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Full text of "Sri Vrat Raj"

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॥ श्रीकृष्णाय नमः ॥ 


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विविधग्रन्थानां लेखकेन रिसच रमकालर इत्युपाये- ३ 
धारणा पॉडतवस्यण माथवाचार्स्पण संपादितया कर ऊे 
भाषाराकया चर समलकत: । ६०) ! 


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मुद्रक और प्रकाशक- 


खेमराज श्रीकृष्णदास, 


अध्यक्ष-" श्रीवेड्डंटिश्वर !! स्टीम-प्रम, बस्बई 





सन्‌ १८६८ के आक्ट २५ के अनुसार रजि्टरी सब इक प्रकाशकने अपने ्ाधीन रकबा है 





पस्तावना. 


७७" आए 


अखिछ विश्वके सारे मानव समाजोंपर दृष्टि डांडकर देखढीजिए, आधुनिक और प्राचीन सभ्यताओंपर पूरा विचार 
.._ कर छीजिए, भूमण्डछके किसीभी छोटेसे छोटे और बढेसे बडे खण्डको के छीजिए चाहें असभ्य कहडछानेंवाले नरोंकाही 
अभूह क्यों न दो ? कोइ भी समुदाय एवं संप्रदाय ब्रतों और उ्सवोसे खाली नहीं है, अपने २ ढंगके सभी उत्सव मनाते 
हैं और त्रत करते हूं । ब्रतोंकी महिसा वेदनेभी बडे ही आदरके साथ गाई है, त्रत करनेवाला सुयोग्य पुरुष जगदीशस्से 
प्राथना करता हैं कि- अग्नेमप्तपते बे चरिष्पामि ततच्छकेयम्‌ , तन्‍्मे राध्यताम्‌ , इदमहमन तात्स- 


तव्यम्नुऐेमे ' हे ब्रत्ेंके अधिपते | सबसे बडे परमास्मन ! में व्रत करूंगा, ऐसी मेंरी इच्छा है में उस बतको पूरा करम्कूं , 
यह मुझ शक्ति दीजिए । यह शो ब्रतकर्ताकी ब्रतार॒म्भसे पहिढका बीत हैं कि, वह ब्रतके पूरा करनेसे मेरा कल्याण होगा 
इस्र भावनासे प्रेरित होकर उसकी सफछलाक छिए परमात्मासे प्राथना करता हें । जब वह घतनिष्ठ होजाता है तो उस 
काछमें सत्य मानता हैं. कि, में अपने जीवनके अमूल्य समयको वृथा द्वी नष्ट कर रहा था उससे अब विरत होकर सच्चे 

उपयोगकी ओर जाता हूँ। जितना में ब्रतमें समय लगाऊंगा वही सच्चा समय हैं, बाकी तो अनूत यानी झूठा उपयोग है 

उससे जीवनकी कोई साथकता नहीं होती । यह हे त्रतपर दिकोंका विश्वास:कि, ब्रव ही सच्चा जीवन बनाता है यही 
कारण है कि, किवमीदही ऋगूवेदकी ऋषाओंमें अत्यन्त सम्मानके साथ ब्रव] शब्दका उल्लेख; किया है- आदित्य 


शिक्षीत प्रलेन, वयमादित्य ब्ले, जन्‍्मनि ब्रते, पत्नो अभिरक्षाति ब्रतम्‌, अपामपि ब्रते ” 
ऋगूवेद ७ भन्त्रोंके वे थोढेस टुकडेभी दिखा दिये हैं जिनमें श्रत शष्दुका प्रयोग परिर्फुट दीख रहा है हाब्दके 
अथेका विचार तो निरक्तम किया गया है | इसे महर्षि यास्क ने कमके पर्य्पायोंमें रखा है, इसी कारण ही 

है कि, प्रद एक कसे विशेष दी है । वृ८"घातुसे छणा।टि धू प्रत्यय होकर प्रत शब्द बनता है । निरुक्तकारनें इसक 
विवरण  बृणोलि ” पदसे किया है कि, जो कमे कत' &ो बूत करें वह ब्रत है। दूसरा विवरण-उन्होंने वारयरि 
पदसे दिया है कि, जो भपनेग्रें प्रवृत्त हुए पुरुषकों ख्री आदिं अपचारोंस रोकता है, यह नियम कराता है, एवं अतेकों 
विपिड़ कर्मोंसे रोकता है; लिन्हेँ कि, परिभाषाप्रकरणमें श्रतराजने गिन २ कर समझाया है | यदि विचार करके देखा 
ज्ञाय तो निरुक्तकारके दोनों अथे ब्रतराजके श्रतपर घटत हैं। यह एक तरहइके सकस्पविशेषको श्रत कद्दता हैं, इस हल* 
राजके प्रतछे अथेपर गद्दरी दृष्टिस विचार किया जाय तो दोनोंक़े अथैका स्वारस्थ एकद्दी दोता हे। महर्षि यास्‍्कके 
अर्थ उसका कोई मी वास्तविक भेद नहीं रहजाता | श्रतराजकारका अर्थ कमके पदार्थंस्र किसी भी अश्र्मे बाहर नदी 
.. जा सकता, ब्रतियोंके सामान्य धर्मों तथा उपवासके धर्मोर्में विस्तारके ख्राथ वे पंद्वार्थ लिखे हुए हैं; जो कि, उन्हें करने 
और छोडने चाहिये । निषिद्ध कर्मांका रोकनेवाठा बत ही ह। क्योंकि, उनके करमेमें त्रतीको ब्तके भंग होनेंका पूर 
इसा है । इसी कारण वह उनको नहीं करता | इस तरह यह्‌ प्रत, त्रतीका वारक भी सिद्ध होता है तथा इसका 

फछ त्रवकर्ताकों प्राप्त द्ोता दे इसके सविधि पूणे दोनेंम उसकी उन्नति तथा खंडित करनेस प्रय्यवायकी प्राप्ति होती है इस 
तरह यद्द पाप और पुण्य दोनोंदी फरलोंका देनेवाछा भी है । अत एवं दूसरा भी निरुक्तकारका अथ ब्रतराजके ₹ 

















304४ पक्के जप३ ३मक ७ तक ९ बाई 


इष्टिपथम पैर समाया हुआ थी। यद्यपि उन्होंने उत्सव शब्दका बहुत कम प्रयोग किया है पर उत्सर 
एक भी इनसे नहीं बचा दे त्यौद्ारोंको इन्होंने ब्रतके कहा है और भिन्न भी प्रति पादन 
सकटपतुर्थी श्रादि जिनमें केवछ उतस्सवक साथ देव पूजन भादि भी किए जाते है। बहुतसे उं त्खवोंक 
पढ्ेख ही कर दिया है । जो केवछ ब्रतका भथे उपवास समझते हूँ उन्हें यह आंति होजाती है. कि 
आजायंगे पर पूर्वोक्त अथोम तो छत्सव भी ब्रतोम ही आजाते हैं । कितनी दी जगह ब्रतोंकी पूज 

४ कलेप्यश्व महोत्सवः३  बढा भारी इत्सव करना चाहिए। इस तरद्द अनेकों उत्सवरों 

होजाता है; वे भी ब्॒तोंमें ही भाजावे हैं। जो जाति जितनी दी नई होती है उधके उत्सव उ8 
हस्खदों का सम्घन्ध, उस जातिके गणय मान्य विशिष्ट पुरुषों क्री अलधारण महत्त्तपूणे घटना? 

ही सम्माभकी ट| 





















हिंसे देखनेवाडे समुदाय उत्सवोंकों जन्म दे देती हैं। समय रे पर इस्छ 






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५2 


लिया करते ह। किन्तु उसका जन्म थोड़े स्मयका होनेके कारण उन घटनाओंकी संख्याके कम होनेसे उनके उत्तय + 
. कम डुआ करते हैं। यही कारण हैं कि, चार छः हजार वर्ष मात्रकी जनमी हुई जातियोंके उत्सव इसने ही कम हैं. कि 
उनकी स्रेख्या डेगलियोंबर ही गिनी जा ख्रकती है ।, अत एवं उन जातियोंकों उनका ज्ञान अनासास ही है । उनके हरि 
हासका झ्ञान करनेके छिए इन्हें कोई कष्ट नहीं उठाना पढ़ता | उनके अबोध बाछक आपही आप अपने बढ़े बुढ़ों 
बातों बातोंनें ही सुनकर जान जाते हैं । पर जिप्न जातिको संसतारकी सभी जातियां अपनेस भव्यन्त आाषीन भा गेक 
नवमस्तक होती हैं, जिसका इतिद्वास ढाम्ों वर्षका पुराना माना जाता हैं, जो अपनेकों अमादि सनातन एवम श्वा 
मानवसमाजको सभ्यता सिखानेवाढ्ा गुरु कहटतौ हे. जिसके अनेकों दी विशिष्ट पुदभोंकी घटना विशेषोध् संत सत्सः 


भौर ब्त इतने कम नहीं हैं नो कि आधुनिक जातियोंके उत्सवों और ब्रतोंकी तरह अगुद्धियोंपर सेभाओ जा सडक । ; 


वह ऐशस्री किसी साधारणकी बात॒क्नो छूकर प्रज्नछ्चितद्दौ हुए हैं जो कि ) बातोंसे ही बता दिय जाये । ले बढ जवण्य व 
महत्त्वहीनही हैं जो कि, उपेक्षाके गड्ढेमें गेरकर बूर देने योग्य हों । प्रत्यककी स्मृति जातिमे नवीन जीवन, रे 
हरएकके साथ जातिके गौरवकी मात्राएं णत्यम्त प्रचुरताक स्राथ छगी हुईं हैं। पूव पुरुषों ॥। गौरवाग्प ६ इतिहास इन 
साथ मिद्धा हुआ है उनकी अ्रद्धाकी अमृश्य कहानी मिली हुई हे जिस अद्धाको योग भाप्यकार कं राव + ॥ आा3, 

कहा हे । इनका स्मृतियोंने सादर स्मरण किया है । इतिहास प्रन्थोंने इनका सौरवॉकी गरियारी ओोपझिक (वा परावृ 
विस्तारके साथ गाया हे । पुराणोंने इनका हर जगद्द उल्लेख करके इनकी प्राचीनवाकी 7न्‍्द भि बजाई 






















है । जँ।क थे; नौ. 
आष॑ ग्रन्धोंमें रत्नोंकी तरह उचित स्थरूोंपर पुवेहुए इन अतोत्सब्रोंका अनेकों पर्मशास्रकारोंत भ्रपनी अपनी शक्ति 
अनुसार संभह किया है | फिर भी रनसे बहुतस्रे बाकी बच गये हैं क्योंकि, जो सृष्टिक आरंभकामी उस्ताव बत कर+ 
हूँ उनके ब्रद्मादिकोंका पता विता अक्षौकिक साधनोंके कहाँस मिठसकता है ? जातिके चधके हुए खिना। १, (३... । * 
आबाल बुद्ध वनिताओंतक व्याप्त थे इस्र गिरे समयके संग्रह कारोंको इन्हें हिन्दृपमशाख्रोंसि मद. लि 0 05१ / 
यही कारण हे कि, पूरा नहीं कह पाय है। फिर भी इनका परिश्रम अगण्य नहीं है उन्होंने अवध पी , 5, >्वाहिबाँब। 
भपमी संप्रहकौ हुई निधि देकर एन्‍्हें अगाड़ी बढनेके लिए उत्साहित किया है। अनराजक छेखफ़को इस पुराने अप्रट 
अच्छी सहायता मिली हे तथा बहुतस्री नृशन खोज करके इस कमीको पूरा कर दिया है। («. ४! अदौौप भा्ेएढ 
विश्वनाथशर्म्मा आजसे दोसौ वर्षके छगभग पहिले हुए थे, आपने पुराण, घर्मशाश्र तवा अनेक राधे: थ. थोक 
इकट्ठा करके समन्वय और विशेष विधियोंके साथ ब्रतोत्सवॉको अपने वतराज अस्धमें रख (॥ 2 ।६ल्‍होँं। ४,०३५ इश्न 
कमीको पूरा किया हे तथा इसमें ये इतने कृतकाय हुए हें कि, इनसे पट्टिछ॒का दूसरा फोईभी दुबे विधस +; बंध करते. 
बाढ्य नहीं हुआ हे । दूसरे संग्रहकारोंके क्तोत्सवोंके संग्रहको अपने प्रन्थमें छेतीवार हमारे: यश की इन ते कोई 
हैतशता नहीं कौ है । किन्तु उसके नामका आदरक स्राथ रहेख सप्रप्ाण किया है कि, अमुकने इस इस पुराणम डिया 
था, रुखे म॑ यहां रख रहा हूं। इनका प्रन्थ ज्तराज नि्णयसिन्धुस कियश्ती तरहभी कम नहीं दे । इनके लिणयक सामते 
फसछाकरभट्टके घमेसिणय अंगण्यसे बन जाते हैं। त्रत और उत्सवोंकी तिथियाँके निर्णय करनेके सप्य इन्हें लिलों व 
खिन्धुक निर्भय बहुतही अखरा है; यहांतक कि, स्पष्ट शब्दोंमें कहदिया है कि, इन कारणोंसे ऐसा जिण। ५9, ?,: | 
है निणय ठौक नहीं दे | यादि दूसर शब्दोंम कह तो यह कह सकता हू कि. निणयसिन्धुकी जिन पा या + माजेत मु ३ कू 
अगूढ़ टीका अमेखिन्धुभौ नहीं कर सका था जिनका कि, जान छेना दूसरोंके छिए महा कटिन काये था, । परि4 















| दूर *, हक] - हि. भर हे रे कह 
2 3 जा रजक सामने अनाथासही रखदों हे। अतोत्सवॉकी विधियोंके निर्णयकी निणयमि- [शी ८१०,) 


हे के 
कम ब्रलराजने भथुमात्रभी मुछादिजा नहीं किया है । यही नहीं, किन्तु सप्रमाण सिद्ध करनेबो 4 मी ही). जहां 
| & बहा हमने यथाज्ञान इन्हें परिस्कुट करनेकौ चेष्टा की हे तथा करतीवार इस्र बातक़ाभी ब्यात रखा है 
रण पे बदुनेपाये। निज्वेष कहतीबार [_] इसकोष्टकके बीचमें कहदिया हैजब इकनेस भीटा! शन्‍्तों। 





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ष देकर :उस्रविषयको पूरा प्रकटकरनेका प्रयत्न कियाहे।दूस्नरे स्थछों पर भी जहां हरापटि-: 5... 2 
केक पूणे चें्टा कौ हे । यह सब कुछ करके हम इसी परिणामपर पहुंचे है कि, |. .” 
>यन्थोक 5०: कार मे. । । * | 0. ५ श्र ' जीने | क; द | भ । . 
का परिष्कारही ब्रत्राजके नामसे श्रीविश्वनाथजीने करढाला है ' इसके सभी मिल्‍ूय कक , 
हो टिक हूं जो कि, आजतकके किसी धमंशास्रोंके संप्रह करपेवाेग ,। है है. 
| है, द्स 8 करंयाणकारी विषयॉपर ध्यपन न दिया हो. रा७5४) आर टू 8 












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होगे कमंकाए्हक बहुत बड़ भागकोी !हछा हैं। देवोपासनाक लिये तो इसने अमृतक निधिकाही काम किया है। 
'बॉफे पत्ते, धषासल एबम उसकी प्रिश स्त्री इसने पृणरूपस दिखाई हैं । जिनके बधप्रयोग्स उपासक इृष्ठदेवका 
ताक्षात्‌ करसकता है, जिन जिन विशिष्ट पुदुषोंने उन विंधियोंसे इष्टद््‌वका साक्षात्कार करके अपने ऐहलॉकिक एव 
कछौकिक कार्मोको पाया हैं उनका पूरा इलिहास शन्य प्रशाणों कर साथ दिया है जिसके देखनेसे कलियुगके कलुषित 
की भी श्रद्धा उनमें उत्पन्न हो तथा वह भी रख्यपुत्॑ड अपना कल्याण करसके | हवनादिका भी बहुतसा विषय 
#र्थी है अनेक तरहकी आहुति और भद्दोंक भी विधान विस्तारके साथ आये है | कोई भी छोकिक कर्मकाण्डका देवता 
की महा होगा! जि ५: कि, पूजन हवन इसमें न आया हो | सतदीक्षी सब बातें विस्तारके साथ, आगई हैं। बत- 
कि उताओे मानवीय उर्शशाणा थी बहुत बड़ा भाग कहृदिया है, जो हि जाहि त: «णॉरपे इधर उधर सुत्र्भ 
णिक्की तरह पिरोया हुआ है। हविष्य !सलुओंके न्ामपर खात्रालाशुकामी निणय करदिया हैं। इस तरह इन्होंने धर्म 
सके क्रिसीसी छप्योगी सालजनीय विष्यकों नहीं छोडा है । जिन्हें देखकर हम यह कह देँ कि, श्रतराणके नामपरे 
मी मेक जि लीं अखिल 7] देश है, एवं जो भी कुछ ऊत्याएइवट, छतझछाप है बह सब उसको कह- 
[या है तो कोई अत्युक्ति 7 होगी। "3 फछके कमकलापमें ऐप्ले अनेकों ही मन्त्र प्रचलित हैँ जिनकी कि, भाष्यकारोने 
कसी दूसरे देवतामें योजना की है तथा उनका आधुनिक ईसंछाण्डमें दूसरे देवताले पयिषयमें विनिय्ोग देखा- 
ता हैं ऐस ही दोसौके छगभग मन्त्र इस ब्रतराजमें भी आये हैं जिनका कि. अथ यहांके विनियोगके अनुसारही 
॥गे किया है । जहां तक हो सका हें यह भी ध्यान रखा है कि, किसी भी भाष्यकारसे विरोध न हो, यह योजना 
! इस 0२ जकी टीकाके दसरी जगह कम देखनेको मिलेगी। यह कियासी इसी उ्देश्यसे हू टि,सन्त्रदे अथसे उसी 
बताका परिषृण अनुसन्धान करके कर्म्नलापकों खर्बोत्क्टॉंगुणवाछा बताया जासके; क्योंकि, बिना देवताका' अनु- 
हुधान किय उच्च कमको श्रतियोंने उन्तम नहीं;बताया है । जो मंत्र यहां जाये है वह ही आजक कृथ्रझाण्डके प्रन्धोंमें 
हीं होंगे विनियक्त कियेगये हैं । इस अथने उनके लिये वहाँ भी पथ दिखादिया है कि, इस अर्थसे उनदे देवता 
का अरुसभान ए7 दीजिये | बेदके भाष्यकारों हा अथ वहांकी व्यवस्थाक अनुसार ह। ऐसा क्यों क्रियागवा इसका | 
7। भी वहाँ टीका 27.75 ५; गया हैं । यद्यपि पुराना पक एसाभी आर्प संग्रदाय था कि, मन्त्रोंका अर्थ न मानकर 
बअछ मज्जोंमे आय हुए नाम्रोंक अलुसार विलितोगों गे व्यवस्था करके उन्हीं नामदाले सनन्‍्त्रोंस उस सामके देवताओंकी 
[ति करने छह ता था पर लिकुफने इस कोई महरूर नहीं दिया है तथा भा.वि :खिकिए अपनी शिक्षार्म' अथके अनु 
बानके विना थत«वोगयो निरथक बताया है । इस अथस रूप जाव्डी ब'स्यजिक् छाम उठा सकेंगे यह हमझकर इस 
टीका उनका विलिर नुसार अथ ऋरदिया है ! 0५. ८.0००५ और _जा ब्रतादिक लिखनेमें अन्तर तो यही 
है कि. निशमसिन्धने प्रत्येक मामके जुद ज॒दे ब्रतोत्सव दिखाय है पर उतने साखोंका हिसाब छोड़कर विधियोंका 
हिसाब लिया है । रिपदाण लेकर 5४:५० सब त्रत और उत्सव एक साथ दिखा दिय हैं इसमें भी निणय 
सिन्धुस इसदी संख्या बहुत ज्यादा है। वारत्त ते निणण्सिन्धुमें है ही नहीं । इनके सिवा और भी अनेकों क्त हूँ 
का कि इस अन्थों मे कोई धरसेप्ती नहीं आया है | सब 767 विस्तारके साथ कहे गये है । इसमें व्यय कियगये 
कालकों तो हमण | ताएये साथक समझा है । 5सर्ग एक हमारी (7७४ यह भी हैं कि गजुस्मति आदि 
सभी पघमण। जक अन्य पाषोंके आयशित कबनेमे के |) ततकुरूफ भाम्यायण आदिका विधान करते हैं अतातमकों 
गभीर रृष्रिसे दल तव थी ये सत्र उप्यासों: ू४; - हैं जो कि; ब्रतोमें रावा. थे रीतिसे विधान किय +% ' 
ही नहीं, शवोंयी 7 टनिरोंए कम उपवास हों. शासोपतास बतके उपवास तो प्रायश्ित्तोंके उपद्ःसोते भी अग।... 
बढ्गये है । अनेकों भव्य पुरुषोंने भी अपनेको तोएएरगों 5 शुद्ध करकेद्दी सुखमय ईश्वरीय याज में बसनकी योग्वत 
पाई थी। ये ।समतोए- करके पुरुषको केबस्यत? अधिकारी बना देते ह। इस कारण धो: छामीको भी शववासात्र 
पादुय हैं। सकाम पुरुष इनको विधिक साथ जाझो .7 पूरा करके अपनी कामनाश्येको अन ही पाजाते हैं अत" 
हव आुक्तिक जा।नी यही है । करिए ए वााप्िषप्टी शिक्षा भादि वेदिक ग्रन्थोंमें भी तो यही बाल है. । पतित प्राणियोंको 
ड्य टिका "एस 7 बतही तो ह पव सभी :70 7४ शिष्ट पुरुषों में देखा जाता ४ । ऐसे ४5 /िएुछिलेपादक बरतोंका 
7, हमने अपनी ४ डगौग मनवरत (ण्टिसके साथ किया, है कि, अतगाजक वाह हुए सब जन आदिकॉको तो 
शायद इस जीवनमें ले करस सं घगके पापहरी परम पवित्र स्मग्णसेदी अपने 7पॉनो सध्डाए 


। 


! 22000 42275 हे ; 394 2600 260 25008 0260264755 खक90/7 77%: 32 
कप हक अफियोश जा ६ बलियमाथ कल पोफेसिलिफारमब्कत. ह५.. जता फणामा्रमलांसहाानापाशपपथाकपात भाप मन दफा. "लाना... शरण 








आओ 
रत 
चर 





अर, 


























. 















७७ अ्रवराजमें आये हुए संग्रह अन्थ-हेंसाट, कल्पतरु, मर्दंनरत्त, प्रथ्वीचन्दोंद्य, गौडनिवन्ध, पटूप्रिंशम्मत 






शेखर, शारदातिहक, पद/थादिश, गोविन्दाणंव, भाग॑वाचनदीपिका, माधवीय, : ज्ञानमाला, निर्णयास्ृत, देवनिर्णध 
_ आचार/मयूख, दुर्गाभक्तितरंगिणी, शिवरहस्य, काछादश, रुद्रयामछ, अद्धायामछ, वाचम्पतिनिबन्ध, पुराणसमुख्यय 


आदि ग्रन्थ हैं। ब्रतराजकारने अपने ग्रन्थमें इनका उल्लेख किया है। 


. _पुराण-त्रह्म, पाद्म, वेष्णव, विष्णुध्, विष्णुधमोत्तर, शैव, लिड्, गारुड, नारदीय, बृहन्ञारदोीय, भागवत, आध्ेय 
: ककान्द, भविष्य, भविष्योत्तर, अश्ववैवर्त, मार्कण्डेय, वामन, वाराह, मात्स्य, कौर्म, अज्ाण्ड, दृबी, भारत: आदिश्य 
पंचरात्र, गणेश, कालिका, नूर्सिह, अगस्त्यसंद्विता आदि इसने पुराणोंम आये हुए ब्रतों और उत्सवोंको तथा ब्रत और 
उत्सवोंस संबन्ध रखनेवाढे विशेष वचनोंको ब्तराजमें रखा है | स्कान्द और भविष्य तथा भविष्योत्तर और विप्छा, 
घर्मोत्तरके ब्रत अधिक संख्यामें आये हैं | 
_ स्मृति-मजु,याज्ञवल्क्य, नारद, देबर, विष्णु, हारीत, यम, आपतस्तेब, कात्यायन, बृहस्पति, व्यास, गदर, पक्ष, वच्िण्ठ 
इद्धसिष्ठ, सत्यव्त, पेठीनसि, छागढेय, बोधायन आदि आई हैं। 
























. बेद-ऋगू। साम; यजु, कृष्ण यजु और अथव तथा दूसरी दूसरी शाखाओंक भी मंत्र भाये हैं। कर्मकाण्ड 
यद्यपि उल्केंस नहीं किया हैं पर अन्थके कल्वरको देखनेस पता चलता है कि, कमंकाण्डका भी कोई प्रस्थ नही 
बचा हे | इसकी भाषाटीका करती वार हमें इन अन्धों मेंस जो मिछ्सके उन सब भन्‍्थोंकों इकठ़ा करना पढ़ा तथा इनके 
अछादा और भी बहुलस भ्रन्थ हमें इकट्टे करने पड़े । इस प्रन्थका पूपक्ष आदि दिखानेके लिये नि्णयसिन्धु, घमसिन्धु, 
जयसिंहकल्पहुम आदिका उल्ेख किया है तथा चारों वेदोंका सायणभाष्य और मिरुक्त आदि बदिक अन्थोंका भी एप, 
योग हुआ है ।'सर्वेदेवप्रतिष्ठाप्रकाश, गोविन्दार्चनचन्द्रिका, मंत्रमहाणव, मंत्रमहोद्धि, नवग्रद्विधानपद्धति, अतिप्नार्सप्रह 
मुन्त्रसंहिता, प्रहशान्ति, पारस्करगृह्मसूत्र, आपस्तंबसूत्र, सूय्येसिद्धान्त, :महरलाघव, छीछ [हूर्तेचिन्तामणि, तू 
ब्क्‍्योतिषाणव, कमकाण्डसमुश्यय,आश्वछायनसूत्र, व्याकरणमहाभाष्य, वाल्मौकीरामायण, हिरण्यकेशीय बक्षक मंसमुचय, 
भादिका भी टीकामें उपयोग हुआ है । इन अन्थोंके प्रमाण आदि हमारी टीकामें मिलेंगे। कहीं हमने नामनिर्ेश कर 
दियाहे तो कहीं विषय दिखायाहे उसके नामका और कोई संकेत नहीं किया है । इस मदग्रन्थर्म हमें एक वर्षके करीय 
अनवरत परिश्रम;करना पडा । फिर भी नहीं कह सकते कि, यह परिपूणे होगई क्योंकि, मानवी बुद्धि कहीं स्थगित 
होती ही है | सायणाचाय्येके अनुभवके अनुसार किसीनकिसी कक्षामें अज्ञाम रह ही जाता है। यद्यपि बेद्‌ पुराणों 
संभिद्चित,सेवा करनेके पीछे हम छिखनेके कार्य्येसे विरत हो छेखिनीको विश्राम देते हुए दूसरी रीविसे धर्मसेवार्मे लगे 
हुए थे, दूसरे शब्दोंमें यह कहें तो कह सकते हैं कि, हम अपने अधीत वेदवेदाज्ञोंका उपयोग करना छोड़क र निरयंक 
ही सुढा रहे थे कि, भारतके अतिप्राचीन “ श्रीबेंकटेश्वर ” प्रेसके स्वत्वाधिकारी एवम्‌ क्षेमराज णदास 


नामके प्रसिद्ध फमंके अधिपति भनातनपर्मभूषण रावबहादुर सेठ श्रीरड्रनाथजी वया अ्री के 


से 












# 



















छा सा ३. टी 
"रम सहदयताके साथ कलमसे देश और धमंसेवा'करनेमें अम्सर किया। यह उन्हींकी प्ररणाका फल 
हमें; अह्यसूजका + _ पावपकाश आदि तथा अतराजकी इस भाषाटीकाकों धार्मिक देशदासिद्ोर् 
रख से मे 5 2१3! 
न सर कार इनक हृदयसे घमके .छिये कितना प्रेम पं कितनी श्रद्धा हैं कि, धर््रयारके 
ला हुए प्रतिवादिभयेकर अठक अधीश्वर राजसम्भानित जगदूगुरु श्रीमद्नन्ताचार्यजी महाराजको देख मुझे 
अर न अकीफ पहाड़ी स्थानोमें भी छोगोंमें घा्मिक जीवनकी रूहर वहा देनेके छिये भेजा। यही क्‍यों! सनात्ल- 
क्‍ बा आपने कफ समयपर अपूब त्याग किया हे । भारतके विशिष्ट पुरषोके स्मृविचिन्द्दोंको देखनेकें लिये भने 
द ब्ोचपोत .... था मकर देखा हे ! यदि थोड़े शब्दोंमें कह तो यद्द कह सकते हैं कि, यह उन्हीं की धामिंक भावनाओं 
. आजम ते हुईं. रचिर प्ररणा हे जिसे कि. मैं' इस भा' े _थ 
पा पड 5 है सनंसा 200 रण ! में, प्तराजकी इस भ्राषाटीकाके रूपमें रख रहा हूं । 
.: “पंल्वंकके विषय-सेगंदाचर एफ क्रते का मन ५ 
देवता । मा मक भहिसुस॑ हक 2 कक किए ३ सिलर » पेमें, प्रायश्वित्त, उपवासधम, हविष्य उपयुक्त रद्रमेडल, बस: 
बुर जादि वे लिएय हैं, जिनका! सभी रो उक्त वस्तु,भद्रसेंडछ, इसके 
2. ढेकर जम्रावसतककी तिथियोंके ब्रत तथा दोड़ी भादि सब 






































. श्सच, प्रतोंकी देंब पूजा, कथा, उद्यायन तथा विधि और उनकी तिथियोंका निर्णय एवं ,अन्य ऐतिहासिक बृत्त है, इसके 
पीछे वारत्त हैं । इनमें प्रत्येक वारके सूये आदि देवोंका पूजन ओर उनकी. कथाएँ वर्णित हैं । बुध और “बुंहस्पतिके 
ब्रत हमने और भी दूसरे अन्थोंत्ते छाकर जोढ दिये हैं । कुछ प्रदोष आदिके ब्रत भी ऐसे ही गयेहँ (जो वार तिथि 
दोनोंसेद्टी सज़न्‍्ध रखते हैं। व्यतीपातके ब्रत दान आदि।आये हैं जिस्रके लाराके प्रकरणकों 'किकर हमने एक /वेदिक 
.टिप्पणी दी है। संक्रान्तिके प्रकरणके पीछे रक्षपुजा आदिका प्रकरण आया हैं। पीछे मंगछागौरीकें त्त आदि आकर और 
भी बहुतसे ब्रव भादि आये दूँ द्वो कि, भनुक्रमणिकामें सब भिन्न भिन्न करके दिखा दिये गये हैं. और भी अनेकों धम्म- 
शाखरके प्रयोजनीय विषय आये ह्‌ ज़िनका प्ष्ठाइ[अनुक्रमणिकामें लिखा हुआ हैं पर मूछमें कहीं मासोके मार्नोमें हेर- 
फेर हुआ है। हमने उसे अविरोधके पथसे लेजानेकी चेष्टा(की हे फिर भी विवेकी पाठक उसे सुधारकर पढ़ छेंगें । 
यद्यपि शिढायन्त्रोंसे किक्कीही वार मनमानी रीतिसे दूसर दूसर प्रेसॉने इसका प्रकाशन किया था, पर इतने बडे धार्मिक 
सान्य प्रन्थका पदार्थ विचार एवं धर्मशाखके दूसरे दूसरे मन्थोंको रखकर सेशोधनपूर्वक परिष्कारके साथ किसीने भी 
इसका प्रकाशन नहीं किया । [धमंशाख्रके प्रतिष्ठित ग्रन्थकी यह दुर्दशा देखकर अनेकों माननीय पुरुषोंके मुखसे उच्च- 
: श्वरसे यही शब्द निकले कि,ऐसा न होना चाहिये;इस प्रन्थका सुधारके साथ यथायें रूपमें प्रकाशन हो। हिन्दू संस्क्ृतिके 
पोषक एव शास्रोंके उद्धारका अनवरत ब्रत रखनेंवाले वेकुण्ठवासी सेठ: श्रीक्षेमराजजीने खाडिछकर आत्मारामजी 
शास्त्री तथा महाबछ कृष्णशास्त्रीको आमंत्रित करके इसका संशोधन करा, आवश्यक टिप्पणियॉसे मूछका' परिष्कार 
कराके आजसे ४३ वर्ष पद्दिल़े अपने श्रीवेंकटश्वर प्रेंस बेबईंसे प्रकाशित किया । अबतक यहे ग्रन्थ (कितनीही वार उसी 
रूपमें प्रकाशित हो चुका हैं। हमने हिन्दीटीका छिखते|वार इसकी टिप्पणीपरभी ध्यान दिया है एवम्‌ यथाज्ञान मूल 
' और टिप्पणीकाभी संझोधन किया है (तथा उसके दिखाये पाठभेदोंकाभी अथ करते चले हैं,जहाँ कि, हमने उसका अर्थे 
दिखांतां आवश्यक समझा है । [पद्‌ पद्पर इस बातका ध्यान रखा है कि, धर्मशाखमें, हमारी साधारण बुद्धिके दीषसे 
/ कोई उछटा सीधा अथ न होंजाय जिससे कि, धार्मिक जनोंके! हृद्योपर कुछका कुछ प्रभाव पडे । आदमीके हाथसे 
ढिखी/हुईं टीकार्मे कोई गलती न हो इस बातपर हृदय विश्वास!नहीं करता क्योंकि “भत्य॑स्प चित्तममिसंचरेण्यम!ः 
भनुष्यके[चेचछ चित्तका क्या ठिकाना है ? आज एक बातका निश्चय करता है तो कछ उसको ;असत्‌ समझकर उसे 
त्यागनेको छशावढा होता ह । हां, मेरेसे जितनाभी हो सका हे शुद्ध ही संपन्न करनेकी चष्टा की हँ(जो कुछ किया है 
बह धार्मिक जगत॒की क्षेवा तथा बिद्वानोंके मनोविनोदक भावको' छेकर ही किया है कि, धार्मिक,जन अपने अश्विष श्रतो- 
स्सबॉका जान अनार [सही प्राप्तकर सकेंगे । तथा विज्ञ!7० न इसकी सरठतापर [प्रसन्नता प्रकट करेंगे आशा भी यही 
करता हूँ कि, भारतक सभी सप्रदायोंके सुयोग्य हिन्दू इस (पत्ता कर हमारे परिश्रसको सफछ करेंगे ॥ 


विदुषां वशवद्‌ :-< 
प० माधवायार्य्यः । 





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ञ्ि किनाण्व।ज भंजचतराशीः रुप भािगर सु: 
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ः दफन "या पधकको ४ ८ | हि लनिधदि नंशु के नि न्त है मन | [9 
सवेषां नस्तनोह अतिदिनशुदये श्रीहरिः शान्‍्तर्मा 


हे ह ।7॥ ५5 | 0 कह आ 4 हर न 
जगन्निवाश्चस्य हरः परतन्षी जनो भुत्रि 4 अध्याय 5 57 0025 2 4 ४ 45९०५ की 
है अध्क्कलरर * | हि का ॥५ कआ८ ६ के 9 गुल्कु के. नी पक दूध ब्कक्ज न ४ हि | है च ॥] 
अस्माभित्रतराजस्य बविश्वनाभकृते: खलु | अनन्‍्यन्व/लयवयेदद 7५ , ४३०१२०१-१ ७ || 
|] रे मारदेनानवेरि 2 ०28 ही हवा था 4 उपलककल ७ 
ढेखकाग। पाठकारगों प्रसाद्नानवरस्थितेः | सम्पूछ वायापाव ह्ठा कारंग्रइण वे ॥ ४ 
| श्खै 


। | 
य्यं 4६4 /#॥ श्रिः पु स्‍क५ है ह:दह। ने एव 0, ४ १२... *; के 7 डा 5 है ई 
सारट्य सावधातु 'ब शांखिलसइडछाम्डयां । शा साश।पा। 5, बस्ती) कर 0 क ६, 
है 
५५ हक 2७५ 


ऐ धरा यज्ेस जूत ्ध ० 3 है| हि ४ २>मक्त छ्द्य थे ४ " है ५४ ञ | हे ४ |] ये हे । | 
ताभ्यां महातयज्ञेप सब स्यन्वान्बिछोब्य व ॥ स्वछे स्थल ६. मीौरि: बहकाय ... '... | २॥॥ 


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असल कि लक 
जिस समिकिक: 





टि पूर कप प्निः ८90507 0८६२२ ५,४ * देय के | न्‍्थों हर ' ॥ 
खसब।त्सयपय | थे 3 53 | ४ २३४, ५ १97३० | साउग्र अन्य ,3 4 , » ८४ई,६ / | * ० । | | #।| 


नंगारिनागधरनीमितीय/एद्ध:7 5: ]) आरोहणेन स्थाविष्य्प ब५,5ब- ०-५: || ८ | 
परं त्वस्थ च्‌ ग्रन्थस्य कर्मणा स्वेन सूचितः ॥ हैगिप्ठ ,८ ५...) मे उध्यवरयय: न कक की 
भोरेश्वरो बापुजीजो5विधायवास मुद्रण ॥ अठो सो हटास्मामि: धूजितों ' नेब अदला, । ॥ !०9॥| 
 इलि तन्नोर॒रीक्ल्ल गथाथ्रत्रि अमुद्रयन ॥ तयोड-ताि दावकोरोज्याना मै वजर | ४१ ॥ 
जल्ारूघनीयधीशस्य पुरो वादः प्रब्तित: | तत्र साब्यादिशिनां: विपुरीकारिंद स्रति | १२ ।। 
न्‍्वायाधीशमुखादेषा निर्गता वे सरस्वती ॥ प्रतिधाटिसुदिलोपथ अन्धों बाह्य थे ॥ + ५ ॥॥ 
सब देथं बादिने च सत्वरं प्रतिदिन, ॥ इलि तन्निंगंतां "दीव.. ७.9. ८ ४ २४ ॥| 
लक्ष्मी निगमर-्जे वा. कु बेखित पुनः स्वयम्‌ ॥ अपीला रू द पादशोष अज्लाम्रे 
:. तत्रापि बत्येतरमौश्मज्या खुविपक्षयणों ॥ स्वाशा देशों डा ,पी 
 भाष्टअेमेलज्रेब सत्यः प्रतिवादों रविष्यति ॥ 3 2 क 
कूतअ् निश्चयश्ञापि जल्लेन मअथमेन यः | कृत निश्चय: सोपएथ सत्य ख्थान्यथः ने हि॥१८॥ 
शवमुक्तना बिवादख् स्म्पूणः समकायत ॥ फारगुन 2/बक्पक्ष-4 दृशस्थां भौमवास/ ।) * “, ॥| 
दक्षाधिफा्टाइ झाल्बशतते श्रीश्ञाद्धिबाहन || सत्य ख्रवंत्र जयति सत्ये सर्थ ५ लिपिनम्‌ ॥ २० || 
'सत्येन बद्धंते कौलिंः खत्येन सुखमभेधते ॥ असत्यं सर्वदा धेयमस-येनायशों भवेत्र | ६१ ॥ 
यजप्यसत्येन जीयाश्सो दष्याश्म न किम्‌॥ स्रारमित्य विजानन्तु सुध्ियो न्‍्यवट्ारिणः | | “२ ॥| 
न मन्तब्य छदा ग्कन राजसैदिरवत्मनि ॥ बय विजयिन: मुज्ञास्तथापि कि द अहन || २३ |] 
बहुद्च्यब्ययों नूनसुभयोरपि जायते ॥ तत्रापि किंचिजयिनों रुष्पमित्यभिभायत ॥२४॥| ः 
पराजयी तु घुदर्रों इंझ्माजाति स्वतः || तस्मायदि जना! सुज्ास्तदा आणप्वतु भे बच: ॥ २५॥। 
(- बिबादे तु खयुत्पन्न इभयोरपि स्ांत्बनम्‌ | उभ्ाभ्यामेव कऋतेब्ये नान्यस्थन्र निचायताम ॥ २६ ॥ 





रे मा] रथ ३ र्क हि ; हब ष्जु पृ के द ॥0)॥ 


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हि के है. ॥ ० हे ु ॥ 
शा +५ ६ ४, + 76६ ५६] /* ६ डा 


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नो न्महादुद॒क्ा स्वाइन्मशंत्वीधि सज्नना: || २७॥। 


( सत्दय-. ३ ब पहिद इसे टिप्पणीके रूप ह 
बेब खा शस मुझ टिप्पणीक रूपम प्रकाशित किए पीछे मोरेश्वर बापूजीन अविनारफे वज्ष हो श्रका 
0, छ इन्हें खचके साथ पुस्तक अर्वेकटेश्वर प्रेसकौ देन्ौ पड़ी भी इस्रीका विवरण इन 'होकोमे है! 




































*- रे ०.7 हित ३ //आरी 2/0७ कि 27570 /5207 82 शणी (07782 // सन 
0. दशीकमक 2 शहआ मे हरय कलथे का. 3... (मकर. स्‍धपब «००५ १ ऋषामाभमपरजाकपंबमाकापरदाा॒बजलक- नद#प्ाजतकक कैश "जे. न्‍लमादपोकपवी॥०+ जानने (% 2. छिपे भर 


विषय: पृष्ठाक: 
लटक 
परिभाषाप्रकरण । 
भन्नल्ाचरण ला, 
ग्रन्थकाप्रार्भ्भकाल ' ड़ 
जतका लक्षण हि 
ब्रतका समय रा श 
ब्रतका निषिद्काल १ 
देश भेदसे निषेष ३ 
तके आरंभ और समाप्तिकी तिथि ”! 
अतारंसके बार डे 
द » योग ११ 
: ध्तके वर्ज्य दिन 2 
भद्राका विचार श 
ब्रतके देश ह १? 
व्तके अधिकारी . 
 ज्तमें चारों बणोका अधिकार है 
व्तमें छ्लियोंका अधिकार ११ 
ब्लेस्छोंका अधिकार ग् 
ब्ेश्य शाद्वोंके लिये दो रातसे )2 
अधिक उपवासका निषेध ६ 
सघधवाकों पतिकी आज्ञासे अधिकार ?? 
यज्ञ आदि नहीं करसकती ?? 
विभवाका अधिकार ? 
ब्रतके धर्म ' छ 
संकल्पकी विधि & 
पौदेके कृत्य 2? 
अश'्तकेलिय विशेष श 
बिनालापेहीप्रारंभ ?ः 
व्रतिथोंके सामान्यघर्म ८ 
ब्तकी देवबपूजा ११ 
ब्रतकी देवमूर्ति १? 


बतीको ऋतुकालम ल्वृदारगमनकी आज्ञा?! 


इसीका दूसरा पत्त 


मांससझकत ध्तु गे 
आरंभमें नानदीमुखश्राद्वका विधान . ९ 
संकरिप त्तकों न करनेका प्रायश्वित्त ?? 


विशेषपरिर्थितिमें प्र।यश्वित्तका अमात 
प्रायश्वित्तकरके फिर अती हो १ 


उपबासके धर्म रा 
उपवापका भ्र्थ १ 
उपबासीके गुण ५; 
उपकासका रूदि अ्रथं ;. १० 


उपबास और श्राद्वमं दातुनका निषेध? 





(४ हू 
ह ४ 4 कं है ५ हा भें श छः ६ धर ५ 
/ हम, + 
ड है 


20260 5/2%:/0:000022 0 /ैअष्यना 23 क 202 ाथ०४2 22222: कि ४2:789 82 ३5 
उधरण्कद्रपर्द ऋजेर भी जपन'. ७ अनारअआकस+काकों अपाफपार) 4िीकल्‍०९७०. २ “कप बपे४८केपेरप +ल्‍+भक३० कर. ॥ ५ ककनतरककॉमिनरको मार्क यमन क. कृपकानात ।पजतोपे-अभमाताइअभपपान्‍कनकी 


और “ 
व्रतराजस्य विषयानुक़रमणिका । 


विषय; ' 





समय पानीपीनेकी आज्ञा... १० 
ब्रतकी पारणाके नियम १) 


ब्रतमें अन्नके स्मरणआदिका निषेध: ११ 


उबटनआदिका अविधघान है 

पतितआदिके दशनादिकोंका न्षिध 
करनेका प्रायध्ित्त हे 

सन्ध्या अब करें .. ?) 


सूथ्योद्यके विना दान बतका अभाव १२ 


आचमनसे शुद्धि १9 ' 
प्रशवका उपयोग | )१ 
झ्ियोंको अतकरनेमें सुविधाएँ १? 
व्रतिनी रजल्वलाकी व्यवस्था... 7! 
सूतकमें व्य उस्था , 
त्रतकर्ताके प्रतिनिधि हक... आई 
काम्यकर्मके प्रतिनिधिका विचर हर ड 
किनके प्रतिनिधि नहींहोते १२ 
व्रतकी दविध्यची ने ? 
मांसका विवेचन १२ 
ब्रतकेलिय आजश्य कवस्तुएं १७ 
पंचपद्षतव ) हे 
पंचगय्य ?) 
पंचाम्ृत १६ 
तीनमघुर अर 
छः रस. न 
चतु'सम ( चारपराबर ) हा. न 
सर्वेगन्ध 79 
यक्षकद्‌म या 
सर्वोषधी .... ११ 
सोमाग्याष्टक ह ?) 
अशक्षअर्ध्य १) 
संडलकेलिये पांचरंग १) 
कोतुकर्सेज्ञ क न्‍ 7? 
सातमृत्तिकाएँ १५७ 
सात घातुए. ११ 
सात धान । 
सत्रह धान १? 
| अठारह धान ; १? 
शाक्र )) 
कलश १? 
उसका परिमाण )9 


प्रतिमा और उसके द्रव्यके परिमाण . !! 
जहां दोमकी संख्या न कहद्दी द्वो भृ८ 


अप्मिमु व कर्म 
झा धानादिकर्म 





कै '+लपकटटर/मिकप  आपप पिन कम नर काल टन्‍उणज 7५ है सेन 42: 7 कल _टपीरिल्‍ह के 40708 घत सार कमी छत मक+ करती ४३7७ ४० फरआ पर: यह पक 777] 
उन 
वि ट् ँ 
/2॥ थ्ृ के 





प्रष्ठाक: 
धान्यके प्रतिनिधि १८ 
जहां मंत्र ओर देवता न कहें हो वहां ?? 
मूलमन्त्र बनानेकी विधि १) 
द्रव्य के अभावमें प्रतिनिधि १ 
पवित्र ११ 
| १९ 
अ्रमृतधूप १३ 
दशाडडधूप १ 
सुवगमान )) 
रजतकामान ११ 
तबेकी तो ल २० 
काप्रॉपणका विवेचन !ह 
धानके बॉँट १५9 
होमकी चीज! मान ») 
इसी का दूसरा मान न 
होम द्व्यके प्रतिनिधि १' 
आहुति केसे देना ' ( 
यवादिक्रे प्रतिनिधियोंका अ्रभाव 5३ 
'ऋत्विजॉका रण ११ 
अद्तवच्र + लक्षण ») 
आच!येआदिक भूषण १! 
श्रतका आग मधुपके )) 
ऋत(्विजों की संख्या 75 
दक्षिणएविव्रान | ;) 
सर्वतोभद्रमेडल ११ 
लिंगतो मदर “क। 
चतुलिंगतोभद्र 7 
द्वादशर्लिंगोद्भव २४ 
मण्डलों के देवता ओर उनके 
आवाहन।दिके मन्त्र १$ 
| लक्ष पूजनकी उद्यापवर्वि(धि २९ 
आचार्य्यका वरण ११ 
ऋत्विजोंकी प्राथना ३० 
दुष्ट परवोकी निष्का तन )9 
पंच गव्यसे प्रोत्तण ४) 
स्व॒स्ति प्राथना १! 
शग्न्यु तारण ४१ 
प्राणप्रतिष्ठा ११ 
क्लशपर देवपूजन २२ 


पुरुषसूक्तके मंत्रोंस घोड शीपचार पूजन 77 


३४ 
रे 








प्रश्नांक: 
स्विष्टक्त्‌ होम 3८ 
मुदाओंके लक्षण, और नाम डरे 
उपचार हड 
अडतीस उपचार ; 
षोडश उपचार ५ ११ 
देश उपचार पु १ 
रातिपूजनके अनुपधुक्त उपचार ४० 
पाद्ाञ्ञ ४ | १) 
आखचमनाह़ है 
श्रर्ध्या ड़ है १9 
उद्गतंन 79) 


स्तान पात्रके द्वव्य 
उपचारके सब द्वब्यका प्रतिनिधि 2 
पूर्ति आदिके स्नानका निशय है. 
देव पूजनके देय पदाथ 7? 
शंखके श्भिषेक १! 
जिम त्तका उद्यापन न कहा हो उसमें ?? 
उद्यापनके कथनपर ९४६ 
खंडितव्रतकों पूरा करनेकी विधि )9 





हू जा ज्णा हुजऊ जयूदणायु ह जुचू३ह ॥ 








यमद्वितीयाका निशुय, यमुनाक्षन ... "! 
इसके कृत्य हे 
यमद्वितीयाकी रु था, व दिनो कटा थ से तो तन 5 


इसीमेंभेयादोज और यमपूजन ८ 


ततीयाक गत । 


सब तरतोंकी सामान्य पूजाविधि._ ४७. चैत्र० शु० तृ० सौभाग्यशयनत्रत.. ८१ 
५५ आह सतीदेवी ओर शिवपूजन आदि पर 
प्रतिपदाक त्रत॥ ., इसीमें गौरीके डोलाका उत्सव ८४ 
चन्रशक्का प्रतिपदाके संबत्सरके प्रारभकी विधि | इसीसें मनोरथ तृतीयाका अत के 
इसमें उद्यव्यापिनी तिधिका विधान उसकी कथा हे 
उथा निणंय ?! । इऋन्यतीका बत ८९ 
महाशान्तिका विधान ? । अहन्धतीके पूजनकी विभि हे 
पूजन 7. अद्न्थती अतकी कथा ९.० 
चे० शु० आरोग्य प्रतिपदाका अत ५३ | इसबतका उधापन ». ९२ 
च० शु०विद्या प्रतिपदाका व्रत 4४ | वेशासशुक्तृतीयाकों शत्यतृतीयाका अत ५३ 
चं० शु८ तिलक अत ? | वैशासस्रान है 
साधारण ल्लियोंको बेदका अधिकार नहीं५५ | परशुराम भयन्ती ५४ 
चेंत्र० शु० प्रं० नवरात्रका प्रारंस ५६ अक्षषतृतीयाका नियाय १) 
चं० शु० प्र० प्याऊका दान और बसे इसकी विधि १? 
घटका दान ५९ | इसको युगादि कथन ओर कर्तव्य हे 
श्रावण शु० प्र० रोटक ब्रत )) | कथा १) 
ु उसीमे सोमेश्वरके पूजनकी विधि । ज्ये० शु० तू० इंभाजत ५६ 
हे सब त्रतोंकी शिव पूछा ५७ श्रा० झु० तृ० मधु्वावत १) 
्ध रोटक ब्रतकी कथा ९८ श्सी को सगणुगोरी ब्रत हे 
. “ डैप्रवासकी प्रार्थनाके मन्त्र ५९ | खरणगौरीकी पूजा १ 
स्थाषंस ओर पूजन ? | ह्वर्णगोरीकी : 
दकाप स्वणेगोरीकी कथा ९८ 
आभ्वित शु७ पतिपद दोहित्र प्रति ; गत | हे 
| ५ 
इसमे धमाका भांद किन 320 तेतकी विधि... १०% 
सामाकें जीतेनी, पितालिकों «१ 
मुडतकां अम्राव , 2००. $ हि है 3 हा शिशानिती क हु 
धोरद नकतत्रका प्रा 5 5 पी अंभोकी 
बे भर है । | | अंगोषफी पूजा * १०४ 











4७७४० ७०७७७ आज च ससग/&१ ०#१९०॥०५९८ ३३४६ 


; | विय: । 


एृष्ठाक: | 

नवरात्रशब्दका श्र्थ ६२ | कबा 
घटस्थापनका समरथ्र, राजिमें निषेध?! | उद्यापन 
नवरात्रके घटकी हथापना वि 7 | झा० घु० तू बतदूगौरीय। 
नवरात्रकी दुर्गापूजा ६३ | 
अगपूछा ६५ 

| कुमारीपूछा ६६ 
प्रारंभके पीछे सृतकर्में विशेष ६७ 
कार्तिकत्ुक्लाप्रतिपत्‌ ५; 
क्रथां भ्द मे 
इसीमेंबलिकौपूजा २ससीलींचनाव गोका 25३ | रत 
अन्नकूटकी कथा तथा विधि न 
गोवधनके भोगके मेंत्र ७५ 

द्वितीयाके ब्रव | 

कार्तिकशुद्धाह० ग्रमद्वितीयाकी अत. ७०५ 





हे! 


भू 
, ईसकी कथा! 


( 


->यकयॉटिसानासर्वीिल्‍राकक: के 


| नाममंत्रोंसे पूछा 

| अगपूजा 

| आव णपूआ 

पुष्पपूणा है 

| एऋसोशआाठनामोंसे पूजा 





दर्यागिधापतिजत 

मे।+ ह[० इ७ पिति 

पूजन ड 
भंगपूजा 

कथा 

महिता तथा इसमे 4-: ::.।: निषेश 
दोष शास्तिका मंत्र 

स्यपन्तकमरा ही कथा 

जान हु ० चेक («६ कप (विनायकका 
पूजा 






 आ्राखिनक्ृ० चु७ दरारम्नलिता बत 
| कपा है 

| कार्तिक कुण्सू ० कूरक बहुर्थीका (५ 
कथा 

का माघ शु» ब० गोौरीमतुर्भीशत 














संकटनाशन कथा 


 अगारकचहुर्थीके अतरी कया 


> झका<+ सल- 





विषय! 


ताथाारकप्रदवतपटेनपंरा।बपवएखखासबा 





पश्चमीके ब्रत । 
चैठ हु० प०७ वन्पादिको दोलाका 
उत्सक ० ८८ १९१ 
का० शु० नागरपचमीजत । 
भा० ॥० देमादिका नागपंचपीवत १९३ 
शआरा« झु० नागदश्बत और कथा ११ 





माहपद शु०प० ऋषिपंचभी बत_ १५९५ 
ब्रतकी विधि १९६ 
ऋषिपुजानिधि ही 
कृषा । ९८ 
भविष्यपुराणकी कद्दी ऋषिपंचमीकीकथ[२०० 
उद्यापन २०४ 
आ*+ झु० उपाश्ललिताजत २०६ 
. » की पूजा २०७ 
कथा २१० 
उद्यापन २१९ 
मा* शु० वसनन्‍्तपंचमी र्ज्ड २२० 
षट्ठीक त्रत। 
भाइपद छु० ललिताषष्ठीका ब्त २२० 
७ 5० कपिलाषप्टीका व्रत २२१ 
ब्रतकी विधि २२२ 
का० कृ० स्कन्दषष्टोका अत २१३१ 


भाद्र०वा मार्गशीष हु ० वम्पाधषण्टी कान्रत 5 ३ ३ 


निर्धनकीविधि २३६ 
सप्तमीके ब्रत | 
बै० शु« गंधाबीकी उत्पत्ति० २२७ 
भा क० शीतलासप्मी न 
कथा २३८ 
भा० ० मुफक्ताभरण्त्त २१४१ 
उमामहेखरकी पूजा ' 3१ 
कथा हे २४२ 
आ० शु० विश्वशास!प्रवेश २४८ 


» # 'रसस्‍्वतीकी पूजाकी विधि ,,. 


माघ कु० रथप्प्तमीका व्रत १४६ 
५... कंभा २७५० 
». अचलासप्तमी # / २०५३ 
७... पुत्रसप्मीजत २५५ 

. अष्टमीके ब्रत | 
.चअत्र शु० भवानीकी उत्पत्ति २५६ 


? ** झा जेककी कलीका प्राशन ,, 
7?  बुधवारकों बुधाश्मीडा ब्रत ,, 


ब्रतकी विधि पूजा २५७ 
कथा २०५ 
उशधापन , ६३ 
आमण ० दशाफल्तत पूृणाविधि २६५ 
का . २३६९६ 


पृष्ठाका 


विषय: पष्ठांकः 





भाद्र ० कृ० जन्माष्टमीका व्रत २७० 
इसका मिश॒ुय कि 
पारणा ४५३ 
ब्रतप्रयौग शे७४ 
पूजाविधि २७५ 
कथा २७८ 
शिष्टाचारले प्रापततुई कथा २८४ 
उद्यापन २८% 
भाहपद 2० ज्येष्ठातत २९२ 
ज्येष्टादेबीकी पूजा २९, ३ 
भविध्यपुराणकी कही अतकी विधि 
ओर कथा २९४ 
स्कल्द पु० कही ज्येष्ठाके बृतकी विधि २५५ 
उद्यापन '. २९६ 
भा० शु० दूर्भाध्मीका व्रत २९७ 
निणय $) 
इसका ल्ियॉको नित्य विधान २९८ 
ब्रतकी विधि ओर पूजा आदि हे 
महालक्ष्मी त्रत ३०० 
पूजन है 
कथा ३०२ 
आख्ि० छशु० मद्यश्मी ३१६ 
५ ऊ#० अशोकाश्पी न 
मार्गशी> क० कालसैरवकी अश्मी ,, 
इसका निर्णय ११ 
कृष्णाएमीकी क्या ३१७ 
नवभीके ब्रन ! 
चेतन झु० रामनवसीका वत० ३१६ 
रामनवमीका निणुय 98 
रामकी प्रतिवादानका प्रयोग २३२१ 
श्रीरामपूजा ३२१ 
कथा ३२४ 
रामनामके लिखनेंक|वत ३३० 
कथा ओर उद्यापन.... हा 
भ।० शु० अदुःख नवमीका व्रत ३३२ 
गोरी ओर गणपति शा पूजन कि 
कथा ३३३ 
आखश्वि० शु० भद्रकालीका तब्रत ३१८ 
नवरात्र 5 ३३८ 
दुगके पूजनकी विधि ३३९ | 
अरधध्य ओर अध्येके पात्रॉका फलपुष्प ३४१ 
तथा दूसरी बस्तृओंके समपर्णेका फल ,, 
आवरणपूणा १४६ 
चौसठ देवी ओर माताएँ हि 
| पांच मुख शोर आयुध ३४७ 


का० झु० अत्मनवसीके अतकी कभा ,) 


विषयालक्रमणिका । 







२ कक: 4व ३ कप के हि २४२८: 





विषय: 


पृष्ठीक: 
2४७७७॥॥७/७॥एए/ए७७७॥७शएशएशश/श/श/शआशाणााआ“ आ अयक 
तुलसीका विवाह ३४७ 
कथा ३४८ 
है द्शमीके ब्रत । 

ब्य० 'झु० दशहराका बत्‌ ३५२ 
दशहू रानामका गंगास्तोन्न 

झोर उप्रके पाठकी रीति ३५३ 
आपादढ शु० आश्वादशमीका अत १५६ 
यह मन्वादि हट का 
ब्रतक्की विधि हा 
भा० शु० दशाबताएजत ३५८ 
श्रा० शु० विणयादशमीका व्रत । 

निणेय एवं यात्राका विधान ३५७९ 
इसके कृत्य ») 

एकादशीके ब्रत । 

एकादशी निशय ३६१ 
उम्रमें अ्रुणों दयका स्वरुप ११ 
वैष्णबका लक्षण ३६२ 
स्मार्तोक्ा वेष १ 
इकादशीके भेद 9$ 
परेद्रत्र॒त, उपोषण 5 
हेमाहिके मतस्ते एकादशीके भेद ३६ ३ 
विदोष 39 
तब्रतके न करनेपर प्रायश्चित २६५ 
दशमीमें त्रतकी विधि हर 
ग्रतके नाशक ५४ 
अशतकिमें विशेष विधि ११ 
ब्रतमें वर्ज्य 93 
बज्थकि कियेसे प्रायरिचत 


दांतुन निषेष, कियेसेह्ानि, विशेषधिश्ि 
उपबासके प्रहणकीविधि, एकादशीका 
सकरक, शावादिकॉको विशेष, रातिका 
संकल्प जागरण, द्वादशीखें निवेदन- 
मंत्र, द्वादशीमें बज्ब॑पदार्थ ३६५ 

विधि सुतकर्मेभीकरे, रजकेदशनमे भी 
करे, द्वादशीमें उपवास, आठ मह्दा- 
द्वादशीयों, शुक्लकृष्ण दोनोंका उद्य॒[- 


पन, उसकी विधि ३६५ 
पूजाकी विधि ३७२ 
पुशणोकी कही दोनों एकादशियोंके 

उद्यापनकी विधि 7! 
आपाद छु० गोपदत्तकी उद्यापनविधि३७५ 
पूजाविधि १? 
कथा | ३७६ 

पुरुषोत्तममास की कमलाएकादशीका 

मादष्त्म्य २७२ 


आ० झु० एकादशीकों वामनका अबतार३ ८५९ 


उपर मा “४ पक सआकन्म मकइभ कप लक 2 तक कप + ५०२६३ 9४५५८ १ कर 0 >लज कलम कर परम 
०48०८: 2६5:४७३ 72८ ८४5०४, ता 2 ०० ++++०-५९: 34 कपल प्र पसपमभमा ४ मप्र इस मा क एके हर. कि 






विषयः 








कार्तिक० झु० प्रबोधके उत्सवकी विधि३८ 


१! भीष्मपंचकत्रत ३८३. द्वादशीके ब्रत । 
प्रबोधके मेत्र २८४ | चें० छु० द्वा० दमनोत्सव 
तुश्सीविवाह डे इसमें दमनपूजनकी अबरब दर्तव्यता 





मार्ग० कृ० एकादशीका व्रत एका दशीकी 
उत्पत्तिका भाहात्म्य - ३८६ 


वें? छु० द्वादशीमें व्यतीपात योग 
 आषाढ शु० को विना खऋनुराधाके 


अण०्मा०कृष्णा परमा एकादशीकी कथा ४७ 





मार्गशीष शु० अनज्ञत्रयोद्शीवत 
चतुदशोके व्रत । 


५१९ 









४७५ | चे० झु० रातमें झ्िब आदिका पूजन ५३३ 
» | इसीमें कुछ विशेष 
४७६ | वबें० श० नृ्सिहचतुर्दशीका त्रत हर 





नृर्सिहचतुरदंशी निशाय 


ड़ 









,» वैतरणीव्रत २९१ | योगके पारणाका विधान छः कथा ५३२ 
मार्गशीरष कृष्णा एकादशीका साहातय ३९३-| आपषाढ भादपद और कार्तिककी अनन्तचतुदशीका त्रत ५३७ 
मार्गशीष शुक्ला एकादशीकी कथा या शुक्ला द्वादशियॉमें अनुराधा श्रवंण ब्रतकी विधि, पूजा के 

- माहात्म्य ३९९.| ओर रेवतीके योगमें पारणाका निेध!! अंगपूजा, नामपूजा ५३९ 
पोष कृष्णा एकादशीका माहात्म्य- ४०२ | अनुरावाके प्रथमपादकीही वर्ज्ज्ञ्., || शंगपूजा छा 
मावकृष्णा आमलीकी एकादशीकी श्रावण छु० द्वा० द्ित्रत और पवित्रा - पीठपूजा ऐे 

कथा था माहात्म्य ४०८... रोपण कक अनतनन्‍्तपूजा ५४/) 





पोष शुक्ला ए० की कथा या माहात्य४०५ 

चेत्रकृष्णा पपमोचनी एकादशीकी 
कथा या माहात्म्य 

चेत्रशुक्ला कामदा एकादशीकी कथा 


भा० शु० श॒द्ठा द्वादशीको दुग्धब्॒तका 
संकल्प 

दूधके विकारकी त्यागात्यागव्यवध्था 

यही श्रवणके योगमे श्रवणद्वादशी 


४१९ 


या माहात्म्य ४९२, | कहद्दाती है हे 
वेशाखक्रष्णा वरूथिती एक्नदशीकी इंसीकी विष्णुविशखलसंज्ञा ओर 
कथा या माहात्म्य 4२४ साहात्म्य 


वेशाखशुक्ला मोहिनी एकादशीकी कथा | 


इसीपर हेमादि ओर निशयामतकी 
या! माहादय ४२६ 


मं ही 
रॉ 


' व्यवस्था. , 
ज्येष्र कृष्ण परा एकादशीकी कथा ब्रतकी विधि ४ 
या माहात््य ४२८ | विष्णुधर्मका कहा दूसरा विधान 


ज्यष्ठ शुक्ला निजला एकादशोकी कथा 
या माहात्म्य ड्र९ 
आषाठकृध्णा योगिनी एकादशीकी कथा 

या भाहात्म्य ड्३े२ 

'. आ्झुं०पदञ्मा एकादशीकीकथा या मा.४३४ 
यही शयनी हे ४३६ 

इसीमें विष्णुशयन और चातुर्माध्यत्रत 
हण होता हे इसका माहात्य्य 


ब्रह्ममैवर्त, भविष्य और विष्णु रहस्यका 
कहा बिधानान्तर 
“क्रथा 
इसीम्ें वामन जयन्तीका ब्रत 
बासन पूजा ओर उनके अंगेंकी पूजा 
शिक्ष्यके दानका संकश्प 
“पौ० झ७ द्वा० सुरुप द्वादशीका ब्रत 


न 





है 2 








अथिपूंजा, अगपूजा, आवरण पूजा ५४३ 









४७७ | पत्रपूजा, पुष्पपृजा, एकसो आठ-नामोंसे 

| पूजा पड, 
डोरेकी श्रार्थवा, डोराके बांधनेके मंत्र 

४७८ | ओर जीणके बिसंजनके मन्त्र... ५४६ 
वायनेके मंत्र, पुराने डोरेके दानके मंत्र 

हा ओर कथा ५४७ 
अनन्तके व्रतका उद्यापन ५५४ 

४७९ | नष्ट डोरेकी विधि ५५६. 

»..| भाद्र० शु० कदलीवतकी विधि 






हं८० 


पक 


रंभाका रोपण 

कथा 

गुजरातीयोंके आचारसे प्राप्त उमा« 
भहेंचवर सहित कदलीका पूजा -५५८१ 






9). 


हा 








हट: 
४८२ 








४८६ | कथा ५०५९. 
४८९:। उद्यापन १६, 
४९० | कार्ति० कृ० नरकचतुदेशीका जत. ५६२ 






इश्चमें प्रात:तिलके तेलसे क्षान विधान ,, 












ओर उसकी . कथा ,, स्नानके विशेष जप ले 
३ ब ईहे हु 
आवण कृष्णा कामिछा एकादशीडी.... त्रयोदशीके ब्रत इसमें ओर अमावस्यामें दीपदान 
कथा या माहात्म्य 3४६ | आषा० झु० जयापार्व॑तीका व्रत कथा विधान ४ 
आवशण शुक्ला पुत्रद एकादशीकी कथ। ओदि |. ४>+$ | सनत्कुमारसंहिताके कहे नरकचतुदशी 
या माहात्य * ४४८ | भा० शु० गोत्रिरात्रत्रत ओर कथा ४९८ तीन दिनके विधान ११ 
: भद्रपद कृष्णा अजा एकाद शीकी कथा गुजरातियोंका गोत्िराक्त 4०] | काठ झञ० वैकुण्ठ चैंतुदंशीका वत. ५६५ 
' या माहाक्त्य ४५० | उद्यापन ५०६ | कथा | ५ ६ ६ 
भा शु० परिवर्तिनी ए०कथा या मा० चेत्र शु 
० अशोक प्िरात्रत्रत ५०७ ल्‍ रण 
आखश्विनकष्णा इन्दिरा एकादशींकी कथा केथा जे 40 08% कि हक हा 
माद्दार यृ गम का ०] 
या की ु डणड | [७9कु० त्र० महावारणीयोग . . ५११ ब्रत और जा पा ५६८ 
आ० झु० पाशांकुशा एडादशीकी कथा समें गंगासनानकी विशेषता और फेरे. ,). | ब्रतकी पारणा ' कई 
या कि कक 6. *. ४४७ | कार्तिकया श्रावणकी शनिवारी व्रत को वीधि, पूजा ५७१ 
9 3 जरमा एका कीरूथ यासा ०४० त्योदशीको प्रदोष त्रत तथा क्‌ न 
शु प्रवेषधिनी के, । .. >पो ), | कालान्तरमें पूजाका विधान 'पजर 
0 7१: बसी एका०कथा था सं|४६ ० प्रकारान्तर ' 
आभास इक एकादशीडी कथा ४६५ कह न 
० “४६५. | प्रदोष्॒नतकी कथा ४५१८ उद्यापन 


७९४६ . 


22 


हँ 





































पूर्णिमाके ब्रत। 
शिमाका निर्णय 
चेत्रीकों बित्रवश्भदानकाफल ५5 
 दमनसे सब देवोंकी पूजा 
वैशाखी कार्तिकी ओर माघीके दानकी 


ए 


प्रशंसा ५८८ 
ज्य० शु० वटसाविन्नीका त्रत न 
ब्रतकी विधि ») 
पूजा विधि ७८९ 
पूजा. ११ 
अगपुजा ब्रह्मसत्यपूजा ७९, ० 
कथा - ५९१ 
अब्द साध्यत्रत ६०१ 
उद्यापन ६०१५ 
'आषाढीको गोपब्रत्रत और उसकीपूजा६ ०४ 
कथा ६०५ 
उद्यापन ६०७ 
आधाढ झु० पौ० कोकिलाहत “६०८ 
उसकी विधि पद 
कथा ६१० 
उद्यापन ६१५ 
श्रावण पौ० रक्षाबन्धनकी विधि ,, 

निर्णय, कथा ६१६ 
झद्ोंके मन्‍्त्ररहित ६१७ 
रत्ाबन्धनके मन्त्र ओर फल ६१८ 


भा० पो० उमामदेंशरकी कथा ,, 


शिवके अगोकी पूछा ६२१२ 
शक्तिके अगोंकी पूजा ६२३ 
उद्यापन ६२४ 
आश्वि० पो० कोजागरबत भर रे७ 
कथा है ० 

कार्तिकीको ज्रिपुरोत्वैवक्था / | ६३०. 


का० झु० चतु०कार्तिकमासका उद्यापनों: ३५ 
मार्ग ० कृ० पौ० द्वार्निशी पूर्णिमाका 
त्रत 


१] 


कथा... - ६३८ 
का ० पो० होलिकाका उत्सव ६४२ 
हो लिकाका निर्णय ६४४ 
अमावस्याके त्रत। 
भां० कुशप्रहणी ६४५ 
» पिंठोरीव्रत. ६४६ 
ब्रतकी विधि ९१ 
कथा है 
आ० कु० अम। गजष्छायापर् ६४८ 
कार्ति० श्रमा० लक्ष्मीत्रत और बलिके 
राज्यका उत्सब विधि. +9 


. _विषयानकऋमणिका । 


भविध्यपरीक्षा 


राजाओंके लिये विशेष 


मार्ग ० अमा० गौरीतपोब्रतका विधान .६५१ 


9 इसको महात्रत कहा है 
सोमवती अमावस्याका व्रत 
पूजन 

कथा 

अश्वत्थकी पूजाका मंत्र 
प्रदक्तिणाका संत्र 

उद्यापन 


पोष अमावस्या अर्थघोदय त्रत 
कथा 


मलमासके ब्रत 
इतिहाससह्ठवित व्रातान्तर 
मलमास ओर ज्ञयमास सकज्ञा 
चायमाप्त कब आता हे 

पू० आ० मी 8 का० पू० तक चार म 


वर्षोका स्वस्तिक व्रत गो ल्‍ उपसि आदिका समय प्रकारा- . . 
8 | ?! न्तरसे उद्यापन 5) 
च्‌ 'आश्चिन छु० ए० से का० हु ० ए० 
रविवारमें सूर्य त्र्त ६७७ | प्ासोपधास ब्रत छह 
सूर्यकी पूजा ११ आ० झु० ए० का० शु७:ए० तक 
कथा है कब बारणापारणात्रत छ्र्ड 
आश्विन आदिके रविवारोंमें आशादित्य संक्रान्तिके त्रत घश९ 
न्रत +£) | धान्य संक्रान्तिके व्रत कब करे, सूर्यका 
दल )) पूजन, उद्यापन 9) 
सूयके अगोंकी पूजा ९-९ | लबण संक्रान्तिके ब्रतशर उसकी विधि७ ३० 
आ० शु० झन्त्य रवि६ दानफलब्रत ६८४ | सोगसेक्रान्तिका अत और विधि... ७३१ 
पूजा १) रुप संक्रान्तिका गत ओर विधि |. 
कया ११ एकभमषप्कका निर्णय 29 
सोमवारको शिवपूजा 4० | शत घेनु और उसका बत्स 25 
कथा 2 | जलघेनु ओर उसका वत्स कप 
उद्यापन ११३ | शुढ़ वेनु ओर उसका बत्स .. | ,, 
प्रकारान्त रखे सखोमवारका ब्त ६९३ 77% अल आर अनीज ७३२ 
शिवका पूजन तथा आठ सोमभाग्यसंक्रान्तिका त्रत इसमें सोनेके 
सोमवारोंका ब्रत ६५४ कम्लका २१ 
उद्यापन ६५* | ताख्बूलु,संक्रान्तिका अत और विधान ,, 
27% अत अमल ते 8 सनोर्रिय संक्रान्तीका त्रत उद्यापन , ७३३ 
शिवका पूजन ५५ १॥ अशोक संक्रास्तीका ज्त इसमें सोनेके 
दूसरी रीतिसे ६९८ सूर्यकी पूजा 3 
मंगलवारके त्रत . ४०१) | कप्िलाका दान * १5 
ब्रतकी विधि १! आयु धक्रान्ती जत तथा धान्य- 
मगलका येत्र इसके बनानेकी विधि संक्रान्तीकी तरह उद्यापन विधान ७३४ 
ओर पूजनकी रीति ७०२ | घन संक्रान्ती ब्रत पूर्वबत्‌ उद्यापन विधान 
मंगलका कवच ७०३ | सब संकान्तीयोंका उद्यापन 
। कथा ७०५ | पनु संकान्तीकी विशेषता 







ध्‌ 


वशन्ट०० ०-७१ भा दधानानन वपिभभयिनशनयिनानल्‍्क्दनन परम जननतू कि -+क-कानूना वनननम«न-राम, चलन  ज्शशष्यडस्डस्सड 
8:5००+-24० 56.2500-० "या: पर: 2३७१०. ध दर धादवथधाका अप कर २०2७, ध६0-4- "7० 32५. ५ जिक्र 202 
3 न-+-मगक-ु(+3५००७-६.९२०अिनमम-+-०० 


विषय, छुच्चां$,, 


६५० | उद्यापन जड़े 
१) टी० बुद्धका बतादि ७०७ 
बृहस्पंतिवारका ब्रत ओर स्तोत्र ७०८ 
३१२ | शभ्रावणमे झुक्रवारके वरलध्ष्मीकाब्त ७०५ 
६५५ | पूजाकी विधि | हल 
ते आग पूजा न 
, ६५७ | कथा मा 
६६० | श्रावण श० शनीचरका त्रत ७१३ ' 
३६४ | पूजन 2३६ 
१9 कथा ह हर 
३६६४ | व्यतीपातके ब्रत ७१७ 
)2 व्यतीपातकी उत्पत्ति ७१८ 
१६९७ । चन्द्र सूर्यका बर हा 
"६६ कह 
पूजन की 
३४० | तारदीयंका व्यतिपात जत ७२१ 
८“ | हर्ष्यक्षका इत्त ेु मी 
दान विधाव ७२४ 





मध्य ॥ 





विषयः पृष्ठांकः 
रविका बते ज्ञान ७३६ 
मकर संक्रान्तिमं घ्तकंब्लदानकी ं 

सहिमा.. * हद 


मकर संक्रान्तिमें दधि मनन्‍्थनका दाव ७३७ 
पानोंके दानका तत और उसका 


उद्यापन _.. ७८ 
मौन त्रत ओर उद्यापन ७३९, 
प्याऊके देनेक़ी विधि ओर उसका 

उद्यापन । ” छ४० 
लाख पद्मॉंकी विधि 2 हे “७४१ 
लाख आदि दीप दानोंकी वि: ७४२ 
लाख दुबोग्रे पूजनेकी विधि ७७४३ 
इसका माहात्म्य पे 

लाख प्रदक्तिणाओंकी ।वोधे और 

शिवजीकी कथा ७५१ 
लक्षादि प्रदक्षिणाएँ अश्वयकी. ७५४ 
अश्वत्यका मन्त्र ज्५ण 
पूणाविधि 


मै 


पी रन] हे 

अश्वत्यरूपसे ।विष्णुका आर्विभाव तथा 
उसकी लाख प्रदक्षीणाएं, कार्तिक 
माहातयसे ७७६ 
विष्णुकी लाख प्रदक्षिणाश्ोंकी विधि ७५९ 
उल्यापन 


७६० 
तुलसीकी लाख प्रदक्षिणाओंकी विधि ,, 
उद्यापन ७६१ 


$ ॥' ह 
गो आहयण अप्ि और हनुमानकी लाख 
प्रदक्षिणाओंकी विधि ७६२ 


है हनन कपल 2०८८ आसार २८ 


विषयानुक्रमाणेका । 


08723 20670 287 दर 


विषय३ 





ब्रद्मइृत्यादि महापाप, उनके समपाप, 
छातिअंशकर पाप, संकर करनेवाले 


पाप, मलिन करनेवाले पाप और 
.._ उपपातकोंका उल्लेख )१ 
उद्यापन . ७६३ 


लाख बेलपत्रोंसे पुजा ओर उसका 


माहात्म्य ७९१४ 
उद्यापन ७५६६ 
शिवकी नाना लक्ष पूजा विधि. ७६७ 
उद्यापत ७६८ 
तुलसीकी लक्ष पूजा विधि ७६९ 
प्राथनाके मन्त्र 8) 
पतन्र लेतेके मन्त्र ११ 
विधि ७० 
उद्यापन $ 
विष्णुकी लक्ष पूजाकी विधि ७७१ 
उद्यापन ७७२ 
बिल्वबत्तीकी विधि ५ 
उद्यापन ७७३ 
रंद्र बत्तीकी बिधि ७५४ 
उद्यापन ७७६ 
सामान्यसे लक्षबत्ती व्रत ७७७ 
उद्यापन ७७९ 
विष्णुका सक्षबत्ती व्रत ७८४ 
उद्यापन ७०३ 
देहबत्ती व्रत ऐ 


इत्यतुक्रमणिका ॥ 








! ९& ५ अकक-अन्‍ननभकनन हि 









पृष्ठांक: 






विषय: 


टरशक) 
20७0७॥/७//॥/#/#एशनशणशशा 
डउयापत ७८५ 
विष्णु ओर सूर्यकी लाख नमस्कार विधि हे 
उद्यापन ७८६ 
श्रा, भो० मंगला गौरीका त्रत ७८५ 
गोरीकी पूछा मे 
कथा ७८८ 
उद्यापन ७९५ 
मोन वत और कथा ७९६ 
उशापन ७९८ 
पंच घान्यपृजा ७९६९ 
उद्यापन ८0०0 
| शिवामुफ्ति जत ु ८०१ 
उद्यापन ८0३ 
हस्तिगोरीन्नत ८०१ 
कथा मी 
कृष्पाण्डी अततथा कथा ८०७ 
उद्यापन ८५०९ 
ककटी रा व्रत उद्यापनसद्ित ८१५ 
कर्कटीका पूजन ८१५ 
उद्यापनकी विध «१९ 
कोटी दीपदानका उथापन ८२० 
पार्थिव लिन्नषका उद्यापम ८२१ 
व्रतराजमें आये हुए िषय 'छोकबद्ध 
या अल्युक्रमणिकाध्याथ * ८१२ 
सात घानोंसे लक्ष पूजा विधि ८२४ 
लक्ष पूजाका उद्यापन ८५५ 
टठीकाकारकी कृष्ण प्रार्थना. ८२६ 











१ ाननशणशछ ७ऋऋछछऋनऋऋछछ 





अभिला देव सबितः 
श्रप्मि दुर्त बृणीसहे 
आश्विनावर्तिस्मदा 
प्रभित्य॑ देव सविताएम्‌ 
प्ष्परसां गन्धर्वाणाम्‌ 
प्रदितिद्य जनिष्ट 
प्रंहों मुख मांगिरसो 
प्रति सप्तिम्‌ 
प्रग्नेरप्रस: 
प्रमिह्तन्यरतः क्णैम्‌ 
प्रमिर्दाद विशम्‌ 
म्रिमुक्थऋषय: 
ग्रमिबिशईघ्सते 
प्येत्रद्म ऋभमव: 
उछुनीते पुनरत्माझु 
प्यन्त इष्म 
याध्याप्म 
तो देबा 
द्विरि भोगे: 
में त्व॑ं नो अन्तम 
'अत्ये वो निषदम्‌ 
म्वपूर्णाम्‌ 
अभिस्व धृष्टिम दे 
अग्रिमीक पुरोहशितम 
अपत्ये तायबों यथा 
अदश्र मस्य 
अयुक्त सप्तशन्ध्युवः 
अधादेवा उदित: 
शरयोदष्ट्री अचविषा 
अग्रे त्वच यातुधनस्य 
आममुर्धादिव: 
अरायिकाण विकटे 
आप्यायस्व समेतु ते 
आइदास इन्द्रबन्त 
आादित्याबू याचिषामहे 
आये गो) परिनिरक्रमीत्‌ 
आपो हिँष्ठा मयोभुष;: 
आपो अधस्मान्‌ मातर:ः 
आकलेशु 
आदित्यवरा 
आपः सजन्तु 
आंद्ों पुष्करिणीम्‌ 
आदर: करिणीम्‌ 






पृष्ठांक: 


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सन्न्र, 

आकृष्णेनरजल] २२९ 
आत्वाहाष॑मन्तरेडथि ३७० 
आवहन्ती पोध्या ६९२ 
इन्द्रवी|वश्वतस्परि ५५ 
इय वो प्रति भस्मत्‌ २६ 
इद विष्णुविचकमे २७ 
इम मे गंगे यमुने २८ 
इदमाप: प्रवहत ४१ 
इरावती, घेनुमती १९५ 
इषे त्वोज त्वा २२६ 
इहैवेधि मापच्यो हरा ३७० 
इममिन्द्रो अदीवरत्‌ हर 
इह प्रव्नृह्दि यतमः ६४३ 
उदीरतामवर उत्परास २७ 
उदुत्य जात वेदसम्‌ २२६ 
उद्वयं तमसस्परि मर 
उद्यन्य सिन्रमह १9 
उदमादयमादित्यो २२७ 
उद्बुध्यए्वाम २५७ 
उभोभया विन्लुपर्धेहि ६४२ 
उतारूधान्‌ र्ृ॒णु॒द्ठि ६४३ 
उद्भे तिष्ठ हर 
रध्बोमवप्रति ६४ रे 
ऋषभ वा समानानाम्‌ २७ 
एह्मम इद होता ३४ 
एपो द देव? प्रदिशोनु ३५ 
एवा पित्रे १ ५६ 
एतावगिस्थ महिसा ३२ 
ओमासश्रषणीधरुतः २६ 
ओषधय: समवदन्त ६३ 
कद्ुद्गाय प्रचेतसे २७ 
कद्मेन प्रषा भूता न 
कांसोस्मिताम्‌ ६४ 
काण्डात्काण्डात्‌ ु ६३ 
कुमारं माता युवति समुदब्धपू २७ 
क्षुत्पिपासामक्ञां ज्येष्ठाभ्‌ ६५ 
ऊणुष्ब पाज; ६४३ 
गन्धद्वारां दुराधर्षाम्‌ १५ 
गशानान्धवा ु २८ 
गोरीमिंमाय ३३३ 
घृत्त मिमिश्षे ध्ड 

| चरँमा मनसो जातः ३३ 
चत्वारि अज्ा: ३५ 


चन्द्राप्त 
बित्र देवानाम 

ब्मया श्रत्र बसवो 
जातवेदसे सुववाम सोमम्‌ 
जुझ्ों दमूना 

ततो विराड्जायत 

ते यज्ञ बहिंधि 
तस्माक्ष्ञात्सवहुत सेद्वत 
तस्मायज्ञात्मवेहुत ऋच: 
तस्मादा अजायन्त 
तह्मा अरंगमामवो 
तत्त्वायामि 

अम्बक यजामह 
तबनक्षुदवहितम्‌ 
तरणिबिश्वदशेतो 
तत्सूर्यस्य देवत्वम्‌ 
तन्मित्रस्य वद्णस्य 
तदविष्णो: परम पदम्‌ 
तव अमास आशुषा 


बेस सोमा$सिधारयु 


तदस्य प्रियमभिपायों 
ताममिवर्णा तप्ना ज्वलन्तीम्‌ 
त्यानु ज्षत्रियां प्रथ 

ताम्रआवह 

नीणि पदा विचक्रमे 

त्रिदवः ध्रृथिवी 

निपादुर्ध्व 

तीब्णेनामे चज्ञु षा 

देवस्त्वा सविता पुनातु 
दधिक्राव्ण: 


देवस्थत्वा सवितुः 


धाम ते विश्व भुवनम्‌ 
धाम्नो धाम्नो राजन 
प्रवा योः ध्रुवा पृथिवी 
भव ते राजा बर्णों 
ध्रुव धवेण हृविषा 
नाभ्या आसीदन्तरिक्त 
मृचत्ा रक्षः परिपाहि 
निघुसीद गणपते गणेघु 
परं सृत्यो नु परेहि 
प्रत्यक्ष देवानां विश: 
पबित्र ते वितत ब्रद्मश॒ध्पते 
प्रतद्‌विष्णुः स्ल्कैंसे 


पृष्ठोंक३ 





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१५ 
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मन्त्र: 
प्रो मात्रया तन्‍्वा 
प्रतिस्प्ृशों विंछल 
पुरुष एवेदं सर्वे 
रणादबि 
पूणमसि पूण मे 
ब्रह्मजबड्ान वरमे पुरस्तात्‌ 
ब्राह्मणोस्य मुख 
भद्रा अशथा हरितः 
मिन्धि विशा अपदिषः 
मरुतो यस्य हि क्षय 
मयि वापो 
मधुवाता ऋतायते 
मही दो: 
मनसः काममाकृ तिम्‌ 
भाई प्रजा: परासिचम्‌ 
मानस्तोके तनयथे 
भोघुण: परापरा निऋतिः 
यत्पुरुषेश हविषा 
यत्पुरुष व्यद्धघु: 
यज्ञेंन यज्ञमयजन्त 
यमाय सोम सुनुत 
यदकन्द प्रथम जायमान' 
बदापो अध्न्या 


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फजक33>>जी-ऊऊ-+ च्न्‍व 


भन्त्र 


यरत्वा हृदा कीरिणा 
यस्मे त्वे सुकृतो जातवेद: 
यतो विष्णुविचकमे 
यत्पाकत्रा मनया 

यद्दों देवा 

य; झुचिः प्रयतो भूत्वा 
यत इन्द्र भयामह 
यत्रेदानी पश्यसि 
यज्षरिपुसंनममाना 

याः फलिनी या अफला , 
युवा सुवासा 

येक्यो माता मधुमत्‌ 
यो व शिवतमों रस: 
रत्तोह णंवा जिनमा 

वायो शर्ते हरीणाम्‌ 
विश्वानि वो दुर्गहा 
विष्णोनुकं 

विद्यामेषि रजस्श्हा 
विष्शोः कर्माणि पश्यत 
विचक्रमे पृथ्चिवी 
विश्वमित्सवनम्‌ 

हँस झुविषद्‌ वसुरन्‍्तरिक्षसद्‌ 


३०१ 


६४६९३ 


३० 

श्र 
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२७ 

१०२ 
२९२७ 
२५८ 
३ ् 
५५६ 
३२६ 


इति मन्त्रसूची समाप्ता । 











हिरण्याहपा उबसो विरोके 
हिरण्यग्थः समबर्ततामे 


हिरण्यवर्गाम 
स्वत्त्ययनं ताक्ष्यम्‌ 
सहद्नशीर्षा 
सप्ताययासन्‌ 

सहि रत्नानि 
सबितुष्दवा प्रधव 
सनोबोधिशभ्रुधि 
संवत्सरोडसि 
सकतुमिव तितउना 
स्प्तत्वा हरितो वहान्त 
स्वादुः पवस्व 
स्योनाप्भिवि 
संबनसापयसा 
सूर्यों देबीमू 
झुक्रमसि 

शन्नो देबी 


| शममि अभिमिः करत 


शुचीबोपह ब्या 


शुकेषु में हरिमाणम्‌ 
श्वियेजातः 





३२४ 


अथ॑ क्‍ 


क 


. भाषादीकासमेतः । _ 


4 « “4०- अल 
श्रीगणेशायनम३ ॥ श्रीमुरुभ्योनम; ॥ 

#कारविपम्रेशगुरून्सरस्वती गौरीशसूर्यो च हरिं च मेरवम्‌ । प्रंणम्यं देवान्कुरुते हि भन्थ 
देवज्ञशर्मा जगतो हिताय ॥ १॥ बविष्ण्वचेनं दानशिवाचंन च उत्सर्गधर्मत्रतनिर्णयश्व ॥ वेदात 
पुराणात्स्मृतितश्च॒ तद्द्रतोक्तसिद्धान्तविधिं विधत्ते ॥ २॥ संगह्य सर्वेस्य मं पुराणं सिद्धान 
न्तवाक्य सुनितिः प्रणितम॥ लोकोपकाराय कृतो निबन्धो ब्रतप्रकाशः सुधियां मुदे स्थात ॥३॥ 
यावन्तों ब्राह्मणा लोके धरमशाख्रविशारदाः ॥ तावन्तः कृपया युक्तांः कु्वेन्त अन्थशोधनम्‌ 
॥ ४ ॥ विज्ञाप्यन्ते मया सर्वे पण्डिता गुणमण्डिताः ॥ प्रचारणीयो अ्न्थो5यं बालवद्रालकस्य 
में ॥ ५ ॥ रामाडुसुनिभूसंख्यें ( १७९३) वस्विष्वड्भेरइंसखूयके ( १९५८ ) ॥ वर्ष शाके श॒कपक्षे 
पश्चम्यां तपसः शुभे ४3 । ६॥ विलोक्य विविधान्‌ ग्न्थॉल्िख्यतेज्ञजनाथ वे ॥ तन्निमित्तोय- 
मारम्भः किमज्ञातं मनीषिणः ॥ ७॥ चित्तपावनजातीयः शाण्डिल्यकुलमण्डनः ॥ गोपालात्म- 
जदवज्तः सड़मेश्वरसंज्ञितः ॥ ८ ॥ दुगोघट्टे बसन काइयां नत्वा पितपितामहान्‌ ॥ कु वें 





विश्वनाथोईई ब्तराज॑ सविस्तरम्‌ ॥ ९ ॥ 





भाषाटीका ॥ 


फल चिप ८49 
नमो भगवते नारायणाय ॥ ह 
तव्कृपालेशतो मंन्दाः धिदुषां यान्ति पृज्यताम्‌ । 

ते देव देवदेवेश राधाकान्ते द्याकरम ॥ 

सद्गुरून खिलाँश्वेव नत्वा(ह माधवीं मुदा । 

इृदानीं ववराजस्य हैन्‍्दवीं वृत्तिमारभे ॥ 

जिसकी क्ृपाके छेशस मन्‍्द जन भी विद्वानोंके पूज्य 
बनजाते हू उस दयाके खजाने राधाके प्यारे देवदेवेश देव 
और सब सद्गुरुओंको नमस्कार करके में माधवाचाये 
आनंद्स इस समय ब्रतराजकी भाषाटीकाका प्रारंभ 
करता हूं ॥ द 

ओंकार वाधरूयें इंश्बर तथा प्रज्ञानधन  परत्रह्म परमा- 
व्माको और विन्नोंके अधिषति गणपतिजी महाराज एवम्‌ 
सब गुरुदेव श्री सरस्वती जी, गौरीजी, भगवान्‌ सूय्येनारा- 
यण, श्रीविष्णु भगवान्‌ , भैरव और अशेष देवताओोंको 
नमस्कार करके मे काशी श्षेत्रका रहनेवाढा संगमेश्वर 
उपनामवाछा श्री गोपाछजीका बारूक ज्योतिषी विश्वनाथ 
शर्म्मा, संसारके कल्याणके लिये यह अन्थ बनाता हू ॥१॥ 
बेदोंमें पुराणोंमे और स्मृतियोंमें जो, श्री विष्णु नमगूवानके 
पूजनका दानका और शिवजीकी पूजाका विधान हैँ तथा 
उत्सग घरमका निणय हें एवम्‌ ब्रतमें कहे हुए सिद्धान्तोंकी 
जो विधियाँ हैं वे सब इस हमारे ग्रन्थमें यथावत्‌ रहेंगीं 
॥ २ ॥ यही नहीं किन्तु मेने इस ग्रन्थमें सबके -प्राचीन 
प्रतोंका संग्रह किया है. तथा ऋषि मुनियोंके बनाये हुए 


सिद्धान्त वाक्योंका भी उल्लेख किया है, भेरा इसके बना- 
नेमें निजी कोई भी स्वार्थ नहीं हें केबल छोकके कल्याणकी 
कामनासे प्रेरित होकर ही इस लिखने बेठा हूँ मेरी आन्त- 
रिक इच्छा यह हैं कि यह मेरा अ्न्थ विद्वानोंके आनन्दके - 
डिय हो ॥१॥ इस संसारमें जितने भी धम शास्रक जानने: 
वाले विद्वान ब्राह्मण हैं वे सबकेसब मुझपर दया करके भेरें 
इस छोटेस प्रन्थका संशोधन करनेकी कृपा करेंगे ॥-॥ में 
गुण मण्डित सकल पंडित गणोंस जिनीत प्राथना करवा हूं 
कि, जिस तरह मांबाप बाढककी अस्पष्ट तोतछी बोलीका 
प्रचार आनन्द्से करते हैं रसी वरह आप अपने इस बाल- 
कके ग्रन्थकों भी प्रचछित करेंगे । ५ ॥ संबत्‌ सतन्नह सो 
तिरानवैके तथा शक सोलह सौ अठानवेके माघ सुदी पंच- 
मीके दिन ॥६॥ अनेकों ग्रन्थोंको देखकर -भज्ञ छोगोके 
लिय मैंने छिखना प्रारम्भ किया है। ऐसेही लोगोंकों 
आप हे ७ ष्हे 
समझानेके कारण ही मैंने यह आरंभ किया हूं. क्योंकि, 
विद्वान तो सब कुछ जानतेही हैं।॥७॥ मेरा जन्म चित्तपावन 
जातिमें हुआ हैं मेरा वंश शांडिस्य कुमें खास खान रखता 
है, मुझे छोग संगमेश्वर कहा करते हैं मेरे पिता श्रीका नाम 
गोपालजी है में ज्योतिषी हूं ॥॥ ८ ॥ बनारसमें मेरा रहना 
४ अर च्े प्री 

दुर्गा घाट पर होता है वही में प्रिता तथा बाबा भादिको 
प्रणाम करके खासे विस्त्रके साथ त्रतराज नामक ग्रन्थको 

छिखता हैँ ॥९॥ <-:< ... 


पाई /दानय: 2५७ पापा: एफ: अग्पपधिनकआाा3 2पप।प२२/४०४४४३ पक वन उ प्पथम नवाब गे पम्प पप कप; फससमि नर पसक उप मपपा के २३८८८ 





. >धर्म शाख्रतो प्राणिमात्रके लिये उपादेय हे,अश्जनोंके लियेशपने 
'संप्रहको कंदना ,विद्वानोंके लिये नहीं यह प्रम्थकारक़ी विनज्जंता मात्र है, 


(२) ब्रतराजं: | ः 

प्रतलक्षणम्‌ ॥ अन्र केचित्स्वकतंव्यविषयों नियतः संकलपों ब्रतमिति ॥ तन्न,-अश्निहोत्रसंध्या- 
वन्दनादिविषये सड्ुल्फेतिप्रसक्ते! । अतोषभियुक्तप्रसिद्धिविषयों यः संकल्पविशेषः स एव 
ब्रतम्‌॥ न च ब्रर्त संकल्पयेदित्यनन्वय इति वाच्यम्‌ । पाक पचाति दाने दद्यादितिवत्मत्यया- 
नुम्हाथ प्रयोगोपपत्तेरिति नव्या३ ॥ 


..[_ ता्मॉस्वे- 


के बाते 
८4/24/6770, 0 2: 
स्काउट काट [टन बबक 


. श्रथ ब्रतकाऊ) ।. 


तत्रादों निषिद्धकालमाह हैमाद्रौ गारग्य:-अस्तगे च गसे शुक्रे बाले वृद्ध मलिम्लुचे ॥ 
उद्यापनसुपारम्भं ब्रतानां नेव कारयेत्‌ ।। तत्रेव वृद्धमठबहस्पती-अग्म्याधानं घर तिष्ठां च यक्ष- 
दानव्तानि च ॥ माडल्यममिषेक च मलमासे विव्र्जयेत्‌ ॥ बाले वा यदि वा वृद्धे श॒क्रे चास्त॑ 
गते गुरो ॥ मलमासे च एतानि वर्जयेदेवदर्शनम ॥ लक्छः-नीचस्थे वक्रसंस्थेषप्पतिचर णगते 
बालवृद्धास्‍्तगे वा संन्यासो देवयात्रात्तनियमाबोधेः कर्णवेधस्तु दीक्षा । मौजीबन्धोइथ चूडा- 


पारिगयनावीधेवास्त॒देवपतिष्ठा वर्ज्या साद्भेः मयत्नात्रिदशपतिगुरों सिंहराशिस्थिते च ॥इति |. 
न॑।चस्थो मकरस्व:॥ कल्पतलरों देवी पुराणे-लिंहसंस्थं गुरु श॒ुक्र॑ सर्वारम्मेष॒ बजयेत ॥ प्रारब्ध॑ 
न॒ च सिद्धयेत महामयकरं भवेत्‌ ॥ पुत्रमित्रकंलत्राणि हम्याच्छीप्रं न संशयः ॥ देवाराम- 
तडागषु व्रतोद्यानशददेषु च ॥ सिंहस्थं मकरस्थं च गुरु यत्नेन वर्जयेत्‌ ॥ वसिष्ठः-सिंहस्थे 


_ अब व्रत शब्द 6 अथेका निणय करते हैं कि, ब्रत शाब्दका 
असली अथ क्या है | कोई २ ब्रतके रहस्यक्ो न जानने 
बारें अपने करनेके कामको करनेके दृढ़ संकल्पको ही त्रत 
कहते हैं सो उनका यह कहना ठीक नहीं है, क्‍योंकि, फिर 
तो आपका, ब्तका लक्षण सन्ध्यावन्दन अग्निहोत्र आदियें 
भी चला जायगां पंर इनका त्रत शब्द्से ध्यवहार नहीं देखा 
जाता: किन्तु नित्य नियम शब्दस इनका व्यवहार छोकमे 
देखा जाता है। इस कारण यह मानना होगां कि जिसका 
योग्य पुरुष त्रवशब्दस व्यवहार करते चढे आरहे हैं उसीका 
च्ाम ब्रत है। यह त्रत भी एक ग्रकारंका संकल्पही है फिर 
ब्तका संकल्प करे यह करना नहीं बन सकेगा क्योंकि 
संकल्प आर ब्रत दोनों एक ठहरे, पर यह कहना भी ठीक 
नहीं हैं क्योंकि पके पकायेको पाक कहते हैं तो भी संसा- 
रमें ऐसा व्यवहार देखा जाता है कि पॉकको पकाओ तथा 
दियेको दान कहते हैं फिर भी छोकमें यह कहते हुएं छोग 
इृष्टि गोचर होते हैं कि दानको देदों इंसी तरह ब्रतका 


४२०९2 यह व्यवहार होजायगा ऐसा नये आचास्य 
हतेहें। | | । 


:. अब जतके समयका निर्वंचन करते हैं, ब्रतकाल- निषिद्ध 
को बंता देनेसे बतके समयका अपने आप निर्णय हो 
जाता हे इस रण सबसे पढिलि ब्रतके निषिद्ध कालकोही 
कहते हैं । हेसाद्रिमें गांग्येन कहा है कि-जब बृहस्पति और 
झुक 2 + पा३ अस्त हो गये हों, उदित भी- हों कमल इनका 
वो कोई वे इृद्काल हों, एस समयमें तथा 


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। ४५ लि | न] “कल, ! 

की । रे ८ न की । 


स्पतिका वाक्य है क्वि-श्रौत स्मार्त अप्रियोंकी स्थापना, 
प्रतिष्ठा, यज्ञ, दान, त्रतव और संगढकी कामनासे अभिषेक 
या मंगछका काम ओर अभिषक मल्सासमें न होना. 
चाहिये। यदि शुक्र और बृहस्पति अस्त होगये हों तथा 
उद्ति भी हो तो किसी तरह बाल्बृद्ध संभाले जा रहे हों 
अथवा मलमास हो तो न तो किसी अपूर्व देंवका दशन 
करना चाहिये एवम्‌ न पहिले निषेध किये हुए कामही करने 
चाहिये। छल्छका कहना है कि,बृहस्पतिजी महाराज मकर 
राशिपर विराज रहे हों अथवा रेढे बैठे हों अस्त हो अथवा 
बाल वृद्धोंमें गिने जा रहें हों अथवा नियत राशिको हांध- 
कर दूसरी अनियत राशिपर चले गये हों उस समय 
सन्यास तथा देवयात्रा न होनी चाहिये ब्रत और निय- 
सकी. कोई विधि तथा कणच्छेद दीक्षा जनेऊ भुडन उद्धाह 
वास्तु प्रतिष्ठा और मूर्तिप्रतिष्ठा न होनी चाहिये । सज्ज- 
नॉको कभी भी ऐसे समय ये काम न करने चाहिये यदि 
इहस्पतिजी सिंह राशिपर बेंठे हों तो भी ये काम न होने 
चाहिये | कल्पतरु देवीपुराण प्रन्थसे कहा है कि बृहस्पति 
ओर शुक्र सिंह राशिपर हों तो कोई भी त्रतादि शुभ कमे 
न करना चाहिये क्योंकि ऐस समयमें प्रारंभ किया हुआ 
कोई भी नांगलिक कम सिद्ध नहीं होता प्रत्युत महामयंकर 
होताहे | वो शीघ्रही पुत्र मित्र और परिवारको नष्टकर 
डालता है इसमें कोई संदेह नहीं हैं। यदि देवमंदिर बगीची 
बावडी धत बाग और घर बनवाना हो-तो सिंह. राशि 
ओर मकर राशिपर बैठे हुए बृहस्पतिकों प्रयत्नंके साथ 
परित्याग कर दे | वक्षिएजीका कथन हे किं-सिंह राशिको 


परिभाषा ] भाषाटीकासमेतः । (हे) 





तु मघासंस्थ गुरु यत्नेन वर्जेयेव॥ अन्यत्र सिंहमागे तु सिहस्थोषि न दुष्पति ॥ सिहंस्थ- 
गरोबेजेनीयत्व॑ भमंदोत्तरमाग एवं, अन्यत्र तु सिंहांशा एवं वज्यें) ॥ तथा च मदनरत्नादि: 
धतकालविधानें--सिंहस्थितः सुरणरू्यंदि नर्मंदायाः त॑ वर्जयेत्लकलकमंसु सोॉम्यभागे॥ 
विन्ध्यस्य दक्षिणदिशि प्रवदन्ति चार्याः सिंहांशकें मुगपतावपषि वर्जनीय३ ॥ सिंहांशस्तु पूर्ण 
फरगुन्या! प्रयमः पाद। ॥ मुगपतो मकरस्थे ॥ मकरस्थे गुरो देशविशेषमाह लक्क:--नमदापूर्वभागे 
तु शोणस्योत्तरदक्षिणे ॥ गण्डक्याः पश्चिम भागे मकरस्थो न दोषभाक ॥ केषांचित्खीकते- 
-काणामन्येषां च ब्रतानामगस्त्योदयेप्यारम्भ॑ निबेधति हेमाद्रों लोगाक्षिः-उद्यानिका शिव- 
चवित्रकमेघपूजादूबाष्टमीफलाविरूठकजागराणि ॥ स्त्रीणां ब्रतानि निश्चिलान्यपि वार्षिकाणि 
कुर्यादगस्त्य उदिते न शुभानि लिप्छुः ॥ इति। डद्यानिका-प्रतविशेष॒॥ शिवपविन्र कम आषाढयामथवा 
भाद्रयां विहिते शिवपवित्रारापणस ॥ मेघपुना व्रतविशिष३ ॥ इवाष्टमी भाद्रशुक्काष्टनी | फलविरूढक माद्रपद- 
शुह्नचतुदेश्यां पाली पालीवरत कदलीव्रतापरनामकस॥ जागरस आदिनपोर्णपास्थां को जा गखतम॥कार्तिक शुक्र - 
'चतुर्देइयां विहित॑ जागरवते वा ॥ अन्नोमयत्रागस्त्योदयस्थावश्य मावित्वेन विधेरनवकाशल्वाप्त्तेपिकल रो ज्ञेग३॥ 
वार्षिकाणीत्यत्र र्षातु मवानि वार्षिकाणीत्येव व्युचत्तिन तु वर्ष मवानीति ॥ तथा सतिं शरेदांदिग्रीष्पप्य त- 
मगस्त्योदय नुजत्तेस्तन्मध्यें विहवितानां खीत्रतानां सवेधानारंभ एवापद्ेतेति॥अगस्त्पोदयकाबथ। दिवोदासीय- 
उदेति याम्याँ हरिसंक्रमाद्रवेरेकाधिके विंशतिमे ह्यगस्त्यः ॥ स सप्तमेषप्तं वृषसंक्रमाच्च म्याति 
गर्गादिभिरित्यनाणि ॥ ब्रतार॑ंमसमाप्त्योस्तिथिं विशिनष्टि हेमाद्रों सत्यत्रतः-उदयस्था तिथि- 
याँ हि न भमवेदिनमध्यमाक्‌ ॥ सा खण्डा न ब्तानां स्थादारम्भश्ष समापनम्‌॥ एतद्रग्॒ति- 


रिक्तायामसण्डायां प्रारंभभाह ॥ तत्रेव वृद्धवल्िष्ठ:-खखण्डव्यापिमातेण्डा यद्यखण्डा मे. 





भोगकर यदि बृददरपतिजी मघाराशिपर आये हों दो उन्हें 


 सावधानीके साथ छोड़ना चाहिये। यदि मधघाकों भोगकर 


सिंह राशिपर आये हों तो फिर कोई दोष नहीं हैं. । नमे- 
दाकेउत्तर भागमें ही सिंह राशिपर स्थित बृहस्पतिका त्याग 
किया जाता है और नजगहोंमें तो सिंहांशकाही निषध हें । 


- यही मदन रत्नादिके ध्ृत कालविधानमें छिखा हुआ हैं 


रा 


कि- श्रेष्ठ पुरुष ऐसा कहते हैं कि सिंहांशक म्रगपतिपर बेठे 
हुए बृहंस्पतिका त्याग विन्ध्याचलहकी दक्षिण दिशामें होना 
चाहिये। तथा सिंहस्थित सुरगुरुका त्याग नमेदाके उत्तर 
भागमं होता है । पूवाफाल्गुनीके प्रथम पादको सिंहांश 
कहते हैं।मगपतिका अथ सिंद्राशिपर और मकरस्थेका अथ 


मकर राशिपर यह होता है | छल्लाचायंजी मकर राशिपर 


बैठे हुए बृहस्पतिमें देश विशेष कहते हैँ-कि नमेदानदी के 
पूरवम तथा शोणनदीके उत्तर दक्षिणमें, और गंडकीके 


' पश्चिम मकर राशिपर बैठा हुआ भी बृहस्पति दूषित नहीं 
.. है। हेमाद्रिम छोगाप्चिने अगस्त्यके उदयमें बहुतसे उन 


: ब्रतोंके आरंभका निषध कियाहे जिन्हें प्रायः स्त्रियां किया 


करती हैं-कि जो कोई अपना कल्याण चाहे उसे चाहिये 


कि ख्रियोंके ब्रत उद्यानिका शिव पवित्रक मेघपूजा दूवां- 


- मी फल विरूढक और जागरण त्रत तथा वर्षा ऋतुके 
ब्रतोंको कभी न करे | उद्यानिका एक ब्र॒तका नाम है। शिव 


 परविन्नक एक व्रतका नाम है वह आषाढ वा भादोंकी पूर्णि- 


है! मेघपूजा एक ब्रतका नाम हे। दूवाष्टमी सादोंकी शुक्का ' 
प्टमीको कहते हैं । फलविहढक, भादोंकी शुक्ला चतुदशीके 
दिन होता हे जिसे पालीत्रत तथा कदली ब्रत कद्दते हैं -। 
आश्रविनकी पोणमासीके कोजागर ब्रतको जागर कहते है । 


अथवा कातिककी शुक्छा चतुरंशीको जागर ब्रत होताहे।यहां 


दोनों जगह अगस्त्यका उदय अवध्यंभावी है तब विधिके 
लिय कोई अवकाश ही न रहेगी इसकारण .- दोनों - जगह 
विकल्प किया हैं । “ वार्षिकाणि ” का वर्षामें होनेबाले 
ब्रतोंको न करे यह अथ है, यह अथ नहीं है कि वर्ष भरके 
ब्रतोंकोही न करे । यदि ऐसा न मानोंगे तो शरद्स छेकर 
ग्रीष्म तकके समयमें अगस्त्यका सम्बन्ध होनेस इस कांछमें 
कहें गये खी ब्रतोंका सवंथा तिबैध होजायगा । -दिवो- 
दासीयग्रन्थरम अगसत्यजीक उद्यका काछ- गरगग आदिके 
वचनोंको उद्धत करके कहा हैं कि, अगस्त्यजीका उदय 
दक्षिण दिशामें होता है जब कि सिंहकी संक्रांतिके इकीस 
अश बीत जाति हैं तथा वृषकी संक्रांतिके सात अश « ब्यतीत 
होनेपर अस्त होते हैं | हमाद्विमं सत्यत्नतने त्रतके आरंभ 
करने और समाप्ति करनेकी तिथिको बलाया हे कि-सूख्ये 
नारायणके उदयके समयमें तो जी तिथि हो पर मंध्याहके 
समयमें वह न रहे उस खण्डा तिथि कहते हैं इस खण्डा 
तिथिमें न तो ब्रतका प्रारंभ करना चाहिये तथा न क़तकी 
समाप्रि ही करनी चाहिये। तहां हीं वृद्ध वसिष्ठने खण्डासे 


: आाके दिन होता है ज़िसमें शिवजीपर'पवित्री चढ़ाई जाती। भिन्न जो भखण्झ तिथि है उसमें: ब्॒तके मारंभ करनेको 


32“ नननिललिकिल 





त्रतराज; । 


ततिथिः ॥ व्रतआरम्भणं तस्यामनस्तगुरुशुऋय॒क ॥ इति ॥ अनस्तामित 
णीयमित्यर्थ:॥ रत्नमालायामू-सोमसौम्यगुरुशु ऋचा सर: 


[ सामान्य 





गुरुगुक्रायां तिथौ ब्तमार 
सर्वेकमंसु भवन्ति सिद्धिदा॥ भा 


भोमशनिवासरेषु च॑ प्रोक्तमेव खहु कर्म सिद्धचाति ॥ विरुद्धसंत्ता इह ये च योगा: तेषामनि 


खलुपाद आद्यः॥ स वेध्तिस्तु व्यतिपातनामा सर्वोप्यनिष्टः 
नवपश्चशूले ॥ गण्डेषतिगण्डे च 


योगे अथमे सबजे व्याघातसंक्षे 


परिघस्य चाउ/धंम॥ तिम्नः 
पडेव नाह्यः शुभेष कार 


विवर्जेनीयाः ॥ दर्ज संकान्तिपातौ परिघमखदलं बेध्वातिं पातयोगं विष्कम्भायत्रिनाडी: शुर 


कृतिषु च षड्गण्डयोः पश्चज्चले ॥ गा! 
जन्मोत्थप्रासोड़तियिस (ल) ह तिथि 


व्याघाते वज्नरकेडडगः 


पितमृतिदिवसोनाधिमासान्कुहोरां जद्य 


व्युह्मां दब मां च॥ बह्ायामले- दिनभद्रा यदा रा: 


राजिभद्रा यदा दिवा ॥ न त्याज्या शुभकायेंषु प्राहुरेव॑ पुरातनाः ॥ इति ॥ 


पुण्यानि 


कक हैकि जिस गधाइकाक पवार जद, यह [77 _77_____- हैँ कि जिस मध्याहकालमें भगवान्‌ सूये देव आका- 


शको पूण् व्याप्त करते हैं उस समय जो तिथि खण्डित न 


तथा शुक्र ओर गुरु दोनों हों तब ब्रतका आरंभ करना 
चाहिये। यानी जिससे शुक्र और वृहस्पतिजी अस्त न हों 
उससे ब्लका प्रारम्भ करना चाहिये यह इस कथनका 
 वात्पय हुआ। रत्नमालामें कहा है कि-सोमवार बुधवार 
. इहेस्‍्पति और शुक्रतारकों कोई भी शुभ कम करो उसकी 
वैश्य सिद्धि होगी क्योंकि ये सिद्धि देनवाले हैं पर 
रविवार मंगछ और श निवारमें प्रारम्भ किया हुआ वो ही 
कम सिद्ध हो सकता है जो इनमें कहा गया है 
हो | सकते, जो री द्‌ मं (१ ४ 
नहा प्रथम पाद ही अनिष्ट कारी है पर वेश्रति और 
: व्यतीपात ये दोनों पूरे अनिष्टकारी हैं किन्तु परिघ योगका 
आधा भागहीं वजेनीय है । विष्कंभ और वज्॒ योगकी तीन 
पडियाँ एवम व्याघात योगकी नो घड़ियाँ तथा शूछयोगकी 
पांच घड़ियां और गेड अतिगे इयोगकी छः घड़ियां शुभ 
हमर सदा छोड़ देनी चाहियें। अमावस 
बे अथमचरण, वेधृति, 


॥ 


पातयोग तथा विष्केभकी 


बेब काना घडढियो गंड अतिगंडकी ३ घड़ियां शूढछुकी 
पांच, गे एक, और वजञ्ञकी ९ घड़ियें शुभका«सें 


बे र देनी चाहिये 'उवम्‌ पिताके, मरनेक। दिल, उनमास, 
ह रें नक्षत्र, जन्म मास, जन्म नक्षत्र 
" दिरागमन अमन और बे जन्मतिथिको झुभकामका, प्रारंभ या 
| मात ने ' अक्षयामलमें कहाहे कि दिनकी 





अथ देशमाह व्यासः-सर्वे शिलोब्याः पुण्य: 
विशेषान्रेमिषं तथा ॥ देवीपुराणे-देशो नदी गया शेलो 
कुरुक्षेत्र प्रयागं जम्बुकेश्वरम ॥ केदार॑ वाम पाद च कुडवं पुष् 
गया चामरकण्टकम्‌॥ कालअरं तथा विन्ध्यं तत्र वासों गृहस्य च ॥ 
मजः-सरस्वतीदषद्त्योदेवनद्योयदन्तरम ॥ त॑ बहानिर्मितं देश बल्मावर्त 
देशे य आचारः पारंपर्यकमागतः ॥ वर्णानां सानतरालानां स 
 याश्व पश्चालाः शरसेनिकाः ॥ एप बहार्पिदेशों वे बह्मा 
पंचाताः कान्यकुब्जा। । झुरसेनिझा३-मथुरादेशाः ॥ अनन्तरः सम; 


! सक्रांति, पात .. 


विवाह | हैं 


सागराः सरितस्तथा ॥ अ्ररण्यानि 
गड्जानमेद पृष्करम्‌ ॥ वाराणस 
कराद्यम्‌ ॥ सोमेश्वरं महापु० 
गुहः-स्ामि का तिकयः 
ते प्रचक्षते ॥ यह््मि 
सदाचार उच्यते॥ कुरुक्षेत्र * 
वत्तोदनन्तरः ॥ परत्याः-विरादा; 
॥ हिमवद्विन्ध्ययो म॑ध्ये यत्पराग्‌ 


भद्रा रातमें हो और रातिकी भद्रा दिनमें हो तो उ/ 
भद्गाका परित्याग न करना चाहिये ऐसा पुराने आचायोक 
मत है । ' 


अथ देश निर्णयः-ब्यासने कहा है कि, सब पव॑त पत्रिः 
3 ५ सब समुद्र और नदियाँ पुण्यवन ब्रतादि करनके दे 
हे नमिषारण्य तो विशेष करके है। देवी 


नदीका किनारा, गया, शेल,गंगा, नरमंदा, पुष्कर, बनारस, 
अर क्षेत्र, प्रयाग, जंबुकश्वर, केदार, वा 


ग मपाद, कुडव,पुष्कर, 
भहापुण्य, सोमेश्वर, अमरकटक, काछंजर, विंध्याचछ जह| 


« | कि गुह भगवान्‌ विराजते हैं। गुह स्वामिकातिकको कहते 


* ये सब पुण्य देश हैं। मनु महाराजने पुण्य दशकों 
बताया है कि सरस्व ती ओर हृषइती दोनों देव नदियोंके 


बी चमें जो अद्श हैं उच्च त्ह्मास निर्माण किये गये देशको 


सहित चारों वर्णोंकी परंपर के कमसे आया हुआ आचार 
* उस सदाचार कहते हैं। कुरुक्षेत्र विराट, पंजाब, मथुरा, 
यह त्रह्मषि देश है यह भी अद्यावर्षके बराबरका हैं । अब 
लि. ६५ उस्वतिके कुछ पदोंका आप्रही अर्थ करते हर 
कि भरत्य विराटको कहते हैं+पंचांग पं 7- न दर््यचांग कान्यकुब्जका नाम है 


ज॑ अर्थ किया है उसके हम सहमत नहीं 
पेजाब प्रान्तकाही पांचाल नामसे व्यवहार 
नहीं करते । पांचालका सीधा अर्थ यह रै 
कि जो पांच नदियोंसे भूषित हो ऐसा पंजाबही है कन्नोज नहीँ दे, 


॥ भाषाटीकासमेतः । (५) 





विनशनादपि ॥ प्रत्यगेव प्रयागान्व मध्यदेश उदाहत/॥ विनशन कुरुक्षेत्रम।आसम॒द्रात्त वे पूर्वा- 
दासमुद्रातु पश्चिमात ॥ तयोरेवान्तरं गियोरायावर्त विहब्ंधाः॥ सिन्धुनदीपश्रिमतीरव्या- 
वृत््यधमाह--कष्णसारस्तु चरति म्रगों यत्र स्वभावतः ॥ स ज्षेयो यज्ञियों देशो म्लेच्छदेश- 
सततः परः ॥ एतान्द्िजातयों देशाब्‌ संश्रयेरन्‌ प्रयत्नतः ॥ याज्ञवल्क्यो5पि--यस्मिन्देशे मृगः 
कृष्णस्तस्मिन्‌ धर्मान्निवोधत ॥ इति ॥ 


ब्रताधिकारिण: । 


स्कान्दें--निजवर्णाश्रमाचारनिरतः शुद्धमानसः ॥ अल्ब्धः सत्यवादी च सबवूतहिते रतः ॥ 
ब्रतेष्वधिकृतो राजन्नन्यथा विफलश्रमः ॥ श्रद्धावान्पापभीरुश्ध मददम्भविवर्जितः ॥ पूर्व निश्च- 
यमाश्रित्य यथावत्कमंकारकः ॥ अवेदानिन्दको धीमानधिकारी वब्रतादिष॥ निजवर्णाश्रमा- 
चारेत्यनेन चतुर्वणोॉनामधिकारों गम्यते ॥ अत एवं कौर्मे-बाह्मणाः क्षत्रिया बैद्याः शूद्राश्वेव 
द्विजोत्तम ॥ अर्च॑यान्ति महादेव॑ यकज्षदानसमाधिन्निः ॥ ब्रतोपवासनियमेहॉम ध्वाध्यायतर्पणेः ॥ 
तेषां वे रूद्रसायुज्यं सामीप्यं चातिदुलंभभम्‌॥ सलोकता च सारूप्यं जायते तत्मसांदतः ॥ 
देवलो5पि--ब्रतोपवासनियमेः शछारीरोत्तापनेस्तथा ॥ वर्णाः सर्वे विम॒च्यन्ते पातकेम्यों न 
संशयः ॥ _अज्राधिकारिविशेषणस्य पुंस्त्वस्याविवक्षितत्वात्खीणामप्यधिकारः ॥ भारते-मासु- 
पाश्ित्य कोन्तेय येषपि स्थुस पापयोनयः । ख्वियो वैद्यास्तथा शाद्वास्तेईपि यान्ति परांगतिम्‌ ॥ 
कचिन्म्लेच्छानामप्यधिकारो हेमाद्रों देवीपुराणे--स्नातेः अमुदितिहडैबाहिणेः क्षत्रियेरृमिः ॥ 
वेश्यः शद्रमंक्तियुक्तेम्लेंच्छेरन्येश्व मानवेः ॥ ख्ीमिश्व कुछशादंल तद्विधानमिद श्रण ॥ वेश्य- 
दस न कलर कप व टन अमन मिलन कम मन मम 


शूरसेन मथुराका नास है । अनन्तर बराबरकों कहते हैं । 
हिमालय ओर विन्ध्याचछके बीचका कुरुक्षेत्रस नीच नीचे- 
का तथा प्रयागस इधर २ का भाग मध्य देश कहलाता है। 
इस जछोकमें जो 'विनशन' शब्द आया हैं उसका कुरुक्षेत्र 
अथ होता है पूर्वी समुद्रस छेकर पश्चिमी समुद्रतकका 
तथा हिमालयसे लेकर विन्ध्याचछतकका देश आयावतं 
कहलाता है इसमें सिन्धुनदीका पश्चिमी किनारा भी 
आजाता है उसकी निवृत्तिके छिये यानी उसकी भी कहीं 


जो बुद्धिमान्‌ है उसका सब जअ्तादिकोंमें अधिकार है। . 
अन्थकार कहते हैं कि, उदाहत ऋोकमें जो यह कहा है 
कि, अपने ३ वण और आश्रप्तके आचारमें सदा छगे रहने- 
वाल, इससे प्रतीत होता हे कि ब्रवादिकों मैं चारोंही वर्णो ता 
अधिकार है। तब ही कूमे पुराणमें कहा गया है कि-हे 
द्विजोत्तम | जो ब्राह्मण, क्षेत्रिय, वैश्य और शूद्र, यज्ञ दान 
समाधि, ब्रत,उपत्रास, नियम,हो म, स्वाध्याय और लपंणस 


भगवान्‌ महादेवका अचन करते हैं उन्हें भगवान शिउ्रकी 
कृपासे अलद्यन्त दुलूम जो सायुज्य-सामीप्य सालोक्य और 
साहप्य आदि चारों मोक्ष हैँ वे मिलजाते हैं.। देवल नेमी _ 
कहा है कि,सभीवणके छोग ब्रत उपवास नियम ओर काय- 
क्शके व्पोंके करनेसे पापोंसे छूट जाते हैं. इसमें कोई भी 
सन्देह नहीं हैं । इन वचनोंमें अधिकारियोंक प्रति पुछ्िंगऊे 
शैब्दोंका प्रयोग किया है बह विवक्षिंत नहीं हे क्योंकिइससे 
पहिल कहे हुए पुरुषों केसे गुण यदि स्त्ियो्म हों तो वे भीव्रत 
करनेकी अधिकारिणी ह।भारतमं कहा हे कि हे कौन्तेय! जो 
पापयोनियोमें पेंदा हुए जीव भी हैं. तथा जो ख्री वेश्य (कोई 
'वेश्या:ऐसा प,ठ मानते हैं) और शूद्रहें वे सब मेरी उपासना 
करके परम्तगतिको पाजाते हैं। कहीं किसी २ में म्लेच्छों का 
अधिकारभी रेखा जाता है| हेमाद्विम देवीपु वचन 
है कि, है कुरुशादूछ ! जिसे ब्राह्मण क्षत्रिय बेश्य भक्ति- 
युक्त शूदर स्ली और म्लेच्छ तथा अन्य मनुष्य स््रान करके 
असन्नताके साथ कर सकते हैँ उस ब्रतका यह विधान है 


पुण्यदेशमें गिनती न होजाय इस कारण कहते हैं कि 
जिस देशमें काछा हिरण स्वभावसे विचरता हो वह यज्ञ 
करने छलायंक देश है, जहां क्ृप्णसार मृगः स्वभावसे नहीं 
विचरता हो वह म्लेच्छ देश है । मनुजी महाराज कहते हूं 
कि; ये जो हमने पुण्य देश बताये हैं इनका ट्विजातिगण 
न... २७ ७. हक 
पक साथ आश्रय ढें।याज्ञवल्क्यते भी कहा हेकि जिस 
देशमेकृष्णस्रर्रम्गग रहता हैँ उस देशक धर्माको मुझसे जानो। 






धथिकारि निणय-स्कन्द पुराणमें बताया है कि, हे 
राजन जो पुरुष अपने वणे ओर आश्रमके आचारमें छगा 
रहता हो, शुद्ध मनका हो, छोछुप न हो सत्य बोलनेवाला 
हो, सब प्राणियोंके कल्याणमें छगा रहता हो उसका ही 
ब्रतोंमें अधिकार है; नहीं तो व्यथेकाही परिश्रम है। जो 
पुरुष श्रद्धाल हे जिस पापोस डर छगंता है। जिसके मद 
और दंभ दोनों नहीं हैं, पहिछे निश्चय करके फिर उसीके 
अनुसार-करनेवाढा है, जो वेदकी निनदा नहीं करता तथा ' 























(30 


शद्रयोस्त द्विराब्राधिकोपवासो न भवति ॥ वेश्याः श॒द्वाश्व ये मोहाइपवासं परकुर्बते ॥ त्रिरा् 
पचचरात्र वा तेषाँ व्युष्टिन बिद्यते ॥ इति प्राच्यलिखितनिषधात्‌॥ व्युप्ट-फलम्‌॥ सभर्तकाण| 
खीणां भत्राद्याज्ञां विना माधिकारः। तथा च मदनरत्ने मार्कण्डेयपुराणे--या नारी हनतज्ञाता 
भरत्रां पित्रा खुतेन वा ॥ निष्पलं तु भवेत्तस्था यत्करोति व्रतादिकम ॥ भत्राक्षया स्वत्रतेष्बधि- 
कारः ॥ भायों भठेमंतेनेव व्रतांदीन्याचरेत्सदा ॥ इतिकात्यायनोक्तेः । यज्ु.--पत्यों जीवति 
या नारी ह्मपवासत्रतं चरेत ॥ आयुष्य॑ हरते भर्तु; सा नारी नरक॑ व्जेतव ॥ इाते विष्णुवचन 
'तद्धतुरनलत्तापरम्‌ ॥ यज्ञ काश्रित, नास्ति स््रीणां प्रथग्यज्ञो न ब्तं नाप्थुपोषणम ॥| भर्तः शुश्रृ- 
पर्यवेताछोकानिष्टान्‌ ब्रजात्ति ताः ॥ यहेवेश्यो यज्य पिच्रादिकेभ्यः कुयोद्धताभ्यचन सत्सक्रियां 
च॥ तस्य हाद्ध सा फल नान्यचित्ता नारी सुंक्ते भव॑शश्रपयेव ॥ इति स्कान्दात्‌ समभर्तका- 
णामेकादर्याद्रुपवासादावनधिकार इ/ति ॥तत्न॥ तस्यापि पृथकस्वात॑ंत्येण भत्रेनलुज्ञापरत्वात । 
अत एव व्यास/-काम भर्ठुरठज्ञाता ब्रतादिष्वधिकारिणी ॥ इति । शब्बभोषि-काम॑ भतुरत- 
ज्ञया ब्रतोपवासनियम! स्त्रीधर्माः ॥ इति | न चात॒ज्ञया व्रतेष्विव यक्ञेपि प्रथणथिकारापत्ति- 
रिति शड्बचम्‌। तस्याः श्रत्यध्यपनानाथिकारात ॥ यद्वा ।. स्कान्द्स्य भरठेंः श॒ुश्र॒ुषायाः स्ताव- 
कत्वेनाप्युपपन्नत्वादेति। न॒च भर्ठरठज्ञयेबाधिकारासिद्धाविधवाया ब्रतेइनथिकारापत्तिरिति क्‍ 
पाच्यम्‌। नारी खल्वनत॒ज्ञाता भर्जा पित्रा खुतेन वा॥ विफल तद्धभवेत्तस्पा यत्करोत्योध्व- 


बतराजः । [ सामास्य- 


































देहिकेमू॥ इते मार्क॑ण्डेयोक्तेः। पिन्नाद्याज्या तस्था अधिकार इति हेमाद्रिः॥ ख्तरीणां -----7_7->. ! पिनरादयाज्या तस्था आधिकार इति हेमात्रिः॥ ख्रीणां ब्रत- 


भाप झुनें। वेश्य और सुद्रोंके छिय दो राजे अधिक उप- | वचनोंसे ख्तरियोंको त्रत उपवास आदिका अधिकार नहीं' - 


वासको विधि नहीं है कि-जो वैश्य और शुद्ध मोहके | यह नहीं कह सकते. क्योंकि, ये स्वध्षत्र करनंकी मनाई _ 


वश होकर तीन रात व पांच रातका उपवास कर बैठते | करते हैं आज्ञा पाकर करनेकी मनाई नहीं करते, इसीडिये 
उन्हें उसका फल नहीं मिछता यह पहिलोंका छिखा हुआ | व्यासने लिखा हैं कि पतिकी आज्ञा लेकर इच्छानुसार ब्रत 


अनुरोध है। ऋोकमें जो व्युष्टि शब्द आया है उसका फल | करसकती है। शंखने भी छिखा है कि, पतिकी आशज्ञासे 
अथ है । सधवा स्वियोंकों विना पतिकी भाज्ञाके त्रतादि | स्त्रियां इच्छानुसार ब्रत उपरास और नियमोंको कर सकती 
करनंका अधिकार नहीं हे। ऐसा ही मदनरत्न ग्न्थन हैं । अब वहां यह शंका होती है जैसे त्रल आदि पतिकी . 
क डेंय पुराणसे उद्धृत करके छिखा है कि, जिस ख्रीको | आज्ञासे कर सकती हैं उसी तरह यज्ञ आदिकरनमें खत्रियों- 
पति पिता ओर पुत्रसे बल करनकी आज्ञा नहीं मिली हो | को कौन रोक सकता है ? उस पर उत्तर देते हैं फि, यज्ञ 
यदि वह ब्रतादि करेगी तो वे ब्रतादि उसको फल देनवाल | यजमान वेदप!ठी होना चाहिये और श्लियोंको बेदका 
नहीं होंगे।ख्ली, पतिकी आज्ञासे सभी ब्रवोंको कर सकतीहे | अधिकार नहीं है इस कारण पतिकी आज्ञा प्राप्त करनेपर 
क्योंकि कात्यायनने कहा है कि ख्रीको चाहिये कि हमेशा | भी यज्ञ आदि नहीं कर मकतीं। अथवा यों समझ लीजिये 
र्पाः आज्ञासे ही अतादिकॉकों करे, विना आज्ञाके न | कि पतिकी अनन्य भक्ताके लिये जो पत्तिके किये हुए शुभ 
करना चाहिये ॥ यह जो विप्णुका वचन हैं कि, जो स्री | कर्मॉंका भागीदार कहा है वह सेवा करनेत्रालियोंकी 
पतिके जीवित रहते हैए उपवास ब्रत करती है वो पतिंकी | प्रशंसा कीगयी है, यह मान लेनेपर भी ग्रन्थ छग सकता 
आयुका नाश करती है जिससे उसे नरक होता है इसका | है । यदि यह कहो कि पतिकी आज्ञासे ही स्री बतकरस- 
पत्पय बिना आज्ञासे करनेमें हे इसके सिवा और कुछ भी | क्‍ंती है तो जिनके पति नहीं हैं. वें विधवा स्त्रियें ब्त कर 


नहीं हट है कोई २ यह कहते हैं कि, स्कन्दपुराणमें छिखा | दी नहीं सकतीं, सो नहीं कह सकते. क्योंकि वे पिताकी 
इईआ है कि ख्ियोको  पतिप्त प्रथक्‌ यज्ञ त्रत और उपोषण तथापिताके अभावसें भाईकी आज्ञासे बरतादि कर सकती '* 
न करना चाहिये; उनको तो ५ तिकी सेवासे ही इष्ट छोक | _..' दैमाद्विने श्रीमार्कण्डेयजीके वचनसे कहा है किजो 
५. शाज्ञा तथा पुत्र और पिताके पूछे | 
(3५७ पी ावसे ही पके किये हुए देवपूजन | बच- से पक पी हे वे संब उसके निष्फल होते हैं इस! 


स्क कि 
. भिछ जाते हैं। पति अन्तःकर णक्ो लगा देगवाली सती | +..विंगा पतिक्की आज्ञा 





हे बचनसे पतिके अभावमें पिता आदिसे पूछकर कर सकती 
् असल | न पी द्विमिं 2 ७ ऊे ः का 
... ' हा फछ पाती है। इन . है। हेमाडिमें धरिबंशको लेकर, 





॥ 
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जी डनओता खिल. 


नटओा आलपक -१ चर पलसिलनकत दे बल्ब पलट सनक ५२२+ पान यड १ फल प्लस ताक.$ड 3: कस कल “पछ+ 





रि गँ के ले 0. 
र खियोके ब्त मुहणके बाड़े 
पा 

५ 


परिभाषा, | 


भाषाटीकंांसमेतत । द ः 


अहणे विशेषों हेमाद़ों हरिवेशें--स्रान॑ च कार्य शिरसस्ततः फलमवाप्लुयात ॥ स्लात्वा सल्ली 
प्रातरुत्थाय पति विज्ञापयेत्सती ॥ 





. थथ ब्रतधमा! । 


ब्रतसंकल्प विधिभोरते--गशहीत्वोहुम्बर॑पात्र वारिपृ्णेमददमुख/ ॥ उपवास तु ॒गद्दीयाद्यद्रा- 
संकल्पयेदबुधः | ओदुम्बरम्--ताम्रमयम्‌ । “ ओऔइुम्बरं स्मृतं ताम्रमू  इति विश्वोक्तेः । यद्वा 
अन्यन्नक्तत्रतादिकं कल्पयेदिति कल्पतरूशा श्रीरत्तसतु--कल्पतरूमते वाकारश्रार्थे। तेनाथमर्थ 
यत्तु नक्तादि कतुमिच्छेत्तदपि उक्तविजिनेव गहीयादिति तन्‍न्मतं परिष्कृत्य वाकारस्योपवास- 
पदस्य च्‌ वेयथ्यापत्तेयत्संकल्पयत्तद्‌गह्दीयादित्यनेनेवोपपत्तेरित्यदूबघत्‌ । ताम्रपात्राद्यमावे 
हस्तेनापि जल गहीत्वा संकल्पय दित्यक्तम्‌ ॥ मदनरत्ने तु यथा संकल्पयेदिति पाठः ॥ यथा 
कामफलमुल्लिखेद्त्यथंः ॥ अतण॒व॒ माकेण्डेय+-संकल्पं॑ च यथा कुर्यात्स्तानदानब्रतादिके ॥ 
. जनन्तरं झत्यमाह मदनरत्ने देवलः--अशुकत्वा प्रातराहारं स्नात्वा$चम्य समाहितः॥ सूर्याय 
देवताभ्यश्व निवेद्य ब्रतमाचरेत्‌ ॥ अन्न प्रातब्रेतमाचर दित्येबान्वयः । प्रधानक्रियान्वयस्याम्य- 
हिंतत्वात । अश्ञक्त्वेति त्वशक्तस्थाभ्य ठुत्तातक्ष्वादिभक्ष णापवाद३ ॥ केवित्त, ब्रतदिने आात- 
राहारमभ्ुक्‍त्वा ब्रतमाचरेदित्याहु। तन्न; उपवासो ब्रते कार्य इत्यनेनेबाश्धक्तततोइषधिकारस्य 
प्राप्तत्वादेतस्थ वेयथ्यापत्तेः ॥ अन्येतु, प्‌ृवदिने प्रातराहारम म्ुकत्वा अर्थादेकभक्त॑ कृत्वोत्तरदि 
लात्वाचम्य ब्रतादिक कुयोदित्याहु: ॥ परेतु, सबत्र पूर्वेद्यरेव साये संध्योत्तरं ब्रत म्राहमम 
किम कक जलकर "2 भटक वन लकी तक की खत अकबर कर डक कक दा 26 अर लि जल ली कल लि लब गज तन आ लटक मल 


लिखा है कि जब करेई व्रत करना चाहती होंतों उन ख्रियोंको 
चाहिय कि, शिर समेत स्लान करके पीछे पत्तिदेवकी आज्ञा 
प्राप्त करके ब्रत करें। तब वो उस ब्रतके फलछको पासकेंगी 
अन्यथा नहीं पासकतीं ॥ 


त्रतधमे-त्रतके सकट्पकी विधि महाभारतभ छिखी हे 
' कि; हाथ भरा भराया तांबेका पात्र छूकर उत्तर दिशाको 
ओर मुख कर संकल्पकरक उपवासको ग्रहण करना चा 
हिय । यदि रातका कोइ उम्रवास करना हो तो उसमे भी 
,इसी प्रकार संकरप करना चाहिय | अब ग्न्थकार इलोक 
की व्याख्या करते हैं कि, ओदुम्बर वांबेके पात्रकों कहते 
हैँ क्योंकि विश्वकोशर्मं ओदुम्बर तांबेके पात्रके परय्यायमें 
- आया है । कल्पतरु ग्रन्थमें ऊपरके इछोकका अर्थ करतेहुए 
लिखा हे कि दिनकी तरह रातक ब्रतादिकोंका भी संकटप 

करना चाहिय। श्रीद्ततने तो कर्पतरुकारके मतके इलोकर्मे 
आये हुए वाकारको “ च ? के अथसें माना हे चका और 
अथ होता है, यह करनसे इछोकका जो अथ होता हूँ कि 
दिनके ब्रतकी तरंह रावके ब्रवकोभी संकल्प पूवक ग्रहण 
करे वह पहिलेही कहा जा चुका है । इस तरह माने बिना 
इलोकम जाये हुए वा और उपवास य॑ दोनों पद ब्यथ हो 

जाते हैं क्योंकि; इनके विनाभी इनका तात्पय वाको विक*ः 
स्पार्थंक मानने पर निकल आता हे । यदि. तांबेका बर्तन 
उपस्थित म हो तो हाथमें ही पानी ढेकर संकटरप कर छना 
चाहिये। यद्दा 'संकेल्पयेतं'के स्थानलम मदनरत्नकारने यथा 
संकल्पयेत्‌ ऐसा पांठ लिखा हे -). यथाका तात्पर्य यह हे कि 


जैसी कामना हो उसको कहकर संकल्प करना चाहिये। 
इसी कारण माकंण्डेयपुराणमें कहा है कि जिन कामना- 
ओंको छेकर ब्रत करना चाहता हो उन्‍हें संकल्पमें कहकर 
ही स्नान दान और ब्रत आदि करने चाहिये । 


सकरपके बादके कृत्य-मद्नरत्लग्रन्थम देवढनें कहे हैं 
कि, बिना भौजन किये एवम्‌ स्नान आदिसे निषृत्त होकर 
एकामप्रवृत्ति करके भगवान्‌ सूय नारायण तथा अन्य देवता- 
ओके लिये नमस्कार कर प्रातःका्ू ब्रतका संकल्प करके 
ब्रतकी ग्रहण करना चाहिये | इस इलोकमें : प्रातब्रेतमाच 

रेत्‌ ' ऐसा अन्वय होता हे क्‍योंकि प्रधान क्रियाके साथ 
अन्वय होना अच्छा समझा गया हैँ, तब इसका अथ होता 
है कि प्रातःकालस ब्रतको करना चाहिये यह पह्चिछेही 
लिखचुके हूं ' अश्क्त्वा ” यह जो पद इलोकम हे इसका 
तात्पय यही होता है कि अशक्त पुरुष भरे ही कही हुई 
गड़ेली आदि चूंस ले पर प्रातः यह भी न होना चाहिये । 
कोई २ तो इसका ऐसा अथ करते हैं कि, प्रातःकालढ विना 
भोजन किय' हुए त्रत करना चाहिये उनका यह कहना 
ठीक नहीं है, क्योंकि शाख्रोंमें ऐसा कहाही ग्या है कि 
त्रतम उपवास करना चाहिये इससे विना भोजन किये 


हुएका ही ब्रत करनेका अधिकार प्रतीत होता है फिर विना 


भोजन,किय इस अथवबाले अभुकत्वा पदका इछोकमें छिख- , 
ना हो झूठा होता है । दूसरे कोई २ तो पहिले दिन प्रात 


- काछ भोजन न करके अर्थात्‌ एकभक्त यानी एक वार 
सायकालको ही भोजन कर दूसरे. दिल स्नानादि तथा 









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वारब्रतादों बहुशस्तथा दह्वत्वात लि. चान्वय इत्याहुः ॥ तामान्यथर्माः ॥ हेमाद्रो 
भविष्ये--क्षमा सत्यं दया दान॑ शोचमिद्धिददिग्रहः ॥ देवपूजाशिहवरन सन्तोषः स्तेयव्जेनम्‌ ॥ 
सर्वेत्रतेष्वयं धर्म: सामान्यों दशथा स्थितः॥ देवपजा-यहिवत्य॑ वर्त तस्य पूजा। अगभ्निहवन पृज्यदेवतेहे- 
बेन होम।॥/उपक्रमात्‌ । तञ्च सत्तमीत्रते स्यपूज। अग्निहवनम्‌। नषमीत्रते हुर्गापूजा। अतलुक्तदेवता- 
ब्रते इष्टदेवताएजा | हवन॑ व्याहतिहोम इति केचित॥अत्र क्षमादीनां स्वत्तन्त्रतया चतुर्वेगंसाधन- 
त्वेन विहितानां ब्रताड्तया विधानं ' खादिर वीयंकामस्थ यूप॑ कु्यात्‌ ' इतिवत्संयोगपृथक्त्वाह- 
पपन्नमिति हेमादिः । सवब्तेष्वित्यत्र सर्वव्रतपद मविष्यपुराणोक्तसवत्रतपरमतो व्ताम्तरे विध्य- 
न्तरसत्वे एव होमादीनाम ड्रत्वम्‌, नान्यथा | अतण्व एकादशीत्रतादों शिष्टानां होमाद्यनाचर ण- 
मित्ति केचित्‌ ॥ वस्त॒तस्तु येब्वेव पुराणान्तरोक्तत्रतेष होमादिविधिरस्ति, तद्विषयकमेव सर्व- 
पदम्‌, अन्यथा तद्तिरत्वेन संकोचापत्तरोति ॥ प्रथ्वीचन्द्रोदयेपभ्रिपुराणे--स्नात्वा ब्रतवता 
सर्वेब्तेयु ब्रतमूलेयः ॥ पूज्याः सुबर्णमय्याद्याः शक्तयेता भूमिशायिता॥जपो होमश्व सामान्‍य 
ब्रता:ते दानमेव च ॥ चतुविशद्वादश वा पश्च वा त्रय एवं वा॥विप्राः पूज्या यथाशक्ति तेभ्यों 
द्याञ्व दक्षिणाम्‌ ॥ व्रतमूतंयः तदेप्रतिमाः॥ देवछ/--अह्ाचर्यमहिंसा च सत्यमामिषबवर्जनम्‌ ॥ 

व्रतेष्वेतानि चत्वारि चरितव्यानि एनत्यशः ॥ स्त्रीणां तु॒प्रेक्षणात्स्पर्शात्ताभिः संकथनादपि॥ 

नश्यते बह्नचर्य च न दारेष्वृतुसंगमात्‌ ॥ स्वदारेष्डतुसड्रमादितिकाचित्पाठ: ॥ आपिपे-मांसम्‌। 

आमिष4 दृतिपानीयं गोवज क्षीरमामिषम्‌॥ मसूरमामिषं सस्‍्ये फले जंबीरम मिषम्‌ ॥ आमिए॑ 








आप छ हक रु रे छू 
आचमन करके ब्रतादिकोंको करना चाहिये; ऐसा कहते। वालेको खरके यूपकाही विधान * किया गया है। इलोकओं 
(3 ३ ( के कर है । 0 हु 
हैं। दूसरे कोई तो सब बतोंमें पहिले दिन सा्यकालकी | सर्वेत्रतेष' यह जो पद आया 


हैं जिसका सब त्रतोंमें, ऐसा 
न्ध्याके पीछे ये क्योंकि वारोंके | अथ कि है इसमें के करे 
सन्ध्याके पीछे अतका ग्रहण करना चाहिये क्योंकि वारोंके |... आयागया है इसमे ब्रत भविष्य पुराणके कहे हुए ही 


5 ७३ * छू ७ फ्र ७५ ७१७ ।$ ०१ न्‍ छक ५ 
ब्रतांदिकोम्लें एसा अनेक बार देखा गया है ऐसा कहते हैं । | हैं उन्हींमें होम आदिकी विधि हैं ब्रत मात्रम यह व्यवस्था 
इनके मतमे इस इलोकके प्रातः पदका अन्वय स्नात्वाके | 


साथ होगा जिसका यह अथ होगा कि प्रातःकाल सनान | पुराणके म्तकों छेकर छिखा हे कि-ब्रतके समयमें भूमिपर 


है ब्रताद्का अहण करना चाहिये। । 
योंके सामान्य घम-हेमाद्विमें भविष्यको लेकर कहा | 


हि २2 हे 
है कि-क्षमा, सत्य, दया, दानः शोच, इन्द्रियनिग्रह, देव- | _ _ ०. २ 
| | त्रतेंक अन्तम दान भी जे 

पूजा, अग्निहवन, सन्‍्तोष, अस्तेय-यह द्श तरहका सामान्य दीन भी दंना चाहिये। शक्तिके अनुसार 
धर्म सब त्रतोंम करना चाहिये । जिस देवताका त्रत हो _.. हे 

छे हक - । डर हि णा री स्य्टे ेः 
उसकी पूजा, ब्रतकी देवपूजा कहाती है । पूज्य देवताके | है दक्षणा देनी चाहिये। जिस देवका व्रत हो ब्रतकें 
उद्देशस अग्निम विधिके साथ किये हुए हवनको अग्निहवन | 


8 अर के के 
कहते ह। जिस बातको छुंकर इलोक ढिखा है यह बात | 


'उससेही प्रतीत हो जाती है । कोई २ ऐसा कहते हैं कि- 
' सप्तमौके ब्रतमें सूयेकी पूजा और सूयेक लिये हवन तथा 
नवसौके ब्रतमें ुर्गाकी पूजा और उसीके लिये हवन होना 


॥अक है 
पा अतका कोई देववाही न कहा गया हो | ख्रीके साथ समागम करनेसे बत नष्ट नहीं होता । इड्जोकर्मे 
हे न ईंट देवकी पूजा और व्याहृति ( भूमुबसस्वः ) | न दारेषु इसके स्थानमें स्वदारेषु ऐसा पाठ मानते हू 
४ ५७ 5 , - 5 | तब स्वदारम ऋतुगामी 
है पर यहां ये ब्रतके अंगके रूपमें | है, यह पश्चांतर भर्थ हे 


से हवन होना चाहिय। हेमाद्विने लिखा हैँ किए 

न बयम्‌ क्षमा 
आदि चतुवंगके साधन है दे 
ब्रिधान किय गये हैं इसक 


हू ! यही प्रयोजन हे कि इस हेत 
. भेत करनेसे ब्रतका अध्यु ह आर 





इय बढ जाता हे जस 'बीये चाहने 


माननेसे ठीक नहीं होगा । पृथ्वीचन्द्रोदय ग्रन्थमें अग्नि- 


रायन करनेबा ३ ब्रतीकों चाहिये कि सब ब्तोंमें स्नानके 
पीछे शक्तिके अनुसार सोने आदिकी बनाई हुईं ब्रतकी 
पूतिका पूजन करे फिर सामान्य जप होम करना चाहिये 


चौबीस या १९ या पांच या तीन आह्णोंको भोजन करों, 
लिये बनाई गईं उसकी भूतिको व्रतसूतति कहते हैं। देव: 


चर धर 
ढने लिखाह कि-जब कभी व्रत करे उस समय सदाही 
त्ह्मचर्य अहिंसा सत्य और निरामिष भोजन ये अवश्य ही 


् छा कक कक कक हक 
| कर ! ब्वियोंके देखनेसे छूनेसे तथा उनके साथ बातें चीरे 


करनेस बह्यचय्येका नाश होता है। ऋतुकालमें अपनी 


होनेपरभी अत नाश होजाता 


ख । सांस, मुसकका पानी और 


सस्योंमें मसूर आमिष तथा फोम जभीरी आम्रिष हूं 





रिमापा, | धाषाटीकासमेंत+ । े 


, अैक्तिकाचूण॑मारनाल तथामिषम्‌ ॥ इति स्मृत्यत्तरोक्त वा ॥ 









बताद्या 
तदाह शातातपः*-नानिष्ठा तु पितज्छाद्धे कर्म किंचित्समारनेत्‌ ॥ 
_रदीतजवानाचरणे ॥ मदनरत्ने छागलेयः-पू्व ब्रत॑-ग़हीत्वा यो नाचरेत्काममोहितः ॥ जीवन्भवति 
. चाण्डालो मृते च श्वाईमिजायते ॥ काममोहित इति विशेषणाद्याध्य:दिनाइनाचरणे न दोषः॥ 
तथा च हेमाद्रो स्कानदे-सवेभूतमय॑ व्याधिः प्रमादों गुरशासनम्‌ ॥ अव्तन्नानि पठ्य/्ते सकू- 
देतानि शाख॒तः ॥ सर्वेभ्यो भूतेभ्यः सकाशाद्रतकर्तुभयमिति हेंमाद्विः। मदनरत्ने तु सर्व- 
भूतभय्य व्याधिरित्यपरिचितत्वाद्यारूयातम्‌ सर्ववुतमयम्‌ -सर्वेभ्यों भूतेम्यः सकाशाद्वतक!ुमंयमिति 
सपोदिनयाद्भताडवैकल्पे न अताहानिमवर्तीत्यर्थः ॥ गुरुशासनम्‌ गुरोराज्ञा ॥ सकद॒क्त याउसकुत्यागे प्राय- 
श्रित्तम्‌ ॥ तदुक्त स्कानद्गारुडयोः-क्रोधात्ममादाल्वोभाद्वा त्रतमड़ो भवेद्यदि ॥ दिनत्रयं॑ न 
सुजीत मुण्डनं शिरसोउथबा ॥ न चात्र प्रायश्रित्तोक्तेरतिक्रान्तत्रतानाचरणमितिवाच्यम्‌ । प्राय 
श्रित्तमिदं कत्वा पुनरेव ब्रती भवेत्‌ ॥ इतिस्कान्दात ॥ ह 
द . भ्रथोपवासधमो: । ह 
तत्रोपवासस्वरूप कात्यायनवृद्धवासिष्ठाभ्यां दशितम्‌ ॥ उपावृत्तस्य पापेभ्यों यस्‍्तु वासों 
गुणेः सह॥ उपवासः स विक्तेयः सबभोगविवर्जितः ॥ ग्ुणेः-तज्ञाप्ययज नध्यानतत्कथा ओर 
वणादयः ॥ उपवासकृतामेते शुणा) शोक्ता मनीविभिः ॥ दया सर्वनूतेषु क्षातिरससया शौच- 





मनायासोःकापण्य च माड़ल्यमस्पृहेत्यादिनिर्विष्णुधर्मोत्तरागौतमादिप्रतिपादितेः ॥ तच्छ - 
लि: ोीससससिस नमन न न नमन नन मनन न न नमन न न मनन ऊन नम करन» 3७-3७» क+ भजन नम ननननननननननननन नमन नानक» «० «+++भ७०००५५५५७०५७.५५०.७.. ५ 


सीपीका चूरन भी इसी कोटिमें है तथा कांजिक भी आमि- 
पमें ही संभाला हैं, ये दूसरे २ स्मृतिकारोंके म्तोंखि आमिष 
गिनाये हैं । ब्रतादिकोंके आरंभ नांदीमुखश्राद्ध अवश्य 
करना चाहिये। यही शातातपने कहा हैँ कि-सांदीमुख 
श्राप पिनन पितरोंका पूजन किये किसी भी कमेका प्रारंभ 
ने करना चाहिये। | 


सकल्पित ब्रतको न करनेका प्रायश्रित्त-मद्नरत्नप्रैथमें 
छागलेयके मतको लेकर लिखा है कि, जो पुरुष पहले ब्रत 
महण करके काममोहित हो पीछे उसे न करे तो वो जीता 
हुआ ही चांडाल हैं तथा मरनेके बाद कुत्ता होता है।शहो कर्म 
जो ' कीममोहित ? लिखा हुआ है उसका यही तात्पथ्ये 
निकलता है कि, जो काम मोहित होकर न करे तो उसे 
प्रायश्वित्त है । यदि व्याधि आदि कारणोंस न कर सके तो 
उसके लिंये कोई दोष नहीं हे। ऐसा ही हेमाद्विंम स्कानदको 
प्रमाण है कि,किसी भी जीव आदिका भय,रोग, भूछ और 
गुरुकी वाज्ञा यदि ये एकवार उपस्थित भी होजाय तो 
इनसे त्रतका नाश नहीं होता। खोकमें जो 'सवभूतभयम्‌' 
यह पद आया हें, हेमाद्विने इसका अथे किया है कि चाहें 
किसी भी प्राणीसे भय हो; पर »८ मदनरत्नने इसका अर्थ 
यह किया है कि किसी भी अपरिचित जीवके भयसे ब्रतक- 
लाके भी व होनेपर यदि ब्रतमें चटि हो तो दोष नहीं है। पर 

> मदत्तरत्नने तो इसका अर्थ इस प्रकार कर दिया है कि मानों 
वो इससे परिचित ही न हों यह आशय भी इस ( अ्रपरिचितत्वाद 
व्याल्यातम्‌ ) को विभक्त करनेसे निकलता हे पढ़िले अविभक्त दशाका 


हे 


थे किया हे । 


परिचित सर्प आदिक भयसे कम छोप हो तो अवव्यमेव 
त्रतकी हानि होती है। सपे आदिके भयसे ब्रतका वैऋल्य 
होनेप रभी कोई दोष नहीं है । यह मन्यक वा फा उक्त रका 
आशय । गुरुशासनका अथे गुरुकी आज्ञा होता है। 
एक्वार इस अथवाला सक्षत्‌ शब्द कछोकमें रखा है इससे 
यही सिद्ध होता है कि (08 | / इन ब,तों ते ब्रत कम छोप 
करनमें आ्रयश्विव होता है। आदी स्कन्द औ८ गरुड़ पुएाणमें 
कहागया है कि क्रोच प्रमाद और छोनके कारण यदि जब्त 
भंग दोजाय तो तीन दिन भोजन न कराना चाहिये । यदि 
यद्द न हो सके तो शिरका मुंडन ही करडेनां चादिय: इससे 
यद्द बात नहींदे कि,जो ब्रत बिगड़ गया हो फिर वो किया 
ही न जाय;क्योंफि स्कन्द्पु एणमें ही लिखाहे कि,प्रायश्वित 
करके फिर त्रती होजाय अथात्‌ं जो त्रत बिगड़ गया हैं 
इक करके फ़िर उसे पूस करना चाहिये | 


.>अथ उपवास धम-बुद्ध कात्यायन और वसिष्ठजीन उप- 
वासका स्वरूप बताया हें कि, पापोसि निवृत्त हुए पुरुषका 
जो गुणोंके साथ वास है वह उपवास कहलाता है, उससे 
कोई भी भोग नहीं होता | इष्टद्व अथवा ब्तके देंवताके 
जपनेके मैत्र, यजंन, ध्यान और कथा सुनने आदिको गुण 
कहते ह, ये विद्वानॉने उपवास करनवालॉके गुण बताये 
हैं, सब प्राणियॉपर दया, सहन; अनिंदुन; पविन्नता, अप- 
रिश्रम, कृपणताका न छाना। संगछके काम करना और 
अनुचित इच्छाका त्यांग करना ये भी उपवास करनेवालोंके 
गुण हैं, इन्हें विष्णुधमात्तरपुराणमें, गौतमने प्रतिपादन 


- कि, के। तत्कथाश्रवणादय: में जो धत्‌ शब्द है उसके 


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ब्देनोराह्या देवता बतदेवत। व ॥ एवच पापनिद्ृत्या गरगाठुद्ठानसहितों मिराहारस्य वासो- 
प्रस्थानमुपवास इत्युकू॑भवति इदू च फलसाधनस्योपवासध्य स्वरूपमुक्ततू ॥ उपवास- 
पदार्थसतु स्म्रतिपुराणव्यवहरे झूठया निराहारावस्थानमात्रम॥ वृद्धवसिष्ठ:-उपवासे तथा 
आदे न कुपोहन्तवथावनम्‌ ॥ काछ्ठेनाति शोषः ॥ अतणव तात्रिन्दाति ॥ दब्तानां काष्टठसंयोगो 
हंम्ति सतकुलानि च ॥ इतिवाक्यशेयाद्विधोरिव नियंेधस्यापि विशेषपरता युक्तेव । लेन. 
अलामे वा निषेध वा काछ्ठानां दन्तवावने ॥ पणादिना विशुद्धयेत जिह्ोल्लेखः सदेव हि ॥ इति 
पंठीनसिवचनांत्‌॥ अछामे दन्तकाष्ठानां निषिद्धायां तथा तिथों ॥ अपां द्वादश गण्डूषेबिंद* 
ध्याइस्तवथावनमू ॥ इति व्यासवचनाञ्व पर्णादिना द्वादशगण्ड्पेव! दुष्तधावनं कार्यमेव ॥ 
देवलः-अधक्नज्जलवानाश सकृत्तांबूलचबेणात्‌ ॥ उपवासः प्रणर्येत दिवास्वापाश्च मेथुनात॥ 
अशक्तो तु तेबेव जलपानमम्यवुज्ञातमू--अत्यये चाम्बुपानेन नोपवासः प्रणश्यति ॥ अत्यये 
जडुपन विना-आाणात्ययें ॥ विष्युधने असकृजलपानं च दिवास्वापं च मेथुनम्‌ ॥ तांवलचर्वणं 
प्रांस वजयेद्धतवासरे ॥ असकृदित्युक्त्या सकृज्जलपानेनादोबः ॥ अत्र-पारणान्तं ब्र॒त जय 
बतानते विम्रभोजनम्‌ ॥ असमाप्ते बते पूर्व कुयात्रेव ब्रतान्तरम्‌ ॥ इति तश्यापि व्रतवासर- 
त्वान्मांसनिषेष/ः पॉरणारिनें एवं न तृपवासदिने | 'उपवासे प्रसक्तयभावाव | अतएव निणे- 
यांमृते व्यासः--व्जयत्पारणे मांस ब्रताहेपप्योषध सदा ॥ इति ॥ अश्छी ताम्यवतन्नानि आपो 
मूलें फुले पयः ॥ हजिआहांगकाम्या च गुरोब॑चनमोषधम्‌॥ इति स्कानदवचनात्मसक्तमोंबध- 








दो अर्थ होते हैं। पहिछा अथ वो यह है कि,जिप देवतारा | नका निषेध कर दिया हो । देवरूस्सूतिभ कहा है कि एक- 
ब्रत हो उसकी पूजा करनी चाहिय,जिस ब्रतका कोई देवता | वारकों छोड़कर ज्यादा पानी पीनेस तथा एकवारके भी 
न कहा गया हो उसमें अपने इष्टदेवका ही पूजन करलेना | पान खा छेनेसे; दिनके सोने और मैथुनंस उपवास नष्ट 
चाहिये, यह तत्‌ शब्दका दूसरा अथे होता है । इस प्रकार | दोजाता है। पाती पिये विदा न रहा जाय तो एकवुर 
उपवासशब्दका अथ होता हैं: कि, तिराहारका जो पाप-- | पानी पी छेना चाहिये, यह इसी वचनसे प्रतीत हो जाता है 
निश्वत्ति पूवेक गुणोंके साथ रहना है वह उपबास कहाता है | कष्टं|्े समय पानी पीनेसे उपवास नष्ट नहीं होता; 
'यह संकाम उपवासका रंक्षण-कहा गया है। स्वृति और | वो कष्टमी साधारण न हो किन्तु मरणान्तसा ग्रतीत- 
पुराणॉमें उपवास कम रूढि अथ निराहर रहना मात्रहें। | हो यह ( अत्यये ) का ग्रन्थकारका आशय हे | विष्णु- 
वृद्धवसिध्ते छिखा हे कि, उपवास ओर श्राद्धमें दृत्त-- | धर्मम लिखा हे कि, वारंवार पानी पीता, दिनमें सोना; 
पावन'न क्रना चाहिय | यह काठसे दन्त घावन करनका मेथुन करना,पानका चबाना ओर मांसका खाना ब्तके दिन 
हो निषेध है, अन्यसे करनेका नहीं ।यदी कारण हे कि | कभी न होना चाहिये | वार वार पानी पीनेका निषेध 
काठकी दातूनकी निन्‍्दा की हू कि, श्राद्ध तथा उपवासमें | किया गया है ' इस झारण एक बार पानी पीनेका कोई 
काठकी दांतुन करनेस सात कुछ नरकम पड जाते हैं, इस | दोष नहीं हैं। जब तक त्रतकी पारणा न हो उस दिन तक 
वाक्यविशेषस विधिकों तरह निषधकी भी विशेष व्यवस्था | ब्रतका दिन समझा जाता है । ब्रतकी समाप्ति ब्राह्मण- .. 
हो.जाती है कि काठकी दैंतूनकाही निषेध हैं, इसी लिय | भोजन अवश्य होना चाहिये । जबलक पहिला त्रत पूरा न 
पंठीचसीन लिखा है कि,जब क़ाठकी दांतुन न मिले अथवा | होढ़े तबतक दूसरे ब्तका प्रारंभ न करना चाहिये। पार- 
जब दातुन कर नेका निषध हो उस समय अन्य उपायोंसे | णाका दिन भी ब्रतका ही दिन है, इस कारण मांस आदि 
भुस्त पा लेनी चाहिये और पण आदिपे जोभ ३३५ ः निषिद्ध घस्तुओंका सेवन पारणाके दिन भी न ह होना 
दोहे हर हो जैक. दा कस 5 चाहिये। उपवासमें तो भोजनकी प्राप्ति ही नहीं हे । 
दिल दातुन न मिलता हो अथवा जिन तिधियोंमें काठकी । कर ्ज 2 है 2207 जल जे पक लिसजी हि 
छू कसतेका निषेध हो उनमें पानीके १ रहुडोस मुखझुद्धि | है कि अब और + या दे के हो मे. "ला निजीका. वचन 
इन छेनी चहिये|इन वचनोंसे यह सिद्ध रोज है कि पर्ण | रि । ग ७३-३० ९४३के ३: के कल 
आईदेस,जीभ दथा कुछ्ोंसि दांदोंडो उससम कप ० पैंगें। जिनकी ग्रांस सेज्ञा की गयो है ऐसी ओबधियोंको कभी 
जाहिये/ जब रि दृष्तुरू न मिड डर पा शृद्ध रखना | भोजनके काय्येसे न व्यज्ा चाहिये | जछ, फल, पश्च, 
200 »202७७४७ ४६ अथवा दाधुन कर- | अआह्वण कास्या, हंवि; मुरुक बचत और औपषध थे जांहों 















परिसाषा, | 


हज 






०२८ र्कमननानन»्न»५++-+--+-भम-+ कतजत+ "0 गानीशकीरश० ९७७ ०००० 






 भाषाटीकांसमेतः । __ (११) 





2 
चाय 


रूपमपि मांस प्रताहे वर्जयेद्त्यिथं: ॥ किष्णुरहस्ये-स्म॒त्यालोकनगन्धादिस्वादन परिकीर्त- 
नम्‌ ॥ अन्नस्य वर्जयेत्सव आसानां चामिकांक्ष णम्‌ ॥ गात्राग्यड्र शिरोभ्यड्रं ताम्बूल॑ चालुलेप- 
नम्‌ ॥ ब्रतस्थों वर्जयेत्सव यच्चान्यदलरागक़त॥इति ॥- हारीतः--« पतित्तपाखण्डादिनास्तिका- 
दिसंभाषणानृताछ्लीलादिकसुपवासादिष वर्जेयेत्र” इति अज्ञादिषदेर यत्पुरुषार्थनया सर्वदा 
निषिद्ध तदपि ऋत्वर्थतया संगह्मते । अत एवं ब्रताषिकारे सुमन्तुः--विहितस्यानलधश्ठानमििद्रि- 
याणामनिगप्रहः | निषिद्धसेवन नित्य वर्जेनीय॑ प्रयत्नतः ॥ पतितादेदर्शन तु विष्णुपुराणे--तस्या- 
वलोकनात्सूर्य पश्येत मतिमान्नरः ॥ सर्शादो ॥ विष्णुधर्मे--संस्पर्शों च नरः स्नात्वा शुचिरा- 
दित्यदशनात्‌ ॥ संभाष्य ताव्छुचिपदं चिन्तयेदयुत॑ बुध ॥ योगियाक्षवदवय:--यदि वाग्यम- 
' छोपः स्थाद्रतदानक्रियादिषु ॥ व्याहरेद्वेष्णवं मंत्र स्मरेदा विष्णुमव्ययम्‌ ॥ यमः--मानसे 
नियमे लुपे स्मरेद्विष्णुमनामयम्‌ ॥ इति ॥ बृहन्नारदीये-रजस्वलां च चाण्डालं महापातकिन॑ 
तथा | सूतिकां पतितं चेव उच्छिष्ट रजकादिकम्‌ ॥ व्रतादिमध्ये श्णयाद्यद्येषां ध्वनिमुत्तम३ ॥ 
अष्टोत्तरसहर्स्न तु जपेदे वेदमातरम्‌ ॥ वेदमाता-गायत्री ॥ मिताक्षरायाँ दक्ष--संध्याहीनोउशु- 
चिनित्यमनहेंः सर्वकर्मसु ॥ यदम्यत्कुरुते किंचित्र तस्थ फलमश्लुते ॥ अब प्रातःश्संध्यें- 
वाड्रमित्याहुः केचित्‌ ॥ अविशेषात्तत्सन्ध्योत्तरमाविनि कमांदों साड्रमिति युक्तमित्याहुः 
भाज्ञा।॥ पातःकालीनब्रतादिसंकल्पस्त प्रात ःसन्ध्यां कृत्वेव कार्य: ॥ प्रातःसन्ध्यां बुध: 








अंक 22कम्मन का भमकतउ-अकजए2०० कप 2. 


कृत्वा संकल्प॑ तत आचरेत ॥ इति गौइनिबंधधतस्मृते$ 


. बअतको नष्ट नहीं करते;इस स्कन्दाके वचनसे जो ओऔषधीके | 
रूपमें मांससज्ञक अरेषधोंका सेवन प्राप्त हुआथा उसकाभी | 
निराकरण उक्त नि्णयाम्ृतक वचनसे हो जाता है।विप्णुरह- | 
स्थमे लिखा है कि,अन्नका स्मरण, दृशन, गन्धोंका आस्वा* | 
दन,वर्णन और भासोंकी चाह इन सबका त्याग ब्रतक दिन | 
होना चाहियेतथा ब्रतीपुरुषको चाहिये कि शरीरका उब- | 
टना,शिरका तेल छगाना,पानका चबाना,सुगन्धित द्वव्योंका | 
छगाना,बढ ओर राग उत्पन्न करनेवाली वस्तुओंका सेवन | 


न करेहारीत कहते हैं कि,पतित,पाखण्डी और नास्तिकोंसे 


बोलना,झूठी बातें बनाना एवम्‌ गंदी बातें करना येघ्तब काम | 
ब्रतादिकॉम न करने चाहिये।भनज्ञका वात्पय केवछ भोजन | 


वस्तुस ही नहीं है किन्तु जो भोगजात निषेध किये हैं वे 


भी अन्नके कहनेस आजाते हैं कि निषिद्ध वस्तुओंके भी | 


स्सरण आदि न करने चाहिय। अथवा ब्रतमें अन्नादिक 


द्शन स्पशेन आदिका जो त्रतीपुरुषके लिय निषेध किया 
है वो निषिद्ध भी हवन आदिम करना चादिये अथात्‌ हव- 
नादिके विषयमें व्रती पुरुषको अन्नादि स्पशादिका निषेध | 


नहीं है । तब ही त्रताधिकारमें छुमनन्‍्तुन कहा है कि. कहे 
. हुएका- अनुष्ठान न करवा, इन्द्रियोंको न रोकना, निषिद्ध 
चीजोंका सवन करना इन क!मोंको प्रयत्नके सप्थ छोड 
देना चाहिये ॥ पतित आदिकोंके दशनमें तो-विष्णुपुराणमें 


कहा है कि; बुद्धिमान्‌ पुरुषको चाहिये कि, पत्रिताडि- | 


कॉको देखकर भगवान्‌ सूर्य नारायणके दशन करल।स्पशो- 


दिकक वारेमें-विष्णुपुराणमं कहा है कि यदि ब्रती कोई 


प्रतित भांदिस छू जाय तो स्तान करनके बादु सूये 





॥ माकेण्डेयपुराणे--सू्योदर्य बिना 


भगवानका दुशन करके शुद्ध हो जाता है।यदि उनसे बातें 
चीतें की हों तो दश हजार वार शुचिपद्‌ ( विष्णु भगवा 
नूका ) चिन्तन करके गुद्ध होजाता है। योगी याज्ञवहक्यनें 
कहा हे कि यदि ब्रत दान और क्रिया आदिकोंमें वाणोके 
यम (मौन) का छोप होजाय तो वेष्णव संत्रका अप अथवा 
विष्णु मगवानका ध्यान करना चाहिय | यमस्मृतिमें लिखा 
है कि, मानस नियमके छप्त हो जानेपर आधि व्याधि* 
रहित जो विष्णु भगवान्‌ हैं उनका स्मरण करना चाहिये । 
बुहन्नारदीयमें छिखा है कि, त्रतकरनेवाछा उत्तम पुरुष जो 
ब्रतादिकोंन रजस्वछ७ चांडाल,महापातकी- सूतिका,पतिव+ 
झूठ सुंदवा् एंदम्‌ धोबी आदिकी बात॑ सुने तो ब्रो 
१००८ हजार गायत्री जप करकही शुक्ध हो सकता है | 
मिताक्षरामें दुक्षन कहा हे कि, जो सब्ध्या नहीं करता वो 
सदाही अपवितन्न है; वॉ किसी भी बेदक कमंको नहीं 
घ ( धर 
कर सकता, यदि किसी १दिक कामको करता भी हे तो 
उसे उसका फछ नहीं घिछता | इस जिषयर्भ कोई २ ऐसा 
भी कहते हैं हि प्रातःकाल्की सन्ध्याक बारेमें ये बातें हे 
कि प्रातःकाल्की सन्ध्याही सब कार्याँका अंग है पर बुद्धि- 
मान्‌ शिष्ट छोगोंका यह कहना है किं,दोनों ही मुख्यहैं! प्रातः 
काछ होनेवाले कर्ममें ग्रातःकाछकी सन्ध्या तथा साँयका- 
छकी संध्याके पीछे होनेवाले कर्मांमें सायकालकी सैध्या 
अग हे वह पहिलछ होनी चाहिये । प्रात कालमें होनेवाले 
ब्रतसकलप तो प्रातः संध्या करके ही करने चाहिये, क्‍योंकि 
गौडनिर्वधप्रन्थमें छिखा हुआ है कि विद्वानको प्रातः 
कालकी संध्या करकृह्दी त्रतका संकल्प करना चाहिये! 


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कक्रमः ॥ इति ॥ क्रम/-उपकपः क्रिया ढे 
सयोदयशब्देन उषःकालो लक्ष्यते | “ त॑ बिना रात्ौ स्लानादिव् 





देय कल्प- 
उन्दोगपरिशिष्टे--सदोपवीतिना भाध्यं सदा बद्धाशिखेन च॑ ॥ विशिखो व्युपवीती 


ति न तंत्कृतम्‌॥ पियमत्याइड्रबणे आत्मालंभे अवेक्षणे ॥ अधोवायुसम॒त्सगें 


कं न कायम्‌ १) छतलि 





प्रहारेषतृतभाषणे ॥ मार्जारमूषकस्पर्श आक्रोशे ऋषधसंभवे ॥ निमित्तेष्वेष सर्वत्र. कर्म कुब- 


त्रपफ स्पृशेत्‌ ॥ माकण्डेयपुराणे--शिरःस्नातश्र कुर्वीत देव॑ पिच्यमथापि वा ॥ वराहप्राणे- 
ल्लानसन्ध्यातपंणादि जपो होमः सुराचनम्‌ ॥ उपवासवता कार्य सायसत्ध्याहुतीविना॥ 


भगवद्गीतायाम--तस्मादोमित्युदाहत्य यक्ञदानतपःक्रियाः ॥ पवर्तन्ते विधानोक्ताः सतत बहा- 


वादिनाम्‌ ॥ आपस्तम्बश--त्रिमात्रस्तु अयोक्तव्य: कमोरम्सेष सर्वेशः ॥. जिमान्र--प्रणवः (इति 


सामान्यपरिभाषा ॥ ) विस्त॒ता चेयं सामान्यपरिभाषा ५०० आचारमयूखे द्रष्टव्या ॥ अत्र ख्रीां विशेष॥ 


हेमाद्रो पाह्मे-गरमिणीसृतिकादिश्व कुमारी चाथ रोगिणी॥ यदाउशुद्धा तदाउन्येब कारयेत्पयता 
स्वयम्‌ ॥ प्र्ता-शुद्दा, स्वयंकु्यांठित्यरथं: ॥ पुंसोण्येष विधिर्लेंड्रस्पा विवक्षितत्वादोति दैमाद़िः ॥ 
एवं स्रीमी रजो दरंनेपि कार्यम ॥ तयाच सत्यत्रतः-प्रारब्धदीघंतपसां नारीणां चेद्रजों 
भवेत्‌ ॥ न च तत्र ब्रतस्य स्यादपसोधः कर्थंचन ॥ व्रतस्थ-उपवासस्येत्पर्थः ॥ पूजादिक त्वन्येत 
कारयेव। तथा च मदनरत्रे मात्स्ये-अन्तरा त॑ रजः्स्पर्श पूजामन्येन कारयेव ॥ सूतकेप्ये- 
वम्‌॥ तथा च तत्रेब-पूर्व संकलिपत॑ यज्च ब्रत॑ सुनियतब्रतेः ॥ मनन नरेः शुद्ध दानाच्चन- 


केण्डेयपुराणमें डिखा है कि, सूर्याद्यके बिना बत और | कभो यज्ञ दान और तपकी क्रिया करतेहं तब ओमू कहकर: 
दान आदिका क्रम नहीं है।क्रम उपक्रमको कहते हैं,जिसका ही अवृत्त होते हैं.। आपर्तम्बने कहा है कि, सभी कामोंके 
प्रारंभ भर्थ होता हे। कोई “ ब्रतदानाद क्रम: इसके | आरंभ त्रिमात्रका अयोग करना चाहिये । सभी _ त्िमात्र 
स्थानपर ००,३४६ ८ ४३३ ऐसा पाठ रखता हे 5 | अणव ओंकारको कहते हैं, इसे सब कोई जानता ६ । यह 
सतमें-प्रत दान भादिक जिम ऐसा अथ होगा कि ये। सामान्य परिभाषा बहुत बड़ी है, यदि विस्तार देखनः दो 
सूर्योदय विना ४ चाहिये । महिला | तो आचार मयूख नामके अन्थमे देखनको मिलेगा ॥ 
ढ़ हि भन्थमें लिखा है कि, उषः- मिटा हं-हेमाद्ियें 
डा कह... 4“कयोकि/कल्पतरुअन्थर्मे लिख हिये। श्वियोंको ब्त करनेमें विशेष सुविधाएँ-हेमा पद्म- 
झालक विना रातमें स्नान आदि न करने चा । छन्‍्दोग है के 
शिष्टमें भ। ऑराणसे हि कि, . जब गर्शिणी, पृतिकादिका 
परिशिष्टम लिखा हुआहै कि, उपवीतस सदा रहना चाहिये। 3 
तथा चोटी कभी भी खुली न रहनी चाहिये। जो मनुष्य | री ओर रोगिणी शुद्ध हों तो उस समय उन्हें 
कल दे पक अर ._ | मत दूसरेसे कराना चाहिये। यदि शुद्ध हो तो 
चोटीमें बिना गांठ दिये अथवा विना चोटीके तथा बिना हे ६ 
अते गीती न होकर जो अपना ज्रत अपने आपही करना चाहिये। क्योंकि अंथरार 
अनेऊ पहिरे एवम्‌ उपबीती न होकर शुभ काम करता | कर अप हक 
किये हएवे रोके वेदिक मंत्रोमे |  “यता ” का शुद्ध अर्थ करते है। हेमाद्रि कहते हैं कि, 
न किये हुएके वराबर है। पित फे वदिक मंत्रोंमें क्र ्‌ 
भे पीछे ने परों लेनेमें, | गम लिंगकी विवक्षा नहीं है इससे यह भी सिद्ध होता 
५ पेछि पाठादिक करनलेमें, अस्पृश्य अगोंको छू लनेमें, | « कै 
देखनेमें, अपनी सौगन्ध आदि खाने के | + “पवित्र और रोगादिकी अवस्थामें पुरुष भी अपना ब्रत 
देखनस, अपनी सोगन्ध आदि खाडनम, अधोवायुके दूसरेसे करा है। यदि गेगयी हो तो उस- 
आजतेपर, झूठ बोलने और प्रहार करने पर तथा बिल्ली | सण ह उकपा हे। यदि रजस्वढछा होगयी सर किक 
मूसेके छूने, किसीको गाली देने ने और बरी | भी ब्रतका त्याग न कर, पूजादि किसी दूसरेस करा 
चीज छू, कम करता हुआ पुरुष आचमन करके 3 2 हि हल जिनको लिखा ० कप आदि 
आर व अ ५ 8. ५ 5 | बड़ाबत कर रखा है यदि उस श्रतके बीच रजस्वढा भी 
जाता है | कस उराणस लिखा इआ हूं कि, देव और | होजौय तो भी उन्हें उच्च ब्रतको न छोड़ना चाहिये । यहाँ 
पिततर संबन्धी वैदिक कर्मोंको वाह घुरुष शिर सहित | ब्तका मतरढब उपवाससे है, अत स्वयम्‌ करती हुईं भी 
। -आक कफ धर ५ हे > फड , ध 
खान गले भारभ करे । आराहपुराणमे कहा हैँ कि उप- | जो नित्वांत पवित्रताके काय पूजा आदिक हैं उन्हें दूस* 
और ३ छ हद न संध्या तपंणादिक्ध जप होम | रेसे करा लेना चाहिये । ऐसेही मद्नरत्नमंथर्मे मत्स्यपु- 
हे पल ९ सायकाडकी सन्ध्या और आहुती | राणको लेकर लिखाहै हि, रजःस्पशेके समय पूजा तो 
हक *+० रच है यह बात नहीं होनी चाहिये ! | किसी दूसरेसे.ही करा लिया करें स्वयम्‌ न करुनी चाहिये 
..* ह। इसी कारण बद्वादी ज़न' ज़ब पूलकर्में भी यही व्यवस्थों है, पै 












वैसे ही बहां दिखा भी हुआ 


ख््ल 








विवर्जितम्‌ ॥ इंति ॥ अथ प्रतिनिषिः ॥ केन 





: भाषाणीकासमेत+ । 


॥ कारयेदित्यपेक्षायाम्‌, तत्रेव पेठीनसिः--भार्या पत्पेव्रेल॑ 






ऋचड-ट-िः-ससससस2स2-23933>-3030302:020040...0000.020..... ९४४४॥7/ १३१६ है लहर इआ॥: 22020 02/07/2247: 70:70 जम 2 मक्का 


६232 


कुयोद्वार्यायाश्र पतित्रेतम॥असामथ्येंपपरस्ताभ्यां ब्रतमड़ो न जायते ॥ अपरः-पुत्रादिः॥ तवैव 
बायुपुराणे--उपवासे त्वशक्तस्तु आहिताग्रिर्थापि वा॥ पुत्राद्या कारयेदन्याद्राह्मणाद्वापि कार- 
येव॥ उपवास प्रकुवांणः पुण्य शतशञ्॒ण लमेत्‌ ॥ नारी च पातिम्हिश्य एकादश्याझ्ुपोषिता ॥ 


' पुण्य शतग॒र्ण भोक्तामित्याह गालवों मुनिः॥ मातामहादीनारश्य 


ज्क दश्यामुपोषणे ॥। 





च भक्तितों विप्ा; समग्र फलमाप्लयुः ॥ एते च प्रतिनिधयो न काम्ये | तथा च मण्डन;-- 

के के रे छह | कु क हक । 0९५ 0. 
काम्ये प्रतिनिधिनास्ति नित्ये नेमित्तिक च सः॥ काम्येप्प्युपक्रमादूध्व कचित्मतिनियथि बिहुः ॥ 
न स्यात्मतिनिधिमत्रस्वामिदवाप्रिकर्मंस ॥ स देशकालयोः शब्दे 'नारणेः पुत्रभायथोः ॥ नापि 


निधातव्य निषिद्धं वस्तु कुच्नचित्‌ ॥ 


अथ बते हृविष्याणि । डे 
हैमाद छन्दोगपरिशिष्टे कात्यायनः-हविष्येदु यवा मुख्यास्तदल्ध ब्रीहयः स्मृताः ॥ माषको- 
द्रवगोरादीन सर्वाभावेषि व्जयेत ॥ तत्रवाभरिपुराणे-ब्रीहिषष्टिकमुद्वाश्व कछायाः सलिल॑ पयः ॥ 
श्यामाकाश्वेव नीवारा गोधूमादा व्रत हिताः॥ कृष्माण्डालाबुब्न्ताकपालकीज्योत्स्मिकास्त्य- 


जेत्‌ ॥ चतुर्मक्ष्य॑ सक्त॒कणाः शाक॑ दि घृत मधु ॥ श्यामाकाः शालिनीवारा 


यावक मूलत- 


नइलमू॥ ह॒विष्य॑ ब्रतनक्तादांवश्रिकायांदिके हितम्‌॥ मर्थु मांस विहातव्य॑ सर्वेश् ब्रतिम्रिस्तथा ॥ 


है कि नियम पूर्वक ब्रत करनेवालोने जो त्रत पहिलेही | 


पर भी न छोडना चाहिये. पर दान पूजा आदि पविच्नताके 


राज कहते हैं कि, पतिका ब्रत स्त्री तथा ख्रीका ब्रत पतिको 


करना चाहिये. दोनों ही न कर सकें तो किसी अपरसे | गयाहें वह उसीस तात्पय॑ रखता हे उसका प्रतिनिधि न 


| करना चाहिय। 
मतलब पुत्रादिकोंस है, वे ही ब्रतको पूरा करदें । इस विष- | 
यमें वहां ही वायुपुराणमें लिखा हैं कि, यदि आहितापि हो | 
अथवा उपवास करनेमें अशक्त हो तो उसे पुत्नस करा छना 


कराहें परन्तु ब्रतका भग न होने देना चाहिये। अपरका 


चाहिये, पुत्र न कर सकता हो तो दूसरे किसी कर सकने- 


वाले परिवांरके आदसीसे करा ढेना चाहिये, यदि उससे । 


कई. 


भी असंभव हो तो किसी आाह्यणसेही उपबास करा छेना 
चाहिये, इस प्रकार उपवास करानेवाले पुरुषको सौ गुना 
अधिक पुण्य फछ आ्राप्त होता है। महात्मा गारूब मुनि 
कहते हैं दि जो ख्री पदिक लिय एकादशीके दिन उपवास 
करती है उस सौ गुना अधिक फल प्राप्त होता है। जो 
मनुष्य नानी आदिकि बदले प्रेमपूवंक एकादशीका उपवास 
करता है वह हे ब्राह्मणो !. समग्र फछको प्राप्त होता 


है। ये प्रतिनिधि कास्य कर्ममें नहीं होते। ऐसा ही मण्ड- | 
नने भी कहा है कि प्रतिनिधि काम्य कमंका नहीं,हे, वो | 
तो नित्य और नेमित्तिक कर्ममें ही होता है, पर कोइ २ | 


काम्यकमम भी प्रारंभके पीछे प्रतिनिधि मानते हैं। संत्र- 
पर, स्वामीके काये. दववाके काय और अप्लिकाय इनमें 
ई अतिनिधि नहीं होसकता. यहीं क्यों ! देश, काछके 


मरीज. बवकब, 


१ नारणेरभिरेबस्रेत्यपिप्ाठ: । ६ मधु “मांते तिदायान्यदुजते. श्र हितमी रंतसित्यपिवाढः ।. हु रे 


न कपल नम टला मल 
| बिधानके विषयमें किसी दूसरे कालको किसी पुण्य 
संकल्प करके प्रारंभ कर दिया हो उसमें सूतकादिं आजाने- | कालछका प्रतिनिधि न बनाना चाहिय तथा किद्ली 
| देशका किसी दूसरे देशको प्रतिनिधि न मानना चाहिये, 
. कैत्योंको न करना चाहिये।॥ यदि स्वयं न कर सकता हो- | 


तो किससे कराना चाहिये. इस विषयमें पैठीनसि महा- 


पुण्य 


अरणिका प्रतिनिधि दूसरे काष्ठ वा पत्थरको न बना डेना 


| चाहिये तथा पुत्र और अपनी स्रीकाभी किसीको प्रतिनिधि 


ने बनाना चाहिये। ज़िस वस्तुका कहीं निषेध कर रिया 


अथ त्रतको हृविष्य चीजें-हेमाद्रि भन्थमें छान्‍्दोग्यपरि- 
शिष्टमें कात्यायनके वचन कहे हूं कि, दृविष्य अन्नोंमें जौ 
मुख्य कहे हैं, उनके पीछे त्रीहिकी गणना है, चाहें कुछ भी 
न मिले पर उडद, कोदों ओर सफेट सरसोंको कभी ग्रहण 
न करना चाहिये। इसी विषयमें अश्निपुराणमें कहा है क्रि, 
शाढी, सौंठी चावछ, मूंग तथा कराय, पानी, दूध, 


| ब्यामाक, नीवार और गेहूं आदि पारणमे हितकारी हैं ॥ 


पंठा या काशीफलछ, धीया, बैंगन, पाछकका' साग, 
ज्योत्स्निका इनका त्याग करना चाहिये। मीठा दि, घूक 


रही 


| चतुभक्ष्य, सामा, शाल्ली चावछ, नीवार, सत्त कण, शाक, 


साधारण चावढू, यावक, ये स प्‌ रातके मतादिसे हवि- 
ध्यान्न कह्दे गये ६ तथा अप्निकाय्यंसं भी इनका ग्रहण हो 
सकता हैं। पर किसी भी ब्रती पुरुषको मधु सांसका 


#नगोट-यदपि हमें कितने दी स्थलोमें सांस शब्द मिलता हैं, अर्थ 


| भी सीघ! मांस द्वी किया हुआ पायाणाता है जो कि, मांस आछज 


संघारमें प्रसिद्ध दे, मनुस्सृतिके श्राद्धप्रकरणमें मांस शब्द अनेक विशे- ' 
परणणोंके साथ दृष्टि गोचर होजाता है सब प्रन्थोंमें भी इसका कप- 








बअलश्जा । | सामान्य 






008 0777 727 28 


60/77/7027 70 कर 2000 04727 000772: 36208 000 ६2023 8.2/00 ॥527220न्‍3 240 
कमला अधना साया गाज मम] प्र 





77 मा 


पालकी पाथरी । ज्योखिता कोशातकी ॥ तत्रेव भविष्ये-हमन्तिक सितास्विन्नं घान्यं स॒ठ्ा यवा: 


स्तिलाः ॥ कलायकड़शुनीवारा वास्तु हिलमोचिका ॥ षष्टिका कालशाके च मूलक केम्ुकेत- 


श् 
स़्र 


रत ॥ कन्दः सेन्धवरसाम॒ुद्रे गव्ये च दषिसर्पिषी ॥ पयोग्लद्धृतसार च प्मसाम्रहरीतकी॥ 
पिप्पली जीरक॑ चेब नागरड्रकतिन्तिणी॥ कदली लवली धात्री फलान्यशुडमेक्षवम्‌ ॥ अतेहृ 


पक्क सनयो हृविष्याणि पचक्षते ॥ लवणे मधुसापिषी॥ इति क्चित्पाठः॥ दमान्दिक धाम्यं-कहमा 
स्तदपि सित श्वत्मस्विन्न च हृविष्यम्‌ ।। कलायाः सतीनकपयोंया मटर इतिप्रासिद्धाः ॥ वादाण इते दाक्षेण:. 
प्रासिद्वा॥ वास्तुई बथुवा इपि झरुपातः ॥ “हिल शुक्र मोचयति” इति क्षीरस्वास्युक्तेश्शकासारी हिल्साए क्‍ 
इति प्रतिद्धा। शाका जलोद्ववाः । गीडदेश हेलांचले इति प्रसिद्धा।। कालशाकम॒त्तरदेश कालिकेति प्रासिद्धम॥ 
केमुक केस॒त्रा इतिपृरवदेशे प्रिद्धम । नागरड़क तारिह्म। “ ऐशबतो नागरड्रो नादेयी भूमिजंबुका'' 


इत्यमराद॥नागर चेवेति पाठे।नागर शुण्ठी॥ढवली रायआंवव्ठेतिमहाराष्ट्रभाषयोच्यमान फलम।हरफररेवर्ड 
इतिमध्यदेशभाषया ॥ अतिेलपकमित्येतत्कवितहविष्याणामेव विशेषणम्‌ ।। मत्ु--मुम्यज्ञानि पथः सोमे 


मांस यज्चानुपस्कृतम्‌ ॥ अक्षारलवर्ण चेव प्रकृत्या हविरुच्यते ॥ अनुपस्कृतमप्क्रम । 


कभी भी ब्रतमें सवन न करना चाहिये। अन्थकारके यहां 
पालको, पाथरी और ज्योत्स्तिका, कोशावकीको कहते हैं | 
भविष्य कहा हे-हेमनत ऋतुमे होनेवाढा हेमन्तिक, 
विना भीगेहुए सफेद धान; मूंग, जो, तिछ, मटर, कांगुनी, 
नोवार, बथुआ, हिलमोचिका, सांठी चावछ, काल शाक, 
केबुकको छोडकर बाकी मूल, केद्‌, सैंधा और समुद्र नोन, 
तथा गऊके द्धी और घी, मछाईं आदि न निकाला हुआ 
दूध, कटहर,- आम, हरीतकी, पीपछ, जीरा, नारंगी, 
इमली, केला, लव॒ली, आमरछा ये सभी हविष्यान्न हैं। पर 
इंखका गुड हृविष्य अन्न नहीं हे । जो त्रतप्राह्म वस्तु तेलमें 
न पकाई हों वो ब्रतमें ग्रहण कर लेनी चाहिये। ऋषियोंने 
इन चीजोंको हृविष्य बताया है । जिनकी कि हम गणना 
करचुके हैं। कहीं २ “गव्ये च दधिसर्पिषी? के स्थानमें 
(छवणे सधुसपिषी ? ऐसा भी पाठ है जिसका अथ होता 
है कि, दोनों नमक, मधु और सर्पि इत्यादि भी ह॒विष्यान्न 
है। «मन्तिक, धानका नाम है कछमा, वह भी बिना भीगी 


संग नहीं आया हे, पुराणोमें भी इसकी पूरी कहानी मिलती है, इसे 
देखकर पत्येकके हृदयमें यह शैका होनी स्वाभाविक है कि, क्या 
प्राचीन आय्येक्ति यहां मांसकी गिनती हविध्यान्नतकमें हुआ करती 
पी ! जब सनुस्मृति इसे प्रकृतिसे हबि कह गयी ते) फिर इसके हृवि- 
चयान्नरपनेमें कौनसा सन्देह बाकी रहजाता है |उचित तो यह था 
कि जेसे अतशाजके लेखकने अग्रिपुराणका यह वचन डद्धत किया है 
कि-“ मधु मांस विद्यातव्यं सर्वैश्ध ब्रतिमिः सदा” सभी अतवालोंको 
रिइु मांसका सवेथा त्याग करना चाहिये, और इसी प्रस्4में पारणाके 
दिनको भी ब्तका दिन संभाला है, इससे यह बात सिद्ध होती दे कि, 
“ते अथवा परणाके दिन भधु सांसका प्रहणन कर॥ चाहिये। 
इसके पीछे इसी प्रकरणमें लेखक सनुका वचन इसके हविष्य होनेमें 
ल् है, तब इस ग्रन्धसे हविष्य और अहविष्यका निशेय करने- 
बी लोग हे विषयमें क्‍्यः समेंगे १ यद्यपि लेखकने इस विषयम्ें 
हे सा व करदी थी पर छेखककी व्यवस्था दुरूद हुई हे, 
हक हजार लाश उदे व्यवस्था, करना अत्यावश्यक है । मजु- 

| ३ ने खानेड़ी महाफशशहती बताया हे, तथा 


हुई सितओर श्रत-ह॒विष्य है । कछाय और सतीनक दोष 
पर्य्यायवाची शब्द हैँ। यह मटर करके प्रसिद्ध हे. इसे 
दक्षिण देशमें वाठाणे ऐसा बोछते हैं, वास्तुक बधुआगके 
नामसे असिद्ध हैं। “हि शुक्र-हिल माहिने शुक्रको जो, 
मोचयति ” छुडवादे उसे हिलमोचिका कहते हैं, ऐसी क्षीः 
स्वामीने व्युत्पत्ति की हैं। जिसे शुक्रासारी और हिलसार 
भी कहते हैं। यह एक पानीमें होनेंबाछा शाक है, जिस्म 
गौडदेशम हेलांचछ कहते हैं । काछशाक उत्तर देशों 
काहिका करके प्रसिद्ध हैं। केमुक केमुत्रा करके पूरव देश 
प्रसिद्ध हैं। नागरंग-नारंगीका नाम है, क्‍योंकि अमरधि 
हने ऐरावत, नागरंग) नादेयी, भूमिजम्बुका. ये पर्याय 
वाचक शब्द रखे हैं। यदि नागर चेव! ऐसा पाठ रखेंगे 
तो नागर झुंठी अथ होगा। छवली रायआंवलीको महा 
राप्ट्र भाषामें कहते हैँ। जिसे मध्यदेशम हरफररेवी 
कहते हैं । अतेछ पक्त यह कहे हुए हविष्य अज्नोंका 
ही विशेषण है । मनुस्मृति्त क हागया हे कि, दूर 


मांसकी निरुक्ति करतीवार यह भी कह्द दिया हैं जो मुझे यहां खाते | 
है मे उन्हें वहां खाऊंगा, इस कारण बुद्धिमान्‌ मांसको मांस कहते : 
हैं। इन वचनोंके देखनेसे प्रतीत होता दे कि मनुस्सनिकार माँस 


खानेको धर्म नहीं मानते फिर जहां कहीं मांसका विधान देख्षा जाता 
हे वो उन्हीं मांस खोरोकी विशेष व्यवस्थाके लिये 


शात् न बताएतो शान्नके सावेभोम पनेमें बडा आयेगा कि शाज्ष मां 
खोरोंपर द्वितकारी शासन नहीं रखता। जो किसी तरद्द भी मांस 
नहों खाते उनका वो कभी भी हृविष्य नहीं हो सकता पर जो मांग 


भक्तणमेंदी अपना कल्याण समझता है वो तो अतके उपवास कालमें' 


मांसके ही'स्मप्न देखता रद्द होगा, वो कभी भी सोजनके समय रुक 
नहीं सकता उसका हृचिष्य तो वो मांस ही होगा, यही समझकर 
शाह्षने भी कह दिया है कि, मांस भक्तण सदा ही सदोष .है पर जो 
जा रहा हे वो हृविष्यके स्थानमें भी खा सकता है| इसके कोई 
मसिका झपूर्व विधान नहीं माछ्म होता एवम्‌ न माँसकों अपूर्व हृवि- 
ध्यका हीं दिया जा रहा दे।. द 


् है जो अधमंकी 
तरफ ध्यान देकर मांस भक्षण करते हैं | याद उनकी भी व्यवस्थाएँ प 


करे सके, 3? करे कफ उन ए लय 
् 


परिमांती, ) . क्‍ ... भाषाटीकासमेततः | 


22/00/0270 4 220 %022 दम 27600 ४ 2 4000 00877 76 2 2222.0: 202 7:77 7770: 222 7 हि त52 62 ६222६ ९३४२ कक 
_िदकेव्य्वयइमगउधाधकरदरत पाक 'चदास्‍वाान्‍ामापापता: पा परतदिकाातधतताभ५आाकाातटासादतरा263 १०508 4वहव० तन, ामपयमपपरकक, 











अथ त्रताद्यपयुक्तानि वह्तूनि | 

तत्र पंचरत्वानि।आदित्यपुराणे-खुबर्ण रजत मुक्ता राजावत प्रवालकम ॥ रत्नपश्चकमारूयात॑ 
शेष वस्तु ब्वीम्पहम्‌ ॥ कनक॑ कुलिशं नील पद्मराग॑ च मौक्तिकम्‌ ॥ एतानि पश्चरत्नानि 
रत्नश,सत्रविदों विदुः॥ इति समयप्रदीपक्षतकालिकापुराणोक्तानि वा ॥ कुलिश हीरकम ॥ 
स्मृत्यत्तरे-अभावे सर्वरत्मानाँ हेम सर्वत्र योजयेत ॥ विष्णुधमोत्तरे-मुक्ताफले हिर्यं च वेदूय 
_ पद्मरागकम॥पुष्परा्ग च गोमेदं नीले गारत्मतं तथा। प्रवालयुक्तान्युक्तानि महारत्नानि वे नव॥ 
अथ पलवा॥हेमाद्रों अह्माग्डपुराण-अश्वत्थोहम्बरप्लक्षचूतन्यम्रोधपकछवाः ॥ पश्चनड्रा इति ख्याताः 
सर्वकमंसु शोभना/॥ पश्चमड्राः पंचपकछवा! ॥ पश्चगर्व चा॥तमप्रैव स्कान्दे-गोमूर्न गोमयं क्षीरं दथि 
सर्पियंथाक्रमम्‌ ॥ विष्णुधमें-गोमूत्रं मांगतश्रार्द शक्ृत्क्षीरस्थ च॑ तबयम॥दय दन्नो परतस्षेक- 
मेकश्व॒ कुशवारिजः॥ गोमूज्प्रमाणं तु प्रायश्रित्तमयूखे सेयम्‌ ॥ विष्णुधमें-गायदपा5दाय गो- 
मूत्र गन्धद्वारोति गोमयम॥आप्यायस्वेति क्षीरं च द्धिक्राव्णोषथ वै दथि ॥ शुक्रमसीति आज्ये 
कम लकी असल अशशलीिलश निकल लीन नम लिलन कलम लिए बिक िकिन मल कल निलकि२ / 0 की 6 कल $॥ 





सोम, मांस, और विना उपस्कार किया हुआ मांस एवम्‌ 


ह | राम! इस संत्रको बोढकर गोत्र एवम्‌ आप्यायस्व! इस 
खारी नौनको छोडकर बाकी नमक ये स्वभावसे ही हवि- 


न | मेत्रसे दूध तथा 'द्चिक्राग्णो? इस संत्रसे दृहि और शुक्र 
“यान्न हैं। अनुपरक्ृत अपक, यानी विना पकाया हुआ | मसि' से घी और 'देवस्य त्वा? से कुश का पानी सिलाना 
सांस भी ह॒विष्यान्न हैं । ः चाहिये। ऊपर कही हुई पांचों चीजोंके योगसे पेचगव्य 

ब्रतके लिये आवश्यक वस्तुएँ-सबसे पहिले आदित्य | बनता है। | 
पुराणके कहे हुए पंच रत्नोंको बताते हैं-सोना, चांदी, | गन्धद्वारां दुराधर्षो नित्यपुर्टा करीषिणीम । इंश्वरीं 
मोती, मूंगा और छाजवर्दी ये पांच रत्त कहें हैं। बाकी | सवभूतानां तामिहोउहये श्रियम्‌ ॥” यह छ्ष्मीयूत्तका संत्र 
दें लक्ष्मीके विषय इसका अर्थ यह अर्थ होता है कि, अनेक 


वस्तु अगाडी कहेंगे | समयप्रदीप अन्थमें रखे हुए कालिका- 
पुराणके कहे हुए पंचरत्न-सो ता, हीरा, नीढम, पुखराज | वरहकी स्वच्छ सुगन्धिकी द्वारभूत, किसीसे भी अभिभूत 
और मोती ये हैं रतन शाखवेत्ता इन्हें पांच रत्न मानते हैं । ने ने 
मूलशछो रुूमें जो कुलिशशब्द आया है उसका हीरा अथ हे ! 
स्मृत्यन्तरमें लिखा है कि, सब रव्नोंके अभावमें सब जगह 
सोनेकी योजना कर दे। विष्णुधर्मोत्तरमे कहा हे-मुक्ता, 
सोना, वेदूय्य, पद्मराग- पुष्पराग, गोमेद, नो, गारुत्मत 
ओर प्रवाछू ये महारत्न कहे गये हैं । 

पंचपल्व-हेसाद्विम जह्याण्ड पुशैणस कहा है कि, पीपर, 
गूछर, प्छक्ष, आम ओर वरकी डारें पंच पछव कहाती हैं। 
इस कोकमें पंचभगा ऐसा पाठ आया हे | जिसका पंच | 
पल्षव अथ है, ये सब कामोंमें उपयुक्त हैं| पंचगव्य-हेमा« | टैप है मं आपका बल 
द्र्भि स्कान्द पुराणसे पेचगठय कहा हे कि, गोमूत्र, गोवर, । वधक सत्त्व चारो ओरसे आजाय सुस बाजक खसंगमसक 
दूध) दृह्ी और गऊका ही सर्पि ये पंचगव्य कहाते हैं।| लिये हो ॥ 
विष्णुधमम कहा है कि, जितना पंचगव्य बनाना हो तो | “ओं द्धिकराव्णो अकारिष जिव्णोरश्वस्थ वाजिनः । सुर- 
आधाअंश तो गोमूत्र लेना चाहिये, तीन तीव भाग गोवर | भिनो सुखाकरत्‌ प्रण आयूषि तवारिषत ॥” दुधर्से शीघ्रही 
ओर दूधका होना चाहिये, दो भाग दही और ९ भाग धृत व्याप्त हो जानंवाले, बलशाली, व्यापन शील दृहीको इनमें 
तथा बाकीका कुशजलछ होना चाहिये । जितना पंचगव्य | मिला रहा हूँ। अथवा प्रत्येक पाद्‌ विश्लेषम प्रथ्वीको 
तयार करना हो उसमें हमें तीन अश गोवर और तीन अंश | आक्रान्त करनेवाले, जयशीर तथा बेगवाले अश्वका संस्का- 
इघके तथा दरें अंश दहीके तथा आधा अंश गोमूत्र | रकर दिया है। थो दृधि अथवा अश्व हमारे मुखोंमें 
ओर बाकी एक अंश कुशजलका मिलाकर ही तयार करना | सुगन्धि कर दे एवम्‌ हमारी आयुको बढा दे। “ओं शुक्र- 
वाहिय। जेसे २१ तोले पंचगव्यमें एक तोले गोगूत्र, दो | मस्यसतमसि धासमनामासि प्रिय देवानामनाधृष्ट देव यजन- 
गोले कुशजर तथा दो तोछे घी, ४ तोढे दही और ६ तोले | मसिक” है आज्य- | तू शुक्र-दीप्तिमान्‌ू अथवा वीय्ये रूप 
गेबर ओर छः तोले दूध लेना चाहिये। विष्णुधमम छिखा | है। आप विनाश रहित हो यानी जो आपका सेवन करता 
[भा है कि, गायत्री मंत्र बोंढडकर गोमून तथा न्धद्रान | है उसकौ शीघ्नही अरपधुमें मृत्यु नहीं होती। आप शीक्ष 











। न होनेवाली तथा सदा सब तरहसे पुष्ठ करनंवाली, 
| दानभ चित्तकरनेवाढी अथवा हाथियोंकी ईश्वरी हाथी 
| आदि उत्तम सवारी देनवाली संपूण जगतकी ईश्वरी श्रीको 
| बुला रहा हूँ । गोमयके विषयरमें विविध तरहको सुगन्धि 
| देनेबाले तथा क्रिसीसे न दबनेवाले, सदा ही पुष्टिक देने- 
| वाले एबम्‌ शुष्क गोमय रूपमें आजानेवाले सब आ्राणियोंसि 
अशसित तथा विविध शोभा संयुक्त गोमयको बुलाता हूँ । 
जिस मंत्रका जिस विषयमें प्रयोग हो उसका उसी विषयमें 
अथ होना चाहिये | “ऑआप्यायस्व समेतुते विश्ववः सोम- 
इष्ण्यम्‌ ॥ भवा वाजस्य सगथे ।” हे सोम | आपका बल- 


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४० 


च देवस्य त्वा कुशोदकम्‌॥एमिस्त पश्चश्नियुक्ते पश्वगव्य॑ प्रचक्षते॥पन्चाव्त तु ॥ हेमादों शिवधर्मे- 
पठ्चामृतं दूधि क्षीर॑ सिता मधु इत॑ स्प्तम्‌ ॥मदनरत्ते कात्यायनः--आउज्यं क्षीर॑ मधु तथा मधुर- 
त्रयमुच्यते ॥ पहुसाः ॥ तत्रेव मविष्ये-मथुरोःम्लश्व लकणः कपायस्तिक्त एवं च ॥ कटुकश्रेति 
राजेद्ध रसपटकमुदाहतम्‌ ॥ चहुःसम तु ॥ गारुडे-कस्तूरिकाया दो भागों चत्वारश्न्दनस्य च॥ 
कुकुमस्य त्रयश्रेकः शशिनः स्थाचतुःसमम्‌ ॥ कुंकुम॑ केशरम।शशी क पुर ॥ सर्वेगन्धम्‌ ॥ कपूर शअन्दन॑ 
दर्पः कुंकुम॑ च समांशकम्‌ ॥ सर्वगन्धामिति प्रोक्॑ समस्तसुरभूषणम्‌ ॥ दर्प! कस्तूरिका ॥ 
यक्षकर्दम: ॥ तथा-कह्तूरी हगुरुओ्षेव कर्प्रश्चटदनं तथा॥#ंकोले च भवेदेधिः पश्चप्रियक्षकर्दमः ॥ 
थथ सर्वोषषयः ॥ छन्दोगपरिशेष्ट-कुष्ठे मांसी हरिद्वे दे मरा शेलेयचन्दनम॥व्चा चम्पकमुस्त व 
सर्वोषध्यों दश स्घृताः ॥ तौम्राभ्याशक्म्‌ ॥ पाष्मे-इक्षवस्तृणराज॑ च निष्पावाजोजिधान्यकम्‌ ॥ 
विकारवच्च गोक्षीरं कुछुमं कुंकुम तथा॥लवणं चाष्टम तत्र सोौभाग्याष्रकम॒च्यते ॥तृणराजः ताल; | 
भजाजी जीरकम्‌ ॥ अर्थाशज्ञनि ॥ आप क्षीएं कुश/आाणि दुष्यक्षततिलास्तथा ॥ यवाःसिद्धार्थका 
श्वेति ह्ध्योउष्टाज़ः मकीर्तितः ॥ मण्डद्ार्थ पद्चव्णानि ॥ पथरात्रे-रजांसि पचवर्णानि मण्डलार्थ ९ ” 


कारयेत्‌ ॥ शालितण्डुलचूर्णन शुक्ल वा यवसंभवम्‌ ॥ रक्त कुछुभसिन्दूरगोरिकादिसमुद्धवम्‌ ॥ 
हरितालोद्गवं पीते रजनीसंभव॑ तथा ॥ कृष्ण दग्धयवेहेरित्पीतकृष्णावीमि भ्रितम्‌ ॥ रजनी 
हरिद्रा ॥ कोतुकंज्ञानि॥ भंविष्ये- दूब। यवाकुंराश्रेव वालकं चूतपह्लव॥॥ हरिद्वादयसिद्धार्थाशाते- 


विक्वव होगे हो आपका बामनाम है आप रोड थार तप. 77 77 होते हो आपका धामनाम है, आप इवोंके प्यारे | रत्ती बनाना होतो दो रत्ती कस्तूरी, ४ चदुन, ३ ६ कु 
की बा हो जब बा | चोर एक री का डेना चाहिये ।गन्‍्यहार एंड 
््‌ कक च कक | 
> ४ हे रका ओर शशि पूर न्थ-कर्षरः 
असवे5श्विनोबाहुम्यां पृष्णो हेस्ताभ्याम्‌ ॥” देव सविताकी कम र्‌ डा शर्स डक 2 हे । के के कपूर क्‍ 
आज्ञामें अवर्तेमान हुआ में अश्वित्रीकी बाहु तथा पूषाके | हक व लीकक कली बराबर छिये जॉय उस 
हाथों अहण करवा हूं। याज्ञिक विनियोगादिके आधारपर (मय इन्हें स्ंगन्ध कहते हैं। यह सब देवताओंका भूषण 
डिखे गये बेद आाष्योंमें इन मत्रोंका वही अथ है जो इनके | + ! मन्‍्थकार दर्पशब्दसे कस्तूरीका महण करते हैं। यक्ू 
विनियोगक हिसाबस होता है। एक काममें विनियोग | मे कस्तूरी, . अशुरु, कपूर, चन्दन, कैंकोल ये पांच 
किये गये मंत्रोंका यह नियम नहीं है हि, फिर दूसरे | भेलकर यक्षकर्देम कहाते हैँ । सर्वांषधी-छन्दोग प्ररिशिष्ठम 
कासमें उनका विनियाग ही न हो किन्तु दूसरमें भी उनके | ढिंखा हे कि- कट, ककोल, दोनों हछदी। मुरा, शैडेय' 
विनियोग होता हैं, यह हमें मीमांसाका ऐन्द्रीन्याय बता | पैन, बचा, चपक, मुस्त इन द्‌ श्रॉंको सवाषधि कहते ह। 
रहा हे । पर जहां ,विनियोग _होगा उसी विनियोगके सोौभाग्याष्टक-पह्मपुराणमें छिखा है कि, इंख, तृणराज, 
अडसार उनका अथ होना चाहिये, यही सोचकर हमनभी | 'ेंप्पाव, अजाजी, वन्य, दही, कुसुम, क्ेकुम, लवण ये 
इनका बैसाही अथ किया है, जहांतक हो सका हैं भाष्य- | आठ सोभाग्याष्टक ऊहाते है। तृणराज कारकों कहते हैं। 
कारोंके अथंकाभी ध्यान रखा है । या वैसा ही अथ | अजाजी जीरेका नाम है +आटांग अध्य-पानी, दूध, कुशाके 
गायत्री मेत्रके अथे करतीवार गोमूत्रमें वेसीही भावना - भाग, दृही, चावछ और तिछ जौ और सफेद सरसों 
करठेना चाहिये । | सष्टांग अध्य कहाते ह। पंचरात्र शास्त्र लिखा हुआ 
२ सके चर शक रे कि मृ0 हु शक र.. हि के पी ९ चूप ् 

पे दमा शिवधमोजें बताया है कि दही, दूध, करना नह आह _ ये रेधके पांच चूण तयार 
आढ) सहत ओर घी ये पांचो मिलकर पंचामत क्‌ ते हैं * 8 न हूँ, चावल तथा यवका चून 
सघुरत्य कि ७ ६ | बरतना चाहिये। कुसुम, . सिन्दूर और गेरुको ढाढके 
५. पनरत्नमन्थस कात्यायनका बचन हैँ कि, घी ० » व आ 
९ खहत इन तीनोंको मधुरत्रथ कहते हे । हु | , पथा हरताछके और हलदीक चूनका पीलेरेगके 
पस-सदत रल्‍्न बन्थम हो भविष्यका वचन हक खि न अनभ लेना चाहिये | जल हुये जोओंसे काढा तथा पीड़े : 
राजेन्द्र ! प्धुर, भम्ल छबयों , है कि, हैं | और काछेस हरा बना छेना चाहिये । क्योंकि इन दोनोंको 
८, गये ब-क ए $ कधाय, विक्त १ कठुक ये छः मिछा कर देनेंसे ह रे नल | ह 

रस कहे गये हैं। चतुःसम्-गरूह पैर 8 उस हरा रंग बन जाता है । ज्होकमें रजन 
अश कस्तूरी, चार अश चन्दन, तीन झऊ ८ भौ ररद्राक हो परय्योय आया है। कौतुकसेज्ञक-- 
झ ब 2 पते अश कुकुम और एक | भविष्य पुराणमे . ढिखा. है धि दूः भैके कक 

। श क्रपूर सर चारो मिछफर चतुर्संप्त कहाते हूँ ज्ञैस ब्द न हुआ हद कै; दोनों ज्‌, जे के अकुर, 
32 जसकी जह,' जाम्रकी छा८, दोसों दछदियोँ, . सफेद 


परैभाषा, | 


भांपाटीकासमेतः | 


20200 06/02/7020 :07 05000: 0702 
2 8-५ 4885 8 ४7 ० 2 3 पर! 


पत्रोर॒गत्वचः ॥ कड्रणोषधयश्रेताः कौतुकारूया नव स्मृताः॥ जथ्र पपतमृद: ॥| मात्स्थे-गजाश्वरथ- 


: वल्‍्मीकसंगमाद्धदगोकुलात॥ म्रदमानीय कुंभेष भक्षिपेश्वत्वरातथा ॥ गोकलावधि सप्त,चत्वरेण 
सहाष्टो मृदो भवन्ति ॥ सप्तवातवः ॥ हेमाद्रों भविष्ये--छुबवण रजत॑ ताम्रमारकूटं तथेव च॑ ॥ 
> लोहे बपु तथा सीस घातवः सप्त कीतिता/॥आरकूटं पित्तलम॥सप्तघान्यानि ॥ षदूत्रिंशान्मते तत्रेव-- 
यवगोधूम धान्यानि तिलाः कड्शुस्तथेव च॥ श्यामार्क॑ चीनक॑ चेव सप्तथान्यमदा हतम्‌ ॥ 
तप्तदशधान्यानि ॥ मार्कण्डेयपुराणे-ब्रीहयश्व यवाश्रेव गोधूमा अणवध्तिलाः ॥ भ्रिथ कोबि- 
दाराः कोरदूबाः सतीनकाः ॥ माषा मुद्रा मस्राश्व निष्पावाः सकुलित्थकाः ॥ आहढक्यश्रण- 
काश्वव शणाः सप्तदश स्मृता॥कोरदूषाः कोद्रवाः ॥ सतीनकाः काया? मठ।इ ते प्रतिद्धा: ॥ भष्टादश- 
पाम्यानि ॥ स्कानदे-ब्रीहियबास्तिलाशेव यावनालास्तथेव च ॥ सतीनकाः कुलित्थाश्र कड्गुकाः 
कोरदूषकाः ॥ माषमुहमस्राश्च निष्पावाः इयाम सर्षपाः ॥ गोधूमाश्णकाश्रैव नीवाराटक्य एव 
च॥एवं कऋमेण जानीयाद्धान्यान्यष्टादशेव तु ॥ शाकानि॥ हेमादों क्षीरस्वामी-मूलपत्रकरीराप्रफल- 
फाण्डाधिरूढकाः ॥ त्वक्‌ पुष्प कवर्क चोति शारक दशविध स्मृतम्‌ ॥करीर॑ वंशांकुरः॥अग्ग्रन॑ पछवः |। 
काण्ड नालम॥कवक छत्राकम्‌ । कर्शा उत्ताः विष्णुधर्मे-हेमराजतताम्राश् मृन्मया लक्षणान्विता:। 
यात्रोद्ठाहप्रतिष्ठादों कुम्माः स्प॒ुरभिषेचने ॥ तलरिमाणं च ॥ तत्रेव--पथ्च 'शाडइगुलेवपुल्या उत्सेषे 
पोडशाडइगुलाः ॥ द्वादशाड्गुलमूलाः स्पुसुंखमष्ठाइगुले भवेव॥पंचगुणिता भाशाश्व पंचाशा आश 
दृश । पंचाशदंगुलानि वेपुल्यमित्ययः । केचितु पशञ्चद्शांगुलवैपुल्या इत्याहुः ॥ प्रतिमादब्ययोंः परिमाणम्‌ ॥ 
हेमादों भविष्य-अलठक्तद्रव्यतत्संख्या देवता प्रतिमा तृप ॥ सौवर्णी राजती ताम्री वृक्षजा 


के कप हइकक ४०77 77070 04%? हज। 02707 7075 ए:/7 (५१४४7 ० प पक गत क शा, 




















सरसों, मोर पंख, सौपकी कौंचली ये कंकणकी औषधि हैं | 


इन्हें कोतुक कहते हैं। सप्तमृद्‌-मत्स्य पुराणमें छिखा है कि, 
होंकी धूल, रथकी रेत, बामीकी मिट्टी, नद्ियोंके संगमकी 


हेकी मिट्टी ये सात मृत्तिकाए हैं। इन्हें घटमें गेरे। जहां 
गेंरना कहा हो वहां; अन्यत्र नहीं । ज्छोकमें गोकुछतक 
साल तथा एक चौराहिकी इस तरह आठ मिट्टी होदीं हैं 

सप्तथातु-हेसाद्विग्रन्थमें भ॑विष्यका लिखा है कि, सुब०७ 
रजत, ताम्र, आरकूठ, छोह त्रपु और सीसा ये साब धातु 


हूँ । आरकूट पीवछको कहते हैं। वहां ही सप्तथान, षद्‌- 


त्रिंशद्‌ृ अन्थक मतसे-यकर गोधूम, त्रीहि, तिल, केंगु, 
इयामाक और चीनक इन सातोंकों सप्तधान्य कहते हैँ । 
सन्नहधान-मा्केण्डेय पुराणमें कहे है, कि ब्रीहि, यव, 
गोधूम, अणु, तिरछ; प्रियंगु, कोबिदार, कोरदूष, सतीनक, 
माष, मूंग, मसूर, निष्पाव, कुछित्थिका, आढकी, चणक 
और शण ये १७ धान्य कहाते हैं। कोरदूषका पर्य्याय 
कोद्रव हैं। तथा सतीनकका पर्य्याय कछाय हैँ जिसे छोग 
मटर कहते हैं। अठारह धान्य-स्कान्दपुराणमें फहे.हैं कि-- 
त्रीहि, यव, तिछ, यावनालर (रामदाना) सतीनक, कुलित्थ, 
केगु; कोरदूष, साष, मुद्ठ, मसूर, निष्पाव, श्याम, सर्षप, 


गोधूम, चणक, त्ीवार, आढकी, य क्रमसे गिननेंसे अठा* 


शाक-हंसाद्वि मन्थमे क्षी रस्वामीके मतसे शाकभी गिनाये 


ऋहत हैं । पुर | हैं कि. शाक दश तरहके होते हैं. सब शाक उन्हींके भीतर 
जिप स्थानमें घोडा बैंध ओर हाथी बैँधे उन दोनों जग- | 


आज्ञाते हैं । कोईं--जड, कोई पत्ते तथा कोई कुछा और 


| कोई पछव एवम्‌ कोई फलछ और कोई कोंपर, उपजे 
मिट्टी, ताछाबकी मिट्टी, गेडओंके खिरककी और चौरा- | रह डर्ड 


अंकुर, छाछ, फूल और कोई कवचके रूपमें होते हैं । करोर 


| बशाकुर यानी कुछेको कहते हैं । पल्व॒को अग्न तथा काण्ड- 
|: को नाल एवम्‌ कवचको छत्राक कहते हूँ । कलश-विष्णु, 
| धमम कहा हैं कि, कर॒श अपने लक्षणके अनुसार सोने, 


चांदी, तांबे और मिट्टीके होते हैं, ये यात्रा विवाह और 
प्रतिष्टादिक्म अभि्षिकके निमित्त होते हैं। कछशका परि- 
माणभी वहीं कहा हें कि; पंचाशांगुछ विपुलल। सोछह 


| अंगुल ऊंचा, १२ अंगुल जडवांछा और आठ अंगुलक़ा 


मुंह होता हे । दिशा दश ह इस लिये आशाशब्दसे दशका 
बोध होता है | पांचस दशकों गुणाकर देनेपर ५० होथे 


| ह, जिसका यह मतलब होता है कि पचास अंगुर विपुल 


हो | कोइ २ तो १५ अगुल ही विपुद मानते हैं, विपुुकः 
अथ चोडा होता है | - 


प्रतिता और उसके द्रव्यका परिमाण--जहां लिख दिया 
है वहां तो कोई बातही नहीं है. किन्तु जहां प्रतिमा और 
उसके द्रव्य तथा उनका परिमाण नहीं कहा गया है उसके 
लिये विचार करते ह-हेमादिन भविष्य पुराणको छेंकर 


द | लिखा है कि, हे राजन | जहां देवताकी प्रतिमाका द्रव्य 
रा यं। ॥ ३ धँंकुश। ॥ 549 ७ 


कब: जप < ७७० ०-८क, 77:20. |“ न्‍्थ- ०००. >ल्ज्वब्नन 3:५८ 7.५०: -ब- - वथ ०५-. 


कक 


| सामान्य 
व... हो था॥ वित्जा विडेंठयोत्या वजजित्ताहपारतः) ॥ आमाजात्लछगय॑न्‍ता कतेव्या 
शक्तिसमवे ॥ अंगुष्ठपर्वमारभ्य वितस्पवधिका स्थुता ॥ मात्स्ये तु विशेषः-अंग्ुष्ठ पर्वादारप्य 
वितल्तियावदेव तु ॥ गहे तु सतिमा कायो नाजिका शस्यते बुधैः ॥ अ (बीडशासु प्रासादे 
कर्तव्या नाधिका ततः ॥ इति॥ अधिक कल्पतरो मतिष्ठाकाण्डे ज्ञेयम्‌ ॥ अनादेशे होमसहया ॥ 
तथा--अठक्तसंख्याहोमे ठ॒ शतमष्टोत्तरं स्प्रतम्‌ ॥ मात्स्ये-होमो अहाजिवृजःरया शतमष्ोत्तर 
भवेव ॥ अष्टाविंशतिरष्टो वा यथाशक्ति विधीयते ॥ मदनरत्ने बाहे-यथोंक्तवस्त्वसंपत्तौ ग्रह 
तदठुकारि यत्‌॥ पान्यप्रतिनिधिः | यवाभावे च गोधूमा ब्रीक्ममावे बच तप्डुलाः ॥ भानादेश 
होमद्रव्यम्‌ ॥ आज्ये द्रव्यमनादेशे जुहुयात्व यथाविधि ॥ अवादेशे बन्त्रदैद॒तम्‌ ॥ मंत्रस्य देवतायाश्र 
प्रजापातारिति स्थिति॥/मेत्रस्प. देवतायाश्वाविधाने प्रजापतिदेवता समस्तव्याहतिर्धन्त्र॥ स्मृत्यन्तरेपि-न 
व्याहत्या सम॑ हुतः” इति ॥ गारुडे--प्रणवादिनमोन्‍्त च चतुथ्य॑नत॑ च सत्तम।देवतायाः स्वव॑ 
नाम मूलमंत्रः प्रकीतितः ॥ दवव्याभावे प्रतिनिधि! ॥ हेमाद्रों विष्णुधर्में-दृध्यलामे पयो गाहायं मध्य 
लामें तथा जुडः॥ चूते प्रतिनिधि: कार्य: पयो वा दि वा नूप ॥ तंब्रेव मेत्राय णीपरिशिप्टे- / 
#दर्मामावे काश: ।पिठीनसि)--“सर्वाभावे यवाः॥तत्रैव देवल:-आज्यहोमेष सर्वेष गव्यमेव॑ 
भवेद्वृतम्‌ ॥ तद्भावे महिष्यास्तु आजमाविकमेव तु ॥ तदभावेतु तेल स्यात्तदभाव तु जाति- 
लग ॥ तदभावे ठ कोछ॒म्म तदभावे तु सार्षपम््‌ ॥ अथ पवित्र ॥ हेमादो परिशिष्टे कात्यायन- 
अनंतगर्नितं साम कोश द्विदुलमेव च ॥ पादेशमात्र॑ विज्ञेय पवित्र यत्र कुत्रचित ॥ आज्य- 


जनम कम अल लक अजब ले जम ज सनसनी दब मन नकल जप लि कि तिलक एज कलश आ कि 
ओर उसका परिमाण तथा मूर्तिका परिमाण नहीं कहा 





40% 2०27 कर 44/70/7764 760 2/707///0/0 67 77007 00070: 


(१८ ) ... ब्रैंतेरीजे: । 









है १ अब 


लेकर पक तकको सोने, चांदी और तांबेकी बनवा छनी 


जमे कुछ विशेषता कही है कि अंगूठेके पोरुएस छेकर एक 


घरकी मूर्तिको विद्वान्‌ शुभ नहीं बताते । हवेलीमें १६ 
अगुलस बढी नगवानकी मूर्ति न होनी चाहिये | यदि इस 
विषयसें अधिक जाननेकी इच्छा हो तो कल्पतरू प्रन्थके 
प्रतिष्ठा काण्डको देखलेना चाहिये । 

'होम-जहां होमकी कोई संख्या न कही हो वहां १०८ 


चाहें उतनी आहुति दे । मदन रत्न ग्रन्थमें आह्म पुराणको 
हे न्‍र कह 
अस्त दूसरी बंम्तुकी लेलेना चाहिये। जैसे--जौ न हों तो 
भेहओंस दया ब्रीहि न हों तो तण्डुलों से काम कर छेते ह। 
दैवेन द्ृव्य न लिखा हो वहां विधिके साथ 


जह 
'मीकौही भाहुतिदेनी चाहिये । जहां कोई मंत्र देवता न 


ह्हँ 
| 


5 इसका ग्रन्थकार अर्थ करते है कि, मंत्र 
भावधामस प्रजापति देवता और 


समस्त व्याह्ृति ही मेत्र 


हैं कि; जो चीज कही गयी वो न मिले तो उस | 


केहमसया चह्ा पति हिय + है बे । धर । कक के है 
५. ही चहंअनापति समझना चार पर ढिखा है कि, जिनके बीचमे कुछ दर न हो तथा अग्र भाग 
र देवताके | ऋुशा छेनी वाहिय' 





| होगी 


सा कै श । होता है। दूसरी २ स्मृतियोंमें भी लिखा हुआ है कि, व्याह' 
गया हो वहां जेसी अपनी शक्ति हो उसके अनुसार मापसे | तियोंसे हवन करनके बराबर दूसरा कोई हवन नहीं है 
है के | अथवा व्याहृतियों के बराबर कोई हवन मंत्र नहीं ह। गरड़ 
चाहिये। यदि यहभी न हो सके तो मिट्टीकी ही बनवा | पुराणमें छिखा हुआ हें कि हे सत्तम ! जिस देवताका मूह 
ले; नहीं तो चित्रपठको ही पूज दे तथा पिष्ट लेपसे ही ।| _ 

काम चढाले । प्रतिमा अंगूठेकें पोरुएस लेकर चाहें | 


है कप षा्‌ हि है ष्थ ज्‌ आप है] 8. 
विछ॒सिति तक बड़ी हो। मत्स्य पुराणमें तो प्रतिमाके प्रमा | सब देवताओंके मूल मंत्र बन जाते ह । 


विलयद्‌ तककी मूर्ति घरमे पूजनी चाहिये. इससे अधिक | 


कह, 


मंत्र बनाना हो उस देवताके नामको चतुर्थीक एक वचना' 
नव क्रक उसके आदिसें जोमू और अन्तर्में नमः छगानेसे 


द्रव्याभावे प्रतिनिधि-हेमाद्रिमें विष्णुधभकों छेकर छिखा 


| हुआ हूं कि, हे राजन यदि दही न मिले तो दूध तथा मधुके . 
| अछाभरम गुडसे काम करना चाहिये। यदि घी न होते. 
| दही व दूधसे काम्त लेना चाहिये। उसी अन्य मैत्रायणीय 
| परिशिष्टका वचन है कि, दूबके अभाव काशको लेलेना . 
| चाहियें। पंठीनसिने कद्दा है कि, सबके बदले जौओसे 
सभझनी चाहिये। मात्स्य पुराणम कद है कि ग्रहादिकी | 
पूजामें १०८ आहुति होती है. २८, तथा ८ भरी हुआ करती | 
ह.यह करनेवालेकी शक्तिके ऊपर निर्भर हैं, वो जितनी 


काम छेना चाहिये । इस विषयमें वहां देवठका भी वाक्य 
हैं कि जहां कहीं आज्यका होम है वहां सब जगह, गौका 
ही घृतलेना चाहिये। यदि गौका ने मिले तो भप्का, 
यदि भैंसका भी न मिले तो बकरी और बद्ूरीका भी न 
हो तो भेडका व्तेतवा चाहिये। यदि यह भी न हो तो 
तिहछका ते तथा तिछतेलभी न हो तो 'जातिंलका तेल तथा | 
इसके सी अभावमें कौसुभका तेछ तथा इसकेसी अभा: 
व सरसोंका तेल लेना चाहिये। 
पवित्र-हेमाद्रिपन्थमें कात्यायन परिशिष्टक मतको लेकर 
साबित हो ऐसी द्विदछ कुशा लेनी वाहिये-बो प्रादेश' माय 
चाहिय। जहां भी कहीँ पत्रिश्राका प्रकरण आये बह 


भाषा, ] भाषाटीकासमेतः । ( १९ ) 


(26 46 कह 22८5 260. कह सकी कि व 20002 0 एफ शा 22600 ५८ 80:207660 60070 ५५ 





४७७७४::--:2::2०4- ना ०३७०० अकतलकनन. वफननन जनक “क 








स्पोत्पवनाथ यत्तदप्येतावदेव तु॥ अयथेष्माः ॥ पलाशाश्वत्थखद्रिवटोहुम्बराणाम्‌। तदमभाघे 
कण्टकवर्जसवंवनस्पतीनाम्‌ ॥ बथ घूथाः ॥ अगुरुश्वन्दनं मुस्ता सिहक वृषण्ण तथा॥समनभागेस्तु 
कतव्यों धूषोष्यममृताहयः ॥ पिह॒क पिह्ठाद इति प्रतिद्धम॒ ॥ वृषण कस्तूरी ॥ पड़भागकुष्ठ दिगणो 
शुडश्व लाक्षात्रय पंच नखस्य भागाः ॥ हरीतकौसजरसःसमांसी भागकमेक त्रिलवं शिलाजम।॥ 
'धनस्य चत्वारि पुर॒स्य चैको धूपों दशाड्र8 कथितो मुनीन्द्रेः ॥ सर्जरतो राल इति प्रसिद्ध/॥ मांसी 
जदामासाी ॥ ।ब्रंछव ।ज्रिमागस ॥ घना कपूर) ॥ पुरो सुग्युछश ॥ सुबणभानमाह है > “जालसूथ- 
मरीचिस्थ॑ चसरेणू रजः स्मृतम्‌॥ तेष्ष्टों लिक्षासतु तास्तिस्लो राजसर्षपप उच्यते॥ गौरस्तु ते 
त्रयः घट ते यवों मध्यस्तु ते त्रयः ॥ क्ृष्णलः पंच ते माषस्ते खुबर्णस्तु षोडश ॥ पल खुबर्णो- 

श्वत्वारः पश्च वापि प्रकीरतितम्‌ ॥ रजतमानमाइ--दे कष्णले रुप्यमाषों धरणं षोडशेव ते ॥ शत- 
मान तु दशभिधरणेः पलमेव ठ॒॥ निष्कः सुवर्णाश्रत्वार॥॥इति ॥ तात्रमानमाह--“कार्षिकस्तासिकः 
पणः '” इति पलचतुथोशेन कर्षेणोन्मितः कार्षिकस्ताम्रसम्बन्धी पणो भवति॥ कर्षसंज्ञा च 
निधण्टो- ते षोडशाक्षः कर्षोरस्त्री पल कषेचतुष्टयम हाति ॥ ते षोडश माषा अक्षहरसच 
कष इत्यथेः ॥ धरणस्यथेव पुराण इति संज्ञान्तरम्‌ ॥ ते षोडश स्थाद्धरणं पुराणश्रैव राजतम्‌ ॥ 
इति मिताक्षरायाँ स्मृतेश। शतमानपले पर्याये ॥ सुवर्णचतुष्ठयसमतोलित॑ रूप्यं राजतो निष्क- 








तथा जहां कहीं शतकी गुद्धिके ढिये पविन्न आया हे वहां भी | 
ऐसा ही समझना चाहिये ॥इपध्स-पलछाश, अश्वत्थ, खद्रि, | 


सिह्ार कहते हैं, वृषण कस्तूरीको कहते हैं । 
दशांगधूप-$ भाग कुष्ठ, १३ भाग “गुड़, हे भाग छाक्षाः 
पांच भाग नख, हरीतकी, सजरस और मांसी ये तीनों एक 


एक भाग, तथा त्रिह॒ब, सिलाजीत चार भाग; वन एक | 
भाग पुर इन सबको मिलाकर दशांग धूप बनता है। ऐसा | 


बड़े २ मुनि कहते हैं। सर्जरस रालका नाम है, मांसी जटा- 


कपूरका नाम है । गूगलको पुर कहा है । 


लिक्षा होता है | तीन लिक्षाओंका एक राजसघप ( राई ) 
होता हैं । तीन राज सर्षपोंका एक गौर ( सफेद सरसों ) 
होता है । छः गौरोंका एक मध्य यव होता है | तीन तीन 
जौओंका या तीन विचले जौ भर एक कृष्णछ होता है । 
पांच कृष्णठका एक सासा होता है ! सोलह.सार्षोका एक 
सुवर्ण होता है । पांच या चार सुवर्णौंका एक पल होता है | 
यह तो कोशकारोंने भी माना है कि चार सुवणाका एक 
पल होता है पर याज्ञवरक्‍य स्मृतिमें जो पांच सुबणोंसे भो 
पछ कहा गया हे इस पर विचार होता हे कि कौनसे पांच 
सुवर्णोका एक पक होता है इस पर याज्ञवक्‍यकी मिताक्षरा 





मिताक्षराने कहा हे कि मध्यम यवादिसे मान करतीवार तो 


| चार सुवर्णौका एक पल होता है, पर यह मध्यम, साधार- 
बट, उदुम्बरये समिध हैं।इनके अभावमें कांटेदारोंको छोड | णस सवाया होनां चाहिये तबही बसे चार सुवर्णोका एक 
कर सब वनस्पतियाँ छेलेनी चाहिये। धूप-भगुरु, चन्दन, | पछ होजायगा जैसा कि साधारण यवादिके पांच सुवर्णोका 
मुस्ता, सिद्धक; वृषण इन पांचों बस्‍्तुओंको रबर लेकर | पल होता है, यह जो पांच सुवर्णका भी पल याज्ञवरक्यः 
जो धूप बनाया जाताहे उस अमृत कहते हैं। सिहकको | जीने लिखा हैं वो नारदादिकॉके मतकी ओर ध्यान देकर 
| छिखा है, यदि उनका यह मत होता तो जेस उन्होंने चारकी 


| भूमिका बाँघी हे वेसीही पांचकी भूमिका बाँधते, यह 


| तोछका विषय है इसमें बिना व्यवस्थाके व्यवहार नहीं चह् 
। सकता । हे 

0 
रजत मान-दो कृष्णछोांका एक रूप्यसाष होता हें । 


कै हा सा जटा- | सोलह मासोंका एक धरण होता है; दश घरणोंका" एक 
मांसीकों कहते हैं। त्रिडवका मत्छब तीन भागोंसे है, घन | शतमान पछ होता है; याज्वसक्यजीके कहे हुए चार सुब- 
हे ० | णौंकाही एक निष्क होता हैं। 

सुबणमान-याज्ञवस्क्यन कहा हैँ कि, जाढसें सूयकी | 
किरणोंमें जो कण उड़ते, चलते दीखते हैँ; इनमेंसे एकका | है उससे तोछा हुआ कार्षिक बनता है यह तांबेका पण 
नाम त्सरेणु हे । आठ त्रसरेणुओंको मिल जानेपर एक 


ताम्रमान-चांदीके मानक परूका चौथाहिस्सा जो कर्ष 


होता है । यह याज्ञवक्‍्ल्य, स्मृतिसे ,ही लिखा गया है । 
वेद्यकके निधण्टुमें करषंका अथ किया ह्‌ कि-सोलह साषोंका' 
एक कष तथा चार कर्षोका एक पल होता हैँ । सोलह 


माषोंका एक अक्ष होला हैं, उतनाही कर्ष होता है, ऐसा 


अन्थकार कहते हैं घरणका दूसरा नाम पुराण भी हे-कक्‍्यों 
कि, मिताक्षरामें लिखा हे कि,सोलहका धरण होता हे ज़िसे 
चांदीके लोलमें पुराण भी कहते ह। शतमान यह पछफाही 
पर्य्याय है । चार राजबसुबर्णाक बराबर तुला हुआ रूप्य 
यानी राजत निष्क होता हे एवम्‌ चार सोनेके सुबर्णक 


१ ज्ोट-पूर्व व्यवस्थाके अनुसार तारदादिके पांच घुवणोंका भी 


टीकामें जो विचार किया हे उसे हम यहां उद्धल करते हैं | | एक निष्क होना चाहिय । 


30:02 2587 05203 हुक 7:०४ 





४ | 


इत्यर्थः | खुवर्णनिष्कस्त--चत॒ःसोवर्णिको निष्को विशेयस्त प्रमाणतः॥ इतिमनूक्तेःःस च पल 
पमान णएवाकोइत्र कार्षांपण इत्यपेक्षायां देश भेदेन कार्षापणो भिन्न इत्याहहेमादरो नारदः- का्ौ- 
पणो दक्षिणस्यां दिशि रौप्यः भवतंते ॥ पणेनिबद्धः पूवेस्यां घोडशव पणाः स ठ ॥ घोडशपणाः 
अष्टो ढब्बूका कार्षापणः प्र्वस्यामित्यर्थ:॥ तावता लभ्यं रूप्ये दाक्षेणस्यां स इंते द्वेतनिर्णये॥ क्‍ 
हीलावत्याम-वराटकानां दशकद्य यत्सा काकिणी ताश्व पणश्वलख्शाते षोडश द्वम्म इहाव- 
गम्यो द्रम्मेस्तथा षोडशमिश्व निष्कः ॥ इते ॥ 
अथ धान्यमानम्‌ ॥ ह 
भविष्ये--पलद्वर्य तु भ्सत दिगुण्ण कुडव मतम॥चतुर्निः कुडवेः प्रस्थः मस्थाश्वत्वार आठक॥ 
आदढकेस्तेश्वतुर्मिश्व द्रोणस्त कथितो बुधे॥ कुंभो द्रोणद्वर्य शपः खारी द्रोणास्तु षोडश ॥ द्रोण- 
द्यसस्‍्य वे शर्प इते संज्ञा।वर्ल च कुडवः प्रस्थ आठको द्रोण एव च ॥ धान्यमानेषु बोद्धव्या 
क्रमशोष्मी चतुग्रणाः ॥ द्रोणः षोडशलत्निः खारी वेंशत्या कुंभ उच्यते ॥ क्लुमेस्तु दशनिवांहो 
धान्यसंख्याः प्रकीतिताः ॥ विशत्येत्यत्रापि द्रोणेरिति संबद्धबते ॥ तथाच--कुम्भो द्रोणद्रय- 
मिति पक्षाद्विशतिद्रोणमितः कुम्भ इंते पक्षान्तरमद्रोणाटकयो!पारिमाणान्तर सुक्त॑ पराशरेण- 
वेदवेदाड़विद्विप्रधमशासखाठुपालकेः ॥ पस्था द्वात्रिंशातिद्रोंणः स्मृतो द्विभस्थ आठकः ॥ इति॥ 
एतेषां न्यूनाधिकपक्षाणां शक्तिदेशकालाद्यपेक्ष या व्यवस्था सेया ॥ 
। अथ होमद्गव्यमानम ॥ 
सिद्धान्तशेंखरे-होमद्र॒व्यप्रमाणानि वक्ष्यम्ते तु यथाक्रमम्‌ ॥ कषेप्रमाणमाज्य॑ स्यान्मधु 
क्षीर॑ च तत्समम्‌ ॥ तण्डुलानां शुक्तिमात्र पायसं प्र्तेः समम्‌ ॥ कर्षमात्राणि भक्ष्याणि लछाजा 


बराबर सुवर्ण निष्क होता हे ऐसा मनुने कहा हे वो पलके 


३ 2 47/8//4605:6०/6०470//77 //%/ ८8/7५/0४35 %2222220:702020200:%2:0%::24 





॥ सामाल्य-« 
22270:5::.. 








समान होता हे । अब यहां यह जाननेकी अपेक्षा होती ह 
कि; यहां कार्षापण क्‍या है ? देशभेद्स कार्पापण भिन्न हे | 
इसी विषयम हंमाद्रिमें नारद्जीका वाक्य हे कि, दक्षिण 
देशमें रोप्य कार्षापणही प्रचलित है । पूरबमें सोलह परोंस 
कार्षापण निदद्ध है। सोछह पण या आठ दब्बूका पूरवमे 
कार्षापण होता है। दक्षिणदिशासें उतनेहीमें रूप्य मिल- 
जाता हें, यह द्वेननिणयमें लिखा हुआ है| छीछावतीमें तो 
यह पक हे कि, २० कोडियोंकी 3५ हक तथा 
चार काकिणोका एक पण होता है सोलह पर्णोका ए 
द्रम्म तथा सोलह द्रम्मोंका एक निप्क होता है। ॥ यदद 
पहिले समयकी तोल है तथा सिक्काओंमें भी यही व्यवहार 
होता था. वेधकशासत्रमें भी कहीं २ इसका व्यवहार देखा 
जाता है पर व्यापक रुपमें नहीं हैं 
« पनमान-भविष्य पुराणक अनुसार धनका मान कहते 
है कि दो पलको प्रद्धतत कहते हैं, दो प्रतोंका एक कुडव 
होता है, चार कुडवोंका एक प्रस्थ होता है। चार प्रस्थोंका 
एक आदक होता है। चार आढकोंका एक द्रोण होता हैँ 
खारी दोंणका एक कुंभ तथा शूरप होता है सोलह द्रोणोंकी एक 
अब डलर ' नन्‍्थ हार लिखते ह्‌ कि कुंभ और शूर्प दोनों 
बेबाक बी 5 द। पल कुडव प्रस्थ आढक और द्रोण 
के पहका रह इनसे एकस एक चौगुना होता है।यानी 


केक अ8 ऊँडेद चार कुडबका एक प्रस्थ, चार 
मेस्थका एक आढ़क तथा चार भाढ़कका एक द्वोण द्ोता 


हैं। सोलह द्रोणोंकी एक खारी वथा वीस द्रोणका एक 
कुभ होता है दशा कुंभोंका एक बाँट होता है । यह घानकी 
संख्या होती है| प्न्थकार कहते हैं कि, श्लोकमें जो* विंश- 
त्या? पद हे इसका सम्बन्ध 'द्ोणे:' इस पदक साथ हें,इससे 
हमने वीस द्रोण लिये हैं न कि वीस खारी। दो द्रोणोंका 
एक कुंभ होता हे इस पक्षसे भिन्न वीस द्रोणके बराबर 
कुंभ होता है यह भी किसीका पक्ष हैं। पराशरजीन द्रोण' 
ओर आढकका कुछ और ही परिमाण कहा है कि, धर्म 
शा्खोंके अनुपाकक बेद तथा बेदांगोंके जाननेवाले आक्षण 
३३ प्रस्थोंका द्रोण और दो प्रस्थका आढक मानते हैं । यह 
जो कहीं छोटा और कहीं उसके अधिकका जो द्रोण तथा 
आाढक तथा अन्य मान कहा हे उसकी देंशा और काढके 
अनुसार व्यवस्था जाननी चाहिये कि; उस समय उस 
दृशमें यह व्यवस्था थी तथा उस देश उस समय वह्द थी 
आज इनका व्यवहार नहींके बराबर है । 

होम द्रव्यमान-सिद्धान्त शेखरमें कहा है कि, एक करे 
आज्य हो तथा मधु और दूधभी उसीक बराबर हों, चावढ 
शुक्ति भर तथा खीर प्रसृतिके बराबर छनी चाहिये जितने 
यमन के बाहिया लीक मदाभा: 


१ सेदिती आदि कोशकारोंने चार कुडव (प/व ) की एक प्रस्थ 
(१ सेर ) तथा ४ प्रस्थका एक आढक एवम आठ आदढकका एक 
द्रीण माना हे इस तरह ३३ प्रस्थका एक द्रोण होजाता है पर आढ- 
कके परिमाणमें कोशकार और पराशरजीका अन्तर रहही जाता है। ' 
पहिले समयमें यह तोल प्रचालित थी 


जब कि भारतथी मातृभाषा 
सेरछृत थी,पर इस समसमें तो सेर मन श्ादिका ही सर्वत्र स्यवद्दार है। 











६५ 


स्थात्कन्दानामष्टमोंशकः ॥ इक्षु! प्रवभ्रभाणः स्थादडूशुलद्वितयं छता ॥ पभादेशमात्राः समिथो 
बीहीणां चाज़ालि!ः समः ॥ तिलसकतुकणादीनां शृगीसुद्राप्रभाणतः ॥ तत्र पुष्पफलादीनां प्रमा- 
. णाहुतिरिष्यते ॥ चन्द्रश्रीेसण्डकस्त्रीकुंकुमाशरुूकदमाः ॥ हरिमस्थसभाः भोक्ता गग्शलुबंदरो- 
पमः ॥ हरिमन्‍्यः चणकःर ॥ आहुतीनामिदं मान कथित वेदवदिलिः ॥ स्याजिशुद्रा मगीस॒द्रा 
सबवफलप्दा ॥ मानान्तरं शारदातिलकटीकायां पदाथांदरों कर्षप्रमाणमाज्य स्याच्छत्ति 
पयः स्मृतम्‌ ॥ उक्तानि पश्चगव्यानि शुक्तिमात्राणि साधुन्नि॥ तत्समं मधु दृग्धान्न॑ आसम 
दाहतम्‌ ॥ दधि प्रसतिमात्र स्थाछाजाः स्युमुष्टिसंम्रिताः ॥ पृथुकास्तत्ममाणाः स्थुः सक्तवोषि 
तथाविधाः ॥ पलाड्/ गुडमानं च शकंरापि तथाविधा ॥ ग्रासाद्धमात्रमन्नानामिक्षु) पर्वेपश्माणतः ॥ 
एक स्यात्पत्रपुष्प॑ च तथा धूपादि कल्पयेत।मातुलिड़ चतुः खण्ड पनर्स दशधा कृतम्‌ ॥ अष्ठधा 
नारिकेलं च चत॒धो कदलीफलम्‌ ॥ त्रिधा कृतं फल बेल्व॑ कापित्थ॑ खण्डितं द्विधा॥ ब्रीहयो 
मुष्टिमानाः स्युसद्रा माषा यवास्तथा॥ तण्डुलाः स्युस्तदर्धाशाः कोद्रवा सुष्टिसंमिताः ॥ लवण 
शुक्तिमात्र स्यान्मरीचान्येकाविशतिः ॥ घृतस्य कार्षेको होमः क्षीरस्थ मधुनस्तथा॥ शुक्तिमा- 
त्राहुतिदेध्ः प्रर्तिः पायसस्यथ च ॥ खण्डत्रयं तु मूलानां फलानां स्वप्तमाणतः ॥ आसमात्र ठु 
होतव्या इतरेषां च तप्डुलाः ॥ अक्षतास्तु यवाः भोक्ता अभावे ब्रीहयः स्मृताः ॥ तदभावे च 
गोधूमा न तु खण्डिततण्डुलाः ॥ येषां केषांचिदन्येषां द्रव्याणामप्यसम्भवे ॥ सर्वत्राज्यम्ुपादेय॑ 
भरद्ाजसुनेमंतात्‌ ॥ सर्वप्रमाणमाहुत्या पतच्चाडइगुलगृहीतया ॥ इति ॥ संपूर्णानि च सर्वत्र 
सूक्ष्माणि पच्च पञ्च च।इश्नूणां पक मान लतानामड-गुलद्रयम॥चन्द्रचनदनकाइमीर क स्त्री यक्ष- 
कदंमान्‌ ॥ कलायसंमितानतान्‌ ग॒ग्गुरुं बदरास्थिवत्‌ ॥ द्ववः ख्ुवेण होतव्यः पाणिना कठिन 


४३5 इक क 
































दोनी चाहिय | ग्रासके बराबर अज्न तथा आधे प्रासके 
बराबर शाक होना चाहिये, मूहका तीसरा और कन्दका 
आठवां हिस्सा एवम्‌ इंख पोरुएके बराबर एवम्‌ दो अंगुल 
छूता तथा प्रादेश मात्रकी समिध और ब्रीहियोंकी अंजलि, 
तिछ और सत्तकण आदिकोंको मगीमुद्राके बराबर छेना 
चाहिये। पुष्प और फलकी जहां जेसी आहुति छिखी 
हो वहां वैसी होनी चाहिये । चंद्र, श्रीखण्ड, कस्तूरी, 
ऊुकुस, अगुरु, कदंस थे चनके बराबर तथा गूगल बेरक 
बराबर होना चाहिये। हरिमन्थ चनाको कहते हैं, वेद 


जानन वालॉन आहुतियोंका यह मान कहा है। मध्यमा, 


अनामिका और अंगुष्ठको मिलाकर किसी वस्तुके उठानमें 
मृगीमुद्रा होजाती है, यह होममें सब फर्लोंको देनेवाली है। 
मानान्वर-शार दातिटककी पदाथादश टीकामें लिखा हुआ 
है कि, कषेके बराबर घृत तथा शुक्तिके बराबर दूध तथा 
. शुक्तिमान्न ही पंचगव्य लेना चाहिये ऐसा श्रेष्ठ पुरुषोंका 
मत है | दूध और मधु भी शुक्तिसात्र ही छेना “चाहिये, 
. दूधका अन्न भासके बराबर छना चाहिये। प्रस्रतिके बराबर 
दृही एवम्‌ खीलछ, प्रथुक और सक्त मुप्टिके बराबर लेने 
चाहिये । गुड़ और शकरा आधे पछ होने चाहिये। भाघे 
पग्रासके बराबर अन्न और पोरुएके बराबर इंख होनी 

चादिये। पत्ता या फूछ एक होना चाहिये ऐसे दी बूपकी 


भी कल्पना होनी चाहिये । बिजोरेके चार टुकड़े तथां 
कटहरके १०,नारियछ॒के ८,केलाकी गिरहके चार, बढलके 
तीन ओर केथके दो टुकड़े करना चाहिये । ब्रीहि। मूंग। 
उड़द और जौ सदट्टीभर भाधी मुट्ठी तंदुल और कोदव एक 
मुद्दी होने चाहिय, २१ मिरच, एक शुक्तिभर नमक, घी 
दूध ओर सहत एक कषभर हवनमें आने चाहिये । दहीकी 
शक्तिभर आहुति तथा खीरकी प्रस्तिभर होनी चाहिये। 
मूलके तीन टुकड़े तथा फ्ोंके प्रमाणके अनुसार डुकडे हो 
जाने चाहिये । दूसरी चीजें तथा बन्दुढ ग्रासके बराबर 
होने चाहिय | साबित चावढोंको अक्षत कहते हैं, इन 
भक्षतोंके अभावमे यव, तथा यवोंके अभावम ब्रीहि लेने 
चाहिये । यदि त्रीहि भी न हों तो गेहूं छेलेना चाहिये पर 
टूट अक्षत (चावकछ ) कभी न लेने चाहिये | भारद्वाजमुनि 
का तो यह मत है कि. जिस किसी भी द्रव्यका अभाव हो 
उसके बदलेम सब जगह घी वर्ना चाहिये, सब. जगह 
पांच पांच सूक्ष्म तत्व होते हैं इस कारण चारोअंगुरियाँ 
ओर अंगूठाकों मिछाकर आहुति देनी चाहिय एक पोरुवेके 
बराबर इख, दो अंगुलॉके बराबर छता तथा चंद्र, चद॒न्त 
केशर, कस्तूरी और यक्षकरद्म ये मटरके बराबर तथा गूग- 
छको बेरके बराबर छेना चाहिये । द्रव दृव्यका खुबसे तथा 
कठिन हृव्य दृव्यका हाथसे हवन कऋरणा चाहिये । स्रवां 





अत _ 62५37 37470 पी 
00420 पक 


हविः ॥ स्रवपू्णा द्रवाः प्रोक्ताः कठिना म्रासम 
स्वरूपेणेव होतव्या इतरेषां च तप्डुलाः ॥ 
भथ ऋत्किबरणम्‌ । क्‍ 

हेमाद्रो पाह्मे-बालाप्रिहोत्रिण बिम॑ सुरूप॑ व गुणान्वितम्‌ ॥ सपत्नीक॑ च संपूज्य भूषयित्वा 
च भूषणे॥पुरोहित सुख्यतमं कृत्वान्याँश्व तर्थात्विज३ ॥ चताबशदगणोपेतान्‌ सपत्नीका त्रिमंत्रि- 
तावू ॥ अहताम्बरसंछत्नान्‌ ल्लग्विणः शुचिभूषितान्‌ ॥ आचार्यादेशृषणानि ॥ अडगुलीयकानि 
(व)तथा कणवेष्टान प्रदापयेत ॥ तत्रेव लेड्रें-वस्ययुग्म॑ तथोष्णीषे कु डले कण्ठभूषणम्‌ ॥ अड्गु- 
लीभूषण चेव मणिवन्धस्यथ भूषणम्‌ ॥ एतानि चेव सवाणे प्रारम्भे धर्मकर्मणाम्‌ ॥ पुरीहिताय 
दुत्वाथ ऋत्विग्थ्यः संप्रदापयेद॥पूर्वोक्त भूषणं सर्वे सोष्णीष वख्नसंयुतम्‌॥ दद्यादेतत्मयोक्तश्य 
आच्छादनपर्ट तथा ॥ अताहमधुफक्माह विश्वामित्रः-संपूज्य मधुपर्केण ऋत्विजः कर्म कारयेत | 
अपूज्य कारयन्‌ कर्म किल्बिषेणेव युज्यते॥ऋत्जां #ंस्यामाह। तत्रेव मात्स्ये- हेमालड्भरारिणः कार्य: 


(3 बट ऐप ३३ दा ५ 
ता 222 22720 
बे 


2.25 पदक १नपरमकनक मान पक 4 ७०-इुतान्‍र-; #ननक+*पननछर+ "०2 आम क़त ल्‍॥११+०ममअनकनना 


त्रीहयो 








27226 0720 6 88 8:4700 ४:47 २:20 /7% 07 गिल 40768 0005८, 
यवगोधृमप्रिय इगातिलशालयः ॥ 


पंचविंशति ऋत्विजः ॥ तो येज्च सम॑ सर्वानाचार्यें द्विगुण भवेत ॥ दक्षिणया तोषयेदित्य्थः ॥ 
अथ सर्वेतोभद्रमण्डलम । 


हेमादों स्कान्दे-प्रागुदीच्यायता रेखाः कुर्यादेकोनबिंशतिम्‌ [॥ खण्डन्डख्रिपद्‌ः कोणे शरद्डला 
प्रधमिः पढें! ॥ एकादशपदा बलीमद्वं तु नवत्िः पढेः ॥ चतुर्विशत्पदा वापी विशत्या परिषे: 


पदें!॥ मध्ये षोडशन्निः कोष्ठेः पद्ममण्ठद्ल स्मृतम्‌ ॥ श्रेतेन्डुः 


भरकर द्रवद्र्य तथा 3 द्रव्य ग्रासके बराबर छेने 
चाहिये । ब्रीहि, यव, गोधूम, प्रियंगु, तिछृ, शाली, ये 


कि 
नहीं हुआ करते पर दूसरोंके बदलूमें तंदुल आते हैं। 


ऋत्विकू संवरण-हेमाद्रिमें पद्मपुराणका वचन कहा है 
कि-अनेक सदगुणोंसे युक्त परम सुन्दर छोटी उम्रसे अध्नि 


होन्न करनेवाले सपत्नीक विद्वान ब्राह्मणकी भरी भांति 
पूजा कर फिर अनेक तरहके आभूषणोंसे अछंकृत करके| 
मुख्य पुरोहित बच्तवे, पीड़े दूसर ऋत्विजोंका वरण करे || ५ 


किक 


वे त्राह्मण भी सपत्नीक तथा चौबीस गुणोंसि युक्त, भहत 


स्वर्यभूने कहा है कि कोरे वस्रको 


ै वहां ही छिंग पुराणका 
न्ाह्णोंक वरण किया हो उनमें सबसे पहिर पुरोहितको 
जेख्े, पाग, कानोंके दो 
है) भणि बन्धका भूषण और आच्छादन पट 
सब कममोके प्रारंभसे ह 
जॉंको भी ये ही सब चीजे 
तजेजीन कहा हे किः 


करनेके पीछे उनसे कर सधुपकसे ऋत्विजोंकी पूजा 


अराना चाहिये, दिला: पूल के 


कुण्ड छ, केठका भूषण, अंगुलि- | 


| ही देना च (हिये | पीछे अन्य ऋत्वि- | 
'दूत्ती चाहियें। ब्र॒लांग मधुपकं- 





श्रद्चलाः कृष्णा वल्लीनीलिन 


| करानसे करानेबालकों पाप छगता दे।ऋत्विजोंकी संख्या- 
| हेमादिमें ही मत्स्यपुराणस लिखी है कि, सोनेके अछंकार , 
जेसक तेसे ही हृव्यके रूपमें छेने चाहिये, इन) प्रतिनिधि 


पहिने हुए पच्चीस ऋत्विज वरण करने चाहिये । उन 


| सबको बराबर और आचाय्येको इनसे दूना प्रसन्न करना 
| चाहिये , प्रन्थकार कहते हैं कि, द्विगुण तोषयेत्‌ का मतलब 


है कि दूनी दक्षिणास तुष्ट करें । 


सर्वतोभद्र मण्डल -हमाद्रिमें स्कान्दपुराणसे कहा गया 
हू कि, पूरबंस ओर उत्तरसे रबी लंबी उन्नीस उन्नीस 
रखाए बनानी चाहियें. भद्रके चारों कोनोंमें खण्ड चन्द्र" 


न | माका त्रिपदाकार तथा उसके आए चारों ओर पांच पदोंसे 

व्च [ अहत वद्बका क्षण-४ अहत यन्त्रनिमुक्तमुक्ते वास: | 

ध्वयस्भुवा | तच्छर्त साजलिक्येंषु तावत्कालं न सेदा | बनाना चाहिये। चौबीस पदोंसे वापी तथा २० पदोंकी 

अहत वस्त्र कहते हैँ वही | द 

माइक काय्योमे श्रेष्ठ नियतसमयको है | और साहा | 
पहिन हुए एवम्‌ अनेक प्रकारके पवित्र भूषणोंसे विभूषित | 
इंए हो उन्हें अपनी ओरसे छाप, छल्ले और छुंडछ देने | 


्‌ | बन जाते है । सो केसे बनते हैं? इसीपर लिखते हैं: कि 
वचन रखा है कि जिन 2 पक कक 


गड्डुछा बनावे, एकादश पदोंसे वल्ली तथा नौ पदोंसे भद्गन 
परिधि होनी चाहिये, बीचमें सोलह कोष्ठोंसे अष्टदल 
कमल बनाना चाहिये। उन्नीस उन्नीस आड़ी सीधी छकी- 
रोंक बनेहुए इन कोठोंमें रंग भरनेसे खण्ड चन्द्रमा आदि 


चन्द्रमामें श्वेत तथा शंखछाओंमें काछा, सब वल्षिओंमें 


| नीला रंग भरना चाौहिये। 
कम 22 ले जज शक मल जल लक लल मर कमीशन की लिन 


१ बृहज्ज्योतिषाणवके छठे स्कन्धके सत्रहव अध्यायमें अनेक तरह ह 
के भद्र बताये हैं तथा यह श्री वेंकदेश्वर प्रेसमें भद्रोंके चिन्रोंके साथ 
प्रकाशित भी होगय। है | जिस किन्‍्ही रे हाशयोंको भद्रोंके विषयकी । 


| विशेष जिद्बांसा हो उन्हें देखलेना चाहिये |. 


परिभाष! ] भाषादीकासमेत; | क्‍ ३३ ' 


प्रयेव ॥ भद्द रक्त सिता वापी परिधिः पीतवर्णकः ॥ बाह्यान्तरदलाः शखेताः कर्णिका पी 
णिक्वा ॥ परिध्या वेष्टित पद्म बाह्य सत्व॑ रजस्तमः ॥ तन्मध्ये स्थापयदेवान्जहाद्रांश झुरे- 
चरान्‌ ॥ इति सवतोभद्रपीठम्‌ ॥ 








अथ हछिड्गतोभद्रम । 
चतुर्विशातिरालेख्या रेखाः पराग्दक्षिणायताः ॥ कोणेषु श्रद्ध॒लाः पश्च पद वल्ल्यस्तु पाश्वतः ॥ 
परदेनवभिरालेख्याश्वतु भिलेघ॒श्ड्डला: ॥ लघुबलल्यः पद; पड्मिस्ततोषष्टादशन्निः पढेः ॥ कृत्वा 
लिड्रानि वाप्यः स्युस्रयोदशभिरन्तर॥ ॥ ततो वीथीदयेनेव पीठं कुर्याद्विचक्षणः ॥ तस्य पादा: 
पथ्वपदा द्वाराण्यपि तंथेव च ॥ एकाशीतिपदं मध्ये पद्म॑ स्वस्तिकझुच्यते ॥ कोणेषु श्वद्डलाः 
कार्या। पदेख्चिभिस्तत) परम ॥ परदेश्वतुमिरदिक्ष स्थुभद्राण्येषां समम्ततः ॥ एकादशपदा वल्टयों 
मध्येष्टदलमालिखेत्‌ ॥ पद्म॑ नवपद होव लिड्गतोमद्रमुच्यते ॥ श्वद्डलाः कृष्णवर्णन वह्ली 
नलिन प्रयेत ॥ रक्तेन शब्ला लघ्वीबंहीः पीतेन प्रयेत॥ लिड्ल्‍रानि कृष्णवणानि शखेतेनाप्यथ 
वापिकाः ॥ पीठे सपाद श्वतेंन पीतेन द्वारप्रणम्‌ ॥ मध्ये स्थ॒ु। शृंखला रक्ता वल्लीनीलेन पूर- 
येत्‌॥ भद्राणि पीतवर्णानि पीता पड़ुजकणिका ॥ दलानि खेतवण[नि यद्वा चित्राणि कल्पयेत्‌ ॥ 
तिस्नो रेखा बहिः कार्याः सि कफासिताः क्रमात्‌ ॥ 
अथ चतुलिड्ोद्धवम | 
लेड़े-रेखास्त्वष्टादश प्रोक्ताश्वतुलिड्गनसमुद्धवे॥को गरदुद्धिपदः शवेताख्रिपदेः कष्णःंखला;॥बल्ली 
सत्तपदा नीला भद्रं रक्त चतुष्पदम्‌॥ भद्रपार्थे महारुद्र कृष्णमष्टादशेः पढें! ॥ शिवस्थ पाश्वतो 
वापीं कुर्यात्पंचपदां सिताम्‌ ॥ पदमेक तथा पीतं भद्गवाप्योस्तु मध्यतः ॥ शिरसि शंखलायाकश्र 
कुर्यात्पीत पदत्रयम्‌ ॥ लिड्भाननां ध्कन्धतः कोष्ठा विशती रक्तवर्णकाः ॥ परिधि: पीतवर्णस्तु 


पढें) षोडशलन्निः स्मृतः ॥ पदेस्तु नवन्निः पश्चाद्॒क्ते पद्म सकर्णिकम्‌ ॥ 





भ्रम छाल, वापीम श्वेव, परिधिमें पीला, दढॉमें सफेद 
और कर्णिकाके कोष्ठकोंमं पीछा रंग भरना चाहिये । मध्य 
कमलछको परिधिसे पतिविष्टित करके बाहिर सत्व-रज-तम्त 
समझने चाहिये । इसके मंडलमें त्ह्मादि देवॉकी स्थापना 
: करके उनका वैध पूजन करना चाहिये । 


हिंगतोभद्र-पूरबस और दक्षिणसे लम्बी छम्बी चोवीस 
चौवीस रेखाएँ खींचनी चाहिये। कोनॉमें पाँच पद्की 
खट्डा बनानी चाहिये, पाश्चम नो पदोंसे वद्ली बनानी 
चाहिये | चारपदोंसे छोटी शट्ठछा बनानी चाहिये, छ: 
पदोंस लघुवबल्ली बनानी चाहिये, फिर अठारह पदोंसे छिग 
बनाना चाहिये, उसके भीतर तेरह पदोंसे वापी बनाना 
चाहिये, दो वीथियों से पीठकी रच ता होनी चाहिये । इसके 
पाद और द्वार पंचपदके होते हैं । मध्यम इक्यासी पदोंका 
पद्म होता हे जिंस स्वस्तिक भी कहते हैं| इसके बाद 
कोंनॉमे तीन पदकी झड्छछा करनी चाहिये । सब दिशा- 


जमे चार चार पदोके भद्र होते हैं, ग्यारह पद्लेंकी, वल्ली 


होती हैं ।-उन्तके बीचम अष्टद्छ कमछ होता है; इस प्रकार 


नौपद पद्मयका छिट्ठडतोभद्र होता: है; अड्डा कृष्णबरणशेस, 
व्डी'नीलसे, लघु शछूला छांखसें, बंदी पीठेस/“कृपणसे 


लिक् ओर श्ेतंसभी वापी तथा श्रेतस पादपीठ ओर पीतसे 
द्वारको भरना चाहिये । मध्यमें शझ्कछा छाछ हो और 
बल्लीको नीलेसे भरना घ्वाहिये, भद्र पीत वणके और कम- 
लकी कर्णिकार्म पीछा रंग तथा दढॉमें श्ववत अथवा चितक- 
बरा भरना चाहिये। बाहिर तीन रेखा होनी चाहिये, 
उनमें ऋमसे सफेद छारू ओर काछा भरना चाहिये | 


चतुलिद्ञतोभद्र-चतुलिद्गञ भद्र्में पूवकी तरह अठारह २ 


-रेखाय होती ह उनके कोणोंमें सफेद रंगका तीन पद्का 


चन्द्रमा बनावे; काछे रंगस त्रिपद्‌की बनी झखछाकों 
भरना चाहिय, सप्त पदुकी वल्ली नीले रंगसे भरना एवम 
चार पदका भद्र छाल र॑ंगस भरना चाहिये | अठारहपदोके 
भद्रणारवेन कृष्णमहारुद्र तथा उनके पाश्वमें पांच पदकी 
वापी बनानी चाहिये । जिसमे श्वत रंग भरना चाहिये भद्र 
और वापीके बीचका पाद पीछे रंगका होना चाहिये तथा 
श्खलाके शिरेक तीन पादभी पीछे रंगके होने चाहिये । 
लिड्ञोंके स्कन्धरमें आये -.हुए बीस कोष्ठ छाऊ रह्धके होने 

हिय, सोलह पदोंकी परिधि पीछे रज्ञकी होनी चाहिये | 
पीछे को पदोंस कर्णिका सब्चित क्वाल ग्डप्का-कमल:बंनालां 
चाहिय'। ... 


अथ द्वादशलिगोड्भवम्‌ । 

तत्रेव--प्रागदीच्यायता रेखाः षट्जिंशद्धि प्रकल्पयेत्‌ / पदालनि द्वा 
च्‌॥ खण्डेन्दरद्विपदः कोणे शृंखला; पट्पदें! स्मृताः ॥ त्रयोदशपदा वह 
त्रयोदशपदा वापी लिड्रमष्टादश स्मृतम्‌ ॥ «लिड्भत्रयस्य_पेक्तों ठुं शोभाकोष्ठ श्रत॒देश ॥. 
तेषामुपरि पंक्तो तु कोष्ठा! सत्तदशेव तु ॥ पूजापक्तिस्तु विज्ञया परितः पंरिकीर्तिता ॥ पूजा- 
पेक्तयन्तरा पेक्तों कोष्ठा द्यशीतिसंख्यया ॥ परिधि! स च विक्षेयो मण्डले ह्ान्तरा द्वयोः॥ 
परिध्यन्तरकोष्ठेषु सबतोभद्रमालिखेत्‌ ॥ विशेषश्वात्र वित्षयः श्रृंखला ष पदा भंवेत्‌ ॥ चयोदश* 
पदा वल्ली भद्दे तु नवनिः पद! ॥ पश्वविंशत्णदा वापी परिधि! षोडशात्माकः ॥ मध्ये नवपद॑ 
प्म॑ कणिकाकेसरान्वितम ॥ सत्तं रजस्तमोवर्णाः परितो मण्डलस्य तु॥त्रयः परिधयःकायो स्तत् 
द्वाराणे कारयेत्‌ ॥ सितेरदुः श्रेंखला कृष्णा वल्ली नीला प्रकीतिता ॥ भद्दे चेवारूणं क्षेयं वापी 
स्याच्छवेतवणिका ॥ लिड्रानि कृष्णवर्णानि पाश्वतो द्वादशेव तु ॥ परिधिः पीतवण्णेः स्यात्कमहं 















द्रादंशश्त पश्चविंशतिरेद 
| भद्रं तु नवन्निः पदे।॥ 


पश्चवणकम्‌ ॥ इति सर्वेतोभद्रलिड्गतोभद्वारिमण्डछानि।मय स्वेतोभद्रंडिंगतोभद्रमंडलविभाग:॥उच्यते- 

शिवत्रतं विना सर्वत्रतोद्यापनेषु सर्वतोभ्द्रमण्डल॑ कारयेच्छिवत्रते तु लिड्गतोमद्रमालिखेत | 

तत्र कारिका ॥ बाहुमात्रायतां वेदीं रुर्याच्छुद्धम॒दा बुध! ॥ तद्वेयां सर्वतोभद्रं मण्डल विलि' 

वेत्तत;।शिवत्रते,, तत्रेव लिड्गतोभद्रमालिखेत्‌ ॥ तन्मध्ये स्थापयेदेवान बअह्मायांश्र सुरेश्वरांव॥ 
अथ मण्डलदेवता; | 

तन्मध्यें बह्माणम्‌ ॥ बहाजज्ञानं गौतमो वामदेवो बहा त्रिष्टुप॥मध्ये बह्मावाहने विनिग्ोग॥ 


>अहाजत्ञानं प्रथम पुरस्ताद्विसीम तः सुरुचो वेन आव१सबु नया उपना अघ्य विष्ठाःसतश्चयोति 


मसतश्व विवः ॥ भो ब्रह्मद इद्दगच्छ इह तिष्ठ पूजा गहाण मम संमुखः सुप्रसन्नो वरदो भव ॥ 
कक न तप कम न मम आम शी 


 द्वादशढिज्लोडव-पूरव ओर उत्तरस छत्तीस छत्तीस 
रेखायें बनानी चाहिये। सबमे बारह सौ पश्चीस पद होंगे, 
कोणपमें तीन पदोंका खण्ड चन्द्र, छःपदोंकी श्रृखछा, तेरह 
पदोंकी वही एवं नौ पदोंका भद्र, तरह पदोंकी वापी तथा 
अठारह पदोंका छिड्ढ होना चाहिये | तीन छिल्गॉकी 
पक्तिमं--चौद॒ह शोभा कोष्ठ होने चाहिये उनकी ऊपरकी 
पांतम सत्रह कोठोंकी पूजा पंक्ति चारों ओर होती है। पूजा 
पंक्तिक भीतरवाली पंक्तिम बियासी कोठोंकी परिधि होती 
हैं; यह दोनों सण्डलॉके बीचसें होती है। परिधिके भीत- 
रके कोठोमें सवेतोभद्र लिखना चाहिये। इसमें विशेषता 
यह है कि छपदोंकी शंखलछा, तेरह पदकी वही, नौपदका 
भद्ठ, पच्चीस पदुकी परिधि होती है। बीचसे नौ पदका 
पद्म होता है । सत्तोगुणके इवेल, रजोगुणके छाछ, तथा वमो- 
शुणके काले रज्ञको संडलके चारों ओर परिधि बनानी 
चाहिये। इनमे द्वारभी बनाने चाहिये। भ्रेतरड्का चन्द्रमा, 
फाकरइकी शड्भेा, नीलेरइुकी बही बनानी चाहिय । 
डे हक भद्र तथा स्वेतवणकी वापी बनानी चाहिये। 
बेटी परिचि हे बा लि बनाने चाहिये । पीत- 
कई के कप पचरंगा कमछ बनाना चाहिये। 
तोसद मण्डड बनादा खार 
(जिकप ७ $....... 'पादिये। पर शिवत्रतोंके उद्यापनोंमें 





अतोंके उद्यापनोंमें सवे- | विस 


वेदी बनानी चाहिये उस वेदीपर सर्वेतोभद्र मंडल लिखना 
चाहिये ओर शिवन्नतोंमें लिंगतो भद्र मेडल बनाना चाहिये; 


'उसके बीचमें जअद्यादिक देवता तथा इन्द्रादि देवोंको 


स्थापित करना चाहिये ! 


मण्डल देवता-सबसे पहिले मण्डलक मध्यमें अद्माजीको 
स्थापित करना चाहिये, “त्ह्म जज्ञानम्‌”? इस संत्रका गौतम 
वामदेव ऋषि हे । अद्य[दिवता है त्रिष्ठुपू छ्न्द हे मध्यमें 
ब्रद्मके आवाहनकें इसका विनियोग होता है। जिस 


वाक्यके अन्तमें विनियोग आबे वहां स्रीधे हाथमें पानी 


लेकर विनियोगान्त पद्‌ समुदायको बोछकर पानी भूमि 
पर छोड देना चाहिये | यह सब जगह समझना चाहिये। 
न्रह्म ज्ञान प्रथमम्‌ इस मंत्रको बोककर ब्रह्माकी स्थापना 
करनी चाहिये मंत्रका अथे-(१) पहिछ सर्व प्रथम त्रद्बाजी 
>त्पन्न हुए थे जब इन्होंने वपस्यासे भगवानके दशन करके 
वन पद्‌ पालिया उस समयमें कान्तदर्शी दोगये, पढ़े 
उन्होंने नियमित रूपस सुन्दर प्रकाश शीछ देवता रवें 
तथा जो वस्तु हम देख रहे हैं एवम्‌ हमारे जो दृष्टि गोचर 
नहीं हैं उन सब वस्तुओंको और उनके कारणोंका इसीने 


फ्रेहस चाहिये, इस विषय इसकी बराषरीका गा नहीं है ॥ दे अक्षान्‌ ! यहां 
इसाण है कि,विंदाक्को बाछुके धरावर कब गज िगक लक कु यहां बेठो, भरी पूजाको अहण करो, मेरे सन्मुख 


!ी 


तार दिया था। ऊपरके भ्री लोक इसीने रखे हैं। 


! अंकी भाँति एसस होकर परदान देसेसषटे, हो ।। 


परिभाषा, | 


भाषाटीकासमेतः 


न्‍अशकलनथ& 5०2नलाला पक पक डक न_ कान न_- नल न. 





वाय्वन्ता अष्टो लोकपालाः स्थापनीय॥३ ॥१॥ तत्र आप्पायस्व राहुगणों गौतम; सोमो गायच्री 
सोमावाहने विनियोगा+ ॥ ओम्‌ आप्यायस्व समेत ते विश्वतः सोम दृष्ण्यम्‌ ॥ भवा वाजघ्य 
संगथ ॥ २॥ अभि त्वाइजीगर्ति। शुनः शंप इशानो गायत्री ॥ ऐशान्यामीशानावाहने वि० 
ओम अभि त्वा देव सवितरीशानं वायाणाम॥।सदावन्भागमीमहे ॥३॥ इंद्र वो मधुच्छन्दा इन्द्रो 
गायत्री॥ पूर्वे इन्द्रावाण॥ ऑइन्द्रं वो विश्वतस्पीरे हवामहे जनेम्य॥अस्माकमस्तु केबलशा ४ ॥ 
अग्ने दूतं काण्वो मघातिथिरमप्रिगायत्री आम्रेय्यामग्न्यावा० ॥ ओम अश्रि दूल॑ इजीमहे हो 
विश्ववेद्सम्‌ ॥ अस्य यज्ञस्थ सुक्रतुम ॥ ५ ॥ यमाय सोम॑ वेवस्वतो यमोइउलुष्ठप ॥ दक्षिणे 
यमावा० ॥ ओम यमाय सोम सुठुत यमाय जुहुता हविः ॥ यम ह यज्ञो गच्छत्यप्रिदूतो अरे 
कृतः ॥ ६॥ मोषणों घोरः काण्वों निक्रुतिमोयत्री/निक्रेत्या निक्रत्यावा०॥ ओम सोषणः परापरा 
निऋतिदुहेणावधीत ॥ पदीड़ तष्णया सह ॥७॥ तत्वायामि शुनःशेपो वरुणश्चिष्ठप्‌ ॥ पदश्चिमे 
वरूणावा० ॥ ३*तस्वा यामि बहाणा वन्दमानस्तदाशास्ते यजमानों हविभिः ॥ अहेव्यमानों 
वरुणेह बोध्युरुशंस मा न आयुः प्रमोषी३ ॥ ८ ॥ वायो झार्त वामदेवों वायुरलुछ॒प्‌ । वायव्याँ 
वाय्वाबाहने विनि० ॥ वायो शत हरीणां सवस्व पोष्याणाम्‌ । उत वा ते सहझ्िणोरथ आयात 
पाजसा ॥ ९॥ वायुसोमयोम॑ध्ये अष्टो वसव:॥ ज्मया अन्र मेत्रावरुणों बसवस्थिष्टप वायुसोम 
यांमध्ये वस्थावाहने वि० ॥ ज्मया अत्र वसवो रन्त देवा उरावन्तरिक्षे मर्जयन्त शुश्रा३॥ 











श्रीत्रद्माजीकी तरह और भी सब देववाओंका आवाइन 


कप्स उत्तर, इशान कोण, 


उत्तरमें सोमके आवाहनम इपत मंत्रका विनियोग किया है 


जो अनेक कामनाओंका देनेवाला भाव है वो सब ओरस 
प्राप्त हो, हमें अन्नके साथ संगम करानेके डछिये यहां प्रति 


हो पर यहां इसका अर्थ चन्द्रमाके पक्षम होना चाहिये 
जिसके कि उत्तर स्थापनमें इसका प्रयोग किया जा रहा 


हैँ । इसके बाद वही पूवकी विधि होती है कि हे सोम यहां | 
आओ) यहां बैठो, पूजा ग्रहण करो, हमारे सामने होवो | 
ओर प्रसन्न हो वर दो | यही बात हर एक देवताके विष- | 


यमें समझनी चाहिय ।॥| “ अमित्वा ” इत्यादि जो मंत्र हे; 


वाले देव तुम वरॉके इशानको तुम्हारा भाग देते हो, आप 


हमारी सदा रक्षा करे।। “४ इन्द्रेवो” इस मंत्रके मधुच्छन्दा' 
ऋषि है, इन्द्र देवता है; गायत्री छन्द्‌ हैं, पूवर्म इन्द्रके | 


आवाहनमें इनका विनियोग होता हे (४७) हमारे हिंये 


वो हमारे लिये केवछ हों। “अश्निंदुत'' इस संत्रका काण्व 
५ 


| देवता हैं, 
इन्द्र ही सब जनोंसे बडा है, हम इन्द्रको ही बुढाते हैं, | 





| मधातिथि ऋषि है, अप्नि देवता हे, गायत्री छन्‍्द है, अप्नि 
करना चाहिये, इसके पीछे आठों छोकपालोंको शाल्योक्त | 
पूरव, वहि कोण; दक्षिण, | 
नेऋत्यकोण, पश्चिम, वायव्य कोग: इन आठों दिशाओंमें | 


स्थापित कर देना चाहिय “आप्यायरव” इस मंत्रका | इस यज्ञके अच्छे करनवाड है, उन्हें हम वरण करते हैं।। 


राहुगण गौतम ऋषि है, सोम देवता है, गायत्री छन्द्‌ हैं, | “यमाय सोसम्‌ ”! इस मंत्रका वैवस्वत यम देवता हैं, तथा 


| वही ऋषि भी है, अनुष्टुप्‌ छल्द है, दक्षिण दिशामें यमके 
(२) मंत्राथ-हे सोम | हमें बढाओ आप भी बढो, आपका | 


कोणर अग्निके आवाहन करनेमें इसका विनियोग करते हैं, 
( ५) सबको जाननंगाले अथवा अखिल धनवाले देवदूल 
तथा सब देवताओंके बुलानेंवाले अप्नि देवको जो कि हमारे 


आवाहनस इस्तका विनियोग होता है ( ६) यमके लिये 


| सोमका हवन करो, यमके छिये हविका हवन करो, क्‍यों 
| कि परिद्प्त अग्नि, अलंकृत होकर उन्हें बुलाने चछ दिया 
छ्वित हो जाओ ! चाहें कहीं इसका कुछ अथ किया गया | 


है॥ “' मोबुणो ” इस संत्रका घोरका पुत्र काण्व ऋषि है, 


| निऋति देवता है, गायत्री छन्‍्द है, नेऋत्यकोणमें निकऋ- 


तिक आवाहनमें इसका विनियोग होता हे ॥ ( ७) दुह्ेणा 
निऋति अपने तृष्णाक॑ साथ हमसे सदा दूर रहे, हमें 
कभी न मारे, यहां अपनी जगह बेठ जाय ॥ “तत्त्वायाप्मि” 
इस संत्रका शुनशिप ऋषि है, वरुण देवता हे त्रिष्डुपू छन्‍्द 


| है पश्चिममें वरुणके आवाहनम इसका विनियोग होता 
इसका अजीगतका छडका शुनःशप ऋषि हैं, इशान देवता | 


हैं, गायत्री छन्द्‌ है, इंशान कोणमें ईशके आवाहनमें इसका | 
विनियोग होता है (३ ) हे सबके सविता-उत्पादन करने- | 


है (८ ) यजम्तान हवि आदि पूजनके द्वारा आपसे ही सब 
अशाएं किया करते हैं, में भी आपको यहां आवाहन 
करनेक लिये तथा अपनी रक्षाके लिये प्राप्त हुआ हैँ, हे 
वरुण देव , आप श्ञान्त चित्तसे मरी प्रार्थनाएँ झुनिये॥ 
मेरी आयुको नष्ट मत्र कीजिये यानी मेरी आयुको बढाइये ॥ 
“ ओमू वायो शतम्‌ ” इस मंत्रक[ वाम्देव ऋषि है वायु 
नुष्टुपू छन्द हैं; वायव्यर्मं वायुके आवाहनमे 
इसका विनियोग होता है (९) में आपको यहां पूजना- 


| दिके छिय बुला रहा हूँ, है वायो | आप अपने पछे पता 





ब्रतराज$ । | ध्षामान्य- 














धका 22552 क72/7%१ है 2६ कक प्ररीलत 4: 0) कक रत 700 ७ ८2% 7: ५4: 
487/78578%ए:८72777 6:75 22/#%/:/% 77776 8 एक: ६ 


अवोक्पथ उशूजयः कृणुध्व श्रोता दूतस्यष जग्जुषो नो अध्य ॥१०॥ आरद्ासः 
दश रुद्रा जगती ॥ सोमे शानयोम ध्ये पकादुर उदय ॥ ओम आरुद्रास 
हिए्ण्प्थः खुविताय गन्तनाइये वो अस्मत्नति हथते मतिस्तृष्ण बच 
त्यां ठ मत्स्य! सामदो दादशादित्या गायत्री ॥ गोमध्ये दर (दशा दित्यावा०॥ ओम त्षां 
न क्षत्रियों अब आदित्यान्याविषामहे ॥ सुधुब्यीकोँ अभिष्ठये ॥ १२ ॥ 


०५) 


। 
गोतमो5खिनावुण्णिक्‌ | इन्ड्राग्ग्योमध्ये अश्वयावा[० ।। ओम 2 खिनावारतिर स्मद 





22:22 222 शा 8 8 32200 50200 260 72/05/6770: (24000, "०५ 
3- #>ककर पाम्पभाकाक... कक हू सजा... मा उसआआ भरमणमाभावताभीमानाका ७०३ /०५००ककाक८क, लि दशा 


20008 20 0/4270 0 80 23000, 02002, 62% 000 2॥2/0 70600 80 2 
७७७७७ ७७७७॥एएरथांजाआआाणणणणाणणानशााााााभ 





च्छ् 


श्यावाश्व॒ एक 











ब॒त्‌ ॥ अवार्श्थ समवस्ता नियच्छतम्‌ ॥ १३ ॥ ओमासो मधुच्छः्दा विशेदेया गायत्री ॥ अग्न 


यमयोमेध्ये विवेदुवावा० ॥ ओम ओमासश्रैणीषृतो विश्वेदेवास आगल ॥ दाइवांसो दाशुप 


इन्द्रवन्त सजोषसो क्‍ 
जैन दिव डत्सा उदन्यवे॥! 


अश्विनावार्ति राहूगणो 
मदख्ाहिरष्य 


सुतम्‌ ॥१४॥ अने त्य देव गोतमों बामदेवः सप्तयक्षा अष्ठी। यमनिक्रेत्योर्मध्ये सत्तयक्षाबाण। . 


ओम अछि त्ये देव सवितारभोण्योः कविक्रतुमचामे सत्यसव रत्नधोमन्नि जिये मारते कविम| 
उध्वां यस्थामातिभों अदिद्ुतत्लविमनि हिरण्यपाणिरमिमीत सुक्रतुः कृपास्वः ॥ १५॥ 


आयंगोः सापराज्ञी सपी गायत्री ॥ निर्दतिवरुणयोम॑ध्ये सपीवा० ॥ ओम आयंगौः पृश्चिरक्रमी । 


दुसद॒न्मातर पुरः ॥ पितरं च प्रयन्त्मः ॥ १६ ॥ अप्सरसामेतश ऋष्यश्वक्गो गन्धर्वाप्सा: 
सोःतुष्ट्यू ॥ वरुणवाय्वोमेध्ये गन्धर्वाप्शरलामाबा० ॥ ऊ अप्सरसा गन्धर्वाणां भुगाणां चरणे 
चरन्‌ ॥ केशी केतसर्थ विद्वाग्सखा स्वाइर्मदिन्तमः ॥२७॥ यदुऋंद ओचथ्यो दीवेतमा स्कन्‍द 








हजार घोडोंको रथमें जोडदो, आपको लिये हुएः अनंकों | हे. एक मनवार देखने योग्य अश्वितरी कुमारों ! 
घोडोंका जुता जुताया रथ वेगके साथ यहां आजाय ! वायु | सोनेके झिलमिछाट करनेवाछे रथको सामने छे आभो ॥ 
और सोम दोनोंके मध्यमें अष्टावसु स्थापित करने चाहिये।। | ओमास ” इस संत्रके मधुच्छन्दा ऋषि हैं, अग्नि और 
ब्सया अन्न” इस मंत्रके मेत्रावरुण षि हैं, ऋत्िष्टुपू | अ्के बीचमें विश्वेदवाओंके आबाहनर्थ इसका जिनियोग 
उन्द है, वसुदेवता हैं, वायु और सोमके बीचर्से वघुओंके | होता है (१४ ) हे विश्वे दवाओ ' तुप सबके रक्षक हो 
आवाहनमें इसका विनियोग होता है ( १० ) यह आपके | मल॒ष्योंके धारण करनेवाले हो आप यजमानों क्र पुत्र दिया 
विराजनेकी जगह है। हे भूमिपर विचस्नेत्राले बसु देवो ! | े 
यहाँ स्मण करो। है उंद्रो : इस विस्तृत अन्तरिक्षमें आप | सोपको पीनेके छिये यहां आओ और अपने स्थानपरविरा- 
बिचरते हो । मर भर देततग बुछावा, सुन लिया | जमान होजाओ ॥| ' ओमू अधित्ये देवे ” का गौतस वाम' 
खाबाश्व॒ ऋषि है, ग्यारह रुद्र देवता हैं, जगती छन्द है, |. "मे साव यक्षोके आवाहनमें इसका विनियोग 
सोम और ईशानके बीचमें एकादश रुद्रॉंके आवाइनसे होता है ( १५ ) से उस सामनेवाले पूयका पूजन करता 
इसका विनियोग होता है ( ११ ) इन्द्रवाढे परस्पर प्रेत ्क 
रखनेवाल, सोनेक रथवाढे ग्यारहों रुद्र इस मेरे यज्ञप | भीतर प्रकाश शील हैं वो भेरे मनोरथोंका पूरा कर॥ “आये 
आजाओ, यह भेरी स्तुति आपको चाहती है, जैसे कि, | गो ” इस संत्रकी सापराज्ञी ऋषिका है, सर्व देवता हैं। 
पानी चाहनेवाढे, गौतमके छिय आपसे मेघ भेजे थे उसी | 





35833 गे । कि 2 इस क्‍ लि होता है (१६) जो कि अपनी शीघ्र 
है १२) सुख देनेबारे हा इतका विभियोग होता रप चलजाते है एसे अ 

६ (१२) मुख आल पतनस रक्षा करनेवाके जो आदिस्य | अपने 

दल व अको चाचता हूं कि वो मे रक्षा करें त्रथा | 
यह. कसर गत सुनते, सरी सनोकाननाको पूरा | 
अ “अनोजात ! इस संन्नके राहुगण गौतम ऋषि 


दे । अश्विदी इबताहें 5 क ऋट्छ ेे | 
नम उनके पी उन्दू हूँ, इन्द्र और अप्निके 
. 7+न इसका विनियोग होता हे (१३) 


| योग होता है । ( १७ ) अप्सरा ओर गंधर्वोंके विचरनेके 


हक 
स्थान ७ ६ सि ६28 हो. ब्श्ाछ क सनषकन लत ०... 


| रत हो सकलप करके देनेवाले यजमानक्के सबन किये हुए. 


| 4 । इसमे कान्त दृ्शित्व आदि अनेक गुण हैं, जिसकी कि. 
मे छ्ु 22 3 प्र ९ ५ मी दूं: हैः 
| प्री छन्‍्द ह।निऋति और बरुणके बी चमे सर्प देवताक 


का अनेक तरह सप देव मेरे साममें । 
|. आानपर पूजाके छिये विशजमान होजाओ।॥ “अप्स- 


| कप एम ” इस मंत्रके ऋष्यश्ज्ञ ऋषि हूँ, गंध 
। है हे को. द्वंता हअलुष्ठु प्‌ छन्द्‌ है,वरुण और वायुके 
| थोग ह. ओर जप्सराओंक आवाहनमें इसका विनि, 


20254 अप पिकन क कम ध>483202 200:572/: 24:42 220 22000. 202 02% 30022: 50% 232: 2 ४ का 770 कक 7७ 8:२००००7०४:: ०,८20 277 27 2%(४०72:7 04/72/2725 70022:0 003 77427: क2277000, 2 077782/ 72777: 630 2:0फ:%0077 7:23 3 02:07 02026: 





छ्िष्टप॥बहासोम य स्कम्दाबा०। कलह यदऋः्दः प्रथम जायमान उद्यचुसहझद्रादुत वा पुरी- 
षात ॥ इयेनस्यथ पक्षा हरिणस्थ बाहू-उपस्तुत्यं महि जाते ते अबन हे १८ ॥ तज्रंब ऋषभ्म । 
ऋषल मां वेराजों नन्दीखरोपुफ़प्‌ ॥ उहासोमणय अध्ये नन्‍्दीशराबाण/ओब कषम भा समानानां 
_ सपत्नानाँ विषासहिम्‌ ॥ हन्तार शत्रूणं कृापे दिरज गोपलिं गवामू॥२०शकडुद्ाय घोरः क्ाण्वः 
शूलो गायत्री ॥ तत्रेव शूलाबाण'ौआओम कटु॒द्राय घचेतले मीब्हुष्टमाय नव्यसे ॥ बोचेम शंतमं 
हे ॥९०॥ कुमार कुमारों महाकालखिटष्टप्‌ ॥ तत्रेव महाकालाबा०्पेओम्‌ कुमार माता शुवतिः 
समुब्ध॑ गृहा बिनति न ददाति पित्रे ॥ अनीकमस्य नमिनलनासः पुरः पश्यान्त निहितम- 
रतों ॥ २१॥ अद्तिलोक्यो दृहस्पतिदक्षोग्लुष्टपए ॥ बल्लेशानयोन॑ध्ये दशादिसत्तरणाला० ॥ 
आदितिहाॉजानिष्ट दक्ष या हृहिता तब॥ ताह्देवा अन्वजायन्त नद्रा अक्यृुतबन्धबेश हे २२ ॥ 
तामग्रिवर्णा सौभारिहेर्गां जिष्ट प्‌ ।बह्चेन्द्रयोर्म ध्ये दुगो .॥ओस्‌ तामप्रिवणों तपला ज्वलस्तीं वेरो- 
चनीं करमफलेष जझ्ुष्ठाम ॥ ढुगा देवीं शरणमह म्पदे! सुतरासितरसे नमः ॥ २३॥ इद विष्णु 
काण्वो मेघातिथिविष्णुगायत्री ॥ बहोन्द्रयोम॑व्ये विष्ण्वादा० ॥ ओम इब विष्णुविचक्रमे त्रेधा 
निदधे पदम्‌ ॥ समूब्हमस्य पांसुरे ॥ २० ॥ उदीरतां शेखः स्वधा तिष्टप्‌ ! बह्ाग्न्योमेध्ये 








स्चावा० ॥ ओम उदीरतामबर उत्परास उस्मध्यमाः पितरः सोम्यासः 





शेसोंका आस्वाद करलेनेवाला हे, अत्यंत तृप्त हे वो अप 
रायें और गन्धर्वोको यहां लाकर विठादें “ओम यद्ऋन्‍्द?! 





॥ उस थे इंयुर 


जन सामने देखते है ॥। ' आदिति' इस मन्त्रका छोक्य 
बहस्पति ऋ"षि 


दक्ष देवता है,अनुष्टुपू छन्द हैं,त्रह्मा ओर 


इस मन्त्रका औदश्य दीघंतमा ऋषि है, स्कन्द देवता तथा | शिवके बीचमे दक्षादि सप्त॒ गणोंके आवाहनमे.. इसको 


'त्रिष्टुपू छंद हे, ब्रह्मा और सोमके बीचसे स्कन्दके आवा- 
हसम इसका विनियोग होता है ( १८) है अत्यन्त बेग 
वान स्कन्द | आपके जन्‍्मकी सबको प्रशशा करनी 
चाहिये । सबकामोंक पूरक शिवजी मह।राजसे पेदा होते 
ही तारककों छछकारते हुए चनघोर गजना की थी | युद्धके 
समय जो तेजी वाजके पंखोंमें होती है दो आपके हाथोंमें 
है। जसे हिरण चॉकडी साग्ता हे ऐसे ही आप बेरीपर 
झपटते थे ।| “ऋषभेजा” इस मन्त्रका वेराज ऋबभ ऋषि 
है, नंदीश्वर देवता है, अनुप्टुपू छन्‍्द है, ब्रह्मा और सोम 
के बीचमें नन्दीश्वरकें आवाहनमें इसका विनियोग होता! 
है ( १९) हे नन्दीश्वर | जसे आप हैं उसी तरह मुझे भी 
यहां आकर बराबरवाछोॉमें सबसे श्रेष्ठ ब्रथा बेरियोका 
असझह्य तथा मुझे मारनेकी चेष्ट। करनेवाढॉका मारनेवाढा 
एवं. गझओंका बड़ा गोस्वा मी बनादें | ''कड्द्राय'” इस 
मन्त्रका घोर काण्व ऋषि है, ( ये शकुन्तछाके पोषक- 
पितासे भिन्न हैं) शूछ देवता है, गायत्री छन्द हें, वहां 
शूलके आवाहनम इसका विनियोग होता हैं (१० ) सबके 
जाननेवाले; दष्ठोंकी भगानवारू, भक्तोकोीं सींचनंवाले 
पापके नाश करनंवाके अत्यन्त सुखरूप शिवके छि 
इयसे अनक बार कहते है कि यहां आइय ॥ “कुमारम्‌ ' 
इस मंत्रका आज्रेय कुमार ऋषि हैं. सहाकाछ देवता हूं 
आ्रिष्टप्‌ छंद है | वहाँ ही महाकाछफके आवाहनसे इसका! 
विनियोग होता।हैं (२१ ) युवती माता भल्ठी भांति छिपा 
कर रख हुए जिस कुमारको गुहासें धारण करती हू 
पिताक लिये नहीं देती जिसकी युद्धमें बढी हुईं सेनाको 


विनियोग- होता हे (२२ ) हे दक्ष | भापकी दुहिता जो 
अदिति उत्पन्न हुई थी उसको सम्वन्धस ही अम्नत पीने- 
वाल भद्रदेव आदित्य उत्पन्न हुए थे अथवा हे दक्ष - 

आपकी छड़की अदितिने जो आदित्य पेंदा किये उन्होींके 
पीछे अमृत पीनवाछ सब देव पंदा हुए हैं ॥ “तामम्ि- 

वर्णाम्‌” इसका सोभरि ऋषि है, € यह गोत्रकार अगि- 
राकी परंपरामें हे, आदिस्रने इनके वशोपवंशको भी 
बुलाया था; इनका ऋग्वेदर्म इतिहास हैं, ये एक विशिष्ट 
गौडवशके प्रधान हैं, ) इस मंत्रकी ढुर्गा देवता है; त्रिष्टुप्‌ 
छन्द है; ऋह्मा और इन्द्रक बीचमें दुर्गके आवाहनसे इसका 
विनियोग होता है ( २३ ) कर्म पछोंके निश्चित्त पूजीजाने 
वाली अग्िके वणकी तश्श तपसे देदीप्यसान हुई बेरोचनी 
दुर्गा देवीके शरणको में प्राप्त हुआ हूँ, अच्छे वेगवाल्ी 
देवि ! तेरे बेगके छिय नमस्कार है; आप हमें अच्छीतरह 
पार लगा दे ॥ “इद विष्णु” इस मन्त्रका काण्व मेधातिथि 
ऋषि है, विष्णु देवता है, गायत्री छन्द्‌ है; ब्रह्मा और 
इन्द्रके बीचमे विप्णु भगवानके आवाहनमें इसका विनि 

योग होता है ( २४ ) इन श्री विष्णु भगवान्‌ महाराजने 
वासनावतार छूकर बिक दान छनके लिए तीन डैंग भरे 
थे, तीसरा डैंग घूरि घूषित वल्िक शिरपर रखा था, ऐसे 
ये बिष्णु भगवान हैं। “उदीरताम! इस मन्त्रका शांख ऋषि 


है। स्वधा देवता है त्रिष्टुप्‌ छन्द हैं पितृओंके आवाहनमें 


इसका विनियोग होता है (२०) इस लोकमें परलोकम्त 
ओएर मध्य छोकमें जो पिन्रेश्वर स्थित स्वधा तथा सोम 
संपादक हैं वे ऊँचेके छोकोंमेँं चछ जाय । जो, 
निःसपत्न सध्यके जाननेवाले हैं, जिन्होंने असुको प्राप्त 


(२८ ) 


ब्रतराजः । सामान्य- 


५; असम रकम ा€ १कठ कप 6३४ हट टिएआए कं अ कर 2:27 टेट 7क्‍:677:04/ 27677 
(४८ 


वुका ऋतत्ञास्तें नोःवन्ठ॒ पितरों हवेइ ॥२५॥ पई मृत्योः सकुंखकों मृत्युरोगास्त्रिष्दुप्‌ । 
बरह्ययमयोग॑ ध्ये मृत्युरोगाव[० ॥, पर ६९ अहछु परेहि पथाँ यस्‍्ते स्व इतरो देवयानाद्‌॥ 
चक्षुप्मते धष्वते ते बवीमि मा नः प्रजा रीरिषों मोत वीरानू ॥ २६॥ गणानों त्वा शोनको 
गत्समदो गणपतिजंगती ॥ बहानिकत्योमेध्ये गणपत्यावाणाओम गणानां त्वा गणपातिं हवा- 
महे कविं कवीनामुपमश्रवस्तमम्‌ ॥ ज्येष्टराज बह्मणां ब्रह्मणस्पत आनः #ण्वन्नातिमिः सीद 
सादनम्‌ ॥२७॥ शत्नोदेवीराम्बरीषः सिन्धुद्वीप आपो गायत्री ॥ ब्रह्मवरुणयोम॑ध्ये अबावा० ॥ 
ऊ हां नो देवीरभिष्टय आपो भवन्‍्तु पीतये। श॑ योरभिल्लवन्तु न: ॥२८॥ मरुतों यस्य राहगणो 
गोतमो मरूतो गायत्री ॥ बहायवाय्वोर्मध्ये महदावा० ॥ ७ मझतो यस्य हि क्षये पाथा दिवो 
'वेमहसः।स सुगोपातमोजनः ॥ २९ ॥ स्थोनाप्राथेवी काण्वों मेधातिथिभूमिगांयत्री ॥ ब्ह्मण' 
पादमूले कर्णिकाघः परथिव्यावां० ॥ ऊँ स्पोना एथिवि भवानृक्षरा निविशनी ॥ यच्छा नः शर्म 
सम्रथ॥३१०॥३म मे गड्ढे सिंघक्षितेयमेघों गंगादिनद्यों जगती॥तत्रेव गंगादिनग्यावा० ॥ ओम मं 
मे गड्ढे यमने सरस्वाति शुठ॒द्वि स्‍्तोम॑ सचता परुष्ण्या॥ आसिकत्या मरूटब॒धे वितस्तयाजीकीो , 
श्रण हवा सुषोमया ॥३१॥ धाम्नों गोतमों वामदेवः सप्त सागरा अष्टी ॥ तत्रेव सप्तसागरावा० ॥ 
> धाम्नो धाम्नो राजब्रितों वरुण नो सुथ्वायदापो अध्य्या इते वरुणेति शपामहे ततो वरुण 
नो मुझ्या। मयि वापोमोषधीहिं सरितो विश्वव्यचाभूस्त्वेतो वरूणो मुझ्च ॥ ३२ ॥ तद॒परे मेरू 
नाममंत्रेण पूजपेत ॥ मरवे नमः | मेरमावा० ॥ ततो मण्डलाइहिः सोमादिसात्रियों तत्क्रमेणा- 


कर लिया है; वे हवॉमे मेरी रक्षा करें। अथवा उत्तम 
मध्यम और अधम जितने भी पिन्रेश्वर हैं, वे सब हमारी 
ह॒विको ग्रहण कर हमसे अनुकूछ रहें। जो £सत्यक जान- 
नेवाले हैं वो हमारे प्राणोंके रक्षक हों ॥ “पर॑ मृत्यो” इस 
मन्त्रका संकुसुक ऋषि है, मृत्यु और रोग देवता हैं । बहा 
और यमके बीचमें स॒त्यु और रोग बिठानेम इसका विनि- 
योग होता है। (२६ ) हे मृत्यु और रोगो ! आपका जो 
रास्ता देवयान पथस भिन्न पितृयान है, उसपर आप जायें 
कान ओर जांखोंवाले आपके छिए में कह रहा हूँ, आप 
मेरी प्रजाको और वीरोंको मारने की इच्छा मत करना ॥ 
धणानान्त्वा” इस मन्त्रके गृत्समद शौनक ऋषि हैं, गण, 
पति देवता हैं, जगती छन्द हैं, ब्रह्म और निऋ तिंके 
बीचसें गणपतिके आवाहनमें इसका विनियोग है ( २७ ) 
अपने गणोंके पति तथा कवियोंके कवि एवम्‌ जिसका यश 
मात्रही सबकी उपमा हो सऋता है| वे जो राजनवाडोंमें 
सब अ्रष्ठ तथा प्रशंसनीयोंकों भी प्रशसनीय हैं। उन्हें में 
यहां बुलाता हूँ, हे ब्रह्मणस्पते हमारी प्रार्थनाको सुनते हुए 
एक्षाक साथ इस अपने बेठनेकी जगह आ बैठिय॥ 
| झन्नो देवी” इस मन्त्रके अस्बरीषके पुत्र सिन्धुद्दीप ऋषि 
६, आपो देवता हैं, गायत्री उन्द्‌ है, ब्रह्मा और वरुणकं 
बौचसें आप देवताके आवाहनमें इसका विनियोग होता 
है ६ २८) देवी आप हमारे यज्ञ, अभिषेक और पीजेके 
उखकारी हों तथा हमारे हुए रोगोंको श्ान्त करने 

ओर होनेवाडोंको दूर करनेके लिय वहें ॥ “मरुतो यत्य ! 
“ज मत्रको राहुगण गौलस ऋषि है, परुत देवता हैं, गायत्री 
४न्द्‌ है, तह्य और वायुके बीचसे 


सरुतोंके आवाहनमें 
इसका विनियोग होता है । (२९) हे द्वके अस्त तेज- 


सस्‍्वी मरुत दृबताओ ! जिस यज्ञमानके घरमें आप सोम 
पीते हैं अथवा अन्यवस्तु पान करते हैं, वो. जन आपसे 
अत्यन्त रक्षित होता है ॥ “स्योना प्रथिवी” इस मंत्रका 
काण्व मेघातिथि ऋषि हे, भूमि देवता है, गायज्री छेद है; 
अह्यके पादमूछमें कर्णिकाके दीचे प्रथ्वीदेवीके आवाहन 
में इसका विनियोंग होता हे (३०) है भूमि! आप - 
हमारे छिये कंटक कांकडियोंस हीन सुविस्तृत निवेश 
देनेवाली सुखरूप हो जाओ और खूब आनन्ददायी हो ॥ 
“इसे में गंगे यमुने” इस संत्रका प्रियमेघाका पुत्र सिन्धु- 
क्षित्‌ ऋषि है, गंगादि नदी देवता हैं। जगती छन्‍्द है 
वहांही गंगादि नदियोंके आवाहनमें इसका विनियो॥ 
होता है । ( ३१ ) हे बायुके वेगस बढनेवाली ! गेगे यमुने| 
सरस्वति भरे रतोत्रका भलीभांति सेवन करो, तथा है 
वायुस तरंगित होनेबाली विपाट्‌ ! आपभी इरावती वित" 
सता ओर सिन्धुनद्क साथ सामने होकर सुने॥। “धाम्नो- 
धान्न” इस मंत्रका गोतम वासदेव ऋषि है, सप्त सागर 
देवता हैं, अष्टी छंद है, तहांही सातों समुद्रोंक आवाहनमें 
इखका विनियोग होता है।। ( ३२) है राजन बरुण | जो 
जो आपकी भयकी जगह हों उन सबसे हमें छुटादो, जैसे 
गो हिंसाके योग्य नहीं है उसी तरह वश पड़ते दूसरॉकी 
भी हत्या न करनी चाहिये पर हमने की है । हे वरुण | 
उस पापसे भी हमें छुटा दीजिये, आपकी औषधि और 
पानी भौ हसें कोई नुकसान न पहुँचाबे तथा व्याप रू भूके 
भी विन्नोंस मुझ वचाछों॥ इसके पीछे भेरुका मेरुके 
नाम सन्‍्त्रसे पूजन करना चाहिये, ( ओमू- 
मेरवे नमः 2 मेरुके किये नमस्कार है । मेंहका 


परिभाषा, ] 


| कप: /5 77%, 0-20 कक 777८5) ;6 8840४ ४24 


भाषाटीकासमेतः । (२९ ) 








02744 27 ८ एड? परी! की: 78007 2४/८5/0773 


2502:50:032.4%:% 22 कु 7० 2५ ०85- 04:79 ::26४/क6:07:0 5:2९ कटालनआ कक 2278,8 7 5 भ ७ 2820:0५७५/५८आ ४१३१ /४२०९, 
पर " च+नवधवदाक+००-० तप डम८काबबाड वक्त. 


३ ७ 


युधान्यावाहयेत)/सोमसमीपे पाशम्‌॥ इशानसमीपे त्रिश्वुलम ॥इन्द्रसमीपे वज्चधम 
शक्तिम्‌ ॥ यमसमीपे दण्डम।निक्रातिसमीपे खड़म्‌ ॥ वरूणसमीपे पाशम्‌ ॥ वायुसमीपे अडकु 
शम्‌ ॥८॥ तद्ाह्ये उत्तर गोतमाय नमः गोौतममा०। एवमेशान्याँ भरद्ाजमा पूर्व विश्वामित्रम)। 
आम्नेय्यां कश्यपम्‌ ॥ दक्षिणे जमदगम़िम्‌ ॥ नेकंत्यां वसिष्ठम्‌ ॥ पश्चिम अविम्‌ ॥ वायव्यामरू- 
न्धतीम॥तद्वाह् पूर्वांदिक्रमेण ऐर्द्री०कोमार्री०बाह्ी० वाराहीं० चासुण्डां०बेष्णबीं० माहेश्वरीं० 
बनायकीमावाहयामि इत्यष्टो शक्तीः प्रतिष्ठाप्य प्रत्येक॑ सह वा पूजयेत्‌॥ इति मण्डलदेवताश॥ 
ह अथ छक्षपूजनोद्यापनविधिरुच्यते ॥ 

अद्य पूर्वोचरितेवंगुणावेशेषणावाशेष्टायां पुण्यातिथों मया कृतस्यापमुकदवताभीत्यर्थमस॒क- 
लक्षपूजनकर्म णःसाडतासिद्धचथ तह॒द्यापनं करिष्ये॥तदंगत्वेन पश्चवाक्येंः पुग्याहवाचनमाचा- 
यांदिवरंण च करिष्ये॥ ततबादों निविश्नतासिद्धयंथ गणपतिपूजन करिष्येशषततो गणपति संपूज्य 
पुण्याहं वाचयेत्‌ ॥ तदित्थमू--अस्य लक्षपूजनोद्यापनकर्मणः पुण्याह भवन्तो अबन्त्वित्युक्ते 
अस्त पृण्याहमिति विप्रा वदेशुः । एवं स्वस्ति भवन्तों हुवन्त।आयुष्मते स्वस्ति।ऋद्धि भवन्तों 
बुबन्तु ॥ कम ऋष्यताम्‌ ॥ श्रीरस्त्विति भवन्तो झुवन्तुअध्तु श्री.॥ कंल्याणं मवन्‍्तों बवन्तु॥ 
अस्त कल्यणम्‌॥ कमांड्रदेवता भीयताम्‌ ॥ सतो गोचनामोच्चारणपूर्वकमसुकमगोत्रोईमुक- 
शर्माह यजमानोउसुकगोत्रममुकशर्माणं स्वशाखाध्यायिन॑ व्राह्मणरश्मिलक्षरजनोद्यापनाख्ये 
कमण्याचार्य त्वां बुणे ॥ आचारयत्वेन बुतोस्मि । यथाज्ञानं कर्म करिष्यामि ॥ आचार्यस्त 
यथा स्वर्ग शक्रादीनां बृहस्पतिः ॥ तथा त्व॑ मम च्ञेस्मिन्नाचायों भव सुब्रत ॥ इति 
संप्राथ्य गन्धादिना आचार्यपूजनं कुर्यात्‌ ॥ तथैव बच्माणं वृणयात। यथा च तझखो बह्या स्वगें- 


आवाहन करता हूं। इसके पीछे संडलस बाहिए सोमादिके | ताका मतलब है कि,जो देवता हो उसका नाम लेना चाहिये 
पास उनके आयुधोंकी स्थापना ऋमसे करनाचाहिये।सोमके | इसी तरह और भी समझता) इसके पीछे गणपतिका पूजन 
पास पाश,शिवके पास त्रिशूछ/इंद्रके पास वज्ञ,अग्निक्े पा । | करके पुण्याह वाचन कराना चाहिये, वो उम्याहवा तन 
शक्ति, यम पास दण्ड, निरतिके समीप तछवार, वरुणके लि कक ५४ वन ००३० + के फोलआ 
कि के ग आ 3० नके उद्यापन । 

पास पाश, बायुके समीप अकुश स्थापित करना चाहिये को कम ब्राह्मगोंको कहना चाहिये कि पुण्याह हो । 
इसक पीछे इनक बाहिर ऋषियोंको स्थापित करना चाहिये | यज्ञमान-आप कहें कि, ऋद्धि हो । पीछे आह्मण-"कम्से 
जैसे कि,देवताओंको स्थापित किया करते है| उत्तरमें गौतम: | ऋद्धिको प्राप्त हो।यजमान-ओऔ हो ऐसा आप कहैं,आराह्मण- 
इशानमें भरद्वाज, पूव्मे विश्वासित्र, अभिकोणमें कश्यप, | थ्री हो | यजमान-कल्याण हो ऐसा आप कहैँ, ब्राह्मण- 
दक्षिणमे जमदप्रि, नेऋत्यम वसिष्ठ, पश्चिममें अत्रि ओर हो कल्याण । , संस्कृतमें जो वाक्य जिस बोछने कहे है वे 
वायव्यकोणमें अरुन्धतीको स्थापित करना चाहिये। इसके | उस संस्कृतमें ही बोलने चाहिये । ) कर्मके अगभूत देवता 
बाहिर इसी क्रमसे ऐन्द्री,कौमारी,आाह्मी,वाराही, चामुण्डा, | रसन्न हो जाओ ॥ 

वैष्णवी, माहेश्वरी और वेनायकी इन आठों ४ कर आचाय्य वरण-यजमान आचाय वरण करती वार 
देवताओंकी तरह आवाहन प्रतिष्ठा करके चाहें तो एक | #हता है कि, इस गोतन्रका इस नामका में, इस गोत्र 
एकका, चाहे सबका एक साथ पूजन करना चाहिये ॥ ओर इस नामके इस शाखाके इस त्राह्मगको, इस छक्ष 
अथ छक्ष पूजा ओर उद्यापनविधि-स्नानादिस निषृत्त | पूजनके उद्यापनमें आच!यके रूपमें वरण करता हूँ। वरण 
होकर हाथमें पानी लेकर संकल्प बोलना चाहिये कि,आज | होनक पीछे आचाय कहता है कि, में आचार्यक रूपसले 
ऐसी २ पुण्य लिथिसें इस महीनाके इस पच्से इस संवस्स- | वरण क्रियागया हूं, जेसा मुझे ज्ञान हैं उसके अनुसार 
रमें इस देवलाके प्रसन्न करनके लिय इस छक्ष"कप्तकी | कम कराऊंगा। पीछे यजमाव आचायेकी प्राथना करता हैं 
सांगता सिद्धिक लिय यानी यह रक्ष कम अंगोंसहित पूरा | कि, जैसे स्व इन्द्रादिकोंका आचाये बृहस्पति है, उसी 
हो जाय इसके छिये उसका उद्यापन करता हूँ एवम्‌ तरंग | तरह सुब्रत आप इस कमस मेरे आचाय होजाबो । पीछे 
होनेसे पुण्याहवाचन और आचाय्यवरण भी करता हूँ, ।| यजमान अपने आचायका पूजन किया करतेहैं। इसके बाद 
उसमें सबसे पहिले गणपलिपूजन करता हूं (इस इस की | अन्य बाह्मणोंका चरण करना चाहिये। हे ह्विजोत्तम ! जेंसे 
जगह करती बार जो तिथि हो कहना चाहिये तथा इस देव- | स्वगंमें 'चतुसुंख पिलामह ब्रह्मा होते-हैँ उसी तरह आप मेरे 





करे 











(३० ) बतराजः । [ सामाय- 
लोके पितामहः ॥ तथा त्व॑ मम यश्लेषस्मिन्‌ बह्मा भव द्विजोसतम ॥ इतिबद्यार्ण संप्रार्ध्य ॥ आण 


यागस्थ निष्प्तों भवश्तोध्थ्यथिता मया॥ सुभसत्नैश्व कं्तव्यं कमे दे ब्ि धिप्वकम ॥ इति सर्वाह 
त्विजः आरथयेद॥आचायः आचम्य प्राणानायम्य यजमानेन व्रतो5हमसु के कम करिप्ये॥ कर्म 
धिकाराथमात्मनः शुद्धचर्थ च॒ पुरुषसूक्तजप महं करिष्ये ॥ पृथिवीत्यस्य मंत्रश्य मेरुप्रष्ठ ऋषि | 
कर्मों देवता।खुतल छन्द॥ आसनोपवेशने विनियोग३॥ >पृथ्चि त्वया धृता लोक 7०॥ पुरुषसूतत 
जपान्ते--यदत्र संस्थितमिति मंत्रद्रयेन सर्वतः सपपान्विकिरेत्‌॥ततःशुची थो हव्यत्यापोहिष्ो 
आ्यूचेन साधितपंचगव्येन कुद्दीः प्रोक्षणं कायम्‌ ॥ ततः कृताश्रलिः स्वस्त्ययन ताह्ष्य्॑निी 
मंत्रद्यय॑ पठेत ॥ देवा आपान्त । अठ॒धाना अपयान्तु ॥ विष्णोदेवयजन रक्षस्वेति बदेत्‌ ॥ तह 
कलशपूजनं कृत्वा स्वंतोभद्रे लिड्तोभद़रे वा ्रह्मदीनावाहयेत्पूजयेज ॥ 








इस कमेमें जह्मा वन जावो । इसके बाद यजमानको | तन महे रणाय चक्षसे |? हूँ आप ! मुझ सुख देनेवार ! 
-अत्विजोंसे आर्थंता करनी चाहिये कि, पैसे इस, यागकी | ओ, तथा बडे भारी स्मणी: दृशनके निममित्त तथा भा 
सिद्धिके लिये आपका परण कियाहै,आप भी भाँति प्रसन्न | रसके अनुभव करनेके लिये मुझ धारण करो। “ओम | 
-दोकर इस कर के हल के 3 लि िवतगी रंस वर भाजयतैह नः उशतीरिव मात 
अच्छी वरह वर लिया है मे बह वा, तने | तमहारा जो सु ३ ला रस है यहाँ उसका रह 
अधिकारक लिये आत्मशुद्धवर्थ पुरुषसूक्तका जपभी करूंगा | 2 कराओ जैसे ५.3५ ५ फरनवाली वेटकी मां अप 
.पथ्वी” इस मंत्रका मेरुपष्ठकषि है, सुतरू छन्द है, कूमे | जंटोकों करती है। “ओम तस्मा भरंगमाम दो यस्य क्षया। 
” 


हर मा ः है। जन्वथ आपो जनयथा च नः॥ हे आप! तुम जिस पाएं 
वताहे, आसनपर बैठने । विनियोग होता है। न लीरल के कं हक जद 
तरल 2५... वेठेनेमें इसका विनियोग होता है नाझ करनेके लिय हमें प्रसन्न करते हो उस पापके नह क 


“पृथ्वित्वया धृता लोका देवि हे प्णुना धृता।हवं च धारय | है हे न के 
हि कि पविर 3 प्‌ का वि [आप नके लिये आपको हम अपने शिरपर रखते है। आप ह॑ 
लोकोंको धारण कर रखा है। है देवि ! आपको विष्णु भग- | उत्र पौत्रादि पा करनेमें समग्र बनादें।अथवा आपके एए 
९ ६+ज यु हे जिसमे हि कि भर 
वाबूने धारण किया है भे आओ ७... दम दप्त हो जायें जिसके निवासके लछिय आप प्रस्त 
लिया मा 05 30 धारण करें और ५ हैं, आप सका स्वासी हमें बनादें। इन मंत्रोंसे कुगा 
आसनकी अवैत्र करे। यजुरवेदकी इक तीसवां. न जन से पंचगव्यसे प्रोक्षण करना चाहिये | प्रोक्षण हींग 
ह, जकर सोलह मंत्रोंकों पुरुषसूक्त८ कहा है उसका | .. से प्रौक्षण कर ि 
जपकर लेनके पीछे हाथगें सफेद सरसों लेकर“ओम्‌ यदत्र | की कहते हैं। इसके पीछे हाथ जोडकर आओमू सस्त 
संस्थित भूत॑ स्थानमाश्रित्य सर्वर । की तत्स4 | ने वाह्यमरिए्टनेमिम, महंजुध व्यचस देवतानाम्‌ | आए... 
-2 रथ तत्रयाच्छतु ॥ ... भन्‍्दु भूतानि पिशाचाः सबेतो | समर्थ जो नाव है उसकी ता जिसके अत हि व पपोई 
द्शिम्‌ | सर्वेषामविरोधेन छक्षपूर्जा समारसे |" जिही सकता मी कक या 2 हक 
जो यहां दृष्टसत्त्व सदाही इस स्थानका लेकर | हैं, संग्राभमें हमारे वी कप पं 
३ के हैं. तहां ही चढ़े 3 लेकर | होता है, संग्राम हमार वीरोंको न नष्ट होने देनेवाले के 
22 हैंतें है वे सब जहांक ह वहां ही जाय । भूत और | ताओंके सबसे बडे, अग्रणी प्रमी यशस्वी इन्द्रका आश्रय हि 
पिश्ाच चारों ओर भाग जायें,में किसीफे बिना विरोधक | छेता है॥ “ओमू अहो मुच्च मां गिरसो संग च लाश 
हे 3९ ९ ५ , 
हज न ५ 5 वेय सनसा च वाक्ष्यमू, प्रयतपाणि: शरणे प्रपयये खत 
के अभिमत्रित करक चारों ओर बखेर देना चाहिये । सम्बाधे अभय नो कु |” है पापसे छुटानेबाले ! मर 
। 22५४:मह 5४५ #फ0: सपा मम पापोंस छुा ९, में वाणीसे अग्निकी स्वस्ति और मन 
हि वि मे ध्ष्य * | 
न्मोनः शुचयः पावका:[” हे मा बमिज बा पीक्यको स्वस्ति प्राप्त हो गया हू । में हाथ जोडकर आपकी 
पविश्नोंके पवित्र यज्ञको आप) हियि ही अ ५ | शरण ग्रप्त 37 हूँ | विवादके कार्य्यम हमारा कल्याण ही 
पा पक हक ..। रहा ह।क्योंकि | तथा किसी प्रकारका सय न प्रतीत हो। इन दोनोंको - 
४०४७.» परप्यको प्राप्ति होती है देखो,ये शुचिजन्मा तथा < 


र न्‍ बछतना चाहिये । दे जायें दो शहाएे. 
. शरचि सत्यदायक पविश्रताके उत्पादक आगये। इस | उ५ है | इवता आजायें और राक्षस छोग यहा 
मत्रस तथा "शेप 


आ हे ५ आय है विष्णु भगवन्‌देव यजन भूमिकी रक्षा करो। 
शक हि करता नली प लक _पो हि छा सयोखुवस्ता न ऊें 5ता । ऐसा ६ हरा पूजन करना चाहिये ॥ ढिंगतोमा | 
स्का बनाया पे ः के 
। हि शक आगाडीी पूरा भफण शयेगा बहों हम इसके अधैको तो स्व ता हिल, 
. चिडेंगे घोर कही नहीं, वहीँ सब जगह यही अथे सम्भना चाहिये। 












प्र 


परिभाषा, | 





ततो मूर्तावम्ग्युत्तारणम्‌ | 
प्रतिष्ठां च करिष्ये॥ अश्निः 


मअन्नप्निनारी बीरकुक्षि पुरण्चिम्‌ ॥१॥ 








बपरिहाराधमसः 
सतिमिति सूक्तमप्निपद्रहित सहित च पठन्परतिमायां जल पातयेव॥ 
सूक्त यथा--३ अग्नि: सते बाज भर ददात्यप्िर्ीरे श्र॒त्यं कमनिष्ठाम॥ अम्मी रोदसीई 

अग्ने रजसः समिदस्ठु भद्राइ्निनही रोदसी 


तो मू्तवग्ुतारणम्‌ ॥ अस्यां मू्तों अवधातादिदोवपरिदापवम जप 7५] [7 अस्यां मूर्तों अवधातादिद 


। (३१ ) 


20% ३३ ७४/६८ का ६2% ३५५७४ 4420 





न्युत्तार्॒ण देवतासात्रिध्याथ प्राण- 





व चरत्स- 
आविवेश॥ 








अग्निरेक चोद्यत्समत्प्वग्निजत्राणि दयते पृषणि॥र॥अग्विह त्थं जरतःकणेमावाग्निस्ो निरद 
हज्जरूथम्‌ ॥ अग्निरत्रि धम उसष्यद्न्तरग्नितमेध प्रजया सजत्सम] ३ अग्निदा द्रबिणं वीरपेशा 


अग्निऋषियः 
मुक्थेऋषयो 
परियाति गोनाम्‌ ॥५॥ अग्ति विश्य 


सहल्यासनोति॥ अग्निर्दिवि हृव्यमालततानाग्नेधांमानि बिधता पुरुचा।श॥। अग्नि- 
विहयन्तेईरिंन नरोयामनि बाधितालः ॥ आग्वि बयो अम्तरिक्षे पतमन्तो४गिहःसहस्ा 
इव्यते मालुषीरयां अनि मलबो नहुबे विज्ञाता॥ अग्निर्गा- 


न्जवा पथ्यामृतस्याग्नेगव्यूतिद्त आनिलता।दाअशनये अर नल दस्ततक्षरार्त महामवोचामा 
छुद॒क्तिम्‌॥ अग्ने प्रावजरितरं यविष्ठाग्ने महि द्राविगनायजल्द॥० (इत्यग्स्जुत्तारणम्‌॥प्राणप्रतिष्ठा॥ 
ततो देवे आणप्रतिष्ठां कुर्यात्‌॥ अस्य औीमागप्रातिष्ठामंत्रस्य वहाविष्णुमहेशवरा ऋषय ऋग्यज्ञः 


ः 


है 
| 
० 


अ्स्यां मू्तों आणप्रतिष्ठापने विनि०्॥ ऊँआंद्ठी को अंयंरं लंव॑शं 
सोहम्‌ ॥ अस्यां मूर्तों माणा इह प्राणाः । न 
जीव इह् स्थितः ॥ पुनः आं ह्ीमित्यादि पठित्वा अध्याँ छूलों 


हेसः 


तामाथवाणे च्छन्दांसि।क्रियामयबपु: प्राणाख्या देवता।आं बीजम्‌ ॥ हीं शक्तिथाक्ों कीलकृम्‌ । 


अंयर ल॑ वश पेहक क्षे अगकों द्ीआं 

ऊ आर्य द्ीमित्यादि पुनः पठित्वा अस्यां मूर्तों 
कक 2 १20) लत न नल 

ज्ञान्ड्रथाज वाहमनस्त्वकूचक्षु 


हि 8. ध्यिफ-उान्ण लत पाफबल8 चकृष्प्छ + ध् कक] ब्ूत द. १3742७० 5.8 २४ श्छ्ू थे दिन ८ हि ही द८ नो आज रु की 
श्रोत्जि्राप्राणपाणियद्दायूरस्थ पी इह्मत्य सुर्ख चिर॑ तिछन्तु स्वाहा ॥ ऊँ अखुनीते प०्य। न्‌ः 


छू 5 





लउत्तारण-इसके पीछे मूर्तिमं अग्न्युत्तारण करना 
बाहिये, संकस्पमें जेसे तिथिवार आदि बोछे ज्ञाते हैं. उन्हें 


गीछे “ ओम अप्निः सप्तिम्‌ू ” इस सूक्तको अभिपद्रहित 


प्र्मिपदकें बिना पढना चाहिये (१) अप्नि देव, वेगको 
गरण करनेवाले अन्न संपादक शीघ्ष गामी धोड़ोंकों देते 
[) वेद्रोंके पढनेबाले पुत्नको तथा कस निष्ठाको कर देते हैं, 
सीन आसमानमें विचरते हुए अग्नि देव, सुन्दरी खीको 


गिर पुत्रोंकी जननी बना देते हैं (२) करमेबान्‌ अभिकी | 
प्रसित्‌ सुन्दर हो, अग्नि ही इन बड़े भारी जमीन आस- | 


।नॉमें व्याप रहा है, वो अपने भक्तोंकी आय .ही रक्षा 


गै मार ढाहृता है। (३ ) अम्निने ही जरत्कण नामक 


तै को थी, अभ्निन ही नृमेघका परिवार बढाया था ४) 
रक ज्वाल्य रूप अप्नि घनको देता है, इसीने इस मंत्र द्रष्ट 
एषिको पुत्र दिया है तथा एक हजार गऊएँ दक्षिणामें दी 


बराजमान् हैं; (५) अभिको ही | ऋषि लोग सरतुतियोंते 





अनेक भांति बुलाते हैं. मजुप्योंको जब युद्धमें कष्ट होता हे 


' तो अप्निकी ही शरण जाते हैं, आकाशमे डड़नेवाले पक्षी 
ग्रोछ करके पीछे सकरपमें यह जोड देना चाहिये कि, | 
अवधातादि दोषोंकी निवृत्तिके छिय अग्न्युत्तारण तथा 
(बताकी सनिधिके छिये ग्राणप्रतिष्ता भी करता हूं. इसके | 


अ्निको ही देखते हैं,अपभि ही गझओंकी रक्षक लिये जाता 
ज्ञ॒ ८ भ्छै्‌ । 

ह्‌। (६) सालुषी प्रजा अग्निक्की ही प्राथना करती है, नहु- 

पके वेशज भी अशभ॒िको ही उपत्यना करप हैं) अप्नि ही 


| यक्षकी गान्धर्वी ( बाणीरूपी ) पथ्या है, अप्ि ही घीका क्‍ 
शरीर सहित पढ़ता हुआ तप्त प्रतिमापर पानी छोड़ना | 
आहिये। इस सूक्तके प्रत्येक मंत्र अभ्िपद्‌ आया हे यहां | 
(र<क मंत्रकों एक बार तो जेसेका पेसा एवम्‌ एक बार | 


भरा हुआ रासता है। (७) ऋभुओंने अप्निके छिये ही 
वेदेक स्तुतियोंका अन्वेषण किया था, हम शीघ्र ही मतों. 
रथोंको पूराकर देनेवाले अग्निकी स्तुति बोढ रहे हैं, अग्नि 
स्तुति करनेबालेका रक्षण करता हुआ बडा भारी धन देता 
है ॥ आ्राणप्रतिष्ठा--इसके पीछे देवतामें शरण श्रतिष्ठा करनी 
चाहिये इस आणदतेछ मंत्रके ब्रह्मा विष्णु और महेश ऋषि 
हैं, ऋयु , यजु सान और अथवेछन्द हैं, क्रियामय शरीर- 
बाछा आण नायक देवता है, आ बीज हैं; हीं शक्ति है; 
फ्ों कीछक है,इस मूर्पिम प्राणप्रतिष्ठा करनेसे इसका विनि- 


ह कं | योग होता हैं | पीछे डछटा हाथ मूतिपर रखकर-ओमू 
भला हैं, यहांतक कि उस अकेलेक भ्कों बेरियोंको आप | 


आंह्ींक़ोंअयर॑लेवेशेपष॑ सह लेक्ष अःक्रों हीं आं 


नासक | ई सः सोहमू इन बीजोंका उच्चारण करते हुए यह भावना 
ईिषिको रक्षाक्ी थी, अप्निनि ही जरूथ नामके देत्य का 
छा डाछा था; धसक बीचमें बेठे हुए अन्रिकी रक्षा अभ्निने | 


करते रहना चाहिये कि इस मूर्तिमं प्राण आगये थे यहां हैं। 


किर दुबारा इस बीजोंकों बोछकर यह भावना करनी 
घःि 


चाहिये कि, इस मूर्तिमें यहां जीव स्थित है फिर तिवारा 


| इन्ही बीजोंको बोलकर भावना करनी चाहिये कि इस 
| भूतिमें ज्ञानेन्द्रिय और कर्मेन्द्रिय छुल पूवेक रहेँ। ' ओपू 
7, अमन ही यजमानकी दी हुईं हृविको देवताओंमें | ५ 
हुचाता हे; यही अपने अनेक रूप करके अनेक जगह | ८-९-२३ का सत्र है। यह पूरा-ओम अछुनीते पुनरस्मा- 
| सुचझ्षुः पुत्र: प्राणसिह नो घेहि भोगम्‌। ब्योकू पर्वेम 


असुनीते ? यहांस लेकर, ' यान: ध्वस्ति ” तक एक ऋणगू 


( ३२ ) 





स्वस्ति॥ 


जे 
थे हे 
कक बे ही *१॥/ ५ 
एप क4# ९" रे 
कक 802 प्‌ ५92 का ध््ा 
जज हू) ह। के आओ) कक ध््ा 
हक एलन त३ शक तिएफ. ही पा/ १४०१ ्जऋएछएछाएातनलनणन्््््छ मं डा 478 2 ए%+६ 62 277५ 22 ६५४ 8280 ४ 2065८ 20205 कट 07229, 70020 ॥80000 20300 8 72280 0/60/00000 000 /808 है 080/ 00008 ४025 शा ! 


गर्भाधानादि पश्द्शसंस्कारासिद्धचरथ पश्चद्श प्रणवात्रात्तिं करिष्ये ॥ अणव पश्चदश- 








वारं जपित्वा ॥ रक्ताम्नोविस्थपोतोछलसदरुणसरोज धिरूढ़ा कराब्जेः पाशं कोदण्डमिक्षूद्धवम! 
गुणमप्यकुश पथ्च बाणान्‌ ॥ विश्वाणासकपाले त्रिनयनलासिता पीनवक्षोरुहाव्या देवी बालाओं॑- 
वर्णा भवत्‌ छुखकरी प्राणशक्तिः परा नः |ततो मण्डलोपरि व्रीह्मादिधान्ययवातिलेख्िकूटं कृत 


तत्र महीद्योरित्यादिना अब्रणं कलश संस्थाप्य कलशोपरि पूर्णपात्र 


संस्थाप्य तस्योपरि उ्यंकः 


कमंत्रेणोमया सह ज्यम्बक वा,विष्णुमंत्रेण लक्ष्म्या सह विष्णुं,सिद्धिब॒द्धिसहितं गणेश वा पदया 


सहित सूर्य वा भवानीं तत्तन्मंत्रेणावाह्म शिवस्य दक्षिणे लक्ष्म्या सह 


विष्णुमावाहयेत॥ शिव- 


स्पोत्तरे साविच्या सह बह्माणम्‌।एवं विष्ण्वादीनामपि ॥ अथ पोडशोपचार एजा ॥ ततः सहमस्रशीर 
त्यावाहनम्‌ ॥ पुरुष एवेदमित्यासनम्‌ ॥ एतावानस्पेति पाद्यम्‌ ॥ त्रिपादूध्व॑मित्यध्यम्‌ ॥ 





स्‍र्॑गुबचरनाम्‌, बहुमोे व बृढया न लव ॥| यहा विद कै, (77: ' अनुमते न मड़या नः स्यस्ति ॥ यहांवक | सिद्धि और बुद्धिसहित गगेश भगवामकों अथवा पत्नीगे 
घुय्य 


है । हे अधुनीते ! यहां हमारे इन देवोंमे फिर ज्ञानेन्द्रिय 
और कर्मेनिद्रय प्राण और भोगको स्थापित कर, हम रोज़ 
ऊपर चढते हुए सूय्यको चिर काछुतक देखें, इन मूर्तियोंमें 
ये सथ सदा बना रहे. हे अनुमते ! हमें सुखीकर हमारा 
कल्याण हो [ गोविन्दाचन चंद्रिक्ामें तथा सर्वदेवग्रतिष्ठा 
प्रकाश आदि गअन्धोंमें आ्राण प्रतिष्ठाके विषयमें इस मंत्रको 
नहीं रखा है तथा श्रीमान्‌ चौबे बनवारीछाढूजीने तो इसी 
मेत्रकी प्रतीकको प्रणवाबृत्तिके संकल्पमें ही सामिल कर 
दिया है न उक्त विषयमे प॑. चतुर्थीछालजीनेही उक्त संत्रका 
उलेख किया है ] पृर्वोक्त ऋचाक़ा पाठ करके गर्भावान 
आदि पन्द्रहों संस्कारोंकी सिद्धीके छिये पन्‍्द्रहवार प्रण- 
बका जप करता हूं इस प्रकार संकल्प करके पन्‍्द्रह बार 
भणवका जप करना चाहिये। पीछे प्राणशक्तिका ध्यान 
करना चाहिये कि, छालरंगके समुद्र सुन्दर जहाजपर 
छालकमलके आसनपर विराजमान हुईं है, तथा हा्थोंम 
पाश, इंखका धनुष प्रत्येचा अछुश और पांच बाणोंको 
धारण किले हुए हैं तथा छोहस भरा हुआ कपाछ भी 
हाथोंमें लिये हुए हे, तीन नेत्र हैं, बड़े बड़े वक्ष्यस्थल हैं. तथा 
बालूस्यके सप्तान अरुण रंगकी “पराप्राण गक्तिद्‌वी हमें 
सुखकरी होवे । पीछे बनाये हुए सर्वतोभद्र या लिंगतोभद्र 
दोनोंके ही ऊपर ब्रीहि आदिके तथा धान्य यव और तिलसे 
तीनकूटवाढा पर्वत बनाकर उसपर “ ओम मही दो: 
प्रथिवी च न इम यज्ञम्मिसिक्षताम पिप्तान्नो भरीमसि ” 
महती भू हमारे यज्ञको पूणे कर तथा जो आवश्यकीय वस्तु 
।त हमारे घरको भर दे । इस मंत्रसे बिना फूटे घड़ेको 
शह स  उपर पू्णपात्र रखकर पीछे “ ओम उ्यम्वक 
बेस सुरध्ि पृष्टिवर्धनम्‌ । उर्वास्कमिव बन्धवानमृत्यो- 


$) 5२३ ३ 
पुषिके आदेदात ! हमारे यशकों बढानेवाले तथा हमारी 
पुष्टिक बदानेचले व्यस्बकका य॒ कह 


_अन्घनकी दरह सुझे सौतसे मुक्त करें पर, अमरत्वसे कभी 
 गुक्त न करें, विषयक मेत्रस उप्तासहित अ्यंबक भगवानको 
जयथबा नैंस उक्ष्मीसहित विए 


| 


' चाहिये शिवके उत्तर 


जन करता हू,वो ककडीके | 


+ जे. भगवानको अथवा | है 


सहित सूर्य भगवानको अथवा भवानीको मंत्रोंसे बुढाक 
शिवके दाँय हाथमें छक्ष्मीसहित विष्णु भगवानकों बुढा॥ 
र् सावित्रीसहित बअल्याको बुह्ार 
चाहिये ) यही हिसाब विष्णु आदिकी प्रधानतामें भी होगे 
चाहिये कि, प्रधानके दोये बाँये दूसरे बठने चाहिये। 
सहस्वशीष। पुरुषः सहस्लाक्षः सदस््पाद। 
सभूमि९५सर्वतस्प॒त्वात्यतिष्ठदशाडुलम | 


तह परत्रह्म परमात्मा श्री विष्णु भगवान अनेकों शिर 
आदि अग तथा अनेकों ही ज्ञानेन्द्रिय और कर्म निद्रयवाढ! 
है वो इस सष्टिम सब ओरसे ओत प्रोत होकर नाभिरे 
ढाद्श अगुल जो हृदय है उपमें विराजमान होता है । इप 
मेत्रस भगवान का आबाहन कर ना चाहिय । 

३ पुरुष एवेद?9सर्व यद्भूत यज्य माव्यम्‌। 


उतामृतत्वस्थेशानो यदन्नेनाति रोहति॥ « 
जो कुछ अलुभवमें आ रहा है तथा जो हो चुका और 
होगा वह सब पुरुष ही है वो मसोक्षका अधिपति है तथा 
जीवोंको कमेफल देनेके लछिय कारणावस्थासे कार्य्योव्था 
स्थूड जगत्‌के रूपमें आता है। इस मंत्रस आसन देना 
चाहिये । _य 
३४ एतावानस्य महिमातो ज्यायॉश्व पुरुषः। 
पादो5स्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृत दिवि॥ 
इसको इतनी तो महिमाहै, इससे पुरुष बडा है, सबजीव 
के जरा मात्र ह और अंशी वो नित्यधाम नेकुण्ठमें विरा- क्‍ 
है ! इस मेत्रसे पाद्यका प्रतिपादन करना चाहिये। 
३“जिपादूर््व5उदेत्पुरुषः पादोषस्येहाउसवत्पुनः। | 
ततो विष्वडः व्यक्रामत्साशनानशनेडअभि ॥ 
वो तिपाद पुरुष ऊध्वे उद्ति है,इसका अंश जीव हिंग- 
५ चबार आवागमन करता है । वो अंश, देव मनु 
ध्यादि अनेक रूपमें होकर संसारमे भ्रमता फिरता है तथा : 
3... पादि व्यवहारभाकू एवम्‌ बद्ध मुक्त होता रहवा 
' इस मत्रस अध्य देता चाहिये। मर 


परिभाषा. ) 





तस्माद्विराडित्याचम न 
तम्‌॥ तस्माय्ज्ञार 





भाषादीकासमेतः |... 


यम्‌ ॥ यत्पुरुषेणेति ल्ञानमू॥ ते यज्ञानेति वख्यम्‌ ॥तस्म 
प्वबहुत ऋच इते गन्धमतस्मादशेति पुष्पम ॥ यत्पुरुष व्यदधरिति धूपम्‌ ॥ 


तक 


( शे३ ) 


! अत 50 072 ष्य यश तहत 0227:0:07 880 क00065 2067 0 आ//27/:प7 27 
8.5 2020 07:26 70 कक 720 सिल्क 2220 227 कक 00688 2 2 60% 7 


हम 6 


द्यज्ञादित्युपवी- 





आह्मणोस्थेति दीपम्‌ ॥चन्द्रमा मनस इति नेवेधरमनाब्या आशलीदिति प्रदक्षिणा॥ सप्तास्येति 
& रु ७३३ 
'नमस्कारान ॥ यज्ञेन यज्ञमिति मंत्रपुष्पाअलिम ॥ इति षोडशोपचारे! पश्चाम्॒तेश्व वैदिकमन्नेः 


करे 


पुराणोक्तमंत्रेश्व स्थापितदेवताः संपूज्य रात्रो जागरण कुघोत ॥- प्रातनित्यक्ृत्यं विधाय तस्य 


लक्षपुजनश्य वा आचरितत्रतस्य साइलासिदबथ पूजनदर्शांशेन लिलयवत्रीहिशि 
दोक्तेन मूलनन्त्रेण पुराणोक्तेन वा कार्यः ॥ 


दिनिवां होम॑ करिष्ये ॥ होमस्त दे 





3०5 ततो विरशाडजायत विराजोी अधि युझूषः। | 


स जातो अत्यरिव्यत पश्चाद्धनिमथों पुरः ॥ 


७ यत्युरुषेण हविषा देवा यज्ञमतत्वत । 


% त यज्ञ बहिंषि प्रौक्षन्पुरुष जातमम्नतः । 
तेन देवा अजयन्त साध्या ऋषयश्व ये ॥। 


अगाडीके ऋषि मुनियोंने उस यज्ञ पुरुषको प्राणायामोंस | 


साक्षात्‌ किया तथा जो भी साध्य और ऋषि हुए उन 
पी वह छ. 

' सबॉने उसीसे उसका यजन भी किया। इस मँत्रस वस्त्र 

समपेण करना चाहिये। 


उससे ऋचायें और सामर प्रकट हुए, छन्द भी उससे प्रादु- 
भूत एवम्‌ यजु भी उसीसे प्रकट हुआ । इस मंत्रस गंध 
द्रव्य समपेण करना चाहिये । 
रे कै 
तस्माग्यज्ञात्सवेहुतः सम्भल पषदाज्यम्‌ । 


पशुस्तॉश्रके वायव्या नारण्या ग्राम्याश्व ये ॥ | विस्तार करके पुरुष पशुको बाधा | इससे नमस्कार करना 
उसी परमात्मास प्रषत और आज्य दोचों प्रकट हुए तथा | 


उसीने वायव्य एवम्‌ आमीण ओर वन्य पशुओंको उप- | 


जाया । इस मंत्रस उपवीतका समपंण करना चाहिये । 


[हिये। हु 











६ वायसा- 





3० यत्पुद्द्ष व्यद्धुः कतिथा व्यकल्पयन्‌ । 


े | घु् किमस्यासीत किम्बाहकिमुरूपादा उच्येते 

इसके पीछे इससे विरादू उत्पन्न हुआ एवं उस विरादसें | 
विराद्का अभिमानी पुरुष हुआ वो देव मनुप्यादिभावसे | 
भिन्न भिन्न अनेक पअकारका हो गया इसके पीछे ऋष॒शञः पुर | 
ओर नगर रचेगये।इसमंत्रसे आचमनसमर्पणक एनाचाहिये! | 


जब विराट उत्पन्न हुआ था उस समय उसमें अनेक 
प्रकारकी कसपनाएँ की गयीं वोही प्रश्नोत्तरके रूपमें भग- 
वती ऋचा कहती है कि, उसका मुख बाहु उरू और पाद 
कौन कहे जाते हैं ! इस मंत्र धूप देनी चाहिये । 


| ३* ब्राह्मणो5स्थ मुखमासीद्‌ बाहू राजन्य+क्रतः। 
वसम्तोःस्थासीदाज्य द औष्म:इध्मःशरद्धवि:॥ | 

जिस समय दुवगण पुरुष रूपी हविसे यज्ञ करने छगे | 
उस समय वसन्त आज्य, भ्रीषप्स इच्प और शरद द्विके | शृद्र उत्पन्न हुए । इस संत्रस दीप देना चाहिये। 
स्थानमें हुआ। इस मेत्रसे स्नानका समपेण करना चाहिये। | ३५ उल्द्धमा मरसोजतश्क्षोः सथ्योप्जजायत। 
| बाद बायुश्व म्राणश्व लुखादग्निरजायत ॥ 


ऊरू तद॒स्य यदवेश्यःपदभ्या?9शद्रोपजायत ॥ 
मुखसे ब्राह्मण, बाहुसे क्षत्रिय, उरूस वेश्य और पदोंसे 


22 


० की ए हक 
मलसे चन्द्रमा, नेत्रोंस सूये, ओजसे वायु ओर प्राण तथा 
मुखस अप्नि उत्पन्न हुआ । इस मंत्नसे नेवेद्यका निवेदन 
करना चाहिये । 


| अताभ्याआखीदुन्तरिक्षए 9शीष्णों द्योः समव- 


3 ००. | लत । दष्यां समिदिश: आत्तथा न 
ओं तस्मादज्ञात्सवहुतप्कतचः सामानि जक्षिरे। | ये गा भूमिदिशः श्रो लोकों 
श 8 ः ९ 

न्दा *सि जज्षिरे तस्माद्रजुस्तमादजायत ॥ | 


. सब यज्ञोंमं जिसके लिये जिसका ही हवन होता है । 


नाभीसे अन्तरिक्ष, शिरसे दिव, चरणोंसे भूमि, श्रोत्रस 
दिशा उत्पन्न हुई । इसी प्रकार अन्य छोकोंकी भी कल्पना 


| की गयी । इस मंत्रसे प्रदक्षिणा करनी चाहिये | 
| * सतास्यासव्‌ परिषयास्रिः्सत्त सामिषः कृता॥ 
| "+। थद्यज्ञ तब्वाना अबन्नन्‌ पुरुष पशुम्‌ 


सात परिधि और इक्कीस समिध्रकी देवताओं ने यज्ञका 


चाहिय। 
ऊ यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवास्ताने धर्मोणि प्रथ- 


ह कक | मान्यासना लेहइनाक॑ महिमानः सचन्त यत्र पूर्व 
३४ ब्स्मादशवा अजायन्त ये के चोमयादतः | | 
गावो द जज्षिरे तस्मात्तस्माज्ञाता अजाबयश। | 
उसीने अश्व तथा अश्व सरीखे आणी एवम्‌ जिनके ऊपर | 
नीचे दोनों ओर दांत हैं उनको उत्पन्न किया; उसीने गऊ | 
और भेड बकरी आदि बनाये । इससे पुष्प समर्पित करने | 
_  [ लिका समपंण करना चाहिय | इस प्रकार षोडशोपचारस 
१ ततो व्राडिति वाजसनेयपाठः । 


साध्याः सन्ति देवाः ॥ 

देवॉने यज्ञस यज्ञ पुरुषका ही यजन किया। वे यज्ञ 
पुरुष पूजनसबन्धी घमे सुख्य थे। वे स्वमगेमें पूजित हुए जो 
कोई अब भी वसा करेंगे वे वहीं जाकर पूजेंगे जहां कि 
पह्िर साध्य दव पूज रहे ह इससे पृब्यदेवको पुष्पांज- 





मार जी 
प् 2 ,५2/007//072///007 ५ // 0, नी 
हर 04 थी 267/25- ८5% ट043 0% ४2,420 77:7३ 00526: 42740 ३0:४/204/77 764 020 //7 7778: 27 7६६00. 22220, 


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5 क्ः 28072 200 % 


अथाभिमुखम्‌ । 


पा ती 


आचम्य त्राणानायम्य तिथ्यादिसंकीत्य एबंजुणविश्ेषविशिड ःय पृण्यतिथावमुककमाई- 
तया विहितासुकह॒बनमहं करिष्ये इलि संकल्प्य गोमयादिलिते श॒द्धे देशे श॒द्धमृदा इशानी- 
मारभ्य उदक्संस्थं चतुरडःणलोन्नतं वा चतुर्दिक्ष मिलित्वा द्विसप्तत्यंगुलपारिपिकं ह फलितमष्ठा: 
दशांगुलविस्तृतं होमाल॒सारेण तद्धिकं वा न तु ततो न्यून॑ मध्योन्नतं स्थण्डिल कुर्यात ॥ 
तहोमयेन प्रदक्षिणमुपलिप्य दक्षिणेषष्टावुदीच्यां द्वे प्रतीच्यां चत्वारि प्राच्य (मधमित्यंगुलानि 
ःक्क्तवा दक्षिणोपक्रमामुदक्संस्थां प्रादेशमात्रामेकां लेखां (लिखित्वा ) तस्या दक्षिणोत्तरयो 
तगायते पूर्वरेखयउसंछटे प्रादेशसंमिते द्वे लेखे लिखित्वा तयोम॑ध्ये परस्परमसप्तष्णा 
उद्कूघस्था:प्रागायताः प्रादेशसंभिताध्तिस्त इति षढड़ लेखा यक्षिवशकलमूलेन दक्षिणहस्ते- 
नोछिख्य लेखासु तच्छकलमुद्॒गग्न॑ निधाय स्थण्डिलमद्विरव्युक्ष्य शकलमाश्रिय्यां निरस्य पार्षि 
पक्षाल्य वाग्यतों भवेत्‌ ॥ तेजसपात्रयुग्मेन संपुटीकृत्य सुवासिन्या ओजियागारात्घ्वगृहाद्र 
पमृद्धं निर्धूममाहतमाप्नें स्थण्डिलादाश्रेय्यां दिशि 


निधाय | जुष्टोदमूना आत्रेयो वसुश्रुतोः 
्रिख्रिषठप्‌ ॥ अग्न्यावा० ॥ ऊ जुष्ठोदमूना अतिथिदरोण इम॑ं नो यज्षमुपयाहि विद्वान ॥ विश्व 

अप्ने अभियुजों विहत्या शबरूयतामाभरा भोजनानि॥२॥ एह्मम्न इत्यस्यथ मंत्रस्य राहूगणो गौतम 
#षिः ॥ अम्नि्देवता॥ त्रिष्ठपछन्दः॥ अग्न्यावाणा। हे एह्मम्न इह होता निषीदादब्धः खुपर एता 
वा न: ॥ अवतां त्वा रोदसी विश्वमिन्वे यजामहे सौमनसाय देवान्‌ ॥ २॥ इत्यक्ष तरावाह्म 


अल कर कप पक न सकल न अत + लक की सरल ३० पल जज लक ( । ९ ७७ ४. ५ २ 
[जन करना चाहिये। पंचामृतसे पुराणोंके ऐसेही 'छोकोंस | हुईं हों रेखाएं और खींचनी चाहिय । इस तरह तीव 
'थापित दूसरे देवताओंका भी पूजन करना चाहिये तथा | उत्तरकी रेखाएं तथा तीन पूरबकी रेखाएं कुछ मिलाकर ह: 
प्तको जागरण करना चाहिये ॥ 


५ | रेखाएँ होनी चाहिये | उस शकूको उत्तरकी ओर अगर 
आतःकाछ नित्य कमसे निवृत्त होते ही रक्ष त्रत अथवा | 





ब्रीहियोंसे अथवा खीर आदिसे पूजनका दशवों हिस्सा 
हवन करूँगा, इस अ्कारका संकल्प करना चाहिये वेदोक्त 


चाहिये, इंशान कोणसे ले 
करना चाहिये, 
चाहिये चारों दिशाओंमें मिलकर 
होनी चाहिये, 
यदि होम अधिक कर 
करना हो तो छोटा 
ऊँचा अवचर्य 
भद्क्षिणाके ऊमसे लीप देना चाहिरे 

अपुलछ तथा उत्तरी तरफ दो अ 


बहत्तर अंगुछुकी परिधि 


प्रादेशस्ात्र एक छकीर 
उस उकीर) बिक है 
श्स उकीर% वक्षिणोत्तर में बैसीही मध्यरेखासे 


; 
इं4७22........... 


हे | भाग करके रख देना, पीछे पानीसे प्रोक्षण करके उस शक. 
केये हुए ब्रतकी साह्॒ता सिद्धिके लिये तिछ, जौ और | 


| छको अग्निकोणमें पटककर हाथ घो,मौनी हो जानाचाहिये। 
। फिर किसी सौभाग्यवती सुवासिनी ख्रीके हाथसे, किसी 
मूछ मंत्रस, या पुराणोक्त मूल मेत्रसे हवन करना चाहिये। । हुईं इतनी अभ्नि धंगवाडेनी चाहिये जो कि कुछ देरतक बुर 

अथ्‌ अभिसुखम्‌-आचमन, आणायाम॒ करके संकरप | नहीं तथा बेदी कमेमें सौम्य हो । यह अभप्नि या तो किसो 
ना चाहिय कि,आज ऐसे ऐसे पवित्र दिनमें इस कामके | चेद पाठीके घरकी होनी चाहिये। अथवा अपने ही घरकी 
उस हीपे शक हवनकों करता हूं। पीछे गोब- | होती चाहिये।जैसी आये, वेसी ही स्थण्डिकस अग्निकरोग्म 
रसे छीपे हुए शुद्ध स्थल में शुद्ध मिट्टीस एक स्थण्डिल बनाना | रखदे । इसके पीछेका जो कम हैं सो अगाडो कहते हैं । 

कर उत्तरकी तरफ बनाना प्रार॑स | 


| ओं जुष्टो दमूना” इस संत्रका आज्रेय 
यह स्थण्डिल चार अंगुरु ऊंचा होना फ 


भी धातुद्चे बने हुए कटोरेम, कटोरेस ढकी हुईं दधकती 


वसुश्न॒ल ऋषि हैं, 


। अप्नि देवता है, ज़िष्डुपू उन्द्‌ हैं, अप्रिके आवाहनमें इसका 
> (व | विनियोग होता 
अठारह हो बा होना चाहिये | | दमन करनेवाले 
ना ह तो बड़ा हो सकता हे पर कमर | 

५ * अतिथि अ ज 
नहीं हो सकता किन्तु स्थण्डिल मध्यम | ज्ि.यजमा 


_ | जाननेवाले अग्नि देव! 
होना चाहिये। उस स्थण्डिल्को गोबरस | कैरे 0828 


हे। परम प्रसन्न द्याशील तथा वैरियोंके 
एवम्‌ जिसकी हम सेवा करते हैं ऐसे 

नके घर आ उपस्थित हों,हे सब कुछके 

हम परआरोप करनेवाढेसबको मार, 


द | वरियोंकी शक्ति तथा धनका हरण में दे दीजिय। 
ये । पीछे दक्षिणमें आठ | पर पक निक पर कह 


४ + ५ 3७ 
कै ०... पे एल्यन्न! इस सत्रका राहगण गौतम ऋषि है, अग्नि 
गुर, पश्चिममें चार अंगुल | देवता है, तरिष्ठप्‌ छन्द है हू हे) 
| योग होता है। हे दे 
' छफर उच्रक्षी पक यह्चिय शकरुद्वारा दक्षिण दिशासे | यहां निभ्य होकर 
हे सोंचकर, | प्रथिवी तेरी 
न छिपी। यजन 


द्‌ है,अग्निके आवाहनमें इसका विनि- 
वॉको बुछाकर छा देनेवाले अग्नि देव! 
अविराजो, इस यज्ञको पूरा करो,द्यावा 
रक्षा करें, मे अ्रसन्नताके छिय सब देवताओंका 
करता हूँ । इन दोनों मंत्रोंस अक्षतोंसि आबोः 


परिभाषा, | भाषाटीकासमेतः । (३५ ) 





जम 40776 277 74074 0:4४ 72:02 40५$82/76: 20040 40%: 2080600006:/4:6706 07077 7#९४//०३४३०5५:2727: ्््यश्शा्यभ चमक :फ्रच ्ट्:् )्ओिि़्कि या प्रज्धात 


आच्छादन दूरीकृत्य समसस्‍्तव्याहतीरनां प प्रजापति! भ्रजापातिब्रहती ॥ अश्निप्नतिष्ठ 
वि०॥ ३ भूऊेंवः स्वरित्यात्मामिसुख पाणिभ्यां पडलेखासु तचत्कमबिहितनामकमझकनामान 
मा प्रतिष्ठापयामीत्यम्रे म्रतिष्ठाप्य ॥ चत्वारि श्वद्धा गोतमो वामदेवोइप्रेद्निष्दुप ॥ अश्निमृत्ति 
ध्याने वि० ऊँ चत्वारि शड़ा चयो अस्य पादा दे शीर्ष सप्त हस्तासो अस्य॥ जिधा बचद्धो 
वृषभो रोरवीति महोदेवों मत्या' आदेवश ॥ सप्तहस्तश्रतुःशड्र४ सतजिहो द्विशीषेकः ॥ त्रिपात 
प्रसन्नवदनः सुखासीनः शुचिस्मितः ॥ स्वाहाँ 6 दाक्षिणे पा्खे देवी वामे श्वां तथा॥ बिश्- 
दक्षिणहस्तेस्त शक्तिमन्न॑ खच॑ ख्ुवम्‌॥ तोमर व्यजनं वामेध्तपात्र च धारयन ॥ आत्मामिष्ठख 
मासीन एव॑ंरूपो हुताशनः ॥ ऐष हि देवः भदिशो तु सवा$ पूवों हि जातः स उ गर्भे अन्तभासे 
विजायमानः स जनिष्यमाणः पत्यड्सखस्तिष्ठति विश्वतोमुखः॥ अस्ने वेश्वानर शाण्डिल्य- 
गोत्रज़ मेषध्वज प्राड्एख मम संसुंखो वरदों भव ॥ ततोषन्वाधानं कुर्याव्‌ ॥ तत्चेत्थम--आचम्य 
प्राणानायम्य देशकालों संकीत्ये श्रीपरमेश्वरभीत्यथ क्रियमाणेफ्सुकब्र॒तोद्यापनहोमे देवता- 
परिमहार्थमन्वाधानं करिष्यें॥ अस्मिन्नन्वाहितः्नों जातवेद्समश्रिमिध्मेन प्रजापातें, अजापातिं 
चाघारदेवते आज्येनात्र प्रधानदेवताः अमुकहोम्यद्॒व्येण मत्येकमसुकसंख्याकामिराहुतिमि- 
बेह्माद्यावाहितदेवताश्व नाममंत्रेण प्रत्येकमेके कयाःज्याहुत्या यक्ष्ये। शेषेण .स्विष्टकतमपश्नि- 
मिध्मसन्नहनेन रुद्रमयासमाप्रदेवा-विष्णुममिं वायुं सूचे प्रजापति चेताः आ्यश्वित्देवता आज्य- 
द्रव्येण ज्ञाताज्ञातदोषानिबेहणाथ विवास्मभि मरुतश्वाज्येन विश्वान्देवान्त्संत्ावेणाड्रदेवताः 
प्रधानदेवताः सर्वाः सब्रिह्ठिताः सम्तु । णवं साड्रोपाड्रेन कमणा सद्यो यक्ष्ये॥व्याहतीनां परमेष्ठी 








हन करके, ढकनेकी हठाकर-पीछे संपुर्ण व्याहृतियोंका | 
प्रर्मेष्ठी प्रजापति ऋषि है; बृहती छन्द है! प्रजापति देवता | 


है, अभिकी प्रतिष्ठामें इसका बिनियोग होता है। ओ सूझुवः 


तीन तरहसे अथवा तीन जगह बँधा हुआ है, बडा भारी 


कक हि 


प्रसन्न भुख हैं, सुखसे बेठ सुन्दर स्मित कर रहे हैं; दाईं | 
ओर स्वाहा और बाई ओर स्वधा बेठी हुई हैं, दाये हाथ | 
में शक्ति, अन्न, खुक ओर स्रुवा तथा वायें हाथम तोमर | 
व्यजन और घीका पात्र हैं; ऐसे भव्य अप्नि देव मेरे | 
सामने विराज रहे हैं। हे मनुष्यो ! सब प्रदिशाओंस यही | 


+व्याकरण महाभाष्यकारने इसका शब्दपरक अथ्थैकियाहे। भागवतने 


इसीके भावका ऐसाही एक इलोकरखकर भगवान्‌ विष्णुजीकी ओर | 


बढाया हे) ह 





अभ्नि दृव हैं, सबसे पहिल यही हुआ है, यही गर्भेके बीच 
मे हैं, यही विशेषरूपसे हो रहा है और यही होगा; हे 


| मनुष्यों ! यद्यपि सवेतो सुख है पर तो भी आपके सामने 
स्व: । इससे अपने सामने दोनों हाथोंसे, छः रेखाओंके | 
बीचर्म जिस कामके लिये जो अग्नि स्वरूप,नाम कहागया | 
है, उस रूप नामकों कहकर अप्निकी स्थापना कर देनी | 
चाहिये, कि ऐसे २ अग्निको इस २ काममें में स्थापित | 
करता है। ओमू “+चत्वारि श्ज्ञा:” मन्त्रका गोंतस वास- | 
देव' ऋषि हैं, अग्नि देवता हैं, त्रिष्दुप छन्द है, अग्निकी | 
मूर्तिके ध्यानमें इसका विनियोग होता है। इस अग्नि 
देवके चार शज्ण, तीन पाद, दो शिर ओर सात हाथ हूं, | 


विराजमान हो रहा है । हे शण्डिल्य गोत्री मेषकी ध्वज!- 
वाले एवम्‌ पूरवकी ओर मुख करके बेठे हुए आप मेरे सामन 
मुझ वर देनवाल हजिये। अन्वाधान-आचमन प्राणायाम 
करके, देशकाछ॒का कीत्तन करके, करनेवाढेको कहना 
चाहिय कि परसेश्वरकी प्रसन्नताके लिये किये इस ब्रढके 
उद्यापनके होममें, दववाक परिग्रहके लिये, अन्वाधान कर्म 
करता हूं । इस अन्वाहित अश्निम जातबेदा अग्निको तथा 
प्रजापतिको इध्मसे, प्रजापति आधार देवता तथा अग्नि 


हे रे 5 । और सोम इन दोनोंको एवम्‌ नेत्रोंको आज्यसे इसकर्मके 
देव है, सब काम्मोंका पूरा करनवाहा हैं, वो यहां मनुष्यों | 
के वीच आविराजा है | भगवान्‌ अप्नमि देवक साथ हाथ; | 
चार आड़, सात जिहा दो शिर और तीम पाद हैं, सदाही | 


प्रधान देवताओंको इस हृव्य द्र॒व्यसे इतनी आहुतियोसे 
तथा त्रह्मादिक आहत देवताओं को नामसनन्‍्त्रसे एक एक 
आज्यकी आहुतिसे यजन करूँगा, बाकी बचे शाकल्यसे 
स्विष्टकृत्‌ अग्निको तथा समिधाके वन्धनसे रुद्रको; एवम्‌ 
अयासअग्निदेव विष्णु अग्नि वायु सूर्य और प्रजापति 


ये जो प्रायश्चित्तक देवता हैं इन सबको आज्यसे तथा जाने 


और वे जाने हुए दोषोंके निवारणके छिय॑ अग्नि और 
मरुतको तीनवार आज्यसें, विश्वेदवाओंको संस्नावसे 
एवम्‌ जो अज्भदेवता वा प्रधान देवता उपस्थित हों में 
सबका सांगोपांग कर्म विधिसहित यजन करूँगा। व्याहः 


| तियोंके परमेष्ठी प्रजापति ऋषि हैं। प्रजापति देवता हैं 
....३ एपोइ देव: । २ सएवजातः ४ इति साध्यन्दिनीयपाठः । 


( ३६ ) ब्रतराज: । 


[ सामान्य 





2७७७ न मम 


अजापतिः प्रजापतिबृंहती । अन्वाधानसभिद्धोमि विनियोगः॥ ऊँ चभूर्भवः स्व: सवा 


पअजापतय इढं० ॥ तत इध्माबाहिषोः सन्नहन कृत्वाएग्नि परिसम॒ह्य परिस्तणीयात्‌ ॥ तज्चेः | 
अग्न्यायतनादष्टाइगुलमिते देशे ऐशानी दिशमारण्य प्रदक्षिणं स मन्तात्सोद्केन पाणिना हर 
परिमृज्य पोडशदमें: परिस्तृणीयात्‌ । तत्र आच्यां अतीच्यां चोदगग्ना दर्भाः ॥ अवाच्यामुदीन 
च मागआः ॥ पूर्वपश्चात्परिस्तरणसूलयोरूपरि दक्षिणपरिश्त रणमूं ॥ उत्तरपरिस्तरणं तु तदस्रगो 
रधस्ताव्‌॥ ततोग्नेदक्षणतों बह्मासनार्थमुत्तरतश्व पात्रासादनाथ कांखिदभोन्प्रागग्रानास्तणीया 
अग्नेरीशानश्विरभ्मसा परिषिच्य उत्तरास्तीर्णेषु दर्भेष दक्षिणसव्यपाणिश्यां क्रमेंण चरुस्थाही- 
_ मोक्षण्यों दर्वीज्चुवों मणीताउज्यपात्रे इध्मावहिंषी इते द्ंद्रश उदगपवर्ग आक्संस्थं च स्युब्जाति 

पात्राण्यासादयेत्‌ । ततः प्रोक्षणीपात्रजुत्तान॑ कृत्वा प्र द्शमात्रकुशद्रयरूपे पवित्र निधाय 






हु 


अद्विस्तत्पाबं प्रयित्वा गन्धउष्पाक्षतात्रिक्षिप्याड्गछ्रीपकनिष्ठिकास्यासुदगमे प्रथक्पवित्रे पृतव 
अपश्िरूत्पूय पात्राप्युत्तानानि कृत्वा इध्मं च विस्नस्य सर्वांणि पात्राणि ले: प्रोक्नेत। ता आप 
चित्कमण्डलो क्षिपेदित्येके । प्रणीतापात्रमश्े: अत्यडूनिधाय तत्र ते पवित्रे निधाय उदकेन पू; 
यित्वा गन्धपृष्पाक्ष ताब्निक्षिप्य। बहामपक्षे--अध्मिन्कमाणि बह्माणं त्वाईई ब्रणे इंते पाणिना पा 
सटरट्ठा इतो बच्मा बृतोस्मीत्युक्त्या माइमुखो यज्ञोपवीत्याचम्थ समस्तपाण्यड्ज॒प्ठो भृत्वाग्रेणाए 
परीत्य दक्षिणत उदड्सुखः स्थित्वाउसनार्थ दर्भेषु दक्षिणभागस्थमेक दर्भम इग्गष्ठानामिकाध 
गहीत्वा निरस्तः परावसुरिति नेकत्यां निरस्यापः ध्पृ ट्ेदमहमवांवसोः सदने सीदामी त्युक्त्वोद " 
सुख एव वामोरूपरि दक्षिणाडिंख्र संस्थाप्पोपविश्य गन्धाक्षतादिभिरचितः सन्‌, बृहस्पतिय््ा 


3 १..>०->क०न+, 


आर छू छ कै हे पे श न 
शिष्य ते चहस्पते यज्ञ गोपाय सयश पाहि स यज्ञपाति पाहि स मां पाहीति जपिल 
ध्यै्‌ रे 5 
विनियोग होता है । फिर भूमुवः स्वः हो 4 जापतय इद | कर, अँगूठे और कनिप्चिकासे उ दूश प्रथक्‌ू पवित्र रखकर 
5 अहकर अपभ्निमें समिध हवन कर देनी चाहिये। | तीनवार पानीका उत्पवन्न करके, इध्मको टीक करके, सब 
इसके पीछे समिध और कुशाओंको सन्नहनकर अम्निके पात्रोंको पानीसे तीनवार प्रोक्षण लवालिथि गंदी 
परिसमूहन करना चाहिये। इसके बाद अग्निको चेताकर पक या बाहिक जी, 
चारों ओर कुशके विछानेकों कहते हैं । उसका क्रम यह है | देना चाहिये । प्रणीतापात्रको अग्लिके पूवर्म रखकर उस 
कि, वेदीके चारों ओर इशान कोणसे लेकर प्रदक्षिणक | पर दोनों पविच्ना रखकर पानी भरकर, सुग न्धित पु 
फमसे तीनवार ने करके पीछे सोलह कुशाओंको | तथा अक्षत डाल दे । पीछे कहे कि, में इस काममें आपको 
बिछाना चाहिये। पूरव और पश्चिममें उद्गग्म दस / तथा ] 
है ्‌ न कं] 
बी कि वो हाथ पकड़कर कहे कि में तेरा ब्रह्मा बन गया; पीछे 
की परिस्तरणके भूछक अं दृक्षिण परिस्तरण होना | ब्ह्माजी परबकी ओर मुख करके यज्ञका उपवीत पहिन 
चाहिए। तथा उनके गाडीक नीचे उत्तर परिस्तरण होना | आचमन कर, हाथ परोंको इकट्ठा करके आगाडीसे अग्नि 
न हैये । इसके पीछे अग्निसे दक्षिण अह्माऊ आसनके | को घे 
हक ७ 
असनक लिए कुछ एक | दर्भामेंसे एकद+ अंगूठा और अनामिकासे केकर “निए 
3. वभोकों बिछाना चाहिये, पीछे अग्निसे लेकर | स्तःपरावसु"' परावसु निरस्तकर दिया शीघ्र यह मुख्ये 
इशासकोण तक तीनवार पात्ती छिडक कर उत्तर दिश,की 
4६ रे हा चल ९ ! 
शद्सहमवावसो:सदने सीदापि” मैं अवांबसुके सदन पर 
दर दर गं।पडिओ * रे क्‍ 
चरुस्थाली प्रोक्ष जम बाबर एड देनी चाहिय। पहिले बैठता हू यहे कहता हुआ उत्तरकी ओर मुह रखता हुआ 
प्रणोता आव्यपात्र, इध्प बह, हैवे तथा फिर ही बायें घोंट्के 
तरफ्से स्थापि कं जिस पमय यजमान्त उत्तका गध अक्षत्‌ आदिसे पूजन क्‍ 
रख दे । पीछे शोक्षणी पातनदो बीयर 3 उल्टा | करता है उस समय ज्ह्मा कहता हे कि “इन्द्रके घरपर वह 
दो इसको पवित्रीके हपने इखकर, | ' णी अद्या बनते हैं वो ही 


शक हे ७ धर ञ, ५, । 
इहती उन्द है अन्वाधानकी सप्तिधाओंके होमसें ईनका | पानीसे भर, उसमें सुगन्धित फूल और अक्षतोंक्रो डर 
० ३ कर ९ 
उसका चारों ओरसे परिस्तरण करना चाहिये। परिस्तरण | » ऐसा कहते हैं कि, वो थोडासा पानी क सण्डलमे मर. 
२ 
५ हे त्रह्माके रूपमें वरण करता हूं, बननेवाल द्विंजको भी चाहिये 
दक्षिण उत्तरमे प्राग्ग्न दे होनी चाहिये । पूर्व. और 
+। परकर, दक्षिणसे उत्तर मुख करके बैठे, आसनके हि 
लिये तथा अग्निसे उत्तर पात्रोंके 
कहते हुए कुशाको नैकत्य कोणमें फ्रेंककर आचमन करे 
ओर बि्ी हुईं कुशाओंपर दोनों हाथोंस ऋफ्से च्चे 
यें घोंदूके ऊपर दायें पैर रखता हुआ बैठ जाता ै। . 
बी ५... ईंग सबोंको उत्तरकी तरफ. हा ह 
हमे उंलबा 
क्‌ ». ' उसे | यज्ञपतिकी रक्षा करें, भेरी रक्षा 


बृहस्पति इस यज्ञकी रक्षा, ु 
करे, इस प्रकार ज़पता हक .'. 


परिभाषा, ] 


यज्ञमना एवं वर्तेत ॥ ततः कर्ता बहान्नपः 
स्युपांधॉपमणयेत्युश्ेरझक्त्वातिसजेत ॥ ततः 


नासिकासमीरं नीत्वोत्तरतोग्नेनिंधायास्येदर्मरा 
उरतःसंस्थाप्य तस्मिन्नाज्यमासिच्य परिस्तरण 


का 


सेप्य पुनस्तनंवोह्मुकेन प्रधानदव्वध्यसहितमाउय 


ज्वलता दर्भोल्मुकेनावज्यस्य दर्भाअद्वयं नि! 


भाषाटीकासमेतः । 


प्रणेष्यामीत्युक्ते--- झँ भूश्ेवः स्वर्वृहस्पातिप्रसूलते- 
कतों तत्मणीतापात्न दक्षिणोत्तराश्यां पाणिल्‍यां 
च्छादयत ॥ ते पवित्र आज्यपात्रे निधाय तत्पात्नं 
द्रहिरुत्तरतोड्ारानपोह्य तदु॒पर्याज्यपात्र निधाय 


त्रिःपयग्निकृत्वा तदुल्मुक निरस्यापः स्पृष्ठाड्ारानग्नों क्षिपेत्‌ ॥ अंगष्ठोपकनिष्ठिकाम्यां पावत्रे 
गृहीत्वा । सविठ्॒देति मन्त्रस्य हिरिण्यस्यस्तूप ऋषि॥सविता देवता।पुर उष्णिक छन्दः। आउय- 
स्योत्पवनेविनि० ॥ ७ सवितुष्ठा मसव उत्पन्नाम्याच्छिद्रेण पवित्रिण बसोः सूथस्य राश्मानिः ॥ 


इति मंत्रेण प्राजुत्पुनाति सकृह्विस्तृष्णीम्‌॥ते पविश्रे अद्धिः 


प्रोक्ष्याग्नो पहरेत ॥ स्कन्दाय स्वाहा 


स्कन्दायेद्‌ नममेति ।| तत आत्मनोगतो भार पोक्ष्य । तन्न बहिंःसन्नहनीं रज्जुमुदगम्ां मसारये 
तस्थां बहिरास्तीर्य तदुपारे आज्यपात्र निधाय कुशान वामहस्तेन स्जुकूस्त॒ुवो च दक्षिणहस्तेन 


ग्रहीत्वाओऋ प्रताप्य दवा निधाय स्॒॒व॑ वामहस्ते गृहीत्वा 


दक्षिणहस्तेन स्लुवबिल दर्भाग्रश्निः 


संमृज्य तथव खुबपृष्ठ दर्भाग्रेरात्मामिसुखं त्रिः संमज्य कुश मूलेदण्डस्थाधस्ताद्विलपृष्ठादारभ्य 
यावहपरिष्टाद्विल तावत्‌ त्रिः संमृज्याहरिः प्रोक्ष्य म्ताप्य घृताइुत्तरतः स्थाप येत्पुनस्तथेव स््र॒ुच॑ 


संमृज्य मोक्ष्य प्रताप्य ख़॒वोत्तरतः स्थापयेदभोानद्धिः 


क्षालथित्वाइश्नो प्रहरत ॥ स्नरुवेणाज्य॑ 


गहीत्वा होमद्व्यमभिधाये उदग॒द्रास्य अग्स्याज्ययोम॑ध्येन नत्वाध्ज्याइक्षिणतों बाहिषि 
सान्तरमासाद्य ततो, विश्वानि न इति तिरझूणां वसुश्नतोप्रिख्चिष्टप ॥ द्ाभ्यामचनेष्न्त्यथोपस्था- 
नेवि० ॥ ऊँ विश्वानि नो इुर्गहा जातवेदः ॥ सिन्ध न नावा दुरितातिपषि ॥ अम्ने अधविवन्नमसा 
टणानः ॥ अस्माक बोध्याविता तनूनाम्‌। यधत्वा हदा कीरणा मन्यमानः ॥ अमर्त्य मत्यों जोह- 


यज्ञम् मन लगाकर बेठ जाय । यजमान त्रह्मासे पूछता | 


है कि ब्रह्मन्‌ जलका प्रणयन करूंगा | यह झुनकर ब्रह्मा, 


“ओमू भू: शुवः स्वः बृहस्पति प्रसूता ता नो मुआवन्तु | 
अंहसः।” बृहस्पतिजीसे आज्ञा पाये हुए बे पानी तुमे | 
पापसे छुडादें यह मंत्र धीरे तथा पानीका प्रणयन करो यह | 
ऊँचे स्वरसे कहकर पीछे मौन छोड दे, इसके पीछे कर्ता | 


दोनों ह/थोंसे प्रणीता प/त्र॒को नाकके समीप छाकर अप्निके 


त्रोंको आज्य पात्र पर रखकर उस पात्रकों सामने स्थापित 


करे। फिर उसमें घी करके उसे परिस्तरणके बाहिर उत्त- | 
रकी ओर अंगारोंपर रखकर जछते हुए कुशोंको आज्य- | 
पात्रके चारों ओर घुमाकर आगपे पटक दे, पीछे दो | 
उल्कोंसे प्रधान द्रव्य सहित तीन वार पर्य्याप्नि कर उल्कको | 
फेंक आचमन करके अंगारोंको अम्निमें छोड दे। अंगुष्ठ | 


ओर उपकनिष्ठिकोंसे दो पवित्र छेकर, “ओप सवितुट्ठा” 
इस मत्रका हिरण्यस्तूप ऋषि है, सूर्य देवता है, पुर उप्णिक्‌ 
हन्द है, आज्यके उत्पवनमें इसक्रा विनियोग होता है। 


सविताको आज्ञामें चलता हुआ में निर्दोष पविश्रें और | 


सबके बसानेवाले सूय्ये देवकी किरणोंसे तेरा उत्पवन 


चाप घीका उत्पवन करना चाहिये। उन दोनों पवित्रोंका 
पाणीसे प्रोक्षण करके अग्निमं डा देना चाहिये। उस 


इस अथंके ऊपर लिखे हुए मंत्रको मुखस कहना वेध है 


| इसके पीछ अपने सामनकी भूमिका प्रोक्षण करके वहां ही 


उत्तरकी तरफ अग्रभाग करके वहां बहिंके बॉधनेकी र5जुको 
बिछाकर उसपर आज्य पात्र रखकर बाँये हाथमें कुशा 
और दायें हाथमें खकू के अभ्निसे तपा दर्वीको रखकर 
पीछे बायें हाथमें खुवा छे और दाये हाथमें कुश लेकर उस 


0 | खबके बिलको तीनवार शुद्ध करे | इसी तरह अपने सामने 
उत्तर रखकर दूसरी कुशाओंस ढक्क दे, उन दोनों पवि- | 


तीन वार छबकी पीठको शुद्ध करें, पीछे कुशोंकी जडोंसे 
सुवोके बिछकी पीठस छेकर ऊपरके बिछतक तीनवार 
शुद्ध करके फिर पानीसे उनका प्रोक्षण करके पीछे उन्हें 
अभ्निसे तपाकर घृतके उत्तरमें रख देना चाहिये, फिर इसी 
तरह स्रचको शुद्ध करके पीछे उसका प्रोक्षण करके ख्वासे 
उत्तरकी ओर रखदे। दर्मोका पानीसे प्रश्षाढन करके उन्हें- 
भो आगमे पटक दे । जख़वसे घी लेकर ट्ोमकी चीजोंमें 


| भिल्य दे, पीछे उसे उत्तरकी ओर उद्दासन करके घी और 
| आगके बीचमें छेजाकर घीसे दक्षिणकी ओर कुशासनके 
| कुशाओंपर रखदे । “ओपमू विश्वानि न? इत्यादि तीन ऋचा - 


ओका वसुश्र॒ुव ' ऋषि है, अग्नि देवता हें, तिष्ठुप्‌ छन्द है। 


बसानेवा | दोका पूजनर्म तथा एकका उपस्थानमें विनियोग होता है। हे 
करता हूँ। इस संत्रको एकवार बोछ कर तथा दोवार चुप- | 


जात वेद!आपहमारे सब कटष्टोंको नष्ट करते हैं आप हमें ऐस 


| पार छगा देते हैं जेस कि योग्य जहाजी समुद्रसे पार कर 


कक हर 


ली उस | देता हे। हे अम्ने जेस आपने अज्िकी नमसस्‍्कारें सुन दुःखों 
अमर यह ,स्कनदुके लिय स्वाहा हैं। यह मेरा नहीं है।' 


पार क्रिया.था इसी तरह हमारी भी सुनो एवम्‌ हम 





(३८ ) 4 ) . नााननननमनकननननं,ाे-भ मनन न नान «मनन मय न ++म मम कल 


बीमि ॥ जातवेदों यशो अस्मासु घेहि प्रजाभिरत्रे अम्नतत्वमस्थाम्‌॥ २॥ यस्मे त्व * सुकते 
जातवेद उ लोकमप्ने क्रष्णवस्योनम|॥अखिन सखपुत्रिणं वीरवन्त गोमन्ल रथिन॑ शते स्वस्ति 
॥३॥ इ्ति अष्टदिक्ष॒ गन्धपृष्पादिशिरभ्िमभ्यच्यें आत्मान चालकुत्य घ्कय। परस्थाय ततः पाणि- 
नेध्ममादाय मूलमध्याग्रेष ख्वेण त्रिरभिषार्य मूलमध्ययोमध्यमागे गहीत्वा। अयंत इध्म इत्यस्प 
मंत्रस्य वामदेव ऋषिः ॥ जातवेदोप्रिंदेवता ॥ तिष्टपूछन्दः ॥ इध्महवने विनियोगः ॥ ऊ अये त 
इृध्म आत्मा जातवेदस्तेनेध्यस्व वरद्ध॑स्व चेद्धवर्चच चास्माव्‌ प्रजया पशुभिबंहमवचसेनान्नाश्े 
समेधय स्वाहा ॥ इतीध्ममग्नावाधाय अम्नय जातवेद्स इदं न ममति त्यक्त्वा । स्त॒वंणाब्य॑ 
गहीत्वा वायवा दिशमारभ्य आम्नेयीपर्यन्तमाज्यधारां ज्हुयात्‌--प्रजापतय इति मनसा ध्यायर्‌ 
स्वाहेति लुहुयाव।तथेव निर्नतिदिशमारभ्य इेशानदिक्पयेन्त जहुयात्‌। उमयत्र भजापतय इद 
न ममेति त्यजेव ॥ तत उत्तरे। अग्नये स्वाहा ॥ अग्नय इदं०॥दक्षिणे सोमाय स्वाहा । सोमा' 
येदं न ममेत्येतावाज्यभागो हुत्वा प्रधानहोम कुर्यात्‌ ॥ ततो बह्यादिदेवतानां मंत्रेणकेकया 
आहुत्या जहुयात्‌ | बह्मणे स्वाहा ॥ सोमाय स्वाहा ॥ इंशानाय स्वाहा॥इन्द्राय स्वाह।अग्नो 
स्वाहा ॥ यमाय स्वाहा ॥ निऋतये स्वाहा ॥ वरुणाय स्वाहा ॥ वायवेस्वाहा ॥ अष्टवर्सुन्य 
स्वाहा ॥ एकादशरूद्रेभ्यः स्वाहा ॥ द्वादशादि यः स्वाहा ॥ अश्विभ्यां स्वाहा ॥ विश्वेभ्यों 
देवेभ्यः स्वाह्।सप्तयक्षेम्यः स्वाहा ॥ भूतनागेभयः स्वाहा ॥ गंधवाप्सरोभ्यः स्वाहा ॥ स्कंदाय 
स्वाहनन्दीश्वराय स्वाहा ॥ शुलाय स्वाहा ॥ महाकालायस्वाहा ॥ दक्षादिसप्तगणेभ्य स्वाहा॥ 
दुर्गायेसस्‍्वाहा ॥ विष्णवे स्वाहा ॥ स्वधायेस्वाहा ॥ मृत्युरोगेम्यः स्वाहा ॥ गणपतये स्वाहा॥ 
अद्यस्वाहा॥ मरुद्ः स्वाहापृथिय्ये स्वाहतागंगादिनदीभ्यः स्वाह्।सप्तसागरे भ्यः स्वाहा ॥मेरदे 
स्वाहा ॥ 5 ये स्वाहा ॥ त्रिशूछाय स्वाहा ॥ वज्ञाय स्वाहा ॥ शक्तये स्वाहा ॥ दण्डाय स्वाहा॥ 
खड़ायसरवाहा ॥ पाशायस्वा०।अडकुशाप स्वा० ॥ गोतमायस्वा० ॥ भरद्राजाय स्वा० ॥ विश्वा- 
मित्राय स्वाहा ॥ कश्यपायस्वाह।जमदग्नये स्वाहा ।| वसिष्ठाय स्वाहा । अच्रये स्वाहा।अरु- 
न्धत्ये स्वाहा ॥ ऐड स्वाहा ॥ कोमायें स्वह्ा।बाम्हो स्वाह॥ वाराह्मे स्वाहा चासंडाये स्वाहा॥ , 
पी मम मम मे और, मिल: श, आम, कज 
हमारॉकी रक्षा करो| | है अग्ने जो मरणशी&छ मनुष्य आपकी | नहीं है । इस प्रकार आहुति छोड़ते हुए कहना चाहिये 
२००४ नक अली ++ न 3 किलर हे इसके बाद ख्ब॒स आज्य छेकर वायुकोणसे लेकर अभ्निको: 
पूरे करते हो, हे जातबेद ! हमें बुत दो, मैं हपती हि आज जि वा 
साथ अमृतत्वको भोगू। हे जात्वेद ! जिस सुझृदीके छिये | ये स्वाहा” यह मनसे ध्यान करता हुआ ही आहतिको 
आप सुख छोक करते हैं उसे घोड़े, बेटे, बीर बहादुर पुत्र | छोडे | इसी तरह नेऋत्य कोणसे लेकर इंशान कोण तक 
पैथा अनेक तरहक घनका छाभ होता हैं जो सदा ही बना | मनसे “प्रजापतये स्वाहा” इस प्रकार कहता हुआ धीढी 
लक 30 सकि कृप। है, आठों दिशाओोमें गन्ध, पुष्प, | धारका हवन करना चाहिये कि, यह प्रजापतिका है मेरा 
से अग्निको पूजकर अपनको वस्खाभूषणोंस | नहीं है) उसके बाद उत्तरमें भी इसी तरह- हवन करनों 
व बस उपस्थानकर पीछे हाथस समिध छेढे | चाहिये। “अग्नये स्वाहा” इद्मप्ये न मम, यह मैंने अग्नि 
भी पके पे “अत इम” इस मतकों बोठकर | सोगाय साहा कह यो पल तो शिव इस, 
३ सत्तव नहीं है, इन दोनों आहुतियोंके पीछे 


* ऋषि है, जालडे बा के ९ *५ े 
० जातवंदा अप्नि देवता है. त्रिष्टुपू छन्द है, इध्मके | प्रधान होम करना चाहिये | इसके पीछे बिना मंत्रके 
हक 
है इससे आप प्रकाशित हूजिये और बढिये 
'ऋरिये। थे जि जात आहुतियाँ हैं एक एक पर एक एक आहुलिदनी चाहिंये। 


हेवनसें इसका विनियो 
ही त्द्मादिक देवताओंको एक एक आहुति दे “ओम त्रह्मण 
तथा हमे प्रजा पद्ु 
जात है. इससे मेरा | 
ब्रेंदा अश्निकी हे; इससे कुछ सी. सरा | अथ स्विष्ठक्ृद्भो मु 'ओमूयद्स्प कर्मण द्र्स मैत्रका ह्व्रिः द 


तराजः । | सामान्य 















000 नम 0727 20000 72200 60700 






किक कट 0/00/ 8708 9 





ग॒ होता है । है जातवे है 
आपकी आस्मा है इससे २०५ ७ पिच यह इध्म ४३३32 पक पल | 
पक यहास लकर ' अ बता ह १) थ तक 
< अर प्रद्मतेजेस बढाकर प्रकाज्ित म्‌ वेनायक्ये स्वाहा ” यह 


परिषाभा, ] भाषाटीकासमेतः । 






ः 5 की !कद्धोम विनियोगः ॥ 
७ यदस्य कर्मणोत्यरीरियं यद्दा न्यूनमिहाकरम॥अ प्रिष्टात्स्विष्टऋद्धिदान परव स्वि्टं खुहुतं करोतु 
मे ॥ अम्नये स्विष्टकृते सुहुतहुत सर्वभायश्रित्ताहुतीनां कामानां समद्धथित्रे सर्वान्न कामान्‌ 
समधेयस्वाहा॥अगम्नयं स्विष्टकुत इद न०।त्रिसन्धानेन रूद्र४*हद्राय पशुपतये स्वा०। रूद्राय पशु- 
पतय इदनमम ॥ अप उप्पृरय । खुबवेण प्रायश्वित्ताज्याहुतीः सप्त ज्ुहुयाव॥तत्र मंत्रा॥ अया- 
शेत्यस्य मंत्रस्य विमद ऋषिभाअयाव्भिदेवता ॥ पेक्तिदछन्दः ॥ प्रायश्चित्ताज्यहोम विभियोगः ॥ 
अ अयाश्राभ्स्यनमिशस्तीश्र सत्यमि त्वमया असि॥ अयसा वयसा कृतो यासव हव्यमृहिषे 
अयानो थेहि भेषजं स्वाहा । अयसेषग्नयइद्‌० । अतो देवा इति द्योः काण्वों मेघातिथिऋंषिः । 
आय्याया देवा देवताः ॥ द्वितीयाया विष्णुदेवता ॥ गायत्रीछन्दः ॥ प्रायश्रित्ताज्यहोमेबि० ॥ 
३० अतो देवा अवन्ठ नो यतो विष्णुविचक्रमे ॥ प्रथिव्याः सत्धामानिः स्वाह॥देवेन्य इद न० ॥ 
४ इद विष्णावचक्रमे त्रेधा निदधे पदम्‌ ॥ समूठ्हमस्यपांखुरे स्वाहा । विष्णव इढं० ॥ व्यस्त- 
समस्तव्याहतीनां विश्वामित्रजमद्प्रिभरद्राजप्रजापतय ऋषयश।अशिवायुसू यैप्रजापतयो देवताः। 
गायच्युष्णिगलुएवब्बू हत्यश्छन्दांसि ॥ मायश्रित्ताज्यहो मे बि० ॥ ऊँ भूःस्वाहा अग्नयइदं० ॥ ऊँ 
झुबः० वायवइद्‌ ॥ ३ स्व: स्वा९ सूयोय्रेदं> ॥ % नभूसुवः स्वःस्वाहा अजापतयइदं ॥ ततो 
ब्रह्मा कतार परीत्याग्नेबायव्यदेशे तिछन्रेता एब सताहुतीज्ञेहुयादात्यागं यजमानोषत्र कुर्याव ॥ 
अनाज्ञातमिति मंत्रदयस्य हेरण्यगल ऋषिः ॥ अग्नि्दवता! विश्प्छन्दः ॥ ज्ञाताज्ञातदोषर्पारे- 
हाराथ पायश्रिताज्यहोम वि० ॥ ७ अनाज्ञातं यदाज्ञातं यज्ञस्य क्रियत मिथ ॥ अग्ने तदस्य 
कल्पय त्व* है वेत्थ यथातथन्‍्स्वाहा ॥ अग्नयइ० ॥ ऊयुरुवसंमितों यज्ञो यज्ञ: पुरषसंमितः ॥ 


( है९ ) 
. मंत्रस्य हिरण्यगर्न ऋषिः।। अग्नि: स्विष्ठटकदेवबता ॥ अति पतिइछन्द ॥ रि प्रच्धकः 


ण्यगभ ऋषि हे, स्विष्टक्त्‌ अप्नि देव है, अतिधृतिछन्द हे, 
स्विष्टक्तत्‌ होममें इसका विनियोग होता है। इस कम्मका 
मुझसे कुछ बाकी रहगया हो या उसमें मुझस कुछ न्यूनता 
आगयी हो तो उस संभालनेवारूा ज्ञाता स्विष्टकत्‌ अग्नि- 
देव, सबको अच्छा कर दे | यह विधिके साथ किये गये 
हवनको ग्रहण करनेवाले सबी प्रायश्रित्तकी आहुरतियोंके 
कार्मोंका समर्थन करनेवाले एवम्‌ अच्छी इष्टी करनेवाले 
अग्नि देवके लिये है। हे अग्ने |! हमारी सब कामनाओंको 
पूर है. ३ जप  ध 
रा करिये.यह अच्छी इष्टी करनेवाले अग्निक छिय हैँ । 
मेरे लिये नहीं हैं । इससे तीन बार सन्धान करके पीछे 
पशुपति रुद्रके लिये स्वाहा है यह पशुपति रुद्रके छिय हैं 
मेरा नहीं हे इससे एक आहुति देकर पीछे हाथ पैर धो 
डाले । पीछे खुवेसे सात प्रायश्चित्तकी आहुतियों दे | इन 
सातों आहुतियोंके भिन्न भिन्न मंत्र हैं। उन्हें यहीं मूलमे 
लिंखा हे । उनके अर्थ यहां लिखते हैं । “ओम अयाश्थ” इस 
मेत्रका विमद ऋषि है, अया अग्नि देवता है, पेक्ति छन्द्‌ 
है, प्रायश्चित्तके आज्य होममें इसका विनियोग होता है। 
हे अयास्‌ अग्ने, आप हमारी बुराईको दूर करना; क्योंकि 
आप वास्तवर्म अयास हो तथा आप वयससेभी अग्यास हो 
परिपृूण हविको देवोंमें पहुँचाते हो । हे अयास्‌ ! 
हमारे लिये भषजकों धारण करो। “ओमू अतो देवा 
लथा ओम इद विष्णुविचऋमे' ? इन दोनों मंत्रोंके काण्व 
संधातिथि ऋषि हैँ, पहिलेके देव तथा दूसरके विष्णु देव 
देवता, हैं, गायन्नी छन्द है; प्रायश्वित्तके आज्य होममें इनका 
विनियोग होता है। हे देवताओं | आप हमारी उससे रक्षा 


कर जिसस विष्णु भगवान्‌ प्रथिवीके सातों थासों 
पर चल्लेथ । यह दवोकी है ॥मेरी नहीं है, श्री विष्णु भग- 
वान्‌ अपने छोकसे चले ओर आहवनीय आदि तीनों 
कुण्डोंम अशसे आ विराजे, बाकी निद्य धाममे रहे ॥ यह 
विष्णु भगवानकी हैं मेरी नही है। भू। भुव+ स्वः इन 
तीनों व्याह्ृतियेमिंस एक एकके ऋषशः विश्ाम्ित्र, जस- 
दग्नि और भरद्वाज ऋषि हैं, अग्नि वायु और सूर्य देवता 
हैं, गायत्री उष्णियू और अनुष्टुप्‌ छन्द हैं तथा तीनोंके एक 
साथ रहने पर प्रजापति ऋषि, प्रजापति देवता और बृहती 
छन्द है, प्रायश्रित्तके आज्य होममें इनका विनियोग होता 
हे । ओम भू: स्वाहा अम्नये इंद न मम-यह अग्निके छिय 
है मेरी नहीं हे। भोम्‌ भुवः स्वाहय वायवे इदे न मम-यह 
बायुके लिये हे यह मेरी नहीं है । स्वः स्वाहा, सू््योय इद्‌ं 
न मम-यह्‌ सूय्यके लिये हैं मेरी नहीं हे। ओम्‌ भूभुवः 
स्व: स्वाहा प्रजापतय इद न मम-यह' प्रजापतिके लिये ह 
मेरी नहीं हे। इसके पीछे, ब्रह्मा कर्ताकी प्रदरश्षिणाकर 
अग्निंसे वायव्य देशमें बेठकर इन सातों आहुतियोंको हवन 
करें और यहां आहुति-तद्याग थजमानही करें। “ओम 
अताज्ञावम्‌” इन दोनों मंत्रोके हिरण्यगभ ऋषि हअ ग्निः 
देवता है, त्रिष्टुप्‌ छन्द है, जाने और बे जाने दोषके निवा- 
रणके लिये प्रायश्रित्तके आज्यहोममें इनका विनियोग होता 
है। हे अग्ने | इस यज्ञमें जो जानुके विनाजाने दोष हुआ 
हो आप सबको यथावत्‌ जानते हैं; इस कारण आप उसका 
निवारण करदे । यह अग्निके छिये हैं) भरी नहों है, पुरु- 
हा कप बे अम्ने | ज्ञकी ह. री 
घषस यज्ञ तथा यज्ञस पुरुष होता हैँ । हे अग्न  यज्ञका सर 





(० पत्र ककवण 767 ६: जैव र० पाए 


श््ल्ाम््थध्प्थ्पप्थ््य्य्््य्थथ्ल्््मार आई 5 








अग्ने तदस्थ कल्पय॑ त्वश्हि वेत्थ यथातथश्स्वाह्माअग्नयइ०॥ यत्पाक्रेत्यस्य मंत्रस्य आप्त्या- 


$ ०, 


ख्वित ऋषिः ॥ 


बलतराज: | 


कद ३ ् श 
तक) धमच्य, गा 22002: ० 9७9७3333 29 03,30%94200550333:-++ 2-35  - न ० ००५७-५४ ५५2८८ ५५.५3 मनन आह ५9 शक पद 22% ७ ४ 


है बला ड्ल्यय ष्न्फु 
आगिदवता ॥ तिष्दुप्छदः ॥ मात! ्ञातदश्यप 





22244 १8 22 8:70 कटी ० शत (०2002: 2:क्‍ चैक जी न श्र 


आप के 
ब्््त व बड़ झा छ ँ 
हा 


5! मल 8 शा 
शा बंद ४ पक आह ॥ हा कद] दी ह कार धह ए धा २५१०५ ;९" फोर 
हशुथ अआायबचाज्यट्रारायिण | 


 यत्पाकत्रा मनसा दीनदक्षा न यज्ञस्य मचवते मर्तास:॥अग्निष्ठद्धो ता ऋत॒विद्विजानन्यजिष्ठ 
देवा: ऋतुशो यजाति स्वाह्ा।अग्नयइढं॥यद्दों देवा इत्यस्यथ अभितपा ऋषिः॥ मरूतो देवताः॥ 


जिटृप्छल्दः ॥ मंत्रतेत्रविषयोखादिनिमित्तकप्राय श्वित्ताज्य हो मेजि० ।। ऊँ यद्दो 


देवा अतिपातयातनि 


वाचा च प्रयुती देवहेव्यनम्‌ू ॥ अरायो अस्मों! अन्निदच्छ तायतेन्थत्राल्मिन्म रूतस्तत्रिधेतत 


स्वाहा ॥ मछरुझय इद न ममेति त्यजेत ॥ ततः 


कता पूणाहुर्ति जुहुयात्‌ ॥ 


तद्यथा--स््रुवेणाज्य 


गहीत्वा खच॑ द्ादशवारं चतुवारं वा प्रयित्वा तस्यां खबमूध्यबिल निधाय पुनरधोविह 


निक्षिप्य ख्॒वाग्रे पुष्पाक्षषफलसदितं तांबे 


कर 


तय सत्यपाणिना ख्क्स्म॒वमूले ध्षत्वा दक्षिण 


पाणिना खुक्स्॒व॑ शंखमुद्र॒या ग़हीत्वा तिष्ठन॥ झुवाग्रन्यस्तदाष्टि, धाम ते वामदेंव आपोजगती। 
पूर्णाहुतिहोमेवि०॥#धाम॑ ते विश्व॑ शुवनम विश्वितमन्तश्समुद्रे हृद्यस्तरायथषि । अपामनीके समि 
थे आध्तस्तमइ्याम मडुमन्त त ऊमि<स्वाहेति पठन्यवपरिमितां धारां ख्रुगप्रेण सनन्‍्ततां सश्ें . 


हुत्वा अद्य इृद न ममेति त्यकत्वा विश्वेश्यों देवेश्यः 


स्वाहेति संज्लाव हुत्वा विश्वेभ्यों देवेभय 


इदू न ममेत्युकत्वा वहिंदि पूर्णपात्र निधाय दक्षिणपाणिना स्पृशन्‌॥ ऊँ पूर्णमस्ति पूर्ण मे भूया 


सुपू्णमसि खुपूर्ण मे भूथाः ॥ सदसि सम्मे भूयाः 


मा मेक्षे्ठा॥। इति जपित्वा कुशाओ: 


की कि. हि 


 सर्वेमासे सब में भूयाः ॥ आश्षितिराप 


भागादिजु दिक्ष मंत्रेजलश यथालिड्ं सिश्वेत ॥ ते च मंत्रा।- 


ई प्राच्यां दिशे देवा ऋतिजो मार्जयन्ताम्‌ ॥ दक्षिणस्यां दिशि मासाः पितरों मार्जयर्ताम । 


अप उपस्पृश्य ॥ प्रतीच्यां दिरी ग्रह: 


पशवो मार्जयन्ताम ॥ 


हट 


उदीच्यां दिश्याप ओषधयो मार्ज॑ 


यन्ताम्‌॥ उध्वायां दिरी यज्ञः संवत्सरः भजापतिमाज॑यतामिति-तत ----- लि तत एकथुत्या पठन कुशाग्र 
जगत फू 777 न नियत 


तुटियोंकों अप जानते हो आप यज्ञक्रों निर्देव करदे | यह 
ञ ये ४५ धर ब्ड 
अग्निक लिय है मेरी नहीं है || ८ ओमू यत्पाकत्रा ” इस 
मत्रके आप्त्य त्रिव ऋषि हैं,अग्नि देवता है, त्रिष्टुपू छन्द है, 
ज्ञात ओर अज्ञातः दोषके परिहारके किये प्रायश्रित्तके 
आज्यहोमर्म इसका विनियोग होता है। जो विशिष्ट ज्ञान 
रहित मनसे दीन दक्ष भनुष्य यह समझते हैं कि, हमने 
पह्का सब ठीक कर दिया हें पर यज्ञके जाननेवाले देव- 
ताओंके यजन्‌ करनेवाले अग्निदिव उसकी सब घ्ुटियोंको 
जीनत ६, ऐस अग्नि देव ही देवताओंका यतन ऋतु ऋतु 
0५ करते हैं। यह आहुति अग्निके छिये है 
“ओम  यद्वो देवा? इस मंत्रका असितपा ऋषि है, मरुत 
देवता है, त्रिष्डुपू टून्द हैं; अशुद्ध मेत्रक बोनस जो प्राय- 
शित्त होता है उसके हॉममें इसका विनियोग होता है । ह 
दवो । मैंने जो पाणीस संत्र बोलनेमे गलती की हैं उससे 
हनवाल पापने जो हमारा अनिष्ट शोच रखा है, है सरुतो ! 
3 इससे दूर कर दो । यह मरुतोंके छिए हे मेरी नहीं है। 
ह का भ् यों को दनेके वाद पूणाहुति दे । पृर्णाहुति कस 
द्‌ बे सो खिखते ह“जुवास बारह वार या चारवार 
सीधा स्रदा 2 पी रे 

जग आर फिर उसे ओंधा रखदे, पीछ खस्कूके 
५ अक्षेत्र और ताम्वूल रखकर सत्य हाथस 

2 और खूपके मूक, रखंकर दाथे ५ ताप 
पूडंक लुत्र खकूको रे इसी पे के दायें हाथसे शेखमुद्रा 
४ 75 5 पर्रर हाई जमाकर बेठ जाय, 


ह मेरी नहीं हे । | वि 


खकूके ऊपर | दि 


आम पास ते” इस संत्रका वामदेव ऋषि हे,आप देवता है 
जंगती छन्द्‌ है, पूर्णाहुतिके होममें विंनियोग होता है। हे 
जल देव | तेरा तेज अबत्रिढ्व विश्व फैला हुआ है, समुद्रक 
हेदयक भीतर आपका आयु है मीठी जो तेरी ऊर्मि पानी 
समुदायमे है, में उसीका भोग करता हैँ | इस मंत्रको 
अहता हुआ जोक बराबर धारा तब तक अश्निमें पड़ती 
रहे जबतक्‌ कि थोड़ासा बाकी न रह जाय, जर देवके 
लिय यह हूँ भेरा नहीं है, यह कहकर आहुति दे दे-“ओम्‌ 
श्भ्यो देवेभ्य: स्वाहा” इस मंत्रसे संखावका हवन कर्‌ 
है यह बिश्वे देवाओंके लिये है। पीछे कुशाओं पर पूरे 
प्राजरकी रखकर, उसे दाँये हाथसे छूते हुए कहना चाहिं 
कि, तू पूर्ण है मेरा भी पूरा हो, तू सुपर्ण हें मेरा भी सुपण 
व पदू हैं, मेरा भी सदू हो, तू सब है, मेरा भी सब 
है) दे अक्षिति हे, मुझे भी अक्षय करदे, इस प्रकार जपकर 
:प दिशाओंमे उनके मत्रोंसे कुश जछू छिडकना चाहिये। 
वे भन्न ये हं-ग्राची दिशामें सुयोग्य ऋत्विजों मार्जनकरें। 
दक्षिण दिश्ञाें मास और पितर म्ाजन करें। पश्चिम 
शाम अह और पशु माजेन करें। उत्तर दिशामे आप 


अपषिधि ओर वनस्पति प्ाजेन करें। ऊध्वे दिशामें यह्ञ 
संवत्सर 


+* बाद एक स्व॒रस लीच छिखे हुए “४ आपो अस्माव 
मात्र: ” इत्यादि भन्नोंद 


९ सजापति ज्ाजेन करें। दिशाओंक मार्ज- 


श्र ५  ' 
रा कछुशजछसे अपना माजने 


परिमापा, | भाषादाकासमंत्र: । ९ ढेर) 


स्वशिरसि मार्जयेत्‌ ॥ तंत्र मन्ता+--आपो अस्मानित्यस्य देवश्रवा आपशब्िष्टुप्‌॥ माजेने वि०॥ 
४ आपो अस्मान्मातरः शुन्धयन्तु घुतेन नो वृतप्वः पुनर्तु ॥ विश्व हि रिम्रे भ्वहत्ित देवी 
रादिदाभ्यः शुविरापूत एमि | इदमापः सिन्धुद्वीप आपोषलुष्टुपू॥ माजेने बिं० ।| ऊ इृदमापः 
प्रवहत यत्किच दुरितं मयि ॥ यद्राहमामिदुद्रोह यहा शोप उतानूतम्‌ ॥ झुमित्या न आप 
आओबषधयः सनन्‍्तु ॥| दुर्मिच्यास्तस्मे सन्तु॥योस्‍्मान्द्रिष्टि य॑ च व द्विष्मस्तं हनमीति निऋतिदेशे 
कुशाम्रेरपः सिश्वेव। ततो ब्रह्मा कर्वृवामपाश्वस्थितपतत्यजलों पूर्णपात्रस्थं जलमू--७४ माहं प्जां 
परासिय या न। सयावरीम्थ नः ॥ समुद्रे वो निनयानि सवे पाथो अपीथ॥ इति मंत्रमेकश्र॒त्या 
पत्न्या वाचयन्‌ स्वयं वा पठन्‌ प्रत्यद्सुख॑ निषिच्याजअलिस्थजलेः पापापनोदनारथ मात्मान 
यजमान पत्नी च मोक्षेत्‌ ॥ पत्नी तज्जलं बहिंषि निषिच्चेत ॥ अथवा यजमान एव बर्िष्युत्तानं 
स्ववामपाणें निधाय दक्षिणपाणिना पूर्णपात्रमादाय माह प्रजामिति तज्जलं तस्मिन्प्रत्यड्मुखं 
निषिच्य ता आपः समुद्र गच्छनतीति ध्यात्वा पाणिस्थजलेरात्मान पत्नी च श्रोक्षेव ॥ ततः 
कर्ता वायव्यदेशे तिष्ठन्नश्निम पतिष्ठव ॥ तद्यथा-अम्ने त्व॑ न इति चतछणां गौपायना लोपायना 
वा बन्धु) सुबर्धुः श्रतवन्धुवित्रबन्धुश्रेकेकचा ऋषयः ॥ अग्निर्देवता ॥ द्विपदा- विराट्छन्दः ॥ 
अग्य्युपस्थाने बि० ॥ ऊँ अग्ने त्व॑ नो अंतम उत चाता शिवों मवावरूथ्यः ॥वसुरग्निर्वसुश्रवा 
अच्छानक्षिद्यमत्तमं राये दा॥॥ स नो बोधि श्रधी हवमुरुष्या णो अधायतः । समस्मातद। त॑ त्वा 
शोचिष्ठ दीदिवः सुझक्षाय नूनमीमहें सखिल्‍्यः || ऊ च मे स्व॒रश्व मे यज्ञोप च ते नमश्व ॥ यत्ते 
न्यूनं तसमे त उप यत्तेईतिरिक्त तस्मे ते नमः ॥ ३४ स्वस्िति श्रद्धा मेधां यशः भज्ञां विद्या बुद्धें 
शिय बलमाआयुष्य॑ तेज आरोग्य द॒ृहि में हृव्यवाहन॥ मा नस्तोक इति मंत्रस्य कुत्स ऋषिश॥ 








करना चाहिये। “ओम आपो' अस्मान्‌” इस मेत्रका दवश्रवा 
भ्के ्छ_ कर ४९३ 
ऋषि है, आप देवता है त्रिष्टप्‌ छन्‍्द्‌ है, साजनम विनियोंग 
होता है । संसारकी माकीसी पाछत करनेवारके आप हमें 
प्रोक्षणसे शुद्ध करें। जलसे पवित्र करनेवार्लीं जलूस पवित्र 
करें, देवी आप, मेरे सब अनिष्टोंको दूर कर रही हैं, में पा- 
नीसे पवित्र होकर ही खग जाऊंगा। “ओम इृद्माप/? इस 
मेत्रका सिन्धुद्वीप ऋषि है, आप देवता हैं, अनुष्डपू छन्द 
है, माजनमें इसका विनियोग होता हे। हे जछो | गे भी 
कुछ भेरेमें दुरित हैं उन्हें बहा छजाओ, जो मन कि से 
झूठा बर किया है, तथा किसीको झूठी गाली दी है अथ व 
जो मुझसे करते हों, इस पापसे मुझे छुटादें, हमें आप और 
ओषधियां अच्छे मित्रवाली हों; दुखदायी उसे हों जो 
चर ्शै्‌ दो ७ $ ब्क 
हमस बंर करता है या जिससे सबेर करता हूं। व उसे 
मारता हूँं। यह मंत्र कह कर नऋ्यकोणम कुशाओं पानी 
छिड़क दे. इसके पीछे त्रह्माजी यजमानके बाये पाश्चम् बैठी 
हुई यजमानपुत्नीकी अजहछिमें पूणपात्रके पानीको “ओमू 
माह प्रजाम्‌” इत्यादि मंत्रको पूरवको ओर मुखऋरके कहता 
हुआया ऋहछातहुआ भरदे । मत्राथ-मे अपनी उस प्रजाको 
परे न फेंकू जो कि, मुझे प्राप्त हो रही हे, हम तुम्हें समुद्रमें 
छेजायेगे वहां आप अपना पीना । इसके पीछे ब्रह्म/को 
चाहिये कि, उस जछसे पाप निवारणकेलिय अपना;और 
यजमानपत्नीका प्रोक्षण करदे, पीछे यजमानपत्नी उस 
पानीको कुशाओंपर छोड दें। अथवा यजमान ही पूर्वा- 
६ . 


भिमुख अपना बाँया हाथ सीधा कुशाओंपर रखकर सीधे 
हाथम पूण पात्र छेकर “ ओम ्‌ माहं प्रजां परासिच या नः 
सयावरीस्थनः सपद्रे वो निनयामि स्व पाथो पीथ ” इस 
मेत्रको बोछता हुआ पत्नोकी अजलीमें पानी छोडता 
हुआ पानी सपुद्रको जारहे हैं. ऐसा ध्यान करके अपना 
और पत्नीका दोनोंका प्रोक्षण करना चाहिय | इसके पीछे 
कर्ता वायब्यमें बैठा हुआ उपस्थान करे । “ ओमू अम्ने 
त्वनो इत्यादे चार सेत्रोंक ऋमते गौपायन, छोौपायन अथ- 
वा-बन्धु, सुबन्धु, श्रतचन्धु और विप्रबन्धु ऋषि हैं । अग्नि 
देवता है, द्वियदा विराट छन्द हैं, अभ्िके उपस्थानमें इसका 
विनियोग होता हैं । है' अग्नेदिव ! आप हमारे त्राता तथा 
निवान्त रक्षक हैं आप सप्न॒दायके रक्षक हैं घनकीकीर्ति 
वाले तथा घन ह आप हमें ब॒क्षाइये आपही हमें देवताओंके 
उत्तम धनके देनवाले हैं।हमारे बेरी हमें चारों ओरस 
दवाना चाहते ह, आप उन्हें देखें, एवम्‌ हमारे आह्वानको 
सुने॥हे प्रकाशशील ! ऐसे तुझे स्वर्गीय सुखकेडिय बुला रहे 
हैं कि, हमें और हमारे साथियोंको अद्भुत सुख हो। च ओर 
स्वर मेरे लिये हों। हे यज्ञ | तेरे छिय नम £कार है,जो तेरे- 
लिये कम है उस तेरे तथा जो तेरे छिये ज्यादा हे उस, 
तेरे लिय नमस्‍्कार हे। हे हव्यवाहन ! स्वरि त, श्रद्धा, 
मेधा, यश, प्रज्ञा, विदा बुद्धि, श्रीबछ, आयुष्य, तेज और 
अरोग्य मुझे दे  सानः स्तोक्े ” इस मंत्रके कुत्सऋषि हैं 


चुत न्यंबधरधया -4>-० 3 2०५७००2:०००००--० ४ “मनन ये पं 








१ ही 5११22 72% /77227: “677 अकटम ६872 “7775207/% 77१४० ५४४ बरुर4 [सर न 


4५ 4 
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रुद्रों देवता ॥ जगतीछन्द्‌॥ विभूतिग्रहणे वि०॥ मा नस्तोके तनये मा न आयो मा नो गे! 
मा नो अश्वेषु रीरिषः ॥ वीरान्मा नो रुद्र भामितोवधीहेविष्मन्तः | सदमि त्वा हवामह्दे । 
ज्यायुष॑ जमदसमेरिति ललाटे ॥ कश्य पस्यत्यायुषमिति कण्ठे ॥ अध्स्त्यस्य ज्यायुषमिति 
नामों ॥ यदेवानां ध्यायुषमिति दक्षिणस्क हु । तन्‍्मे अच्तु व्यायुषमिति वामस्‍्कन्धे ॥ सई॑ 
मस्तु शतायुषामेति शिरासि ॥ इति विभूति धृत्वा परिस्तरणान्युत्तरे विछ॒ज्य परिसमुद्य ३ 
पयुक्ष्य रे; पुष्पादिनिरलंकृत्य नेवेधं वाम्बूल॑ च निवेध्य-यरु्य स्मृत्या च 'नामोत्तय 
तपोयज्ञक्रियादियु ॥ न्यून संपूर्णां याति सद्यो वन्दे तमच्युतम ॥ प्रम दात्कुवतां कम 
प्रच्यवेताध्वरेषु यत्‌ ॥ स्मरणादेंव तद्ठिष्णोः सम्पूर्ण स्यादिति श्रातिः ॥ इते विष्यु: नर 
स्मृत्वाचानेन कमणा श्रीपरमेश्वरः प्रीयतामित्युक्त्वा-गच्छ गच्छ सुरश्रेष्ठ स्वस्थाने परमेश्वर। 
यत्र बह्मादयों दवास्तत्र ग़च्छ हुताशन ॥ हृत्यश्रि विखुजेत्‌ ॥ एवं होम॑ संपाद्य उत्तरपूत 
कृत्वा आचाये संपून्ष्य गां दद्यात--यत्नसाधनभूता या विश्वस्याधौधनाशिनी ॥ विश्वरूपषो 
देवः प्रीयतामनया गवा ॥ इति ॥ ततो ब्राह्मगभोजन संकरुप्य ॥ यान्तु देवगणाः से क्‍ 
पूजामादाय पायिवीम्‌॥ इष्टकामप्रसिद्धयथ पुनरागमनाय च ॥ इति स्थापितदेवतां विसत 
पीठमाचायाय दद्यात्‌ ॥ इत्यनिमुखम ॥ 
अथ घुद्रालक्षणम्‌ || 














हेमाद्ौ--संमुखी कृत्य हस्तो दो किंचित्संकुचितांगुली॥ म॒कुली तु समाख्याता पड़ज॑प्रसतो 


सा॥ पवॉक्ता मुकुली या व पादेशे निःछतांगुलि॥ 


व्याकोशमुद्रा मुकुला पद्ममुद्रा प्रकीतिता। 


अंगुष्ठो कुश्चितान्तो तु स्वकीयांगुलिवेष्टितो ॥ उच्चावभिप्ठुतरो हस्तो योजयित्वा त निष्ठरा | 


तजंन्यों कुचिते कृत्वा तथेव च कनीयसी 


विनियोग होता है । हे रुद्र, हमारे तोक, तनय आयु 
गो ओर अश्वोर्तें मारनेका भाव न करियेगा न हमारे 
क्रोधी बीरोंकोही मारियेगा, क्यों कि हम आपको सदा ही 
अपने घरपर बुढाते रहते हैं “ ओमू ज्यायुष॑ जमदसे: '! 
इस मंत्रस छलादर्म “ ओम कद्यपस्य ज्यायुषमू ” इस 
मंत्रस केठमें * ओम अगस्यस्य ज्यायुषम्‌ू ”” इस मंत्रसे 
नाभिसें  ओमू यंहेवानां अ्यायुषम्‌ ” इस मंत्रसे दाँये 
कन्घेपर “ ओमू लनन्‍्में अस्तु ज्यायुबम्‌ ”? इस मंत्रस बांये 
कन्धेपर एवम्‌ “ ओम स्वेभस्तु शतायुबम्‌ ” इस मंत्रसे 
शिरपर विभूति रूगाना चाहिये । अथे-जमदप्नि, कश्यप, 
अगस्त्य ओर देबोंके तीनों आयुष्य हैं वे सब मेरे आयुष्य 
हों सब शतायु हों। विभूति घारणरे बाद उत्तरमे परि 
स्तमोंकों छोडकर तीनवार परिसमूहन और प्रोक्षण करके 
पीछे फूलोसि अलूंकृत करि, नेदेय और पानका निवेदन 
करके भगवानदी प्राथेना करनी चाहिये कि, जिपके 
 स्मरणसही यज्ञ दान तप आदिकी न्यूनता शीघ्र पूरी हो 
जाहीं है, के उस अच्युतक लिय नमस्कार क्रता हूं । यज्ञ 
ऊमे इरवे हुए हमसे प्रसादक वश होकर कोई गछतीहो तो 
हा केक स्तररणसे पूरी हो जाय। पीछे विष्णु 
दि बाज पल कहना 'चाहिय कि इस कसंसे 
'ओ॥ है परमश्वर | हे सुरश्रेष्ठ ! 


हा अपने घामको पधारिये। हे हुताशन ! जह| ब्रह्मार्दिक 


॥ अधोमुखी दृष्ठमखा स्थिता मध्ये करस्य तु। 
रद देबतादे। जगती छन्द है, विभूतिक प्रहणते इसका कण 7 [7777 देवताहे) जगती छन्द हैं, विभूतिके प्रहणमें इसका | 


देवता गयेंहों वहांही आप भी पघार जाइये । इस 
आकार अभिक्ा विसजन करना चाहिये । इस प्रका 
होपका संवादून करके उत्तर पूजा कर तथा आवचार्य्य॑त्षा 
पूजन करके उन्हें गाय देनी चाहिये, “ यज्ञसाधनभू' 
ताया:!” यह गों दानका मंत्र हे कि, जो यज्ञकी साधन गे 
हैं, सारे पापों का नाश करनवाली है, ऐसी गऊके दान 
विश्वहपघारी भगवान्‌ प्रध्नन् होजायँ । इसके बाद जा्षग 
भोजनका संकल्प करके “यान्तु देवगणा:?? इससे दवोंढा 
विसजत करना चाहिये कि, सब देवगण मेरे इष्ट कार्मोको 
सिद्ध करनेके ढिय तथा फिर आनेके छिये मेरी पाशिबी 
पूजा छेकर अपने अपने छोऋको जाये ) [ केवछ गणप्‌. 
तिजी ओर छक्ष्मीजी रह जाये] देवविसर्जन करनेके पीढे 
पीठ आचायके छिये दे देना चाहिये। यह, अम्निमुखका 
विधान पूरा हुआ | 

मुद्राओंका रश्नण हेपाद्विसे कहते ह--जिध्षम दोनो 
ह।थोंको सममने करके अंगुडियॉको कुछ संकुचित करते 
रखते ह उस“मुकुलीमुद्र। कहते ह “ पैकजप्रसता ” भोः 
इसीका नाम है ।जिस मुऊुछीमुद्रामें प्रदेशर्म अगुलिय 
निकलने हुई हों तो “व्याकोशमुद्रा तथा कलीकीतरहखिली 
हुई हो, तो “पद्ममुद्र।” कहते हू । जिसमें अंगूठ कुछ सिकुई 
हुए हों तथा अपनी अगुल्सिवष्टित हों, दोनो हाथ सामने 
ऊँचे जुड़े हों, उस “निष्ठरा” मुद्रा कह। हैं। जिसमें दोनों क्‍ 
तजनी तथा कन्रीयसी अगुढी सकुचित हो, जिनके कि न. 
दीख रहे हों वो हाथक मध्यम, हो, इसे “ अधीमु्ी 


परिभाषा, | भाषाटीकासमेतः । 











चतस्रश्वोत्यिताः पृष्ठे अंग्रष्ठाबेकतः कुर ॥ नाल व्यवस्थितों हो तु व्योमझुद्रा परकीर 

न्त्राज्तरे सर्वदेवतापूज़नसाधारण्थेन षण्सुद्रा डच्यन्ते।देवताननसलंतुष्ठा सर्वदा संसुर्ख 
अंगृष्ठो निश्षिपेत्सेयं मुद्रा त्वावाहनी मता ॥ संग्रथ्य निक्षिपेत्सेयं झुद्रा त्वासनसंस्ति धो 
मुखी त्वियं चेत्स्यात्स्थापनीछुद्रिका मता ॥ उच्छितावाच्छितों कुर्यात्संसुखीकरणी भवेत्‌ ॥ 
प्रख्तांगलिकों हस्तों मिथःछिष्टो ठ संगुखों ॥ कुर्योत्स्वहृदये सेय॑ झुद्ठा भ्ाथनसंज्ञिका॥ इत्यव॑ 
सर्वेदेवानां पूजने षट प्रदर्शयेत।शिवपूजने लिड्रमुद्रा।उच्छित दाक्षि णांगुप्ठ वार्मांगज्ेन बन्धयेत॥ 
वामांगुलीदंक्षिणानिरगुलीमिश्व वेष्टयेत्‌ ॥ लिट्ल्‍डसुद्रोति विख्याता शिवसात्रिध्यकारिणी ॥ 
श्रीकामः शीरष्णि कुरवीत राज्यकामस्तु नंत्रयोः॥मुखे त्वन्नादिकामस्तु औआीवायां रोगशाग्तिकृता 
हृदये स्बकामी च ज्ञानार्थी नामिमण्डले ॥ राज्यकामस्तु ग॒ुह्ये च राष्ट्रकामस्तु पादयोः ॥ 
रामपूजने सप्तदशमुद्राः ॥ तथा च्‌ रामाचनचन-्द्रिकायामगस्त्यः-आवाहनी स्थापनी च 
सन्निधीकरणी तथा ॥ छुसानिरोधिनी मुद्रा संमुखीकरणी तथा ॥ संकलीकरणी चेव महाऊ॒द्रा 
तथव च ॥ शाइ्डचक्रगदाप्रपत॒कोस्तुभगारुडाः ॥ श्रीवत्सवनमाले लव योनिसुद्राः भ्रकी- 
तिता ॥ एतानिः सप्तदशमिसंद्राभिस्तु विचक्षण:॥ यो राममर्चयेन्नित्य॑ मोदयत्स छझुरे- 
वरम्‌ ॥ द्रावयेदषि विभेन्द्र ततः प्राथितमाप्लयात ॥ मूलाधाराहादशान्तमानीतः ढुरुमा- 
अालिः ॥ तिस्थानगलसेजोमिविनीतः प्रतिमादिषु ॥ आवाहनी च मुद्रा स्थादेवार्चनविधों 
मुने ॥ ए्पेवाधोसुखी मुद्रा स्थापने शस्यते पुनः ॥ जउन्नतांगछयोगेन सुप्ठीकृतकरदया ॥ 
सत्निधीकरणी मुद्रा देवाचनविधों सुने ॥ अंगुष्ठगालिणी सेव झुद्रा स्यात्सब्रिरोधिनी ॥ उत्तान- 
मुहियुगला संमुखीकरणी मता ॥ अड्लेरेवाड्रविन्यासः संकलीकरणी भबेत ॥ अभ्योग्याँगछ- 








संलग्रविस्तारितकरद्॒या ॥ महाम॒द्रेषमारुपाता न्यूनाधिकसमापनी ॥ 


मुद्रा ” कहते हैं । चारों अगुलियाँ पीठकी तरफ उठी हुई 


हों, दोनों अगूठे एक तरफ हों,पर दोनों अच्छीतरह व्यब- | 
स्थित न हों, इसे ४ व्योम मुद्रा ” कहते हैं। अन्य त्न्त्र | 
अन्थोंमें सब देवताओंके पूजन करनेकी छः मुद्राएँ कही ह, | 
उन्हें हम यहां ही कहते हैं। देवताके आननसे जो सदा | न्‍ हू 
सन्तुष्ट रहै वो “ संमुखी मुद्रा ” कहाती हे । जिसमें अगूठे | उड50 शवत्सम॒द्रा, वनमाछा सुद्र' और वरनिर 
। पा पा सन्रहसुद्रायें हैं । जो बुद्धिमान इन सत्रहों मुद्राओंसे देदाधि* 
निकाछे जाय वो “ आवाहनी मुद्रा ” हें) जिसमें इकठठी। - ९ नह है 
करके तो करे तो असिन शदा कहाती हयात हवा रामका अचन करता है, एवम्‌ उन्हें प्रसन्न 
है लि अलओ | करता है, वो उनके हृदयकों अपनेपर दयाछु बना जो 

आसन मुद्राको अधोमुखी कर दियाजाय तो यह “ स्थापनी | 

१ क्र ९: चः रे ४ रे । ५ ९ छ  उ 

मुद्रा ” कही शक, । यदि ऊँच ऊूच कर तो ास सुखी | छाई हुईं जो छुसुमांजलि है, उससे अतिमाके वेजकी वृद्धि 
करणी मुद्रा ” होगी। दोनों हाथोंकी अगुंलियाँ फेलाकर 


फिर उन्र दोनोंको मिलाकर हृद्यपर करनेस “ ग्राथना | 


मुद्रा ” होजाती है । इन छओ मुद्राओंको सब देवताओंक 
पूजनमें दिखावे । शिवपूजनम छिंगमुद्रा करनी चाहिये। 
उठ हुए दाये अगूठेको बांये अगूठसे बांध दे तथा बाय 


द्‌, उस समय “िंगमुद्रा” होती है । यह शिवका सान्निष्य 


देनेवाी होती है| श्रीकामवाल्ञा इस सुद्राको शिरपर तथा | 
राज्यकामी नेन्रॉपर, अन्नादि चाहनेवारा मुखपर, रोग- | 


शान्ति चाहनेवाला ग्रीवापर,. सब चाहनेवाका हृदयपर, 
ज्ञान चाहनेवा नासिमण्डलपर, राज्यकामी गुछ_पर और 





कानिश्ठानामिका- 
राष्ट्रकामी प्रोपर इस मुद्रासे स्पशे करै। रामपूजनमें १७ 
मुद्राएं होती हैं, ऐसाही रामाचन चन्द्रिकार्मं अगस्त्यजीने 
कहा है कि-आवाहनी, स्थापनी, सन्निधीकरणी, 'सुसे- 
निरोधिनी, सन्मुखीकरणी, संकलीकरणी, महामुद्रा, शख- 


मुद्रा, चक्रमुद्रा, गदामुद्रा, पद्ममुद्रा, धेतुस॒द्रा,कौस्तुभसुद्रा, 
योनिमुद्रा ये 


। रे 4 
चाहता है सो ले छेता है | मूछाधारस लेझर द्वादृशांततक 


होती हे, हे मुने | देवाचेनविधिम “ आवाहनीमुद्रा ” ही 
कप भ्छै अप | 
श्रष्ठ है, फिर इसी मुद्राको स्थापनके समयमें अधोममुखी 


| मुद्रा कहते हैं । दोनों अगूठोंको ऊपर उठाकर सुठ्टी कर 
| लनेस “ सन्निधीकरणी मुद्रा ” बन जाती हैं जो कि देवाचे- 
| नमें उपयुक्त है। उन्नत- किये हुए अगूठोंके साथ दोनों 
हाथकी अगुहियोंकों दांये हाथकी अगुल्योंसे बेष्टित कर | 


वि 


हाथोंकी मुठी करनेसे “ सैनिरोधिनी मुद्रा ” बन जायगी, 
मुट्ठी ऊंचको दोनों मुट्ठी करनेपर “ सम्झुखी करणी ” बन 
जायगी,अगोंस - गोंका विन्‍्यास करनेस “'संक ली करणी” 
मुद्रा बनती है, अगूठोंको आपसमें छगे रहते हुए भी 
हाथको फेला देनस “ महामुद्रा ” बन जाती है। वह कम 
बेशकी पूर्ति करनेबाली होती है। कनिश्चिका और अत्ता- 


ग 
॥ 20806 6 का ४ करत 26008: 26060 070 0 07400 
र्जशा कि नपान+» > जम ५५+ ०५०4 न >नधनाअ५ सम कक म मन जनक कम जनक नमन मम कम भक अनबन कन०क भाप कना मामा ००० ००००० ०० ]।-7०-ँ्‌ँ:,्‌.,[ृण ्गणा्ाकऊकछामककक कभ्््क्नकभेेू्क ध्ध्धध्ध््य/ ४2४26 74/00077527/] 


0778 


[ ५ 
420: ३2/80/7860: 2/00.0000 27776: 40020% 220 20 60770 7 





मध्यान्तःस्थांगृष्टासद्मतः ॥ गोपितांगुष्ठमूलेन सब्रिधों मुकुली ऋला।क रहयेन सुद्रा स्पाक्ष- 
ड्ारुयेयं सुराचने । अन्योग्यामिसुसस्पशेव्यत्ययेन तु वेडयेत्‌ ॥ अंगुलीभिः प्रयलेग 
मण्डलीकरणं भुने ॥ चक्रमद्रेयमारख्याता गद्ाञद्ा ततः परम्‌ ॥| अन्योन्यामिसुखाहिश 
ततः कौस्तुभसंज्ञिका ॥ कनिष्ठेन्योग्यसंलग्रेमिमुख (हि परस्परम्‌ ॥ वामस्य तजनीमधे 
मध्यानामिकयोरपि ॥ वामानामिकर्संसष्टा त्जनीमध्यशोमिता ॥ पयायेणानतांगष्ठद् 
कोस्तुमलक्षणा ॥ कनिष्ठान्योन्यसंलग्नविपरीत॑ तु योजिता ॥ अधस्तात्मापितांगष्ठा मु 
गरुडसंज्ञिता ॥ तजन्यंगुष्ठमध्यस्था मध्यमानामिकादहयी ॥ कानिप्ठाइनामिकामध्यतर्जम्यप्र 
करद्दयी ॥ मुद्रा श्रीवत्समुद्रेय वनमाला भवेत्ततः ॥ कनिष्ठानामिकामध्या सड्ठिरुन्नततर्जनी॥ 
परिन्रान्ताशिरस्पुच्चेस्तजनीभयाँ द्वौकसः ॥ योनिमुद्रा समाख्याता द्योतत्करद्रयाश्रिता। 
तजन्याकृष्टमध्यान्तोत्थितानामिकयुग्मिका ॥ मध्यस्थलास्थितांगुष्ठा सेयं॑ शस्ता म॒नेषचेने। 
इति मुद्रालक्ष णम्‌ ॥ क्‍ 

अथोपचारा; ॥ । 

पदार्थादशें ज्ञानमालायाम--अष्टत्रिशव्‌ षोडश वा दश पश्चोप्चारकाः ॥ तान्विभज्य प्र॥ 
श्यामि के ते तेश्व कृतेश्व किम्‌ ॥ अध्य पाद्यममाचमन मधुपर्कमुपस्पृशम ॥ स्मानं नीराजा 
वद्धरमाचाम चोपवीतकम) पुनशचमभूषे च दपषणालोकनं ततः ॥ गन्धपुष्पे धूपदीपौ नेवेद्य॑५ 
ततः क्रमात्‌ ॥ पानीयं तोयमाचार्म हस्तवासस्ततः परम्‌ ॥ हस्तवासः करोद्रतनम ॥ ताम्ब॒ल 
मल॒लेप॑ च पुष्पदानं ततः पुन३॥ गीत॑ वाद्य॑ तथा नृत्य स्तुतिश्रेव प्रदक्षिणाः ॥ पुष्पाअहि 
नमस्कारावष्टन्रिंशत्समीरिताः ॥ इत्यप्टजिंशदुप्चाराः ॥ अन्यज्ञ--आसन॑ स्वागत चार 
पाद्यमाचमनीयकम्‌ ॥ मधुपकॉसनस्थानवसनाभरणानि च ।। सुगन्धः सुमनो धूपो दीपमत्नेन 
भोजनम्‌ ॥ माल्याठुलेपने चेव नमस्कारविसर्जने ॥ इति षोडशोपचाराः ॥ अध्ये पार्य चाव- 
मन स्नान वस्थनिवेदनम्‌ ॥ गन्धादयों नेवेद्यान्ता उपचारा दर ऋमात्‌ ॥ शारदातिलके पोह-. 
उपस्थित हुए अग्रभागमे छिपी हुईं हों ऐसा ही जिसका | 


च्कै 





जाती है। दोनों हाथोंकी अनामिका दोनों हाथोंकी तजनी' 


आपससे वेष्टित कर दे। अंगुल्योंको 
कर तुपर, ४ "पकऋमुद्रा ? 


कनिध्चिकाएँ आमने सामने 
बाय हाथकी तजनीके बी 
ऋम दूसर हाथकी मध्या और अनासिका 
वजनी भध्यमें शोमित हो, ऋमसे दो 


नों अगूठ जिसमें नमते 
मुद्रा ” कहते 
भाजानी चाहिये कनिश्िका और अ | 
बकरे ना- 
मिका तजलीके सध्य आनी 


सै 
कहावंगी, कतिष्ा 


ने आपससें मिलगयी हों तथा | 
चस एवम्‌ सध्य और अनामि 


मिल गयी हों) | टन, स्नान, आरती,वस्र,आचमन,उपवी त,पुनराचसन,अहं- 


भूः पे ९ ५ ५ 
| (५ भूसंचन, दुषणाछ्ो कन, गैध, पुष्प, धूप, दीप, नेवेदय 
'उसे “ कौस्तुभ मुद्रा / क हते हैं। कनिष्ठिका आपसमें | कि 


९ $। ५ 
विपरीत ले दो मा चढे हो तो इसे / गरुड- | गीत, बाद्य, नृत्य, स्तुति, प्रदक्षिणा, पुष्पांजलि, नमस्कार 
अनामिका दोनों जा ५ + पष्ठक बीचमें मध्यमा और | ये हे 
चाहिये, यह * श्रीबत्समुद्रा” 
बा का और मध्याकी एकसूठि | 
पजनी उठी हुईं होनी चाहिये इसे 
क्‍ ९ रखनेसे “ बनमाहिका मुद्रा ” बन |: 





| पर रखी हुईं हों, दोनों: अनामिकाएं खडी हों, मध्यस्थहमे 
संस्थापन हो तथा, अँगूठेका अग्रभाग उनमें छिपा हुआ हो | अँगूठे हों तो “ योनिमुद्रा ” बनती है, यह पूजनमें अहिः 
इसे मुकुछीकरण मुद्रा ” कहते हैं । देवपूजामें दोनों | 

हाथोंमे “ शखसुद्रा ” बनती है,इसमें अगुलियॉकी नोकोंको | दिखाकर उनकी संख्या लिखी है,उसमें ज्यादा कम हो जाते 
प्रयस्नके साथ गोल | हैं तथा कहीं कुछ, और कहीं कुछ होता है ] 

| . बन जाती हैं। एक एकके सामने 
सामने करके सिलानेसे “ गदा मुद्रा ” होती है। दोलों' 


श्रेष्ठ है। ये सुद्राओंके लक्षण समाप्त हुए ॥ [अन्थमें उपचार 


अथ उपचार-पदार्थादशमें ज्ञानमाछासे लेकर ढिखा।ै. 
कि३८,१६, १० और पांच (५) ये उपचार हैं इन्हें यहांगे 
अलग अछग दिखाऊंगा तथा इनक करनसे क्या फल होता 
है सो भी छिखूँगा । अध्ये, पाय, आचमन, मधुपक, उप क्‍ 


पानीय, तोय,आचमन, करोद्ट्तन, पान,अनुलेप, पुष्पदान। 


अडतीस उपचार हैं। अथ षोडश उपचार-आसन, 

स्वागत, अध्यं, पा, आचमन, मधुपकांसन, स्नान, वसन, 

५. भरण सुगन्ध, फूछ, धूप, दीप, अन्नभो जन, म'ल्यअनु- 
श ञु 

लपन, नमस्कार और विसजन ये ( सोलह ) षोडश उप क्‍ 

चार कहाते हैं। दशोपचार- अध्य, पाद्य, आचमन) स्नान. 

और वस्चलिवेद्न तथा गंधसे लेकर नेबे्यतक ऋमसे द्श 





परिभाषा, ] भाषाटीकासमेतः । ( ४५ ) 
शोपचारा उक्ता॥ते च--आसनल्लानवशस्खाणि भूषणं च विवर्जयेवारात्रों देवाचने तेश्व पदार्थ 
द्वादशः ऋ्रमात्‌ ॥ पूजन॑ कपिलंनोक्त तत्सवे च विसरजयेत्‌ ॥ गन्धतेलमथो दद्यादवस्याप्रातिर्म 
ततः ॥ अध्यांदिदव्याणि ॥ दूवां च विष्णुऋान्ता च स्यामाक पद्ममेव च॥ पाद्याड़ानि च चत्वारि 
कथितानि समासतः॥ कपूरमशुरू पुष्प द्रव्याण्याचमनीयके॥ सिद्धार्थमक्ष ते चे बदूबां च तिल- 
मेव च ।। यवगन्धफल पृष्पमष्ठाड़ं त्वप्यम्ुच्यते । खाने दख्े तथा भध्ये दह्मादधचमनीयव म्‌ । 
उद्बतनपदाथों: ॥ उद्वतिनमपि तत्रव--रजनी सहदवी च शिरीष लक्ष्मणाप्रि व ॥ सदाभद्रा 
कुशग्राणि उद्बतनमिहोच्यते ॥ मन्चतन्त्रमकाशे--अक्षता गन्धपृष्पाणि स्नानपात्रे तथा त्यम्‌ ॥ 
उपचारद्रव्यभावे मतिनिधिः ॥ लत्रेब--द्रव्याभावे प्रदातव्याः क्षालितास्‍्तण्डुछाः झुभाः ॥ तत्रेबोक्त- 
मगस्त्यसंहितायामू--तथाचमनपात्रेषपि दद्याज्ञातीफले झुने ॥ लवड्रमपि कड़ोले शस्तमाचम- 
नीयके ॥ द्रव्याभावे ॥ तन्त्रान्तरे उक्तम-तण्डुलान्मक्षिपेत्तेबु द्रव्याभावे तु तत्स्मरन ॥ मृत्यौदिस्दांन- 
निणयः ॥प्रयोगपारिजाते व्यास+-प्रतिमापट्यन्चाणाँ नित्यं स्नान न कारयगेत ॥ कारयेत्पवे- 
दिवसे यदा वा मलधारणम्‌ ॥ विष्ण्वादिदेवपृजने वर्ज्याजि ॥ ज्ञानमालायाम-नाक्षतेरचेयेद्धिष्णु न 
तुलस्था गणाधथिपम्‌ ॥ न दूवेया यजेदेवीं बिल्वपत्रेश्व भास्करम्‌ ॥ उन्मत्तमकंपुष्ण च विष्णो 
वेज्य सदा बुधेः॥“अक्षतास्त यवाः प्रोक्ता इति पदाथादरशों उक्तात्वाद्यवानामेवायं प्रतिषधो न 
तण्डुलानाम्‌॥ तन्ब्ान्तरे-महाभिषेक॑ सर्वत्र शड्ढेनेव म्रकल्पयेत्‌ ॥ सर्वत्रेव प्रशस्तोषजः शिव- 
खूयार्चन विना॥ जिस्तरस्त्वाचारमयूखे द्रष्टव्यः ॥ अथ अतोद्यापनानुक्ती ॥ पृथ्वीचन्द्रोदये नत्दि- 
पुराणे--कुर्योइद्यापन तसय समात्तों यहुदीरितम॥उद्यापन विना यत्त तद्गबतं निष्फलं भवेत॥ यत्र 
चोद्यापन नोक्त ब्रतालुगुणतश्वरेव ॥ वित्तालुसारतो दद्यादतुक्तोद्यापने ब्रते ॥ गां चेब काथ्वन॑ 








दद्याद्डतस्य परिपूतये ॥ इति ॥ समात्तावुद्यापनमल॒क्तोद्यापनविषयम्‌ ॥ 


ह4७७७७७७७0. .. 
उपचार होते ह | शारदातिछकमें सोछह उपचार कहे हैं। 
्, ९ गने ्ै्‌ 
रातके पूजनमें अनुपयुक्त उडपचार-कपिलजीने कहा है कि, 
जब रातवको देववृजन करना हो तो आसन; स्नान, वस्त्र 
ओर भूषण इन उपचारोंकों न करे, बाकी बारह उपचा- 
रोंको करना चाहिये | इसके बाद परम सुगन्धित अतर 
देना चाहिय। पाद्यांग-दूवां विप्णुक्रान्ता, श्यामक और 
पद्म ये संक्षेपसे पायके अग कहे है। आचमनांग-कपूर, 
अगुर और पुष्प इनको आधभमनीमें डाहकर, आचमन 
करना चाहिये | अध्योग-सिद्धाथ, अक्षतःदूवा, तिछ, यव, 
गनध, फछ और पुष्प इन सबको अध्यें पान्रसं डाढकर. 
अध्य देना चाहिये। स्लानके पीछ बस्र और भोगक पीछे 
आचमन कराना चाहिये । उद्दतंनभी--शारदा तिलक में 
बताया है कि; हछदी, सहृदेवी, शिरीष, लक्ष्मणा, सदा- 
भद्रा और कुशाप्र ये सब वस्तु उद्तेनमें प्रहणकी जाती है। 
स्‍्नानपात्रके द्व्य-मत्रतैत्रप्रकाशमें लिखा हे कि, द्वव्यके 
अभावम साफ किय हुए तंडुझ छून चाहिये। वहीं ही 
अगस्व्यसंहितामें कहा है कि, हे मुन ! आचमन -पात्रमें 
जातीफछ, छवंग और कैकोछ डालना अत्यन्त उत्तम है। 
उपचारद्रव्यके सबका प्रतिनिधि-द्रव्यके अभावमें तन्नान्त- 
रमें कहा है कि, द्रव्यके अभावमें भी उस द्रव्यको स्मरण 
करके धुले चावछ वरतने चाहिये। मूर्ति आदिके स्लान- 
निणेय-पर प्रयोगपारिजातमं व्यासजीका. बचत है कि, 





प्रतिमाक बस्र ओर यन्त्रोंको रोज स्नान न कराना चाहिये, 
जिस दिन कोई पर्व हो उस दिन अथवा मेले होगये हों 
तो धो दे नहीं तो न धोना चाहिये। ज्ञानमाल्यमें, विष्ण्वा- 
दि देवपूजनमे के हेयपदार्थ लिखे हुए हैं कि, अक्षतॉसे 
विष्णुका तथा तुझूसीदुहोंसे गणपतिका, दूवांसे देबीका 
तथा बेलूपत्रॉस सूथ्येका कभी भी पूजन न करना चाहिये। 
धतूरे आर आकके फूलछ कभी भी विष्णु भगवानपर न 
चढाने चाहिये । पदार्थादशमें छिखा हुआ है कि, यवोंको 
अक्षत कहते हैं, फिर यह अक्षतोंका निषध यवॉका ही 
होगा न कि चाबलोंका | तंत्रान्तरमे लिखा हुआ हैं कि, 
सब जगह शंखसे ही मह!/भिषेक होना चाहिये, क्योंकि 
शिव और सथ्यांचनको छोडक र, सब जगह शंख प्रशस्त 
हैं। [ द्रविडद्शमें श्रीवेष्णवोंके यहां विष्णु पूजनमें भी 
शंखका व्यवहार नहींके बराबर हैं] यदि अधिक देखना 
हो तो आचारमयूख नामके अन्थमें देखछो । जिस बन्नतका 
उद्यापन न कहा हो उसका उद्यापन; पृथ्वीचन्द्रोदयनामके 
प्रन्थमें नन्दि पुराणसे केकर कहाहे कि-ब्रतकी समाप्ति 
पर जो कहा गया है वो उद्यापन अवश्य करना चाहिये । 
क्यों कि, बिना उद्यापनके त्रत्‌ निष्फछ होजाता है । जिस 
ब्रतका उद्यापन न्‌ कहा गया हो उसका उद्यापन उस ब्रतके 
अनुसार ही करल तथा अपनी श्रद्धाक अनुसार दान भी 
कर दे। गझऊ और सोना भी त्रतकी पूर्तिक रिय दान करे। 
जिस ब्तमें उद्यापन नहीं कहा गया है उसके अन्त्म उच्या* 
| 





([ है. द ) हे 
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उक्तोच्पनेहु-आदों मध्यें तथा चान्‍्ते ब्रतध्योद्यापन भवेत्‌! द्याप व 
अथ अतमभज्ठे संपूर्णतावा विषि:- हेमाद्रों भविष्ये-युधिष्ठिर उवाच ॥ संपूर्णतामलुष्ठाने ब्रतानां 





् [ सामाशे- 





कक 2206 00804 00676 00276 77८7: 
288 23400: 0१७४2 06200 4004 20270 60767 












तद्गतोद्यापनं कार्य संपर्णफलमाशुयात। 
न्द्‌- 


नन्‍्दन॥कुरु मसादं गह्यार्थमेतन्मे वक्तमहेसि॥ श्रीकृष्ण उवाचा॥ साधु साथ महाबाहो कुरुरात 
युधिष्ठिर॥रहस्यानां रहस्थ॑ ते कथयामि ब्रते तबा।संपूर्णता कता यत्र तत्र सम्यकू फलप्रदम्‌॥ 
यज्चीर्ण नरनारीभि्म॑वेत्संपूर्णारकम्‌ ॥ अवश्य तत्व कर्तव्यं सपूर्णफलका लिमिः ॥ किविद्धा 
प्रमादेन यद्वतं ब्रतिना स्थितम॥तत्सपर्ण भवेत्सव त्रतेनानेन पाण्ड व॥उपद्रवेबहुविये मे हामोहाइ 
पाण्डवायद्भम किंचिदेव स्याद्गतं विप्तविनाशनम॥तत्संपूर्ण भवेत्पार्थ सत्य सत्ये न सशयः॥ 


काश्वन रूप्यक रूप शिल्पिना तु घटापयेत॥ भम्नश्नतस्य यो देवस्तस्य 


रूप विनिर्दिशेत्‌ ॥ व्रत 


हैं“ ५७५ दल क क्षा $ 
ह्रीपुंसयोः पार्थ प्रारव्ध यद्वतं किल ॥ न च निष्पादित॑ किंचिदेवात्सर्थ ता स्थितम्‌॥ द्विम्ुरं 
पडुजारूढ सोम्यं प्रहसिताननम्‌ ॥ निष्पादित शिल्पिना च तस्मिन्नेव दिने उनः ॥ तन्मानंवु 
मन/आात्ते बराह्मणेबिंधिना गृहे ॥ स्तापयेत्पयसा द्ना पृतक्षौद्ररसाम्बुभिः ॥ व खचन्दनपुष्प 


पूर्जा कुयात्समाहितः 


डुमकारकेः ॥ अध्य प्रदद्यात्त्नाम्ता मन्त्रेणानेन पाण्डव ॥ डपवासस्य दानस्य 


॥ तोयपूणस्य कुम्भस्य सुने विन्यस्थ देवताम्‌ ॥ घूपदीपाक्षतर्वस्त्रे रत. 


प्रायश्रित्त कृत 


भया। शरण च॒ प्रपन्नोईस्मि कुरुष्वाद्य दर्यां मम ॥ ब्रतच्छिद्र त्तपरिछद्वें यच्छिद्रं त्रतकर्मणि। 


भत्सवें त्वत्मसादेन संपूर्ण जायता मम 
सपण ब्रत सजायतां मम ॥ 
दिक्पालेभ्यो नमो नमः 
चेद कटी शीषेकवक्ष सी 
स्ललन्नल्ल्फ्ंं ि++......... 


2रकला५क नाक, 





पत्र करना चाहिय। उद्यापत्र कह गया हो तो-उन ब्रतोंके 
. आदि मध्य और अन्तमें उद्यापन होता है। उद्यापन कर- 
नस हो ब्रतका संपूर्ण फछ पाता है, अन्यथा नहीं पाता। 
मम संपूर्ण करनेकी विधि-हेमाद्विन भविष्य पुरा- 
णको लेकर कही है । युधिष्ठिर महाराज श्रीकृ.ण परमा- 
पास पूछने ढगे कि, ब्रत कैसे पूरे होते हैं? इस गुप्त 
विषयको मुझे बतलाइये । श्रीकृष्णजी बोले कि, हे महा. 
का कप न विश ! बद रहस्योंका और दृश्य है, मैं 
ि जहा ब्रतको संपूर्णता करदी वहां 
अच्छे फलोंका देनेवाला होजाता है कस 
५ कर्क हो। जाता हे, सम्पृणताकोचाहमेवाडे खीपुरुषोंको 
चाहिय उसे अवश्य करें । ब्रत करनेवालोंके प्रमादसे जो 
अत भ्न हुआ पडा हो वो ब्रत, हे पाण्डब | इसके कर- 
नस पूरा हो जायगा। अनेक तरहके उपद्रवोसे तथा अज्ञा- 
नके कारण, जो विश्ननाइक ब्रत भजन होगया हो, 
दो! इसके किये पूरा होजायगा, इसमें को इ भी सन्दे 
५५५ गस देवताका ब्रत किया हों उसी देवताकी सोने 
कप किसी कारीगरसे बनवा लेनी चाहिये, 
पीने इस ब्रदको किया हो पर दो पूरा न कर 
सका हो देवात्‌ विश्व उपस्थित हो गये 


इसीको करना च्‌ 
सीक . पटर_- पर पे पक इक, हक पए वाझ, चक, मो करना चाहिये ! इसी दिन किसी शिस्पीसे ऐसी 


उमेश 








5 
छः 


. - 4 नासाचंशुशिरोरहानिति पाठान्तरम्‌। 


॥ प्रसन्नो भव भीतस्य भिन्नचर्यव्रतस्य च 
पूवदक्षिणयोः पश्चाइत्ते च बलिं हरेत ॥ 
॥ इद्मध्यमिद पाद्य॑ तेम्यस्तेश्यो नमो नमः ॥ पाद 


। जिसके कियेसे संपू- 


हों तो समाधानभी | हि 


॥ कुछ प्रसाद 
उपयधस्तात्सवेंग्यो 
च जातुनी 


॥ कुक्षि तु हृदय पृष्ठ वाक॑ चश्षुश्व शिरोरहान्‌ ॥ पूजयित्वा तु देवस्प 


| कप माइक १3:40 का -3 ०५२५५ >फतारी 400॥0॥0॥॥७॥॥७७एए9 काका >> नमन 


मूति बनवानी चाहिये, जो कमछासनपर विराजमान हो 
उसके दो भुजाएं हों, सुन्दर हसता हुआ मुख हो, जितने 
प्रमाणकी मन चाहे उतने ही बनवाना चाहिय. फिर पर 
पर उसे ब्राह्मणोंसे स्नान कराना चाहिये । स्नानक पानीमे 
दही, दूध, घृत और सहद मिला रहना चाहिय, स्तानक 
पीछे वल्र' चन्दन और फूलोंसे देवताकी पूजा करनी 
चाहिये, हे पाण्डव ! जिसका उद्यापन किया जारहा हो 
पहिल पूण्कुम्भके ऊपर उस देवताको स्थापित करे 


उसी देवताक नाममंत्रसे धूप, दीप, अक्षत और अनेढ 


तरहके र॒त्नोंसे अध्य देना चाहिय, उपवास और दानका 
भायश्रित्त मेने कर दिया है, में आपके शरण हैं, अब आए 
3, पर दया करें| ब्रतका छिद्र, तपका छिद्र एवम्‌ जो 
3.5 कम छिद्र हों, वो सब आपकी कृपासे पूरे होजाएँ 
मे अ्तकी गछतीसे बडा डरा हूं,मैने त्रद्मश्व्यका भी पाहन 
नहीं किया है, आप मुझपर कृपा करें जो मेरा अत पूरा 


हू | होजाय । पूष और दक्षिणके पीछे उत्तरमें बलि दे, पढ़े 


6 


ऊपर और नीचे बलिदान करे, सब दिक्पाढोंकी बह. 
हा डँगी उन्हें नमस्कार करके कहे कि, लीजिये यह 
लक अध्य है, यह आपका पाद्य है, आप सबोगे 

+. ५ रिवार नमस्कार हे। देवताके चरण, जातु, 
कटी, शीर्षक, वक्ष, कुक्षि, हृदय, पृष्ठ बाकू, चह्छु, और 






(४७) 





परिभावा; | भाषाटीकासमेंत: । 
| 


ततः पश्चात्ल्षमापयेव्‌ ॥ पूजितस्त्व॑ यथाशक्त्या नमस्तेःस्तु घुरोत्तम ॥ ऐहिकामुष्मिकी 
देव कार्यल्िद्धि दिशस्व मे ॥ एवं क्षमापचित्वा तु प्रणमेच्च प्रयत्नतः ॥ तम्मूर्ति च द्विजातिश्यो 
विधिवत्मतिपादयेत्‌ ॥ स्थित्वा पूवमुखों विप्रो गद्दीयादर्भपाणिना । विभहस्ते प्रयच्छेच्च दाता 
चेवोत्तरामुखः ॥ मन्त्रेणानेन कौनतेय सोपवासः प्रयत्नतः। इद ब्रतं मयाखण्ड कृतमासीत्पुरा 
द्विज ॥ तत्सब पूर्णमेबास्तु तब सूर्तिप्रदानतः ॥ ब्राह्मणोउपि प्रतीच्छेत मन्त्रेणनेन तबन्नप ।। 
ब्रतखण्डकृतं पूजाब्रतिनानेन .ते पुरा ॥ सम्पूर्ण स्यात्मदानन' तब पूर्णा मनोरथाः ॥ बराह्मणा 
यत्मभाषन्ते तन्मन्यन्ते दिवोकसः ॥ सर्वदेवमया विप्ता न तहचनमन्यथा ॥ जलांधेः शक्षारतां 
नीतः पांवकः सर्वेभक्षताम्‌ ॥ सहर्नेत्र! शक्रोषपि कतो विभमहात्मप्िभाब्राह्मणानां तु बचना- 
द्रह्महत्या विनश्यति ॥ अश्वमेघफल साम्न॑ लग्तले नात्र संशय: ।॥ व्यासवाल्मीकिवचनात्परा- 
शरवलिष्ठयो;॥ गगंगोतमथौम्यात्रिवासिष्ठाडिरसां तथा ॥ वचनातन्नारदादीनां पृ भवत॒ ते 
अतम्‌॥ एवं विविविधानेन गहीत्वा बाह्यणो ब्रजेत्‌ ॥ दाता तत्मरेष्येत्सव बाह्मणस्य शहे स्वयम॥ 
ततः पश्चमहायज्ञान्कृत्वा वे भोजनादिकम्‌ ॥ एवं यः कुरुते भकक्‍त्या ब्रतमेतन्नरोत्तम ॥ तस्य 
संपूर्णतां याति तद्गतं य॒त्पुरा कृतम्‌ ॥ खण्ड संपूर्णतां याति पसज्ने ब्रतदेवते ॥ भग्नानि यानि 
मदमोहबशादूगहीत्वा जन्मान्तरेष्वापि नरेण समत्सरेण ॥ संपूर्णपूजनपर स्य पुरो भवन्ति सरब्ब- 
ब्रतानि परिपृणफलपदानि ॥ 
अथ सबेत्रतेषु सामान्यतः पूजाबिधि: || 

सहल्लशीरेत्यावाहनम्‌ ॥ आगच्छागष्छ देवेश तेजोराशे जगत्पते॥ क्रियमाणां मया पूर्जा 
टहाण खुरखत्तम ॥ पुरुष एवद्मित्यासनम्‌ ॥ नानारत्नसमायुक्त कातंस्वरविभूषि तम्‌ ॥ 
आसन देवदवेश भीत्यथं मतिगशहायताम्‌ ॥ एतावानस्थेति पाद्यम ॥ गड्भादिसवतीर्थेभ्यो मया 
ब्रत पूरा हो जाय, इस विधिविधानसे ब्राह्मण मूर्ति छेकर 


अपने घरको चला जाय । तथा देनेवाला स्वयं ही इस सब 
स/मानको ब्राह्मणके घर पहुंचा दे | पंचपहायज्ञोंकों करके 


वालॉको पूजकर क्षप्रापन करना चाहिये । हे सुरोत्तम ! | 
जेसी मेरी शक्ति थी, उसके अनुसार मेने आपका पूजन | 
कर दिया, अब आप इस छोक और परढोक दोवोंकी | 
काय्येसिद्धि करो। इस प्रकार क्षम्ापन कराके प्रयत्नके | भोजन करना चाहिये । हे नरश्रेष्ठ ! इस प्रकार जो भक्तिके 
प्ताथ प्रणास करे एवम्‌ उस सूतिको विधिक साथ जाह्मणको | साथ बत करता हैं उसका पहिल किया हुआ अत पूर्णताको 
रेदे, झ्राह्मण भी पूर्व मुख करक कुशयुक्त हाथसे छे। तथा | प्राप्त हो जाता है, जब ब्रत देवता ही प्रसन्न हो गया तो 
ति बार दाताको' उत्तराभिमुख होना चाहिये । मूर्तिदान | ततके पूरे होनेम क्या कभी रह जाती है ? हे युधिष्ठिर ! इस 
#रनतक यजसानको निशह्ार करना चाहिये तथा मंत्र | जन्मकी तो बात ही क्या है, जो दूसरे जन्मोंमें मी मदसो- 
हहते हुए मूिद्दान देना वाहिये कि, हे द्विज ! मेन पहल | हके बशमें होकर बत भंग हो गया हो, वह भी इस अकार 
'स ब्र॒तकों खण्डित किया था ब्यो सब आपको मूर्ति दनस | पूजन करनेबालेका पूरा हो जाद्य है और पूरा फल देता 


डि पे प रे 


पे हो जाय) हे युधिप्ठिर | मूर्ति छनेवाढे आह्यण भी मूतति | है ॥ 


थे छूकर व्रत्॒डक्न्त पूजा” इस मंत्रको कदता हुआ | अ कर बे व्रतोंशी सामान्यपुजा विधि-“ओम्‌ सहख- 
' कि, जो तुमने अपने व्रत झ्नो खण्डित किया था सो इस्र | शी ” इस मंत्रस आा वाहन करना चाहिय और कहता 
तिंके दानसे पूरा हो गया, तुम्दरे मनोरथ पूरे होंगे । | चाहिये कि;हे सुर सत्तम,हे देवेश[हे' तेजके खजाने!हे संसा- 
गस बालको ब्राह्मण कहते हैँ, देवता उप्त बातको मानते | रक़े स्वामी | आजाओ आजाओ,की हुईं मेरी पुजाको ग्रहण 
| यह जो कहा जाता हे कि, सब देवमय बाह्यग हैं यह | करो। “ ओम्‌ पुरुष ऐवद्म ? इस मंत्रस आसन देना 
व झूठी नहीं है। इन महात्म! ब्राह्मणों ते समुद्रको खारा, | चाहिये, कहना चाहिये कि, हे देवदेवेश | आपकी प्रसन्न- 
वकको सर्वभक्षी और शक्रको सहखनेत्र कर डाछा ।| ताके छिये अनेक रव्नोंसे जडा हुआ सोनेका सुन्द्र सिंहा- 
झर्मोंके आशीर्वादस अद्मह॒द्या नष्ट होजाती है, समग्र सन रखा हुआ है, आप इसे अहण करें । “ओम एतावान- 
श्रमेधका फछ प्रिछ जाता है, इसमें सन्देह नहीं है व्यास, | स्थ” इस संत्रस पाद्य अपेंग करना चाहिये कि, मैंने गंगा 
स्मीकि, पराशर, वसिष्ठ, गर्ग, गौतम, धौम्य, अन्रि, | आदिक सब तीथासे प्राथना करके यह शीवछ पानी छिया 
सिष्ठ, अगिरस और नारदादिकोंके बचनोंसे आपका | है, आप पाश्के डिये इस भ्रदण करें “ओमू त्रिपादुध्व!'इस 





























(४८ ) बहार) | | धामान्य- 

विश की मिकी न लिन कक मल 6,030/7 ंग्ययायाए गा अध्यापक एस ननननननीगतगग तक गदएावएफाए/22ह उध्रपरता शत ा्यवाच्वता 2 दा 52 0:7%: 0०3 244804-»7 46 400:५५५००-७४००७०० ४००2० +०क+ ८०५०५ ७५००५० नकल भा ० पक ०४५५६ २७७ 2700 84 20700 002 00000 770  # कक 

र ॒ थे अतिमहाताओ ॥ त्रिपादूध्व इत्पष्यंम्‌ ॥ नमस्ते 
प्रार्थनय। हतव्‌ ॥ तोयमेतत्खुखस्पदश पाद्याथ आतेगहाताओ ॥ त्रिपा त्पष्यंम ॥। नम 


देवदेंबश नमस्ते धरणीधर ॥ नमस्ते कमलाकान्त गहाणापय उमो5स्तु ते ॥ तस्मादिराकेत्या 
चमनीयम ॥ कर्प्रवासितं तोय॑ मर्दाकिन्याः समाहतम्‌ ॥ आचम्यतां जगन्नाथ मयादत्त 
मक्तितः ॥ यत्पुरुषेणेति स्वानम्‌ ॥ गड़ा च यमुना चेव नमेंदा च सरस्वती ॥ कृष्णा च गौतम 
बेणी जिता विन्वुस्तवेव च॥ तापी पयोष्णी रेवा च ताभ्यः स्लानाथमाहतम्‌।तो यमे तत्सु खस्पर 
ल्ानाथे प्रतिगह्यताम्‌ ॥ पश्चामृतस्लान॑ पन्‍्मन्त्रेः एथक्वारयेत ॥ त॑ यत्ञमिति वद्थम्‌। 
सर्वभूषायिके सौम्पे लोकलजानिवारणे॥ मयोपपादिते तुभ्यं वाससी प्रतिगह्मताम्‌ ॥बद्चे 
च्‌ सोमदेवत्ये लाया सुनिवारणे॥मयोपपादिति तुर्यं वाससी प्रतिगह्मताम्‌॥ तस्मायतज्ञादिति 
यज्ोपवीतम।दामो रर नमस्ते एतु त्राहि मां भवसागरात/बह्मसूत्र सोत्तरीयं गृहाण पुरुषोत्तम। 
तस्मावज्ञात्सबेहुत इति गन्धम्‌ ॥ श्री्वण्ड चन्दन दिव्य गन्धाव्य॑ मुमनोहरम्‌ ॥ विलेपन छुएः 
अष्ठ चन्दन मतिगहामताम्‌ | अक्षतास्तडुलाः शुश्राः कुकुमाक्ताः सुशोभनाः ॥ मया निवेदिता, 
, भक्त्या मूहाण परमेश्वर ॥ तध्मादश्वेति पुष्पम्‌ ॥ माल्यादीनि सुगन्धीनि मालत्यादीनि+ 
प्रभो ॥ मयाहतानि पुष्पाणि पूजार्थ प्रतिगह्मयताम्‌ ॥ यत्पुरुष व्यदयुरिति धूपम्‌ ॥ वनस्फी 
रसोदूतो गन्धाव्यों गन्ध उत्तमः ॥ आव्रेयः सर्वदेवानां धूपो5यं प्तिगह्मताम ॥ बाह्मणो स्येति 
दीपम्‌ ॥ साज्यं च वर्तिसंयुक्त वद्धिना योजित मया॥ दीप झहाण देवेश ब्रेलोक्यतिमिराप' 
हम्‌ ॥ चर्द्रमा मनस इति नेवद्यम्‌ ॥ अन्न चतुविर्ध स्वादु रसेः षढ़ामिः समन्वितम्‌ ॥ भक्ष्य 
भोज्यसमायुक्तं नवेद्य म्रतिगह्मताम्‌ ॥ इदं फर्ले मया देव स्थापितं पुरतस्तव ॥ तेन मे सफल 
वातिभवेजन्मनिजन्मनि ॥ फलम्‌ ॥ नाभ्या आसीदिति ताम्बूलप्।पूगीफल महद्दिव्यं नागवही' 





खकफ मन पााए. 


के चर ््‌ 
मेत्रसे अध्य देना चाहिये कि, हे धरणीघर | है कमठाकान्त 





हे देवरेवेश ! आपके छिये बारंबार नमस्कार हे, आप 
इस अध्यको ग्रहण करें, आपके ढिये नमस्कार करता हूँ। 
“ओमू तस्माद्विराडू” इस संत्रस आचमन कराबे कि, यह 
कर्पूरस सुगन्धित 8 पानी मंदाकिनीस छाया हूं, हे 
गगज्ञाथ: मे भक्तिक साथ दे रहा हूं आप आचमन करें. 
“ओम यट्युरुषेण”' इस संत्रस स्नान. कराना चाहिये कि हे 
दूव ; यह ठण्डा पानी, गंगा, यमुना, नर्मदा, सरस्वती हे 


कृण्णा, गौतमी, बेणी, क्षित्रा; सिन्‍्धु, लापी, पयोष्णी और 
रवा इन 5 


रिव्य नरियोंसे छाया हूँ, आप स्नानके लिय इसे 
पभहण कर, पचामृतसे स्नान तो पांच मंत्रोरे 

हि ९० पचाद्नतसे स्नान तो पां व्‌ संत्रोंसि प्थकू कराना 
कै भोम्‌ ते यज्ञम” इस सेत्रसे वस्र समर्पण कराना 
कि क्रि, में आप शी दो बल्ब देवा हूं, आप इन्हें प्रहण 
हे कप  भूरणों ते उतर (सुर्द ह,लो ऋछाजको निवा- 
पं गबाद्ध हैं, मत्त आपकही डिये तैयार किये हैं। इन 
सा का इपत है लज्ञके भड्डे नित्रारक है मे इन्हे 
'पजीव देवा राह कि आयात, इस मंत्रसे ल्‍ 
७ ० जप कि, हैं दापोरर | ते? डछिरे 

है ४6 भवसगरप दमोरर ! ते छिये नप्तस्कार 


रे ते रक्षा करिये, हे | 
सदित जझ पूत्रकों प्रदण करिये| ४ है पुरुषोतन | उत्तरीय 


के नर हा दि |] 
इस मत्रत गन्ध निवेदन करना 






चाहिये कि,हे सुसअ्ठ | यह 


ओपू तस्मायज्ञास्सबहुतः 


घिसा हुआ गन्धसे परिपुर्ण मनोहारी दिव्य->श्रीख् 
चन्दन) आपको प्रसन्नताके ढिये तयार है, आप इसे ग्रह 
कर | हे परमेश्वर|कुंकुपसे सने हुए सुन्दर अक्षत मेने भत्ति 
आपको निवेदन कर दिये हैं आप इन्हें अहण करें| 
“ओम तस्मादश्वा” इस मंत्रस पुष्प निवेदन करने चाहिये! 
हे प्रभो ! से आपकी पूजाके लिये मालाएँ और माहती+े 
घुगन्धित पुष्प छाया हूँ आप उन्हें ग्रहण कर । रे ओ। ५ 
यत्‌ पुरुष व्यदृधु.” इस मंत्रसे धूप दनी चाहिये, है धूप! . 
तू बनस्पतिक रससे बना हैं, गन्वोंसे भरा पडा है, उत्ता 
गन्ध है, सभी देवोंके सूघने छायक हैं, हे परमेश्वर : रे 
ग्रहण करिये । “ ओम ब्राह्मगोडस्य ” इस मंत्रस दीप देन 
चाहिये । घीस भरा हुआ हे, सुन्दर बत्ती पडी हुई है जग 
दिया, यह तीनों छोकोंके अन्धकारका नाशक हे, हें देविश' 
ग्रहण करिये।“चन्द्रमा मनस”इस मंत्रस तथा छओ रखेंगे 
युक्त भक्ष्य और भोज्यसे सयुत,चारों प्रकारका अज्नउपरियं! 
है।इस नेतेद्यकों आप ग्रहण करें। ' ओम इद फर्क मया देव 
इस मेत्रस फल निवेदन करना चाहिये कि, हे देव भाप 
सामने जो फल रखा हुआ है, मैं इस छाया हूँ. इसपे 
मुझे प्रत्येक जन्ममें फलकी प्राप्ति होगे । ४ ओम नाश 
आसीपू" इस मंत्रस ताम्बूछ निवेदन :करना चाहिये किं।. 
है परमेध्र| जिसमें सु-दर सुपारी पड्ी हुई है, नागवल्लीश 


। 
| 
| 
+ ) (था 
है] | 


परि | प्रति ७त्र ० ] भाषाटीकासमेलः | ( ४९ ) 













५५ बकबअप नाथ सता 


25220 72%: 70 70%. 2 5027: 07722:% 
करमपमाओ'.. अग्ाक पहना अप. फल, 





दुलेयुतम्‌ ॥ कर्प्रादिसमायुक्त ताम्दूल प्रतिगृह्यताम्‌ ॥ सत्तास्येति दक्षिणा ॥ हिरण्यशलीर 
देमबीज॑ विभावसोंः ॥ अनन्तपुण्यफलदमतः शारित प्रयच्छमे ॥ चन्द्र दित्यों च॒ घश्णी विद्यद्‌- 
प्रिस्तथेव च ॥ त्वमेव सर्वेज्योतीषि आर्तेक्य मतिणादाज ॥ नीराजनम ॥ यज्ञेन यजत्रित्रि- 
मन्त्रपुष्पाखलिः ॥ नमस्ते पुण्डरीकाक्ष नमस्ते हामरपतिः ॥ नमस्ले रमलाकाह्ल हछुदेद 
नमो5स्तठु ते॥ यानि कानि च पापानि ह्माह्हः्ज्लारि च॥ तानि जाबि विशध्यत्लि प्रदक्षि- | 
णपदेपदे ॥ इति प्रदक्षिणा: ॥ नमः सर्वहितार्थाथ जनदाधारहेलवे ॥ साष्ठाड़ोई्यं 5 जामोःस्तु 
प्रणयेन मया कृतः ॥ इति नमस्कारः ॥ इति सामान्यपूजाबिधिः ॥ 


इति श्रीत्रतराजे परिभाषा समात्ता॥ 
अथ प्रतिपदादितिथिबतानि लिख्यन्ते ॥ 


" ७४-४० 8 (५८८ ७ ०<:+»»+०«-- 
९* रे न ५ ०३, 
मात्स्ये--वजेयित्वा मधों यह्ठ द्च्षिक्षीरघृतेक्षयम्‌ ॥ दद्यादख्राणि सूक्ष्मणि रघपाश्रशेतानि 


च ॥ रसपात्र--द्ध्यादिपात्रे॥।सपूज्य विप्रमिथुन गोरी मे भीयतामिति ॥ हेमादों पाये च-वर्ज ये- 
चैत्रमासे तु यस्तु गन्धाठलेपनम।शुक्ति गन्धश्तां दष्याद्विप्राय श्रेववाससी॥। मक्त्या तु दक्षिणां 
दब्यात्सवकामार्थसिद्धये ॥ गन्धवस्रदानमंत्रौ-नन्दनावासमन्दारसखे वृन्दारकालचित ॥ चन्दन 
_त्वें मसादेन सानद्राननदप्दों भव ॥ शरण्य सर्वलोकानां लज्ञाया रक्षणं पश्म ॥ सुवेशघारित्य 
यस्माद्वासः शान्ति श्यच्छ में ॥ इति मंत्राभ्यां गन्धवाससी दद्याव ॥ 
न्‍ : अथ चेन्नशुक्क॒प्रतिपदि संवत्सरास्म्भविधि: ॥ 
आहो- अत मतिपत्लूयोंद्यव्यापिनी आह्या ॥ चेत्रे मासि जगद्गझ ससर्ज मथमेहनि ॥ छुकू- 
पक्षे समभे ठु तदा सूर्योदय सति॥ इतिबचनादा अवृत्ते मशमाले तु मतिइ्यद्ति रबौं ॥ इति 


दुलभी है; कपूंरादिक भी पढ़े हुये हैं. ऐसे पानको ग्रहण | बच्न देता है | रस पात्रका भय दही आदिके पात्र यह होता 
करो। “ओमू सप्तास्य” इस मन्द्रसे दृक्षिणा देनी चाहिये | | है । एवं देतीवार आ्ाक्षण ब्राह्मणीका पूजन करके यह कहता 
-हिरण्य गभके ग्भमें स्थितःजो अग्निका हेस बीज, हैं; वो | है कि, गौरी मुझ पर प्रसन्न हो जाय तो वो ब्रतक्षरके 
अनन्त पुण्यका देनवाछा है. इससे आप मुझे शान्ति दें । | कल्याणको पादा है। हेसादिमें पद्म पुराणकों लेकर लिखा 
चांद, सूरज, जमीन ओर अरिन तुही सबज्योति हे, मेरी | है कि, जो वो चैन्रके. महीनेमें गंधका अनुरेपन छोड़ ऋर; 
इस आरतीको ग्रहण कर “ओम यज्ञन यज्ञगू” इस मंत्र | ब्राह्मणके लिये गंधसे भरी हुई सिपी ओर दो सफेद कप डा 
स पुष्पांजलि दनी चाहिय। है पुण्डरीकाक्ष ! तेरे लिये नम- | देता है, दथा सब कामोंकी अथसिद्धिके छिय भक्तिभावसे 
स्कार है| है अमर शिय | तेरे छिये नमस्कार है | हे कमछा- | दक्षिणा देता हे वो ब्रतको पूरा कर छेता हैं! गन्ध ऑर 
कान्त | तेरे लिये नमस्कार है । हे वासुदेव ! ऐरे छिये नम | वखदानके मंत्र-हे नन्‍्दन वनमें बासकरनेवाल्े सन्दारके 
स्कार है , ' ओम्‌ यानिकानि च पापानि ? इससे प्रदक्षिणा | मित्र तथा देवगणोंसि पूजित चन्दन | तुम आनन्दक साथ 
करनी चाहिये, प्रदृक्षिणके पद्‌ पद्‌ पर वे वे सब पाप नष्ट | सघन आनन्द देनेवाछे हो ओ | इस सनन्‍्जसे गन्ध समर्पित 
'दीते हैं, जो इस जन्म और अनेक जन्‍्समोंमें किये हैं. ' नमः | करनी चाहिये | सब छोकोंका शरण एवम्‌ छज्जाका परम 
'सवहितार्थाय ” इस मंत्रस भगल्ञानको साष्टाह्ञ प्रणाम करनी | रक्षण तथा जिसके धारण कर नेसे सुन्दर वेष बन जाता है 
चाहिये कि सबक हितकारीके लिय नमस्कार है एवम्‌ सारे | ऐसे ये वस्न मुझे शांति दें । इससे बस समर्पित करने 
:जगवके आधारभूव जो आप हैं के" छिये मेरी साष्टाह्न | चाहिये। 
प्रणास है। इसे से अपने नमते हुए शरीरसे करता है | यह | >> लि 
खासान्य पूजाविधि समाप्त हुई | तथा इसीके बा ब्रत- | अथ चेत्र शुक्ल परद्िपदाकों संवत्लरके 
आरभकी विधि । 


राजकी परिभाषा जी समाप्त हुई । इति परिभाषा प्रकरणम्‌ ५ 
।. अह्म पुराणमें लिखा है; इसमें सूर्याद्य व्यापिती प्रतिपह॒ 


समाप्तम्‌ ॥ क्‍ 
/: प्रतिपदा तिथिक व्रत लिखजाते हैं । | नी चाहिये। क्योंकि, इसी पुराणमें लिखा हुआ हे कि 
चत्रमासकी शुक्षह्लतिवदाकों अलह्याजीने सृष्टि रचनाका 


* भ्रत्स्य पुराणमे छिखा हे कि; जो चेत्रकें महीनेमे दही, र 
आरम्भ किया था, उस दिन प्रतिपदा उदय व्याधिनी थी 






















दूध, घृत्त और मीठेका त्याग करके रस पात्रोंस युक्त सूक्ष्म | 
*.. .- ऊही 


पी 


( ५० ) ब्रतंराज: । 





722//0//४:77%0/ 


दिनदये व्याताबब्यातों वा पू्बंब ॥ बत्सरादों वसन्‍्तादों बलिराज्य तथेव चे। 
पूर्वविद्धेव कर्तव्य अतिपत्लर्वंद! डुधेः ॥ इति बद्धवशिष्ठवचनादिति बहवः ॥ युक्त तु, दिन 
प्युदयसम्बन्धाभावे संवत्सरासम्भमप्क्तकाय लोपमसकाबिदं बचने पूलडधताम्राह्मताविधायका| 


9५. 


दिनद्॒ये तत्सम्बन्ध त॒॒संपूर्गत्वादेव पू्वाभातिः । कद! कायमित्याकां क्षाविरहातूई 
मृतत्वविरहा्व नेतद्वचन/त्पूर्वेति ॥ बह्े-मवर्तेयामास तथा कालस्य गणनामपि ॥ अहानब्दानू- 


है 


तृन्मासान्पक्षान्‌ संवत्सराधिपाव्‌ ॥ ददों स मगवाव्‌ बह्मा सर्वेदेवलमागमे । बाहयाँ सभा 
ब्रह्माण॑मानिर्देश्यततुं ततः ॥ यथ।क्तास्‍्ते नमस्यृन्तः स्त॒वन्तश्वाप्युपासते ॥ ततस्त कृतश॒श्र 


कि आह 


गत्वा चेव हिमालयम्‌ ॥ स्वानि स्वान्यथ कमाणि तेन युक्ताश्व चक्रिरे ॥ बाद्यी सभा कामरु 
विशेषण तदानव ॥ घारपनत्यम लं रूपमानिर्देदयं मनोहरम्‌ ॥ ततः्मभति यो घमः पूवः पूवेत 
कृतः ॥ अद्यापि रूढः खुतरां स कतव्यः प्रयत्ततः ॥ तत्र काया महाश[/न्तिः सर्वकल्मण्ता 
शिनी ॥ सर्वोत्पातम्शमनी कलिदुःखतगाशिनी ॥ आश्ु्मदा वृद्धिकरी धनसौभाग्यवधिनी | 
मड़ल्या च पवित्रा च लोकद्यछुखाबहा॥त ध्यामादो तु संपूज्यो बह्मा कमलसंभवः ॥ पाद्मा्न 
पुष्पधुवैश्च वख्ालंकारभूवणेः ॥ होमेबेल्यपहारश्व तथा बह्मणभोजनः॥ ततः क्रमेण देवेश' 
पूजा कार्या प्रथक्प्रथरू ॥ कृत्वोड्ड्रारनमस्कारों कुशोदकतिलाक्षतेः ॥ पुष्पवृपप्रदीपाणेमोंजमे 
यथाक्रमम।मंत्रं संपूजनाथें तु बहुरूप॑ परिस्पशेद॥ मेत्रमिति जातावेकवचनस्‌ ॥ बहुरूपं मंत्र नानाझा' 
समंत्रान्परिस्पृ शेर ग हो या दि; पथ। ॥ लेन" >नमो ब्रह्मण' 'इत्सादि 'विष्णवे परमात्मने नम$' द्त् 
न्‍्तमंत्रवाक्यवृन्दोपात्ता देवताशब्दाश्वतुर्थ्यन्ताः प्रणवादयों नमोहझता मंत्रत्वेन आशध्या।॥पार्थना' 


भविष्योत्तरपुराणमें छिखा हुआ है कि, मधुमासके गवृत्त | पहिछे और उनसे भी पहिलोंस जो घर्म पालन किया गय 
होने पर, उद्यव्यापिन्ी प्रतिपदाको ख॒ष्टि रचनेका प्रारम्भ | है अब भी वही धर्म चछाः आता है, उसे प्रयत्नकें सा 
किया था, यदि दोनों दिनोंकी प्रतिपदा उद्यव्यापिनी हो, | करना चाहिये। इस प्रतिपदृके दिल सब पापोंके ना 
अथवा दोनों दिनों उद्यव्यापिनी न हो तो पहिली लेनी | करनेवाली, सब उत्पातोंको शान्त करनेवाली, कहि 
चाहिय । एसा-सवत्छरक आरंभको प्रतिषदा. 30 अद दुःखोंको नाश करनेबाली,आयुको बढानेवाली, सौभाग्य 
आदिकी प्रतिपदा तथा कार्पिको शुद्ध प्रतिपदा सदा पूर्व | बर्धव करनंबाढी संगलकरनेबाली, दोनों छोकोंम मु 
विद्धा ही करनी चाहिये। वृद्धवसिष्ठधके वचनसे बहुतसे 


| धर ७ क् 
हा । ते | देनेबाी और परम पवित्र जो महाशान्ति है उसे कर देश 
कहते हूं, परन्तु दोनों दिन उद्यव्यपिनी न मिली तो संब- | चाहिये। चनत्रसुदी प्रतिपदाको पाद्य, अध्य; पुष्प, धूप,व। 


इस कारण 233 काय्यका विधान करनेवाढ्ा यह वचन | सबसे पहिंले कमरूसे उत्पन्न होनेवाले त्रह्म।जीकी पूजा होने 
युक्त ही है, दोनों दिन ही उद्यव्यापिनी होगी; तब तो | जाहिये। त्रह्माजीकी पूजाके प॑छे ऋमसे सब देवताओंकी 
पहिल दिन ही उद्यव्यापिन्ती मिल जानेके कारण पूर्बाका | जुदी जुदी पूजा होनी चाहिये । पूजनके मंत्रोमें आक्िं 
ही प्दण होगा क्योकि! इस समय कब करना चाहिये यह ओंकार और अन्त नमस्कार जोड़नी चाहिये। कुशोह 


आकांक्षा तो रहती ही नहीं तथा पक्षान्तरमे पूवयुतपनेरा | पि 
अभाव भी रहता ही है इस कारण, पूर्वाका ग्रहण होता है|? अत, पुष्प, धूप दीप, पाद्य ओर भो जनसे यथा 
यह बात नहीं है कि, इस बचनसे ही पूर्वाका प्रहण हो रहा | देवों का पूजन ऋरना चाहिये । पूजनके लिये मंत्रकोते 
हो । त्राह्म पुराणमें छिखा हुआ है कि, इसी दिनसे ब्रह्मा- | जप कर छेना चाहिये, मत्रम्‌ ? यह जातिमे एक वा 
जीने कालकी गणनाका प्रारंभ किया था | प्रह, अब्द, ऋतु, 6 ह. श्सका पेह्चनस तात्पये है, “ बहुरूपम यही मंत्र 
मास ओर पक्षोंकों सब द्वोंका समागम होनेपर सेवत्सर | विश्येषण है श्सका मिलकर यही मतलब होता हैं हि 
 भादिके अधिपोंकों दे दिया। ब्ह्माकी सभाझें अनिर्देश्य | ' ने देवोंके जुदे जुदे सत्र पडढकर उनका पूजन करे ।.' ओर 
कनुवाल अज्याजीकी सब देवता 


> और मुनि आदिकोंने नम- | "मो बह्मणे ” यहासे छेकर * ओमू विष्णवे परमास्मने नम! 
का स्तुति करते हुए उपासना की | इसके पीछे वे सब 
ऋषि मुत्ति आदि ब्रह्म 


का | अहनिक जो मुंत्र वाक्‍्योंके समुदायमें आये हुए चतु्थ्येन 
कल हक शुअप्रा कर हिमालय चछे गये, | ,वेंता शब्द ह; जिनके कि, आदनिसें ओमू और असम 

सकी पेत्त होकर अपन अपने काममे | क्षय 
हे निप्पाप ' उस सम कलह आर क 


हम | नमः छगा हुआ ड, ने सब मंत्ररूपस ग्रहण किये 
बे ह्ञाक इच्छ ; 

घारण करनवारी सभा ण्छानुसार रूप 

अनिदक्य 


भमविष्योत्तरात ॥। 










हे | जायेंगे यानी जिस देवताका पूजन करना हो ,उस 
हु बारण कप करके वो मनोहर निर्दोष | नामको चतुथ्येन्त करके उसके आदिम ओम ओ 
*...... ही थी- जस दिनसे रेकर | अत्तत नमः छगाकर उससे पूजन होता है। 


ज्रतानि | भाषाटीक 


ही 


मल! । (५9% ) 





# ७ ४. 


मंत्रा: नमो बहाणे तुभ्ये कामाय च महात्मने ॥ नमस्तेषस्तु निमेषाय चुटये च नमोस्त॒ ते ॥ 
लवाय च नमस्तुभ्यं नमस्तेइस्तु क्षणाय च ॥ नमो नमस्ते काष्ठाये कलाये ते नमोष्स्त ते॥ 
नाडिकाये सुसूक्ष्माय मुहतोय नमी नमः के नमो निशामभ्यः पृण्येब्यों दिवसेस्यश्व नित्यशः ॥ 
पक्षाभ्यां चाथ मासेभ्य ऋतुभ्यः षड़्भ्य एवं चाझयनाथ्यां च पथ्चभ्यों वत्सरेब्यश्व सर्वदा ॥ नमः 
कृतयुगादिभ्यों भहेभ्यश्व नमो नमः ॥ अष्टाविशतिसंस्येश्यों नक्षत्रेग्यो नमो नमः॥ राशिभ्यः 
करणेभ्यश्व व्यतीपातेभ्य एबं च॥ प्रतिवर्षाधिपेन्यश्व विज्ञातेश्यों नमः सदा ॥ नमो5स्त कुल- 
नागभ्यः सालयात्रेम्य एवं च॥ सातयात्रेभ्प:-सानुचरेस्यः । नमोस्तु सवदिश्य्यश्व दिकपा- 
लेभ्यो नमो नमः ॥ नमश्वतुदशभ्यश्व मल॒भ्यस्तु नमो नमः ॥ नमः पुरन्दरेश्यश्व तत्संख्येम्यों 
नमो नमः ॥ पश्चाशते नमो नित्य दक्षकस्याभ्य एव च ॥ नमोएईदित्ये सुभद्राये जयाये चाथ 
सदा ॥ सुशास्राय नमस्तुभ्य सवोश्यजनकाय च ॥ नमस्ते बहुपुत्राथ पत्नीभिः सहिताय 
च ॥ नमो बुद्धये तथा बृद्धचे निद्राये धनदाय च ॥ नमः कुबेरंपुत्राय गह्मकस्वामिने नमः ॥ 
नमो स्त शद्भपद्माभ्यां निदिभ्यामथ नित्यशः ॥ भद्रकाल्ये नमस्तुभ्यं सुरमब्ये च नमो नमः ॥ 
वेदवेदाड़वेदान्तविद्यासंस्थेभ्य एव च॥ नागयक्षसुपर्णेस्यो नमोःस्तु गरूढाय च॥ सप्तभ्यश्व 
समुद्रेभ्यः सागरेन्यश्र सवेदा ॥ उत्तरेभ्य:कुरुभ्यश्व नमो मेरूुगताय च ॥ भद्गाश्वकेतुमालाश््याँ 
नमः सबेत्र सबंदा ॥ इलावृत्ता(त')य च नमो हरिवर्षाय चेव हि॥ नमः फकिंपुरुषेब्यश्व मारताय 
नमो नम; नमोमारतमभदेभ्यों महत्यश्षाथ सबंदा ॥ पातालेब्यश्व सत्तभ्यों नरकेम्योःनमो नम9॥ 
कालाग्निरुद्रशेवाम्यां हरये कोडरूपिणे॥ सहस्यस्त्वथ लोकेभ्यो महाभूतेभ्य एवं च॥ 
नमः संबुद्धये चेब नमः पकृतये तथा॥ पुरुषायात्षिमानाय नमस्त्वव्यक्तमूर्तये ॥ हिमव- 
व्ममुखेभ्यश्र पर्वेतेभ्यो नमस्त्वथ ॥ पोराणीश्यश्व गड्भाभ्यः सप्तभ्यश्व नमो नमः ॥ नमोस्त्वादि- 
शत लकी लिन न लिन न नल मल जल कब तले जिल लश जिल मिल लीक लत जप सकल कक नर हल लि ललि न गजल पलक पत की; 


प्राथनाके मेत्र-अह्माजीको नमस्क्रार, महात्मा कामकों | नमस्कार हे | बुद्धिके छिये, वृद्धिक छिय, निद्राके लिये 
३ ० 0 कि ! 
नमस्कार, निमंषके छिय नमस्कार, तटिक छिय नमस्कार, 


| ओर घनदाके छिय नमस्कार है । कुबेर जिसका पुत्र है 


ल्वके लिय नमस्कार, तुझ क्षणके छिय नमस्कार, काष्ठाक | 
लिये नमो +मः, कलछाके लिये नमस्कार; सुसूक्ष्मा नाडिकाक | 
लिये नमस्कार, मुहतेक लिय नमोनमः, निशाक छिये. 

के, है पं । 
नमरक र, पुण्य दिवसोंक छिय नमस्कार हें। दोनोंपक्ष, | 


बारहों महीन,छओकऋतु,दोनों भयन और पांचो संबत्सरोंके 
लिये सदा नमस्कार है। कृत युगादिकोंके लिय नमस्कार 
है | ग्रहादिकोंके लिये नमस्कार है, अद्वाइसो नक्षत्रोंक्र 
लिये नमस्कार हैं| राशियोंके, करणोंके, व्यतीपातोंके, 


है; अनुचर सहित कुछ नागोंके छिये नमस्कार है, सात 
बरंबार नमरकार हैं। इन्द्रोंक लिय नमस्कार तथा उत्तकी 


है। तुझ सुशाखके लिये नमस्कार है,सब भद्योंके जनकक्े 


- १ नलकूबरयक्षाय | २ हेरण्वताय | ३ नवष्य इति च्‌ पाठ: । 
्य्ज 


7 0१ 


एस महापुरुषुके लिये नमस्कार हैं । गुझ्कोंके स्वामीके 
लिय नमस्कार हे । शख और पद्म इन दोनोंके खजानोंके 
लिय सदा नमस्कार है । है भद्रकाली तेरे छिय नमस्कारहे, 
है सुरभी ! तेरे लिय वारंवार नमस्कार है, बंद बेदांग और 
बद्ान्तकी विद्या संस्थाके छिय नमस्कार है । नाग, यक्ष) 


| सुपर्ण ओर गरुडक छिय नमस्कार है, सातों समुद्र और 
गेंवे लि पु 8 बज 38 ७. 
$ सागरोंके लिय नमस्कार है, उत्तर कुरुके लिय और मेरुके 


रहनेवालोंके लिय नमस्कार हैं। भद्राश्व॒ और केतुमाछके 


| लिय' सब जगह सदाही नमस्कार हैं, इलावृत्तक छिय; 
५ गोंव कि व 
अतिवरषक अधिपोंके और विज्ञानोंके लिय सदा नमस्कार | 


हरिवषके छिय और किंपुरुष वर्षक लिय नमस्कार है। 


लिये २ | भारतदशके बंड बडे भदोंके छिय नमस्कार है; सातों- 
यात्रका मतढब अनुचर सहितस है । दिशाओंक छिय | 

छ्‌ फ चर कर : 
ओर दिक्‍पाछोंके ल्यि नमस्कार है, चौदहों मनुओंके लिये | 


पाताल और सातों नरकोंके लिये नमस्कार हे, कालछाप़्नि- 
गेंके घट और, 
रुद्र और शिव दोनोंके लिये नमस्कार है, वाराहरूपधारी 


| ५ रु पु गेंक ५ पु 

नमक ६ | भगवानूके छिय नमस्कार हैं, सातों छोकोंक छिय और 
संख्याओंके लिय नमस्कार हैं, दक्षकी पचासों कन्क्षओंके 
लिय नमस्कार है द्वि सुभद्रा और जयाके छिये नमस्कार | 


महाभूरोॉंके छिय नमस्कार है,सबुद्धिक लिये और प्रकृतिक 
लिये नमस्कार है पुरषके लिये और अभिमानक्‌ लिये 


है | एवम्‌ अव्यक्त सूर्तिके लिये नमस्कार हैं; हिमवानसे छेकर 
॥। 3 अल | ऊ ७ 
लय नमस्कार हे, पत्नीयों करिके सहित बहु पुत्रवाछू तुझे 


जो मुख्य पवत हैं उनके लिये नमस्कार है, पुराणोंमें आईं 





रा 


















[ ७२ ) ब्रतराज* । हि 


>>. | [िौि गए णण आओओओ०िओओ ६,7५० अकबर 






7 00 2002४: //00/007 7:४0 0/00 








हा 


मुनिश्यत्ष सतम्यश्वाथ सर्वदा ॥ नमोषस्त॒ पृष्करादिभ्यस्तीर्थेभ्यश्ष पुनःछुनः पे । नम्नगाश्य 
नो लित्य॑ वितस्तादिभ्य एव च ॥ चतुर्देशभ्यो दीांभ्यो धरणीम्यों नमो की नमो पड़ 
विधाने च च्छन्दोभ्यश्व नमो नमः ॥ सुरभ्येरावणाभ्यां च नमो भूयों नमोनमः 0 नमस्तथोडे 
श्रवसे छुवाय च नमो नम/॥। नमोस्ठ धन्वन्तरथ शखाखाभ्यां नमो नमः । विनायककुमाराध्य 
विश्नेम्यश्य नमः सदा ॥ शाखांय च॑ विशाखाय नेगमेयाय वे नमः | ५ नमः स्कन्दमहेध्य 
स्कन्द्मादृम्य एव च॥! ज्वराय सेगपतये भस्मश्हरणाय थे ॥ ऋषिश्यों धालखिल्पेभ्यः केश 
धाय नमः सदा ॥ अगेस्तये नारदाय व्यासादिभ्यों नमो नमः ॥ अप्सरोभ्यः सोमपेम्यों दें 
ध्यश्व नमो नमः ॥ असोमपेम्यश्व नमस्तापितेभ्यों नमः सदा ॥ दिभ्येम्यो नमो नित्य दाद 
शब्यश्व सर्वदा ॥ एकादशब्यो सद्रेभ्यध्तपस्विभ्यों नमो नमः ॥ नमो नासत्यदश्लायामब्िम्य 
नित्यमेव हि॥ साध्येभ्यों द्रादशभ्यश्व पोराणेभ्यों नमः सदा ॥ एकोनपञ्थाशले च मरुद्धद् 
तप्तो नमः ॥ शिल्पाचार्याय देवाय नमस्ते विश्वकमणे ॥ अष्टभ्यों लोकपालेभ्यः सातगेश्यश 
सर्वदा ॥ आयुधभ्यों वाहनेंभ्यों वर्मभ्यश्व नमः सदा ॥। आसनभ्यो दः्दुलिभ्यों देवेम्थश्व नम 
सदा ॥ देत्यराक्षसगन्धवपिशाचेम्यश्व नित्यशः ॥ पिठ्भ्यः सप्तमदेभ्यः प्रतेभ्यश्व नमः सदा) 
सुसू्ष्मेभ्यश्व दवेम्यो भावगम्येम्थ एव च ॥ नमस्ते बहुरुपाय विष्णवे परमात्मने ॥ अथ कि 
बहुनोकेन मंत्रेणानेन वाचयेत्‌ ॥ प्राइनुखोदइमुखो (वेप्रान्‌ देवाल॒दिश्य प्वेबत्‌ ॥ अथवा 
'केमत्र विस्तरेण ब्राह्मणानेव देवतोदेशेन पूजयेदित्यथे! ॥ पूरवेवत्‌ मन्जोक्तकमेण ॥ अध्यः उप्प्य पे 
वद्धमाल्येः सुहष्टकम) सुहृषफम-सरोपा्ं हडरोमा सन्नचयेदित्यथ: 'धनवधाम्यालु विभवेदेक्षिणामि ' 
सदा ॥ इतिहासपुराणानां प्रवक्तृश्व द्विजोत्तमान्‌ ॥ कालज्ञान्वेदवेदज्ञान्‌ भृत्यान्‌ सम्बन्ध 
बान्यवान ॥ अनेनेवतु मंत्रेण स्वाहान्तेन प्रथकप्ृथक्‌॥ मविज्ञायाग्रये होमः कतेव्यः स्वेतृतये॥ 


हुईं सादों गेगाओंके लिये नमस्कार है । सातों आदि | शिल्पाचार्य्य देव विश्वकर्माके लिये नमस्कार हैं, अपने भहु 
पनियोंके लिये सवंदा नमस्कार है पुष्करादि तीथाके छिये | यायियों सहित आठदों छोकपालोंके लिये नमस्कार है 
वारंबार नमस्कार हैं, वितस्ता आदिक नदियोंके लिये | आयुध, वाहन और कवचोंके लिए सदा नमस्कार है। 
वारवार नमस्कार है, चौदहो बडी बडी धरणियोंके छिये।| आसन दुदुभि ओर देवोंके छिये नमस्कार हैं, देत्य, रास 
नमस्कार हैं, धाता विधाता और हन्दोंके छिय नमस्कार | गन्वर्/ पिशाच, पिठ और इनके सप्तभेदवाले प्रेत इ 
है, सुरभी और ऐरावणके लिये वारंवार नमस्कार है, | सबके लिए सदा नमस्कार हे | अत्यन्त सू क्ष्मोंके हिये. 
उच्चे:अवाके लिय और ध्बके लिये नमस्कार है, धन्वन्त | बैक फिय आर भव्य क लिये गा बहु 
रिजी एवम्‌ श्र अम्लोंके लय वारंबार नमस्कार है।। ले विष्णुके छिये नमस्क्रार ह.। अथवा बह 


विनायक कुमार और विप्नेशोंके लय सदा नमस्कार है. 














। 



















| कहनेसे क्‍या है, अपना पूरब सुख करक्रे वा उत्तर भू 
ला | करके.पहिलेकी तरह देवताओंके उद्देशसे ब्राह्मणोंका पूजा 
शाख विशाख और नेगमेयके लिय नमस्कार है, स्कन्द-| करदे। “अथ कि बहुना” इस खलोकका निबन्ध करे 
प्रहों और रकेन्द माठकोंके लिय नमस्कार है ज्वर रोगपति| स्वयम्‌ अथ करते हैं. कि, यहां विस्तारसे कया प्रयोजन 
, और भस्मप्रहरणके लिये नमस्कार है. वष्छखिल्य ऋषियों | देवताओंके उद्देशसे आाह्मणोंका ही पहिले की तरह महं 
और केशव भगवानके छिय सदा नमध्कार हे,अगस्थ्यजी, 


| ऋमसे पूजन करदेना चाहिए । अध्य, पुष्प, धूप - वस॑ ओोए 
नारद्जी और व्यासजीके लिय वारंबार नमस्कार है, | माल्यसे सुहृष् रोमा होकर पूज, रोमांच सहितको हुं 
अप्छराओंके ढिये और सोम पीनवाले देवोंके लिय वारंवार | ४क कहते हैं, हष्टरोमा होकर पूजन करे, यह सुहृष्टकर्क 
हक हे असोमपाओंके ड्यि एवम्‌ तुधित दवोंके ल्यि | अथे है । केवछ अर्ध्यादिकही नहीं किन्तु धन घान्य भा 
; हब ०35 आर पा कक । दा आम सदाही सं घुपणोक शा 
* नमस्कार ३, नासत्य, दस, अश्विनीकुमारोंके लिय हक कक रे वेद गे के डक ल् रे [ दा 
तमस्कार है, पुराणोंके कहे हुए बारहों साध्योंके लि तय | कर तथा कप और बान्धवोंकासी स्का: 
कमा कारे | ये सदा | करे इसी स्वाहान्त सन्त्रसे सबकी दृप्तिके आ४ 


 उन्चा के छिय हे ४ 
सरों सरूतोंके लिय नमस्कार हैं, | अलग अछग यविष्ठ अप्लिंम हवन करना चाहिए, 


ब्रतानि, ! धाषाटीकासमेत: ! 


( ड्टे-) 





वेदविश्वक्षपी दत्वा सथाने प्रधधानिके रूदा॥ य्विष्वाय श्रेष्ठाय । वेदबित बेदोक्त विधिज्ञः ॥ मद्ररत्ने तु 
वेदबादिति पठिता वेदोक्ताविधिनेति व्याख्यातम)। चक्लुपी आज्यमागोी ॥ आधानिके स्थाने प्रच्चाज्होग रम्मे॥ 
होमारम्भे ततः कुंयोन्मड्रलारम्भर्ण नरः दनरत्न--झालाहाऋा तता कुयोब्मड्रलालम्भन 
ततः३ ॥ इति पाठ:॥ भोजयित्वा द्विजास्सवान्सुहत्सम्बन्धिबान्यवान ॥ विशेषण च भोक्तव्य॑ 
कार्येश्रापि महोत्सवः ॥ नवसंवत्सरारम्भः सर्वेसिद्धिमवर्तकः ॥ इति संबत्छशरम्भविधिः 
आरोग्यप्रतिपढ़्तम्‌ | अथात्रेव विष्णुधमॉत्तरोक्तमारोग्यपरतिपद्गतमा। पुष्कर उबाच ॥ संबत्सराव- 
साने तु पश्चदश्यासुपोधितः ॥ प्रातः प्रतिपदि ह्लातः कुयोद्रतमनन्थधीः ॥ पूजयेद्धासकर देव 
वर्णकेः कमले कूते ॥ वर्णकेःरक्तनीलबेतपीवादिनः ॥ शुद्धेत गन्धमातल्येन चन्दनेब सिलेन च ॥ 
तथा कुम्दुरधूपन पघृतदीपेत भागव ॥ कुन्दुर। शहकीनेयासः '। अपूप:ः सकलदका परमान्नेन 
भूरिणा ॥ सेकतेः शकराविकारे॥ ओदनेन च शुक्केन, सता लवणसपिषा॥ ता उत्तग्रेव ॥ क्षीरेण च 
फलः शुक्लबहुबाह्मणतपंणः॥पूजगित्वा जगद्धाम दिनभागे-चतुर्थकेा! आहार प्रथम कुयोत्सपृत 
मन॒जोत्तमासवब च मतुजश्रेष्ठ पृतहीन विवजयेत॥ झुकवा च सकूदवान्नमाहार व समाचरेत्‌ ॥ 
पानीयपान कवीत ब्राह्मणालुमले पुनः ॥ प्रथममाहारस प्रथमग्रासय । सबसे -प्रथममप्रथम चाइरस ॥ 


 आक.] 


सकृददान्र भुक्वां इकमव आस भक्षायंताओाशहछमज्ञ स्यननत्‌ ।। आह्यणावुमत्या पुनराहारमवाशदान्नभाजन 


इक के की (0०, है 20% 2. 


पुनः पानीयपान व कुयोदित्यथे॥बाह्मणानुसत्या झुझ्जानोपि पृतदीन न सुझीत घृतहीन विवजघोदिते निषेधात्‌ 
हु 


संवत्सरामिद कृत्वा ततः साक्षात्रयोदशम्‌ ॥ पूजन देवदवस्थ तस्मितहलनि ७ 


॥ संदरक्लर 


प्रतिमास शुकहप्रतिपदि ॥ त्रयोइशमिति लिड्दशेनात ॥ सवबस्य सहिरण्यं च ततो द्याहिजतये॥पूजनम्‌ 


| आफ.  आक 


इुजापकरण बातपग्रार 





यह वेदविदक हाथसे होना चाहिये। दोसों प्रधान दवोंके 

लिय प्रधान आधब्य भागोंको प्रधान होंममें छसही देना 
कप २ 9 घ 

चाहिये, यव छिका मतलब श्रेश्डस है, बेद विदका सतलब 

क्र (९ गेंक कक कक. हे 

वेदकी कही हुई विधियोंको जाननवारूसे है | मदनरंत्न 

ग्रन्थोमें तो बेदविद्की जगह बदवत्‌ ऐसा पाठ रखकर 


इसका वेदोक्तविधि अथ्‌ किया हैं; चक्षुपीका मतछ॒व आज्य 


भागसे है; प्राधानिक स्थानका अथ॑े, प्रधान होमारंम है। 


मदनरत्नम लिखा हे कि, पीछे मंगलाचरण, शात्मको 


संवत्सरारभविधिः !। 


- अथ आरोग्यप्रतिपदूत्रतम्‌-विष्णुधमात्तर पुराणमें आरोग्य 
प्रतिपदूका ब्रत कहा है पुष्कर बोछे कि, संवत्स 


करना चाहिये | छाछ; नीछा। सफ़ेद और पीछे आदिको 
वणक कहते हैं, हे भागंव ! शुद्ध गन्धमाढास, सफेद्चन्द्‌ 





बलेनानेन धर्मन्ष रोगमे्व व्यपोहति।अरोध्यमाप्नोति गाते तथार्थांयशस्त 





कीके निर्यामकों कहते हैं । संकतके पूओंस, दृधिसे तथ 


4५ ३ अर 
 बहुल्सी खीरसे ( शकराके बने हुओंको सेकत कहते है 


सफद भाव्स भर स्तम्सम्क अर रुहघीक पदाथोसे 
सत्‌ छत्तमकों कहते हैं| क्षीरसे ओर उत्त सफेद फ्‌ठॉसें 
जिनसे बहुतसे ब्राह्मण तृप्त होसकें, इंस सबसे जगद्धास 
सूर्यका पूजन करके श्रेष्ठ मनुप्यको चाहिये कि दिनके चौथे 


| भागमें घृत सहित प्रथम आहार करे तथा कोई भी चीज हो 
इसकेबाद होमारंभके निमित्त, संगछारंभ करना चाहिये ।। पर बिना घीके होतो सबको छोड दे; एक श्रास ही उस 
' अन्नके आहारको करे; फिर ब्राह्मण आज्ञा दे तब पान्तीयका 
सजाकर चाहिये। सब ब्राह्मणोंको, मित्रोंकी, संबन्धियोंको | पात्त करे। प्रथम आहारका देतरूब पहिके म्राससे है, धरृत 
और बान्धवोंकों सानुरोध भोजन कराके पीछे आव भोजन | हीन चाहे पहिछा ग्रास हो, चाहें दूसरा हो, उस छोड दे । 
करना चाहिये, महोस्सव भी होना चाहिये, यह नये संब-| एकहीवार अन्नको खाकर यानी एकही ग्रासको खाकर, 
स्सरके आरंभकी विधि सब सिद्धियोंक्रे देनेवाल्ी है। इति। बाकीको छोडदे ब्राह्मणोंकी सछाहसे फिर बाकी आहारका 
| भोजन करके पानी पीना चाहिये, जाह्मणोंकी आज्ञासे 
| भोजन करता हुआ भी घृत हीन वस्तुका भोजन न करना 
| चाहिय | क्‍यों कि ध्ृृतहीनकों न खाय, यह' निषेध हे। हे. 
रकी समाप्तिमें पन्द्रसके दिन उपवास करके पग्रतिपदके | सागेव |! एक सारूतक इस ब्रतकों करते हुए तेरहों प्रतिप 


दिल, प्राबः काल स्नान करके अनन्य चित्त होकर ब्रत करे, | दाओंको देव देवका पूजन करना चाहिये! शुक्ला प्रतिप- 


वणकोॉस बनाये हुए कमलॉपर, सूर्य नारायणका पूजन | 


दका प्रतिमास संवध्सर ब्रत करना चाहिये। क्योंकि, त्यो 


| दश यह लिखा हुआ है । इसके वाद वस्मसहिल सोना और 
| पूजनके उपकरण अतिसा आदिकोंको ब्राह्मणको दे देन 
नसे; कुन्दुरूकी घूपसे तथा घुतसे दीपकस। कुन्दुरू-शछ- | 


चाहिये, इस ब्रतके प्रभावस ब्रती अपने सब रोगॉंको नष्ट- 





१ वज्नलि इति पाठान्तरम्‌ । 


(५७ रे 





० ०&9&9०» 99 9 न कि ललननमसम०७१3७७७भा०ा नव 





पाम्यावविपुलांश्व भोगाव । बतेन सम्यक्पुरुषो5ध नारी संपूजयेद्यः 


श्रतराज। | 


 प्रतिपद- 





तु जगत्मधानम्‌ ॥ जगत 


पानम्‌-' सूर्य ॥ इति चेत्रश॒क्कश्नतिपद्यारोग्यदायकत्रतम्‌ ॥ विदयाग्रतिपद्रतम्‌ ॥ अस्यामेवोक्त विद्या 
मदनरत्ने विष्णुधमें॥ मार्कण्डेय उबाच ॥ अष्टपत्न तु कमल॑ विन्यसेद्रणकेः जशुभेभातद्माणं कि. 


कायां तु स्यस्य संपूजयेद्रियम्‌ ॥ ऋग्वेद पूर्वपत्रे तु यजुर्वेद तु द| 


९+ 


चाथवर्ण तथा ॥ आम्रेये च तथाड्रानि धर्मशाखत्राणि नेकते ॥ 
सोपवासस्तु पूजयेत ॥ 


न्यायविस्तरम्‌ ॥ एवं विन्यस्थ धर्मज्ञः 


बा 


केणे ॥ पश्चिमे सामवेद॑ तु उदछ 
पुराण चेव वायव्यामीशापय्य 
चेजशुक्रमथार»य सोपवासो 


जितेन्द्रियः ॥ सदा प्रतिपदं पराप्य शुक्ृपक्ष स्थ यादव ॥ संवत्सरं महाराज शुक्कगन्धालुलेपने॥ 
भूषणेः परमान्नेन धूपदीपेरताद्धितः ॥ संवत्सरात्ते गां दद्याद्डते चीणे नरोत्तम ॥ इदं ब्रत यस्तु 


'करोति 


राजन्‌ स वेदवित्स्याद्धावि धर्मनिष्ठ॥कृत्वा सदा द्रादशवत्सराणि विरिश्विलोक॑ पुरुष 


प्रयाति ॥ इति विद्याप्रतिपद्गभतम्‌ ॥ तिएकअ्नम ॥ अथाज्रैव भविष्योक्त॑ तिलकब्रतम्‌ ॥ श्रीक्षष्ण 


उवाच ॥ वसन्ते किंशुकाशोकशोमिते प्रतिपत्तिथि: 


॥ शुक्का तस्यां पक्ुर्वीत सता निय- 


ममाश्रित;॥॥अनेन सामान्यतो वसन्तसम्बन्धिशुक्षप्रतिपल्लाभेषि तया ब्रतामेद चत्रे गहीत॑ द्वित- 


संनिधावित्यप्रिमवचनातरो धाज्चेजरशुक्षप्रतिपदेव ग्रह्मा 
वताः ॥ नद्यास्तीरे तडागे वा शहे वा तदलाभतः 


॥ नारी नरो वा राजेन्द्र संतर्प्य पिन 
॥ पिष्टातकेन विलिखेद्वत्सरं पुरुषाकृतिम ॥ 


पिशतकः एट्वासकों गन्षद्रव्यचूणविशेषः | ततश्रन्दनचूर्णन पुष्पधूपादिना।चयेत ॥ मासतेनामश्नि: 


_ पश्चान्नमस्कारान्तयोजिते: 


॥ मासतुनामामिः-चेत्रवततन्तादिनापानिः ॥ पूज़येद्राह्मणो 


विद्वान्‌ मंत्रेवेंदो- 


दितः शुन्ने।। संवत्सरोसीति पठल्मस्त्र वेदोदित॑ द्विज:॥ नमस्कारेण गण 77777 नमस्कारेण मंत्रण झद्रोपीत्थ मपूजयेद। श॒द्रोपीत्थं मपूजयेत॥ 


कर देता है, चाहें पुरुष हो चाहें ख्री हो इस ब्रतस क्‍ 
जगत अधानको पूजता है वो आरोग्य प्राप्त करता है तथा 
उत्तम गति यश और अनेरू भोग उसे प्राप्त होते हैं। यहां 
जगत्‌ प्रधान सूयेको कहते हैं । यह चैत्र शुक्ला प्रतिपदाका 
आरोग्य दायक ब्रत पूरा हुआ ॥ 


अथ विद्याप्नतिपद्रतम्‌ । 


इसी चेन्न शुद्भा प्रतिपदाको विद्यात्रत होता है । यह 

£ गरत्नसें विष्णुधर्ममें छिखा हुआ है। मार्कण्डेयजी बोले 

* कि, सुन्दर रंगोंस अष्टद्डकमलछ बन ,, अद्याजीको उसकी 
कणिकापर बिठाकर उन्तका पूजन करना चाहिये। पूर्व 
>तपर ऋखेद, दक्षिण पन्नपर यजुर्वेद, पश्चिम पत्रपर साम- 
| तथा उत्तर पत्रपर अथवबेद लिखना चाहिय । बेदा- 
जे की आउनंयमे तथा धम्ेशाश्रोंको नेऋत्य कोणके पत्रपर 
(या वायव्यकोणके पत्रपर पुराण और इंशानमें न्‍्यायका 
विग्तार लिख धर्म जाननेवाढोंकों चाहिये कि उपवास 
तक पूजन करें। हे यादव ! चैत्र शुक्का प्रतिपदास छकृर 
प्रत्यक मासकी 
' त्रतको करे, 
आह्स्यराहित भ्षणोंसे 
धूपरीपस ब्त मनाता रहे । सवत्सरक पीछे ब्रत ला 
बहुओे .ओ। गंक दान करे, हे राजन्‌ | जो पुरुष इस 
त्रतको करता हे वो बेदोंका के हर पतन करें कया शासमार भरोसे रह भी ह धामिक बनता है 









2 रू 
१ त्स्यति पाठ तस्य कम्रद्धस्य कार्णकायामित्यर्थ: | 


त्ररह वष इस ब्रतको करके ब्रह्म छोकमे चढहा जाता है। 
तिलकत्रत-भविष्यपुराणमें कहा है। श्री कृष्ण बोढेक़ि 
ढाक शुक ओर अशोकसे भोभित हुए वसन्तम शुब्ञप्रति 
पत्‌ तिथि आती है, उसमें नियम लेकर स्नान करना 
चाहिये। इस वाक्स सामान्य रूपसे वसन्‍्तकी शुद्डा प्रहि 
+२का छाभ होनेपर भी यह जो अगाड़ी छिखा हुआ है 
कि, उसने यह ज्व चेजरमय ब्राह्मणोंके सन्मुखत्र गहण किया 
॥/ इस वचनके अनुरोदस चेत्रशुर्ला प्रतिपदा ही हेगी 
चाहिये; हे राजेन्द्र ! श्ली हो वा पुरुष हो उसे नदींके 
किनारे अथवा)तडागपर यदि ये न मिल तो घरपर ही 
पितृ-दृवत्ताओंका भल्ती भांति तपंण करके पिष्टातकर 
भनुष्य जैसी आक्ृतिका संवत्सर लिखना चाहिये। पिष्ट 
तकको पटवासक कहते हैं; यह एक सुगन्धित वस्तु 
चूरण है । इसके बाद चन्द्नक चूणस और पुष्प धूपादि- 
कैसे उन्हें पूजे | पीछे नमस्कार छगाये हुए मास और ऋतु: 
ओके नामसे अथात्‌ मास चैत्र आदि और क्र्तु 
पसन्तादिके नामसे शुभ वैदिक अंत्रोंद्ारा, विद्धार, 
आ्ाह्षणको चाहिये कि, पूजन करे । द्विजोंको चाहिये 
कि ५ संबत्सरोडसि ” इस वेदके संत्रको बोहो 
हुए पूजन कर तथा नमस्कार | मरत्रोंसे शूद्र भी इसी 


ब्ताति भाषाटीकासमेतः | #.. हक) 






परिवत्सरोःसीत्यादियज्ञुवेदमसिद्धों मन्त्र: ॥ नमस्कारेण मन्तेण संवत्सराय ते नम इत्यादिना ॥ 
एवमभ्यच्य वासोष़िः पश्चात्तममिवेष्धयेत्‌ ॥ कालोड्वेमूलफलेनैंवेधमोंदकादिभिः ॥ ततस्वत॑ 
पूजयेत्पाथ पुरः स्थित्वा कृताअलिः ॥ भगवंस्त्वत्मसादेन बने क्षेममिहास्तु मे ॥ संबत्सरोप- 
सर्गा में विलय यान्त्वशेषतः | एवमुक्त्वा यथाशकक्‍त्या दत्वा प्राय दक्षिणाम्‌ ॥ ललाटपढ़े 
तिलक कुर्याचन्दनपड़जम्‌ ॥ ततः अमृत्यठ दिन तिलकालंकुतं मुखम॥घाये संवत्सर यावच्छ- 
शिनव नभस्तलम॥एव नसे वा नारी वा ब्रतमेतत्समाचरेव्‌ ॥ सदेव पुरुषव्याप्र सोगान खुधि 
झ्ुनक्त्यसों ॥ भूतभेतपिशाचा ये हुवोरा वरश्िणों अहाः ॥ निरथ्थका भवन्त्येते तिलक वीक्ष्य 
तत्क्षणात्‌ ॥ निरथेकाः प्रयोगनशझ्ूस्या। । अनिष्टकरणे अप्तमर्था इत्यर्थ। ।। पूर्वमासीममहीपालो नाम्ना 
शबुअयो जयी ॥ चित्रलेखेति तस्या$भूद्भाय्यो चारित्रभूषणा ॥ तया ब्रतमिद॑ चेत्रे ग़हीत॑ द्विज- 
सत्रिषों ॥ वत्सरं पूजयित्वा तु ध्यात्वा देव॑ जनाईनम्‌ ॥ हन्तुमाक्षेतुकामों वा समागच्छति यः 
पुनः ॥ प्रयाति भियकृत्तस्था दृष्ठा तु तिलक नरः ॥ सपत्नीदर्पापहरा वशीकृतमहीतला॥भर्ु- 
देद्ठा अहष्ठटा सा छुखमास्ते निराकुला ॥ यावद्जेनानिभूतो भर्ता पुत्रः सवेदनः॥ शिरोतिना 
संभ्यातः सुहृदां सुखदायकः ॥ शिरोतना संप्रयातः शिरोवेद्नय। युत ॥ घमराजपुरात्माताः सर्व- 
भूतापहारकाः ॥ तस्मिन्क्षणे महाराज धमेराजस्य किंकराशतस्या द्वार्मतु॒मापाः अविष्टा हे 
मखसा ॥ शबुखय समानेतु कालमृत्युयुर/सरा॥ पाये स्थितां चित्रलेखां तिलंकालकृताननाम ॥ 


शुद्रोपीत्यनेन तु ख्रीगों परिप्रह॥ तासां विशेषविध्यभावे वेद्किमन्त्रानधिकारात । 





तरह पूअ,वहां शूद्र शब्दसे ल्लियोंका भी ग्रहण होता हे कि, 


_अनननालक फकना भाकतशान नानना 





ननीनना जा 


हह निर्णय हुआ भा । 





थ प् के, । वर्ष भर क्षेम रहे, एवम्‌ इस सालूके भेरे जिन्न नाशको प्राप्त 
ख्ियां नमस्कार मंत्रस पूजत करे क्योंकि विशष # विधिक | 
विना लियोंको वेदिक मत्रोंका अधिकार नहीं ह । “'संव- | जैसे चन्द्रमासे वभस्तल सुशोभित रहता हैं उसी तरह उसी 
त्सरोर्शल”' परिवत्सरोडसि” यह यजुवेंदुका असिद्ध भत्र | दिनसे मुख भी चन्दनस अछक्षत रहना चादिय; प्रति दिन 
है) इस मंत्रको मय अथके यहीं लिखे देते हं-ओमू संवत्स- | म्राथपर चन्दनका तिछक करना चाहिये। हे पुरुषव्याप्र ' 
रोधंस, परिवत्सरोउसि, इद्ावत्सरोडसि, इंदूबत्सरोडंस | थ्ली हो अथवा पुरुष हो, जो इस त्रतको एक साहू तक 
उषसस्ते कल्पन्तामहारोत्रास्ते कल्पन्तामघमासास्व कल्प- | करता हे, वो भूमडछमें दिव्य भोगोंको भोगता है । भूत, 
न्ताम्मासास्‍्ते कल्पन्वामतव॒स्ते कल्पन्ताम्‌ संवत्सर॒स्ते कल्प- | सबे 

न्ताम्‌॥ प्रेट्याउएल्े सच्चात्व प्रच॑ सारय छुपण चिद॒सि । 
तया देवतयाउद्ञलिरस्वदू घवः सीद ॥ हैं. दव ! आप संब- | रथ न शूर कि >> 
अर बव्यर अलत्ल आ 6 त्स ही।।। रथंक यानी प्रयोजन शून्य, जो किसी तरह भी अनिष्ट 


ह । «७ | गे करसक | पहिझूे एक श्ेश्वय नामक जयी राजा था 
इुष, अहोरात्र, अधुंमास, मास, ऋतु ओर संवत्सर आपमें | हे 
ह। आप आन जानेके किये अपना संकोच आर विकाश | 
लेते त्य | ५ 
होते हैँ । हे 32330 कक ह इक पक | किया था बथा संवस्सरका पूजन करके भगवानका ध्यान 
वि क्र ७ ऐप ! कि ४ ज्स ने दिये द् 
यानी आम्‌ सवत्सराय ते नमः इद्यादि भेत्रोंस पूजन करना | “या । जो को३ उसे सारनेके डिये भी आता था वह चित्र 
चाहिय । फिर वस्थोंसे उसे वेष्टित कर देना चाहिये । फिर | लक कक ४ . 
मूछ फल नेवे्य और से संबत्सरका पूजन | "पा था.। इसके सामने सोौतोंका अमभरमान चूण होता था, 
सामयिक मूछ फल नेबेद्य और मोद्कोंसे सवसत्सरका पूजन | सब्र इसके बच्च थे, यह अपने पतिका मुख देखकर असन्न 
करना है को डक सामने 4538 हांथ जोड़कर | 
करना चाहिय कि, है भगवन, आपको क्ृपास यहां मेरा | :. _- पञ्ष सहदों रा 
हे हर बम | थीने इसके पतिकों मार डाछा उतनमें सुहृदोंका सुख देने- 
< विभिन्न जातिकीं बीक्षके लग भग,ल्रियां ऋगेदमें ऋषिका देखी | 
जाती हैं गागीं आदि अनेक बिहुषियोंका प्रसंग उपनिषदोंमे भी पाया | 
जाता है, इतिहास और पुराण भी इससे शुन्य नहीं हैं; काशीके | 
प्रसिद्द विद्वान न्‍्वाखाल दासजी न्‍्यायरत्न तथा आहिताभमि त्रिका- | 
लद॒शी पे, वेशीघरजी अभिहोत्रीका बरतों शाह्नार्थ।चला था, अमिद्दो- | 


श्रिथोंकी ल्लियोंको छोडकर किसीको भी वेदमत्रोंका अधिकार नहीं है | 


हो जाये, पीछे अपनी झक्तिके अनुसार दान देना चाहिये। 


प्रेत पिशाच और एस बरी तथा ग्रह जिनका निवारण ह्ठ 
न हो सके वे इस तिछऋको देखते ही निरथक हो जाते हैं, 


उसकी चित्रहुःखा नामकी ख्री थी, जो परम चरित्र शालि- 
नी थी । उसने यह ब्रत चेन्रम्तासमें जाह्मणोंके सामने १्रहण 


छखाके विछुककों देखकर उसका शुभ चिन्तक बनकर 


रहती थी इस कोई आकुछता नहीं थी, जितनेर्भ मत्त हा+ 


वाला पुत्र शिरकी पीडास मर गया, वहां सब भूवोंकों 
लेजानेवाले धमराजक पुरसे प्राप्त हुए। हे महाराज |! उसी 
क्षण धधराजके किंकर चित्रछेखाक द्वारपर भाये और झढ 
घर घुसगये ये काल मृत्युके अगाडी चलनेवाले थे, शब्वुज- 
यको छूनकलिय आये थ, पर उसके पाश्चवमें तिछक ढूगाये 
हुए चित्रलेखा बेठी- हुईं थी, उस देखकर उनका संकल्प 


नष्ट होगया और वापिस चढ़े गये । हे भारत | उन्तके चढ़े 


(५६) 


[ै.+०९-०-०++ ३९ १०-०००++/7-: न कीकीशा:4-२०० पक + 


+ 
+ | 
पिडप् पद का एड यशा 280920/58 22604 0 6470 00047 70 008 १२०३४ 278५ 
[वक उछरकाअटप कमा कम 5प 7 पकएदर १ मम 0 7 57220 67622 60020 थ 20047 60/20/2086 7४९80 5 20/00/5000 4 06004 % 6000 23007 20% 706, 32222 
८ सनक कि 22 काका क न पद प्यार पेट मल एप एस पा कक आइए फट एक 22777 22 22) 22960. 23.3; 









इृं्ठा एजट्ट अदएपःर पराक्त्यथ गताई$ युन३ ॥ गतेषु तबु स ठप पुश्रण सह भारतानीरुजो बुभुजे 
भोगान्‌ पूर्वकर्माजताज्छुमान्‌॥ अऋरेण समारूषातं मम पूव युधिष्ठिर ॥ एतब्रिलोकीतिलका- 


प्रतिपदे+ . 


८0१४0 2०३४४ 220 | क! ऐ 
| 


ख्पभूजर्ण पुण्यत्नत॑ सकलदुष्टहर॑ पर च॥ इत्थं समाचरति य। स सुख विहृत्य मत्यः प्रयाति 


हल प 


पद्मच्यतमिन्दमोले! ॥ इति तिलकब्तम्‌ ॥ अस्यामेव नवरात्रारम्भः ॥ तलत्र पराझुता आध्या॥ 
अमायुक्ता न कतेव्या प्रतिपच्चाण्डिकाचने ॥ अहूर्तमात्रा कतंव्या द्वितीयायाँ गुणार्विता | 
अन्रेव प्रगादानमुक्तम्‌ ॥ अतीत फाल्गुने मासि पाते चेव महोत्सवे । । पुण्येईह्चि वब्त कथित प्रपा- 
दान समारभेत्‌ ॥ ततश्रोत्सजयद्विदाव मन्जेणानेन मानवः ॥ प्रपेयं सर्वसामान्यभतेभ्यः पति: 
पादिता ॥ अस्याः प्रदानात्पितरस्तृप्यन्त हि पितामहाः ॥ आनिर्वाय ततो देय जले मासचतु- 


ट्टयम्‌॥ पपां दाठमशक्तेन विशेषाद्धममीप्छुना॥ प्रत्यह॑ घर्मघटको वस्थसंवेछिलाननः॥ 


बाह्मणस्प गहे देयः शीतामलजलः शुतिः॥ एप धर्मंघटो दत्तो अद्यापिष्णशिवात्मकः॥ 
अस्य भदानात्सकला मम सन्‍्त मनोरथाः॥ अनेन विथिना यस्तु धर्मकुम्भ॑ प्रयच्छति॥ 
प्रपधादानफर्ल सोएि आाप्नोतीह ने संशय: ॥ इ्ति अपादानम्‌ ॥ अथाचारपाप्त रोटकत्रतम्‌ ॥ तह 
आवणशुक्कप्रतिपत्सोमवारथुता यदा तदा श्रावणे प्रथमलोमवारें वा प्रारभ्य साद्धमासत्रग 
कार्यमू ॥ तिथ्यादि संकीर्त्याधिकसौमाग्यसंपूर्णलंपत्तिकामः श्रीसोमेश्वरप्रीत्यथ रोटकब्त॑ 
करिष्ये। इति संकरूप्य प्रत्यहं॑ कार्तिकशुक्लचतुर्दशीपर्य/ल 


सोमेश्वरं साम्बं॑ पूजग्रेत ॥ तत्र 


+ 
| 


पृजञाविधिः ॥ मासपक्षाइलिर्प श्रीसोमेश्वरतरीत्यथ गहीतरोटकद्गताडुत्वेन विहित॑ श्रीसोमे- 
.रएजर्न कारेध्ये इति संकल्प्य पूजां कुयोत्‌॥ एवं कार्तिकशक्नचत्॒दशीपर्यन्तं पक्‍्त्यहं कथा- 


अवणपूर्वक बिल्वदलेः 
दिल्लिः संपूज्य प्रातः 
स्वयं शुझीत ॥ 





'अ॥/* बे. उकताएच्टर, 


जानेपर राजा पुत्रके साथ रोगरहित होगया, तथा पूर्वक- 


मंस संग्रह किये हुए पवित्र भोभोंकों भो तने छगा, हे युधि- 


(८२ : पहिल यह मुझे अक्रजीने कहा था, यह पलक 
जिछोक्ी तिलक हैं, सकल दुष्टोंका हरनेबाढा परम पुण्यत्रत 
है) इस प्रकार जो कोई इस त्रतको करता है बह इस ढो- 
करें सुखभोगकर अन्तर न नष्ट होनेवाले इन्दुमौडिक 
पदको चढा ज्ञाता है, यह, तिरुकअतकी कथा पूरी हुईं ॥ 
घवराज्र-इसीमें ही नवरात्रका आरंभ होता हे, नवरात्रमें 
प्रतिपद्‌ द्वितीयासे युक्त प्रहण करनी चाहिये। चंडिकाके 


4. 


जन अप्तावस्था युक्त ध्तिपद्‌ न करनी चाहिये पर हि- 
दीया युक्त मुहूत मात्र भी हो तो उसमें प्रारंभ करना चा- 
डिये। प्याऊका दाव-भी इसीमें क हा है, कि, फार्गुनमा- 
सके व्यतीत होजानेपर तथा उत्सबके पुण्य दिन आजाले- 
', त्राह्मणोंके कथनानुसार प्याऊ दिछाना प्रारंभ क्रदे 
का विद्वान मनुष्य इस मंत्रस प्याऊदिलावे कि-यह प्याऊ सर्व 

| कक लिये बनाई है । इसके ग्रदानस पितर और 
पितामदद कप हो जाये।चार माहतक उसका पानी न टूटने 
गये, जी प्याऊ देनेकी शक्ति न रखता हो पर विशेष धर्म 
दवा ही हो तो, हरएक दिन मिट्टीके धेबटकों ऊपस्स 
भौर 34 5 पानीस भरकर, ब्ह्मणके घर दे आते 
और देतीवार कहे प त्रह्म[-विष्णु-शिव रूप 


>क हि क्कि ' यह घमेघट 
० इस | प्रदानस भरे संपूंे म्नोर्थ सफल हो ,जाओ | 


संपूज्य कातिकशुक्कचतुदश्यामुपोष्य 
४ इ5॥[हारसमित रोटकपश्ेक कृत्वा दो बाह्मणाय एक॑ देवाय दस्वा द्रौ 
एवं पश्चवष कृत्वाजते वक्ष्यमाणोश्यापनविधिना उद्यापन 


रात्रो 


कुृर्यां दिति ॥ 
७७४७७एणशशाणणााणणाााा 3 न मकान कलर नल 
जो इस +िधिसे धर्म घटका दान 
फल पालेता है इसमें कोई सन्देह नहीं है। यह प्रपा दाभ 
समाप्त हुआ।॥ अथ आचार प्राप्त रोटक ब्रत-जब श्रावण 
शुद्धा प्रतिषदा सोमवारी हो उसदिन, अथवा श्रावणके 
पहिले सोमवारस लेकर साढे तीन महीना तक इस ब्रतक्रो 





पश्चामृतपुर:सर नानापुष्पा 


करता है वो श्रपादानका 


करना चाहिये। तिथि आदि कहकर अधिक सौ भाग्य और 


परिपूण संपत्तिकी इच्छांवढा मैं, श्री सोमेश्वर्की पसन्न- 
दाके ढिये रोटक त्रत करता हूँ । ऐसा संकल्प कर इस 


है] 


रोजसे कार्तिक शुक्ष चतुरंशीतक साम्ब सोवेश्वर भगवान 


गे दूजन करना चाहिये । सोम्रेश्वरके पूजनकी विधि 
लिखते हैं- पूजनका संकल्प तो मास पक्ष आदिंका .उल्लेख 
करके कहें कि, श्रीसोम्ेश्वरकी प्रसन्नताके लिये; ग्रहण _ 
किये हुए रोटक ब्र॒तके अग रूपसे कहे गये, श्रो सोसे- ' 


श्वरके पूजनको करता 


हू.। पीछे पूजा करनी चाहिये। 


इसी तरह कार्तिककी शुक्ध चतुदशीतक हररोज कथा सुनता 


डेआ विल्थपतन्नोंस सोमेश्वरका पूजन करके, 


कार्तिक गुह्भ 


चतुद्शीको ब्त करके रातको पे चासतस लेकर जितनभी 


पुष्पादिक हैं उनसे शिवका पूजन करके पुरुषके भोज मक्े 
“अर पांच रोट करके दो बाह्षणके हिये तथा एक देवके 
लिये देकर दोनोंका स्वयम्‌ भोजन करके इस प्रकार पांच 
पररेकरक पीछे वक्ष्यमाण उद्यापन विधिसे उद्यापन. करन 
चाहिये | ञ है. 5 ० ही 


ही 


50% % 2 0 आय कं आ के, 


परिभाषा, | 








- अथ रूवेशिवब्नतेषु पूजा | | 
थाहि भगवज्छम्भो शव त्व॑ं मिरिजापते ॥ मसन्नो भव देवश नमस्तुब्भ॑ हि शंकर ॥ 


त्रिपुरान्तकरे देव चरद्रचूड महाद्यतिम्‌ ॥ गजचमपरीधानं सोममाबाहयाम्यहम्‌ ॥ आवाहनम 





कम कु पे के 


बन्धूकसन्निम देव॑ निनेत्र चन्द्रशवरम ।त्रिशूलवधारिणं देव॑ चाधहासं सुनिर्मेल व्‌ ।। कपालचारिणं 
देव॑ वरदाभयहस्तकम्‌ ।। उमया सहित॑ शम्सुं ध्यायेत्सोमेइवरर सदा ॥ ध्यानम्‌ ॥ विश्वेश्वर 
महादिव राजराजेश्वरपतिय ॥ आसन दिव्यमीशान द्ास्येःह तुबभ्यमीखर ॥ आखसनम्‌ ।। महादेव 
महेशान महादेव परात्पर ॥ पा गहाण मदत्त पार्वलीसहितेश्वर ॥ पाद्यम्‌ ॥ भ्येबकेश खदा- 
चार जगदादिविधायक ॥ अध्य गहाण देवेश साम्ब सर्वार्थथायक | अध्यम्‌ ॥ त्रिपुरान्लक 
दीनातिनाश श्रीकण्ठ शाश्वत ॥ गृहाणाचमनीय च पविद्वोदुककल्पितम्‌ ॥ आचमनीयम्‌ ॥ 
धक्षीरमाज्य दधि मु सिलेत्यमतपथ्धकम्‌ ॥ मकाल्पितं मयोमेश गृहाणेद जगत्पते ॥ पंचामुतम्‌ ॥ 
गड़ग गोदावरी रेवा पयोष्णी यमुना तथा ॥ सरस्वत्यादितीथानि स्वानाथे मतिगहाताम्‌ ॥ 
खानम्‌ ॥ वस्ताणि पद्धकूलानि विचित्रांणि नवानि च॥ मयातनीतानि देवेश गहाण जगदीश्वर ॥ 
बख्म्‌ ॥ सोवण राजतं ताम्न कापोस वा तथेव च ॥ उपवीत मया दत्त प्रीत्यंथ प्रतिगह्मताम ॥ 
उपवीतम्‌ ॥ सर्वेश्वर जगद्वन्य दिव्यासनसमास्थित॥। मलयाचलसम्भूत चन्दन भतिगहताम्‌ ॥ 
गन्धम्‌ ॥ गन्धोपरि शुक्काक्षताव ॥ अक्षताश्र सुरश्रेष्ठ श॒ुश्रा घोताश्व निर्मेला॥मया निवेदिता 
भक्‍त्या गहाण परमेश्वर ॥ अक्षतान्‌ ॥ माल्यादीनि झुगन्धीनि० ॥ पुष्पाणि ॥ वनस्पाले० इत्ति 
धूपम्‌ ॥ आज्य च इति दीपम ॥ आपूर्पानि च पक्कानि मण्डकावटकाने च ॥पायस सू पम॒त्न॑ च 
नवेद पमतिशहतामानेवेद्यम॥मध्ये पानीयम॥करोद्रतेनम्‌ ॥ कृष्माण्ड मातुलिड्रं च नालिकेरफ- 
लानि चारम्याणि पावेतीकान्त सोमेश भतिगहाताम्‌ ॥ फलम्‌ ॥ पूगीफलम्‌० इति ताब्बूलम ॥ 





अथ पूजा-है भगवन्‌ ! शभो | हे गिरिजापते । है शव ! . 
दव देवश | हे शकर | | आपके छिये:। 
नमस्कार है, आप प्रसन्न हजिये। त्रिपुरका अन्त करनेवाले | 
एजचमको पहिने हुए महाह्मति चन्द्रचूडदेव श्रीसोमेश्वरका | 


आप आशय, 


आवाहन-करता हूं । इस मत्रस आवाहन करना चाहिये || 
बंधूकके समान .कान्तिवाले तीन -नेत्रधारी जिसके कि, 


रजिश्वर | हे इंदवर | है प्रिय | इशान |! म॒ आपको दिव्य 
आसन दुता हूँ । इस मत्रस आसन दे है परस भी पर 


ह्‌ महादेव | है महेशान | है इच्चर | सेरे दिय हुए पायको | 


उसा सहित ग्रहण करिय । इससे पाद्यका प्रतिपादन कर 


अध्यको भ्रहण कारिय । इस मंत्रस अघ देना चाहिये || है 
त्रिपुरान्तक | हे दीनोंके दुःख नाशक | हे श्रीकंठ ! हे 


करिये। इससे आचसनीय देनी चाहिये ।॥ क्षीर, आज्य; 
दृधि, मधु; शकरा इन पांचों अम्ृतोंस पेंचासत बनाया हें; 


# ५ ७» न 


है जगवक माहचिक | आप-इसे ग्रहण करिये । इससे पंचा- 





मृतका निवेदन करना चाहिये ।॥ गंगा, गोदावरी, रेवा, 
पयोष्णी, यमुना और सरस्वती आदि तीथांके पानी उप- 
स्थित हैं, स्नानके छिय अ्रहण करिये । इससे स्लान कराना 
चाहिये।॥ है जगदीशइवर ! में आपके छिय' अनोखे नये यह' 


| बख्र छाया हूँ, प्रहण करिये। इससे वस्ध निवदून करना 
| चाहिये सोना; चांदी, ताँबा ओर कपासका डउपवीत 
शिखरमें चन्द्रमा है ऐसे जिशूलठ घारण करनेवाले, सुन्दर | 
हासवाले, अत्यन्त स्वच्छ वराभय सुद्रासे युक्त रहनेवाले, | 
कपाल्धारी जो उमासहित सोमश्वर शझिंव हैँ उनका में ध्यान | 
करता हूँ यह ध्यान हैं ॥ है महाराज ! विश्वेश्वर ! हे | 


आपकी प्रसंन्नताके लिय छाया हूँ म्रहण करिये।| इसस उप- 
बीत देना चाहिये ॥ है सर्वश्वर | हे ससारक वन्द्नीय 

हे बड़े दिव्य आसनपर बेठनेवाले ! इस सलयागिरिके चन्द्‌- 
नको ग्रहण करिये | इससे चन्दून चढाना चाहिये; चन्दन 
लगाकर उसपर सफेद्‌ अक्षत छगाने चाहिये। है सुरभश्रष्ठ ! 
धोयेहुए निर्मठ सफद अक्षत हैं में मक्तिके साथ निवेद्न 
करता हूँ, आप ग्रहण करें। इस मंत्रसे अक्षत | * साल्या- 


॥ | दीनि सुंगनन्‍्धीनि ' इस मंत्रस पुष्प चढाना चाहिय। पूरा 
ज्यबकेश | सदाचार | हे जगत॒के आदि विधायक | हे: 
देवेश ! हे शव ! है प्रयोजनके सिद्धकरनेबाले ! अबासहिल | 


मंत्र और अ्थ पीछे छिख चुके हैं ॥| * वनस्पति रसोडूल 
इस मंत्रस धूप और आज्य च'! इससे दीप देना चाहिये। 
इनका अथ पहिछे ही लिख चुके हैं । सिद्ध किय हुए पूरे, 


| मांडे, बटक, चाबछू और दाढछ आदि नेंवेद्य भ्रहण करिये । 
शाश्वत ! पवित्र पानीसे तग्रार की हुईं आचमनीयको प्रहंण | 


इससे नेवेद्य, बीचमें पानी और करोद्वर्तन करे । पेठा, 


| बिजोरा, नारियछ आदि सुन्द्र फछ उपस्थित हूँ, हे पावे- 
| तीके प्यार सोमेश ! आप ग्रहण करिये | इससे फल निवेदन 
| करना चाहिये! इसके पीछे सुपारी ओर पान निवेदन 


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( ५८ ) 








दिर्ण्यगर्भ० इति दक्षिणाम्‌ ॥ अग्निज्योतीरविज्येतिज्योतिनोरायणो विश्ठः ॥ नीराजयाि 
देवेश पशदीपेः छुरेश्वरम्‌ ॥ नीराजनम॥हेतवे जगतामेव संसाराणवसेतवे .॥ प्रभव सर्वविद्यान 
शम्भवे गुवे नमः॥नमस्‍्कारः॥ यानि कानि च०हति प्रदक्षिणा: ॥ हर विश्वाखिलाधार निया 
धार निराश्रय ॥ पृष्पाजलि ग़हाणेश सोमेश्वर नमोस्तु ते ॥ 'पष्पाअलिम्‌ ॥ सुनिभतं खुबेंत 
तिशूलाकारमेव च ॥ मयापिंत तु तख्छम्भो बिल्वपत्र॑ ग्रहाण में ॥ बिल्वपत्रा पणम्‌॥ इति पजा॥ 
अथ रोटकत्रतकथा ॥ युविष्ठिर उबाच ॥ हृषीकेश मयाकार ब्र्तं दानमनेकधा | ओतुमिच्छामि- 
देवश व्रत सम्पत्तिदायकम्‌ ॥ १॥ येन ब्रतेन देवेश पुना राज्य लमामदे ॥ तथा व्रत तु मे 
ब्रहि यादवानां कृपाकर ॥ २।. श्रीमगवालुवाच ॥ वदामि शुभदं पार्थ लक्ष्मीबृद्धिमदायकम्‌ । 
धरमार्थेकाममोक्षाणां निदान॑ परम व्रतम्‌ ॥ ३ ॥ युधििष्ठिर उवाच ॥ केन चादों पुराचीर्ण मत 
केन प्रकाशितम्‌ ॥ विधिना केन कतंव्य॑ तत्सव ब्राहि केशव ॥ ४ ॥ श्रीभगवान्वाच ॥। आसीद 
सोम्यपुर राजा सोमो नामेति विश्वुतः ॥ क्षात्रधमें;तिकुशइलः प्जापालनतत्परः ॥ ५! 
तस्य राज्ये प्रजाः सौम्याः सर्वधर्मपरायणाः ॥ तस्थ राक्षस चामात्यः सोषपि सौम्यशुपह 
बह! ॥ ६॥ तस्मिन्सरस्तु सोम्य॑ चे सदा साम्याम्बुना प्छुतम्‌ ॥ अभूत्सोमेश्वरों देवो ढोकान 
पालनाय च ॥ ७ ॥ तत्राभवत्सोमशमों ब्राह्मणों वेद॒पांरगः॥ वेदाथविच्छास्त्रविद्व शुद्धाचारो 
तिहुलेमः॥ ८॥ तस्थ भायां शुभाचास पुरन्धी चारुभाषिणी ॥ भर्तशुश्रषणरत्ता कल्याणी 
प्रियवादिनी ॥ ५ ॥ सो$करोच्च कुटम्बाथ कणयज्ञ दिनेदिने । ॥ न लेमे चाधिक तेन घनधास्य॑ 
तथंव च॥ १० ॥ अतीव खेद्सिन्नस्ठ विचार्य च पुनः पुनश॥ाकि करोमि कक गच्छान समारयाँ- 
हैं महीतले ॥ ११॥ केन कर्मविपाकेन इंदश लब््यते फलम्‌ ॥ अथवार्थकरं धर्म देवपूजा- 
दिके शुभम्‌ ॥ १२॥ स॒ सोमेशे5करोद्धक्तिं देन्यनाशाय पार्थिव ॥ कदाचिदातिखिन्नः सर 


विलल जलन पचराा मत गा भा आ आता जा 4 पा उककरुअ जा कसम सनक अिनलल कल न्‍ 0 0:9५ भू > के, >ु 
करना चाहिये। * ओम हिरण्यगर्भः समवतताभे भूतध्य हू, जो झुभका दनवाछा, रक्ष्मीकी वृद्धि करनवाछा एवम 


कै 
| 





जातः पतिरेक आसीतू । सदा घार पृथ्रिवीं द्यामुतेमां करे 
राय हविषा विधय ॥ संत्राथं-सबसे पहिढे प्रणिमात्रका 
पति हिरण्यगर्भ हुआ उसीतत जमीन आसभानको धारण 
किया, हम उसी प्रजापतिके लिये करते हैं ! इस ते दृक्षिणा 
देनी चाहियें।| अप्रि रवि और विश्वु नारायण ये तीनों 
ब्योति हैं । में इन पंच दीपोंसे सुरेंश्वर देवेशको नी पजन 
करता हूँ । इससे नीराजित, करना चाहिये ॥ जगतके हेतु 
एवम्‌ सेसारसमुद्रके सेतु लथा सब विद्याओंके प्रभव, गुरु 
बभुके लिये नमस्कार है, इस मंत्र नमस्कार ॥ “ याति 
के च | इससे प्रदक्षिण। करनी चाहिय।। इसका अगे 


पहिढ ही लिख चुके हैं ।हे हर | हे अखिक विश्यके 
आधार ! और स्वय निराधार निराश्रय ईंश सोमेश्वर ! 


पुष्यांत्र्ि प्रदणकर, तेरे छिये समस्कार है। इस मंन्त्रस 
पुष्णंजली निवेद्न करना चाहिये॥ सुबवणसे भी भांति 
हे त्रिशूछकेस आकारवाढा यह सेख बिल्वपत्र 
; कस ; इसे भ्रहण करिये; इप्त मंत्रस बेलपत्र चढावा 
: ७. 34 ॥ अथ कथा-औयुधिष्ठिर बोले हे हषी 

अ आ-अुधिष्ठिर बोले कि, हे हवीरेश | 


| अनेक तरहके ब्त अ ये हैं लेलेशा । अब 
र दान किये हें देवेश | मे आपसे 


। 2७५ सनेनो ऋएहता है जो संपत्ति देखे 
दे देवेश ! जिस ब्रते कर तर्पात्ति देनेबाछा हो ॥१॥ 


पा मुझ फिर राज्य मिछ ज 
“* वादतकि कृपाकर | उस झे कहिये. कर 
#भसव्रान्‌ बोल कि, है पाये ! मैं आपको एक ब्रत ह्र्ता 


धम्र, अथे; काम्म भौ 
प्टिर बोढे कि; पहिल्े इप्त ब्रतको किसने किया था, कौन 
उस अकाशम छाया था, एवम्‌ किसतरह इसे करना चाहिये, 
5 केशव ; सब कुछ मुझ कहिये ॥ ४ ॥ श्रीमगवान्‌ बोहे 
कि-पहिडि उक बडा अच्छा सोमनामका राजा था; वो 
शात्र धमस कुशछ था प्रजा पालनमें तत्पर था ॥५) उसके 
राज्यम उसको प्रजा घममं परायण तथा सज्जन थी, उस 


हे; 


राजाक जो 
तर थ ॥६॥ उसके नगरमें एक सुन्दर सरोवर था जिसमें 


र मोक्षका परम कारण हैं ॥३॥ युधि' 


मत्रीछोग थे वे भी सौम्य थे और सुख देने 


पडा स्वच्छ पानी रहा करता था, वहां छोकोंके पालनके - 


लिये सोभेश्वर शिव विराजा करते थे ॥७॥ वहां एक वेद- 
वेदान्तोंका जाननेवाढा, सककछ शास्त्रोंका वेत्ता अत्यन्त 
सदाचारी वैसा कि कहीं हूँढनेसे भो न मिल सके, ऐसा 
एक सोम्तशर्मा न्ामका ज्राह्मण रहता था। उसकी खत 
अल्न्त सदाचारिणी,मिष्ठ 


ओर प्रियरभ/बिणी परमसुन्दरी 


पतिकी सेवा करनव्रालो और कल्याणी थी॥ ९ ॥ उस : 


आह्यणके पास अधिक घन 


धान्‍्य तो था नहीं, इस कारण . 


“लह कुठुम्बक कण यज्ञ किया करता था ॥|१०ॉ एक, 


हक 


दिन अत्यन्त खिन्न होकर विचारने रूगा कि मेँ क्‍या कर! 


॥ 8 हक ५  । ््‌ ३ 
जे समत कहाँ चढा जाऊँ ॥ ११ | कौनसे केगे 


मुझ ऐसा फछ 'म्रिलें अथवा 
पं मकर धर्म है॥| १९ ॥ हे पाधिव | वो कंगा- 


_देबपूजादिक ही शुभ 


के 
+ 
+ 
श 
बे 







भाषाटीकासमेतः । 


46022: 807 आर क्-8/+ते उग्र ८१४ आण 4:27: 8] ॥# कट! 7:7/07%:7: 24776 :%008 87%: | 





4/0ब4:7 पाए 22 कताखाकाजा ५ "कद पाक 7 फइफ््यलफए पटचा: जलवा । जप्यधलपलप 


20220: 20. 5 





॥ ०-2 2३ पर कर का 6 पक :0 74८7: /प४:-५०५०/+६-०:४/:३९६ ४ हित क2ब 7 च 
जव्लनकलननालपकनीन परम रमकपर 54“ 


स जगाम सरोवरम ।! १३ ॥ अभूत्सोमेशः पत्यक्षस्तस्मिन्सोम्यसरोवरे 

कपया परया थुतः ॥ १४ ॥ तेनासों हुःखितों दृष्टः सोमशर्मा द्विजोत्तमः ॥ य्‌ 

दुःख त्वया विद्यावरेण च॥ १५ ॥ सोमशमॉबाच ॥ 'कैंचिद्त नास्ति पूल तदर्थभीदशी 
दशा! ।। तस्य तद॒चन श्रत्वा ब्राह्मणस्त्विदमबबीत्‌ ॥ १६॥ मो भो विभवरश्रेष्ठ ब्रतमेक 
वदामि ते ॥ श्रीमगवाल॒वाच ॥ तेनादिएं व्रत॑ चेदं पूणसंपत्तिदायकरम्‌ !! १७ ॥ सोमशरमोवाच!। 
भो भो बाह्मणशादल व्तं तद॒द मे प्भो ॥ यस्थालुष्ठानमात्रेण लक्ष्मीवद्धि! मजायते॥ १८ ॥। 
कस्मिन्मासे च कतेव्यं किं दानं कस्य मोजनम्‌ ॥ धनलछाभाय कतंव्यं कस्य देवस्यथ प्जनम्‌ 
। १९ ॥ केस्तु पुष्पेः प्रकतव्या पूजा चारुतरा शुभा | नेवेद्य कीदशं देयमध्य केस्त फले- 
भ॑वेत्‌ ॥ २० ॥ यदि तुष्ठोप्नस विभ्रेन्द्र तत्सव ब्रहि में मन्नो ॥ ब्राह्मण उवाच ॥ साधु त्वया विभ 
पृष्ठ ब्रतमद्धिभदायकम्‌ ॥ २१ ॥ विधान तस्य वक्ष्यामि सर्वर्सिद्धमदायकम्‌ ॥ श्रावणे च 'सेंते 
पक्षे प्रथमें सोमवासरे ॥२२५॥प्रकतेव्य॑ ब्तं विप् शुभ नियमशवेकम्‌ । साउ्टमासच्रयं विप्त क॒तंस्ये 
विधिपूर्वकम्‌ ।। २१।। बिल्वपत्ररेखण्डेश्व पूजनं च दिनेदिने | पश्वसत्तत्रैमिश्वेव पूजन विधि- 
पूवेकम्‌ ॥ २४॥ परिपूर्ण तु कतंव्यं चतुर्दश्यां ल॒ कार्तिकाब्रतारम्भे तु कतंव्यो नियमस्ठ विच- 
क्षणेः ॥ २॥ अद्यारथ्य ब्रतं देव रोटकारूय मनोहरम्‌ ॥ करोमि परया भव्त्या पाहि मां जगतां 
- शुरो ॥ २६॥ दिनेदिन प्रकतेव्या पूजा देवस्य शूलिनः । कथा बिना न भोक्तव्य॑ मत्यहं च पुनः 
पुनः ॥ २७॥ उपोषण चतुदरेयां कर्तव्यं विधिपूर्वकम्‌ ॥ छझुचिहुत्वा दिने तस्म्गि कतेव्य॑ 
रोटकब्रतम्‌॥ २८ ॥ अथ उपोषणम्रार्थनामन्न्रः--चतुर्दश्यां निराहारः स्थित्वा चेब परेडहानि ॥ 
भोक्ष्यामि पावतीनाथ सवघिद्धिभदायक ॥ २९ । कृत्वा माध्याद्िकं च्म्मं स्थापयेदत्रणं घटम ॥ 
पश्वरत्नसमाथुक्त पवित्रोदकपूरितम्‌ ॥ ३० ॥ सर्वोषधिसमाथुक्त॑ पृष्पादिभिरलइकृतम्‌ ॥ वेडित 
वेतवस्त्रेण सर्वाभरणभूषितम्‌ ॥ ३१ ॥ तस्योपरिन्यसेत्पात्र ताम्न चेवाथ वेणवम्‌ ॥विरच्याष्टद्ले 





लीके नाश करनेके छिय सोमेशमें भक्ति करनेलगा, कभी 
अत्यन्त खिन्न होकर सरोवर पर पहुंचा ॥१३॥ है सोस्य ! 
उस सुन्दर सरोवरपर परमकइपासे युक्त श्री सोमेश्वर भग- 
वान्‌ वृद्ध ब्राह्मणके रूपसे दसे ग्रत्यक्ष हुए । १४ ॥ उन्होंने 
वो उत्तम ब्राह्मण सोमशर्म्माकों अत्यन्त दुःखी देख बोले 
कि, आप इतने बडे विद्यावान्‌ होकर क्यों दुखी हो रहे हैं 
|| १५ ॥ सोमशर्मा बोला कि; मैंने पहिले कुछ दान नहीं 
किया था इस कारण मेरी यह दशा हो रही है। सोमश- 
म्मके वचन सुनकर वो बृद्ध ब्राह्मण बोछा कि १६॥ 
हे श्रेष्ठ विप्रवर | में तुम्हें एक ,त्तकहता हूं, उस ब्रतकों 
कर छोगे तो सब सम्पत्तियाँ मिल जायंगी ॥१९॥ सोम- 
शर्मा बोढा कि, है श्रष्ठ विप्रवय्य |! आप उस बतको मुझे 
कहिये | जिसके अनुष्लान मात्रस लक्ष्मीकी वृद्धि हो जाय 
॥१८॥ कौनसे महीनमें ब्रत करना चाहिये, क्या दान देना 
चाहिए, किस भोजन करना, धनके लछाभके ढछिये कोनसे 
पूजन करना चाहिये ॥ १९ ॥ वो शुभ सुन्द्र पूजा किसके 
फूलों ते की जाय, नेबेद्य और अध्य केसा दिया जाय तथा 
कौनसे फछ काममें आये || २० ॥ हू “विप्रेन्द्र | यदि आप 
प्रसन्न हैं तो प्रभो | सब कहिये, यह सुन ब्राह्मण कहने छगा 
कि, हें ब्राह्मण ! तुमने ऋद्धि देनवाले ब्तकों अच्छा पूछा 
॥ २१॥ में सवे सिद्धि दायक जब्त विधान कहता हूँ, 


श्रावण शुक्ठ पक्षमं जिस दिन प्रथम सोमवार हो ।॥ २३२ ॥| 
हे ब्राह्मण | उस दिन इस शुभ ब्तको नियम पूर्वक करना 
चाहिये, यह ब्रत विधिपूवक साढ़े तीन महीने होता है 
॥२३॥| अखण्ड पांच तीन व सात बिल्वपत्नोंसे हर रोज 
विधिपूवक पूजन करना चाहिय ॥ २४ । कातिककी शुद्ध 
चतुदंशीके दिन ब्रतकी पूर्ति करना चाहिये। बुद्धिमानोंको 
चाहिये कि; ब्रतके आरंभमें नियम कर हे ॥२५। हे देव ! 
आजसे लेकर रोटकनामके मनोहर ब्रतको परम अक्तिक 
साथ करता हैँ, सब प्राणिमात्रके गुरो! मेरी रक्षा करिये 
॥ २६ | प्रत्येक दिन शिवका पूजन करना चाहिये, कभी 
भी बिना कथा सुने भोजन न करना चाहिये ॥ २७ ॥ 
चतुदंशीको विधिपूवंक उपोषण करना चाहिये, उस दिन 
पवित्र होकर रोटक ब्रत करना चाहिये ॥२८॥ अथ डपो- 
पणकी प्रार्थनाके मन्त्र-हे सब सिद्धियोंके देने हारे पावती- 
नाथ ! चतुद्शीको' निराहार रहकर दूसरे दिन सोजन 
करूंगा ॥| २९ || मध्याह काछके सब कृत्य कश्के एक 
सावित घट स्थापन करना चाहिये, वो पेचरत्नोंस युक्तहो 
तथा पवित्र पानीसे भरा हुआ हो ॥| ३० ॥ वो सब औष- 
घियोंसे युक्त हो बथा फूलोंसे अलुकृत हो, श्वेत वखसे 
वेष्टित हो तथा सव आभूषणोंसें भूषित हो ॥॥ ३१ ॥ उस 
कलशके ऊूपर तांवेका अथवा बणुका पान्न हो रहां अष्ठ॒दृद् 


(६० ) ब्रतराज:। .: | प्रतिपदु- 









का ० कक: श् पट 20 चकित 24:70 000 75:00 ९८४2 बट उप हि 
माह पर 0 27/00/४067 40707776: 0 02072(6 ९2:22. 0 2022%440 ५:32: 8४29 
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तत्र पजयेदुमया शिवम्‌ ॥ ३२२ ॥ कृत्वा ल पा जे कर्म नित्यपूजादिव्द तथा ॥ तथयां रफ़े े 
त॒ कतंव्या पजा देवस्थ शझूलिनः ॥ ३२२॥ शुभे चंव भदेशे तु कतव्य। उष्दलण्डर ॥ पूज्यस्ता: 
शिवो देवो धर्मकामाथसिद्धये ॥ २४॥ क्षीरादिल्लापन कु्योचचन्दनादि वि लेपनम्‌ ॥ कृष्णागुर- 
सकपेरमगनाभिविभिश्रितम्‌ ॥ २५ ॥ पृष्पेनोनाविधे र्म्येः पूज्यों देवों महेश्वरः॥ धनकामो 
कर्तव्या पूजा देवस्य झूलिनः ॥ ३६॥ बिल्वपत्ररखण्डेश्व तुलसीपत्रकेस्तथा ॥| नीलोत्पलेश्राए- 
तरेः कतेव्या पुण्यवर्धिनी ॥ २७ ॥ कर्द्ारकमलेश्रेव कुसुदेश्ातिशोभनेः ॥ चम्परकमालतीपुषषे 
मुचुकुन्देः शुभावहेः ॥ ३८ ॥ मन्दारेश्वाकपुष्पश्च पञजाहिश्व शिव भ्रियः ॥ अन्यनानाविधेः पुष्प 
ऋतुकालोद्धवेस्तथा ॥ ३९॥ धूषनानाविषेः पाथ पृण्थवर्धनसाधकेः ॥। दीपास्तत्र प्रकतव्य 
बृतपूणां मनोरम£ ॥४०॥ लेहोः पेयस्तथा भोज्येः स्वादुभिश्व शिवप्रियेश।अन्येना नाविधे रम्ये- 
रूपचारवरंस्ततः ॥४१॥ नेवेद्य तःप्रकृबीत रोटकानां विशेषतः ॥ करतंव्या रोटकाः पद्च पुरुषा- 
हारमानतः ॥ ४२॥ शालितण्डुरूपिष्टन समभागेन वा पुनः ॥ द्वो त॒ विभाय दातव्यों द्वाभ्यां दे 
भोजन शुभम्‌ ।४३॥ एको देवाय दातव्यो नेबेद्याथ सदा बुधेः । महेशाय च दातव्यं तामूह 
खुमनोहरम्‌ ॥४४॥ अध्यंदानं प्रकतव्यं धनसंपत्तिदायकम्‌ ॥ जम्बीरं॑ नालिकेरं च ऋछुई हि 
बीजपूरकम्‌ ॥४५।॥ खज़ुंरी च्‌ शुन्ना दाक्षा मात॒लिडू मनोहरम्‌ ॥ अक्षोडानि नच दाडिम्बं नाएि 
ड्राणि शुभानि च ॥४३॥ ककेटी च शुभा प्रोक्ता अध्यदाने मनोहरा । अन्येनांनाबिणेः पाई 
॥ $ कै] 
ऋत॒कालोड्बः श॒भेः ॥४७॥ यः करोत्यध्येदानं च तस्य पुण्यं॑ वदाम्यहम्‌ | इलाँ च सागो- 
युरक्तां ५ किक 
युक्तां रत्नेश्वान्यमनोहरेः ॥४८॥ द्र्वा यत्फलमाप्रोति तेन तत्फलमाप्लुयात्‌ ॥ अनेनेब विधा- 
नन तत्काये ब्रतमुत्तमम्‌ ॥४९॥ पश्चचष त॒ क्तव्यमत्॒ल घनमीप्सुन्निः ॥ पश्चाइद्यापन॑ कुर्यो 
द्रोटकाख्यब्रतस्य च ॥५०॥ उद्यापने तु कर्तव्यों हेमरूप्यों तु रोटकौं॥ बिह्बपत्न सुवर्णश 
सोमेशभीतये शुभम्‌ ॥५१॥ रात्रौ जागरण क्ुर्यात्पृज्यों देवों महेम्वरः ॥ पूर्णन 'विधिन 
विम्त कतंव्य॑ च शिवप्रियम्‌ ॥५श। दारिद्रचनाशन पुण्य “अल मयम ५९ दारिद्रचनाशन पुण्य लक्ष्मीबद्धिमदायकम्‌ ॥ कर्तव्यं विधि 
कमलको बनाकर पावती सहित शिवजीका पूजन करना | और गेहँका आटा बराबर हो, दो लो आ्रह्मणको देंदे तथ 
33 38 । पा] (2 क तथा नित्यपूजा | दोका अपना भोजन हों ॥४३॥ समझदारको चाहिए कि. 
धर जगत शिवकी पूजा करें ॥ ३३॥ | सदा एक रोट देवके लिये, मैवेयमें देंदे फिर शिवके हिए. 
न्द्र जगहसें पुष्प भडप करना चा हिये | वहां धमं; काम सुन्दर ताम्बूल दे ॥४४॥ पीछे घनसंपत्ति देनेवाढा अब 
ओर अरथंकी सिद्धिके ढिये शिवका पूजन करना चाहिये | हिये। जा गीजपूस 
॥३४॥ क्षीरादिस स्लांन कराकर चन्दनादिका छेप करना | गे री 4 तक अं +४ नारियल) ऋसुक, ब॑ पनोह |; 
'चाहिये, उसमें कृष्ण अगर कपूर और कर्तूरी मिली रहनी | | अखरोट) खजूर अच्छी द्वाक्षाएं -और मनोहर, 
चाहिये ॥ ३५ ॥ तथा अनेक तरहके फूछोंस धनकी काम- | मातुछिज्ञ, अनार और सुन्दर नारंगियां ।।४६॥ तथा सुंदर 
नावालेको पूजा करनी चाहिये ॥ ३६ ।। अखण्ड विल्वपत्र | ककेटीभी अध्यदानमें अच्छी कहीं हे और भी अनेक तर 
तथा तुढसीदलोंसे तश नीले कमतोंसे की हुई पूजा | * ऋतुकालके सुन्दर फढोंस ॥४७॥ जो अधे दान कसा 
_नन्त पुण्य बढ़ाती है ॥॥ ३७) कर्हार, कम्तछ एवम्‌ | हैं मे उसके पुण्यकों कहता है ॥॥ ४८ ।। जो ससागररल' 
पे सुन्दर झुमुद और शुभावह , पंपक, चमेली और | गर्भा-मूमिको दकर जिस फलछको पाता है वही उससे 
हज फूलोंस ॥ ३८॥ मन्दारके: पुष्प तथा शिवजी | पाजाता है। इसी विधानसे इस उत्तम ब्रतको करा, 
० रं आकके फूलोंस तथा ऋतुकालके अनेक तरहक | चाहिय ॥४९॥ अतुछ घन चाहनेबाढेको यह व्रत पांचवर्ष 
जो पल है चाहिये | ३९ || पुण्य बढानेके | करना चाहिये, पीछे इस रोटकबतका उद्यापन करे ॥५० 
चाहिये तथा घीसे हक कह) ः 20५) लाना | उयापनमें एक रोट सोनेका और एक चांदीका बनाना 
|। ४५ ॥| शिवजीके तय जाया पेय ञ हब भी तथा सोमेशकी प्रसन्नताके लिये सोनेंका बिल्वपतर 
नेक तह ७ ये जेल) पेय. और भोष्यों | भी होना चाहिये।।५१॥ रातपें २ै.इसमें देव मर : 
छुन्दर अन्य उपचारोंस ॥४९॥ | हिये।।५१॥ रातमें जागरण करे,इसमें देव मह 


तथा अनक तरहके | श्वर पूज्य हैं,हे आह्मण ! पूरी विधि कि 

नतेद्य करना चाहि: रके तो रोटोंकाही नैये । हद | वेधिक साथ यह 'शि ' 
हो | पुरुषके बहार ०33: का कट ॉमेंचा नेवेद्य | प्यारात्रत करना चाहिये .५२। यह: दारिद्रथका नाशक है 
5: “7 गंध) इन रोटॉमेंचाबल | छक्ष्मीकी वृद्धिका करनेवाराओ भक्तिके साथकरना चाहिये, 









गन 
52754: 28 कर सकवव का 7 7:20: 06047 077 २४ /#2॥00 ली 47४९7): 742] 





द्धा$वत्या ओतव्यं तु कथानकम्‌ ॥५शेी गीतवाद्यादिसहित कु्योज्ञागरणं निशि |) ततः भभातें 
बेमले स्नात्वा पूर्जां समापयेत ।।५४॥ प्‌वाक्तेंविधिना तेन कतंस्य शिवपूजनम्‌ | सरसवे दापये- 
घ्त्या ब्राह्मगाय कुटुम्बिने ॥५५।॥ विपाय देदविदुषे दल्थालंकारभोजने!॥ सप्तल्नी्क शुर्रु 
ज्य ततो भकत्या क्षमापयेत्‌ ॥५६॥ यकल्‍्मयूनं कृतसंकल्पे ब्तेपस्मिन्‌ ब्राह्मण प्रभो॥ तत्सवे 
'णेताँ यातु युष्महाष्टिविलोकनात ॥ ५७ ॥ एवं य। कुरूते पार्थ शाख्रोक्तं रोट्कब्रतम ॥ अना- 
(सेन सिद्धचन्ति हक्याः सर्वे मनोरथा: । ५७ ॥ समदंका महानारी क्रोति विधिवद्गतम्‌॥ 
तिप्रता सा कल्याणी जायते नात्र संशयः ॥ ५९॥ इति शिवपुराणे रोव्कब्रतकथा ॥ 

दौद्ित्रपतिपत्‌ ॥ अथाखिनशुक्कप्नतिपदि दोहित्रेण मातामहश्रार्ध कार्यम ॥ तदुक्त हेमाद्रो-जात 
।त्रोएपि दोहित्रों जीवत्यंपि च मात॒ले ॥ कुर्पान्मातामहश्राद्ध प्रतिपद्याशिने सिते॥ इये च 
(ड्रवव्यापिनी ग्राह्मेति निर्णयदीपे उक्तम्‌ ॥ प्रतिपद्याथिने शुक्के दौहित्रस्त्वेकपावंणम्‌ ॥ श्राद्ध 
तामहं कुर्यात्‌ सपिता सड़वे साते ॥ जातमात्रोषि . दोहित्रो जीवत्यपि हि मातुले॥ प्रातः 
ड्रिवयोम॑ध्ये याउश्वयुक्प्रतिपद्धधेत्‌ ॥ अब सविता इति विशेषणाज्जीवत्पित्‌क ए्वाधिकारी 
पेण्डरहित॑ कुर्यात्‌ ॥ झुण्डन॑ पिण्डदानं च भेतकर्म च सर्वशः॥ न जीवत्पित॒कः रुर्यादरणविणी- 
(तिरेव च॥इति पिण्डनिषधात्‌ ॥ अच्रेव नवरात्रारम्भ। ॥तत्र परविद्धा श्राह्मा ॥ तदुत्त गोविन्दार्णवे 
ग्कंण्डेयदेवीपुराणयोः-प्॒वेविद्धा ठे या शुक्रा भरवेत्मतिपदाशिनी ॥ नवराज़तब्रतं तस्यां न 
हरये झशुभमिच्छता ॥ देशभड़ो भवेत्तत्र इलिक्ष चोपजायते॥ ननन्‍ंदायां दर्शायुक्तायां यत्र स्या- 
मम पूजनम्‌॥ तथा देवीपुराणे-न दशेकलया थुक्ता प्रतिपश्चाट्रिडकाचेने ॥ उदये द्विसुहृतोपि 
गह्या सोदयकारिणी॥ यदा पूर्वदिने संपर्णा शुद्धा भूत्वा परदिन वर्धते च तदा संपुणत्वादमा- 
ग़ेगाभावाच्च पूर्वेव ॥ यानि तु द्वितीयायोगनिषधपराणि वचनानि श्रुतानि तानि शुद्धाधिक- 


वुनने चाहिये ॥५१॥ जागरण गाने बजानेके साथ होंना 
रहिये, पीछे ग्रातःकारू स्नान करके पून्ाकी समाप्रि 
_रना चाहिये।॥ ५४ || पहिछे कहे हुए विधानसे शिव 
[जन करनी चाहिये, जो भी कुछ पूजनका सामान हो वह 
तब कुटस्वी त्राक्मणके लिये भक्तिपूवंक दिवा दे ।५०॥ वो 
प्रदुका जाननेंवाढा होना चाहिये, पीछे बस, अरंकार 
ओर भोजनसे सपत्नीक गुरुंका पूजन करके पीछे भक्तिक 
ताथ क्षमापन करना चाहिये ॥५६॥ ह ब्राह्मण | प्रभु ! इस 
तेकतिपत ब्रतमें जो भी कुछ नून्यता हुईं हो वो सब 
आपकी कृपा दृष्टिसे पूरी हो जाय ॥ ५७ ॥ हे पाथ ! जो 
गा्बोक्त रोटक ब्रत कस्ता है उसके चाहे हुए सब मनोरथ 
अनायास ही सफर होजाते हैं ।| ५८ ॥ जो सुहागिन स्त्री 
इसको विधिके साथ करती हैं वो कल्याणी पतित्रता बन- 
जाती है। इसमें सन्देह नहीं है ।।५९॥ यह शिवपुराणकी 
कही हुईं रॉटक ब्रत कथा पूरी हुईं ॥ अथ आश्विन्र शुद्ध प्रति- 

दाकों मातामहका श्राद्ध दोहित्रको करना चाहिये। यह 
इमाद्रिमं कहा हे कि; जन्म लेतेही दौहित्रको उचित है कि 


मामाके जिन्दें रहते हुए भी आश्रविन शुक्वा प्रतिपदाकों 


नानाका श्राद्ध करें । यह प्रतिपदा संगव काछुतक रहनेवाली 
ढेनी चाहिये; यह निणय दीपमें कहा है कि पिताके जि*दे 


रहते हुए दोहित्रको चाहिये; कि आश्विन शुद्ध प्रेतिपदाके 


संगव कालमें मतामहका आद करे । जातमात्र भी दोहिंत्र 


९ प्रातस्ततस्सज्ववनामधेयमध्याहमस्मात्परतो5पराहमू । सायाहमन्ते च भणन्ति भव्या व्यासानुसाराज्ज्वल्नेमुहूते: ॥| 





मामाके जीवित रहते हुए भी प्रात.काल और संगवर्क मध्यमें 
जो आश्रविनकी प्रतिपदा हो तो अबश्य श्राद्ध करे। यहां 
दौहित्रका जो “ सपिता ” यह विशषण किया हे; इससे 
पिताके जिन्दे रहते ही अधिकारी हैँ। आाद्धभी पिण्ड रहित 
करना चाहिये. क्‍यों कि, जिसका बाप जिन्दा हो; उसे 
मुण्डन, पिण्डदान और प्रेतकर्म न करना चाहिये न गर्सिणी 
सत्रीके पतिको ही ये काम करने चाहियें॥ इसमेही नवरात्रका 
आरंभ होता हे-इसमें ट्वितीयासविद्धा प्रतिपदालेनी चाहिये 
यही गोविंदाणवसे देवीपुराण और माकंण्डेय पुराणकेव चन्त 
कहे हैं कि पू्वंस विद्धा जो आश्विन प्रतिपदा हो तो, शुभ 
चाहनेबालेको उसमें नवरात्रका प्रारंभन करना चाहियेऐसा 
क्रनेस वहां देश भगभी होता हैं तथा अकाल पडता है, जो 
दर्शायुक्त नन्‍्दामें मेरा पूजन होयतो । ऐसे ही देवी पुराणमें 
भी लिखा है कि, जिस प्रतिपदामें अमावसकी एक कला भी 
मिलींगई हो वो चंडिकाके पूजनमें उपयुक्त नहीं हे।परा 


' उदय कालरूमें दो घडी भी प्रतिपदा हो तो वह उदय करने- 


वाली हैं उसमें दुर्गा पूजन करना चाहिये । जब प्रतिपद पूर्व 
दिनमें संपूर्ण शुद्ध होकर हवितीयामें बढती हो तो उस समय 
संपूर्ण होनिक कारण तथाअमावास्याका योग न होनेकेकारण 
पूबाही करनी चाहिये ।जो तो द्वितीयाके योगमें निषेध कर- 
नेवाले वाक्य सुनेगये हैं, व शुद्धस अधिकके विषयमें निषेध" 
पर है।पर दिन प्रतिपद्‌ न हो तो अमा युक्तका भी महण- कर 








( .। ब्‌ ) 
४७७७ माय 233 य  ज 33न जनम मिननन-निनन नितिन भितिनीतिनीन नियम नल नली नल धिनना न टधण ८270 06-45 क “22223 
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निवेधपराण्येव ॥ परदिने मतिपद्सत्वे ठ अमायुक्तापि ग्राह्य ॥ तदाह लल्ठः-तिथिः शी 
तिथिरेव कारण तिथिः प्रमाणं तिथिरेव साधनम्‌॥ इति ॥ यानि त्वमायुक्ता आल न्सिहः 
प्रसादोदाहतवचनानि तान्यप्येतद्विषयाण्येव ॥ अच देवीपूजा भ्धानम्‌ ॥ उपवासादि त्वड़म। 
अष्टम्यां च नवम्यां च जगन्मातरमम्बिकाम॥पूजयित्वाखिने मासि विशोकों जायते नरः॥ हर 
हेमादरो भाविष्ये तस्था एव फलसम्बन्धाद | चित्रावेश्ञतियोगनिषेधो देवीपुराणे- चित्रावेधति 
युक्ता चेत प्रतिपच्चण्डिकाचने ॥ तयोरन्ते विधातव्य॑ कलशस्थापन गृह ॥ दाति ॥ यदा त के; 
तव्यादिरहिता अतिपन्न लब्यते तदोक्ते कात्यायनेन- -मतिपद्याश्िने _मासि भरवेद्रधवतिचित्रयोः | 
आद्यपादो परित्यज्य प्रारमेन्नवरात्कम्‌ ॥ इति ॥ रुह्॒यामले--संपूर्णा भातिपदेव ०७५4५ यद्‌ 
भवेत्‌ ॥ वेधवत्या वापि युक्ता स्यात्तदा मध्यन्दिने र्वो ॥ भविष्येडपि--चित्रा वेधातिसंपूर्णा प्रति 
पच्चेद्धवेस्तूप ॥ त्याज्या अंशाखयस्त्वाद्यास्त॒रीयांशे तु पूजनम्‌ ॥ इद्‌ च रात्रो न कार्यम्‌ ॥+ 
रात्रो स्थापनं कार्य न च कुम्भामिषिचनम्‌॥ इति मात्स्योक्ते!॥ भास्करोदयमारभ्य यावस दश 
नाडिकाः ॥ प्रातःकाल इति प्रोक्तः स्थापनारोपणादिषु ।| आद्याः षोडशनाडीस्तु त्यक्त्वाय:, 
कुछते नर:॥ कलशस्थापन तत्र हारिष्टं जायते भुवम्‌॥ अब्र नवरात्रशब्दो नवाहोरात्रपरः॥ - 
बृद्धों समातिरष्टम्यां ह्ासेइमामतिपन्निशि ॥ भारम्भो नवचण्ड्यास्त नवरात्रमतोः्थवत्‌ ॥। इति 
वचनादिति केचित्‌। वस्त॒तस्त तिथिवाच्येवायम्‌ ॥ तदुक्तम-तिथिब्॒द्धों तिथिहासे नवराप 
मपाथेकम्‌ ॥ अष्टराते न दोषो5यं नवरात्रतिथिक्षये ॥ इति ॥ 
की अथ घटस्थापनविधि$ ॥ 
भातिषदि मातरभ्यड्रं कृत्वा देशकालौ संकीत्य ममेह जन्मनि ढुर्गाप्रीतिद्वारा स्वोपच्छात्ति 
पूवकदीधोयुर्विपुलधनपुत्रपौत्राग्विच्छिन्न सन्ततिवृद्धित्थिरल मोकीतिलाभशहुपराजयसदभीए- 
सिद्धयथ शारदनवरात्रे प्रतिपदि बिंहितं कलशस्थापन हुर्गापूजां कमारीपूजादि करिष्ये । 3 शारवनवरातरे मतिपादे बिंहित कलशास्थापन दुगगापूजा कुमारीपजादि करिष्पे। ही 


लेना | यही छल्ल कहते हैं कि-तिथि ही शरीर है, तिथि 





स्थापन औरर घटामिषचन न करना चाहिये। सूर्योदय 


कारण हे और तिथि ही प्रमाण है । जो नरसिंह प्रसादमे 
वचन उद्धृत किये हैं कि अमायुक्ता करनी चाहिये वे भी पर 
दिन प्रतिपदू न हो तो अमायुक्तमं ही करो; इस विषयके ही 
है। इससे देवी पूजन प्रधान है, उपवास आदिक उसके अग 
हैं । क्यों कि, हेमाद्रिसि भविष्यका बचन है कि, आश्रिन 
मासमे अष्टमी और नवसीके दिन जगन्मातर अग्बिकाका 

पूजन करके भनुष्य शोक रहित होजाता है इसमें विशोक 

आदि फछोंका पूजाके साथ ही संबन्ध दिखाया है। देवी 

उराणमें चित्रा और वेधृति योगका निषेध किया है कि, हे 

शह ४ चैडिकाके पूजनकी प्रतिपदू चित्रा और वैधृतिसे युक्त 
. हो तो उनके समाप्त होनेपरही कलश स्थापन करना चाहिय 
जो बधृत्यादि रहित प्रतिपदा न भिले तो कात्यायनने कहा 

प्वाघको छोडकर लवरात्रका आरंभ करना चाहियेरुद्रयाम 
उम भी छिखा है कि,जबसंपूर्ण प्रतिपदाही चित्रासे युक्त हो 
या वेधृतिसे युक्तहो तो मध्याह कारें पूजनकरना चाहिये। 
भवि:्य पुराणम भी कहाहे कि,चित्रा औरबेधृतिमें हीसारी 
प्रविपदा हो तो पहिछ तीन अशोको छोडकर, चौथे अंशर्मे 
पजनादिक करना चाहिये। पर रातकों यहनकरता चाहिये। 
बाकि, मत पुराणमें डिखा हुआ है कि, रास्मे दृवीका 


है कि, झाश्चिन मासमें वैधृति और चित्रा प्तिपद्‌ हो तो हो 


लेकर दश नाडी तक प्रातःकाल कहाहे उसमें स्थापन और 
आरोपण आदि करने चाहिये। यू्यांद्यस ढेकर जो सोह 
नाडियोंको छोड़कर कलश स्थापनकरता है उसमें निम्नय 
हीअरिष्ट पेदा होता है। यहां नवरात्र शब्द नौ भहोरात्रवो 
कहता है। यदि कोई तिथि बढजाय तो अष्टमीको ससाती 
करनी चाहिये यदि घट जाय तो अमावस्याकी रातको ही. 
प्रति4द्‌ मानी चाहिये। नौरात दुर्गाके पूजनमें आजादी हे 

इस कारण, नवरात्र शब्द सार्थकहोजाता हैं, ऐसाभी कोई 

कहते है, वास्तवर्स नवरात्र शब्द्‌ तिथिवाची ही हे ऐसा ही * 
कहा भी है कि, तिथिकेबढ घट जानेपर यह नवत्ररात्रशन 
साथक नहीं होता, पर नवराजमे तिथिक्षय होनेसे अष्टराः 
होनेपर भी दोष नहीं है,इससे नवराजशब्द तिथिवाची है. 


'माछ्महोता है ॥ अथ नौराज्रके घट स्थापनकी विधि-प्रेति, 


पदाके दिन प्रातःकाछू उबटना करके देश काछूकों कहकर 
मेरे इसी जन्ममें दुर्गोके पूजनके प्रभावसे से पूर्ण आपत्ति- 
योक शान्तिक साथ, दौघोयु, विपुल धन और पुत्र पुत्र 

दिकोंकी अविच्छन्न संसविबृद्धि स्थिरत्रक्ष्मी, कीर्ति ढाभ | 
शहुपराजय . आदि अच्छी अभीष्टसिद्धिके लिये शारद 
नवराज्म प्रतिपदाें कहा हुआ कढश स्थापर: 


जल कहर पा 2-१ २++कतनआ पी ग्कश्ल “4 


22000 था टक द पद 32:/ ४:57: कल> २८ ३०? फप जिकारेइ२ १४८2: हा 2 अं (पीशरप2ह 25 श ऐ 






खसकलूप्य तदड़ं गणपतिपूजन पुण्याहवाचन मात॒कापूजन नान्दीश्रारं च करेष्ये इति संफलप्य 
गणपतिपूजादि कृत्वा ततो महीद्योरिति भूमिें स्पृष्ठा ओषधयः संवर्दत इति यवाक्निक्षिप्प 
आकलशेष्विति कुम्म॑ संस्थाप्य इम में गड़े इति जलेनापूर्य गन्धद्वारामिति गन्धमओषधघयइति 
सर्वोषधीः ॥ काण्डात्काण्डादिति दूवा: ॥ अश्वत्थे व इति पश्चपक्वान्‌॥ स्थोनाप्थिवीति सप्त- 
मूंदः ॥ याः फलिनीरिति फलम्‌॥ स हि रत्नानीनि पेचरत्नानि ॥ हिरण्यरूप इति हिरण्य 
क्षिप्वा।य॒वा छुवासा इति वस््रेण सूअेण वा5वेष्टय पूर्णादवीति पू्णपात्र कलशोपरि निधायतत्र 
वरूण संपूज्य जीणायां नूतनायां वा प्रतिमायां दुगामावाह्य पूजयेत॥ नूतनमूलिकरणहग्स्युत्ता- 
रणं कुर्यात्‌ ॥अथ पूजा! आगच्छ वरदे देवि देत्यदुपनिषदुनी॥ पूर्जा गहाण सुमुखि नमस्ते शकर- 
प्रिय ॥ सबतीर्थमय बारि स्वदेवसमन्वितम्‌ ॥ इम घट समागच्छ तिष्ठ दवि गणेः सह ॥ दुर्ग 
देवि समागच्छ सातब्रिध्यमिह कल्पय ॥ बलिपूजां गहाण त्वमष्टत्रिः शक्तिमिः सह ॥ शंख- 








दुर्गपूजा और कुमारीपूजा भादिक अनेक कृत्य कहूंगा 
ऐसा संकल्प करिके पीछे उसक्के अग जो गणपत्िपूजन 
पुण्याहवाचन और मातृकापूजन हैं उन्हें भी करूंगा यह 
संकरप करके गणपति पूजा आदि करके इसके _पीछे “ओम 
मही यौ:” इस मंत्रस ( इसका अर्थादि पीछे कहचुके हैं। ) 
भूमिका स्पश करके “ ओम ओषधयः समवद्न्‍्त सोमेन 
सह राज्ञा । यस्मे कृणोति ब्राह्मण सते राजन्‌ “पारयाम्सि'? 
आऔषदषधियोंने सोमराजास साथिकार कहा है कि, जाह्मण 
जिसके छिये हमको प्रयुक्त करता हे उप्त कायको हम 
सिद्धकर देती हैं”! ,इस मंत्रस यवॉको बिछाकर उन पर 
हि पे | के ९ ७.. 
ओम आकछगशेषु धावति, पवित्रे परिषिच्यते उक्थयज्ञेषु 
वद्धते ”' है पवसान | आप कछशॉतक धावते हैं. पवित्रमें 
भर दिये जाते हो, यज्ञों में उक्थोंस बढते हो यह प्रमान 
आप समंडलके अनुसार अथ है। स्थानीय विनियोग् तो 
यह है । कछश उठा छाये गये पवित्रपर रख <दिये गये, ये 
यज्ञॉमें वेट मत्रों्त बढाये जाते हैं इस मेत्रस कुँभ स्थापित 
करके ओम इसमे में गंगे यमुन” ( यह मंडछ देवतामें छिखा 
च ९. 6 पृ ९ हर 
हे ) इस मेत्नस उस घटको पानीसे पूर्ण कर “ओमू गन्ध- 
द्वाराम” इस मंत्रस गन्धके छींटे देकर “ ओम ओषधघयर! 
इस मंत्रस सब ओबधी डाढऋर-“ओपू कण्डात्क ण्डात्‌ 
भरोहन्ती प्रुष: परुइस्परि। एव! नो दु्वें प्रततु सहखण 
शतेन च” हे दुर्वे | जेप्ते तू काण्ड काण्ड और पर पवसे 
अकुरित होती है इसी तरह हमें भी सबसे बढा, हम सहसख्र 
और शत सब ओरसे बहें। इस मंत्रस दूवाकुरों को डाढुकर 
“ओम अश्वत्थे वो निषद्र्न पर्ण वो वसतिष्कृता। गोभाग 
इत्किलासथ यंत्सनवथ पूरुषम्‌ ।” अश्वत्थमें विश्राम भोर 
परम आपने वस्ती की है आप सूयकी किरणोंमें हो, आप 
इस यजमानको रक्षाकरें॥ इस मंत्नस पांच पहव डालकर 
५ ओम स्योना प्रथिवी ” इस मंत्रस सातों मृत्तिकार्ये 
डालकर ( इस मन्रका अर्थादि मण्डल जआाह्यणम करदिया 
है ) “ओम याः फछिनीर्या अफला अपुष्पा याश्र पुष्पिणी:। 
कृहस्पतिप्रसूतारतानो मुच्वन्त्वंहसः ॥ ५९ ॥ जो ओोषधी 


फलवाढी हैं, जो अफछा हैं जिनके पुष्प ही नहींआते, या 
जिनपर पुष्प ही पुप्प आते हैं वे बृहस्पति महाराजकी प्रेर- 
णासे मुझे पापस बचायें। इस मंत्रस उसमें सुपारी डाहकर 
“सरिरित्यानि दाशुषे सुवाति संविता भगः । ते भाग चित्र- 
मीमहे” वे सर्वश्वय्येशाली धू्यें देव यजमानके छिये रत्न 
देत हैं; हम उन चाहने छायक भाग्यको मांगते हूँ ॥ इस 
मत्रस पंचरत्न डाढकर “ओम हिरण्यरूपा उषसो बविरोक, 
उभाविन्द्रा उद्थिः सूयश्न, आरोहत वरुण मिन्नगर्त तत्य्व- 
क्षाथामतिर्थि द्तिं च । मित्रोडसि वरुणो5सि ॥”-हे घुब - 

णेके समान रूपवाड़े इन्द्र और सूय्ये, आप दोनों उषा 
काछके समाप्त होते ही प्रकट होते हो, आप दोनों इस 
कछशमें विराजमान हों अदिति और दि्ति दोनोंको देखो । 
इस मंन्नस उस कछणशामें सुबंण डालना चाहिये। “ ओमू 
युवा सुवासाः परिवीतल आगात्‌ सड अयान्‌ भवति जाय" 
मान; ॥ ते घधीरासः कव्रय॒उन्नयन्ति खाध्यो मनसा देव- 
यनन्‍्तः || यदि अच्छे कपड़े पहिननेवाढा युवा परिवीती 
होकर आता है तो वो अच्छा छगता है उसको विचारशील 
ऋन्त द्शी विद्वाचू पवित्र सनसे विचार करते हुए उत्पन्न 
करते हैं। इस समंत्रस कछश पर वस्र डाल सूत्रस वेष्टित 
कर; “ओम पूर्णा दृर्ति परापत, सुपूर्णो पुनरापत, वस्नेंव 
विक्रीणावहे इषधूज +शतकतो ॥” है पूणपात्र | तू उत्कृष्ट 
दो ऋर इस पर बैठ जा, सुपूण होकर फिर आ। हे शवक्रतो। 
मूल्य देकर खरीदनेके समान इष और ऊजे छेते हैं। इस 
मंत्रसे पूणपात्रकों कखछश्‌ पर रखदे फिर उसपर वरुणका 
पूजन करके नूतन मूर्ति हो वा पुरानी मूर्ति हो; उसमें ढुगो- 
का आवाहन करना चाहिये। यदि नयी मृति हो तो पूर्वकी 
तरह अग्न्युत्तारण करना चाहिये | अथपूजा-हे वरके देने- 
वाली देवि | हे देत्योंके अभिमानकोी नाशकरनेवाढ्ली आ; 
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हे सुमुखि | पूजाकों ग्रहण कर, है शकरकी प्यारी तेरे लिये 
नमस्कार है । सब तीथंम्य जछ सब दृवॉसे समन्वित ह, 
हे देवि | अपने गणोंके साथ इस घदपर आकर बैंठो। हे 
दुगदिधि | यहां आकर मुझे सन्निधि हो एवमू आठों शक्ति- 








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चक्रगदाहस्ते झुत्रवर्णे शुभासने ॥ मम देवि वर देहि सर्वेश्वर्यत्रदा यिनी ॥ सहस्तशीष " 
हिर्ग्यव्णों “इत्यावाहनम्‌ ॥ नानाप्रभासमाकी ण्‌ नानावर्णविवित्रितम्‌ । | आसन कॉल्पत देपि 
प्रीत्यथ तव गृहाताम्‌ ॥ पुरुषए० तांमआ० इत्यासनम॥ गंगादिसवेतीयभ्य आनीत तय क्‍ 
त्तमम्‌॥ पा्य तेईह प्रदास्यामि गृहाण परमेश्वरि। । एतावानस्थ० अश्वपूर्णा० पाद्यम ॥ गंधाक्षतेत्र 
संथुक्त फलपुष्पदुतं तंव ॥ अध्य गृहाण दत्त मे मसीद परमेश्वरि ॥ त्रिपादूधदे० कांसोस्मितां' 
अध्यम्‌ ॥ गंगा गोदावरी चेव यमुना च सरस्वती॥ तांभ्य आचमनीयार्थमानीतं तोयमुत्तमम 
तस्मादिरा० चर्द्रांपघ> आचमनीयम्‌ ॥ पञ्वामृतं मयानीत॑ पयोदघिसमंन्वितम्‌॥ घृत॑ मधु 
शर्करया प्रीत्यर्थ प्रतिगंह्मयताम्‌ । आप्यायस्व०१ दधिक्राव्णोअ०२ घृत॑मिमि० शेमजुवाताऋण 
प्वादुः पवस्व०५ इति पश्चनिमत्रेः पथ्चामृतसस्‍्नानम्‌ ॥ ज्ञानमूर्ते भद्धकाले दिव्यमूर्ते सुरेश्वारि॥ 
स्नान गहाण देवि त्वं नारायाणे नमोस्तु ते ॥ यत्ठु हबेण० आदित्यवर्गें० स्नानम्‌ नििते ताइ प; 








योंके साथ पूजा और बलिको ग्रहण करिये।हे शंखचक्र | “ओम तस्माद्विरा०” इस मेत्रस तथा “चन्द्रां प्रमासां बश्न- 
और गदाको हाथ छिये हुए, हू सुन्द्रवर्ण जोर शुभगु- | सा ज्वलन्ती श्रिय छोके देवजुष्टामुदारास्‌ । तां पदानेपि ' 
खबाली, हे सर्व ऐश्रयॉंको देनवाली दवी, मुझे वर दे | शरणमहं प्रपये अछक्ष्मीमें नश्यतां त्वा बरणोमि” चांदूके 
“ओम सहख्)<- शीर्ष”! इस मंत्रस तथा “ द्रिण्यवण |संप्तान प्रकाशमान, प्रकृष्ट कांतिवाडी ए। यशसेभी ग्रका- 
हरिणी सुवगेरजतखजाम्‌ । चन्द्रां . हिरण्सयों छक्ष्मीं जात- | शमान, उदार, जिसकी कि, इन्द्रादिक भी सेवा करते हू, 
वेदों ममावह ॥”हे जात-बेद! तेजस्वरूपिणी, सब ढुखोंको | पद्मनेमि, उस श्रीके शरण हैँ।अपनी अछक्ष्मीको नाश कर- 
हरनेवाली, सोने चांदीको रचनवाली एवम्‌ सबको आरहा- * 


[६ आर्हा- | नंके लिये में तुम्हारा आश्रय लता हूं। इस मंत्रस आचम- 
दिक करनेवाली, तेजोमय लक्ष्म को बुढाओ । इससे दुर्गा- | त्ीय देना चाहिये । आपकी प्रसन्नताके छिय मैं पंचामत 
का आवाहन करे । है देवि! आपकी प्रसन्नताके छिये अनेक 


हे आपका असन्नत नरक | छात्रा हूं इसमें घी, दूध, दही, मधु और सकर मिली हुए 
तरहकी प्रभाओंसे व्याप्त रंग विरंगा आसन तयार है । | है, ग्रहण करियें। इस मंत्रस तथा “ओमू आप्पायस' इस 
प्रंहण करिये। ओमू पुरुष एवेद / सवम्‌ इस सेत्रस तथा मेत्रस ( इसके अर्थादि, मंण्डलदेवतामें लिख चुके हैं) तथा. 
तामू आंवाह जातवेदो रद्मीमनपयामिनीम्‌ । यस्यां हिरण्य 'ओमू द्धिक्राध्णो'”इस मैज्स (इसको पंचगव्य प्रकरणों 
विन्देयं गामश्वं पुरुषानहम्‌ ॥| है जात वेद्‌ | उस न जाने- ड्िख चुके है ) तथा घृतस्मिमिशे घृतमस्य योनिश्वेते श्रितो 
वाली रक्ष्मीको .छादे, जिसमें में गो; अश्व, हिरण्य, और | धृनमस्य घाम,अनुष्वधमावह माद्यसव,स्वाहाकृते वृषभव्षि 
कह इससे दा आह चाहिये । 528 हृव्यमू ” में इस देवको धघृतस सीचनेकी इच्छा रखता हूँ, 
सब ताथास उत्तम्त- पाता मगयों है; स तुझ प्राद्य समस्मापत | .. श प्ि भा हा  । 
करता हूं, हे पस्मेश्वरि | प्रहणकर । गय ४ ओम्‌.एवावा- सकी धृत ही योनि के टेप ही श्रित हर घुतकी का 
नस्‍्य ?* इस मेत्रस- तथा“ अश्वपूर्वी र्थमध्यां हस्तिनादप्र-[ , वितेत्ों छा, हम मैसज्ञ करदे, ह. का्मोंकपूरे करनेवाढ 
मोदिनीम्‌ । श्रिय देवीमुपहये श्रीर्मा देवीजुषताम” में ऐसी | उधाक अनुसार स्वाहाकृत हंउयछे तथा-/“ आओमू - मधुवाता 
श्रीदृवीक! आहाते करता हू, जिसके अगाडी अगाडी घोड़े, | ऋतायते मधु क्षरन्ति सिन्धवः माध्वीनः सन्त्वोषधीः ॥” 
३3 कह हो, हाथी चिंघाडते घढें, वो श्री- | सत्य देवके- छिये वायु मधु रारहा है, नदियों! मधु वह 
नै, इससे पाद्य देना चाहिय । गर हैं, हमारे लिंर हे 
फछ और पृष्पोंस बह कक वियाजारह है इस पक हे का रा ओषबी उमा कि पी न 
प्रश्ण करिये। है परसेश्वरि ! प्रसन्न हृजिये। इससे तथा $ पत्ते विव्यास कि शक र्न्द्रायसुदबीत गि 
' ओम त्रिपादूध्व” इस मंत्र सथा “कांसोस्मितां हिरण्य- | 3 मित्राय वरुणाय वायवे, बृद्दस्पतय मंधुमों अद्राभ्य)ै 
भाकारा सादर! ज्वढन्तीं ठप तपेयन्तीमू । पद्मे स्थिवां पद्म- | भय दिव्य उदयके लिये स्वादिंपठ होजायेँ तथा इन्द्रके ढिये 
चणा चामिहोपहये श्रियम्‌” अनिवेचनीय मन्दहासवाली, | स्वादिष्ठ होकर सुहव करें/मित्र वरुण वायु और बृहदस्प तिके 


कल 00003 > पर बयतृप्त तथा ढिये नहीं दूब सकनेवाले मीठ.स्वादिष्ठहो जायें, इन पांचों 
बणेवादौ, दस औको # बुझा रहा हूँ। इस मेत्रसे अच्ये | स्तन कराना चाहिये । दे ह्ानमूर्े | 
देना चाहिये।शणा, गोदावरी, यमुना और सरखतीसे |: 5 + («दिव्य मू्तें! है सुरेशार! हे नारायणि 
भाचमनडे लिये उत्त८ पानी छाया हूं इस संत्रसे तथा | + पति परे लिये नमस्कार है, स्नान प्रहणकर इसतें) . 
यश सका इन शा अलवर कब लग तथा-ओमू ४०३४ इस मंत्रस तथा ४ अ हक 

में कहा, है... | तपस्तो+धि जातो वनस्पतिस्तव वृक्षो5थ वचिए्व)। तस्य फुछाति 


एक शाप+४67:६८१78 १८६ ८४४३३: ४ हा लक 5१208 तप, शक 7 पक 70067 27:20 0:क770/05207 % 5:43 7070 ४7407 2:2 चक्र: ६74 कै?/ 7 77772: 07/70/2700 04% :/60 75 ९ आउल778 5५१4/३%१९ ३ ५९ ३7 कबीते 
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उत्तरीयम्‌॥ अल पफाराइम नाहत्न सलान ॥ गहाण देवदादे त्वे प्रसी 
अलंकारान्‌ ॥ मलयाद्रेसमुद्भधत कप्रागुरुवासितम्‌ ॥ मया निवादल भक्त्या चन्दर्न प्रहेट्ड: 
ताम्‌ ॥ तस्मा्यज्ञा० गन्धद्वारां० गन्धम्‌ ॥ अक्षताश्व सुरश्षष्ट कुंइुमेन समान्विता३ ॥ नया 
निवेदिता भक्‍त्या प्रीत्यथ मतिगहाताम्‌ ॥ अक्षताव ॥ मन्दार्पारिजातानि पाटलीपड्ुजान्यपि/॥। 
मयाहतानि पूजा पुष्पाणि प्रतिशहाताम्‌ ॥ तस्मादश्वा« मनस+ काम० पुष्प्णणि » अहि 
रिव भोग; ० ऋछ ॥ परिभमलद्रव्याणि ! अथाइपूजा ॥ दुगाये नमः पादों पूजयामि | महाकाल्ये० 
गुल्फों पू० । मड्रलाये० जाठुनीपू० । कात्यायन्ये० ऊरू पू० । भद्गकाल्य० कडी पू० । कमछाये 
नामि पू० । शिवाये० उदर पू० । क्षमाये० हृदय पू० | स्कन्दाये० कण्ठ पू०। मा।हेषाछुरभारदेस्ये० 
नेत्रे पू० | उमाये> शिरः पू० | विन्ष्यवासित्थे० सवाड्र पू० | दशाहड़ रुग्गुल धूप चन्दनाझुरुसे- 
युतम्‌ ॥ मया निवेदितं मकत्या ग़हाण परमेशथारि ॥ यत्पुरुषव्य० कर्मेनमजानू० घूपम्‌ । आज्ये 
च वातिसयुक्त वद्धिना योजितं मया ॥ दीप गहाण देवि त्व॑ तेलोक्यतिमिरापदहे ॥ ब्राह्मणोह्य० 


६३८८ थ। 


्ँ 











आपः सुजन्तु० दीपम्‌ ॥ अच्च चतु॒विध स्वाद रसः पड़ानें; समाब्वितम्‌ | अध्ष्यमोस्यंसमायुक्त 





तपसा नुदनन्‍्तु मायान्तरायाश्व बाह्या अरब्मी: ॥ हू 
सूयके समानवणवाह्लो आपके तपसे वनस्पति हुआ आपका | 
फ्‌छ तो बिल्‍्व है, उसके फछ तपके प्रभावसे मेरी बाहिर | 
भीवरकी अछक्ष्मीको नष्ट कर दें । इस मंत्रसे उत्तरीय देना । 
चाहिये ॥ है देव देवि | अनेक प्रकारके र॒त्नोंस जड़े हुए | 

पूजन कर डाले । दुगो देवीको उम्स्कार इससे पाद, तथा 


महाद्व्य अछंकारोंको ग्रहण कर और प्रसन्न हो ! 
इंस मत्रस अलकार देने चाहिये ॥ यह चन्दन सकूय- 
गिरिका हैं कपूर ओर अगर इसमें डाले गये हैं । में पर 


भक्तिस आपको निवदन करता हूं, आप इसे ग्रहण करिये, | 
इस मंत्रंस तथा “ओम तस्माग्ज्ञा” इस मंत्रसे तथा-। 
४ गन्धद्वारां दुराधषां नित्यपुष्टा करीषिणीम्‌। इंश्वरीं | 
सवभूतानां तामिहोपह्नय' श्रियम्‌ ॥ ?” जिसकी प्राप्तिका | 
द्वार सुगन्धिही है, जिसको कोई डरा नहीं सकता, जो | 
सदा पुष्ठ करती है, जिससे अनेकों गाय आदि आजाती | 
बुलाता 
हू, इस मन्र्स गन्ध समपंण करना चाहिये ॥ दे सुर-।! 
श्रेष्ठ ! ये कुकुम मिछे हुए अक्षत रख हुए है, में भक्तिपूवक । 
आपको निवदन करता हूं ग्रहण करिय इस मंत्रस अक्षत। 
देदि ! मे आपकी पूजाक ढछिय | 
मंदार, पारिजात तथा पाटली पंकज छाया हू, उन्हें अहण | 
करिये। इस मंत्रस तथा- ओम तस्मादुखा ” इस मंत्रसे 
तथा-मनसः काममाकूति वाचः सत्यमशीमहि, पशूना रूप- | 
| चाहिये | इस दीपकर्मे घी और-बत्ती पडीहुई हैं, न जोड़ 


हैं, जो सब प्राणियोंकी स्व्रामिनी है, उसे 


समपण करने चाहिय ॥ 


मन्नस्य मयि श्री: श्रयतां यह्यः ” | श्री दवीजीके भ्रभावस 


हमारे मक्‍की इच्छायें तथा संकल्पें और बराणी सत्य हों, | 
पशुओंके दही, दूध आदि तथा अन्नकी चीजें हमें प्रप्त हों | 
श्री और यश मुझमें रहें, इन मंत्रोंसे पुष्प चढाने चाहियें । | 
“ओम अहि रिव भोगें: पय्येति बाहुं ज्याया हेतिम्परिबाध- | 
मानः | हस्तन्नो विश्वा वयुनानि विद्वान पुसान्‌ पुमांस परि-। 
पातु विश्वतः॥”जेसे सांप अपने शरीरसे चारों ओर छिपट | 
जाता हैं, उसी तरह तू भी ज्याके आधातोंको निवारण | 


हि 





करता हुआ शरीरके चारो ओर भोग की वरह फेछ गयाहे;तू 
सब कामोंका जाननेवालछाहें,सब ओरसे भेरी रक्षा कशशइस 
मेत्र्स परिम्मल द्रव्यॉका समपंण होना चाहिय। इसके बाद 
दुगाक अगोॉकी पूजा करनी चाहिय,एक एक अगक पू जनेका 
जुदा जुदा मंत्र है । पहिल मंत्र चोछकर पीछे उस अगका 


महाकालोके लिय नमस्कार, इससे दोनों शुर्कफ तथा मेंग- 
छाके लिय नमस्कार; इससे दोनों जानु तथा कात्यायनीके 
लिये नमस्कार इससे ऊरू, एवं सद्गकाछीके लिये लसस्कार 
इससे कटदि तथा कमछाके लिये नप्तस्का र, इससे नामि,तथा 
शिवाके लिय नमस्कार, इससे उदर ओर क्षमाके लिये नम- 
स्कार, इससे हृदय; स्कन्दार्के लिय नमस्कार, इससे कंठ 
एवप्‌ महिषासुर मर्दिनीके लिये नमस्कार ,इससे नेत्र,डमा- 
के लिय नमस्कार, इससे शिर तथा विन्ध्यवासिनदीके लिये 
नमस्कार, इससे सबॉगको पूज देना चाहिये। दर्शांगगू- 
गलछ जिसमें है,जो चदन ओर अगरसे संयुक्त ह,ऐसा घूप 

ने शक्ति भावसे निवेदित किया हैं, है परमेश्वरी | अहण 
कर;इस संत्रेस तथा “ओम यत्पुरुष व्यद्धुः इस मसन्नसे, 
तथा-“कदंमन प्रज्ञा भूता साय सम्रम कदुम।श्रव वासय 
में कुछे, मातरं पद्ममालिनोम्‌ ॥ है कदम : आपन तअजा 
उत्पन्न की; आप मेरेम यथष्ट श्रमण कारिये, पद्ममालिनी 
माता श्रीको मेरे कुछमे वसा दीजिय | इस मत्रस घूप दला 


भी दिया है, हे तीनों छोकोंके अन्धक्वारको नष्ठ कएन्‍वाली 
दीपकको ग्रहण कर ॥ इस संत्रस तथा ओम आाह्मणोड्स्य 
इस मंत्रस तथा “आपः सजन्तु ज्िग्घानि विल्कोत वसम 
गह । लिच दंवीं मातरं श्रियं वासय से कुछ” हं समुद्र 

आप लक्ष्मी जेसे ही पदा्थाकों पैदा करें, है लक्ष्मीक पुत्र 
चिछीद ! मेरे घरमें रह, दवी मालाश्रीकों मर कुछमें बसा।। 
इस संत्रसे दीप देना चाहिये। चारों तरफका स्वाठु अन्न 


| 








प्रीत्यथ प्रतिगह्मताम्‌ ॥ चन्द्रमा० आदी पृष्क० नेवेद्यम्‌ ॥ आचमनीयम्‌ ॥ मलय'चलसंभ] 
कस्तूर्या च समखितम्‌ ॥ करोद्वर्तनक देवि गृहाण परमेश्वर ॥ करोद्व्तनम ॥ इद फल मय 
देवि स्थापति पुरतस्तव ॥ तेन मे सफलावा तिमेवेज्नन्माने जन्मनि । नाभ्याआ०्आ द्ीयःकः 
फलम्‌ ॥ पूगीफलम्‌ महद्दिव्य नागवल्ल्या दर्लेथुतम॥ कपूरेलासमायुक्ते ताम्बूल प्रतिगहमताग। 
ताम्बूलम्‌ हिरण्यगर्मेति दक्षिणाम्‌॥ यज्ञेनयज्ञ॑ण्यः शुचिःत्र० ॥ मंत्रपुष्पाअलिम्‌ ॥ अश्वदाग 
गोदाये इत्यादि प्रार्थथेत्‌ ॥ ऊँ श्रियेजातः०्नीराजनम॥श्रीसूक्त संपू्ण पठित्वा पुष्पाअलिम॥ 
मंत्रहीने क्रियाहीन भक्तिहीन खुरेधरि ॥ यत्तूजितं मया देवि परिष्‌ण तदस्‍्तु मे ॥ महिष 
महामाये चाम्॒ण्डे मुण्डमालिनि ॥ यशो देहि धन देहि सवान्कामांश्व देहि में ॥ नमस्कारम। 
अथ कुमारीपृजा ॥ एकवर्षो तु या कन्या पूजाथें तां विवजेयेत।गन्धपुष्पफलादीनां भीतिस्तस्था 
न विद्यते॥ तेन दविवर्षामारभ्य दशवर्षपर्यन्ता एव पूज्या न त्वन्या॥ सामान्यपूजामंत्र॒स्तु-मंत्र- 
क्षरमयीं लक्ष्मी मात॒णां रूपधारिणीम्‌ ॥ नवदु्गांत्मिकां साक्षात्कन्यमावाहयाम्यहम्‌ । इति॥ 
तासां पृथदुनामान्याह--द्विवपेकम्पामारम्य दशवषान्तविग्रहाम्‌ ॥ पूजग्रेत्सवेकार्थेषु यथाविध्ु-, 
क्तमार्मत॥कुमा रिका द्विवर्षा तु त्रिवर्षा तु त्रिमूलिका॥चतुर्वेषों तु कल्याणी पश्चव्षा तु रोहिणी 





जिसमें छओ रस मिलें हुए ह,भक्ष्य और भोज्यसे युक्त है, | 


आपकी ग्रसन्नताके छिय छाया हूँ ग्रहण करिये।। इस मत्रस | 
तथा “ओम चन्द्रमा ममसो जात” इस मेत्रसे तथा-| 
“आदर पुष्करिणीं पुष्टि पिड्डछां पद्ममालिनीम्‌ । चढद्रां हिर. | 
०्मयीं छक्ष्मीं जातवेदों ममावह॥'”जिसका अभिषक दिः्गज | 
करते हैं तथा जो सबको पुष्टि देती है, पिड्डछ वर्णकी है, | 
कमलछकी मालायें पहिन हैं, सबको प्रसन्न करनेवाली है, | 
दयाद्रेचित्त हे स्वय तेजो भय है,ऐसी लक्ष्मीको हे जातवेद | | 


मुझे छा दे ॥ इस मंत्रसे तेवय्य निविदन करना घाहिये; 


मलयाचलूपर पेदा हुआ है, कस्तूरी इसमें मिली हुई है; 
तुम्हारी प्रसन्नवाके लिय यूह करोहतेन तयार है, ग्रहण 
करिये। इस मंत्रस करोह्वतन देना चाहिये ॥ हे देवि | यह 


सह 


फछ सेने आपके सामने स्थापित किया है, इससे मुझे इस | 
ज्ञर के हक २ फस्त ३ 
' जन्म तथा दूसरे जन्मसे सफल प्राप्ति हो ॥ इस अंत्रसे, 


क्‍्था-' ओम नाभ्या आसीदन्त ! इस संत्रस . तथा-“आद्रा 


यः करिणीं यरष्टि सुवर्णा हंममालिनीम। सूर्य हिरण्मजीं 
लक्ष्मी जातवेदों मावह ॥ ' भक्तोपर दया करनेवाली 
जिसका कि, द्माज असिषक करते रहते हं। जो स्वयम्‌ 
सब अयत्न करती है, सुन्दर वर्णवाल्ली सोनेकी माढाएं 


पहिने हुई है, जो सूयंके भीतर भी विराजसान रहती है, | 


ऐसी तेजोमयी ढक्ष्मीको हृ जातवेद तू छे आ ॥। इस संत्रस 
फल समर्पित करना चाहिय ॥ बढ़ा सन्दर पान हैं. सुन्दर 
सुपारी, इलायची और कपूर पड़ा हुअ 


गभे ” इस मेत्रसे दृक्षिणा दे, ' 
क्वा हे श्स यः हि लगते * 
मन्तृहम्‌ । शरियः पलद्दई ५ को ना बहुवादाज्य 
वह __ उदेखच व श्रीकामः संतर्त जपेत ॥? 
लिस धनकी इच्छा हो वह पवित्रतापूवंक सावधन होकर 









| । है, इसे आप ग्रहण | 
* रस सत्रस तास्वृद्ध दे द् हिरण्य- | 
आर क बे (* ओमू हिरण्य- | करनेवाली साक्षात्‌ नवदुर्गात्मिका कन्याका में आवाह 

मू यज्ञन यज्ञम्यजन्तं | हे | 


रोज हवन करता हुआ श्रीपृक्तकी पंद्रहों ऋवाओंका नि 

न्तर जप करता रहे।॥ इससे मेंत्रपुप्पाजलि दे | तथा- 
' अश्वदाये गोदाये घनदाये महाघने । घने मे जुपतां देपि 
सवकामांश्व देहि मे ॥ ? अरब, गो और घन दनेवाढीपे 
लिय नमस्कार है। हे महाघनवाली देवि ! मेरे सब कामों 
मुझ दे तथा घनका भी सेवनकरे । अथवा हे मह।धनवाही 
देवी अइव, गो और घन देनेके लिय मुझसे प्रेम कर दया 
घन ओर सब कामोंको दे। इस मंत्रसे प्राथना करो 
चाहिये। ' ओम श्रिय जातः भ्रिय आनिरीयाय अ्रियं व्ये 


पीछे आचमनके मंत्रंस आचमन कराना चाहिय। यह | “स्टिम्यों दंदाति श्रिये बसाना अश्ृतत्वमायन्भर्वान 


| सत्यासमिथामितद्रो ॥ ? श्रीक छिय पंदा हुआ श्रीक्रे हि 


ही प्राप्त हुआ है स्तुति करनेवालोंके लिये श्री और वयर 
देता है, श्रीकी रखनेवाले अमृतत्वको प्राप्त होते हूँ, वही 
७ हा 5 कप दि रे 

समग्रामके वीर, मित चलनेवाले, सत्यसाबित होते है । इप 


'मेत्रस आरती करनी चाहिये | संपूण श्रीसूक्त पढकर पुष्पां ' 


जलि देनी चाहिये । कि, हे. सुरेश्वरि ! जो मैंने आप 
भक्तिहीन क्रियाहीन और संत्रहीन पूजन किया हे वो मे 


परिपृण हो, हे महिषासुरकों मारनेवाली महामाये .( 
मुण्डोंकी माला पहिननेवाली चाण्मुडे ! मुझे यश दे था 


| देभऔर सब कामोंको दे । इससे नमष्कार करना चाहिय। 


कि कुमारी पूजा-एक वषकी कन्याको पूजनमें प्रहण | 
करे, क्योंकि उसकी ग्रीति गन्ध पुष्प और फछ आदिकों/ 


| नहीं होती इस कारण दो वषकीस लेकर दशवर्ष तदवी 


ही पूज्या है, अन्य नहीं हैं ।। सामान्य पूजा मंत्र तो यह 
कि, संत्राक्षरमयी लक्ष्मी तथा मातृकाओंका रूप धाण 


करता है उनके प्रथक्‌ नाम भी कहते ह--दो वर 
कन्यास लेकर दश वर्षतककी कन्‍्याको विधिके #*ह 
सार सब का्मोमें पूजना चाहिये ॥ दो वर्षकीका ना 
.कुमारिका तथा तील वर्षकी चिमू्िका तथा चार वर्षत 


(तानि, | भाषाटीकासमेतः । ( ६७ ) 





(वर्षा तु काली स्थात्सतवषों ठु चण्डिका)। अष्वर्षा शाम्भवी च दुर्गा च नवमे स्मृता ॥ दश- 
शे सुभद्वेति नामत+ परिएजयेत्‌.) प्रातःकाले विशेषेण कृत्वाउम्यड़रं समाहितः ॥ आवाहये- 
तः कम्याँ मन्जैरोनिः उरथक्प्रथक ॥ तानेव मंत्रानाह--जगत्पूज्ये जगदन्दे सवंशाह्िघ्वरूपिणि ।। 
ज्ां गहाण कोमारि जञगन्मातनमोस्तु ते ॥ १ ॥ तिपुर्रां जिंगणाथारों त्रिमार्गज्ञानरपिणीम्‌ ॥! 
लोक्यवन्दितां देवीं त्रिमाति पूजयाम्यहम्‌ ।। * !' कालात्मिकां कलछातीतां कारुण्यहदयाँ 
शबाम्‌। कल्याणजननीं नित्पां कल्याणी पूजयाम्पहम्‌ ॥ हे ॥ अणिमादिशणाधारामकारा' 
क्षरात्मिकाम्‌ ॥ अनन्तशक्तिमिंदां ताँ रोहिणी पूजयाम्यहम्‌ । ४ || कामचारी कामरात्री 
उलचकऋस्वरूपिणीम्‌ ॥ कामदां करुणाधारां कालिकां पूजयाम्यहम्‌ ॥ ५ ॥ उम्रध्यानां चोप्- 
'पां दृष्ठासुरनिबर्हिंणीम)। चावद्रीं चण्डिकां लोके पूजितां पूजयाम्यहम्‌ 0 ९ | सदाननन्‍्दकरी 
गानतां सर्वेदिवनमस्कृताम्‌ ॥ सर्वभूतात्मिकां लक्ष्मी शाम्भवी पूजयाम्यहम । | ७ ॥ दुर्गमे 
(ह्तेर शुद्ध भथढुःखविनाशिनीम )! पूजयामि सदा भक्‍त्या ढुगा डुगॉतिनाशिनीम || 4 ॥। 
नदी स्वणंवर्णामां स्वेसौभाग्यदायिनीम्‌ !। सुभद्रजननीं देवीं खुभद्रां पूुजयाम्यहम्‌ ॥९%। 
ति कुमारीपूजनम्‌ ॥ प्रारम्भोत्तरं सूतकप्राप्तावाह ॥ खूतके पूजन भोक्त जपदाने विशेषतः ॥ देवी- 
वुद्दिश्य कर्तव्य तत्र दोषो न विद्यतादाति॥ अनारब्धे त्वन्येन कारयेत्‌ ॥ रजस्वला ठ बराह्मणेः 
उजादिकं कार्य: सूतकवादिशेषवचनाभावात्‌ ।! समलेकस्त्रीणां नवरात्रे गन्धादिसेवनं न 
दोषाय ॥ तदुक्त हेमादरो गाशझडे--गन्धालड्भारताम्बूलपुष्षमालालुलेपनम्‌ ॥) उपवासे न दुष्यन्ति 
दस्तवावनमखनम ॥ दृत्याखिनशुक्कर्पातिपत्कृत्यम्‌ ॥| द 

अथ का विं#शक्कअरतिपत्‌ ॥ सा पूर्वी आह्या ॥ पूवाबिद्धा भकतेव्या शिवराचिबंलीदनम्‌ ॥ इति 
पा्मोक्तेः॥ अत्नाभ्यज़ो नित्यः॥वत्सरादों वसन्तादो बलिराज्ये तथेव च ॥ तेलाम्यड्रमकुवाणो 





















कल्याणी एवम्‌ पांच वर्षकी रोहिणी, छःवर्षकी काली, सात | आनंद करनेवाली, शान्त है, जिसे सब देवता नमस्कार . 
बर्षकी वडिका, आठ वर्षकी शांभवी तथा नौ बंषेकी दुर्गा | करते हैं, जिसकी सब प्राणी आत्मा हैं; ऐसी लक्ष्मी शांभ- 
और दशवर्षकी भद्राके नामसे पूजी जानी चाहिये | प्रात | वीको मे पूंजवा हूँ ॥ ७॥| जो दुर्ग तथा दुस्तर युद्धमें 
काल विशेषरूपसे उबटन करके नित्यनेमित्तिक कृत्यसे | भय और दुःखका नाश करती है, उस कठिन आपत्ति- 
चितृत्त हो, एक ग्रचित्तसे बैठजाय फिर इन मन्त्रोंसे प्रथकू* | यॉका नाशकरनेवाली दुर्गोंको मं भक्तिके साथ सदाही 
कन्याओंका आवाहन करे । उन्हीं मन्‍्त्रोंको कहते हं- | पेजता हूं ॥ ८ ॥ परम सुंदरी तथा सोनेक रंगकीसी आभा- 
जिनसे कि आवाहन किया जाता है--हेजगकी पूछ्ये ! हे- | वाली, सब सोभाग्योंको देनेवाली, सुभद्रकी जननी, देवी 
जंगवकी वन्ये | हे सर्वशक्तियोंके स्वरूपव्राढी कौमारी | सभद्राकों में पूजता है ॥ ५ ॥| इति कुमारी पूजनम्‌ ॥ प्रारंभ 
देवी। पूजा अहणकर, हे जगन्मातः | तेरे लियः नमस्काः करनेपर सूदक हो जाय तो-उसमें कुछ विशेष कहते हैं कि, 


हैं ॥१॥ छोग जिले त्रिपुरा कहते हु, जो तीनों गुणोंकी | पूतकेमें दबीका उद्देश लेकर पूजन और विशेष करके जप 
दान करने चाहिये। इनमें कोई दोष नहीं है । पर प्रारम्भ 


आधार है तीनों मागेके ज्ञानकी रूपवाली है; ऐसी तीनों | 

छोकोंठारा वन्दित त्रिमूर्ति देवीको में पूजता हूँ ॥ ९॥ जो | न किया हो तो दूसरोंस ही कराने चाहिये। जो रजस्वला 
कालात्मिक है कछास अतीत हैं; करुणा भरे हृदयकी है, | हो उसे तो ब्राह्मणों त् पूजादिक कराने चाहिये। क्योकि, 
शिवा है कल्याणकी जननी हैं. नित्य हें; ऐसी कल्याणी | पूतककी तरह इसके छिये कोई विशेष वचन नहीं है 
देवीको में पूजता हूं ॥ ३ ॥ 'अणिमादिक गुणोंकी आधारहै | सुहयमिन स्थियाँ यदि नवरात्रि गन्ध॒ आदि सेवन करें तो 
अकारादि अक्षरात्मिका है, अनन्त शक्तियोंके भेदवात्गी है | उन्हें कोई दोष नहीं हैं, ऐसा हेमाद्विंम गरडपुराणका वचन 
ऐसी रोहिणीका में पूजन करता हूं ॥४)। जो कामचारिणी | कहा हे कि गंध; अलंकार, पान, इलमाला, अनुलेपन, 
' क्वामरात्री तथा कारूचकऋके स्वरूपवाली है, कार्मोंको देने- | इव्धावन और मज्जन; उपवासमे भी सुहागिन स्त्रियां कर 
वाली है। जिसमें करुणा भरी हुईं है, ऐसी कालिकाको में | सकतीं हैं। यह आश्विनशुद्धा भ्रतिपदाका कृत्य समाप्त 
पूजता हूं ॥६॥ उम्र ध्यानवाल्ली, उम्र रूपवाली, दुष्ट असु- | हुआ ।॥। अथ कार्तिकशुक्छाप्रतिपदा-पूव्वां परहणकरनी 
रोंको मारनेवाली, सुद्र शरीरवाली तथा छोकमें पूजिता [क्योंकि पद्मपुराणमें लिख हुआ है, शिवरात्रि ओर कार्ति- 


श्रीयंडिका देवीजीकी में पूजा करता *॥ ६॥ जो सदा | कशुक्छा प्रतिपद पूृवधिद्धाही ऋरनी चाहिय, इसमें उव" 








९ 


4 प्रतिपदृ७ 
घेछ्ोक्ते: | अब कलव्यमाह ॥ प्रातगोवद्वेनः पज्यों द्यू्त चापि समः 
भ्रूषणी पूज्याश्वावाहदीह ना: ॥ अब इत्म5।तः4 ॥ वालखिल्या उच्ु। 

क्‌ कहे अब्शे की 0 $ आ' 

तिपदादयेसयर्क कृत्शा नीराजन तत$ । खुबंष: लत्कथागीतदानिश् दिवस नयत्‌ ॥ १ ॥ शक्ष 
स्ठ तदा झत ससज सुमनोहरम॥ कार्तिके शुकृपक्षे त॒ प्रथमे5हान सत्यवत्‌ ॥ २॥। अत्युवाप 
वचओेद देवी मति सदाशिवः ॥ कालक्षेपाय केषांचित्केषांचिद्धनहितवे ॥ ३ ॥ केषाँचिद्धनना 
शाय पहय झूते कृत मया ते तस्‍्य त्वं कौतुक पहण खुबन लापयाम्यहम्‌ ॥४॥ उद्ेत्थ कीति/ 
ताथ्यां सवान्या च जिते तदा ॥ पुनर्दधितीय झुवन छापितं निजितं तथा ॥५॥ पुनस्ततीए 
धवन लापित॑ निर्जितं तथा ॥ पुनवृर्ष पुनश्चर्म पुनः पत्नगबन्धनम्‌ ॥ ६९॥ शशिलेखां उमर 
सर्व तस्याप्यजीजयद॥ निर्मतस्तु हरों गेहाल्वीरवल्कलघारकः ॥ ७ ॥ गड्जातीर॑ समागत 
तघ्थों चिन्तासमन्वितः ॥ सस्मिन्क्ष णे कार्तिकेयः खेलितु च गतःक्तचित॥ ८ ॥ गड्ढातीराध्गे 
गेहमपह्यत्पाथे शंकरम्‌ ॥ ईषत्कुट्टं विरक्त॑ च ननाम चरणों पितुः॥ ९ ॥ तेनापि माज्नि चादत्रात 
पुँत् याहि गहं सुखम्‌ ॥ तब मात्रा जितश्वाहं गच्छामि गहने वनम्‌॥ १०॥ सकद्द उवाच ॥ क्य 
मात्रा जितों देवो बन॑ कस्माज्च गच्छसि ॥ अहमधप्यागमिष्यार त्वत्पादों सेबयाम्यहस्‌॥ १९॥ 
शिव उद्याच ॥ विजित्य तव मात्रा त॒ क्षण न स्थेयमत्र वे। मम लोके तथेत्युक्तः ऋचिद्वच्छाम्प 
ततः ॥ १२ ॥ स्कन्ह उबाच ॥ मा गच्छ त्व॑ महादेव यतमाग प्रदशिय ॥ आनीयते .मया जिला 
स्व तव घनाविकम्‌ ॥ १३ ॥ शिवेनापि तथेत्युदत्वा चूतमाग अदाशितः ॥ स्कल्दोपि गृहमागद 
पावेदी वाक्यमबवीत ॥१४७॥ स्कम्द उवाच ॥ देवि देवो गत काउसो वृषभोज्ेव संस्थितः। 
शीर्ष च न विधु कस्मान्मातः सत्य बदाद्य में ॥ १५ ॥ देव्युवाच ॥ स्वय्रमेव कृत शृत 
स्वयभव पराजितः ॥ स्वयमेव गतः क्रोधात्पाथ्यतां स कर्थ मया ॥१९६॥ स्कन्द उवाच ॥ मय 

















ठन करना जरूरी है, क्योंकि वत्सरके आदिम, वसतके 
आदिम तथा बलिक राज्यमें जो तेलाभ्यजड्ग नहीं करता वो 
नरकमें जाता है, यह वसिद्ठंजीने कहा है।॥ इस तिथि 
क्या करना चहिये ! सो कहते हैं कि-प्रातःकाल गोवर्धन 
का पृजन करे तथा जूआ भी खेले तथा गझओंका पूजन 
ओर श्ूद्भार भी करना चाहिये।अथ कथा-बाछूखित्य 
बोले कि, प्रतिपदाके दिन प्रातःकाकू उबटन स्थान करके 
अपना आगार करना चाहिये। फिर अच्छी कथा वातांओं 
में इस दिन्को पूरा करना चाहिये ॥ १॥ श्रीप्रहादेवजीने 
कातिकशुक्ला प्रतिपदाकों सत्यकी तरह सुंदर जूआ रचा 
था।॥ २॥ सदाशिव भगवानने देवीजीसे कहा कि हे- 
देवि ! किसीके फालक्षपके लिये तथा किसीको धन पानिके 
किए ॥ ३ ॥ एवम्‌ किसीके घनके नाशके लिये मैंने जूआ 
बता दिया है, इस जुएके खेछको अप देखें मे एक भुवन 
दावपर छूगाता हू ॥ ४ ॥ एक भुवत्त दावपर रख दिया 
और दोनों जूआ खलने छंगे पर पावेतीजीने उस दावको 


'जीद् लिया । महारेवजोते दूर 
गप हइवज़ःत दूसरा भुवन दावपर रखदि 
शीसदीय चद भी जीत रख ) क्‍ 


कल जीत लिया )। ५ ॥ महादेवजीन वीसरा 
बन भी दुषपर रख दिया, उसे भी अम्वाने जीत छिया, 
का क हक पीछे चरम, फिर सांप दावपर छगा- 
दा बको श अछ सा, इसके पीछे डमरू दावपर रखा, 
इन एवॉको पा जीत लिया। शिवजी सब कुछ 
एंकर वल्कछ् बसन पहिनकर घरसे चले गये ।॥। ७॥। 


शिवजी गेगाकिनारे वक्े आये और गहरी चिन्तासे व्या 
कुछ होकर वहीं बेठ गये, उस समय कार्तिकेय वहीं-कहाँ 
खेलने गये थे ॥ ८ ॥ गज्ञाकिनारेसे धर जा रहे थयेकि। 
ने हे. कवर तर पा श्रास कह 
मागम शिवजी दीख पड़े, कुछ क्रोधर्म थे, तथा सबसे विए' 
क्त हो रहे थे, स्वाभिकातिकजीन पिताके चरणोंमें प्रणाम 
किया ॥ ९ ॥ शिवजीने पुत्रके शिरको सूघकर कहाकि। 
बेटे सुखपूवक घर जाओ, तुम्हारी माने मुझे जीत लियाईं 
इस्त कारण भें तो गहन बनको जाऊँगा ॥ १०॥, यह पुर 
स्केद बोले क्लि, आपको मांने केसे जीत लियः ? तथा क्यो 
बनको जा रहे हो ? में मी आता हैं, आपके चरणोंकी 
सवा करूँगा ॥११॥ शिवजी बोले कि, तुम्हारी माताब 
जीलऋर कहदिया है कि. यहां मरे छोकोंमें मत ठहस्वा 
इस कारण में कहीं जा रहा हूँ ॥ १२॥ यह सुन सकल 
बोले कि, है महाहेव | आप कहीं न जाये आप मुझे जूआ 
सिखादें | में आपके खोये हुओंकी जीत करके छा दूँगा 
॥ १३ ॥ शिवजीन कहा कि, अच्छी बात हे, स्वामी का द 
कको जूआ खलना बता दिया, स्कन्दमी घर आकर पा" 
तीजीसे बोले ॥१४॥ कि, है देवि ! देव कहां हैं नांदिया 
यहीं है आज माथेपर चन्द्रमाभी नहीं रखा हैं। यह क्यों 


है मातः | मुझे सब बातें सच सच बता दीजिय ॥ १५॥ 


दूवी बोली कि; अपने आपही जूआ बनाया दी 
आपही रु पराजित हुए, एवम्‌ आपही गुस्साई 
भार चढू गये मर उन्हें केस मनाऊं।॥ १६॥ सं 


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त्कीडन त्विति ॥ देव्यक्रीडत्तेन सार तत) स्कन्देन निर्फेल्द ॥१७। 


(स्द्धा 
मयरेण दृषस्‍्तस्थाः शक्त्या पतन्नगबन्धनम्‌ | वृषेणेन्ुस्ततोषधो डर तत्सवे तेन निजितम ॥१८॥ 
कोपीन निर्जितं चर्म गृहीत्वा तद॒पाययों ॥ गक़ातीरे यत्र शिवस्तत्रगत्य व्यवेदयत है १९ ॥ 
ततो देवीसमीपे तु विश्नराजः समाययों ॥ किमर्थ म्लानवदना देवी जाताओि तद्गद ॥ २० ॥ 
देंव्युवाच ।। मया ।र्जतो महादेवः स तु गेहादिनिगेतः ॥ आयास्यति छ्बाह्मथोमाति संचित्य 
संस्थितम्‌ ।। २१ ॥ तब श्रात्रा तु ताल्ित्वा से तस्मे निवेदितम्‌ ॥ नायाध्यत्यछुना देव इते 
चिन्तापरास्म्यहम्‌ ॥९२॥ गणेश उवाच ॥ देवि शिक्षय मां. झतं जेष्यानि जातर हरम्‌ ॥ 
आजनाथिष्याने साभग्रीं यद्य॒ह स्थां सुतस्तव ॥२३॥ इति पृत्रवचः श्रुत्वा तस्मे द्ृतमशिक्षयत्‌ ॥ 
स गहीत्वा पाशयुर्ग सारिकाः शीघ्रमाययों ॥ २४॥ प्रृष्ठाप्रद्टा यत्र देवा: स्कनदो यत्र व्यव- 
स्थितः ॥ गणेश उवाच ॥| मंयानीताविमों पाशों सॉरिकाः पट एबं च ॥ २५॥ क्रीड रथ तु 
मया साह् देवस्यथाग्रे ममाश्नज ॥ इति अआ्ातृवचः श्र॒त्वा छाुमाभ्यां क्रीडिति तदा ॥ २६॥ 
मूषकेण बलीवदे मयूरं चाप्यजीजयत ॥ शिवश्य सर्वाविष्य स्कन्दस्थ च तथेज च ॥ २७॥ 
गृहीत्वा स तु विध्रशस्तत्झालेपावंतीं ययो ॥ पावेत्यपि च संतुष्दा गणेश॑ वाव्यमबबीत्‌ ॥शै८। 
सम्यक्‌ कृत॑ त्वया पुत्र नानीतोसों महेइवरः ॥ सामदानादिक॑ कृत्वा आनयात्र महेइवरम्‌॥२९॥ 
तथेत्युकत्वा गणेशोपसो समारुहाय व सूषकमष्स त्वरित चाययों तत्र गह॑ नेतु हहेइवर्स ॥३०॥ 
इंइवरस्तु सघुत्थाय हारेद्वारं समागतः॥ नारदेरितवृत्तान््तो विष्णुस्तत्र समागलतः ॥३१ ॥ विष्णु 
रूवाच ॥ ज्यक्षां विद्यां कुछ शिव एकाक्षोह भवाम्यहम ॥ रावणन तथत्युक्ते कोणों भव 
जनादुन ॥ श२ ॥ विष्णुझवाच ॥ ओतुवत्पश्यसे मां त्वें तस्मादोतुर्भविष्यसि ॥ नारदउठबाच ॥ 
देव सिद्ध महत्कायमायाति स गणेइबरः ॥ ३२३ ॥ ज्ञातुमत्र संवद्ू मूडकाप्श्य धष्यताम ॥ 





पावतिजीस बोले कि, मेरे साथ खेलिय, जआ केसे खा | आप मेरे साथ शिव्रजीके सामने खडछ, भाईके वचनसुनकर 
। स्कनद्‌ खलनकी तयार होगये, फिर दोनों माइयोंसें जूआ 
जीत छिया ॥ १७ ॥ मयूरसे नांदिया जीता, शक्तिसे पन्न- | मचा ॥ २६ ॥ गणेशजीने मूसेस वृषभ और मथूरको भी 
गबन्धनको जीता, इस प्रकार सब कुछ जीत लिया ॥१८॥ | जीवलिया तथा शिवजी और रकन्दकी सब कुछ ॥ २७॥ 
स्कन्दजी शिव जीके कौपीन और चम्म उससे जीतकर + जीवकी चीजेंलेकर गणेश पावतीके पास आये पावेतीजीसी 
गंगाकिनारे वहाँ छेकर पहुँचे, जहां गंगारु कितारे शिवजी | जयी पुत्रस बोलीं कि ॥२८॥पुत्र ! यह तो तूने ठीक किया 
५४ शक लत चल ल आकक 0 करदिया ॥| १९॥ | पर शिवजीको न छाया. जा. साम दामादिक करके शिव- 
हक सी न 322 बता जल जीको यहां! छेआ ॥२९॥ गणेशजीने कहा कि अच्छी बात 
पर 86 कल जहर क | है; अभी छाताहूँ, झट मूसपर सवार हो शीघ्रही शिव जीको 
कि,मैने 8 05. शलानिक लिये सके दियआ बेलाओों विज वहांसे उठकर 
कि, अपने दृषादि छेनेके लिय घर आयेंगे इसी लिय बेटी जिदार ले आय वार देय हे आज विष्णु- 
रह गयी ॥| २१॥ तरे भाईने सब जीतकर उन्हें देदिया सकल की पी हट मर्ज कह कक 
वो अब नहीं आरहे हैं में इसी चिन्तामें हूं ॥ २२ ॥ यह |  त त शहर हि कक के आक है. के हा । 
सुनकर गणश बोले कि, दददवी! मुझे जूआ खलना सिखादे | बिण्शु भगवान्‌ शिवजीसे बोले; कि शिव महाराज ! ज्यक्ष 


करते हं,पा व तिजी स्कन्दके साथखली,स्कन्दन पावतीजीको 


कक 


स्वामिकातिकजी बठेथे | स्वामिकार्तिकजीसे बोले कि, मे 


१ एकश्चासावक्षः पाशक्श्वेतिविश्रह्टे विवक्षित्पि बहुब्नीहिणा शब्दच्छलात्काण इत्युक्तम्‌ । 


से भाई और शिवकों जीत कर सब कुछ छादूं तो तेरा | 
हे आप ज् ' 

बेटा, नहीं तो नहीं ॥ २३॥ पुत्रके ऐसे वचन सुनकर | 
हिए.०५४ जूः हि स्‌ दर 
उन्हें जूआ खछना बतादिया, वो दो पासे और गोद ढेकर | 
खेलन चलदिय ॥ २४ ॥ पूछते पूछते वहां चले आये, जहां ; 
| नारदजी बोछे कि; हे-दव! अब बहः दाय सिद्ध होगया, 
दो पासे गोट और कपडा छेकर चलाहूँ॥२०॥ है बडे माई! : 





विद्याकरिये, में एक अश्ष होजाऊँगा, रावण वहां सुन 
रहा था बोछा कि अच्छी बात है, आप काने हो जाइये 
॥१२॥ यह झुन्र विष्णु भगवान्‌ बोले कि, तुम्त मेरी ओर 
बिलावकी तरह देखते हो इस कारण आप बिछ्ठे होजाओ,. 


चर 
वो गणेश्वर आरहा हे ॥३३ ॥ आपका समाचार जाननेको 


प्रतियद-- 
(७० ) 'तराज। हि ले ु 





इति श्रत्वा नारदस्य वचन रावणोग्रतः ॥ ३४ ॥ कुवन्माजारवच्छब्द ४ ३०% 
* व्यज्य गणपः शनेः शनेरुपाययों ॥ २५ ॥ जातो विष्णुः पाश इति दूः देलोकि- 
का कर सी महादेव॑ विनयानतकन्धरः ॥ ३६ ॥ गणेश उबाच ॥ आगम्यतां देव गह देवी 
8 ॥ यदि नायासि गेह त्व॑ मरार्णास्त्यक्ष्यति चामि बका | हे ७| कल्‍ कह जया सब 
कार्यमेतदुपायनम्‌ ॥ महादेव उवाच ॥ एषा ध्यक्षा महाविद्याईडना गणए ध | अनया 
कीउते देवी आगमिष्ये शहं तदा ॥ गणेश उबाच ॥ सवथव क्रीडितव्यं शा नास्त्यत्र संशय: 
॥३९॥ आगम्य्ता गह देव भ्रात्रा सह हि मा त्रज ॥इति तस्थ बचः श्रुत्वा ईशवरः सगणो ययौ 
॥४०॥ नारदोप्यागतस्तत्र महोत्र॒पि चागतः॥उपविष्टास्तु केलासे देवास्तत्र ९०५४० ३६६ ॥४१॥ 
हृष्ठा देवीं प्रहस्यादों महेशों वाक्यमबबीव ।॥ ज्यक्षविद्या महादोवि गड्लीद्वारे विनिर्मिता। ४२॥ 
अनया जयसे त्व॑ चेत्तदा त्व सत्यभाषिणी॥देव्युवाच।|ब्षादि तब सामग्री मयेय॑ लापिता शिवा 
॥४३॥ त्वया कि लाप्यते ब्रहि दर्शयस्व सदोगताव।इतिश्रुत्वा बचस्तस्याः प्रक्षताधोमुख हर: 
॥४४॥ तास्मिव्‌ क्षणे नारदेन स्वकोपीन समर्पितम्‌ ।। बीणादण्डश्रोपवीतमनेन ऋरीडतामिति 
॥४९॥ सदाशिवः असत्नोभृत्कीडन संप्रचक्रठः ॥ यद्यद्याचयते रुद्र॒स्तथा विष्णु: प्रजायते॥९ | 
यद्यद्याचयते देवी विपरीतः पतत्यसों ॥ स्वकीयाभरणा्ं च महादेवेन निर्जितम्‌ ॥४७॥ स्कन्दा 
लड्डारिक सर्वे पुनराप्त हरेणच ॥ ततो गणेशः छोवीच वाक्य सदसि गार्वितः ॥ ४८ ॥ न क्ीडि- 
व्ये है मातः पाशों लक्ष्मीपतिः स्वयम्‌ | कृतो हरेण सर्वस्वं ते हरिष्यति मत्पिता ॥४९॥ इति 
पुत्रवचः श्रुत्वा पावेती ऋषमाछिता॥ तथाविधां तामालोक्य रावणों वाक्यमत्रवीत॥५०॥ रावण 
उवाच॥पापिष्ठेनाद्य शप्तोःस्मि हुंढु रूठेन विष्णुना।अधमॉय न कर्तव्य इत्युक्त तु मथा यत/५१॥ 
देव्युवाच ॥ स्ोच्छषिष्ये वत्साह धूततानेतान्‌ महाबलान्‌ू ॥ सामथ्थ पह्य मे पृत्र धर्मत्यागफले 
पद प कल द  न्‍  न प 3 


हे रावण ! तुम उनकमूसेको डरा दो। श्रीदेव्षिके ऐसवचन जीत छेंगी तोआप सच बोलनेवालीहैंयह सुनकर देवीबोढी 
छुनकर रावण भगाडीस ॥ ३४ ॥ बिछावकी तरह शब्द | क्लि आपकी वृषादिक सामग्री मेने दावपर छगादी ॥४३॥ 
करने लग/ जिसको सुनझर मूसा भाग गया, गणेशजी | आप क्या लगाते हैं ऋहें, सभासदोंको तो दिखा दें, 'पावे- 
मूसेको छोड धीरे धीरे पैदुछ चल आये ॥ ३५ || गणेश- तीजीक ऐसे बचनसुनकर,शिवजी नीचेको मुंहकरके देखने 
जीने दूरसही देखलिया कि, विष्णुभगवान पासा बन | छगे॥ ५४ "| उसी समय नारदुजीने कौपीन, बीणा दृण्ड 
गये हैं, महादेवजीक सामने प्रणामकरके नम्रतासे नीचा | और 'जनेऊ शिवजीको समर्पित किय कि, इनसे खेल 
शिरकरक बोले ॥ ३६ ॥ कि, हे देव | माने आपको मान- | छीजिये। | ४५ ॥ सदाशिव प्रसन्न हो कर खलन ढगे, रुद्र 
पूवंक घर बुलाया है, यदि आप न पधारेंगे तो अंबिका | जो दाव चाहते थे, विष्णु वही बनजाते थे ॥ ४६ ॥ पर 
प्राणोंकीं छोड देंगी ॥३७॥ आप जब घर चहल आवेंगे | जो पारबतीजीका .दाव होता था वो उलटा ही पडता था, 
तोम वहां सब भेट कर दूगा, यह सुन शिवजी बोले क्वि हे इश्स तर ह शिवजी न अप हे हार हुए क्‍ कि आभरणादिक 
गणेश ! इस समय मैंने ज्यक्ष ५ दम फिर जीत छिये ॥४७॥ स्कन्दके भी अरूंकारकी जो वस्तुएं 
वेश . इस समय मन ज्यक्ष महा विद्यानिर्माण कीहै॥३८॥ गीं बे सब भी शिवजीने फिर जीत हीं. इस कि 
यदि इनस मेरे साथ पावतीजी खेले तो मैं आऊं। यह सुन | अ ये सब हक है न्‍ गे अल कक कक 
गणंशजी बोले कि आपके साथ मा अवश्य खढगी, इसमें | रख कं पति 5 वात: 
कोई मन्देह नहीं है || ३९॥ भाइको 'साथ छे घर आइये वा सर पति स्वयम्‌ पाशे बने हुए हैं, पिता 
अत पर ै पा सवस्व हर लेगे ॥ ४९ ॥४ पत्रक एसे वचन सुनकर 
घरढो चहतिय 8 रैक गरणोंसदित शिवजी | पावती ऋधसे मूछित हो गयीं, पावत्तीजीको इस प्रकार 
हे 33-48: 49080.89% हक कक: हा द्ख कर रावण बोछा कि ॥|५० | सैंने केवछ विष्णुसे 
आये हुए बेटे थे 2९ हि के 5 सब भा | यही कहा था कि, अधम न कर, इसी बातपर इस पापीने 

५ का आप रा का आवरतीजीको देखते ही से शाप दे डाछा ॥ ५१॥ यह सुन द्‌वी बोलो कि ्द 
गए" दारपर बनाया 30५) ५3 7... #यक्ष विद्याको पड, + सेब महाबलशाल्ी धूतोंकोम शाप दूंगी। 
.... 3३ इस विद्यासे भी जोआप मुझे उत्र मरे सामथ्येको देख ! तथा इनके धर्व॑त्यागके फलकों 


न्‍+ब_ न. 








१ इुवेज्भूदितिशषः । २ कुत्सितिन । 


55 अं 


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28727 / 77 07560 03600 20/66/7768 67070 68077 70007 60% ; 52222 280 32202 28000 5008 38 7 2270 0:06 % 7:62 2807 70600 77 27/00/7020 इक ४ लक ४ 82758 72726: हु 








तथा ॥५२॥ देव यस्‍म!|दबलथा कपर् च कृत स्वयापहास८ा हर ८5 ते मूर्धा गड़ामारभपीडितः 

इतह्वनतः कुबेर त्व यतः शिक्षयलें घने । सदेव अममगं ते स्थादे झब न मवेत्सियथितिः ॥ «४ ॥ 
यतः कृता त्वबलया सह माया त्वया हरे ॥ एबं बेरी रावणोय तव ऋायों नथिष्यति ॥५८॥ 
हित्वा मां मातरं पुत्र बालकत्व॑ त्वया कृतम्‌ ॥ अतस्त्वं न शुवा बद्धो बाल एव मविष्यत्धि।५६॥ 
स्वभेषि ते छुखे ख्लीणां न कदापि भविष्याति ॥ गणेश उदाच ॥ अनेन चौतरूपेण मूष- 
कोषयं पलायथितः॥ ५७॥ मध्यमाग कृत॑ विश्व शपेन राध्षसाधमम्‌ !। देव्युवाच ॥ यस्‍्माद्रिन्ने 
त्वया इड्ट कूत मद्ठालकस्य तु ॥ ५८ ॥ तस्मादयं तव रिवुविष्णुस्त्वाँ घातयिष्यपते ॥ इति 
देव्या बचः श॒त्वा सर्वे संछुद्ठमानलाः ॥ ५९ ॥ देंवीशापे मनश्वकुनारंदों वाक्यमबबीत ॥ 
नारद उवाच ॥ कोप॑ कुवेन्तु मां देवा न्थ शाप्या कदाचन ॥ ६०॥ सर्वषामादिमायेय यथा- 
; ॥ नाय॑ शाप इये देवी समतेव्या तु विचक्षणेः ॥ ६१॥ गड़ग सदा लिष्ठतु रूद्- 
मस्तके बलादमां वा नयतु क्षपाचरः ॥ जायाहरस्थाथ ययोचिताम्ुतिब्वानड्भरतृष्णारहितः 
कुमार; ॥ ६२॥ अहं श्रमामि घरणीं न स्थातव्यं तपोधने॥ सम्यग्देवि त्वया जोक्त श्रण्विदानीं 
बचो मम ॥ ६३॥ सर्वक्रोधापलुत्यथ ननरतमुनिपुड्रवः ॥ कक्षानाद चकारोचेहॉहाहीहीति चांब- 
वीत्‌॥ ६४॥ तस्य चेष्टा विलोव्थाथ सर्वे हबेमवाप्तुयु॥देव्युवाच ॥ भो भो विदूइकश्रेष्ट कूत- 
कत्योसि नारद ॥ ६५॥ वर वरय भद्ठरं ते यद्यन्मनासे रोचते ॥ नारद उबाच ॥ याचयनन्‍्त वर 
सर्वे को कि याचयिष्यति ॥६६॥ सर्वे ते याचयिष्यत्ति यथाचेष्ट ब्र॒वन्तु तत्‌ ॥ शिव उबाच ॥ 
सब सक्षम्य॒तां देधि जिते यद॒बनादिकम्‌॥ ६७० ॥ तम्ममाध्तु अतशतलेन ग्राह्म जगंदम्बिके ॥ 
देव्युबाच॥ मास्तु त्वया समेनाथ स्वप्नेषि मम चान्तरम्‌ ॥६८॥ एतदेव वर मन्ये धो माभू- 

















देख | ॥ ५२ | हू दव | आपने एक अबछाक साथ कपट 
किया है, इसकारण आपका शिर सदा गंगाके 'भारस 
पीडित रहेगा ॥। ५३ ॥ पीछे नारद्जीस दुगांने कहा कि; 
हैं मुन . आप इधर उधर कुचष्ठाएं करते फिरते है, इस 
कारण आप अ्रमते ही रहें, एक जगह आपकी स्थिति न 
रहें, || ५४ ॥ हे विष्णों ! तुमन जो एक अबछासे साया 
की है, इस कारण आपका वेरी यह रावण आपकी ख्लीको 
हरगा ॥५५०।॥ पीछे पावतीजी स्कन्द्स बोली कि; हे पुत्र . 
तूने मुझ माकी छोडकर जो छडकपन किया है, इस कारण 
तू सदा बाछक ही रहैगा, न युवा होगा और न बूढाही 
होगा ॥ ५६ ॥ तुझे स्वप्नण भी खी सुख न मिलेगा यह 
सुनकर गणेशजी पाव॑तीजीस बोढे कि; मां | इसने बेला 
बनकर सरे सूसेको भगा दिया था। ५७ ॥ इसने सर 
मागके बीचसें विन्न किया था, इस कारण- इस अधघम 
राक्षसको तो शाप दे | देवी बोली कि, हे दुष्ट | तूने मर 
पुत्रक मार्गस विन्न किया था ॥ ५८ ॥ इस कारण, यह 
तेरा वरी विष्णु तुझे मारेगा, देवीके ऐसे वचन सुनकर 
सबको मनमें क्रोध आगया ॥ ०५९ ॥ इन्होंने देवीको शाप 
देनका विचार किया कि, नारदजी बोले-हे देवों! आप 
क्रोध न करो, यह किसी तरह भी शाप देन योग्य नहीं है 
॥ ६० ॥ यह सबकी आदिमाया हैं, यथा योग्य फछको 
देनवाली है, यह शाप नहीं है, यह तो सदा विद्वानों के याद 


करने योग्य है ॥| ६१ ॥ गेंगाका सदाही शिवक्ेे शिरपर 
रहना अच्छा है, बछात्‌ भठे ही रमाको राक्षस हरे पर 
जिष्णुके हाथस इसकी मृत्यु उचित ही है, कुमारका काम 
तृष्णास अछग रहना ही अच्छा हैं॥ ६९२ ॥ मे भूमिपर 
घूमता ही रहूं, क्योंकि, तपोधनोंको कभी एक जगह न 
रहना चाहिये, हे देवी | आपने ठीक ही कहा हैं, अब से 
कहूँ सो खुनो ॥ ६३ ॥ यह कह मुनिपुगव श्री नारदजी 
सबके क्रोधको दूर करनके छिय नाचने छगे, कक्षानाद्‌ 
करन लगे,हा हा है है आदि अनेक शब्द करने छगे ॥६४।॥ 
नारदजीकी चष्टाओंकी देखकर सब प्रसन्न होगये; इतनमें 
देवी कहनेलगी कि, भो भो विदूषक श्रेष्ठ नारद ! आप 
कृतकृत्य हों | ६५ || तुम्हारा कल्याण हो; जो आपको 
अच्छा छगें वो वरदान मांगलो, यह सुन नारदज्ी बोले 
कि, हे देवो | सब वरदान मांग छो), कौन क्या मांगेगा 
|| ६६ ॥ जो वरदान माँगना चाहते हैँ उनको जो मांगना 
हो सो कहें | यह सुन शिवजी बोल कि, जो वृषभस लेकर 
जो भी कुछ आपने जीता था, उसे आप क्षमता करिये।।६७॥ 


है जंगदम्बिके ! मेरी वस्तु सुझपर ही रहनी चाहिये चाहें 


आप सो बार जीतीं पर मेरी चीजें सुझे मिले, यह सुन 
पावतीजी बोलीं कि, मेरा आपसे कभी स्वप्नमं भी वियोग 
नहों॥ ६८ | मे यह भी मसांगती हूँ कि, आपका क्रोध 





» - १ एप रावणस्तव बरी सविताडय तब भायों नथयिष्यतीति संबंध: । इंट्छांद्सः २ विदृषको विनोद तू । 


अतिपहु- 


अलराजः । 





ड 





87:07 / 77:88: 
अपमान १” 





न्ममोपरि ॥ कांतिके छक्कपक्षे ठ प्रथमेहहनि सत्यवत्‌ ॥ ९६॥ जयो लब्धो २3 सत्ये- 
नव महेल्‍्चर ॥ तस्मादयूल प्रकतव्य प्रभात तच्च मानर्दः | कि | गाह ते गया! यसय तस्य॑ 
संव॒त्सरं जयः॥ विष्णुरुवाच ॥ अहं य॑ य॑ करिष्यामी श्रेष्ठ वा लधुमेब वा ॥७१॥ तथातथा 
भवन तद्रमेन वदाम्यहम्‌ ॥ स्कत्द उवाच॥ सदा मनस्तपस्यायां मम तिष्ठत देवताः ॥७२॥ 
कदापि विषये मास्तु देय एप वरो मम ॥ गणेश उबाच ॥ संसार यानि का्याण तदादों मम 
पूजनात ॥ ७३ ॥ यान्तु सिद्धि मम कृपां विना सिध्यस्त मा कचित्‌। रावण उबाच ॥ वेदव्या- 
ख्यानसामथ्य मम शीघ्र भवत्विति ॥ ७४७ ॥ सदाशिवे सदा चास्त भक्तिमेंप्यमिचारेणी॥ 
नारद उवाच ॥ छद्घाऊुद्धाश्व ये केचिन्मूखोम्खांश्व थे जनाः ॥ ७५॥ मद्वाक्‍्यं सत्यमित्येव 
मानयन्तु सहासुराभा इत्युक्त्वान्तहिंताः सर्वे देवा रुद्रपुरोगमाः ॥ ७६॥ तस्मात्मतिपदि थूत॑ 
कुर्या्सवॉपि वे जनः ॥चूत॑ निषिद्धं सर्वत्र हित्वा प्रतिपद बुधाः ॥ ७७॥ स्वस्योग्रमादिज्ञानाय 
कुर्यादददतमतन्द्रित॥विशेषव्ध मोक्तव्यं सुहृद्धिबोह्मणेः सह॥७८॥दयिताभिश्व सहित॑ नेया सा 
च्‌ भवेत्रिशा ॥ ततः संपूजयेन्मानेरन्तः पुरसुवासिनी॥७९॥पदातिजनसंघातान्‌ ग्बेयः कटके 
शुभे॥ स्वनामाडः स्वयं राजा तोषयरेत्स्वजनान्पृथकू ॥८०॥ वृषभान्महिषांश्वेव युद्धयमानान्‌ 
परः सह ॥ गजानश्वांश्र योधाँश्व पदातीन्समलंकृतान्‌ ॥ ८१ ॥ मथारूटः स्वयं पहयेन्नटनर्तक- 
चारणान्‌ ॥ योधयेन्न त्रासयेच्च गोमहिष्यादिक तथा ॥ ८२ ॥ ततोपपराहुसमये पृर्वस्यां दिशि 
भारत ॥ मार्गपालीं प्रबध्नीयातुद्गस्तंमेईय पादपे ॥८३॥ कुशकाशमय्यीं दिव्यां लम्बकेबंहनियु- 
ताम।दशेयित्वा गजानश्वान्‌ साथमस्यास्‍्तले नयेत॥८४॥ कूते होमे द्विजेन्द्रेश्य बध्तीयाव्मार्- 
पालिकाम्‌॥ नमस्कार ततः कुयान्मंत्रेणानेन सुब्रत ॥८५॥ मार्गपालि नमस्तेस्तु सर्वलोकसुख- 
प्रदे ॥ विधेयें: पुत्रदारादः प्रयेहां इतस्थ में ॥ ८६॥ नीराजन॑ च तत्रेव कार्य राष्ट्रजयप्रदम ॥ 
शिकिशल लि ललिरलटीएस है ले मम की लीक जले लिप डे जल कमल कपिल लि किकली फोन 6 फल का * मर जल केटटह 


हु ८५२ पृ कक. 3०0 च् ब््‌ कर 
मुझपर कभी न हो। कारतिक शुक्षा प्रतिपदाके दित भने | खलना चाहिये तथा दो पहरके सप्य अपने कुटुम्बी मित्र 


सत्यके समान ही ॥६५॥ हे महेश्वर ' सत्यसे ही में आपसे 
जीती हूं, इस कारण आजके दिन ग्रातःकार सबको जूआ 
खलना चाहिये ॥७०॥ आजके दिन जिसकी जीत होगी, 
उसकी साकछुभर जीत रहेगी; यह सुनकर विष्णु भगवान्‌ 
बोले कि, जिसको में छोटा या बढ़ा बना दूं ॥ ७१॥ वो 
वेसाही हो जाय, यह वर मे आपसे मांगता है ॥| स्कन्द्‌ 
बोले कि है देवो | मेरा मन सद्‌! तपस्या ही में छगा रहे 
॥७२॥ कभी विषय न पडे यही मुझे दर दो, गणशजी 
कहने छगे कि; संसारम जो कोई काम हो उससे मेरे पूज- 
नको सदसे पहिले होनेपर ॥ ७३ ॥ सिद्धि हो मेरी कृपा 
बिना सिद्धि न हो | रावण बोला कि, वेदोंके झ्राष्य रच- 
नंकी मेरेसें शीत्र ही सामथ्ये हो जाय || ७४ ॥ तथा सदा- 
शिवमें मेरी सदा अव्यभिचारिणी भक्ति बनी रहे, नारदजी 
बोले कि, जा परम क्रोधो हैं अथवा जिन्हें कभी ऋोध ही 
नहीं आता ह्‌ चाहें मूख हों चाहे विज्ञ हों ॥ ७५ ॥ भेरे 
वक्यापर्‌ सत्र विदवास करें, इस प्रकार वर याचता और 
वरदान इनेपर सब देव अन्तथ[त्र हो गये ॥ ७६ ॥| इस 
कारण कात्तिक शुक्ल प्रतिपदाक्तो सबको जूः केक 
ः ब्ाहिय। है पिदानो, «डी लबकों जुआ खेलना 
ग जप हो 08 पद्ध है ॥ ७७ ॥ अपने साल 
: ता एल आ्भतेक छुय म्रालस होकर जुआ 


एवम्‌ योग्य आह्यणोंके साथ बैठकर भोजन करना चाहिये 
७८॥ इस निश्ाको प्यारी स्लियोंके साथ बितवानी चाहिये 
एवम्‌ अन्तःपुरकी सुवासिनियोंका मान सनन्‍्मान करना 
चाहिये ।। ७९ ॥ पदातिजन तथा पासके रहनेवाले अपने 
जनोंको जिनपर कि, अपने नामकी छापछगी हुई ह। ऐसे 
गलके भूषण ओर कड्टूछॉसे प्रसन्न करना चाहिय || ८०॥ 
इसके बाद थोड़े, हाथी, ब्रष, भैसे आदिको सजवा कर 
_नह आपसन् छडवावे तथा सनिकोंका भी नकली युद्ध 
इस ॥ ८१ ॥ राजा मचपेर ब्रेठा हुआही रखे । नट नतेक 
ओर चारणोंकी भी नकली छडाई देखे तथा साड, भसा 
आदि किसीको भी ढराना नहीं चाहिये || ८२॥ इसके 
पछ सध्याहके समयमें पूवेदिशाम राजाको चाहिये कि 
किसी ऊँचे वृक्षपर अथवा किसी ऊँचे छट्टेपए, माग- 
पाली बँधवादे ॥ ८३॥ वो कुशकाशकी बनी हुईं भव्य 
होनी चाहिये, जिसमें बहुतसे छटकन छगे रहने चाहिये 
पहिडे घोड़े हाथियोंको उसका दशन कराके, साये- 
कालको उन्हें उसके नोचे होकर ,निकलवाता चाहिये 
पे | कया कराकर-मार्गपाली बांपरनी 
यू, है सुब्रत | फि त्र्से उसे नमस्का 

करना चाहिये ।८५॥ हे मार्नपालि | परेछिये नमरतार है, 


आप ५ के. ४ 
है सब छोकों को सुख देनवाली ! विधय, पुत्र, दार आदि- 


कोंस मुझे पतिपृण कर दे ॥ ८६॥ वहांद्दी राष्ट्रको जय- 






ध्रतानि, | 


ः ही ... भाषाटीकासमेतंः 


मागपालीललेनाथ यारित गावो दृषा गजाः ॥ <७॥ राजानों राजपुत्राश्य॒ बराह्मणाः झद्जा 
तयः ॥ मार्गपार्ली सपुलंध्य नीशजास्तु खुखान्विलाः॥ ८८॥ तस्मा 
विधिपूर्वकम्‌ ॥ इति सनत्कुमारसंहितायां यूतविधि 
अथ बलिपूजागोऋ्ौनवश्टिकाकषणानि | 

तत्रेव--वालखिल्या ऊत्चुः॥ पूर्वाविद्धा मकतेव्या प्रतिपदठलिपूजने ॥ वर्धमानतिथिनेन्दा यदा 
साद्धत्रियामिका है| ह्वितीया वाद्धेगामित्वादत्तरा तत्र चोच्यते । धजिण लेजट द्त्यन्द्र वर्णकेः 
पश्चरड्रके! | गहमध्यम शालायां विन्ध्यावंल्या समान्वितम्‌ ॥ जिह्दा च॒ ताल्वक्षिप्रान्तों करयो 
पादयोस्तले ॥ रक्तव्णनास्य केशान्‌ कृष्णेनेब समालिखेत ॥ सवाड्र पीतवर्णेन शस्रा्य नील- 
वर्णतः॥ वरस्त॑ व श्वेतवर्णेन यथाशो् प्रकल्प्येत ॥ सवानरणशोभाव्य द्विक्षुज नृपचिद्वितम॥। 
लोकों लिखेद गहस्यान्तः शय्यायां शुक्लतण्डले;॥ मन्त्रेणानेन संपूज्य पोडशेरूपचारके॥बलि- 
राज नमस्तुभ्य देत्यदानवपूजित ॥ इन्द्रशत्रोपउनराराते विष्णुसान्रिध्यदों भव ॥ बलिसुद्दिय 
दीयन्ते दानानि मुनिपुड्वाः ॥ यानि तान्यक्षयाणि स्थुमयेतत्संग्रदर्शितम्‌ ॥ कोझुत्ीतिर्बले 
येस्‍्मादीयतेःस्यां युधिष्ठिर.॥ पार्थिवेन्द्रेसेनिवरास्तेनेयं कोमुदी स्मृता । यो यादशेन भावेन 
तिष्ठत्यस्थां युधिष्ठिर ।। ह्षदेन्यादिरूपेण तस्य वर्ष प्रयाति वे ॥ बलिपूजां विधायेव पश्चाद्रो 
क्रीडन चरेत्‌। गयाँ क्रीडादिने यत्र रात्रों दृश्येत चन्द्रमा।। सोमो राजा पशुन्‌ हन्ति सुरभी; 
पूजकांस्‍्तथा ॥ अतिपदर्शसंयोगे क्रीडन च गवां मतम्‌॥परायोगे तु यः कुयात्पुत्रदारधनक्षयः ॥ 
अलंकायोस्तदा गावो आसाझेश्व स्थ॒ुरचिताः ॥ गीतवादित्रधोषेण नयेन्नगरबाह्यतः । आनाय्य च 
ग्रह पश्चात्कुर्यान्नीराजनाविधिम्‌॥ अथ चेत्मतिपत्स्वल्पा नारी नीराजद चरेत ॥ द्वितीयायां 
तदा कुयोत्सायं मड्ररूमालिकाम्‌ ॥ एवं नीराजनं कृत्वा सर्वपापेःप्रसुच्यते । मतिपत्पूर्वविद्धेव 

















देनवाली आरती करे, मार्गपालीक नीचेस जो गऊं; वृष, 
गज आदि ॥ ८७॥ बथा राजा, राजपुत्र ब्राह्मण और शूद्र 
जातिके लोग निकल जाते हैं बे नीरोग एवम्‌ सुखी हो जाते 
हूं (| ८८ ॥| इस कारण दूत आदिको त्रिधिपूवंक करना 
चाहिये।। ८९॥ 
यह सनत्कुमारसहिताकी छतविधि समाप्त हुईं ॥ 

अथ बलिपूजा, गोक्रीडन, वष्टिकाकषण-बलिकी पूजा, 
गऊूओंके साथ खेलं ओर वष्टिकाका कषेण (रस्सीखीं चना) 
भी इसी दिन होता हें, सनत्कृमारसहितामेही कहा है । 
वाहुखिल्य ऋषि बोले कि, बलिक पूजनमे पूव॑विद्धा प्रति 
पदा करनी चाहिये, यदि वधमाना प्रतिपदा साढे तीनपहर 
हो । द्वितीयामें वृद्धिगामी होनेके कारण. उत्तरा प्रतिपदा 
लेनी चाहिये । पंचरंगके दुत्येन्द्र बढिको विन्ध्यावलीके 
साथ घरके बीचकी शालामें काढतीवार जीम, वालु, आंख 
और हाथ, पावोके तले छाहूरंगस छिखने चाहिये तथा 
केश काले ही रंगसे बनाने चाहिये | सारा शरीर पीतव- 
णका हो,शबख्बरादिक्त नीले रंगके बनाये जायँ,वर्र शत रंगके 
जसे कि, शोभित लगे वेस ही बनाये जायें, सब आभरण 
पहिनाये जाये, जिनसे कि; सुन्द्र छगे, दुश्ुुंज एवम्‌ राज 
चिहसे चिहित होना चाहिय। घरके भीतरकी शस्यापर 
तेडुलोंस इसके छोकफो लिख दे, तथा इस निम्नल्ठिखिल मंत्र 


समुदायसे सोलहों उपचारोंसहित पूजे। हैं देत्यदानवपू: 


छ 


जित बलिराज ! तेरे लिये नमस्कार है, हे अमरॉके भराते। 
एवम्‌ इन्द्रक शत्रु ! बिष्णुके सान्निध्यको देनेवाछा हो, 
मुनिपुंगवो! बढिक उद्देशस जो दान दिये जाते हैं वे अक्षय 
हो जाते है । यह मने तुम्हें बतादिया है। हे मुनिवरों |! इस 
प्रतिपदाके दिन इस भूमिपर राजालोगोंढ्ाारा किये हुए 
पूजनसे बलिको प्रसन्नता होती है, इस कारण इसे कौमुदी 
कहते हैं, हैं युधिप्चिर |! जो मनुष्य जिस भावसे इसमें 
हेगा चाहें उस हषे हो चाहें उसे शोक हो वोबही साहभ- 
रतक बराबर चलता रहेगा।। इस प्रकार बलिपूजा करके 
पीछे गोक्रीडन करना चाहिये | जिस दिल कि, गोक्रीडनरमे 
रातको चाद॒का प्रकाश हो तो सोमराजा उन पशुओं तथा 
सुरभियों और पूजकोंका नाश कर देते हैं, इस कारण प्रति- 
पदा और दशके योगमें गोक्रीडन होना चाहिये ।जो छ्विती 
या युक्त प्रतिपदाके दिन गोक्रीडन और गोनतैन कराता हैं 
उच्तके पुत्र दारका नाश होता हे | गोक्रीडनके दिन गऊ- 


ओं रो खिला पिछाकर सजाना चाहिय, गीत बाजों से उन 


गामके बाहिर छेजाय, पीछे घर छाकर उनकी सीराजन- 
विधि होनी चाहिये ॥ यदि प्रतिपदा थोडी हो तो ल्लियोसे 
आरती कराना' चाहिये और ह्वितीयामें अनेक मंगलकृद्य 


कराने चाहिये। इस प्रकार नीराजन करके सब पापोसे छूट 


जाता हू । पूवविद्धा प्रतिपदा ही बष्टिका कष णर्में छी जाती 
है, द्वितीया युक्ता नहीं ली जाती। कुशकाशकी एक सुन्दर 


| प्रतिपदू* 









एम गए य 77 
की पक 2:07777 20070 42% 
५0४४ /४६ ०४० कन्क 72:77: ये पक: की / 72 


2 (02% १7४५ ०४ (8628० ० कैंट ८/ कट घ ४४ कफस्ामदाआ 
250:::5 5०55:5540 7 पेंग: अनेक पीने विद दि ककलिकप प ५ कप पक पद ए पद: ख्शाखय | 
५४222 बंका पाक न्याय समा जन न नि 


वेडिकाकर्षणं मवेद्‌ ॥ कुश कोशमर्यी कु्षादृष्टिकां छुहढां नवाम्‌ ॥ देवद्वारे अर कक नेया 
चतुष्पये ॥ तामेकतों राजपुत्रा हीनवर्णास्‍तर्थकतश शहीत्वा कर्षययुस्तां यथासार मु हु 
समसंख्या द्योः कार्या सर्वेपि बलवत्तरा॥जयोत्र हीनजातीनां जयो राज्ञस्ठ वत्सरम॥उनयोः 
पृष्ठत/कार्या रेखा स्वाकर्षकोपरि | रेखान्ते यो नयेत्तस्य जयो भवति _नान्‍्यथा॥ जयचिहृमिद 
राजा विदधीत प्रयत्नतः ।। अन्तकूटकथा ॥ अथान्रकूट[पर पर्यायों गोवद्धनोत्स व्‌ः। "कसम 5 
तायाम ॥ वालखिल्या उत्चुः ॥ कार्त्तेकस्य सिते पक्षे ह्युत्नकूट समाचरेत्‌ ॥ गोवद्धनोत ४3 
श्रीविष्णुः प्रीयतामिति ॥ १ ॥ ऋषय उल्चः ॥ कोइसो गोवद्धंनों नाम कस्मात्त परिषजयेत॥ 
कस्मात्तदुत्सवः काये; कृते किंच फर्ले भवेत्‌ ॥२॥ वालखिल्या ऊच्चुः ॥ एकदा भगवान कृष्णो 
गतो गोपालकेः सह ॥ गहीत्वा गाए प्रतिपदि कात्तिकस्य सिते बने ॥३॥ तत्र नानाविधा लोका 
गोप्यश्वापि सहस्तशः॥ गोवद्धनसमीपे तु कुव॑न्त्युत्सवमादरात्‌ ॥ ४॥ खाद्य लेहां च चोष्य॑ न 
पेयं नानाविध कृतम्‌ ॥ कृता नगास्तथान्नार्ना नृत्यान्त च परे जनाः ॥५॥ नानापताकाः संग 
केचिद्धावन्ति चाम्मत॥॥ केचिद्रोपाः अनृत्यन्ति स्तुबन्ति च तथापरे ॥ ६॥ इंतस्ततों वितानानि 
तोरणानि सहख्रशः ॥ इश्नेतत्कौत॒क कुँष्णो वाक्यमेतहुबाच है ॥ ७ ॥ कृष्ण उवाच ॥ उत्सव) 
क्रियते कस्य देवता का च पूज्यते॥पक्कान्नखादनाथाय कल्पितो वोत्सवोउघुना॥८॥ न॒भक्षयन्ति 
ये देवास्तेम्योःने तु मदीयते॥प्रत्यक्षमीजिनो देवास्तेब्योःन्न न तु दीयते ॥ ९॥ दृछ्ेह्शी भवद- 
बुद्धि गोपाला वेघसा कृता॥गोपाला ऊचु॥ एवं मा बद कृष्ण त्वं वृननहृत्तुमहीत्सवः ॥ वार्षिक: 
क्रियतेस्माभिदेंवेसद्रस्य च्‌ तुष्ठये .॥ १० ॥ इन्हे पूजझय भट्ट ते भाविष्यति न संशयः॥ 
अद्य कुबेति देवेन्द्र महोत्सवर्मिम नरः ॥ ११ ॥ दुलिक्ष च तथाब्वृष्ठटिदेश तस्य न जायते॥ 
तस्मात््वमपि क्कुष्ण तर कुरूत्सवमनेकथा ॥ १२ ॥ कृष्ण उधाच ॥ अय गोधधेन; साक्षादवृष्ठि- 


है अऋ तए ३070 २४7० हब 


कहना शा-टनक 
कण ०7 ट टटए ए 





नई छुदृढ रस्सीको देवद्वारपर या दर्पद्वाएपर अथवा चौरा- 
हेपर एक तरफ राजकुमार आदि उच्च वणके छोग खीचें 
तथा एक ओर हीन ब्रणके छोग खींचें जबतक वे न थक्ें; 
तबंतक खींचते ही रहें | खींचनेवा्ॉंकी दोनोंही तरफ 
बराबरकी संख्या रहनी चाहिये, जो इसमें जीतेगा! उसकी 
एक साठ्तक बराबर जीत रहती है।।दोनों ही भोर हृदकी 
रेखाएं रहनी चाहिये, जो अपनी ओर खींचकर हृदतक 
छेजाये उसकी जीत होती है, अन्यथा नहीं ॥ राजाकों 
चाहिये कि,राजा सा इस जीतके चिह॒को प्रयत्तके साथ बनावे 
यह बलिपूजा, गोक्नीडन ओर वष्टिकाकषेणकी विधि पूरी 
हुई॥ । 
अन्नकूट-सनत्कुमार संहितामें गोवधेनोत्सव कहा है 
जिसे छोग अन्नकूट कहते हैं। वालखिल्यऋषि बोले कि, 
का्तिकके शुद॒पक्षमें अज्ञकूट और गोवर्धनोत्सव, श्रीविष्णु- 
भगवानकी प्रसन्नताके लछिय करे || १।| ऋषि छोग बोढ़े 
कि,यह गोवधन कौन हे, किस कारण उसे पूजे, क्‍यों उस- 


का उत्सव किया जाय; तथा कियेपर क्या फछ होता है ?' 


॥ ९ 0 बालखिल्य बोले कि, एकसमय भगवान्‌ कृष्ण का- 
स््ि ड़ रोके ३ 
पकूशुक्दप्रतिषदको ग्वालबाढोंके साथ गायें लेकर पनको 


भ, ४ ३ 
3. | धनेक सके छोग और हजारों ही गो- 


गत छोके ४ | शब्देत ब्जु हे कक हल 
* 5 चठेशब्देन प्रसिद्ध रब्जुविशषः । २ कुर्चे इति प्रतिजानाती तिशेष: ॥ इछोपआर्ष: 


श्ूः कल हि. 
: छरेनि चू्‌ दृवन्द्रमहोत्सवसिस परमिति पाठ 


पियों गोवधेनके समीपमें आदरसे उत्सव कर रह थे ॥४8॥ 
अनेकतरहके खाद्य, लेद्य, चोष्य और पेय पदार्थ बचाये थे, 
अन्नक कूट कर रखे थे बहुतस नाच रहे थे ॥ ५ ॥ कोई १२ 
अनेफ तरहकी झन्डियोंकों छेकर अग़ाडी अगाडी चढतेग्े 
कोई गोप नांच रहे थे, तो कोई स्तुतियां कर रहे थे ॥ ६ ॥ 
इधर उधर अनेक तोरण और लेबू तने हुए थे,भगवानक्ृष्ण 
कौतु भ्५ पु ञ्५ 
यह कौतुक देख कर बोछ॥७।क्िसका उत्सव कर रहे हो | 
किस देवताको पूज रहे हो! अथवा पकाज्न खानेके डिये ही 
आपने यह उत्सव किया ह॥८॥ जो देवता नहीं खाते उन्हें 
तो दे रह हो पर जो देव प्रत्यक्ष भोजी हैं, उन्हें नहीं देते 
|| ९ ॥ आपकौ ऐसी बुद्धिको देखकर ही आपको बद्माने 
गोपाल किया है। यह सुन वे गोपाल बोले कि, हे कृष्ण ! 
आप ऐसे न कहें । यह वृत्रके हन्ताका उत्सव है, हम देव" 
राज इन्द्रकी प्रसन्नताके लिये हर साल करते हैं।।१०॥आप 
भीप्रसन्नचित्तस इन्द्रकी पूजा अवश्य करिये,आपकाकल्या- 
ण होगा।जो कोई आजके दिन इन्द्रकी पूजा करता है॥११॥ 


हि 


उसके देशमे कभी अकाल और अनावृष्टि नहीं होती, इस 


कारण है कृष्ण आप भी इस उत्सवको अनेक तरहसे 
भनाथ ॥ १९ ॥ यह सुन कृष्ण बोले कि, देखो यह साक्षात््‌ 


॥ नर इति राजोपछक्षणम |) 


९ न त्ृ श हि ।] 
'उ छुग़स:। हृश्यते चाय समत्कुमारसंहितास्थकार्तिकमाहात्म्ये || 
| 


वतानि, | 


कह 
अजगधक ख्क्स््मुत्पि धाा्ाछाह: 4 रह 
बा कास जल: के 
28:77 72677 27/20/7770 25/67/2772 707 2 हम कम 2 77226 722 20075 का 40770: .%) 70777 20220 %2/000/0/500/7/20000 07778 :/0 72768 20% 786 87000 00 5007 कै 2660९ 00 



























सौमिक्ष्यकारकः ॥ मथुरास्थेत्रजस्थेश्व प्रजितव्यः प्रयत्नतः ॥९श॥ हित्वेतत्पूजनं लोके वृथेर्द्र 
पूज्यते कथमउत्सवः क्रियतामस्य मत्यक्षो5यं घुनक्ति च।१४/करिष्यति कृषि सम्य 
हनिष्यति ॥ यदायदा संकर्ट मे महृदागत्य जायते ॥ १५॥ तदातदा पूजयामि दृइ्यं गोवर्धन 
गिरिमाश्रवणेश्रवणे गोपा वाती झुवेन्ति कित्विदम ॥१६॥ तेषां मध्ये केश्रिदुक्त कृष्णोक्त क्रिय- 
तामिति || यदा खादाति चाजन्न॑ वे नगो गोवर्धनस्तथा ॥ १७॥ तदा कृष्णोक्तमाखिलं सत्यमेव 
भविष्यति ॥ सर्वण्व तदा गोपा विनिश्िित्य च नन्दज॒म्‌ !। १८ ॥ बचर्न आाहुरित्यं चेन्रिश्वयोस्लि 
तथा कुछ ॥ सर्वेषामग्रणीमत्वा गोवर्धनमहोत्सवम्‌ ॥ १९ ॥ ततः. कृष्णस्तथेत्युक्त्वा उत्सवे 
क्रतनिश्चयः ॥ नानासामग्रिक चक्क्‌येथोक्त नन्दसूद॒ना॥२०॥ नानावस्थाणि पात्राणि विस्ततानि 
नगाप्नत) ॥ तत्र दत्तोषन्नपुखस्तु यथा गोवद्धेनो महान्‌ ॥२१॥ भक्त खूपाने शाकाश्व काजिकं 
बटकास्तथा ॥ रोटकाः प्रिकार्य च लड़डुकान्मण्डकादिकम्‌ ॥२२॥ दुग्ध॑ दाये पृत क्षोद्र लेहां 
चोप्यं तथामिषम्‌ ॥ कथिकाये सर्वमपि तत्र दत्वा वचोध्बवीत ॥ २३ ॥ कृष्ण उबाच ॥ मत््त 
पठित्वा गोपाला नेत्रे संमीलयन्तु च॥ गोवंधैनेन भोक्तव्यं सर्वभन्न॑ न संशयः ॥ २४ ॥ गोवर्द्धन 
धराधार गोकुलबाणकारक ॥ बहुबाहुकतच्छाय गवां कोटिमदो भव ॥ २५॥ लक्ष्मीर्या 
लोकपालानां घेलुरूपेण संस्थिता ॥ घृत॑ वहाति यत्षार्थें मम पा व्यपोहतु ॥२६॥ पढठित्वेर्द 
मन्जयुगं सर्वे सादितलोचनाः ॥ कृष्णो गोवद्धेन विश्य सर्वेमन्नमभक्षयत्‌ ॥ २७ ॥ भ्नक्षणावसरे 
केश्रिज्ननेदेष्ो गिरिस्तथा ॥ अतीवा मूत्तदाश्वर्य तच्चेतसि सुनीश्वराः ॥ २८॥ ततो नाडीदयात 
कृष्णो गोपान्वाक्यसुवाच सः ॥ अहो गोवद्धनेनात्र क्षणाुक्तमिद स्फुटमू ॥ २०॥ पश्यत्तु 
सर्वे गोपालाः भत्यक्षोई्य न संशयः ॥ यद्यस्ति सुखवाज्छा वः कुवेन्त्वस्थ महोत्सवम्‌ ॥ ३० ॥ 
इति ख्त्वा वचस्तस्य सर्वे बिस्मितमानसाः ॥ गोवद्धनोत्सवं चक्रेल्द्राच्छतगुणं तथा ॥ ३१ ॥ 
इन्द्रोत्सवं द्रष्टुकामः समागच्छत नारदः ॥ गोवद्ध॑नोत्सवं दृदष्वा देवेन्द्रस्थ सभां यणों ॥ ३२ ॥ 











ह 5. का कप 
देवता गोवर्धन हैं यह वृष्टि और सोभिक्ष्य करनेवाह है, 
मधुराबवासी और ब्रजवासियोंकों प्रयत्नके साथ इसका 
पूजन करना चाहिए ॥ १३ ॥ इसके पूजनकों छोड़कर 
छोकम इन्द्र क्‍यों वृथा पूजा जाता है । इसका उत्सव करो, 
यह प्रत्यक्ष खायगा ॥१४॥ खेती अच्छी करेगा, विन्नोंका 
नाश करेगा, जब जब मुझे कोई बंढा भारी संकट भा 
जाता हैं ॥१०॥ तब तब में इसी प्रद्यक्ष देंब गोवधेनको 
पूजला है यह सुन गोप आपसमें काना फुस्सी करने रूगे 
कि, क्या करें ॥ १६ ॥ उन गोपोंमेंसे कुछएक कहने छगे 
कि, कृष्णकी कही सानों, यदि यह खा छेगा तो इसे केव 
पहाड़ न समझ कर गोवर्धन देव समझना || १७ ॥ तब 

जो कुछ कृष्ण करता है वो सत्य ही होगा, इस प्रकार 
सब गोप निश्चय करके कृष्णसे बोल ॥ १८ ॥ कि, जिससे 
हमें मिश्चय हो सो करिये। तथा सबके आगाड़ी होकर 
गोवधनोत्सव मनवाइये ॥ १९ ॥ भगवानने भी उर्त्सवका 
निश्चय करके कहा कि, अच्छी बात है, फिर कृष्णजीने 
जो सामाग्रियां कराना चाहीं गोपॉने सब तयार करदी 
| १० ॥ अनेक वरहके वस्य और बडे बडे पात्र गोवर्धन 
" सामने रख दिये तथा वहां एक गोवर्धेतके बराबरकासा 
अन्नपुख छगा दिया ॥ २१॥ भात, कढी, दाल, शाक; 
कांज्नी, बढ़े, रोहियां, पूरियाँ, लड्डू; और मांदे आदिक 


॥ २९ || दूध, दही: घी, सहद, चटनी, चूसनेंकी चीज 
तथा बिना मांसकी सब चीजें देकर | २३।| कृष्ण बोले 
कि, हे गोपो ! मन्त्रकों पढकर आंखें मीचलो, इतनेमें ही 
गोवर्धन सब खालेगा, इसमें कोई संदेह मत करना ॥२४७।। 
हे गोवधेन | हे धराधार ! है गोकुछके त्राण एवम्‌ ! अनेकों 
भुजाओंसे छाया करनेवाले | हमें करोड गऊ दें ॥ २५ | 
जो छोकपालॉकी रूक्ष्मी पेनुरूपसे स्थित हो यज्ञके लिये 
घूत देती हैं, वो मेरे पापोंको दूर करे ॥ २६॥ इन दोनों 
मन्त्रोंको पढकर सबने आंखें मींचली, इतनेंस ही गोपाल 
कृष्ण्‌ गोवधेनम प्रविष्ट होकर सब अज्न खा गये ॥ २५ || 
कोई गोप जो आँख बिना मिच बेठे थे उन्होंने देखा कि, 
गोवर्धन सबका भोजन कर गया हे तो हे भुनीश्वरो' | उसके 
आश्वयका ठिकाना ही न रहा ॥ २१८ ॥ इसके दो नाडीके 
बाद, भगवान कृष्ण गोपोंसे बोछे कि देखो-गोवर्धनतें 
एक क्षण भरमें ही सब खा छिया ॥ २० ॥ है गोपालों ! 
देखो यह प्रयक्ष देव है, इसमें कोई सन्देह नहीं है, यदि 
आपको सुखकी इच्छा हो तो सब मिठुकर इसका उत्सव 
करिये ॥ ३० । भगवान्‌ कृष्णक ऐसे बचन सुनकर सबने 
बड़े ही आश्रयके साथ इन्द्रके उत्सवस सोगुना, गोबधेन 
का उत्सव किया ॥ ३१॥ नारद आये तो थ इन्द्रोबत्स 
को देखने पर गोवधनका उत्सव देखकर इन्द्की सभासें 














ह या चाचा सर 






द 



























देबेन्द्रेण कृतातिथ्यों वार॑वार प्रणोदितः! ॥ नोवाच वचन किचिदेवेन्द्र! प्रत्यभाषत ॥ 
«. आदर, 





8 कप 25 

















5 तट धत्श तार हा १2220 /2/26 90820 600/070000603/7%0 60, 
अपर 404 088207 00%: 20200 7/4207 400 ४7४७४ //0027९२/ ६ हैः 22%/77॥ ३४९५५ 
220 202205 0 04 02652 00 20 /0000 7: 2002 70658: 











[ प्रतिपदृ- 


23: बम: कद 2 
४7.2 25248 40082. 727, 2607 











22222 22% हर 222:.25%. ; 
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३३॥ 


इन्द्र उवाच ॥ युष्मार्क कुशल विप्र वतेते वा नवेति वा ॥ मदओे कथ्यता हुःखे मु हरा- 
म्यहम्‌ ॥ ३४॥ नारद उवाच ॥ अस्माक कि सुनीर्द्राणामेन्द्र हःखस्थ कारणम ॥ पर॑ गोवद्ध॑न: 


शेलः शक्रों जातो विलोकितः ॥ २५॥ त्वहुत्सवे पृज्यतेःसौ 


गोपालेगोकुलास्थिते! ॥ अतःप्र॑ 


यज्ञभागाव्‌ म्रहीष्यति स एवं हि॥ ३६॥ इन्द्रासनं तथेः द्रारणी क्रमात्स थे हरिष्याति ॥ यस्य 
वीय च शर्त्रं च तस्य राज्य प्रजायते ॥ २७ ॥ किमस्माक॑ मुनीन्द्राणां य एवेन्द्रासने बसेत॥ 
व्षाद्या मासषट्काद्ा द्रष्टव्योइसों समागतः ॥३८॥ इत्थमुक्त्वों च देवेन्द्र प्रययों नारदों श्रुवि॥ 
इत्थं नारदवाक्यं स श्रुत्वा शक्रोडभ्यभाषत ॥ ३९ ॥ अहो आवतंसंबर्ता द्रोगनीलकपुष्कराः ॥ 
सर्वे मेघा जल ग़ह्म करकामः समन्विताः ॥४०।प्रयान्तु गो कुले शीघ्र मारयन्तु च गोपकान॥ 


गोवद्धंत स्फोट्यन्त वल्वपातेरनेकशः ॥ ४१ 
ततो घनघटाघोषो गोकुलेःभून्सुनीखराः ॥ 


॥ घातयन्तु चगाश्रापि ग्हाप्युत्चाट्यन्तु च॥ 
४२॥ 


जात आरादन्धकारो मध्यादह्रसमये तदा॥ 


काम्पितास्तु तदा गोपाः किमकाण्डसुपर्थितम ॥४३॥ ववृषबहुपानीयं करकामिस्तदा घनाः॥ _ 


गोपा उच्ुः ॥ हा कृष्ण क्ृष्ण हे कृष्ण किभिदानीं | 
कुपितो5यं हि वासवः ॥ कृष्ण उबाच ॥ निमील्याक्षीणि भो गोपा ध्येयों 


रक्षाकता स ण्वास्ति नान्योस्ति जगतीतले ॥ 
ते ॥ ४६॥ ततः श्ोवाच वचन गोपान प्रति 
तत्स्थल दत्त ब्रजन्त्विह ॥४७॥ अन्य: 
दिन तोयं बृष्टं सुसलधारया ॥ ४८ ॥ 
नाम्नेव कृष्णो नित्य प्रयच्छति ॥ 


बलाहुजः ॥ श्रीकृष्ण उबाच॥ अहो 
को(स्ति स्थल दातु भत्यक्षोई्य॑ नगोत्तमः ॥ एवं सप्त- 
नानादेशा ययुनाशं न 
४५९ ॥ पक्कान्नाने च गोपेभ्यस्तत्र 


विधीयताम्‌ ॥४४॥ मृताः सम सर्वे गोपाला! 


गोवर्धनों गिरिः ॥४५॥ 
इत्युक्तवोत्पाट्य त॑ रोल तत्तले स्थापितास्तु 
गोवद्धे नेने- 
गोपाः शरणं ययुः ॥ गोवद्ध॑नस्य 
ते सुखमावसन्‌ ॥ इत्येव॑ 


कोठक दृष्ट्वा सत्यलोक॑ ययो मुनिः ॥५०॥ ब्रह्म॑स्त्वे कि प्रसुप्तोत्सि जायते सश्ठिन 'शनम्‌॥ 


जा दाखिल हुए ॥| ३२ || देवेन्द्रने आतिथ्य करके वार वार 
“2? पर जब नारदजीने कुछ न कहा तो इन्द्र बोला कि, 
॥ ३३॥। है विश्र ! आप प्रसन्न हैं या नहीं कहें | में आपके 
कष्टोंको मिटा दूंगा ॥। ३४ ॥ यह सुन नारद बोले कि, हे- 
इन्द्र : इससे ज्यादा और मेरे दुःखका कारण क्‍या होगा 
कि, एक पहाढुको भी मेने दूसरा इन्द्र बना देखा ॥ २५ ॥ 
>ज आपके हत्सव्सें वो गोकुलके ग्वाढोंसे पूजा जा रहा 
है इंसक बाद वो यज्ञके भागकों कभी न कभी लेगा ही 

॥ ३३॥ धीरे धीरे वो इन्द्रासन और इन्द्राणीको ढेकर 

2 कुछ हर लेगा क्योंकि, जिसके पास हथियार हों तथा 

धरुपाथ होता है उसका ही राज होता है ॥ ३७ || 

इस सुनीन्द्रोंका क्या है, बोही भरे इन्द्र हो, साढ़ छ: 


सभ्योसे इन्द्र बोला ॥ ३९ ॥ है आचत । २ ते 
द्रोण ! नीढ ! भर, [ ३९ है आवत ! संबत ! 


* आर पृष्करो | आप सब 
साथ पाती भरकर ॥ ४० | ! शीघ्र ग 
मार दो, बजोंसे गोब शीघ्र गो 


संघगण' उपलोंके 


कुछ जाओ । गोपोंको 


» | यहां सब आ जांओ | ४७ || 


? मे के अनेकों टुकड़े ह 
गायोंको भार डे, घरोंको उस _ हे उंडादो ४ ४१ ॥ |: 


मुनीश्वरो |! गोछुछुपर घनकी घटाओंका घोष होने ढछगा 
॥ ४२ ॥ सध्याहकाछमें एकदम अन्धकार छागयीों, गोप 
इकद्स कांप उठे, कि यह अकारण क्या हो गया ॥ ४३ ॥ 
बहुतस पानीके साथ ऑले बरसने छगे | गोप. कहने छगे 

/ है| कृष्ण ; हा कृष्ण |! हे कृष्ण !!|! अब क्‍या करना 
जहिए । ४४ ॥ यह इन्द्र नाराज हो रहा है,.हम सब 
गोंपाछ मर रहे हैं, यंह सुनकर भंगवान्‌ कृष्ण बोहे कि, 
हे गोपो ! आंख मींचंकर गिरिगोव भेतका ध्यान करो 
0 इस भूमिपर सिवा गोवर्धनके दूसरा कोई भी 
एक करनवाढा नहीं है, यह कहकर गोवधेनको उठा; 
सबको उसके नीचे बिठा दिया ॥४ ६॥ इसके पीछे भग- 
वान्‌ गोपोंस बोले कि, देखो ! गोवर्धनने जगह ढदेदी ! 
इस समय कौन स्थल दे 
यह उत्तम नगप्रयक्ष देव हे | 
सात दिनितक मूसलछधार पानी बरसा ॥ ४८॥॥ उस 
हम अनेक देश नष्ट हो गये, जिन्होंने शरणागति 
नहीं की थी, पर शरणगोप नष्ट न हुए, गोवर्धनके नामसे 
बान कृष्ण रोज देते थे ॥ ४९ ॥ गोपोंके छिये पक्षान्नके 
दाता थे जिससे गोप वहां सुखपूर्वक रहे आरये,नारदजी यह 


सकता है, इसीने रिया है, 


री सेब कौतुझ देखकर सत्यक्षोक 'चलेगय|॥५०। जा कंर 
उजाड़ दो। इसके पीछे ह का मिल शक, 


नेझाजीसे बोढे कि, हेन्नद्वान ! भाप सोरहे हैँ क्या ! सृष्टि का 


व्रतानि, ] भाषाटीकासमेतः । 


तस्माच्छीघ्रं गोकुले त्व॑ गत्वा व" बा 
छष्टिविनाशनम्‌ ॥ कल्िदेत्यः समुत्पत्न: स्वमाख्याहि मे सुने ॥ ५२ ॥ नारद उवाच ॥ नोत्पन्नो 
देत्यराद कश्चिस्यक्तः शक्रोत्सवो छवि ॥ गोपकेरिति संछुद्ध इन्द्र ण्यं प्रव्षति ॥ ४३२॥ इते 
तस्य बचः श्व॒त्वा हेसमारुझम वे विधि! ॥ आगतो यत्र शक्कोौइस्ति ऋषधादेव भमवषति ॥ ५४ ॥ 
बक्योवाच ।।| कर्थ व्यवसिता बुाद्धरीव्शी ले सुरेधवर ॥ चलोक्यनाथों भगवात्रिजेतव्यः कर्थ 
त्वया ॥ ५५ ॥ एकय्रेव करांगुल्‍या पदय गोवद्धनो धुत) ॥ इंष्यों कथं॑ तेन साक॑ त्वया शक्र 
विधीयते ॥ ५६ ॥ इति बह्ावच:ः श्वत्वा मेघान्संसतभय वासवः ॥ प्रणिफ्त्य चर कूष्णं 
शक्तों वचनमबवीत्‌ ॥ ५७ ॥ इन्द्र उवाच ॥ क्षन्तव्या मत्कृतिर्विष्णो दास्ो् शरणागतः ॥ 
यद्रोचले तत्मदेयमपराधापलुत्तये ।। ५८ ॥ कृष्ण उवाच ॥ अज्ञात्वा तव सामथ्य .गोपालेरचि्स 
त्विदम्‌ ॥ एवाँ दण्डस्त थोग्योः्यं सम्पगेव त्वया कृत: ॥५९॥ अहं कनीयाँसस्‍ते जाता तवात्ञा- 
परिपालकः ॥ शरणागतजातीनां रक्षणं तु मया कृतम्‌ ॥ ६० ॥ यदि प्रसन्नो देवेश उत्सवोष्य 
प्रदीयताम्‌ ॥ गोवद्धनाय गिरये गोकुल रक्षितं यतः ॥ ६१ ॥ वालखिल्या ऊच्चुः | शक्रोपि च 
तथेत्युकत्वा तत्रेवान्तरधीयत ॥ गते शक्रे गिरीनद्र ते संस्थाप्य हरिस्त्रवीब ॥६९२॥ कृष्ण उवाच।। 
गोपा दृ्॑ तु माहात्म्यममद्धतं शेलज तु यत्‌ ॥ अद्यारभ्य प्रकतेव्यों महान गोवद्धनोत्सव१ ॥६३॥ 
गोवद्धनेन शेलेन निखिला तु धरा धता ॥ एतत्सारमजानद्धिः कर्थ संक्रीडितं पुरा ॥ ६७ ॥ 
अद्य पव्रतराजस्तु सर्वे बते ममाग्रतः ॥ एलत्लवाप्भावेन बल्ले लब्धघं मया महत्‌ ॥६५॥ अति“ 
संव॒त्सरं तस्मादन्नकूओे विधीयताम्‌ ॥ गवां मवति कल्याण पृुत्रपोत्रादिसनततिः ॥ ६६॥ ऐश्वर्य 
च सदा सोख्य॑ भवेहोवद्धेनोत्सबात्‌ ॥ कृत यत्कातिके स्नान॑ जपहोम।चनादिकम्‌ ॥ ६७ ॥ सबब 
निष्फलतां याति नो कृते पर्वेतोत्सवें ॥ णवमुक्तास्तु ते गोपाः सत्य स्वममन्यत ॥ ६८ ॥ ययु: 
कृष्णादयः सर्वे नवमेःहाने गोकुलम्‌ ।। वालखिल्या ऊचुः ॥ इत्येतत्सवेमारूयातमस्मामिःष्तु 


(७७ ) 
निवारय ॥ ५१ ॥ बद्योवाच ॥ । केमथ जायत॑ द्वाष्ट: कथ 

















नाश हो रहा है, इस कारण शीघ्र गोकुलमें जाकर वृष्टिका 
निवारण करिये ॥५१॥ यह सुन ब्रह्माजी बोले कि, किस 
ढिये वृष्टि हो रही है, सष्टिका नाश केसे हो रहा है ? हे 
मुने | क्‍या कोई दैत्य पेदा होगया ? मुझे सब बतादें॥५२॥ 
नारद बोले कि, दैत्यराद तो कोई नहीं हुआ हे पर भूमि- 
मंडलपर गोपॉने .इन्द्रोत्सव छोडदिया है, इससे इन्द्र नाराज 
होकर वरस रहा है ॥ ५३ | त्रह्माजी यह सुनकर हँसपर 
चढ़े ओर वहां जाये जहां इन्द्र कोधित होकर मूसछघार 
बरस रहा था ॥०७। ब्रह्माजी इन्द्रसे बोल कि, हू इन्द्र ! 
तेरी ऐसी बुद्धि केसे होगइई, क्‍या तू चत्रिकोकनाथ भगवा 

नको जीत सकता है ? ॥५०। देख, एकही चिटली उंग 

लीसे इसने गोवर्धन उठा रखा हे, हेइन्द्र | तू उसके साथ 
क्‍यों हष्या कर रहा है॥ ५६ ।॥ इन्द्रने अद्याजीके ऐसे 
बचन सुनकर मेघोंको रोक दिया, एवम्‌ भगवान रृष्णके 
चरणों पडकर बोछा ॥ ५७ ॥ कि-भगवन ! में आपका 
शरणागत दास हूँ। मेरे कारनामें क्षमा किये जायें. यदि 
ऐसी ही इच्छा हो तो अपराधको दूर करनेके छिय दण्डही 
दे दीजिये ।| ५८ ॥ भगवाब्‌ कृष्ण बोले कि; हे इन्द्र 
तेरी ताकतकों जाने विना इन गोपालॉने यह पूजडाला, 
इनको ज़ो तुमने दण्ड दिया वह ठीकृही दिया है।॥ ५९ ॥ 


में आपकी आज्ञा साननेवाला, आपका छोटा भाई हूं, मेंने 


शरण आये हुओंका रक्षण किया है ॥६०॥ यदि आप 
क्ैड शव के 

प्रसन्न है तो आप इस गिरिगोवर्धनकों अपना उत्सव देदें, 
जिससे कि, मेने गोकुछकी रक्षा की है ॥ ६१ ॥ वाढखिल्य 
बोले कि, इन्द्रभी एवमस्तु कहकर वहीं अन्तर्धांन हो गय ७ 
इन्द्रके चठे जानेपर भगवान परवेतकों रखकर बोले ॥६२॥ 
है गोपों | तुमने गोवधनका- माहांत्य देखा आजसे लेकर- 
आप सदा गोवधनका ही उत्सव करना ।।६३१॥ इस्री गोव« 
धनने सारी भूमि धारण कर रखी हैं, पहिले आपने इसकी 
शक्तिको न जान, कसा खेल किया था ॥६४। यह पवेत 
सब कुछ मुझसे कह देता है, इसकी सवाके प्रभावसे ही 
इतना भारी बल मुझे मिला है ॥६७५।॥। इससे आप हरसाछ 
अन्नकूट करना, जिससे गौओं का कल्याण होगा ओर पूत्र 
पौचत्रादि सन्ततियाँ प्राप्त होंगी || ६६ ॥ गोवधनके उत्सवस्त 
ऐश्वथ्य और सदा स्रोख्य प्राप्त होगा, कार्तिकके महीतनामें 
जो भी कुछ जप होम अचेन किया हो ॥६७॥ वो विना 
गोवर्धनके उत्सव किये, निष्फल हो जाता है। भगवानने 
गोपोंस कहा तथा गोपोन उसे सत्य मान छिया ॥६८ 

नौमें दिन कृष्णादिक सब गोकुछ चले गये, बालखिल्य 
बोले कि, हे मुनीश्वरों | हमने सब आपको सुनादिया 


( ७८ ) 


पट गम ज उप 


अलराजे ० ० ये पा कै । 
४००३ कक)0: 7248: 022 7700:4/0 7 


१ ० ८/॥ चर करी बस 5 527 577 529 ४ हैक 
90% 0027 7237: /800./2 ९0 8048९ ४0250: //04//42:% ;4 77650 


४४600: क 00 है कक 2260 0 8820 सम 4 अदा पि2 
ह् बढ. मर परमराध्ता॑ाकाचशाकषाादा0०0७७ ७, ५ प्याआर2डफफापरापट 





का: की 





फटा: शक कर 


रह बम तएा 7 पर 7 4 कफ पदक 





छत फप्ओ "कान 


तुष्टथे तामू ॥ नानाप्रकारशाकाए देश- 
मुनीश्वराः ॥ ६९ ॥ श्रीकृष्णस्य ठु संतुष्टये अन्नकूटों विधी ७००५४०« ं 
कालोबचितानि व ॥७०॥ पक्कान्नानि विचित्राणि कुयाच्छब्त्यलुसारतः ॥ स्वान्रपबत॑ कुयाच्श्री- क्‍ 
क्रष्णाय निवेदयेत्‌ ॥ ७१ ॥-गोवद्धनस्वरूपाय मन्त्न कृष्णोदित उठब्‌ ॥ एव यः कुरुत भक्तों 
विष्णुलोके महीयत ॥ ७२ ॥ इति श्रीसनत्कुमारसंहितायां अतिपत्कत्यम्‌ ॥ 


अथ द्वितीयाबरतानि ॥ ॥ 

यमद्रितीयानिणयः ॥ कारतिकशुक्कद्वितीया यमद्वितीया ॥ सा अपराहव्यापिनी आह्या ॥ उद्ें 
शुक्ृदितीयायामपराहेःचेयेद्मम्‌ ॥ स्नान॑ कृत्वा भावजायां यमलोक॑ न पश्यति ॥ ऊजें शुक्क- 
द्वितीयायां पूजितस्तर्षितो यम॥।वेष्टितः किन्नरहेष्टस्तस्मे यच्छति वाज्छितम्‌ ॥ इति स्कान्दात्‌॥ 
दिनद्वये अपराहव्यातावव्यात्तों वा परेवेति युग्मवाक्यात्‌ ॥- प्रथमा श्रावण मासि तथा भाद्रपदे 
परा ॥ तृतीयाश्वयजे मालि चत॒थी कार्तिकी भवेत्‌ ॥ श्राषणे कछुषा नाम्नी तथा भाद्दे व 
निर्मला॥ आबिने प्रेतसंचारा कार्तिके याम्यतो मता ॥ इति ॥ चतस्नो द्वितीया उपक्रम्य प्रथ- 
मायां किचित्मायश्रित्त द्वितीयायां सरस्वतीपूजा तृतीयायां श्रा द्रस॒कक्‍्त्वा चतुथ्यों यमपूजनमृु- 
क्तम्‌॥ कार्तिक शक्ृपक्षे त॒ द्वितीयायां युधिष्ठिर ॥ यमो यमुनया पूर्व भोजितः स्वगहेःचिंतः॥ 








अतो यमद्वितीयेयं त्रिष छोकेषु विश्वुता ॥ अस्यां निजग॒हे पार्थ न भोक्तव्यमतो नरे: ॥ यत्नेन 
भगिनीहस्ताद्वोक्तव्य॑ं 3४४3. ॥ दानानि च प्रदेयानि भगिनीभ्यो विशेषतः ॥ स्वणी- 


लड़ारवखात्रपूजासत्कारभोजनेः ॥ सर्वा भगिन्यः संपूज्या अभावे प्रतिपन्नकाः 
मित्रभगिन्य इति हेमाद्िः ॥ पितृव्यमगिनी हस्तात्मथमायां युधिष्ठिर 
ट्वितीयायां युधिष्ठिर ॥ पित॒र्मातुः स्वसुश्रेव ततीयायां 
भगिन्या हस्ततः परम्‌ ॥ सर्वासु भगिनीहस्ताड्रो 


है ॥६९॥ भगवान्‌ क्ृष्णको प्रसन्न करनेके लिये अन्नकूट 
करना चाहिये, देशकाह़॒के अनुसार अनेक तरहके शाक 
॥७०॥ तथा अपनी शक्तिके अनुसार अनेकतरहके पक्तान्न 
बनाने चाहिये, सब अन्नोंका पर्वत बनाकर श्रीकृ” 
प्यके लिय निवेदन कर दे ॥७१॥ यह भी गोवधनस्वरूपी 
कृष्णके लिय दोनों मंत्रोंकी पढकर निवेदन होता है, जो 
कोई इस प्रकार अन्नकूटको श्रीकृष्णके लिये निवेदन करता 
है, वो विष्णु छोकको पाता है ॥७२॥ ये संनत्कुमार संहि- 
ताके कहे हुए प्रतिपदाके ब्रतादिक पूरे हुए । 


द्वितीयात्रतानिं॥ 
अथ यम द्वितीयाका त्रत-कार्तिकके शुद्ध पक्षक्ी द्विती- 
याको यमद्टितीया कहते हैं, इसे ऐसीको ढेना चाहिये जो 
कि अपराहमें भी व्यापक हो । क्यों कि, ऐसा छिखा 
ता है कि, जो मनुष्य कातिकके रुक पक्षकी ट्वितीयाको 
यभुनाजीम स्नान करके अपराहु समय यम॒का पूजन करता 
वो यम॒लोकको नहीं देखता | प्यारे किश्नरोंस घिर हुए 
राज, कार्तिक शुक्छृपक्षकी द्वितीयाके दिन दृप्त और 
प्रसन्न करनेपर पूजन करनेवालेको मनवांछित फछ देते डर 
नी सन्द्पुराणमें लिखा हुआ है | यदि दो दिन द्वितीया 


हो, चाहे दोनों ही सिल हे 
बा मध्याह न, वहच्यापिनी हो, चाहें दोनों 
ठीया माननी चाहिये। 


गे आवणसें पहिली त में दृर 
एवम कारमे तीसरी हेली तथा भादोंमें दूसरी 


 कातिकर्म चौथी ये चार यम- 


हो, तो दूसरीको ही यमहि- | ह्विती 


॥ प्रतिपन्नका।- 
॥ मातुलस्य खुता हस्ता- 
तयोः करात्‌ ॥ भोक्तव्यं सहजायाश्र 


क्तव्यं बलवर्धनम्‌ ॥ धन्य यशस्यमायुष्य धर्म- 


द्वितीयाएं होतीं हैँ । आवणकीका 'नाम कछुषा, तथा भादों- 
कीका नाम निमछा, एवम्‌ कारकीका नाम प्रेतसंचारा और 
कारतिककी द्वितीयाका नाम यम द्वितीया है। इन चारोमैंसे 
पहिलीम प्रायश्ित्त तथा दूसरीमें सरस्वतीपूजा तीसरीमे 
श्राद्ध और चौथी यमद्वितीयामं यमका पूजन होता हें। है 
युधिष्ठिर : पहिले यमुनाजीने यमको अपने घरपर बुढा, 
स॒त्कार कर उसे भोजन कराया था इस कारण इसे तीनों 
लोकॉम यमह्वितीया कहते हूँ इसी कारण हे पार्थ ! इस 
द्वितीयाको अपने घरपर भोजन न करके प्रयत्नके साथ 
बहिनके हाथस स्वादिष्ठ भोजन करना चाहिये तथा उस 
दिन बहिनको विशेषरूपसे दान देने चाहिये । सोभमेके 
अछकार, सुन्दर वस्र ओर सुस्वादु अन्नस सभी बहिनोंकी 
पूजा, सत्कृति होनी चाहिये । यदि बहिन न हों तो जिन्हें 
बद्दिन मान रखा हो उनको इसी विधिशे सत्कृत करना 
चाहिय। क्योंकि, ऋोकमें जो प्रतिपन्नभगिनी शब्द आया 
है उसका अथ मानौ हुईं मित्र बहिन होता है ऐसा हेसा- 
ट्रिका मत है। हे युधिष्ठिए ! पह्चिली द्वितीयाकों तो चाचाकी 
बेटीके हाथसे तथा दूसरी द्वितीयाको' मामाकी बेटीके 
हाथस खाना चाहिये तथा कार शुदी द्वितीयाके दिन 
भूआकी या मौसीकी बेटीके दाथसे तथा कार्तिक जुकक। 

याके दिन अपनी बहिनके, हाथसे सपत्लीक भोजन 


करना चाहिये, यदि ऐसा न हो सके तो सभी द्वितीयाओंको 


: अपनी संगी बहिनके हांथसे, धन्य एबमू यशके- देनेवाढ, 





धाषाटीकासनेल: ! 








कामार्थपाधकप्‌ ॥ यस्‍याँ तिथों यझुनया यमराजदेवः संभोजितो तिडकशस्ख्सूसोहदेट 
तस्यां स्वसुः करतलादिह यो झुनक्ति म्राप्तोति रत्नधनधान्यमक्तत्तमं सः ॥ इति हेमादों 
भविष्ये यमद्वितीयाविधिः ॥ । ह 

ला बमद्विवीयाकथा--वालखिल्या ऊतुशकार्तिकस्य सिते पक्षे द्वेतीया यमसंज्ञिता ॥ तत्रापराह्ने 
कर्तव्यं सर्वथेव यमार्चनम्‌ ॥१॥ प्रत्यहं यमुनागत्य यममम्रार्थयत्पुरा॥श्रातंमंम झुहँ याहि भोज- 
नाथ गणाव॒तः ॥९॥ अद्यशो वा परश्रो वा प्रत्यहं बदते यमः ॥ कार्यव्याकुलचित्तानामबकाशो 
न जायते ॥शा तरैकदा यम्॒नया बलात्काराह्निमन्त्रितः ॥ स गतः कांतिके मासि द्वितीयायां 
सुनीखराः॥४॥ नारकीयजनास्घुकत्वा गणेः सह रवेः खुतः ॥ कृतातिथ्यो यमुनया नानापाकाः 
कृतास्तथा ॥५॥ कृताभ्यड़ो यमुनया तेले्गन्धमनोहरेः ॥ उद्गर्तन॑ लापयित्वा:स्लापितः रूर्य- 
नन्‍दनः ॥ ६॥ ततो$लड्ारिक दत्त नानावस्थाणि चन्दनम्‌॥ माल्यानि च प्रदत्तानि सम॑ चोप- 
भुपाविशव ॥७॥ पक्कान्नानि विचित्राणि कृत्वा सा स्वर्णमाजने ॥ यम च भोजयामास यखुना 
प्रीतमानसा ॥८॥ श्ुक्त्वा यमोषपि भगिनीमलड्भारेः समचंयत्‌ ॥ नानावख्नेस्ततः माह वर 
वरय भामिनि॥९॥ इति तद्बचनं श्रुत्वा यमुना वाक्यमब्बीत्‌ ॥ यमुनोबाच ॥ प्रतिबंष समा: 
गच्छ भोजनार्थ तु मद्शहे ॥१०॥ अद्य सबवे मोचनीय।ः पापिनों नरकाद्यमम ॥ ये चेव भगिनी- 
हस्तात्करिष्यत्ति च भोजनम्‌ ॥९१॥ तेषां सौर्यमदो हि त्वमेतदेव इणोम्यहम्‌ ॥ यम उवाच!| 
यमुनायां तु यः स्नात्वा संतप्य पितृदेवताः ॥१२॥ झनक्ति मगिनीगेहे भगिनीं पूजयेदपि॥ 
कदाचिदपि मद्द्वारं न स पश्यति भाठुजे ॥ १३॥ वीरेशेशान दिग्भागे यमतीय प्रकीतितम्‌ ॥ 
तत्र स्‍्नात्वा च विधिवत्संतर्प्य पिवर्देवताः.॥१४॥ पंठेइतानि नामानि आमध्याह्ने नरोत्तम: ॥। 
सूर्यश्यामिस्ुखों मौनी इडचित्तः स्थिरासनः ॥ १५॥ यमो निहन्ता प्शिधमराजों वेबस्वतो 
जि किक जि सिअिकिफिकिएएएएएकाा 





आयुका बढनेबाछा और धममे) अथे, कामका_देनेंवाछा | प्रीछे यमके छिये अलंकार करनेके अनेक लरहके सामान 
बलवर्धक भोजन करना चाहिये। जिस तिथिको भगिती | व और चन्दून माला आदिक दिये जो कि! यमके न: 


गत 


प्रेममें डूबी हुईं यमुनाजीने अपने हाथस यमदेवको जिम।या | पानेके ही ह भ ॥ ७ | अनेक तरहके पक्तान्नोंस सोनके 
था, उस दिन जो मनुष्य अपनी बहिनके हाथसे जीमता है | थालोंको सजाकर अत्यन्त प्रसन्नताकें साय यमकों भोजन 
वो अपूर्व रतन तथा धनधान्योंको प्राप्त होता है । यह हेमा- | कराया ।! ८ ॥ भोजन करनेके पीछे यमने भी, अनेक तर: 
द्विम भविष्यके अनुसार यमद्वितीयाकी विधि कही है ।।_ । हके वल्लालंकारोंस बहिनका पूजन करके बहिनसेकहा कि, 

यमद्वितीयाकी कथा-वारूखित्य ऋषि कहते छंगे कि। ए बहिन ! आपकी जो इच्छा हो सो मांगो ॥ ९॥ यमके 
कार्तिकके शुक्ृपक्षकी द्वितीयाको यमद्वितीया कहते हैं.उसमें| ऐस बचन सुनकर यमुनाजी कहते-छगीं कि, आप प्रतिवर्ष 
सायकाछके समय यमका पूजन करना चाहिये || १.॥ प्रति। आजके दिन मेरे घरपर भोजन करनेके लिय पधारा करे 


द्नि श्रीयमुना महारानी आकर. यमदेवकी प्राथेना करने । १० ॥ तथा जिन पापियोंने आजके दिन आपकी बरह 


छगीं कि, हे भाई | अपने सब इष्ट मित्रोंको छेकर मेरे घर | अपनी बहिनके हाथसे भोजन किया हो, उन पापियोंको 
भोजनके लिय आओ ॥|२॥ यमका भी यह काम रहता था| आप अपने पाशसे सदा मुक्त करते रहें एवम्‌ जो बहिनके 
कि, कल आऊंगा या परसों आजाऊंगा क्‍्योंकि,हस काममें | हाथसे इस प्रकार भोजन करें ॥ ११ ॥ आप उन्हें सदा 
छगे रहते हैं इस कारण अवकाश नहीं मिलता ॥ ३॥ है | सुख पहुँचावैं, यही में आपसे वरदान मांगती हूँ। इतनी 


मुनीश्चरो ! एक दिन जबरदस्ती निमनन्‍्त्रण दे दिया, तथा | सुनकर यम कहने छगा कि; जो तुझमें स्नान तर्पण करके 
यह भी कार्तिकके शुह्ृ॒पक्षकी द्वितीयाको यमुनाजीके घर |॥ १९ ॥ बहिनके घर भोजन करे उसका पूजन करेंगे है 
भोजन करने गया।| ४॥ जातीवार रविस्ुत यमने अपने | सू्यपुत्रि ! वे मनुष्य कभी भी मर द्रवाजेको न देखेंगे || 


है? 


पाशसे सब लोगोंको सुक्त कर दिया था एवम्‌ अपने इृष्ट ॥ १३॥ वीरेश महादेवकी इंश! नी दिशास एक हक 
गणोंकों लेकर यमुनाजीके घर गया था तथा यमुनाजीने | है, उसमें स्नान करक विधिके साथ पिलर ओर देवताओंका 


९5 हि डर 


यमका प्रिय आतिथ्य किया और पाक भी अनेक तरहके | वर्षण करके 0 १४ ॥ जो (अलुष्य _अछ; एकाग्र 0 
बनाय ।। ५॥ यमुनाजीने सुगन्धित तहोंसे ग्मका अभ्यज्ञ मौनपूर्वेक स्थिरासनसे सूथ्यके सामने सध्याहे हाटूर हे। 


लत 


हम ही च्च ४ 3 ३ पल २०७. को के प्र 
किया, पीछे उब॒टन करके स्वच्छ जलसे स्तान कराया॥६॥ | नार को पढता है १०) वे नाम ये हैं किन्‍्यम, निहन्ता, 





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दण्डधरश्र काल! ॥ भूताविपों दत्तकृताठ॒सारी क्ृतान्त एतदशॉनाममिजपेत ॥ १६ ॥ एगानिय 
तानि द्श त्ैः नामदशकेनेत्यथेः ॥ ततो यमेश्वर प्ज्य भगिनीणहमात्रजेत्‌. | मन्त्रेणानेन च तय 
भोजितः पू्वमादरात ॥ १७ श्रातस्तवाठुजाताह भुंक्ष्व भक्ष्यमिर्द शुभम्‌ ॥ प्रीतये यमराजस्य 
यमुनाया विशेषतः ॥ १८॥ सम्तोषयेद्यो भगिनी वख्यालड्रणादिनिः ॥ स्वप्ने5पि यमलोकस्य 
भविष्यति न दशेनम्‌ ॥२९॥ तृपेः कारागृहे ये च स्थापिता मम वासरे । | अवश्य ते भेषणीया 
भोजनाथ स्वछुर्गंहे ॥२०॥ विमोकव्या मया पापा नरकेभ्योधद्य वासरे ॥ येप्य बन्दीकरिष्यत्ि 
ते दण्डया मम सर्वधा॥२१॥कनीयसी स्वसा नास्ति तदा ज्येष्ठागह बजेत।तदभावरे सपत्नीजां 
तदभावे पितृव्यजाम॥२२॥ तद्भावे मातृस्वसुमातुलस्यात्मजां तथा॥ सापत्नगोत्रसम्बधेः कर्प- 
येत्तु यथाक्रमम्‌ ॥२१।सर्वाभावे माननीया भगिनी काचिदृव हि॥ गोनद्याद्ययवा तस्या अभावे 
सति कारयेद॥२४॥तद्मांवेंःप्यरण्यानी कल्पय्ेतु सहोदरीम॥अस्याँ निजगहे देवि न भोक्तव्य 
कदाचन॥२५॥ ये झुज्ञन्ति दुराचारा नरके ते पतन्ति च ॥ स्नेहेन मगिनीहस्ताद्वोक्तव्य॑ पुष्ठि- 
वद्धेनम्‌ ॥२३॥ दानानि च पदेयानि भगिनीभ्यों विशेषतभाश्रावणे तु पितृव्यस्य कन्या हस्तेन 
भोजनम्‌ ॥२७॥ माठुलूस्य खुताहस्ताद्वोक्तव्यं भाद्ममासके ॥ पितृमातृष्वखुकन्थे आखिने तु 
तयोः करात्‌ ॥२4॥ अबश्य॑ कातिके मासि भोक्तव्यं॑ भगिनीकरात ॥ एवसुकत्वा धर्मराजों 
ययो संयमिनी ततः ॥ २९ ॥ तस्मादषिवराः सर्वे कारलिकब्रतकारिण:ः ॥ ख्ुझन्त भगिनी- 
हस्तात्सत्यं सत्यं न संशयः ॥३०॥ यमद्वितीयां यः प्राप्य भगिनीगहमोजनम्‌- ॥ न कुर्यादर्षज 
पुण्य नश्यतीति रबेः खुतम्‌ ॥ ३१ ॥ या तु भोजयते नारी अंतर युग्मके तिथो ॥अर्च॑येच्चापि 
ाजणजहए७/7._प्भभपप--. |] 


पिठराज, धमराज, वेबस्वत, दुण्डधर, काल, भूत्ाधिप, | यदि अपने सम्बन्धकी भी वहां कोई न हो तो मानी हुई 
' दृत्तकताचुसारी और कृतान्ल। तथा इन दश नामोंका जप | बहिनके घरही भोजन करना चाहिये, नहीं. तो गौ, नदी 

करता हू ॥ १६॥ रोके जो ८ एतदशमिः ” यह पद | आदिकोही बहिन मानकर, उनके पास ही भोजन करना 
आया है; इसका ग्रन्थकार अथ करते हें थे वे दृश नाम हैं, | चाहिय ॥२४।॥ यदि ये सी न प्राप्त हों किसी वनीकों ही 
इन दृश नामोंके डरा यमका जप करता है ॥ इन दश- | अपनी ब हिन मान ले, हें देवि | इसमें अपने घरपर कभी 
नामोंसे यमेश्वरका जप पूजन करके बहिनके ३ जाजाय | श्री भोजन न करना चाहिये ॥२५०॥ जो दुराचारी लोग 
(मी भहिंन भी इस. संत्रसे भादरके साथ भाईंको भोजन | यम ह्वितीयाके दिन अपने घरपर भोजन करते हैं, वे नर 
वें ॥(७॥ कि; है भाई ! में तेरी छोटी बहिन हूं, इस | कह पड़ते हैं, इस दिन तो प्रेमके साथ बहिनके ही हाथसे 
पवित्र भोजनकों यसदेव ,और यमुनाजीको विशेषप्रसन्न- | पुष्टिकर पदार्थ खाने चाहिये || २६ ॥ इस दिन बहिनको 


आन हि के * क ७५ कु कट 
ताके लिय आप करें ॥१८॥ बख् ओर अढे कारोंसे बहिनको विशेष रूपसे दान देने चाहिये, श्रावणक्री द्वितीयाको त्तो 
सन्तृष्ट कर, फिर स्वप्नमें भी यमछोककों दशन नहीं होते 


बा 8 चाचाकी बेटीके हाथसे भोजन करना चाहिये ॥ २७॥ : 
॥१९॥ राजाओंको भी यह चाहिये कि, जितले कदी उनके भादोंकी द्वितीयाकों हि 


न कप | दिनके मासाकी बेटीके हाथसे, तथा कारकी ' 
5 गा सब इस दूजक दिन अपनी हिनके घर | द्वितीयाकों मौसीकी बेटी अथवा भूआकी बेटीके हाथसे 
भी पापियोकी 35०. द॥ १० ॥ आजके दिन में | भोजन करना चाहिये॥ २८ || पर कार्तिकशुकू द्विती- 
री नये छईगा तथा जो कोई राजे महाराज | याको जरूर ही अपनी बहिनके हाथस भोजन करना 
३ पा बा ये जरूरही भेरे दण्डय | चाहिये, ऐसा कहकर, धर्मराज यम सयमनी नामकी 
कप के हज बहिन न हो दो बडी बहिनके ही। अपनी पुरीकोीं चंढे गये॥ २९ || इस कारण हें. कार्ति- 
कक सा बन करना चाहिये, यदि बडी भी न हो तो | कके ब्रत करनेवाले ऋषिवरों .! यम द्वितीयाके , दिन 
भीनहोतो स् बा कल अत चतू यह | बहिनके घर पहुँचकर, उनके हाथस भोजन करो जो 
हि कप 5 28 भैसे किसीके यहां | | कुछ कहा गया हे, इसमें सन्देह न करना, यह सत्य 
न हो दो मौसीको वेटीफे घन ते बैन भी कोई | है ॥ ३० ॥ ओऔसूर्य भगवानते तो यहांतक कहा है कि; 
बेटौके ही हायसे सह या बारिश” पदों तो भामाकी | जो भलुष्य यमद्वितीयाके दिन बहिनके हाथका भोजन 
हो दो गोत्र आरिशी कैसी भी इन.) यदि यह भी न | नहीं करता, उसके सालभरके किये हुए सब सुकृत नष्ट 
बदन अवश्य चाहिये।२श। | हो जाते हैं ॥ ३१॥ जो कोई ख्तरी "य् दिलीय के द्नि 


दि 


0 ४7 शा श 5 मास्त+ १07८ जलकर 5 30% ए8 ४८१ 7४०४४ ००:१४ ४४// ३४४८ आह आकर २१४९३ कक०१ ५८१३: ४ ३४७४7 ८०१ ८४ ५३४६ कह पता 20 7 जप से घइनराम 6 3 आमनभभ ०00 # 772: ०१३ 


(2 म 'समेलः 
कप. है] 
447: 22220 00/2%:% 202 /7ण27/7५%237060:/:277/न्‍0 07: ४:6४ 20:02 040/22220//लै7 ८507: कट: 03%0 87: 050 70%, 07 हक 76,११९ ३ कैए॥आ ७७६४ 72020 87 थी (हि 







000 2000: 








ताम्बूलेन 55| वेधव्यमाप्ठयाव॥२२॥्राठुरा इ/क्षयो नून॑ न भ्षत्रेचत्र कहिंचित। अपर 
सा दवितीया आातभोजने ॥ ३३ ॥ अज्ञानाद्यदि वा मोहान्न सुक्त सगिनीशहे॥ अवा 
भावादा जरितेनाथ बान्दना।एतदा[ख्यानक अ्रुत्वा मोजनध्य फर्ल लब्लेदह ॥ ३४ ॥ इति श्रीसन- 

| दितीयाख्यानदे संपूर्णम्‌ | अ्रातृह्वितीयः ४ अन्य अतद्चितीय/दि िध्ति- 





त्कुमारसंहितायाँ यमद्ि 
थितत्वे-यमं च चवित्रगुप्त च यमदूर्ताश्व पूजयेत्‌॥ अध्याश्ात्र भकतेव्या यधाय सहजहयेः॥ 
सहजहयः--आ्ञातमगिनीमि/ अध्यमन्त्रस्तु-एल्मेहि मण्डल पाशहसुत यमान्तझालोकघरामरेश-॥ 
क्‍ ज्ातद्वितीयाक्रतदेवपूर्जा गृहाण चाध्य भगवन्नमघ्ते॥धर्मराज नमस्तुभ्य॑ नमसले यललुनात्रज॥ताहि 
माँ किंकरेः साद्ध सूर्यदुत्र नमोह्स्त ते ॥ लेड्गे--कार्तिक तु द्वितीयायां शुक्कायां जादुदूजनम्‌ ॥। 
या न कुययांद्विनश्यन्ति भातरः सतजन्मसु ॥ पाद्मे उत्तरखण्डे--मद्रे भगिनि भो जातस्त्वदंध्रि- 
सरसीरहम ॥ श्रेयसेध्य नमस्तुभ्यमागतोडई तथबालयम।॥मुदुवाक्य ततः खत्वा झत्वरं कियतें 
तया ॥ अद्य आ्रावमती श्रातस्त्वया धन्याध्मि मानदा।मोक्तव्यं तेज्य महेहे स्थासुदरे मम माना 
कार्तिके शुक्रपक्षस्य द्वितीयायां सहोदरः॥ यमो यघझुनया पू्थ भोजितः स्वरुहेितः ॥ 
अस्मिन्दिन यमेनात्र नारी वा पुरुषोषि वा । अपविद्धा: कर्म प्शेः स्वेच्छया ये पचन्ति हि।॥ 
पापेभ्यों विप्रमुक्तास्‍्ते सुक्ताः कमेनिबन्धनात ॥ लतेषाँ महोत्सवों बत्तो यमभराष्ट्रसुखावहः ॥ 
तस्माहन्धोत्व मह्ेहे भोजन कुरु कार्तिको।आआहशियः शतिगह्याथ नमस्कृत्य समचंयेत्‌ ॥ सो 
अगिन्यः संपूज्या ज्येष्ठास्तत्र तु संस्युतः ॥ वखादिना थ लत्कार्या निज्रविचालुरूारतः ॥ 
भ्ातुरायष्पवृद्धणथ सगिनीमभियंमस्यथ वे॥पूजनीयाः प्रयत्नेव अतिमाश विधानत्द ॥ माछण्डेयो 
बलिव्यासो हनूमाँश्व विभीषणः ॥ कृपो द्रोणिः परछुराम एतेस्टो चिरजीविन/ माकंण्डेय महा- 





भाग सत्तकल्पान्तजीवन ॥ चिरंजीवी यथा त्व॑ हि तथा में आातलर कुछ 


भाईको अपने घरपर भोजन कराकर उस पान खिल्ाती है | 
वो कभी विधवा नहीं होती || ३९॥ न उसके भाईकी | 
आयुका ही क्षय होत है, अपराह्ृवक रहनेवाली जब द्वितीया | 
हो तबही भाईको भोजन कराना चाहिये। ३११ यदि | 
अज्ञानसे अथवा मोहसे या विदेश रहनके कारण वा। 


२ु 


बन्दी होनेसे जिसने बहिनके हाथस भोजव नहीं किया 
हो वो यमह्वितीयाकी कथाको सुनकर वहिनके हाथसे | 
५ ३ ४ हि ७ #५. । 
भोजनका फल पाछेवा है ॥१४।॥ यह सनत्छुमारसंहिताको | 


5 


कही हुईं यम द्वितीयाकी कथा पूरी हुईं ॥ भैया दौज-अब 


तिथितत्वके अनुसार भेया दौजकी विधि कहते हैं | इस 


प्रन्थर्म लिखा हुआ हैं कि, बदन और भाई दोनों मिलकर | 
यम, चित्रगुप्त और यमके दूदोंका पूजन करें तथा सबको | 


अधघ दें । इस खोकम जो 'सहज द्॒येः' यह पद आया हैं 


इसका बहिन भाई अथ है। इसीमें अध्यका सत्र छिखा 


हुआ है। जिसका अथ होता हैं कि; हे सूयेके सु ! पाश 
हाथोंमें रखनेवाले अन्तक ! सब लछोगोंके धारण करनेवाले 


तेरे लिये नमस्कार है तथा है यमुनाके बड़े भाई ! तेरे लिये 


डे 


सूयछुत , 


०५ मे, 


तर 


हेंरे चरणं कमछोंको प्राप्त हुआ हूं, अपने भेयके छिये में तेरे 
छा फ 


नमस्कार हैं, अपने किंकरोंके साथ मेरी रक्ष! करो, हे 
रे लिये वारंवार नमस्कार है । लिंगपुराणम | 
लिखा हुआ है कि, जो ख्री इस भेया दूजके दिन भाईका | 
पूजन नहीं करती, वो सात जन्मतक बिता भाईकीही रहती | 

। पद्मपुराणक्े उत्तरखण्डम लिखा हुआ हूँ कि-जब भाई | 
बहिनके घर जाय॑ तो बहिनसे कहे कि, हे भद्रे बिल ! से | ४ 
| आए हैं बेसा ही मेरे भाईकछो भो कर दूँइति भाकुद्वितीया।। 


; | इॉले आत्द्वितीया ॥ 
घर आयाहू। भाईके ऐसे प्यारे बक्‍योंको सुमकर बहिनको 
भी झीघ्रही कह देना चाहिये दि, आज मेँ तरेसल भाई- 
वाली हुई हू, हे मानके देनेदाले ! आज हे तेरेसे धन्य हुई 
हू | अब आप मेरी और अपनी अ:बुक्की इृद्धिके छिय मेरे 
घरपर ही भ्रोजन करें | क्‍यों क्लि कार्तिकर्क शुक्छ पक्षकी 
द्वितीया हैँ,आजके ही दिन यम्ुुनाजीने अपने सहोद्र साईं 
यमदेवजीको अत्यन्त सनन्‍्मानके साथ जिसाया था । जो 
ख्री, पुरुष यम्छो कसे अपने अशुभ कमोंके फलोंकों भोग- 
रहे थे, जिन्होंने अपने बुरे परिष/कको आप उपस्थित किया 
था आज यमने उन सबको छोड दिया है, वे कर्मवन्धनसें 


| छूट गये हूँ उन छोगोंका यमके दरबारसें वा भारी महो- 


व्थवव हो रहा हैं, जिसमें सभी आनन्द मना रहे हैं। इस 


| कारण हे भाई ! आज इस भैया दूजकों मेरे घरपर 


५. | भोजन करो, ओर भी अनेक ग्रकारकी आशिष करती हुई 
यम ! आओ; आओ, इस भेया दूजकी पूजा और अघंको | कि श्र करता हु३ 


अहण करो, आपके लिये वारंबार नमस्कार है। हे धमराज ! | 


भाइको नमस्कार करके उसका पूजन करे, सबही बहि- 
नोंका पूजन सत्कार होना वाहिय, पर बडी बहिलका वो 
मुख्य रूपसे अपनी शक्तिके अनुसार पूजन करना ही 
चाहिये ॥ पीछे सब वहिलोंकों चाहिये कि, वे सब्न सिछकर 
भाईकी आयुकी वृद्धिके छिये यरकी प्रतिमाका पूजन करें। 
माकेण्डेय, बलि, व्यास, हनूमाल, बिझौषण, क्वप--द्रौणि 
और परशुराम ये आठ चिरंजीबी हैं | है स्वााव कल्पतक 
जीनवाढ, मदहाभण्यशारी, चिरंजीडी अप्कण्डेय ! जसे 


( ८२ ) मिनी िचछ्ं्टिलिेंगंगगग्ग्ग्गमगगग्ग्गग् 





अथ वृतीयाब्रतानि॥ 
पौभाग्यशयनत्रतम्‌ ॥ तत्र चेत्रशुक्कत॒तीयायां सोभाग्यशयनब्रत | मा? कक ५३१ जाल ॥वसन्त- 
मासमासाद्य वृतीयायां जनप्रिय ॥ सोमाग्याय सदा खीमिः कार्य पृत्रणुखप्छुनि/।॥। लऔ*र*र 
पूर्वाहे तिलेः स्वान॑ समाचरेत्‌ ॥ तस्मिन्नहनि सा देवी किल विश्वात्मना सती ॥। पाणिग्रहणिके- 
मन्त्रेखदृहा वरवर्णिनी ॥ तया सहैव देवेशं दृतीयायां समचेयेत्‌ ॥ कह“ ५रपकुर मकर 
संयुतेः ॥ प्रतिमा पश्चगव्येन तथा गन्धोदकेन च ॥ पशाम्र॒तेः स्वापयित्वा है शंकरसं- 
युतामा।नमोःस्तु पाठलाये च पादों देव्याः शिवस्य त।शिवायेति च्‌ संकीत्य जया गुल्फयो- 
सतथा ॥ बिशुणायेति रुद्रस्प भवात्य ज॑धयोय॑गम्‌ ॥| शिवं रुद्*े्वरायेति जयाये इति जाहनी। 
धकीत्य हरिकेशाय तथोरू वरदे नमः ॥ इंशायेशं कि रत्य शट्डरायेति शड्डरम्‌ । । कुक्षि द्रये- 
च कोटर्ये झलिनं शूल॒पाणये॥ मड्लाये नमस्त॒भ्यम्॒दरे चापि पूजयेत्‌ ॥ सवात्मने नमो रुप 
मीशान्ये च कुचद्रयम ॥ शिव वेद्ात्मने तद॒ुद्राण्य कण्ठमचयेत्‌ ॥ त्रिपुरतक्षाय विश्वेशमनन्ताये 





के हक भू लि 4५ छ२ - 
करद्रयम्‌ ॥ त्रिछोचनायेति हर बाहू कालानलमिये ॥ सौमाग्यज्षुवनायोति भूष॑गाहिं समर्चयेत्‌॥ 


स्वाहास्वधाये च मुखमीखरायोति शुलिनः॥ अशोकमथुवासिन्थे पज्यावोष्ठो च कामदौ॥ 


स्थाणवे च हर॑ तद॒दास्य॑ चन्द्रमुखप्रिये ॥ नमो$द्धनारीशहरमसिताड्रीतिनासिकाम ॥ नम “ 


उम्राय लोकेश ललितेति पुनथुवा ॥ शर्वाय पुरहन्तारं वासुदेव्ये तथालकम ॥ _नमः श्रीकण्ठ 








| रीकी तथा भोमू शंकराय नमः”इस मंत्रसे शिवकी कटिक्ा 


| थे (६  सपय: )) पन् 
मत्स्यपुराणमें लिखा है कि, चैत्रशुक् हतीयाको सौभा- | हा कप े हे ओमू हे 3. 5 
ग्यश्ययन नामका ब्रत होता है। मत्स्य भगवान कहते हैं कि, | “रीकी तथा “ओम लपाणयेनमः”? इस मंत्रसे शिवकी 
वसन्तऋतुके महीनामें तृतीयाके दिन हे जनप्रिय ! दासी क्‍ दोनों कोखोंका पूजन करे | “ ओपू मेगछाये नमः”? इस 
ओर पुत्र सुख चाहनेवाली ख्लियोंकों सोभाग्यके लिये ब्रव | मंत्रसे गौरीके तथा “ ओमू सर्वात्मने नमः ”” इस मंत्र 
करना चाहिये। पहिले तो शुक्हुपक्षके पूर्वाहर्मे तिहोंसे | शिवके उदरको पूज । “ओम इंशान्ये नमः” इस मंत्रसे पाः 
स्नान करना चाहिये । क्योंकि, इसी दिन वरवर्णिती सती । बतीके कुचोंको तथा “ ओंवेदात्मने नमः”इस मंत्रसे शिवके 
देवीका वेदिकविधिसे परमेश्वर शिवके साथ विवाह हुआ | कुचोंकों पूजना चाहिये | «८ ओमू रुद्राण्ये नमः *” इस मैत्र" 
था; अनेक तरहके फूछोंसे, धूपस, दीपसें और नेवेदरस | से गौरीसे तथा “ ओमू त्रिपुरप्नाय नमः” इस मंत्रसे शिवके 
सतो देवीके साथ शिवजीका पूजन करना चाहिये । घोकर | कठका पूजन करना चाहिये | “ओमू अनन्तायें नमः” इस 
भगवान्‌ सहित गोरी देवीकी प्रतिमाकों पंचगव्यसे गंधो- | मंत्रसे श्री गौरीके तथा.“ ओमू त्रिछोचनाय नम*् ” इस ' 
दकसे ओर पंचारुतसे स्नान कराना चाहिये। दोनोंके अंग | मंत्रसे शिवके करोंका पूजन होना चाहिये। ४ ओम काह्ा 
पत्यज्ञोंके पूजनके मंत्र मरिन्न भिन्न हैं, उनसेही अंग प्रत्यं- | नढग्रिय नमः” इस भंत्रस गोरीके तथा “ओम सौभाग्य 
गोंछा पूजन होता चाहिये “ओमू पाटछाये नमः? इस | वनाय नमः! इस मंत्रस शिवके दोनों बाहुओंकी पूजा! 
मंत्रसे गौरीके तथा“ ओमू शिवाय नमः ” इस मेत्रस | करनी चाहिये। “ओमू स्वाहा स्वधाये” इस मंत्रसें गौरीके 
रा का सेन न ल ओम जयाये |तथा “ओपू इंधवराय नमः" इस मंत्रसे शिवके मुखकी पूजा 
55 आह गौरीके तथा “ओम त्रिशुणाय नमः ” | करनी चाहिये। “ओमू अशोक मधुवासिन्ये नमः ” इस 
अदा नग/ इस मरे गोरे दया « जो के | गोरीके जोर “ओोय स्थाणवेनमः” इस सैतस शिव 
नमः ” इस मंत्रंस शिवके जंघाओं प्‌ रुद्रेशवराय | होठोंका पूजन होना चाहिये। “ओम चन्द्रमुखप्रियाये 
५होप जया सह. आका पूजन करना चाहिये | नमः ” इस मंत्रसे गौरीके तथा. ओम अधनारीशायनम: 
है कब आकर गोरीके जा तथा “ ओम | ईंस मंत्रस शिवके भुखका दुबारा पूजन करना चाहिये। 
हियि हि हि 28 'शिवके जाशुओंका पूजन | “ओप असिताह्वायै नमः” इस मत्रस गौरीको तथा “ओम 
तथा ४ ओप ईशाद ज०५ ५... इस मंत्रस गोरीके ; उप्राय नमः ” इस मंत्रसे शिवजीकी नासिकाका पूजब 
हि प्‌ इंशाय तेस: ! इस मत्रस शिवके झरू गॉँक | हो प्वा हि के 4६ «.*; कप र्प 
पूजन करना चाहिये। “ओम रत्ये नमः? इस सजज प5 |, जाहिये । “४ ओमू लछितायै. नमः” इस 
गरीकषो, परमाशियर कफ पर. कया “ ओप शवाय पुरहन्ते नमः” 
। (7 पथं२ जापयिलवाचयह्रीरीमिन्दुशजरसंयुतामितिपाठे हेमा प्िवा कफ, |] भृषणाहि शिवमू ): 


अथ तृतीयाके व्रत । 













हि 





वतानि, ] भाषाटीकासमेतः । 





नाथाय शिवं केशांस्तथाचयेत ॥ भीमोग्रसोम्यरूपिण्ये शिरः स्ोत्मने नमः ॥ शिवमन्यच्य 
विधिवत्सौन्नाग्याष्टकमग्रतः ॥ स्थापयेद्वृत्तनिष्पावकुसुंभक्षीरजीरकम ॥ तृणराजेक्षलूवर्ण कुस्तु- 
बुरुमथाष्टमम्‌ । दत्त सोमाग्यकृद्यस्मात्सोमाग्याष्टकमित्यत/एव निवेद्य तत्सवंमग्नतः शिवयोः 
पुर | चेत्रे शड़ोदर्क प्राइय स्वपेद्रमावरिनदम ॥ पुनः अभ्ात उत्थाय कृतस्नानजपः श्ावे $॥ 
संपूज्य दविजदाम्पत्य॑ माल्यवल्यविभूषणेः ॥ सोभाग्याष्ठटकसंयुक्त सुवर्णभतिमादयम्‌ । मीयता 
मत्र ललिता बराह्मणाय निवेदयेत्‌ ॥ णव संवत्परं यावत्ततीयायां सदा सुने ॥ पाशने दानमत्रें 
च विशेष हि निबोध में ॥ गोशड्रोदकमाणे स्थाह्शाखे गोमय पुनः । क्‍्येष्ठ मन्दारकुसुम 
बिल्वपत्र शुचों स्प्रतम्‌ ॥ आवणे दधि संग्राइयं नभस्थें च कुशोदकम्‌ । क्षीरमाश्वयुजे मासि 
कार्तिके पृषदाज्यकम्‌ ॥ मार्गशीर्षे तु गोमूज्ने पोषे संप्राशयेद्वृतम्‌ ॥ माघे कृष्णातिलांस्तद्वत्पश्थ- 
गव्य॑ च फाल्गुन ॥ लाछिता विजया भद्गा भवानी कुमुदा शिवा ॥ वाखुदेवी तथ गोरी मड़ला 
कमला सती ॥ उमा च दानकाले तु प्रीयतामिति कीत॑येत॥मलछिकाशोककमलकदम्बोत्पलमा- 
लती ॥ कुब्जक॑ करवीरं च बाणमल्लानकुंकुमम्‌ ॥ सिनहुवारं च सर्वेषु मासेषु ऋमशः स्मृतम्‌ ॥ 
वाणम-नीलकुरण्टकश अम्लानम-महासहापुष्पण॥ सिन्‍्दुवारम-नेगुंण्डीुष्पमु।/ज पा कुछु म को सुंभमा लती- 
शतपत्रिका) ॥ यथालापजं प्रशस्तानि करवीरं च सबंदा ॥ एवं संवत्सर यावदुपोप्य विधिवन्नर॥। 
सत्री वा भकत्या कुमारी वा शिवावभ्यच्णे शक्तितः | ब्रतानते शयन द्द्यात्सवॉपस्करसंयुतम ॥ 
उमामहेंश्वर हेम॑ वृषभ च गवा सह ॥ स्थापयित्वा च शयने ब्राह्मणाय निवेदयत॥ अन्यान्यपि 











इस मंत्रसे शिवकी मोहोंका पूजन करना चाहिये। “ओम 
वासुदेव्ये: नप्त: ” इस मंत्रस गौरीके तथा ४ ओम श्रीक- 
ण्ठाय नमः ” इस मंत्रस शिवके केशॉका पूजन करवा 
चाहिये । “ ओम भीमोग्रसौम्यरूपिण्ये नमः ” इस मंत्रसे 
गौरीके और “ ओम ्‌ सर्वात्मने नमः ” इस मंत्रस शिवके 
शिरका पूजन करना चाहिये । इस प्रकार दोनोंका पूजन 
कर ठेनेके बाद, इनके सामने सोभाग्यकी आठ वस्तुओंका 
निवेदन करना चाहिये। मटर,कसूम; दूध,जीरा, ताछूपत्नः 
इंखका गाडा, छवण और हुस्तुम्बुरु इनको सोभाग्याष्टक 
कहते हैं । क्‍यों कि, ये वस्तु सौभाग्यक करनेवाली हैं। हे 
अरिन्दम | इस प्रकार दोनोंके सामने सोभाग्याष्रकका 
निवेदन करके, पीछे गोआगके परिमाणमात्र पानी पीक्षर 
भूमिपर शयन करना चाहिय । दूसरे दिन प्रातःकाल 
नित्य कर्मसे निवृत्त होकर साछठा वख और आभूषणोंसे 
ब्राह्मण दम्पतियोंका पूजन करे, पीछे सौभाग्याष्रकके साथ 
गौरी पावतीकी बनीहुईं सोनकी ब्रतमूर्तिको उस ब्राह्मणको 
दे दे और कहे कि, इस दानस छछिता देवी मुझपर प्रसन्न 
हो जाय इसीतरह चैत्रशुक्ला ठृतीयासे छेकर प्रतिमासकी 
शुक्का तृतीयाकों यह त्रत करना चाहिय।इसके प्राशन्न और 
दान-मत्रोंमें जो कुछ विशेषताएं हैं उन्हें भी कइ्ते हें। 
गोखामात्रतो पानी पहिलीमें तथा वशाखकों थोडासा 
गोबर खाकरही रहजाना चाहिये,ब्येष्ठमें मन्दारकें फूछ तथा 
अपषाहमें वेलपत्र, श्रावणमें थोडासा दही, भादोंमें कुशका 





गोमूत्र, पोषमें घी,माधमें कालेतिठ ओर फागुनमें पैचगव्य 
हछेना चाहिये। दानके समय यह कहना चाहिय कि,छछिता; 
विजया; भद्गा, भवानी; कुमुदा, शिवा, बापुदेवी, गौरी; 
मंगछा, कमला ,सती ये सब देवियाँ इस दानसे परमप्रय्न्न 
होजाये, पीछे दान देना चाहिये। इन नामॉमेंसे हरएक 
नामको ढेकर उसके पीछे “ प्रीयताम्‌ * रूगाना चाहिये 
तथा पहिल्म पहिली ओर दूसरेमे दूसरी देवीकी प्रसन्नताके 
लिये दान देना चाहिये, तथा उसीके छिय “४ प्रीयताम ? 
कहना चाहिये । चोेत्रमें मछिक्राके, वेशाखर्म अशोकके, 
ज्येष्ठम कमछके, आषाढम कदम्बके, श्रावणमें उत्पलके: 
भाद्पदम मालतीक, कारभे कुष्नकके, कार्तिकम करवीरके, 
अगहनमें वाणके, पौबमें अम्लानके, माधषमें कुंकुमके, ओर 
फागुन सिंघुरवारक फूलोंकों चढाना चाहिये। बाण नाम 
नीले कुरंटकका है | महासहाको अम्छान कहते हैं। निगु- 
ण्डीको सिम्घुवार कहते हैं । जपा, कुसुम, कोंसुभ, माढती 
और शतपत्रिका मिलजाय तो चढावे, नहीं तो रहने दू,पर 
करवीरकी कभी नागा न होनी चाहिये; उस तो अवश्यही 
'बवढाना चाहिय | स्त्री हों अथवा कुमारी हों, इस प्रकार 
एक सालतक ब्रत करती हुईं शक्तिके अनुसार शिवपुजन 
करती रहें, ब्रतकी समाप्रिषवर सब उपकरणोंके प्ताथ शय्या- 
दान करना चाहिये,उस्पर सोनेके शिव/गौरी पावती गऊ 
और विजार पधराकर ब्राह्मण को देना चाहिये जेसी शक्ति 


पानी, कारमें दृध, व'रस्िकिसें गायका आध्य/ मागशीषेसेहो उसके: अहुसार दूरूरी २ भी वस्तु जोडेस देनी चाहियें. 


(८४) 


अाडााखडएा पडः दामाद कराए छत अल उछ: कर 5 
ध्य्ड्ड के 
4 हक नवीन 2६7५: «2 प्रखापफज फर्क खाकर पधर राधा मामा 
उन 7 पड उजन न मननानमनमपन-+ जलन न कननम« न ++ 





ब्रतराजः । . तृतीया- 


जोक न्य्य््य्य््य्य्य््य््््स्टःःडडःड 55520: अाबबा 





्श्श््य्श्क्््ल्ल्स्बख्शख्ञ् 





अकत्न० डक फंतजजिका 
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30, % क. हद  “ पह ३४ 

हि ४ ॥6॥ ' छा छः 

शा व | ५ जए 


पेदा: आप मिथ्वनात्यम्वरादिनिः ॥ घान्यालड्रारगोदानेरभ्यच् :44 ॥ 2वित्तशाठ्ेन 
न ; प् पत* वजन रे; ग्झश्यनब्रलम।॥ सर. वबान्कामानवाप्नोति 
रहितः पययेजपदिस्मणः ॥ एवं करोति यः सम्यक्सोमाग्यशयनबतम॥ । 

"अं कील ञ आर पे जि खाल + 
पदमानन्त्यमश्नते॥फलस्येकस्य च॒ त्यागमेतत्कुबंन्‌ समाचरेत।।यत्र कीर्ति समाप्नोति अतिमासं 









तराधिप ॥ सौभाग्यारोग्यरूपायुरवश्वालड्रारभूषणे ॥ न वियुक्ता भवेद्राजन्नब्दाबुद्शतत्रयम्‌॥ 


यस्ठ द्वादशवर्षाणि सोमाग्यशयनब्रतम।करोति सत्त चाष्टों वा शऔीकण्ठभवने5मरेः ॥ पज्यमानो 

वसेत्सम्यग्यावत्कत्पायुतत्रयम्‌ ॥ नारी वा कुरुते भवत्या कुमारी वा नरेश्वर ॥ सापि तत्फल- 

माप्नोति देव्यातुगहलालिता ॥ शृणुयादपि यश्वेव प्रद्द्यादयवा मतिम्‌ ॥ सोषि विद्याधरो 

भूत्वा स्वगगलोकें चिर॑ बसेत्‌॥ इति मत्स्यपुराणे सौमाग्यशयनत्रतम्‌ ॥ क्‍ 
अत्रेव गौया दोलोत्सव३ ॥ 


तदुक्त हेमाद्ों देवीपुराणे--चेत्रशुकुत॒तीयायां गोरीमीश्वरसंयुताम्‌ ॥ संपूज्य दोलोत्सवर्क . 
कुयात्रारी शुभेप्छुका।तथा च निर्णयामते--ठ्ृतीयायां यजेदेदी शह्डरेण समन्विताम्‌ ॥ कुंकुमा- 


गरुकपूरमणिवख्रत्धगचिताम्‌ ।। सुगन्धिपु ष््‌ धूपेश्च दमनेन न 
शेवोमातृष्टये सदा॥ रातौ जागरण कुययोत्मातर्देया तु दक्षिणा।सोभाग्याय सदा सह 


विशेषतः ॥ तत आन्दोलयेद्वत्स 
।भिः कार्यो 





उसुखेप्साने॥॥ इयं च परा आह्या।मुहरतमातसस्वेषि दिने गौरीततं परे इति माधवोक्तेः ॥ इय॑ 


7 मन्वादिः 


॥ कृत॑ श्राद्ध विधानेन मन्वादिषु युयादिष ॥ हायनानि द्विसाहस्॑ पितृणांत॒त्तिद 


बत्‌ ॥ अधिमालेपि इदं कर्तव्यम्‌ ॥ अन्न . पिप्डदा्न नास्ति ॥ अथ चेनजुकलुलीयायां 


नोर्थ गत पात्र उस | इश्वर उवाच॥ साधु क्ंतं त्द्यां 
नोरंधक्वतः सताम्‌ ॥१॥ त एवं विश्वभोक्तारो 


पके शिवा आओ आह आजा आज जप रारआमतालकल्छ भी घान्य अलंकार आदि अनेक धन 
चर्योसे आाह्मण ब्राह्मणीको पूजना चाहिये। वित्तके दानमें 
ठवा न होनी चाहिये, निःसन्देह होकर करना चाहिये । 
गी इस प्रकार भढ्वीभांवि सौभाग्यशयनका ब्रत करती हे 
ऐ सब कामोंको ग्राप्त हो, अन्तमें मोक्षकी पद्वीको प्राप्त 
जाती है । किसी एक फलका त्याग करके ब्रत करना 
हिये । हे राजन्‌ ! जो इस ब्रतको प्रतिमास के रती है वो 
गिभाग्य, आरोग्य, रूप, आयु, वल्च, अरुकार और भूष- 
सि एक अब वर्षतक कभी भी वियुक्त नहीं होती । जो 
गोइ बारह व्षतक सौभाग्यशयनीका ब्रत करंगी अथवा 
' वध वा आठ वर्षतक इस त्रतको करती रही वो देवतोंसे 
[ज़त हुईं तीस हजार कल्प केलासमें निवास करेंगी । 
( राजन्‌ जो स्त्री वा कुमारी भक्तिके साथ इस ब्रतकों 
ररती है बह भी भगवतीके अनुपहसे पू्वोक्त फलको पाती 
(। जो कोइ इस ब्रतकी कथाकों छुनगा अथवा जो कोई 
(सञजरतके करनेकी सलाहदेगा वहभी विद्याधर होकर चिर- 
अलतक स्वगम वास करैगा। गौरीके दोढाका उत्सव-इसी 
पृततीयाक्ों गौरीके हिंडोलेका उत्सव होता हे।इसी विषयपर 
अ ५ “रोभागवतकों छेकर कहा है कि, जिस खीको 
ने ुभकी इच्छा हो उसे चैत्रगुक्ल तृतीयाक दिन गौरी 
3र्तेकाी पूजन करके डोछेका उत्सव करना घाहिये। 





... ब्लेड फर्म 7-८ काशयों घरुपीठसाश्रित्यरिथितां पाव॑ती प्रति शिवोत्ति: काशी 


निणयामृतमें भी लिखा हुआ है कि, चैत्र शुक्ला तृती 
याके दिन, कुंकुप्, अगर, कपूर, मणि, वस्य, माला, 
छुगन्धित पुष्प, धूप और कख्यूरीस गौरीसहित शिवका 
पूजन करना चाहिये, पीछे शिवके सहित पार्बतीजीका 
डोला निकाछुना चाहिये, इनकी प्रसन्नताके छिये रातंकौ 
जागरण करके भक्तिपू्ण पद गाने चाहिये, प्रातःकाह 
दक्षिणा देनी चाहिये, जो पुत्रछ्ुुखकी इच्छा करती हों 
जथवा जो सोभाग्य चाहें उन्हें अवश्य ही इस ब्रतको करनी 
चाहिये | यहां उद्यव्यापिनी तृतीयाका प्रहण है क्योंकि, 
माधवाचायका ऐसा मत है कि चौये, उदयकालम यदि 
एक मुहते भी तृतीया हो तो, उसीमें ये सब काये करते 
चाहिये,ये मम्वादि विधि हैं,इसके छिय लिखा हुआ है कि, 
सन्‍्वादि और युगादि तिथिमें विधानके साथ किया हुआ 
श्राद्ध दोहजार वर्षतक पिन्रीश्वरों ही तृप्ति करताहैअधिमासमे 
भी इसे करे, पर अधिमासमें पिण्डदानका विधान नहींहे। 
भनोरथ तृतीयाका ब्रत-चैत्र शुक्छा तृतीयाको मनोरथ तृती- 
याका ज्त होता है एक दिन महादेवजी पावती जीसे बोड़े 
कि. है उम्र ! तुमने परिभ्रह करते हुए यह बहुत ही. अच्छा 
किया जो सज्ञनोंकों मनोरथपूण करनेवाले धम्रपीठको तुमने 
भहण किया है ॥| १॥ जो मानव विश्वक्के भोगनेवाली तेरा 
पज़न करते हैं. बेही सब वस्तुके भोगनेवाले और विश्वके 





खडे। २ पश्चयन्तमिद्म। 


देवि कृतवत्या परिग्रहम्‌॥ अस्येह धर्मपीठस्य 
विश्वमान्यास्त एवं हि॥ ये त्वां विश्वश्च॒जामत्र 





अर्थ. अर 2/2282:20 5 44900 46:07 % 227 7:% 230: 72602: कक" 2 248 74:78 84 00220 7 कक २० अर टक्कर व /424 कह कर 2000 25५, 42 20422 # 0 # 00200 4242 27320 40 760 82620 277: %; 


पूजयिष्यन्ति मानवाः ॥२॥ विश्वे विश्वद्धजे विश्वस्थित्युत्पत्तिल्यप्रदे ॥ 
भविष्यन्त्यमलात्मकाः ॥ ३ ॥ मनोरथद्तीयायां यस्ते भक्ति विधास्यत् 








नरास्त्वद्चकाश्ात्र 


है ॥ 
[न पक मा न] ् (कर कह मिकेज ही 
; | । # पं इन्फण ५ हर | एच ९ 







भविन्री मदलुअहात ॥४॥ नारी वा पुरुषों वापि त्वेद़्ताचरफ (ल््रिये॥ मनोर्थानि है ऋप्य जान 
स्‍्ले च लप्य्यत ॥५॥ देव्युवाच॥ मनोरथतृतीयाया बते कीदक्रथानकमाकिंफल के! कृतं नाथ 


कथयेतत्कृपां कुछ ॥%॥ इश्वर उदाच ॥ शरण देवि यथा पृष्ठ मवत्या मबतारिणि ॥ मनोरथव्रतं 
चेतदगद्मादगुह्मतर परम्‌ ॥७॥ पुलोमतनया पूर्व तताप परम तपः॥ कंचिन्मचोरथ माप्तुंन चाप 
तपसः फलम।८॥अपूजयत्ततो मां सा भक्त्या परमया मसुदा॥गीतेन सरहस्येन कछकण्ठी कलेन 
हि ॥९॥ तद्ाननातिसन्त॒ष्टो मुदुना मधुरेण च ॥ खुतालेन छुरद्रण घातुमाशकलावता ॥ १० ॥ 
प्रोवाच त्व॑ वर॑ बूहि प्रसन्नोस्मि पुलोमजे | अनेन च झुगीतेन त्वनया लिड्भडपूजया ॥ ११॥ 
पुलोमजोवाच ॥ यदि असन्नो देवश तदा यो में मनोरथः॥ ते प्रय महादेव महादेवी- 
महाभिय ॥१२॥ सर्वेदिवेषु यो मात्यः सर्वदेवेषु सुन्दरः ॥ यायजूकेष सर्वे यः श्रेष्ठ: सोघ्तु 
मे पति; ॥ १३॥ यथामिलषितं रूप यथामिलषित सुखम्‌ ॥ यथामिलधित॑ चार: पसन्नों देहि 
में भव॥१४॥यदा यदा च पत्या मे सड़ः स्याद्ुत्लुखेच्छया ॥ तदा तदा च त॑ देह त्यकत्वाधन्य 
देहमाप्लुयाम्‌ ॥ १५ ॥ सदा च॒ लिड्रपूजायां मम मक्तिरतुत्तमा ॥ भव चूयाद्धवहर जरा- 
मरणहारिणी ॥ १६॥ नतुव्य॑येषि वेधव्य क्षणमात्रमपीह न॥ मम भावि महादेव पातित्रत्य॑ च 


यातु मा ॥ १७ ॥ रुकन्द उवाच ॥ इमं मनोरथ तसया। पोलोम्याः पुरसूदन ॥ समाकण्ये क्षण 


ऐप 


स्थित्वा प्रादेशों विस्मयान्वितः ॥ १८ ॥ इंश्वर उबाच ॥ पुलोमकन्ये यश्चेष त्वयाउकारि मनो- 
रथः ॥ लप्ध्यसे ब्रतचयातस्तत्कुरुष्ष जितेश्द्रया ॥ १९॥ मनोरथतृतीयायाश्वरणेन भवि- 


च्यति ॥ तः बक्ष्ये तद्वियेहि 


बन्दंनीय्‌ होते हैं॥ २॥ हे विश्वात्मक ! हे विश्वको भोगने- 

वाली ! हे संसारकी उत्पत्ति स्थिति और प्ररूयकी माहि- 

'किनि ! तेरा पूजन करनेसे मनुष्योंका अन्तरात्मा शुद्ध हो 
घर 6 कप ओर 

जाता है ॥ ३॥ जो कोई मनोरथ तृतीयाके दिन तेरी भक्ति 

करेगा मेरी कृपास उसके मनोरथकी सिद्धि अवश्य ही 





होवेगी ॥ ४ ॥ हे प्यारी ! स्री हो वा पुरुष हो, तेरे ब्रदको 


करके यहां सनोरथोंको पाता हे तथा अन्त उसे ज्ञान प्राप्त 
होता हैं ॥| ५ ॥ इतना सुनकर पावतीजी पूछने छगीं कि, 
मनोरथ दुतीयाका त्रत कैसे होता है तथा उसकी कथा कसी 
हैं, एवम्‌ केस यह ब्रत किया जाता हे तथा इसका फल 
क्या है ! यह तो कृपा करके बतलाइये ॥ ६ ॥ श्री गौरीके 
ऐसे वचन छुनकर शिवजी कहने छगे कि, हे ससारसे 
पारल्गानेवाली ! तुमने जो पूछा है, उसे घुनो, यह म वो- 
रथ देनवाला ब्रत है। गोपनीयसे भी परम गोपनीय हे 
| ७ ॥ एकवार पुलोमाकी छुयोग्य पुन्नीन किसी सनोर- 
थको पानेके लिये कठिन तप किया। पर उसे वो फल 
“नहीं मिछा ॥८॥ इसक पीछे उसने परम प्रसन्नवाके साथ 
_मक्तिसावसे मेरा ;पूजन किया तथा कोयलकेसे कंठसे मुझे 
अनेकों रहस्य पूणे गाने सुना० ॥ ९॥ वो साधारणगान 
' नहीं था, वो कोमछ ओर मधुर था, छय) ताछू मात्रा आ- 
दिस परिपूण था॥ १०॥ मे प्रसन्न होकर बोला कि; कया 
मांगती हैं, मांग । में तेरी लिंगपूजा और इस गानेसे परम 


यथोद्तिम्‌ ॥ २० ॥ ते 


महासोभाग्यदेन 
प्रसन्ञ हुआ है ॥ ११ ॥ पुलछोमाक्ी पुत्री बोढी कि, हे पावे- 
तीके प्यारे महादेव ! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं वो मरे 
मनोरथोंको पूराकरों | १२॥ सब देवोंसें जो मान्य हो 
तथा सब द्वोमें जो सुन्दर हो तथा यज्ञ करनेबाढोंमें जो 
सर्वेश्रष्ठ हो, वो ही मेरा पति हो ॥ १३ ॥ है मव ! आप 
प्रसन्न होकर मुझे जेसा में चाहूं वेसा रूप सुख ओर आयु 
प्रदान करें ॥ १४॥ हृदयके सुख पहुँचानेकी इच्छासे,जब 
जब मेरा पतिक साथ संग हो, तब बब में, उस देहको 
छोडऋर दूसरे देहको पाजाऊं ॥ १० ॥ है भव हर !! 
जरा और :मरणको नाश करनेवाढी मरी तो अकोकिक 
भक्ति, आपकी लिंगपूजामें हो || १६ ॥ हे महादेव ! पतिके 
व्यय होजानेपर भी में एकक्षण सरभी विधवा न होऊं तथा 
भविष्यका मेरा पातिब्रत भी अक्षुण्ण बनारहे ॥ १७ || इत- 
नी कथा सुना कर स्कन्द कहने छगे कि; पुरसूदन शिव 
पुलोमजाके इन मनोरथोंको सुनकर विस्मयके मारे एक 
क्षण तो रुकेरहे ॥ १८ ॥ फिर बोले-हे पुछोमज ! जो तूते 
मनोरथ कियाहें वह अवध्य ही तुझे प्राप्त होगा पर प्राप्त 
होगा श्रतकरनेसे ॥ १९ ॥ इस कारण तू जितेनिद्रय होकर 
व्रत कर, मनोरथ पृतीयाके त्रत करनेसे वो होगा में उस 
ब्रदकी विधि बतढाता हूं, जेसी बताऊं वेसीही करना 
॥२०॥ है बाढ़े | उस सौभाग्यक देनेवाले ब़्तके करते पर 


१ कोकिछाया मधुरस्वरतुल्यनत्यथेः । ९ तानमानकलावतेत्यर्थः । 





एष्षलकतातताप्ाततातदालायतानातादाताता। 
कि नमन टन रन नलनन मन 


बे |! अवब्य भविता बाले नव चर्च मनोरथः ॥२१॥ पुलोमकन घोवाच ॥ कारुण्यवारिषि श़म्प्ो 
प्रणतम्राणिसवेद ॥ किंनाना चाथ का शक्ति; का एज्या तत्र देवता ॥ २९ कदा च तद्विधा- 
तत्यमिनिकर्तव्यता च का ॥ इत्याकर्ण्य शिवों वाक्य तां ठु भणिजगाद ह।इ-बर उवाचा। मनो- 
रथतृतीयाया ब्रतं पोलोमि तच्छुमम्‌ ॥ पूज्या विश्वशुजा गोरी शुजविंशतिशालिनी ह ॥ २४ ॥ 
वरदाभयहस्तश साक्षसूत्र समोदकः ॥ दुव्याः पुरश्ताद्रतिना आशाविनायकः ॥ २५) 
चतर्भजश्नासनेत्रः सर्वसिद्धिकरः अछ्ुः ॥ चेत्रशुक्रद्वितीया याँ कृत्वा वें दन्‍्तधावनम॥३)३। साय- 
न्‍्तनीं च निर्वेत्य नातित॒प्त्या खुजिक्रियाम॥नियमं चेति गृद्दीयाजितऋरोधो जितेन्द्रियः । (२० 
संत्यक्तास्पृश्यसंस्पशःशुचिस्तद्तमानसः ।प्रातब्रत चरिष्यामे मातविश्वश्च॒ुजेप्न घे। (२८॥ विधेहि 
तत्र साब्रिध्यं मन्मनोर्थसिद्धये ॥ नियम चेति संग्रह्म स्वपेद्रात्रों शुभ स्मरत्‌॥ भोतंरुत्थाय 
मेधावी विधायावश्यक विधिम्‌ ॥२९॥ शौचमाचमन कृत्वा दन्तकाष्टं समाददेत्‌ ॥३०॥ अशोक 
वृक्षस्य श॒र्भ सवेशोकनिशातनम्‌॥ नित्यन्तनं च॑ निष्पाद्य विधि विधिविदां वर ॥३१॥ स्वात्वा 
शुद्धाम्बरः साय॑ गोरीपूजां समाचरेत्‌॥ आदो विनायक पूज्य पृतप्रात्रिवेद्य च॥ ३२९ ॥ ततो 
चयेद्रिश्रछ जामशोककुसमेः शुभ! ॥ अशोकवातिनिवेद्यधूपश्चागरुसंभवः ॥३ रे॥ कुंकुमेनाललि- 
प्यादावेकसुफ ततश्वरेव ॥ अशोकवर्तिसहितेपृतप्रेमनोहरेः॥३४॥ एवं चेत्रतृतीयायां व्यतीतायां 
पुलोमजे ॥ राधादिफाट्गुनानतासु ततीयासु ब्रत॑ चरेत ॥३५॥ क्रमेण दन्तकाष्ठाने कथयाप्रि 
तवानघे ॥ अत॒लेपनवस्तुनि छुखुमानि तथेव च ॥ ३६॥ नवेद्यानि गजासश्यस्य देव्याश्रापि 
शुभवले ॥ अन्नानि चेकमक्तस्य शरण तानि फलाप्तये ॥ ३७॥ जम्ब्वपामागंखदिरिजातीचूत- 





लत... 








कदम्बकम्‌ ॥ प्लक्षोदुम्बरखजूरीबीजप्रीसदाडिमी॥२८॥ दन्तकाष्ठद्रमा एते ब्रतिनः 


तेरे मनोरथ अवश्य ही पूर हो जायेंगे | २० ॥ यह सुनकर 


शरणोंके रक्षक ! सर्वस्वके दाता शिव देव | उस बतक' 


हाथमें लिये हुए आशा विनायक हैं, इनका देवीसे पहिल 


शुक्ला ट्वितीयाको सोती बार दातुन करे॥ २६॥ तथा 


सायंकालको हलका भोजन करके क्रोध रहित जितेन्द्रिय 
होकर: नियमको प्रहण करे ४२७ ॥ ट्वितीयाकी रातको ही | 
अस्पृश्योंक स्पशको छोड़े पवित्र वाके साथ सगवतीमें मनको | 
विश्वभुज माता में प्रातःझाल 


लगाकर कहे कि, हे 


र है कि, हे अनधे ! 
पर व्रत करूँगा | २८।। आप सर मनोरथ सिद्ध करने 


लिये 8० लि 5 
लि ह अपनी संनिधि ८ । इस प्रकार नियमका ग्रहण करके 
:भकता अ्मरण करता 


के 


हुआ सो जाय ॥ २९॥ औि-+-+-++7 ५ ॥ अत करने / पूरी, करने 


समुदाहता॥ 





| वाल बुद्धिमानको चाहिये कि प्रातःकाछ उठ, आवश्यक 
पुलोमाकी कन्या कहनेलगी कि, हे करुणाके खजाने | है | 


कारय्योंस निवृत्त होकर, शौच आचमन करके दातुन करे 


६ है स ब्रदक' | ॥ ३० ।! अशोक वृक्षकी दातुन उत्तम है।यह सब शोकोंका 
क्या नाम हैं, उसमें क्‍या शक्ति हैं; उसमे किस देवताका | 

५ ३ ४ ध 
पूजन होता हैं॥॥ २९॥ कब उस ब्रतको एवम्‌ केसे करना | की विधियोंका संपादन करके ॥ ३१॥ ख्लान करके पवित्र 
हि थे है के ३ ३ ः के, | 
पे ः हर कर एस गम कक कहन लग | व्योंको धारण करे, फिर पूजाओंसे विनायकका पूजन 
क्‌ ॥ २३ | है पुलोमज ! मनोरथ तृतीयाका ब्रत बडा। 3 मा शी 

हि | करके. गौरीका पूजन करे ॥ ३२॥ इस क्ृत्यके पीछे अशो 

अच्छा हैं इसमें चारों ओर बीस भुजावाली गौरीका पूजन | हि काल 
करता चाहिये ॥ २४ || ठीक देवीके सामने ही आशा | 
विचायक गणेशका पूजन करना चाहिये, ये गणश वरके | 


दनवाल, हाथमे अभय हियि हुए अक्षसूत्र पहिने हुए लड्डू । 


नाश करती हे विधि जाननेवालेको उचित है कि वो,नित्य- 


कके फूछ और अशोकक नेवेद्य एवम्‌ अगरु के धूपसे विश्र 
कक ७ भा, २३ 
भुजादबीका पूजन करे ॥ १३॥ कुंकुमसे देवीका छेपन 
श च् 
करना चाहिये । ब्रतीको चाहिये कि, उन्हीं पूआ एवम्‌ 


र नेवे्य आद्का ही एकवार, आहार करे ॥ ३४ ॥ हे पुलो- 
पूजन करना चाहिये-॥२५॥ ये चार भुजावाले और | 


कप ३ पक कं 8 ; 8 3 
सुन्दर नंत्रवाल हैँ एवम्‌ सव सिद्धिक करनेवाले हैं । चेत्र | खकीसे लेकर फार्गुनकी तृतीया तक ब्रत करना चाहिये है 


मजे ! इस प्रकार चेनत्रकी तृतीयाकों व्यतीत करके वेशा- 


निष्पाप पुलोमजे ! जिन जिन तृतीयाओंमें जिस जिम 
पेड़की दातुन एवम्‌ दंवीके छेपकी वस्तु और जिन जिन 


अर २. उस ष्श्6 का ५ 
वक्षोंके फू आते हैं, वह भी सै तुझे बताताहूं ॥ ३६॥ 
ह शुभ्रत्नते | विनायक तथा दवीके नेबेद्य तथा एकबार 


भोजन करनवालिके अन्न भी फल प्राप्तिके लिये बताता हूँ तू 


_ | सावधान होकर सुन ॥ ३७॥ जामुत, अपामाग, खदिर, 


जाती, चूत ( आस ) कदम्ब, पुक्ष, उदुम्बर, खजूर, बीज- 


पूरी, अनार ।| ३८ ॥ ये ब्र्त करनेवाले पुरुषोंकी दातुल 
क्‍णणणणणणणणणाणाणाााा कमल: अमन मिलनी किन जल कक क 


हजाइत 5६ » 


ब्रैतानि, ] भाषादीकासमेतः । 


के चना मम 
2006 60 20 60 2000 





सिन्द्राशुरूकस्त्री चरदन रक्तचन्दनम्‌ ॥ श२े९ ॥ गोरोचर्न देवदारूं प्माक्ष च निशाहयम 
प्रीत्यालुलेपन बाले यक्षरदेम सेमवम्‌ ॥४०॥ सर्वेषामप्यलामे च मशस्तो यक्षकदमः ॥ कस्तू- 
रिकाया दो भागो दो भागों छुटकुम स्थ च॥४ ? प्रचन्दनत्ण बयो जाग। राशिनस्त्दक एव हि॥ 
यक्षकद्म इत्येष सन्‍व्तसुरयछभाः ॥४२॥ अवुलिप्याथ कुछुमेरचंयेद्॒ब्चि तान्‍ज्यपि ॥ पाटला- 
मलछिकापमकेतकीकरवीरकेः ॥ ४३॥ उत्पलेराजचपेश्व नन्यावर्तेद्ष जतिलिः ॥ कुमारीशिः 
काणिकारैरलामे तच्छदेः सह ॥ ४४ ॥ सखुगन्धिनिः अखूनोबेः सर्वालामेषपि पूजयेत्‌ ॥ करम्भो 
दधिभक्तं च सचूतरसमण्डकाः ॥ ४५॥ फेणीका वट्कात्रेव पायसं च सशकेरव्‌ ॥ समुहूं 
सपृतं भक्त कार्त्तिके विनिवेदयेत्‌ ॥४७॥ इन्देरिकाश्व लड़्डूका माथे लंपसिका शुभा ॥ छष्टिकाः 
श्करागर्भाः सर्पिषा परिद्:घित|:॥ ४७ ॥ निवेद्याः फाल्यने देव्ये सार्ू विश्वजिता झुदा ॥ 
निवेदयेद्यदन्न॑ हि एकभक्तेएपि तत्स्मुतम्‌ ॥ ४८॥ अन्यत्रिवद्य सम्मूटों छखानोन्यत्पतद्धः ॥ 
प्रतिमास ततीयायामेवमाराध्य वत्सरम्‌ ॥ ४९॥ ब्रतसंदृर्तेये कुय्यात्स्थण्डिलेध्रिसमचेनम्‌॥ 
जातवेदसमंत्रण तिलाज्यद्रविणन च ॥५०॥ शतमष्ठाषिकं होम॑ कारयेद्धिधिना ब्रती ॥ संदव नक्ते 
पूजोक्ता सदा नक्ते तु भोजनम्‌ ॥ ५१ ॥ नक्त एव हि होमो$यं नत्त एव क्षमापनम्‌ ॥ गृहाण पूजां 
मे भक्तया मातर्विनज्नजिता सह ॥ ५२ ॥ नमोस्तु ले विश्वउुज प्रयाशु मनोरथम्‌ ॥ नमो विश्न- 
कूते तुभ्यं नम आशाविनायक॥ ५३॥ व विश्वश्षुजया साकू मम देहि मनोरथम॥एतों मंत्रों 
समुाये पूज्यों गोरीविनायकों ॥ ५४ ॥ व्रतक्षमापने देयः पयड्ूस्तूलिकान्वेतः ॥ उपधान्य 














| के भी लिये है | ४८ ॥ जो त्रती अपने नेवेद्स इतरका 
माघ और फार्गुन इन दोनों मांसोंकी तीजोंको अनारकी | भोजन करता हैं वो उसका अधम्पतन होवा हैं. कही हुई 
ही दातुन करनी चाहिय ।|॒ सिन्दूर, अगुरु, कस्तूरी,चद्न; विधिसे प्रत्यक मासकी तृतीयाका न्रवत करना चाहिये ॥ 
रक्तचम्द्न || ३९ ॥ गोरोचन, देवदारु, पद्म, अक्ष; दोनों | इस प्रकार एक सालूतक करना चाहिए ॥ ४९ ॥ ब्रतकी 


हल्दी, ये प्रत्येकमासमें ऋमसे अनुरूपन होते हैं। द्वे वाले ! | पूर्तिक छिय पिछ, आज्य आदिसे “ओधू जातावेद्स ” इस 
प्रीतिका अनुल़ेपन यक्ष कदसका है ॥ ४० ॥ सबके अभाव 


| मन्त्रस स्थण्डिल् पर अश्लिहोत्र करना चाहिये ॥ ५० ॥ 
में यह यक्षकदम ही प्रशस्त है, दो अश कस्तूरी और दो | ओम जातबेद्स सुनवास सोममू; अरातीयवो निदृह्मति 
अंश कुकुम ॥ ४१॥ तीन अश चन्दून,। एक अश कपूर, 


| वेद: स नः पषद्ति दुर्गाणि विश्वा नावेब सिन्धु दुरिता- 


इन सबको मिछानेसे देवताओंका प्यारा यक्षकदंमस बन- | झभिरप में जातवेदा अभिके लिय सोमका सेवन करता 
2] २.३ अर ४ 
जाता है, जिसे सब देवता (प्याय समझते हैं ॥ ४२॥ इन 


| हैं, वो मेरे वेरियोंके धनको जछा रहा हें, एवम्‌ मुझे मेरी 
कप रु हक | जन ज्ड के ब्ध. 
वस्तुओंका लेपन करके पुष्पोंको चढ़ावे उन फूलॉंकों भी ' आपत्तियोंस इस अकार पारलछगा रहा हे, जैसे चतुर मल्नाह 
बताये देते हैं--पाटछ, चमेली, कमर) केतकी, करवीर 


। समुद्र नावकों पार छेजाता है ।। विधिक साथ १०८वार 
॥ ४३ ॥ उत्पढराज, चम्पा जुही, जाती, कुमारी और 
कर्णिकारक फूछोंसे चेत्रादि म।समें कमसे पूजन करें + यदि 


, हवन करना चाहिये, सदा रावबको पूजा और रातको ही 

| भोजन करना चाहिये ५१ ॥ रावको ही हवन करना 
फूल न मिल्लें तो उनके पात्रों सेही पूजन कर ढेना चाहिए । | चाहिये। एवम्‌ रातकोही क्षुमापनव करना चाहिये ॥ हे- 
॥ ४४ ॥ यदि बताये हुये वृक्षोके न तो फूछ ही मिले | मातः | भक्तिकें साथ जो सर तेरी पूजा कर रहा हूं; उसे 
और न पत्ते ही मिले तो कोई भी सुगंधित फूछ हो उसीस | विनायकके साथ ग्रहण कर॥ ५९॥। है विश्वभुजे ! तेरे 
पूजनकर देना चाहिये।॥ करंभ, दही, भात, आमका रस, | छिये नमस्कार है, मरे मनोरथोंको शीघ्नही पूरा कर, हे-- 
प्राड, ॥ ४५॥ फेणीका बडा, शक्कर पडी हुई खीर, मूंग | विश्वश : है आशाविनायक ! तेरे छिये बारम्बार नमस्कार 


और घीसहित भाव, ये सब कार्तिक मासके नेवेद्यहें।४६ ॥ | है ॥ ५३ ॥ हैं विनायक | आप विश्व्ुुजाके साथ मेरे मनो 
जलेबी, रूइडू, हछ॒वा, तथा घीके मोमन दी हुई पैसों 


| रथोंको पूरा करो । इन सन्त्रोंको कहकर योरी और विना- 

पूडी | ४७॥ यह नेवेद्य फांगुनके महीनेंम विनायक और | यककी पूजा कर देनी चाहिये ॥ ५४॥ ज़तके अपराधोंको 
कप ९ रे 0 क्षु न दि हिये की हर 

माताके सामने निवेदन करना चाहिये; यही एक भक्तवाले | क्षमा करानेके लिये त्रतीको चाहिये कि, सर्वोपकरणसद्दित 


7 


हैँ । चैत्रकीस लेकर एक एकमें एक एक बृक्षकी तथा | 















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>. >प जया ययान-आ भड संमम्यायं महक. 22). "०. ाथमका, पान रमनकममा+आनक न 
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१ पूरिका 5 


ब्रलराजई |. हि पल कल है 


तृतीया* 


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॥ 


समायक्तो दीपीदर्घगसंयुतः ॥५५॥ आचार्य च सप्त्नीक पर्यडे डपवेश्य के ॥ त्र्ती सम चयेदसेः ; 
करकर्णविभषर्णः ॥ ५६ ॥ छुगन्ध चन्दनेमोल्येदेक्षिणाभिमुदान्वितः पे ॥ दुद्यात्ययस्विनीं गां 

चब्रतस्थ परिपर्तेयमे ॥ ५७ ॥ तथोपभोगवस्तूति च्छत्रोपानत्कम ण्डंलून्‌ ॥ मनोरथतृतीयाया 
व्रतमतन्मया क्ुतम्‌ ॥ ४५९ ॥ न्यूनातिरिक्त संपूणमेतद्स्तु भवहिरा । इत्याचाथ समा४च्छय 
तथेत्यक्तथ्न तेन वें ॥ ५९ ॥ आसीमान्तमल॒ब्रज्य दुत्वान्येभ्योषि शाक्तितः ॥ नक्त समाचरेत्‌ 
पोष्येः साऊू सुभीतमानसः ॥ ६० ॥ आतश्चतुथ्यां संभोज्य चतुरश्च कुमारकान्‌ ॥ अभ्यच्य 
गन्धमाल्याबेद्रोदशापि कुमारिकाः ॥ ९१ ॥ एवं संपूर्णतां याति अतमेतत्छानिमलम्‌ ॥ कांग 
मनोरथाबाप्त्ये सर्वेरेतद्गरतं शुभम्‌ ॥ ६२॥ पत्नीं मनोरमां कुल्यां मनोवृत्यलुसाश्णीम्‌ ॥ 
तारिणी इःखरसंसारसागरस्य ण्तिब्रताम्‌ ॥ ६३ ॥ कुवेन्नेतद्वतं वष कुमारः आप्लुयात्स्फुटम्‌॥ 
कुमारी पतिमामोति स्वाठ्य सर्वशणाधिकम्‌ ॥ ९४॥ खुबासिनी लमेत्पुत्नान्‌ पत्थुः सोख्यम+ 
खण्डितम्‌ ॥ दुर्भगा सुमगा स्याच्व धनाठया स्थादरिद्रिणी ॥ ९५॥ विधवापि न वेधव्स पुन- 
राष्तोति कुलाबिद ॥ गुविणी च झुमे पुत्र लभते सावेरायुषम्‌ ॥ ६६॥ ब्राह्मणों लभते विद्यां 
सर्वतौमाग्यदायिनी ॥ राज्यश्रष्टो लमेद्राज्य वेश्यों लाम॑ च विन्दति ॥ ६७ ॥ चिल्तित॑ 
लगते शुद्रो ढतस्थास्थ निषेवणात्‌ ॥ घर्माथों धर्ममाप्रोति धनारथी धनमाप्लुयात्‌ ॥ ६८॥ 
कामी कामानवाशेति मोक्षार्थी मोक्षमाप्ठुयात । यो यो मनोरथों यश्य स ते ते विन्दते 
घ्रवम ॥ ६५ ॥ मनोरथतृतीयाया ब्रतस्य चरणाद्रती ॥ ७० ॥ इंते श्रीस्कन्दपुराणे काशीः 
खण्डे उत्तराथें अशीतितमेष्ध्याये चेत्रशुक्ततीयायां मनोरथतृतीयात्रताख्यान संपूर्णम्‌ ॥ 


शय्यादान करें, जिसपर तकिया दर्पण आदि सब कुछ हैं | मनको आलन-नद देनेवाली तथा सनके अनुसार चलनेवाढी 
[०० यही ब्रतीका कतेत्य है कि, आचायय और उनकी [ह/खसंसारक समुद्रस पार छंग़ानेबाी कुछी न तथा पति- 
पत्नी दोनोंको पछड्धपर बिठाकर, वस्र तथा हाथ और, [वंताकों ॥ ६३ ॥ वो कुमार प्राप्त करता हैं, जो एक साह 
कानोंके आभूषणोंस उनका पूजन करे ॥ ५६ ॥ सुगन्ध [तक इस ब्रतको करता है, तथा इस ब्रतको एक खाक 

न्दन माहढाएँ एवम्‌ दूध देनेवाली गो और दक्षिणाएँ ये | करनेबाली कुमारी स्वंगुण सम्पन्न धनी प॒तिको पाजातीहै 
सब चीजें आनन्दके साथ त्रतकी पूर्तिक छिए दे | ५७ ॥ |॥६४॥ सुवासिनी ख्रीको पुत्र और पतिका अखण्डित 


तेसे ही उपभोगकी अन्य वस्तुएं छत्र, जूते, कमण्डलु इनको | सौख्य प्राप्त होता है । इस ब्रतके प्रभावसे दुर्गा सुभगा 
भी आचाय्यकों देना चाहिये, इसके पीछे आचाय्यंस |और द्रिद्रा धन्ात्य बनजाती है ॥६५॥ विधवामी एिः 
पूछना चाहिये कि. मनोरथ तृतीयाका जो मेने ब्रत किया | कभी वेधव्यक्रो प्राप्त नहीं होती । गर्मिणीको अच्छा,चिर- 
हे | 5८ ॥| इससे जो कमी वेशी हुई द्दो वो आपके वचत्तों | जीबी पुत्र मिलता हे ॥ ६६ |॥ ब्राह्मगको सब सोभ/ग्योंको 
से पूरी होजाय | आवचाय्यंको भी चाहिये कि, कह दे कि, |देनवाली विद्याकी प्राप्ति होती है, राज्यश्रष्टको राज्य तथा 
आपका ब्रत सपररहसे पूरा होगया ॥ ५० ॥ अपनीसीमा | 


| वेश्यको धनका लाभ होता है ॥| ६७ ॥ जो शुद्ध इस ब्रतको 






तक आचाय्यंकों विदा फरने जाय, दूसरे जो याचक्क | 


भादि घेंठे हों उन्हें भी यथाशक्ति दान दे,पीछे अपने अनु- 
जीवियोंको साथ लेकर रातको प्रसन्न चित्तस भोजन करे 


पांच पांच वर्षकी छुडकियोंकों गन्ध, साल्यसे पूजन करके 
हन्दे भोजन कराना चाहिये॥६१॥ इस प्रकार यह 
जनम व्रत पूरा होताहै, जिन्हें सनोरथ पूरा करनेकी 


श्प्ठा ही उन्दे याहिय 








हय कि, वा इस शुभ ब्रतको करें ॥६२॥। 


५ 
| करे तो, उसकी चाही हुईं वस्तु उसे मिक्क जाय, धर्माथी 
| बस तथा धनार्थी घनको पा. जाता है 


॥ ६८ ॥ कामीको 


हे | काम तथा सोक्षार्थी को मोक्ष सिढ॒ला हैं जिसका जो मनोः 
॥६०॥ चोदके दिल चार, पांच २ वर्षके रूडके २ | | ! 
> दँते वार पांच २ बषेक छडक एवम्‌ १९ रथ होता है इस. ब्रतके करनस उस वही मिल जाता है यह 
ः फ् श्विं / चई क । 
| निश्वित है ॥ ६५॥ मनोरथ ठतीयाके ब्रत करनेशे त्रतीको 
। सब कुछ मिलता है ॥, ७७० ॥| यह  स्कनद्‌ पुराण 
| फाशीखण्ड उत्तराधके ८० व्‌ अध्यायकी चेन्र 'शुह्हां 
' तृतीयाम की सनोर५ तृतीयाके ब्तकी कथा पूरी हुई॥ 





न्‍ अथ अरुन्वतीत्रतम्‌ | 

अथ चेत्रशक्‍लत॒तीयायाँ मध्याहव्यापिन्यामरुन्धतीत्रतम]तत्र छीणामेबायिकारः-अवेधव्या- 
दिफलश्रवणात्‌ ॥ तत्रादों संकल्पः-मम इह जन्मनि जन्मान्तरे च बालवेधव्यनाशार्थमनेक्सों- 
भाग्यपुत्ररूपसंवत्तिसमुद्धाय 4मरन्धतीव्रतमहू॑ करिष्ये ॥ निर्विन्नताखिद्धयर्थ गणपतिपूजन 
करिष्ये इति संकल्प्य धान्योपरि कलशस्थपूर्णपात्रे हेमीं गोरी वसिष्ठ॑ शुर्व च संस्थाप्य पूजयेव्‌॥ 
तद्यथा-अष्टकर्णिकया युक्ते मण्डले पूजयेत्त ताम ॥ अरून्धती महादेवीं वसिष्ठसहितां सतीम्‌॥ 
आवाहनम्‌ ॥ अरुन्धति महादेवि सर्वसोभाग्यदायित्रि। दिव्यं खुचारुवेष च आसन मतिणशहा- 
ताम ॥ आसनम्‌ ॥ सुचाह शीतल दिव्यं नानागन्धछुवासितम्‌ ॥ पा गहाण देवेशि अरून्धति 
नमोस्त ते ॥ पाद्यम्‌ ॥ अहन्धति महाभागे वविष्ठप्नियवादिनि॥अध्य ग़ृहाण कल्याणि भर्ा सह 
पतिव्रते ॥ अध्यम ॥ गड़ातोय समानीत सुवर्णकलशे स्थितम।आचम्यतां महाभागे वसिष्ठ- 
सहितेःनघे ॥ आचमनीयम्‌ ॥ गड्भासरस्वतीरेबापयोष्णीनमंदाजलेः ॥ स्वापितालि मया देवि 
तथा शान्ति कुरुष्व में ॥ स्तानम।। नानारड्रसमुद्भूत॑ दिव्य चार मनोहरम॥|बर्त ग़हाण देवेशि 
अरून्धति नमोस्ठु तेावखम॥करचु की तु पवर्त्य॑ च नानारत्नेः समन्वितम॥ ग्रहाण त्वे मया दत्त - 
मरुून्धति नमोस्तु ते॥ उपवब्यम्‌ ॥ कपूरकुइकुमेयुक्त हरिद्रादिसमन्वितम॥कस्तूरिकासमायुक्त 
चन्दन प्रतिगढ्मयताम।चन्दनम]।हरिद्रा कुँकुम चेव॑ं लिन्दूरं कजलान्वितम॥मया निवेद्ति भकत्या 
गहाण परमेश्वरि ॥ सोमाग्यद्रव्यम्‌ ॥ माल्यादीनि खुरग० पुष्पण्‌॥ वनस्पतिरसोदुभूतो० धूपम्‌ ॥ 








आज्य च वर्तिसंयुक्तम० दीपम!अत्न चतुर्विध स्वादु रसेः षड्निः समन्वितम्‌ ।। नवेद्यं शह्मतां 
वि मिनी मशिशभशभशिशिशिशभशशि शनि लीन लिन लेक कक न की लिन भजन कक इाााााााााााााआआाआाणाणाणआाणणणाआाआाआआआआआआााााााााभाुभाााााा भा ७७७७ ७एशएएएएा 


अरुन्धतीका ब्त-सध्याह व्यापिनी चैत्रशुक्छा ठृतीयाको 
अरन्धती ब्रव होता है । इस ब्रतके करनेका अधिकार 
ख्ियोंको ही हैं। क्‍यों कि, इसके अवैधव्य आदिक फल 
सुने जाते हैं| ब्रतके आदियें संकल्प है कि; अपने इस 
जन्सके और जन्मरान्तरोंके वेधव्यको नाश करनेके लिये 
तथा अनेक सौभाग्य और पुत्ररूपसमसद्धिक लिये अरुन्ध- 
बीके ब्रतको में करती हूं॥ यह ब्रत नि्रिन्न समाप्त होजाय 
इस कारण गणपतिजीका पूजन भी करती हूं | पीछे 
धान्योंके. ऊंपर कछश रखकर, उस केठशपर पूणपात्रकी 
स्थापना करके, उसपर सोनेक गोरी; वसिष्ठ अ ध्रवको 
स्थापित करके पूजन करना चाहिये | पूजनकी जिधि यह 
. है कि-आठ कशिकाके सण्डछपर वसिष्ठजीसदित सती 
अरन्धतीको विशजप्तान करके पूजना चाहिये। देवी, 
अरुन्धतीके छिये नमस्कार है, में अरुन्धतीका आवाहन 
करता हूं । इत्यादि आवाहनके मंत्र है हे महादेवी : है. सब 
सौभाग्योंके देनेहारी देवी अरुन्धती ! आप इस मेरे सुन्द्र 


३५८ 


मुद्दावनें आसचको ग्रहण करो ।इससे आसन देना चाहिय॥ 


हे देवॉकी माहिका अरुन्धती ! इस सुन्दर शीवछ ओर 
अनेक सुगन्धोंसि सुगन्धित पाद्यको ग्रहण करो। आपके 
लिये नमस्कार है ॥ इससे पाद्य देना चाहिये । अधक्ल मंत्र 
है वरसिष्ठकी प्यारी बोलनेवाढ़ी महाभाग कल्याणी अरू- 
“बंबती | अपने पतिके साथ मेरे अघेको प्रहण कर, तेरे छिये 
नमस्कार है । आचमनका समंत्र-हे निष्पापदेवि | अरू- 
नन्‍्वत्ति] आप वचिष्ठजीके साथ आचमन-करिये,-सगाया 
हुआ गेमाजरू सोनेके कछशमें रखा हुआ हें ॥ ध्नानका 
१९ । 


मंत्र-है देवि | आपकों, गेगा, सरस्वती, रेवा, पयोष्णी और 
नमदाके जछसे मेन जैसे खान कराया है तसेही आप भी 
मुझे शान्ति दें । वल्रका मंत्र-हे देवेशि ! अरुन्धति | सुन्दर 
मनोहर दिव्य एवम्‌ अनेक रंगोंका रँगा हुआ वस्ध अहण 
करिये,आपके लिये नमस्कार हू | उपवसद्ध का मंत्र-हें देवि ! 
अरुन्धति | तेरे लिये नमस्कार हैं, अनेक रत्नोंके साथ 
केचुकी और उपवख्र देता हैँ,महण करिये । चन्द्नका सेत्र- 

चन्दन ग्रहण करिय इसमें कपूर ,कुंकुम,.हछूदी और कस्तूरी 
पड़ी हुईं हैं । सौभाग्य द्धरव्यका मंत्र-हरलूदी, कुँकुम ओर 
कज्जल समेत सिन्दूरकों में भक्तिभावसे निवदन करता हूं, 
हे परमेश्वरि |! ग्रहणकर । पुष्पोंका मंत्र-/भाल्यादीनि सुग- 
न्धीनि माल्त्यादीनि वेप्रभो'मया55हतानि पूजाथ पुष्पाणि 
प्रतिगह्म ताम्‌॥” है अभो | मेन आपकी पूजाके लिये माढती 
आदिके सुगन्धित पुष्प इकट्ठे किये हैं आप उन्हें प्रहण 
कर्रिये । धूपका मंत्र-/बनस्पति रसो इभूतः सुगन्धाढयों 
मनोहर: । आज्नियः सर्वेभूतानां घूपो३्य प्रतिग्रह्मय तामू | ? 
अत्यन्त सुगन्ध मिछ्ताहुआ सनोहर तथा सबके सूघनेछायक, 
एवम्‌ वनस्पतियोंके रससे बना '_+ यह धूप हैं) इस अहण 
करिये। दीपदानका मंत्र-“ सा््य च वर्तिसंयुक्त वहिना 
योजिते मया। दीप ग्रहण देवेशि जैलोक्यतिमिरापहें ॥? 
बत्ती पडे हुए घीके दीपकको जढा दिया हें, हे देवेशि ! इस 
तीनों छोकोंके अन्धकारकों नष्ट करनेवाछी, इस दीपकको 
प्रहण करिये। नेवेश्यनिवदनका संत्र-हें प्रर्मेश्वरि ! छहों 
स्सोस युक्त भक्ष्य,भोग्य, छेश और पेय यह चारों तरहका 
स्वादिष्ठ अन्न तैयार है।इस नेवेद्यको महणकरिये ओर प्रसन्न 


+ कक कर 
। 
टल्‍ 440 2207 23400 08 ४200 80026002:000 260 873, 00/60/7770 * ०0: 
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( ९० ) लिन मिल सिर 


र्‌ः ञ्छ ; 
देवि प्रसीद परमेथ्वरि ॥ नवेद्यम्‌ ॥ पूगीफ्ल महत्दिव्यं नागवलल्या दलेधुतम्‌ ॥ है ७ केक ५) 
ताप्वूलं प्रतिगह्मताम ॥ ताम्बूलम्‌ ॥ इद्‌ फल द्‌वि स्थापित॑ पलक || *लप सफल: 
वातिमवेजञन्मनिजन्मनि ॥ फलम्‌॥ हिरण्यगर्भगर्भसस्‍्थ॑ हेमबीज वि (बसोः ॥ अनन्‍्तउुप्यफल- 
दमतः शान्ति प्रयच्छ मे। दक्षिणाम॥ पृत्रान्देहि धन देहि सोमाग्यं दहि सुब्॒ते॥ अन्यांश्र सर्व 
कामांश्र देहि देवि नमोस्तु ते ॥ म्रार्थनाम्‌॥ अरुन्धति महाभागे वसिष्ठश्नियवादिनि ॥ सोमाग्य 
देहि म दवि धन पुत्रांश्व सर्वद॥उत्तराध्यभ| द्विभ्रुजां चारुसवोड़ी साक्षसत्रकमण्डलुम|। प्रतिमां 
काअनीं कृत्वा नामनिः परिषूजयेव ॥ देववन्याये नमः पादों पूजयात्रि॥ लोकवंद्याये० जातु- 
' नी पू० | संपत्तिदायिन्ये०कटी पू० । गंभीरनभये० नामिंपू० । लोकधा5्ये०स्तनोपू०। जगद्धाउगै 
कण्ठंपू०। शान्त्ये न०वाहुपू०।वरप्रदाये० हस्तो १० धृत्येन०मुखपू० । अरून्धत्ये० शिरःप्‌ू०।सकल- 
प्रियाये० शिवांगू० । वसिष्ठम्रियाये० वसिष्ठथ्ववसहित सर्वाड्र पूृ० । नमो देव्ये इति नीराज- 
नमू॥ पृष्पाश्नलिम।वायन दद्यात--वंशपात्रे स्थित पूणे वाणक॑ घतसंयुतम्‌॥ अरून्धती प्रीयता 
च ब्राह्मणाय दद्ाम्यहम्‌ ॥ वायनम्‌॥ खुबर्णमूर्ति्रथुक्तां वलिष्ठवव्॒वसंयुताम ॥ अरून्धर्ती 
सोपचारां ब्राह्मणाय ददाम्पहम्‌ ॥ मूत्तिंदानमंत्रः ॥ गउछ देवि यथास्थानं सर्वालड्भारभूषिते॥ 
अरुन्धति नमह्तुभ्य॑ देंहि. सोभाग्यपुत्मम्‌ ॥ इति विघर्जनम्‌॥ भथक्रथा-स्कन्द उवाच॥ 
पुरावत्तमिदं विप्रा। श्णुध्व ब्रतघुत्मम्‌ ॥ आसीत्कश्चित्पुरा वित्त सर्वशाखविशारदः ॥ १॥ 
तस्थेका कन्यका जाता रूपेणाप्रतिमा झुवि॥ ततो विवाह सम्यग्वे पिता लेस्थाकरोद्धिजः ॥ २॥ 


कुछशीलवते दत्ता सा कन्या वरवर्णिनी ॥ अचिरेणेद कालेन भर्ता तस्या मृतो द्विजः ॥ १॥ 
बालरण्डा तु सा जाता निर्वेदादगमदगृहात्‌ ॥ यघुनातीरमासाद्य चकार विपुले तपः॥ ४॥ 


2 -'स-ससल यमन पपानान सनक ७ जा 9१5२० ७७ आल नस 40७३३७५+०७ हा ७-म3७००४5 वा ाए५७५१ा३७७ ७७७५ त५५भभकाह५७५५+५+ ५७५ +स धार भ ५५५५० ९७५+नथकापा थकान ५५५भ३भ५ ५ ७५०३५५५५०५५५५५५५०७५५७५३४५५७०७५७०५५७५०५७००७७७०४०७०७४५००-०७० ० 








हृजिये | पान छीजिये, इसमें कपूर इछायची घुपारी और 
नागवल्लीके पत्ते पडे हुए हैँ, इससे ताम्वूछनिव दून कर दे। 
हे देवि ! यह फल मैंने आपके सामने रखा है, इससे मुझे 
जन्म जन्ममें सफछा अवाप्ति हो। इससे फछ०। अमिक्का 
हम बीज हिरण्य गर्भके गर्भस्थ हे अनन्त फलका देनेवाला 
हैं; उससे मुझे शान्ति दे । इससे दृक्षिणां० हे सुब्रते ! मुझे 
सौभाग्य दें, धन दे और पुत्रादिक दे तथा और भी सब 
कार्मोको दे, तेरे हिये नमस्कार है । इससे ग्राथना करे। हे 
वसिध्ठकी प्रियवादिनी महाभागे अरुन्धती देवि | सौभाग्य 
दे। ओर सदा घन तथा पुत्रादिक दे । इससे उत्तर अध 
दे । सुन्दर शरीरवाली तथा अक्षसृूत्र और कमण्डछसे युक्त 
दो भुजोंकी सोनेकी प्तिप्ता बनाकर नाम सन्‍्त्रोंस पूजन 
करना चाहिय। दृववन्यके लिये नमस्कार हे, चरणोंको 
पूजता हूँ। लोकवन्यके छिये नमस्कार है, जानुओंका पूजन 
करता हूँ। संपत्तिदायिनीक छिये नमस्कार है, कटीको 
पूजता हूँ। गंभीरनाभीवालीके लिय नमस्कार है, नाभिको 
जता हूँ । लोकधात्रिके लिये नमस्कार है, स्तवोंको पूजता 
5. जगदानीके टिये नमस्कार है। कंठको पूजता हूं। शांति 
हिये नम्रुछर हूं, बाहुओंका पूजन करता हूँ । वस्प्रदाके 

3 डे डे है हृशथोंको पूजता हूँ। धरृतिके लिये नमस्कार 
है । अरुन्धतीक लिये नमस्कार हे शिरका 





पिताके घर चली आईं और 


पूजन करता हूं । सकढ प्रियाके लिये नमस्कार है, शिखाको 
पूजता हू॥वसिष्ठ श्रुवके सहित सर्वाह्को पूजता हूं ।देवीको 
पूजता हूं, इससे नीराजन करना चाहिय। ऊपर “ ओम 
देववन्याये नमः ” इत्यादि मन्त्रोंसे लिखित अगोंका पूजन 
कर । सबके आदि ऑंकार छगादे, अंग पूजनके पीछे 
पुष्पांजलि दे, पीछे वायन दे । “ बंशपात्रे स्थितम्‌ ?? यह 
इसका मन्त्र हे कि, वंशपात्रम रख हुए घृत संयुक्त वाण' 
कको में आह्मणको देला हूँ, इससे अरुन्धती प्रसन्न होजाय | 
सुवर्णकी मूर्तिसे संयुक्त तथा वसिष्ठजी और धवके साथ 
अरुन्धतीकी मूर्तिका सोपचार दान करता हूं इससे मूर्ति 
दान करना चाहिये। हे सब अलेकारोंस विभूषिते अरु' 
न्धती ! तेरे लिय नमश्कार है, मुझे उत्तम सौभाग्य दे और 
यथास्थान पधार, इस मंत्रस विसजन होता है। अथ भर 
न्धतीके ब्रतक्की कथा-स्कन्द्‌ बोले कि, हे आाह्मण ! पुरामे 
जमानेकी एक अच्छी बात सुनो । पहिले एक ब्राह्मण जो 
सब शाह्थोमे निष्णात था।॥ १॥ उसके एक अद्वितीय 
सुन्दरी लडकी थी, उस त्राह्मणने उसका बडी अच्छी तरह 
विवाह किया ॥ २॥ उस वरवर्णिनी कनन्‍्याको एक कुलीन 
पुरुषको दे दिया पर थोडेही दिनिमें उसका पति स्वगंवास 
कर गया ॥ ३॥ वो बाछूविधवा हो गयी, इसी दुःखसे 
यमुनाजीके किनारे घोर तपस्या 





'समेतः । 









































(९१ ) 


पक 820 व 22046 22/22/2072 किक ४ पीट वीय 28० 27:72 76772 00/8 27 7775: 

















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एकभुक्त्यादिकेशेव कृच्छृचान्द्रायणेस्तथा ॥ मासोपवासनियमेरात्मानं पावयत्सती॥ १५॥॥ 
कदाचिदागतघ्तत्र श्रभन गोया सदाशिवः ॥ यमुनातीरमासाद्य वानिर्ता ताँ ददरशो सा ॥ ६ ॥ 
कृपया च शिवा गोरी महादेवशुवाय सा ॥ देव केनेदर्शी श्राता बालबधव्यतादशाम ॥ ७ ॥ 
बद माँ कृपया देव कृपां कुछ दयानिधे ॥ महादेव उबाच॥ अय॑ दविप्रः पुरा गोरि छुल- 
शीलयुतो शुबि ॥८॥ तेन कन्या परिणीता छुरूपा थुबती सती ॥ स तां विवाह्म तरुणीं विदे- 
शमगमद्विजः ॥ ९ ॥ ततो बहुतिथ काले सापश्यद्ध तंरागमम्‌ ॥ नागतस्तु तदा विश यावज्जीवं 
गतो द्विजः ॥१०॥ तस्या जन्म गतं सर्व विफल पतिना बिना ॥ तेन पापन विश्नोइसों नारीत्व॑ 
प्रापतवाज्छिवे ॥९१॥ स्वनारीं यः परित्यज्य निदोर्षा छुलसखूम्भवाए॥ याति देशान्तरं चाय 
अन्धा इब महारणबवे॥१२॥ परदाररतो वा स्यादन्यां वा कुरुते स्वियम्‌ ।। सोध्यजन्मनि देवशि 
दर विधवा भवेत्‌ ॥१श। या नारी तु पति त्थकत्वा मनोवाक्ायकर्मामींः ॥ रहः करोति 
वे जार गत्वा वा पुरुषान्तरम्‌ ॥१४॥ शझोगान-खुवत्वा च या योषितमदेन +्रमदा रूती ॥ तेन कमें- 
विपाकेन सा नारी विधवा भमवेत्‌ ॥१५॥ स्वपत्नीं कुलसभूतां पतिबव्रतरतां सतीम ॥ अलुकूलां 
परित्यज्य परां यो याति स्वेच्छया ॥१६॥ स॒ पापी जायतेष्यरि्मिःशस्रीहीनो विप्रजन्माने ॥ 
अनेन सद्झे देवि लोकेईस्मिन्नास्ति पातकम्‌ ॥ १७ ॥ न वेधव्यात्परों व्याधिन वेधव्यात्परों 
ज्वर$ ॥ न वेधव्यात्पर: शोको न वेधव्यात्परॉपकुशः ॥ १८ ॥ निरयो न च वेचव्यात्कष्टे वेध- 
व्यता नृष ॥ तेन पापेन बहुना जायते बालरण्डिका ॥ १९॥ इति तस्य वचः हत्वा सा गोरी 
विष्मिताभवत्‌ ॥ पत्नच्छ त॑ महादेव गोरी सा करूणान्विता ॥ २० ॥ केनेदरश महत्पाप बालबे- 
धव्यदायकम्‌ ॥ नशयते कर्मणा देव तम्मां वद कृर्पा कुछ ॥ २१ ॥ मह॒दिव उवाच ॥ श्वणु देवि 
प्रवस्‍्यामि बालवेधव्यनाशनम्‌ ॥ अरुन्धतीब्रत पुण्य॑ नारीसोभाग्यदायकम्‌ ॥ २९॥ यत्कृत्वा 
बालवैधव्यान्मुच्यतें नात्र संशय! ॥ श्रतमेतत्तदा विप्रा गोर्या शट्डरतों बश्रतम्‌ ॥ २३ ॥ 











करने छगी ॥४॥ वहां उसने अनेकों एकभुक्त अनेकों कृच्छ 
तथा अनेकों चांद्रायण एवं अनेकों महीनोंके उपवासके 
नियमोंसे अपनी आत्माको पवित्र किया ॥ ५ ॥ एक दिन 
वहां पावेती सहित महादेवजी धूमते हुए पहँच गये ओर 
यमुनाजीके किनारे तप करते हुए उस बालविधवाको देखा 


. ॥6॥ गौरीजीको दया आईं वह शिवजीसे पूछने छगीं किः 


हे देव |! किस कारणसे इसे बाल वेधव्य मिछा ॥ ७॥ हैं 
देव | कृपा करिये. मुझे बताइये | महादेव बोल कि, हे 
गौरी ! पहिछे यह एक कुलीन ब्राह्मण था ॥८॥ इसने एक 
सुन्द्री कन्याके साथ विवाह किया था ओर विवाहमसात्र 
करके ही विदृेशकों चछागया ॥९॥ उस सतीने बहुत दिन- 
तक पतिकी प्रतीक्षा की, जिन्दगी चढी गईं, पर यो छोट- 
कर नहीं आया ॥१०॥ उस कन्याका जन्म साराही व्यथ 
चलछागया, उसके पापसे हे शिव ! यह ब्राह्मण इस जन्समें 
स्ीत्वको प्राप्त हुआ है ॥११॥ जो पुरुष कुडीन तथा निर्दोष 
अपनी खत्रीको छोडकर इस तरह विदेश चला जाय जेसे 
कि, आंधरा महासमुद्रमँ चछा जाता है ।। ११५॥ परदाररत 
हो अथवा दूसरी खीको करले सो, दूसरे जन्ममें स्री होकर 
वैधव्यकों भोगता हैं ॥ १३॥ जो तो खी मनसे, वाणीसे 
अथवा अन्दः करणसे, एकान्तमें छिपकर जार करती हे 


निशिलिलि मिल निनिलि मिली किन किक मन नकल लीड कील लि जिन जज अब जज अजब मम न न _नाा2ुाएाा७७७४४४७४७४७४७४//आ्आशआआशशशशशशआशआशशाशाशआआआछछ## शेष [##भ] 


अथवा दूसरे पुरुषको करलेती है ॥ १४ ॥ भथवा मदसे 
प्रमदा हुईं भोगोंको भोगती हैं; इस कर्मविपाकसे वो नारी 
विधवा हो जाती है ॥१०॥ अथवा जो पुरुष कुछीना सदा- 
चारिणी सती तथा अनुकूछा स्वपत्नीको छोडकर, इच्छा- 
नुसार दूसरीसे रमण करता है॥ १६ ॥ थो पापी दूसरे 
जन्ममें क्लीहीन होता हे | हे शिवे | इसके बराबर कोई 
पाप नहीं है ।।१७॥ वेधव्यसे पर कोई ब्याधि नहीं है तथा 
वैधव्यसे परे कोई ब्वर भी नहीं है एवं न वेधब्यसे परे 
कोई शोक हैं ॥१८॥ न वैधव्यके बरावर कोई निरयही हैं 
एवम्‌ न इसके समान कोई कष्टही है बहुत करके इस 
पापसे ही वालविधवाएँ होती हैं ।। १९ ॥ शिवजीके ऐसे 
वचन सुनकर गौरीजीको बढा विस्मय हुआ तथा आद्े 
हृदयसे शिवजीसे पूछने रूगी ॥ २० ॥ कि; हे भगवन्‌ ! 
कौनसे कमसे यह बालवेधव्य देनेवाछा महापाप नष्ट हो, 
यह कृप/ करके बतादीजिय || २१ ॥ यह सुन महादेवजी 
बोले कि; हे देवि ! में बालवेघव्यका नाश करनेवारा 
एक अरुन्धती त्रत कहता हूँ । यह सौभाग्यका देनेवारा 
भी है। २२ ॥ इसको सुनकर बालछवेंधव्यके पापसे 
५ २ ५ 6 रा < अप 
छूट जाते हैं; इसमें कोई सन्देह नहीं है । हे ब्राह्मणों ! 
उस समय गौरीजीने इस बतको शिवजीसे सुना था॥२३॥| 


१ तिष्ठतीतिशेषः | « 





००८ अ#>7०:- 





पमुनातीरमासाद्य उपविष्ट तदा ट्विजाः॥ तस्य 


जे | 
पं तौयो<« १ 

>' € ' 
225 727 30000 ५००० 7 8207५ :02 8:७४ ४४४ -य शदाउकका। साइड का, 


॥र केक फेक कोन न क*क १७७७७७एकाण- बैक ०... 


नायें महादेव्या कारित ब्रतमुत्तमम्‌ ॥२५॥ तेन 





पुण्य महता ब्रतजेन मुनीश्चराः ॥ सा नारी चागमत्स्वग मुक्ता वेध व्यतस्तदा ॥ २५ ॥ इब् 
ब्रतं क्षत॑ सम्यश॒पदिष्ठ मुनीध्वराः ॥ कृतमम्येश्व बहुनिस्तेषपि मुक्ता मुनीखराः ॥ २६ ॥ अरु 
न्धतीत्रतमिदं सदा कार्य मुनीख्चराः ॥ नारी वेधव्यतो सुच्येत्सौभाग्य॑ प्राप्लुयात्परम “ २७॥ 
इति श्रीस्कन्दपुराणे अरुन्धतीतव्रतम्‌ ॥ अथ उद्यापनस ॥ युधि छिर उवाच ॥ ड्द्यापनवि 


३९0१४ 


० तच्‌ त्रहि 
अरुन्धत्याः सुरेश्वर॥ भक्तितः श्रोत॒मिच्छामि ब्रतसंपूर्तिहितवे ॥ कृष्ण उवाच ॥ अरुन्धती- 
ब्रत॑ वक्ष्य नारीसोभाग्यदायकम्‌ ॥ येन चीर्णेन वे सम्यक्‌ नारी सोभाग्यमाप्लुयात्‌ ॥ जायते 
रूपसंपन्ना पृत्रपोत्रसमन्विता ॥. वसन्तर्त समासाद्य तृतीयायां युधिष्ठिर ॥ माघे वा माधवे चेष 


. श्रावणे कार्तिकेषथवा ॥ ल्लार्न कृत्वा त्वे सम्य 
समाहूय पतिव्रता ॥ पूजयेत्पृष्पतांबूलेश्वन्दने 


क्‌ त्रिरानोपोषिता सती ॥ मिथुनानि 
श्व 


च्‌ चत्वारि 
तथाक्षतेः ॥ कुकुमागुरुकस्तूरीक पूर मृ गना- 


भिन्निः ॥ शिलापट्टे च संस्थाप्य जीरक लवणान्वितम्‌ ॥ लोष्टकेन समायुक्त वस्वयुग्मेन वेहि- 


तम्‌ ॥ आवाहयेदरूंन्धती वसिष्ठप्राणसंमिताम्‌ 


॥ पतिव्रतानां सर्वासां मुख्यां 
द्विवुजां चारुसवांड्रीं साक्षसूत्रकमण्डलुम्‌ ॥ प्रतिमां काश्वनीं कृत्वा नामनिः 
च ध्र॒वं चेव पमंतिमां पूजयेद्रती ॥ देववन्धे नमः 
त्तस्थाः सर्वेसंपत्तिदायिनि ॥ नाभि गभीरनाभ्ये 
स्कन्धों बाहू शान्त्ये नमस्तथा ॥ हस्तौ ठु वर 


पादी. जाल॒नी लोकवन्दिते 
तु लोकधाच्ये तथा स्तनों ॥ जगद्धात्ये तथा 
दाये तु मुख धत्ये नमः 


वे देवभामिनीम,॥ 
परिपूजयेत॥वस्तिएं 
॥ कटिं संपूजये- 


पुनः ॥ अरून्धत्ये शिरः 


पूज्य सवा सकलम्रियें॥ एवं संपूल्य ता देवीं गन्धपुष्पोपचारकेः ॥ पूजयित्वा सती देवी 


ततश्ाघ्य प्रदापयेत्‌ ॥ अरुन्धति महाभागे वसिष्ठप्रियवादिनि ॥ 


पुत्रांश्व सबेदा ॥ पुत्रानदेहि 


हे 'बाबणो ! इसको पोरीजीने शिवजी छ+ जय पर पर 777 : इस बतको गोरीजीने शिवजीसे सुनकर उस 
खीसे इस ब्रेतको कराया ॥२४॥ हे म्ुनीश्वरो |! इस ब्रतके 
कक ५ ५ ध्ह (0 ६ 

पण्यसे वो ख्री स्वगे चल्ली गई और वेधव्यसे छूटगई॥ २५) 
है मुनीश्चरो ! भर्न जस सुनाथा वेसाही कह दिया, इसे 
दूसरे भी बहुतोंने किया, वे भी सब आत्माएँ मुक्त होगई 
॥२६॥ हे मुनीश्चरो ! इस अरुन्धतीके ब्रतकों सदा करना 
चाहिये, इसके करनेसे खली वेधव्य योगसे छूटकर परम 
सौभाग्यको आाप्त होती है ॥॥ २७॥ यह स्कन्द पुराणकी 
अरुन्धती ब्रतकी कथा हुईं ॥ अथ उद्यापनम्‌-युधिष्ठटि रजी 
भगवान्‌ इंप्णजी्व बोले कि, हे सुरधवर !अरुन्धतीके ब्रतकी 
उद्यापन विधि कहिये, मैं ब्रतकी सपूर्तिके लिये भक्तिसे 
अन्ना चाहता हूँ ॥ भगवान्‌ इृष्ण बोले कि, नारियोंको 
सौभाग्य जे अरुन्धतीके ब्तके उद्यापनको कंहूगा, 
जिसके भलीभांति करनेसे नारी सौभाग्यको पाजाती है। 
हेपखे संपन्न और पुत्र पौत्रोंसे समन्वित होती है। हैं युधि- 


: वसन्‍्त ऋतुकी हृतीयाको चाहे माध हो, चाहें वेशाख | ढोक 


भव शआवण और ऋतिक हो, स्नानादि- कर तीन रात 


को ३ 2 मैंत करनवाल्ली, चार दम्पतियोंको बुलाकर 
इंकुम अगर ३ और अक्षतोंसे उनका पूजन करे तथा 








कु 





क 


१ प्रतिमारुप बसिश् धुत चेत्पभः 


धन देहि सोभाग्य॑ देहि सुब्रते ॥ अन्यांश्व 


सोमभाग्यं देहि मे देवि धन 
स्वेकामांश्व देहि देवि 


सहित जीरेको, छोढेके साथ रखकर दो व्रोंसे वेशित कर दे 
बसिष्ठजीके प्राणोंकी प्यारी अरुन्धतीका आवाहन करे, जो 
सब पतिप्रताओंमें मुख्य,देव भामिनी है । सर्वाज्गसुन्द्री दो 
ध्ुुजाकी, अक्ष सूत्र, कमंडलु युक्त सोनकी मूर्ति बनाके 


नाममंत्रसे पूजे।ब्रती,वसिष्ठजी घवजी और प्रतिमा टीनोंको 


ही पूजे। “ ओमू देववन्धे नमः”! इस संत्रसे चरण “ओम 
लोकवन्दिते नमः” इससे जातु ॥ ओम स्वश्षपत्तिदायित्ति 
पमः ” इससे कटि “ ओम गभीरनाम्ते नमः ” इससे 
नाभि/ओमू छोकधाञ्ये नमः”'इससे स्तन 'ओम्‌ जगद्धात्ये 
"मः इससे स्केद “ओमू शान्त्ये नमः” इससे बाहु “ओमू 
3. मे पमः” इससे हस्त ४ ओम धृत्ये नमः” इससे मुख 
ओम अरुन्धत्ये नमः” इससे शिर तथा “ ओम संक्ढ- 
अये नमःइससे सर्वाज्ञका पूजन करना चाहिये । देववन्या। 
छोकेवन्दिता, सब संपत्तिक देनेहारी, ऑढीनामियाढी 
ठोकथात्री, जागद्धान्नी, शांन्ती, वरदा, घृति, अरुन्धती 
और ,सकछ प्रिया जो तू है तेरे. छिय नमस्कार हैं। 


+ कार गन्धीपेचारस सती देवी अरुन्धतीका पूजन 


करके अंध देंना चाहिये । हे महाभागे ! अरुन्धती ! हे 
वसिष्ठकी प्यारी. बोलने वाछी ! हे देवी! 


हें सुब्रते मुझे सदा' 








बतानि, | 















की 


मोष्स्तु ते | सुवासिन्योथ संपूज्या। समा प्तिदेवस तदा ॥ शुभगन्धाक्षतः पुष्पेद्याच्छूर्षण 
क्षकान्‌ ॥ होम॑ चेव तदा कु्योस्समिड्वेश्व तिलेः प्रथकू ॥ संख्ययाष्टोत्तरशत प्राथनामन्त्रतः 
उधीः ॥ मिथुनाने च संपूज्य भूषणाच्छादनादिभिः । नानाविधोषचारेश्व चत॒र्विशातैसंख्यया ॥ 
प्राचायोय च॑ गां दयादख्राप्याभरणानि च॥ शब्यां सोपस्करां दद्यात्कांस्यपात्र सदीपकम्‌ ॥ 
प्रादही चामर चेव अर्व दष्यात्सुशोभमनम्‌ ॥ यथावद्धोजय्रित्वाथ स्थियः श्परस्समोदकान ॥ 
ग़ेदकान्काथ्वनं चेव तथा वसख्च यथाविधि ॥ पोलिका घृतप्पांश्व प्रिकाश्व विशेषतः ॥ सोहा- 
लेकाश्व दातव्या एकेक द्विगुण तथा ॥ मोजनद॒यपयाएे दीनानाथांश्व पूजयेत ॥ अनेनेव विधा- 
बेन भामिनी कुरुते ब्रतम्‌ ॥ अवेधव्यमवाप्नोति तथा जन्मसहस्रकम्‌ ॥ पुत्रपौन्नसमायुक्ता चन- 
गन्यसमादता ॥ जीवेदबशर्त सामं सह भर्ता महाव्रता ॥ एवमभ्यर्चयित्वा ठु पदं गच्छेदना- 
प्यम्‌ ॥ देवभारयां यथा स्वर्ग ऋषिणायों यथेव च॥ राजते च महाभागा सर्वकामसमृद्धिमिः ॥ 
7ति श्रीस्कन्द॒पुराण अरूच्धतीनतोद्यापनम्‌ ॥ | द जी 
अक्षय्यततीयात्रतम्‌ ॥ ह 

अथ वेशाखशुक्ृव॒तीयायां भविष्योत्तरोक्तमक्ष य्यवृतीयात्नतम्‌ ॥ तीर्थ वैतादिने स्तान॑ तिलेश्व 
पेततर्पणम्‌॥ दाने धर्मंघटादीनां मधुखूदनपूजनमू॥ माधवे मासि कुवीत:मजुसूदनतुष्टिदम्‌ ॥ 
तुलामकरमेषेषु प्रातः स्नान विधीयते॥ ह॒विष्य॑ बरह्मचय च ,महापातकनाशनम्‌ ॥ वेशाखस्नान- 
नियम ब्राह्मगानामऊत्षया ॥ मधुसूदनमभ्यच्य कुथोत्संकल्पपूर्वकम।वेशा्ख सकल मास मेंष- 
पंक्रमणं रवेः ॥ प्रातः सनियमः स्नास्थे भीयतां मधुसूदनः ॥ मधुखूदनसन्तोषाद्राह्मणानाम- 
तुप्रहात्‌ ॥ निर्विन्नमस्तु मे पुण्य वेशाखस्नानमन्वहम्‌ ॥ माधवे मेषगे भानों सुरारे मघुखूदन ॥ 
प्रात+स्नानेन मे नाथ फलदः पापहा भव ॥ यदा न ज्ञायते नाम तस्य तीथस्य भो द्विजा। ॥ 
तत्र चोच्चारण कार्य विष्णुतीर्थमिदं त्विति ॥ अपि सम्यग्विधानेन नारी वा युरुषोषपि वा ॥ 
प्रातः स्नातः सनियमः सर्वेपापेः पम्नुच्यते ॥ वेशाखे विधिवत्स्नात्वा भोजयेद्राह्मणानद्श ॥ 











तरह बव करनंवाढी भी महाभागा सब काम समृद्धियोंसे 


सौभाग्य और धन पुत्र दे। पुत्रोंको दे, धन दे और सोभा- | तरह 
शोभावमान होती है। यह रकन्दुपुराणका ब्त अरुन्धतीः 


ग्य दे और भी सब कामोंको दे | हे देवी ! तेरे लिये नम- 


स्‍्कार है । समाप्तिके दिन सुवासिनी स्वियोंका गन्ध; पुष्प; 
और अक्षतोंसे पूजन होना चाहिये तथा सूपमें रखकर 
भक्ष्य देना चाहिये। उसी समय समिध और तिलोंसे होम 
हो। जिसकी संख्या १०८ हो। यह प्राथना मंत्रसे हो । 
वर्खाच्छादनोंस तथा अनेक तरहके उपचारोंसे, चौबीस 
दृम्पतियोंका पूजन करके, आचाय्येको गझ और वखाभ- 
रण दे। उपस्कर सहित शय्या दे तथा दीपक सहित 
कौसका पात्र दे, दूपण और चमर दे तथा सुशोभन अश्व 
दे । खियोंको यथावत्‌ भोजन कराकर, लड्डू भरे हुए सूप 
एवं विधिके साथे. मोदक, कांचन,- वख। पोढिका; 
घत, पूप, पूरी और .सुहालिरा देनी चाहिये ये चीज 
एक एकको दो दो दे | दीन और अनाथोंकोी इतना 
दें दे जो दो दो भोजन करसके, जो भामिनी इस 
प्रकार त्रत करती हैं उस हजार जन्मतक वेधव्य. नहीं भ्राप्त 
होता । उसे यथेष्ठपेटा, नाती और घन; धान्‍्य मिलता है वो 
सहाव्ता पतिके साथ सौवरषतक जिन्‍दी रहती है। इस प्रकार 
पूजन करनस मोक्षपद्की प्राप्ति हो जाती हैं, जेसे स्वग्मे 
देवभाय्यां और ऋषि सा्थ्याएं सुशोभित होती. हैं: उसी | 


के ब्रंतका उद्यापन पूरा हुआ ॥ 


अथ अक्षय दतीया ब्रतम- वेसाख शुक्छा तृतीयाके दिन 
भविष्यपुराणमें अक्षय तृतीयाका ब्त कहा है कि, इस दिन 
तीथम स्नान और तिलोंसे पितरों झा तर्पण करे, धर्म घटा- 
दिकोंका दान और मधुसूदनका पूजन करे, क्‍यों कि, 
वैंसाखमें भगवानका तुष्टिदेनेवाढा पूंजन अवश्य कतेव्य 

। तुला; मकर और मेंषराशिमे प्रातः स्नानका विधान 
है, इसमें हविष्यान्न भोजन और जअह्यचय्थे, महापापोंका 
नाश करनेवाला है। भगवानका पूजन करके सकटपपूर्वेक 
ब्राह्मणोंकी आज्ञा प्राप्त करके वेसांखकें स्नानका नियम लेना 
चाहिये । हे मुरारे ! हे मधुसूदन ! वैसाखके मासमें मेषके 
सु्यमें हे नाथ! इस प्राप्त: स्नानसे मुझे फछ देनेवाले हो 
जाओ और पॉपोंका नाश करो | हे ब्राह्मणों | जो तीथका 
नाम पता न हो वो उसको विष्णुतीथ कहना चाहिये। चाहे 
खी हो चाहें पुरुष हो जो नियमपूंवेक प्रातःस्नान करता है । 


वो सब पापोंस छूंटा जाता है । बेसाखंसे विधिक साथ 


समान करके दुश न्राह्मणोंकों भोजन कराना चाहिये, 


| तृतीया-« 


दा 00277 0 0: 6005%00५8,/ ध्प्् 29270 5,2207 08 * 2 ६402 22५५८: ५४०४५ (१०१० “2२ मधययाणाए न रण करत 
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कत्स्नशः सर्वपापेभ्यों सुच्यते नात्र संशयः ॥ इति वेशाखस्तानविधिभविष्ये ॥ इयमेव ततीया 
परशरामजयन्ती ॥ सा च. प्रदोषव्यापिनी ग्राह्मा ॥ तहुक्त भागवाचनदीपिकायां स्कन्द्भविष्य- 
योः- वेशाखस्य सिते पक्षे तृतीयायां पुनवेसों॥ निशायाः प्रथमे यामे रामाख्यः समये हरि।॥ 
स्वोचगः पढ़प्रहर्यक्ते मिथने राहुसंस्थिते ॥ रेणकायास्तु यो गभादुबताण। विश्रुः स्वयम्‌ | 
दिनदये तब्याप्तावशतः समव्याप्तों च परा ॥ अन्यथा पूर्वेव ॥ तह॒क्त॑ तत्रेव भविष्ये “शुक्ल 
तृतीया वेशासे झुद्धोपोष्या दिनद्यये ॥ निशायाः पूर्वयामे चेदत्तराष्न्यत्र पूर्विका ॥ तज्े 
बेशाखत॒तीया अक्षय्यतृतीया ॥ सा च॒ पूर्वाहव्यापनी आझा॥ दिनद्वये तब्यातों तु फो- 
वेति ॥ इयं युगादिरिपि ॥ या मन्वाद्या युगाद्याश्व तिथयस्तासु मानवः ॥ स्नात्वा हुत्वा च जप्तवा 
च दत्वानन्तफले लमेत॥ श्राद्धेपि पूर्वाहव्यापिनी ग्राह्मा ॥ पूर्वाहे ठु सदा कार्या शुक्ला मतन- 
युगादयः ॥ देवे कमंणि पेच्ये च कृष्ण चेवापराहिकाः ॥ वेशाखस्य ततीयां च पूर्वाविद्धा 
करोति वे ॥ हव्यं देवा न गहम्ति कव्यं च पितरस्तथा ॥ इति । अत्र रात्रिभोजने प्राय- 
श्रित्तमग्विधान-रात्रो भुक्ते वत्सरे तु मन्वादिषु युगादिषु ॥ अभिस्ववृष्टिं: मन्ज च जपेदश्गत्तरं 
शतम्‌ ॥ अपराक यमः-कृतोपवासाः ससिल॑ ये थुगादिद्निषु च्‌ ॥ दास्यन्त्यत्रादिसहित॑, तेषा 
लोका महोदयाः ॥ इति ॥ अथ विधिः ॥ वैशासस्य तृतीयायां श्रीसमेतं जगदूगुरूम ॥ नारायण 
पूजयेच्च पुष्पधूपविलेपनेः ॥ योःस्यां दंदाति करकान्वारिव्यजनसंग्रतान्‌ू ॥ स याति पुरुषों 
लोकान्वे हेममालिनः ॥ बेशाखशुक्कपक्षे तु वृतीयायां तथेव च ॥ गड़ातोये नरः स्नात्वा 
मुच्यते सर्वकिल्विषेः ॥ तथात्रैव ॥ श्रीकृष्ण उबाच ॥ बहुनात्र किमुक्तेन कि बहक्षरमालया ॥ 
वेशाखस्य सितामेकां तृतीयामक्षयां श्रण ॥ तसयां स्नान जपो होमः स्वाध्यायः पितृतपणम्‌॥ 


7.» /याआशक तल “की... 3-3. ,रकााटगक मलकपकन के अनाज०-पारव-पुंमपएबनननानन लगन नाल»+ ०2५4 तनुना--+_लक ५3८०५ ना नमक, 








यो सब पापोंस छूट जाता है इसमें कोई सन्देंह नहीं है, | खकी पू्व॑विद्धा तुतीयाको करता है उसके उस हृव्यको देव 
यह भविष्यकी पशाखस्तानकी विधि होगईं। परशुराप्रज- | तथा कव्यको पितर छोग नहिं लेते । ऋगविधानमें लिखा 
बन्‍्दी-इसीठतीयाको कहते हैं । परशुरामजयंती प्रदोष हुआ हैं कि; जो कोई मन्वादिक और युगादिक तिथियोंमें 
व्यापिनी छनी चाहिये। यही भागवाचनदीपिकामे स्कन्द | रातको भोजन करता है वो, अभिस्ववृष्टि मदे, अस्य युध्य- 
ओर भविष्यपुराणका प्रमाण दिया है कि, वेशाख शुक्ला | तो रघ्वीरिव, प्रवणे सख्र॒ रूतम: । यद्ज्जी ध्षमाण अन्धसा 
ढ्तीया उनवेसुम रातक पहिले पहरमें परशुराम भगवान्‌ | उमिनदू बलस्य परिधीं रिवात्रतः-इस वृष्टिकों हम अपने 
3 छमहोंसे युक्त मिथुनराशिपर, राहुके रहते, रेणु- | आनन्दके ढिये युद्धकाछकी शीघ्रगतिकी बरह चाहते हैं। 
काक गर्भस अवतीण हुए । ये स्वर्य भगवानक अवतार थे। | पानीकी धारकी तरह नम्र हम छोगोंमें उसकी रक्षाएं वही 
दो दिन प्रदोषव्यापिनी हो अथवा अंशतः | दोनों दिन हो | चली आ रही हैं! बज्रधारी इन्द्रने निर्भीकता पूर्वक वृत्रकी 
/ रा प्रहण करनी चाहिये, नहीं तो पूबाही छेनी यही | परिधियोंको भेद्‌ ढाछा ॥ इस मंत्रको १०८ वार जपकर 
नात वहां ही भविष्यपुराणस कही है' कि, वे शुद्ध हो है। [यह ए्‌ णो 
3रणस कही है कि, वेसाख शुक्ला शुद्ध हो सकता है । [ यह शौनकोक्त एवम्‌ अग्नि पुराणोक्त 
तृतीया जुद्धाको नेत कर, यदि दोनों दिन हो तो, रातके ऋणगू विधानमें नहीं मिला ] अपराकमें यम भी कहता है 
पहिे पहरब रहे तो दूघरी करनी चाहिये, नहीं तो पहिली | कि, उपवास किये हुए जो पुरुष, अन्नादिके साथ पानी हेंते 
चाहिये । अक्षय उतीया- तहां हद वेसाखकी ठती- | हैं उन्हें ऊंचे लोगोंकी प्राप्ति होती हे । अथ विधि-वबैसा- 
का कहे तृतीया ध कहा है, उसे पूवीह्न व्यापिनी लेना, | खकी ढतीयाको पुष्प, धूप और विंलपनोंसे छक्ष्मी सहित 
आाहिंये ह ये 58200 हो तो दूसरी ही ढेनी | भगवान्‌ जगदूगुरु नारायणका पूजन करना चाहिये। 
बबदा पक दि रो ० जो तिथि युगादि हो | अक्षय उतीयाके दिन जो पुरुष, पानीके घडेके साथ वीजना 
हज बा हक ४ उसमें अन्नदानसनान और | और खांडके ओले देता हें.। हे वीर ! वो पुरुष (दिव्य छो- 
पूवाह्यापिली ऐेनी चाहिये है कक हि यह तिथि | कोंक़ो चछा जाता है '_ शाखशुक्छा तृतीयाको गंगाक पानीमें 
मुक्छा चिधियों पूबहमे हो यो कह का 8 हु कि ६७६ ज्ञान करके सब पापोंसे छूट जाता हैं। भगवान्‌ कृष्ण बोढे 
ृण्णपक्षद हों तो अपराहव्यापिनी डैनी चाह [हथ यदि | कि, बहुतसी बालोमें कया रखा है एक बेशाख शुक्छ अक्षय 
नी 0. दय। जो वैसा- | तृतीयाकोसुनाअक्षय तृतीयाके दिन स्नान,जप, होम,स्वाध्याय 


) छैके। २ जभीप्यवृष्टि | इति पाठाः तरप्र। ३ बीजमसमााचम्त्िलभजड.. 8 


श् 





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हरे है. कि भा 
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न 2008 7 ध्यान दा: थी भर है? पक |! हर 
ब्र्ता नि | पं 6४६३ ६ + मर वी फेंय 20१५ 


(९९ ) 


क्रियते तस्यां तंत्सव स्थादिहाक्षयम्‌ ॥ आहदिः कृतयुगस्येयं युगादिस्तेन कथ्यते ॥ 
नी सर्व लौख्यअदायिनी ॥ पुरा महोदयः पार्थ वणिगासीत्सुनिर्मलः ॥ पियंवदः 
सत्यवृत्तिदेंवबाह्मणपूजकः ॥ पृण्याख़्यानेकचित्तो5मूत्‌ कुटुम्बव्याकुलोपि सन तेन श्र॒ुता वाच्य- 
माना तृतीया रोहिणीयुता ॥ यदा स्याद बुधसंयुक्ता तदा सा तु महाफला ॥ तस्यां यदीयते 
किचिदक्षय स्यात्तदेव हि॥ इति श्रुत्वा च गड़ायां सन्तप्य पितदेवताः ॥ गृहमागत्य कारकान्‌ 
सान्नाठदकसंयुतान ॥ अन्नपूर्णान्व॒ह-कुम्भा जलेन विमलेन च॥ यवगोषमलइणणद सक्त दध्यो- 
दन॑ तथा ॥ इश्षक्षीरविकारांश्व सहिरण्यांव शक्तितः ॥ शुच्चिः शुद्धेन मनसा धो ददौ 
वणिक्‌॥ ज्ायेया वाय्यमाणोषपि कुटुम्बासक्तचित्तया॥ तावत्तस्थों स्थिरे सत्वे मत्वा सर्वे विन- 
वरम्‌ ॥ धर्मासक्तमतिः पारथ कालेन बहुना तत॥ जगाम पश्चत्वमसौं वासुदेवमजुस्मरना॥ ततः 
स क्षत्रियो जातः कुशावत्याँ युधिष्दिर ॥ बनूव चाक्षया तस्य समृद्धिर्धमसंय्ता ॥ ईजे स च 
महायज्ञेः समत्तवरदक्षिणे! ॥ स ददौ गोहिरण्यानि दानान्यन्यान्यहनिशम ॥ बुआुजे कामतो 
भोगान्दीनान्धांस्तर्पयच्छने॥॥ तथाप्यक्षयमेवास्य क्षयं याति न तद्धनम्‌ ॥ अ्रद्धापूत ततीयायाँ 
यदत्त विभव॑ विना॥ इत्येतत्ते समाख्यातं श्रूयतामत्र यो विधिः ॥ तृतीयां तु समासाद्य स्नात्वा 
संत्प्य देवता॥ एकशुक्तं तदा कुर्याद्रासुदेव॑ मपूजयेत्‌ ॥ तस्यां कार्यों यवैद्योंगो यवेर्विष्णं सम- 
चेयेत्‌ ॥ यवान्द्द्यादद्विजातिभ्यः प्रयतः प्राशयेद्यवान ॥ उदकुन्भान्सकनकाव सात्नान्सवंरसेः 
सह ॥ यवगोत्ठमचकान्सक्तु दध्योद्न तथा ॥ ग्रेष्मक॑ सर्वमेवात्र सस्य दाने प्रशास्यते ४ 
तृतीयायां ठ॒ वेशाखे रोहिण्यक्षे प्रपूज्य च॥ उदकुम्भप्रदानेन शिवलोके महीयते ॥ तत्र मन्त्र+-- 
एव धमंघटो दत्तो बरह्मविष्णुशिवात्मकशअधस्य प्रदानात्तप्यग्तु पितंसोएपि पितामहा॥। गन्धोदक- 
तिलेमिश्र॑ सान्न कुम्म॑ सदक्षिणम॥ पितभ्यः संप्रदास्यामि अश्षय्यमुपतिछठत्‌ ॥ छत्रोषानत्मदानं 











पितृतपंण ओर दान जो भी कुछ किया जाता है; बो सब 
अक्षय हो जाता है। यह कृतयुगकी सबसे पहिछकी तिथि 
है, इस कारण,इसे युगादि तिथि कहते हैं, यह सब पापोंके 
नाश करनेवाली तथा सब सौभाग्योंकों देनेवाली हे । हैं 
पाथ ! पहिल समयमें एक सत्यका रोजगारी, प्यारा बोल- 
नेवाढा, तथा देव और ब्राह्मणों का पूजक, सुनिमे्ठ महोदय 
नामका (बनिया था । उसकी पुण्याख्यान सुननेमें रुचि 
रहती थी, यदि. म्बक कामम भी वो व्याकुछ होता था, 
तब भी उसका मन शाखमेंही रहता था। एक दिन उसने 
रोहिणी नक्षत्र शार्िनी अक्षय तृतीयाका महात्म्य सुना 
कि, यदि वो बुध संयुक्त हो तो मंहा फलवाडी होती है ! 
जो कुछ उसमें दान दिया जाता है उसका अक्षय फल होता 
है । ऐसा सुन वो वेश्यगंगा किनारे पहुँचा. वहां उसने 
पिठ देवताओंका तर्पण किया, पीछे घर आकर, अन्न और 
पानीके साथ ओंढे, तथा अन्न और स्वच्छ पानीके भरे हुए 
बड़े २ घड़े, यव गोधुम, छवण, सक्त, दृध्योदृन, इख और 
दुधके बने पदार्थ, शुद्ध मनसे शक्तिके अनुसार सोनेके 
साथ ब्राह्मणोंको दान दिये। ख्रीका चित्त कुटुम्बमें जासत्त 
था इस कारण उसे बहुत रोका पर जबतक वो बासुदेवका 
स्मरण करके सृत्युको प्राप्त नहीं हुआ हू पार्थ | तब तक वो 
धममें आपतक्त मतिवाला वेश्य बहुत काछृतक सबको विन- 
क्छ 0 कर हक ६ 
इवबर मानकर स्थिर सत्वमें रहा । हे युधिष्ठिर | इसक पीछे 
वो कुशावतीपुरीमें क्षत्रिय हुआ, उसकी घर्मसयुक्त अक्षय 


संपत्ति हुईं, उसन बडी छंबी चौडी दक्षिणाके साथ बड़े 
बढ़े यज्ञ पूरे किये, तथा रात दिन गौओंके सोनेके तथा 
अन्यभी अनेकों वस्तुओंके बहुतस दान दिय। उसने इच्छा- 
नुसार भोगोंकों भोगा तथा घीरे २ अनेकों दीन और अ- 
न्धोंको ठृप्त किया, इतना करने पर॒भी इसका घन्‌ अक्षय 
था; नष्ट नहीं होता था,क्योंकि इसने अक्षय दतीयाके दिन 
विभवको छोड-कर श्रद्धापूवंक जो दिया था उसकाही फल 
था । यह मैं तेरे छिये कहदिया यहां जो विधि है उस झुन । 
तृ तैयाके दिन स्नान तथा देवतपंण करके एक वार भोजन 
करता हुआ वासुद्‌वका पूजन करना चाहिये।इसमें बांका 
होम और वासुदेवका पूजन होता है । ब्ाह्मणोंके लिये 
जौओंको दे और पवित्र होकर जाओंका ही प्राशन करे । 
कनकसहित पानीके भरे हुए घड़े, सब रस अन्न, यव, 
गौधूम, चणक, सतुआ और दृध्योदनका दान करना चा- 
हिंय । इसमें ग्रीष्म ऋतुक सस्य दान कियेहुए अच्छे होबे 
हैं । बैसाख ठृतीयाके रोहिणी नक्षत्रमँ शिवपूजन करनेके 
बाद उदकुभदान करके शिवकोक्म चढा जाता है। यह 
घट दानका मंत्र है कि;म्रह्मा विष्णु ओर शिवरूप यह धर्त- 
घट मैंने देदिया है, इसके दानस पितर और पितामह तृप्त 
हो जायें। गन्धोदक और तिलोंके साथ तथा अन्न ओर 
दृक्षिणासहित, घट देवा है, यह दान पितरोंके लिये अक्षय 
होय जाय । छत्र, जूते, गो, जमीन, सोना और वल्ल जो 
भी कोई भगवानकी प्यारी वस्तु श्रीकृष्णापंण की जायगी 


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च गोभूकाथनवाससाम ॥ यद्यदिष्ट केशवस्य तदेयमविशंकया॥ एतत्ते सर्वमारूय 


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डे 
री डे 
हा 
[ तृतीय 
४7 42200 32॥2 00000: 77 न्स्स्प्््््््व््ड्ड्ड्ोोो सात पपाायसपप५ कपल 270 700 *। | 





[त॑ किमन्य- 


च्छोठ॒मिच्छसि ॥ अनाख्येयं न मे किखिद्स्ति स्वस्त्यस्तु तेडनच ॥ नास्यां तिथों क्षयमुपेति 
हुत॑ च दत्त तेनाक्षयेति कथिता सुनिभिस्तृतीया ॥ उदिश्य दवतपितुन्‌ क्रियते मलुप्यस्तच्चा- 
क्षय भवति भारत स्बमेव ॥ इति श्रीमविष्ये अक्षयय्यतृतीयात्रतम्‌ ॥ अस्यामेव विष्णघमों. 


त्तरोक्मक्षय्यतृतीयात्रतम्‌ ॥ वैशासे झुक्ृ॒पक्षे तु तृतीयायामुपोषितः ॥ 
स्वस्य सुकृतस्य च ॥ तथा सा कृत्तिकोपेता. विशेषेण- च पूजिता ॥ 


अक्षय्यं॑ फलमाप्नोति 
तत्र जत हुत॑ दत्त 


समक्ष य्यमुच्यते ॥ अक्षयया सा तिथिस्तस्मात्तस्याँ सुकृतमक्षयम्‌ ॥ अक्षतेः पूज्यते., विष्णु- 


स्तेन साप्यक्षया स्मृता॥ अक्षतेस्तु नरःस्नातो 


विष्णोद॑त्वा तथाक्षताव्‌ ॥ सक्तृश्व संस्कृतांश्रेव 


हुत्वा चेव तथाक्षताव्‌॥ विप्रेष॒ दखा तानेब तथासक्तस्खुसंस्कृतान ॥ पकान्नंत महाभाग 
फलमक्षय्यमश्नते ॥ एक मप्युक्तां यः कु्यांचतीयां भूगुनन्दन ॥ एतावत्त तृतीयानां सबासां तु 


फल लभ्षेत्‌॥ इति अक्षय्यततीयाबत संपूर्णम्‌ ॥ 


रम्भाब्तम्‌ ॥ 


अथ ज्यष्ठशक्नतृतीयायां रम्भाव्रतम्‌ ॥ त | 
20 प यत्नेन रम्भाख्यं बतमुत्तमम्‌ ॥ ज्येष्ठशुक्तृतीयायां स्नात्वा नियमतत्परा ॥ 


अत तथा रम्मा सावित्री बटपेत॒की:॥ कृष्णाष्टमी 
व्रतविध्यादिक तु हेमाद्रों 


तियिग्नाह्ा | तत्रेब ब्रतमाचरेत्‌ ॥ 
च कतव्या संघुखो तिथि: ॥ 
रम्भाव्रतानिणेयः ॥ मथुलुवा ॥ 


हसब २ [7 7++-+---....0.२२३य। उवदवे समागच्छ 


"से वे अक्षय होगी. यह सब मैंने कह दिया और क्‍या | 


37वा चाहते हो। हे निष्पाप ! तेरेसे मुझ कुंछ-भी गोप- 
नीय नहीं हे ५ है भारत ! इस तिथिको जो भी हवन, दान 
क्रिया जावा हैं वो - कभी 


उलआओ + श्यदतीया कहते हैं । देवता और पितयोंके 


“इशस जो भी कुछ किया जाता है वह सब अक्षय हो 


है. 
गाता हैं। यह श्री भभिष्यपुराणका कहा हुआ अक्षय तृती- 
3 नव पूरा हुआ तथा-इसीमें (विष्णु धर्मोत्तर पुराणका 


३ डुगा, अक्षय तृतीयाका ब्रत कहा है कि, वेशाख शुछ्या | वि 


कि 
उवीयाके दिन वास करके सब सुकृतका .अक्षय फल 
गजाता है। यदि यह कि स् 


सब्‌ अक्षय हो जाता है, 
इसमें सुकृत अक्षय हो- 
एक ओर कारण भी है 
पूजा होती है, अश्षतोंसे 
मान किया हुआ मनुष्य विष्णु भगवावके डिये अक्षतोंको 
अजर जे शा और जश्तोंका हवन करके वैसे ही 
अश्त्त और संस्कृत सतुओंको 
ह् 0५4८ ॥ 
पर ह हि जाताहे। है भगुनन्दन ! जो इस प्रकार 
०४० २ छेता हे वो सब दीज्ोंके ब्रतोंका 
..___+ है यह अक्षय तदीयाका बत पृणे हुआ || 


कि, इसमें अक्षतोंसे भगवाबकी 
सस्‍्तान किय है 


दुक्त माधवीये भविष्ये--क्ष्ण उबाच 


प्येक्नोभाग्यमातिकामाय। 


नाशको भ्राप्त नहीं होता! इस 


और पक्तान्नको ब्राह्मगोंको ड् 


ह। स्वणेगोरीकी पूजा 


॥ भ्रद्रे 
पूबविद्धा 
। च भूता 
संवत्सरकोस्तुमादों द्रष्टन्यम्‌ ॥ इति 


ध | आवणशुक्कत॒तीयायां मशुस्रवारूया गुजेरेष असिद्धा। तस्या 
अस्मदेशेपअविद्धत्वादिधिनोक्त)॥ सा परयुता श्राह्या॥ स्गोरीत्रतम ॥ 


कवृतीयायां स्वरंगौरीत्रतम्‌ ॥ एतत्च क्णोटकदेशे 
सकल्प/-मम इह जन्मनि जम्मान्तरें च अक्ष 
_.. ये ओपरमेश्रमीत्यथ॑ स्वर्णगौरीक्रतमह करिष्ये ॥ तत्र 


अथाचारप्राप आवणगशु- 
जे दक्कततीयायां मलिद्म्‌ ॥ तप 
पुत्रपोत्रादिधन धास्ये- 

पूजा -देवदेवि समागच्छ 
अथ रंभाव्रतमू-ज्येष्ठ शु 


५ का तृतीयाक दिन रंभावरत होता 
) यह साधवीय धर्मेशाखर्म भविष्य पुराणको लेकर कहा 
है| भगवान्‌ कृष्ण छुभद्रास बोले कि, प्रयत्नके साथ ज्ये४ 
शह्ला तृतीयासें स्नान करके नियममें तत्पर - होकर रंमांना- 
भर उत्तम ब्रतकों करे। इसमें पूर्व॑विद्धा तिथि ग्रहण करनी 
चाहिये । उसीसे ब्रतभी करना चाहिये क्योंकि, कृष्णाएमी 
<है तथा) रंभा; भूता और वटपेतृकी सावित्रीके अतोमें पूव॑ 
संमुखी तिथि 'पूव विद्वए करनी चाहिये । यदि ब्रतकी 
वि तथा दूसरे विधान देखने होंतो, हेमाद्रि तथा संबत्सर 
अस्तुभादिकमें देखने।यह रंभाके ब्रतका निगय हुआ॥ . 
ये सबुखवा अतमू--आ्रवण शुक्ला तृतीयामें मधुस्तवा 
भका अत गुजरात होता है पर वो ब्रत हमारे देशमें 
असिद्ध नहीं है इस-कारण नहीं कहा । उसे 'जब तृतीय 
जायिस युक्त हो तत्र ग्रहण कर्ना' चाहिये ।| स्व 
गो रीजव-अब अं बारसे प्राप्त जो श्रावण झुका: तृतीयामें 
स्वणगोरीत्व होता है उसे लिखते हू । इस कर्णाटक देशम 
दे शुस्छा तृतीयाकों करते हैं, इसका संकल्प तो मेरे 
स्स जन्म ओर: जन्मान्तस्पे अक्षय सौभाग्य और पुत्र 
पोआदि घन बान्य ओर ऐश्वयेकी प्राप्तिके छिये.तथा ओऔीप- 
शमवेरको प्रसन्नताके ढिये स्वणगौरीजबर्ज करता हूं, यह 
कहते है-हे देवि ! हे देत्रि ! आजा, 


 अतानिं, ] भाषारीकासमेंलः । ८ 





 आर्थयेडहु जगत्पते ॥ इसमां मया कूतां पूजां गहाण सुरसत्तम ॥ आवाहनम्‌ ॥ भवानि त्व॑ महा- 
देवि सर्वत्तोभाग्यदायिके अनेकरत्नसंयुक्तमासनं अतिगह्मयताम ॥ आसनम्‌ ॥ सुचारू शीतल 
दिव्य .नानागन्धश्ुवासितय्‌ ॥ पाद्य॑ गृहाण देवेशि महादेवि नमो5स्ठले ॥ पाद्यम ॥ श्रीपारवंति 
महाभागे शड्गरमियवादिनि ॥ अध्य गृहाण कल्याणि भ्ना सह पतित्रते ॥ अध्येम्‌ ॥ गड़ा- 
तोथ समानीतं सुवगेकलशे स्थितम्‌॥ आचम्यतां महामागे भवेन सहितेइनवे ॥ आचम नी- 
 यम्‌ ॥ गड्ासरस्वतीरेबाकावरीनमंदाजछे! ॥ स्तापिताधि मया देवि तथा शातिं कुरुष्व म ॥ 
स्ञानम्‌ ॥ सर्वभूबाषिके सोम्ये लोकडजानिवारणे ॥ मयोपपादिते तुभ्यं वाससी भतिगहा- 
ताम्‌॥ वख्धम्‌॥ कज्चुकीम। आचमनीयम्‌ ॥ कपूरकुडकुमयुक्त हीरद्रदिसमन्वितम॥ कच्त्रिका 
समायुक्ते चन्दन म्रतिगह्मताम्‌ ॥ चन्दनम्‌ ॥ हरिद्वाकुकुम चेव सिन्दूरं कल्नर्ल तथा॥ सोमाग्य- 
द्रव्यसंयुक्त गहाण परमेश्वरि ॥ सोमाग्यद्रव्यव ॥ माल्यादीनीति एुष्पम्‌ ॥ देवहुमरसोद्धतः 
कालागरुसमन्वितः ॥ आव्रायंतामयं धूपो भवानि प्राणतर्पणः ॥ धूपम्‌ ॥ आज्य चेति दीपमू॥ 
अन्न चतुवर्ध स्वाइ० इति नेवेध्यम्‌ ॥ आवचमनीयम्‌ ॥ कपूरेलालबड्भादिताम्बूलीदललंयुतम ॥ 
कछकायियुते चेव ताम्बूले मतिश्हताम्‌ ॥ तांम्बूछम्‌॥ इदं फल मया देवि० इति फलम्‌ ॥ 
हिरण्यगर्भेति देक्षिणाम्‌ ॥ नीराजनम्‌ ॥ नमस्कारम्‌ ॥ यानि कानि च पापानि० इति अदक्षि- 
णाम्‌ ॥ पृष्पाजलिम ॥ पुत्रान्‌ देहि धन देंहि सोभाग्य देहि छुब्त ॥ अन्याँध सर्वेकार्माश्व देहि 
देवि नमोस्तु ते ॥ इति मारथना ॥ भवान्याश्र महादेव्या बतसंपूर्तिहेतवे ॥ भीतये द्विजवयोय 
बाणकं भरददाम्यहम्‌ ॥ नानाबोडशपकात्रेवेणुपात्राणि बोडश ॥ कुर्यादखादिमियुत्तान्याहय 
द्विजदम्पतीन्‌ ॥ व्रतोद्यापनस्िद्धयथ तेभ्यो दद्याद्धती नरः ॥ स्वलंकृताः सुवाधिन्यः पातित्र- 


व्येन भूषिताः ॥ मम कामसमृद्धचर्थ मतिगहन्तु वाणकम ॥ इति स्वणेगौरीपूजा ॥ 





हे सुरसत्तमे | मेरी की हुईं पूजाकों महणकर [इससे आवा- | 
हन । तथा-आप भवानी और आपही महादेवी ह आपही | 

हि. कर गों ; 
सब सोभाग्योंकी देनवाली हं- इस अनेक रत्नोंस जड़ हुए | | ॥ 
| तथा-आज्य च वतिसयुक्तम”' इस प्रन्त्रस दीप । तथा- 


आसनको आप ग्रहण करें, इस मन्त्रस'आसव । तथा०- 


अच्छी तरह ठण्डा एवम्‌ अनेक तरहकी सुगन्वियोंस सुग- | 


न्धित हुआ पाद्य अहण करिये, हे देवेशि ! हे महादेवि | 


छः ५ कप ध् श २३ 
जे छाया हूं वो सोनेक कलुशमें रखा हुआ हे है महाभागे! 


अनध | शिवके साथ आचमन कर्‌, इस मन्त्रस आचस- |! 
नीय। तथा गज्ञा, सरखती, रेवा, _कावेरी और नमंदाके | 
पानीसे मेने आपको स्नान कराया है तेसे ही आपभी मुझे 

ः | तथा -ब्रव संपूर्विके छिय और महादेवी भवानीकी प्रसन्नता 
षणोंस बढकर हैं छोककी छज्ञाका निवारण इनसे ही | 
| देकर, पीछे त्रत्ती पुरुषको चाहिये कि, सोलह वेजुपात्रोंमें 
| सुहाल भर, ट्विजद्पतियोंको बुछाकर, अतके उद्यापनकी 


शांति दे, इस मंत्रस स्नान । तथा-ये सुन्दर बस्ध सब आशभू- 
भ्ै पष है. | 

होता है, में इन्हें आपको देता हूँ आप अहण करिये,,इस 

मन्‍्त्रसे वख देकर कंचुकी और आचमनीयको देना चाहिए॥ 


कपूर, कुंकुम, हलछदी और कस्तूरी इसमें पडी हुई हैं एस | ्‌ 
चन्द्नको ग्रहण करिये, इस मंत्रस चन्दत। तथा हरिंद्रा, | हे पातित्रत्यस भूषित खझूतव सुवासिनियों ! मेरी मनो- 
उकुम, सिंदूर और कजजढको सौभाग्यद्रव्योंके साथ ग्रहण | 


| पूजा ॥ 


करिये। इससे सौभाग्य द्रव्य । तथा-“माल्यादीनि” इस 
९३ 





मन्त्रसे पुप्प। तथा-देवद्रसके रससे बन" गया, जिसमें 
कि, काछागुरु मिल हुए हैं ऐस घूपको सूंधिये, है भवानी । 
इसमें बडी सुन्द्र सुरभि आ रही है, इस मनन्‍्त्रस धूप | 


“अन्ने चतुविध खाढु” इससे नेवेद्य निवेदन कर; आचमन 
कराना चाहिये || इसमें कपूर, एलां, छत्र॑ंग, तॉबूछीदछ 


तेरे छिय नमस्कार है । इस मन्त्रस पाथ। त्था-शझ्गरकी | और सुपारी पडी हुईं हे पान लीजिये; इस मेत्रस पान । 
प्यारी बोलनेवाल्टी महाभागे पार्वति ! कल्याणि ! पति- | 
समंेत्र अध्य ग्रहण करिये, इस संत्रस अध्ये | तथा-गड़ाः । 
| सकार और यानि कानि च पापानि” इस मन्त्रसे प्रदू- 


तथा-“इद फछे मय देवि” इससे फूछ। तथा-“ ओमू 
हिरण्य गर्भ: ” इस सन्त्रंस दक्षिणा, पीछे नीराजन नपम्त- 


श्लिणा, तथा-पुष्पाजलि; एवम्‌ है सुब्रते ! पुत्र दे, धन दे, 
सौभाग्य दे तथा और भी सब कामनायें पूरी कर। तेरे 
छिय नमस्कार है। इस मसन्त्रसे प्राथना करनी चाहिय। 


के छिय, ब्राह्मणकों वाणक देता हैं । इस मन्त्रस वाणक 


सिद्धिके छिए उन्हें दे दे तथा देतीवार यह कहना चाहिये- 


कामनाको पूरी करनेके लिए वाणक छो। यह स्वरणगोौरीकी 


(९८ ) ब्रतराजः । [ ततीयां « 
की पडा 
हट 90५ 0 2220 22290 22222 डी 





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_ध् कया ॥ पुरा कैलासशिल्रे लिद्गन्धव॑सेवित ॥ उमया साहते स्कन्दः पम्नच्छ शिवमव्य- 
यम्‌ ॥१॥ स्करद उवाच ॥ कद णासागरेशान लोकानां इक ॥ त्रत॑ कथय देवेश पृत्र- 
पौत्रअवर्धनम्‌ ॥ २॥ शड्टर उवाच ॥ साधु पृष्ठ महाभाग कथयाति षडानन ॥ स्वणगौरीवरत 
नाम सवसंपत्करं नृणाम्‌ ॥ ३ ॥ पुरा सरस्वतीतीरें विमलाख्या महापुरी ॥ तत्र चन्द्रभो नाम 
राजाभूद्धनदीपमः ॥४॥ तस्य द्वे रूपछावण्ये सोन्दर्यस्मरविश्वमे ॥ महादेवीविशालाक्ष्यो भाये 
वालमृगेक्ष णे ॥ ५ ॥ तयोः प्रियतरा ज्येष्ठा तस्यासीन्नपतेमता॥ स कदाचिद्वनं भेजे मृगया- 
सक्तमानसः ॥ ६ ॥ तत्र शादूलवाराहवनमाहिषकुअरान्‌ ॥ हत्वा बश्राम तष्णातेः स तस्मिर्‌ 
विपिने महत्‌ ॥ ७ ॥ चकोरचक्रकारण्डखअजरीटशताकुलम ॥ उत्फुछहलछ को दाम कुमुदो- 
त्पललमण्डितम्‌ ॥ < ॥  अपूर्बमवर्नीशो।सो ददर्शाप्सरसां सरः॥ समासाद सर तीर पीता 
जलमत॒त्तमम्‌॥ ९ ॥ भकक्‍त्पा गोरीमर्चयन्तं ददर्शाप्सरसां गणम्‌ ॥ किमेतदिति पत्रच्छ राजा 
राजीवलोचनः ॥ १० ॥ अप्सरस ऊछुः ॥ स्वर्णगौरीत्रतमिदं क्रियतेड्स्मामिरुत्तमम्‌ ॥। सर्व 
संपत्कर नृ्णां तंत्कुरुष्व तृपोत्तम ॥ ११॥ राजोबाच ॥ विधान कीहर्श ब्रत किफले छव्तया- 
रणाव्‌ ॥ ता उच्चुयोषितः सर्वा नभोमासि तेतीयक ॥ १२ ॥ प्रारव्धव्य ब्रतमिद गॉोर्या। 
पोडशवत्सरान्‌ ॥ तच्छृत्वा सोएपि जम्राह बते नियतमानसः ॥१३ ॥ गुणे; षोडशभियथृक्त दोर 
दक्षिणे करे ॥ बबन्धानन मन्त्रेण भकक्‍त्या गौरी प्रपूज्य च | १४ ॥ दोरक॑ षोडशगण्णं बध्चामि 
दक्षिण करे॥ त्वत्मीतये महशानि करिष्येःहे ब्रतं तब ॥ १५ ॥ ततः कृत्वा व्रत देव्या अगभ- 
ब्रिजमन्दिरे ॥ विश्वालाक्ष्या ततो दृष्छो राजा गोयोः प्रपूजकः ॥ १६ ॥ बद्ध॑ ते दोरकं हस्ते 
हटा च पतिकोपना ॥ न क॒र्तंव्यं न कतंव्यमिति शक्ि वद्त्यपि ।। १७ ॥ त्रोटित्वा सा च 
चिक्षेप बाह्मशुष्कृतछूपरि ॥ तेन संप्पृष्टमात्रेण तहः पल्ववितां गतः ॥१८॥ तदद्वितीया ततो 

इ्टा विस्मथाकुलिताभवत्‌ ॥ तन्‍्मूले दोरक॑ छिल्न गृहीत्वा सा बर्बेन्ध 0:56 %0++++0 77० मी. न पहजा मो अल है कै१५॥ शत 

अथ कथा--पहिछे समयमें सिद्ध मन्धवोस सेवित 
केलासके शिखरपर, उम्रा सहित अव्यय शिवजीसे श्रीस्क- 





व 70772. 
ह7/॥:02: दराराधाानरनााभाभाकाञ काका भयाध नाक 2 











अप्सराय बोलीं कि, हम उत्तम स्वगगोी ब्रत कर रही हे 


न्द्जी पूछने लगे। १॥ हर करुणाके सागर इंशान | हे- इससे भजुष्योंको सब्र संपत्तियाँ मिल जाती हूं हे नपोत्तम 
देवेश ! एक ऐसा त्रत कहिथे जिसस कि, बेटे नातीयोंकी आल कक बोढा कि, कक विधान 
वृद्धि हो ॥ २॥ शिवजी बोडे कि; हे महाभाग पडानन | कर ५. नव करनेस क्या फल होता है कहें तब 
तुमने ठीक पूछा. मनुष्योंको सर्व्रपत्त्‌ देनवाछा स्वणंगौरी |" जियो बोर कि, भाद्रपद्‌ शुक्ला दतीयाक दिन ॥ १२॥ 
नेत है ॥ ३॥ पहिले सरखी नदीके किनारे एक विमछा |. + की प्रारंभ करना चाहिये, यह षोडश वत्सरका है, 
नासकी महापुरी थी वहां कुबेसके सम्रान घन्द्रप्रभा नाम | ई से राजाने भी उस ब्रतको नियमके साथ ग्रहण किया 
की राजा था॥ ४ ॥ उसके महादेवी और विशाराक्षी दो | राजाने भक्तिभावसे गौरीजीका पूजन करके 
ख्रियाँ थीं जो रूप लावण्य सौन्द्य्ये और स्मरविश्रमें निन्नल्िखित भत्रके साथ सोलह तारका धागा बांधा ॥१ ४ 
अद्वितीया थीं, आखें हिरणक वच्चेकी सी थीं॥ ५ ॥ ड्से कि हे महेशानि ! तेरी प्रसन्नताके लिए से दायें हार्थम 
बडी सबसे ज्यादा प्यारी थी, एक दिन वो शिकार खलते सोलह धागोंका एक वरन बांधा हू, में तरा ब्रत कहूँगा 


गया | ६॥ वहां वो शेर, शुक्र, जड्ञलीमैंस और हाथि- | * हक वो देवीका ब्रत करके अपने मकान आया, विश्ञा 
य गोंको मारकर, प्यासका मारा बनसें पूमन छगा॥ ७ ॥ , छाक्षीन देखा कि, राजा गौरीका पूजन करता है ॥ १६॥ 
सकडों हो चकोर, चक्र कारंडब और खजरीटोंस आकुछ | हाथमें उस डोरेको बैँधा हुआ देखकर पतिपर नाराज हुई 
पथा उत्पछ और हह्कोंसे व्याप्त एवम्‌ कुम॒द और उत्पढों | राजा कहते ही रहे कि, न तोड़ियि न तोड़िय ।। १७॥ पर 
से मंडिद ॥ ८ ॥ एक अपूर्व अप्सराओोंका सर देखा, उसके | उसने उस ढोरेको तोड, . सूख वृक्षपर पटक दिया; उस 
कै हैक बज के पिया॥ ९ हज भत्तिभावके डोरेके छू जानेसे सूखा पेड हरा हो गया ॥ १८ ॥ दूसरी 
ँज़ाने उससे पूछा कि १९ अप्सराओंके समहको देख |यह द्ख विस्मित हो गयी और उस डोराकों उठाकर 

निजननन++त.... याकर रही है १॥ १० ॥ अपने हाथरस बाँध लिया ॥ १९ ॥ वो उस ब्रतके माहाः 


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द्रतमाहात्म्यात्पतिप्रियतरामवत्‌ ॥ देवीत्रतापचारण सा त्यक्ता हुखिता बने ॥ २० ॥| 
प्रययों सा महादेवीं ध्यायम्ती नियमार्विता ॥ मुनीनामाश्रमे पुष्ये निवसन्ती सती 
कचित ॥ २१ ॥ निवारिता सुनिषरेगच्छ पापे यथासुखम्‌ ॥ धावन्ती विपिनं घोर गणाध्यक्ष 
ददश हू ॥ २२॥ त॑ च दृष्ठापि सा गोरी द्रक्ष्याम्यहसुपोषिता ॥ इति निश्चित्य मनसा गश्त 
प्रववतेःन्‍्यतः ॥२शा ततो ददशाग्रतस्तु गच्छन्ती च सरोवरम ॥ ततो वन्नश्चिय॑ चाग्रे सर्वाभ- 
रणनूबिताम्‌ ॥ २४ ॥ पह्यन्ती शनकेस्तद्द्रजन्ती चेब माठुषी॥ तेस्तेनिराकृता इुष्टा 
निर्विण्णा निषसाद ह ॥२५ ॥ ततस्तत्कृपया गोरी प्राइरासीन्महासती ॥ ता दृष्टा दण्डवदलूमों 
नत्वा सत॒त्वा नृपप्रिया ॥२६॥जय देवि नमस्त॒भ्यं जय भक्तवरप्रदे ॥ जय शड्भधरवामाड़े मड़ल्े 
सर्वमड्रले ॥ २७ ॥ ततो लब्ध्वा वरं भक्‍्त्या गोरीमभ्यच्य तद्गतम्‌ ॥ चक्के देवीपद॑ तस्ये दो 
सोमाग्यसंपदः॥२८॥ इति तस्याः प्रसादेन सवान्‌ भोगानवाप्य च॥ विज्ञाल्क्षी प्रिया राक्षो 
भूत्वा च मुमुदे भशम॥२९॥एवमाराधयन्‌ गोरी श्ुक्त्वा भोगानलुत्तमान॥अस्ते शिवपुरं प्रातः 
कान्तामिः सहितो नृप: ॥ ३० ॥ यच्छोभमन बतमिद कथितं शिवायाः कुर्यान्मम भियतरों 
भविता च गौया॥प्राप्य श्रियं समधिकां ऊुबि शत्रसंघान्रिजित्य निर्मलपदं सहसा प्रयाति॥३९॥ 
इति श्रीस्कन्दपुराणे गौरीखण्डे स्वर्णगौरीत्रतकथा॥भथोद्यापनम॥ युधिष्ठिर उवाच ॥ उद्यापनविर्ि 
बहि तृतीयायाः झुरेश्वर ॥ भक्तितः श्रोतमिच्छाम ब्तसंपूतिहेतवे ॥ १॥ कष्ण उवाच ॥ उद्या- 
पनवििें वक्ष्य सावधानेन वे ऋणु ॥ त्रिशदण्डप्रमाणेन मभित दक्षिणोत्तरे ॥ २॥ प्रत्यक्म्रागपि 
राजेन्द्र नंव गोचर्म इष्यते ॥ गोचर्ममार्त्र सलिप्य गोनयेन विचक्षणः ॥ ३२॥ मण्डप॑ कारयेत्तत्र 
नानावण खसुशोभनम्‌ ॥ ग्रहमण्डलपार्ख तु पद्ममण्दर्ल लिखेत ॥ ४॥ तम्मध्ये स्थापयेत्कुम्भम- 
व्रणं मृन्मय शुभम॥ ताम्रपात्र म्रकुवीत पले! बोडशभिस्तथा ॥ ५ ॥ तदधर्धिन वा कुर्याद्धित्त 


है. 
्््‌ 











स्म्यस पतिकी अत्यन्त प्यारी होगई किन्तु जो प्यारी थी वो 
देवीके त्रतके अपचारस राजाने वनमें छोड दी ।। २० ॥ वो 


छोग भी उसे अपने आश्रमस निकाल देते थे कि, पापिडे ! 


बरले, भक्ती भावसे गौरीजीका पूजन करके, उस ब्रतकों 


किया; देवीचरणोंने उसे सोभाग्य संपत्ति दी। ९८।॥ | 
भगवतीके प्रसाद्स बिशाढ्ाक्षीको सब भोगोंकी प्राप्ति हुई; | 











यह राजाकी प्यारी स्ली होकर एकदम प्रसन्न हुईं २९ || 


ं ः [ वो | इस प्रकार, गौरीकी क्ृपासे, आराधन करते हुए विशाल" 
कभी मुनियोंके पवित्र आशभ्रसमेँ वसती हुई, नियमपूर्वक | 
महादेवीका ध्यान करती हुई चलने छगी ॥ २१ || मुनि | 


क्षीने ऐसे भोगोंको भोगा जिनसे कोई उत्तम ही न हों, 
अन्तमें स्रियॉसहित वो राजा शिवपुर चल्घागया ॥ ३० || 


| यह मेने गौरीका सुन्दर त्रत कहा हं,जो इस बत्रतकों करता 
तेरी राजी हो वहां चली जा; एक दिन उसे चलते फिरते। 
एक घोर वनमें गणपतिजी मिछ गये ॥| २१ ॥ गणेशजीको | 
देख करके भी उसने निश्चयकिया कि;में त्रत करके गौरीको | 
देखूगी, यह शोच, वहांसे अन्यत्र चछ दी ॥ २३ ॥ इसक | 
बाद उस सरोवर जाती हुईं सजी सजाई वनश्री सामने | 
मिली ॥ २४ ॥ जो जो इसे मिले, सभीने इस दुष्टाका । 
तिरस्कार किया जिस जिसको कि, इसने वनमें धीर धीरे | 
घूमते हुए देखा था पीछे यह दुखी होकर एक जगह, बेंठ | क र 
गईं।। २५ ॥ उस रानीपर कृपा करके महासती गौरी प्रकट | देण्डके ( १९० हाथके ) प्रमाणसे दक्षिणोत्तरमें नपी हुई 
हुई, उन्हें देखकर दुखी रानीने दण्डकी तरह भूमि नव- | 
कर स्तुति की ॥ २६ ॥ है देवि ! तेरी जय हो, है भक्तोंको | 
बर देनवाली तेरी जय हो, हे शकरकी वामाहु ! तेरी जय । 
हो, हें मंगले ! सर्व मंगले ! तेरी जय हो ॥ २७ ॥ गौरीजीसे | 
। छिखाये।।४॥ इसके बीचमें एक साबित शुभ मिट्टीका कलश 


है वो मेरा और गौरीका प्यारा होता हैं तथा लोकोत्तर 
श्रीवाल्ता हो, वेरियोंके समुदायोंको जीत, सहसाही निमलछ- 
पदको पाजाता हैं !३१॥ यह स्कन्द्पुराणमें गौरीखण्डके 
स्व० ब्रतकी कथा पुरी हुईं। अथोद्यापतम्‌--युधिष्ठिरजी 
भगवान्‌ कृप्णजीस बोले कि; हे सुरेश्वर ! तृतीयाके उद्या- 
पनकी विधि कहिये, में त्रतकी संपूर्तिके छिये भक्तिसे 
सुनना चाहता हूं।॥ १॥ श्रीकृष्ण बोले कि, में तुझे उद्या- 
पनकी विधि कहता हूं, सावधान मन करके सुन, जो तीस 


|| २॥ तथा पूर्वेसे पश्चिममें ३६ हाथ हो वो गोचस सात्र 
कहाती है हे राजेंद्र ! चतुर ब्रती, कहे हुए गोचस माज्रकों 
गोबरसे छीप कर ॥ ३ ॥ उसमें अनेक रंगोसे सुशोभित 
एक सण्डप करा, ग्रहमण्डलकी बगलसे एक अष्टद्छ कमल 


ध्थापित कर दें, सोलहपरलोंका एक तामेका पात्र बनाव यह 
कर वा चर २५५ हा 
न हो सके 'तो इसके आधेका ही बनवाले, इसमें लोभ न 


शा विवर्जयेत्‌ ॥ खेतवखयुगच्त्न॑ श्वेतयज्ञोपवीति च॥ ६॥ भाजन च अं है 
परि विन्यसेत्‌ ॥ कर्षमात्रसुवर्णेन प्रतिमा कारयेदबुधः ॥७॥ तद्थे मध्यम शीक्त तदघ त॒ कनि 
प्रकम्‌ ॥ कृत्वा रूपे पयस्नेन पार्वत्याश्व हर॒स्थ च ॥4॥ वेदोक्तेन पतिष्ठा च कर्तेव्या ठ यथा. 
विधि ॥ अथ ताम्रमये पात्रे इतिमां तत्र विन्यसंत ॥ ९ ॥ पावेत्यास्तु थुर्ग दद्याइुपव (तं शि व्स्य 
च ॥ पश्चामृतेन स्नपने कृत्वा .देवस्यथ चोत्तमम्‌ ॥ १०॥ स्नान च॒ कारयेत्पश्वात्ततः पू़ों 
समाचरेत्‌ ॥ चन्दनेन खुगन्धेन सुपृष्पेश्न प्रपूजयेत्‌ ॥ ११ ॥ धूप च कल्पयेद्नन्ध चन्द्नागुरुसं- 
युतम्‌ ॥। नानाप्रकारेनविद्य तथा दीप च कारथेत्‌ [। १२ ॥। अचयेत्पूजयेद्धकत्या गन्धपुष्प! फला- 
क्षते! ॥ आवाहनादि कतंव्य पुराणागमसंभव३ ॥ १३ ॥ काया विधान तः पूजा भक्तिश्रद्धासम- 
न्वितम्‌ ॥ देवदेव समागच्छ प्रार्थथेःहं जगत्पते ॥ १४ ॥ इमां मया कृतां पूजां गृहाण सुरस- 
त्तम ॥ एवं पूजा प्रकतंव्या रात्रों जागरणं ततः॥ १५ ॥ गीलनृत्यादिसंयुक्ते कथाश्रवणपूवकम॥ 
अर्चयेत्पू्व॑वद्व॑ पश्चाद्वोमं समाचरेत॥ १६॥ स्वगृह्योक्तविधानेन कृत्वाप्रिस्थापनं॑ ततः॥ 
प्रारभेश्व ततो होम॑ नवग्रहपुरःसरम्‌ ॥ १७॥ तिलांश्व यवसमिश्रानाज्येन च परिप्लुताव॥ 
जहुयाहुद्रमन्त्रेण गोरीमन््रेण बेदबित्‌॥ १८ ॥ अष्टोत्तरशत वाषि अष्टाबिशत्मिव वा ॥ एवं 
समाप्य होम॑ त॒ तत्राचाय प्रपूजयंत ॥ १९ ॥ अध्यपुष्पप्रदानश्र वस्चालंकारभूषणेः ॥ शकत्या च 
रक्षिणां द्यात्मचारगोंधिकां मताम्‌ ॥२०।घेते सदक्षिणां दरवा सुशीलां च पयस्विनीम ॥स्वर्ण- 
(डी रोप्यखुरां कांस्पदोहनसंयुताम्‌ ॥ २१ ॥ रत्नपुच्छां बखथ॒ुतां ताम्रपृष्ठामलंकृताम ॥ सब- 
सामव्रणां भद्रां घेतु दद्यात्मयत्नतः ॥ २२ ॥ सुवर्णेन समायुक्तामाचार्याय च साथधवे ॥ षोह- 
ग़॒न्निः प्रकरेश्व पकाने पीणयेज्च तम्‌ ॥ २३ ॥ पोड्शप्मितेदद्याद्राहमणेलयः प्रयत्नतः ॥ वंश- 
्रस्थितः पश्चात्पकाब्रेवायन शुभेः॥ ४० ॥ अन्‍्येभ्यों ब्राह्मणेभ्यश्व दक्षिणां च प्रयत्नतः ॥ 
न्‍न्वुनिः सह उुख्सीत नियतश्व परेहहानि॥ एवं कृत्वा भवेत्पार्थ परिपूर्णत्ती यतः ॥ २५॥ 
ति श्रीसकल्दपुराणें क्रष्णयुव्रिष्ठिससंवादे स्वणंगौरीब्रतोद्यापनम्‌ ॥ 


रना चाहिये उसे दो सफेद कपडोंस ढककर; सफेद ही 





द | तृतीया« क्‍ 


कलशो- 


| ८॥ वेदिकविधिसे उसकी यथावत्‌ प्रतिष्ठा करके उसे 
बेके पात्रपर रख देता चाहिये ॥ ९॥ पाव॑तीजीको दो 
ख तथा शिवजीको जनेऊ देकर, देवका पंचामृतसे उत्तम 
मात कराकर ॥| १० | पीछे शुद्ध पानीसे समान कराके 
जा प्रारंभ करनी चाहिये, सुगन्धित चन्दन और अच्छे 
खेले हुए पुष्पोंसे पूजे ॥ ११ 


ऋरके दीपक कराये ॥१२॥ 


करे, पहिलकी 


डे १॥ चन्दुन ओर अगर जिससे | 
डड़े हों ऐसी धूप दे तथा अनेक तरहके नेवे्को निवेदन 





र्‌ ग ' | चाहिये।।१६।अपने गृह्मसूत्रके विधा न्‍के अनुसार नवग्रहके 
गरनेऊ डालकर ॥ ६॥ उसमे तिरू भर कर कलुशके ऊपर ; > 
ख दे। समझ दारको चाहिये कि, एक कर्षभर सोनेकी | 


[तिं बनवालू ॥७॥ आधे कर्षकी मूत्ति मध्यम तथा चौथा- | मंचोंसे और गौरीमंत्रसे हवन करे।। १८ ॥ एकसों आठ 


की कनिष्ठ कही है,वो हृवहू गौरी पावंतिकी होनी चाहिये | 


पूजनक साथ अम्निस्थापन करके हवनकरना चाहिये॥१०७ 
वेदका जाननंवाढ्य, घीसे भिगोये हुए तिछ. जौओंका रुद्र 


आहुति अथवा अद्ठाईंस आहृति दे,होम समाप्त करके आचा' 
यका पूजन करे ॥१९॥ अघ दे, फूछ चढावे तथा और भी 


| वल्लालंकार दे; गौसे अधिक मूल्यकी दक्षिणा दे ॥ २०॥ 


गोकी दक्षिणसहित गऊ दे जो दूध देनेवाली हो,सुशीलहो॥ 


| जिसके सोने मढे सींग और खुरोंमें चांदीहो अथवा सोने 


सींग और घांदीके खुर भी उसके साथ दें, कांसेका एक 


| दोहना दे॥२ १॥रतनोंकी पूंछ तांबेकी पीठ भी देनी चाहिये, 


हे गे | वह कपडा उढाई हुईं अलंकृत होनी चाहिय ।॥॥२२।| गऊके 
वेदोक्त औ गन्ध,पुष्प फछ और अक्षतोंसे | 
पर के । व जज ज्र _ 
पा है या जा द्कि 223 । दे, उसे सोलह प्रकारके पक्कानोंस उत्पन्न करना चाहिये 
ये कि | ५9... नस पूजा करनी | ॥२१॥ सोलह सपत्नीक आद्यणोंको प्रयत्नके साथ भोजन 
इस कि,हे दुंव ! हर देव | आशओोहहे जगत्पते | मेंआपकी । रे हे 
थेना करता हे शैर जा ३ 
हे हे | ४0 है सुरसत्तम ! मैंने जो यह पूजा | पिटारी दे॥२४॥दूसरे ब्राह्मणोंकोभी प्रयस्नके साथ दृक्षिणा 
चाहिये । शी करिये पूजा करके राषको जागरण करना | 
| "2 साथ्‌ बस अवण । है पार्थ | इस प्रकार करके उसका ब्रत पूरा हो जाता है 
“--...... रना | ॥२५॥ यह स्वणंगौरी्रवका उ्यापन पूरा हुआ ॥। 


साथ कुछ सोना भी देना चाहिये,यह सब साधु आचारयको 


कराकर,सुन्दर पक्कान्नके साथ उन्‍हें बांसकी सोछ॒ह सौभाग्य 


देकर दूसरे दिन नियमपूर्वक भाशयोंके साथ भोजन करें 


... १ बच्बुगम। 


जछछ . ६ 





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अथ सुकृततृतीयाविधिरुच्यते ॥ 


अआवणशुक्लत्तीयायां सुकृतब्रतम्‌॥ तत्र सा मध्याह्रव्यापिनी, माह्या ॥ अथ वथा. ॥ शोनक 
उदाच ॥ सर्वकामप्रदायीनि त्रतानि कथिताएने वे॥ढ॒त कथय यत्नेन येन श्रेयोईहमाप्ठ याम्‌ ॥ १॥ 
खूत उवाच ॥ साधु साथु महाभाग लोकानां हितकारकम्‌ ॥ कथयाभि द्वतं दिव्ये योदितां पल- 
दायकम्‌ ॥ २॥ कृष्णस्थावरजा: साध्वी सुभद्रा नाम विश्वुता ॥ रूपलावप्यसंपन्ना खुझ्गा 
चारुहासिनी ॥ ३ ॥ गाण्डीवधन्वनश्वासों योषितां च दरा प्रिया ॥ त्रेलोक्याधिपातिः क्रष्णस्त- 
स्थाहं मगिनी प्रिया ॥ ४ ॥ इाते गर्वसमाविष्टा न किंचिदकरोच्छुभम्‌ ॥ कालो5षपे थस्य चाज्ञां 
व शिरसा धारयेत्सदा॥ ५॥ स मे श्राता सखा कृष्णो दठुजानां निकृन्तनः ॥ इाते संचिन्त्य 
मनसि न किंचित्साकरोत्तदा ॥ ६॥ सर्व ज्ञातं तदा तेन देवदेवेन शाहिणा ॥ इति संच्ित्त्य 
मनसि अआात्त्वान्मम गौरवात ॥ ७ ॥ भवाब्धितारणं किंचिन्मूटत्वान्न करिष्यति ॥ ध्यात्वा 
सुहर्त मनसि श्रीकृष्णो भक्तवत्सलः ॥ ८ ॥ खुभद्रानिकटे गत्वा बचन॑ चेदमबवीत्‌॥ परलोक- 
जिगीषार्थ न किंचिदषि ते कृतम ॥ ९ ॥ व्रत कुरुष्व मनसा संवान्कामानवाप्स्यसि ॥ खुकूत॑ 
तारक॑ लोके लोकानां हितकारकम्‌ ॥ १०॥ यत्कृत्वा- सर्वेपापेभ्यों झुच्यते नात्र संशयः ॥ 
भाहिसक्तिपदं चापि सर्वसोभाग्यदायकम्‌ ॥॥ ११॥ व्रत कुरुष्व चायेव खुकृतस्य फलाप्तये ॥ 
कालो5ह सर्वलोकेषु वृक्ष रूपेण संस्थितः ॥ १९॥ धर्मस्तस्थ च मूल हि ऋतवः स्कत्घ एव 
च्‌ ॥ मासा द्ादशसंख्याकाश्रोपशाखा हात॒ुकमात्‌ ॥ १३॥ षष्ठचाथिकं च ब्रिशतं फलानि 
दिवसास्तथा॥ पर्णानि घटिकाः प्ोक्ताः कालोएहं वृक्षरूपकः ॥ १४ ॥ तस्मात्फलानां आप्त्य्थ 
ब्रत॑ कुरुष्ष शोमने । नभोमासे च संपाते शुक्रपक्षे व भामिनि ॥ १५॥ ततीया हस्त- 
संथुक्ता ब्रत॑ कार्यमिद शुलम्‌ ॥ प्रातश्रेवः सम्ुत्थाय दन्तधावनपू्वकम्‌ ॥ १६॥ स्नान कुयो- 
द्यथान्याय हरिद्वानिः समन्वितम्‌ ॥ मध्याह्ने चेव संप्राप्ते कृत्वा गोमयमण्डलम्‌ ॥ १७ के 


पढे & की पथ 


चतुद्धोरेण सहित मण्डपं तत्र कारयेत्‌ ॥ वेदीं विरच्य धवलां हस्तमात्रां विशषतः ॥१८॥ तन्मध्ये 





थोडी देर शोच भक्तवत्सलछ श्रीकृष्ण ॥८॥ छुभद्राके समीप 


अथ सुकवनृतीयात्रतम्‌ू-अत्र सुर्कत तृतीयाके ब्रतको | हा 3 हे 
जाकर बोले कि,परलोकको जीतनेकी इच्छास तेन कुछ भी 


कहते हैं । श्रावण शुक्ला ठृतीयाको सुक्ृतत्नत होता हैं; पर | 
तृतीया मध्याह व्यापिनी होनी चाहिये। अथ कथा | शौन- | नहीं किया हें ॥९॥ तू मनसे त्रदकर, सब कार्मोको पावेगी, 
कादिक ऋषि गण बोके कि, आपने सब कामनाओंक | छोकमें सुकृतवारक हैं, लोकोंका हितकारक हैं ) १० ॥ 
देनेवाले ब्रेंव तो कहदिये अब प्रयत्नके साथ उन ब्रतोंको | इस त्रतको करके सब पापोंसे छूट जाता है, इसमें कोई 
कहिये जिनसे हमें श्रेय मिछ्ठे ॥ १॥ सूतजी बोडे कि, | सन्देह नहीं है, यह सुक्ति और मुक्तिप्रद तथा सब सोभा- 
हे महाभाग! आपने अच्छा पूछा इससे छोककए हितहै एक | ग्योंका देनेवाछा है ॥११५॥ तू अभी सुकृत फलको 
ऐसे दिव्यत्नतको कहगा जो ख्रियोंको फरूंदायकहे | २। | पानेके लिय तब्रतकों कर, में काछ हूं, सब छोकोर्मे वृक्ष 
(भगवान्‌ क्ृष्णकी छोटी बहिन,सुभद्राके नामसे प्रसिद्ध थी। | रूपसे स्थित हैं; ॥ १३१॥ धर्म ही मूल हैं, ऋतु स्कन्द्‌ 
वो रूप छावण्यसे संपन्न,सुन्दर हसनेवाल्ली सुमुखी थी॥३।। | है, अनुक्रमस बारहों महीना उप शाखाएं हैँ ॥ १३॥ 
गाण्डीव धन्वा अजुनकी प्यारी पथ्रानी और तीनों छोकोंके | तीनसों साठ दिन ही उसके फल हैं, घडी पत्तियां हैं ऐसा 
स्वामी कृष्णकी में प्यारी छोटी बहिन हू ॥४॥ इस अभि" | काछरूप दक्ष में हीहूं॥१४॥ हे शोभने | इस कारण 
मानसे उसने शुभका कुछ भी संचय नहीं किया, जिसकी | फरलोंकी प्राप्तिके लिये तू ब्रतकर हे भामिनि!भाद्रपदमासके 
आज्ञाको काल भी अपने शिरपर सदा धारण करताहे॥०।॥ | शुक्र पक्षकी ॥ १५ ॥ हस्तनक्षत्रसंयुक्ता ठृतीयाके दिन 
वो मेरा भाई सखाक्ृष्ण है जो राक्षसोंका सहार करता है। | इस शुभव्नतको करना चाहिये । प्रातःकाकू उठकर दातुन 
ऐसा मनमें शोचकर उस समय उसने कुछ भी नहीं किया | करके ॥१६॥ उचित रीतिस हऊदी छगाकर स्नान करना 
)॥ ६ ॥ देवदेव कृष्णने यह सब जान छिया और यह शोच- | चाहिये ॥मध्याह्कारूमें गोवरका चौका छगाकर ॥ १७॥ 
-कर कि, मैं इसका भाई हू, मेरे गौरवसे ॥ ७॥ संप्तार | उसमें चतुद्दॉससहित एक सण्डप बनाना चा। हिये, उससे 
सागरसे तरनेका कुछ भी उपाय न करैगी क्योंकि मूढह यह | हाथ भरकी सफेद बेदी बनाकर ॥ १८ ॥ उसके बीच 







हद॒ले पद्ममक्षतेः परिकल्पयेत्‌ ॥ पीढे मां चोपरि स्थाप्य क्षीराव्यिखुतया सह ॥ १९ | 
उपचार पोडशामः पूजयेद्धक्तिसंयुतः ॥ पष्टचविक च॒ ब्रिशत खुक्ृतस्थ फलानि वे ॥२०॥ 
गोधूमचर्णन फर्ल शकरानिः समन्वितम्‌ ॥ उड़म्बरस्थ वृक्षस्य फलाकार च कारयत्‌॥ २१॥ 
वेणपात्रे च संस्थाप्य वाणक॑ च द्विजातये ॥ सहिरण्यं सताम्बूल दद्याजव यथाविधि ॥ २२॥ 
वायनमन्त्र--पुत्रपौजसमद्धचर्य सोमाग्यावातये तथा ॥ वाणकं बे प्रदास्थामि त्रतसंपूर्तिहेतवे 
॥ २३ ॥ पिछस्य च फलानां वे पायसं परिकरपयेत्‌ ॥ श्रातुस्वरूपिणं मां च भोजयित्वा यथा- 
विधि ॥ २४॥ इति कृत्वा च विधिवत्समाप्य च ततः परम्‌ ॥ तृतीये वत्सरे प्राप्ते उद्यापन- 
विधि चरेत ॥ २५ ॥ आचाय॑ वरयेद्धक्तया वेदवेदाड़पारगम्‌ ॥ सुशील सवे धर्मश शास्तं दाल 
कुटुम्बिनम्‌ ॥ २६॥ स्वत्ति वाच्य द्विजेः साके नानदीक्राद्ध विधाय च ॥ हेमी च प्रतिमा 
फ्यांत्रिष्कनिष्काधसंख्यया ॥ २७ ॥ क्षीराबश्यिसुतया साक॑ मम शक्त्या > भक्तितः ॥ नवीन 
हलशां ताम्रं विधानेन समन्वितम्‌ ॥२८॥ पहुवेश्व हिरण्येश्व वस्रयुग्मेन वेष्टितम ॥ तम्मध्ये मां 
गतिष्ठाप्य उपचार प्रपूजयत्‌ ॥२९ ॥ ततः पुष्पाअलि दद्यात्क्षमाप्य व पुनः पुनः ॥ वाणक हि 
दान ब्रतसंपूर्तिहितवे ॥३०॥ लक्ष्मीनारायणो देवो ह्ास्मात्संसारसागरात्‌॥ रक्षेंद्रे सकलाद 
7पादिह स्व ददातु में ॥ २१ ॥ अच्युतः प्रतिगृह्मयति अच्युतो वे ददाति च ॥ अच्युतस्ता- 
कोमाभ्यामच्युताय नमो नमः ॥ ३२॥ रात्रों जागरणं कुर्याहरीतवादित्रमड़ले! ॥ पुराणश्र- 
णेनेव रात्रिशष ततो नयेत्‌ ॥ ३३ ॥ प्रभाते विमले स्नात्या नित्यकम समाप्य च ॥ विष्णो- 





क्षत्रोंस अष्टट्छ कमछ बना डाले; उससें सिहासनपर | 
ध्मीके साथ मुझे बिठलाकर ॥ १९ ॥ पोडशोपचारसे 
क्तिसहित पूजे, तीनसो साठ झुक्ृतके फछ ॥ २० ॥ गेहूके | 


नेक बनेहुए तथा शर्करा मिंले हुए, गूलरके फलके बराबर 
नाले ॥२१॥ उन्हें बांसुके पात्रमें सोना और पामके 


थ रखकर, उस वाणकको विधिक साथ ब्राह्मणक | 
ये दान कर दे ॥ २९॥। वायनका मंत्र-पुत्र पौन्रोंकी | 
पृद्धि तथा सौभाग्यकी ग्राप्तिके लिये तथा ब्रतकी संपूर्तिके | 
ये वाणकका दान करता हूं॥२१॥पिष्टकी और फहोंकी | 
र बना श्राठृस्वरूपी मुझे भोजन कराकर || २४ (| इस | 
धर विधिक साथ ब्रतको समाप्त करके इसके बाद, | 


कक कक 


सरे वर्षमें उद्यापन कर ॥ २५ ॥ वेद्वेदान्तोंके जान- 
१) स्वेधममज्ञ, सुशील, शान्त, दान्‍्त और कुटुम्बी 
'चाय्यका वर॒न भक्ति सावके साथ 


छश || २८ | जो पंचपद्चबोंस हिरण्यसे और दो व्ोंसे 


छी प्रकार पूजना चाहिये ॥२९॥ इसके पीछे पुष्पांजलि 
हे जड क्षम्ापन कर, अतकी संपूर्तिक छिये बाणक 
गो चाहिये ॥ ३० ॥ छश्मीनारायण देव ही इस संसार 


नागर और सब पापोसे से ४ 
४।॥ ३० | झर मेरी रक्षाकरें तथा यहां मुझे सब 


शो देते द्त “एरफज--5 है| पर स्यान दोनोंका किया जाता दे। चाहें दोनों झंजरोक दोनोंस अच्युत ही 


हे । करके ॥ २६ ॥ ! 
स्तिवाचनपूर्वक नान्दीश्राद्ध करा, निष्ककी हो, चाहें । 
थे निप्ककी हो, एक सोनेकी प्रतिमा कराबे || २७ | | 
| मूर्ति द््मीनारायणकी हो, ढकनेके साथ नया तांबेका | 





पार करते हैं ,अच्युतके लिये ही वारंवार नमस्कार है।॥।३२॥ 
इसके पीछे गाने बजानेके साथ रावकों जागरण करना 
चाहिय, बाकी रात तो पुराणकी- कथा सुनकर, बितानी 
चाहिये ॥ ३३ ॥ निर्मल प्रभातमें स्नानकर, नित्यकमसे 


| निवृत्त हो “ ओम विष्णोनुक वीर्य्याणि प्रवोचम्‌ पार्थि- 


वाति विममे रजांसि । यो अस्कभाय दुत्तरा सधस्थे 
विचक्रमाणख्रधोरुगायः ” भगवान्‌ श्रीमन्नारायणके पुरुषा- 
थेको कोन वर्णन करसकता है, जिस क्रान्त दर्शीने पैच- 


'तत्त्वके बने हुए,तथा शुद्ध सत्व अथवा अग्राकृत तरूंव॒के बने 


हुए, लोकोंका निंमाण किया है। जो तीन डगमें बलिका 
राज्य ल उपेन्द्र बनकर बैठ गया। तीनों विधानोंसे जिसकी 
बडी बडी स्तुतियाँ गायी जाती हैं | इस संत्रत्त तथा “ओम 
सक्तमिव तितउना पुनन्तो यत्र धीराः मनसा वाचमतक्रत ॥ 
अत्रा संखायः सख्यानि जानते भद्देबां लक्ष्मीमनिहिता- 
धिवाचि ॥ ” इस मेत्रका महर्षि पतेजलिजीने दूसरा ही 
अथ किया है, पर पहिछा हवन विष्णु भगवानका है तथा 
प्रयोगभी लक्ष्मीनारायण भगवानकी पूजाके बाद हृवनमें 


जी आर शत कम |] | होताहे तब इस मंत्रका छक्ष्मीपरक अर्थ होना अत्यावश्यक 
वे हो, उसके बीचमे मुझे प्रतिष्ठित करके उपचारोंसे | 


कि कक 
है। जस सतुआओंको चालनीसे छानकर पवित्र बना लेते 


| इसी तरह धीर पुरुष मनसे लक्ष्मीके पवित्र मंत्रोंको विशुद्ध 


कप 


कर लेते हैं। इस अवस्थामें ऐसे पुरुष लक्ष्मीका साश्षात्‌- 
कार कर लेते हैं, ऐसे पुरुषोंकी भद्रा छक्ष्मी वेदके संत्रोंसि 
यहां प्रतिष्ठित की गईं है। दोनों मेन्नोंस आहुति एक होठी, 
पर ध्यान दोनोंका किया जाता है। चाहें दोनों मंत्नोंके 


१ सन्धिराषे: । 





अंतानि, | (१०३ ) 
लेक॑ सक्तुमिव होममन्त्रद्यं स्पुतम्‌ ॥ रे४ ॥ अष्टाधिकद्िशतं च तिलेहोंम॑ तु कारयेताबलश। 
भतिमाथुक्तमाचार्याय निवदेयेत्‌ ।१३५॥ गां द्यात्शपिलां चेव सालंकारां सदाश्षिणाम्‌ ॥ आचार्य 
पूजयेद्धकत्पा वल्लेराभरणेरपि ॥ ३६ ॥ ब्राह्मणान्भोजयेत्यश्वाइतुंबिशलिसंख्यकान्‌ ।। आशिषो 
वे गहीत्वाथ स्वयं शुञ्जीत वाग्यतः ॥ ३२७ ॥ इति तस्य वचः श्र॒त्वा तत्सव हि चकार सा ॥ 
भ्ुकत्वा मोगान्यथाकाममन्ते स्वंगे जगाम सा ॥३८॥ इतिश्रीमविष्योत्तरपुराणे सखुकऋतब्तकथा ॥| 
दरिवाकिक्राज्तमस्‌ ॥ 
अथ भद्॒पदंशुक्कततीयायां शिष्टपरिगृहीत हरितालिकाब्रतम्‌ ॥ तन्च परयुतायां ( विद्ध 
कार्यम्‌ू-“मुहतमात्रसलेषपि दिने गौरीतजत॑ परे” इंति माधवोकेः॥ हरितालिकाब्नतपुरस्कारेणापि 
परविद्धा ग्रहणवचनादिवोदासीये उदाहतत्वाद्य ॥ तत्र त्रवविधिः॥ भाद्रपद शुक्कव॒ृतीयायाँ प्रातस्ति- 
लामलककल्केन स्तात्वा पद्वर्ल्न परिधाय मासपक्षायछिरूय मम समस्तपापक्षयपृवकसप्त- 
जन्मराज्याखण्डितसौमाग्यादिव॒ुद्धमे उमामहेश्वरमीत्यथ हरितालिकात्रतमहं करिष्ये॥ तत्ादों 
गणपतिपूजन करिष्ये । इति संकल्प्य गोरीयुक्तं महेश्वर॑ एजमेत्‌ ॥ अथ पूजा ॥ पीतकौशेय 
वसनां हेनामाँ कमलासनामं ॥ भकानाँ वरदां नित्य पार्वती चिन्तयाम्पहम्‌ ॥ मन्दारमालाइ- 
लितालकाये कपालमालाड्वितशेखराय ॥ दिव्याम्वराये च द्गिम्बराय नमः शिवाय च नमः 
शिवाय ।॥ उमामहेश्वराश्यां नमः ध्यायामि ॥ देवि देवि समागच्छ भाथग्रेडह जगन्मये ॥ इमा 
मया कृता पूजां गृहाण खुरसतमे ॥ उमामहेशवराम्पां नह । आवाहनम्‌॥ भवानि त्वं महाडदेदि 
सर्वसौभाग्यदायिके ॥ अनेकरत्नसंयुक्तमासन मतिग्छहाताम्‌ ॥ आखनम्‌ ॥ सुचार शीतल 
दिव्य नानागन्धसमत्वितम ॥ पाये शुहाण देवेशि महादेजि नमो5स्ठु ते ॥ पाद्मम्‌॥ श्रीयर्वेति 





महाभगे शड़्रजियवाशिनि॥ अध्य गहाण कल्याणि भत्रों सह पतिव्रते ॥ अध्येम्‌ ॥ गड्गाजलं 
मजा कर मनन कट लक कल 


अन्तर्म आहुति दृतीवार यह भावना कर छनी चाहिये कि; 
यह आहुति रक््मीनारायण भगवानकी है मेरी नहीं हे 
।। ३४ ॥ कहे हुए समंत्रोंस दोसोआठवार तिरोंक्ी आहुति 
देनी चाहिये, प्रतिमासद्ित कछशकोी भाचाय्यक निवेदन 
कर देना चाहिये || ३५ ।। तथा अछुंकार और दृक्षिणास- 
हित कपिछा गायको दे, भक्तिभावके साथ वखछेकारोंत 
.आचायेको पूजदे ॥३६॥ पीछे चीबीस ब्राह्म गों हो भोजन 
करा, उनके आशज्ञीर्वाद्‌ छेकर, आप मौन होकर भोजन 
करे ॥ ३७ (भगवान्‌ कृष्णके ऐसे वचन सुनकर सुमेद्रान 
हि कक छू 
बसाही किया, इस छोकमें भोगोंक्रो भोग कर, अन्तप 
स्वेंगको चली गयी) ३८ ॥ यह भविष्योत्तरपुराणकी सुकृ- 
तत्रतकी कथा पूरी हुईं ॥ 

हारितालिकावरतमू-भाद्रपद शुद्धृतृतीयाकों शिष्टपरिपृ- 
हीत हरितालिकाका बव होता है, वह परसे विद्धा ( युता ) 
जो भाद्रपदशुह्धा ढृतीया हो उसमें होताहै । क्‍यों कि,माध- 
वका कथन है कि, चौथके दिन मुहूते मात्रभी तीज हो तो 
गौरीत्त होता है दूसरे दिवोदासीय मन्थम -छिखा- हुआ 
है कि, भाद्रपदशुक्छा ठृतीयाको “हरिवालिकाब्रत होता है 
वह चतुर्थी विद्धाम होता है ) अब तब्रवक्की विधि-कहते है 
कि, कही हुई भाद्रपदशुक्छा तृतीयाके दिन प्रातःकाढ तिल 
'ओर आमलकके कटकसे स्नानकर प्रद्टरल पहिन, संकल्प 
कहते हुए मास पक्ष आदिका उ्कलेखकर मेरे समस्त पापोंके 


नाश पूर्वक सात जन्मतक राज्य और अखण्डित सोभा- 
ग्यादिकोंकी वृद्धिक लिये तथा उमामहेंश्वरकी प्रीतिक लिये 
हरिताहिकाब्रत में करता हूँ, तहां सबसे पहिलछे गणपतिका। 
पूजन करूंगा, ऐसा संकरप करके गौरी सहित महेश्वरका 
पूजन करे । अथ पूजा-पीछे कोशेयबस्रवाली सुवणणके 
समान चमक्‍्रकनी; कमलके आ पघनपर विराजमान होनेवाली, 
भक्तोंकी वरदाता, पावतीजीको में याद करता हूँ ॥ में उस 
शिवा और शिवके लिये नमस्कार करता हूं, -जो एकके 
अलक मन्दारकी माछास आकुछित हो रहे हू तो, दूसरेका 
शखर कपालोंक्री माछासे अकित हो रहा है| एक दिव्य 
वख्र धारण किये हुए हैं तो एक दिगम्बर है । उमामहेश्व- 
रके लिये नमस्कार है, ध्यान करता हूँ. हे देवि ! है देवि ! 
पधारिये, पधारिये। हे जगन्मये ! में तेरी आाथना करता हूं. 
हे सुरसत्तमे | इस में री पूजाको महण कर, उमा महेश्वरके 
लिये नमस्कार है । इससे आवाहन) तथा-हे भवानि ! हे 
महादेवि ! हें सब सौभाग्योंके देने हारी ! रतन; जटित* 
आसनपर विराजमान होजा, इससे आसन तथा-झुन्दर 
शीवर दिव्य एवम्‌ अनेक गन्ध मिले हुए पाग्यको ग्रहण 
कर | है देवेशि ! महादोव ! तेरे लिये नमस्कार हे, इससे 
पाद्म । तथा-है श्रीपावति ! हे महाभागे | हे शकरको प्रिय- 
वादिनि | हे कल्याणि ! पतित्रते ! भर्ताके साथ अध ग्रहण 
करिये। इस मंत्रस अध्ये । तथा-मैंने गेगाजरू भगाया हें; 










[ ततीया« 


(१०४) व्रेतराजः ! विकिलिरर, 





समानीत॑ छुबर्णकलशे स्थितम्‌ ॥ आवचम्पर्ता महाभ गे सद्रेण सहिते$नथे । हा आचमनीयम्‌॥ 
गड्गासरस्वतीरेबापयोष्णीनमंदाजले॥।स्नापितासि मया देवि तथा शान्त कुरूष्च भरे स्नानम्‌ ॥| 
दध्याज्यमघुसंयुक्त मधुपर्क मयाइनघे ।॥। द्त गहाण देव शि भवपाशवियुक्तये ॥ मथुप्कम्‌ ॥ 
प्यो द्धि घत चचच्‌ शकेराम धुसयुतम्‌ | पथ्चामृतेन स्तपत प्रीत्यर् प्रतिगृह्मयताम्‌ | * पथ्चाम् तः 
स्‍्नानम्‌ ॥ किरिणा घृतपापा च पृण्यतोया सरस्वती । मणिकणाजल शुद्ध स्नानाथ. प्रतिगहाय- 
ताम्‌ ॥ स्नानव्‌ ॥ सर्वभूवाधिके सोम्ये लोकलज्ञानिवारणे ॥ मयो पपादिते ठुभ्य॑ वाससी भति 
गहाताम ॥वख्थम। मन्त्रमयं भयादत्त परअह्ममय शुभम्‌ ॥ उपबीतमिद सूत्र शहण जगदान्बकी 


श् 


उपदीतम ॥ कंचुकीमुपबीतं च ननारत्नेः समन्वितम्‌ ॥ गृहाण त्वे मया दत्त पावेत्ये च नमोः्स्तु 
ते ॥ कंचुकीम ॥ कुंकुमागुझुकर्प्र्कस्त्रीचर्दनथुतम्‌ ॥ विलेपने महादेवि तुमभ्ये दास्यामि 
भक्तितः॥ गन्धम्‌ ॥ रज्ितः कुंकुमो बेन अक्षताश्वातिशोभना: ॥ भक्‍त्या समर्पितास्तुभ्य॑ भसन्ना 
भव पार्वति ॥ अक्षताव ॥ हरिद्रां कुकुम॑ चेव घिन्दूरं कल्नलान्तितम्‌ ॥ सोमाग्यद्रव्यसंयुक्त 
गृहाण परमेश्वरि ॥ सोनाग्यद्वव्यणि ॥ सेबन्तिकाबकुलबम्पकपाटलाब्जेः पुत्नागजातिकरवीर- 
रसालपुष्पेः ॥ विल्वप्रवालतुलपीदलमालतीभिस्त्वां पूजय।नि जगदीश्वरि में मसीद॥ पुष्पम्‌ ॥ 
अयाइ्पूजा ॥ उन्नाये०पादौ०। गौयें दमः जं वे०। पार्वत्थेन० । जालुनीपू० । जगद्धाउ्ये०ऊरूप्‌०।जगत्‌ 
प्रतिष्ठायै .कटीपू० । शान्तिरूपि० । नामिपू० देव्येन०उद्रंगू० । लोकबन्दिताये ० । स्तनोपू० । 
काल्यैन०। कण्ठपू०शिवायैन० मुखम्पुण मवान्ये०। नेत्रपु०।हद्राण्पेण कणों पू० । शवॉण्ये०। 




















वो सोनेके कलशम रखा हुआ हैँ, है भनथे | महाभागे ! , 
शिवजीके साथ आचमन करिये। ।इस मंत्रस आचमन | | 
तथायगंगा, सरस््रती, रेवा पयोग्णी और नमंदाक्े पानीस | 
जसे मन स्नान करायो है उसी तरह आपभी मुझे शान्ति | 


दे। इस मंत्रस स्तात । तथा-दे अनघे | मैन दि, घी ओर 
मधुस बना हुआ मधुपके दिया है, हे देवेशि ! संसारके | 


रसाढके फूलोंस तथा बिल्व, ग्रवाढ। तुडसीदुछ ओर माढ 
तीस तेरा पूजन करता हूँ हे जगदीश्वरि ! प्रसन्न होजा | 
इस मंत्रसे पुष्प चढाने चाहिय। अब भगवतीके अगोका 
पूजन कहते हैं ओम्‌ उमराये नमः पादी पूजयामि-उम्ाके 
लिये नमस्कार है पादोंको पूजवा हूँ । ओमू गोय्ये नमःजई 
[ मधुपक ! संसारके | (०-गोरीके छिये नमस्कार है जंघाओंका पूजन करवा हूँ 
पाशोंको दूर करनेके लिये उस ग्रहण कर । इस मेत्रसे मधु- | इससे जघा, तथा-ओपू पाव्त्ये नमः जानु नी पू०-पाव* 
पक। तथा-पय, दही, घी, शकेरा और मधु इनका बना | तीके छिये नमस्कार है, जातुओंको पूजता हूं इससे जाजु, 
जोप॑ बाक्षव, इपके स्नावक्ो आप अपली प्सन्नताके लिये | तथा-ओमू जगद्धाञ्ये नमःऊरू पू०-जगत्‌की धारण करने" 
प्रहेण करें ।इस मंत्रसे पंचामृत स्नान | तथा पुण्य तोया, | वालीके लिये नमस्कार हैं ऊरुओंको पूजता हूँ । इससे।ऊरु; 
किरणा, धूत॒रापा, सज्वती और मणिकर्गीके शुद्ध जलको | तथा-ओम जगूत्तिष्ठाये नमः कटी पूजयामि-जगत्‌की 
स्नानके लिये प्रहण करिये | इस मंत्रस स्नान, तथा-“स्व- | जिससे प्रतिष्ठा है उसके छिये नमस्कार है, कटीकी पूजवा 
भूवाधि' इस सेत्रस बस्र | तथा-हे जगद्म्बिके | संत्रमय | है? ईंस मंत्रसे कटि, तथा-ओमू शान्ति रूपिण्ये नम:नार्भि 
मैने दिया हैं; यह परत्रह्म मय और शुभ है इस उपवीतसू-| जयोमि-शान्ति 'रूपिणीके लिये नमस्कार हैँ नाभिकी 
त्रकों ग्रहण करिये । इस मेत्रस उपवीत। तथा-अनेकर- | आप फैरता हूँ । इससे नाभि, तथा-ओमू देब्ये नमः उद्रं 
त्नोंके साथ केचुकी और उपब्नको मैं देता है, आप ग्रहण | /जयामि-देवीके छिये नमस्कार है उद्रका पूजन करता 

करिये, हे पावति ! तेरे छिय नमस्कार है। इसे उपब्ख |. ते उद्र/ तथा-ओम्‌ छोकवन्दिताय नमः रतन 
और कंचुकौको। जिसमें कुकुस, अगर,कपूर; कस्तूरी और | १९-छोक जिसे वन्दुन करता है उसके डिये नमस्कार है 
घन्दून है ऐसे विंडपनकों हे. महादेवी । में भस्िभावक्े | स्वनोंका पूजन करता हूं, इससे स्तनोंका, तथा-ओमू काल्‍ये 
साथ समरपित करता हूं || इससे गन्ध | तथा-सुन्दर अक्षव, | नमः कण्ठं पू०-काछीके लिये नमस्कार है, कंठको पूजता 
इंइुपस रंगे हुए है, मे भक्तिभावके साथ समवित करता | 5537 2 तथा-ओम शिवाये नमः खुख पूजयामि | 
है हे पादेदी प्रसन्न हो जा। इस मेत्रस अक्षत । | शिवा लिये नमस्कार है,मुंखका पूजन करताहू इसेसे मुख 
हरिद्रा कुकुम सिन्‍्दुर और कजलके दे हे हे तथा- | तथा-ओमू भवान्य नमः नेत्र पू०-भवानीके लिये नप्तस्कार 
भहण करिये | इस मंत्र सौसाग्य दम । सथा-सवसि | न शे पजन करता हूं। इससे नेत्र तथा-ओमू रुद्राण्य 
बकुछ, चपक, पाटल य द्रव्य । लथा-सवन्तिका, | नस: णों पू०- गैके लिख ५ गॉका . 
झंछ। चेपक, पाटल, ऋमहछ, पुन्नण, जाति, करवी पे ) | कं कण पू०-रुद्राणोक लिये नमस्कार है, कार्नोंका 
'! 3४) गत के जीर और | पूजन करता हू.। इससे कान, तथा-ओम हर्वाण्यें तमः 















घ्रतानि, | कासमे 





(१०५ ) 








ललाटं पू० । मड्रलदाज्ये० शिर/पू०॥ देवहुमरसोद्धतः कृष्णागुरुसमान्वित:॥ आनीतो5यं मया 
धूपो भवानि इतिझ्ह्यताम ॥धपम॥ त्वं ज्योतिः सर्वदेवानां तेजंसां तेज उत्तमम्‌ ॥ आत्मज्योतिः 
पर॑ धाम दीपोष्य॑ प्रतिग्रह्मताम ॥ दीपम्‌ ॥ अन्न चतुर्विध स्वाइ रसेः षढ़्चि!ः समन्वितम्‌॥ 
भक्ष्यमोज्यसमायुक्त नवेद्यं मतिशह्ाताम्‌ ॥ नेवेद्यम ॥ आचमनीयम्‌ ।। मलयाचलसंभूत॑ 
कर्पूरेण समन्वितम्‌ ॥ करोद्वतेनक चार ग्रह्मतां जगतः पते॥करोद्वतेनम।।इदे फल मया देवि० 
फलम्‌ ॥ पूगीफले मह॒द्दिव्य॑ं० | ताम्बूलम्‌ ॥ हिरण्यगर्भगर्भस्थ॑० । दक्षिणा[ल ।। वज्माणिक्यवे- 
दूयमुक्ताविदुममण्डितम्‌ ॥ पृष्परागसमायुक्त भूषणं मतिण्हाताम्‌॥ भूषणम्‌ ॥ चरद्वादित्यों च 
घधरणी विद्य॒दश्निस्वमेव च्‌॥ त्वमेव स्ज्योत्तीष आतिक्य॑ प्रतिगह्मताम्‌ ॥ नीराजनम्‌ ।| 
अथ नामपूजा ॥ उमायेनमः गौयें० पार्वत्ये ० जगद्धाउ्ये ० जगत्मतिष्ठाये० शामन्लिरूपिण्ये० हराय० 
महेश्वराय० शंभवे न०शूहूपाणये० विनाकध्बे०शिवाय०पशुपतये० महदेवाय० ।पुष्पाखलिम ।! 
यानि कानि च पापानि बहाहत्यासमानि च ॥ तानि सवोणि नहयखर्तु प्रदक्षिणपदेषदे ॥ प्रद- 
क्षिणाम ॥ अन्यथा शरण नास्ति त्वमेव शरण मम ॥तस्मात्कारुण्यभावेन क्षमस्व परमेश्वरि॥। 
नमंस्कारम्‌ ॥ पुत्रान्‌ देहि धन देहि.सोमाग्य देहि खुब्॒ते ॥ अन्यांश्व स्वकामांश्च देहि देवि 
- नमो5स्तु ते ॥ इति प्राथेना ॥ ततो वेणवादिपात्रस्थानि सोमाग्यद्रव्यसहितानि वायनानि 
दद्यात्‌ ॥ अन्न॑ सुवर्णपात्रस्थं सवद्धफलदक्षिणम्‌ ॥ वायन गोरि विप्राय ददामि पीतये तव ॥ 
सोभाग्यारोग्यकामाय सर्वसंपत्समृद्धये ॥ गौरिगोरीश तुष्टयथ वायनं ते दुदाम्यहम्‌ ॥ इति 
मन्त्राभ्यां वायनम्‌ ॥ इतिपूज। ॥ जथ कथा ॥ सूत उवाच ॥ मन्दारमालाकुलितालकाये कपाल- 








ललाटं १०-शर्वाणीके हिये नमस्कार है, छछाटका पूडन 


करता हूँ इंसस छछाट, तथा ओम्‌ मंगलूदाउये नमः शिरः 
पू०-मद्ठछछ दायिकाके लिये नमस्कार है इससे शिरकी पूजा | 
करनी चाहिय ॥ देवहुमके रससे तयार किया तथा क्ृष्णा- | 
गुरु मिलाया हुआ धूप में छाया हूँ; ढे भवात्रि ! ग्रहण | 


करिये। इस मंत्रस धूप, तथा-तू सब देवॉंकी ज्योति और 


जिसमें चार तरहका स्वादिष्ठ अन्न छः रखोंसे समन्बित 
तथा भक्ष्य भोज्य आदि विभागोंमें विभक्त मौजूद हैं, ऐसे 


नेवेय्रको प्रहण करिये। इससे नेबेद्य, लथा-मछ्याचढुका 
चन्दन कपूरके साथ घिसा हुआ हैं, यह आपका को 
करोद्वतनक हैं। हे जगत्पते “ग्रहण करिये। इस मंत्रस करो- | या ही ब्यद्रव्योडे या अतापिय 
पदक कक जि | चाहिए। इसके पीछे सोभाग्यद्र॒व्यों 

इतेन, तथा-/इद फर्े मया देवि” इस मंत्रसे फछ निवे-। हे कु हा हि के पड कि पल भा क 
द्न्‌ ५ तथा- ६ पूगी फ्‌्ल महहिव्यम्‌ 47 इस मत्रस ताम्बूल प्रात्नम रखे हुए वायनोंका दान करना चाहिय;, फ्छु | नस, 
तथा-“हिरण्यगर्गर्नस्थम” इस मंत्र से दक्षिणा, तथा-यह | अर दक्षिणासहिल सुवणपाज्में रखे हु र अन्नरूप वायनकों 
$ | हे गौरि ! आपकी प्रसन्नतांक छिए ब्राह्मणको देता हूं! 


वज माणिक्थ वेद्य्ये मुक्ता और विद्यमोंस मण्डित हे, 
इसमें पुष्परागमणि छगी हुईं है;इस भूषणकों ग्रहण करिये। 


इससे भूषण, तथा-चांद, सूरज, धघरणी; विद्यत्‌ और अग्नि | 
तुही है, सब ज्योतिवालो तुही है; आरतीको ग्रहण कर । | 
इस मंत्रस नीराजन निवेदन करना चाहिये || अथ नाप | 
पूजा-उमाके छिये नमस्कार, गोरीके लिये नमस्कार, पाव- | 


हीके छिये नमस्कार, जगद्धात्रीक लिये नमस्कार, जिससे 
१३ ह 





| ओस आक्ुढित हो रहे हैं तो ;दूसरेका शेखर कपाछोंफी 


। अगतकी प्रतिष्ठा हैं उसे नमस्कार, शान्तिरूपिणीके हिये 


नमस्थार; हरके छिये नमस्कार, महेश्वरको नमस्कार,शंभुको 
नप्तस्कार, शूछपाणिको नमस्कार, पिनाकध्ृषकों चमस्कॉर, 
शिवको नमस्कार, पशुप्तिको नमस्कार, महादेवकों लम- 
स्‍करार। इसमेंसे प्रत्येक नामसे पूजन करके पुष्पांजलि सम्त - 


हि त्र्स्‌' आर | पिंत करनी चाहिये | जो कोई भी बदह्यहत्याके बराबरके 
तेजोंका उत्तम तेज हैं तूही आत्माकी ब्योति और परंघाम | 


ष्है हृ " कर ७ ०. _ का कि । 
है, इस दीपकको प्रहण करिये। इस मंत्रस दीपक, तथा- | भ्न्त्रसे अदृक्षिणा करनी चाहिये। और कोई शरण नहीं 


$ ५, पु कर. 
| हैं, तूही मेरा शरण है, इस कारण कारुण्यभावसे हे पर- 


कम 


पाप हैं वे सब प्रदक्षिणके पद पदपर नष्ट हो जाये । इस 


मेश्वरि ! मुझे क्षमता कर | इससे नमस्कार, तथा-पुत्रोंको 
दे, धन दे, हे सुब्रते | सौमाग्य दे और भी सब कार्मोकोदे 


| है देवि | तेर किए नमस्कार है। इससे प्राथना करमी 


सौभाग्य और आरोग्य प्राप्त होने तथा सब कार्मोंकी सम्र- 


| द्विके लिये एवं गोरी और गोरीशकी प्रसन्नताके लिए तेरे 


वायनको दान करता हूँ! इन दोनों /मन्त्रोंसि दान करना 
चाहिये ॥ पूजाविधि पूरी हुईं अथ कथा-सूतजी शौन-: 
कादिकों से कहते हूं कि, एकके अछक तो मन्दारकी माछा*' 














मा किलर बराय ॥ दिव्याम्बराय च द्गिम्बराय तमः शिवाय च नमः शिवाय॥ १। केलास- 
शिखर रम्ये गोती इच्छति शह्भरम्‌॥ गह्याइश्ह्मतर गुह्यं कथवह्व महँथर । २ ॥ पर्वेस्वे सब 
धर्माणामल्पायासं महत्फलम्‌ ॥ असन्नोईसि यदा नाथ तथ्य ब्रृंहि ममाप्नतः ॥ ३ ॥ केन ल्व॑ हि 
मया प्रातस्तपोदानब्रतादिता ॥ अनादिमध्यनिषनों सता! चंव जगत्मञः ॥ ४ ॥ इंश्वर उवाच॥ 
श्रणु देवि मवक्ष्या्रि तवाग्रे ब्रतमुत्तमम्‌ ।! यहोप्य॑ मम सदस्य कथयामि गत प्रिये ॥ ५ ॥ यथा 
चोदगणे चन्द्रो प्रहाणां भाठुरेव च ॥ वर्णानां च यथा विश्रो देवानां विष्ण॒रेव च॥ ६॥ नदीगा. 
च यथा गड्न पुराणानां च भारतम्‌ ॥ वेदानाँ च यथा साम इन्द्रियाणां मनो यथा ॥७॥ पुराण- 
वेदसर्वस्वमागमेन यथोदितम्‌ ॥ एकाम्रेण शणब्वेतद्यथादृ््ट पुरातनम्‌ ॥ ८॥ येन ब्रतप्रभा 
वेण प्राप्मर्धासनं मम ॥ तत्सवे कथयिष्ये%ईं त्व॑ मम भेयसी यतः ॥९॥ भाद्रे मासि सिते पक्षे 
तृतीया हस्तसंयुता ॥ तद॒लुठ्ठानमात्रेण सर्वपाषेः प्रमुच्यते ॥ १० ॥ शणु देवि त्वया पूर्व यहु- 
श्र॒तं चरित महत्‌ ॥ तत्सवे कथयिष्यामि यथावत्त हिमालये ॥ ११॥ पार्वत्युवाच ॥ कर्थ कृत॑ 
मया नाथ ब्रतादामुत्तमं त्रतम ॥ तत्सव श्रोतुमिच्छामि त्वत्सकाशान्महेश्वर ॥ १२॥ शिव 
उवाच ॥ अस्ति तत्र महानिदिव्यों हिमबान्नग उत्तमः ॥नानाबूमिलमाकीणों नानाहुमसमाकुल! . 
॥१३॥ नानापक्षिसमायुक्तो नानामृगविचित्रकं॥यत्र देवाःसगन्धर्वांः सिद्धचारणमह्य का। ॥१७ 
विचरन्ति सदा हष्टा गन्धवां गीततत्परा ॥ स्फोटिके! काखने! शद्गेमणिवेदूर्यभूषितेः ॥ १५॥ 
धुजेलिखब्रिवाकाशं सुहदो मन्दिरिं थथा ॥ हिमन पूंरितो नित्य गड़ाध्वनिविनादितः ॥ १६॥ 
गवति त्व॑ यथा बालयें परमाचरती तपः | अब्दद्रादशर्क देवि धून्नपानमधोमुखी ॥१७॥ सम्ब- 
सरचतुःषाष्टि पकपणांशन कृतम्‌ ॥ माघमासे जले मग्ना वेशाखें चाम्रिसिविनी ॥ १८ ॥ आवणे 
व बहिवाँसा अन्नपानंबिवर्जिता ॥ इृष्ठा तातेन लेत्के्ट चिन्तया ं/खितोडभवत्‌ ॥ १९॥ कस्मे 
्रैया मया कन्या एवं बिन्तातुरोप्भवत्‌ ॥ तदेबाम्बरतः शाप्तो ब्ह्मपृत्रस्तु धर्मवित॥ २० ॥ 
शल्लसे अद्वित हो रहा हूं, एक पास दिव्य वसन हैं तो | देवि ! सुन तुमने जो पहिंझे बडा सारी त्रत किया था वो 
[क ब्रिलकुल कपडा छी नही रखता, उन दोनों शिवा और सब कहूँगा जैसा कि, हिमालयपर हुआ था। ११ ॥ पाव॑- 
शेबजीके लिय नमस्कार है || १॥ केछासके शिखरपर | तीजी बोढीं कि, हे नाथ | मैंने केसे सब ब्रतोंका शेष ब्रत 
पैरीजी शिवजीसे पूछ रही हैं कि, जो गोप्यस भी अलन्त | किया, हैं महेश्वर | यह सब में आपसे छुनना चाहती हूँ 
पपनीय गोप्य हो है महेश्वर ! उसे मुझे कहिये॥ २॥ है | ॥ ! २॥ शिव बोले कि, एक हिसवाच्‌ नामका दिव्यउत्तम 


ताथ ! यदि आप प्रसन्न हों तो मेरे सामने कहो, जो सब | प्नत है, जो अनेक तरहकी भूमिस व्याप्त तथा अनेक 
वर्मोका सबंस हो, जिसमें परिश्रम थोडा और फछअविक | तरहके वृच्षोंसे समाकुछ हैं ॥ १९ || जिसपर अनेक तरहके 
)॥ ३६ ॥ सने ऐसा कोन सा तप, दान, त्रत किया था पक्षीगण रहते हैँ, अमेकों बरहके नवजीवबोंस 'विचित्र हर 
जो हे आदि, सध्य तथा अन्तसेरदित एवम्‌ जगतुके | रहा है, जिसपर सिद्ध चारण यक्ष गन्धर् और देव ॥१४॥ 
भ फ ४22. 9 चोर + न्ध र र्गं पा ने ५० ली .. 
बे लक कक ले ४ ॥ शिवजी हा हृष्ट हुए विचरते रहते है, गन्धव॑ गीतगानेमें तत्पर रहतह।, 
है दीप सु ः ७५. 3 ऑहता हैं; वो | जो मणि और वेदूयस विभूषित स्फटिक और सोनेके शड़ 
भर सवेखकी तरह गोष्य हू हे श्रिये ! मे 00 23, । + | रूपी ॥ १५॥ भुजोंस आकाशको छिखते हुए स्थित है, जैसे 
जसे उडगंगस चन्द्रमा, सहोंमें सूथ्ये, वर्णाम ब्राह्मण, देवों 


में विप्णु॥ ६॥ नदियोंध गछ्ना, पुराणोंमें भारत, वेदोंमें 


9 भ््‌ रा है 
कि, विप्णुका मंदिर होता है जो दिमसे पूरित तथा गल्जाः 
जीकी ध्वनिसे शब्दायमान रहता है ॥ १६ " हे-पार्व॑ति ! 
! और इन्द्र अपने घाल्यकालसे परम तप करते हुए बारह वर्षतक पधूम्र' 
पुराण वेद॒का सबेस्व, ले ने कहा है उस न को > $ 
कक हा हा नसा कि आगमने कहा है उसएकाग्र | पान करते हुये नीचेंको सुख करके तप क्िया॥१७॥चौसठ- 
संस धुन समर 5 खो चह्‌ प्राचीन वृत्तान्त देख रखाहे हे 


७, 


| कर 5 
सासवेदू, और इन्द्रियोंप्ें मन अष्ठ है ।। ७॥ ऐसे ही यह 


अप कल] 
कह की वषतक सूख पत्त खाकर रही,माघ मासमें जल तथावेशाखों 
६.7 0" प्रप्त लतके बरे मजे भे प्‌ निक १३६५ छः व 

दण मेरी ' मारी री डत को गा । हक आओ मन्पाया, “असि सवत्त किया॥ १८॥श्रावण पे अन्नपात छो इकर बाहिर, 
घारवद शक्ल इस जेल. से में तुमे कहँगा॥ ९॥ | रही,जब आपके पिताने यह दुख देखा तो चिन्तासे दुखी हो: 
न बाप क२ 3 ४ एतीयाके दिन, उसका अनु- | गये॥१०॥ घि में किस विवाह | उ ; 
में सूद पापोंसे छूट जाता है॥ १० ॥ है. | घर... (त लडकीको पं किस विवाह! उसी समय, 

दे! $> ॥ है- | धर्मके जाननेवाले ब्रह्मपुत्र आकाशमागस प्राप्त हुए ॥ २० ॥ 


5:24 
प्त नाय ऋरने 


. बतानि, ] भाषाटीकासमे तः | 





नारदों सुनिशादूलः शलपुत्रीदिदक्ष या | दत्वाघष्य विष्टरं पाद्य॑ नारद ओक्तबान गिरिः॥ २१॥ 
दिमवाहबाच ॥ किमर्वमागतः स्वामिन 


मुत्तमम्‌ ॥२२॥ नारद उबाच॥ शरण शलिन्द्रमद्वाक्य॑ विष्णुना प्रेषितो5ह: 





2 


योग्याय 





ग्हम्‌ ॥ योग्य 





दातव्य॑ कन्यारत्नमिद त्वया ॥ वालहुदेवसमों नास्ति बहाविष्णशिवादिष ॥ तस्मे ठेया 
त्वया कन्या अत्रार्थे संमते मम । हिमवालवाच ॥ वासदेवः स्वयं देवः क्यों आार्थयले 





यदि ॥ तदा मया प्रदातव्या त्वदागमननगौरवात्‌ ॥ र५ ॥ हइत्येव॑ गदिते अत्दयाः नभस्यन्त्थे 
मुनिः ॥ ययो पीताम्बर्धर इाहबऋणनदाघरणए॥ २६॥ कुलाखलिपुटो भूत्वा झुनीरद्रस्तमभा- 
षत ॥ नारद उबवाच।॥ श्रणु देव भवत्काय विवाहो निश्चितस्तव ॥ २७ ॥ हिमवांस्तु तदा गौरी 
म॒ुवाच वचन मुदा ॥ दत्तासि त्वें मथा पुत्रि दवाय गंसडध्वज़े ॥ २८ ॥ अत्वा वाक्य पिठत॒देंबी 
गता सा संखिमन्दिए ॥ भूमों पतित्वा सा तत्र दिलल्यलिहुःझिता ॥ २९० ॥ बिलपन्ती तदा 
दृष्ठा सखी वचनमत्रवीत्‌ ॥ सरू्युवाच ॥ किमयथे दुःखिता देवि कथयस्व ममाप्रतः ! ३० 

यद्धवत्यामिलणित करिष्येपह न संशयः ॥ पावत्युवाच ॥ सखि शुण मम पमीत्या मनोउमिलपषितं 
मम ॥ ३१॥ महादेव॑ च भर्तारं करिष्येपह न संशयः ॥ एतस्मे चित्तितं कार्य तातेन कृतम- 
न्यथा ॥ ३२ ॥ तस्मादेहपारित्यागं करिष्येषहु सखि प्िये॥ पार्वत्या वचन शत्वा खी वचनमभ- 
बवीत्‌ ॥ ३३ ॥ सख्युवाच ॥ पिता यत्र न जानाति गामैष्यावों हि तदहनम्‌ ॥ इत्येव॑ संमतं 
कृत्वा नीतासि .त्व॑ं महद्रनम्‌ ॥ ३२४ ॥ 
छत में पुत्री देवदानवकिन्नरेः ॥ १५ ॥ नारदाप्रे कृत सत्य कि दास्ये गरूडध्वजे ॥ इत्येदं 
चिन्तयाविष्टो :मूच्छितो निषपात हु ॥ ३६॥ हाह। कृत्वा प्रधावन्ति लोकाह्ते शिरिपृंगवर्म ॥| 
अचुगरिवर सर्वे मूच्छाहेतुं गिरे वद्‌ ॥ ३७ ॥ गिरिरवाच ॥ हुःखस्य हेतुं शुणुत कबन्यारत्नं हतं 





ता निरीक्ष यामास हिमवांस्तु गहेशहे ॥ केन नीता-- 


मुनि शादूछ नारदजीको शेह्पुत्रीके देखनेकी इच्छा थी; 
दिमालय नारदजीको अध्ये, विष्टर ओर पाय देकर बोला 
॥२१॥ है स्वामिन्‌ |! आप किस लिय आये ह ! हैं मुत्ति 
सत्तम | कहिये, आपका श्रेष्ठ आगमन मुझे बडे भाग्यासे 
मिला है ॥२२॥ नारदजी बोले कि, हे शेडेन्द्र हिमवन ! 
सुत; मुझे विष्णुत् भेजा हे कि,इस योग्य कन्यारत्नकों योग्य 
बरक छिय ददेना चाहिये ॥२३॥ ब्रह्म, विष्णु और शिवमें 
वासुदवके बराबर कोई नहीं है, इस कारण आप अपनी 
कन्याको विष्णुक लिये द्‌ दं, यह मेरे भी समति है ॥२४।। 
यह मछुन हिमवान्‌ बोछे, कि वाझुदेव स्वये आकर यदि 
कन्या मांगेंगे तो भ् देदूगा क्योंकि, आप उनके छिये आये 
हैं ॥२०॥ नारदजी यह सुनकर आकाशर्म अन्तर्धान होगये 
और वहां पहुँचे जहाँ कि; पीताम्बर वस््र पहिन,शेख,चकऋ, 
गंदा और पद्म हाथमें लिये हुए विष्णु भगवान्‌ रहते हैं 
॥२६।॥| हाथ जाडकर नारदजी बोढे कि, हे देव ! सुनिय 
आपकाही कार्य है मेने आपके विवाहका योग छगाया हे 
[॥२७॥। उस समय हिमवान तो प्रसन्नवाके साथ गौरीजीसे 
बोले कि; हे पुत्रिके ! मेने तुम्ह गरुडध्वज दंवके छिये दे 
दिया है ॥९८॥ पिताक ये बचन सुनकर पावतीजी सखीके 
घर चल्ली गयीं ओर वहां जमीनपर गिर, अत्यन्त दुखी 





होकर रोन छगीं ॥ २९ ॥ इन्हें रोते हुए देखकर सख्वी 
बोली कि, है देति ! किस लिये इतती दुखी हो रह्दी हो! 
मरे सामने कहो ॥|३०॥ जो आपकी इच्छा होगी वही में 
करूंगी, इसमें कोई भी सन्देह नहीं है, यह लुन पावतीजी 
बोढीं कि; हें सखि | जो मेरे मनकी बात है उसे ॥३१॥ 
प्रमस सुन, मेंने तो यह निश्चय किया था कि, महादेवकों 
अपना पति बनाऊंगी पर पिताने कुछ ओर ही कर दिया 
॥३२॥ हे प्यारी स््खि | इस कारण अब से देह परित्याग 
करूंगी,-पावतीके ऐसे बचन सुनकर सखी बोली कि।।३३॥ 
जिसको पिता नहीं जानते उन वनको चेंगी,शिवजी पावे- 
तीजीस कहने छगे कि; ऐल निश्चय करके तुम्हें तुम्हारी 
सखी वबनको के गयी। ३७ || आपके पिता हिमवानन 
आपको घर घर देखा कि, मेरी बेदीको देव, दानव और 
किन्नरों मेंसे कौन ठेगया।३५। मेने नारद॒के सामने सत्यकह 
दिया था अब विष्णुको क्या दूंगा इस प्रकारकी विन्तासे 
मूच्छित होकर वे भूमिपर गिरगये ॥३६॥ उस समय लोग 
हाहाकार करके भगे ओर बोले कि, है गिरिवर ! मूचिछत 
क्यों हो रह हो; बताओ तो सही || ३७ | गिरे बोले कि, 
मेरे दुःखके कारणको सुनो, मेरा कन्यारत्न हरलियां गया 
है; या तो उसे काछसपने खा लिया है अथवा व्याप्न सार 





१ छाइसम्‌। 


डर 


ह! 
|] 


ब्रतराजः । दि | तृतीया-- 








(२१०८ ) 








वीजा काल्सपेण सिदशागिण वा हता गो सटेती नो जाने को गला बी किक बस. ॥ २८ ॥ न जाने क ' गता पुत्री केन इछ्लेन 
करके लक “कं महातरू ॥ ३५ ॥ गिरिवेनादुन ० इज 
कारणात्‌ ॥ सिंहब्याप्रेश्व भछ्ेश्व रोहिमिश् महाघनम्‌ ॥ ४० ॥ त्व॑ं चापि विषिन 48४: 
सखिनिः सह ॥ तत्र दष्ठा नदी रम्यां तत्तीरे च महागुहाम्‌ ॥ ४१॥ तां प्रविश्य स द् 
मन्नमोगविवर्जिता ॥ संस्थाप्य वालुकालिडू पावेत्या साहत मम ॥ ४२ ॥ भावशुक्लततीयायां- 
मर्चेयन्ती ठ॒ हस्तमे ॥ तत्र वाद्येन गीतेन रात्रों जागरण कृतम्‌॥ ४३ ॥ब्रतराजप्रभावेण आसन . 
चलित॑ मम ॥ संप्राप्ती5१ह तदा तत्न यत्र त्व॑ं सखिभिः सह ॥ ४४ ॥ प्रसन्नोईस्मि मग्या प्रोक्ते के. 
ब्रहि वरानने ॥ पार्वेत्युवाच ॥ यदि देव भसन्नोषसि भतो भव महेश्वर ॥ ४५॥ तथे ्युक्त्वा हु. 
संप्राप्तः केलासं पुनरेव च ॥ ततः प्रभाते संप्राते नद्यां कृत्वा विसरजनम्‌॥ ४६॥ पारणं त॒ कृत 
तंत्र सख्या साद्धे त्वया शुभ ॥ हिमवानपि त॑ देशमाजगाम घन वनम्‌ ॥ ४७॥ चतुराशा 
निरीक्ष॑स्तु विहलः पतितो भ्रुवि ॥ दृष्ठा तत्र नदीतीरे प्रसुत्तं कन्यकादयम्‌ ॥ ४८ ॥ उत्थाप्यो 
त्सड्रमारोप्य रोदन कृतवान्‌ गिरिः ॥ सिंहव्याप्राहिमहलकेव॑ने हु कुतः स्थिता ॥ ४९ ॥ पार्वे 
ट्युवाच ॥ 'णु तात मया ज्ञातं त्वं दास्यसीश्चराय माम्‌ ॥ तदन्यथा कृत 'तात तेनाहं बन- 
मागता ॥५०॥ ददासि तात यदि मामीश्वराय तदा गृहम॥आगमभिष्यापि नेव॑ चदिह स्थास्यामि 
निश्चितम्‌ ॥ ५१ ॥ तथेत्युक्त्वा हिमवता नीतासि त्व॑ गृह प्रति ॥ पश्चादतता त्वमस्माकं कृत्वा 
वेबाहिकीं क्रियाम्‌॥ ५२ ॥ तेन ब्रतप्रभावेण सौमाग्यं साधित॑ त्वया ॥ अद्यापि ब्रतराजस्तु न 
कस्यापि निवेद्तः ॥५श॥नामास्य व्रतराजस्य शरणु देवि यथाभवत्‌ ॥ आलिभिहोरिता ययस्मा- 
त्तस्मात्सा हरितालिका ॥५७॥ देव्युवाच ॥ नामदे कथित देव विधि बद मम प्रभो ॥ कि पुण्य 
कि फल चास्य केन च क्रियते व्रतम्‌ ॥ ५५ ॥ ईश्वर उबाच ।। श्रणु देवि विधि वक्ष्ये नारीसौ 


बढ है।२८न जाने बेटी बहा चढेगा इ० 4५ 0. 77 र777_ हे।२८॥न जाने बेटी कहां चली गईं, कौन दुष्ट चुर भह वन्र था ॥४७॥ वहां चारों दिशाओंको देख विहछ हो 
लेगया। शिवजी पावतीजीसे कहते है कि,इस प्रकार आ पके | जमीनपर गिर गया, पीछे न दोकिनारपर देखा तो दो 
पिताजी शोक सन्तप्त होकर, ऐसे कांपने छगे जैसे कि ! | छडकियाँ सो रहीं हैं ॥०८॥ उन्हें उठा गोदीमें बिठाकर 
आँधीस भारी वृक्ष कांपा करता है।३९॥और आपको देख- | रोने छगा कि, बेटियो | सिह, व्याप्न, सर्प और भल्ल्कोंस 
नेके कारण बन वन फिरने छगे जो हि, व्याप्त भह और | दूषित इस वनमें कहांसे आबड़ी ।।४ ९॥ यह सुन पावती 
रोहियोंसे सापोंस महाघने हो रहे थे ॥४०॥ आप भी घोर- 


गे सखियोके २" | जो बोलीं कि; मुझे यह पता था कि आप मुझे शिवजीको 
वनगे सख्ियोंक साथ घूम्रती हुईं एक रमणीक नदीको देख /. पर जेब यह पता चला कि, आपने अन्यथा किया है 


उसके किनारकी सुन्दर गुफामें ॥४ *॥ सखीके साथ घुस | तो में बन चली आई ॥|५०॥ यदि आप मुझे महादेवजीके 
गयीं, अन्नका परित्याग करदिया।पाबतीसहित मेरा पालका | छिये दें तो में घर चल नहीं तो मैं यहांही रहूंगी यह निश्चय 
लिंग स्थापित करके॥४२। (वूजतहुए भादपद शुक्ला तृतीयाक | है ॥५१॥ हिमवानने कहा कि, ऐसाही होगा और आपको 


तक हि कप ३ 
हस्तनक्षत्रमे त्रतादि करके, रात्रिको एनपेजानेक साथ | घर छे आये, पीछे विवाहविधि करके आपको हमें दे दिया 
जागरण किया।४श/ब्रतराजके प्रभावसे मरा आसन हिल- 


५) ॥| उसी बतके प्रभावसे आपने सौभाग्यतिद्ध किया 

को के | आह के 

गया का समय ५ पहुंचा जहां कि,आप सखियोंक | वो ब्रतराज आजतक मैंने किसीके सामने सहीं कहा 

बा मर था। हा हे “ने कहा कि, में असन्न हूं ५ | | ५३ | इन ब्तराजका नाम हरिताहिका क्यों पडा ! 
५... भागना हो सो भांग, यह सुन्न पावती बोलीं सो सुन ! आली सहेलियोंने जिसका हरण किया इस 
? है महश्वर ; यदि आप ग्सन्न हैं तो मरे पति हो जाइथे । लक कि, 

कह कस “ पत हां जाइय | कारण वो तुम हरितालिका हुईं ॥ ५० ॥ देवी बोली कि, 
5. ही अच्छी वात ह्‌ फिर केछास चला आया प्रभो! आपने यह तो भरे हर्त्तालिका इस नामका निव- 

न इसके बाद प्रभातकाल रा भतिमाका विसजेन | चैन किया, इस अतका क्या फल हैं, कियेसे क्‍या पुण्य 
! ॥डै२0 आपने सखियोंके साथ पारण किया तथा 


हा लयकि होता है और किसने इस ब्रतको शा 378 हैं !॥ ५५॥ 
हिसवानओी उस जगह चढ़े आये जो कि,आपकी गुहावार शिव बोले कि, हे देवि ! इसकी विधिको कहता हूँ यह 
'. २ भल्लकेरहिपि: सहिते बनमित्यपि पाठ: | द द 


ब्तानि, | श 






भाग्यहेतुकम्‌ ॥ करिष्यति प्रयः त्नेन यदि सो के <- 
स्तम्भमण्डितम्‌ ॥ आच्छाद्य पद्वर्ललेस्त नानावर्णविचित्रित:॥ ५७ ॥ चन्दनेन खुगर्चेन लेप- 
येदू गहमण्डपम्‌ ॥ शब्बभरीमुदड्रेस्तु कारयेदहानिःस्वनाव ॥ ५८ | नानामड्भरलगीत॑ च कतेव्य 
मम सद्मनि ॥ स्थापयेद्वालकालिड़ पावेत्या सहितं मम ॥५९॥ पूजयेद्वहुपृष्पेश्च गन्धधूपादिनि- 
नेंवेः ॥ नानाप्रकारनेंवेथः पूजयेज्ञागरं चरेत्‌ ॥ ६० ॥ नालिकेरेः पूृगणफलजम्बीरबकुलेस्तथा ॥ 
बीजप्रे! सनारिड्रोः फलेश्रान्येश्र भूरिशः ॥ ६१९॥ ऋतुकालोड्वनूरिध्रकारं: कन्दमूलकेः ॥ 
३० नमः शिवाय शान्ताय पश्चचक्राय शूलिने ॥ ६२ ॥ नन्दिनड्धिमहाकालगणरुक्ताय शम्भवे ॥ 
शिवये हरकान्ताये प्रकृत्ये सशष्टिहितवे ॥६१॥ शिवाये सर्वेमाड्गल्ये शिवरूपे जगन्मये ॥ शिवे 
कल्याणदे नित्य शिवरूपे नमोस्तु ते ॥६४॥ शिवरूपे नमस्तुभ्यं शिवाय सतत नमः ॥ ममस्ते 
बहाचारिण्ये जगद्धाव्ये नमो नमः ॥ ६५ ॥ संसारभयसन्तापात्राहि माँ(सेंहवाहिति॥ गन 
कामेन दवि त्व पूजितासि महेश्वरि ॥ ६६॥ सज्यसोनाग्यसंपातिं देहि मामम्व पावेति ॥ मन्जें- 
णानेन देवि त्वां पूजयित्वा मया सह ॥ ६७ ॥ कथा श्रुत्वा विधानेन दष्यादतन्ने च भूरिशः ! 
बाह्मणेम्यों यथाशक्ति देया वस््हिरण्यगा। ॥६८॥ अन्ये्ं भूयरी देया सत्रीर्णा वे भूषणादिकम॥। 
भत्रा सह क॒थां श्रुत्वा मक्तियुक्तेन चेतसा ॥६५॥ कृत्वा व्रतेश्वरं देवि सर्वपापेः प्रमुच्यते ॥ सत्त- 
जन्म भवेद्राज्यं सोमाग्यं चेव वद्धेते |७०॥ त॒तीयायाँ तु या नारी आहार कुछते यदि ॥ सत्तजन्म 
भवेद्वन्ध्या वेधव्यं जन्मजन्मनि ॥७१॥ दारिय पुत्रशोके च ककेशा दुःखभागिनी ॥ पच्यते नरके 
घोरे नोपवासं करोति या ॥७२५॥ राजते काखने ताम्रे वेणवे वाथ मृन्मये ॥ भाजने विन्यसेदन्ने 
सवसख्व॒फलदक्षिणम्‌ ॥ दाने च द्विजवर्याय दच्यादस्तें च पारणा ॥ ७३ ॥ णवं विधि या कुछते च 
नारी त्वया समाना रमते च भत्रो ॥ भोगाननेकान्‌ शुवि स्‍प्ुज्यमाना सायुज्यमन्ते लगते हरेण 
॥9४॥ अश्वेघसहझञाणि वांजपेयशतानि च ॥ कथाश्रवणमात्रेण तत्फलं पाप्यले नर३ ॥ ७५॥ 








ख्रियोंकों सो भाग्य दनेवाला है, जो सोभाग्य चाहती हे वो 
प्रयत्नस करेंगी ।५६।॥ केलछाक स्तंमसे संडित, तोरणादिक 
करने चाहिये, उन्हें अनेक वंणांस चित्रित, पद्टवख्नसे ढकता 
चाहिय ॥| ५७ || सुगन्धित चन्दनसे गृहमण्डठको लीपना 
चाहिये तथा शंख, भरी ओर मृदक्ञके वारंवार शब्द कराते 
चाहिय ।| ५८ ॥ मेरे मंद्रिमें अमेक तरहके मंगल गीतोंके 
. शब्द करने चाहिये तथा बालुकाका मेरा छिल्गढ, पावती 
सहित स्थापित करना चाहिय ॥|५९॥ नये गन्ध, घूपादिक 
और पुष्पोंसे मेरा पूजन करना चाहिये तथा अनेक प्रका- 
रके नेवेद्योस पूजकर जागरण करना चाहिय ॥६०॥ नारि 
यर, सुपारी, जबीर, बकुछ, बीजपूर ओर नारंगी भादि 
फर्ॉसे बारंवार पूजन करना चाहिये ॥६१॥ तथा ऋतुका 
लमे होनेवाले कन्दमूलोंसे पूजन करे. पंचवक्‍त्र शान्त्र तथा 
शुरूघारी शिवके लिये नमस्कार ह॥६१॥नन्दि, भ्ज्लि, म 
काछ आदि अनेकगणयुक्त शम्सुके छिय तथर हर की कान्‍्ता 
सष्टिकी हेतु जो प्रकृति रूपी शिवा हू उसके छिय नमस्कार 
है ६३ 0 हे सबमगलोंके देनेहारी, जगन्मय शिवरूप 
कह्याणदायके ! शिवरूपे शिव ! तेर छिये सदा वारबार 
नमस्कार है ॥॥६४।॥ शिवरूपा तेरे लिये तथा श्िवाके लिये 
सतत नमस्कार हैं, त्रह्मचारिणीके लिय नमस्कार तथा जग- 


द्वान्नीके लिय नमो ममः है| ६५ ॥ हे सिंहपर चढनेवाली | 


ससारके भयके सन्तापसे मरी रक्षा कर; हे महेश्वरि देवि ! 
जिस कामसे मेने तेरा पूजन किया है उस पूराकर ॥६ ६॥ 
हे अब ! है पावति | वो राज्य, सौभाग्य और सम्पत्ति 
दीजिये. इस मंत्रसे मेरा और देवीका पूजन करके ॥६७॥ 
कथा सुने और विधानके साथ ब्राह्मणोंकों बहुतसा अन्न द्‌ 
तथा झक्तिके अनुसार वख्र; हिरण्य और गऊसभी दान करे 
॥ ६८ ॥ औरोंको भी वहुतसी दक्षिणा दे तथा स्थियॉको 
आभूषण दे. भक्तियुक्त चित्तसे पतिके साथ कथा सुने 
॥॥६९। हे देवि इस प्रकार ब्रतकों करके सत्र पापोंसे छूट 
जाता है, सातजन्मतक इसका राज्य होता है तथा सोभाग्य 
बढता है ।।७०॥ इस तृतीयाके दिन जो खत्री आहार करती 
है वो सातजन्मतक बॉझ, तथा जन्म २ विधवा होती है 

७१॥ यही नहीं किन्तु जो उपवास नहीं करतीं वो दुःख 
भागिनी ककंशा हो; दारिद्र और पुत्रशोक देखती है तथा 
घोर नरकमें दुःखपाती हैँ ॥ ७२ ॥ चांदीके सोनेके तंबेके 
कांसके अथवा मिट्टीके पात्रमें अन्न रख कर वल्र फल और 
दक्षिणाके साथ एक अच्छे ब्राह्मणकोी देकर पीछे पारणा 
करे ॥७श। इस प्रकार जो स्त्री त्रत करती है वो तेरे समान 
पतिके साथ रमण करती है, अनेक भोगोंको भोग कर 

न्तम दरका सायुज्य पाती ४।॥ एक सहस्र अश्वमेष 
त्रथा एकसों वाजपेयका जो फल होता है वो फछ कथाके 


(११०७ ) अतराजः | 


| तृतीया- 


एतत्ते कथित देबि तवाग्रे छतमुत्तमम ॥ कोटियज्ञकृत पुण्यमस्यावष्ठानमात्रतः ॥ 3९॥ इति.. 
श्रीभविष्योत्तरप्राणे हरगोरीसंबादे हरितालिकात्रतकथा संपूर्णा ॥ ह अथोद्याएन ॥ पावत्युवाच-॥ 
उद्यापनविर्धि दृहि तृतीयायाः सुरेखर ॥ भक्तितः श्रोतत॒मिच्छामि अतपूर्तिडलबे ॥ १॥ महादेव . 
उबाच ॥ उद्यापतविर्े वक़्य ब्रतराजस्य शोभने ॥ यघ्य वष्ठानमात्रेण संपूर्ण हि ब्रतं भवेत ॥२॥ 
चतुःस्तम्भ॑ चतुद्वारं कदलीस्तम्भमण्डितम्‌ ॥ घण्टिकाचामरयुत॑ कमलेरुपशोमितम्‌ ॥ ३॥ 
चन्दनागुरुकप्रेलॉपित मण्डपं शुभम्‌ ॥ मध्ये वितानं बश्नीयात्पवर्णरलंक्ृतम ॥४ ॥ तत्मध्ये 
कारयेत्प्म पश्धवर्ण: सुशोभनेः ॥ तस्योपरि न्यसेद्रीहीन द्रोणन परिसंमितान ॥ ५ ॥ सौव्ष 
राजत ताम्र कलश विन्यसंदुधः ॥ पश्चरत्नानि निक्षिप्प सर्वोषधिसमन्वितम्‌ ॥ ६॥ तस्योपरि 
न्यसेपात्र स्‍तेवर्ण राजतं च वा ॥ वृषारूट महादेव रजतेन विनिर्मितम ॥ ७ ॥ सर्वावय संयुक्तां 
गोरी हेन्ना विनिमिताम्‌ ॥ पूजयेत्तत्र गन्धादनेः पुष्पैर्नानाविधेः शुले : ॥ ८ ॥ राचौ जागरण 
कुयोत्कथावाचनपूवेकम्‌ ॥ ततः प्रभातसमये क्तश्ञानादिकर्म च ॥ ९ ॥ पूर्ववच्चार्ययेदवीं पश्चा- 
द्वोमं समाचरेत्‌ ॥ स्वगह्योक्तविधानेन कृत्वापक्‍िस्थापनं तत१॥ १० ॥ आरमेश्व ततो होम॑ नव- 
महपुरःसरम्‌ ॥ तिलांश्र यवसंभिश्रानाज्येन च पारिप्लुताव ॥१९ १॥ जुहुयाहुद्रमत्रेण गो तीमस्त्रे | 
वेदबित्‌ ॥ अष्टोत्तरशतं चाषि अष्टाविशतिमेब वा ॥ १२॥ एवं समाप्य होम॑ त॒ तत्राचार्य पपू- 
जयेत्‌ ॥ खुवर्णरलवासोप्िगों दब्याव् यथावितर ॥ १३॥ छाय्यां- सोपस्कर्र दद्यादावार्याय 
धयत्वतः ॥ षोडशदिजयुग्मानि सुपक्कान्नैश्व नोजयेत्‌ ॥ १४ ॥ सौभाग्यद्रव्यवद्थाणि वहपात्राणि 
पोडश ॥ दातव्यानि प्रयत्नेन ब्राह्मणेभ्यो यथाविधि ॥ १५॥ अन्येभ्यो द्विजवर्येम्यो दक्षिणां च _ 
>यतनत; ॥ भूयसों परया भक्‍्त्या प्रदद्याव्छिवतृष्टये ॥ १६॥ उद्दिश्य पार्वतीश च सच कुर्या- 
दतनिद्वता ॥ बन्धानिः सह भुखीत नियता च परहनि ॥ १७ ॥ एवं या कुरूते नारी ब्तराज॑ 


मनोहरम्‌ ॥ सोभाग्यमखिल्ल॑ तस्याः सप्तजन्म न संशयः ॥ १८ ॥ इते श्रीदरितालिकात्र- 
तोद्या पने संपूर्णम्‌ ॥ 


पते रत म_एपूपरप्+पदराू+८ाूप्प-+-++_+..........ह0ह0ह8080ह0/ह0हत॥॥ कक 
उनन भाज्से मिल जाता है |७०॥ है देवि | यह मैंने तुम्हें! 
कह दिया तथा उत्तम ब्रत भी कह दिया इसके करनेसे 


कोटि यज्ञ ह। फल होता है ॥७६॥ यह भविष्योत्तरपुराणके 
हर गोरीको संवादपूर्वक हरितालिका ब्रतक्ी कथा संपूण 


5३ | जाथोद्यापनमू-पावदी बोलीं कि, हे सुरेधर ! इस | 


तृतीयाक ब्रतकी 


देवजी बोले कि, हे शोमने | 


पेथा चन्दन, अगर और क 
तयार करं। बीचसें पंच 
उसके बीचस्म सु 
एक टद्रोणके बरा 
साथ पांचों र्तॉको पटक कर, 
पेबक फंलशको स्थापित करे ॥ 
पा । पाजको रले उसके ऊपर चांदीके वृषारूढ 

3 र सवाइसंपर्ण सोनेकी श्रीगौरीको अल 
तरहेक शुभ सुगन्धित | 3 


| 


| 





एुप्पोंस पूजदे।८॥रातमें कथा बाच- 


नके साथ साथ जागरण होना चाहिय, इसके बाद प्रातः 
कालके सप्तय स्नानादि कम करके ।। ९ ॥ पहिलेकी तरद 
देवीका पूजन करके पीछे होमका सरंजाम करना चाहिये ' 
अपने गृह्मयसूतजके कहे हुए विधानके अनुसार अभिस्थापन 


व 


करके ॥|१०॥ नवग्रहोंकीपूजा करके होम करना चाहिये। 


उद्यापनविधि कहिये, मैं ्रतकी संपृ्तिके वीस परिश्र॒तत हुए जो मिलें हुए तितोंकी ॥९११॥ 


भु अप ' 

लिय भक्तिभावके साथ सुनना किक हूं ॥ १॥ न | अट्टाईंस आहुति दे ॥१२॥ इस प्रकार होमकी समाप्ति करके 
ज्ञ ज्ञु द्य | 9५ हा स्कद हा रा 

कहता हूँ जिसके करनेसे व्रत गण बजा हर चार हा हा के ९ मा] लि के ० 

उम्भका घार द्वारका केलेके सतबोंस मंडित घटिका और | & कं सो के की नस पा जे 
गेल सु ) 5 | दे एवम्‌ सोलह बाह्मण दम्पतियोंको अच्छे पक्कान्नस भोजन 

वाप्रॉस सजा हुआ तथा कछ शॉसे भलीभांति शोमित।३॥ | करावे । ।१४॥ सोभाग्य द्रव्य वल्ल और सोलह पात्र बांसके, 

| लिपाहुआ शुभ सण्डप | प्रयत्नपूवंक विधिके साथ ब्राह्मगोंको दे दे ॥ १५ ॥ अन्य 

» से अलक्षत वित्ान बांधे ॥४॥ | ब्राह्मणोंकों भी प्रयत्न पूवक भाक्तिभावके साथ शिवजीकी 

“दर पववर्णोंस प्म बचादे उसके ऊपर | 

यर प्रीहि रखदे || ५ ॥ सब औवबधियोंके 


के 'चान्दीके 8 | तथा दूसरे दिन नियम पूवक कुटुम्बियोंके साथ भोजन करें 
की ऊपर सोनेक | ॥१७॥ जो स्त्री इस अकार इस ब्रतराजको करती है, उसका 


बंदका वेत्ता रुद्॒मत्र और गौरीमेत्रस १०८ अथवा 


कक 


तुष्टिक लिये बहुतसी. दक्षिणा दे ॥ १६ ॥ जो भी कुछ करे 
वो लिराल्सा होकर पाब॑ती और शिवजीके उद्देशसे करे 


सातजन्मतक सौभाग्य अचछ रहता है, इसमें कोई सन्देह 


नहीं है || १८ ॥ यह श्रीहरिताल्िकाब्रतका उद्यापान पूरा! 
हुआ। कम 













ब्तानि, | ह भाषाटीकासमेल: । (१११ ) 
| बुहद्वोरीब्रतव्‌ ॥ 
 अथ भाद्रपदकष्णत॒तीयायां बृहद्रौरीत्रतम्‌ ॥ डोर्लीति देशभाषायाम्‌ ॥ शाखामूछफलेः 


सह रीगेणीलिप्रसिद्धां बहती गहमानीय सिकताविद्यां निक्षिप्य उडझेदऐेच्ए तत्र ता न्‍्यसेत्‌। 
चफ्द्रोदर्य दष्ठा सुस्नाता प्॒रसखीनिः सह अलंकृत्य पुजेयतातद्थथा मम इह जन्माने जन्मा- 
न्तरे चाक्षय्यसौभाग्यमातिकामा पुत्रपौत्ादिधनधास्येश्वर्यश्राप््यण श्रीगौरीमीत्यथ शहद्रौरी- 
ब्रतं करिष्ये इति संकरूप्य कलशे वरुण संपूज्य इहहौरीं पूजयेद्‌ ॥ चठडेजा छुवर्णार्तो नाना- 
लड्डारभूषिताम्‌ ॥ हिमेन्दुतुहिनामार्सा झक्तामाणविभूषिताम्‌ ॥ पाशाडकुशधरां देवों ध्यायेत्‌ 
सवार्थसिद्धिदाम्‌ ॥ कमण्डलुधर्रा सूक्ष्मां पानपात्र च बिश्रतीम्‌ ॥ ध्यायानि ॥ एंहि मात- 
विशुद्धे त्व॑ त्रिगुणे परमेश्वरि ॥ आवाहयामि भकक्‍त्वा त्वाँ प्रसन्ना लव सबेदा ॥ आवाहनम ॥ 
हेमरत्नकृत देवि आसव॑ ते विनिर्मितम।पाशाहकुशघर्रां दुवीमासने स्थापयाम्यहम्‌॥ आसनम्‌॥ 
अक्षमालाइकुशधरे वीगापुस्तकधारिणि ॥ भक्‍्त्या दत्त मया तोय॑ पाया मतिगहाताम ॥ 
पाद्यम ॥ अध्य ददामि ते मातमंक्तानामभयेकरे ॥ गृहाण त्व॑ बहहोरि गन्धाक्षतसमन्वि- 
तम्‌ ॥ अध्यम्‌ ॥ भक्तानामिष्ट मातः सर्वोलड्वारसंयुत ॥ आचम्यतां जगन्मातब्ृहद्टोरि 
नमो5स्तु ते॥ आचमनम्‌ ॥ ततः पश्चाप्ठतल्लानम ॥ इस्नापयामि जगन्मातस्त्वां सुतीथजलेन 
वे॥ प्राथेयित्वा मया देवि सद्यस्तापविनाश्िनि ॥ स्नानम्‌॥ वल्ले घोत॑ अूया देवि डुकूले तब 
निर्मितम ॥ मक्‍त्या समर्पित मातगहातां जगइम्बिदे ॥ बखन्‌॥ हरिेदां कुटकु्म चव सिन्दूरं 
कजलान्वितव॥ सौमाग्यद्रव्यसंयुक्ते शृहयण परमेश्वरि ॥ सोमाग्यद्रव्यम्‌ ॥ प्वसूत्रविनि्मित॑ 
दोरकमर्पयेत ॥ मलयाचललंभूत घनखारं मनोहरम्‌ ॥ गन्घे गृहाण देवि त्वं बहढ्ोरि नमो5स्तु 
ते॥ गन्धम ॥ करवीरेजातिकुसमेश्रम्पकेबकुलेः शुभेः ॥ शतपत्रेश्व कहारेरचंयेत्परमेश्वरीम्‌ ॥ 


अथ बृहद्‌गौरीततमू-भाद्रपद्‌ कृष्णा दृतीयाको वृहृद्गौ- | 
रीब्रत होता हैं । भाषामें इसे डोली कहते हैं. शाखा, भूल | 
और फछों सहित बडीकटेरीको जिस दक्षिणक्री भाषामें | 
के पे) 0 सै *- ; 
रींगिणी कहते हु । घर छाकर रतेको वदी पर निश्षिप्त 
करके पानीस ,सींचकर तहां ही उसे रखदे | अच्छी तरह | 
स्नान की हुई स्री, सजघजकर, घन्द्रोदयकों देख पांच | 

। पे भर पूर ३ घि रे ५ | ल्‍ूर-्छ न 
सखियोंके साथ पूजे। उसकी विधि यह हूँ कि, मरे इस | कारोंसे संयुक्त ! आचमन करिय । हैं जगतकी माता बूह - 
जन्म और अन्यजन्मोंमें अक्षय सोभाग्यक्रो _चाहनेवाली | दूगौरि ; तेरं छिय वारंबार नमस्कार है, इस मंत्रस आच- 
मं, पुत्र, पौत्र आदि, धन, धान्य; ऐश्वय्यप्राप्तिक लिय तथा | 
श्री गौरीदेवीकी प्रसन्नताके लिये बुह्द्गौरीके ब्रतको में कर- | 
तीहूँ ऐसा संकरप्‌ करके कलशपर वरुणका पूजन कर बृह- 


दूगोरीको पूजे । चतुुुजी, सोनेकीसी कान्तिबाली, अनेक 
तरहके अलंकारोंसे भूषित हुई, हिम; इन्दु और तुहिनकी 


तरह चमकनेवाली, मुक्तामणियोस विभूषित एवम्‌ पाश | 


और कुशको :हाथमें लिये हुए जो सब सिद्धियोंकी देने- 








माला, अकुश और वीणा पुम्तकक्रो धारण करनेवाली ! 
मैंने मक्तिभावसे पानी दिया है इसे आप पायके लिय ग्रहण 
करिये; इस मंत्रस पाद्य, तथा-हे भक्तोंकी अभयकरनेवाली 
मातः ! | में तेरे छिय अधे देता हूं इसमें गन्घ और अश्षत 
मिले हुए हैं । हे बृहदूगोरी ! आप ग्रहण करें। इस मंन्नस 
अघे, तथा-हे भक्तोंको इष्ट देनवाडी माता: हे सब अल - 


सन्‌, तथा- इसके बाद पंचामलसे स्नान कराना चाहिये कि, 
हैं जगन्प्तातः | हे शीत्र ही तापको नष्ठ करनेबाली !आपकी 
प्राथना करके अच्छे तीथोके पानीस आपको ख्वान कराता 
हूं । इस मंत्रस स्नान, तथा-दें देवि | इस घोत बख्रका 
दुकूछ, आपके छिये बनाया गया है; में भक्तिभावसे सम- 
पिंत करता हूँ, हे जगद्म्बिके मातः | अहण .करिये। इस 


| मंत्रस बल्च, तथा हरिद्रा, $ुंकुस तथा कजल सहित सिन्दूर 
बाली तथा करंडलु और पान पात्रको छिये हुए हैं ऐसी | 
जो दवी है उसका में ध्यान करती हूं। हे मातः ! ज्ल, तू | 
विशुद्ध हैं, और तीनों गुणोंकी मालिक है जैँ मक्तिके साथ | 
: तेरा आवाहन करती हूँ; आप मुझपर सदा प्रसन्नरहिये इन | 
मेत्रोंस आवाहन, तथा है देवि ! आपका आसन हेमरत्नों- | 
का किया है, पाश और अकुश घारिणी देवीको में आसन- [| 
पर स्थापित करता हूँ । इस मंत्रस आसन, तथा-है भक्ष- 


थे सब अन्य सौभाग्य द्वव्योंके साथ हे परसेश्वरि ! प्रहण 
करिये। इस संत्रस सोमाग्य द्रव्य, तथा पांच सूत्रका बना- 
या हुआ डोरा अपँण कर दें; हे देवि | मरूयाचढूपर पेदा 
हुआ सुगन्धित सुन्दर घनसार उपस्थित हैं, भहण क्रिये हे 
बुहद्गोरी ! तेरे रछिय नमस्कार है । इससे गन्घ,तथा शुभ- 
करवीर, जाति, कुछुम, चपक, बकुछ। शतपत्र और कहा- 
रोंसे परमेश्वरीका जपून करना चाहिये। इस मंत्र । पुष्प। 


बलतराजः | [ तृतीया+ 





पुष्पत ॥ धूयोःप॑ णह्य॒तां देवि काछायुरुसमल्वितः ॥ से स्वेदेवानां ५३ ३४2१४ 
धूपम्‌ ॥ दीय॑ ग्रहाण देवेशि त्रेछोक्यतिमिरापहे ॥ वद्विना योजित॑ मातबुंहद्रों कल ज> ९५ 
दीपम्‌ | नेवच् गह्य तां देवि भक्ति भ ह्मचलों कुरू | इप्सित हु नर देहि प्रत्र च परा गतिम्‌ ॥ 
>> प्रभ्‌॥ इदे फलामति नारिकेलफलन्‌ ॥ पूगीफलामिति ताम्बूलम्‌ ॥ हिरण्य- 
नवेद्यम ॥ पानीयम ॥ इृद फलामात नारकलकल हे अल जा 
गर्मेति दक्षिणाम्‌ ॥ नीराजनम्‌॥ पृष्पाश्नलिम्‌ ॥ अथ कण्ठ दोरक॑ बध्नीयात | धारयिष्या मे 
बद्दे ताां त्वद्भक्ता त्वत्परायणा ॥ आयुर्देहि यशो देहि सौभाग्य देहि में शिव ॥ दोरकबन्धनम्‌ ॥ क्‍ 
क्षेंमसम्पत्करे देवि सवंसोभाग्यदायिनी ॥ सर्वकाम्रदे देवि गृहाणाध्थ नमो5स्तु त्‌॥ इति 
विशेषाध्यम्‌ ॥ ततब्र्द्वार्यव:-क्षीरोदार्णवर्सभूत लक्ष्मीबन्धो निशाकर ॥ ग़हाणाध्य मया दत्त 
रोहिण्या सहितः शशिन्‌ ॥ जार्थना “गगनाडुणसंदीप क्षीराब्यिमथनोद्भधव । । भाभाधितदि- 
गाभोंग रमाठुज नमोष्तु ते॥ पक्कान्नकलसंयुक्ते बायने दद्यात॥ आहूतासि मया दाव पूजितासि 
मया शुभ ॥ सोमाग्यं मम देहि त्व॑ यत्रस्था तत्र गम्यताम्‌ ॥ इति विसजनमू ॥ अथ कथा ॥ 
विजयोबाच ॥ अथान्यच् बृहुद्रोरीत्रतं वक्ष्यामि कल्यक ॥ मासि भाद्गपदे कृष्णे ततीयायां घ 
तद्गतम्‌ ॥ १ ॥ आनयेद्वहती गोरी शाखामूलफलेः सह ॥ रिंगिगीवृक्ष॑ समूहमानये तू ॥ 'निक्षिप्य 
देवतां वेद्यां तद॒धः पिकतां शुभाम्‌ ॥ २॥ न्यसेच्चसद्रोदय दृ्टा स्नात्वा धौताम्बराबता ॥ 
सखीनिः सहिता सम्यगलंकृत्य प्रपूजयेत्‌ ॥ ३ ॥ गोरीमावाह्य विधिवत्सिकतामण्डले शुभ ॥ 
गन्धपुष्पाक्षतीदिव्येधूपदीपेरनेकशः ॥ ४ ॥ सर्वोपचारबंहतीं युक्तां पश्च॑निरचेयेत ॥ एवं पूज्य 
यथाशक्त्या कृत्वा चेव प्रदक्षिणाम्‌ ॥ ५ ॥ बध्नीयादोरक॑ पश्च त्तिन्तु पश्चवकनिभि तम्‌ ॥ बध्नामि 
दोरक॑ कण्ठे खद्धक्ता त्वतरायणा ॥ ६॥ आयुर्देहि यशो दृहि सौभाग्य पीके के खडद्धक्ता खत्वरायणा ॥ ६॥ आडुदेंहि यशो देहि सौभाग्यं देहि मे शिवे ॥ 
बन लक नर अनंत पल नल व लाभाग्य दाह 


तथा है देवि ! इस थूपकों अहण करिये, इसमें काछागुर लक्ष्मीके छोटे भाई ! तेरे लिये नमस्कार है । इस मंत्रसे 


के के घ 0] य्‌ 
प्लिल् हुए हैं, सबके सूघनेकायकऊ है, देवहुमके रससे बनाया । 
मु है] 


है। इससे धूप, तथा-हे तीनों छोश्ोंके तिमिरको हरनेवाली 
दवेशि | जलायेहुए दीपकको प्रहण कर, है बृह॒दू गोरि 
तेरे लिये नमस्कार है। इससे दीप, तथा-हे देवि ! नेवेद्य 
महण कर और मेरी भक्तिको अचलछकर, यहां चाहेहुए बर 
दे तथा अन्तर्म मोश्ष दे, इससे नेवेद्य । इसफेबाद पानीय 
तथा इंद्मू फहम्‌ ”! इस मेत्रस नारियछ, तथा-/ पूणीफ 
लग ” इस संत्रसे ताम्बूछ और “ हिरण्यगर्भ ”” इस मंत्र 
दृक्षिणा, इसके बाद नीराजन, इसके पीछे पुष्पांजलि 
तथा-इसके पीछ कण्ठम्ें डोरा बांधना च/हिये कि, भें आ- 
पका भक्त आपमें ही चित्तकों छागानेवाढ। आपको घारण 
करता हूँ, है भद्दे | शिवे | मुझे आयु दे, यश दे और सौ- 
भाग्य दे । यह डोरा बांधनेकी विधि हुईं॥ है क्षम और 
सैपतूकी करनेवाली तथा सब सौभाग्योंकी देनवाली और 
सब कार्मोको भदान करनेवाडी देवि | अध्ये प्रहणकर, 
तेर लिय नमस्कार है, इस संत्रस विशेष अध्ये दे । इसके 
बाद... को अध्ये दे कि, हे श्लीरसागरसे उत्पन्न होने- 
डक्मीके भाई निशाकर ! मेरे दिये हुए अध्यकी न 
दान ; रोहिणीके साथ प्रहण कस्यि। है आकाशरूपी 
न हक ः द धछीरसमुद्रक सथनसे उत्पन्न होनेवाले ! 
---... से दिगुदिगन्तोंकों प्रकाशित कर देनवाडे 












१ सखीमिरित्यपि पाठः | 


चन्द्रमाकों प्राथना करनी चाहिये | पीछे पक्तान्न और 
हक ः सर फू, के आर 30५ 
फर्ॉके साथ वार्यना देना चाहिये । पीछे हे देवि ! मन 
तुम्हें बुढायाथा वथा हे श॒भे ! मैंने तेशा पूजन किया है; 
मुझे सोभाग्य दे तथा जहां विराजती हो वहां आनन्दके 
साथ चली जा | इस मंत्रस विसजन करना चाहिये ॥ अथ 
कथा -विजया बोली कि, हे ऋन्यके ! में तुझे बृहद्‌गौरिके 
त्रतकों कहता हूँ-भाद्रपद भासके क्रष्ण पक्षकी तृतीयाकों 
वह ब्रत होता है ॥ १॥ इहती गौरीको शाखा, फल और क्‍ 
मूक साथ छावे अन्थकार कहते हैं कि ) बहती गोरीका 
मतलब बडी कट॒हरीसे हे। उस देवताकों बदीपर रख, 
बडी कटहरीके नीचे सुन्दर बालू डालनी चाहिये ॥ २॥ 
हर कि भ्५ रे श् 
| ३ पुल हुए अच्छे कपडे पहिन, चौँदक उगने पर 
सख्ियोंके साथ मझ्ुलक्ृत्य करके उसका पूजन करना चा* 
हिय॥ ३॥ उस सिफताके पवित्र संडरूपर विधिक साथ 
गोरीका आवाहन करके अनेक तरहके दिव्य गन्ध) पुष्प, 
अक्षत, धूप और दीपोंसे ॥ ४ ॥| तथा सब उपचारोसे 
+ चजसहित बडी कटंहरीका पूजन करना चाहिय्र । 
व प्भकार यथाशक्ति पूजन कर ग्रदक्षिणा करके ॥ ५॥ ; 
पीछे पांच ढर्‌का डोरा बॉवे कि, में इस डोरेको कंठमें 
(जाई तू अपने शरणागतोंकी संभालनेवाली एवम्‌ उनकी 
"पमगति है॥६॥हे शुभ ! आयु दे.यश दे और सौभाग्य दे, 


धैतानि | भाषाटीकासमेतः । 






७॥ क्षेमसंपत्करे देवि सर्वेतोभाग्यदायिनि ॥ 
सर्वकामप्रदे देवि गहाणाव्य नमोःस्तु ते ॥ ८ ॥ गगनाड्गणसंदीप क्षीराब्धिमथनोद्धव ॥ माभा- 
सितदिगाभोग रमांठुज नमोस्तु ते ॥ ९ ॥ कथामेता च खणुयाहोय ग्रे तत्मनाः सदा।॥ ततो 
गोधूमचूर्णेन पश्चक्तिः कुडवेयुतम्‌ ॥ २० ॥ पक्कान्नमथ विभाय दत्वा खुख्धीत च स्वयम्‌ ॥ एवं वे 
पश्चवषाणि कृत्वा ब्रतमतुत्तमम्‌ ॥१ १॥सवोन्कामानवाप्नोति नात्र कार्या विचारणा ॥ ऋषिकन्यों< 
बाच ॥ केन चादों पुरा चीण ब्रतमेतत्वयोदितम॥ १२॥ ईप्छितं कोपि लेने वा अतस्यास्य 
प्रभावतः ॥ विजयोबाच ॥ रण कन्ये यथा प्रात पावेत्या कथित पुरा ॥ १३॥ खूत उबाच ॥ 
श्रणुध्वमषयः सर्वे नेमिषारण्यवासिनः ॥ पुरा कृतयुगस्यथादों सर्वेभुतहिलषिणा ॥ १४ ॥ 
शंभुना कथित गोये तद्॒तं कथयाम्यहम्‌ ॥ कदाचिदुपवि्ट त॑ पावेती परयपच्छत ॥ १५ ॥ 
पावेत्युवाच॥ शांभो त्वां प्रष्टमिच्छामि करुणाकर शड्ूर ॥ सर्वेबाधोपशमन सर्वकामफलप्रदम्‌ 
॥ १६ ॥ ब्रतानां सर्वदातानाछुत्तम ब्रृहिं तत्वतः ॥ आयुरारोग्यदं देव पुत्रपोत्रमदायकम्‌ ॥ १७ ॥ 
तद्भतं ब्रहि देवेश यद्यह॑ं तव वछमभा ॥ इश्वर उवाच ॥ श्रणु देखि पर गहाँ त्र॒तं परमहलनम्‌ ॥ 
पुराभूद्रपर स्यान्ते पाण्डोः ज्ियवराड्ना ॥ २८ ॥ वर्षषोडशसंपूर्णां संपत्ननवयोवना ॥ अन- 
पत्या तु सा कुन्ती मतोरभिदमबवीत्‌ ॥ १९ ॥ कुत्त्युवाच ॥ केन कर्मविषाकेन पुत्रहीनाश्मि 
दुःखिता ॥ अनपत्यप्रतीकारमिदानीं ब्रहि तत्वतः ॥ २० ॥ पाण्डुसवाच ॥ ऋषिशापो5छिति मे 
भद्रे यतस्ते ने भाविष्यति ॥ २१ । भतुस्तद्वचन खश्वत्वा विदगहेध्म्यगात्स्वयम्‌ ॥ पित॒गेहे बले- 
माना कुन्ती व्यास ददर्श ह ॥ २९॥ नमस्कृत्य च ते प्राह कुन्ती लुकुलिताखलिः ॥ कुन्त्यु- 
वाच ॥ तात में कथायाशु त्व॑ पुतरसन्‍्तानकारकम्‌ ॥ २३॥ सर्वेश्॑पत्करे दृणां ब्रतमे्क महा- 
मुने ॥ व्यास उबाच ॥ शृणु त्वे बृहतीगोयों बर्त सन्‍्तानदायकम्‌ ॥ २४॥ भाद्गकृष्णव॒तीयायाँ 


अनेन दोरक॑ बद्धा चन्द्रायाध्ये समपेयेत्‌ ॥ 





इस मंत्रस डोरा बांध कर चन्द्रमाके लिये अधे देना चाहिये | 
॥ ७ ॥ हे क्षेम और संपत्‌की करनेबाली तथा सब सोभा* | ब्रा तथा र 
| इच्छाओंको पूरी करनेवाला ॥१६॥सब देनेवाल ब्रतोंमे जो 


ग्योंको देनेवाली, सब कामनाओं को पूरी करनेवाली देवि ! 


अधे ग्रहण कर, तेरे छिये नमस्कार है| ८ ।| हे आकाशके । 
आंगनके दीप ! तथा क्षीर समुद्रके मथनसे होनेवाल् | है | 
अपने प्रकाशसे दिगू दिगन्तोंके प्रकाशित करनेवाले लक्ष्मी- | 

मा १६ ७ कर, विश जे ; 
जीके छोटे भाई सोमराज | तेरे छिय नमस्कार है ॥ ९ ॥ | 
गौरीके सामने तन्‍्मना होकर इस कथाको सुने तथा पाँच | 
अंजछी गहूंके चूनका पक्कान्न बनाकर भोग घरे ॥ १० ॥ | सोलह व पे >> 
। न होनेके कारण पतिसे बोली कि, कोनस कम विपाकके 


आधा पक्तान्न ब्राह्मणको देकर आधेका स्वयम्‌ मोजन करे | 


इस प्रकार पांच वर्ष इस अपूर्व ब्रवको करके || ११ || सब | न्‍्तान्‌ होनेसे थ 
| प्रतीकार यथार्थ रूपसे कहिये । यह सुन्‌ पाण्डुराजा बोढे 


कार्मोंक्रो पाजाता है, इसमें विचार करनेकी बात नहीं हे। 


यह सुन ऋषिकन्या बोछी कि, सबसे पहिले आपका कहा | 
हुआ यह त्रत किसने किया था॥ १९ ॥ तथा इस ब्रतके 
प्रभावसे किस इच्छितफछ मिला है! यह सुन विजया बोली : 
कि, हे कन्यके | सुन; मुझे सबसे पहिले पावतीजीने कहा | 
था ॥ १३॥ सूतजी बोड़ें कि, सभी नेसिषारण्य बासी | 
ऋषियों |! सुनो | पहिल कृतयु गक आदि सब प्राणियोंके | 
हितेषी ॥| १४ ॥ शंभुन यह ब्रत गौरीके छिये कहा था; | हू 
'गौरीका ब्रत सनन्‍्तानका देन वाला है।२४।भाद्रपद्‌ कृष्णा- 


उसे कहता हूँ, कभी बेठेहुए शिवजीसे पावेतीजीने पूछा 


१५ 





१ सोमराज इत्यपि पाठः । * अनपत्यत्वप्रतीकारमित्यथः । हे अपत्यमितिशेषः । 


था ॥१०॥ हे करुणाकर ! शकर ! शंभो ! में आपसे पूछवी 
है कि, सब वाधाओंकी शमन करनेवाढा! तथा सभी 


सर्वोत्तम बत्रत हो सो कहिये | वो आयु, आरोग्य बथा पुत्र, 
पौत्रों का देनिवाठा हो ॥१७॥ है देवेश | यदि आपका मुझ- 
पर प्रेम है वो उस ब्रतको मुझसे कहिये | यह सुन शिवजी 
बोले कि, हे देवि ! सुन अत्यन्त गोपनीय प्रमदुरभ ब्रत 
सुनाता हूं । पहिले दवापरक अन्तर्म पाण्डुकी प्यारी सझुन्द्री 
सोलह वर्षकी अवस्थावाली नवीन यौवना कुन्ती सन्तानके 


कारण मैं निस्सन्‍्तान होनेसे दुःखी हूं || २० ॥ इस दोषका 


कि, मुझे ऋषिका शाप है, इस कारण तेरे सन्‍्तान न होगी 
॥ २१ || भर्ताके एस बचन सुनकर आप पिताके घर चल 
दी, पिताके घरमें रहते हुए एक दिन व्यास देवके दर्शन 
हुए ॥ २२ ॥ उन्हें नमस्कारपूर्वक हाथ जोडकर बोली कि, 
कोई पुत्र सन्‍्तान होनेका उपाय शीघत्रही कहिये ॥ २३ ॥ 
जिससे सब तरहकी संपत्ति होजायँ, हे महामुने | ऐसा 
ब्रत होना चाहिये। यह सुन व्यासजी बोले कि, बृहती 





झञं; | ु | ततीय|+ 
(११४) ५०४ अली निन सी नर लिर ५८५५८ म न जी लक मन न कल हि, कम मिल मलिक, 





दा किक 22 पका ५7४६ #3५५# एक 5 । ए// कक: 7 ऋषि 4 
(5287 %४५/५२३४४०-॥ 4 धार 
; 





निशि चत्धोदये श॒भे ॥ स्नाने कृत्वा च विधिवन्मोनी भूत्वा व्रत चरेत्‌ ॥ २५॥ सर्वेसंपत्का 
चव छरीणां पत्रान्नसोख्यकृत्‌ ॥ भ्दिरण्यादिदानानां सर्वेपामधिक व्रतम्‌ ॥ २६ ॥ पञ्ववर्ष विधा 
तव्यं तत उद्यापन चरेद्‌ ॥ उद्यापनविधानन संपूर्ण फलमश्नुते ॥ २७॥ अन्‍्ते ठ॒कारयेद्धक्ता 
सौवण बृहतीफडप्‌ ॥ पट्टबुत्तरचतुर्निध शुभ बजरय॑त॑ तु तत्‌ ॥ २< ॥ देंव्याः पुरस्त संस्था 
पर्ववल्लातिपूजयेत्‌ ॥ आचार पूजयद्धक्त्या विप्राव पश्चव॒ तथंव च॥ २९॥ सुवासिन्यः पथ 
पूज्या बख्यालंकारभूवणे! ॥ कंचुकेश्वेव ताण्दकेः कण्ठसूत्रहरिद्रया ॥ २० ॥ वेशपत्राणि पञ्चव 
सत्रेः संवेष्टितानि च ॥ घिन्दूरं जीरक॑ चेव सोभाग्यद्रव्यसंयुतम्‌ ॥ रे१॥ गोधूम पिष्ठजातं व 
बृहती उलपथ्कम्‌ ॥ वायनाति च पश्चेव तथ्यों द्यात्त ओजनम्‌॥ रेंर॥ अध्य दत््वा वाय- 
नानि दत्वा भुखीत वाग्यतः ॥ तत्फल घारयेत्कण्ठे सवेकाम सम्रद्धये ॥ रे ३॥ ततः आतः ससमु- 
त्थाय सालंकारा सखीजने; ॥ गीतावाह्ययुत। नद्यां गोततां तु विसजेयेत्‌ ॥ रे४ ॥ आहू- 
तासि महादेवि पूजितासि मया शुभे ॥ मम सोमाग्यदानाय यथेष्ट गम्यतां त्वया ॥ ३५॥ 
एतदूब॒तम्रभावेण काचिद्राह्मणकन्यका ॥ पातिं सञ्जीवयामास निर्भत्स्थे यमर्किकरान्‌ ॥ ३६॥ 
तस्माश्वर त्व॑ ब्रतमेतदाद्यममाय+प्रदूं पुत्रसमृद्धिदं च ॥ पृत्रेश्च पोजेश्व झुता चर पत्या गोरीप्रसा- 
दाद्वव जीववत्सा ॥ ७३॥ य इढ श्णुयत्रित्य॑ श्रावयेद्र समाहितः ॥ स भ्ुकत्वा विपुलान 
भोगानन्ते शिवपद व्रजेत्‌ ॥ ३८ ॥ इति श्रीभशिष्योत्तरपुराणे बृहद्रौरीकथा संपू्णों ॥ 
इृदं कणोंटके प्रसिद्धम ॥ 
सोभाग्ययुन्द्रीत्रतम्‌ | 
अथ मार्गशीर्षें माघे वा कृष्णतृतीयायों सोभाग्यछुन्द्री्रतव ॥ तब्नतुर्थीयुतायां कार्य न 
द्वितीयाविद्वायाम्‌॥ द्वितीषावेधरहिता ततीया याइसिता भवेत्‌ ॥ चतुर्धीयोगिनी किंचि- 
च्छुद्धा वापि यदा भवेत्‌ ॥ इति कथायासुक्तेः ॥ अथ कथा ॥ नारद डवाच॥ भगव॑स्ते प्रजाःसष्टा 











वुतीयाकी रात चन्द्रमाके उदय होनेपर विधिक साथ स्वान साथ ले. गाने बजानेके साथ उस गोरीका नदीम विसजन 
करके मौनी हो व्रत करना चाहिये ॥ २५ ॥ यह सब | कर दे हे ॥ ३४ ॥ हे द्वि ! मत्े तुम्हारा आहान किया था 
तंपत्तियोंका करनेवाला है वथा श्लियोंको पुत्र और अन्नसे | पथा पूजन भी किया है। सु सौभाग्य दुनेकेलिय यथ् 
पुखी करता है,भूमि और दिरिण्यदानस भी इसका अधिक | गन करिये॥ ३५ ॥ इसी ब्र॒तके प्रभावसे किसी बह" 
फछ होता हें॥ २६ ॥ पांच बष इस ब्रतको करके पीछे | "की छडकीने यमके नौकरोंको डरा कर पतिको जीवितकर 
ईसका उद्यापन करना चाहिये,उद्यपत करनेस सब फलको लिया था॥ ३६ हे इस कारण तुम्त इस ब्रतकोी करो । यह 
ग़जाता हैं ॥ २७ ॥ अन्त तो भक्तिके साथ एक सोनेका | अओ वधा पुत्र पौशोंकी समृद्धि देनवाढाहै,तू भगवती गोरीके 
इटेरीका फूछ बनाता चाहिये, उसमें सोनेके चौसठ बीज | +सोद्से पुत्र पात्रों सहित जीतेहुए व॒त्सोंवाली हो ॥३७॥ 
बनाने चाहिय।।२८॥उसे देवीके सामने रखकर पहिलकी जो इसे एकाग्रचित्तस सुनते घुनाते हैं,वे यहां अनेकों तरहके 
तरह पूजना चाहिये तथा वहीं भक्तिक साथ आचाय्येका | भोगोंको भोगकर अन्तमें शिवपदको पाजाते हैं. ॥ ३८ || 
और पात्र ब्राक्मणोंका पूजन करना चाहिये ॥२९॥ कंचुकी, | हैं श्रीभविध्योत्तर पुराणके बृहृद्‌गौरीबतकी कथा संपूर्ण 
तठा; कठसूत्र तथा बस्र, अलेकार, हरिद्रा ओर मूषणोंस | 5९ | यह त्रत अधिकतर कर्णाठक देशमें असिद्ध है॥ 
च सुबासिनियोंकों पूजना चाहिये || ३० ॥ घांच बॉसके | सौभाग्य सुन्द्री ब्रतमू-सागे शीर्ष वा साघमें क्ृष्णपक्षकी 
साथ शक हुए जौरा और सौभाग्य इब्यके | तीजको सौभाग्य सुन्दर ब्रत होताहै।यह ब्त चतुर्थीसे युक्त 
ब है हा है पाँच पके हुए कटेरीके फल | तृतीयामें तो-कर लेना चाहिये पर द्वितीयास विद्ध तृतीयामें 
अल व रदेदे ॥ हि ॥ अध्य और वायव | ट्वितीयाके वेधस रहित जो कृष्णपक्षकी तीज हो भ्े -ही 
हि 5 आर ३ डक पू्तिके छिये उस | वह्‌ चतुर्थीके साथ युक्त हो अथवा किंचित्‌ शुद्ध हो तबहीं 
+२ नित्यचय्यांसे निइत्त हो, अछुझार आतकाढ उठ. | सोभाग्य सुन्दरी त्रत करता चाहियेअथ कथा-एक समय 


' अछझ्ार पह्िंन सखियोंको | देवषिं नारद पितामह ब्ह्माजीस शिष्वाचारके उपराब्त 












नानाव्णास्तथा गणाशा स्वेदजा अण्डजाश्वेव उद्धिज्ञाश्व जरायुजआा3॥ १॥ देवालुरा+ सगन्धर्दाः 
सयक्षोरगराक्षसाः ॥ एके सुरूपाः झ बलिनश्वापरे तथा ॥२॥ तथान्ये दुःखसंयक्ता 
काणा मुकाश्व पड्वः ॥ हुःशीला दुर्लंगा दीन परकर्मकराः सदा ॥ ३॥ एवं मे हृदि सन्ताप॑ं 
संशय छेत्तमहंसि ॥ ब्रह्मोबाचा श्रणु वत्स प्रवक्ष्यामि त्वभक्तोडइसि श्रियोईसि मे ॥शा। कमबीज- 
प्ररूठ हि शरीर पाथ्चमोतिकम्‌ ॥ ये दत्तदाना जायन्ते खुरूपाः खुखिनों जन ॥ ५॥ तपः३- 
प्रभावाज्ञायनते बलिनः सुमगास्तथा ॥ अदत्तदाना जायन्ते परकमंकराः सदा ॥६॥ पराप- 
वाददक्तार; परद्रव्यापहारका: ॥ हन्तारः प्रा णिनां चच अभक्ष्याणां च॒ भक्षका। ॥ ७ ॥ ऋणजशो 
नरकान भुकत्वा जायन्ते कुत्सिता नरा। ॥ द्रिद्वाः पड़वो मूकाः काणाद्या दुर्भगास्तथा ॥ <॥ 
नारदवं स्वकर्मोत्था नरा नायथश्व हुःखिताः ॥ नारद उवाच ॥ उपाय बृहि भगवन्येन कर्मक्षयों 
भवेत ॥ ९॥ तपो दान॑ व्रतं तीथ शरीरस्थ च शोषणम्‌ ॥ इुःखसन्तापतत्तानां जीवितान्म- 
रणं वरम्‌ ॥१०॥ ब्रह्मोबाच श्र॒णु नारद यद्‌ गह्मं त्रतानाझ्तत्तम व्रतम्‌॥ स्वदःखभशमन व्याधि- 
दारिद्यनाशनम्‌ ॥। ११ ॥ सखुखसोभाग्यजननं पुत्रपोत्रभदायकम ॥ खुरूपदं च सोमाग्यकारणं 
. क्ामदं तथा ॥ १२॥ नारीणां च विशेषेण सुखसोभाग्यदायकम्‌ ॥ वसिष्ठाय पुरा मोक्तमुषीणां 
च समागमे ॥ १३ ॥ केलासशिखरे रम्ये शंकरेण महात्मना ॥ नारद उवाच ॥ कस्मात्पोबाच 
भगवान्कृपा कस्मादजायत ॥ १४ । बहक्तोवाच ।। दृष्ठाउतं च सोमाग्यमरुन्धत्या जगत्पशञ्ञु३ ॥ 
तथा रूप च शीले॑ च सोभाग्यमतुर्ल तथा ॥ १५॥ कृत्वा शिरःम्रकम्पं च जहास मुदु शडूरः ॥ 
पृष्ठवाउछडुर देव॑ वसिष्ठ: स्मितकारणम्‌ ॥ १६॥ इश्वर उवाच ॥ अहो ब्रतस्य माहात्म्य॑श्रूयता- 











बोले कि; हें भगवन्‌ ! आपनेही अनेकों वण तथा अनेकों 
गुणवाली ये प्रजा रची है, पसीनास पेदा होनेवाले, अण्डों 
५. फ ।। पक २ |: आप हक 

से पेदा होनेवाले तथा भूमिसे निकरनेवाले पोदे एवम्‌ 
जरायुज मनुष्यादिक सब आपके ही पैदा किये हुए हैं 
॥ १ ॥ मय गन्धवोके देव और असुर। यक्ष, सर्प, राक्षस, 
सुरूप, बलवान्‌ तथा कुछूप, निबंछ ॥ ९॥ एवम्‌ अनेक 
प्रकारक दुखी, काने, गूंगे, पंगु, दुराचारी, दुर्भाग्य तथा 
सदा दूसरके काममें छगे रहनेवाक्े आपके ही बनाये हुए हैं 
॥ ३ ॥ यही मेरे हृदयमें संताप है कि; आपके वनाए हुए 
ऐस क्यों हो गये हैं ? आप मेरे इस संदेहको मिटाकर मुझे 
शांति प्रदान करिये | इतना सुनकर त्रह्माजी कहनेलंगे कि, 
हे वत्स ! तुम मेरे प्यारे भक्त हो; इस कारण में तुम्हें 
सुनाता हैं, तुम सावधान होकर सुनों ॥ ४ ॥ यह पञ्चमूतों 
से बना हुआ शरीर कमरूपी बीजका पौदा हैं, जिन्होंने 
दान दिए हैं वें सुन्दर और सुखी होते हैं ॥५॥ तपके 
प्रभावस बी ओर सुभग होते हैं पर जिन्होंने दान नहीं 
दिया है वे दूसरोंकी नौकरी करकेह्दी अपना जीवन विताते 
हैं | ६ ॥ दूसरेकी बुराई करनेवाले, दूसरेके धनको हरने- 
वाछे, प्राणियोॉंके मारनेवाे एबयम अभक्ष्यके खानेतन्नाले 
घृणित जीव ॥ ७ || अपने २ कर्मोंके अनुसार नरकोंको 
भोगकर उसी कर्मके छेशसे यहां आकर दरिद्री, छंगडे, 
मूँंगे, काने कोजडे और दुभंग होते हैं ॥ ८ ॥ हे नारद ' 
इस कारण ये प्राणी अपन २ कर्मासे आप दुखी हो रहे हैं । 
इतनी सुनकर नारदज़ी महाराज ब्रद्माजीसे कहने छगे कि 





हे भगवन्‌ | कोई ऐसा उपाय बताइये जिनसे इन दुःखी 
जीवोंक अशुभ कर्मांका नाश हो जाय ॥ ९॥ यदि ऐसा 
कोई तप; किंवा दान त्रत तीथे और शरीरका शोषण भले 
ही हो, बतला दीजिये क्‍योंकि दुःखक सन्‍्तापसे तपे हुए 
इन जीवोंका जीनेसे मरनाही अच्छा हैं ॥ १० ॥| यह सुन- 
कर त्ह्माजी कहने छगे कि; है. नारद ! :सावधानीके साथ 
सुन लेना; ब्रतोंमेंसे अद्यन्त गोपनीय एक उत्तम ब्रत हैँ वो 

सब दुःखोंका शान्त करनेवाढा एवम्‌ व्याधि और दारि 
ठाका नष्ठ करनेवाल्य हे !! ११ ॥ सुख तथा सोभाग्यका 
पेदा करनेदाह्न और पुत्र पौत्रोंका दनेवाला है, सुरूपका 
देनेवाला सौभाग्यका कारण तथा सब कामनाओंका देने- 
वाला हैं।। १९॥ और ख्वियोंकों तो विशेष करके सुख 
सौभाग्यका देनेवाला है। पहिले इस बतको सब ऋषियों 
के समागमर्में वसिष्ठजीके छिए ।॥१३॥ सहात्मा शकर भग- 
वानने कैलाशकी सुन्दर शिखरपर कहा था। इतनी कथा 
सुनकर देवर्षि नारदजी पितामहसे कहने छगे कि, है महा“ 
राज यह वो बताइये कि,यह त्रत वसिष्ठजीके लिये शिवजी 
ने क्‍यों कहा तथा येह कृपा वसिष्ठजी पर क्यों हुईं।१४॥ 
इतना सुनकर अक्माजी नारदजीसे कहने छंगे कि, हे घुत्र 
शिवजीने अरुन्धतीका अतुछ अद्भुत, सौमाश्यतथा सोन्द्य 
और सुघचरित्रोंको देखकर ॥ १०५। शिर हंछाकर सुन्दर 
मन्द्हास किया । उसी समय वसिष्ठजीने उस सन्दहयसका 
कारण पूछा कि,भगवन्‌ ! आपने किस कारण मंदृहासकिया 


हि कक 


है १६॥शिवजी कहनेछगे कि, हेअप्चऋषियों |बतकेमहात्मम्को 


हश्श्द) मा 









प्रुषिसत्तमाः ॥ पुरा जन्मनि श॒द्वस्य दासकर्मकरा सदा ॥ १७ ॥ उच्छिष्टभोजना नित्यमुच्ि- 
ट्शयना सदा ॥ कुरूपा दुर्गा दीना रूक्षा गहद्भाषिणी ॥१८॥नाम्ना मेघवती ख्याता हु: 


वदनाशुभा ॥ एकदा भ्रेषणार्थ सा गता ब्राह्मणसब्निधों ॥ १९ ॥ कृत॑ ब्रत॑ हल नारीणां वाच्य 
मान द्विजन्मना ॥ सोमाग्यसुन्द॑री नाल तृतीया सवकामदा ।॥ २० ॥ ३४४ ग्यदे शास्त्र सब- 
कामफलमप्रदा ॥ मया प्रकाशिता पूर्व प्राथितेनोमया तथा ॥ २१॥चीणण तासां असद्भाच्च मेरे 
वत्या प्रयत्ततः ॥ कुत्सितं चेव नेवेद्यं दत्त दानं च किश्वन ॥ २२॥ हविष्यं च तथोक्तिए 
पारणं च्‌ तथा कृतम्‌॥ केवल च ब्रत॑ चीण अ्रद्धायुक्तेन चेतसा ॥ २३ ॥ श्रद्धया धायेते धो 
बहुनिनोधराशिमिः ॥ ऋषयश्चक्रिरे धम श्रद्धया भावितात्मना ॥ २४ ॥ तेन धर्मविषाकेर 
निषादाधिपंतेः छुता ॥ सुरूपा च सुशीला च सर्वलक्षणसंथुता ॥ २५ सम्पूर्णावयवा जाता 
तस्था देव्याः प्रसादतः ॥ उच्छिष्टमोजनाज्ञाता निषादानां च योनिषु ॥ २९॥ अदत्तदानाद 
संजाता तथा सा भोगवजिता ॥ व्रतप्रभावात्संजाता सुरूपा च पतिम्रता ॥ २७॥ महासौ 
भाग्यसंयुक्ता साक्षाह्॒क्ष्मीरिवापरा ॥ सवकामप्रदा देवी नन्दिनी बसते गूहे ॥ २८॥ तढ्ठत 
चास्ति देवर्षे सवेकामफलप्रदम्‌ ॥ नारद उवाच ॥ ब्रतस्यास्य विधि त्रहि को विधिः किंच 
पूजनम्‌ ॥ २५॥ कस्मिन्मासे प्रकतंव्यं देवता का प्रकीतिता ॥ किंपुण्यं किंच नेवेद्यं ध्यान कि 
स्पाच्च पूजने ॥ ३० ॥ बह्ोवाच ॥ ब्रतस्यारम्भर्ण चादौ मार्गशीर्षषथ माघके ॥ द्वितीयाबेध- 
रहिता ततीया याइसिता भवेत्‌ ॥ ३१ ॥ चतुर्थी योगिनी किचिच्छुद्धा वापि यदा भवेत ॥ उप- 
वासं प्रकुबीत दुन्‍्तधावनपूर्वकम्‌ ॥ ३२ ॥ अपामार्गेंण कुर्बीत दन्तशाल तदा ब्रती ॥ उमे देवि 
नमस्तुभ्यं शंकरस्याद्धंधारिणी ॥३श॥ नियममत्तः ॥ प्रसीद श्रीमहेशानि करिष्ये व्रतसुत्तमम्‌॥ 
सात्निध्यं कुरू मे देवि ब्रतेरस्घिन्‌ हरवछमभे॥३७॥ सोभाग्यसुन्द्रीनाम वशिनी सा प्रकी्तिता॥ 


छुनो, पहिले जन्ममें सदा शुद्रके दास्यको करनेबाली॥१७॥ 


झूठिन खानेवाली, यक्त शय्यापर सोनेवाली, बुरी सुरतत- 
को, दुभगा, दीना, कठोर स्वभावकी, तोबछा बोलनेवाली 
॥ १८ ॥ जिसकी कि, तरफ कोई प्यारकी एक नजरभी न 


0० पक" 


डाल सके एसी भेधवती नामकी दासी थी | वो एकबार 
किसीके पहुंचानेक लिये किसी आरह्मणके यहां गयी ॥१९॥ 
न समय जाह्मण देव वहुतसी स्लियोंको सौभाग्य सुद्री 
नामक तृतीयाके ब्रतकी कथा सुना रहे थे जो सब कामना- 
ओके पूरे करनेवाडी है ॥ २० ॥ ज्ञान और वैराग्यकी देसे" 
वाली तथा सब का्मोंके फलोंकी दाता हैं, एकवार उमाने 
मुझसे श्राथना की थी उप्त समय भैंते 
किया था ॥ २९१ ॥ इन ब्रव 'करनेबाली स्लियोंके प्रसड़से 
दासी सेघवतीने भी इस ब्रतको प्रयत्नसे पूरा किया, उस 
अत प्राप्त हुये सडे बुसे थोडेसे नेवेद्रकाभी दान दिया 
॥ ९ ॥ तथा ब्रतकी सम्माप्तिमं इसने पारणाभी झूठे अन्नसे 
?. * इसके हृदयमें बतके लिये अपार श्रद्धा थी उसी 

$ + मे इसने ब्रतको किया था | २३॥ यह निश्चित वात 

हैं कि अद्धान धम्को धारणकर रखा है; वहुतसी धतन्र 

दिना वह हक धारण नहीं कर सकतीं, पर ऋषियोंने 
धर्म किया था। जिक्र गयी कर बे बस 
परम सुंदरी सशीर दम सप दासी उसी ब्रतके प्रमावस 
की कन्या बनी॥ २५॥ उसका कोई की... / भदराज 
का कोई सी अक्ू विकुछ नहीं 


ही इसे प्रकाशित 


था;:सोभाग्य सुन्द्रीकी कपास वो सर्वोग भुद्री हुईं। पर 
पारणामें जो झूठा अन्न खाया था, इस कारणही वो निषा- 
द्योतिम उत्पन्न हुईं । २६ ॥ इसने दान तो दियाही नहीं 
था; इसकारण इसे इस योनि भोगनेक छिये भी कुछ न 
मिला, पर ब्तके प्रभावसे सुरूपा औट८ पतित्रवा हुई॥२ण। 
महासोभाग्यसे संयुक्त यह एसी मालस होती थी मात्र 
दूसरी लक्ष्मी ही हो, यह सबको आनन्द देनेवाली तथा 
सब कामनाओं को पूरा करनेवाली नन्दिनी होकरही अपने 
पिताके घर रही ॥ २८ ॥ हे देवर | यह्‌ सब कार्मोंकाफूठ 
5नवाल्या है। नारद बोले कि, इस ब्रतकी विधि कहिय, 
केसे पूजन होता है ।। २९ ॥ कौनसे मासमें करना चाहिये 
कोन इसका दबता है, इसका पुण्य क्या है, नेवेय कौन १ 
रे + ४ ०. < 

है) एजनभ केसे ध्यान करना चाहिये | ३०।॥। यह सुन 
अह्मा बोले कि, सार्गशीरषमें या माघमें इसका इस ब्तका 
आरंभ करना चाहिये । जबकि, कृष्ण पक्षकी तृतीया- 
द्वितीया विद्धा न हो।। ३१॥ चाह वो किंचित्‌ चतुर्थी 
योगरिनी हो अथवा शुद्धा हो इसमें पहिले दांतुन करके पीढे 
उपधास करना चाहिए || ३२ ॥ ब्रती अपामागगंकी दातुन 
करे। हे शंकरकी अर्धाक्लिनि उमे देवि ! तेरे : छिए नमस्कार 
है ॥ ३३ ॥ नियम मंत्र-हे महेशानि! प्रसन्न हो जा तेरे 
इस उत्तम ब्रतको करूँगा, हे शिवकी प्यारी ! इस ब्रवमें तू 
मुझे सोन्निष्य देना ॥ ३४ ॥ इस ब्रतकी देवी सौभाग्य 


(११७ ) 









2कंआक विजकी#/व ०7 ८5०७५ ६४८ $ 67५४ ४४२: + तर + ६४: लक हू हरदा लक विवानाटन् १, रा: कं लेप जिकली हू हक हल 
रे 06: प्क््प्ट ५०००4... ४0 पयाटफज:च05 
जन यिय बन नर+-७5० न कन रलकन_--- ५ नकपमान माप ० ०३ भर. 


सवसत्ववशंकरी॥३५।तस्या दर्शनमात्रेण दासवज्ञायते जगत्‌॥ द्रोणपुष्पेश्व 
पम्पूज्या दाडिम चाध्यहेतवे ॥३६॥ नवेदयं मोदकान्दद्यात्कपूर ऋाइसरेदतल! ॥ सर्वासु च त॒ती- 
ग़सु विधिरेष उद्गहलः ॥३७॥ वत्स पोषासिते पक्षे दतीयायाँ बरत भवेदाचेदिकादन्तकाहं 
वर महकेण च पूजनम्‌ ॥ ३२८ ॥ राज्यसोमाग्यदां नाम सुरूरी पूजयेत्ततः ॥ धाचीफलं दंदेदड्य 
ड्रोल प्राशयेन्रिेशि ॥ ३९ | नेवेद्य बठकाः कार्या घृतशकंरथात्विता।॥ कंकोलाम्बु तथा 
गइय राज्यसोमाग्यहेतवे ॥ ४० ॥ पृतेन बोधयेदीप राजों जागरण चरेत्‌ || सर्वकाममदा देवी 
पर्वदुःखहरा सदा || ४१ ॥ सर्वेश्यप्रदा देवी सर्पापहरा शुभा।  एकापि बहुधात्मेय नामरूप- 
गरसेदतः ॥ ४२ ॥ माधमासे च॒ संप्राप्ते बदयां दन्तथावनम्‌॥ जात: कुर्वीत नियम रूपसोभाग्य- 
तवे ॥४१॥ अपराहे ततः स्नात्वा सवोभरणभूषिता ॥ चूतपुष्पेश्ष सम्पूज्या रूपसोभाग्य- 
उुन्दरी ॥४४॥ नालिकेशध्यंदानं च नवेद्य शष्कुली स्मृता॥प्राशनं चेव कघ्तूयपों रूपसोभाग्य- 
नुन्दरीम ॥४५॥पूजयेत्तत्र सा सर्वरूपसोभाग्यसुन्द्री ॥ फाह्युनस्थासिते पक्षे प्रातर्नियम्सयुता 
। ४६ ॥ सौमाग्यसुन्द्री बेल्व॑ दन्तकाएं तु कारयेत्‌ ॥ स्ताने ऋृत्वा तथा नारी काथनारेश्व पूज- 
पृत्‌ ॥४७॥ नवेद्य सक्तवस्तत्र घृतशकैरयान्विताः | यक्षकदमजो लेपो धूपश्वागुरुसंभवः ॥ ४८ ॥ 
ग्रीजप्राध्यदान च प्राशन चन्दनोदकम्‌। प्राशनस्य प्रभावेण सर्वान्कामानवाप्लुयात ॥ ४९ ॥ 
प्रणं च प्रकर्तेव्य सह सर्वैश्च वान्धवेः ॥ चेत्रे मासि प्रकत॑व्या तृतीया पापनाशिनी ॥ ५० ॥ 
पत्नेन पूजनीयारस्यां सुखसोभाग्यसुन्दरी ।। दम्तकाए्ठ समुहिद्॑ जम्बूवृक्षसमुद्धघधम ॥५१॥ 
एूजा दमनकेनाम अह्यें विह्वफले स्मृतम्‌ ॥ नेवेद्य मण्डकाः प्रोक्त४ शकेराइतसंयुता:॥ ५२ ॥ 
पुखसोौमाग्यप्राप्त्यथ प्राशनं वज्वारिणः ॥ वेशाखस्याखिते पश्े तृतीयायामुपोषयेत्‌ ॥५३॥ 


प्ालतीदन्तकाएं च नियमग्रहणं ततः ॥ पातिसोमाग्यदां 


सुन्द्री है कोई इसे वशिनी भी ऋहते हैं यह सब कामोंके 
देनेवाली है।। ३५ ॥ जिसके दशेन माजत्रस जगत्‌ दासकी 
तरह हो जाता हैं इस कारण इस वशिनी कहते है। द्रोण 
पुष्पोंस पूजन और अनारका अध्य होता है ३६।॥| लइड॒- 
ओंका नेवेद्य और कपूरका प्राशन करावे यही सब तृतीया- 
ओंकी विधि हे ॥॥३७॥ हे वत्स | पौषके कृष्णपक्षकी तृती- 
याके दिनसे इस ब्रतका प्रारंभ होता है,इसमें दांतुन ओऑंगाकी 
और पूजन दोना मरुएके फूछोंसे होता है॥३८॥इसके पीछे 
राज्य और सौभाग्यक देनेवाली सौभाग्य सुन्द्रीको पूजे, 
आसलछेका अध्य दे तथा कंकोलका प्राशन रावको करावे 
॥३९॥ थी शुक्र मिले हुए वटकोंका नेवेद्य करे तथा राज्य 
और सौभाग्यके लिये कंकोछके पानीका प्राशन करे ||४०॥ 
घृतका दीपक जलाकर रातकों जागरण करे, देवी सब 
कार्मोको देनेवाली तथा सब दुःखोंके हरनेब्राली है ॥४१॥ 
सब ऐश्रर्यके देनेवाली तथा सब पापोंके हरनेवाढी एवम्‌ 
एक होते हुए भी नामरूप भेदस अनेक आत्मावाली हें 
॥॥४२॥ माघ मासमें रूप ओर सौभाग्यके लिये प्रातःकाल 
नियमके साथ वेरियाकी दांतुन करना चाहिये ॥॥४३॥इसके 
बाद अपराहमें ्वान करके सब आभरणोंसे विभूषित हो, 
रूपसौभाग्य सुन्दरीका आमके फूछोंसे पूजन करनाचाहिये 
।४४॥नारिकिलका अधे तथा शण्कुलीका नेवेद्य और कस्तू: 





देवी सुंदरी पूजयेत्ततः ॥ ५४ ॥ पद्मेः 





रीका प्राशन होता है।इस द्नि जो रूप सौभाग्य सुन्द्रीको 
॥४५॥ पूजती है वो सबेरूप और सोभाग्यस सुन्द्री होती 
है फाल्गुन कृष्णपक्षकी तीजके दिन नियम शी होकर 
॥ ४६ ॥ सौभाग्यसुन्दरीको बिस्वकी दांतुन करावे वथा 
सस्‍्नाव करके कचनारके फूलोंस देवीका पूजन करे | ४७॥ 
इसमें थी सक्करमिल्े हुए सतुणही नेरेद्य होते हैं, यक्षकद- 
मका छेप और अगरका घूप दिया जग्ता हैं ॥ ४८ ॥ वी ज- 
पूरका अधे तथा चन्द्नके पानीका प्राशन हो; इस आशनके 
ही प्रभावसे सब कार्मोक्ो याजाता हैं ॥ ४९ || इसके बाद 
सब कुटुंबी जनोंके साथ पारणा करे, चेत्रमासमें पाप- 
नाशिनी ठृतीया अवश्य करनी चाहिये ।। ५० ॥ इसमें भी 
सुखसौभाग्य सुन्दरीका सावधातीस पूजन होना चाहिये, 
इसमें दांतुन जामुनकी होती है ॥ ५१ ॥ दमनकके फूलोंस 
पूजा तथा बेलपत्रका अध एवम्‌ घी सक्कर संयुक्त मांड 
भैवद्य होते है ।५२॥ इसमें सुछ् और सोभाग्यकी प्रामिके 
लिये हीरेके पानीका प्राशन करना चाहिये | वेसाख कृष्णा 
तृतीयाके दिन त्रत करना चाहिये ॥५३१॥ इसमें मालतीकी 
दांतुनका नियम है। फिर स्नानादिके पीछे पति और 
सौभाग्य देनेवाली सुन्दरीदबीका पूजन करे ॥५४॥ छाल, 


नि ल मक ज जलकक न आह मम नाम ाा॥ ४2 


१ परस्मेपद्माषम्‌ । १ सौभाग्यसुन्द्री पूजयेद्त्यन्बयः । 


व्रतराजः । 


मिल दम 8३:१2 04000 20 कक %472///77 26०8 ४७ है 22/00/2505 244520%40%4 400... न 
४७7 ७७७४४ क्र, जनक» मी 


५५ है| ने 









(११८ )2 


ध 8 22५ भम्टाह दो पाप 
कि ज>कन टी अटल पान /8 मीट कद प 27402 6:47: /40: 47 





47 धाभ 6 23800 ९: 





0: 5 55:3+044 





39५ 











हि 242 
हा 


खमुटाभूप्यूछ हि 


का या (न ु $ न तू के हैं लए पशु 
सितेः सुरक्तेश् मह्िकामिश्व पूजयेत्‌॥ दषिभक्त सकपूर शबेराइतसयुतम ॥ 


कर्पयेदेव्या अध्य चाम्रफल्ल भवेत्‌ ॥ हेमोदक॑च॒ संप्राश्य पृष्ठिं सॉमाग्यमाप्लयात्‌ ॥ ५६॥ 


ज्येष्ठ मासि तृतीयायास्॒पबासपरा भवेत्‌ ॥ यूथिका दुन्तकाष्ठ॑ च्‌ लावण्यखुभगार्थिनी ॥ ५७। 
महिकाकुसुमेः पूर््यां यक्षकर्दमचचिताम ॥ लावण्यछुभगां देवी सुन्द्रा पूजयत्ततः ॥ ५८। 
कदलीफपलाध्यदानं च नेवेद्य पृतपूरिका ॥ मोक्तिकाम्बु ततः पीत्वा लावण्यसुभगा भवेत्‌ ॥५९॥ 


आपषादे च ततो मासि पतिसोमाग्यसुन्दरी ॥ प्रातरुत्थाय कर्तव्य दन्‍्तकाष्ठमशोकजम ॥६०॥ 


नियम तत्र कुर्बीत तृतीयायां प्रयत्नतः॥ बिल्वपत्रेः कोमलेश्व पतिसौभाग्यसुन्दरी॥ ६१॥ 
जम्बूफलाष्यंदानं च नेवेद्य पायसे स्मृतम्‌॥ शकेराधृतसंयुक्ते खुंदरी पीयतां मम ॥ ६२॥ 
विटुमाम्बु निशि प्राइय हविषा पारणं स्मृतम॥सपत्नीनाँ मुख नेव सा पश्यति कदाचन॥ ६३। 
श्रावणे मासि संप्राप्तें ततीयायामुपोषिता ॥ बेल्व॑ वा बादरं का जातिपुष्पेश्व शोभनेः ॥ ६४॥ 
स सर्वेश्वर्थसोभाग्यसुन्दरी पूजयेत्ततः ॥ नेवेद्यं श्वेतपक्कात्रं धूपदीपादिक तथा ॥ ६५ ॥| कदही- 
फलाध्यंदानं च प्राशयेद्राजत पयः ॥ गजाश्वपशुदासीनां हेमरत्नादिवाससाम ।। ६६॥ इंश्वरी 
सवलोकानां भगवत्याः प्रसादतः ॥ मासि भाद्रपदे प्रात्ते पूज्या सोभाग्यसुन्दरी ॥ ६७ ॥ दःत- 
काएं तु कतंव्यं मात॒लिड्गसमुद्धभवम्‌॥ उत्पलेः पूजयेदेवीमध्ये ककेटिकाफलम्‌॥ ६८ ॥ नेवेशे 
डशोकवत्तिन्यः पिवेन्माणिक्यज पयः ॥ ( कर्पूरागरुकस्त्रीसुखदेश खुगत्धिना ) ॥६९॥ आश्र- 


| तृतीया- . 


7 जा 


उज्यसिते पक्षे तृतीयायां व्रत चरेत्‌ ॥ दल्तकाष्ठ॑ म्कतेव्यं प्लक्षवृक्षसमुद्भवम्‌ ॥७०॥ पूजयेद 
परया भक्‍त्या पुत्रसोभाग्यसुन्द्रीम्‌ ॥ उतपलेः शतपत्रैश्व पूजा कार्यो प्रथत्तत॥ ७१ ॥ नारिठू 


मध्यदानाथ कृष्माण्ड वापि कह्पयेत्‌॥ नेवेदे गैणकाउछुश्राउछर्कराप्ृतपाचितान्‌॥ ७२। 
ओदुम्बरं पयः भाइय उुन्द्री प्रीयर्ता मम ॥ पुत्रपोत्नसमायुक्ता सुखसोभाग्यसुन्दरी ॥ ७३॥ 
कक लक मा 
सफद कमछ और चसमेलीस पूज घी, शक्कर और कपूर | और सुन्दर जाती पुष्पोंसे ॥६४॥ सर्वेश्चय्येसंपन्न सौभाग्य 
मिल हुए दही चावलॉका ॥५०॥ नेवेय दनावे तथा आमके | सुन्दरीका पूजन करना चाहिये, श्रेतपक्त अन्नका मेवे 


फलका अधघे दे, सोनेके पानीका प्राशन करे, इससे पुष्टि 
और सोभाग्यकी प्राप्ति होती है॥ ५६ ॥ जिस ख्रीको 
ढावण्य तथा सुभगता ग्राप्करनकी इच्छा हो वो ब्येछ 
ऊंष्णा तृतीयाको उपवास करे, यूथिकाकी दांतुन करे ॥५७॥ 
लावण्य सुभगा सुन्द्री देवीको यक्षकदेसस चचित करके 
महिकाक फूछोंसे पूजे ॥५८॥ कदलीफलका अधेदान तथा 
बुतकोपूरियोंका नेवेथ्य करके मोतियोंका पानी पीना 
चाहिय, इससे छावण्य सुभगा होजाती है ॥| ५९ || आषाढ 
ऊ८णा ठृतीयाकोपति सौभाग्यसुन्द्रीका ब्रत करना चाहिये, 
तत:काछ उठकर अश्योककी दांतुन करनी चाहिये ॥६०॥ 
प्रतक नियम, प्रयत्नसे करने चाहिये । पति सौभाग्य 
सुन्द्रीका कोमल बेलपत्रोंस पूजन करे ।। ६१॥ जामुनका 
अर दान तथा खीरका नेबेय्य हो जिसमें घी और शक्षर 
मिली हुई हो तथा सौभाग्य सुन्द्री देवी प्रसन्न हो, यह 

हनी चाहिये | ६२ | विदुमके पानीका प्राशन तथा 


हविका हे 
_आ। पारण कहा है, इस ब्तको करनेवाली ख्री सोतोंका | है 


मुह नहीं देखती ॥ ६ भ 
4 , | प३ | श्रावणसहीनामें कृष्ण गे 
उपवास करे. होनामें कृष्णा तृतीयाको 


दीतैन वलीकी या बेरियाकी होनी चाहिय 





और धूप दीपादिक हों ॥ ६५ || कद॒लछी फलका अघे दे, 
राजतपयका प्राशन करे; इस ब्रतके प्रभावसे उसके घरमें 
घोडा, हाथी, पशु, दास, दासी, सोना, चांदी, रेशमी 
कपडे और रत्न सब कुछ हो जाता है ॥। ६६ ॥ तथा भग- 
वतीकी कृपासे वो सब छोकोंकी इंश्वरी होजाती है। 
भादोंकी कृष्णातृतीयाके दिन सौभाग्य सुन्द्रीका पूजन 
करना चाहिय ॥ ६७ | इसमें विजौरेके काठकी दाततुन 
तथा कमछोंसे पूजन होना चाहिये और ककडीके फलका 
अघ होना चाहिये ॥ ६८ ॥ नेवेद्यम अशोककी मंजरियाँ 
तथा माणिक्यके पानीणा प्राशन करे ॥ ६९ ॥ कार कृष्णा 
तृतीयाके, दिन ब्रत करना चाहिये, इसमें पिछ्खनकी 
दांतुनका विधान है| ७० ॥ शतपत्र और उत्परोंसे प्रय- 
त्नक साथ पुत्र सोभाग्य सुन्द्रीका भक्तिपूवंक पूजन करना 
चाहिये ॥ ७१ ॥ नारज्ीके फठका अधघ अथवा पेठेका 
अघ तथा घीमे पके और सिश्रीमें पगे हुए, शुश्रगणकोंका 
नेवंदय करना चाहिये ॥ ७२ ॥ तथा उरुम्बरका पानी 
प्राशन करके कहना चाहिये कि, मुझपर सुन्द्री प्रसन्न 
होजाय ॥ ७२॥ इस प्रकार करनेपर उसे पुत्र पौतन्र सुख- 


१ देवतेतिशेषः । २ पृश्येतिशेषः । ३ पकान्नविशषान्‌ । 


ध्रतानि, | 


+ कप 
पा ब्पा्ि ना व्यय श््ज्‌ हर कै | हु ्प मु 
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(र्ति के मापि सम्बत ततीवायाहुपोबिता ॥ ओऔडुम्बर दन्तकाष्ठे कृत्वा ब्रतरुपाचरेत ॥ ७४ ॥ 
इतकीमिश् सौमाग्सैनाम्ता संयोगसुन्दरीम्‌ ॥ निवेदयेदप्‌पांथ सुगन्धा्छालिसम्भवान्‌ ॥ ७५॥। 
पक्रोड॑ चाउ्येदानेन लवडूं माशयेत्ततः ॥ सा वियोग न चाप्नोति पितृश्रातखुतादोनेः ॥ ७६॥ 
4 चीगे ब्रते कृपाहुयापनविधि ततः ॥ सदशाखत्रमधीयानमागमेषु विशारदम्‌ ॥ ७७ | 
प्रोचार्स माथयेत्मातमागशीर्षे यथ(विधि ॥ चीणे ब्रत॑ मयाचार्य उद्यापनविधि मम ॥७4॥ ब्रत- 
[ऋल्यनाशाय यथाशा्तं समाहितःखु्ूरीमण्डल कार्य गोरीतिलकमेव वा ७९ ॥ उमाम- 
वर देंवे खुबर्गेंन तु कारयव ॥ ब्रतारम्मे यथाशक्त्या राजत॑ वाषि कारयेत्‌ ॥ <०॥। वित्त- 
ग[ठयं न कवते य॑ सति द्रव्पे फडार्थि ता॥ ब्ष प्रपूज्य तां मूर्ति तामेव मण्डलेब्चेय्रेत्‌ ॥ <१॥ 
पवोपहरिेलवैश्व पुष्रै्नानाविवेरपि ॥ एकेव सा जगन्माता बहुरूपेव्यवस्थिता ॥ <९॥ रूपे- 
पद शमिश्रेव पूज्या सौमाग्यहुन्द्री ॥ ततः पद्मनिभां देवी रक्ततत्बोपशोमिताम्‌ ॥ 4३ ॥ 
कामरणशोमाठ्यां रक्तकुदऊुम च चिंताम्‌ ॥ ध्यत्वा चेवंविधां देवी पूजयेदेकमानसा ॥ ८४ ॥ 
'त्नौ जागरणं काँय गीतवादित्रतिःस्वनेः ॥ ततः सबाणि पुष्पाणि नवेद्यादिफलानि च ॥ <५ ॥ 
प्र््योर्थ परिकलप्पानि सर्वेकामार्थंघिद्यये ॥ ततः प्रभ्ञाते विमले सताने कुृत्वा विधानतः 
। ८६ ॥ कुछुम्भकुछु मेहोंम॑ किंशुकैवापि कास्येर ॥ अट्ोत्तरशतं पूर्ण मथु॒त्रय लमल्वितम्‌ ॥4७॥ 
रदभावे तु कतेव्यः शतपत्रोविधानतः ॥ आखरेंग च मन्जेण गौ मुख्य समाचरेत्‌ | <<॥ 
श्रोजयेच्च प्रयत्नन चतुरोष्डों विधानतः ॥ मिष्टानत्नेन सपत्तीकान्‌ नक्‍त्या वे परितोबयेत्‌ | <९ ॥ 


उ्वालडुरणेश्वेव यथाशक्ति प्रपू ऋयेत्‌ ॥ 


सौपाग्यवह्न॑ चेक र नारीणां चेव दापयेत ॥ ९० ॥ ततो 


इस्ते प्रदातव्यं कुटकुम लवण गुडम्‌ ॥ नालिकेर तथ। बंछी दूवां घिन्‍्दृरकज्जलम्‌ ९१) मड्ढ- 


डाष्कम तद़े दत्चा सौभाग्य माप्ठलुयात्‌ ॥ आचाये 


नौभाग्य सब मिलजाते हैं ।। ७३॥ कार्तिक कृष्णादुतीयाके 
देन उदुम्बरका दन्तवावत करे, उपवास पूर्वक त्रत करना 
वाहिये ॥७४॥ केवकीके फूछोंसे सौभाग्य संयोग सुन्द- 
का पूजन और शालिके अपूर्पोका नेबेद्य करना चाहिये 
॥७७।॥ अखरोटके फर्ोंको अघमें कामछाना चाहिये तथा 
उवंगका प्राशन करना चाहिये। ऐसा करनेवाढी पति, 
भाई और पुत्रोंके वियोग को कभी नहीं देखती ७६ इस 
ब्रतके पूरे हो जानेपर उद्यापन अवश्य करता चाहिये । दो 
प्ब शास्त्रों छा पढा हुआ हो तथा आगमोंम विशारद्‌ हो 
॥ ७७॥ ऐसे आचाय्यस मागेशीर्षमें विधिके साथ आथना 
करनी चाहिये कि, मेने त्रत पूराकर डिया है; अब आप 
उद्यापन कराइये ॥७८॥ तथा आप भी ब्तके वेकल्यको दूर 
करनेके लिये सप्राहित हो जाय +सुन्दरी मण्डक करना 
चाहिय अथवा गौरी तिछ॒ऋ होता चाहिये 4| ७९ ॥ ब्रतके 
आरंभमें जैसी अपनी शक्ति हो सोने चांदीकी उमामहेश्व- 
एकी मूर्ति बनवालेनी चाहिये ॥ ८० ॥ फंछार्यी को चाहिये, 
कि द्रव्य होनेपर वित्त शाठय न करे जो मूर्ति साछ भर घूज 
दी गयी है उसी सोने चांदीकी मूर्तिकों मेडडपर भी पूजन 
गेना चाहिये । ८१ ॥ अनेह प्रद्चारके उपहार तथा गन्ध, 
पुष्प आदिस पूजन करे, एकही जगन्माता बहुरूपस व्यव- 
थत हैं ॥ ८२ ॥ अपने बारहरूपोंसे सोभाग्यसुन्दरी पूजी 


१ सोभाग्यनाम्ना 





ए 


च सपत्नीकं वख्यालड्रणः शुने ॥ ९९ ॥ पार- 


जाती है इसके बादूं कमछके समान शोभावाढी। छालूव- 
ब्ोंध शोमित हुईं । ८११ छारूदी आभरणोंको पहिने हुई 
एवम्‌ लालही कुंकुमस पूजी गईं, सौभाग्यसुन्द्री देवीका 
ध्यान करके एकमनसे पूजन करे ॥ ८४ ॥ गाने बजानेके 
साथ रावको जागरण करना, पीछे सब वरहके फूढों और 
नेवंदोंको ।| ८५ ॥ यदि यह इच्छा हो कि मेरे सव काम; 
होजायेँ तो अधेम परिकल्पित करे ! पीछे प्रातम्काल विधिके 
साथ स्नान करके ॥ ८६ ॥ कुसुम्भके फूलोंस अथवा किशु- 
कके फूछोंस होम कराना चाहियें। दीनों मधु इसमें रहने 
चाहिये तथा १०८ आहुतियाँ होती चाहिये ॥८७॥ यदि ये 
न मिलें तो शतपत्रों सही हवन सुपादन करे; यह गौण ओर 
मु ्य दोनोंही हवन आपुरमत्रस होने चाहिये ८८७४ चार 
वा आठ सपतनीक ब्राह्मणोंको विधिपूर्वक सावेधानताके 
साथ भक्तिमावस, भोजन कराकर प्रसन्न करे ॥८९॥ जैसी 
शक्ति हो उसके अनुसार बल औए अल्ूकार भी दे तथा 
द्ियोंको एक एक सौभाग्यवख भी दे (| ९० ॥ इसके बाद्‌ 
हाथमे कुकुम, छवण और शुड, नारिकेछ; पान) दुर्वों, 
सिन्दूर और कज्जक देना चाहिये ॥९१॥ इस मगढाइकेके 
देनेसे सौभाग्वकी प्राप्ति होती है; तथा सपत्तीक भांचा- 
य्येका सुन्दर वल्ल और अलूंकारोंस यथाशक्ति र्के 


जमाग्यशब्देन सहितांसंयोगसुन्द्री सौभाग्यसंयोगसुन्द्रीमित्यथः। 


। 














है ब्लर 235 ५ 02०७० 9 । 

( १२१० ) [जः [ चतुथ - 

९ त्‌ | आ हु उ. क्षन्ए8 न व *;। ८ हयटनत 5 यु पू $ 

धाप्य यथाशक्ति मण्डलं तत्समपयेतप्रार्थयेच्च ततो देवी सर्वश्नोभाग्ण्छुदरीमू ॥ ९३ ॥ पाते - 


"हि. 


तापि मया देवि सर्वसोभाग्यसुन्दरि ॥ दत्वा मत्नाथितानकामान गच्छ देवि 





यथासुखम्‌ ॥९४॥ 


मूर्ति च मड़लां देव्या उपहारांश्व सवेशः ॥ गुरो गहाण सब त्व॑ खुद्री जीयतामिति॥ ९५॥ 
सत्मसादान्मया चीण बतमेतत्सइलैमम्‌ ॥ क्षमस्व विभशादल मसादसुमुखों भव ॥ ९६॥ 


एवं चीणब्रता नारी कृतकत्या भवेत्सदा ॥ येनेद॑ च कृत वर्ष संप्राप्त ज़न्मनः फलम ॥ ९७॥ 


हि 


नातः परतरं किंचिद्रतं सॉमाग्यकारकम ॥ देहाह्ते शिवलोके तु भोगान्‌ सुक्‍त्वा यथेप्सि- 
तान्‌ ॥ ९८ ॥ इतिश्रीमविष्योत्तरपुराणे सोमाग्यसुन्द्रीत्रतोद्यापनं संपर्णम्‌ ॥ 


अथ चतुर्थीत्रतानि लिख्यन्ते ॥ 


संकष्टचतुअव्रतम । 


तत्र श्रावणक्रृष्णचत॒थ्यां संकष्टचत॒र्थीत्रतम॥तञ्च चरद्रोद्यव्यावित्याँ कार्यम्‌ ॥ श्रावण बहुले 


पक्षे चतुथ्यी तु विधूदये ॥ गणेश पूजयित्वा तु चन्द्रायाव्य प्रदापयेत--इति कथायां तत्र व्रत- - 


पूजाविधानात ॥ द्विनद्वये तथ्याप्तों पुर्वेब ॥ ८ 


मातविद्धा गणेश्वर ” इतिवचनात्‌ ॥ दिनदये+- 


व्याप्ती परेव ॥ हेमाद्रो-चन्द्रोदयाभावे चतुर्थी निशि षट्घटिकाव्याप्ता परैव बले। ढ्ति॥ 


अथ ब्रतिविधि॥मासपक्षाइुलद्धिर्प तिथो मम 


णेशपीत्यंथ संकष्टचतुर्थी्रतमहं करिष्ये ॥ तत्रादों स्वस्ति 
करिष्पे।सोवणरोप्यताम्रमृन्मयाद्यन्यतरमां गणपतिमूर्ति 
परि स्थापयित्वा षोडशोपचारेः पूजयेत्‌। तथ्चथा--लम्बोद 
रत्नः सुवेषादबं म्रसन्नास्य विविन्तयेत्‌ ॥ ध्यायेदजान 


॥ ९२ | उन्‍हें मण्डल दे देना चाहिये, इसके बाद देवीकी 
आ्रथना करनी चाहिये॥९३॥ है सबवे सौभाग्यसुन्द्री देवि! 
भेने तुझे पूजा है तू मेरे मांगे हुए कारोंको देकर यथासुख 
चली ना॥ ९४ ॥ हे गुरो ! देवीजीकी मंगलीक मूर्ति तथा 
सब उपहारोंको आप छीजिये। देतीवार कहना चाहिये 
कि; सुन्द्री देवी प्रसन्न हो ॥९५॥ हे विप्रशादूठ ! मैं आप- 
कौही कृपासे इस कठिन ब्रतकों पूराकर सकाहू भेरेको क्षमा 
करते हुए हुए मुझपर प्रसन्न हृजिय ॥९६।॥ इस प्रकार जिस 
खींने एकसाह त्रतकर लिया वो क्ृतकृया हो गईं, उसने 
उन्म लेनेका फल पा लिया॥ ९७ | इससे अधिक दूसरा 
कोई भी त्रत सौभाग्य देनेवाला नहीं हे । जो स्री इस 
ब्रवकों करती हे वो देहके अन्तर्म शिवलोकम चली जाती हे 
॥5८॥ यह श्रीभविष्योत्तरपुराणका सौभाग्यसुन्दरीका ब्रत 
पूरा हुआ | हु 


चतुथीव्रतानि | 


संकछ चतुर्थी्रत-श्रावण कृष्ण चतुर्थीके दिन संकष्ट 
चतुधीका ब्रत होता हू इस ब्रतको उस चतुर्थी म करना 
चाहिये जो हि चन्द्रमाके उद्यमें व्याप्त हो । क्योंकि, 
सेकट चतुर्थीकों ब्तकथामें, आवण शुक्छा चौथको चन्द्र- 
मौका उदय होने पर गणेशजीका पूजन करके चन्द्रमाको 





१ गच्छेद्ति शेष: | 


कृत्वा जलपूण्ण पूर्णपारत्र॑वस्यु तकुम्भो 
इर चतुबाहुं त्िनेत्र॑ रक्तवर्णकम्‌ ॥ नाना: 
ने देव ततकाशनसुप्रभम्‌ ॥ चतुर्बाह 


अध देना चाहिये। यह चन्द्रोदय व्यापिनी चतुर्थीमें त्रतकी 


पूजाका विधान किया हे । यदि दोनों ही दिन चन्द्रोदय ._ 


व्यापिनी हो तो दृतीयास विद्धा पूर्वा ही महण करनी 
वाहिय क्‍यों कि गणेश्वरके ब्रतम मातृ ( तृतीयासे ) बिद्धा 
प्रहण की जाती हैं यह बचन मिलता है। यदि दोनोंही 
दिन घ॒म्द्रोदय व्यापिनी न हो तो परली ही चतु्थीका 
ग्रहण होता है। क्‍यों कि, चन्द्रोदयके अभावते रातको 6: 


हि रत ७५+ के, 
बडीतक रहनेवाल्ली परा चतुर्थी काही त्तमें प्रहृण हो है 
ऐसा हंमाद्रिन कहा हैं। अब ब्रतकी विधि कहते हैं-सबसे 


पहिले संकल्प करना चाहिये कि अमुक मास, अमुक पक 
और अमुक तिथिमें विद्या, धन, पुत्र, पौत्र, प्राप्तिके लिये 
तथा समस्त रोगोंसे मुक्त होनेके लिय श्रीगणेशजीकी प्रसक् 
लाके छिय, संकटचौथका ब्रत्॒ में करता हूँ. तथा पहिढे 
स्व॒स्तिवाचन, _ गणपति पूजन एवम्‌ कछशका पूजन 
भी करूंगा॥ सोने चांदी तांबे और मिट्टीमेंसे अपने वित्तके 
अनुसार किसीभी- घातुकी गणेशमूर्चि बनाकर उसे कुंभर4 
पूण पात्रपर बेध स्थापित करके सोलहों. डपचारोंसे पूजन 
करता चाहिये | पूजन निम्नद्धेखित रीतिसे होता है- 
अनेक तरहके रत्नोंसे भी भांति सुसज्जित रक्तवण 


चार भुजावाले, तीन नेत्र धारी प्रसन्न मुख, ढुम्बोदर 
भगवानका 


न्तेन करना चाहिये । तपाये हुए सोनेको 


न्ड स्का सुधा, 
र््‌ हर 


विद्याधनपुत्रपोत्रश्तप्स्थर्थ समस्तरोगमुक्तिकामः श्रीग-. 
वाचन गणपतिपूजन कलशाच 






भहाकाय सूर्य शो टिसम ॥ इति ध्यानम्‌ ॥ आंगच्छ त्व॑ जगन्नाथ झुराखुरतमस्कत ॥ 
सवंज्ञ विन्नराज कृर्पां कुरू 
शे 






अनाथनाथ हझशीण० ॥ गजास्याथ नमो गजास्यमादाहयामि 
इति आवाहनम ॥ ग कक विशेषतः ॥ भक्दारिद्यविच्छेता एकदन्त 
नमोस्तु ले ॥ पुरुष एवेदं० विज्नराजाय० आसनम ॥ मोदकान्यारयन्ह पते भत्तानां वरदायक॥ 


देवदेव नमस्तेंस्तु. भक्त माँ फलदों भव ॥ एतावानस्य० लबम्बोद्राय० पाठ्य ॥ महाकाय 
महारूप अनंतफलदो भव ॥ देवदेव नमस्ते5स्तु सर्वेबां पापनाशन ॥ जिपादृष्द० शकरखूनवे० 
अध्यंम्‌ ॥ कुरष्वा चभन देव सुश्वस्ध छुवाहद ॥ सबोधदलबस्वःमिन्नीडकण्ठ नघो5स्ठु 

तस्मादिराछ० उमासुताय० ऊचमजीयपय॥ स्ान॑ पश्चयामुलेनेव झहाण गणनायक ॥ अनाथनाथ 
सर्वत्ष नमो मूषकवाहन ॥ पयो दि पृ चेव शकेरामशुसंयुतम्‌॥ पर्यामलेन स्वप्न मीत्यथ 
प्रतिगह्मयताम्‌ ॥ वक्रतुण्डाय० पश्यामृतस्लानम्‌ ॥ गड्गा च यघुना चेव गोदावरिसरस्वती ॥ 
नमेदा सिन्धुकावेरी जले ध्नानाय कलिपतम ॥ यत्पुरुषेण०हेरंबाय ० झ्ानम्‌ ॥ रक्तवखसुयुग्म च॒ 
देवानामापे दुलमम्‌ ॥ ग्रह्याण मड़ल देव लम्बोदर हरात्मज ॥ त यकज्ञ॑०शपंकणाय"०बदसख्रपा/बहा- 
सूत्र सोत्तरीयं गृहाण गणनायकाआरक्त बह्सूज च कनकस्योत्तरीयकम्‌ ॥ तस्माथज्ञात्सवंहुत+ 


धुत प०॥ कुब्जाय० यज्ञोपवी० ॥ गहाणेश्वर सर्वज्ञ दिव्यचन्दनसुत्तमम्‌ 


रुूजाकर अजाक्ष 


गोरीखुत नमोस्तु ते॥ तस्माञ्ज्ञात्सवहुत ऋचःसा ०्गणैश्वरा ग्गन्धम्‌ गाअक्षताश्र छुरश्रेष्ठ कुड़कु- 





प्रभावाले, कोटि सूथ्यके समान चमकीछे बड़े लम्बे चौडे | हे अनाथोंके नाथ है मूबकवाहन | मे आपकी प्रसन्नताके 


शरीरके, चतुभुजी गजानन देवका ध्यान करना चाहिये | | छिये आपको पञ्चाम्ृतस स्वान कराताह इसमें दूध, द्धि, 


इन मंत्रों त ध्यान, तथा हू सुरापुरनस्मक्ृत जगन्नाथ | तुम | धुत, शकेरा और सहत मिल हुए हें आप ग्रहण करिये । 


आओ । है अवाधोंके नाथ | सर्वज्ञ विन्नराज | कृपा करो । 
इस मसंत्रसे तथा “ ओम सहख्र शीर्षा ” इस संत्रस तथा- 
गजाध्यको नमस्कार 


हाथम रखते हुए भ्रक्तोंकों बर देते रहते हो, हे देवदव ! तेरे 


प्व ' हे देव | हे देवताओंके पूज्य 
मुख्य | हे नीरूकण्ठ | आप आधचमसन करें आपको मे प्रणाम 


करता हूँ । ” ऑतस्माह्विराइजायत विराजों ” इस मंत्रसे 
तथा उमासुताय नमः आधमनीय समपये उम्नासुतके छिये 


१६ 


वकऋतुण्डाय नम: परच्बाइतत्तान सम्रपय वकतुण्ड दुवक 


| लिये नमस्कार हैं पच्चास तस स्तान कराता हू इससे पच्चा- 
गजात॒नका आवाहन करता हूं इनसे | 


आवाहन करना चाहिये | तुम _इन्द्रादिक सब छोकोंक | 
गोप्ता हो, विशेष करके भक्तोंके दारिद्यको नाश करनेवाले | 
हो, है एकदन्त | तेरे लिये नमस्कार हैं। इस मंत्रस तथा 


“ ओमू पुरुष एवेद्म्‌ ” इस मंत्रस लथा हविन्नराजके छिये | है में स्तान कराता हू इस कह कर शुद्धजलसे स्नान करानपए्‌ 
नमस्कार हैं, इसस आसन देना चाहिये। आप रडडूओंको | चाहिये । 'रक्त वस्त्र' है छम्बोदर हे शंकरनन्दन, देवताओं 
| कोभी दुलूभ इन सुन्दर छालरजक्भवाले भ्रव्य दोनों बच्चोंको 


लिये नमस्कार है, आप भक्तोंके लिये फल देनेवाले हो। इस | धारण करिये इस मंत्रस तथा “त॑ यज्ञ बहिंबि” इस मंत्रस 


मेत्रसे तथा " ओमू एताबानस्य महिमा ” इस संत्नस तथा | बथा शूपेकर्णाय नमः । वस्त्र परिधापयामि शुूपंकर्णके छिये 
लम्बोदरके लिये ममस्कार है,इस मंत्रस पाद्य देना चाहिये। | 
जैसे आप सहाकाय ओर मसहारूप हैं उसी तरह अनन्‍्ल | 
फलके देलेवाल भी हो, हे सब पापोंके नाश करनेवाले देव- | रीये! हे गणनायक ! यह सुन्दर छाछरज्ञका डुपट्टा और 
देव | तेरे छिय नमस्कार है, इस मंत्रसे तथा “ ओम त्रिपा- | 
दृध्व ? इस मंत्रस एवम्‌ शकरके सुतके छिये नमस्कार हैं| 


इस मंत्रसे अघ देना चाहिय | फिर आचमन कराघे 'कुरु- | 


सृत स्तान तथा गछ्का यमुना गोदावरी; सरस्वती, नमंदा+ 
सन्धु और कार्वेरीका जछ, आपको स्नान करानेको छाया 
हूँ इसखे आप स्नान करिये “ यत्पुरुषण ?' इस संत्रको 
लथा-हेरम्बाय नमः स्नान कारयामि हेरम्बके लिये नमस्कार 


प्रणाम हैं, म॒ वंस् घारण ऋराताहं ) इससे १ बस्तर कटिमें 
वॉँघे, दूसरा वस्र ऊपर उढादेता चाहिये। अहामपूत्र सोत्त- 


सुबगके तारोंका यज्ञोपवीत है, आप इन्हें स्वीकृत करें 


| इससे तथा “लस्मायज्ञात्‌” इस सत्रस एवम्‌-कुब्जाय नमः, 
| यज्ञोपवीतमुत्तरीय च समपय-कुब्जकी तरह चढलनेवाले 
सुन्द्र मूसकक ऊपर | 


आरूढ होनेवाले हे. सबके पाप या दुःखोंके दलन करनेमें | घारण कराताहूं, इससे यज्ञोपवीत ओर डुपट्टा घारण करा- 


| ना चाहिये | 'गृहाणव्वर सवज्ञ' है इंश्वर हे सववेज्ञ हे करु- 
| णाके आकर हे गुजाक्ष है गोरीसुत ! आपको प्रणाम हे, 
| आप उत्तम दिव्य चन्द्‌॒वस अपनेको चचित करो। इससे 
नमस्कार हैं म आचसनीय समर्पित करताहूँ। ऐसे कहकर | तथा-तस्मायज्ञात्सवेहुत”इस संत्रस एवम्‌-गणेश्वराय नमः; 


आचमम करावे | फिर पभ्चामृतस स्लान करावे हे गणाधीश | गन्ध समफेये-गणश्वस्केलिय नमस्कार है, में गन्ध चढाता 


देवदेवकेलिय नमस्कार हैं; में उनको यज्ञोपवीद एवं डुपट्टा 





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(१२३१ ) ब्रतराजः 
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माका!ः सुंशोमितः ॥ मवा निवेदिता भकत्या गहाण गणनायक ॥ अक्षताव्‌ ॥ सुगन्धि- 

दिव्यमालां, च गृहण गणनायक ॥ विनायक नमस्तुभ्य॑ शिवखूनो नमोस्तु ते ॥ मालाम ॥ 
माल्यादीनि सुगन्धी० तस्मादश्वा० विश्ननाशिने नमः पुष्पाणि॥ अनेनेव नाम्ना दूवोकुडकुमादि 
द्यात ॥ अथाड्रपूजा--गणेश्वराय० पादोपू० । विश्नराजाय० जाहनीएू० | आखुवाहनाथ० ऊरूपूण 
हेरंबायण करटींपू० । कामारिखूनवे नामिंप्‌ृ० | लंबोदराय० उद्रंपू० गौरीसुताथ० स्तनौपू०। 
गणनायकाय० हृदयपू" । स्थुलकण्ठाय० कण्ठंपू० । स्कर्दाग्रजाय० स्कत्धोपू० । पाशहस्ताय० 
हस्तोपू० | गजबक्लाय वकंपू० । विध्नहत्रें० ललाटंपू० ।सर्वेश्वराय० शिरः पूजयामि॥ श्रीगणा- 
थिपाय० सवोहूंपू० ॥ दशाड़े गग्गुले धूपमुत्तमं गणनायक ॥ गृहाण देव देवेश उमाखुत नमो- 
सतु ते॥ यत्पुरुष० विक्रटाय० धूप॑० । सर्वेज्ञ, स्वेसत्नात्य सर्वेश विवधाप्रिय ॥ गृहाण मड़हे 

दीप घृतवर्तिसमन्वितम्‌ ॥ बाह्मणोस्‍्य ० वामनाय० दीए०। नेवेद् गहातां देव नानामोदकस. 





हूं, इससे सुगन्धित छाहूचन्दन चढाना चाहिये। “अश्षताश्र 
सुर हे सुरश्रेष्ठहे गणनायक ! ये रोलीसे रह्लेद्ुए सुन्दर 
अक्षत मैंने भक्तिपूवक आपको भेंट किये हैं, आप स्वीकृत 
करिये; इस प्रकार कहके छाछ अक्षत चढाना चाहिये । 
 मुगंधि दिव्यसालां च- हे गणोंके नायक हे विन्तायकः 
हे शिवसूनों |! आपके ढिये नमस्कार हैं, नमस्कार हैं, आप 
सुगन्धित दिव्य माठाको धारण करिये । इसप्रकार कहके 
माला पहिनाना चाहिये। फिर “माल्यादीनि ? में आपकी 
पूजाके लिये माल्यादिक सुगन्धि एवम्‌ ऐसे ही अनेक प्रका- 
रके द्रव्य छाया हूँ, है गणनायक ! इन्हें अहण करिये । इस 
मंत्रस, तथा-“ ओोमू तस्मादश्वा ? इस मंत्रसे एवम्‌ विश्न- 
विनाशिने नमः-पुष्पाणि समर्पये-विश्नविनाशकके छिये 
नमस्कार है में पुष्प चढाता हूं, इससे फूछ चढाना चाहिये 
“ विन्नविनाशिने नमः दूवाकुरान समपेयाप्रि विप्नविना- 
शीके लिये नमस्कार है दूभके अंकुर समर्पित करवा हूं, 
विश्नवि-कुंकुप) समपयामि, उसीको कुंकमसमर्पित करता हूँ, 
वि. नमः. सुगन्धित तैे समपेयामि उसीको सुगन्धित तेछ 
समर्पिल करता हू इस प्रकार विन्नविनाशीके नामसे अन्य 
वस्तु भी गणेशजीको भेंट करनी चाहियें। अगपूजा-- 
ओम गणेशवराय नमः पादौ पूजया ति-गणेश्वरके लिये नम- 
स्कार हैं, चरणोंका पूजन करता हू । इससे चरण » पैथा 
ओम विश्नवराजाय नमः जातुनी पूजयाप्रि-विन्नराजके छिये 
नमस्कार हैं, जानुओंका पूजन करता हूं । इससे जानू,तथा- 
भ्‌ आखुवाहनाय नमःऊरू पूजयामि-मूंसके वाहनवालेके 
डिये नमस्कार है ऊरूका पूजन करता हूं । इससे ऊरु, 
हज परस्वाय नम्तः , कटी पूजयामि हेरबके लिये नमस्कार 
5 कटिका पूजन करता हूँ इससे कटि, तथा-ओम्‌ कामा- 
जा हे कर पूजयामि-कामारिके सुतके लिये नम- 
द्राय नमः उद्र पजय पि मम हो 
हर पक अब न्‍ लम्बोद्रके लिय नमरकार हे, 
*  सलेस उद॒र तथा ओम गौरीसु. 


दव नमः र के लिये 
३ नमः स्तनो पूजयाप्ति-मौरीसुतके डिये नमस्कार हे 


# 


स्तनोंका पूजन करता हूं, इससे स्तन, लथा-ओपू गणनाय- 
काय नमः हृदय पूजयामि गणनायकके छिये नमस्कार है 
हंद्यका पूजत रकता हूँ । इससे हृद्र॒य, तथा-ओम स्थूह- 
कण्ठाय्‌ नमः कण्ठे पूजयामि-स्थूछ कंठवालेके छिये नम- 
स्कार है कंठको पूजता हू इससे केठ, तथा-ओम एकरदाप्र- 
जाय नमः स्कन्बो पूजयामि-स्कन्दके बडे भाईके छिये नमः. 
स्कार है कन्धोंकों पूजता हूँ । इससे कन्घे, तथा-ओम पाश- 
हृश्ताय नमः हस्तों पूजयामि पाशको हाथ रखनेवालेके 
लिय नमस्कार है। हाथोंका पूजन करता हूं इससे हाथ,तथा 
गजवकाय नमः वक्र पूजयामि-हाथीके मुहवलेके छिये नम्- 
स्‍कार हैं मुहका पूजन करता है । इससे मुख, तथा-भोपू 
विन्न हन्त्रे नमः छला्ट पूजयामि-विन्नोंके नाश करनेवाहेके 
लिये नमस्कार है छछाटका पूजन करता हूँ इससे छलाट, 
तथा-ओम -सर्वेश्वरायः नमः शिरः पूजयामि-सर्वेश्वरके 
लिये नमस्कार है। शिरका पूजन करता हूं। इससे शिए, 
तथा-ओपू श्रीगणशाय नमः सर्वाह्ल पूजयामि श्रीगणेशजीके ' 
लिये नमस्कार है सब अंगोंका पूजन करता हूं इसशे सर्वाज् 
पेज देना चाहिय । तद्नन्तर दशाह्ंगुग्गुे यह दशाहु' 
धुगालयुक्त उत्तम धूप है है गणनायक ! हे देव देवेश ! है. 
<माझुत , आप इसे स्वीकृत करें, आपके छिये नमस्कार 
है| | इस सत्र तथा यत्पुरुष व्यद्धु: इस संत्रस एवमू विक* 
टाय नक्न, धूपम्राप्नापयासि विक्रटमूर्ति गणपतिके ढ़िये 
गसरकार है, धूपका गन्ध अपित करता हूँ इससे धूप देना 
चाहिये। “ स्वज्ञ सर्वेस्‍त्नाठ्य” हे सर्वज्ञ हे सब प्रकारके 
र्नोंसे सम्पन्न हे सबके ईश्वर हे देवलाओंके पियारे” धृत 
और पत्तीयुक्त इस माज्लिक दीपकको अज्जीकृत करो! 
आज्णोउस्यमुखमासीदू ” इस मंत्रसे तथा वामनाय 
गम: दीप॑ दृशयामि वामनरूप गणराजके छिये नमस्कार 
है भें दीपक दिखारहाहूँ । ऐस- कहके दीपक दिखा 
रोपक पर अक्षत छोडके हाथोंकों प्रक्षालित, करे । फिर 
नवंय गृह्मताम्‌ देव ” बहुतस लडुओं एवं पक्तान्नयुक्त छः 
रसवाढ्त भोभ्यपदाथसि रुचिर, इस नेवेद्कों प्रहण करों 





् 


उलम्‌ ॥ पक्कान्नफलसंयुक्त पड़सश्र समात्वतम्‌ ॥ चहन्द्रभामन० सवंदवाय० नंवद्यम 


ण्यागोतमीनां पयोष्ण 


व्ययूलदा हरि 





नमंदाजले; ॥ आचम्यतां विन्नराज प्रसतन्नो भव सवेदा )। आचमनम्‌ 
छुगन्धीन्यघधनाशन । आनीतानि यथाशक्त्या गहाण गणनायक 
तनाशिने० फलं० । ताम्बूल गृह्मयतां देव नागवल्‍टया दलेयुतम ॥ कर्प्रण समायक्त खुगर्ध 
मुखभूषणम्‌ ॥ विन्नहत्र॑न० ताम्बूलं० ॥ सबदेवाधिदव त्व॑ सर्वेसिद्धिभदायक ॥ 
- मया देव गहाण दक्षिणां विमो ॥ सर्वेश्वराय० दक्षिणां० ॥ पश्चचवर्तिसमायर्त व! 


(११३ ) 


० पुर "ी++»+++-+ननननन + नमन न के तपरनमन-वप अप नकल “नमन 2 








हे 


॥ सवा 


है. 


भकत्या दसां 
देना योजिते 





मया ॥ गहाण मड़ुले दीप विश्नराज नमोस्तु ते ॥ नीराजनम्‌ ॥ यानि कानि च पा० नाम्या 
आसीदिति प्रदक्षिणा३॥ नमोस्त्वनं० ॥ सप्तास्येति नमस्कारः ॥ यक्षेनयज्ञामितिमंत्रपुब्पाझ- 
लिम्‌ ॥ एवं पूजा प्रकतंव्या षोडशेरूपचारके! ॥ मोदकान्कारयेन्मातस्तिलजान्दश पार्वति 

देवाग्रे स्थापयेत्पश्व॒ पश्च विभाय कल्पयेत्‌ ॥ पूजयित्वा तुत॑ विपम्न॑ भक्तिमावेन देववत 

दक्षिणां च यथाशकक्‍त्या दच्चा वे पश्चमोदकान्‌ ॥ पूजयेन्निशि चन्द्र च अध्य दर्वा यथा- 
विधि ॥ क्षीरसागरसंभूत छुधारूप निशाकर ॥ गहाणाध्ये मथा दत्त गणेशप्रीतिवद्धे- 
नम्‌ ॥ रोहिणीसहितचन्द्रमसे नमः इदमध्ये० ॥ क्षीरोदार्णब्संभूत खुधारूपनिशाकर । 
गहाणाध्य मया दत्त रोहिण्या सहितः शशिवारोहिणीसहितचन्द्राय ०” इदमध्येमू० ॥ गणेशाय 
नमस्तुभ्यं सवेसिद्धिप्रदायक ॥ संकष्ठ हर मे देव गहाणाध्य नमोस्तु ते ॥ कृष्णपक्षे चतुथ्या 





इस मंत्रस लथा-“चन्द्रमा मनसो जातः' इससे तथा-सव्व | 


देवाय नमः नेवध निवेदयाि सबके पूज्य गणपतिक छिय 
नमस्कार हेम॑ नंवंद्य निवेदित करता हैँ, जिसस नेवेद्य 
भोगछूगा देँ। कृष्णा, वेणी, यमुना; प्रयागराज, गोतमी 
पयोष्णी और नमेदाके जरसे हे विपन्नराज ! आप आचमन 
करो और सदा मुझपर प्रसन्न रहो।इससे आचमन करावे। 
'फछान्यम्रत' हे पाप | ओर दुःखोंकों नष्टकरनेवाले हे गण 
नायक | सें यथाशक्ति अमृतसहदृश मधुर एवं सुगन्धित फछ 
आपके छिय लायाहूँ आप इनका स्वाद इसस तथा सववा- 
तिनाशिने नमः, फर् समर्पयामि-सब पीडाओंके नाशक 
गणेशजीके छिये नमस्कार है, में फछ चढाताहूं ऐसे कहके 
ऋतु एछ चढावे । ताम्बूल गृह्मताम्‌! हें देव नागरपान 
कपूर ओर सुगंधित पदाथोंसे युक्त, मुखको विभूषित कर- 
नेवाले ताम्बूछको ग्रहण करिये इससे तथा विन्नहत्रे नम 
मुखशुद्धयर्थ ताम्बूठ समपेयामि विज्नोंके हरनवालेक लिये 
नमस्कार है आपकी मुखणशुद्धिके छिय ताम्बूछ चढाताहूं 
इतना कहके ताम्बूछ समर्पणकरे | “स्वेदेवाधि” हे सबदे 
वताओंके पूज्य हे सबके प्रति सिद्धि देनेवाल ! में भक्तिसे 
दक्षिणा चढाता हूं हें विभो ! आप इसे स्वीकृतकरो । सर्वे 
श्वराय नमः दक्षिणां समपेयामि-सर्वेश्वरके किय. नमस्कार 
है दक्षिणा चढाताहू इतना कहकर दक्षिणा चढाव | फिर 
पांच बत्ती चासकर उस दीपकसे आरतीं करत्य हुआ 
पपञ्चबत्ति! इस पद्मयको पढे,इसका यह अथ है कि हे वि्न- 
राज ! पांचबत्तीवाल प्रज्वलित इस मांगलिक दीपकको 
अद्भीकृत करों- आपके छिये प्रणाम है। पीछे यानिकानि य॒ 
पापानि, इस पूर्वोक्त प्यकों तथा “ नाभ्या आसीत्‌ ” इस 
मन्त्रको पढते हुए प्रदृक्षिणा करनी चाहिये “ नमोडस्त्वन्न 


न्ताय सहखमूतेये” इस पहले कहे हुए पद्यको तथा “सप्ता- 
स्यासन्‌ परि०? इस संत्रको पढता हुआ हाथ जोडकर प्रणाम 
करना चाहिये “ ओम यज्ञेन बज्ञमयजन्त ” इस मन्त्रको 
पढ़कर पुष्पाजली चढावे | गणंशजी पावतीस कहते ह के 
हे मातः पावंति! इस प्रकार सोलहों उपचारोंसे पूजा करनी 
चाहिय, पूजाके अन्तर्मे तिलोंक दशमोदकोंमेंस पाँच गणप- 
तिके सम्मुख भेंट करे ओर पाँच छड्डडुओंको देवताके 
समान आचाय्यका पूजन करके उन्हें यथा क्षक्ति दक्षिणाकि 
साथ देदे। फिर रातमें चन्द्रोद्य होनेंपर यथाविधि चन्द्र 
माका पूजन करके, ' क्षीरसागर ' आदिसन्त्रोंस अध्यदान 
करना चाहिय । इनका अर्थ यह है कि, हे क्षीरसमुद्रस 
उत्पन्न हे सुधा रूप ! हे निशाकर | आप रोहिणी सहिलमेरे 
दिये हुए गणे शक प्रेम बढानेवाले अध्यको ग्रहण करोःरोहि 
णीसहित चन्द्रमाके लिये नमस्कार है यह अध चन्द्रमाको 
समर्पित करता हूं, इस मंत्रस चन्द्रमाको अच दे। तथा है 
क्षीरसमुद्रस उत्पन्न होनेवाले हे सुधारूप निशाकर! म अधे 
देता हूँ हे शशिन्‌ ! रोहिणी सहित आप इसे प्रहण करिये 
रोहिणीसहित चन्द्रमाके लिये इस अधघेंको देता हूं | इससे 
रोहिणी सहित चन्द्रमाके लिये अघे दे। तत्पश्चात्‌ गणपतिके 
लिये अर्घ्य देता हुआ और “ गणशाय ? इत्यादि पढे इसका 
यह अथ है कि, सबसिद्धियोंके देनवाल गणेशजी महाराज 
आपके छिये नमस्कार हैं, है देव ! सब सकटोंका हरण 
करिये तथा मरे अध्यंदानकों अद्भीकृत करिय आपके छिये 
वारंवार नमस्कार है। कृष्णपक्षकी चोथके द्त चन्द्रमाके 
उदय हो जानेपर पूजन करके शीज्नही प्रसन्ञ कर छिया है, 
हे देव ! अघे ग्रहण करिये; आपको नमस्कार है; यह अधे 
संक्रदहर गणेशजीके लियः मेरा नहीं हैँ । पीछे चतुर्थी 





(१२५४ ) प्रतराजए।.. [ चतुगी-.. 
तु पूजितोसि विधूदये ॥ क्षिम प्रसादितों देव शहाणाष्य नमोस्तु ते ॥ संकष्टहरगणेशाक 


पे 


का. दा 7७ दम "प्रा क दयडरक कण जप 


५ हा + जि ' 
इद्मप्येम्‌ ॥ तिथीनाझत्तमे देवि गणेशमियवह्धमे ॥ शबसकदनः हट चतुथ्यत्य॑ नमो . 
ने ॥| चतुर्थ्ये० अध्यम्‌ ॥ वायनसम त्र/-विप्रवण नमस्तुन्य & मोदकान्व ददाम्यहस्‌ ॥ मोद- 
कान्सफलान्पश्व दक्षिणानिः समन्वितान्‌ ॥ आपडुद्धरणाथाय शहाण द्विजसत्तम ॥ भाथना- 
: बुद्धमतिरिक्त वा द्रव्यहीनं मया कृतम्‌ ॥ सत्सव पूणतां यातु वि रूप गणेश्वर ॥ आहाणार्‌ 
भोजयेदेवि यथान्नेन यथासुखम्‌॥ स्वयं सुक्लीत प्वैव मोदकान्फलसंयुतान हे 5 अशक्तत्वकमा 
वा शुद्धीत दधिसंयुतम्‌ ॥ अथवा भोजन कार्यमेकवार हिमागजे। प्रतिमां गुरवे दद्यादाचायाय _ 
सदक्षिणाम॥वर््रकुम्मसमायुक्तामादों मन्त्रमिम॑ जपेत-3/ नमो हेरम्ब मदमोहित संकष्टात्रिवारय 
निवारय ॥ इतिमूलमन्त्रमकविंशतिवारं जपेत्‌ ॥ विसजनमन्त्रः-गच्छगच्छ सुरश्रेष्ठ स्वस्थाने 
त्व॑ं गणेवरर ॥ ब्रतेनानेन देवेश यथोक्तफलदो भव ॥ इतिपूजा ॥ अथ क्रथा॥ ऋषय उल्ुः॥ 
दारि्रशोककष्टायेः पीडितानां च वेरिनिः ॥ राज्यम्ष्टेलेपेः से: क्रियते कि झु॒मार्थिनिः ॥१॥ 
धनहीनेनरः स्कन्द स्वोपद्रवपीडितेः ॥ विद्यापुत्रगहश्रष्ठे रोमथुक्तेः शुभाथनि! ॥२॥ कतंत 
किं बदोपाय पुनःक्षेमाथसिद्धये॥ स्कन्द उबाच॥श्णुध्य॑ मुनयः सर्वे ब्रतानामुत्तम॑ ब्रतम्‌ ॥ ३॥ 
संकष्टतरणं नामामुत्रेह खुखदायकम्‌ ॥ येनोपायेन संकष्टें तरन्ति भ्रुवि देहिनः ॥ ४॥ यद्गतं 
देवकीपुत्रः कृष्णो धर्मोय दत्तवान्‌ ॥ अरण्ये क्लिश्यमानाय पुनः क्षेमार्थसिद्धयें ॥ ५॥ यथा 
कोभी अधे देना चाहिये कि, हे चतुथि | तुम तिथियोंम 
श्रेष्ठ हो, तथा गणपतिजीकी अत्यन्त पियारी हो इस कारण 
में अपने सझ्कूटोंकी निवृत्तिके छिये आपको प्रणाम करता 
हुआ अध्यदान करताहू । फिर दक्षिणासहिल फछ और 
पाँच मोदकोंका वायना आचार्यके छिये देव और “ विप्र- 
वय नमः ! इसको पढ़े, इसका अथे यह हे कि, हे विश्र- 
बय्य ! आपके ढिये प्रणाम हे, में मोदक प्रदान करतहूँ, हे 
ह्विजोत्तम आचाये ! आप इन फल और दक्षिणासमेत पांच 
मोदकोंको मेरी आपत्तियां दूर करनेके छिये स्वीकृत करो | 
फिर्‌ अबुद्धमतिरिक्ति इस सन्त्रस आचायेकी साखह्ि 
पार्थना करे कि, मेने जो विना जाना, या बिना कहा हुआ 
किया वह या जितने द्रव्यकी जरूरत थीउस द्रव्यसे शून्यजो 
इस त्रतानुध्ानको किया है।उससे जो त्रुटियां होगयी हों, वे 
सब नए हों और हे ब्राह्मण आचार्य रूपी गणाधीश ! 


आपकी कृपासे वह सब ज्तानुष्ठान सम्पूर्णताको प्राप्त हो । 





अथ है कि, हे हेरम्ब ! आपके छिये नमस्कार हे, आप मद 
एवं मोहजन्य सट्डूटोंसे इचाओ बचाओ । तदननन्‍्तर पच्छ 
गच्छ” इस सन्त्रकों पढ़ता हुआ अक्षदोंकों पूजा स्थानमें 
गेरे और पूजाकायकों समाप्त करे, इसका यह अभ है 
कि, ह सुरभ्रष्ठ | हें गणेश्वर ! आप अपने संथानमें साननन्‍द 
पधारें, मैंने जो यह आपका व्रतानुष्ठान किया है इसका जो 
शास्कारोंने फल कहा है उसको मुझे दे । इस प्रकार सह 
चतुर्थीके दिनकी गणपति पूजन विधि समाप्त होती है॥ 


कथा-ऋषिगणोंने भगवान्‌ स्वामिकार्दिकजीसे पूछा कि। 
है प्रभो | दारिद्य, रोग तथा कुछादि रोगोंसे महादुःखित 
एवम्‌ बेरियोंद्वारा राज्यसे च्युत किय गये शुभाकांक्षी संब 
'नरेशोंको क्या करना चाहिये ॥ १॥ हे स्कन्द ! सभी 
उपद्रवॉसे पीडित तथा विद्या पुत्र ग्रह और घनसे विहीन, 


श्रीगणपतिजी अपने मातासे कहते हैं. कि, हे हिमालय न- 

न्द्नी हे देवि ! यथाविहित अथवा जैसा समयपर तैयार 

किया कराया हो उस अन्नस शान्तिपूषक आनन्दके साथ 
््ु ् 

ब्राह्मगोंको भोजन कराव, ब्रतकरनंबाह्य फछ एवं पथ्च 

मोदकोंका भोजन करे, ब्रत करनवाला असमर्थ होतोद धिक्े 

साथ किसी भी एक अन्नका भोजन करले अथवा एकबार 


का ऋण ही ब्रतानुप्तान करे (फिर गणेशजीकी मूर्ति 
2 हल देथा वस्ध एवम्‌ कलशदान आचायेको देदे । 
0 से पहिले यजम्तानकों चाहिये कि वह “आओ 
2 अाहिय कि वह 'अ 

/ इस सुख्य सन्‍्त्रको २१ बार जपे | इस मन्त्रका यह 


शुभाकांक्षी मनुष्योंको क्या करना चाहिये ॥२॥ वो कर्वेव्य 
उपाय कहिये जिससे उन्हें क्षेम और अथकी सिद्धि हो 
जाय, यह सुन स्कन्द्‌ बोले कि, है ऋषिगणों ! सब साव- 
धान होकर छुनो, में एक उत्तम ब्त कहता हूँ॥ ३॥ 
संकश॒तरण उसका नाम है वो इस छोक और परछोक 
दोनोंमें सुखका दनेवाढ्ा है, प्राणी इसी उपायसे भूमण्ड* 
छपर सब कष्टोंस पार हो जाते हैं ॥४।॥| इस ब्रतको देवकीः 
पुत्र कृष्णने क्षम ओर अथ सिद्धिकें लिये घमराजको दिया 
था जब कि वो कस दुःख पा रहेथे ॥ ५॥ जेसे कि; 


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भाषाटीकासमेतः 





कथितवान्‌ पूव मणेशों मातरं प्रति. ॥ तथा कथितवाउडछीशो हापरे पांडवाह८ ॥६॥ 
ऋषय उत्चुः ॥ कर्थ कथितवानम्बां पावतीं श्रीगणेश्वरः ॥ यथा एच्छम्ति शुनयो लोकालग्रहकाँ- 
क्षिणः ॥७॥ स्कन्द उवाच ॥ पुरा कृतयुगे पृण्ये हिमाचलखुता सती ॥ तपस्तप्तवती भूरि तेना- 
लब्धः शिवः पतिः ॥ 4॥ तदास्मरत्सा हेंरम्ब॑ गणेश पूर्वजं सुतम्‌॥ तत्क्षणादागत्त दृट्ठा गणेश 
परिप्च्छलि ॥९॥ पावत्युवाचातपस्तत्तं मया घोर॑ दुश्वर॑ लोमहपेणम्‌।। न माप्तः स मया कास्तो 
गिरीशो मम बल्॒मः ॥ १० ॥ संकटष्टतरणं दिव्य॑ ब्रत॑ नारद उक्तवान्‌ ।। त्वदीयं यद्धतं तावत 
कथयस्व पुरातनम्‌ ॥ ११ ॥ तच्छत्वा पावतीवाक्य संकष्टतरणं ब्रतम॥प्रीत्या कथितवान देबो 
गणेशो ज्ञानखिद्धिदः ॥ १९॥ गणेश उवाच ॥ श्रावणे बहुले पक्षे चतुथ्यां तु विधूदये 

गणेशं पूजयगित्वा तु चन्द्रायाप्ये श्रदापयेत्‌ ॥ २३ पावंत्युवाच॥ क्रियते केन विधिना कि 
कार्य कि थे पूजनम्‌ ॥ उद्यापन क॒दा कार्य मन्त्र! के स्थ॒ुस्तु पूजने ॥१४।॥ कि ध्यान श्रीगणे- 
शस्य गणेश वद विम्तरात्‌ ॥ गणेश उवाच ॥ चतुथ्यों प्रातरुत्थाय इन्सघादन एबकआ ॥ १० 

ग्राह्म॑ त्रतमिद पुण्य संकष्टतरणं शुभम्‌ ॥ कतेव्यमिति संकरप्य ब्रतेईइस्मिन्‌ गणप॑ स्मरेत ॥१७॥ 
स्वीकारमन्त्रः-निराहारोषस्मि देवेश यावच्चरद्रोदये मदेव ॥ भोक्ष्यामे: पूजयित्वाह संकटष्टात्ता- 
रयल्‍्व माम्‌ ॥ १७ ।। एवं संकल्प्य राजेन्द्र ल्ात्वा कृष्णतिलेश! शुभ॥ आहिक तु विधायेव 
पश्चात्पूज्यों गणाथिप ॥।१८॥ त्रिभ्रिमादेल्तदुद्धेंन ततीयांशेन वा पुन॥ यथाशकक्‍त्या तु वा हमी 
प्रतिमा क्रियते मम ॥ १९ ॥ हेमामावे तु रोप्यस्य ताम्नस्यापि यथासुखम्‌ ॥ सर्वथेव दर्द्रिण 
क्रियते मृत्मयी शुभा ॥२०॥ वित्तशाठ््य न कर्तव्य कछते कार्य जिनश्यति ॥ जलपुूण वख्नझतं 


कुम्भ तदुपरि नयसेत ॥२१ पूणपात्र तत्र पद्म लिखेदद्ल शुभम्‌ | दवा तत्र संस्थाप्य गन्ष- 





गणेशजीने अप नी माको सुनाया था, वेसेही श्रीकृष्ण परसा- 
त्माने दापरमे पाण्डवॉको सुनाया था॥ ६ ॥ ऋषिगण 
कहने छगे कि, गणेशजीने भपनी माताको क्यों छाया था; 
क्योंकि ऐसी बातें तो छोंकका कल्याण चाहनेवाने ऋषि 
छोग पूछते हैं ॥ ७ ॥ यह सुन स्कन्द बोले कि, पहिले 
पुण्य कृतयुगर्म सती हिमाचछकी सुताने घोर तप किया, 
पर शिवको पति रूपमें न पासकी ।। ८ ।। उस समय 
पावत्रीजीन अपने पहिरक्े पुत्र गणपति हेरम्बका स्मरण 
किया, उसी समय गणेश आ उपस्थित हुए, तब वो गणेश- 
जीसे पूछने छूगीं ॥९॥ कि मैन ऐसा दुग्धर घोर तप किया 
हैँ जिसकी कि कहानी सुनकर रॉगट खडे होजायं, पर भेरे 
प्यार गिरीशको मेने पतिक रूपमें पास नहीं पाया ॥१०॥ 
देवषिं नारदजीने आपका संकट तरण नामक एक दिव्य 
ब्रत कहाथा, आप अपने उस पुराने ब्रवको मुझसे कहिये । 
पावतीजीके ऐस वाक्य सुनकर ज्ञात ओर सिद्धि देनेवाले 
गणेशजी परमप्रसन्नताके साथ, संक्रष्टब्वरण सामके भपने 
ब्रतको कहने छगे।। १२ ॥ श्रावण कृष्णा चौथके दिन 
तुर्थीमेंही चन्द्रोदय होनेपर गणेशजीका पूजन करके 
चन्द्रमाको अघ प्रदान करना चाहिये ॥११॥ यह सुन पावे- 
तीजी बोली कि, उस ब्रतका किस विधिसे तथा केसे पूजन 


होना चाहिये, कब उद्यापन हो, और पूजनके मंत्र कौनसे 





१ न रृष्ठः शंकर; पतिरित्यपि पाठ* 


हैं ॥१४॥ हे गणेश ! श्रीगणेशका ध्याघ कौनसा है, विस्ता- 


रके साथ सुना दीजिये।यह सुन गणेशजी बोले कि,चौथके 
दिन उठ, दुन्तथावन पूर्वक ।)१०॥ परम पवित्र इस सेकृष्ट 
तरण नामके ब्रतकों ग्रहण करे, फिर ब्रदका संकरप कर 

इस ब्रतर्म गणेशजीका स्मरण करे ।। १६ | रवी ह्वार मंत्र- 
हे देव | जबतक चांदका उदय न होगा उतने समयतक में 
निराहार रहूंगा, आपका पूजन करकेही भोजन करूंगा, 
आप मुझे संकटोंसे पार छगा दूँ ॥ १७।॥। भगवान्‌ कृष्ण 
युधिष्ठिरजीसे कहते हूँ कि, हे राजेन्द्र | स्वानादिस निवृत्त 

हो, शुभ काले तिलोंस आहिक कम करके पीछे गणपतिका 
पूजन करना चाहिये ॥ १८ ॥ गणेशजी पावतीजीसे ऋहते 
हैं कि, तीन मासकी, डेढ' मासेकी अथवा एक मासकी 

सोनेकी गणेझजीकी मूर्ति शक्तिके असुसार बनवा ॥१९। 

यदि सोनेकी न बनवा सके; तो चांदीकी या तांबेकी ही 
बेनवाले यह भी न हो सके तो मिट्टीकी ही बनवा छती 
चाहियें ॥२०॥ इस कार्यमं घनका लोभ न करना चाहिये 

छोभसे कार्य नष्ट होता है; इस मृर्तिको पानीस भरे एवम्‌ 
बधवसोॉंसे ढकेहुए कुंभके ऊपर, ऋ्रमशः स्थापित कर देना 
चाहिये । २१ ॥ कलश पर पूणपात्र रख दें, तहां अष्टद्लछ 
कमल लिखना चाहिये तहाँ विधिपूवकदवता स्थापित करके 


पारवलाअसभंक; 








( १२६ ) हि 





पुष्पेः प्रपूजयेत्‌. २२ ॥ एवं ब्रतं प्रकरतव्यं ्रतिमासं त्वयाद्रिजे ॥ यावज्जीबं ठ॒ वा वांप्येक 
विंशतिमेव वा॥२श। अशक्तोः््पेकवष वा मतिवर्षमथापि वा।॥ उद्यापनं ठ॒ कतंव्य॑ चतुण 
श्रावणेःसिते ॥२४॥ स्वीकारश्व तथा कायः सकट॒हरग तिथो || हर त्यं तथाच ६2 । सर्वशाद्व 
विशारदम्‌ ॥२५॥ अ्रद्धया मार्थयेदादो तेनोक्त विधिमाचरेत्‌ ॥ एकविशतिविभरंश्व बस्चालंका: 
भूषणेः ॥२६॥ पूजयेह्रोहिरप्याश्ेहुत्वान्नों विधिपूर्वक्म्‌ ॥ होमद्र॒व्यं  मोद्काश्च तिलयुत्ा 
वृतप्छुताः ॥ २७ ॥ अष्टोत्तरसहर्ल वा नोचेदष्टोत्तर शतम्‌ ॥ अष्टाविंशतिसंख्याकान्मोदकाजा 
सशकरान्‌ ॥२4॥ अशक्तोष्टो शुभाव स्थूछाउ्जुहुयाज्वातवेद्सि।वेदिकेन च मंत्रेण आगमोक्तेन 
वा तथा ॥२९॥ अथवा नाममंत्रेण होम॑ कुर्याद्यधाविधि।॥ पृष्पमण्डपिका कार्यों गणेशाहाह- 
कारिणी ॥ ३० ॥ पूजयेत्तत्र गणपं भक्तसंकष्टनाशनम्‌ ॥ गीतवादित्रनिनदेभेक्तिभावपुरस्तृते 
॥३१॥ पुराणवेदनि्धषिस्तोषयेच्च गणेश्वरम्‌॥एवं जागरण कार्य शक्‍त्या दानादिक॑ तथा ॥३१ 
सपक्नीकमथाचार्य तोषयेद्रस्रभूषणे॥उपानच्छत्रगोदानकमण्डलुफला दिलि।३३ ॥ शबय्यावाहन- 
भूदानं धनधान्यण्हादिमिः ॥ यथाशक्त्या प्रकरतेव्यं दारिद्याभावमिच्छता ॥ ३४ ॥ एकविशाति- 
विमराश् भोजयेन्रमन्निमम।गजास्यो विन्नराजश्व लम्बोद्रशिवात्मजी ॥३५॥ वक्रत॒ण्डः शपकर 
कुब्जश्वेव विनायक॥ विज्ननाशों हि विकटों वामनः सर्वदेवतः ॥३६॥ सर्वार्तिनाशी भगवार 
विप्नहतों च धूम्रक॥ सर्वदेवाधिदेवश्व सर्वे पोडश वे स्प्ता॥३७॥एकदुन्तः कृष्णपिड़ो भाह- 
चन्द्रो गणेश्वर॥ गणपश्चेकविशश्च सर्व एते गणेश्वराः ॥ ३८ ॥ दुर्गोपिर्धश्व रुद्रश्व कुलदेव्यापिई 
भवेत्‌॥ बिशेषेणाष्टसंस्याकेमोंदकेव्न स्मृतम्‌]३९॥ एवं कृते विधानेन प्रसन्नोईह न संशयः॥ 
ददामि वाज्छितान कामांस्तंद्रत॑ मत्तियं कुह॥४०॥श्रीकृष्ण उवाच॥एवं तु कथितं सर्व गणेगेन 
स्वयं नृप ॥ पार्वत्या तत्कृतं राजन बतं संकष्टनाशनम्‌ ॥४१॥ व्रतेनानेन सा प्राप महादेव॑ पति 





पीछे वेध पूजन करना चाहिये॥ २२ ॥ हे गिरिज | आप | शक्तिके अजुसार दान करना चाहिये ॥ ३२ | वद्, 


प्रतिमास इसी प्रकार ब्रव करें जबतक कि आप जीदें, 
अथवा इक्कीस बरसतक करें ॥२३॥ यदि शक्ति न हो तो 
एक वर्ष अथवा वर्षमें एक दिन तो अवश्य ही करे ।श्रावण 
क्ृप्णा चौथके दिन उद्यापन करें ॥२४॥ संकष्टहरण चोथके 
दिन स्वीकार करना चाहिये सब शाखोंके जाननेवाले गण- 
पतिजीके ब्रतोंके विधानोंको जाननेवाले जो आचार्य हों, 
उनकी ॥२५।॥ अद्धासे प्राथंना करनी चाहिय, फिर जैसे वो 
कह वेसही त्रत करना चाहिये | इक्कीस ब्राह्मणोंको वस्त 
अलंकार और भूषणोंसे ॥२६॥ तथा गऊ और सोनेआददि- 
कस पूजन करके विधिपू्वेक हवन करे, इसमें होमद्रव्य, 
घीसे भीगे हुए सतिक मोदक हैं ||२७॥ एक हजार आठ 
अथवा एक आठ तथा अद्वाइंस मोदक चीनीके बने होने 
चाहिये ॥ २८ ॥ यदि इतनी शक्ति न हो तो वेद्क मंत्रसे 
5 त गाणपत्य शास्रके मंत्रसे बडे बडे आठ सुन्दर लड्‌डुन 
का अम्निमं हवन करना चाहिये | २९ | | अथवा 
7. जैसे विधिसहित हवन करना चाहिये, गणेश- 
सन्न करतवाला फूछोंका मण्डप बनाता चाहिये 
१०: ॥| बहिन नाशनेबाढे गणेशजीका तहां 


एज ते करता भक्तिभमाव े कि &. अर 
< हिये; से किये गये ग 
वजानेके शब्दोंसे । ये गये गाने 


7३ ज़ीको ;रुन्न करे 


* ॥ पुराण और वेदके शब्दोंसे |ती 


भूषण, छत्र, जूती, जोडा, गौ, कप्रण्डलु, और फहा 
दिकोंस, सपत्नीक आचास्येको प्रसन्न कर देना चाहिये 
|३३॥ जिसको यह इच्छा हो कि मेरे घर कोई दारिद्रत 
रहे उसे अपनी शक्तिक्रे अनुसार शय्या, वाहन, भू, धन) 
धान्‍्य और गृहादिकोंस सत्कार करना चाहिये ॥३४॥ मेरे 
नामसे २१ ब्राह्मणोंका भोजन करना चाहिये। में नाम 
गजा प्य, विप्नराज, छम्बोदर, शिवात्मज ॥३५॥ वक्रतुण्ड, 
शुपकण, कुब्ज, विनायक, विश्ननाश, वामन, विकट, सर्व- 
देवत ॥३६| सर्वातिनाशी, भगवान्‌ विजन्न हर्ता, धूम्रक। 
सवेद्वाधि देव ॥ ३७ || एकदुन्त, क्ृष्णपिछु, भाढचन, 
गणेश्वर और गणप ये हैं ये इक्कीस गणनायक हैं ॥ १८॥ 
दुर्गा, उपेन्द्र, रद्र भौर कुछदवी इनके नामके चार ब्राह्मण 
अधिक हो जाते हैं बिशष करके आठ मोदकोंकाही हवन 
कहा गया है॥ ३९ ।॥ विधिपूर्वक ऐसा करनेसे में प्रसन्न हो 
जाब्य हूँ, इसमें कोई सन्देह नहीं है, म॒ सब मनोकामना“ 
ओको पूरा करता हूं, है मात ! भेरे प्यारे इस ब्रतको करो 
,, 3० ॥ भगवान्‌ श्रीकृष्ण राजा युधिष्ठिरजीसे कहते 
है कि, इस प्रकार गणेशजीने अपने आप कहा तथा पार्व- 
जीने उस संकष्ट नाशन ब्रतको किया ।| ४१॥ इसी 


+ रत हकार राध्को जागरण करके ब्रतके प्रभावसे पावंतीजीने शिवजीको अपना पति पाया। 


छः हू 34 
द ता पा 
ब्क्ला गग्क्म फुचा शल्य रा लज्लफड्रर खटन कि ्ै || है; शेड 
| 9, ि ५४ है है हल 
ड क्यू; (७३१६ ५५४०३ ६४४० 


बकप ॥ तत्कुदष्व महाराज ब्रतं सेकटवाशनम्‌ ॥४२॥ चतुर्थी संकदा नाम स्कत्देन कथिता 
इवीव ॥ ऋषितिलेककाम स्तेलोंके ततमिद ब्रतम्‌ ॥४३॥ सूत उवाच ॥ कृत युधिष्ठिरेणेतद्रा- 
यकामेन वे द्विज ४ तेन शबृन्निहृत्याजों स्वराज्यं भातवाद्‌ स्वयम ॥ड४)॥ तस्मात्सवेप्रयत्नेन 
पते काये विचक्षणैः ॥ येत धर्माथकामाश्व मोक्षश्वापि भवेत्किल॥ ४५॥ यः करोति व्रत 
वेषाः सर्वकामार्थधिद्धिदव ॥ से बॉच्छितफर्े प्राप्य पश्चाहणपता बजेत्‌ ॥ ४९॥ यदा यदा 
सर विप्रा नर प्रप्नोति सकटम ॥ तदा तदा मकतंव्य बत सड्टनाशनम | ४७ ॥ त्िपुर हन्तु- 
फामेन कृत देवेन झुलिना ॥ तरेलोक्यभूतिकामेन महेस्द्रेण तथा कृतम्‌ ॥ ४८॥। रावणेन कूते 
8 वालिबन्धनसड्डटे ॥ स्वदीय॑ प्रातवात्राज्य गणेशस्य शसादतः ॥ ४५॥ सीतान्वेषणकामेन 
ऊत॑ वायुसुतेन च ॥ संकरुप्य दृष्टवान्सोषयं सीतां रामंप्रियां पुरा ॥ ५० ॥ दमयःतत्या कृत॑ पूवे 
नलान्वेषणकारणाव ॥ सा पातिं नेषध लेने पुण्यछोक द्विजोत्तम४॥ ५१ ॥ अहल्य वि पति 
छेमे गौतम॑ प्राणवक्ठमम्‌ ॥ विद्यार्थी लगते विद्यों चताथी चनमाप्ठुयाव्‌ ॥ पुत्रार्थी पुत्रभाप्नोति 
ऐेगी रोगात्ममुच्यते ॥ ५२ ॥ इति श्रीस्कन्दपुराणोक्त॑ सेकष्टचतुर्थीत्रतम्‌ ॥ ' 


दूव|गणपतित्रवम्‌ । 


अथ आवणे कार्तिके वा शुक्कच॒त॒र्थ्या दूवोगणपतित्रतव्‌ ॥ मदनरत्ने सोरपुराणे--स्कन्द 
उवाच ॥ केन बतेन भगवन्सौपमाग्यमतुर् भवेत्‌ ॥ पुत्रशेब्रधनेश्वर्ये मंठजः खुखमेधते ॥ तन्‍मे 
बद महादेव व्रतानामुत्तम वब्रतम्‌ ॥ येन चीर्णन देवश नरो राज्य च बिन्द्रति ॥ राक्षी च जायते 
नारी अपि दसकुछोद्धवा ॥ राजपुत्रो जवेच्छबूत गरडश्पन्नगानिव ॥ बाह् णो बल्मवचेस्त्व॑ भाष्य 
सर्वाधिको भवेव ॥ वर्गीअ्मविहीनो४पि सोपी घिद्धि च व्िन्द्ति ॥ महादेव डवाच॥ म्णु वत्स 


श्‌ +््‌ 


प्रवक्ष्यामि ब्रतानामृत्तम ब्रतम ॥ अध्ति दूवोगगपनेत्रत त्रेलोक्पवि श्रुतम्‌॥ भगवत्या छुरा चीण 
आ ऊछऊछछछछ छऊछझछछछछआ ऋ  #& ऑन“ 












हे राजन ! आप इस कष्टनिवारक त्रतकों करिये ॥ ४२॥ | छिंय दमयन्तीने भी इसी ब्तको किया था, उसने पवित्र 
स्कन्दने यह सकटा चतुर्थी ऋषियों को सुनाई थी । लोकके | यशवछ्ठे नेषध लछको पति पाया ॥ ५१ ॥ अहल्याने 
कल्याण चाह नेवाले ऋषियोंने इसे प्रचछ्धित करदि्या ॥४३ | _ प्राणवह्षभ गौत्तम प्राप्त किया थाइस ब्रतस विद्यार्थीको 
सूवजी शौनकादिक महूषियोंसे बोले छि;हे ह्िजोःराज्यकी शींको धन तथा पृत्रार्थीको पुत्र और रोगीको 
इच्छास महाराज युविपछ्ठिर्न इस ब्रत बी कि गॉटिशो:। विद्या; धनार्थीकीं घन तथा पुत्रार्थोको उुत्र आर 


ध्शु तह हे 
द् हैः यक हे ह न णा्‌ 
इसी ब्रतके प्रभावस युद्धमं वेरियोंको मारकर अपना राज्य | आरोग्यकी प्राप्ति होती हैं ॥| ५९।॥। यह श्रीस्कन्द्पुराणका 


पा लिया था । ४४ ॥ इस कारण सबको प्रयत्न पूर्वक | से कष्टचतुर्थी का ब्रत पूरा हुआ ।। शी 

इस त्रतको करना चाहिये, जिससे घम, अथ, काम और | अथ दूर्वागणपतित्र॒त-श्रावणके महीनामें अथवा कातिकक 

मोक्ष मिल जाये ॥ ४५ ॥ है ब्राह्मणों ! जो सभी काम | महीनामें शुक्धपक्षकी चतुर्थीके दिन दुर्वागगपतिका त्रत होता 

अर्थीकी सिद्धि देनेवाले इस ब्रवको करता है वो वांछित | है। मद्नरत्त भ्र्न्थेम सोर पुराणको छेकर कहा है। स्कन्द- 

फडको पाकर अन्तर्म गणपतिपनेकों पाजाता है ॥ ४६॥ | जी बोले कि, है भमवन्‌ ! कौनसे ब्रलके करनेस अतुल 
हे ब्राह्यणो ! जब जब मनुष्योंक्रों बडा भारी कष्टे प्राप्त हो | सौभग्य हो और पुत्र; पौत्र, घन वा एश्वयस मन 
सबको उस सप्तय संकटचतुर्थीका ब्रत करना चाहिय।।४७ | सुख पूवछ घढता हो | है महादेव ! सब ब्रतोंम जो उत्तम 
त्रिपुरको मारनेके छिय शिवजीने इस ब्रतकों कियाथा तथा | ब्रत है उस मुझसे कहिये जिसके करनेस साधारण मलुप्य 
तीनों छोकोंकी विभूति चाहनेवाले इन्द्रने इसी ब्रवको किया | राजा बन जाय वथा दास घरानेमें पैदा हुई भी ख्री रानी 
था| ४८ || जब रावणको बाछित बाँध लिया था, इस | होजाय। राजपुत्र अपने वैश्योंको ऐसे जीतलें जल गरुड़ 
समय रावणने भी इसी ब्रतको किया था उसने भगवान्‌ सापॉको जीत छेता है। ब्राह्मण त्रह्मवचस्वी होकर सबसे 
गणशजीकी कृपास फिर-अपना राज्य पाढिया था ॥४५/मैं | अधिक होजाय। जो बर्णाश्रम धर्मसे हीन भी हो वह भी 
सीताका पता पा जाऊ इस इच्छासे इस ब्रतका संकरप सिद्धिको पाजाय । यह सुन महादेवजी बोल कि, हैं व॒त्स . 
हनुमानजीने किया था इसके ही प्रभावस वो सीताजीका | सुनः मैं सब ब्रतोंस उत्तम ब्रत कहता हूँ ऐसा तीनों छोकोमें 
पता छगासके ॥५०॥ है. ब्राह्मणों । नक॒का पता पानेके | असिद्ध दुर्वागणपतिका ब्र॒त हैं पृहिझे इसे भगवती पांव, 








ऊ 


बंतरांजः | चतुब ... 


( १२८ ) विश 


क्‍ 
५ गन्धः 
किन्नरेस्तथा ॥ चीणमेंतद्गतं सर्वे पुराकल्पे पडानन ॥ चतुर्थी या भवेच्छुछा नभोमासण 
पु्यदा ॥ तस्यां ब्रतमिई कुयात्कातिक्यां वा पडाननोगजानने 328६2 विपांटितग। 
विधाय हेम्वा विश्वेश हेमपीठासनस्थितम्‌ ॥ तथा हेममर्यी ढूबों तदाधोरे व्यवस्थिताम्‌॥ 
संस्थाप्य विन्नह॒तारं कलशे ताव्रभाजने॥ वेडित॑ रक्तवर््नण स्वेतोमद्रमण्डले ॥ पूजयेद्रक्तः 
कुसुमः पत्रिकामिश्व॒ पश्चणि ॥ विल्वपत्रमपामागःशमी दूवां हरिप्रिया ॥ अन्‍्येः छ गन्धकुसुमे. 
पत्रिकातिः सगन्विनिः ! फलेश्व मोदकेःपश्चादु पहार्‌ पल उपचार स्तु वाधना। पजयेह्िएि 
जाछतम्‌ ॥ इत्यावाहनमस्नः ॥ उमाछुत नमस्त॒भ्य॑ विश्वव्यपित्‌ सनातन ॥ विज्नोघांश्िग्ि द 
सकलानः्य पाद्य ददाधि ते ॥ पाद्याध्ययोम॑त्रः ॥ गणेश्वराय देवाय उम्तापुत्राय बेधसे। : 
पूजामथ प्रयच्छामि गहाण भगवन्मम गन्धमन्त्र; ॥ विनायकाय ख्राय वरदाय गज्ञा 
नन ॥ उमाखुताय देवाय कुमारणरवे नमः ॥ लंबोदराय वीशाय सर्वेविष्नों घहारिणे |॥ पुष्प 
मन्त्रः ॥ उमाइमलसंनूतों दाभवानां वधाय वे ॥ अलुप्रहाय लोकानां स देवः पाठ विश्- 
पक ॥ धूपमन्त्र: ॥ परव्ज्योतिप्रकाशाय सवेसिद्वमदायक ॥ दीप तुभ्य प्रदास्यामि महाः 
देवाय ते नम॥ दीपमन्त्रः ॥ गणानांत्वा० सादनम ॥ उपहारमन्त्र: ॥ गणेश्वर गणाध्यक्ष गौरी . 
पुत्र गजानन ॥ ब्र॒तं संपूर्णतां यातु त्वत्मलादादिभानन ॥ प्रार्थनामन्त्रः ॥ एवं संपूज्य विश्लेश 


हि ० मिल, 0 


यथाविभवविस्तरेः ॥ सोपस्कार गणाध्यक्षमाचार्याय “बैंदुयत ॥ शहाण भगवन्बहान्‌ गणराज॑ 
ल्ल्ल्ल्ल्ल्ल्ल्ॉससस,,थफईनजफससस स स स  घघअफक्‍क  क्‍क्‍्ल्‍-क्‍ककलचचचकच इइइ क्‍ न च कक जलन न नलनननननननननल-_-न-+-नन्तन ननन/+ककनक नकल भभ५५५५०. 


पावत्या श्रद्धया सहं ॥ सरस्यत्या च इन्द्रेण विष्णुना धनदेन च॥ अनच्यश्व देवेसुनि 


५५ कल ७. भ्र भू “पी म श 
तीन श्रद्धाक साथ किया था । है पडानन | सरस्वती, इन्द्र, आपके लिय प्रणाम हू, आप भेरे कार्यों जो जो विम्न उप- 


विश्णु, कुबेर तथा दूसरे २ देव, मुनि, गन्धवे, किन्नर 
इन सबोसे पहिल्े कस्पमें इस तब्रतको किया है । हे पडान न! 
जो श्रावण या कार्तिक मासकी पुण्यद्‌ शुक्बाचतुर्थी हो,उससें 


इस ब्रतकों करना चाहिये सोवेकी एक एसी विप्नेश गजा- 


ननकी मूर्ति बनानी चाहिये जिसके गण्डसे मद चुचारहा 
हो, चतुसुजी ओर एक दन्त हो उसे सोनेके सिंहासनपर 
विठा देना चाहिये, सिंहासनके नीचे सोनेक्नी दूब रखना 
चाहिये ( उस मूर्तिके निर्माण यह सब होना चाहिय 
पीछे विधिपू्क विश्नर्ताकों तांबेके कलश पर स्थापित कर 
देता चाहिये। कलश,सर्वेतोभद्रमण्डलपर छाढुबखसे वेष्टित 
करके रखता चाहियेलाछ फूछ और बिट्व,अपाभाग,शमी, 
दूर्वा और तुलसी इन पांचोंकी पत्रिकाओंस पूजन करना 
चाहिये । इससे सुगन्धितपुष्प पत्रिका, सुगन्धि द्रव्य और 
लदडूओंसे पीछे भेंटकी कश्पना करनी चाहिय|उपचारोंसे 
विधिके साथ गिरिजा सुतका, साझोपाडु पूजन करना 
चाहिय।यह आवाहनका मंत्र हे(नो आवाहनका मंत्र कहा है 
इसमें कोई पद्‌ आवाहनका प्रतीत नहीं होता इस कारण 
आवाहनको दूसरी जगहकी विधि यहां भी समझनी चाहिये 
कि, है दूर्वा श्रिय गणपते ! आपकी प्रसन्नताके लिये 
७ ३ 9३. (ऑफर ९ 
परम करता हूं।ह देव(से यहां आपकी पूजा करना चाहता 
० - हर अर आवाहून करता हूं, मेरी पूजा स्वीकार 
७... ७ 
५ मंश्नर । आप पेरेरर प्रसन्न हों । यह आवाहन मंत्र हे) 
दे उमानत । हैं सत्र व्याप्त एस डे! हे सनातन! करना चाहिये।डसका यह मन्त्रहे किदे भगवन हि अह्द | है सनातन ! 


आप पथधार मे उसके छिय ग्र्थना करता हू, | वि 


स्थित हों, उत्त सब विन्नोंके पुजजोंको छिन्न भिन्न करिये, 
अध्य तथा पाद्यदान करता हूं ! इससे अर्थ पा्य, तथा यह 
पाद्य तथा अध्य दानका एकही मन्त्र हैं । हे भगवन | आएं 
गर्णोंके इंश्वर, विजय करनेवाले, पार्वतीके पत्र और जाग. 
तूकी उत्पत्ति करनेवाले हैं, आपकी प्रसन्नताके छिये दिव्य 
गन्ध समर्पित करती हूँ, आप इस गन्धको स्वीकृत करें| 
इससे गनन्‍्ध, तथा-विनायक, शूर, वरदेनेवाले, उम्ाें 
पन्‍्दुन, स्वासि कातिकेयके बडे आता,समस्त विश्नोंके सम. 
हको नष्ट करनेवाले वीर लम्बोदरदेवके लिय' प्रणामहै,आप 
सुगन्धित पुंप्प और दूर्वाके अंकुरोंको स्वीकृत करिये!इससे 
पुष्प तथा उम्रा ( पावती ) के शरीरसे गिरे हुए मेढसे 
जिसका अवतार, छोकोंके कल्याण एवं दानवोंके सहारे 
छिय हुआ है वही सब जगत्‌को धारण करनेवाढा द्व 
भरी रक्षा करें।इससे धृप,तथा-हे सब प्राणियोंकों सिद्धिके 
इनवाढ आप, परम ज्योति स्वरूपका प्रकाश करनेवाढ़े 
महादँव है आपके ढिय प्रणाम हे में आपके ढिये दीपक 
सम्र्पित करता हूं । उससे दीपक,तथा-“ओम गणानांत्वा” 
इससे उपहार, तथा-हे गणेश्वर ! हे गणाध्यक्ष ! हे गौरी- 
पुत्र ! है गजानन ! वह मैंने जो आपका ब्रव किया है।वह 
आपको प्रसन्नतास सफूछ हो,इससे प्राथना करनी चादिये। 
महादेबजी स्वामिकातिकेयस कहतेहेँ कि इस प्रकार अपने 
भवके अनुसार गणपतिका पूजन करके ,उसकी साम्रप्र 
और ज/भूषणादिसमेत गणपतिकी मूर्तिको आचार्यकी भेंट 
करना चाहिये।डसका यह मन्‍्त्रहे कि-हे मगवन!हे बदन ! 


.... * रृघाराखाविणम्‌ । २ विश्नेशासने | ३ तुलसी | क्‍ 





भाषादीकासमेल) । ( १५९ ) 























सदक्षिणम्‌ ॥ ब्रत॑ त्वद्रचनाद्द पूर्णतां यातु खुब्रत ॥ दानमत्तः ।। अथवा शुक्कपक्षस्प चतु्थ्यों 
संयतेन्द्रियः ॥ एवं यः पश्ववर्षाणि कृत्वोद्यापनमाचरेत्‌ ॥ ईप्सिताछमते कामान देहान्ते शाहुरं 
पदम्‌ ॥ कु्याद्वपेत्रयं त्वेव॑ सर्वश्िद्धिदायकम्‌ ।। उद्यापनं बिना यह्तु करोति बतसत्तमम्‌ ॥ 
तेन शुक्लतिलेः कार्य प्रातः स्वानं पडानन ॥ हेम्वा वा राजतेनापि कृत्वा गणपातें दुधः॥ पश्थ- 
गव्यस्तु संस्नाप्य दूर्वानिः संप्रपूजयेत्‌ ॥ मन्त्रेस्त दशनि्भकत्या दूबायुग्मेः शिखिध्वज ॥ दूर्था* 
युग्मेद्शभिमंत्रेः पूजा ॥ दूर्वायुक्ते! पश्चगव्येः स्तपनम ॥ ते च दशा नाममन्त्रा उक्ताःस्कन्द्पुराणे--गणा- 
थिप नमसस्‍्ते5स्त उमापुत्नाधनाशन ॥-विनायकेशपुत्रेति स्वंेपिद्धिमदायक ॥ एकदन्लेमवकऋेति 
तथा मृषकवाहन ॥ कुमारणुरवे तुभ्यमेभिनोमपढदेः प्रथक ॥ इत्येव॑ कथितं सम्यक्‌ सर्वसिद्धिपद॑ 
शुभम्‌ ॥ ब्रतं दूवोगणपतेः किमन्यच्छोठामिच्छसि॥ इति सौरपुराणोक्ते दूवांगणंपतिब्रतम॥ 
अथेकविशतिदिन॑ गणपतिपजनब्रतम्‌ ॥ तलब श्रावणशुक्लचतुर्थीमारभ्य श्रावणकृष्णद्शमीपर्यन्तम्‌ | 
तत्र चतुर्थी मभ्याहृव्यापिनी आह्या ॥ अथ पूजा--एकदन्त॑ झाूर्पकण गजतुण्ड चतर्सजम ॥ 
पाशांकुशधर दव मोदर्क बिश्वल करे ॥ ध्यानम्‌))। आगच्छ जगदाधार सुरासुरवरारचित ॥ 
, अनाथनाथ सर्वेज्ञ गीवाणपरिपूजिता। आवाहनम्‌ ॥ स्वर्णसिंहासन दिव्यं नानारत्नलमण्वितम ॥ 
समपित मया देव तत्र त्वं सखुपाविश ॥ आसनम्‌ ॥ देवदेवेश सर्वेश सवंत्तीथोहतं जलम ॥ 
पाद्य रहाण गणप गन्धपुष्पाक्ष तेयुतम्‌ ॥ पाद्यम्‌ ॥| प्रवालमुक्ताफलपूगरत्नताम्बलजाम्बूनद्मछ- 








दृक्षिणगासहित गणराजकी मृतिका दाने करता हूँ, आप | चाहिए | मद्ादे वजी कातिकेयसे कहते हैं कि, यह सब 


स्वीकृत करिएगा और तुम्हारे “अस्तु परिपूण ते'' हे सुब्रत! | सिद्धियोंका देनेवाढा दूर्वांगगपतिक्ा ब्रत तो कह दिया। 


आपके इस वचनसे यह मरा किया हुआ दूवोगणपत्रिका | 
ब्रत सम्पूर हो, यह दानका मन्त्र है भथवा जिस किसी | ढैँआ दूवॉगणपत्रिका जब्त पूरा हुआ ॥ 
भी महीनेकी शुक्छूपक्षवाल्वी चतुर्थी हो उसी द्नि जिंत- | 
द्विय हो दूर्वांगणपत्िके ब्रतकों करे, फिर पांच वर्षत्रक | 
करके उद्यापनकरे | इस प्रकार इस सोद्यापन ब्रतका करने | 
वांछा, इस छोकमें वाहइिछितपदा्थोंकों तथा देहके अन्‍्तर्म 
शह्भूरके पदको पाता है; तीन वर्षतक इस त्रतको करनेसे | 


सब सिद्धियाँ मिछ जाती हैँ । जो विना उद्यापनके इस त्रत 


को करना चाहे, हे पडानन | उसका प्रावरखान सफेद | 
तिलॉसे होना चाहिए, विधिविधानको जाननेवाले ब्रतीको | 
चाहिये कि, सोनेकी अथवा चांदीकी गणपतीजीकी मूर्ति | 
बनवाकर पञ्चगव्यसें स्वान कराके दूबसे पूजन करे, हे- 


शिखिध्वज ! वो पूजन दुश मन्त्रोंसे दो दो दूवाओंसे 


लिए नमरकार है, हे अधैनाशन ! तुम्हारे छिय_ नमस्कार 
हे ५4 अर ० टच 
हैं; है विनायक ! तुम्हारे किए नमस्कार है, हे ईशपुत्र ! 


तुम्हारे छिये नमस्कार हैं; है. स्सिद्धि्रंदायक ! तुम्हारे | 
लिए नमस्कार है, है एकदुन्‍त ! तुम्हारे छिए नमस्कार है; | 
है इस्वक्र | तुम्हार छिए नमस्कार है; हे मूषकर्वाहन | | 
३ ! | पायको स्वीकृत करिये ! “प्रवाछ” इससे अध्येदान करे; 


तुम्हारे लिए नमस्कार हैं, हे खामिकातिकके बड़े भाई ! 


तुम्हारे लिए नमस्कार है, इस प्रकारस दश नाम मन्त्रोंको | 
' अछग अंछंग कहता हुआ दशवार दूर्वाक्रे दृछ्ल चढ़ाने 





अब ओर क्या सुनना चाहते हो ? यह सौरपुराणका कहा 


' अथ इक्कीस दिनवक गणपतिके दूवादिस पूजन करनके 
ब्रवको कहते हैँ -यह इक्की हैं दिन पशथ्येन्‍्त गणपति पूजन 
नामक ब्रत, श्रावणसुदि चतुर्थीको आरम्भ करके भाद्रपद 


| वदि दशमीतक करना चाहिये । इस ब्रतमें मध्याहृव्यापिनी 


चतुर्थी अहण करनी चाहिये। पूजनविधि कहते हैं-““एक- 

न्त” इससे ध्यान करे, इस मन्त्रका यह अथे है कि एक 
दांववाले, शुपसद॒श कणवबारे, गजसह॒श मुखबाले, चार- 
भुजाबाले, पाश ओर अकुशघारी तथा अपने दाहिने हाथ 
में मोदक छिए हुए गणपति देवका में ध्यान करता हूँ। 
“आगच्छ” इस मंत्रसे आवाहन करे, इसका अथ यह है 


| कि, है जगदाधार ! हे देव और दानवोंमें श्रेष्ठ. जो देवता 
भक्तिपूवंक करना चाहिये, यानी दो दो दूबाओंसे दस | 
मन्त्रोंसे पूजा तथा दूवा युक्त परश्चेगव्यस स्नान कराता | 
चाहिये, दुधा चढानेके दशनाम मंत्र स्कन्दपुराणमें कहे हैं | 
है गणाधिप' तुम्हारे लिए नमस्कार हैं; हे उमापुत्र! तुम्हारे 


ओर दानव हैं उनके पूज्य | हें अनाथोंके नाथ ! हे सर्वेज्ञ ! 
आप यहां. पधार 'खण” यह आसनपर बैठनेका मन्त्र है, 
इसका अथ यह हूं कि, हे देव ! मैंने आपके विराजमान 
होनेके लिए नाना रत्नोंसे जठित दिव्य सुबंणके सिंहासन 
को समर्पित किया हैं आप उसपर विराजमान हों, “देव- 


| देवेश” यह पाद्यदान करनेका मंत्र है; इंसका अथ यह है 


कि, है देवदेबोंकि भी इंश्वर | हे सर्वेश्वर | आपके प:दच्चक 

छन करनेके किए सब तीथासे जल छाया हूँ, इसमें गन्ध 
शा उ * कं रा 

तथा अक्षत भी मिला दिये है, अतः हे गणपते ! आप इस 


इसका यह अथ हू कि; हैं अमोघशक्ते ! झूँगा, मुक्ता, उत्तम 
घुपारी; ताम्बूछ, सुबण, अष्टगन्ध और पुष्प, अक्षवोंसेयुक्त 





मिड लि 
>जातअननन भरिधातणत 


अतराजः | 


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पम्थय्‌ ॥ इष्ाकन्‍कममोघदात्ते दे मयाव्ये सफलीडरुष्य ॥ अध्येम्‌ ॥ गड़्ादिता 


निर्येश्ध आनीते तोयमुत्तमम्‌ ॥ क्पूरेलालबड्धेश्व उक्तमाच्यम्यर्ता विजो ॥ ऋचवसूरए: 
ह:झोहवकुलमालतीमोगराद्मिः ॥ वासित॑ स्निग्धताहेत॒स्तेल चार प्रमुहाताम्‌ ॥ 
ग्तातम ॥ कामधेलससुदूनूस सर्वे जीवन परम्‌ ॥ पावन यश्षहे 


॥ चअम्प- 
अभ्यड़- 
प्रयः स्नानाथमार्पितिम ॥ 


+ श़ृ + ४: हक ने | के ति 
पय/स्‍्तानम्‌ ॥ पयसस्तु समुदुभू्त हिमादिदवव्ययोगतः ॥ दध्यानीत॑ मथा देव स्मानाथी प्रति- 


गद्ाताम ॥ दुधिश्तानम्‌ ॥ नवनीतससुत्य्त॑सर्वसम्तोषकारकम्‌ ॥ यज्ञाडू 
प्मग्स्थभर्पितम,॥ बुतस्नानम्‌ ॥ पृष्पसारसखुदभूत॑ मक्षिकान्निः 
दब भव स्तानाथमर्पितम्‌ मधुस्तानम्‌ ॥ इशुरससमुद्भूतां शर्करा 
“हमने गृहाण त्वे। मयापिताम ॥ शर्करास्मानय ।। 


ह ०५ 

इाभयसंयुत्त ॥ मधुपको 
प्श्र 6 

परम आश्नया विज्लो ॥ 


ड्रंछ 2: 


देवताहतोपत 
कूल च चत्‌ ॥। सर्वतुष्टिकर 

सुमनोहराम्‌ ॥ मलापह- 
सवभाधुग्रत। हेट। सवाई: सवाप्रियडर:॥ 





प7 स्वानुमानीत इकुसारभवों गुडः ॥ झुडस्तानस ॥ काँस्ये हरे पिछितों दधिम- 
+ नया नीतः पूजाथें मत्ियुद्धताम्‌ । मधुपर्कम ॥ 
सुवाधित गृहाणेदं सम्पक स्नाल॑ सुरेश्वर ॥ 
'अकोटजानिवारणम्‌ ॥ अनर््यमतिसूक्ष्म॑ व गहाणेद 
वे रजकाचनंसंयुतम्‌ ॥ मकक्‍त्योपपादित देव गृहाण 


सयतीर्थाहत॑ त्ोग॑ 
स्मानम्‌ ॥ रक्तवस्थ्थुर्ग देव 
मयाप्तम्‌ ॥ वल्यम्‌ ॥ राजलसं॑ ब्रत्मसूत्र 
समेश्वर ॥ यज्ञोपवीतम्‌ ॥ अनेकरल- 


कानि भूषणानि बहूनि थे ॥ तत्तदड़े काथनानि योजयापमि लवाज्ञया ॥ भूषणम्‌ ॥ अष्टगन्ध- 


उनः : 5 रक्तचन्डनप्तुत्तमम ॥ द्वादशाड्रेष ले 


'भफ/2०उ40808७.५ "प८:.. 24 ॥084.' 





पकड़ केरो। बाज्रादि इस मन्त्रसे आचमन कराने इसका 
(है अक्ष हैं कि, है विभों! आपके आचमनके छिये सब 
।वित्र तोथीस पत्रित्र जछ, कपूर, इछायची, और छवंग 
"छ/के छाया हूँ आप इसक्रा आचमन करें। _चम्पका- 
पाक: इस मन्त्रस अतर लगाता हुआ स्तान करावे, इस 
गन्यका अथ यह है कि; चस्पा, अशोक, मोलसरी,मालती 
भौर मोगरा आदि पुष्पोंकी सुगन्धसे पूण, क्लिग्ध करने 
पाला पह सुन्दर अत्तर है; इसको आप स्वीकृत करें। 
“कामदेधु” यह दुग्धसे स्नान करानेका मंत्र है, इसका 
।थ यह है कि, कामना पूणेकरनेवाढी गौका यह दूध सब॒ 
'णियको जिलातेबादा तथा पत्रित्र करनेवाढा एवं यज्ञक्के 
योर हैं, आपको स्तान करनेके लिए इसे छाया हूँ, 
४गप भपन स्तानके लिये स्वीकार करिये । “पयसस्तु” इस 
४7 इविस्ताव कराबे; इसका अर्थ यह हैं कि, हे देव ! 
* 7 -माकर यह दवि तैयार किया है, इसमें शीतढता 
२47 ऊ/नंवराढ़ पदार्थोकों मिलाया हे, इस प्रकार बहुत 
उत्तत पह दृधि, आपके स्नानार्थ छाया हूं, आप इसे स्वी- 
द्र्त कु | 3, 3003 शतसनानकराबे, इसका अभय 
पह है के, मस्खनसे सिक।| आ ष््ि 





। धीमा गन डः' 


भ> अंध्य मेसे आपको दिया है, आप इसे अज्ञीकार करके 


| चाहिए, इसक) यह अर्थ हेकि, हेदेव 


देव लेपयामि कृपा कुद ॥ अन्दनस्‌ ॥ रक्त- 





अथ है कि, आपके भेलाको दूर करनेके लिय इस इंख़के 
रसको वनी हुई शर्कराको अपित करता हूं आप ग्रहणकरें । 
“सर्वेमाधुय” इस मंत्रसे गुडसे ने। इसका अर्थ 
ध इसे स्नान कराने, इसका 
पह हैं कि, सब पदा्थोर्मे मधुरता उत्पन्न करनेवाला अत" 
“व सबको प्रीतिकरनेबारा, इंखके रससारका बता हुआ 
पृष्टिकारक हू झुड आपको स्तान कराने छाया हूँ। 
' फस्ये”! इससे मधुपक प्राशन करावे, कांसेके पात्रमें 
फासक हो पान्रसे ढककर दधि, सहत जोर घृतसे संयुक्त, 
पक आपके पूजनेके छिये छाया हूँ, आप इसे स्वी- 
हवे करें, इस मन्त्रसे मधुपक आशन करावे। “सर्व” इस 
५ +  थजे स्नान कराबे, इस सन्त्रका यह अथ है कि, 
हू विभो | यह जढछ सब तीयसे छाकर झुगंधित किया हे- 
+ अर : आर्थना करता हू कि, आप इसे अज्भीकृत करके 
भलीभांति स्तान करें; “रक्त? इस भन्त्रस छाल रड्के;दो 
जे धारण करावे, इसका यह अर्थ हेकि, हे देव ! ठोकछाजं 
का निवारण करनेवाले अत्यन्त पृक्षम, बहुमूल्य इन छाल दों 
का आप अज्ञीक्त करें, मैने आपके भेट कि एह। स्तन 
५ जंवर्णयुक्त चांदीके तारोंका यह यज्ञोपवीत है, है देव! 
 रमबवर ! सन यह आपक्ने भेंट किया है, आप इसे घवी 
कैत कर । अनेकरत्न”' इससे आभूषण बारण कराने । इसे 
“>त्रकी यह अथ है कि, आपके उस उस अज्भपर इनअनेक 
रतन जटित झुबर्णक आमूषणोंकी आपको अभ्यनुज्ञालेकर 
पारण कराता हूँ। ४ अह्गन्ध ” इससे चन्दन ढछगाना 
व | आपके छछा&गरीचा 


डाद्श अगॉपर अष्टगन्धबाढ़े छाहु चेन्दूनको छगाता हैँ! 





टा&8 820०. .442530 ००९४६. ३०३००. ७४५ >४-७६४४७ 
का 


४ कक ध्पप्ज्प्फज 2८ उछट, 


! (१९०३८ 2७.< 3-४... ०8 "2 &४+म "पूछ »)०३+०आ+ लक 
लश््््णञ्प्थपल््श्े््श्ल्कर 





नानापडुजपुप्पेश्व अधथितां पलवरपि 


नाथ० ऊरू पू०। लंबोदराय"० वक्षस्थलं पू० 


भाषाटीकासमेलः । 
परे ॥ शोभाय संप्रदास्थामे गहाण जगदीखर ॥ अध्ललाव* 
पाठल कणिकारं च बन्धूक रक्तपड़जम्‌ ॥ मोगर मालतीपुष्पे शहामतां भुवनेश्वर ॥ पुष्परि 
वपत्रयुतां मालां गह्दाण सुमनोहराम 
अथाड्रपूजा--गणेशाय पादों पू०गोरीपुत्राय० गुल्फी पृू० । विशेश्वराय० जालनी पू० ! ८ 5 
जुनाथाय० स्तनों पृ० देमाठुराय० कण्द 








दि 
हि 

+ई ] 
। 

4 ४ 


कलल्‍मभ३ 


बक्रतुण्डाय० शिरः पू०अधथेकर्विशतिपन्ररुजञा--गणाविपाय० धगिराजपत्र स्ू० । उम्र “५० 

बिल्वप्नस० । गजाननाय० दूवोपत्र स०। लबोदराय० बदरीपने स॒० । हरसूनवे० मधुपचे «० : 
गजवक्काय० तुलसीपत्र स्० । गुहाम्रजाय० अपामार्गंपत्र स० । एकदन्‍लताय० बहलीप रू- - 
इभमवक्ताय० शमीपत्र स० | विकटाय० करवीरपत्र स० | विभायकाय०्अश्वत्थपत्र॑ स॒० : रादि 


लाय० अकेपत्र स० | बटदे नमः चंपकपत्र स० 


विष्णुक्रान्तापर्त स० । सुराधिपनये० देवदारूपचन॑ 


अन्वयप्रदाय० अज्ञनपंत स०  पत्नीहिंला: 
| मालच-नद्राय० आगरशूपनच स० 


वतदूवापचस० शुपब्नणाय० जाती पंत्रंस ० | सुरनपथधाय ० धलरपचेस ० । एकदन्तायण कूलकीपफर- 


अथकावशांतेनामपुंजा--गजाननायनमः । विन्वराजाय ० । लेंबोदराय० । शिवात्म॑ईायण! चड 


है:+औ7 १ “यु 


ठुण्डाय० । शपंकणोय०। कुब्जायथ० | विनायकाथ० | विश्ननाशनाथ० । विकटाय० बॉसलप्ट 


सवातिनाशिने०। प्गवतेन० । विश्नह 


आप क्ृपाकंरे | 'रक्तचन 


या तर ; 
इसका यह अर्थ है कि, है जतई छाल चन्दर्स रंगे 
हुए, इन अक्षतोंकों आपके दिककोंकी शोभा वृद्धिके छिये 
तिलकोंके ऊपर चदाता है, भाप अक्लीकार करें, “ पांदले 


भु 
शा 


7 


कर्णि” इससे पुष्प चढाबे; इस मम्त्रका यह अथ हे कि 
पाटछ, कर्शिकार, बन्धूक, छाछ कमछ; सोगरा और 
मालती इन पुष्पोंकी हे शुबनोंके इश्चर ! स्वीकृत ऋरि 


४९ 
“जाना” इस मन्त्रस साछा पहरादे, इसका यह अर्थ है क्कि 
विविध कप्नछके पष्पों फोसछ राविरव्सों तथा विच्यपत्रॉसे 
गूथी हुईं इस सुन्दर माठाकों अज्भीकार करिये। फिर 


/ गणेशायन्रमः षादों पूजयामि ?” इत्यादि नाप मन्त्रोंसे 
तंत्तत्‌ अड्ञोंकी पूजाकरे, इनका यह अथ है कि गणेशके छिये 
नमस्कार है, मं उनके चरणोंका पूजन करता हूँ | गौरी3 
त्रके लिय नमस्कार है, गुल्फोंका पूजन करता हैँ | विश्वे- 
श्ररके लिये नमस्कार ह; जानु पूजता हूँ | गजाननके छि 

नमस्कार है ऊरू पूजता है | रूम्बोद्रके छिये नमस्कार है 
वषह।स्थछुका पूजन करता हू, गणनाथके लिये नमस्कार हैं 
स्तनॉको पूजता हूं। द मातुरके छिय नमस्कार है, कण्ठका 
पूजन करता हू | वक्रतुण्डके लिये नमरकार है, मस्तककी 
पूजा करता हूँ |! इककीस पत्रोंसे पूजा-गणाधिपाय नम 
भृद्धिराजपत्र समर्पयाि! गणाधिपके छिय. नमस्करर, 


अव्शयण संबइबाधिदेया धघू०। एच्जदइलादा0 : 









भ्रद्धिराजके पत्ते चढाता हूँ । उम्रापुत्रके लिये नमस्कार, 


बिल्रपत्र चढाता हूं। गजाननके किये नमस्कार दूवके पत्ते 
चढाता हूं । छम्बोदरके लिये नमस्कार, बदरीक पत्ते चढाता 
हूँ ! हरसूनुके छिय नमस्कार, मधुक पत्ते चढाताहूं | गजब 
कक किय नमस्कार है, तुलसीके पत्ते चढाता हूँ । कार्विके 


१४ विश्नहन्ता, १५ घूम्रक, १६ सब देवाधिदेव, १७ 


जन्‍ पते कं 
न्‍ है ॥॥ ॥ ह। तन 
पक > 


लिये नमस्कार हें, क्र 





करे ब्यजआत अपासागक पर 
चढाता हूं । एकदन्वके छिये तमतकार हैं, बृइतीके एच 
चढाता हूं । इमबऋक लिय नमस्कार है, झंमीपतन्नोंकों सम्त- 
बित करता हूं [ विक्ट के छिये ममम्कार हें, कमेस्फ पे 
यढाता हूं ।विनायकके लि समस्कार है, पीएछके परे 
समर्षित करत छके लिये नमस्कार हैं, ऋषकक एच 
चहःता हू । बहुरूप घारीकू लिये वमस्कार है, चस्यकृदे- 


फ़्‌ हक] 


संयके देनेबाऊुऊ लिय नमस्कार हूँ, 5 
[ हु । पत्तीदितहे हिये तमपकार >: 
ला हूँ।सुराधिरतिक किये नसत्झार <. 
देवदारुके पते चढाता हू । भांउबन्द्रके छिये नमः ३. 
अगरक पत्र संपषित करताहू । हेरम्डके लिये रूपा: र - - 
सुफेद दृबकेःपत्त चढाता है | शूपकणक छिय तलाःदार हे 
जञातीक पत्रोंको समर्पित केरतः । देवताओंके जाधिय 
सिक्के छिय नभस्कार है. धन्तरेके ५ ' चढावा हूँ | एक उनसे: 
लिये नमस्कार है केतकीपंत्र समर््ित करता हूं । यह इकीस 
पत्रोंसे पूजा पूरी हुईं अब इक्कोस नामॉँसे पूछा कड्टते 3 
गजाननाय पुष्प सम्पेयामि! इत्यादि इक्कीस साम 
मन्त्रोंस इककीसवार पुष्पसमर्पित करे | इनका यह ऋई 
हैं-गजाननके लिय पुष्पाप॑ण करता है । ये इक्कीसों :+ 
प्रायः वेही हैं, जो पत्र पूजामें आचुक हैं पर क्रम 
तथा कुछ नये नामभी है इस कारण फिर छिखते 
गजाबन, २ विन्नराज, ३ लम्बोदर, ४ शिवास्मज, 5 बक- 
तुण्ड, ६ शुपेकण ७ कुष्ज, ८ विनायक+ ९ विश्नना 

१० विकट, ११ वामन, १२ सर्वातिताशी, १६ भगवान ; 


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दृन्त, १८ कृष्णपिंग, १९ आरूचन्द्र, २० गरणेश्वर. २५ 






पिड्राय” | भालचद्धाय? । गणेश्वराय० । गणपाय० । पुष्पं स०॥दशाडू 5० सर्वेसोग- 
न्ध्यकारकम्‌ ॥ सर्वपापक्षयकर॑ हाण त्व॑ मयापिंतम्‌॥ ध्रूपम्‌ ॥ सर्वेज्ञ स केश तंमो- 
नाशनमुत्तमम्‌ ॥ गृहाण मड़ल दीप देवदेव नमो$स्तुते ॥ दीपम्‌ ॥ न कम पयसं 
शर्केरास्वितम्‌ू ॥ राजिकाधान्यसंपुक्त शर सतक्रकम्‌ ॥ हिंगजीरककृष्माण्डमरी- 
चमाषपिष्टकेः ॥ संपादितेः सुपक्वेश्र भजितेवेटकेयुंतम्‌ ॥ मोदकापूपलड्डूकशप्कुछीवटका- 
दिभिः ॥ पर्षटे रससंयुक्तेनेविद्यममृतास्वितम्‌ ॥ हारिद्राहिंगलबणसहित सूपसुत्तमम्‌ । । मया 
निवेदितं तुभ्ये गह्ाण जगदीश्वर ॥ नवेश्यम्‌ ॥ अतितृत्तिकर॑ तोय॑ सुगन्धि बे च पिबेच्छया । 
त्वाये तृप्ते जगन्त्तं नित्यतुप्ते महात्माने ॥ मध्ये पानीयम ॥ उत्तरापोशनार्थ से : दक्षि तोय॑ 

फ है $ त्त ल्‍ 
सुवापितम्‌ ॥ मुखपाणिविशुद्धयथ पुनस्तोय ददामि ते॥ उत्तरापोशर्न हस्तमक्षालन मुखपक्षा 
लनम्‌ ॥ दाड़िम॑ मधुर निम्बुजम्ब्वाप्रपनसादिकम्‌ ॥ द्राक्षारम्भाफल पक्‍व॑ हे ककेन्धूखाजुर 
फलम्‌ ॥ नालिकेर च नारिड्ठर कलिड्रमाजिर तथा ॥ उर्वारक॑ च. देवेश फलान्येतानि गहा- 
ताम्‌॥ फलानि ॥ कस्तूरीकुडकुमोपेत॑ गोरोचनसमन्वितम्‌ ॥ गृहाण चन्दन चारू करोड्रोद्र्तन ः 
शुभम ॥ करोद्त॑ंनम)। नानापारिमलद्रव्येनिमितं चूणमुत्तमम्‌ ॥ अबीरनामर्क पुण्य गन्धि चारू 
प्रमहताम ॥ नानापरिमलद्गव्यम्‌ ॥ नागवल्ीपत्रपूगचूर्णवादिरचर्रयुक्‌ । एल्छालवडुसं- 
मिश्र ताम्बूल प्रतिगह्मताम्‌ ॥ ताम्यूलम ॥ न्यूनातिरिक्तपूजायां संपृर्णफलहेतवे ॥ दक्षिणां 








गणप, ये इक्कीस गणेशजीके नाम हैं इनमेंसे हरएक | भोजनके बीचमें जल्पान करावे. इस मम्त्रका अधे यह है 
नामके साथ ' “के छिय नमस्कार ! छगाकर पुष्प चढाने | कि आप इस अत्यन्त तृप्तिकारक घुगन्धिवत जछका यथेष्ठ 
चाहिये। आदिये ओमू, अंत्मे नमः” 30 कस पानकरो सदा ठृप्त रहनेवाले महात्मा (परमात्मा ) जो 
छ्‌ $ 
६८ 39400: ₹303%5%2 से बे करे, इस | आप हैं आपकी तृप्ति होनसे सब जगत्‌ स्वतः तृप्त होता. है। 
मन्त्रका अं यह हे कि,सर्वेत्र सुगन्धी करके सबके पापोंकों | फिर उत्तरापोशन करावे, उत्तरापोशन पीछे पीनी हाथ 
क्षीण करनेवाले दशाड्र गूग़छवाल्ी धूपकी सुगन्ध मेंने की | घुछाना तथा मुख धुलाना है उसका “ उत्तरापोशन ” यह 
हैं, आप इसे स्वीकृत करें। “ सर्वज्ञ ? इसस -वीपक करे, | मन्त्र हे-इसका अर्थ यह है + , आपके भोजनोक्षर आच- 
अथ यह हे कि हे स्वज्ञ | हे सब लोकोंके ईश्वर | हे देव- | मनके लिये सुगन्धित जरूदान करता हैं, और हाथ एवं 
देव ! अन्धकार नष्ट करनेमे मुख्य ! इस माह लिक दीप मुख प्रक्षाइनके लिये जल देता हु । “ दाडिमम्‌ ” इस 
ककों ग्रहण करो, आपको प्रणाम करता हू । “लाता” इस | सन्‍्त्रसे नानाविध फल चढावे, इस भन्त्रका अथ यह है कि 
चार सन्त्रोंसे नेवेथ चढावे, इनका यह अर्थ हे कि विविध | पका मीठा दाडिस, नींबू, जामन, आम, पनस ( कटहल ), 
पृक्‍वान्न ; शकेरामिश्रित पायस, राई धनिया पड़ा हुआ | द्राक्षा, केला, बेर, खजूरके फछ, न रियल, नारिंगी ओर 
तक संयुक्त पिसी मेथीका रायता बनाया गया हे, हींग कलिज्ञ देशके अंजीर, तथा काकढी ये सब आपको सम- 
जीरा कृप्माण्ड और मिरच पड़ी हुईं उरदकी पिडीके बडे | पित करता हूं, है देवेश ! आप ग्रहण करिये “कस्तूरी” इस 
कि धीमें यहाँलक सेके गये हैं कि सँजसे गये हैं, मोदक, मन्त्रसे करोद्वत्तेन करावे, यानी दोनों हाथोंकी अनामिका- 
अपूप, छट्टडू, जल़ेबी, वटक और रससयुक्त परटोंसे अम- | ओसि चन्दन चढावे इसका अथ यह है कि कस्तूरी, केसर, 
तके समान हो रहा हे, हलछदी, हींग और नमक पडी हुई तथा गोरोचन मिले हुए चन्द्नकों ग्रहण करो / यह आपका 
उन्‍्दर दाल तयार हैँ इस नेवद्यकों में भक्तिभावके साथ | करोह्तंन है “नाता” इससे अबीर चढावे » इंसहा अर्थ 
आपको निवद्न कर रहा हूं है जगदीश्वर | आप ग्रहण | यह है कि विविध सुरगंधित परिमलद्र॒व्योंस सुगन्धित यह 
फरिये। “ अ तितृप्ति” अत्यन्त ठृप्ति करदेनवादे सुगन्थित | सुन्दर अबीर है, आप ग्रहण करिये ८ नागवल्ली ” इससे 
पानीको यथट्ट पीजिय स्वतः तृप्त रहनेवाले जो महापुरुष | पान सुपारी चढावे, इसका यह अर्थ है कि सुपारी, कत्था; 
के सम इनिपर ड६२५ कक इस | कपूंर, इलायची, रूबंग इन सबसे मधुर हुआ यह ताम्बूछ 
के की. छियि गा हर ! उत्तरापोश- | है इसे आप सुखशुद्धिक ढिय स्वीकृत करो » दृक्षिणा 
. उत्तरापोशन कर जा हैं इससे आप चढाता हुआ ' न्यूनाति/” इस मन्त्रको पढ़े इसका 
बे भोज हे येख और हाथोंकी जुद्धि कर लीजिये। | अथे यह है कि पूजा जो न्यूनता रहंगयी हो 
रन लिया गाज है पर कल पालन मोर था जो जोर छठ हो गया शो शो का 
' ते इस सन्त्रसे | तथा पूजनके सम्पूर्ण फलकी प्राधिके 9 ७ ३०१० ) 


आल मे भाषादीकासमोतः । (१३३) 






काथ्नीं देव स्थापयामे तवाप्रतः ॥ दक्षिणाम्‌ ॥ सितपीतेस्तथारक्तेजेलजेः कुसुमः शुभ 

प्रथितां सुन्दरां माला गृहाण परमेश्वर ॥ मालाम्‌ ॥ हरिताः चेतवर्णा वा पश्यत्रिपत्र॒संयुताः ॥। 
दूवाकुरा मया दत्ता एकर्वेशतिसंमिता+ ॥ गणाधथिपाय०।दूवाकुरं समर्पे० । इमापुबाध "अभय- 
प्रदाय० | एकदुल्ताय०। सूषकवाहनाय ५ विनायकाय०। इंशपुत्राय० इमवक्काय ० सवोसेद्धिप्रदा- 
यकाय०। लम्बोदराय०। विप्नराजाय०। विकटाय० । मोदकापमियाय० । विज्ञावध्व॑ सकते ० | विश्वव- 
न्याय० | अमरेशाय० । गजकर्णकाय० । नागयन्षोपवीतिने० । भालचन्द्राय०। विद्याधिपाय० । 
विद्याप्रदाय दूवीकुरं समपेयामि | इति ॥ गणेशं हृदये ध्यात्वा संबवंसड्ृष्टनाशनम॥ एकविशति 
संख्याकाः करोमि च॒ प्रदक्षिणा; ॥ प्रदक्षिणा:॥ आओंदुम्बरे राजते वा कांसये काथ्चवनसम्भवे ॥ 
' पात्रे प्रकल्पितान्दीपान रृहाण च पुरोपितान ॥ विशेषदीपान्‌ ॥ पश्चाततिक्यं पश्चदीपदीपितं 
परमेश्वर ॥ चारू चन्द्रमस दीप गहाण परमेश्वर। पञश्चातिक्यम्‌ ॥ कप्रस्य मया देव दीपस्ते5य 
निवेदितः ॥ यथास्य नेक्षतर भस्म तथा पाप॑ विनाशय ॥ कप्रंदीपम ! स्तोबेनानाविधेः सूक्तेः 
सहस्ननामभिस्ततः ॥ उपबिश्य स्त॒वीतेन कृत्वा स्थिरुतरं मनः॥ दीनानाथदयानिधे खुरगणः 
संसेव्यमान ह्विजेबंहोशानमहन्द्रशेषगिरिजागन्धर्वसिद्धौः सतुत ॥ सवारिष्टनिवारणेकनिपुण 
बलोक्यनाथ प्रस्तो भक्ति मे सफलां कुरुष्व सकलासक्षांत्वापपराधान्मम ॥ आवाहरन न जानामि 
न जानामि तवार्चनम॥ विसजेन न जानामि क्षम्यतां जगदीश्वर ॥ क्षमापनम्‌ ॥ गोरीखुत 
नमस्तेषस्तु सर्वतिद्धिदायक ॥ सर्देसड्ष्टनाशाथमन्‍्य मे अतिखछाताम॥ अनेनएकरविशत्य ध्यान 
'दद्यात ॥ कृतपूजाणाः साडतासिद्धयथ बाह्मणाय वायनभदाने करेष्ये इंते सद्भूल्प्य त्राह्मण- 





| दीपक समर्पित करने चाहिये। पथ्चार्तिक्यम्‌ हे परमेश्वर ! 
| चांदकी चांदनीकीसी चमकवाले; पांच दीपोंसे दीपित इस 
हिल न & ए 8 ७ पे कज,! कक 
सफेद,छाछ कमढोंके पुष्पोंकी गूथी हुईं इस सुन्दर मालाको | पंचादिक्य दीपको प्रहण क रिये। इससे पंचार्तिक्चका निव- 
धारण करो | “हरित” दरित या सफेद वर्णके, पांच या | दुन करना चाहिय।“'कपूरस्य' है दंव: से कपूरका दीपक 
कप का क ५ शक से ७ कल ५ 
तीन पत्तेवाले दूबके इक्कीस अकुर मैंने आपके मेंट किये | आपकी भेंट किया है जसे इसकी भस्म नहीं दीखती इसी 


हैं, इस मंत्रको पढकर ' गणाधिपाय नमः दूवाँकुरं समप॑- | तरह मेरे पापोंको भी इस तरह सिटादे कि फिर न दीखें, 
यामि ' इत्यादि इक्कीस नाम सन्त्रोंकी पढता हुआ हरे या | 


हम हि | इससे कर्पूरका दीप देना चाहिये । इसके बाद आसनपर 
सफेद व्णकी पांच या तीन पत्तेकी दूब इक्कीस वार ओम | बैठ, एकाग्र चित्त होकर अनेक तरहके स्तोत्र, सूक्त,सहस्न- 
गणाधिपाय नमः दूबकुरं समर्पयामि-गणाधिपक लिय | नाम और नामस्तोत्ेस गणपतिकी ह्तुतिकरे, और “दीना- 
नमस्कार हैं दुर्वाकुरोंका समपेण करता हूं। ओम उमा- | 


की कीओ हाय | नाथ”इत्यादि मन्त्रोंको पढता हुआ साजलि अपराध क्षमा 
पुन्नाय नमः दूवोकुर समपञ्मामि-उमापुत्रक लिये नमस्कार | करावे इसका अर्थ यह है कि, हे दीन एवम्‌ अनाथोंपर 
हे दूरवाकुरोंका समपंण करता हू ! इसी तरह अभयश्नद, | दयाक समुद्ररूप हे सुरगणोंसे सेव्यमान |! है द्विज (आह्ायण) 
एकद्न्त, रुषकवाहन 9 विनायक, इंशपुत्र; इभवकऋ, सच । और अह्या महादेव ५ देवराज; झोष, पात्रती, गन्धवे तथा 
सिद्धि प्रदायक, ढम्बोदर, विन्नराज, विकट, मोदकप्रिय, | सिद्धोंसे स्तूयमान ! हे समस्त अरिष्टोंके निवारण करनेमे 
विन्न विध्वंसकर्, विश्ववन्ध, अमरेश, गजकण; नाग यज्ञो | अत्यन्तचतुर ! हे जिछोकके सबप्राणियोंके प्रभो | हे नाथ ! 
पवीतिन्‌ , भालचन्द्र, विद्याधिप, विद्याप्रद, इन नामोंक | सैंसे जो आपकी आराधना की है उस सफर करो और मेरे 


५ छ०७ डे अन्तर [| ५] इन्हें ५ हु 
आदिम “ ओम्‌ ” ओर अन्त / नमः ” तथा इन्हें चतु- | सब अपराधोंको क्षमा करो; में आपके आवाहनकी तथा 


थींके एक वच्रनान्त करक “* दूबाकुरं समपयामि ? छगाकर | पूजा एवं विसजनकी विधिको नहीं जानता हूँ, है जगदी- 
गणेशजी पर दूब चढानी चाहिय। “ गणजश्ञ हृदये०” सब | श्वर | आप इसलिये आवाहनादिकोंकी जटिको क्षमता करें। 
सकटोंके नाश करनेवाले गणेशजीको हृदयमें ध्यान करके | गोरीसुत” इससे इक्कीसबार अध्येदान करे, इस सन्त्रका 
इक्कीस प्रदक्षिणा करता हूँ। इससे इक्कीस परिक्रमाएंँ | यह अथ हे कि, हे गौरीसुत ! हे सब सिद्धियोंके देनेवाले ! 
करनी चाहिये; “ औदुस्बरे ” हे देव! आपके सामने, | आपके प्रणाम है; आप मेरे सब संकटोंको नष्ट करनेके लिये 
चांदी, सोने, तांबे और कांसेके पात्रमें कल्पित किये गये | अध्यंग्रहण करिये इससे२१अघ दे।की हुई पूजाकी साज्ञवा- 
दीपक रखे हुए हैं आप इन्हें स्वीकार करें, इससे विशेष | सिद्धिके लिये ब्राह्मणको वायना देता हूँ इस प्रकार संकट्प 


आपके सम्मुख सुवर्णकी दुक्षिणा भेंट करता हूँ सितपीतः 
इससे माछा चढावे, इसका यह अर्थ हे कि-हें परमश्वर ! 





(१३४) ब्रतराजः । .. चहुनी- 





पूजन कृत्वा | दशमोदकसंयुक्तं वाणक॑ च फलमदमू ! गणेशशीएनाथाय शहाण त्वं द्विजोत्तम। हि 
इति वायन दत्वा साह़तासिद्धये बाह्मणान्भोजयेत्‌ ॥| इत्यकाव्शतिदिनिगणपालपूजा || 
. अगरैकविशतिदिन्यणपतिपूजाबवकूथा ॥ शौनक उवाच ॥ जतसूत महामाज्ञ व्यास विद्याविशारद ॥ 
सड़दे च समुतत्रे कार्यसिद्धिः क्थ नणाम्‌ ॥१॥ सूत उवाच ॥ श्ृणुध्चं भुनयः सर्वे शौनक- 
प्रमुखानधाः ॥ संकष्टनाशन पुण्य ब्रतं वच्मि यथाश्रुतम्‌ ॥ २ ॥ यत्कृत्वा सर्वेकार्याणि सिद्धि 
यान्ति न संशयः ॥ पूजयेच्च गणेश हि एकार्वेशदिनावधि ॥ ३॥ शौनक उचाच ॥ कर्थ पूज्यों 
गणाध्यक्षो विन्नहर्ता गणाधिपः ॥ केन चादों पुरा चीण ब्रतं विज्नहरस्थ च। ४। बद सर्च 
महाप्राज्ञ अस्माक्क विधिप्वकम्‌ ॥ प्रात्तोससि त्व॑ महाभाग्यादरण्ये सच्ममण्डप ॥५ ॥ सूत उद्याच॥ 
एवमेव पुरा प्रल्ञ। घए नुखो बदतां वर: || सनत्कुमारमुनिना ब्रह्मपृत्रण योगिना ।॥ द॥ सन- 
वडुमार उवाच ॥ कातेकेय महाप्राज्ञ देवसेनाधिप प्रभों॥ सड़टातु कथे मच्येज्जनों थे जशान- 
दुर्बेडः ॥ ७॥ श्रुत्वा वाक्य बह्मसूनोः सर्वेषां कार्यगोरबात्‌ ॥ सेनानीस्तु तदा हृषादुवाच च 
महामुनिम्‌ ॥ ८ ॥ स्कत्द उवाच ॥ विश्रवर्य महायोगिन्‌ पार्वत्या मुखतः अलम्‌ ॥ वबदामि 
तद्गत तुभ्यं शरण सब समासतः॥ ९ ॥ केलासभवने रम्ये वसमानो महेश्वरः ॥ स्नातु जगाम 
भगवान्‌ भोगवत्यां यथासुखम्‌ ॥ १० ॥ तस्मिप्रेव दिने अम्बा ह्वभ्यड्रस्नानमारभत्‌ ॥ स्वश- 
रीरान्मलं गद्य तस्य मूर्तिमकलपयत ॥ ११ ॥| सजीवां च पुनः कृत्वा एहि पृत्रेर प्चोदयत ॥ 
अवददे ततो नाम बछवरुत्व॑ विनायकः ॥ १२ ॥ उत्र गच्छ बहिद्ारे तिष्ठ तत्र हृढायुधः॥ 
आयास्यति कद्ाबिद्वे पुरुषो भवनान्तरे ॥ १३॥ त॑ निवारथ निःशडूं यावत्स्नान॑ करोम्यहम॥ 
करके आचायेका पजन करे, फिर “दशमोदक” इस मंत्रस | घूवजी बोड़े कि,ह मुनिवरों! जैसे आप छोगोनि मुझसे प्रश्न 
आचार्यकों दश मोइकोंकः वायता दूँ; इस संत्रका यह अथ | किया है वैसे ही त्रद्माजीके पुत्र योगी सम तकुमार मुन्निन 
ह कि हे द्विजोत्तम | बहुत पल देनेवाडे टश मोदकोंका गम शेष ल्‍ 
तायना; गणेशजीकी ग्रसन्नताके हि मैने आपको दिया है, | 0 ५ 3 पडाननस प्रश्न किया था ॥ ६॥ कि, है 
आप ग्रहण करिये। पीछे पूजनकी सझेपाज् परिपूर्णताक कारतिकेय है महाग्राज्ञ | हे देवताओंकी सेनाके अधीश्वर ! 
लिये ( इक्कीस ) ब्रद्मणोंको भोजन कराना चाहिये । यह | है /भो अज्ञानी जन किस उपायको करनेसे संकटोंसे छूट 
इक्कीप दिन गणपत्तिपूजन करनेदी विधि समाप्त हुईं।.. | तकता है ॥ ७॥ सूतजी शौनकादिकोंसे कहने लगे कि, 
कया अब इक्कीस दिन वय्य॑न्तगणपति पूजनके | *कैंजीके पुत्र सतत्कुमार महात्माने जब यह प्रश्न किया तब 
नतकी “ कथाको ” कहते हैं-शौनक महषिने पूतजीसे पूछा | :>भक उत्तरकों महत्त्वका हेतु मानकर बडी' प्रसन्नतासे 
कि, हू सूत ! है महाग्राज्ञ, है व्यासजीकी विद्याके चतुर- | सवा मिका तिकने महामुत्ति सनत्कृमारको उत्तर दिया ।॥|८॥ 
पण्डित * आप यह बतावें कि जब संकट उपस्थित हो ऐस स्वामी कातिक बोले कि, हे विश्रवर्य ! हे महायोगिन्‌ ! मैंने 
समय भलुध्योंके काये किस उपायसे सिद्ध होते हैं, कहिये | पावेतीजीके मुखसे जो छुत्ा हैं उसी ब्रतको आपके लिये 
सक्षपस्रे कहता हूँ आप सुने ॥९॥ रमणीय केछासमें निवास 


॥१॥ यह सुन सूचजी बोल कि, हे समस्त शोसक प्रभृति 
पवित्र मुनियो! आपछोगोंको संकटोंको नष्टकरनेवार्ध पुण्य | करनेवाले भगवा व्‌ महादेवजी एक समय सुखपूर्बक भोग: 
] सु छा, री 
पती गंगामें स्तान करनेको चल दिये।। १० ॥| उसी दिन 


0... भी यु ५ न 
हा भी हे अं * > कहता हूँ आपलछोग शुनों॥२॥ 
से पुण्य ब्रतकों करनेवाले तय अ ते।अ ने 
हा जो यह पवित्र 2 हज कक सिद्ध होते स्का भगवतीने भी उबटता लगाऋझर स्तान किया 
गणेशजीका पज हि 'प मैंतेम इक्कोस दिव्न ५. | अर अपन शरीरके सरेनसे जो मैछ निकछा, उसे लेकर 
हर हज न करना चाहिये ॥३॥ शौनक मुनिने | उसकी एक मूर्ति बनाली में जीवाः 
हर पूछा कि विश्नोंके हर्ता, गणोंके अध्यक्ष गणाधिप कि , आधा के क ग  वत् । ...इसमें जीवात्माका 
भर |... पक कहा कि, हे पुत्र ! तुम यहां मेरे सम्रीपं 
मर पूजा करनी चाहिये तिन्नहर्ताका यह ब्त 0५3 तीन मात बह मर लेसीपल 
किसने किया है॥ ३३ ३ हे तर महर्तका 'है श्रेत पहिले | आओ, फिर पावतीने नाम भी कहा कि, आप वलग 
पक हमारे हिए कहो 00 विधि- | और विनायक सबको वश करनेवाले हो ॥ १२ ॥ 
बा कक हमारा बडाभारी भार्य है, | हे पुत्र ! बाहर द्वारपर जाओ, वहां हह ३ 
उस जेंगछके यहममण्डपसें आप हमें प्राप्त हुए हैं ॥ ५ | हक रहो कक, कोई उरुष इस भवनके भीतर आधे 
हे 4. *)| में जबतक स्नान करती हूं, तबतक तुम निःशेक 





४-55: 3-+._०>>०+००-७ ४० >०७नननत-न न नननपन मन ननन-न- का ७ ७-० ८५+का 3 ५.७५... 


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50230 726, 00707. 2 0 पी उस के गफ 775 पक 0 भर: 0070 20 (एक काश जप कदर 67 





७४ ड2/ 4४४ ४5%: ४४ 2 ऋष 4४५0३ १७४७५ 2५५५ ५०, ॥ (2४५५८: ६७/२२ ८ पफत:(/ ४८ 





ममाज्ञां गह्य पश्चात्व॑ प्रवेशयितुमहेसि ॥ २१४ ॥ माताज्ञां शिरसि अगमददारदेहलीम ॥ 
मुहर तु समादाय हस्ते बछबनामकश॥१५॥ अरक्षद्वारंदेश स पादेत्याज्ञां स्मरन्‌ बलली ॥ तदानी 
मेष चायातो विद्युत्या चचितो विछुः ॥ १६॥ रूझादे मबनद्वरे शम्भुः सर्वेश्वरों हरः॥ 
देहलीं प्रविशेद्यावद्वोस्यद्वारशे बलों ४१७॥ द्वारपाल्ू उचत्च ॥ कोइसि त्व॑च क्िमर्थ हि 
गम्यते भवने झुने ॥ मात्राज्ञा याति यावत्त स्थावब्यं तावददेव हि॥ १८ ॥ स्कन्द उबाच ॥ 
दारपालबचः शख्षत्वा शम्छः कोपमथाकरोत्‌ ॥ शन्‍>ठुबाच ॥ कध्याज्ञा च मया ग्ाह्मा 


को५लि तवे भावसे कथम्‌ ॥ १९॥ ग्रहीत्वा डमरू हस्ते द्वारपलूशिरोफहरव ॥ माविशच्च 
दवा नाथ रूकात साउचिन्तयत्पावेती हद ॥ बहुधा 





ततस्तूण स्वगृहं पार्बलीवलि! ।२० ॥ 
बाधते क्षद्रे शंकरे कोपकारयम ॥5२१॥ अलंहकृता ४ झुह्नाता पावेती जगदम्बिका ॥ 
पायसन तु पूछे दे भक्ष्यलोज्येत् संयते ॥ २२ ॥ सस्थाप्य पात्र धीठांल -चूतेम प्ितयातज्विते॥ 
पात्रदर्य समालोक्य अवबदत्पाबतों शिव ॥ २३॥ शम्हुदबाच ॥ दिव्य॑ काथनसंचूत॑ 
दर्वीयक्त खुलोबने ॥ भोज्यपात्र तु ऋस्‍्येद स्थापतें च द्वितीयक्र॒मू ॥ २४७ ॥ भोज- 
नाथ द्वितीयोड्य को यालि बंद बछमे ॥ नायाति त्वरयः चात्र विलम्बे कारणं बद ॥ २५॥ 
इति श्र॒त्वा बचः शम्म्तोः सर्वेशस्यथ महखती ॥ भीतिहंबसमाश्क्ता सर्वेक्षमवदत्तदा।। २६॥ 
पावत्युबाच ॥ देवाद्य स्नानसमये उद्धतिनमलोद्भवम्‌ ॥ पुच्च विरच्य च इढो देहल्यां स्थापितो 
मया ॥ २७ ॥ तद्थच द्वितीय वे भाजन स्थतृपत धवमाइति शुत्दा बचस्तस्थाश्रकम्पे प्राकृतो 
यथा ॥२८॥ शिव उवबाच ॥ प्विशउल च॒ मां द्वार॑ं तब पुत्रों न्‍्यवास्यत्‌ ॥ कोइसि त्व॑ बच मया 
'पृष्ठस्लेन नोक्ता तवाबन्रिधा ॥ २९५॥ कोपेन च तलतस्तस्य शिरश्छिस्वा निषातितम्‌ ॥ इति 











होकर उस द्रवाजेपरही रोको । मेरी आज्ञा ढेकर भीतर | पूण ऋर ॥ २२॥ अछग अछग दो चोकियोंपर स्थापित कर- 
प्रविष्टठ करना चाहिय ॥ १४ ॥ सूतजी बोले कि, वह बहुब | दिय जो घृत तथा शकरासे युक्त थे, महादेवजी उस दिन 
विनायक माताजी आज्ञाको शिरोधाय करकर, दरवाजकी | उन भोजनपात्रोंको देखकर बोढे ॥ २३॥ कि; हैं सुलो- 
देहलीपर अपने हाथमें मुद्ृर छेकर खडा होगया।॥ १५ ॥ * चने ! यह दूसरी दिव्य झुवर्णका दुर्वी ( करछुली ) युक्त 


वहांपर खडा होकर वह बीरवल्वब पावेवीकोी आज्ञाका 
स्मरण करता हुआ द्वारदेशकी रक्षा करन छगा, वहांपर 
उसी समय बिभूति छगाये हुए स्वेश्वर भगवान शम्मुदेव 
आ पहुँचे ॥ १६ ॥| जब वे देहलीके भीतर प्रवेश करने छगे 
तो वह द्वारपा उनको रोकता हुआ ॥ १७॥ बोछा कि, 
तुम कोन हो; सुन्दर भवनके भीतर क्‍यों जाते हो, जबतक 
मेरी मॉकी आज्ञा न हो तबतक यहांही ठहरो।॥ १८ ॥ 
स्वाह्लि कार्तिकजी श्रीसनत्कुमार झुन्रिसे बोले कि; द्वारपा- 
छके एसे वचतोंकों सुनकर महादेवजीने कोप किया और 
बोले कि, में किसकी आज्ञाको माने तुम कोन हो बिता- 
जाने कया बक रहे हो ? ॥ १९ ॥ फिर पावतीपति भगवा- 
सूने हाथमें डमरू छेकर उस द्वारपाल श्रीवह्लयनामक विन्ता- 
यकका मस्तक काट डाछा और झट अपने घरके भीतर 
९ हक 
घुस गये ॥ २० ॥ अपने पतिको कुपित हो भीतर आते हुए 
देखकर पावती अपने अन्तःकरणमें सोच करने छगी कि, 
छुधा सता रही हैं इससे आज ये वाराजसे हो रहे हैं ॥२१॥ 
'पावती उस समय स्लान करक अछक्लार घारण कर चुकी 
थी इसछिय दो भोजन पात्र खीरसे तथा भरक्ष्य भोज्यसे 


भोजनसखाली किसके लिये रखी है ॥२४। हे वहभे ! 
भोजनके लिये दूसरा कोन आता है, सो तुम कहो | अब- 
तक आया नहीं,तुमने भोजनपात्र परोस दिया,यह विलम्ब 
क्यों हो रहा है, वताभो)२४।| ऐसे जब महादेवजीने पूछा 
तव वह सतियोंमें अभ्मणी पावंती उन्न सर्वेश्वर भगवानके 
वचनोंको सुनकर भय तथा हषेसे समाविष्ठ हुईं बोही॥२६॥ 
भय इसहिये हुआ कि, मेरा पुत्र द्वारसे कहां चछा गया 
ये भीतर केसे आये और हे इसछिये कि, आज आप मेरे 
पुत्नकों देखेंगे तब ये बहुत प्रसन्न होंगे । पावती बोली कि, 
हे देव ! आज ख्रान करनेके समय उद्धत्तनसे उत्पन्न मेलसे 
सजबूत पुत्र बनाकर मेने द्वाररक्षाके छिय बाहर खापित 
किया था || २७ ॥ उसकेहों छिय इस भोजन पात्रको रखा 
था।किर महादेवजी पावेतीके इस वचरनोंको सुनकर साधा- 
रण जनकी दरह कौप गये । २८ ॥ और बोछे कि; तेरे 
पुत्रने भीतर आनेके समय मुझे रोका,फिर मैंने उससे पूछा 
भी कि तुम्त कौन हो ? पर उसने यह नहीं कहा कि, में 
पावरतीका पुत्र है ॥ २९ || जब तेरा नाम नहीं छिया और 
मेरेको मना किया तब कुपित होकर मेने उसके शिरको 


 ? अड़भावआपषेः: | २ अतिष्ठद्धितिशेषः । 


ब्रतराज! ।. रे कि 











च्क 


( १३६ ) कल अल अप कि कप कप कक पक कक 








हक 


श्रुत्वा तो देवी विद्वला पतिता सुबि ॥ ३० ॥ पार्वेत्युवाच ॥ पुत्र अतीक १-३० 
महेश ॥ तथेव च मम प्राणा गमिष्यन्ति न संशयः ॥ २१ ॥ इत्युकत्व लक हे झि पट 
मित्यवीवदव ॥ पुन) पपात सा भूमों बातेन कद्‌ली यथा ॥ ३ कप क्‍ हर कम हा के 5 ष्ठ भ्े 
त्वं हुःख॑ पुत्राथ मा कुछ प्रिये ॥ अधुना तथ पुत्र हि जीवयामि शिरो वि यामेष 
समाध्वास्य गतो द्वारं स्वयं विशठः ॥ इतस्ततोवलोक्याथ गजो दृष्टो मृतस्तदा ॥ रे४ ॥ निकृत्य 
तन्नागशिरों बल्लव॑ योजयद्विशु) ॥ संजीव्य पल उत्र पा्वेत्त त॑ न्यवेदयत्‌ ॥ ३५ ॥ च्ट्वा 
गजशिर पुद्र॑ पावेती हषनिर्भरा ॥ भोजपित्वा पतिं पुत्र स्वणपात्रे खशोभन ॥ ३६॥ नमस्क्ृत्य 
ततो देव॑ पतिपात्र उपाविशत्‌ ॥ बुुजे तु ततो देवी १ तिशष तु भोजनम्‌ .॥ ३७ ॥ केलास- 
खुबने रम्ये पावेत्या न्‍्यवसद्वि्ठः ॥ अटन्‌ बहु कदाचित्स वृषभेण बलीयसा ॥ ३८ ॥ पावेत्या 
सहितो देवः प्रातवान्नमंदातटम्‌ ॥ रम्यं रेबातटं दृष्ट्वा पार्वती हावद्च्छिवम्‌ | के ॥ पाव- 
त्युवाच ॥ देवदेव महादेव शंकर भाणवहनभ॥ अक्षक्कीडनकामाहं त्वया साद्ध सुरेश्वर ॥ ४० ॥ 
शंकर उवाच ॥ अक्षक्रीडनकामा त्वमासनस्मिन्स्थिय भव ॥ जये पराजये चात्र साक्ष्य 
योजय प्रिये ॥ ४१ ॥ स्वामिवाक्यं च सा श्रुत्वा एरकां गह्म झुष्टिना ॥ नराकृलिमथाकह्प्य 
भाणान्सा समयोजयत्‌ ॥ ४२ ॥ देहं तस्थ च सा स्पृश्य पाणिप्नेन साम्मसा |; लमु॒वाच ततो 
बालमक्षक्रीडां विछोकय ॥ ४३॥ आवाम्यां क्रीडमानाध्यां को जयीति बद : छवम्‌ ॥ इति 
मात॒वंचः श्रुत्वा बालको वे तथेति श्ञोः ॥ ४७ ॥ अक्षक्रीडा समरब्धा पार्बत्या शंकरेण च॥ 
जयो जातश्व पावेत्या शकरस्तु पराजित॥ए५। शंकरस्तुतद उप्च्छत्की जिलो वद बालक ॥ 
अवदद्ालकस्तत्र जितं दबन शूलिना ॥४६॥ पुन; क्रीडाप्रवृत्ता सा साक्षीकृत्वा तु बालकम्‌॥ 











काटकर गिरादिया, पावती यह सुनकर शोकसे व्याकुल हो | श्वृरपर चढकर पार्वतीके साथ इतस्ततः विहार करते हुए 
जमीनपर गिरपडी ॥ ३० ॥ और बोली कि, हे दुँव . है |॥ ३८ ॥ नर्मदाके तटपर पहुंचे पावती नमंदाके तटकों रम- 
भहृश्वर उस पुत्रको जिन्दा करोगे तबही भोजन करूगी, | णीय- देखकर महादेवजीसे बोढी ॥३९॥ कि, ह देव देव ! 
नहीं तो मेरे भी प्राण चले मयंग इसमे कोई 9 5 | महादेव ! हे शंकर ! हे प्राणोंसेमी अधिक प्यारे ! हे छुरे- . 
समझना ।। ३१ ॥ 'हा बहुद अनथ हुआ ”? ऐसा कहती हुई | ३ कम 5 
- ब्छेन ! गे उना चाहती हैँ ॥४०॥ 
शोकसे वारवार भूमिपर इस तरह गिरी जैस बायुके वेगस | गे हक है छि कह किक हे सी आ चाः 
आअका गाछ गिरा करता है ॥ ३२ | महादेवजी पापतीस | *दाददेवजो बोले कि, हैं प्रिये सी मम 
छ कि, है भद्र/तुमः खडी हो जाओ हे श्रिये ! तुम पुत्रके | देती हो तो इस आसनपर स्थिर होकर बेठो ओर जीत तथा 
लिये शोक मत करो, अभी में तुमार पुत्रको जीवित कर- | हारकी निगाह देनेके लिय किसी दुसरेको नियुक्त करो 
ता£, के बह शिर नहीं जीवित करूंगा ॥ ३३ ॥ अपनी |॥४ १ रवासी महादेवजीके ऐसे बचनको सुनकर एक मुद्ठी- 
जिया पावतीको ऐसे आश्वासन देकर , विभु ( महादेवजी ) | भर एरे उपाडकर भजुष्यकी तरह खड़े करदिये, उस एरोक 
द्वार॒पर पहुंचे, फिर २ दूसरेका मस्तक जोडनेके | पुखपें आ्राणोंको भरदिया॥४२॥ पीछे पार्वतीजी अपने हस्त- 
४ तो “नह बहापर की ४त हस्तीका शरीर | कमतमें जढ़ लेकर उससे उसके शरी एका स्पश करके उसके 
बलहवके शरीरसे जिया प्रकार. कटकर | प्रति बोली कि,तुम हमारे पाशोंके खलको देखते रहो॥४३॥ 
े इस अकार बल्लवको जीवित दोनों यहां पाशोंस सेलके दे हो उसकी 
करके पाव॑तीको दे £ हे हि व दार्ना यहा पाशोंस खेलते हू, जिसकी जीत हो उसक 
करक पावतोको दे दिया ॥ ३५॥| पावेतीभी अपने उस जीत और जिसकी ० नाक 
बद्धव पुत्रको गज़ाननके रूपसे ३ । और जिसको हार हो उसकी हार बता देना । माता 
अपने प्रियपति मदादेवजीको क्या" हक बे 5३ और | ऐसे वचन '3गकर उस बालकने कहां ठीक हैं॥ ४४॥ 
पैे दोनों पात्रोंमें भोजन करा || हि उन्दें? झुब- | किर पार्वतीने भहेंश्वरके साथ बृतक्रीडाका प्रारम्भ किया, 
प्रणाम कु. लक » 3 महादेवजी- | उस झतज्रीडामें पावतीका विजय, महादेवजीका पराजय 
| ९ उनक उच्छिष्ट पात्रमें महेश्वरक भोजनसे ५ न से पूछा कि 
बच हुए अन्नका कक ५ 3. | ४५ | तब महादेवजीन उस बालकसे पछा कि, 
के भोजन किया ।॥| ३७॥ महादवजी पावे- | हे बत्स ! हो ग जील हरे मे 
ठीके साथ रमणीय कैलासक शिख न न्दिरपं ह्‌ वत्स हर तुम कहो, किसर्क ले हुई ! उस बारूक 
निवास करन छग | एकवार महादेवजी जठ_.. में | वहांपर झूठेही कहदिया कि, महादंबजीकी जीत हुईं ॥४$॥ 
क्‍ >अ +हाेबजी बढवान्‌ नन्दिके- | तब पाती अपनी हार सानकर उसी बालुऋको साक्षी 


बतानि, 


( १ ड़ ह )) 
अमक, 
ठप आा जम ॥ 8३७77 480 60070 %१४० 

















- भाषाटीकासमेलः । 











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पुनजित तु पावत्या शकरस्त पराजितः ॥ ४७ ॥ बाल पत्नच्छ सा देवी जिते केन वदाइुना ॥ 
पुनरप्याह बालोएसोी जित॑ देवन शलिना ॥ ४८ ॥ हर्षंण च समाय्क्तः पावेती श्राह शैकरः ॥ 
कीडां कुछ महादेवि रोष त्यज शुभानने ॥४९॥ क्वीडति सम पुनर्देवी जितो देव्या स शंकरः ॥ 
लज्जितः शंकरो बाल को जितो बद निश्चितम्‌ ॥ ५० ॥ शंकरं घाह बालोआसो जितस्त्व॑ झुब- 
नांधिप ॥ यालवाक्य समाकर्ण्य पार्वती कोपनिर्भरा ॥ ५१॥ भिथ्या वदसि दुष्टात्मद्‌ पाद- 
हीनो5त्र कदम ॥ पच्यमानोउतिहुःखेन भविष्यसि न संशयः ॥५२॥ वाल उवाच ॥ विशार्प कु 
मां मातवोलभावान्मयेरितम्‌ ॥ इति श्वत्वा वचघ्तस्य मातृभावाइयान्विता ॥ ५३ ॥ पावेत्यु- 
वाच ।। नागकन्या यदा पुत्र पूजार्थिन्यस्तटे शुभे ॥ गणेश प्जयन्त्याथों दृष्ठा पूजाजिधि 
शिवम्‌॥ ५४ ॥ तासां श्रुत्वा बचो दिव्य तब भक्तिमविष्यति॥ गणेश पजयित्वा ठु मम 
साब्रिध्यमेष्यसि ॥ ५५ ॥ इत्युक्त्वा सा ततो देवी हिमाचलमगादुषा। व्यतीते वत्सरे पूछे 
शआ्रावणे मासि चागते ॥ ५६॥ गणेशपूजनाथ ता नागकन्याः समागताः ॥ दृष्टवान्नमदातीरे 
स्रीवृन्दं बहुनूषितम्‌॥ ५७ ॥ बाल उवाच ॥ किमय चागता बालाः किंचात्र क्रियतेथुना॥ 
भवतीनिः पूज्यते का किंफले बदताद्य में ॥ ५८॥ नागकन्या ऊचुः ॥ वत्स पूजा गणेशस्य 
क्रियतेःस्मामिरुत्तमा ।| पूजिते तु जगन्नाथे लग्यते वाज्छित धुवम्‌ ॥ ५९ ॥ बाल उवाच॥। कर्थ 
पूज्यों गणाध्यक्षः कियत्कालं वदन्ठु भोः।। को विधिः के च संभाराः कदा पूज्यों गणे- 
श्यर+ ॥६०॥ नागकन्या ऊचुः ॥ आवणे मासि संप्राप्ते चतुथ्यी च खगोदये॥ तिलामलककल्केन 
स्नान कुर्याजजलाशये ॥ ६१ ॥ शुक्पक्षे समारभ्य या कृष्णा दशमी भवेत्‌ ॥ मध्याह्दे पूजयेत्‌ 





करके बेसेही खेलने रूगीं। इस बारभी पावतीका जय | 
तथा महादेवजीका पराजय हुआ ।| ४७ | पावतीने पूवे* | 
बत्‌ फिर उससे पूछा कि, किसने जय काभ किया है $ तुम | 
कहो, फिर उस बालकने मिथ्याही कह दिया कि,-महा- | 
देवजीका जय हुआ है ॥३८॥ फिर महादेवजी हृष्ट होकर | 
| हिमाछठयके समीप चढी गयी | फिर उसको वेसेही दुख . 
| भोगते जब एकवर्षव्यतीत होगया और श्रावण मास आगया 
| ५६।॥ तब नागकन्याएं गणपतिका पूजनकरले वह पर 


पार्वेतीसे बोले कि; हे महादेवी ! तुम खेलो, हे शुभानने | 
रोष छोड़ो ॥४०।॥ ऐसे कहकर फ़िर पूव॑वत्‌ पाव॑तीके साथ 
खेलने छगे पर फिर भी पावंतीन महादेवजीको हरादिया, 


तब महादेवजी रूज्जित होकर उस बारूकसे बोछे कि; है | 
| नागनकयाओंके समूहको देखकर ॥ ५७ |! बोछा कि; हे 
| बालाओ!तुम किसछिये आयी हो अब यहांपर क्‍या कर रही 
| हो ? तुमछोग किसका पूजन करती हो; इस पूजनसे क्‍या 
| फछ मिलता हैं ? यह सब तुम्हारे मुखसे सुनना चाहता हूँ 


व॒त्सख! अच्छा ठीक कहो, किसने जय किया |॥५०।|तबवह 
बालक फिर महादेवजीस बोछा कि; हे भुवनाधिप! आपका 
ही जय हुआ हैं; पार्वती उस बाढकके बचन घछुन क्रोधित 
होकर बोली कि ॥ ५१ ॥ रे दुष्टात्मन्‌ | तू झूठ कहता है, 


इससे तेरे पाद न रहेंगें और इस कीचडसें पडा ऐसेही | ं ट ध 
दुःख भोंगेगा, इसमें संशय मत करना ॥ ५२ ॥ बारूक | उत्तम पूजन कर रही हैं. क्‍योंकि,ये गणपति समस्त जगतके 


| नाथ हैं, इनकीं प्रसन्नता होनेपर ऐसा कौनसा वांछित हे 


बोला कि, हे मातः ! भैंने जो झूठ बोला वह बालकपनके 


कारणही बोला है, न कि, राग इेशके कारण इसलिये मेरे | | 
| किस प्रकार एवम्‌ कितने समयतबू गणपतिका पूजन करनः 


बालकपनकी ओर निगाह देकर मेरे अपराधकी क्षमाकरके 


मुझे शापसे निरुक्त करो । सूतजी शौनकादि सुनियोंसे | 
कह रहेंहँ कि,ऐसे जब उसने फिर आ्र्थना की वब भगवती | 


स्वाभाविकमात्वात्सल्यसे द्यापूण हृदया हो ॥५३॥ बोली 
कि, है पुत्र । जब पुत्रोंकी सम्पत्तिकी इच्छावाी नाग- 
कन्याएं इस नमंदाकंतटपर आकर गणपतिका पूजन करेंगी; 
तू उनकी आनन्ददायक पूजनविधिकोदेखेगा, उनके मुखसे 


गणेशकी पूजाके अछोकिक माहात्म्यको सुनेगा ।॥५४।। तब | 





उस पूजनके द्शन तथा माहात्म्यश्रवणके प्रभावसे तेरे सनमें 
गणपृतिकी भक्ति उत्पन्न होगी, तद्नन्तर तुमभी गणपतिका 
पूजन करके मेरे सामीप्यपद्का छाम्र करोगे ॥५५॥ सूतजी 
शोनकादि मुनियोंस कहते हैं कि, भगवती देवी पाबती उस 
बालकसे ऐसा कहकर फिर क्रोबसे वहांस उठकर, अपने 


आयीं, वो नमेदाके किनारेपर आभूषणोंसे विभूषित उद्र 


॥५८।।नांगकन्या बोलीं कि, हे वस्स! हम सभी गणेशजीका 


जो न प्राप्त हो सकेगा ।। ५९ || बारूक बोछा कि; भोः ! 


चाहिये उस पूजनकी क्या विधि है, उस पूजनके छिये 
क्या कया साम्रत्नी चाहिये.। कब गणपत्िका पूजन करना 
चाहिये ? नागकन्याएं बोलीं कि; श्रावण (सुदि ) चतुर्थीके 


| दिन सू्योद्यके समय तिछ और आंवलोंकी पीठीसे शरीर 
| मलकर किसी जलछके स्थानमें स्नान करना चाहिये, सब 
| कम श्रावणसुदि चतुर्थीको आरम्भ करके इंसी मासकीसुर्दि 


दृशमीको समाप्त करना चाहिये, प्रतिदिन. आ्रतसकाल- तिछू 


ब्रतराज।सख 






तावदेकाबैंशदिनावधि । ६२ ॥ एकविंशतिदूवॉमिस्तावत्पुष्पेः शुभेः सदा । | मोदकेरेकविशेश्र 
पूजयेल्मत्यहं जनः ॥ ६३ ॥ मोदका दुश विभाय दातव्याश्व सदक्षिणाः ॥ एक गणाधिप दवा 
स्वयं चाद्याइशेव तु ॥ ९४ ॥ पूजा मोनेन कतेव्या भोजन च तथानव ॥ बहाचारी भूमिशायी 
झुद्र॒भांपणवर्जेतः ॥ ६५ ॥ हविष्याशी तथा भूबाच्छुचिरत्तबहिः सदा ॥ एवं नियममास्थाय 
पूजां कुयोत्सदा ब्रती ॥ ९६॥ ताम्रपात्रे जल गहा गत्धपुष्पसमन्वितम्‌॥ फलरत्नसमायुक्त 
मध्य दाह्॒णाथधिप ॥ ६७ । गणेशाय नमस्तेष्स्त पावेतीनन्दनाय च॥ गन्धपृष्पसमायुक्त 
शहाणाघ्ये नमोः्स्त ते ॥ ९९ ।। प्रदक्षिणाः सदा वत्स एकविशतन्रिवेदयेत्‌ ॥ पूजासमाप्तों विप्राय 
वायनं च समपयेत्‌ ॥ ९९॥ गणशप्रीतये तुथ्यं वायनं दशमोदकम्‌।। दक्षिणाफलसंयुक्त 
वशपात्रे सुकल्पितम्‌ ॥ ७०॥ गणेशः मतिगहाति गणेशो वे ददाति च॥ गणेशस्तारको- 
भाभ्यां गणेशाय नमोनमः ॥ ७१॥ एवं पूज्यों गणाध्यक्षों नामंदो मक्तितः शुभः ॥ गणेशे 
पूजिते वत्स तव सिद्धिभविष्यति ॥ ७२॥ एवमुकत्वा गता देव्यो नागकन्याः शुचिस्मिताः॥ 
बालकेन कृत पश्चादन्यस्मिव बत्सरे ततः ॥ ७३ ॥ आ्रावणे मासि संभाते शुक्रपक्षे तिथौ शुमे ॥ 
चत॒थ्यां क्ृतसम्भारी ब्रत॑ जम्राह बालकः ॥ ७४॥ गणेशं नामेंद तत् एकविंशदिनावधि॥ 
विधिवत्पूजयामास नमस्कृत्य गणेश्वरम्‌ ॥ ७५५ ॥ गणेशो बरदो जातो याचयस्व यदीप्सि- 
तम्‌ ॥ अत्वा वाक्य गणेशस्य हषनिर्भरभानसः ॥ ७६॥ बाल उवाच ॥ नमस्कृत्य. मणेशारन 
वर देहि नमोः्स्तु ते॥ पादयोमें बलं देहि वास शंकरसब्रिघों । ७७ ॥ गणेश उवाच ॥ यथे- 
च्छलि तथवास्तु पाव॑त्याः मीतिर॒स्तु ते ॥ इत्युकत्वा तु गणेशोःसौ तत्रेवान्तदेये विश्रुः ॥ ७८॥ 
इृठपादश्व बालोब्सो केलासमगमत्ततः ॥ दृष्ठा हरस्थ चरणों शिरसा जगृहे शुभौं॥ ७९ ॥ शिव 











ओर आवलोंकी पीठीसे जछाशयमें स्नान करके मध्याहमें 
« ९१ दिनतक गणपतिका पुजन करना चाहिये॥ ६२॥ 
इक्कीस बार दुव और सुगन्धित पुष्प रोज चढाना चाहिये 
और इक्कीस लड़्डूओंसे पूजा होनी चाहिये, उन इक्कीस 
'रूड्डुओऑमेस दक्षिणासहित दुश लड्डू बाहश्यणकों दे दे। 
द्शों लदडुओंका आप भोग छगावे, तथा एक छडूडू गणे- 
शजीके यहां रहनेदे ॥ ६४ ॥ सूबजी शोनक मुनिसे कहते 
हैँ कि हे अनघ ! रोज पूजन करनेके समयमें दूसरेसे 
सम्भाषण न करे, पूजाके मन्त्रोंकाभी मनमेंही उच्चारण करे, 
इकोसदि्नितक त्रह्मचय्येसे रहे, प्रथिवीपर शयन और शुद्र 


म्लेच्छ, पतित, रजस्वछा आदि नौचोंसि सम्भाषण न को | विधि 


६५ त्रती पुरुषको सदाही हृविष्य भोजन और बाहिर 
भीतरकी शुद्धि रखनी चाहिये और यह भी चाहिये कि,वो 
सदा इस प्रकार नियम पालन करता हुआ ही गणेश्नजीक्षा 
पजन कर ॥ ६६ ॥ गन्ध, पुष्प. मिछा हुआ पानीस भरा 
आए तादका पात्र ढेकर फछ रत्नसहित गणेशको अर्घ देना 
चाहिये ॥६०॥कि, पावेतीकेनन्दन गणपतिके लिये प्रणामहै 
आप गन्धरपुष्पान्वित अध्य ग्रहण करो, आपकेलियेप्रणामहै 
0१८ है बत्स ; इक्कीस वार प्रदक्षिणा करनी चाहिये/जब 
पूजन समाप्त हो उस समय जाह्षणकेलियवायनादेनाचाहिये 
४६५) आपको गणशजीकी के लिये बॉँसके परे 
जि वायना देताहं 
कामिश्जोडो रेस मे शवायना देताहूं |७०॥॥ 


है ओर गणशजीही, लेनेबाएेड तथ (| के 


गणेशजीही अपने दोनोंके उद्धारकरनेवाले हैं ऐसे गणेशजीडे 
लिये वारवार नमस्कार हैं ॥७१॥ इस प्रकार नर्मदाके हो- 
गेके कारण नामेद नामवाले गणेशजीकीशुभकरनेवालीपूजा 
भक्तिपूरवक करनी चाहिये। हे बत्स|गणेशजीक। पूजनकर- 
नेस तुम्हारे सब कार्योंकी सिद्धि होजायगी।।७९।॥मन्द्स्मित 
बाली देवी नागकन्या उस बाछुकस ऐसा बचने कहते चढी 
गयी फिर उस बालकने दूसरे वर्षमें वेध त्रत॒ किया ॥७१॥ 
जब श्रावणसुदि चतुर्थी आईं तब बहुतसी पूजाकी सामग्री . 
इकट्टी करके ब्रत करनेका सह्भुस्प किया ॥७४।॥ तहां नंभदा 
तटपर विराजमान होनेवाले गणेश ल्नोको इक्कीसद्निपयन्त 
व ववतूणामकरके पूजनकिया॥। ५५॥गगेशजी वरदेनेवाढे 
होकर उस्सेबोले कि, ह तात! जो तुम्हारे अभिरूषितपदार्थ 
हों उन्हें मांगों गणेशजीके ऐसे वचनोंको सुनकर, मनमें 
अत्यन्त प्रसन्न हो॥७६॥बो बाढूकगणोंके अधिपतिकोप्रणाम 
करके बोढा कि, हे प्रभो आप मेरे लिय वरदें आपके ढिये 
पणाम है, भेरे पेरोंमें बल और महादेवजीके समीपमें मेरा- 
निवास हो यही बर चाहता हूँ ॥2॥ गणेशजी बोले, जैसा! 
चाहते हो वेसाही होगा अर्थात्‌ तुम्हारे घचरणोंमें चछनकी 
वाकत और महादेवजीके पासनिवासहोगा, तुम्हें पार्वतीकी 
अखनताभी प्राप्त होगी। सूतजी शौनक मुनिसे कहते हैं कि 
गणेशजी इस प्रकार बर देकर उसी जगह अन्तर्धान होगये 
(| ४८ ॥ बह बालकभी अपने पेरोमे बलछूमेकी ताकतको पा 
फठासको चल्ागया,वहां महादेवजीके दृशनकर उनके शुभ 


न्‍ल्‍ दिन लिनिदिनिकी ( १३९ ) 


भाषाटीकासमेतः | 





24200 अ 0 कप्दामा बकथा अएडाए पद 2 कद का हर उएक/:5 


उवाच ॥ उत्तिष्ठ वत्स ते पादों कर्थ जातो इठों वद्‌ ॥ कस्य असादात्वमिह आगतोपसि ममा- 
लयम्‌ बाल उवाच ॥ कृत मया मणेशस्य एकविंशदिनात्मकम।॥ शत च नागकन्याक्य 
स्तद्गत पूजन मया ॥| <१ ॥ तेन पृण्यप्रभावेण प्राप्तोपहतव ॒संत्रिधों ॥ गणेशस्प प्रसादेन 
शरीर दृततां गतम्‌ ॥ <२ ॥ शिव उवाच ॥ कीहरशं तद्भत बहि करिष्येहे च तद्तम ॥ चबल्ल- 

भाया दशनाथ पावेत्या रोषशान्तये ॥ 4३ ॥ बाल उवाच ॥ आवशे शुकृूफक्षे तु चतुथ्यां च 
. समारभेत ॥ श्रावणे बहुले पक्षे दशम्यां च समापयेत्‌ ॥ ८४ ॥ गणेश पूजयेत्षित्यमेकविंश- 
दिनावधि॥ एकविंशतिदूबान्निः पुष्परपि तथेब च॥ ८५ ॥ करतंव्या मोदकास्तत्र एकविंश- 
तिसंख्यकाः ॥ दश विप्राय दत्वा तु एक देवे नियोजयेत्‌ ॥ ८६ ॥ अवशिष्ठटाः स्वय भक्ष्या: 
श्रतमेव॑ मया विभो ॥ कि मयाद्य त्वयाज्ञतत कतेव्य बतते विभो ॥ ८७ ॥ आचरच्छम्भरप्येव 
गणेशस्य ब्रत॑ शुभम्‌ ॥ पूजनासु गणेशस्य पावेत्याश्वल्षितं मनः॥ <<८ ॥ हिमाचल नमस्कृत्य 
बचने चेदमबवीत्‌ ॥ पावेत्युबाच ॥ गम्यतेष्य मया तात केलास निजमन्दिरम ॥ <९ 
शिवस्य चरणों द्रष्ट्मुत्सुंके मे मनोपमवत्‌ ॥ शीक्र देहि ममाज्ञां भोः क्षणं स्थातुं न शकक्‍यते 
॥ ९० ॥ हिमाचल उवाच ॥ प्रेषयिष्ये क्षण तिष्ठ विमानेनाकेवचसा ॥ सेन्य ददामि रक्षा 
तब मांगें शुचिस्मिते ॥ ९१ ॥ पितृवाक्य समाकण्य विमान चाररोह सा॥ क्षणमात्रेण सा 
याता केलासमवनोत्तमम ॥९२॥ दृष्डा महेश्वर देव मणनाम विहस्थ च ॥ कि कृत मो न जानेह 
मनो में चाहत॑ त्वया ॥ ९३॥ वाक्यंश्वत्वा भ्रिययाश्र मनसा चालिलिड़ ताम ॥ अवदत्‌ 
वक्वारण तस्या हरण मनसो धव स्‌ ॥९४३॥ शिव डउंदाच । कूल मया गणेशस्थ पूजन तब हेतवे ! 
तेन पुण्यप्रभावेण आगता त्वे ममान्तिकम्‌ ॥ ९५ ॥ पावेत्युवाच ॥ कर्थ पूज्यो गणाध्यक्षो वद 


महां जगत्मन्नो ॥ अहमद्य करिष्यामि सेनानीद्शनाय च ॥ ९६ ॥ शंकर उवाच ॥ कुछ देवधि 





रणॉपर अपना शिर रख दिया ॥७९॥ महादेवजी बोले | 
कि हें वत्स ! तुम खडे हो, तुम्हारे परॉम चलनेकी ताकत | 


_कहांसे आई, किसकी प्रसन्नतासे तुम यहां मेरे स्थानमें 


आपहुचे हो | कहो ॥८०॥ बारूक बोला कि, हें प्रभो ! सने | 
नागकन्याओंसे इक्कीस दिनका गणेशतब्रत सुनाथा और | 
उसीके अनुसार वह ब्रत और पूजन किया॥ ८१ ॥। 
गणेशजीके इक्कीशदिनके पूजन ब्रतके पुण्य ग्रभावसे से | 
आपके समीपसें आप्तहुआ हूं गणेशजीकी ग्रसन्नतासे मेरा | 


- शरीर दृढ हुआ हैं ॥ ८२॥ महादेवजी बोले कि; हे वत्स! 
वो ब्रत केसा हैं यह मुझसे कहो, में भी उस-“ब्रतकों 


करना चाहिये ।॥८०॥ इसमें इक्कीस मोदक बनाने चाहियें 


उनमेंस दशमोदक बाह्मणकेलिय, ओर एक गणेशजीके | 


भेट करके ॥ ८६ ॥ अवशिष्ट दश मोदकोंको आप भरहण 


करे, हे प्रभों ! मेंने नागकन्याओंके मुखस्र गणेशजीके | 


'इक्कीस दिन पएूजनवाले इस ब्रतका विधान ऐसही सुनाथा 


ओर उसी प्रकार मेने किया भी । हे अ्रभो | अब आप सुझे | 
जो आज्ञा करें वह करूं।। ८७॥ सूत्जी शौनक सुनिसे | 
“बोले कि; फिर महादेव्रज्ञीने भी पावतीकी प्रसन्नताक लिये| 








गणशजीका इक्कीश दिनके पूजनवाछा न्ेत किया; उसके 
समाप्त होतेही उसी पूजाके प्रभावले पावतीका मन महा 
देवजीकी ओर चलायमान हुआ ॥ ८८, अपने पिता 
हिमालयको प्रणाम करके बोली कि, हे ब्रात ! आज में 
अपने घर केछाशको जाती हे ॥८९॥ मेरा चित्त महेंश्व रके 
चरणोंके देखनक छिय उत्कण्ठित हो रहा है । आप मेरे 
लिये शीघ्र जानकी अनुमति दे, अब यहां एक क्षण भी 
नहीं ढहर सकती ॥ ९० || यह सुन हिमारूय बोला कि; 
तुम क्षणभर ठहरो, में सूय सदृश दीप्यमान विमानम बेठा 


| कर तुमको भेजूंगा, हे शुचिस्मिते ! रस्तेमें तुम्हारी रक्षाके 
करूंगा; प्रिया पावेतीका रोष शान्त और दशन हों ॥८३॥ 
बारूक बोछा कि श्रावण सुदी चतुर्थीसे प्रारंभ करक | 
श्रावण कृष्णाद्शमीको पूरा करना चाहिय ||८४॥ इक्कीस | 
दिनतक रोज गणेशजीका इक्कीस दूब ओर फूलोंस पूजन | 


लिये संता भी दता हूँ ॥ ९१ ॥ पावतीजी थ्री पिताके 
उन वचनोंको सुनकर तद्नुसार दिव्यविमानपर चढकर 
क्षणमात्रम अपने उत्तम भवन केछास पहुँच गयी ॥ ९१ 

फिर महादेवजीके दशन करके हँसते हुए उन्हें प्रणाम कर- 
तीहुईं प्रेमपूवक पूछने छगी कि,हे प्रभो!आपने कया किया। 
यह तो समझसें नहीं आया पर आपने मेरा मन एकदम 
वहांस खींच छिया ॥ ९३ ॥ प्यारीके इस कथनको छुन- 
कर भगवान्‌ महादवजीन मनसे पावतीको आलहिझ्लन 
किया और उनके मनके हरनेका-कारण कहते हुए ॥९४७॥ 
बोले कि हैं पावेति ! मेंने देरी प्राप्तिक छिये गणपतिका 
पूजन किया था उसी पुण्थके प्रभावसे तुम मेरे समीप आईं 
है ॥ ९५ ॥ पावती बोली कि; हे जगक्भो ! गणशजीका 


[ चतुर्थी 










हा 


(१७०) ब्रलराजः । 


गणेशस्य पूजन च यथाविधि ॥ एकविंशति दूर्वान्निः पृष्पेनानाविषेः शुभेः ॥ ९७ ॥ मोदके- 


रेकविशेश्व एकविंशदिनानि च ॥ अर््यैश्व तावत्सख्याकेस्तथा बाह्मणतर्पणेः ॥ ९८ ॥ तिलो- क्‍ 
चनमुखाच्छत्वा गणेशः पूजितस्तया ॥ एकविशदिनात्पश्रात्‌ कुमारोभ्यगमत्स्वयम्‌ ॥ ९९॥ 


स्कन्द हष्ठा तदा देंव्या: स्तनाभ्यां निझरा बबुः ॥ सुतमालिड्रय सा देवी चुचुम्ब च मुख पुन 
॥ १०० ॥ वत्साध च्‌ सुख दृ्टं गणेशस्थ म्सादतः ॥ बहुकालं च माँ त्यक्त्वा गतः धप्मुस 
बालक ॥ १ ॥ कृतकृत्याद्य जातास्मि दशेनात्त न सदयः॥ रोष त्यज महाघुद्धे शपर्थ ते वदा 
म्यहम्‌ ॥ २॥ स्कत्द उवाच ॥ मातवंद गणेशस्य पूजन व यथाश्रुतम्‌ ॥ विश्वामित्र॑ च राजान॑ 
मम मित्र वदाम्यहम्‌॥ ३॥ पावेत्युवाच ॥ बद मित्र गणेशस्थ पूजन कुरू भक्तितः ॥ एक- 
विंशतिदूवानिरेकविंशतिपुष्पकेः ॥ ४॥ कतेव्या मोदकास्तत्र एकरविंशलतिसंख्यकाः ॥ द्श 
विप्ाय दातव्याः स्वयं चाद्यादशेव तु ॥ ५ ॥ एक गणाधिपे दत््वा अध्यानपि तथेव च ॥ पूज- 
यस्व गणाध्यक्षमेकबिंशदिनावधि ॥ ६॥ इदं व्रत गणेशस्य भक्तितो यः करिष्यति॥ तस्य 
कायागि सिद्धबन्ति मनसा चिन्तितानि च॥ ७ || ब्रतराजविधिं श्रुत्वा सेनानीश्व तथाकरोत्‌ ॥ 
सेनानीनामग्रणीत्व॑ संमवाप्य शुचित्रतः ॥ ८ ॥ कथयामास विभाग्य विश्वामित्र नराधिपम्‌॥ 


राजा नमस्कृत्य ब्रतं तत्स्वयमाचरत्‌ ॥ ९ ॥ गणेशो बरदों जातो विश्वामित्राय तत्क्ष- 

णाव॥ गणेश उवाच ॥ बद राजन्किमिच्छास्ति ददामि तव याचित्तम्‌ ॥११०॥ विश्वामित्र 
उवाच ॥ देहि देव प्सन्नश्नेत्माग्विप्रषित्वमस्त्विति ॥प्राप्तेन विपर्पित्वेन सर्वे श्राप्ता मनोरथा३॥१९ ९ 
गणश उबाच ॥ विप्रषित्व च राजेन्र प्राप्स्यासे बहापुत्रतः ॥ वसिष्ठाद्राह्मणश्रेष्ठान्मम 
हा लक कल मिल मा 
पूजन किस प्रकार करना चाहिये ! आप मुझे कहिये, में | जेसा तुमने सुना है वैसा मुझसे कहो, में अपने मित्र राजा 
स्वामिकातिकको देखनेकी इच्छासे गणपति पूजाको करूंगी | विश्वाभित्रकों सुनाऊँगा॥१०३॥ पाती बोली कि, है तात ! 
॥ ९५ ॥ महादेवजी बोले कि, हे देवि ! तुम विधिवत्‌ | ऐम अपने मिन्न विधामित्रसे कहो और तुमभी भक्तिपूवक 
ग णेशपूजन करो, उस पूजनकी यही विधि हे कि, इक्कीश | गणेशजीका पूजन करो, उस पूजनमें इक्कीश दूबके अकुर 
इजक अछुर एवम्‌ इक्कोश ही नानाविध उत्तम पुष्पोंस | ओर इक्कीशही पुष्प चढाने चाहिये ॥ १०४ ॥ ओर 
(५७ ॥ इस जतसें गणेशजीका पूजन किया जाता है | क्कोश मोदक बनवा, उनमेंसे दशा मोदक माह्मणके लिये 
ओर वह अन इक्‍्कीश दिनिपय्यन्त करना चाहिये। | पेंदें और दश मोदक अपने भोजनके लिये रख ढे ॥९ ०५ 
इक्कीस भोदका का नेवेद्य बनवाके उसमेंसे दश आह्ंणके, | अवशिष्ट रहे एक मोदकको गणेशजीके भेट करदे अध्य भी 
देश अपन और एक गणपतिके सेंट करदेना चाहिये और | *कीसही होने चाहिये और इक्कीश दिनितक गणेशजी“ 
अतिदिन २९ अध्यंदान और इक्कीस जाक्षणोंकी भोजन | _ (जन करना चाहिये॥ १०६ ॥ गणेशजीके इस पूजन 
कराता चाहिये॥ ९८॥ महत्वर देवके मुखसे गणेश पूज- [.पको जो करता हे उसके चाहे हुए सभी काम सिद्ध होते 
नकी विधिको सुनकर पावतीने गणेशजीका पूजन किया, | _ "४॥ अपनी माताके मुखसे ब्रवराजकी विधिकों 
इक्कीस दिन व्यतीत होते ही स्वामिकाधिकज़ी वहां | “कर स्वामिकार्तिकनेभी उसे विधिके साथ किया, बो 
आपही चले आये॥ ९९ ॥ स्वामिकातिकजीको देखते | 2 “तंत उस ब्रतके प्रभावसे सेनापतियोंमं सबका शिर- 
३ समय पाव॑तीजीके स्वनोंसे दूधका झरना बहने |: दै।१०८॥ है विप्रोमें अम्रगण्य! स्वामिकार्तिकने फिर 
छगा । अपने हे आावलो + » अ | राजा विश्वाप्रित्रकों गणेशजीके उस ब्र॒त॒का अनुष्ठान विधान 

उत्रका आलिज्लन करके मुखको वारवार री भ 

चूमने छगी ॥ १०० ।। हैं. बत्स पण्मुख ! बहुत समयसे | * हा/विश्वामिन्रने गणेशलजीको नमस्कार करके वह त्र॒तकिया 
इश्को छोड़कर तुम दूसरी जगह चले गये थे, आज हैं | ३५५. ५- सो समय गैशजी राजा विश्वामित्रके लिय 
णिकषजीकी प्रत प्रभावसे तुम्हारे मुखको के ) गा मे | बरद्न देनेवाले होगये और बोले कि,हे राजन ! तुम क्‍या 
अज में तुझको देखकर कृता् हो अप चाहते हो, जो तुम माँगोगे वही दूँगा ॥ १० ॥ विश्वामित्र 
ह। दे महयबुद्धे । तुम कोप कोदो मे जप हक नहीं | बोले कि,हे देव! यदि झआाप प्रसन्न हैं तो मुझे पहिल त्रह्मपि- 
तुमको नाराज नह स्पी फरती हूँ कि, पददान करो | क्योंकि इस पदके मिलनेसे ही सब पदार्थ 
करूंगी ॥ १०२ || स्वा- मिलछगये ऐसा में मानता हूं ॥ ११ ॥ गणेशजी बोले कि, है 

डे कि, हे माव ! गणेशजीका जनम | गाजर हूं ॥ ११ ॥ गणेशजी बोले कि, 
विधान | राजेन्दू) तुमको ज्रह्मपिपद तो विप्रा्रगण्य अद्वपुत्र वसि३ 











क्र 


बतानि, ] 


भाषाटीकासमेल 





वाक्य न संशय; ॥१श॥ णएब्सुकत्वा गणेशोपसो पृजितों भूमिषेन च ॥ पुनरन्य वर॑चादात्पूज- 
कानां हिताय वे ॥ १३॥ यदा यदा च राजेन्द्र सड्ूद॑ च कलो ऋुषवि॥ भविष्यति जनानां हि 
कतव्य पूजन मम ॥ १७४ ॥ स्मरिष्यन्ति च माँ भक्‍त्या नमस्कृत्य पुन) पुनः ॥ तेषां हःखानि 
सवाणि नाशयामि न संशयः ॥ १५॥ एवं दत्वा वरान्सम्यक्‌ तत्रेवान्तहितोए्मवत ॥ सन- 


त्कुमार योगीनद्र पावेत्या मुखपद्मतः ॥ १६॥ श्रुतं मया च त्रेतायां नणेशब्य ब्रते महत ॥ 
निवेदित च तत्सवे कुछ विप्र तपोनिधे ॥ १७॥ सनत्कुमार उवाच ॥ महदाख्यानकं शत्वा 


तृप्तीईह तु न संशय) ॥ खूत उवाच ॥ णएबसुकत्वा गतों योगी नगस्कृत्य षडाननम्‌ 
॥ १८ ॥ संनत्कुमारसेनानीसंव[द च यथाश्षमम्‌ ॥ व्यासप्रसादाच्छुतवांस्तथा तुभ्य॑ निवेदितः 
॥ १९ ॥ इ्द व्रत गणेशस्य करिष्यति च मानवः ॥ तस्य कायाणे सर्वांणि साद्धें यास्यत्ति 
सत्वरम्‌ ॥ १५० ॥ किमन्यद्धों जनश्रेष्ठाः श्रोतुकामास्तपोधनाः ॥ तत्सवे कथायेष्यामि वक्तव्य 
यदि चेच्छथ ॥ २१॥ य इद श्वणुयाद्धवत्या आखूयान च समाहितः॥ तदीप्लितानि कार्याणि 
स लमेब्रिश्चितं शुवि ॥ २९२॥ शोौनकांग्या ऋषिगणाः श्ुत्वा सूतवचोड्ुतम्‌ ॥ पौराणिक नम- 
स्कृत्य विररामा पने शु्ें ॥ १२३ ॥ इते श्रीमविष्योक्तरपुराणे स्कन्द्सनत्कुमारसंबादे ततीयो- 
छासे एकविशतिदिवसगणपतिव्रतकथा संपू्णा ॥ 
्झान्दोतडवोगजपतिछतत ॥ 

अन्यच्च--भालुवासरयुतायाँ यर्याँ कस्यांचिच्छुकचतुथ्यामारभ्य षण्मासपयन्‍्त कतंव्यतया 
विहिते स्कन्दपुराणोक्त दूवोगणपतित्रतम्‌ ॥ एतदेव शिष्टाचारे श्रावणशुक्रचतुर्थीमारमभ्य माघ 
शुक्कचतुर्थीपयन्त क्रियमाणं दृश्यते ॥ मासपक्ष्याद्यछ्लिस्यध मम समस्तपापक्षयपूवक्सप्तजन्म 


राज्यसोमाग्यादिविवृद्धये महागणपतित्रीतिदारा उमामहेश्वरसालोक्यघिद्धये षण्मासपर्थन्त 





ऋषिसे मिलेगा, इसमें संशय नहीं है यह मेरा वाक्य है 
॥ ११२ ॥ ऐसा कहकर फिए ओर भी राजाके पूजित हो | 


जा करनेवालोॉके हितके लिये :अन्यभी वरदान किया कि | 
| | सुनेगा, उसके पृथित्री पर ही सभी वाडब्छित काय' निश्चित 


॥११३॥ हे राजन्‌ ! जबजब जिन जिन मनुष्योंको क 


युगर्में घोर संकट उपस्थित हो तबतब उन्त मनुष्योंकों चा- | ४ 
हिये कि वे मेरी पूजा करें ॥११४ ॥ जो मनुष्य भक्तिपूवक | भडुत वचन सुन उन्हें श्रणाम करके अपने अपने पवित्र 
मुझे वारंवार नमस्कार करते हुए याद्‌ करेंगे. उनके सत्र | 


खको नष्ट करूंगा इसमें संशय नहीं है ।। ११५ ॥ ऐसे | 
दे बे | इक्कीस दिन पय्येन्‍्त गणपति पूजनके बत्रतकी कथा संम्पूण 
मेने पावेतीके सुखारबिन्द्स || ११६ ॥ तन्रेतायुगक आर- 
स्भमें गणेशजीके इस बड़े भारी ब्रतको सुनाथा, हे विश्न 


वरोंको देकर गणेशजी वहां ही अन्तहिंत होगये । स्वामि 
कार्तिक सनत्कुमारस कहते हूँ कि, हे योगी-द्र | सनत्कुमार, 


हैं तपोनिधे ! वही मने तुम्हें कह दिया है इसे आप करें 


॥ ११७॥ सनत्कुमार बोले कि, हे प्रभो ! में इस महान | 


आख्यानको सुनकर तृप्त हो गया हूँ इसमें संदह नहीं है | 


तिंकजीको प्रणाम :करके चछ .गये || ११८ ॥ मैंने समत्कु- 
मार और स्वामिकार्तिकका यह संवाद भगवान वेद्व्यास 

जीकी प्रसन्नतास जैसा सुना था वंसाही आपके निवेदन 
कर दिया है ॥ ११९ ॥ इस गणंशजीके इक्कीस दिनके त्रत- 
को जो मनुष्य करेगा उसके सब काय शीघ्रही खिद्ध होंगे 
॥१२० ॥ हे सब मलुष्योमें श्रेष्ठो ! ओ ,तपरूप धनसेही 





सम्पन्नता माननेवालो |! और आप छोग क्या सुनना चाहते 
हो,यदि मरे कहनेको आप सुनना चाहेंगे वो में सब कहंगा 
१११ ॥ जो मनुष्य समाहित होकर इस ब्रठकी कथाकों 


ही सिद्ध होंगे ॥ १२२॥ शोौनक प्रश्वति सुनियोंनें सूतके 


आसन पर विश्राम किया। १२३ ॥ यह भविष्योत्तर पुरा- 
णान्तगत स्कन्द और सनत्कुमारके संवादक वृतीय उल्लासमें 


छः महीनेतक करनेका दूर्वोग्णपति बत- 
इसके अछावा रविवार युक्ता जिस किसी महीनेकी शुद्धां 


| चतुर्थीके दिन आरम्भकर छः महीनेवक करने योग्य, स्क- 
| न्द्‌ पुराणका कहा हुआ दूर्वा गणपतिका ब्त है । यही दुवा 

 चतुर्थीब्रत शिष्टोंके व्यवहारके कारण श्रावण सुदि चौथसे 
| आरंभकर माघसुदि चौथतक किया जाता है। यानी रवि- 


सूतजी बोले कि, योगी सनत्कुमार ऐसा कहकर, स्वामिका- | बार शुक्का चतुर्थीसि छेकर छः मास तक किये जानेवाला 


इकीस दिनका दूर्वा गणपतिका ब्रव॒ स्कन्द और सनव्कुमा- 
रके संवादके रूपमें कहा है। इस अच्छे अच्छे छोग श्रावण 
शुक्ला चतुर्थीसे छेकर माघ शुद्धा चोथतक करते हैं यह 
तात्पय है । इस बत्रतका संकल्प करती बार मास) पक्ष आ- 
दिका उद्धेख करके कहें कि, मरे समस्त पापोंके नाश पूर्वक 
सात जन्मोंमें राज्य और सौभाग्यकी वृद्धिक छिये तथा 











की 20000: अं, 22040: 82204 ६:28 4020 32024 





“( १४२) अतराजज। 





२३६०४ करे 





दूवोगणपतिव्रतमहं करिष्ये इति संकर्प्य पोडशोपचारः पूजयेत्‌ | से ॥ खूत डवाच॥ 
कूलासशिखरे रम्ये सर्वदेवनिषेवित ॥ सिद्धसंघसमाकीणें गन्धवयणलेविले ४ । १ ॥ दृव्या सह 
महादेवों दीव्यत्यक्षेविनोदतः ॥ जिताले त्वं जितेत्याह पावती परमेश्वरः ॥ २॥ साएपपिहं . 
जित इत्याह सविवादस्तयोरभूब ॥ चित्रनेमिस्तदा पृष्टो मृषावादमभाषत ॥ २॥ तदा क्ोष- 
समाविष्ठा गौरी शाप॑ ददों तत॥ प्रसादिता ततस्तेन विशाप॑ कुरु पार्वति॥ ४४ पावंत्युवाच॑॥ 
यदा सरोवरे रम्ये चरिष्यति भवान्‌ भ्रुवि॥तदा स्वरगंणिकाः सर्वा वीक्ष्यक्षे त्व॑ समागताः ॥५॥ 
तदा भव विशापस्त्वमिंत्युक्तः स पषात ह ॥ ततः कतिपयाहोभिः कृष्णानन्तसरोवरे ॥ ६॥ 
कृष्णों भूत्वा वर्सस्तत्र ददझ स्वविल्ासिनी॥ततस्त सादर गत्वा प्रच्छ प्रणिपत्य ताः॥ ७॥ 
क्रियते कि महाभागाः पूजायां वाज्छितं च किम॥ततस्ता अब्व॒व॑स्तस्मे दूर्वाजिश्निेश्वरत्रतम ॥ ८ ॥ 
क्रियतेःस्मानिरिह च परत्राभीष्टसिद्धये ॥ ततोःबबीअित्रनेमित्रेत मे दातुमहंथ ॥ ९॥ अयेनाह“ 
गिरिजाशापान्मुच्येय॑ चिरदः/खितः ॥ ततस्ता अब्ु॒ुकक्‍त्सवां ब्रतमेतदलुत्तमम्‌ ॥ १० ॥ दूर्वावि-. 
प्रैशवरो यत्र पूज्यते सर्वसिद्धिदः ॥ शुकृपक्षे चतुर्थी या भालुवारेण संयुता ॥ ११ ॥ तस्वयां तिथौ 
समारभ्य पण्मासं ब्रतमाचरेत ॥ प्रत्यहे षण्नमस्काराः षड़दूवाः षट्‌ प्रदक्षिणाः ॥ १२॥ शुक्षपक्षे 
चत॒थ्यों च प्रत्येक चेकविंशातिः | एकमक्त च कर्तव्य कथा च श्रणुयादिमाम्‌ ॥ १३॥ ध्याये- - 
द्विनायक देव समाहितमनाः सदा॥तरूणारुणसंकाशं सर्वाभरणभूषितम्‌॥ १४ ॥ जटाकलाप- 
सुभगं कुड्कुमेंनोपरश्षितम्‌ ॥ गजानन प्रसन्नास्य॑ सिन्द्रातिछ॒का ढ्वितम ॥ १५ ॥ विशालवक्षप्त 


ह 


दन्तमोदकधारिणम्‌ ॥ 


सहागणपतिकी प्रीतिद्वारा उमामहेश्वरके साहोक्यक लिये 
छः मासतक दूर्वांगणपतिका व्रत में करूँगा । संकल्पके बाद 
'सोलहो उपचारोंस गणेशजीका पूजन करना चाहिये । अथ 
-केथा-सिद्धोंके समूहसे समाकीण, गन्धव जनोंसे सेवित 
तथा सब देवताएँ जिसका निरन्तर सेवन करतें रहते हैं 
'ऐसे केछासके रमणीक शिखरपर ॥ १ ॥ पावतीजीके साथ 
पासोस खेलते खेंढ़ते बोढे कि, तुम जीत गईं जीत गई 
॥ २१ पावेतीजी बोढीं कि, आप जीत गये आप जीत 


गये, यही दोनोंका विवाद हो गया, उसे समय चित्रने- 
मिसे पूछा तो वो झूठ .बोढने छगा॥ ३॥| उस समय पारव॑- 


तीजीने क्रोधमें आकर शाप दे दिया। -चिन्ननेमिने खुसा- 
मद की कि हे पार्वति ! मुझे शाप रहित कर दीजिय ॥४॥ 
ऐसा सुनकर पावतीजी बोलीं कि जब तुम घूमते हुए रम-. 
8 सरोवर पर आई हे हक शत देखोगे ॥५॥ 
. से समय तुम्त शापसे रहित होजाओगे, ये नकर 

। गिर गया, इसके कुछ दिनॉंके पीछे ऊन नायर ४ 
पा ॥ कृष्ण होकर रहने छगा एक दिल वो कृष्ण 

छठ 

पहुंचकर प्रणाम करके 
या करवी हो 
'दे सससे 
"इस दोक 


पूछने छग़ा ॥७॥ कि हे महाभागो | 
) दे पूजासे आप क्या चाहती हैं ? यह सन 
” हम दर्द गणपत्िका ब्त ॥| ८॥| अपने 
परडोकड़ी उछाओंकी पूतिक्र ढिये ऋरती. 


नियोंको देख, आदर पूर्वक उनके पास | 


सुन वर्तोंको पहिने 


भातसुक्तामणिविभूषितम्‌ ॥ चतुभ्चुजमुदाराड़ किंकिणीकंकणेश्रुतम्‌ ॥१६॥ पाशाड्कुशधर देव॑ 
महोदरं महानागबद्धकाक्षें सुदान्वितम्‌॥ १७॥ खुन्दराशकसंबीत- 
मिभास्पमपराजितम्‌।प्रणताम रसन्दोहमौलिमाणिक्यररिमपिः --- 3 तामरसन्दोहमोलिमाणिक्यरहिममिः ॥९८॥ विराजितांध्रिकमल् सर्व १८॥ 


विराजितांध्रिकमलं सर्व- 


हैं। यह सुनकर चित्रनेमि बोढा कि इस त्रतक्रो मुझे दे 
दीजिये ॥ ९॥ में बहुत समयसे दुःखी हू इसीसे में पारव॑- 
तीके शापसे छूट जाऊँगा फिर उन सबोने उस त्रतको कहा 
| १० ॥ जिसमें सब सिद्धियोंका देनेवाला' दूर्वागणपति 
पूजा जाता है। जो शुकुृपक्षकी रविवारी चौथ हो ॥ ११॥ 
उसमें आरंभ फरके छः मासतक ब्रत करना चाहिये प्रति 
दिन छः दूर्वा, छः नमस्कार और छः प्रदक्षिणाएं करनी 
चाहिये ॥। १२॥ किन्तु शुह्ध पक्षकी हरएक चौथको इक्कीस 
प्रणाम इक्कीस दूर्वा और इक्कीस प्रदक्षिणाएं एकबार भोजन 


और इस कथाका अ्रवण करना चाहिये ॥१३॥ सदा एका- 


प्रचित्तत विनायक देवका ध्यान करना चाहिये कि, खूब 
निकले हुए अंरुणकीसी आभावाले, सब आभरणोंसे भूषित 
| १४ || छुन्द्र जटावाछे, सुभग एवम्‌ कुँकुम छगाये हुए 
सिन्दूरके तिछ़कको छगाये हुए, मुखपर चमकती हुईं प्रस- 
जतावाले गजमुख ॥१५०॥ तथा बडी बडी बगढोंवाले, चरम 
कनेवाल्ी मुक्तामणियोंस विभूषित, चतुर्भुजी, ढम्बे चौड़ 
शरीरवाले,किकिनी और कड्छोंको पहिने हुए ॥१६॥ पाशे 
ओर अंकुश हाथोंमं लिय हुए टूटादाँत लड॒डु रखहुए, बढ़े 
पटवाल बड़े नागोंस कसे पेटवाले,प्रसन्न चित्त ॥१७॥|सुन्दर 
_ हुए इसके मुखवाले, किसीसे न द्वारनेवाले 
नपर्कार करनवाले देवजन,समूहोंके शिरोंके माणिक्योंकी . 
उस्य्मोंसि।१८।जिनके अरण कम विराज रहे हैं जिसको 


ब्रेतानि, | 


देवनम दा 
मतन्द्रितः ॥ एवं चरित्वा षण्मासाञछचि: 
सदा पुनः ॥ उद्यापनं इकलेंव्यं द 





म्व्मथ आ श्ाद्कः लुक: 


भाषाटीकासमैतः | 


न्ज हा लक ध्याशदपअआाउपसातावपेमा्/पाक सरदाानकासय/ ध मी यम व वजओ व तन पक बाय कम अल मल मील अम न 
तम्‌ ॥ अभीष्टफलद देव सवभूतोपक्वारकम्‌ ॥१९॥ एवं ध्यात्वा यजेन्रित्यं विनायक- 
सत्यपरायणः ॥ २०॥ पश्चाह्ृन्धादिदवांमिरचंये् 
दशकालाइसारतः ॥ २१ ॥ ततो मगधदेशस्य मानेन यवपि- 





टकम्‌ ॥ दशमानकमादाय दशाष्ट्रावपि मोइकानू ॥ २२ ॥ कृत्वा वृतप्छुतान्सम्यक्ष देवाय 


पषडात्मने ॥ 


पद च विज्ञाय दातव्याः ओ्रोत्ियाय कुटुम्बिने ॥ २३॥ विनायक गणाध्गक्ष॑ विश्लेशं 


, औगणाधिपम्‌ ॥ वरदं खुमुख चेव दूवीयटक्ेः अपूजपेत्‌॥ २४ ॥ षढ़दूर्वात्य तथा दह्यान्महापू्जां 
भकल्पयेत्‌ ॥ एवं कुछ महेशानप्रीत्यर्थमंभिवाड्चितम्‌ ॥२५॥ तथेत्युकत्वा बित्रनेमिः टीणशिः्दा 
बिनायकम्‌ ॥ शापान्छुक्तत्ततः शब्पुमन्यगाव प्रहसबन्रिव ॥ २६ ॥ शंकरेण ततः पृष्ठश्चित्रनेमि- 
ब्रेत॑ जगो ॥ ब्रतं श्रत्वा ततः शंबुग गेशह्प कुतूहलात ॥ २७॥ गौरीकोपप्रसादाय शिवो$पि 
कृतवानथ॥ सापि देवी शिवेनोक्त चक्रे ब्रतमछत्तमम्‌ ॥२८॥ कातिकेयो5पि मात्रोक्तः स्वसख्यु- 


देशमेच्छया ॥ व्रत॑ 


चकार ननन्‍्दी च कार्तिकेयोक्तमादरात्‌ ॥ २९ ॥ सोएपि राजप्रसादाय 


' पुत्राथ च चकार है ॥ ततः ऋ्रमेण छोकेडस्मिव्‌ प्रखुरीयूतनदुत्तमम्‌ ॥ ३० ॥ ब्रत॑ दूर्वांगणेशस्य 
सर्वेसिद्धिकर परम्‌॥ शोकव्याधिमयोद्गबन्धव्यसनहुःखतः ॥ ३१ ॥ विम्ुक्तः पुत्रपोत्रादि 
घनधान्यसमावृतः ॥ इहलोके खुखी भूत्वा पश्चाव्छिदपुरं ब्रजेत ॥ २४ ब्रतेनानेन दर्वाख्य- 
विश्लेशस्य प्रसादृतः ॥ यः पठेत्परया मक्‍त्या कथामेतां दिनेदिने ॥ श्णुयाद्वापि सतत॑ सर्वासि- 
द्विमवाप्छुयात्‌ ॥ ३३ इतिश्रीस्कन्द॒पुराणोक्त दूर्वागणपत्तित्रतम्‌ ॥। 
सिद्धिविनायकब्रतम || 
अथ भाद्रपदशुछूचतुथ्यों सिद्धिविनायकब्रतं हेमादों स्क्ान्दे-तञ्व मध्याहव्याविन्यां कार्यम्‌॥ 
प्रातः शुक्कतिलेः स्नतात्वा मध्याह्दे पूजयेन्रुप ॥ इति लत्रेव पूजाविधानाव ॥ दिनद्ये तब्यातता- 


सबदेव नमस्कार करते हैं जो देव सबको अभीष्ट फलडा 
दुनेवाल्ा तथा सब भूतोंका उपकारक है || १९ ॥ इस 
प्रकार गणशजीक्षा ध्यान, निराठढ्स होकर करना चाहिये 
सत्यपरायण ओर पवित्र होकर इस बतको करके 
॥ ९० ॥ पीछे गन्ध दूर्वा आदिसि हमेजश्ञाही गणपतिजी का 
पूजन करते रहना धाहिये, पीछे देश कालके अनुसार 
उद्यापन करना चाहिये | २१ ॥ मगघधदेशके मानस दुश- 
सानक यवपिष्ट छेकर अठारह रूडडु बना ॥ २२ ॥ उन 
सबको घीसे भलीभांति भिगोकर उनमेस छः छड्डु षडात्म- 
देवकी भेंट कर दे तथा छः वेदपाठी कुटुम्बी ब्राह्मणको दे 
दे ।। २३ ॥ विनायक, गणाध्यक्ष, जिम्ने श, गणाधिप, वरद्‌ 
ओर सुमुख इन नामोंके आदिमें ओमू और अन्‍्लर्मे नमः 
लगा नामोंको चतुथ्यन्त करके इनसे छः दूर्वाओंसे पूजन 
करना चाहिये ॥२४॥ छः दूर्वाओंको देकर महापूजा करनी 
चाहिय आप गणेशजीकी ग्रसन्नताके लिये इस त्रवको करें 
॥९५॥ चित्रनेमिन देवाज्ञनाओंसे कहा कि अच्छी बात है 
मे त्रत करूंगा, पीछे गणशजीका त्रत करके शापसे मुक्त 
हो भहादवजीके पास हँसता हुआ पहुँच गया ॥ २६॥ 
महादेवजीके पूछनेपर चित्रनेमिने सहादेवजीके सामने इस 
बतको कहा और इंभुने बडे ही कुतूहठसे ॥ २७ ॥ गौरीके 
फ्रोधको झानत करनके ढिये किया शिवजीक उपदेशसे 
पावतिजीने भी इस उत्तम बतको किया ।] २८ ॥ कार्तिके- 





यने भो माताके उपदेशसे अपने मित्रके देखनेकी इच्छासे 
प्रेरित होऋर इस ब्रतको आदर पूवक किया; कार्तिक्रेयके 
मुखस सुनकर नंदिकेश्वरने भी इस ब्रतकों आदरके साथ 
किया ॥ २९ ॥ नन्दिकेश्वरन भी राजकीय प्रसन्नता और 
पुत्रके छिये एकान्तर्म इस ब्रतको किया इसी तरह ऋमसे 
यह उत्तम बत लोकमें प्रचलित होगया | ३० | खब 
सिद्धियोंको देनवाले दूर्वागणेशके इस उत्तम ब्रतकों करके 
शोक, व्याधि; भय, उद्वेग, बन्ध ओर व्यसनोंस ॥ ३१ ॥ 
छूटकर पुत्र पौत्र, धन, धानय सब कुछ पाजावा हे इस 
छोकम सुख भमोगकर अन्तर्से शिव छोकमें जाता हू ॥शश॥ 
इस ब्रतके प्रभावसे दूर्वांगणशजीकी - प्रसन्नता होनेस सब 
कुछ होजाता है।॥ जो नर रोज परम भक्तिके साथ इस 
ब्रतको करता हे अथवा जो इसे निरन्तर सुनंठा है वह भी 
सब सिद्धिको पाजाता है ॥३३॥ यह स्कन्द्पुराणका कहा 
हुआ दूवागणपतिक्ना ब्रत पूरा हुआ ॥ 


सिद्धिविनायकत्र त-भाद्रपद शुक्का चौथके दिन होता है। 
यह स्कन्द्पु राणस लेकर हेमाद्विने कह! है इसको सध्याह- 
काछव्यापि वी चो थके दिन करना चाहिये,कर्योकि हेराजन! 
प्रातःकाल शुद्ध तिछ मिश्रित जछसे स्नान फसके सध्याहम 
गणेशका पूजन करना चाहिये, यह यहां मध्याह्द काछमें 
पूजाका विधान किया गया हैं । यदि दोनोंदी दिन मध्याह- , 


३ प्राप्तुमिलि शषः | 


ज्मकल्ल 


है] का ९ फू 
ब्रतशज; 9 
आटा पर विन दे कह 572४०४६ घम/400040770% 20570 आ है % 70/87/7742 70, 206/420%07 00 460. 2007 00260 00020. 000 20970 7078 7700 7/ै/१7१/१7 
सपा जक उपाय व्यापक कम पत्प सर 4८ प अदला काश पा ही जम प7 2: म तर 5070 %॥ 45% 4०४: 7४४४ 90/20%0 ५0067 
हि न ्यया पाप भकता कक ाशपात0प दम सप्तम सत्ता पार 0232 05%8 42043 
3 अया०4कनाअक ०५०१४ कायम का ००००० ]००/आ०/० | ०० | । ००००० ०००० म || ०००] ग्_्ग््ग्ग)____्_्ज्ध्घ्ण्ण्््््|्््ाणणआणआणआणआआआशशशशशश#///शआ#ेऔ्््््श श#ओस्‍ओस्‍ओऑओऑे)े)ए श्र ओ इक का "नल आप 8 म दिए पी धक:27207 52277 7:5॥70 कै" ६४4८8: कर 





वव्याप्तावेकदेशव्यातती वा पूर्वाषन्यथा परा-चतुर्थी गणनाथस्य मात्विद्धा भशस्थते ॥ मध्याहू- 
व्यापिनी सा तु परतश्रेत्परेडहनि॥ इतिबृहस्पत्युक्तेः ।।अब जतविति॥ मासपक्षासुछ्लिख्य ममेह ज- 
न्मनि जन्मान्तरे च पुत्रपोत्रधनविद्याजययश'ःख्रीमाप्त्यर्थमायुष्यामित्रद्धयर्थ व सिद्धिविनायक- 
प्रीत्य्थ यथाज्ञानेन पुरुषघूक्तपुराणोकरमंत्रेष्योनावाहनादिषोडशो पचारेः पथ्चासुतेः सह पा्थिव- 
गणपतिपूजन करिष्ये ॥ तथा मतों प्राणप्रातिष्ठादिकमासनादिक कलशाराधन पुरझुषसूक्ततन्या- 
सांध्र करिष्ये ॥ हेरम्बाय०मृदाहरणम्‌ ॥ सुमुखाय० संघद्नम्‌ ॥ गोरीहुताय “स्थापनम्‌ ॥ अथ 
प्राणप्रतिष्ठां कुर्यात्‌॥ अस्य श्रीमाणमतिष्ठामन्त्रस्य ब्रह्मविष्णुमहेश्वरा ऋषयः ॥ ऋग्यज्ञु।सामा- 
थवांणे च्न्दाति ॥ क्रियामयबपु प्राणाख्या देवता ॥ आंबी जम हीं शक्ति॥ क्रों कीलकम) 
अस्यां मू्तों ाणप्रतिष्ठापने विनियोग:॥ अं आं द्वीं को अं यं र॑ ले व॑ शं षे हू रु क्ष॑ अः अस्यां 
मूतों आणा इह प्राणाभोपुनः ७१ आं ह्रीं को अं० अस्यां मूतों जीव इृह ह्थितः॥ पुन ३४ आँ० 
अस्यां मूर्तों सवेन्द्रियाणि। श्रोत्रत्वक्चश्षुजिद्याप्राणवाक्पाणिपादपायूपस्थानि इहेवागत्य सुर डर 
चिर तिष्ठन्तु स्वाहा ॥ अखुनीते पुनरिति ऋचे पाठेत्वा गर्भाधानादिपश्वद्शर्सस्कारसिद्धयर्प 
पश्चद्शप्रणवाबत्तीःकरिष्ये इति संकरप्य पश्चद्शवार प्रणवमावत्य तच्चक्षु्देवहितम॒०इ तिमन्त्रेण 
देवस्याज्येन नेत्रोग्मीलन कृत्वा पश्योपचारेपूजन कु्यात।आसनविधि कृत्या पुरुषसूक्तन्धासान 
विधाय पूजनमारमेत्‌॥ एकदन्तं श्पकण गजब चतुर्धुजम॥ पाशांकुशधर देव ध्यायोत्िद्रि- 


#५ 


विनायकम्‌ ॥ ध्यायेदेव महाकाये तप्तकाश्वनसब्रिमम्‌॥ दन्ताक्षमालापरशुपूर्णमोद्कहस्तकम। 








रु 


व्यापिनी मिले अथवा दोनोंही दिन न मिक्ते अथवा एक- 


देशव्याप्ति हो तो पूवा ही ढेनी चाहिये, नहीं तो परकाही 


प्रहूण करना चाहिये | क्योंकि बृहस्पतिन कहा है कि, | 


पे त हे 
गणशके ब्रतमे हृतीया विद्धा चोथ उत्तमा होती है, यदि | आज्यसे देवक नत्रोन्‍्मीलनमें इसका प्रयोग हे इस कारण 


उ9 रे भर ५ भ 
। अथ भी ऐसाही होना चाहिये कि,हे देव ! हिलकारीआपक 
की जाली है । प्रवविधि- संकल्प करतीवार मास पक्ष आदि [४ न 


५५ ० 9५ ;$ 
का उल्ख करके कहता चाहिये कि मेरे इस जन्म और 


पर दिन मध्याहव्यापिनी हो तो पंचमीसहिता दूसरे दिन 


लिये नमस्कार है, इस मंत्रको 


हे हे स्पापन करना चाहिये | इसके बाद प्राणप्रतिष्ठा 
बे है | अस्य श्री 'यहांसे लेकर पंचद्शवारं प्रणवमावृत्य' 
यहांवक प्राणप्रतिष्ठा ४ ३१ में एकली है इसी कारण इत- 
नेका + मी , ५२2 दर । 
हा उह अर्थ नहीं करतेह ] * ओम त्नक्लुदेवहित पुरा- 


, फच्छुक उच्चरत्‌ पश्ये शरद: शर्त विशुयास शरद: शत्तम्‌ | कृति 


| करे । इन 


अजवास शरद: शतंमू-अदीनाः स्याम शरद: शतभूयश्र श्रदः 
शतात्‌ वंदभाष्य तथा सन्ध्या आदिकर्मं सूयकी प्राथनाम 
इसका अथ किया हे तथा विनियोग भी किया है पर यहां 


| नै नेत्र घृतसे खुछ गये जैसे आप अपने नेत्रोंस देखते हैं 


भ | उसी तरह हम भी सौवषतक देखते.रहेँ, तथा सुनना और 
जन्मान्तरोंमें पुत्र, पौत्र, धन, विद्या, जय, यश और ख्ीकी | हैँ, तथा सुनना 


प्राप्तिक हियि ओर आयुष्यकी वृद्धिके लिये आर सिद्धि: ह्स सोसे भी अधिक सोवषतक य सब भोगें, इ्स मंत्रको 


विनायककी असन्नताके छिय जैसा मुझे ज्ञान है उसके अनु- | रे * 
कल जर हॉन है उपके अह- | बोढ़कर घीसे नेत्र, खोछकर पंचोपचारसे पूजन करना 
सार पुरुषसूक्त और पुराणके कहे हुए मन्ह्रोंसे ध्यान | 


हक अेलभह जल कबे कक कक पाथिव चाहिय,वो इस प्रकार होता है- “ओम सहखशीषा "इत्यादि 

आदिके गण दि . आलझार 9, मेतिष्ठा | तोड़ मंत्रों १ शिखा २ छछाट ३ नेत्र ७ कणे ५ नासाह 
आईदक आसन जादिक कछशाराधन और पुरुषसूक्तका | कर » 

न्यास करूंगा ॥ पीछे शुद्ध जगहस ८ ओम हेरम्बायनप्र: | मे सेल ८ नाभि ९ कटि१०जघन ११ऊरु १ रजंघा 

मृत्तिकामाहरासि, हेसम्बके छिप न्‍ मा | * रेजानु १४गुल्फ १५पाद पाएण्णि एबं १६पादतछभागमें स्पश 
राम, हरम्वके लिये नमस्कार हे, मृत्तिका छेता | ६५ । ऐसेही पादतत्ञादि जि: दा 

हूँ इससे मिट्टी प्रहणकर * ओम सुसुखाय नमः” समखके | दो पादतछादि शिखापर्यन्तस्थानोंमें करके फिर 

2 बोलते हुए मू्ि लकी | विपरीत ऋमसे. हस्त न्यास करें । फिर समस्तमूतिका 

द् नाना | स्शे करता हुआ इन सन्त्रोंको पढ़ना चाहिये। * एक' 
चाहिये 5३ मे गे । ।५ चा।हय | कः 

भाहिये। ओम गोरीपुत्ाय नम्नः ? गौरी सुतको तमरफार | न्‍जक अआ 


कहना भी सौवषंतक रहे, न सौवर्षतक दीन ही हों फिर भी 


चाहिये । आसनविधिके बाद पुरुषसूक्तके न्‍्यासोंको करना 


ए 


इन्‍्त इन सन्‍्त्रोंको पढ़कर भगवान्‌ गजाननदेवका ध्यान 

सन्त्रोंका यह अथ है कि, एकदन्त श्प 
कण, गजसद॒श सुख, चतुंभुजी, पाश तथा. अंकु- 
शको धारण करनेवाले, सिद्धिविनायक देवतांका में 
यान करता हूँ,महाव्‌ शरीर,वप्तका ्वनके सह उज्ज्बढा- 
! पन्‍्त, रुद्राक्षमाढ्त, परशु एवं मोद्कोंको धारण 


<._ ख़तानिं, | भाषाटीकासमेलः । 





ब द्‌ «का विश्नेश छसुरराजारचितेश्वर ॥ 
अनाथनाथ स्वज्ञ पूजाथ गणनायक ॥ सहस्शीषेत्यावाहनम्‌॥ विचित्रर॒त्नराचितं दिव्यास्तरण- 
संयुतम्‌ ॥ स्वर्णसिंहासन चारू गृहाण सुरपूजित ॥ पुरुषण्वेदं- आसनं० ॥ सर्वतीर्थसमानीत॑ 
पाद्य गन्धादिसंयुतम्‌ ॥ विप्नराज ग्रहाणेदे भगवन्‌ भक्तवत्सल ॥ एतावा० पाद्यम्‌॥ अध्ये च॑ 
फलसंग्रक्त गन्धपुष्पाक्षतेय्नतम्‌ ॥ गणाध्यक्ष नमस्तेस्तु ग़ह' करुणानिधातिपादूध्व० अधध्यम ॥ 
दध्याज्यमथुसंयुक्ते मधुपक मयाहतम्‌ ॥ ग़हाण सर्वलोकेश गणनाथ नमोस्ठु ते ॥ मधुपर्कम ॥ 
विनायक नमसस्‍्तुभ्यं त्रिदशेरभिवन्दित ॥ गड्ाहतेन तोयेन शीघ्रमाचमनं कुरू ॥ तस्माद्वि० 
आचमनम्‌ ॥ पयो दधि घ्र्त चेव शकेरामधुसंयुतम्‌ ॥ पथ्चामृत गहाणेद स्‍्नानाथ गणनायक ॥ 
पश्चाम्तस्नानम्‌ ॥ गड्ादिसवंतीर्थभ्य आनीत॑ तोयमुत्तमम॥ मकक्‍त्या समर्पित तुभ्यं स्नानाया- 
भीष्ठदायक ॥ यत्पुरुषेण० स्नानम्‌ ॥ रक्तवखयुग देव दिव्य काव्वनसंभवम्‌ | सर्वभ्द गहाणेद॑ 
लम्बोदर हरात्मज॥ त॑ यज्ञ०वस्धम्‌ ॥ राजतं बहासूत्र च काश्वनं चोत्तरीयकम । गहाण चार 
'सवक्ञ भक्तानां वरदों भव || तस्मादज्ञात्सवंहुतः संभ्ृतम० यज्ञोपवीतम्‌ । उद्यद्धास्करसंकाशं - 
सन्ध्यावदरुणं प्रभो | वीरालड्डरण दिव्ये सिन्दूरं मतिगह्मताम ॥ सिन्दूरम ॥ नानाविधानि 
दिव्यानि नानारत्नोज्ज्वलानि च।॥ भूषणाने गहाणेश पार्वतीभियनन्दन । आमरणानि।॥| 


मोदकासक्तशुण्डाग्रमे कद॒न्तं विनायकम्‌ ॥ ध्यानम्‌ ॥ आवाहयामि 





करनेवाले, शुण्डके अग्रभागमें मोदककों प्रहण करते हुए 
एक दुन्तविनायक भसगवाबूका मे ध्यान करता हूँ आवाह- 
यामि! इससे आबाहनके छिय प्राथना करे। इसका यह 
अथ है कि हे विपन्नराज ! हे समस्त देवता एवं असुरोस 
पूजित ! है अनाथथोके नाथ ! है स्वेज्ञ | हे गणचायक ! 
आपका पृजन करनेके छिय आवाहन करता हूं। और 
“ सहसखजशीर्षा ” इस वदिकमन्त्रको पढके आवाहन करे। 
(विचित्र! इससे आसनपर विराजमान होनेकेलिय प्रार्थना 
करे। इसका अथ यह है, हे सुरपूजित | आपके विराजमान 
होनेके लिय विविधरत्नोंस जडा हुआ, दिव्य आस्तरणसे 
शोभित, यह सुन्दरसिंहासन है, आप इसे स्वीकृत करिये 
“ओम पुरुष एवेद” इस मन्त्रकी पडकर आसनपर विरा- 
जमान करे । 'सवतीथ! इसमें पाद्यग्रहणक लिय प्रार्थना 
करे, इस छहोकका यह अर्थ हें कि, है विप्नराज ! हे मग - 
वन्‌ ! हे भक्तवत्सछ सभी तीथोंसे प्राप्त किया हुआ गन्धा- 
दिस संयुक्त यह पाद्रह आप इसे स्वीकृत करें। फिर 
४एतावानस्य”' इस मन्त्रसे पाद्य प्रदान करें। “अध्ये व ! 
इससे अध्य ग्रहणके. लिये प्राथना करे, इसका अथ है कि, हे 
गणाध्यक्ष ! हे करुणानिधि ! आपकेलिय प्रणाम है, आप 
ग़न्ध पृष्प एवम्‌ अक्षतसे युक्त इस अध्यको ग्रहण करो 
“त्रिपादुध्बे घुदेत्‌”” इस मंत्रस अध्येदान करे। “दृष्याज्य”' 
इससे मधुपक दानकरे। इसका जथ यह है कि; हे सब 
लोकोंके ईश्वर ! हे गणनाथ ! आपके छिय प्रणाम हैं, दृधि, 
घृत और सहत इन तीनों द्र॒व्योंको कांत्यसम्पुटमें घरकर 
मधुपके तेयार किया हैं; आप इसे स्वीकृत करिये। विना- 
यक! इससे आचगबनके छिय प्राथना करे | इसका यह अथ 
१९ 


है छि, हे विनायक ! हे त्रिदर्शोंके पूज्य ! आपके लिये 
प्रणाम हैं, आपको आचमन करानेके छिये गक्काजल ढे 
आया हूं, आप इससे शीघ्र आचमन करें तथा “ ओम 
तस्मा द्विरडजायत ”” इससे आचमन करावे । “ परयोद्धि 
इससे पश्चास्ृत स्नान करावे,; इसका अथ यह हे कि, हे गण” 
नायक ! आप दूध, द्धि, घुृत, शर्कका और सहत इन पर्ा- 
मृत रूप द्रव्योसे स्नान करें, “ गड्जादि ? इससे शुद्ध स्नान 
करनेक लिय प्राथेना करें; इसका अथ॑ यंह हे, गड्भाइडदि 
सभी पवित्र तीथाँका यह जछ छाया हुआ है है अभिरूषित 
पदार्थोके देनवालल ! आप इससे स्नान करें, “ ओम यत्पुरु- 
बेण ? इससे स्नान करावे। “ रक्ततख्र ? इसस वस्ध घारण 
करनेकी प्रार्थना करे, इसका अथ यह हें कि; हे देव ! हे 
लम्बोदर ! हे शिवकुमार ! हे सर्वे पुरुषाथाके देनेवाले ! ये 
दिव्य सुवर्णके तन्तुओंस बन हुए दो बस हैं, आप इन्हें 
धारण करिये, “ते यज्ञ बहिंषि ” इससे एक थोत, वस्य 
दूसरा अगोछा घारण करावे। ' राजतं ब्रह्म ” इससे डुपट्टा 
घारण करावे; इसका यह अथ है कि, चाँदी ओर सुवर्णके 
सू्तोकासा यह डुपट्टा हें हें स्वेज्ञ ! आप इस सुन्दर वख्रकों 
धारण करो और भक्तोंको वरदान दो । “ओं तस्मायज्ञात्‌” 
इससे यज्ञोपणीत पहनावे “ड्यड्रास्कर ” इससे सिन्दूर 
चढावे; इसका अथ यह हैं कि; उदय होते हुए सूयंक सदश 
और सन्ध्याके समान छाछवणे, वीरताका आभूषण रूप 
यह सिन्दूर हे हे प्रभो! इसे स्वीकृतकरो । नाना ' इससे 
आभूषण पहरावे; इसका यह अथे हें कि; हे श्भर एवं 
पावेतीके परम आनन्द करनेताले ! इन नानाविध दिव्य 
रत्न जड़ित आभूषणोंको धारण करिये । कस्तूरी इससे 


च्ह्क 


_्ञर 


कस्त्रीरोचनाच-द्रकुडकुम श्र समन्वरितम। विलेपन सरश्रेष्ठ चन्दनं प्रतिगह्मताम्‌ ॥ तस्मादज्ञा 
न्सवहुत ऋच इति गन्धम ॥ रक्ताक्षतांश्व देवश गूहाण दवरदानन ॥। ललाटपढटले चन्द्रस्तस्यो- 
परि विधार्यताम्‌ ॥ अक्षताव ॥ माल्यादीनि खुगधीनि० करवीरेजातिझमेश्वंपकेबकुले: गुभेः ॥ 
शतपत्रश्व कहा रेरचेयेहरणनायथकम्‌ ॥ तस्मादश्वेति पृष्पाणि॥ अथाड्रपूज हि -गणेश्वराय नमः 
पादी पूजयामि ॥ विश्नराजाय” जाहुनीपृ०। आखुवाहनाय० ऊरूपू० । हेरंबाय” कटीएू०। 
कामारिसूनवे० नाभिंपू० । लंबोदराय उद्रंपू० | गौरीखुताय०” स्तनौप० । गणनायकाय० 
हृदयंपू० स्थूलकर्णाय० कण्ठंपू० । स्कल्दाप्रजाय० स्कंधौप० । पाशहस्ताय० हस्तोपू० | गन 
वक्ताय० वक्रपू० । विन्नहर्तनेन० ललाटपृ० । सर्वेश्वराय० शिरःपू० | गणाधिपाय ० सर्वाक्ृंपू०- 
अथ पत्रपूजा--सुमुखाय० मालतीपत्रं समपंयामि | गगाधिपाय भड्धराजपत्रम० । उमापुत्राय० 
बिल्वपृ० । गज्ञाननागय० श्वेलदूवोंप० | लंबोदराय० बदरीप० । हरसूनवे ० घत्तर॒प० । गज़कण। 


ब्रतराजः। 


(“१४६ ) 





काय० तुलसीप७ वक्रत॒ण्डाय० शमीपत्र॑० । गुह्मग्रजाय० अपामागेप० । एक्दस्ताय० बृहतीप० 
- विकूटाय० करवीरप० । कपिलाय० अकंप० गजदन्ताय० अज्ञुनप० । वश्चराजाय॒० विष्णुक्रां- 


ताप० । बटवे० ढ्‌। डिमीपबत्रम्‌ | सुराग्रज्ञाय० देवदा[रूप० । मालचन्द्राय० मरूप० । हेर्म्बाय० 


.अश्वत्थप० । चतुझ्चुजाय० जातीप० | विनायकाय० केतकीप० । सर्वेश्वरायण अगस्तिप० | 


दशा गग्युलुं धूपं सुगर्ध च मनोहरम्‌ ॥ गृहाण सर्वदेवेश उमापुत्र नमोस्तु ते ॥ यत्पुरुषम० 


' धूपम्‌ ॥ सर्वेज् सर्वलोकेश चेलोक्यतिमिरापह । शहाण मड़ढूं दीप रुद्रप्रिय नमो5स्तु ते॥बात्म- 
'णोःश्य ० दीपम्‌ । नेवेद्य गह्यतां देव" नानाखाद्यमय दिव्य॑ नेवेद्य॑ ते ---777+__-... 7 नाखाद्यमयं दिव्य॑ नेवे ते निवेद्तिम्‌, मया भक्त्य। । मया भक्त्या 
लि अीज द अधर ता» 37. 900 कि, पीज " िन  ििआजआ ला: 


छुगन्धित चन्दन चढानेके ढिये प्राथंना करे,, इसका अर्थ | स्कार है सर्वाका पूजन करता हूँ ॥ पत्र पूजा-सुमुखके 
यह है कि, है सुरश्रेष्ठ | कस्तूरी, गोरोचन, कपूर और केसर 


इनसे मिश्रित ( छाछ ) चन्द्नके विढेपनको प्रहण करो | | उमाके पुत्रके लिये बिस्वपत्र, गजाननके छिय सफेद दूब, 


( (८ ञ्् / | ० चर क्र 
“तस्माचज्ञात्सवं” इसस उस ( छाल ) चन्दनको विलेपन | ढम्बोदरके छिय बेरका पत्ता, हरके सूनुके लिये. धत्रेके 
हे आह हे व 2 हुए चावलछ रा | पत्ते, हाथीकेस कारनोंवालेके लिये तुलसी के पत्ते, वबऋतुण्डके 
् । + ॥ सट्ट ॥ 6७०५. कक ७. कप डे €९० का छू कक 
ई हे बज भव आर क रा उलवाढू ; इन | छिय शप्तीके पत्ते, गुहके बडे भाइके लिय ओंगाके पत्ते 
52 के ल्यादीनि' या 0 परद्रमाक ऊपर धारण | एकदन्तक लिय बृहतीके पत्त विकटके लिय करवीरके पत्ते, 
न! माल्यादीनि' इस पूवोक्त मन्त्रस एवम 5रवीर। | कपिलके लिय अंक पत्ते गजद॒न्तके छिये अजुनके पत्ते, 
माठती, चम्पा, सोडसरी, कमल और 05 मलक | लधराजके हियि विष्णुक्रान्ताके पत्ते, बुक लिये दाडिमके 
फूलोंस गणेशजीकी पूजा होनी चाहिये। इस्‌ संत्रस तथा | _> कक 2 लि अल सर 
'बस्मादश्वा भज्ञायन्त ” इस संत्रसे फूछ चढ़ाने चाहिये। |» छसुराप्मजक छिय देवदारुके पत्त, सालचन्द्रक 


अज्ञपूजा-गणेश्वरके लिये . गस्कार है चरणोंका पूजन [ मरुएके पत्ति, हेरम्बके छिय पीपलके पत्त, चार भुजावां- 


करता हैं; विन्नराजके लिये नमस्कार है जातुओमें पूजन | टेंके लिए जातीके पत्ते, वितायकके लिये केतकीक पत्त 
करता हूँ, मुसेका वाहन रखनेवाढेके लिये नमस्कार है और सर्वेश्वरके छिय अगस्तिके पत्ते समर्पित करवा हू | 
का पूजन करता हूँ, हेरम्बके लिये नमस्कार है कटीका | दशाई' इस छोकसे धूपके लिये प्राथेना करे, “ य॒त्युरुष 
उजन करता है। कासके वेरीके सुतके लिये नमस्छार हे | अदृधु/” इससे धूप करे | * स्वज्ञ ” इस ज्कोकसे दीपकके 
दे नाभिका पूजन करता हूं, ढम्बोदरके लिये नमस्कार उद्‌- | लिये प्राथना करे, इसका यह अथे हे कि, हे सर्वक्ञ हे 
रका पूजन करता हूं, गोरी सुबके लिये नथस्कार, स्तनोंका | त्रिकोकीके अन्धकारको नह करनेवाले | है रुद्र भगवानके 
पे फैला हैँ, गणनायकके डिये नमस्कार हृदयका पूजन | पियारे ! आपके छिये प्रणाम है, आप मालिक दीपकको 
करता हूँ; स्थूछ ऊानवालेके लिय नमस्कार है ३ | स्वीकृत करो । तथा “ब्राह्मगोउश्यमुख”” इससे दीपक प्रज्व- 
जि बज बा रखनेबालके छ्यि नमत्कार | णके ल्यि आथूना कर । उस ग्राथनामें “लवदं गह्मतां देव 
स्कार है पूजन करता है. हि लेक लिय नम- | इस पूृ्वोक्त ग्लो कऊैका या “नाना खाद्यमय ?” श्स . ज्होकका 
स्छार हे ढछाटका पूजन करता ६। सब, मे टिय नेम- | इचारण हे कह अर्थ यह हे कि, हे पाव॑ती: 
(कार है शिरका पूजन करता है। हवा के लिये लम- 
के । शाश््जनचछे लियि त्म- | 





 बिध भक्ष्य, भोज्यादि पदाथौसे मधुर नेवेद्य भक्तिपूवक 


| “नदन . है गणाघिराज़  .! जैंने आपके छिये नाना- 


ना 


| लिये मालतीके पत्र, गणाधिपके लिये भक्गराजके पक्ति | 







भार प्र 22 22270 2770 020 


ब्रतानि, भाषादीकासमे तः । ( १४७ ) 





शिवापुत्र गृह्दाण गणनायक ॥ चन्द्रमामन० नेवेद्यम्‌ ॥ ण्लोशीरलबड्रादिकपूरपरिवासितम ॥ 
आशनाथे कृत तोयं शहाण गणनायक ॥ मध्ये पा० उत्तरापो० सुखत्रक्षालनम | मलूयाचलस॑ 
भूत कपूरेण समन्वितम्‌ । करोद्वतेनक चार ग़ह्मतां जगतः पते ॥ करोट्टलेनम ॥ बीजपूरा- 
म्रपनसखजूरीकदुलीफलम्‌ ॥ नारिकेलफल दिव्य ग्रहाण गणनायक ॥ इदं फल मथा० फलम्‌॥ 
एकर्विशतिसंख्याकान्‌ मोदकान्‌ पृतपाचितान्‌ ॥ नेवेद्य सफल दद्यान्नमस्ते विप्ननाशिने॥ 
गणेशास० मोदकापे० । पूगीफर् मह॒द्दिव्यं नागवलल्याद० ताम्बूलम्‌ ॥ हिरण्यगर्मेति-दक्षिणाम॥ 
वज्रमाणिक्यवेदूर्यमक्ताविहुम माण्डितम्‌ ॥ पुष्परागसमायुक्ते भूषणं प्रतिगह्मताम ॥ भूषणानि ॥ 
दूवायुग्म॑ गृहीत्वा तु गन्धपुष्पाक्ष तेयेतम्‌ ॥ पूजयेत्सिद्धिविश्नेशं प्रत्येक॑ पूर्वनामन्निः ॥ गणा- 
थिप नमस्तेःस्त उमापुत्राधनाशन ॥ एकदन्तेभवक्नेति तथा मृषकवाहन ॥ विनायकेशपुत्रेति 
सर्वेसिद्धिप्रदायक ॥ कुमारगरवे नित्य पूजनीयः प्रथत्नतः ॥ इतिदूर्वापेणम्‌ ॥ चदुद्घादित्यौं च 
धरणी विद्वदश्निस्तथेव च ॥ त्वमेव सर्वेतेजाँधि आतिक्य॑ प्रतिगह्मयताम्‌ ॥ नीराजनम ॥ विद्ने- 
श्र विशालाक्ष सर्वाभीह़फलप्रद ॥ प्रदक्षिणं करोमि त्वाँ सर्वान्कामान्‌ प्रयच्छ मे ॥ नाथ्या 
आसीदिति प्रदक्षिणां० नमस्ते विन्नसंहत्रे नमस्ते इंप्धितम्द ॥ नमस्ते देवदेवशः नमस्ते गण- 
नायका। सत्तास्यासन्परि० नमस्कारोनविनायकेशपुत्रः त्व गणराज सुरोत्तर॥ देहि म॒ सकलान्‌ 


०३:०० कप: अाताबन्वप....0त6त666ल्‍ल्‍ुक्‍.६.९: ०० मापा: ४2 :रमस्ककाबएरा अत कामपफफ पा प्रयशाकपफारएए४ा४760:44४ 94 एप यपपपक-4५,027:24०७ ५. 





निवदित करदिया हैँ, आप इसे स्त्रीकृत करिये इससे तथा। “ओम उसापुत्राय नमः” जमापुत्रके छिये नमस्कार है, 
“ चन्द्रमा मनसो ” इससे नेवेद्य चढावे . “एलोगीर- | “ओम अघ नाशिनेनमः” अघना शीके लिए नमस्कार हैं, 
छवज्भादि”' इससे जछू पिछ७ कुछ्ला तथा मुख प्रक्षाछ॒न | ओम एकदन्ताय नमः” एक दांतवालेक छिये नमस्कारहै 
करावे | इसका यह अथ हैं कि, है गणनायक ! इछायची | “ओम इभवक्त्राय नम.” हाथीके मुखवालके लिए नम्त- 
खशखश, लवज्ञ और ऐसी ही दूसरी २ सुगन्धित वस्तुएं | स्कार है, ओम मूषकवाहनाय नमः” समूसके वाहन रख- 
तथा कपूरस सुवासित किया हुआ यह जछ आपके पीने | नेवारढेके छिए नमस्कार हैं “विनायकाय नमः” विनायक 
आदिके लिए हैं, इससे इसे स्वीकृत करिय, “मल्याचछ”? | के छिए नमस्कार है, “ओम इंशपुत्रायनमः”? इंशक पुत्रके 
इससे करोद्वतेन क इसका अर्थ यह हे कि, हे जगत्पते ! | छिए नमस्कार है; “ओम सवसिद्धिप्रदायनमः” सब सिद्धि- 
चन्दून और कपूरको घिसकर आपके करोद्वतेन करानेके | योंको देनेवालेके छिए नमस्कार है, “ओम कुमारगुरवे-* 
लिए छाया हूं, आप इस सुन्दर करोद्वतेनको अगीकार | नमः” कुमारके गुरुके छिए नमस्कार हे। इन नामॉसे दुर्वा- 
करो । “बीजपूराम्रम्‌'” इससे तथा 'इदू फल” इस पूर्वोक्त | से प्रयस्वके साथ पूजनकरना चाहिए । फिर “चन्द्रादित्यो 
जोकस फल भोग छगावे, इसका यह अथ हे-हे गणनायक | इससे नीराजन करे। इसका अथे यह कि. है देव ! आपही 
बीजपूर, आम, कटहर, खजूर, केछा और नारियलके फलों | चन्द्रमा आपही सूय आपही प्रथ्बी आपही विद्युत, आपही 
को ग्रहण करो | फिर इककीस रूड्डुओंका फर्लोंके साथ | अग्नि और आपही सब चन्द्रमा आदिकोंको प्रकाशित कर- 
गणपतिक भोग छूगावे ओर “एकर्विशति” इस जोकका | नेवाले तेज: स्वरूव हैं। आपका निराजन करता है, आप 
उच्चारण करे | इसका अथ यह है कि, घीके इक्कीश | स्वीकृत करो, हे विष्नेश्वर ! हे 'विशालाक्ष ! हे सबवांछि- 
लड्डुओंका नेवेद्य, फलोंके साथ आपको चढाता हूँ. विश्नों | तफछोंको देनेवाले ! आपकी प्रदक्षिणा करता हूँ । आप 
को नष्ट करनेवाले, आपके छिए प्रणाम हैं। और “गण- | मेरी सब कामनाओंको पूणे करो। इस अकार प्रार्थना 
शाय नमः मोदकानपर्यामि” गणेशको नमस्कार है, मोद- | करके “नाभ्या आसी” इस मन्त्रको पढता हुआ प्रदक्षिणा 
कॉका अर्पण करता हूं इस वाक्यकाभी छद्चारण करे। | करे। “ओम नमस्ते विन्न' इस इकोकको तथा “सप्रास्या- 
“पूगीफर्छ” इससे ताम्बूछ ओर पूृगीफल चढावे, “हिर-।| सन्‌! इस मन्त्रको पढला हुआ पूत्नके अन्त्म प्रणाम करे । 
ण्यगरभगभस्थ” इस पूर्वोक्त मन्त्रकों पढता हुआ दक्षिणा | इस सछोकका यह अथे है कि; आप .विष्मोंके संहारकारी 
' चढावं; वजमाणिक्य” इससे र्नाभरण चढाव। अर्थ | हैं, आपके लिए प्रणाम है, हे वांछित फलोंके देनेवाछे! 
यह है कि; हीरा, माणिक्य, बेडूये, मोती, मूँगा, ओर पुष्प- | आपको प्रणाम करता हूँ, हे देवदेवेश | आपके छिएप्रणाप 
राजस जटित आभूषणोंको धारण करिए। फिर दूबके दो | है, हे गणनायक ! आपके छिये प्रणाम है “बिन/यक” इस 
दूछ तथा गन्ध. पुष्प और अक्षतोंकों लेकर पृवोक्त ब्राम | छोकस तथा “यज्ञेनयज्ञ” इस मंत्रस पृष्पाखल्ि प्रदान 
मन्त्रोंस सिद्धि तथा विन्नोंके पति देवगणेशजीका पीछे | करे। इस श्लोऋका अर्थ यह हे कि, हे विनायहू ! हे ईश- 
“ओम गणाधिपायनसः” गणाधिपके लिए नमस्कार हे | पुत्र | हे गणराज ! हे सुरोत्तम | हे सिद्धि विनायक ! 






( ११८ ) बलराज: |] 


[ चतुधी- 


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भम्‌ ॥ गणेश त्व॑ प्रसन्नः सन्‍्सफल कुरु सवेदा॥ विनायक गणेशान सर्वेदेवनमस्कृत ॥ पार्व॑ती- 
प्रिय विष्ेश म्तम विश्नान्निवारयथ ॥ प्राथनाम्‌ ॥ अथेकविंशति गृह्म मोदकान पृतपाचितान्‌ ॥ 
स्थापयित्वा गणाध्यक्षसमीपे कुरुनरदन ॥ दश विप्राय दातव्याः स्थापयेदश आत्मनि॥ 
एकं गणाधिपे दद्यात्सवृतं मोदक शुभम्‌ ॥ दशानां मोदकार्ना च फलदक्षिणया युतम्‌ ॥ विभाय 
फलसिद्धयथ वायन प्रददाम्पहम्‌ ॥ वायनमन्त्रः ॥ विनायक रय प्रतिमां वस्थयुग्मेन वेश्नि- 


कामान्वन्दे सिद्धिविनायक ॥ यज्ञेनयज्ञ० मन्त्रपृष्ष स० ॥ यन्मयाचारतं देव ब्रतमेतत्सुदुले- 


ताम्‌ ॥ तुम्य॑ संप्रददे विप्र श्रीयतां मं गजाननः ॥ गणेशः भतिगद्वाति गणेशो वे ददाति च॥ - 


गणेशस्तारकोमाम्यां गणेशाय नमोनमः ॥ इति प्रतिमादानमन्त्र॥ अथ कथा॥ शौनकादया ऋषि 


गणा नेमिषारण्यवासिनः ॥ खूतं पोराणिकश्रेष्ठमिदमचुरवेचस्तदा ॥ १ ॥ ऋषय ऊचुः ॥ निर्वि- 
प्रेन तु कार्याणि कथ॑ सिद्धयन्ति सूतज ॥ अधन्विद्धिः कथ्थ नृणां पुतुसोभाग्यसम्पदः ॥ २॥ 
दम्पत्योः कलहे चेव बन्धुमेदे तथा नणाम्‌ ॥ उदासीनेषु लोकेषु कर्थ सुमुखता भवेत्‌ ॥ ३॥ 
विद्यारम्मे तथा नृणां वाणिज्ये च कृषों तथा ॥ नृपतेः. परचक्के च जयसिद्धिः करथ्थ॑ भवेत ॥५ 
कां देवतां नमस्कृत्य कार्यल्िद्धिमवेन्त्रणाम्‌ ॥ एतत्समस्तं विस्तार्य बूहि मे सूत पृच्छतः ॥५॥ 
खूत उवाच .॥ सतन्नद्धयोः पुरा विशाः कुरुपाण्डबसेनयोः ॥ प्ृष्टवान देवकीपुत्र कुल्तीपूत्रो 
युधिष्ठिःः ॥ ६॥ युधिष्ठिर उवाच ॥ निर्विश्नेन जय॑ मह/ं बद त्व॑ देवकीखुत ॥ का देवतां 


नमस्कृत्य सम्यआज्यं लभ्षमहि ॥७॥ कृष्ण उवाच॥ पूजयस्व गणाध्यक्ष मुमामलसम॒द्ध- 
व्‌ ॥ तस्मिन्सम्पूजिते देवे धुवं राज्यमवाप्स्पसि ॥ ८ ॥ युधिष्ठिर उवाच ॥ देव केन विधा- 


आपको ग्रणाम करता हैं आप मेरे छिए सब वाब्छित | तस्‍्वको जाननेवाले सूतजीसे ये वचन बोडे ॥ १ ॥ कि हे 


पदाथोंको प्रदान करो । 'यन्मयाउ<चरिते! इन रोकोंसे पूतनंद्न ! किस उपायंके करनेसे काय्य निर्विन्न सिद्धिहोते' 


क्षमा प्रार्थना करे, इनकाअर्थ यह हे कि, हे देव ! हे गणेश! | हैं मनुष्योकी पुरुषा्थ सिद्धि किस उपायसे होती है, पुत्र 
नो मैंने यह दुरम ब्रत किया हे, इससे आप प्रसन्न होंऔर | पोत्रादि सौभाग्म और सम्पत्ति कैस प्राप्त हों ! इस कहिये 
इस त्रतको पूर्णतया सफल करें ! हे विनायक ! हे गणेश ! | यदि ख्री और पतिका कलह हो या बान्धवोंमें पारस्परिक 
है सव देवताओंके पूज्य ! हे पाव॑तीके पियारे| हे विश्नेश्वर ! 
आप मेरे विश्नोंको निवारण करिये फिर पहिले इक्कीशघी के 
छड्डू गणेशजीक समीप स्थापित करके पीछे हे युधिष्ठिर ! 
, उनमेसे दश कथा सुनानवाले ब्राह्मणको देदे और द्श 


क्या करना चाहिये जिससे यह सब शांतहो ।।३॥ विद्या- 
रम्म, वाणिज्य, खती, दूसरे राज्यपर राजाके आकरमणके 
कॉका अं शा | समय जय तथा सिद्धि किस उपायको करनेसे होती हे 
४ स्‍ हक कप जा हि मोदकको गा _॥ ४ ॥ किस देवताकी आराधनाकी जाय ? जिससे काय- 
है रहने द॑ और ब्राह्मणणको जब दशमोद- शा फिय 
दे 2 न छू हा, च्छी त्‌ 
दे उस समय फल और दृक्षिणाभी देना चाहिये सिद्ध हो, हमारे छिय इन सब प्रश्नोंका अच्छी तरह 





ओर प्रार्थना भी करनी चाहिये मैं इन दश मोदकोंको के | उत्तर दें ॥५॥ सूतजी बोले कि, हे विप्रो ! जब कौरव वथा 


एवं दक्षिण।के साथ ब्राह्मणको वायनाके रूपमें दे रह हूं, 
इसस यह ब्रत सफल हो जाय, फिर 'विनायकस्य! इन दो 
शोक को्‌ पढ़, गणशजीकी प्रतिमा दो व्बोंके साथ ब्राह्म' 


'पाण्डवॉकी सेना परस्पर युद्धके लिए तैयार 'खडी हो रही 
थी:उस समय कुन्तीनन्द्न राजा युधिषप्ठिर देवकीनन्दन 
हर जे 0 उमीक गदोब भगवानसे पूछने छगे कि, हे देवकीनेदन ! निविष्न जय्राप्त 
बस्रोंसे भेष्टित चाहिये। इनका अथ यह है कि, ताह्मण | दो | करनेका उपाय मेरे छिये बताइये, किस देवताकी आरा 
बज इस विन्ायक देवकी अतिमाका आपके ढिय | धनाकी जाय जिससे जयपूर्वक राज्य मिछे उस देवताकी 
झजीही ५ व हक पक पर प्रसन्न हो जय गणें- | आराधनाका उपदेश मुझे करिए ॥ ७॥ क्रष्ण बोले कि, है 
जीही  अलेश ह बह, तथा हैं जाह्मण | ु गणश- राजन ! पावतीजीक मेलठसे जिन्होंनें अववार लिया हैं ऐसे 
जीको बारंबार.प्रणास है न करनवालं है, अतः गणश्ञ |। 
(निवास करनेवारे झौनक हैं ॥ ब्रत कथा-लेमिषारण्यसैं ' 
«४ फरनेताद झोनकादि सहर्विज्न पुराण 





आप राज्यको पाजायेंगे इसमें कोई सन्देह नहीं है॥ ८॥ 


है 
भू 


फूट पडजाय, या अपनेमें छोगोंका प्रेम नरहे तो उस समय 


गणपतिदेवका पूजन करो, क्योंकि: उनका पूजन करनेसें 


ण शाज्ओोंके युधिष्ठिर बोढुकि, हे देवदेव ! किस विधिके अनुसार गणः 


... जाट के 


व्रतानि ( १४९ ) 


नेन पूजनीयों शणाणिए। ॥ पूजितस्तु तिथों कस्यां सिद्धिदों गणपो भवेत्‌ ॥९॥ कृष्ण उवाच ॥ 
मासि भाद्रपद शुक्ल चत॒थ्यों पूजयन्नप ॥ मासि मांधे आवणे वा मानशीडथवा भवेत ॥ १० 

गज़वकं त शक्लायां चतुथ्यों पूजयेत्रपा।|यदा चोत्पद्यते मक्तिस्तदा पूज्यों गणाथिप) ॥९१९॥ आतः 
शुक्कतिलेः स्‍्नात्वा मध्याहे पूजयेतन्रप । निष्कमात्रसुवर्णन तदथार्धेन वा पुनः ॥२२॥ स्वशक्तयथा:- 
गणनाथस्य स्वर्णरोप्यमयाकृतिम्‌ू ॥ अथवा मृन्मयी कु्ोद्धित्तशाठबं न कारयेत्‌ ॥ १३। 
एकदन्तं शुपकर्ण गजवक्न चतुशुजम ॥ पाशाइुकुशधरं देव॑ ध्यायेत्सिद्धेविनाथकम्‌ ।| १४। 
पॉत्वा चानेन मल्त्रण स्नाप्य पश्चामृते! पृथक ॥ गणाध्यक्षेति नाम्ना थे गन्ध दद्यात् 
भक्तितः ।। १५॥ आवाहनारें पाद्य च दत्वा पश्चात्मग्त्नत)॥ रक्तवस्युर्ग स्ेप्र्द दद्यात्व 
भक्तितः ॥ १६ ॥ बनायकेति पृष्पाणि धूपं चोमासुताय च ॥ दीप रुद्रभियायेति नेवेध 
विप्ननाशिने ॥१७॥ किश्वित्सुवणपूजां च ताम्व्॒ल च समर्षयेत ॥ ततो दृवाडकुरान गद्य 
विशतिं चेकमेव हि॥ १८ ॥ पूजनीयः प्रयत्नेन एसिनामपढदेः परथछू ।। गणादेप नभस्तेष्स्तु 
उमापुनाधनाशन ॥ १९॥ विनायकेशपुत्रेति सर्वेसिद्धिभदायक ॥ एकदन्‍तेमवक्केति तथा. 
मूषकवाहन || २० | कुमारणशुरवे तुभ्य पूजनीयः प्रयत्नतः ॥ दूवायुग्म गहीत्वा तु गह्नच-- 
पुष्पाक्ष लेयुतम्‌ ॥ २१ ॥ एकेकेन त॒ नाम्रा वे दच्वेक॑ सर्वनामाने:॥ अथेकर्विंशातिं गृह्या मोद- 
कान्‌ घृतपाचितान्‌ ॥ २२ ॥ स्थापयित्वा गणाध्यक्ष समीषे कुरनन्दन ॥ दशा विमाय दातव्या$ 
स्वयं ग्राह्मास्तथा दशा ॥ २२॥ पक गणाथपे ददह्यात्सनवेद्य नुपोसम ॥ विनाथकस्य प्रांतेमां 
ब्राह्मगाय निवेदयेत्‌ ॥ २७ ॥ विनायकस्य प्रांतिमाँ वख्युग्मेन वेड्िताम॥ तुम्य संभददे 


भाषाटीकासमंलः 
(४९) :2०: 205 5056 072720280:2/ 6 ४ इंआऋ#४ 7 पी 2038 २६०० /४/2% ४९ ५ मटका १ ८ ; 











पतिका पूजन करना चाहिये ओर किस तिथिम पूजनेस 
सिद्धियाँ देते हैं आप कहो ॥ ९ ॥ श्रीकृष्णचन्द्र बोले कि 
है राजन ! भाद्रपद शुद्धा चतुर्थी या श्रावण अथवा मागे 
शी महीनेको शुकहुृपक्षकी चतुर्थीक दिन गणपतिका पूजन 


इससे आधेही दोलेकी सुवणकी॥ १श॥।या चान्दीकी गणपति 
मूति अपनी सम्पतिके अनुरूपबनवालरू, यदि सवंथा सद्लोच 


सम्पत्ति रहते कृपणता न करनी चाहिये ।। १३ ॥ एकदन्त 


पाश और अभेकुशको धारण करनंवाल सिद्धिविनायक 
भगतानका ध्यान करना चाहिय ॥१४ ॥ पीछे ओम सिद्धि 
विनायकाय नमः इन मन्त्रोंसे पच्चाय्तके दुग्ध आदि 
पदषथारस प्रथक्‌ प्रथक तथा संमिलितोंसे स्नान कराबे ओम 
गणाध्यक्षाय नमः इस मन्त्रसे भक्तिपूबक गन्धदान करना 
चाहिये ॥१०॥ और स्नानसे आवश्यकीय काम आवोहन 

आसन, पायाघध्यांदिभी “आ गणाघ्यक्षाय नमः इसी नामस 





| होकर करने चाहियें॥ १६॥ “ओं विद्वायकाय नमः” इस 
| मन्त्रस पुष्प, 'डसासुतायनस» इससे धूप 'रुद्रश्रियाय- 
| नमः) इससे दीपक प्रज्वालन, और विपज्नविनाशिने नमः ?! 


| इससे नेवेद्य चढाबे ओर इसी मन्त्रसे आचमन और ऋतु: 
करिय ।॥ १० ॥ यदि अन्य महीनों गणपति पूजनके | 
लिय प्रेम ज्यादा हो तो उस महीनकी शुक्लाचौथमें ही 
गणपतिका पूजन करलेना चाहिय ॥ ११ ॥ हे राजन | 
प्रातःकाल सफेद तिलोंसे स्नान करके मध्याहमं गणशजीका | करे । हे गणाधिप तेरे छिय नमस्कार है, हे उमासुत ! तेरे 
पूजन करना चाहिये । एक निष्क या आधे निष्क अथवा | 


फर्लोंको भी दे॥१७॥फिर कुछ सुब॒णकी दक्षिणा तथा ताम्बूल 


| समर्पित करके इकीस दुबक अकुर छेकर ॥१८॥ उनकी प्रय- 


व्नके साथ प्रथक्‌ प्रथक़ नीचे छिखे हुए नाम मंत्रोंस पूजन 


लिये नमस्कार है, ह अघनाइन तेर छिये नमस्कार है॥१९॥ 


| हैं विनायक ! तेरे छिय नमस्कार है, हे इंशपुत्र ! तेरे लिये 
| नमस्कार है,है सवंसिद्धिदायक तेरे लिय नमस्कार हैं,हे एक- 
हो दो सत्तिकाकी हो गणपति मूर्ति बनवारढूनी चाहिय पर | दन्त ! तेरे छिय नमस्कार है. हे इभवकत्र तेर लिय नमस्कार 


| है, है मूषकपर चढनंवाल : तेरे छिय नमस्कार हैं २० | 
छाजके सददृश कानवाले;हस्तीके समान मस्तकवाले, चतुझ्चुज | 


तुझ छुमारक गुरुके लछिय नमस्कार है। इसी प्रकार इक्कीसो , 


| नामोंसे प्रयत्नके साथ पूजन करना चाहिये! पीछे गेध, पुष्प 
। और अक्षतोंके साथ दो दो दूब लेकर ॥ २१ 
| नाम मत्रोंमसे एक एक जोडा चढातीवार एक एक बोलना 
| चाहिये, पीछे घीके इक्कीस अच्छे छड़डुओंको छेकर॥४२३। 


इक्कीसो 


गणंशजीके समीपमें स्थापित करके है कुरुनन्दन | उनमेसे 


| दश बआह्यणको देने तथा दर स्वय छने चाहिये ॥२१॥नेवेद 
| समेत एक गणपतिके लिय दे दे, हे नृपोत्तम ! विनायककी 
न्त्रस करने चाहिये स्नानकरानेक पीछे वल्लपहरानाआदिक | 
भी गणाध्यक्षाय नमः ”?इसी नाम मन्त्रसे भक्ति श्रद्धाउन्वित 


मूर्तिको ब्राह्मणक लिये दे देना चाहिय ।२४ || डस समय 
यही प्रार्थना कर कि, हे ब्राह्मण |! में आपको गजानन 





१ पूजनमितिशिषः । २ पाठक्रमाद्थक्रमस्य बढ्लीयस्त्वाससिद्धपूजोक्त: ऋमोउत्र बोघ्य: । 


(१५० ) ब्रतराज३ । [ चहुधों- 
विप्न भ्ीयतां में गजाननः ॥ २५॥ विनायक गणेश त्व॑ सर्वेदृवनमस्कृत ॥ पावेतीभिय 
विप्वेश मम विन्न॑ विनाशय ॥ २६॥ गणशः प्रतिगुह्मति गणेशों वे ददाति च ॥ गणेश- 

(रकोमाम्याँ गणेशाय नमो नमः ॥ २७ ॥ कृत्वा नेमित्तिकं कर्म पूजयेदिष्टदेवताम ॥ 
बराह्मणान्भोजयेत्पश्वादुद्रीयासेेलवाजितम्‌ ॥ २८ ॥ एवं कृते धर्मराज गणनाथस्य पूजने ॥ 
विजयस्ते भवेत्ूनं सत्य सत्य मयोदितम्‌ ॥ २९ ॥ तिपुर हगतुकागेन पूजितः शलपाणिना ॥ 
शक्रेण पूजितः पूर्व वृत्रापुरबधेच्छया ॥ ३० ॥ अन्‍्वेषयन्त्या भर्तारं पूजितोहहल्यया पुरा ॥ 
नलस्थाध्वषणाथाय दमयन्त्या पुराचितः ॥ ३१ ॥ रघुनाथेन तद्बच्च सीतायान्वेषणे पुरा ॥ रन 
सीता महाभागां वीरेण च हनूमता ॥ ३२॥ भगीरथेन तद्बन्व गड़ञामानयता पुरा ॥ अम्नतोत्पाद 
नाथाय तथा देवासुरेरपि ॥ ३१॥ अमृत हरता पूर्व वेनतेयेन पाक्षिणा ॥ आराधितो गणः 
ध्यक्षो ह्म्म॒तं च हत॑ बलात्‌ ॥रे४॥ रुक्षिमर्णी हतुंकामेन पूजितोइसों मया प्रश्चः ॥तस्य प्रसादा- 
द्राजेन्द्र रुक्मिणीं प्रातवानहम्‌॥ ३५ ॥ यदा पूर्व हि दत्येन हतो रुक्मिणिन-दनः ॥ आरा- 
घितो मया तद्दद्गुक्मिण्या सहितिन च॥ ३९॥ कुष्ठव्याधियुतेनाथ साम्बेनाराधितः पुरा ॥ जय- 
कामस्तथा शीत्र त्वमाराधय शाहुरिम्‌ ॥ ४७॥ विद्याकामों लम्नेद्रिय्ां घनकामो धन तथा॥ 
जय व जयकामस्तु पुत्रा्थी विगद्ते खुतान ॥३८॥पततिकामा च भर्तारं सौभाग्य च सुवासिनी ॥ 


; नाप्लुयात्ववचित्‌ ॥ २९॥ बवेष्णव्याद्यासु दीक्षासु आदो पूज्यों 


६... +- पाक >जक्ा >न्मााबक तमाम 












विधवा पूजयित्या तु वेधव्यं 
गणाधिपः ॥ तस्मिन्सपूजिते विष्णुरीशों भालुस्तथा छुमा ॥ ४० ॥ हृव्यवाहमुखा देवाः 
पूजिताः स्थुने संशयः ॥ चण्डिकाद्या मातृगणए परितुष्ठा भवत्ति च ॥ ४१ ॥ तस्मिन्संपूजिते 


चचाआान्व्च््च्च्च्च्णच्च्चख्ाोाणजफपपक्‍क्‍क्ा+++-+-+--+_+_+++++ 
भगवानके प्रतिम्ताका दान करता हूँ, इससे गजानन भग- | ध्यक्षकी ही अचना की थी, गणपत्रिजीकी ही क्ृृपासे वहां 
वान्‌ प्रसन्न सुझपर हों॥२५।गणेशजीका स्मरण करता हुआ | जाकर बल्पूर्वक कछुश छीन लिया॥२४।पैंने भी रुक्मिणी- 


प्राथंना करे कि, हे विनायक ! हे गणेश ! हे समस्त देवता- 
ओके पूज्य ! है पावतीके पियारे पुन्न | हे विश्नोंके इंश्वर ! 
आप मेरे विप्नोंका विनाश करिये ॥ २६॥ गणेशजीही 
देनेवाले हैं, गणशजीही छेनवाले हैं। गणेशजीही हम दोनों 
धजमान एवं आचायके उद्धारक हैं अतः गणेशजीके लिये 
बार यार प्रणाम हे॥२७॥इसप्रकार नेमित्तिक करम्सरूप गण- 
पति पूजनादि अनुधानको समाप्त करके अपने इष्ट रेवताकी 
पूजा करनी चाहिये, पीछ व्राह्मणोंको भोजन कराकर तैल- 
रहिब् वस्तुका भोजन करना चाहिये।॥ २८ ॥ हे धर्मम- 
राज . इस प्रकार गणंजीका पूजन करनेसे तुम्हारा अवच्य 
विजय होगा, इसमें सन्देह नहीं, यह कथन सर्वेधा सत्य 


है॥ २९ | जब त्रिपुरासुरको मारनेके छिये त्रिशुलधारी 
महादेवजीने, वृत्रासुरके विनष्ट करनेकेलिये इन्द्रने पूजाकी 
॥३०||अपने पति गौतमसुन्तिकी प्राप्तिके छिय अहस्याते. 
नलकी प्राप्तिक लिय दमयन्तीने ॥ ३१ ॥ सीताजीकी पुनः 
भाप्तिके लिय रघुनाथजीन, सीताजीके द्शनोंके छिय हतु- 
मानजीने॥ ३९ ॥ गड्जाजीको छानेके लिये भगीरथने, 
भडुकस अमृत निकालनक छिय देवता बथा दैत्योंने भी 
पहिछे गणपतिकीही आराधना की थी और अपने अपने 
चिकोर्षिंत का्यो्ें सफलछताके भागी हुये थे |३ ३॥ और 


कि] बैक 
गरुढने लव देवराजके दाथस अमृतकलशको छीनकेलानेके 


छिय स्वगेष्टी ओर  घावा किया था तब उसने 


भी गणा- | परितुष्ठ होजाते हैं ॥ 


का हरण करनकी इच्छासे भगवान्‌ गणेशजीकी ही आरा 
धनाकी थी उनकेही प्रसादसे में रुक्मिणीको पा गया॥३५॥ 
जब सम्बर दानव रुक्मिणीके पुत्र प्रझँ्नको सूतिकागृहस 
लेगया तब मेने और रुक्मिणीने गणेशजीकी पूजाकीडसीके 
अतापसे हमको प्रद्युश्न फिर ग्राप्त होगया ॥ ३६ ॥ जब 
साम्बके कुष्ठ होगया था उस समय उसने अपने कुछ रोगकी 
निवृत्तिक लिय गणपतिकी आराधना की थी जिससे उसे 
निरोगता प्राप्त हो गयी। इसलिय हे राजन ! तुम भी 
यदि अपनी जय चाहते होतो शह्भुरनन्दन गणराजकी शीघ्र 
आराधना करो ।| ३७ ॥ क्योंकि गणेजीकी पूजा करनेसे 
विद्यार्थों विद्याका, धनाथ्थी घनका, जयार्थी जयका, पुन्नार्थी 
पुत्रोंका ॥ ३९ ॥ पतिकी कामनावाल्ली कन्या पतिका, 


सुवासिनी सौभाग्यसस्पत्तिक्रा छाम छेते हैं। वेधव्यदुःख्से 


पीडित हुई श्री, यदि गणेशजीकी पूजा करे तो फि ' वह 
_न्मजन्मान्तरमें कभी भी वेधव्य दुःखको नहीं देखती। ३ ६॥ 
वेप्णबी शेबी आदि जब दाक्षीगहण करती हो उस समयमें 
भी पहिंले गणेशजीकाही पूजन कराना चाहिये। क्‍योंकि 
गणशजीके पूजन करनपर विष्णु, महादेव, सूर्य, पाब॑ती 
॥४०॥ और हुताशन आदि सभी देव पूजित- हो जाते 
है इसमें सन्देंह नहीं है, चण्डिकादि मातृगण भी 

४१ ॥ सूतजी भ्रुनियोंसे कहते ६ 









ल्‍$:--4.- पान 
'स्म्ध्य्मफ्ा 





का 


विश्ना भकत्या सिंद्धि 
त्वं स्व राज्य हत्वा शज़ब्‌ रणाजिरे ॥| 





बिनायके ॥ एवबंकुतले धर्मराज 





गणनाथस्य पूजने ॥ ४२॥ आपस्थ 


सिद्धयन्ति सर्वक्रार्याणि सात्र कार्या विचा- 


कह 


जुगा॥ ४३ ॥ एबडक्तश्त कृष्णेन साहुजः पाण्डुनददनः ॥ पूजयामास देवस्य पुत्र॑त्रिपुरघा- 


तिन& ॥ ४४ ॥ शबह्ुसंघंनिहत्याजों प्राप्तवात्राज्य 
गणेश सिद्धिदायकम्‌ ॥ ४५ ॥ सिद्धबन्ति तस्य कार्याणि मनसा चिः 
गमिष्यते तेन नाज्ना लिदिविनायकः ॥ ४६:॥ य इद॑ 


मोजला ॥ सूत उवाच ॥ 


ये पूजयेन्मन्दभाग्यों 
न्‍्तलान्यपि ॥ खूथालि 
वियुयात्रत्व श्राववेद्ा समाहित: ॥ 


72 


सिद्धयन्ति सर्वकायाणि विन|।यक्रसाइत:;।।४७७॥३ति लिख्धिविमा्यकम भविष्योक्ते संएर्णम्र ॥ 
है .. अत्र चन्द्रदर्शनानषेष; । 
मास भाद्रपदे शुक्के शिवलोके अ्पृजिता ॥ तस्यां स्नान तथा दाने उपबासोएसन तथा ॥ 


क्रियमाणं शतणुर्ण म्रसादाइन्तिनों नूप ॥ चतुर्थीत्यलुषड्रः 


पराशरः-कन्यादित्य चतुथ्यों च शुक्के चर्वस्य 


॥ अस्थामेव चन्द्रदशेने दोषमाह 


दशनम्‌ ॥ मिथ्यातिदूषर्ण कुर्यात्तस्मात्पस्येन्र 


त॑.सदा ॥ तदोबशान्तये मन्त्रो विष्ग॒ुपुराणे-सिंहः प्रसेनमवरवीत्पिहों जाम्बबता हतः॥ खुकु- 


मारक मा रोदीस्तव होष स्यमन्तकः 


॥ अथ स्थमन्तक्ोताख्वानम्‌ ॥ नबन्दिकेश्वर उबाच । श्जुष्वैकास्र- 


चित्तः सन्त्रतं गाणेश्वरं मह॒त्‌ ॥ चतुर्थ्याँ झुक्ृपक्ले तु सदा कार्य अथत्नतः ॥ १॥ सनत्कुमार 


योगीन्द्र यदीच्छेच्छुनमात्मनः ॥ नारी वा पुरुषो बापषि यः कुयांदिधिवद्ध तम्‌ ॥२॥ 


मोचयत्याशु 


विभेन्‍्द्र संकष्टाद्अतिनं हि तव॥ अपवादहरं॑ चेव सर्वविन्नम्गाशनम्‌ ॥ ३ ॥ कान्तारे विषमे वापि 


रणे राजकुलेषथवा ॥ सर्वंध्िद्धिकरं विद्धि ब्रतानाम्ुत्तम॑ ब्तम्‌ ॥ ४ ॥ 


गज़ाननंत्रियं चाथ त्रिबु 


लोकेष विश्वुतम्‌ ॥ अतो न विद्यते बह्मन्‌ सर्वश्षंकट्टनाशनम्‌॥५॥सनत्कुमार उवाच ॥ केन चादो 


पुरा चीणे मत्यछोके कर्थ गतम्‌ ॥ एतत्समस्तं बिस्‍्तार्य ब्रहि 


कि, है मुनिवरो ! सह जय पल ज पूजन कर- | 
नेस ये सब सनन्‍्तुष्ट होजाव हूँ । श्रीकृष्णचन्द्र भगवान्‌ | जाता के 
राजासे कहते हैं कि; हे राजन युविष्ठिर ! इस प्रकार गण- | _ यो है पूर्व जछोकर्मे 
ताथ भगवानका पूजत करनेस | ४२ ॥ तुम्र भी संग्राममें | 
अपने शत्रओंकों मारकर अपनी राज्यसम्पत्तिको प्राप्त होगे। | 
पूजन लय सभी ८ पूण होती हैं इससें कुछ भी | 
पन्‍्दृह नहीं करना चाहिये। ४३॥ भगवान्‌ ऋृष्णने महा- | हहा है कि दस अर ” 
एज्ञ युधिष्ठिरको गणेशजीके ब्रतका अनुष्ठान कहा उक्त |... दा हैं कि, शिहने प्रसेनको सारा, 
पहाराजन भी भाइयोंके साथ त्रिपुरघाती देवके पुत्रकी | 
[जा की | ४४॥ संग्राम शत्ुओंकों मार बलसे राज्य | 
प्राप्त कर लिया । सूतजी शौनकादि मुनियोंसे कहते हैं कि, सदा शुह्पक्षकी चौथके दिन प्रवस्तके साथ करना चाहिये 
जो मन्द प्रारव्यभी हो पर सिद्धिदाता गणपतिका पूजन- | ॥ १) हे योगीन्द्र सनत्कुमार ! यदि अपना भा चाहे 
करे तो ॥ ४५ ॥ उस मन्दभागीके भी मनके विचारे सब | तो खी हो अथवा पुरुष हो वो विधिके- साथ इस ब्रतको 
कार्य सिद्ध होते हैं, आरंभ किये हुए कार्य सिद्ध हों, इसमें | क२ ॥ २ || हे विप्रेन्द्र | यह त्रत, 

तो सन्देह ही कया हैं, इस प्रकार अपने भक्तोंको सिद्धिप्र- | ३ 

दान करनेसे गणेशजीका नाम सिद्धिविनायक असिद्ध हो- | 


गया हैं ॥ ४६ ॥ इस पवित्र आख्यानको जो समाहित | 


चित्तसे सुनता है अथवा सुनावा है उसके सभी कार्य,सिद्धि- 
विन्तयक की ग्रसन्नवास अवश्य सिद्ध होते हैं || ४७ ॥ यह 


भविष्यपुराणकी कही हुई सिद्धि विनायकके त्रतकी कथा | 


[री हुई ॥ 
“ चौथकी सहिसा-उसकी कही हें जो भाद्रपद 'मासमें 
शुक्मपक्ष् आये कि; यह शिवलोकर्मे भी मानी गई है हे 





गाणेशरं व्रतम ॥६॥ नन्दिकेश्वर 


राजच्‌ : इसमें दान, स्लान; उपवास और अचेन जो भी 
कुछ किया जाता हैँ वह गणेशजीकी क्ृपास सौगुना हो 
चतुर्यीका छाम्र असंगस होता है। 

दोष-पाराशर ऋषितने इसी चौथको चन्द्रमाके देखनेका 
दोष कहा है कि, कन्याके' सूच्यम शुकृपक्षकी चौथको चाँ- 
दुका देखना म्रिथ्या दोष छग्राता हैं, इस कारण इस दिन 
चदिको कभी न देखे । दोष शान्तिका मंत्र विष्णु पुराणमे 
| सिंहको जाम्ववानने 

मार्‌ दिया, हे सुकुमारक ! रो मत यह स्यमनन्तकमणि तेरा 
ही हूँ || स्यमन्दकसणिका डपाख्यान-बन्दिकेश्वर बोडे कि, 
सब गणेशजीके महात्रतको एकाअचित्तस सुनो, यह जत 


बिक 


त्रवीको सब्र कष्टोंस छुडा 
दवा हैँ यह अपवादोंका नाश करनेबाढा एवम्‌ सब विश्नों- 
का निमूछ करनेवाढा है ॥३॥-दुर्गम पथवाल्ले वलमें, २णपमें 
राजकाजर्स सब सिद्धि करनेवाले ब्रतोंमें इसे उत्तम सम- 
झिय ।। ४ ॥ यह गणेशजीका प्यारा है तथा तीनों छोकमें 


| असिद्ध हू । हें अह्यन्‌ इससे अधिक दूसरा कोई भी ब्रत 


नहीं है जिससे कष्ट नष्ट हों ॥ ५।॥ सनत्कुमार बोल कि, 


| इस ब्रतको' पहिल्े किसने किया है यह मृत्युलोकर्म केंसे 

| गया ! यह सब बताये हुये मुझे गणेश्वरका ब्रत विस्तारके: 
कम का कक पा छ््कि 

' साथ कहिये ॥ ६।॥ नन्दिकेश्वर बोले कि, सष्टिके स्वामी/ 


हर ) विशिमिशी लि किशन मिकन 
उवाच ॥ चक्रे व्रत॑ जगन्नाथों व! सुदवः प्रतापवान ॥ आदिष्ठ नारदनव वथाला5छनम॒क्तये ॥७॥ 
सनत्कुमार उवाच ॥ षड़्गुणेश्व्यसंपन्नः सष्टिसंहारकारक! ॥ वासुदेवो जगवद्यापी पराप्तवाँछा- 
उछन॑ कथम्‌ ॥ ८ ॥ एतदाश्व्यमारख्यान ब्रूहि त्वे नन्दिकेश्वर ॥ नन्दिकेश्वर उवाच ॥ भूमिभार- 
निवृत्यथ वसुदेबछुताबुभो॥९॥ रामक्ृष्णों समुत्यन्नौं; पद्मनामफणीश्वरों ॥ जरासन्धभया त्कृष्णो 
द्वार्कों समकल्पयत्‌ ॥१०। विश्वकमोणमाहय पुरी हाटकर्निमिताम॥तत्र षोडशसाहस्॑ स्रीणों 
चेव शताधिकम्‌॥ ११॥ भवनानि मनोज्ञानि तेषां मध्ये व्यकल्पयत्‌ ॥ पारिजाततरू मध्ये 
तासां भोगाय कल्पयत्‌ ॥१२॥ यादवानां गहास्तत्र षट्पंचाशच्च कोटयः ॥ अन्येषपि बहवो 
लोका वसन्ति विगतज्वराः ॥१३॥ यत्किचित्रिषु लोकेषु सुन्दर तत्र दृश्यते॥ सत्राजितप्रसे- 
नास्यों पत्रावगस्य विश्वुतों ै॥१४॥ अम्भोषितीरमासाद्य तन्मनस्कतया च सः ॥सत्राजितस्तप- 
स्‍्तेपे सूयमुद्धिय बुद्धिमान्‌ ॥ १५॥ वब्रत॑ निरशने महा सूर्यसम्बद्धलोचनः ॥ ततः असत्नो 
भगवान्सत्राजितपुरः स्थितः ॥ १६ ॥ सच्ाजितोएपि तुष्टाव दृष्ठा देव॑ दिवाकरम्‌ ॥ तेजोराशे 
नमस्तेःस्तु नमस्ते सवतोष्ठख ॥ १७ ॥ विश्वव्यापिन्नमस्तेःस्तुनमस्ते विश्वरूपिणे॥ काइयपेय 
नमस्ते5स्तु हरिदश्व नमोस्तु ते॥ १८ ॥ अहराज नमस्ते5स्तु नमस्ते चण्डरोचिषे । वेदतय 
नमस्तें5स्तु सर्वदेव नमोषस्तु त ॥१९॥ प्रसीद पाहि देवेश सुद्ष्ठया मां दिवाकर।॥ इत्थं संस्तूय- 
मानो$सो देवदेवो दिवाकरः || २० ॥ स्लिग्धगम्भीरमधुरं सत्राजिलमुवाच ह ॥ सूर्य उवाच॥ 
वर बृहि प्रदास्यामि यत्ते मनसि वे ते ॥ २१॥ सत्नाज्ञित पहामाग तुष्ठोएहे तव निश्चयात्‌ | 
सत्राज़ित उवाच | स्यमन्तकमर्णि हि यदि तुष्ठोश्सि भास्‍्कर ॥ २२ ॥ ददों तस्य च तद्वल॑ 
स्वकण्ठादवतायें सः ॥ भास्कर उवाच ।॥! भाराष्टक शातकुम्भ स्रवत$सौ महामणिः ॥॥ २३ ॥। 
मसल नम 5 0 मय 


व्रतराज:। | शतुर्पी- 


् 





प्रतापी क्ृप्णने इस ब्रतको किया था। झूठे दोष मिटानेके 
लिये नारदजीने श्रीकृष्ण परमात्माको कहा था ॥७।॥ सन- 
त्कुमार बोले कि छः गुण ओर ऐश्वयेसे संयुक्त; सृष्टिकी 
उत्पत्ति स्थिति और प्रढयय करनेवाले संसारके अन्तर्यामी 
वासुद््‌वको छाउछन कैसे छूगा | ८ ॥ हे नन्दिकेश्वर ! इस 
अनोखे आख्यानको आप मुझे सुनाएं । यह सुनकर नन्दि- 
केश्वर बोले कि, भूके भारको मिटानके लिये दोनों, वासु- 
देवके पुत्र ॥ ९ ॥ रामक्ृष्णके रूपमें पद्मयताभ और फणी- 
इर उत्पन्न हुये कृष्णने जरासन्धके भयसे द्वारका बनवाईं 
॥ १० ॥ “विश्वकर्माको बुलबाकर सोनेकी पुरी बनवाई 
गई थी वहाँ सोरूह हजार एकसो आठ स्ियोंके उतनेही 
॥ ११॥ उसमें सुन्दर भवन बनावाये गये, रानियोंको 
आनन्द देनके लिये हरएक महरूमें पारिजातका वृक्ष ढुग- 
वाया गया था ॥ १९ ॥ उस पुरीमें छप्पन कोटि यादवोंके 
रहनक लिये अछग अछग सवन थे और भी बहुतसे छोग 
उससे निर्वाध रहते थ। १३॥ और क्या कहा जाय, जो 
कुछ अन्य जगह त्रिलोकी भरमें सौन्दय्य या ऐश्वर्य्य था 
वह सब यहां दिखायी देता था । उम्रके प्रसिद्ध पुत्र सन्ना- 
जित ओर प्रसन भी इस द्वारकापुरीमें निवास करते थे 
॥ १४ ५ इनमें वुद्धिमान्‌ सत्राजित सूये नारायण भगवा 
पडा परसभक्त था ! इस लिये यह समुद्रके किनारेपर 
तू है अपन सनको छगा ॥ १५॥ घोर निरशन ज्त- 
रूर तपको सूर्यूम दृष्टि बांघकर करनेलगा सूयनारायणउसके 
रस प्रसक् हाकर सस्तीप आ उपस्थिल हुये ॥ १३६॥ सन्ना. 


जितभी भगवान्‌ सूयकी स्तुति करने छगा कि, हे तेजके 
पुजरूप देवदेव | आपको प्रणाम है, हे देव ! आप सब 
ओर सम्मुखस ही सदा प्रतीत होते हो, ऐस आपके लिये 
प्रणाम है॥ १७॥ आप समस्त विश्वर्मे व्याप्त हो, आपके 
लिय प्रणाम है, समस्त जगत्‌ आपका स्वरूप हैं अतः ऐसे 
विश्वरूपक छिय प्रणाम है, हे कश्यप नन्दन ! हे हरिदश्व| 
( हरे रंगके, अश्व हैं. जिसके ) ऐसे आपके छिये प्राणम है 
॥ १८ ॥ है ग्रहोके अधिराज ! आपके छिये प्रणाम है आ- 
पका तेज बहुत प्रचण्ड है, अतः आपके लिये प्रणाम है और 
है प्रभो , ऋग्‌ यजुः एवं साम ये तीनों बेद और समस्त 
देवता आपके खरूप हैं अतः आपके छिये प्रणप्म है ॥१९ 
हे देवेश ! हे दिवाकर ! आप मुझपर प्रसन्न हों और-वात्स- 
ल्थ पूण दृष्टिस मेरी रक्षा करें। नन्दिकेश्वरजी सनत्कृमार 
कहते हैं कि, हे सनत्कुमार ! ऐसे जब सत्राजिलने स्तुति की 
लब सूयनारायण प्रसन्न हो | २० ॥ ज्लेहसे पूर्ण गम्भीर 
मधुर ध्वनिसि सत्राजितको प्रसन्न करते हुए बोले कि, हैं 
महाभाग सत्राजित ! तुम्हारे प्रेममें में प्रसन्न हूँ।भतःतुम्हारे 
पड ष्‌ न केक र्‌ 
मन जिस पदाथकी इच्छा हो उसीको मांगो! में तुम्हारे 
हिय यथेष्ट बर दूंगा।२१॥सत्राकित बोछा कि, हे भास्कर- 
देव ! यदि आप मुझपर समन्तुष्ट हुय हैं तो आप मुझे स्थम: 
न्तक मणि दे द॥२२॥सूय देवने अपने कंठस र॒त्नको उतार 
कर सत्राजितको दे दिया और बोले कि हे सन्नाजित | यह 
महासणि प्रतिदिन आदभार सुवर्णको उगछूती दे ॥ २३ ॥ 


ब्रतानि, | 





शुचिष्मता सदा धार्य रत्नमेतन्महोत्तमम॥र 


दृष्ठटा तु लोका मनस्त 





त्राजेत क्षणेवत्‌इट्धचिं हानति मानवम्‌ ॥ इत्युक्त्व 
न्तदेधे देवस्तेजोराशिदिवाकर:॥२४ तत्कण्ठरत्नज्य 
॥ दिवाकर सब्िन्तयन्तो हि विम्मष्टदृ्ठयः 

दीधितिजनादन द्रष्ट्रससंशयेन ॥ नाय॑ सहर्लांशरितीह छोकाः 
॥ २६ ॥ स्थमन्त्क महारत्न दृष्ठा तत्कण्ठमण्डल 





पक 
लमानरूपी पुरी स कृष्णस्य विवेश सत्वरम॥ 
॥ २५॥ समागतोएय॑ हारिदश्व- 
सत्राजितोड्य मणिकण्ठभास्वान्‌ 
॥ स्पृहाश्वव्दे जगन्नाथो न जहार मर्णि ततः 








॥ २ ॥ सत्राजितोज्ञातमयों याचयिष्यति माँ हरि: ॥ मसेनाय ददों श्ात्रे धायोंड्थ शुचिना 


कम 





'वबया ॥२८॥ एकदा कण्ठदेशेपस 
संयुतः ॥ २९ ॥ अश्वारूढोहशुचित्रासों हतः 
स्वकेः सर्वे: समावतः ॥ ३१॥ 
कष्ट बान्धवः पापिना हतः॥ ३२॥ 


क्षिप्त्वा ते मणिम्नुत्तमम ॥ 
सिहदेन तत्क्षणात्‌ ॥ रत्नमादाय सिंहोएपि गच्छन्‌ 
जासयवता हतः ॥ ३० ॥ नीत्वा स बिधरे रत्न॑ ददो पुत्राय जाम्ववान्‌ ॥ पुरी 
प्रसेनोध्यापि ना 


छूगयाक्रीडनार्थाय ययों कृष्णेन 








विवेश कृष्णो 


याति हृतः कृष्णेन निश्चितम्‌ ॥ मणिलोमेन हा 
द्रारकावासिनः सर्वे जना ऊचुः परस्परम्‌ ॥ वृथापवाद- 


संतप्तः ऋष्णोईपि निरगाच्छनेः ॥३१॥ सहैव तेग॑तोररण्यं हृट्ठा सिहेन पातितम्‌ ॥ पसेने वाहन- 


युत तत्पदालुचरः शनेः ॥ ३४ ॥ 


पर इसको पवित्न हो हर ही अपने कण्ठमें घारण करवा, | मणि छीचछी !! 


ऋष्तेण निहत॑ दृष्ठा कृष्णश्रक्षेबिल गतः ॥ विवेश योजन- 
शतमन्धकार स्वतेजसा ॥ ३५ ॥ निवारयन्‌ दर्शाते प्रासाई बद्धनूमिकम 


॥ ते कुमार ज्ञाम्ब- 


3० | ऋक्षराजने उस स्थमन्तकमणिकों 


३ ३ २2 


क्योंकि हैं सत्राजित | अपवित्र अवस्थामें धारण करनेस | अपनी गुहामें छूजाकर अपनी पुत्रीकोी खलनेके लिये देदी। 


यह सणि धारण करनवालेको क्षणभरमें ही मार देती है। 
ऐसा कहकर तेजोराशि सूर्यदेव अन्तर्िंत हो गये ॥२४॥ 
सत्राजित उस स्यप्तन्वक्मणिको अपने कण्ठमें घारण कर 
चमकता हुआ श्रीकृषप्ण भगवानकी द्वारिकापुरीमें शीघ्ष ही 
प्रविष्ट हुआ, उस सम्रयमें स्यमन्तकमणिस सूर्यकी तरह 
चमकतें हुए सत्राजितको देखते ही द्वारकानिवार्सी समस्त 
जनोंकी आँखे बन्द होगयों और उसे मनमें सूथेनारायण 
समझ ॥२५।॥ सबने सगवान्‌ श्रीकृष्णचन्द्रके समीप दौड- 
कर्‌ निवदन किया कि,हे भगवन्‌ जनाद॑न ! आपके दर्शन 
करतेको साक्षात्‌ सूयदेव आरहा है । श्रीकृष्णचन्द्र बोले 
कि, हें यादवों | यह सहख किरणोंवाला सूयद्व नहीं है, 
किन्तु स्थमन्तक मणिक्को कण्ठमें धारण करनेसे सूयकी 


कि,कहों श्रीकृष्ण चन्द्र इस मणिको मांगलछेंगे तो देनी होंगी, 
नहीं 

जायगा। अवःसत्राजितने अपने भाई प्रसनको उस मणिको 
दे दिया ओर उसे कहमभी दिया कि, तुम इसे पत्रित्र होक- 


मणिको कण्ठमें धारण करके श्रीकृषप्णचन्द्र भगवानके साय 
सिक्कार खेलनेको चछा गया | २९ | फिर जब वह प्रसेन 
घोडेपर चढकर अशुबिहुआ सिकार खेलने छगा तब 
उस एक सिंहने मारकर उससे झट वह स्यमन्तकूमणि छीन 
ली। पर वह सिंह भी अशुचि था, इसलिये जाम्बवान 
ऋक्षराजने उस सिहको मार्गमं ही मारकर उससे वह 


१० 


| श्रीकृष्णचन्द्रभी अपने अन्य अनुवायीयोंके साथ द्वारका- 
| पुरीको चढ्ठे आये || ३१ ॥ किर श्रीकृष्णचनद्र तो आगये 
| पर असेन नहीं आया, ऐसी अवस्था लोगोंने यह कहना 
| सुहूकर दिया कि, क्ृष्णके साथ असेन जेगरमें गया था, 
| आजतक फिर बह वापिस नहीं आया, इससे प्रतीत होत 
| है कि, कृष्णने प्रसनको मारडाछा, हाथ वहुतही. कष्टकी 
| बाव है कि, पापी क्ृष्णने मणिक छोभसे अपना बान्धवभी 
| मार दिया। ३२ ॥ कुछ भी अपने मनमें नहीं शोचा,द्वार- 
| कार्मे रहनेवाले सभी छोग परस्परमें इस प्रकार चर्चा करने 
| छगे पर श्रीक्ृप्णचन्द्रने कुछ नहीं किया था. अत एव इस 
| झूठे अववादसे बहुतही सन्तप्त हो चुपचाप चछद्यि॥३३॥ 
| असेचकी खोज करनेक छिये सब द्वारका निवासियोंको 
तरह सत्राजित चमक गया है तुम॑ व्यथं आत क्यों हो | 
रहे हो ॥ २६ ॥ पर सत्राजितके चित्तमें यह भय हो गया | 


साथ ले उस जेगढूकी ओर गये वहांपर जब श्रीकृष्ण चन्द्र 
5 आप रे कक 
प्रसनकी खोज करने छगे तो एक जगहमें प्रसनका शरीर 


| पड़ा हुआ मिला और यहभी ज्ञात हुआ कि, किसी सिंहने 
तो यहां रहकर जीवन निर्वाह करनाभी दुषप्कर हो | 


घोडेयमेत म्सेनको मारडाछाहें फिर श्रीकृष्णचन्द्र अपते 


| अनु धायियोंके साथ साथ शनेः शनें: । ३४ ॥ उस सिंहके 


कर कप 


| पादचिन्होंकी खोज करते हुए कुछ आगे गये तो वंह सिंह 
रही धारण करना ॥ २८ ॥ एक दिल प्रसत उस उत्तस | 


भी सरा हुआ मिछा और खोज करनेसे ज्ञाव हुआ कि 
सिंहको मारनेवाह्त कोई भयड्जभर ऋक्ष हे, अलः उस ऋक्ष- 
रांजकी खोज करते २ कुछ दूर गये तो एक अत्यन्त भया- 
नक गुदा देखी, इसमें बहुत गाढा अन्यकार था और बह 
गुहा चारसों कोश छेबी थी अपने अनुयायी अन्यछो 
गोंको बाहरही ठहराकर अपने तेजसे गुहाके अन्धकारको 
दूर करतेहुए उसके भीतर घुस गये,एक बहुत सुदृढ महत्ूमें 


(१५४) बलराजः । की ु मा 


 चुतुधी- 






/आाआ 00077 70 0078, 


बतो दोलायाममितद्युतिम्‌ ॥ र२े९॥ मागिक्य लम्बभानं च दृदश भगवान्‌ हरिः ॥ रूपयौ- 
वनसंपत्रां कन्यां जाम्बब्तीं पुनः ॥ ३७ ॥ दोलां दोलयमानां च ददश कमलेक्षणः ॥ महात्तं 
विस्मय॑ चक्रे दृष्टा तां चाहहासिनीम्‌ ॥ दोलां दोलयमाना सा जगो गीतमिद सुहुः ॥ ३<८॥ 
सिंहः प्रसेनमवरधीत्सिंहों जाम्बव॒त! हतः ॥ सुकुमारक मारोदीस्तव होष स्थमनन्‍्तकः ॥ ३९॥ 
मंदनज्वरदाहाता दृष्ठा त कमलेक्षणम्‌ ॥ उवाच ललित बाला गम्यतां गम्यतामिति ॥ ४० ॥ 
रत्न॑ गहीत्वा वेगेन यावच्छेते ठु जाम्बवान्‌ ॥ इत्याकर्ण्य बचः शौरिः शह्ढ दध्मों प्रतापवार 
0 ४१॥ आकर्ण्य सहसोत्थाय युयुधे ऋक्षराट्‌ लतः। तयोयुद्धमभूद्धोरं हरिजाम्बवतोघ्तदा 
॥ ४२ ॥ द्वारकावासिनः सर्वे गतास्‍्ते सप्तमे दिने ॥ मृतः कृष्णो भक्षितों वा निःसे- 
दिग्धं विचार्य च ॥ ४३ ॥ परलोकक्रियां चकः परेतस्य तु ते तदा ॥ एकविंशहिन 
यावद्वाहुपहरणो विश्व ॥ ४४ ॥ युयुधे तेन ऋक्षेण युद्धक्मणि तोबितः ॥ जाम्बबाद 
प्राक्तन स्मृत्वा दृ्ठा देवव्ल महत्‌ ॥ ४५ ॥ जाम्बबाठ॒वाच ॥ अजेयोहहं खुरेः सर्वेशक्षर 
क्षसदानवेः ॥ त्वया जितोए5ह देवेश देवस्त्वमसि निश्चितम ॥ ४६॥ जाने त्वां वेष्णवं तेजो 
नान्यथा बलमीद शम्‌ ॥ इति असाद्य देवेश ददो माणिक्यछुत्तमम्‌ ॥ ४७ ॥ छझुतां जाम्बबती 
नाम भारयाथ वरवर्णिनीम्‌ ॥ पार्णि वे ग्राहयामास देवदेंव च जाम्बबान्‌ ॥ ४८ ॥ मणिमादाय 
देवो४पि जाम्बवत्यापि संयुतः ॥ तद्बृत्तान्त समाचष्टे द्वारकावासिनां स्वयम्‌ ॥ ४९॥ सत्रा- 
जितस्य माणिक्य, दत्तवास्संसदि स्थितः ॥ मिथ्यापवादसंशुद्धि प्राप्तवान्मधुसूदनः ॥ ५०॥ 





परमतेजस्वी जाम्बवानके झूछनेपर झूलछते हुए कुमारको 
एवम्‌ उसके झूलाम अपरिमित कान्तिवाली ॥ ३५॥ ३६॥ 
उस मणिको भी भगवान्‌ कृष्णने छटकते हुए देखा बथा 
वहीं रूप और योवनसे संपन्न जाम्बवती नामकी छडकीको 
भी देखा।॥ ३७॥ जो डोछको हिछा रही थी उस सुन्द्री 
हसनेवाढी छुन्दरीको देखकर कमठनयन कृष्णजीको भी 
बडा पिस्मय हुआ ॥ वो झूछाको हिछाती हुईं इस गीतको 
गा रही थी | ३८॥ कि सिंहकों प्रसनने मारा, उस 
सिंहको जाम्बवन्तने मारदिया, ए सुकुमारक ! तू रो क्‍यों 
रद्द है ! यह स्यमन्तकमणि तेरा ही है ॥ ३९ ॥ जाम्बबती 
कमछेक्षण कप्णचन्द्रको देखके कामज्वरस पीडित हुयी 
भमपूवक बोली कि, हे सुन्दर ! आप यहांस जाओ ॥४०॥ 
इस रत्नको छेकर झट यहांसे भागो.जबतक कि मेरा पिता 
जाम्बवान्‌ शयन कर रहा है, ( तबतकही तुम्हारा यहां 
लीवन रह सकता है. पश्चात्‌ नहीं रहेगा। और मैं इस 
तुम्हारे कोमछसुन्द्र शरीरको देखके मदनात्त हो रही हूं, 
पर क्या करूं यह बहुत भयड्डर पराक्रप्ी हे में यही चाहती 
६ कि, सुम्हारंको इस सणिकी यदि इच्छाहै तो इसे ढेकर 
जैसे आये हो वेसेही प्राण बचानेके छिये भागो, ठहरो 
हम हक कक ऐसे बचन 2-३ कि+-# केक प्रतापी 

गवाबून अपने पाज जन्य शह्लको बजादिया ॥४ 

उस श्धको ध्वनिके कानोंमें पडतेही 3४६४ पद 

उठकर ओक्ृुष्णचन्द्रस युद्ध करने छगा, उन दोनोंका 
हक चानक युद्ध हुआ ॥४२॥ जास्बवानकी गुफाके 
भादिर जो भगवानक जलुयाभ्री झरकाके जन आये थे, 


वे वहां सात द्निवक ठहरे,पर फिरभी भगवान्‌ वापिस 
नहीं आये तो उन्होंन यह समझ लिया कि; क्ृष्णचन्द्र वो 
मरगये या किसीने खा' लिय, ऐसा निणय करके वे सभी 
द्वारकानिवासी छोग अपने अपने घरकी ओर घढ़े गय 
॥४१॥द्वारका्म श्रीकृष्णचन्द्रको सत समझकर उनकी पाए: 
छोकिक क्रिया की गईंविस्लु श्रीक्ृष्णचन्द्रदेव इक्की स दि नतक 
बाहु अहार करते हुए।| ४४ ॥ छडे युद्धमें जाम्बवाबको 
तृप्त करदिया, पर कृष्णके अप्रतिहत पौरुषको देखकर पुरा' 
तन अभुरामघन्द्रका स्मरण करके जाम्बवान्‌ बोला कि 
॥ ४५ ॥ हे समस्त देवताओंके अधिपते । मेरेको कोई भी 
यक्ष, राक्षस या दानव जीत नहीं सकता, पर आपने मुझे 
जोत दिया, अतः मरको निश्चय होगया हैं कि। आप 
कोइ देवताही हैं ॥ ४६ | और उन देवताओंमें भी में 
आपको नारायणकाही स्वरूप समझताहू, .नारायणके ऐंग 
बिना ऐसा अक्षय्यपराक्रम दूसरेसें नहीं हो सकता 
इस प्रकार देवाधिदेव श्रीकृष्ण चन्द्रको प्रसन्न करके उनके 
सवे श्रेष्ठ स्यमन्तकूमणि दे दी || ४७।॥ अपनी वर वर्णिनी 
श्रीजाम्बब॒तीकों भी भार्याथे दे दिया जाम्बवानने अपनी 
पुत्नीका पाणिग्रहण श्रीकृष्णके साथ कर दिया ॥8८॥ उन 
दोनोंको छेकर श्रीकृष्ण द्वारकाम आये और उस वृत्तान्तको 
द्वारका निवासियोंके सम्मुख कहा॥४९॥राजा उम्रसेन 

सभास अपने आप उपस्थित होऋर स्यमन्तकमणि सत्र 
जितको दें दी | भगवानको स्थमन्तकमणिके दरणकी जो 
मिथ्या कूंषण छगाथा ऐसा करनेसे बह निवृत्त होगया॥५२ 


व्रतामि, ] भाषाटीकासमेतः । 


20000 





सत्राजितोषपि संत्र॒स्तः कृष्णाय प्रददो सुताम ॥ सत्यक्षार्मा महाबुद्धिस्‍्तदा सबवंगुणान्विताम 
५१॥ शतधन्वाऋरमसुखा यादवा दृष्ठमानसा/।सत्राजितेन ते बेर चऋ रत्नानिकाषिणः ॥ ५२ ॥ 
दरात्मा शतधन्वापि गते कृष्णे च कुअचित्‌ ॥ सत्राजितं निहत्याशु मणि जप्माह पापधीः ॥५३ 
कृष्णस्य पुरतः सत्या समाचछ्ठे विचेड्टितम॥ अन्तहेष्ठों बहिःकोपी कृष्ण: कपटनायकः 
॥ ५४ ॥ बलदेवपुरों वाक्यमुवाच धरणीधरः ॥ हत्वा- सत्राजितं दुष्टो मणिमादाय गच्छत्तिप॥वषण। 
निहत्य शतधन्वानं गृह्दीमो रत्नमावयोः ॥ मम झौग्यं च तद्गत्न भविध्यति सुनिश्चितम ॥५६ 
एतच्छृत्वा भयत्रस्तः शतघन्वापि यादव: ॥ आहयाक्रनामानं माणिक्य प्रददों च सः ॥५जा 
आरुह्य वडवां वेगात्रिगतो दक्षिणां दिशम्‌ ॥ रथस्थावह्ुगच्छेतां तदा रामजनादनों ॥ ५८ ॥ 
शतयोजनमात्रेण ममार बडवा तदा ॥ पलायमानो निहतः पदातिस्‍्तु पदातिना ॥५९॥रथस्थे 
बलदेवे तु हरिणा रत्नलोभतः ॥ न दृष्टं तत्र तद्॒त्न॑ बलदेवपुरोप्बंदत ॥ ६० ॥ तदाकण्थ महा- 
रोषाइवाच वचन बली ॥ कपटी त्व॑ सदा कृष्ण लोमी पापी सुनिश्चिम ॥ ६१॥ अऊथोय 
सस्‍्वजन हंसि करत्वां बन्चु; समाश्रयेंत्‌ ॥ अनेकशपथेः कृष्णो बलदेव॑ भ्रसादयत्‌ ॥6९॥ स्ो5षपि 
विकष्टमित्युक्त्वा ययो वेद्भेमण्डलम्‌ ॥ कृष्णोडपि रथमारुह्म द्वारकां प्रययों पुनः ॥६३॥ तथै- 
वोचुजनाः सर्वे न साधीयानय हरिः॥ निष्कास्तितो रत्नलोभाज्ज्येष्ठो आता बलो बली ॥६४ 
तच्छ॒त्वा दीनवदनः पापीयानिव संस्थितः ॥ बथानिशाःपात्संततो बन्चूब स जगत्पतिः ॥ ५ ॥ 








सत्राजितने भगवानको जो झूठा कछंक छूगाया था उसके 
5 साबित होनेपर वो बडा भयभीत हुआ यह बड़ा 
चतुर था, झटही सवंगुण संपन्न सत्यभासा नामको छड* 
कींका विवाह कृप्णके साथ कर दिया ॥ ५१ ॥ शतधन्वा, 
अकऋर और दूसरे जो दुष्ट हृद्यक यादव थे वे मणि छेनके 
लिये सत्राजितके साथ बेर करने छगे ॥ ५२॥ श्रीकृष्ण 
चन्द्र कहीं चले गये थे तब दुरांत्मा शतधन्वाने सत्राजितको 
मारकर उसकी स्यमन्तकमणि छीन ही | ५३॥ सत्य 
भामाने अपने पिताकों मारनेका वृत्तान्त श्रीकृष्णचन्द्रके 
सनन्‍्मुख जाकर कहा, कपटियोंके अधिपति श्रीकृष्णचन्द्र 
अपने श्वशुर सत्राजितके वध होनेकी बात सुन, बाहिरसे 
नाराज ओर अन्तःकरणसे ग्रसन्न हुए कि,इसने झूठा कलझू 
लगाकर सुझे बहुत दुःखित किया था अतः ऐसे पापीको 
दरही दण्ड समिछ गया; सत्यभामाक़े सामने केवछ उसे 
दिखानेके लिये बहुत नाराज हुए।॥ ५४ ।॥| फिर श्रीकृष्ण 
चन्द्र बलदेवजीके सम्मुख जाकर बोले कि, है घरणीधर ! 
“दुष्ट शतधन्वा सत्राजितको मार स्यमन्तक मणिको लेकर 
जा रहा है।॥ ५५ | हम शतधघन्व्राको मारकर उस मणिको 
छेलें, फिर वह मणि मेरे उपभोगमें रहेगी इसमें आप 
सन्दह न समझें || ५६ | जब श्रीकृष्णचन्द्रने अपनासंकरष 
प्रकट किया, तो शतघन्वा भयसे संत्रस्त होकर अक्ररको 
अपने पास बुछाः; स्वमन्तकमणि उस द्‌ दी ॥ ५७ ॥ और 
आप घोडीपर चढकर दक्षिण दिशाकी ओर जोरस भागा, 
बलदेवजी तथा श्रीकृष्ण ये दोनों भाई रथमें बेंठकर शत 
न्वाके पीछे पीछे दोडे || ५८ ॥ [ वह घोडी चारसो 
कोश ही जासकती थी, विशेष दोडनकी उस घोड़ीमें 


सामथ्य नहीं थी ] उस घोडीने चारसौ कोशतक दौडकी, 


फिर अपने प्राण छोड दिये, घोडीके मरनपर शतघन्वा 
अपने प्राणोंकी रक्षाके छिये पदातिहोकर दौडा तो भगवान्‌ 
श्रीकृष्णने भी पदाति होकर उसके शिरको (सुद्शनचक्रस) 
काट दिया ॥५९। बल्देवजी उस समय रथमंही बठे रहे 
थे; पर श्रीकृष्णचन्द्रजीन र॒त्नके छोभसे ये सब काम किये 
थ, शतधन्वाके पासमें खोज करनपर भी मणि न मिली तो 
बलदेवजीसे बोल ॥| ६० ॥ कि; मेने मणिकी खोज की पर 
नहीं मिली। बलदेवजी इन वचनोंकों सुनकर अत्यन्त 
नाराज होकर कहने छगे कि, हे क्ृप्ण।तुम सचमुच सदासे 
ही कपटी, छोभी एवं पापकम्मंकारी हो ॥ ६१ ॥ घनके 
लिये अपने बान्धवको भी मारनेंसे पराड्मुख नहीं होते, 
इसी छिये एसा कौन वुद्धिमान्‌ बान्धव होगा जो आपके 
विश्वाससे सुखी रखना चाहे ओर तुम्हारा आश्रय छे १। 
भगवान्‌ श्रीकृष्णचन्द्रने अपने इस लांछनारोपकों सुनकर 
बलदेवजीको अनेक शपयथें खाकर प्रसन्न किया ॥ ६२ 
बलदेवजी-हाय कसी दुःखकी वातों है कि, बान्धवभी 
धनके छोभसे अपने बान्धवकी हत्या करनेस पराड्सुख 
नहीं होता संसार बडा बुरा है, इस प्रकार कहकर विद्स 
राजकी राजधानी मिथिछामें चले गये और श्रीकृष्णचन्द्र 
अपने रथमें बठकर द्वारकाको चलछे आय ॥ ६३ ॥ द्वारका- 
निवासी छोगॉंने एकाकी श्रीकृष्णचन्द्रको वापिस आये 
हुए देखकर निन्दा करना आरम्भ किया कि; यह क्ृष्ण 
भरा मनुष्य नहीं हे, इसने रत्नके छिय अपने बली बड़े 
भाईकोमी द्वारकासे निकाल दिया ।।६४। जगन्नाथ श्रीकृष्ण 
चन्द्र द्वारका निवासियोंकी दोषारोपोक्तिको सुन घोर, 


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अऋरोषि विनिष्क्रम्य तीवयात्रानिमित्ततः ॥ काशीगत्वा सुखेनासो य जन्यज्ञपाति भरसुम॥६६॥ 
तोषसुत्पादयामास तम द्रव्यण बुद्धिमाव्‌ | महक सेल पक सर्व्य नि | ६७ ने 
दुर्निक्ष न वे रोगा इंतयो न च विड्डरम्‌ ।। शुचिना धायते यत्र मोण: स्यस्य # कक, ॥६९८॥ 
जानन्नपि हि तत्सव माठ॒ुष भावमाश्रित+, ॥ लोकाचार तथा मायामक्ञान च समाश्रतः ॥६९॥ 
बन्धुवेरं समुत्पन्न॑ छाउछने समुपस्थितम्‌ ॥ दथापवादबहुले जायमान कंर्थ सह । " ७० ॥ इति 
चिन्तातुर कृष्ण नारदः समुपस्थितः ॥ गृहीत्वा तत्कृतों पूर्जा खुखासीनस्ततो5बबीत्‌ ॥ ७१॥ 
नारद उवाच ॥ किमशे खिदसे देव किं वा ते शोककारणम्‌॥ यथादइत्त समाच्ठ नारदाय ' 
च्‌ केशवः ॥ ७२ ॥ नारद उवाच ॥ जानामि कारण देव यदथ्थ लाउछने तव ॥ त्वया भाई- 
पदे शुक्कचठ॒थ्यी चन्द्रद्शनम्‌॥। ७३ ॥ कृते तेन समृत्पन्ने छाउ्छने ठ दुर्थथ हि॥ श्रीकृष्ण 
उवाच ।। बद्‌ नारद में शीघ्र को दोषश्नस्द्रदर्शने ॥ ७४ ॥ किमथे ठ॒ द्वितीयायां तस्‍्य कुवेन्ति 
दर्शनम्‌ ॥ नारद उवाच ॥ गणनाथेन संशप्तश्रन्द्रमा रूपरगवितः ॥ ७५॥ त्वईंशने नराणां 
हि वृथानिन्दा भविष्यति ॥ श्रीकृष्ण उबाच ॥ किम गणनाथेन शत्तश्रन्द्रः सुधामयः 
॥ ७६ ॥ इृदमाख्यानकं ओछ यथावद्रक्तुमहेसि ॥ नारद उबाच ॥ गणानामाधिपत्थ च रुद्गफ 
विहितः पुरा ॥ ७७॥ अणिमा महिमा चेव लधिमा गरिमा तथा ॥ भातिः पभाकाम्यमी- 
शित्व॑ वशित्व॑ चाष्टसिद्धयः॥ ७८ ॥ भार्याथ मददों देवो गणेशस्य त्रजापतिः ॥ पूजायंत्वा 
गणाध्यक्ष स्तुति कर्त प्रचक्मे ॥ ७९ ॥ बह्मोबाच ।| गजबक्र गणाध्यक्ष लम्बोदर वरप्रद॥ 
विश्ञाधीश्वर देवेश सडष्टिसंहारकारक ॥ <० ॥ यः पूजयेह्णाध्यक्षे मोदकाद्ेः मयत्नतः ॥ तस्य 


[ चतुर्थी- 








कर 


प्रजायते सिद्धिनिबिप्लेन न संशयः 


॥ ८१ ॥ असेपूज्य गणाध्यक्ष ये वाउ्छम्ति सुरासुराः ॥ 





पापिष्ठके समान दीनमुख होकर मिथ्या दोषारोपकी 
चिंतासे अत्यन्त संतप्त हुए ॥६५ ॥ अक्रूरजीने शतधन्वास 
स्यमन्तकमणि लेकर द्वारकार्मे रहना अच्छा नहीं समझा, 
तीथंयात्राक बहाने द्वारकासे काशी आकर यज्ञपति परमा- 
त्माकी तृप्तिके लिये यज्ञोंकों आनन्द्स करने छंगे॥ ६६ ॥ 
स्यसन्तकसणिके प्रभसावसे सुवणके अनायास मिलनेके 
कारण उस काशीजीमे बहुतस विचित्र विचित्र मन्दिरोंका 
निर्म्माण तथा सुवणका दान करके दीनजन तथा ब्राह्म- 
णोंको संतुष्ट किया ॥ ६७ )| सू्यकी स्थमन्तकमणिकों 
पवित्र होकर धारण करनेवाढा जहां निवास करता है 
वहां दुभिक्ष, रोग, अतिवृष्टि, अनावृष्टि; खेतोंमें मूसोंका 
लगना ठीडियोंका उपद्रव, पक्षियोंसे हानी, राजाओंका 
दष महामारी तथा सपे आदिके उत्पात नहीं होते || ६८ ॥ 
यद्यपि भगवाम्‌ सद जानते थे पर साधारण जनोंकी तरह 
लोकाचार, माया और अज्ञानका आश्रयसा छेकर बोले कि 
॥६५॥ भाश्योंके वेरसे होनेवाला छांछन मुझे मिल गया है 
. इसमें सबकी सब झूठी बातें हैँ से केस सहूं ७० भगवान्‌ 
कृष्ण इस छोकिकी चिन्तास आकुलसे थे कि नारदजी 
अएगये, उसकी की गई पूजाको ग्रहण करके बोले ॥| ७१ | 
कि दे देव! आप क्यों इतन दुःखी हो रहे हैं ? आपके 
कक ऊरण क्या है, ऐसा सुनकर भगवान कृष्णचन्द्र- 
म्रोफ़े कि हाल है सब कह सुनाया] ७२॥ नारद 

* कहूँ देव खिस कारण आपको दांछन छगा है 


उसे में जानता हूं आपने भाद्रपद शुक्का चौथको चांदका 
दशन || ७३ ॥ कर छिया था इस कारण आपको झूठा 
कढूंक छगगा हे ऐसा सुनकर कृष्ण महाराज कहने छगे कि: 
हे नारद ! कि उस दिन चांदके देखनेसे क्या दोष दोताहे/ 
यह मुझे शीघ्र ही सुना दीजिये ।। ७४ ॥ द्वितीयाके चांदक 
तो दशन क्यों करते है तथा चौथके देखलेमे दोष क्यों है 
यह सुन नारद्‌ बोले कि, अपनी सुन्दरतापर अभिमा« 
करनेवाले चांदको गणेशजीने शाप दे दिया था ॥७५।॥ कि 
आजके दिन तुझे देखनेसे मनुष्योंकी झूठी निन्‍्दा होगी) 
यह सुन कृष्णजी बोढ़े कि, गणशजीने अश्ृतवंषनिवाल 
बांदको क्‍यों शाप दे दिया )॥ ७६ ॥ इस श्रेष्ठ कथाको। 
मुझे यथावत्‌ सुना दीजिये,यह सुन नारदजी कहने छगेकि, 
महादेवजीने गजाननको गणोंका पति बना दिया ॥ ४७॥ 

अणिमा, महिमा, छूधिमा, गरिमा, प्राप्ति,प्र.कास्य, ईंशित् 
और वशित्व ये अष्ट सिद्धियां हैं॥ ७८ ॥ इन सबको रुद्र 
देवने गणेशको स्त्री बनानेके छिय दे दिया, अजापति 
गर्णेशजीकी पूजाकरके उनकी प्राथेना करने छगा ॥ ४५॥ 
कि हे गजवऋ हे गणाध्यक्ष हे रूम्बोदर!हे बरोंके देनेवारे 
विन्नाधीभ्वर ! है देवेश ! हे सष्टिसंहारकारक ! आपके दिये 
प्रणाम है ॥८०॥ जो मोदकादिकोंसे प्रयत्नके साथ गणप- 
तिका पूजन करता है उसे निर्षिन्न सिद्धि होती है इसमे 
सन्देद नहीं है ॥॥८१॥सुर हो वा अछुर हो गणेशजीकाबिना 


ब्रतानि, | 


भाषाटीकासमेत+) । ( १५७७ ) 






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न तेषाँ जायते सिद्धि! कल्पकोटिशलेरपित ८२ मे त्वद्धकत्या तु गणाध्यक्ष ेष्णः पालयतें 
सदा ॥ रुद्रोएपि संहरत्याशु त्वद्धक्त्येव करोम्यहम ॥ ८२ ॥ इत्थ संस्तृयमानोपसो देवदेवों 
गजाननः ॥ उवाच परममप्रीतों बह्लाणं जगतां पातिम्‌ ॥ ८४ ॥ श्रीगणेश डबाच। वर ब्रहि मदा- 
स्थामि यत्ते मनसि वतंते ॥ बरह्मोबाच ॥ क्रियमाणस्य मे सड्ठिनिछविन्न जायतां पन्नो॥ <५॥ण 
णए्वमस्त्विति देवोइसों गहीत्वा मोदकान्‌ करे ॥ सत्यलोकात्समागच्छत्स्वेच्छथया गगन शनेः 
॥८६॥ चन्द्रलोके समालादयय चलितो गणनायकः। उपहासं तदा चक्रे सोमो रूपमदान्वित॥८टजा 
त॑ दृष्ठा कोपतास्राक्षो गणनाथः शशाप ह॥ दशनीयः सुरूपोएह सुन्दरश्राहमित्यथ ॥ <८ ॥ 
गर्वितोएसि शशाड़ त्व॑ फले प्राप्स्यसि सत्वरम्‌ ॥ अद्यप्रदुति लोकास्त्वां न हि परयन्ति पापि- 
नम्‌ ॥ ८९ ॥ ये पदयन्ति प्रमादेन त्वां नरा मुगलाचछनम्‌॥ मिथ्यामिशापसंयुक्ता भविष्यन्ताह 
ते धवम ॥ ९० ॥ हाहाकारों महाजञातः श्रुत्वा शाप च ज्लीषणम ॥ अत्यन्त म्लानवदनबश्रन्द्रो 
जलमथाबिशव ॥ ९१॥ कुमु्द कोमुदीनाथः स्थितस्तत्र कृतालयः ॥ ततो देवर्षिंगन्धर्वा निराशा 
दीनमानसाः॥ ९२ ॥ तुरासाहं पुरोधाय, जग्झुस्ते त॑ं पितामहम॥ देव॑ शशंखुश्वन्द्रस्य गणेशस्य 
च्‌ चेड्गितम ॥ ९३॥ दत्तः शापों गणेशेन कथयामासुरादरात ॥ विचार्य भगवान्बह्या ताव्‌ 
मुरानिदमबबीत ॥९४॥ गणेशशापो देवेन्द्र शाक्यते केन वान्यथा।! के रुद्गेण न मया विष्णना 
चापि निश्चितम्‌ ॥ ९५ ॥ तमेव देवदेवेश ब्रजध्व॑ शरणं खुराः। स एव शापमोक्ष च करि- 
प्यति न संशयः ॥ ९६॥ देवा ऊचुः ॥ केनोपायेन वरदो गजवकऋो गणेश्वर:॥ पितामह महा- 
प्राज्ष तदस्मार्क वद प्रभो ॥ ९७ ॥ पितामह उबाच ॥ चत॒थ्यों देवदेबोसो पूजनीयः प्रय- 
त्नतः ॥ कृष्णपक्षे विशेषेण नक्त कुयो्व लद्गतम ॥ ९८ ॥ अपूर्पतसयुक्तेमोंदकेः परितोषयेत ॥ 


पूजन किए सिद्धि चाहते हैं वो सो कोटि कल्पसे भी नहों 
पा सकते ॥८३॥ है गणाध्यक्ष ! आपकी भसक्तिक ही प्रलाप 


से विष्णु सदा सष्टिका पालन करते हैं, शिव संहार करते | 
हैं, में भी आपकी भक्तिसे बछपाकर सृष्टिकी रचना करता | 


हूँ ॥८३॥ इस प्रकार नह्माजी स्तुति करनेपर दंव २ गजा- | करके ब्रह्माजीके पास गये, वहां जाकर उन्होंने त्रह्माजीको 


हे ॥८४॥ | गणेशजी और चन्द्रमाका सब वृत्तान्त सातुनय कहसुनाया 
हे ब्रह्मन ! जो तुम्हार मनमें कामना हो वही मांगो, में | 
दूंगा। तद्याजी बोले कि-हे प्रभो! त्रिडोकीकी रचना । 


नन परम प्रसन्न होकर जगत्‌पति प्रजापतिंस बोले ॥८४॥ 


करनेम किसी भी प्रकारका विपन्न न हो; मे यही वर मांगता 


शनेः शनेः सद्यलोकसे नीचेकी ओर आकाशमार्गंस आने 
के 8. आर ँ भु ३५ ४ 
छगें। ८६॥ चढछते चलते चन्द्रमाके भुवनमें पधारे, चन्द्र- 


माने उनका छम्बा पेट देखकर उनसे अपनी सुन्द्रताको | 
उत्तममास उनकी दिछगी की | ८७ | गणपति चद्रमाकी | 


ओर देख कोपसे अरुण नेत्र करके शाप देनेछगे कि, रे 


सुरूप हूँ ।। ८८ ॥ अस्तु अब तुझे गबंकरनेका फछ जल्‍दी 
मिलगा, आज ( भादवा सुदि चतुर्थी ) के दिन तुझ पापा- 
व्माकों कोई भी छोग नहीं देखेंगे ॥ ८९ || और यदि कोई 
मनुष्य प्रमादवश तेरा दशन करभी छेंगे वे सभी झूठे कलूं- 
कृके जरूर ही भागी बनेंगे।९०॥ जब गणपतिजीके भयेकर 





शापको सुनकर सब छोकोंमे महान हाहाकार मच गया, 
चन्द्रमाभी अत्यन्त मलीन मुख करके लज्जाका मारा जलके 
भीतर चला गया ॥ ९१ ॥ और जलके भीतरभी छुमुदमें 
अपना वासकरने छगा; तब सब देवता, ऋषि ओर गधे 


| निराश एवम्‌ दीनमना होगए ॥।९२॥ पीछे इन्द्रको अग्रणी 


। । कै ३ | । कि सहाराज गणेश जीने यह शाप चन्द्रमाको दिया 
है, फिर भगवान्‌ ब्रह्माजी सोच विचारकर देवताओंसे 


| कहने छगे कि ॥ ९४ ॥ है देवराज | तुम गणेशजीके 
हूँ ॥८५॥ गणपतिजीने कहा कि; अच्छा ऐसाही हो; तुम 
जो जिछोककी रचना करते हो उसमें किसीभमी प्रकारका | 
विन्न न उपस्थित होगा । फिर अपन हाथमें रूडडू लकर.| 


प्रभावकों जानते ही हो, गणेशजीके दिए शापको कोन 

अन्यथा कर सकता हैं ? न महादेवजीसें न मर ( ब्रह्मा ) में 
है. 3 रु ए 

ओर न निष्णमेंही शाप टालने की सामथ्य है |॥ ९५ || 


| इसलिए है देवताओं | आप उनही दे बदेवॉके इंश्वर गण- 
| पतिजीकी शरणमें जाओ, वही अपने शापकी आप निवृत्ति 


करेंगे ।। ९६ ॥ देवता बोले कि, महाप्राज्ञ पितामह प्रभो ! 
२ लि 
किस प्रकार आराधना करनेस गणेशजी प्रसन्न होकर वर 


| दिया करते हैं उस उपायकों आप हमें कहो || ९७ | बह्या- 
/<% कक. कि च छल बे 
गर्वी चन्द्र | तुझे यह अभिमान हैं. कि, में देखनेंके योग्य 


जीने कहा कि, चतुर्थीके दिन प्रयत्नपूवक गृणपतिकापूजन 


| करना चाहिए सभी महीनोंकी कृष्णपक्षकी चतुर्थीके दिन 
| मे ब्रत रातकों गणपलिका विशेषकरक यूजन करना चाहिए 
। || ९८ ॥ जिसे दिन रात्रिस चतुर्थीका योग हो उसी दिन 


गणेशजीका त्रत पूजादि करे, घृतके पूड और मोदकोंका 


| नवेद्य चढ़ाकर उनको प्रसन्न कर, ब्रत करनेवालोंको चाहिए 


(१७८ ) 











5००:३७७8 





पा 


मधुरात्न ह॒विष्यं च स्वयं सुद्धीत वाग्यतः ॥ ९९॥ स्वणरूप गणेशस्थ रु शतान्स द्विजसत्तम ॥ 
शक्त्या च दक्षिणां दद्याद्वित्तशात्यं न कारयेत)॥ १०० ॥ एवं श्त्वा च तः सर्वेगीष्पतिः प्रेषित- 
सस्‍्तदा ॥ स गत्वा कथयामास चन्द्राय बह्मणोदितिम्‌ ॥ १॥ ब्रत॑ चक्रे ततश्चन्द्रो यथोक्ते तह्मणा 
पुरा | आविरबेभूव भगवान्‌ गणेशो ब्रततोषितः॥ २॥ तं क्रीड मान गणनायक॑ च तुष्ठाव 
दृष्टा तु कलानिधानः ॥ त्वं कारणं कारणकारणानां दे त्ता सि वेद्यं च विभो प्रसीद ॥ ३॥ पअसीद 
देवेश जगन्निवास गणेश लम्बोदर वक्रतुण्ड॥ विरिश्विनारायणपूज्यमान क्षमस्व में गवेक्ृत॑ 
च हास्यम्‌ ॥ ४ ॥ ये त्वामसपूज्य गणेश नून॑ बाच्छन्ति मूढाः स्वकृतार्थसिद्धिम्‌॥ ते देवनह्ठा 
निद्धतं च लोके ज्ञातो मया ते सकलः प्रभावः ॥ ५॥ ये चाप्युदासीनतरास्त पापास्ते यान्ति 
वासं नरके सदेव ॥ हेरम्ब लम्बोदर मे क्षमस्व दुश्चोष्टितं तत्करुणाससमुद्र | ६॥ एवं संस्तूय- 
मानोध्सो चन्द्रेणह गजाननः॥ तष्ठोःह तब दास्यामि वर ब्रृहि निशाकर ॥७॥ चन्द्र उवाच॥ 
लोकानां दर्शनीयो5ह भवामि पुनरेव हि॥ विशापो5़हं भविष्यामि त्वत्मसादाहणेश्वर ॥ ८॥ 
गणेश उवाच || वरमंत्य॑ प्रदास्यामि नेतदेयं मया तव॥ ततो ब्ह्मादयः सर्वे समाजग्मुरभया- 
दिताः ॥ ५ ॥ विशाप कुरू देबेश प्राथयामों ब्य॑ तव ॥ विशापमकरोचचनद्र कमलासनगौर- 
वात्‌ ॥ ११० ॥ भाद्रशुक्नचतुथ्यां तु ये पश्यन्ति सदेव हि।॥ मिथ्यापवादमावर्ष प्राप्स्यन्तीह न 





कि, आप भी मधुर हविष्यान्नकाही मौन होकर भोजन करे 
॥५९ है ब्राह्मणोंमें श्रेष्ठ | ब्रतके अन्त गणेशजीकीसुब ण- 
मूर्तिको ज्राह्मणके हिए दान करके यथाशक्ति दक्षिणाभी 
दे, दानमें कृपणता नहीं करनी चाहिए ॥| १००॥ इस 
अकार जद्याजीने गणेशजीको प्रसन्न करनेका उपाय बताया 


गवेस आपका होस्थ किया था उस अपराधको क्षमा करिए 
|| ४॥ मैंने जान ढिया है कि, जो मनुष्य आपकी महिमा 
को न जानते हुए आपकी पूजा न कर, अपने का्योंकी सफ 
लता चाहते हैं वे निश्चयही मूढ हैं, उनकी बुद्धि प्रारब्धने 
भ्रष्टकर दी है, भच्छी तरह आपका क्या प्रभाव है यह मैंने 


देवताओंन उसे सुनकर अपने आचारय॑ बृहस्पतिजीको 
चन्द्रमाके समीपमें भेजा, बृहस्पतिजीने अह्माजीके बताए 
उपायको चन्द्रमाके लिए जाकर कहा | १०१ ॥ चन्द्रमाने, 
तक्ञाजीके कथनानुसार गणेश भगवानका ब्रत और पूजन 
किया इससे गणेशजी पस॑न्न होकर चन्द्रमाको बर देनेके 
लिए प्रकट हो गए ॥| १०२ ॥ मानों गणपतिजी बालक्रीडा 
कर रहे हों, ऐस खरूपस दिखाई दिये. चन्द्रमाने उस 
२३ ६ 
वाल मूर्ति गणशजीका दृशेन और स्तवन किया,कि हेविभो! 
आप प्रथ्व्यादिकोंके जो लन्मात्रार्प कारण हैं, उनके 
कारण जो अहझ्रादि हैं उसके भी कारण जो महत्तत्त्वादि 
दे उनके आप कारणस्वरूप हैं, यानी समस्ततस्वोंके आदि- 
कारण आपही हैं, यह जो समस्त वेद्यात्मक ( ज्ञेयरूप ) 
अप हू यह एवं इसके ज्ञाताभी आपही हैं, दे विभो ! 
2 प अनुअह करें॥ ३ ॥ हे देवताओंके ऊपर अनुग्रह एवं 
लिम्नह करनकी शक्तिवाल ! हे तीनों भुवनोंमें व्याप्त होकर 
रहनेवाले ! हे गणोंके ईश्वर | है लम्बोदर ! हे बक्॒तुण्ड ! 
ओप अपनी स्वाभाविक प्रसन्नताको प्रगट करें, आपकी 
पा जह्या ओर विष्णु स्प आंदिक सभी देवता करते हूँ, 
. ऑपकी महिसा वचनोंके अगोचर है, आप अपने स्वाभा- 


दिक सहस्तकी ओर रृष्टि देकर मैने जो अपने सोन्द्यके 


जान लिया है॥ १०५ ॥ जो पापी आपके चरणोंकी सेवा 
में अनुराग न कर उदासीन हो रहे हैं वे सभी नरकमें अव- 
श्य पडनेवाल हैं, हे हेरम्ब ! हे रूम्बोदर ! आप करुणाके 
समुद्र हैं, अतः आप हास्यकरनेके अपराध को <क्षमा करो 
॥ १०६॥ जब चेद्रमाने एऐस अपने अपराधकी इसप्रकार 
क्षमा मांगी; तब गणपतिजी बोले कि, हे निशाकर ! झ 
तुम्हारे पर प्रसन्न हूँ, तुमको जो वर चाहिये सो मांगो,में 
दूंगा ॥ १०७ ॥ चन्द्रमाने फिर प्रार्थना की कि, हे गणा- 
घिराज ! आपके अनुम्हसे में पहिलेके माफिक छोगोंका 
द्शनीय ओर आपके शापसे निमुक्त होजाऊँ, यही वर 
मांगता हूँ ॥| १०८ ॥ गणेशजीने कहा हे चन्द्र ] और जो 
कुछ चाहो सो वर मांगछो, इस वर को तो नहीं ढूँगा। 
जब गणेशजीने अपना शाप हटाना नहीं चाहा तब सभी 
बह्मादि देवता भयभीत हुए वहां पर आये। १०९॥ और 
गणेशजीकी प्रार्थना करने छंगे कि, है प्रभो ! हम सभी 
आपको ग्राथना करते हैं, आप चद्रमाको शापसे निमुक्त 

करे। जब इस भ्रकार त्माजीने भी प्रार्थना की तब उनके 

गौरवकी रक्षाके लिए चद्रमादो शापसे न्मिक्त कर दिया 

॥ ११०॥ गणेशजीन फिर कहा कि, जो छोग भाद्रपद 

डल्षावतुर्थोके दिन ही चन्द्रमाका दुर्शन करेंगे तो वे वर्ष- 





2४242 8:242 27 22020. यू 22028 “व: द 7:77: 72658 हू 





बतानि | भाषाटीकांसमैतः । ( 


मल 8375 /202 00600 80060 70% 0677? / 67:7९ 


संशयः ॥ ११॥ माखादों पूवमेव त्वाँ ये पदयन्ति सदा जनाः ॥ भद्रा (द्वितीया) यां शुक्क- 
पक्षस्य तेषां दोषो न जायते ॥ १३॥ तदाप्रद्धति लोको5यं द्वितीयायां कृतादरः ॥ पुनरेव ठु 
पश्नच्छ कलाबान गणनायकम्‌ ॥ १३ ॥ केनोपायेन देवेश ठुष्ठो भवसि तद्वद ॥ गणेश उवाच ॥ 
यश्व॒ कृष्णचतुथ्यों तु मोदकायेः मपूज्य माम॥ १ थारोहिण्या सहित त्वाँ च समभ्यच्योष्यदानतश॥ 
यथाशकत्या च मद्रपं स्वर्णन परिकल्पितम्‌ ॥ १५॥ दच्वा द्विजाय भुखीयात्‌ कथा श्त्वा विधा- 
नतः ॥ सदा तस्य करिष्यामि संकष्टस्य निवारणमू ॥ १६ ॥ भाद्रशुक्चतुथ्यां तु मृण्मयी 
प्रतिमा शुभा ॥ हेमाभावे तु कतेव्या नानापुष्पेः प्रपूज्य माम्‌ ॥ २७ ॥ बराह्मणान्‌ भोजयेत्पश्चा- 
ज्ञागरं च विशेषतः ॥ स्थापयेदत्रण कुम्भ घान्यस्योपरि शोमितम्‌ ॥ १८॥ यथाशक्‍त्या च 
महर्ष शातकुम्भेन निर्मितम्‌ ॥ वख्चद्यसमाच्छत्न मोदकायेः प्रपज्य माम्‌ ॥ १९॥ रक्ताम्बर- 
घरो मत्यों बह्मचर्येत्रतः झाविः ॥ रोहिणीसहित त्वाँ च पूजयेत्‌ स्थाप्य मत्युरः॥ १२०॥ रज- 
तस्य तु रूप ते कृत्वा शकत्या विनिमितम्‌ ॥ वच्ध शिवप्रियायेंति उपबर्ख गणाधिप ॥ २१ ॥ 
गन्ध लम्बोद्रायेति पुष्पं सिद्धिप्रदायके ॥ धूर्प गजम्ुखायेति दीप सषकवाहने ॥ २२॥ विश्न- 
नाथाय नवेद्य फल स्वार्थसिद्धिदे ॥ ताम्बूलं कामरूपाय दक्षिणां घनदाय च ॥ २३॥ इश्षु- 
दण्डमोद्केश्व होम॑ कुर्यात्च नाममभिः ॥ विसजने ततः कुयात्सवंसिद्धिभदायकम्‌ ॥ २४ ॥ 
एवं संपूज्य विप्नेश कथां श्रुव्वा विधानतः ॥ मन्त्रेणानेन तत्सवे ब्राह्मणाय निवेदयेत्‌ ॥ २५॥ 
दानेनानेन देवश भीतो भव गणेश्वर ॥ सर्वत्र सवेदा देव निविन्ने कुछ सवेद[॥ २६ ॥ मानोतन्न्ति 


पय्यन्त वृथा अपयशके अवश्य भागी होंगे ॥१११॥ किन्तु 


: जो शुक्ृपक्षकी पहिलीतियिमं यादी भादरशुक्या द्वितीयाके 


दिन पहिंले ही चन्द्रदशन करेंगे, वे फिर यदि चतुर्थीके 
दिन भी चन्द्रदर्शन करेंगे तो भी वे मिथ्या वादके भाजन 
नहीं होंगे ॥११२॥ इसलिये भाद्रशुक्छ द्वितीयाम चम्द्रमाके 
दृशन करनेस भाद्रशुक्छा चतुर्थीको चन्द्रमाके दशन कर- 
नेपरभी गणेशजीके शापके अनुसार मिथ्या अपवादके 
भागी नहीं होते, द्वितीयाक दिन छोग चन्द्रमाको प्रमसे 
देखा रकते हूं। चन्द्रमा फिर गणेशजीसे पूछने छगा 
(॥११३॥ हे प्रभो ! आप किस,तरह संतुष्ट होते हैँ,उस उपा- 
यको आपही कहो | गणेशजीने उत्तर दिया कि, जो पुरुष 
कृष्णपक्षकी चतुर्थीके दिन मरा पूजन करके मोदकादि- 
कॉका भोग , छगावे रोहिणी खेत आपका पूजन करके 
अध्यदान करे, तथा झक्तिके अनुसार बनाई हुईं सोनेकी 
मरी सूर्तिको ||११५॥ आह्यणको दे विधिपूर्वक मेरी कथा 
सुनकर भोजन करता है उसपर में सदा संतुष्ट रहता हूं, 
उसके समस्त सझूटोंका निवारण करता हूं ॥११६॥ भाद्र- 
पंदर] ज़ चतुर्थीके दिन मेरी सुबर्ण सुन्दर मूति बनवानी 
चाहिय, यदि सुवर्णमूर्ति बनवानेकी शक्ति न हो तो शुद्ध 
सेत्तिकाकीही बनवाछे, उस मूर्तिम मेरा आवाहनादि करके 
अनेक तरहके पुष्पोंसे भेरी पूजा करके ॥११७॥ ब्राह्मणोंको 
भोजन करावे, फिर रालसें जागरण अवश्य करे। पूंजनकी 
'वेधि यह हैं कि, स्वोत्ोभद्रमण्डल या- नवग्रह मण्डल 
बनवा कर उसके मध्यमें धान्यराशि रखके उसपर विना 
छिद्रका कलछशस्थापन करे ॥११८॥ उस कलछशके ऊपर 
पू्णपात्रको रख वस्रवेष्टित करके उसपर मेरी सुबर्णयी 
अतिमाको, शक्ति न होतो सृत्तिकाकीही मृ्िको स्थापित कर, 


दो बस्मोंध नेपण्य करके मोदकादिद्वारा पूजन करना 

चाहिये ॥११९॥ पूजन करनेवाढेको चाहिये कि वह बह्म- 

चरयकी रक्षा करता हुआ अरुण वस््र धारण करे। मेरी 

पूजाके समयमें मरी मूर्तिक आगे रोहिणीके साथ तेरी रज- 
तम्नयी मूर्पिको स्थापित करके पूजन करे ॥११०॥ वह रज- 
तमयी चन्द्र मूर्ति भी अपनी सम्पत्तिके अनुरूपही बनवाये 
“ओं शिवप्रियाय नमः वस्त्र सप्॒रपये” शिवके प्यारे पुत्रके 
लिय नमस्कार, वस्त्र देता है इस मंत्रसे घोत बख्थर “ओमू 
गणाधिपाय नमः उपव्स्र समपये ” गणाधिपके छिय नम- 
सस्‍्कार उपवस्र का समपंण करताहू इससे डुपद्टा ( उपबस्म ) 
(*ओ छेंबोदराय नमः गन्धेसमथय ” आओ हरम्बोदरके लिये 
नमस्कार गन्ध देता हूं इससे रक्त सुगन्धितचन्द्न, “ ओमू 
सिद्धिप्रदायकाय नमः पुष्पाणि समपये ” सिद्धिदेनेवालेके 
लिये नमस्कार फूछ चढाता हूं इससे सुगन्धित पुप्प, “ओमू 
कामरूपाय नमः ताम्बूछे समपेये ” कामरूपीके छिये नम- 
स्कार पान चढाता हूं इससे ताम्बूल, और “ घनदाय नमः 
दृक्षिणां समर्पये ? घन देनेवालेक लिये नमस्कार दृक्षिणा 
देवा हूं इससे दक्षिणा चढाव । मेरे ये तथा अन्यान्य नाम- 
मत्रोंस इंखके द॒ण्डे एवं छट्टूडुओंका होम करे पर होमके 
समय में “ नमः ” इस पदकी जगहमे॑ “ स्वाहा ” पदका 
निवेश करना चाहिये | हवन करनेके पश्चात्‌ सब सिद्धि- 
योंके श्रदाता गणप्त्रिका विसजेन कर १९४॥ इस प्रकार 
गणेशका पूजन करके विधि पूर्वक कथा सुने, तत्पश्चात्‌ इस 
मंत्रस मेरी मूर्तिको त्राह्मणके लिये दे दे ॥ १२५॥ कि, हे 
देवोंके देव ! है गणेश्वर | आप इस दानसे प्रसन्न हों | हे 

देव ! मेरे सभी कार्य सदा सब जगह निर्विन्न पूर्ण हों, मेरा 





( १६० ) ब्रतराज! । 









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च्‌ राज्य च पुत्रपोत्रान्‌ प्रदेहि में ॥ गाश्व धान्ये च वासांसि द्धात्सव स्वश क्तिंतः ॥ २७ ॥ दत्व 


त॒ बाह्मणे सबे स्वयं उुद्धीत वाग्यतः ॥ मोदकापपम धुरे लवणक्षारवजितम्‌ ॥ २८ ॥ एव करोति 
गबर्द्ध तस्याहँ सबवेदा जयम्‌ ॥ सिद्धि च. धनघान्ये च ददामे विपुलां प्रजाम ॥९९॥ इत्उक्त्वा- 
न्‍्तदेधे देवो विश्नराजो विनायकः ॥ तंद्रतं कुछ कृष्ण त्व॑_ ततः सिद्धिमवाप्श्यसि ॥ १३०॥ 
नारदेनेवमुक्तस्तु ब्र॒त॑ चक्रे हरिः स्वयम॥मिथ्यापवाद॑ निर्नेज्य ततः कृष्णो$मवच्छाचिः ॥ ३१ ॥ 


हे 


ये धरण्वन्ति तवाख्यानं स्थमन्तकमणीयकम ॥ चन्द्वस्यथ चरित सब तेषा दोषो न जायते ॥३११५॥ 
भादशुक्रचतुथ्यों तु ब्वचित्रर्द्र॒स्य द्शनम्‌ ॥ जात॑ तत्परिहाराथ श्रोतव्यं सर्वभव हि ॥ रे३ ॥ 
यदा यदा मनःकष्ठट संदेह उपजायत॥ तदा तदा च ओोतव्यमाख्यान कष्टनाशनम्‌ ॥ एवजुक्त्वा 
गतो देवो गणेशः कृष्णतोषितः ॥ ३४ ॥ यदा यदा पश्यति कार्यछात्यितं नारी नर॒श्वाथ करोति. 
तद्गतम ॥ सिद्धबन्ति कार्याणि मर्नेप्सितानि कि ढुलेम॑ विघ्नहरे मसन्ने ॥१ र५॥ इति श्रीस्कर्द- 
पुराणे नन्दिकेश्वरसनत्कुमारसंबादे स्थमन्तकोपाख्यान संपूणम्‌ 0 


अथ कपदविनावरअतम्‌ ॥ 


श्रावणस्थ लिते पक्षे चतुर्थ्यामेकश॒ग्ब्रतीं ॥ बत कुर्याहणेशस्य मासमेक ब्र्॒त चरेद॥सभसि- 
द्विकरं न्णां सुख चेव सुरेवरातद्विधि।-तिथ्यादि स्छृत्वा मम चतुर्विधपुरुषा्थासिद्धच्थ कपाई 
गणेशव्रतमहं॑ करिष्ये इति संकरप्य, मूलमन्त्रेण पडड़नन्यास॑ कृत्वा पूर्जां समारक्षत ॥ 






















सर्वत्र आदर हो, मुझे राज्यसम्पत्ति मिले, मेरे पत्र पोत्र। सन्देह उपस्थित हो तब तब इस सड्डूटनिवारण स्यमन्तको- 
सम्पत्ति बढ़े । ऐपता आप मुझपर अजुग्रह करें। त्र॒व क रने- | पाख्यानको सुने । इतना कहकर क्ृष्णजीक प्रसन्न किये हुए 


बाछा अपनी धनसम्पत्तिके अनुसार गो, धान्य और बर्खों- | श्रीगण शजी अपने धामकों चढे गये ॥| १३४ || अतः, जब 
२ किक बिक जि 
कोभी ब्राह्मगोंके लिये दे ॥१२०॥ ब्राह्मणके दान दुनक 


| किसी कार्यको करना हो उछसमय सभी स्त्री और पुरुषोंको 
बाद मौती होकर मधुर मोदक और पूडोंका भोजन करे | चाहिये कि, वे श्रीगणशजीके इस भाद्रपद शुक्छा चतुर्थी" 
पर छुवण एवं क्षारके पदार्थोका भोजन न करे ॥१२८॥ हे | वाढे ब्रतकों अवश्य करे। इसत्रतके करनेसे उनके मन चाह 
चन्द्र ! जो मनुष्य इस प्रकार त्रत करते हैं, उनकी सदा | सब काय सिद्ध होते हैं । विन्नराज गणेशजीके प्रसन्न होने 
जय होती है। में उसके लिय आणिमा आदिक मुख्य तथा | पर कुछ भी कठिन नहीं हैं किसी भी कार्यम विन्न उपस्थित 
आकाश गमनादिक गौण अथवा काय्ये सिद्धि एवं धन | नहीं होता ॥१३७॥ इस प्रकार स्करुद पुराणान्तगेत नल" 
धान्यकी सम्पत्तिप्रदान करता हूँ | सन्‍्तानसुखको बढावा | केश्वर सनत्कुमारके सवादरूपसे स्यमन्तकोपाख्यान पूरा 
है ॥ १२९ ॥ इस प्रकार पूजनविधि और उसका माहात्म्य | हुआ ॥ 

बताकर भगवान गणपणिजी अन्तहिंत होगये। है श्रीकृष्ण |। कपर्दिविनतायक ब्रतका निरूपण करते हें-बतकरतेत्राढा 
आप भी मिथ्या अपवादकी शान्तिके लिय गणपति ब्रतको | श्र्वणसुदि चतुर्थी रविवारस एक वक्त भोजनकरता हुआ 
करो, इससे तुमारीभी सिद्धि होगी ॥ १३० ॥ नारदूजीने | एक महीना इस ब्नतकों करे। इसके करनेसे हे सुरेधर' 
ब्रत करनेके लिये कहा तथा मक्तोंके पाप ठुखोंको हरनेवाले | मुष्योंको सब सिद्धियाँ प्राप्त होजादी हैं। अब इस ब्रतके 
स्वयूम्‌ कृष्णचन्द्रजीने भी इस गणपतित्रतकों किया वे इस | करनेकी विधि कहते हैं-अथम सद्डूस्प करे उस स्डूरपमें 
ब्रतके प्रभावसे ही मिथ्यापवादकों धोकर शुद्ध द्वो गये | तिथ्यादिका स्मरणकरके कहे कि; मैं अपने चारों धरम 
0३१॥ लो छोग तुम्दारे उस स्वमन्तकप्रणिवाक्ले आख्या- | अथे, काम और मोक्षरूप पुरुषाथोकी सखिद्धिके लिये क१- 
नको सुनेगे उ्त छोगोकेंमी साद्रशक्दा चतुर्थीमे चन्द्रदशन दिविनायकके ब्रतको करता हू, फि्रि क पर्दिविनायकके 
जन्यदोष स्पश्षे नहीं करेगा ॥१३२॥ हे श्रीकृष्ण ! तुमने | मूलम्ेत्रस पढ़कर न्याख करके उनको पूजाकर / ओ नमः 
किसी सम्यम् भादशुक्ढ्ा च॒तुर्थीकीं चन्द्रदशन किया था। | कपदिते” यह मूलमत्र हे इससे अड्गन्यास करनेबाला,ओम 

बज यह दोष छगा हूं। ऐसही जिनके भाद्रशुक्वा- | नमः हृदयाय नमः; भोम्‌ क शिरस स्वाद, ओमू १ 
हि 0 ह:0+ 2 ा सिथ्या बज शिखाये वषदू, ओं द्किवचाय हुं; ओं ने नेत्रत्राय बोषद। 
0२४५६ ओर जबजब में ये इस समस्त चरितको सुने | ओं नमः कपदिने अस्ाय फट । इस शभकार है: 

! ब सनम व्याकुछता खडी हो या कोई | वार उच्चारण करवा हुआ हृदयादि षडड्भन्यास करे 


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भाषाटीकासमेंलः । (१६१) 


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तब्रादों पीठपूजा-#नमोभगवले सकलगशुणात्मशक्तिपुतानन्तयोगपीठायनमः॥| अछदलकेसरेष ४ 
३४ तीव्राय नमः।ज्वालिन्य ० । नन्दाय० । भोगदाये० । कामरूपिण्ये० । उम्राये ० । तेजोबत्ये० 
सत्याये ० । मध्यपे विन्नविनाशिन्ये० ॥ अथ ध्यानम्‌ू-पकद॒नत॑ महाकार्यथ लम्बोदरगजाननम्‌ ॥ 
विन्ननाशकर देव गणेश प्रणमाम्यहम्‌ ॥ इमां पू्जां गहाणेश कर्पादिंगणनायक।॥ इतिध्यात्वा ॥ 
आंगच्छ देवदेवेश स्थाने चात्र स्थिरो मव॥ यावद्वतं समाप्येत तावत्व सन्निषोनवा इतित्रिवार 
पठेत्‌ ॥ विनायक नमस्तुभ्यप्ुमामलसमुद्भधव । इमां मया करता पूजां प्रीव्यथ प्रतिगृह्यताम ॥ 
सहस्नशीर्षेत्यावाहनम्‌ ॥ अलेकारसमायुक्त मुक्तामणिविनूषितम्‌ ॥ स्वर्णसिहासनं चारू प्रीत्यथ्थ 
प्रतिगह्मयताम॥पुरुषएवेदमित्यासनम्‌ ॥ गोरीखुत नमस्तेषस्तु शंकरप्रियकारक ॥ भकक्‍त्या पाश॑ 
. मया दत्त ग़हाण गणनायथक ॥ एतावानस्थोति पाद्यम्‌ ॥ ब्रतसुद्दिश्य विश्लेश गन्धपुष्पादिसं- 
युतम्‌ ॥ गहाणाध्य मया दत्त सवासेद्धिरदायक ॥ तजिपादूध्य इत्यप्येम। गणाधिप नमस्तेषस्तु 
गोरीसुत गजानन ॥ गृहाणाचमनीयं त्व॑ सवीसेद्धिपदायक ॥ तस्मादिराब्व्त्याचमनीयम ॥ 
अनाथनाथ सवज्ञ गीवाणपरिपूजित ॥ स्वान॑ पश्वामुल॑ देव गहाण गणनायक ॥ आप्या- 
यस्वति दुग्धम्‌ ॥ दधि ऋाग्णो इति दाथे ॥ बृतं मिमिक्ष इति घबृतम ॥ मदइुबातेलि मथ्ु ॥ 





पीछे पूजनके आरंभ पीठ पूजन करे । पीठ ( आखन ) 
केणिकायुक्त अष्टट्क कम्छक आकारका बनावे, दृहिति 


नमः ? यहांसे पीठाय नम: यहांतक पड़ इस मत्रका अर्थ 
यह है कि, संपूर्ण गुणवारू आत्म शक्तिवाले अनन्त पीठों 


दुलों और उसके केशर पर नीचे छिलले हुए भन्रोमें एक 
एकको एक एक कर बोछता हुआ अक्षत्र छोडता जाय; 
“४ ओंं तीत्ाये नमः? तीब्राके छिये नमस्कार आओमू ब्वालि 
नये नमः ज्वालिनीके लिये नमस्कार * ओमू नन्दाये नमः 
ननन्‍्दाके लिये नमस्कार * ओम मोगदाय नमः ? भोगदाको 


बत्ये नमः ” तेजवालीको नमस्कार * ओमू सत्याये नम 
सत्याके लिये नमस्कार इन आठ मन्त्रोंको पढे फिर 
उसकी कर्णिका पर अक्षत पुष्पोंको छोड़ता हुआ ' विजन्न 


विनाशिन्ये नेः ? विपन्नविनाशिनीके लिये नमस्कार इसको | 


पढे फिर ध्यान करे कि, एकदनन्‍्त, भहा ( स्थूछ ) काय 
छम्बोदर, गजेसद॒श मुखंवाढे, विन्नोंके नाशक गणपति 


जो आपकी पूजा करूं आप उसको अज्भीकार करिये इस 
प्रकार ध्यान करके * आगच्छ ” इस मन्त्रका तीनवार हाथ 
जोडकर उच्चारण करे कि, हे दव दवश : आप इस स्थकृस 
पधारकर तबतक स्थिर हो जबतबक कि आपका ब्रत सम्ताप्त 
न हो जाय । 'विनायक ?” इस पौराणिक और आओ सहख- 
. शीर्षा पुरुष इस वदिक मनन्‍्त्रसे आवाहन करे कि, 

. विनायक ! हे पावतीजींके शरीरस उतरत हु २ सेछस प्रगढ 
होनेवाढ ! आपके लिये प्रणाम हेभापकी प्रीतिके लिय जो 
मे पूजा करक्वा हूं उस आप ग्रहण , करिय “ अछछ्कार ' इस 


१ 


| पौराणिक वथा 
| न्त्रस आसत्र प्रदान करे कि; अलझ्लार रब मोतियोंस सुशो 
हाथ अक्षत भौर पुष्प छेकर आसनपर छोडता हुआ ओम 





ओम युरुष एवंद्‌ *' इस वंदिकम 


जित यह सिंहासन आपके विराजमान होनेके छिय है, इस 


| सुन्दर आसनको आपकी प्रसन्नताके छिये सम्रपेण करताहूँ 


| आप इसे ग्रहण करिये गौरीसुत' इस पौरणिक मंत्रस तथा 
बाढे भगवानक छिय समरकार हेँ। भ्रष्टदूछ कमछके आठों | 


एतावानस्य ' इस वेदिक मेत्रस पाद प्रश्षाछनाथ पाद्य 


| दान करे, हे गोरीननद्न ! आप महेश्वरको प्रसन्न करनेवाहे 
| हैं, है गणोंके अधिराज |! आपके छिय भक्तिसे मने पा 


प्रदान किया है आप इसे ग्रहण करिये  ब्रवमुद्धिश्य 


इत्यादिक पोराणिक छ्व ज़िपादूध्वे सं बेंदिक सन्त्रस हस्त- 
| प्रक्षाउनाथे अध्ये प्रदान कर | अथे यह हे कि; हे विन्नेश्वर ! 
नमस्कार “ओम कामरुपिण्ये नमः” कामरूपीके लछिय नम- 
स्कार * ओ उम्राय नमः 'उम्राके छिय नमस्कार आओ तेजो- | 


मेने ब्रतकी सदूगुणताके छिये गन्ध पुप्पादिस युक्त अध्य 
प्रदान किया है; हे समस्त सिद्धियोंके प्रदायक | आप इसे 
ग्रहण करीये * गणाधिव' इस तान्त्रिक एवम्‌ तथ्माद्विराड 
जायव ' इस वेदिक मंत्रसे आचमनीय प्रदान करे कि, है 
गणाधिप ! है गोौरीतनदन | हे गजानन ! हे सब सिद्धिप्र- 
दायक | आप आच मन करों, आपको आचसन करानक 


| छिये यह आचमनीय है अनाथनाथ इस तान्त्रिकमन्त्रसे 
| पच्चाम्तस्नान कराये कि; अनाथोंक नाथ ! हे सर्वज्ञ | हे 
देवको में प्रणाम करता हूं | हे जटाजूट घारी गणनायक मर | 


देवताओंक भी पूज्य | हे गणाधिराज | हूँ देव | स्तान कर- 


| भेके छिये पच्चामृतग्रहण करिये | पच्चासुतसे स्नान करानेके 


पूर्व “ ओमू आप्यायस्व समेतु ” इस वद्किम्रत्जस दुग्ध 
स्नान कराकर शुद्ध जल्स स्नान करावे, ओमू द्धि ऋब्णो 
इस बेदिकमन्जस दधि स्तान, फिर शुद्ध स्नान करावे | 
ओम घृत मिमिक्ष इससे घृतस्नारु, फिर शुद्ध जलूसे खान 
कराव । ओम मघुवाता ऋतायते' इस वेद्किसन्त्रस सधु- 
स्नान, फिर अेद्धईंजलूस स्नान करावे। और “ओम स्वादु 
पबसव” इससे शकेरा द्वारा स्नान कराकर शुद्ध जछसे 
स्नान करावे | इस प्रकार दुग्ध आदि द्वारा। अछगे अलग 

















स्वाहुःपवस्वोति शकरा ॥ इति पंचामृतस्नानम्‌ । | गड्ांजलं समानीत॑ हेमाम्भोरूहवा सेलम ॥ 
स्‍नाने स्वीकुर विध्रेश कर्पादुगणनायक ।। यत्युरुषेणेति सस्‍्नानम्‌ ॥ हरिद्रखद्वयं देव देवाड्ूवस- 
नोपमम्‌ || भवत्या दत्त गृहाणेश लंबोदर हरात्मज ॥ त॑ यत्गमिति वस्धम्‌ | नानालंकारसंयुक्त 
नानारत्नेविभूषितम्‌ ।। अनेकदिव्याभरणं प्रीत्यथ प्रतिगृह्ताम्‌॥ आभरणानि॥ राजत बहस 
च काथ्वनं चोत्तरीयकम्‌ ॥ भालचन्द्र नमस्तुभ्य ग्रहण बरदों भव॥ तस्मायज्ञादिति यज्ञोपवी- 
तम्‌ ॥ कपूरकुंकुमेयुक्त दिव्यचन्दनमुत्तमम्‌ ॥ विलेपन सरश्रेष्ठ मीत्यर्थ प्रतिगह्मताम्‌ ।। तस्मा- 
शज्ञात्सवंहुत इति गन्धम्‌ ॥ अक्षतान्धवलान्देव सिद्धगन्धवेपूजित । भक्‍त्या दत्तान्‌ गहाणेमार 
सर्वेसिद्विमदायक ॥ अक्षतान्‌ ॥ सुगंधीने च पुष्पाणे ऋष्धिसिद्धिप्रदायक ॥ कर्पार्देंगणनाथेश 
मया दत्ताने गह्मताम्‌ ॥ तस्मादश्वेति पृष्पाणे॥ अथाड्रपूजा-कपर्दिंगणनाथाय० पादोपू० 
गणेशाय० जाठ॒नीपू० । गणनाथाय० ऊरूपू० । गणक्रीडाय० कंटिंपू० | वक्रतुण्डाय० हृदयंपू० । 
लम्बोदराय० कण्ठंपू० गजाननाय० स्कन्धोपू०। हेरम्बाय० हस्लौपू० । विकटाय० मुखंपू० । वि्न- 
राजाय० नेत्रेपृू० । धूम्रवणाय० शिरंःपू० । कपर्दिनेन० सर्वाड्रपू० ॥ अथावरणपूजा-ईशानाय० 
अघोराय० तत्पुरुषाय० वामदेवाय० सद्योजाताय० इतिप्रथमावरणम्‌ ॥१॥ वकरतुण्डाय० एकद- 
न्ताय० महोदराय० गजाननाय० विकटाय०.॥ विप्नराजाय० धृम्नरवणोय० विनायकाय० द्विती- 
यावरणम ॥२॥ ब्राह्मयेन ० माहेश्वर्यें कोमायें० वेष्णव्ये० वाराह्मे० इन्द्राण्ये०चामुण्डाये० महा- 


च्ख्ंच्!ंःँंख्ख्चुँखच्|ंँ्ँु्््च्च्च्ल्ंंसंडसःसखखख सखाचलससछसब5बाटााी,5 4 ट2जजसओख ---3न.न ७ ७७क७क७५७७क७७)४४०७७७७ ५ »७५५७,५७॥५५))७)७,७५५७५»७५॥५+७७७५०+०्‌०+++॥४०७+५१७५७५५५०५५५७७७५०५॥ 


और पश्चामृतद्वारा एकबार स्नान कराकर [ पञ्चाम्॒तके 
मंत्रोंकों पीछे छिख चुके हैं | 'गद्गाजल' इस पौराणिक 
ओर “ भोमू्‌ यत्पुरुषेण हृविषा ” इस बेद्किमन्त्रद्मारा शुद्ध" 
स्नान करावे कि, हे क्रपदि गणनायक! है विप्नराज ! स्तानाथ 
सुचणक कमछकी सुगन्धीसे सुबवासित इस गह्लाजलको 
सस्‍्तानके लिये स्वीकृत करिये | 'हरिद्रल्नद्वयं' इस पोराणिक 
चथा “ओं ते यझे वहिषि ” इस बवेदिकसन्त्रस वस्र घारणं 
क्रावे । तान्त्रिक मन्त्रका यह अर्थ है कि, हे लम्बोहर ! हे 
झड्ूूर नन्‍दन ! देवताओंके शरीरपर धारण कराने योग्य ये 
दो हरे रंगके वस्र आपके लिये भक्तिसे समर्पित किये हैं, 
हे इंश ! हे प्रभो ! आप इनको धारण करिये, नानाढझ्षरः 
इससे आभूषण पहरावे कि, विविध अलछड्भार और रत्नोंसे 
सुन्दर इस आभरणोंकी राशिको आपकी प्रसन्नताके लिये 
समपित करता हूं आप इसे ग्रहण करिये ' राजत ”? इससे 
तथा “ओम तस्मायज्ञह्सव ” इससे यज्ञोपवीत पहिरावे। 
“ राजप ” इस पद्यका यह अथ है कि, हे घन्द्रशेखर ! 
अपके लिये प्रणाम है, आप इस चांदी तारोंके इस यज्ञों- 
पवीतको कांचन उत्तरीयकों धारण करो” आपके ढिये 
प्रणाल हे, आप वर प्रदान मेरे प्रति करो “ कपूरकुड्कुमे” 
इस तन्त्रिक “ओम्‌ तस्पायज्ञात्‌” इस वेद्किमन्त्रसे छा 
इगन्धित चन्दन छगावे | कपूर इसका अथे यह है कि, हे 
इुप्त्ए , कपूर कसरसे रुचिर इस द्व्यबिसे हुये चन्द- 
नको ॥ आप अपनी असज्ञताके लिये प्रहण करिये अक्षतान' 
इसस चावढ उगाते। अथ इस्चका यह: हे कि, हे देवता, 


सिद्ध एवं गन्धवाँसें सवित ! हे सर्व सिद्धि प्रदायक | 
आपके छिये भक्तिसे सफेद अक्षत चढाये हैं आप इन्हें अहण 
कारेये  सुगन्धीनि ' इससे तथा “ ओम तस्मादश्वा अजा- 
यन्‍्त' इस बेदिकमन्त्रसे पुष्प तथा पुष्पम्माल्ा चढावे ।सुग- 
न्धीनी? इस छोंकिक सन्‍्त्रका अथे यह हे कि, हे ऋद्धि 
ओर सिद्धिक प्रदान करनेवाले | हे कर्पाई गणेश ! आपके 
लिये मैंने ये सुगन्धित पुष्प समर्पण किये ह आप इन्हे प्रहण 
करिये फिर ' ओं कपदिंगणनाथाय नमः पादौ पूजयामि- 
इन मूछके कह मन्त्रोंस गणेशजीके चरणादि. अज्ञोंकी 
अलग अछग पूजा करे। इन चतुथ्येन्‍्त गणपति वाचक 
पदोंके आग 'न्मः? इस पदका; ह्वितीयान्त पादादि भह्ढ 
वाचक पदोंके आगे 'पूजयामि' इस क्रियापदका श्रयोग है। 
अथ स्पष्ट है। कि कपर्दिं गणनाथ आदिके छिये नमस्कार 
है पाद्‌ जानू ऊरू आदिको पूजता हूं।ये बारह नाम हैं इनस 
क्रमशः बारहों अगोंकी पूजा होती है । अथ आवरणपूजा- 


श्र का. ७२ किक ज. है 
इशानके लिये नमस्कार, अघोरके लिये नमस्कार, तत्पुरुषक 


लिय नमस्कार, वाप्नदेवके लिये नमस्कार, सद्योजातके ल्यि 
नमस्कार इनस पहिले आवरणकी पूजा- करनी चाहिंये। 
पकऋतुण्डके लिये त्रमस्कार; एक दन्तके०,महोद्रके०, गजा" , 
ननके० बिंकटक०, विप्नराजके०, धूम्र वर्णके० , विनायकके . 
लिये नमस्कार इनसे दूसरे आवरणकी पूजा होती हैं। 
झ्यीके हश्वर्र मे प हीं? ' 
नाह्मीके०, माहश्वरींग, कोमारी०, वेष्णवी०, वाराहौं? 
इन्द्राणीए, चाम्ुण्डा० और महालक्ष्मीके छियें नर्भस्कार 


ब्रतानि, ] भाषाटीकासमेतः । क्‍ ( 


१८३ ) 











लक्ष्म्य० तृतीयावरणम्‌ ॥रशे। इन्द्राय० अग्नये० यमाय०निऊलये० वरूणाय० वायबे० सोमाय० 
इंशानाय० । वरूणनिक्त्योमेध्ये अनन्ताय०। इन्द्रेशानयोम॑ध्ये बरह्मणे०॥ इतिचुर्धावरणम।शा 
वज्नाय० शक्तये० दण्डाय० खड़ाय०पाशाय०अंकुशाय० गदाय० त्रिशलाय“चक्राय८्अब्जाय० 
इतिप्रचमावरणम्‌ ॥ ५ ॥ दकश्ाड़ झग्गुलुं धूपं चन्दनाग्ररुसंयुतम्‌ ॥ उमाछुत नमस्तुभ्यं गहाण 
वरदों भव ॥ यत्पुरुषमिति धूपम्‌ ॥ ग्रहाण मंगर् देव इतवर्तिस्प्रज्लिनस ॥ दीप॑ ज्ञानप्र्द चारू 
रूद्र्रिय नमोस्तु ते ॥ बराह्मणोस्येति दीपम्‌॥ नवेद्यं गृह्मतां देव०॥ चन्द्रमामनस इति नेवेच्वम॥ 
आचमनीयम्‌ ॥ इदं फलमितिफलम्‌ ॥ पूगीफलमिति तांबूलम्‌॥ हिरप्यगर्माति दक्षिणाम। 
अग्निज्योती रविज्यॉतिज्योतिरप्रिविभावरुः ॥ ज्योतिस्त्व॑ सर्वदेवानां गणाथिप नमोषस्तु तें॥ 
नीराजनम्‌ ॥ याने काने चं० नाभ्या आसिदिति प्रदक्षिणा: ॥ नमोस्त्वनन्तायथ० सप्तास्यास- 
त्रिति नमस्कारः ॥ गणाधिप नमस्तउस्तु नमस्तेषस्तु गजानन || लंबोदर नमस्लेस्त नमस्ते- 
सत्वम्बिकाखुत ॥ एकदन्त नमस्तेस्तु नमस्तेप्स्तु ऋवभिय।स्कन्दामत्रअ नमस्तेषस्तु नमस्लेस्त्वी- 
प्सितप्रद्‌ ॥| कपरदिंगणनाथेश सर्वेसंपत्मदायक ॥ यक्षेनयक्ञ० मन्त्रपुष्पांजलिम्‌ ॥ अथ बह्मचारि- 
पूजा--अकणान्मुष्टिगणितांस्तण्डलान्सवराटकान्‌ ॥ विप्राय बटढवे दद्याद्नन्धपुष्पार्चितायथ च॥ 
तण्डलान्वे ततो दष्यात्पाके'चात्र च शोभनाव।|कपदिंगणनाथो5सो प्रीयतां तप्डुलेः सदा ॥. कथा 
श्वुत्वा विधानेन देवमुद्रासयेत्ततः ॥ इतिकपरदिगणपतिपूजा ॥| अथ कया ॥ खूत उदाच | कदाचि- 
दुपविष्टश्व पावेत्या सह शंकरः || इति प्राह प्रियां तां तु कि बाते रतिरस्ति ते। १॥ दुरोदर- 





इससे तीसरे आवरणकी पूजा होती है। इन्द्रके छिये अप्निकरे 
लिये, यमके लिय, वरुणक छिय, वायुके, लिये, सोमके 
लिये; इंशानके लिये, वरुण ओर नेऋतिके बीच अनन्‍्तके 
लिये इन्द्र ओर ईशानके बीचमें त्रह्माके लिये नमस्कार हे, 
इनसे चौथे आवरणकी पूजा होती है।बज्ञ ० ,शक्ति०;द॒ण्ड०, 
खज्भ ५ पाश,अकुश, गदा०, त्रिशूछ०, चक्र: और कमछऊे 
लिये नमस्कार, इनसे पांचमे आवरणकी पूजा होती है । 
'दृशाकहुम्‌” इस तान्त्रिक “ऑयत्पुरुषम!”इस बेद्कि मन्त्रसे 
धूप करे कि,हे पावतीनन्द्‌्त|चन्दुन और अगरसे सुगन्धित 
इस दशांग गुग्गछकी धूपको प्रहण करके वर अदान करो, 
मरे आपको प्रणाम हैं | * गृहाण ? इस पौराणिक ओऔर“ओं 
ब्राह्मगोउस्य ” इस वेद्किमन्त्रस दीपक प्रज्वछित करके 
दीपककी ओर अक्षत छोडे, फिर हाथ धोव । हे शह्लूरप्रिय! 
आपके समीप यह माकुलिक सुन्द्र घीसे पूर्ण ओर पत्तीसे 
युक्त प्रकाशस्वरूप ज्ञानको करनेवाला दीपक ग्रश्वढित कि- 
या हैं, आप इसको ग्रहण करिये, आपके ढिये प्रणाम्त हैं, 
“जैंवेद गृह्मतांदेव”इस पूवोक्ते पौराणिक मन्त्रस,तथा “ओम 
चन्द्रमा मनसो ” इस वेदिकमन्त्रस भोग 'घरे तद्नन्तर 
« शीतल निम्ू तोय ?! इस मन्त्रसे आचमव कराकर “इृ्‌ं 
फल सया देव स्थापितम्‌ ” इस मन्त्रसे ऋतुफछ, “पूगी रे 
महद्दिव्यम” इससे एछा छव॒ह्ञ समेत ताम्बूछ ओर सुपारी, 
“हिरण्य गर्भगेखम्‌” इससे दक्षिणा समपंण करना चा- 
हिये फिर कपूर ग्रज्वलित करके आरती करता हुआ “अग्नि- 
व्योती ” इस मन्त्रका उच्चारण करे । इसका अथ यह हे 


१ ऋबेरायेतिपाठ:ः | 


कि, अग्नि और सूय अकाशस्वरूप है और ज्योति (प्रकाश) 
भी अम्नमि एवं सूय स्वरूप है । हे गणाधिप ! आप समस्त 
देववाओंकी ज्योति हैं आपके छिये प्रणाम है “ यानि छानि 
च पापानि” इस त्रागुक्त तान्त्रिकमन्त्रसे तथा “ओम नाभ्या 
आसीदन्तरिक्षम्‌” इस बैदिकमन्त्रसे प्रदृक्षिणा करे। “लमो- 
अस्वनन्ताय” “ओऑसप्रास्यासन्‌ पीरधय/” इस मत्रोंखे प्रणा- 
से; “गणाधिप” इन पराणिक तथा “ओम यज्ञेत यज्ञम 
यजन्त” इस वेद्किमन्त्रस पृष्पाजजलि प्रदान करे । तान्त्रि- 
कमसन्त्रोंका भथे यह हें कि, हे गणाधिप | हे गजानन | हे 
लम्बोदर ! हे पावतीनन्दन ! है एकद॒न्ल! हे महादेवजीके 
पियारे पुत्र | हे स्वामिकार्तिकके अग्मज ! हे अमितवरके 
प्रदानकारिन्‌ ! हे कपर्दिन्‌ ! हें गणनाथ ! हैं इंशवर ! हे सम- 
स्तसम्पत्तिप्रद |! आपके लिये बारबार प्रणाम है । फिर ब्रह्म- 
चारी बटुकका पूजन करे, इस पूजनमें उस ब्रह्मचारीकी 
पूजा करके उसके लिये विना फूटे, एक मुद्टीभर, वराटक- 
समेत, भात करनंयोग्य सुगन्धित चावढॉकों देकर आना 
करे कि इन चावढोंके प्रदानसे कपर्दिगणनाथभगवान मेरे- 
पर सदा प्रसन्न रहें फिर कथाको सुने तदनन्तर उत्तका 
विसजन करें यह कपर्दिगणपतिका पूजाविधान पूरा हुआ ४ 
अब कथा कहते हँ-सूतजी शोनकादि मुनियोंसे बोले कि, 
किसी समय पाव॑ती ओर महादेवजी दोनों केछासपवेलपर 
विराजमान हो रहे थे, महादेव जी अपनी प्रिया पावततीजीसे 
बोछे कि, हे पावति ! क्या तुम्हारी झलकीडा करनकी 
अभिवाषा है १ | तब पाती जीने भी चतक्रीडास महा- 





हु ) बअलराज: ल्‌ रा ज | [ चतु थीं | ध्् 
( ॥। द य 22 0:72: 70570 :0:0% 20/50/0700 2702 /20:7777 7770 75% 77, 70000, (02/72/55८7 22:72: ४4827 7000 5//8/73/) (9:2६ ४ ॥ 28:28 227::/6/4/0 ज्च्ःचस्‍चिि्चििससस काम थ 28/02/0003: 407: पदक पाक 
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मिपालेत वाडिक्नम प्रत्युवाच सा॥ममाषि तस्मिस्सास्त्येव त्वया चेदयिते पण॥२॥शिव उवाच।! 


बिक] 


तव किंकिमभीष् ठ॒ दास्‍्यामि परमेश्वरि ॥ छोकत्रय प्रयच्छस्व किमस्येबचनेत्रंथा॥ ३ ॥पार्षत्यु 
वबाच ॥ यच्छामि पश्चादेतन्मे दातव्यमिति बोच्यते ॥ यदि त्वया तदानों तु विश्वासो 
नास्ति में त्वाये॥४॥वाक्यमेवंविध श्रत्वा शर्बः सर्वात्मनाम्बिके ॥ न विश्वासयितु केन शक्यते 
किंपुनमम॒ ॥ ५ ॥ सोल्लुण्ठनेन कि देवि द्यूतेच्छास्ति तबेब चेत्‌ ॥ पणः प्रकरप्य क्रियतां प्णे 
तिष्ठाम्यहं सदा ॥ ६॥ भाव॑ सथ्चिन्त्य पावेत्याः पणमाकरुप्य यत्रतः॥ चिशूलं विदशान स्वार्‌ 
साक्ष्य च इरोदरे॥»।तस्मिन्कम्शंणि. तज्ित्वा पणमप्य्रहीच्छिवा ॥ एवं डमरूकादीनि तान्य- 
न्यान्यजयत्पृथक्‌ ॥ 4 ॥ दीनो भूत्वा महादेवों भवानीमब्रब्रीदिति:॥ शादूलचर्म तन्मध्ये देहि 
में गिरिजे .झुभे॥९ पार्वत्युवाच॥ न चेव॑ वक्‍त॒मुचितं महादेव पणे गते॥पणे जिते न दास्यामि 
पूवरभुक्तोईसि तत्स्मर ॥ १० ॥ अविचिस्त्य बवीषि त्व॑ं जगदीश क्रपानिपे ॥ इते श्र॒त्वा बचो 
देव्य: कुप्रितोहसो(महेशवरः ॥ ११ ॥ आद्वादशदिनं देवि न रिप्यामि भाषणम्‌॥ इत्युक्ता 
च महादेवस्तत्रवान्तरधीयत ॥ ११॥ रक्षरक्ष क गच्छामि किस्रीवनमतः परम्‌ ॥ इति सश्चिन्त्य 
ता डजम॒द्यान॑ मत्यपद्यत॥ १३ ॥ गिरिजा तत्र वनिताबइन्दं दृष्ठाबवीदिति॥ किमर्थमागताः 
सर्वाः किमेतत्क्रियतेएचुना ॥ १४ ॥ ख्थिय उचुः॥ कर्पादिगणनाथर्य ब्त॑ कतु मिहागताः ॥ तस्य 
शजां विधायादाविदानी श्रूयते कथा ॥ १५ ॥ पार्वत्यवाच ॥ किम तद्गत॑ नायों युष्माप्ति' 
क्रियते बने ॥ फलमस्य किमस्तीति पार्वती प्राह तह प्रति॥ १६॥ ख्विय ऊचुः॥ प्रछचते किं 
त्वया देवि नरेनारीभिरम्विके ॥ अभीष्टसिद्धिरस्मात्त लभ्यते भ्ुवनत्रये | १७॥ इति श्रत्वां 
पचस्तासां पावेती म्राह ता झुवि॥ मत्तः कुपित्वा भगवात्रिगतस्त महेश्वरः ॥ १ न लपनम न हलक न लक कट नह मी, विन नस भहधीहओ १$ गाल ॥ तस्य 


४ |, 
देवजीको जीतनेके छिये प्रत्यु्तर दिया कि, भेरी भी झत- | देवजीका मुख दीन होगया, स्छानवद्न होकर पार्व॑तीसे 
क्रीहा करनेकी अभिलाषा हे यदि आप पण (डाव) लगावें | बोल कि, हे शुभे | गिरिज ! आपने जो जीते ड् उनमेसे ह 
| २ ॥ महादेवजीने कहा कि, हे परमेश्वरि | आपको क्या | व्यात्नचस मुझे देदीजिय ।। ९ ॥ पावतीजीने कहा कि, अब 
तय पण ( डाब ) छूगवाना है ! सो कहिये। में उसी पण- | आप. वापिस देलेको मत कहो आप झूतमें दाव लगाकर 
को लगाऊंगा ! जरतु मैंने त्रिछोकीका पण छगाया है. अब | हार गये हैं, मैंने पहिल्ले ही कहाथा कि, हारनेपर कोई भी 
में जीतता हूं, छाओ; त्रिछोकीका प्रतिपादन कर, विशेष | वस्तु वापिस नहीं दीजायगी आप उसे याद करें ॥ १०॥ 
कहनेकी क्‍या जरूरत है ॥३॥ पावतीजीने उत्तर दिया | दे विश्वेवर ! हे दयासागर | अब जो वापिस माँगते हो 
कि, फिर यह प्रदान करेगी या नहीं, इस विषयर्म आपको | यह माँगना अविचार मूलक है | इस प्रकार जब पावती'- 
मेरा विश्वास नहीं है तो आप पहिलेही ढीजिये में पहि-| जीने कहा, तब महेश्वर भगवानने नाराज होऋर क हा 
लही देती हूं ॥ ४७ ॥ पावतीजीके ऐसे वचनॉको सुनकर || ११ ॥ कि, में आजसे बारह दिनतक सम्भाषण नहीं 
भद्दादेवजीन कहा कि, हे अम्बिक ! ऐसा कौन होगा जो | करूंगा झट आप वहां ही अन्तहिंत हो गये ॥ १२ ॥ महा- 
आपका सर्वथा विश्वास न करे, फिर में आपका विश्वास | देवजीके बिना पार्वतीजी उद्धिम होकर पुकारने छगी कि, 
न करूं, यह तो कभी हो ही नहीं सकता ॥ ५॥ किंतु हे | है नाथ ! आप मेरी रक्षा करो रक्षा करो, में कहां जाऊं 
देवि ! तुम ऐसे टेढे वचन क्यों बोछती हो, यदि आपकी आपके विना यहां किसलिये रह ! इस अ्रकार शोचकर 
धूतक्रीडाके लिये ढालसा हू तो दाव क्या रखती हो ? सो बगीचेसें चली गई ।|१३॥ उस बगीचेपें बहुतसी ख्लियोंको 
जे 0 सदा तैयार रहताहू ॥ ६ ॥ महा- | पूजन करती हुई देखकर पार्वतीने पूछा कि, हें स्त्रियों आप 
हे पा 8९ अ विचार समझ- क्यों आई हो। इससमय क्या करती हो।। १४।किस उद्देशको 
के अर क यहको पणके रूपमें रखा ओर लेकर्‌ इस अतको कर रहीहो,इसके करनेसे कौन फल मि 
न हारजीतके. >उतन्‍्धानक हछिये साक्षि- | छताहै॥ "॥ख््रियोने उत्तर दिया कि, है देवि ! हे अम्बिके ! 
जि २७७४४ ० ३४५ जूएमें वह दाव जीत आप क्या पूछती हो,तीनों ढोकोके खीओर पुरुष इसत्रत॒को 
करण दादपर घरे र "कप . अपन डमरू आदि: हो अपन कार्योकी सिद्धिके लिये करते हूँ उन्तको इसके करनेंस 
जीव डिये॥ ८ ७... पवतीजीने एक एक करके सिद्धि मिलती है १६-॥ इस प्रत्युक्तरको सुनकर पावती- 
/. डिंगे॥ ८॥ इस प्रकार सब सामग्रीके हारनेपर महा. जीर हेश्वरदे 
“मेक हारनेपर महा- | जीने कहा कि, हे सुराहनाओ ! महेश्व॒रदेब मुझपर कुप्रित 


स्का 


बतानि, | 


भाषाटीकासमेतः ( १६५ ) 


दम डक "कर “पल कचरे "न दा 


सनन्‍्दर्शनायव करिष्ये ब्रतमुत्तमम्‌ ॥ व्रतस्वेतध्य कि दान विधानं कीदर्श मम ॥ २९ ॥ स्व 
विचिल्य मनसा कथयन्त सुराड़नाः ॥ ख्रिय उचुः ॥ कालो विधान दाने च॒ ब्रतस्यास्य फल 
तथा ॥ २० ॥ तत्सवे सावधानेन वक्ष्यामः शुणु पावेति ॥ पातादिदोषरहिले सचतुभांलवा- 
सरे ॥ २१ || मासे कार्य व्रत सम्यग्गणेशापितमानसे! ॥ तेलताम्वुलभोगादीन्वर्जयित्वा 
शिवप्रिये ॥ २२ ॥ मन्दवारे ठु खुखीयादेकवार मित यथा ॥ प्रातःकाले शुचिभूत्वा स्नानंकुर्या 
द्विधानतः ॥ २३ ॥ वापीकूपतडागेषु नय्यां शुक्ृतिलेः्सह ॥ संध्यादिक यथान्याय सब निवेत्ये 
यत्नतःव। २४ ॥ अचनागारमासाद गोमयेनोपलिप्य च ॥ गोचर्ममात्र तनन्‍्मध्ये कुयोदन्धेन 
मण्डलम ॥२५॥ तम्मध्यः्टदर्ल पद्म तन्‍्मध्ये गणनायकम्‌ ॥ पूजयेत्स्वच्छकुसुमेहरिद्रामिश्रिता- 
क्षते! ॥ २६॥ गाँ गीं गूं गें गों गश्च न्यास कृत्वा ततः परम ॥ मन्त्रेणानेन कुसुमेरदेवमावाहम 
निक्षिपत्‌ ॥ २७ ॥ अथवा 'गणनाथस्य प्रतिमामथ पूजयेत्‌ ॥ ततस्तद्वताचेत्तः सन्‌ ध्यान कुर्या- 
दिधानतः ॥ २८ ॥ एकदन्त महाकाय लम्बोदरगजाननम्‌ ॥ विश्ननाशकरं देव हेरम्ब॑प्रणमा- 
म्यहम ॥ २९॥ इमां पूजां गृहाणश कर्पदिंगणनायक | आगच्छेति विरुच्चार्य कुर्यादावाहनो- 
देकम्‌ ॥ ३० ॥ पुराणमन्त्रर्थवा वेदमन्त्रेश्व षोडशो! | पूजयेहुप्चारेश्व मूलमन्तरेण पावोति ॥३१॥ 


ततत्मकाशकेमंत्रगन्धपृष्पाक्षतादोनेः ॥ 





होकर कहीं चले गये हैं।॥ १८ ॥ में उनके दर्शनार्थ इस 
ब्रतको करूंगी पर. कहो इसमें किस वस्तुका दान दियाजाता 
हैं! इसकी विधि कया है ? ॥| १९॥ आप मनसे सोचकर 


ठीक २ कहें। देवियॉन कहा कि; हे पावती ! हम आपके | 


लिये इस ब्रतक्कें समय, विधान, दान एवं फछोंको ॥२०॥ | ओम्‌ गे सध्यसाभ्यां नम; ओम गें अनामिका्यां 


| गरत ओम गो कनिष्चिकाभ्य, नमः, ओम्‌ ॥: करतर कर - 


कहती हैँ, आप सुनें, इस ब्रतझों उस महीनेम किया जाय, 


जिसमें चार रविवार हों, पांच रविवार न हों और जिस | 


हि ञो 
महीनेमें ब्रतके दिन व्यतीपात,संक्रांति;म्ासन्‍्त और व्याघा- | ग हृदयाय नम» ओम गीं शिरसे स्वाहा,ओम गूं शिखाये 


तादि दुर्योग न हों | २१ ॥ [ यहां चान्द्रमासके उद्देश्यसे | ओम में कबचाय हुंओमू गा नेत्रत्रयाय बौषद ओम 


। गः अख्ाय फट, इसे अद्धन्यास कहते हं। जिस मंत्रस 


यह कहा है घान्द्रमास प्रकृतमें श्रावण सुदि; एकसे भाद्र 


कृष्णा अमावस्यथापयेनत समझता, क्‍योंकि पहिले श्रावण | 
सुदि चतुर्थीका त्रवार॒म्भ कह आयें हैं यहां पर रविवा | 
रको है इस लिये ब्रतारंभकी श्रावण शुक्भा चतुर्थीभी रवि- | 

्क लि | चाहिय, पीछे गणेशजीमें ही चित्त छगाकर विधिपूर्वेक 


| ध्यान करना चाहिय ॥ २८ ॥ एकदांतवालछे, महानस्थूछ- 


वारी होनी चाहिये, और बह व्यतीपात वेधृति आदि दुययों 
गॉसे दूषित न हो ] जिनका मन गणेशर्मं छूगा हुआ है उन्हें 


चाहिये. कि, पूर्वोक्त मासमें व्रत करें। हूँ भवानि | ब्रत | 
: करनेवाछा तेछ और त्ाम्बूछ एवं भोगविछासादि न कर | 
॥२२॥ श्रावण सुंदि तीज शनिवारके दिन. एकही बार | 
परिमित भोजन - करें | प्रातःकाछ विधिपूवेक स्तान करे। 
| नायक | आओ आओ आओ ” इस प्रकार आवाहन और 


॥२३॥ स्नान वापी; कृप, तडाग,या नदीसें करना चाहिये। 


'स्तान करनेसे पहिछे सफेद्तिलोंस स्नान करना चाहिये | 
पीछे प्रयत्नके साथ विधिपूर्वकर्के सन्‍्ध्या तपंणादि नित्य-। 

से से | मन्त्रोंसे पूजन करे । अथंबवा पुरुषसूक्तके षोडश मन्त्रोंसे 
गोबरसे छीपे उसमें १२०छम्बा तथा ३१६ हाथ चोडा सडल | 
रोडीस करना चाहिय | २५ || उस संडछक बीचमें आठ | 
'दछ कम लिखें, उस कमछकी कर्णिक्राक ऊपर गणेश 
'जीकी मूर्तिको स्थापित करके स्वच्छ पुष्प और रोछीसे | 
रह्षे हुए चावरोंस पूजा करनी चाहिये ॥२६॥ “गांगीं गूं | 
में गों गः ! रे छः गणेशजीके मंत्रके बीज़ हैं; न्यास स्थाप 


कम्म.करके | २४।॥ पूजन करनेके स्थानर्म पहुँचकर उसे 


इन्द्रादिलोकपालांश्व पूजयेदेवसानीधों ॥ 


रै || 


नाको कहते हैं भावनास ऋमशः अँगृुठे और अँगुलियोंपर 
था हाथ नीचे ऊपर इन्हें स्थापित किया जाता है उसीको 
कहते हं-ओम गां अगुष्लाभ्यां नमः, ओम गीं तजनीभ्यां 


पृष्ठाभ्यां नमः । इसी तरह अद्भन्यास होता हे कि, ओम 


अगन्यास और करन्यास कहे हैं। इसी मंत्रस गणेशजीका 
फू्ोंसि आवाहन करके फूलॉको वर्खेर देना चाहिये ॥२७ 
अथवा इसके पीछे गणशजीकी प्रतिमाका पूजन करना 


शरीरवाल, लम्बे उद्रवाले, गजमुखके सहद्ृश सुखवाले 
विन्ञोंके नाशक | हेरम्बदेवको प्रणाम करता हूं ।[२९।॥| फिर 
प्राथना करें कि, है इंश | हे कपदिगणनायक ! आप यहां 
पंधारकर इस पृजनको अज्भीकृत करिये “ है कपदि गण 


“ अस्मिन्नासन सुस्थिरो-भव ?” इस आसनपर बेठिये इससे 
आसनोपवेशनादि करे || ३० ॥ है पावति ! पौराणिक 


पोडशोपचार सहित पूजन करे। या “ ओम्‌ नमः कपदि 
विनायकाय ?” इत्यादि मन्त्रस पूजन करना चाहिय ॥३१॥ 


| इस पूजनमें गन्ध पुष्प एवं चावचछ आदि जो भी छुछ 


गणेशजीके भेंट चढावे, वे सब अन्यत्र कहे हुए तान्च्रिक 
रु कर बिक भ् हर ५३ कक 
गन्धादिकोंके मन्त्रोंसे चह/ने चाहिय, गणेशजीके समी परम 


| ही इन्द्रादि छोकपालोंका पूजन करता चाहिय ॥ ३२॥ 


( १६६ ) 





| का ४...._._.__ल्‍ल६३भ३?हम्ऊ्न्भल्ग््गशणणएएण--एएए७.ए..ए#ःऊऊऋ>ऊःऋछःऋछ तन: 9 


लम्बोदर नमस्तस्तु 






त्रतराजः | द सदीिलयी 


नमस्तथस्त्वाम्बकाखुत | एकद॒न्त नमस्ते5स्तु नमस्तेस्त्वीप्सितप्र द्‌ ॥१५॥ 


| चतुर्थी- 


कपार्दिंगणनाथस्य स्ंसम्पत्मदायितः ॥ पूजाप्रकारः कथितस्तवास्मानीः शाचैस्मिते: ॥ ३४॥ 
अकणानअलिमितान ह॒विष्यब्रीहितण्डुलान ॥ स्वच्छान्यत्नेन संशोध्य चूर्ण कुयान्महद्वरि 


॥ २५॥ शिव ठ॒ चूर्ण मथमे भालवारे'बैचस्द्रवत्‌ ॥ कुर्याहितीय सम्पूर्ण 
कम्‌ ॥ ३६ ॥ तृतीय पायसात्न च दध्यन्न॑ च चतुथके ॥ 
भक्तितः ॥ ३७ ॥ कल्पितान्नानि विधिवद्विद्यन्त यानि 


चन्द्रवद्यष्टिकाछ- 
आनीयाष्टांशक सम्यग्देव॑ सम्पूल्य 
यानि च ॥ ते्षां तषामष्ठटमांश तस्मे 


सम्यक समपेयेत्‌ ॥ ३८ ॥ ततः शुद्धाय बटवे दद्यादेकं वरादकम्‌ ॥ सुष्ठया मितांस्तण्डलांश्र 


भुखीयाद्वागसप्तमम्‌। २९॥ याः 
तु स्चियो विगतकल्मषाः 


कामयन्ते ये भक्ताः पूजास्ते प्राप्लुवन्ति हि॥इत्यूचुस्ता भवानी. 
॥ ४० ॥ तासां तद्चन॑ श्रुत्वा तदानीमकरोद्गतम ॥ तत्र क्षणान्र 


बट 


विश्वेशः प्रत्यक्ष समजायत ॥ ४१॥ पार्वत्युवाच ॥ त्रिलोकनाथ देवेश करू णाकर शबड़ूर॥ 


दीनामनन्यगतिकां मक्तवत्सल पाहि 


माम्‌ ॥ ४२ ॥ तुष्ठश्च शंकरः 
पावेत्युवाच ॥ कपदिगणनाथस्य माहात्म्यात्कि न सिद्धययति ॥ ४३ 


प्राह कथमेतत्त्तया कृतम्‌ ॥ 
॥ सूत उवाच ॥ व्रतस्थे- 


तस्य माहात्म्य॑ ज्ञातुं वाज्छितवान्‌ स्वयम्‌ ॥ उद्श्यागमन विष्णोरकरोत्तद्रते शिवः ॥ ४४॥ 


तदानीं गरुडारूढः समागत्य तमब्रबीत ॥ 
ममाषि ज्ञापनीय तदित्युक्ते: ज्ञापपच्छिक 
आगतें सन्विधिः शीघ्र मामाज्ञापप माधव 


इसका अर आबा 7? पा आला +पाआाइर शक त्राकतरत्तरकतकाइज/ "पा परत न्दहरव्पतसन्‍त अर्थ हे,हे लम्घोद्र | हे पावतीनन्दन | है एक- | 
दन्त ! हे मनोरथोंको पूंण करनेवाले | आपके ढिये प्रणाम 


है | ३३ ॥ देवाज़्नाओंने पाव॑तीजीको इस प्रकार पूजन 
विधान वताकर कहा कि, हे पवित्र मन्दहास करनेवाली | 
समस्त संपत्तियोंके देनेवाले कप्दिंगणशजीके पूजनका 
विधान हमने आपके लिये कह दिया ॥ ३४ ॥ हे महेश्वरि ! 


कि 


है शिरे ! पहिले रविवारकों यानी श्रावणसुदि चौथ रवि- 
वार दिन उसका भद्धे चन्द्राकार पक्कान्न विशेष बनावे, 


नामके पकान्न विशेषको बनावे ॥ ३६ || तीसरे रविवार 
ब्रटक॑ दिन विनायकके 
इनके अष्टम्ांशस भक्तिपूवंक गणपतिका पूजन 


॥ ३७ ॥ जो भी कुछ पंदाथ भोग ढगानेके छिये तैय्यार 


करावे उनके अष्टमांशको भी भगवान गणेशजीके समर्पित | 


कर दूं ३८ | फिर पवित्र ब्रह्मचारीके लिये एक कोडी 


कामना करते हैं उनकी वे सब कामना 


कप 
कप । है 
भौर एक मूटीभर सावत चावल दे देने चाहिये बाकी | जिसको कर; ओे बल्ले ५ 
करनेसे तुम मुझे बुलानेमे कृतकार्य हुए 
बच सात हिस्सोंके पदार्थोका आप भो जन करने ॥ ३९ ॥ | पं जल हे हु 


एस कपदि विन्ायकके भक्त पूजन एवं ब्रतको करते हुए 


मदागमनिमित्त च॒ कि कृत शंकर त्वया ॥ ४५१ 
॥ अथेतदकरोद्विष्णुरुदिश्व्यागमन विधेः॥ ४६॥ 
॥ विष्णुरूवाच ॥ प्रयोजन नास्ति विधे तवागमन- 


प्रत्यक्ष होगये ॥ ४१ !। पावतीजीने कहा कि, हे त्रिोकीके 
नाथ ! हे देवताओंके अधिशज् ! हे करुणानिध | है आनन्द 


| करनेवाले ! मेरा आपके सिवाय दूसरा शरण नहीं है, इस 
| दीनकी आपही रक्षा करो ।हे प्रभो।आप भक्तोंपर वात्सल्य 
| रखनेवाल है | 
| प्रसन्न होकर कहा 
जिनमें किणके अथात्‌ फूटे चावक न हों ऐसे एक अजहि | 
भर हविष्य ब्रीहियोंको अच्छी तरह बीनकर पीसछे॥ ३णी। 


४२।॥ ऐसे बचनोंको सुनकर महादेवजी 
कि, हे देवि ! यह ब्रेत तुमने केस किया 
जिससे मुझको यहां आनाही पडा । तब पार्वती बोलीं कि, 
हे प्रभो ! आप जानते ही हैं, कपर्दिनाथका कैसा प्रभाव है, 


| उसके प्रभावसे ऐसा कौन काये हे सो सिद्ध न हो, मैने 
| कप. गणेशजीकी आराधना की थी, उसके प्रभावसेही 


दूसरे रविवार ब्रतके दिन संपूर्ण चन्द्राकार भाठ यथ्टिक | आपका रोष शान्त हुआ और आप बिना बुढायेही यहां- 


फ७ है प 


| पधारं, इससे यह सब प्रताप कपदिं गणशजीका है ॥४३॥ 
एवम्‌ बिता हट चावलोंकी खीर | 


वनावे चतुर्थ रविवार ब्रतके दिन द्धिभात बनावे, फिर | करनेके छिये,श्रीपत्ि यहां पधारें, इस उद्देशको मनमें करके 


कर | 


सूतजी बोले कि महादेवजीने उस ब्रतका माहात्म्य प्रत्यक्ष 


कपदिंगणनाथका ब्रतानुष्ठान किया ॥ ४४ ॥ पूरा होतेही 
श्रीपति, गरुडपर चढकर वहां आगये और बोले कि, हे 
श्कूर | मेरा विना कायही आना हुआ है,इससे प्रतीत होता 
एक तुमने मेरा आकर्षण किया है, वह कौन उपाय है! 


| 4५ || से भी उस उपायको जानना चाहता हूँ, विष्णुके 


न 


| ऐसा कहनेपर महादेवजीने कपरदिं गणेशजीक ब्रतकों 
हि | पूरी होती हैं | उन्हें बता 
।४०७ तेपस्विनी 'निष्पाप्‌ दुवाज्ञताओंने पाबतीजीसे 
2९) पावतीज्नीने देवियोंके इस वचन्नोंको सुनकर परत 


किया । वहूंपर ध्षेणभर के वादसेही विश्वनाथ भगवान्‌ 


ता दिया। फिर विष्णु भगवानने अद्याजीकों 
बुढानके लिये वही ब्रत किया ॥ ४६ ॥ त्रह्माजी वहां 
आये ओर बोढ़े कि, हे. विष्णों ! मैं यहां कैसे चढा 


आया, तुमने किस टिये मुझे बुछाया है शीघ्र ही. कहिये 





हे आल 
सा + 
| औ 





कारणम्‌ ॥ ४७ ॥ एकदनन्‍्तब्रत किजिद्धवत्येव न संशयः ॥ इन्द्रागमनसुदिशय तदानोीं तेन 
तत्कृतम्‌ ॥ ४८ ॥ आगत्य सहसा सो5षपि ममाज्ञापय विश्वस्तद | विधिरुवाच ॥ हेरम्बब्रत- 
माहात्म्य॑ द्रष्ठुमेव करते मया॥ ४९ ॥ ममापि ज्ञापनीय तदित्ठक्ते विविनोदितम |! विक्रमा- 
दित्यमुहिध्य वज्ची तदकरोश्व सः आगतोहह मलुष्यस्त्वामिन्द्र मत्तः किमीप्सितम 
कपदिहस्तिवदनब्रतमाहात्म्यममीदशम्‌ ॥ ५१ ॥ इति ज्ञातुं मयान्षीए्ं तलब्धं ते तदाबवीत । 
विधान तस्य माहात्म्य॑ ज्ञापनीय त्वयंति मे ॥५रा। पप्नच्छ विक्रमादित्य उत्सुकश्व पुरन्दरम । 
पुरन्द्रछुखाज्ज्ञात्वा तत्सवे स्वपुरों प्रति॥ ५२॥ आवृत्य प्रययों राजा पराक्रमपरायणः। 
कपदोशत्रत कृत्वा महिष्पा:ः पुरतोग्बदत ॥ ५७ ॥ जेष्पाप्ि सकलाउछव्रृन्‍्माप्स्थामि च महो- 
ऋतिम्‌ ॥ तस्य बतस्य कि दानमभिति सा प्राह विक्रमम ॥५०।॥ पत्यवाच क्रियामकों दषण्यादेकं 
वराटकम्‌ ॥ एवं राक्षो सुखाच्छृत्वा दूषयामास तद्ब्रतम्‌ ॥ ५६ ॥ एवं चेत्तन्न कलंव्यं महेहे यत्र 


कुत्र चित्‌ ॥ कर्पादुगणगनाथन कि स्थान्मम सुशोभनम्‌ ॥५७॥ क्रियते न मया नाथ कपद्याख्य॑ 
तु यद्त्रतम्‌॥ इत्पादिदूषणादाशु कुछव्याधिमवाप सा ॥५८॥ कुछव्याधियतां पत्नीं दृष्ट्वा राजा 
ध्रवीत्तदा ॥ न स्थातब्य॑ त्वयात्रेति सब राज्य विनश्यति ॥ ५९ ॥ अकेस्य वचन अत्वा ऋष्या- 
अ्रममगाञ्च सा ॥ परिचयावरशत्तष्टास्तस्थाः सर्वे सुनीयराः ॥ ६० ॥ निश्चित्य योगमार्गेण सब 
तामबवन्सतीम ॥| कपदीशवताक्षपाहःखं प्राप्त त्वया शुभे ॥ .६१ ॥ कुरुष्ष तद्गत॑ सम्यक्सव 
भद्॑ मविष्यति ॥ ऋषीणामाज्ञया कृत्वा कपर्दीशबव्रलं महत्‌॥ ६२ ॥ तदानीं राजमहिषी दिव्य 
देहमवाप सा ॥ अस्मिन्नन्तरिते काले भवान्या सह शड्भरः ॥६१॥ द्वष्ठुं ययो बृषारूटो.शुवनानदि 
चतुदेश ॥ मध्येमाग द्विजेन्द्रस्थ रोदर्न भववल्लभा ॥ ६४ ॥ श्रुत्वा बाह्मण मारोदीः किमथ तब 


रोदनम्‌ ॥ ब्राह्मण उवाच ॥ न किमप्यश्त में ढुःख दारिब्यादेव केवछात्‌ ॥ ६५॥ देव्युवाच । 
विष्णु बोल कि, है ब्रह्मन्‌ | यहाँ बुछानेका कोइ प्रयोजन | यह सुनकर उस ब्रतकी निनदा करन छूगी ॥ ५६ ॥ यही 
नहीं हे ।। ४७ | कपदिं गणेशजीका ब्रव कुछ होता है | है तो आप मेरे घर इस ब्रतको न करें दूसरी किसी जगह 


इसमें सन्दृह नहीं हें उसीस आपका अकस्मातू भाना हुआ। | कर छेता; ऐसे कपदि गणनाथ मेरा क्‍या मद्य कर सकते 


ब्रह्माजीनें इन्द्रको बुछानेके लिय यह न्रत किया ॥ ४८ ॥ | हैं॥ ५७ | है नाथ | जिसका नास ही कोडी हो में उसके 


इन्द्रभी आया बेसेही उसनेभी पूछा कि, हे प्रभो ! आप | ब्रतकों क्या करूगी ! ऐसही अनेक प्रकारके दूषण देनेके 
मुझे आज्ञा देँ। ब्ह्माजोने कहा, गणेशत्रतके माहात्म्यको 


| कारण शीघ्र ही कुछ्ठिनी ओर व्याधिता होगई ।| ५८ ॥ कुष्ठ 
परीक्षाके लिय मैंने यह किया था और कुछभी प्रयोजन | तथा अन्यान्य व्याधियोंस दुःखी रानीको देखकर राजाने 
नहीं हू ।। ४९ ॥ इन्द्रके पूछनपर ब्रह्म|जीने इन्द्रस कहा 


| कह। कि, आप राज्यस निकर जाये नहीं तो राज्यकी खर 
फिर इन्द्रने राजा विक्रमादित्यको देखनेके छिय यही ब्रत | नहीं है ॥ ५९ | विक्रमादित्यके बचनोंकों सुनकर रानी 
किया ॥| ५० ॥ विक्रप्मादित्य इन्द्रक पास गया और पूछा 


ऋषियों के आश्रम चलो गई, उसकी सवासे सब मुन्ति- 
कि, मैं मनुष्य हूं, आप देवताओंके प्रभु हैं; आप आज्ञा दें | छोग राजी हो गये ॥ ६० ॥ सबने योग मा्गसे निश्चय 
आप मुझसे क्‍या सहायता चाहते हैं । तब इन्द्रने कहा कि; | ऊरके उस सतीस कहा कि, हे शुभ | तुमने कर्पादि गणरा- 
कृपदिं गणनाथका बव केसा प्रभावशाली है ॥५१॥ इस | जके ब्रतकी निन्‍्दा की थी उसीसे इतना दुःख भोगना पडा 
बातकी जांच करनेके छिय ही किया था, जो चाहता था| 


॥॥ ६१॥ उस ब्रतवकोीं विधानके साथ कर सब कल्याण 
बह मिल गया, राजाने कहा कि, आप सुझे उसका माहा- | होंवे ऋषियोंकी आज्ञास कपदी विनायकर्क महत्त्वशाली 
पम्य और विधान बताये ।५२॥ राजा विक्रमादित्यने बडी 


| ब्तकों करके ॥ ६९२॥ उद्ची समय दिव्य देह पागई, इसी 
उत्सुकताक साथ पूछा था पीछे इन्द्रस त्रत विधान सुनकर | बीचर्मे पावेतीजीके साथ महादेवजी || ६३ | बृषभपर 
अपनी राजधानी चढछा आया ॥ ५३ || पराक्रमके छगे*रह- | चढकर चौदहों मुव्नोंको देखने निकछे, रास्तेके बीचमें 
नेवाले राजाने छौटकर कपदि गणपतिके ब्रतको रानियोंके | किसी श्रेष्ठ ब्राह्मणक्ा रुदन सुनकर पावती ॥ ६४ ॥ बोली 
सामने कहा ॥ ५४ || कि वेरियोंको जीतूगा, बडी भारी 


| कि; हैं ब्राह्मण क्‍यों रोता है ! तू रो न। वो ब्राह्मण बोला 
सन्नतिको पाऊंगा; यह सुन राजमहिषी राजासे पूछन छगी | कि सिवा दारिद्यके मुझे कों३ दुःख नहीं है ॥ ६५॥ ऐसा. 
कि; उस ब्रवका दान क्या हैं » ५५॥ विक्रमादित्यने उत्तर 


| छुनकर पावंतीजी बोलीं कि, यही दुख हे तो कपरददीशका 
दिया. कि एक कोडी दान दी जाली है; रानी राजाक प्रुखसे | त्रत कर | त्राक्षण बोछा कि, इस समय उस ब्रतक कर- 


। 
| 
| 
| 













$ हू. है 
बेतराजः |... ६ चतुर्बी 






कपिल फरमान कम फल 


नल रचकलन»कनस्पम> नस तब कक अ जे 


अधायाकारम्याकारलम्की.स७४+ाा भा सातञाला, 






पल "पम्प म मल दल ल पल 


दुःख चेत्तव विपेन्द्र कपरदी शत्रतं कुह। ब्राह्मण उवाच॥ एंतत्कते बत॑ देवि सामथ्ये नाझ्ति मेश्ुना 
॥ ६६॥ देव्युवाच ॥ विक्रमाकपुरे सब वेश्यों दास्यति तत्कुदह ॥ कपदीशत्रतेनव मन्त्रितव 
प्राप्स्यलि शुवम्‌ ॥ ६७ ॥ दारिद्यिमोचन सम्यग्भविष्यति न संशयः ॥ सूत उवाच॥ शह भति- 
समागम्य ग्रहीत्वा तण्डुलान्द्रिजः ॥९८॥ वेश्यादगुहीत्वा तत्सर्व तद्ानीमकरोद्गतम्‌ ॥ तस्मिन्नर्क 
पुर विमस्तन्मच्त्रित्वमवाप सः ॥३९॥ आज्ञापयत्कपर्दीश ब्रतं वेश्यस्य तत्क्षणात्‌ ॥ अकरोत्ख- 
सुतायश्व विक्रम: पतिरष्त्विति॥७०॥ ब्रतप्रभावादादित्य उपयेमे विशः सुताम्‌ ॥ अनिनेव विवा- 








हैन परां भीतिमवाप सा ॥७१॥ एवमन्तरित काले मृगयाय प्रविश्य स॥गहन क्षत्तषात्तेः सन्‍्ययों 


झुनिवराश्रमम्‌ ॥ ७२॥ उपचारेः श्रम॑ नीत्वा तेपामकों मनोरमाम्‌॥ रमणीयाश्रमे तस्मिन्दर्श 
यामास विक्रमः ॥ ७३॥ इत्यप्रच्छन्मुनीन्सवान्‌ दातव्यैषा ममाड़ना ॥ तवेयं महिषीत्युकत्वा ते 
'तां तस्मे समपेयत्‌॥ ७४ ॥ सम॑ मंहिष्या स्वपुरी दिव्यनारीनरेयुताम्‌॥ हृष्टः सन्विक्रमादित्य: 
संश्रमात्माप भूषतिः ॥ ७५ ॥ कर्षादगणनाथस्य ब्रत॑ कृत्वा खिया सह ॥ अजयद्विक्रमादित्य: 
सकल शबुमण्डलम्‌ ॥ ७६ ॥ गणनाथब्रतेनेव पुत्रपौत्र॒वृतश्चध स ॥ धनधान्यादिसंपद्धिः खुसेन 
न्यवसद्धुवि ॥ ७७ ॥ एतद्घतं ये कुवेन्ति याश्र कल्पविधानतः ॥ चतुरः पुरुषाथाश्व ते ताश् 
प्राप्तुवन्ति हि॥ ७७ ॥ हयमेधस्य -विन्ने तु संजाते सगरः पुरा ॥; इदमेव बल कृत्वा पुमरमं 
मलब्धवात्र (॥ ७९ ॥ इमां कथथां पश्चचारं प्रथमे भालुवासरे ॥ द्वितीय च तलीये च षड़वार 
“णुयोद्वती ॥ 4० ॥ इति श्रीस्कन्दपुराणे कपरदिविनायकत्रतकथा समात्ता ॥ ः 


द दशरथललिताबतम्‌ ॥ क्‍ क्‍ 
अथाशिनकृष्णचठ॒थ्यों दशरथललिताव्रतम्‌ ॥ तन्च पौर्णिमान्तमाने कार्तिकवद्यचत॒थ्यों 


कार्यम्‌ ॥ देशकालों संकीत्ये मम पृत्रपौद्रादिसकलकामनासिद्धचर्थ दशरथललिताप्रीत्य 


नेकी शक्ति; मुझसे नहीं है।। ६६ ॥ देवी बोढी कि, विक्र. 
सादित्यकी नगरीमें तुझ एक वेश्य सब .उपकरण -देंदेंगा, 
वहां इस ब्रतको करना, यह निश्चय सम्झ कि, इस ब्रंतकें 
प्रभावस तू दीवान बन जायगा ॥ ६७ ॥ तेरा दारिद्य 
बिलकुल ही न रहेगा इसमें कोई सन्देह नहीं है । सूतजी 
बोले कि वो ब्राह्मण घर आकर वहांसे ब्रतश्रद्धांस केवल 
तण्डुल लेकर चछा || ६८ ॥ बेच्यसे सब॒ कुछ लेकर उसने 
जत किया वो विऋ्रमके नगरमें दीवान बन गया ॥६९॥ उस 
न्राह्मणन उस वेश्यको कपरदीशका ब्रत बताया उसने ब्रत 
किया कि; मरी लडकी विक्रप्नादिस्यको व्याही जाय [[७०॥ 
श्रतके प्रभावसे प्रभावित होकर विंक्रमादित्यन बैश्यकी भी 
लड़कीके साथ शादी कंरली | यही नहीं किन्तु इस विवा- 
हसे वो परमप्रसन्न भी हुआ ॥ ७१ ॥ इसके कुछ दिन 
पीठे विक्रमादित्य शिकार खलनेको गया, बहां गहन बनमें 
दुत, भूख प्यासस व्याकुछ होकर मुनियोके आश्रममें जा 
दाखिढ हुआ || ७२ ।॥। ऋषियोंके - किय हुये आतिथ्यसे 
जैकमादित्वका परिअत्त दूर हो गया, वहां सुन्दर स्थहमे 

एक दिव्य सुन्द्री ने ॥ ७३ | उसने मुनियोंक्षे कहा कि 





इसे मुझे द्‌ दो, आपकी ही ऐसा कह करवे 

हे रे के सुनि 
योंन भादित्यको ही दे दिया ॥.७४ ॥ अपनी 
एज प्रदेषीको पा आनन्द सनाता हुआ. राजा अपनी तंग 


रीमें आया, जिसमें अनेकों दिव्य नारीनर रहते थे ॥७५॥ 
विक्रमाकने ख्लीके साथ कपदिंगणनाथका ब्त किया, इसीके 
प्रभावसे उसने वेरियोंके समुदाय तथा उनके सारे देश 
जीत लिये ॥ ७६ ॥ इसी ब्तके प्रभावसे राजाका धर बेटे 
नातियोंसे भर गया था। धन, धान्य और संपत्तियोंसे 
उसका घर भरा रहता था ॥ ७७ ॥ जो स्त्री वा पुरुष करप 
विधानके साथ इस ब्रतको करते हैं- वे अथे, घन, काम ओर 
मोक्षको पाते हैं ॥ ७८।। पहिले सगरके, अश्वमेध यागमें 
बडा भारी विन्न उपस्थित हुआ था; उस समय उसने. इस 
ब्रतको करके ही फिर अपना घोडा पाया था, ।| ७९ ॥ ब्रत 

५ हर कप ९ हक 
करनवाछा पहिंले रविवारको इसकी कथा पांच बार सुने 
तथा दूसरे और तीसरें रविवारकों छः बार सुननी चाहिये 
॥ ८० ॥ यह स्कन्द पुराणकी कही हुईं कपर्दि गणेशर्के 
प्रतकी.कथा पूरी हुईं ॥. . -: हे ० 

दशरथ छल्ितात्रत-आश्रिनी- कृष्ण! चोथके दिन दोंताहे। 
यह कथन अमावसको मास समाप्त होजानेवालोंके हिसावसे 
लिखा हुआ मानकर इसकी पूर्णिमान्त मासके साथ तुलनाकरें 
तो यह ब्रव् कार्तिक वदि चौथके दिन. अपकर पडता हे इसी 
दिन इस ब्र॒तक्ो करना भी चाहिसेशदेशकाछ कहकर अपने 


पुत्र पोचादि सब कार्मोंकी सिद्धिक हिय दशस्थ - छछ्ितो 


सेइलकड--. अर 


रति नि ] 
(28/57/5870 00000 7070 000 7733 007 78 80678 20700 60770 2070 7 70770 600 80 8006 00:00 06 7/ 67% 7000 064८0 ८76 0४6 ०८०० हक 4८७ 72045 


५२ 
भाषाटीकासमेत । 








यथामिलितोपचारें: पूजनमहं करिष्ये इति संकल्प्य ॥ कलशाराधनादि कृत्वा ॥ आगच्छ 
ललिते देवि स्ेर्सपत्पदायिनि !। यावत्पूजां करिष्यामि तावच्व सत्निधों भव ॥ आवाहनम ॥ 
नीलकोशेयवसनां हेमाभां कमलासनाम्‌ ॥ भक्तानां बरदां नित्य छलितां चिन्तयाम्यहम ॥ 
ध्यायामि॥कार्तस्वरमये दिव्ये नानामणिसमन्विते ॥ अनेकरत्नसंयुक्ते आसने संविशस्व भोः ॥ 
आसनम्‌ ॥ गड्भरादिसवंतिर्थेभ्यो मया प्राथनया हतम्‌ ॥ तोयमेतत्सखुखस्पश पाद्यार्थ प्रतिगह्म- 
ताम्‌ ॥ पाद्यम्‌ ॥ दक्ष स्य दुह्दितः साध्वि रोहिणीनाम विश्वुते ॥ पुत्रसपत्तिकाया्थ गहाणाध्य 
नमो5स्तु ते ॥ अध्यम्‌ ॥ पाटलोशीरकप्रसुरनि स्वादु शीतछम्‌ ॥ तोयमाचमनीयाथ शिशिरं 
प्रतिगह्मताम्‌ ॥ आचमनीयम्‌ ॥ पयोदधिप्र॒तमधुशकेरासंयुतेन च ॥ पश्चाम्नतेन स्नपनात्मीयताँ 
परमेशचरी ॥ पंचामृतस्नानम्‌॥ मन्दाकिन्याः समानीत हेमाम्भोरहहवासितम्‌ ॥ स्नानाय ते 
मया दत्त नीर॑ स्वीक्वियतां शिवे ॥ स्नानम्‌ ॥ सर्वसच्याथिके सोम्ये लोकलज्ञानिवारणें ॥ 
मयोपपादितें तुभ्यं वाससी प्रतिग्रह्मताम्‌ ॥ वस्यम्‌ ॥ मलयाचलखभूत॑ घनसारं मनोहरम्‌ ॥ 
हृदयानन्दन चारू चन्दन पतिगह्यताम्‌ ॥ चन्दनम॥हरिद्रां कुडकुमं चेव सिन्दूर कजलान्वितमा। 
साँभाग्यद्रव्यसंयुक्त गहाण परमेश्वरि॥ सोौमाग्यद्र॒व्यम्‌ ॥ माल्यादीनि सुगन्धीनि मालत्यादीनि 
यानि ठु ॥ मयाहताने पृष्पाणि पूजाथ अतिगह्यताम्‌ ॥ पृष्पाणि ॥ अथाड्रपूजा--दशाडर- 
ललिताये०पादो० । भवान्ये० गुल्फौपू० । सिद्धेश्वय० जंघेपू० । भद्रकालये० जालुनीपू० । श्रियेन० 
ऊरूपू० । विश्वरूपिण्ये० करेंपू० । देव्येन० नाभिपू० । वरदाये० कुश्षिपू० । शिवाये० हृदयेपू० । 
वागीश्वयें० स्कन्घोपू० । महादिव्येन० बाहुपू० । भद्राय्रि० करोंपू० । पद्षिन्थे० कण्ठंपू०। खर- 
स्वत्ये०मुखेपू० । कमलासनाये० नासिकांपू० महिए्मदिन्ये० नेश्रेपू० । लक्ष्म्येण कर्णोंपू० । 
भवाम्मे० ललाटंपू० । विन्ध्यवासिन्य० शिरः पू० । सिंहवाहिन्ये० सर्वाड्रंपू० ॥ बनघस्‍्पातिरसो- 
द्रातों गन्धाटयश्व मनोहरः॥ आतप्रियः सवदिवानां धूपो5यं प्रतिगह्मताम्‌ ॥ धूपम्‌ ॥ साज्य॑ चल 
वर्तिसंयुक्तम०।दीपम्‌ ॥ नेवेद ग्रह्मय ताम० ॥ नेवेद्यम्‌॥ मध्ये पानीयम्‌ ॥ इढद फलमिति फलम्‌ ॥ 
पूगीफर्ल मह० ताम्बूलम ॥ हिरण्यगर्भेति दक्षिणाम०॥ कपूरगोरम० ॥ नीराजनम ॥ नमों 


देवीकी प्रसन्नताके लिय जो मुझे उपचार मिछ जायें उनसे 





चन्दन वथा “हरिद्रा” इससे सोभाग्य द्रव्य तथा “माल्या- 


पूजन करूंगा; संकल्प करके करूशस्थापन करें पीछे-हे सब 
संपत्तियोंकी देनेवाली छलिता देवि |! आइये,जबतक में पूजा 
करूं: तबतक यहां ही रहिय, इससे आवाहन तथा नीले 
रेशमी वद्थोको पहिने हुए कमरपर विराजमान हुईं सोने- 
कीसी आभावाली जो कि, अपने भक्तोंको हर समय वर 
देनेके लिये बयार रहती हैं उसे में याद करता हूं,इससेघ्यान 
तथा अनेकों मणियँ जिसपर लगीं हुई हैं ऐसे सोनेके रत्न- 
जडित सिंहासनपर, हे देंवि | विराजमान होजा, इससे 
आसन तथा गंगादि सब तीथ्थोंकी प्राथेना करके उनसे 
शीतल पानी ले आया है, आप इसे पाद्यकेलिये ग्रहण करें, 
इससे पाद्य तथा हे रोहिणिक नामसे प्रसिद्ध हुईं दुक्षकी 
साध्वी दुहिता | मुझे पुत्र और संपत्ति देनेके रूिय अघ 
ग्रहण कर, तेरे लिये नमस्कार हैं, इससे अधे तथा पादुला: 
खसखस ओर कपूर आदिसे सुगन्वित हुए स्वादिष्ठ शीतल 
पानीको थंडे आचसनके लिये प्रहण करिये, इससे आचम- 
सीय तथा पय, द्धि, मधु, शकरा सहित पंचासुतके स्नानसे 
परमेश्वरी प्रसन्न होजाय, इस मेत्रसे पचारत स्नान तथा 
६ सर्वेसत्वाधिके ” इससे बल्ले तथा “ मलयाचर” इससे 
श्र्‌ 


दीनि”” इससे पुष्प समपंण करना चाहिये । क्योंकि पूर्वेकी 
ही विधि समझनी चाहिये ॥ अजक्भनपूजा-दशाहुरूलिता, 
भवानी, सिद्धश्वरी, भद्रकाली, श्री, विश्वरूपिणी, देवी 
बरदा, शिवा, वागीश्वरी, महादेवी: भद्रा, पद्चिनी,सरस्वती , 
कमलासना, महिषमदिनी, रूक्ष्मी, भवात्ी,विन्ध्यवासिनी, 
सिंहवाहिनी, इन नामोंके आदिम “ओम”? अन्तर्स “नसः” 
वथा इन नामोंकों चतुर्थी विभक्तिके एक वचनान्त करके 
इनस पाद, गुल्फ, ज॑घा, जानु,ऊरू,कटि,ना भि,कुछि, हृदय ॥ 
स्कन्द्‌, बाहु, कर, कण्ठ, सुख, नासि छा, नेत्र, कणे,छलाट, 
शिर और सर्वाह्न इनमेसे दोओंको द्विदीया ह्िवचनान्त 
तथा एक अंगको एकवचनान्त करके अन्तर्मे “ पूजयासि?? 
छगाकर उस रेअद्भका पूजन कर देना चाहिये जो जो ऊपर 
लिखे जा चुके हैं।। यह पूजन फूछोंस होता है. पूजनके मंत्र 
बोलकर देवमूलिंपर फूछ छोडे जाते हैं। “वनस्पति” इससे 
धूप तथा * साज्यं च वर्ति ” इससे दीप तथा “' नेवेये 
गृह्मयताम्‌ ”' इससे नेवेद्य लथा मध्यके पानीके मेत्रस बीच्से 
पानीय तथा “ इदे फलूम्‌ ” इससे फछ तथा “ पूगी- 
फर्ल ” इससे पान तथा “हिरण्यगर्भा इससे दक्षिणा- तथा 


ब्रतराज: | 
दव्ये महादेव्ये० मन्जपृष्पण ॥ यानि कानि च पापानि० ॥] प्रद्क्षि जाम ॥ अत्यथा शरण नास्ति 
त्वमेव शरण मम ॥ तस्मात्कारुण्यप्षावेन रक्ष मां परमेशारे ॥ दशरथलालिता भक्त्या नित्य- 
माराधिता मया ॥ पृत्रकामनया देवी सवान्‌ कामान्प्रयच्छतु .॥ प्राथना ॥ दृशरथललितादेव्या 
ब्रतसंपूर्तिहितव॥ वाणक द्विजवर्याय सहिरण्ये ददाम्यहम्‌ ॥ वायनम्‌ ॥ सवाहना शाक्ति- 
बुता बरदा पूजिता मया ॥ ममाठुग्रह कुवांणा गच्छ त्व॑ निजमन्दिरम ॥ विसजनम्‌ ॥ सूंत 
उवाच ॥ अरप्ये वतमानास्‍्ते पाण्डवा दुःखकशिताः ॥ कृष्णं दृष्ठा महात्मान प्रणिपत्य यथाक्र- 
मम्‌ ॥१॥ युधिष्ठिर उवाच ॥ देवदेव जगन्नाथ लक्ष्मीमिय जनादन ॥ कथयस्व छुर श्रेष्ठ दरशांडू- 
ललिताव्रतम्‌ ॥ २॥ कथमेषा समुत्पत्ना केनादों पूजिता छुबि ॥ पूजनात्‌ कि फलावाधिः 
कथयस्व सुरेशवर ॥ ३॥ श्रीकृष्ण उवाच ॥ पुरा त्रेतायुगे पाथे राजा दशरथो महान ॥ तस्य 
भायो तु कौसल्या अपुतरा सा पतिव्रता ॥॥॥ अथांजगाम कास्मिश्विदृष्यश्वद्र ऋषीशरः ॥ स्वागत 
च कृत राज्ञों सोपविष्टो वरासने ॥ ५॥ तेन राज्ञा मुनिश्रेष्ठः स्तोवैश्व बहु तोषितः ॥ तत्य 
भकत्या ठ॒ संतुष्ट ऋषिवचनमत्रवीत्‌॥ ६ ॥ सुनिरुवाच ॥ तुष्ठोएहं तब राजेन्द्र कौसल्याभायेया 
सह ॥ त्रूहि त्वं च महाभाग कि प्रियं ते करोम्यहम्‌ ॥ ७ ॥ दशरथ उवाच ॥ यदि तष्णोषसि मे 
विभ अपुत्रोडहमुषीश्वर ॥ तीथे वा व्रतमेक॑ वा तद्दस्व मुनीखर ॥ ८ ॥ मुनिरुवाच ॥ श्रूणु राज- 
ब्रवहितों ब्रतमेक॑ बबीमि ते ॥ पुत्रकामत्रतं श्रेष्ठ कल राजन्‌ खुराखुरेः ॥ ९ ॥ रोहिणीनाम 
चन्द्रस्य भायो परमवछभा ॥ सा चेव ललिता नाम्री रोहिणीति नराधिप ॥१०। आदिविन स्य- 











सिते पक्षे द्शम्यादि प्रपूजयेत्‌ ॥ दशम्यादि चतुथ्यैन्‍्त दिग्दिनानि व्रत चरेंत्‌ ॥११॥ आदिन 
स्यासेते पक्षे चतुध्यो ठु विशेषतः ॥ स्नात्वा सायन्तने काछे पूजयेद्धक्तिमावतः ॥ १२॥ 


कृष्माण्डेमांतुलिड्राद्येजांतीपूष्पेः सुगन्धितिः ॥ गन्धपुष्पेस्तथा ध्वू्पेनेंबे "लत पक खुगन्धिनिः ॥ गन्धपुष्पेस्तथा ध्ूपेनेंवेद्येदेशमोदकेः ॥ १३॥ ॥ १३॥ 
“कपूर गौर” इससे नीराजन तथा “नमो देव्ये महादेव्यै” 
इतस इुप्प तथा “ यात्रि कानि च्‌.पापानि ” इससे तथा 
मेरा और कोई उपाय नहीं है तूही उपाय हे है परमेश्वरि ! 
इस कारण द्याभावस प्रेरित होकर मेरी रक्षा कर, भैंने 


इनकी पतित्रता खी कौशल्याके कोई पुत्र नहीं था ॥ ४ | 
वहां कभी किसी तरह ऋषीश्वर ऋष्यश्ृंग आये, राजाने 
उनका खागत किया पीछे वो अच्छे आसनपर विराजमान 


दशरथल्नल्ितादेवीका भक्तिभावके साथ पुत्रेच्छासे प्रेरित 
होकर रोजही आराधन किया है, वो मुझपर प्रसन्न होकर 
मेरे कक पूरा करे । इससे प्राथेना तथा दशरथ 
ललिता देवीके अतको पूण्ण करनके लिये ब्राह्मणको सोना 
सहित ताणक दुता हूं । इससे ब्राह्मणको वायना 
वरदा देवी मेने बाइन और शक्तिके साथ पूजी हैं वो भरे 
९ ५ टैपाभाव रखती हुईं अपने स्थानको पधारे, इससे विस 
मे और देना चाहिये। अथ कथा-सूतजी कहते हैं कि, 
वनमें रहते थे उस समय 
2०... भास्मा वहांही उनके पास पहुँचे ऋमशः सबने उन- 
था पीछे अपने समयपर युधिष्ठटिरजी प्रणाम 
करके बोले ॥ १ ॥ हे देवदेव | है जगन्नाथ ! है लक्ष्मीके 
है जनादुन ! हे एरअष्ठ ! दशरथललिताअतको मुझसे 
०५] ५ । यह केसे उत्पन्न हुईं,भूमण्डलपर सबस पहिल 

५३३. आया) इसके पूजनस कौनसा फछ मिलता हे ! 
3. अलाइये ॥ ३। श्रीकृष्ण भगवान्‌ बोले कि, 
...त0. ० पेशरथ नामके बड़े भारी राजा थे ५ 








द्क्र पीछे, | 
भ 


भट करे। सुगन्धित जुई 


१ स्थिताआसन्नितिशिषः 


होगये ॥| ५ ॥ वो मुनिश्रेष्ठ, राजाकी स्तुतियोंस परमसन्तुष्ट 
हुए, उनकी भक्तिस सन्तुष्ट थे ही इस कारण बोले ॥ ६॥ 
हे राजेन्द्र | में आपपर सन्तुष्ट हूं, महाभाग ! आप अपनी 
कौशल्या भार्याके साथ कहिये,म आपका क्या प्रिय करूँ! 
७ | दशरथ बोले कि, यद्‌ आप भ्रसन्न हैं तो हे ऋषी- 
श्वर ! मेरे कोई सन्तान नहीं है ऐसा कोईही तीर्थ या कोई 
त्रत बतादीजिये # ८ ॥ मुनि बोले कि, हे राजन ! साव- 
धान होकर सुन; में एक ब्रत कहता हूं, हे राजन ! पुत्र का- 
मना देनेके विषय यह सबसे अ्रष्ठ ब्रत है, इसे सुर असुर 
सबने किया था॥ ९ ॥ चन्द्रमाकी रोहिणी नामकी परम 
पारी सी है, हे राजन्‌ ! उस रोहिणीको छलिता भी कहते 
हूं ॥१०४ अमान्त मास आश्रविनशुकुृपक्ष दशमीसे छकर आ- 
रिवन क्ृष्णपक्षतक करना चाहिये,द्शमीस लेकर चौथतक। 
दज्षदिन ब्रत करना चाहिये ॥ १ १॥आरिवन क्ृष्णपक्षकी तौ- 
थके दिन तो स््रान करके सायंकाल भक्तिभावसेविशेषरूपस 
जन करना चाहिये ॥१२॥ करूष्माण्ड, मातुलुक और मतीरे 

चमेली आदिके पुष्प चढावे।फिर 


धूप, दीप, करके दश मोदकोंको भोग लगावे !| १३॥ 


। ९ दशरथ: | 


2 





ब्रतानि, साधा अीकासमेलः | 





अध्य दद्यात्व देव्यग्र पूजयित्वा क्षमापयेत ॥ ततो मड्लवाद्यश्व॒ गायनंश्व प्रतोषयेत्‌ । 
चन्द्रोदये च संप्राप्ते अध्य दद्याय्मधिष्ठिर ॥ शड्भे तोय -समादाय सपुष्पाक्ष तचन्दनम्‌ ॥ १५ ॥ 
जाल॒भ्यामवनीं गत्वा चन्द्रायाष्य निवेदयेत्‌ )। पश्चरत्नसमायुक्त दशपुष्पेः समन्वितम्‌ ॥ १६ ॥ 
अक्षतेत्र समायुक्त चरद्रायाष्य निवेदयेत्‌ ॥ दशरथलालेते देवि दशपुष्पं दशाखलिम्‌ 
सुधाकरेण सहिते गहाणाध्य नमोषस्तु ते॥ दशरथललिता भक्त्या नित्यमाराणिता मया ॥१4॥ 
पुत्रकामनया देवी सवोन्कामान्प्रयच्छतु ॥ दशसख्याश्व करकाः शालोीइकहअआः ॥ २९ ॥ 
वर्षेबर्ष प्रदातव्या ब्राह्मणेभ्यः प्रयत्नतः ॥ इत्थ प्रपूजग्रेदेवीं दशावषाणि यत्नतः ॥ २० ॥ 
नारी नरो वा राजेन्द्र ब्रतमेतत्करोति वे। य॑ य॑ चिन्तयते काम॑ व्रतस्यास्य प्रभावतः॥पुत्र॑पोचे 
धन चान्य लभते नात्र संशयः ।।२१॥ इति भविष्योत्तरपुराणे दशरथललिताब्रतकथा संपूर्णों 
अथोद्यापनम--ऋष्यश्वड्र उवाच ॥ उद्यापनविधिं वक्ष्ये ब्रतसपू्िहेतवे ॥ कृष्णपक्षे चतुर्थ्यां तु 
आधिने ब्रतमाचरेत ॥ १॥ दशवित्रेः सपत्नीकेदेंदवेदाड्रपारगः ॥ स्नात्वा साथ॑ प्रकुर्वीत 
मण्डपं भक्तिभावतः ॥ २॥ चतुःस्तम्मं चतुद्वोरं कदलीस्तम्ममण्डितम्‌॥ तन्मध्ये कारयेंत 
पद्म पश्चवर्णः सुशोभितम ॥ ३॥ कलरशं स्थापयेत्तत विधानेन समन्वितम्‌ ॥ ताम्र वा सृण्मय॑ 
वापि वख्चयग्मेन वेष्टयेत ॥ ४॥ तस्योपरि न्यसेंद्राजच्रोहिण्या सहित विधुम्‌ ॥ सोव्र्णी रोहिणी 
' कार्यो चन्द्रमा रजतस्थ च ॥ ५॥ पूवक्तिन विधानेन पूजां कृत्वा समाहित॥ मोदकान कारये- 
द्राजंस्तिलजानेकविशलतिम ॥ ६॥ दशा विप्राय दातव्या आत्मा स्थापयेद्श ॥ णको देवाय 
दातव्यों ललिताप्रीतये ब्रती ॥७॥ दशरथललितादेव्या ब्रतसंपूर्तिहेतवे ॥ वाणक॑ द्विजवर्याय 
सहिरण्य॑ ददाम्यहम्‌ ॥ ८ ॥ दशरथललिता भब्त्या नित्यमाराधिता मया।॥ पुत्रकामनया 





अध्य दान दे; पूजाके पीछे देवीकी क्षमा प्रार्थना कर कि; | 
हमने जो पुत्रसन्‍्ततिक अवरोधक कम्म किये हैं उनको | 
आप नष्ट करिये ओर ऐसी कृपा करें जिससे चिरायु पुत्र | 
सम्पत्ति हो । फिर माज्ललिक बाज वजाकर, गान गाकर | 
उसे सन्‍्तुष्ट करे ॥१४॥ श्रीकृष्णचन्द्र कहते है कि, हे युधि- | 
न्द्न एवं | 
जल भरकर अघे दे ॥९५०।॥ पश्चरत्त तथा दश पुष्प भी | 
उसमें गेरने चाहियें, वो भूमिमें जानू टेकके चन्द्रमाकों | 
देना चाहिय ॥१4॥ उस अधघमें अक्षत भी होने चाहिये | 
तब यो अधे चांदको देना चाहिये | कि हे दशरथरूलिते | 
देवि | दश पुष्प मिली हुई ये दश अंजलिया हूँ | १७॥ | 
चन्द्रमांके साथ इस अधघेको ग्रहणकर, है देवि ! तेरे लिय | 
नमस्कार हैं मने भक्तिभावस दशरथ छलिता देवीका रोज | 
आराघन किया हैं ॥१८॥ वो दवी पृत्रकामनासे सेयी गयी | 
थी, मेरी सब कामनाओंको पूरा करे, यह अधंदानका मंत्र | 
है; ठण्डे पानीके साथ दश ओलछे वा उससे भरे करवे॥१९॥ | 


प्विर ! चन्द्रोदय होनपर श्डम पुप्प, अक्षवत, 


प्रतिवर्ष सावधानीक साथ ब्राह्मणोंको दने चाहिये, डस 


तरह प्रयत्नपूवक दशवर्षतक देवीकी पूजा करती चाहिये | 
| णके छिये दे और कहे कि, मेने भक्तिसे जो दशाज्भछूलि- 


॥२०॥ हे राजेन्द्र ! खी हो वा पुरुष हो जो इस ब्रतको 
करता हे जिस जिस वस्तुकों वो चाहता हें वो वो पुत्र, 


पौचत्र,धन, धान्य सब पाता हे इसमें संदेह नहीं हें।।२१॥यह 
| छलिता देवीकी पूजा की है, इससे वह दुवी प्रसन्न होकर 


भविष्योत्तर पुराणके दुशरथलढितात्रतकी कथा पूरी हुई ॥ 





उद्यापनं-ऋष्यश्रक्ग बोले कि, ब्रतकी संपूर्तिके लिये उद्या 
पन कहूंगा, आश्रविनकृष्णा चौथके दिन उपवास पूर्वक यह 
करना चाहिये ॥१॥ ब्रत करनेवाल मनुष्यका कत्तव्य है कि, 
वह पहिले स्नान करें, पत्चात्‌ शुद्धवस्र धारण करें. पीछे 
सार्यकालमें सपत्नीक दश वेदवंदाड़रबेचा ब्राह्मणोंकों बुछा- 
कर प्रेमसे मण्डप बनवावे ॥२॥ उस मण्डपके चारों दिशा- 
ओम चार केलेके स्तम्भ खड़े करे, चार दरवाज बनवावे, 
उसके बीचसें पांच रड्रॉस कमल बनावे ॥३॥ उस कसछकी 
कर्णिकापर विधिपूवक कलूसकों स्थापित करे, वह कछस 
वांब या मृत्तिकाका हो, उसके कण्ठभागमें दो वस्ल लपेटे 
॥ ४ ।। फिर उस कलूसपर रोहिणीके साथ चन्द्रमाकों 
स्थापित करे | सुवणकी दशाहुरूलिता और चांदीका 
चन्द्रमा बनवावे ॥ ५॥ फिर पूर्वोक्तविधिस एकाग्रचित्त 
होकर पूजा करके है राजन्‌ | इक्कीश तिलॉक रूडूडू बन- 
वावे || ६ ॥ उनमसे दश छड्टडू कथाग्यासको दे दे । दश 
लड़ड़ अपने लिय अछग रखे, एक बचे छड्डूको देवताकी 
भेट चढाद॑ । जिससे छछिता (रोहिणी) देवी प्रसन्न हो।७॥। 
फिर ब्रतपूर्तिके छिय सुबण और वाणक एक उत्तम ब्राह्म- 


ताका ब्रत किया हे उसकी पूर्तिक लिये सुबणे सहित वायन 
इस द्विजवरको देता हूं ॥८॥ मेने पुत्रकामनासे भगवती 


देवी सर्वाद्‌ कामास्मयच्छत ॥ ९ ॥ इति संप्राथ्ये देवेशीं चन्द्रायाध्य नेबेदयेत्‌ ॥ स्वगह्योत्त 
विधानेन कृत्वाभिस्थापन॑ तत:॥१०॥ अन्वाधानं सुसंपाद्य तिछ़पायसलडूडुकेः ॥ अ षरोत्तरशत 
वाएि अष्टाविंशतिमेव वा ॥ ११ ॥ जहुयाचन्द्रमन्‍्त्रेण गोरीमन्त्रेण चेब हि॥ एवं समाप्य होम 
ठ वताचार्य पपूजयेत्‌ ॥ १२ ॥ दशविश्नाव सपत्नीकान्‌ वखास्येश्र मपूजयेत्‌ ॥ तेभ्यश्व करकार 
द्याहन्धोदकसमन्वितान ॥ १३ ॥ विप्रांय पीठदान॑ च ततः कुयाद्विसर्जनम्‌ ॥ ततः फु; 
प्रजायन्ते धनधान्यसमन्विताः ॥ १४ ॥ सौमाग्यसुखसंपत्तिजायते भूआतां वर ॥ अवेधव्यं व 
लभते नारी कामानवाप्लुयात्‌ ॥ १५॥ एतत्ते काथितं भूप किमन्यच्छो तमिच्छसि ॥ कृष्ण 
उवाच ॥ कूते दशरथेनास्मिन्‌ कौसल्याभायेया सह ॥ १६॥ तुष्ठा दशरथे देवी ललिता तु 


सचन्द्रमाः ॥ यस्माच्च कृतकृत्योडसो भार्यया सह 


कीतिता ॥ एत्तते कथितं राजन्‌ 


समाहितः ॥ अश्वमेघसहस्रस्य फल तस्य धुंब भवेंत ॥ १९ ॥ इति 


रथललिताब्रतोद्यापनं सम्पूर्णम ॥ 


मोदते ॥१७॥ तस्माइशरथनामललिता भुवि 


देशरथललिताब्तम्‌ ॥ १८ ॥ य इद॑ श्रणुयात्रित्य॑ आ्रावयेद्रा 


श्रीमविष्योत्तरपराणे दश- 


करऋवतुथीब्रतम ॥ 
अथ कातिककृष्णचत॒थ्यामथवा दक्षिणेद्श आश्विनकृष्णचतुर्थ्य करकचतुर्थीब्रतम्‌ ॥ अर 


ख्रीणामेवाधिकारः | तासामेव फलश्र॒तेः 
सुस्थिरश्रीमातये करकचतुर्थीत्रतं करिष्ये 


[6 


नेरी सभी कामनाएं पूं करे ॥॥ इस मकर रोहिणेक 3, [7777 सभी कामनाएं पूर्ण करे ॥९॥ इस प्रकार रोहिणीकी 
प्राथना करना, पीछे चन्द्रमाके छिये एक अध्य दे । अपनी 
गृह्मशाश्रोक्तविधिसे अग्निस्थापन करके फिर ॥ १०॥ अन्वा- 
धानकरके तिढमिश्रित खीरके छद्दडुओं या तीनोंकी एकसौ 
आठ या अट्टाइश आहुतियां दें॥ ११ ॥ चन्द्रमाके और 
के हे + कक ८. ५ मे ९ 

दृवीके मत्रोंसे हवन करे | ऐस हवन पूवक ब्रतकी समाप्ति 
करके ब्रतका उपदेश देनेवाले आचार्यको पूजा करे ॥१२॥ 
सपत्नीक दश ब्राह्मणोंको वख्ल और आभूषण आदि देकर 
अच्छीतरह प्रसन्न करे। उनके लिये सुगन्धित जहसे भरे 
हुए दश करवेभी दे ॥१३॥ फिर आचार्यके डिये पूजाकी 
समस्त सामग्री और आसन दैकर उस ब्रतका विसर्जन 
२ । इस भ्रकार ब्रतानुष्ठानकरनेसे ब्रत करनेवालेके घरसें 
धनघान्यशाली बहुतसे पुत्र होते हैं ॥। १४ ॥ हे नुपतिवय ! 
सौभाग्य एवं सुखकी वृद्धि होती है। यदि इस्र ब्रतको ख्री 
करे तो उसका वेधव्ययोग निवृत्त हो जाता है और समस्त 
सनो5मिलषित फलको प्राप्त होजाती है ॥ १५॥ अ्रीक्षष्ण- 
चन्द्र बोढे कि, हे राजन्‌ 
दिया और क्या सुनना चाहते 


हो ? कहो । इस ब्रतको 
कप भह समा 


अ्यश्टगके कहनेसे राजा दशरथ और कोौसल्या- 
पद के हे १६॥ उससे चन्द्रमा और ललिता 
है छुर-/ पदष्ट होगये। राजा दशरथ इस त्रतके करनसे 





पहिले ; 


यह त्रत मैंने ! तुम्हारे लिये कह- | लि 


॥ आचम्य मासपक्षायुद्धिव्य मम सौमाग्यपुत्रपौत्रादि' 


। इोते संकल्प्य वर्ट विलिख्य तदधस्ताच्छिवं गण 
पति पण्मुखयुक्तां गोरीं च लिखित्वा षोडशोपचारे: 


पूजयेत्‌ ॥ पूजामन्त्र;--नमः शिवासे शर्वाष्ये 


क्ताथ होगया और स््री सहित प्रसन्न रहा १७॥ इसी 
रण यह दशरथढुलिताब्रत विख्यात हुआ,अर्थात्‌ दशा 
ललिताब्र॒बका नाम दशरथरूलिताब्रत इस प्रकार हो गया | 
है राजन्‌ ! मेंने आपसे यह दशरथलूलितात्रतकी कथा 
कहदी है ॥ १८ ॥ जो समाहित होकर इस ब्रतकी' कथा 
उनगा या सुनावेगा उसको एक सहस्र अश्वमेघ करने 
फछ मिलेगा इससे संदेह नहीं है ॥१५९॥ श्रीभविष्योत्तर्यु- 
"गक दशरथ ( दशाह़् ) छलिताब्रतका उद्यापन पूरा हुआ॥ 

अब कार्तिक वदि चतुर्थीके दिन या दक्षिणदेशमें प्रसिद्ध 
आश्विनक्ृष्णा चतुर्थीके दिन होनेबाले करक चतुर्थीके 
प्रतका निरूपण करते हैं-इस ब्रतकों करनेका केवल खियों- 
काही अधिकार हे; क्योंकि, ब्रत करनेवाली स्तरियोंकी ही 
फलश्रति मिलती है | प्रथम आचमन करे दिर “ ओम 
ह अप ” इत्यादि रीतिस देश काछका स्मरण करे फिर 
सोभाग्य एवं पुत्र पौत्रादि तथा निश्चक सम्पत्तिकी श्राप्िक 
ये करकचतुर्थीक ब्रतको करूँगा । उस प्रकार संकरप 
करनेके पीछे एक बडको लिखे,डस बंडके मूलभागमें महादे' 
वजी, गणेशजी, और स्वामिकार्तिकसहित पार्व॑तीजीक 
आकार छिखे,(फिर प्राणप्रतिष्ठा करके )बोडशोप चारसे पूजन 
करे। पूजाके संत्र- हल नम सलमान ली कता किक महक शिवा ” के लिये प्रणाम है। 


7 ९ आचार्याय | २ पशरथनामसहिता छद्षिता । हे 


को 
सम ” इत्यादि वाक्य द्वारा सक्ृएप करे कि, में अपने 


भाषाटीकासमेलः ! ( १७३ ) 





प्रयच्छ भक्तियुक्तानां नारीणां हरवछमे ॥ इत्यनेन गोयाः, ततो 
नमोन्तनाममन्त्रेण शिवषण्सुखगणपतीनां पूजा कार्या ॥ ततः सपक्ान्नाक्ष तसंयुक्तान दशकर- 
कान ब्राह्मणेम्यो दद्यात्‌ ॥ ततः पिष्टकनेवेद्य भोज्यं सब निवेदयेंत्‌ ॥ ततश्रन्द्रोदयोत्तरं चन्द्रा- 
याध्य दद्यात ॥ अथ कथा-" मान्धातोबाच ॥ अज्जुने तु गते तप्तुमिन्द्रकीलगिरि प्रति. ॥ विषण्ण- 
मानसा सुश्रृद्रोपदी समचिन्तयत्‌ ॥ १॥ अहो किरीटिना कर्म समारब्ध सुहुष्करम्‌ | बहवो 
विशन्नकतारों मार्गें वे परिपन्थिन: | २॥ चिन्तयित्वेति सा देवी कृष्णा कृष्णं जगदुगुरूम ॥ 
मर्तः प्रिय चिकीषन्ती सापच्छद्विप्रवारणम्‌ ॥ हे ॥ द्रोपद्मयवाच ॥ कथयस्व जगन्नाथ ब्रतमेक॑ 
सुदर्लेभम्‌ ॥ यत्कृत्वा स्वाविनज्नानि विलर्य यान्ति तद्॒द्‌॥ ४॥ श्रीकृष्ण उबाच ॥ णवमेव 
महाभागे शम्भः पृष्ठ: किलोमया ॥ तस्यास्तदचन श्वत्वा प्राह देवो महेश्वरः ॥ ५॥ श्रणु देवि 
वरारोहे वक्ष्यामि त्वां महेश्वरि ॥ सवविध्नहरेत्याहुः करकारूयां चतुरथिकाम॥ ६॥ पावेत्युवाचा। 
भगवन्‌ कीहशी प्रोक्ता चतुर्थी करकामिथा ॥ विधान कीदरशं भोक्त केनेयं च पुरा कृता ॥ ७ ॥ 
इश्वर उवाच ॥ शक्रप्रस्थपुरे रम्ये विदृजननसमाकुले ॥ स्वर्णरोप्यसमाकीणणें रत्नप्राकारशो- 
भने ॥ ८ ॥ दिव्यनारीजनालोकवशीकृतजगन्नये ॥ वेद्ध्वनिसमायुक्ते स्वगोंदपि मनोहरे ॥ ९ ॥ 
वेदेशर्मा द्विजस्तत्रावसदेशे विदां वर: ॥ पत्नी तस्येव विभ्रस्य नाम्शा लीलावती झुभा ॥ १० ॥ 
तस्यां स जनयामास पुत्रान सप्तामितो जसः ।। कन्यां वीरावतीनाद्ी सर्वलक्षणसंयुताम।११॥। 
नीलात्पलामनयनां पूर्णन्दुसदशाननाम्‌ ॥ तां तु काले शुभदिने विधिवनच्च द्विजोत्तमा॥ १२॥ . 
ददों वेदाड्भरविह॒षे विप्ाय विधिपूर्वकम । अच्रान्तरे आांददारेश्वक्रे गोय्यांत्रतंच सा॥ १३ ४ 
चतुथ्यां कार्तिकस्याथ कृष्णायां तु विशेषतः ॥ स्वात्वा सायन्तने काले सवास्ता भक्तिमावत* 
॥ १४ ॥ विलिख्य वठवृक्षं च गोरीं तस्य तले लिखन ।। शिवेन विप्ननाथेन षण्मुखेंन समन्वि 


सोभाग्यं सन्‍्तति शुनाम ॥ 


ताम्‌ ॥ १५ ॥ गन्धपुष्पाक्षतेगोरी मन्त्रेणानेन पू्जयन।नमः शिवाय शवांण्ये सोभाग्य सन्ततति 


हे महश्वर भगवानकी प्यारी ! आप अपनी भक्त खतरियोंको । 
सोभाग्य ओर शुभ खन्तान प्रदान करें; इस मन्त्रसे गोरी | 
की पूजा करके पीछे, नमः जिनके अन्तर्मं रहता हैं ऐसे | 
नाम सन्त्रोंसि शिवजी स्वासिकातिक तथा गणपति देवकी | 
पूजा करनी चाहिए | इसके पीछे पकान्न और अक्षतोंके | 
साथ दर्श करवे बाह्मणोंको देने चाहिए। पीछे पिष्ठकका | 
नेवेयथ और भोज्य सब निवेदन कर दे | पीछे चन्द्रोदय 


होनेपर चन्द्रमाकों अधघ देना चाहिए ॥ अथ कथा- 
मिक्षे का ६६ दे 
मान्धाता कहने छगे कि, जब अजुन इन्द्रकील परवेतपर 


कुम्हिला गया और चिन्ता करने छगी ॥ १ ॥ छि अजुनने 
बडा कठिन काम करना प्रारंभकर दियाहे, यह निश्चय है 


यह इच्छा थी कि, पतिदेवके काममें कोई विन्न न» आधवे 


इसी चिन्ताकों करके जगद््‌गुरु श्रीकृष्ण भगवानसे पूछा | 


॥ ३ ॥ द्रौपदी बोली हे जगन्नाथ ! आप एक अलन्त गोप्य 
ब्रतकों व॒तावें, जिसके करनेस सब ओरके विद्न दूर दल 
जाये ॥ ४ ॥ श्रीकृष्ण बोले कि, हे महाभागे ! जेसा आपने 


मुझसे पृछा है, उसी प्रकार पार्वतीजीन महादेवजीसे पूछा 
था उनके प्रश्नको सुनकर महादेवजीने कहा कि॥५॥ | 
हे वरारोहे ! हे महेश्वरि | तुम सुनो, में तुम्हे सब विन्नहा- | 
रिणी करक चतुर्थीका ब्रत कहता हूँ || ६।॥ पावतीने पूछा | 





१ वेद्धसंत्यपि क्वचित्पाठ:। 





सहेतिशेप: 


कि, है भगवन्‌ ! करक च॒तुर्थीका माहात्म्य और इस ब्रत- 
को करने की क्‍या विधि है ? आप कहिये, यह ब्रत पहिले 
किसने किया था इसको भी कह्ठिए ॥ ७॥ महादेवजी 
बोले कि, जद्दां बहुतस विद्वान रहते हैं, जिस जगह बहुतसा 
चांदी सोना एवम्‌ र॒त्नॉकी शहरपनाह है ॥॥ ८॥ जो सुंदर 
स्री पुरुषोंके दशनसे तीनों भुबनोंको वशीमूत करलेता हें; 


जहां निरन्तर वेदध्वनि होती रहती हैं ऐस स्वगेसे भी 


रमणीय इन्द्रप्रस्थपुरमें !। ९ | बेदशर्मा नामक विद्वान 


| | ब्राह्मण निवास करता था, उसकी स्रीका त्ञाम छीलावती 
तप करने चछा गया उस समय सुझ्चु द्रौपदीका चित्त | 


था वो अच्छी थी।| १० || उस वेदशर्मासे छीलावतीमें 


| सात परमते जस्वी पुत्र और एक सब लक्षण सुरक्षण वीरा- 
। वृती नामक कन्या उत्पन्न हुई ॥ ११॥ फिर वह ब्राह्मण 


« कि मागमें विन्न करनेवाले वहुतसे वैरी हैं॥ २ ॥ कृप्णाकी | अपनी नीछकमल सदश नेत्रवाली पूर्णचन्द्रमाके समान सुख » 


वाली उस वीरावती कनन्‍्याकों विवाह योग्य शुभ समयमें 
॥ १२ ॥ वेदवेदाह् ( शिक्षाव्याकरणादि ) शाख्नज्ञ उत्तम 
ब्राह्मणके छिए विधिपूवक दानकर दिया, उसीसमय बीरा“ 


| बतीने अपनी भाभियोंके साथ गोरीत्रत किया।॥ १३॥ 
| फिर जब कार्तिक वदि चतुर्थी आईं दस समय बीरावती 


और उसकी भाभी सब मिलकर बडे प्रम्से सन्ध्याके समय 
॥ १४ ॥ बडके वृक्षकों लिखकर उसके मूलम महेश्वर,गणश 
एवं कार्तिकेयके साथ गौरीको लिखके ॥ १५। गन्ध, पुष्प 
ओर अक्षवोंस इस गौरी मन्त्रको बोलती हुई पूजने छरगी 
! ३ अपूजयन | कक 


(१७४ ) 


व्रतराज: । 


8०2१४ १2427 98 00% 02277 :स 





जा ७७७७७७७७७७७७७॥७७७॥७॥७७७॥७॥॥७॥७॥७/७/॥॥/॥॥७॥७॥७॥एशश//॥॥॥७॥७ए॥॥एएए४/७७७॥७७एएशशश/शएशश/शशणशशशाा ज |. मररकिनताममा कान 


शुभाम्‌ | १६ प्रथच्छ मक्तियुक्तानां नारीणां हरवहमे ॥ तस्यथाः पाखें महादेव 0४ षडा- 
ननम्‌ ॥ १७ ॥ पुनः पुष्पाक्ष तेधपेरचयंश्र इथक्द॒थक ॥ 2080 लक वीक जद हे करकान्‌ 
दश ॥ १८॥ तथा पिष्टकनेवेद्य॑ मोज्ये सवे न्‍्यवेद्यन्‌ ॥ प्रतीक्षन्त्यः खियः स्वाश्रन्द्रमध्यंपराः 
स्थिताः १९॥ सा बाला विकला दीना क्षत्तुड़भ्यां परिपीडिता ॥ निपपात महीपृष्ठे रूरुदु- 
बॉन्धवास्तदा ॥ २० ॥ समाश्वास्य च वा तेस्तां सुखमभ्युक्ष्य वारिणा ॥ तड्भाता चिन्तयित्वे- 
वमारुरोह महावटम्‌ ॥ २१ ॥ हस्ते चोल्कां समादाय ज्वलन्ती स्लेहपीडितः ॥ भगिन्ये दुर्श- 
यामास चद्दधं व्याजोदितं तदा ॥ २२॥ त॑ दृष्ठा चांतमुत्खज्य बुअजे भावसझुता ॥| चन्द्रोदय 
तमाज्ञाय अध्य दखवा विधानतः ॥ २३ ॥ तद्दोषेण मुतस्त्वस्थाः पतिधमंश्र दूषितः ॥ पढि 
तथाविध॑ दृष्टा शिवमरूच्य सा पुनः ।। २४ ॥ ब्रत॑ निरशन चक्र यावत्संवत्सरो गतः ॥ चक्कः 
संवत्सरेः्तीते ब्रत॑ तद्धा ठ्योषितः ॥ २५ ॥ पृ्वोक्तेन विधानेन सापि चक्रे शुभानना ॥ तदा 
तत्र शची देवी कन्यानिः परिवारिता ॥ २६॥ एतदेव बते कठुमागता स्वरगलोकतः ॥ बीर- 
वत्यास्तदाभ्याशमगमद्भाग्यतः स्वयम्‌ ॥ २७॥ दृष्डा तां मालु्षी देवी पप्रच्छ सकल चसा॥ 
वीरावती तदा प्ृष्टा प्रोवाच विनमान्वरिता ॥ २८॥ अहं पतिगहं प्राप्ता मृतो5्य॑ मे पतिः प्रश्ु॥ 
न जाने करमंणः कस्य फल प्राप्त मयाघुना ॥ २९० ॥ मम भाग्यवशादोति आगतासि महेश्वारि ॥ 
अठगहद्दीष्य मां मातर्जीवयाशु पति मम ॥ ३० ॥ इन्द्राप्युवाच ॥ त्वया पिठगहे पूर्व कुर्व॑त्या 
करकब्रतम्‌ ॥ वृथवाष्यस्तदा दत्तो बिना चन्द्रोदयं शुभ ॥ ३१ ॥ तेन ते ब्रतदोषेण स्वामी 
लोकान्तरं गतः ॥ इदानीं कुरू यत्नेन करव्रतमुत्तमम्‌॥ ३२ ॥ पतिं ते जीवथिष्यामि व्रत- 
स्पास्यथ प्रभावतः ॥ कृष्ण उवाच ॥ तस्यास्तद्वचन श्र॒त्वा ब्रत॑ चक्रे विधानतः ॥ २३ ॥ प्रसन्ना 
साध्भवदेवी शक्रस्य प्राणवक्ठभा॥ तया ब्ते कृते देवी जलेनाभ्युक्ष्य तत्पतिम॥ ३४॥ जीव- 
न लनननन नमन मन नल तल कत देता गलनाभ्यत्य तत्पातव्‌॥ २३ ॥ जीव 






कि शवांणी शिवाके लिए नमस्कार है, सौभाग्य और 
अच्छी सन्तति ॥ १६॥ उन ख्ियोंको दे जो, हे हरकी- 
प्यारी | तेरी भक्तिवाली हो, उसके पाश्चेमं स्थित महादेव, 
गणेश और खःमिकार्तिकेयको ॥ १७ | फिर धूप. दीप 
ओर पुष्प अक्षतोंस जुदा जुदा पूजन कर .पीछे पक्कान्न 
अक्षत और दीपकों सहितद्श करुए ॥ १८ ॥ तथा पिष्ट- 
कका नेवेद्य एवम्‌ सब तरहका भोज्य, घन्द्रमाको अधे दे 
की प्रतीक्षामें बेठी हुईं सव खियोंने निवेदन कर दिया 
॥ १९ ॥ वो बालिकाथी मूख प्याससे पीडित थी इस 
कारण दीन एवम्‌ विकछ होकर भूँमिपर गिर पड़ी, उस 
समय उसके वान्धवगण रोने छगे ॥| ८१० ॥ कोई उसको 
हवा करने छगा, कोई मुखपर पानी छिडकने छूगा, उसका 
भाई कुछ शोच विचारकर एक बड़े भारी पेडपर चढ गया 
१ २१ ॥| बहिनके प्रेममें पीडित था हाथमें एक जलती हुई 
भसार ले रखी थी उस जलती मसालको ही उसने चन्द्र 
बताकर दिखा दिया || २२ ॥ उसत्ते उसे चांद समझ, दुख 
छोड, विधिपूर्बक अधघे देकर भावके साथ भोजन किया 
॥२३॥ इसी दोषस उसका पति मर गया, धर्त दूषिद 
इआ। पतिको सरा देख शिवका पूजन किया ॥ २४ ।फ्र 
उन एक सात्तक तिराहार ब्रत किया, पर उसको 
भामियोंने सदस्सरके बीत जानेपर वो ब्रत किया ॥ २५ ॥ 
ही 3 कक शोभ न मुखवाली वीरावतीने भी 

। प कन्याओंसे घिरी हुयी शी देवी 


| २६॥ इसी ब्रतको करनेके लिए स्वर्ग लोकसे चली आईं 
और वीरावतीके भाग्यसे उसके पास अपने आप पहुँच गई 
|| २७॥ शी देवीने उस मानुषीको देखकर उससे सब 
बातें पूछी, एवम्‌ वीरावतीने नम्नताके साथ सब वार्तेंबतादी 
॥ २८ ॥ हे देवेश्वरि ! में विवाहके पीछे जब अपने पतिके 
घर पहुँची तभी मेरा पति मरगया, न जाने मैने एसा कौन 
उग्र पाप किया हे; जिसका यह फल मिल रहा है ॥ २९॥ 
पर फिरभी आज मेरे किसी पुण्यका उदय हुआ है, जिससे 
है महेश्वरि ! आप यहां पधारी हैं, आपसे यही प्रार्थना है 
कि, आप मेरे पतिको शीघ्र जीवित करने की क्ृपा करें 
|| ३० ॥ यह सुन इन्द्राणी बोली कि, हे वीरावति ! तुसने 
अपने पिलाके घरपरः करकचतुर्थीका ब्रत किया था, पर 
वास्तविक चन्द्रोदयके हुए बिनाही अध देकर ,भोजन कर 
लिया था ॥ ३१ ॥ इस प्रकार अज्ञानसे त्रत भक्छ करनेपर 
यत्‌ किज्चिद्पराधके कारण तुम्हारा पति मरगया है, इस 
कारण आप अपने पतिके पुनर्जीबनके छिए विधिपूर्वक 
उसी करकचतुर्थीका ब्रत करिए ॥ ३२॥ में उस ब्रतके ही 
पुण्य प्रभावसे तुम्हारे पतिको जीवित कहूँगी। श्रीकृष्ण- 
चन्द्र बोले कि, हे द्रोपदी ! इन्द्राणीके वचन सुनकर उस 
वीरावतीने विधिपूवेक करकचतुर्थीका त्रत किया ॥ ३३ ॥ 
उसक त्रतको पूरा हो जानेपर इन्द्राणीभमी अपनी प्रतिज्ञाके 
अनुसार असन्नता प्रकट करतीहुईं एक.चुल्ू जल छेकरवीरा- 
वतीके पतिकी मरणभूमिपर छिड़ककर उसके पृतिको ॥१४॥ 





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अतानि, ] ग्लीकासमेतः । ( २१७५ ) 





यामास चेन्द्राणी देवबच्च बनूब सा । ततश्ागादुगह स्वीय॑ रेस सा पतिना सह ॥ ३५ ॥ घन 
धान्ये सुपुत्राँश् दीघमायुः स लब्धवान्‌ ॥ तस्न्वात्वयापि यत्नेन ब्रतमेतद्विधीयताम ॥ ३२६ ॥ 
खूत उवाच ॥ श्रीकृष्णस्य वचः ख्षत्वा चकार द्रोपदी द्ृतम्‌ ॥ तद्भतस्य प्रभावेण जित्वा तान्‌ 
कौरवातणे ॥ ३७ ॥ लेपिरे राज्यमतुर्ल पाण्डवा दुःखनाशनम ॥ या करिष्यन्ति सुभगा ब्रत- 
मेतबन्रिशागसे ॥ ३८ ॥ तासां पत्रा धन धान्ये सोमाग्यं चात ले यश । करक॑ क्षीरसंप्ण तोय- 
पूर्णमथापि वा ॥ ३९॥ दुदामि रत्नसंयुत्ते चिरं जीवतु में पति; ॥ इति मब्जेण करकान्‌ 
प्रदद्याहिजसत्तमे । ४० ॥ सुवासिनीम्यों दद्याश्ष आददात्ताग्य एबं च॥ एवं ब्रतं या कुछते 
नारी सौमाग्यकाम्यया ॥ सौभाग्य उुत्रपोत्रादि लगते खुस्थिरां अियम्‌ ॥ ४१ ॥ इति वामन- 
पुराण करकानमिधचतुर्थीव्रतं सम्पूर्णम्‌ ॥ 

गोरीचतुर्थीत्रतम्‌ ॥ 

अथ माघशुक्कचत॒ुथ्यां गौरीचतुर्थीव्रतम्‌ ॥ हेमादं बाह्मेनड माचतुथ्यं। माधे तु शुक्कायाँ योगि- 

नीगणे३ ॥ प्राग्भक्षायेत्वा ससजे भुयः स्वाज्भत्स्वकेगुणेः ॥ तस्म|त्सा तत्र सम्पूज्या नरे ख्रीभि- 
विंशेषतः ॥ कुन्दपुष्पेः अयत्नेन सम्यग्भक्त्या समाहितः ॥ कुंकुम/लक्तकाभ्यां च रक्तसूत्रे: 
सकड़ूणेः ॥ रक्तपुष्पेस्तथा धृपेदीपेबेलिमिरेव च ॥ जुडादरकाभ्यां पपसा लवणेनाथ पालकेः ॥ 
पाठ 5४ ८),ण्डेरिति देमादिः ॥ पज्याः ख्वियश्र विविधास्तथा विभाश्व शोमनाः ॥ सोमाग्यव्रद्धये 
पश्चाद्वोक्तव्यं बन्युनिः सह ॥ इति गोरीचतुर्थीब्नत बहामपुराणोक्तम ॥ 

वरदचतुधत्रितम्‌ || 
.. अथ माधशुक्रचतुथ्या वरद्चतुर्थीत्रतम्‌ ॥ तदुक्त काशीखण्डे--माघशुक्नचतुथ्यों तु नक्तब्ंत 
परायणाः ॥ ये त्वां दुण्डेड्चेयिष्यन्ति तेःच्याः स्युरखुरहुहाम्‌ ॥ विधाय वार्षिकी यात्रां चतुथा। 


प्राप्य तापसीम्‌ ४ शुक्कांस्तिलान गु॒डबंद्धा प्राश्नीयाक्इडुकान बती ॥ तापसी-माघी ॥ अन्ननक्त 


करदिया, वो पति देवताओंके समान हो गया । वीरा* 
| चौथके दिन उमाने अपने ही अंगोॉंसेअपने ही गुणोंक द्वारा 
| फिर वही सृष्टि रचदी जो कि; पहिरे योगिनियोंके साथ 
| खाली थी। इस कारण इसचतुर्थीको सब मनुप्योंकोचाहिय 


| धि ०: 6०५ 
श्रीकृष्ण चन्द्र भगवानक वचनोंकों सुनकर द्रौपदीने करक |... उसको पूज पर लियोंको तो इस ब्रतकों अवश्य ह। 


वती अपने घरपर आकर अपने पतिके साथ क्रीडा करने 
छगी || ३५॥ वो घन; धान्य सुन्दर पुत्र और दीघ आयु 
पा गया,। इससे तुमभी अच्छी तरह इस ब्रतको क रो॥३६।। 
सूतजी शौनकादिक मुनियोंसे कहते हैँ कि, इस प्रकार 


चतुर्थीकू ब्रतको किया, उसी ब्रतके प्रभावसे संग्रामसें 
२ रे 
कोरवॉको पराजित करके (३७ ।। उसके पति पाण्डव सब 


करती हू, इससे मेरा पति चिरंजीवी हो; इस प्रकार कहकर 
उनको योग्य ब्राह्मणके लिये दे ना चाहिये, और || ४० ॥ 
इस व्रतम सुहागिन स्लियोंके लियही देना चाहिये, सुह्यगिन 


स्वियोंस ही छेना चाहिये। इस प्रकार जो सत्री अपने | 
सौभाग्यसुख सम्पत्तिके छिय इस त्रतकों करती हैं उसको | 
सौभाग्य पुत्र पौत्रादि तथा निश्चकसम्पत्ति मिलती है।।४१॥ | 
यह वामन पुराणका करक चतुर्थीका ब्रत पूरा हुआ॥ 
गौरी चतुर्थीत्रत-माघसुदी चौथके दिन होता है, एसाही | 





हेमाद्िन त्रह्मपुराणको छेकर छिखा हे,माव प्रासकी शुकढा 


करना चाहिये। भक्ति भावके साथ यत्नपूवक भी भांति 


| इकठ्ठे किये गये कुन्दके पुप्पोंसे तथा कुंकुस और अछुक्तक 
दुःखोंकों मिटानेवाल्ली अतुछ राज्य संपत्तिको पा गये | और | एवम्‌ केकणके साथ रक्त सूत्रोंसे ढाल पुष्प, धूप, दीप और 
जो सुभगास्तियाँ इस ब्रतको संध्याकालमेकरेंगीओर रात्रिको | वलिसे पूजन करना चाहिय | गुड, अद्रख, दूध नप्कक 
चन्द्रोदयम अध्य देकर भोजन करेंगी ॥३८।॥ उनख्रियोंको 
पुत्र, घन, धान्य, सौभाग्य और अतुछुयशकी ग्राप्ति होगी । | 


दुग्ध या जरछूसे भरे हुए रत्नसमेत करवे ।। ३९ ॥ में दान | 


साथ पाछकोसे (हेमाद्रिके मतमें मिट्टीके ववेनको पछक कहते 
हैं) अनेक खियोंका तथा पुझील ब्राह्मगोंका पूजन करना 
चाहिये अपने सौभाग्यको बढानेके छिय,; पीछे बन्घुवर्गोके 
साथभोजनकरनाचाहिये/यहगौरीचतुर्थी का ब्रतपूरा हुआ ॥ 


बरदचतुर्थीत्रत-माह शुक्छा चौथके दिन होता हैं. यह 


| काशीखण्डमें कहा हे। हे ढुंढे! माघ शुक्ला चौथके दिन जो 


रातका बत करते हुए तेरा पूजनकरेंगे, देवता उनको अपना 
पूज्य मानेंगे । एक सालतक वीथ्यात्रा करके पीछे वापसी 
चौथके दिन इस त्रतको करे,ब्॒तकी समाप्तिमं सफेदतिलों के 
गुढके छड्डू बनाकर भोग घरके खाने चाहिये, वापसी 
माधकी चौथका! नास है। रातका प्रहण ईं इससे यह बात 
















2: 22222 20672 5: 2272: 
झे कहता" कक सकता धा तकाहडत 











| चतु है 
अहमद पेव्या पिन ऑटोति चिहेंगे जो हि रदचत॒र्थी्रतम्‌ ॥ अथ माघक्ष्णचतुर्थ्य 
पहुशइरगणपतित्रतम्‌ ॥ अथ पूजाविधि:-येभ्यो माता ऋकू १ णवा पिन्नेति चे जपित्वा ॥ आगमाध्थ तु० 
घण्टानाद कृत्वा॥ अपसप त्विति छोटिकामुद्रया श्रूतान्युत्साय॥ तीहणदंष्ट्रेति क्षेत्रपाल् संप्रार्थ्य 
आचम्य आणानायम्य मम सहकुटुम्बस्थ लेमस्थेयंविजयाभयायुरारोग्यैश्वर्या भिवद्धचर्भ धमाथ 
काममोक्षचत॒विधपुरुषार्थसिद्धबरथ श्रीसंकष्टहरगणेश्वरप्रीत्यथ॑ नारदीयपुराणोक्तप्रकारेण पुरुष- 
सूक्तविधानेन यथासंभावितनियमेन यथामिलितोपचारः संकष्टचतुर्थीत्रताड्रत्वेन बिहित॑ 
गणपतिपूजनमहं करिष्ये” इतिसंकरुप्प कलशा्चन शह्ढर्चन॑ च कृत्वा मूलमन्त्रेण न्यासान्‌ 
कुयांव्‌ ॥ अस्य श्रीगणपतिमंत्रस्थ शुक्ल ऋषिः ॥ श्रीसंकष्टहदरगणपतिदेवता ॥ अल॒ष्टुप्छन्दः ॥ 
शीसंकष्टदरगणपतिप्रीत्यर्थ न्‍्यासे विनियोगः ॥ नमो हेरम्ब अगुष्ठाभ्यां नमः ॥ मदमोहित 
तर्जनीभ्यां० ॥ मम संकट्ट निवारय भध्यमाभ्यां ॥ निवारय अनामिकाम्याँ० ॥ हुफट 
कनिष्ठिकाभ्यां० ॥ स्वाहा करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः ॥ एवं हृदयादि॥ सूर्खवः स्वरोमिति 
दिग्वंधः ॥ # नमो हेरंब मदमोहित मम संकष्टे निवारय निवारय हु फट स्वाहा ॥ अथ 
व्यानमू--चेताड़ं: श्वेतवर्ख्न सितकुसुमगणेः पूजित॑ श्ेतगन्वै: क्षीराब्धो रत्नदीपे सुरतरू- 
विमले रत्नसिंहासनस्थम्‌ ॥ दो्धिः पाशांकुशेष्टाभयधृतिरुचिर चन्द्रमौलि तरिनेत्र ध्यायेच्छा- 





|स्थैय्ये, विजय, अभ्य,आयु, आरोग्य और ऐश्वथकी वृद्धिके 
| लिये तथा धरम, अथे काम और सोश्ष इन चारों पुरषाथोंकी 
गणपतित्रत-प्राव कृष्णा चौथके दिनहोता है।। अथपूजाविधि | सिद्धि और सह्ृष्ट हर गणपतिकी प्रीतिके लिये नारदीय- 
ओम येभ्यो माता मधुमत्‌ पिन्वते पय:, पीयूष ग्योरदिति | पुराणकी कही हुईं विधिक अनुसार  पुरुषसूक्तके मन्त्रोंसे 
रद्िबहां: । उक्थ शुप्म्रान वृष भरान्त्सवप्स स्तॉ3आदि- | जिस प्रकार होसके उसी नियमसे उपस्थिव सामग्रीद्वारा 
त्यॉँ3भनुमदा खस्तये”'जिनके लियसुन्द्र केशॉवालीअदिति | सड्ड'्ठ चतुर्थी ब्रवके अज्ञुरूपस अवश्य करने यॉग्य गणपति 
भाता मौठा पय पिछाती है जिनक लिय दिव अम्नृत देता | पूजनको करूंगा, इस गणपतिमंत्रके शुक्छ ऋषि हैं,श्रीसकष् 
या धारण करता है, हे बछवान्‌ कामनोंको पूरा करनेवाले | हरण गणपतिजी देवता हैं,अनुष्ट्रप छन्द है, श्री संकष्टहरण 
मंत्र; मेर अनुष्ठानसे मेरे कल्याणके छिये मुझपर देवताकों | गणपतिकी प्रसन्नताके छिये अंगन्यास और करन्यासमें 
प्रसन्न कर दे। “ओमू एवापित्र विश्वदेवाय वृष्णे यज्ञविधेम | इसका विनियोग होता हैं। कछशपूजन और शद्भपूजन 
नमसा हविभिः । बृहस्पते सुप्रजा वीरबन्तो बच स्यामपतयों | करके “ ओों नमो हेरम्ब मदमोहित सम सझ्ूृष्ट निवारय 
रयीणाम्‌” सब कामनाओंके देनेवाले, अन्न मेरा पालनकरने | निवारय हुं फट्स्वाहा ? यह मूलमंत्र है, इस मूलमंत्रस, ओऑ 
वाले सबे देवमय गणेशके लिये यहां हवि ओरनमस्कारोंसे | नमः, भंगुश्लास्यां नमः ) हेरम्ब तजनीभ्यां नमः, मदमोहित 
| मध्यसाभ्यों नस, मस सदुष्ट निवारय निवारय अनामि' 


नर ्‌ 
पह सब कुछ करत हूँ हे वेदके स्वामिन्‌ !हम अच्छी सन्तान 
कार्भ्यां त्मः। हूँ फट कनिष्ठिकाभ्यां नमः, और खाहय 
करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः, यह करन्यास करना चाहिये। 


वाढ, वीरवाले और धनवाले हो जायें । इन दोनों संत्रोंको 
जपकर पीछे 'आगमार्थ तु देवानां घण्टानाईं करोम्यहमू।तेन 
>'ता यातुधाना अपसपन्तु कुत्नचित्‌॥' मे देवताके आगम- | पीछे ओ नम्मों हृदयाय नमः, हेरम्ब शिरसें स्वाहा, मद- 
| मोहित शिखाये बषदू, मम्र सकृछ् निवारय निवारय कव- 
भी भाग जायें । इस मंत्रस घंटा बजाक र, 'अपसपन्तु? | चाय हु, हुंफट नेत्रत्रयाय वोषटू, स्वाहा अख्ाय फू, इस 
श्स मंत्रको बोलता हुआ छोटिका मुद्रासे भूतोंको भगाकर 
करना चाहिये । अब गणपतिके ध्यानके मन्त्र कहते 
पोरब पसन्नो सत्र सवदा॥'हे बडी २ डाढोंवाढे बडेभारी | हैं, ४ श्रेताड़ू ? के अपर लि, अत जिनके अ्ढ 
सरीरवाले, भूत और प्रतोंके समुदायके स्वामी! हमपरसदा | हैं, ध 
कक नसे जिनका पूजन किया जाता हे क्षीर समुद्रके बीच 
की ५०० ५. है सह प्राणायाम्पूर्वक | कल्प वक्षोंसे रमणीय रत्नद्वीपमे रत्नजटित सिंद्यासनपर 
कप ' भर भर सर कुठुम्बकी श्षेम, विराज़ते है) पाश, अंकुश, बरदानमुद्रा, अभय तथा धेय ह 


बे लद्शीचिद् हो बा रैक जप, पथ 8 :::: स्वतः है सिद्ध हो जाती है कि चौथ प्रदोष व्यापिती 
होनी चाहिये. यह वरद चौथक! त्रत पुरा हुआ।संकष्ट हर 





















ने लिये घंटा बजाता हूं, इससे डरते हुए देल्यादि कहीं 
५ अकार हृदयादिन्यास, तथा भूभुवः खरोम्‌' इससे दिग्वन्ध 
पीछे 'वीक्षण देष्टू महकाय भूतप्रेतगणाधिप । नमस्ते क्षेत्र- 
प्रसन्न थे है खेतही जिनके वस्न हैं, श्रेतपुष्पोंस तथा चन्द- 
क्‍ 5 ये, ह्‌ क्षेत्रपाढ ! तेरे छिये प्रणाम है। इससे | नसे 3 





बतानि, ] भाषाटीकासमेतः 





यथमीरा अजपातबजल हाफ अस्झस 
रणशोमाढटयर 








२ 


॥ लंबोदरं चतुवाहु जिनेत्र रक्ततणकम्‌ ॥ सवा- 
्र विचिन्तयेतागणपलये नमः ध्यायामि ॥ आगच्छ विप्नराजेन्द्र स्थाने 


'त्रस्थितो भव ॥ आराधथिष्ये भकक्‍त्याहं भवन्तं सवसिद्धये ॥ सहस्नशीषो० गणेशाय० 


[्‌बा० । 
रेप एवद० विश्ननाशिने० 


अभीष्लिताथसिद्धचथ पूजितों यः सुरासुरः।॥सर्वविश्नच्छिदे तसमे गणाधिपतये नमः ॥ 
॥ आसनम्‌ । गणाधथिप नमस्तेषसल स्वोारसिद्धकर प्रभो ॥ पा 


हाण देवेश : सुरासुरसुपूजित । एतावानस्थ० लंबोदराय० पाद्यम्‌ ॥ रक्तगन्धाक्षतोपेत्ं 


क्तपुष्पलतमन्वितम्‌ ॥ अध्य गहाण 
यम । 


वश भया 
शजुरसभारांध्य सवासाडइशदशायक 


स॑ हि भाक्तेत!। जिपादूध्व०चन्द्राधधारिणेन० । 
॥ माया दत्त सुरश्रेष्ठ गहाणाचमनीयकम्‌ 


'स्मादिराव्० विश्वप्रियाय० आचमनीयम्‌ ॥ पयो दधि पूर्त चेव शकेरामधुसंथुतम्‌ ॥ पंचाप्तू- 
'न स्नपने करिष्ये सबंसिद्धिदभ्‌ ॥ विन्नहत्रें० पंचामुतस्तानम्‌ | गंगादिसलिले शुद्ध खुबणे- 


,लशें स्थितम॥छु॒वासिर्त परिभलः स्नापयामि गणेश्वर 
उस्नानम्‌ ॥ रक्तवण बसख्चयुग्म स्वकायथंसिद्धये 


। यत्युझषेण० ब्रह्मचारिणेन० शुद्धोद्‌- 
या दर्त गणाध्यक्ष गह्मतामखिलाथंद ॥ 


यज्ञ “सर्वेप्रदाय० वख्ायुग्भम ॥ कुकुमाक् मया दत्त सोवेणशुपवीतकम्‌ ॥ उत्तरीयेण संयुक्त 


नमुद्राकों हाथोंमं घारण करते है एस चन्द्रशेखर त्रिलो 

न भ्रसन्नसुख निमंछ सब नियन्ता श्रीगणपतिजीका सम रत 
कारकी शान्तिके छिये ध्यान करता हूँ। “ छम्बो | 
स्‌ मन्त्रसे भी ध्यान कर | इसका यह अथ हैँ कि, चतु 

ज) त्रिछोचन, शोण झ्ान्वि, समस्त आमभूषणोंति शोभाय-| 
नप्रसन्नमुख छम्बोदर गणपतिजीका ध्यान करता हू 
'णपतिक किये प्रणाम हैं; स उनका ध्यान करता हू | 
आगच्छ ” इस्र छो किक तथा “ सहसख्रशीर्षा ? इस वेद्क 


न्त्रको पढ़कर “गणबशायनम»्झावाहयामि” इससे आवबा- 
न करे, पूर्वोक्त छौकिक मसन्त्रका अर्थ हे कि; है विन्न"| 
'जॉंके अधीश्वर | आप यहाँ पधारकर स्थित हों, मे सब!|' 
ग्याँकी सिद्धिके लछिय मक्तिस आपकी पूजा करूंगा । फिर! 
| कराता हूँ.क्योंकि यह स्नान समस्तसिद्धियों का देनेवाला हैं, 
| विध्नहर्ताके लिये नमस्कार हैँ, पचाम्तका स्नतान समपंण 


६ के सन उन ऋण 


' अभीष्सिताथ ” इस छौकिक और ““ओं पुरुष एवे० 
स वेदिक मन्त्रको पढ़कर “ विन्ननाशिन नमः, आसन 


्॒सपयामि ” इसको पढता हुआ आसन (या आसनाथ।| 
प्प अक्षत्‌ ) समर्पित करे। खोकका अथ है कि; सब ! 
(वल्ा एवं दृत्यजन अपने अपने कायकी सिद्धिके छिये| 
। 


किक 


जेसका पूजन करते हैँ, उस समस्त विध्नोंकों छिन्न करने- 


शा शाकुमकम्मंग 


(ले गणपरतिकि छिये नमस्कार हे | विष्नान्तकक्नो प्रणामा। 
*, से आसन भेंट करता है| ' गणाधिप ” इससे और| 

आओ एतावानस्थ ” इस सन्त्रको पढकर “ लस्बोदराय | 
तेम$ पाद्य समपयामि ” इसको ५8 दा कछोकका | 
भथ है कि तर आर अपरॉके पृज्य | है | 
पब सिडधियीके बेला 53 अर हि लिये गाय | “स्वप्रदाय नम: वख्युग्मे समपेयामि” सब कामनाओंको 
३; आप पाद्य ग्रहण करिये। “ रक्तगन्धाशक्षतोपते ?* इस | 
उोकिक मनन्‍्त्रको दथा “ ओ त्रिपाद्ध्व॑मुदें० ” इस वेदिक- | 
न्द्राधधारिणे नमः. अध्य समपयामि ? | 
। समपंण किये हु हे समस्त पुरुषाथाक दुनवारढ उन्हें आप 


पनत्र और ४ 
इससे अध्यदान करे | छोकिक मनन्‍्त्रका अथ हँ कि, 


इबश  सने भक्तिस यह अध्य, रक्तचन्दन; रक्ताक्षत तथा | 


३ 


_ब०-सनकम्फापकानक 








रक्तपप्पॉसहितसमरपित किया हु आप इस स्वीकार करें, 
चन्द्रमाको छछाटमें घारण करनेवालेक छिये प्रणाम है, में 
अध्यप्रदान करता हूं । हे सुर तथा असुरोंक्ते आराधनीय ! 
है समस्त सिद्धियोंके देनवाले | हे सरश्रे्ठ : म॒ आपके छिये 
आचमनीय प्रदान करता हूं, आप इससे आचमन कर; इस 
मन्त्रस तथा “ओं तस्माद्विराइजायत ? इस वेद्किमन्त्रसे 
“ विश्वप्रियाय नमः, आचमनीय समर्पयामि ?' विश्वप्रियक्े 
छिये प्रणाम हैं, आचमनीय समर्पण करता हूं, इससे आच- 
मनीय देना चाहिय | “ पयोद्धि घुते ? तथा “आओ विद्न 
हल नम परच्चासतस्तान समपंयामि ” इनसे प्चामृत 
स्नान कराना चाहिय | इनका अथ हू कि, दूध, दृधि, घृत, 
खांड और सहब इन पथ्चाम्रतमय द्र॒व्योंसे आपको स्नान 


करता हैं । गड्भादितीथे०” इस छोकिक तथा ““ओं यत्पुरु- 
षेण० ?” इस बेंद्क मन्त्र और “ ब्रह्मचारिणें नमः, शुद्धो 
दुक स्ताने समपयामि ” इस वाक्यस शुद्ध स्वान कराबें, 
लौकिक मंत्रका अथ हैं कि, खुबणक घटमे गंगाआदि 
तीथेंका पवित्र जछ परिमलत सुगन्धरसे सुग न्थित किया भरा 
हुआ हैं, हे गणेश्वर | में डख्ी जलसे आपको स्नान कराता 
हूं, ब्रह्मचारिस्वरूप गणशजीको प्रणाम हैं,शुद्ध जलसे स्नान 
कराता हूं । ' रक्तवण ” इस छोकिक मंत्रस तथा “ओं ते 

जे बर्दिषि० ” इस वैदिक मंत्रस दो वस्ध चढावे और 


पूर्ण करनेवाले गणपतिके लिये नमस्कार है,में दो बल्लचढता 


| हूं, छौकिक मंत्रका अथे है कि; हे गणाध्यक्ष ! मेंते अपने 


समस्त पुरुषार्थोकी सिद्धिके लिये दो छाछ बस्ध आपको 


अज्भीकार करें, “ कुंकुमाक्त ” हू गणनायक , केसर या 


| कण ॥ «7 अध्याय. लहर) 


अंतराजः | [ चंतुभौ- 
गहाण गणनायक ॥ सेट लीकर समर संग" वकऋत॒ुण्डाय० यज्ञोपवीतम्‌ ॥ चन्दनागुरु 
कर्परककुमादिसमन्वितम्‌ ॥ गन्ध गृहाण (जरा सवसिद्धिम्दायक ॥| तस्माद्यज्ञात्सबेहुतऋ० 
रुद्रपुत्राय० गन्धम्‌ | अक्षतांश्व सुरश्रेष्ठ कुकुभाकाबू्‌ सुशोमनाव | पड (ण विन्नरा जेन्द्र मया 
दत्तानिह भक्तितः ॥ गजबदनाय०अक्षताव ॥ रक्तपृष्पाणि विश्वेश एकविशतिसंख्यया ॥ ग्रहण 
सुपुखों भूत्वा मया दत्तान्युमासुत ॥ तस्मादश्वा०गुणशालिने नमः पृष्पाणिस० ॥ सुगन्धीनि च 
माल्यानि गृहाण गणनायक ॥ विनायक्‌ नमस्तुभ्यं शिवसूनों नमो5स्तु ले॥ विश्नराजाय० 
माल्यादीनि० ॥ एकविंशतिनामनिदवात्निः पुष्पेवां पूजयत्‌--ओ गजाननाय नमः ।विध्नराजाय »। 
लंबोद्राय” । शिवात्मजाय० । बक्रत॒ण्डाय" । झूपंकणाय० । कृष्जाय० । गणेशाय * । विध्न- 
नाशिनेन? । विकटाय? । वामदवाय” । सर्वदेवाय० | सवातिनाशिने० । विष्नहर्तरेंन० । 
धूम्नाय” । सर्वदेवाधिदेवाय०। उमापुत्राय० । क्ृष्णपिड्रलाय० | भालचन्द्राय/ | गणाधिपाय०। 
एकदन्ताय० ॥२१॥ इत्येकाविंशतिदूर्वाः पृष्पाणि वा समरपयेत्‌ ॥ अथअंगपूजा---संकष्ट नाशिने 
नमः पादोपू० । स्थुलज॑घाय * जंघेपू० । 'डउकदनताय० जाहु नीपू० । आखुवाहनाय ० ऊरूपू० । 
हेरम्बाय” कर्टिपू" । लम्बोदराय० उदरंपू०। गणाध्यक्षाय" हृदयपू० । स्थूछकण्ठाय० कण्ठंपू०। 
स्कन्दाग्रजाय” स्कत्घोप्‌० । परशुहस्ताय“हस्तौपू० | गजवक्लाय” वक्नंपू० । सर्वेश्वराय० शिरः 






"20 78606 7%: 26/26/7450 घर 280 8,28 











पू० | 


रोलीसे रंगे हुए सुवण सहश इस उपबीत और डुपट्टेको 

स्वीकार करिये | इस छोकिक मंत्र तथा “ ओ तस्माय- 
ए के ८ भरे है ध 

जात सबंहुतः सम्भूते इस बेद्क मंत्रस तथा * बक्र- 


देवके लिय प्रगाम है, में उत्तरीय तथा यज्ञोपवीत चढाता 
हूँ,इस प्रकार कहता हुआ जनेऊझ ओर दुपक्वा देना चाहिये | 
' चन्दनागुरु ' है दवेश | हे समस्त पिद्धियोंके देनेवाले ! 


भ९ु अर श्् 
आप चन्दन; अगर, कपूर और केसर आदिसे मिश्रित इस | ___ ५ हर ; 
रे है. की ८८ _५। गाम सत्र बन जाता है, एक एक नाम सँत्रको बोलक 
विलेपनको स्वीकार करें; इस छौकिक मंत्रस, तथा ““ओं | हि र्ड्क 


| एकवार्‌ दूवां या फूछ चढाने चाहिये, यह नामसंत्रोंसे पूजा 


उस्मायज्ञात्सवेहुत ऋचः ” इस वेदिक मंत्रस और “ रुद्र- 


फ् २ हक किक हि ! 
पुत्नायनम), गनन्‍्ध विलपयाप्ति” महेश्वरनम्दनके लिये प्रणाम | ; * ै 
पुत्नायनमः, ह्‌ | नाम मंत्रोंसे अज्ञपूजा भी होती हैं,संकष्टनाशिन्‌ , स्थूलजंघ, 


है, में चन्दन लगाता हूं ” इस वाक्यस चन्दूव छगावे 
' अक्षतांश्व ' इससे तथा गजवदन्ताय नस3,अक्षतानव समप- 


यार! इससे चावछ चढ़ाने चाहिय, इसका अथ हें कि; | 
हे विध्नराजोंके इश्वर ! हे सुरवर! आपके छिये मक्तिभावस विज >> ली सर आज आन क ि 
ककुमस रजितसुन्दर अक्ष॒त समर्पण किये हैं आप इनको | 5. + नान्‍्त करनेसे य सपा अल 
| जाते हैँ, इसप्रकार तैयार किय गये नाम मंत्रोमेंस एक एकसे 


स्वीकार करें । गजवद्नके ढछिये नमस्कार है, में अक्षत 


चढाता हूं। ' रक्तपुष्पाणि ? इस छोकिक मंत्रसे तथा “आ। 
वस्मादश्वा अजायन्त ” इस छोकिक मंत्रसे तथा “ गुण- | 


झालिने नमपुष्णाणि समपेयामि! ! हे विध्नेश ! है पावती- 
सनन्‍्दुन . भने इक्कीस छाहृपुष्प आपके छिये समर्पण किये 
है, आप प्रसन्न होकर इन्हें स्वीकार कर, गुणशारिको 


कानि([ऋ 


नमस्कार है मे पुष्प चढाता हूँ,इनसे पुष्प चढाने चाहियें। | 
_ मुगन्धीनि-विष्तराजाय: नमः माल्यानि समर्पयामि ? | 


घुर्गन्धित सालायें फढावें। इनका 


गणनायक ; हे विनायक ! हे शिवनन्दस ! आपको प्रणाम 





नमस्कार है. 





” में माछाघारण फराता हूँ | फिर इक्कतीस 


संकष्टनाशिने० सर्वाड्रपू० ॥ अथावरणपूजा----गणाधिपाय०। उमापुत्रा) अघनाशिने०। 


नामोंसे दूर्वास अथवा फूछोंसे गणशजीका पूजन करना 
चाहिये। गजानन, विध्नराज, रूम्बो दर, शिवात्मज, वक्र- 


9 ७ ९ | तुण्ड, शूपकण, कुब्ज, गणेश, विष्ननाशिन विक्रट 
तुण्डाय नमः सोत्तरीय यज्ञोपवीच सम्रपेयामि ” बक्रतुण्ड | ५ ) ! 


वामदेव, स्वेदेव, सर्वारतिनाशिन , विष्नहर्ता, धूम्र, सर्व॑- 


| देवाधिंदृव, उम्रापुत्र, क्ृष्णपिंगछ, भालचन्द्र, गणाधिप, 
| एकद्न्‍्त, ये इक्कीस नाम हैं, इनके आदियमें “ ओम ” और 


अन्तमें ' नमः ” तथा इन्हें - / का एकबचनान्त करतेसे 


पूरी हुई॥ अज्ञपूजा-पुष्प तथा दूबसे की गईं पूजाकी तरह 


एकद्न्त, आखुवाहन,हेरम्ब,छम्बोदर,गणाध्यक्ष; स्थूलकंठ, 
स्कन्दाप्रज, परशुहस्त, गजवक्ष, सर्वेश्वर, संकृष्टनाशिन्‌ इन 
नामोंके आदिम “ओम” और अन्‍्तमें “ नमः ? तथा इन्हें 


पाद, जघा, जानु,ऊरू,.कटि, उद्र, हृदय, कंठ,स्कन्ध,हस्त, 
वक,शिर इनमेंसदोकोद्वितीयाकाहिवचनान्तकरके प्रत्येकके 
साथ' पूजयामि”लंगाकर तथा सर्वाज्गभशब्द और एकअंगको' 
एक वचनान्त करके उसीको छगाकर इन अज्ञोंका पूजन 
करना चाहिये, अथे वही है कि अमुकके ढिय नमस्कार है 
अम्लुक अगका पूजन करताहूं,( गणेशजीके ही ब्रुत प्रकरणमें . 
इस प्रकारकी अगपूजा तथा नाम पूजा हम कईं जगह कह 
आये है इस कारण विस्तारके साथ अथे नहीं करते है ) 


है, आप सु “आवरण पूजा-गणपतिजीके चारों ओर ऋमरः पांचआवरण 
! भाप छुगन्बित भाछाधारण करिये। विघ्तराजके लियि | 


या टक्षत माचकर उत्तपर जय पानेके छिये उनकी भी 
पूजा करनी चाहिये। गणाधिप, उमापुत्र, अधघनाशिन * 






( २७९ ) 


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फथान्‍का 


हेरंबाय० । लेबोदराय० । गजवक्लाय० | इकहइन्ताय० । धूद्धकेलदेल० । भालचन्द्राय० । इंशपु- 
बाय० | इभवक्काय० । मूषकवाहनाय ० | कुमारगुरवे० । संकष्टनाशिने० ॥इति मथमावरणम्‌॥१॥ 
विज्नगणपतये० । वीरगणपतये० । झूपंकणेगणपतये० । श्रद्यदगणदरलये० । बरदगणपतये० ! 
इन्द्रगणपतये० । एकदन्तगणपतये ० । लंबोदरगणपतये०। ल्िप्रिगणपतये० | सिद्धिगणपृतये०इति 
द्वितीयावरणम्‌ ॥२॥रामाय ?। रमेशाय०। वृषाड्राय?। रतिप्रियाय ० पुष्पदाणाय०। महेश्वराय ०। 
बराहाय० । श्रीसदाशिवाय० ॥इति वृतीयावरणम्‌ ॥श॥ आदित्याय० । चन्द्राय० । कुजाय० । 
बुधाय ० । बृहस्पतये० । झुक्राय० । शनेश्वराय० । केतवे० । लिद्धचे० । समृद्धचे० । कान्त्येन० 
मदनरत्ये० । मद्द्राविण्ये० | बखुमत्ये० । वेनायक्ये० ॥इति चतठ॒ुथोवरणम)॥ ४॥ इन्द्रायन० । 
अम्नये० | यमाय ० । निक्रेतये० । वरूणाय ०" । वायवे० । सोमाय० । इंशानाय ० ॥ इति पश्चमा- 
वरणम्‌ ॥५॥ अथ पत्र॒पूजा[-गणाधिपाथ० पाचीपत्रें० ॥ खुसुखाय ० । ऋड्भराजप० | उमापुत्राय ० 
बिल्व०। गजवक्लाय० श्वेतदूर्वाप० । लंबोदराय० बदरीपत्रम्‌० । हरखूबने ०" घत्तूरप० । गुहाम्रजाय० 
तुलसीप० । गज़कणोय ० अपामा्ग० ।एकदुन्ताय ? बृहतीपत्रमू। इमवक्काय० शमीप०। सूषकवा- 
हनाय० करवीरपत्र । विनायकाय० वेशुप० । कपिलछाय० अकंप० । भिन्नदुस्ताय० अज्ञव- 
पत्र॑ं० । पत्नीहिताय० विष्णुक्रान्ताप० । बटवेन० दाडिमीप० । भालचन्द्राय० देवदारूप ० । हेरं- 
बाय० मरूपत्रं० । सिद्धिदाय० सिंद॒वारपत्र० सुराग्रजाय० जातीपत्रम० । विन्नराजाय० केतकी- 
पत्रं० ॥ इत्येकविशति पत्राणि ॥ अथ पुष्पपूजा--सुमुखाय० जातीएु० | एकदुन्ताय० शत- 
पत्रपु० । कपिलाय० यूथिकापु० | गजकणांय० चकपु० । लम्बोदराय० कहारएु० । विकटाय० 


केतकीपु०ण । विश्ननाशिने० बकुलपुष्प॑। विनायकाय० जपापुष्प० । धूम्रकेतवे० 
पुन्नागपु० । गणाध्यक्षाय० घत्तूरपृु० । भालबचन्द्राय मार्तुलिंगपुष्प० । पत्नीहिताय० 





हेरंब छंंबोद्र, गजवक्र, एऋद॒न्त; धूम्रकेतु, मारचन्द्र, इेश- | 


पुत्र, इमबक्, मूषकवाहन, कुमार गुरु. संकष्टनाशिन्‌ इन 
नामोंके मत्रोंस पहिछे आवरणकी पूजा करनी चाहिये। 
विन्नगणपति, वीरगणपति, शुपंगणपति, प्रसादगणपति, 
बरदगणपति इन्द्रगणपति, एकद्नन्‍्तगणपति, रूम्बोद्रगण' 


आवरणकी पूजा करनी चाहिये । रास, रमेश, बृषांक, रति- 
प्रिय; पुष्पवाण, महेंश्वर, वराह, श्रीसदाशिव इन नामोंक 
मनत्रोंस तीसर आवरणकी पूजा करनी चाहिय । आदित्य, 


चन्द्र, कुज. बुध, इहस्पति, शुक्र, श्नेश्वर, केतु, सिद्धि, | 
कान्ति. मदनरति, मदद्राविणी, वसुमति, बेनायकी, , ५ +न्‍ 
समर, रे हि हर ! | विष्णुक्रान्ता ( नर्गिस ) य दो प्रसिद्ध दक्षविशेष हैँं। सिन्धु- 
& | बार निगण्डीको कहते हैं । और सब नाम प्रसिद्ध हैं। 

अग्नि, यम, निर्क्नति, वरुण, वायु, सोम, इंश, इन नाम | सर 
| इस कारण उनका परिस्फुट नहीं करते हू । यह पत्रपूजा 


इन नामसंत्रोंसि चौथे आवरणको पूजा करनी चाहिये:इन्द्र, 


'पंत्रोंसि पांचमें आवरणका पूजन करना चाहिये। यह आव- 
रण पूजन समाप्त हुआ ॥ पत्रपूजा-गणाधिप, सुमुख, उमा- 
पुत्र, गजबकऋ, लूम्बोदर; हरसूनु, गुहाम्रण, गजकण, एक- 


दनत, इभवकऋ, सृषकवाहन, विनायक, कपिल, भिन्नदृन्त, | 
पत्नीहित, बढु, भालछचन्द्र, हेरम्ब, सिद्धिदू; सुराभज; | ला ज 
| सकष्टनाशन इन इक्कीस नासोंके मत्रोंस जाती, शतपत्र, 


विप्नराज; इन इक्कीश नाम मंत्रोंस पाची. भंगराज, बिट्ब, 


श्वेलदूर्वा, बद्री, घत्तर, तुलसी, अपामागग, बहती, शमी, | 
करवीर, वेणु, अक, अजुन,विप्णुकान्ता, दाड़िमी, देवदू रु: 


खक्च् 


| समाप्त हुईं ॥ पुप्पपूजा-सुमुख . एकद्नत, कपिछ; गजकण, 
| छम्बोदर, विकट, विशन्ननाशिन्‌, विनायक, धूम्नकेतु, गणा- 





मरु, सिन्धुवार, जाती, केतकी, ये इक्कीश बूटॉके नाम हू 
इनके साथ पत्र जोडकर फिर द्वितीयान्तर करके सबके साथ 


| & समर्पयामि ” जोडकर फिर एक एक नाम मंत्रके साथ 
| एक एक इसको लगाकर कहे हुए गाचोंमेंस जिसको इस 
छम्बोद्रगण | प्रकार बोले उसीके पत्ते चढाने चाहियें। पाची पत्र एक 
पति ते क्षिप्रणणपति, सिद्धिगणपति इन नामोंके मंत्रॉस दूसर | शक्ष क्के सुगन्धित पत्तेका नाम है, उस वृक्षको पाची कहते 
ट कर अ॥ &. 
हैं। भुज्धराज नाम भांगरेका हैं। अपामाग नाम ऊँगका हें 


इसही ओछा काटाभी कहते हैं। वृहती नाम कठेरीका हें । 
शी जॉटको कहते हैं । करवीर कन्तीरको कहते हैं। वेणु- 
नाम वॉसका है। अक आकको कहते हैं । अजुन ओर 


ध्यक्ष, भालचन्द्र, पत्नीहित, उम्ापुत्र; गजानन, इंशपुत्र, 
सर्वेसिद्धिप्रद, मुषकवाहन, कुमारगुरु, दीघतुण्ड, इभवक्त, 


यूथिका, चपक, कल्हार, केतकी , बहुछ, जपा;पुन्नाग,घक्तर, 
मातुद्किण, जिप्णुऋान्ता, करवीर; पारिजात: कमछ। गोक्‌- 


हु 


व्र॒तराजः ! चतुर्थी 





विष्णक्रान्ताप० ॥ उमापुत्राय०" करवीरपु० । गजाननाथ० पारिजातपु० ॥ इशपुच्राय० 
कमलपु० ॥ सर्वासिद्धिरदाय० गोकर्णिकाएु० । मृषकबाहनाय० कुसुदएु० । कुमारणु- 
रवेनमः तगरपु० | दीघेशुण्डाय” खुगन्धिराजपु० । इभवक्काय० अगस्तिएु ० । संकटनाशनाय 
पाटलाप० । इत्येकविशतिपुृष्पाणि ॥ २१॥ अ थाष्टीत्तरश तनाम पूजा--३* अस्य श्रीमदष्ो- 
त्तरशतविश्नेश्वरदिव्यनामामुतस्तोत्रमन्त्रस्य ॥ गृत्समद ऋषे] गणप तिर्देवता ॥ अल प्छन्द॥ 
र॑ बीजम ॥ न॑ शाक्तिः॥ म॑ं कीलकम्‌ | श्रीगणपतिप्रसादसि द््च्थ पूज़ने वि० ॥ ७+ कारपूवे - 
काणे नामानि ॥ विनायकाय० विप्नराजाय० गोरीपुत्राय० गणेश्वराय० स्कन्दाग्रजाय० अव्य- 
याय० पूताय० दक्षाध्यक्षाय० द्विजानियाय० अप्लिगवेच्छिदे० इन्द्रश्रीमदाय० वाणीबलप्रदाय० 
सर्वसिद्धिरदाय” शवैतनयाय० शिवभियाय० खवोत्मकाय* सटष्टिकजें० देवानीकारचिताय० 
शिवाय० शुद्धाय० बुद्धिप्रियाय० शान्ताथ० बहाचारिणे गजाननाय० द्वेमातुराय० झुनिस्तु- 
त्याय० भक्तविन्नविनाशनायथ० एकदन्ताय० चतुबाहवे० चतुराय० शक्तिसंयुताय० लम्बोद- 
राय० श्र्पकर्णाय ० हेरम्बाय० बरह्मवित्तमाय० कालाय० ग्रहपतये० कामिने० सोमसखूयांग्रिलो- 
चनाय० पाशाइकुशधराय० चण्डाय० गुणातीताय० निरक्षनाय० अकल्मषाय० स्वयंसिद्धाय० 
सिद्धार्चितपदाम्बुजाय० बीजप्रशियाय० अव्यक्ताय० वरदाय० शाश्वताय० कृतिने० विद्वत्मि- 
याय० वीतभयाय० गदिने० चक्रिणे० इश्षुचापक्चते० अब्जोत्पलकराय० श्रीशाय० श्रीपति- 
स्तुतिहषिताय० कुलादरिदते० जादिने० चन्द्रचूडाय० अमरेश्वराय० नागोपवीलिने० श्रीकण्ठाय० 
रामाचितपदाय० ब्रतिने० स्थूलकण्ठाय० त्रयीकर्ते०” सामघोषप्रियाय० अम्रण्याथ० पुरुषो- 
त्तमाय० स्थूलतुण्डाय० ग्रामण्ये० गणपाय० स्थिराय० वृद्धिदाय० सुभगाय० शूराय० वागी- 
शाय० सिद्धिदायकाय० दूवाबिल्वप्रियाय०" कान्ताय० पापहारिण० कृतागमाय० समाहि- 
ताय० वक्रतुण्डाय० श्रीप्रदाय० सौम्याय० भक्तकांक्षितदात्रे०ण अच्युताय० केवलाय० सिद्दि- 
किम मलिक नी पद लि रपट करिकिले निकल आ रहे पल बे लल तिल / पीली कल कि + का लि किक रकम लि 


कक 


णिका, कुमुद, तगर, सुगन्धिराज, अगस्ति, पाटला ये 
इकक्‍्कीस फूलके गाचोंके नाम हैं इनमेंसे हर एकके साथ 
४ पुष्पे समर्पयामि ” छगाकर उसीके फूछको गणेशजीपर 
चढ़ा देना चाहिये ॥ यह क्रमशः इक्करीस नाम मंत्रोंसे 
चढ़ाने चाहिये | इनमें झतपत्रनाम कमलका, यूथिकानाम 
जूइका, कल्हार नाम एक ग्रकांरके छाल एवं तीनों कालोमें 
खिल रहनेवाढ़े कमलका, बकुछ नाम मोछसरीका, जपा 
नाम जबवाका, साठुलुझ् नाम बिजोरेका, करवीर नाम 
कनीरका, पारिजात नाम हार शद्भारका, गोकणिका नाम 
मुहार ( मधूलिका ) सुगन्धिराज नाम गन्धराजका और 
अगस्ति नाम अगस्त्यका है. बाकी सब प्रचलित नाम हैं इस 
कारण उतका अथ नहीं करते | यह इक्कीस तरहके फूलोंसे 
होनेवाली पूजा समाप्त हुई ॥ एकसौ आठ नामोंसे पूजा-- 
अब एकसो आंठ नामोंसे गणशजीका पूजाका विधान 
कहते हैं, इस एकसों आठ गणपतिजीके दिव्य नामोंके 
स्तोत्र रूप भत्रका गृत्समद ऋषि है, गणपति देवता है; अनु 
“ठप उन्द है, रवीज है, ने शक्ति है, से कीलूक हे,श्रीगणप- 
जहा कं है) ह प 

लिदेवकी प्रसन्नवाके लिय गणपतिफे पूजनसें इसका विनि- 

योग होता हे, इस प्रकार कहकर, उस जलको भूमिपर 

6 दे । ये एकसो ज्ञाद नाम यहां भी लिखते हैं, ये सब 


मूलमें हैं जो च॒तुर्थों विभक्तिके एक वचनान्तके रुपमें 
लिख हैं उनके आदिम “ओम” और अन्त नमः छगा- 
कर एक एकको बोलकर पूजन करते जाना चाहिये | 
वरिनायक,३ विध्नराज, गोरीपुत्र, गणेश्वर, स्कन्दाग्रज,' 
अव्यय, पृत, दक्षाध्यक्ष, द्विजप्रिय, अग्निगवच्छित्‌, इन्द्रश्री 
प्रदं; वाणीबदप्रद, सर्वेसिद्धिप्रद,शवंतनय,शिवप्रिय, सर्वा: 
त्मक, सष्टिकते दृवानीकाचित,शिव,शुद्ध, बुद्धिप्रिय,शान्त, 
ब्रह्मदारिन)गजानन/हेमातुर,मुनिस्तुत्य, भक्तविन्नविनाशन, 
एकद्न्‍्त,चतुर्बाहु,चतुर,शक्तिसंयुक्त,लम्बोदर,शूपक णे, हेरेब, 
ब्रह्मवित्तम, काल, प्रहपति, कामिन्‌, सोमसूर्य्याप्रिछ्षोचन, 
पाश' डुकुशघर, चण्ड, गुणातीत, निरखन, अकल्मष, स्वयं- 
सिद्ध, सिद्धाचितपदम्बुज,« बीजपूरप्रिय, अव्यक्त, वरद। 
शाश्वत, कृतिन) विद्वत्म्िय, बीत भय, गदिन, चक्रिम्‌, 
इक्षुचापध्ृत्‌, अब्जोत्पछकर, श्रीश, श्रीपत्ति, स्तुति*" हित 
कुछाद्विश्षुत्‌। जटिन, चन्द्रचूड, अमरेश्वर, नागयज्ञोपवी- 
तिन, श्रीकेठ, रामांचितपद्‌, ब्रतिन, स्थूढकैठ, अयीकत्र। 
सामघोषप्रिय, अग्रगण्य, पुरुषोत्तम, स्थूलतुण्ड, आमणी, 
गणप, स्थिर, वृद्धिद, सुभग, शूर। वागीश, सिद्धिदायक, 
दूवाबिल्वप्रिय, कान्‍्त, पापहारिन्‌ कृतागम, समाहित, 
वक्रतुण्ड, श्रीपदूु; सरोम्य, भक्तकांक्षितदातू,  अच्युत, 


ब्रतानि, ] क्‍ भाषादीकासमेतः । 





दाय० सच्िदानत्द्विप्रहाम ० ज्ञानिनि० मायायुताय० दानताय० बरहिदश्लाय” भयवर्जिताय० 
इसतदेत्यभषयद ० व्यक्तमूलये ० उ् मालतिकाय ०एशकीह डर रसग्टइजेलमोप्टबलालसाप्य० समस्त 
जगदाधराय० वरमृषकवाहनाथ० हष्टचित्ताय० प्रसब्रात्मने० स्वसिद्धिप्दायकाय नम॥१०८॥ 
अष्टोत्तरशतेनेव नाम्ता विश्लेश्वरस्थ च ॥ तुष्ठाव शड्रः पुत्र॑ त्रिपुरं हन्तुसुद्यतता यश पूजये- 
दननेव भवत्या सिद्धिविनाथकम ॥ दूवोदलेर्बिल्वदलेः पृष्ववा चन्दनाक्षतेः ॥ सर्वान्कामान- 
वामभोति स्वापद्धचः प्रमुच्यते ॥ इति श्रीभविष्योकत्तरपुराणे विश्नेश्वराष्टोत्तरातदिव्यनाम- 
स्तोत्र संपूर्णणम ॥ वनस्पतिरसोद्धत दशाडं शुग्गुलान्वितम गृहाणाशुरूुधूएं त्व॑ मया दत्त 
विनायक ॥ यत्पुरुषम्‌ू० भवानीडियकत्रें० धूषम । पृताक्तवर्तिसंयुक्त दीप शाक्तिपदाथकर ॥ 
गहाणेश मया दत्त तेजोराशे जगत्पते ॥ दाह्रणोस्थ० रूद्रप्रियाय० दीपे० । अन्न चतुविध॑० 
गृह्मताम्‌॥ भश््येनानाबिवेयुक्तान्मोदकान्दृतपाचितान्‌ ॥ गहाण दिन्नराजेद्र तिललड़्ड्समन्वि- 
तान्‌ ॥ चन्द्रमाम० विध्ननाशिने० नेवद्यम्‌॥ फलानीमानि रम्याणि स्थापितानि तवाग्रत३ ॥ 
तेन में सुफलावापिभंवेज्नन्मनिजिन्मनि ॥ सड्टनाशिनें- फर्लेस० ॥ पूगीफले » नाभ्याआासी० 
घिद्धिदाय० ताम्बूलं० । पूजाफलसमृद्धियर्थ तवाग्रे स्वणमीशवर ॥ स्थापित तेन में भीतः पूर्णान्‌ 
कुर मनोरथान्‌ ॥ सत्तास्या तन्‌० विश्नेशाय० झखुवर्णपुष्प० श्रिये जात इति नीराजनं०अथ दूवा 


युग्मापंणम-गणाधिपाय ० दूवोयुग्मंस० । उमापुत्राय० दूवोधुग्म॑" अधनाशनायथ० दूवाोयु० एक- 


कवृछ, सिद्धिद, सचिदानन्द्विप्रह, ज्ञानिन, मायायुत, 
दान्त, ब्रह्मिप्ठ, भयवर्जित, प्रमत्त*) देत्यमयद, व्यक्त 
मूति, अमूतिक, पावती" शकरोत्संग खेलनोत्सव छाछूस; 
समत्त जगदाधर; वर मूबकवाहन, हृष्टचित्त, प्रसन्नात्मन| 
सवे सिद्धि प्रदायक, ये १०८ नाम हैं जो स्वोत्रके रूपमें पाठ 
किये जाते हैं [ इनमैंस जो प्रचक्तित नाम हैं उनका अथ तो 
न कप कक | चर 
यहां नहीं दिखाते पर जो प्रचलित नहीं हैं तथा कई शब्दोंक 
समासके रूपमें आये हैं. उनका यहांही अथ करेंगे तथा 
जिन नामोंका अर्थ छिखेंगे उनपर अर्थ ऋमक नम्बर दे 
देंगे | १ जो सबका नायक है जिनपर कि कोई नायक नहीं 
हे। २ स्कन्दके बडे भाई ।१जो कभी नष्ठ नहो। ४ 
चन्द्रमा या ब्राह्मणोंके प्यारे | ५ अम्निके गवको नष्ट करने- 
वारू । ६ इन्द्रको श्रीक्षे दनेंवाछे । ७ देवताओंकी सेनासे 
पूजित होनेवाले । ८ चांद, सूथ्य और अग्नि हूँ नेत्र जिसके 
ऐसे । ९ सिद्ध जिसके चरणोंकी पूजा ही करते हैं। १० 
विप्णुकी की हुईं स्तुतियोंको सुनकर प्रसन्न होनेबाढे । ११ 
प्रमत्त देत्योंको भय देनेवाले १२ पावेतीजी और शिवजीकी 
गोदरम खेलनेका उत्सव चाहनेवाले | यह बाल्य भावका 
परिचायक स्मरण किया गया है। जब महादेवजी त्रिपुरको 
मारनेके लिये तयार हुए उस समय गणेशजीके इन्हीं एक- 
सो आठ नामोके स्तोत्रसे ग०शजीको प्रसन्न किया था जो 
कोई भक्ति भावके साथ इस स्तोत्रस सिद्धिविनायकका 
पूजन करता है तथा पुष्प, चन्दन, अक्षत दूर्वादूक और 
बिल्वपत्रोंको चढाता है उसकी सब इच्छाएं पूरी होजावी 
कक पक श् 
हैं और सब आप त्तियोंस छूट जाता है। यह श्री भविष्यो- 
त्तर पुराणका कहा हुआ श्रीगणपत्तिजीके एकसौं आठ 
दिव्य नामोंका स्तोत्र पूरा हुआ ॥ पूजन- वनस्पति रसो- 


2 3 कस पलक कक न 
दूदम्‌! इस संत्रस तथा “ यत्पुरुषम्‌” इसमंत्रसे 'एबम्‌ ओम 
भवानी प्रियकर्तेनमः घूपम्राप्रापयामि'! भवालीके प्रिय का- 
य्ये करनवाल्केलिये नमस्कार हैं। गणेशजीको-घूपकी सुग- 
न्धि सुंघाताहूं, इससे घूप देनी चाहिये। घुताक्तवर्ति' इस 
मंत्रसे तथा “ ब्राह्मणोस्थ” इससे एवम्‌ ओम रुद्रग्रियाय- 
नमः दीप॑ दृ्शयामि' शिवजीके प्यारे पुत्र एवम्‌ शिवजीस 
अधिक प्यार रखनेवालेके लिये नमस्कार हे दीपको दिखा- 
ता हूं, इससे दीपक दिखाना चाहिये ५“ अन्नेचतुर्विधम' 
इससे तथा अनेक तरहके भक्ष्योंके साथ, तिहोंके छडडू 
समेत घी पकाये हुए मोदकोंको, हे विश्नराजेन्द्र | महण 
करिये, इससे तथा “ चन्द्रमाम०” इस मंत्रसे एचम्‌ ओम्‌ 
विश्नविनाशिने नमः नेवेद्य निवेदुयासि विजन्न विनाशकके 
लिये नमस्कार है नेवेद्यका निवेदन करता हूं; इससे नेवे- 
दयका निवेदन करना चाहिये । 'फलानि' इससे तथा ओम 
संकटनाशिने नमः फ्लू समर्पयामि ' संक्रटनाशीके लिये 
नमस्कार हे फरलोंका समपंण करंताहूं इससे फल चढ़ाने 
चाहिये । 'पूगीफलम' इससे तथा “नाभ्या आसी” इससे 
एवम्‌ ओम ' सिद्धिदाय नमः तास्वूर समपेयामि सिद्धि- 
योके देनेवालेके लिये नमस्कार हे ताम्बू चढाताहू | हे 
इंश्वर | पूजाके फछकी प्राप्तिक लिये आपके सामने सोनेका 
फूछ रखा है, इससे आप प्रसन्न होकर मेरे मनोरथोंको पूरा 
करें; इससे तथा 'सप्तास्यासन? इससे एवम्‌ “ ओम विन्ने- 
शाय नमः सुवणपुष्पे समपेयामि' विन्नशके लिये नमस्कार 
है सोनेका फूछ चढाताहूं, इससे सोनेका फूछ चढाता चा- 
हिये। “भश्रिय जात:” इससे आरती करनी चाहिये। अब 
दो दो दूर्वाएं चढानेकी विधि कहते हं-गणाधिप, उमापुत्र, 
अघनाशन, एक दुन्त, इभवक्त, विनायक्‌, इंशपुत्र, सर्वेसि- 


ब्रतराजः । 





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हा 











दन्ताय” दूर्वायु०। इमवक्काय” दूवांचु० | विनायकाय० दूवोयु० इशपुत्राय दूवाशुग्म । सर्वेसि- 
द्विरदायकाय० दूवा॒० | कुमारगरवे"दूवोय्‌। श्रीगणराजाय“एकदूवाकुरें सम पेयामि ॥ गणा- 
धिप नमस्ते5स्तु उमापुत्राधनाशन ॥ एकदन्तेमवक्कति तथा मूषकवाहुन ॥ विनायकेशपुत्रेति 
स्विद्धिपदायक ॥ कुमारगरवे तुभ्य गणराज प्रयत्वतः । एमिनॉमपदनित्य दूवायुग्म॑सम- 
पयेत्‌ ॥ श्रीगणेशों वक्रतुण्ड उमापुत्रस्तथेव च॥ विज्नराजःकामदश्व॒ गणेशवर इति रुप्ठतः॥ 
जीमूतशक्तिरित्युक्तस्तथाअनसमप्रभः ॥ योगिध्येयो दिव्यगणो महाकाय इतीरितः ॥ ततश्र 
सिद्धिईः प्रोक्तो महोदर इति स्मृताः॥ गजवक्रः कमभीम स्ततः परशुधायपि ॥ करिकुम्पो 
विव्वमरार्तिरुप्रतेजास्ततः परम्‌ लम्बोदरस्ततः सिद्धिगणेशश्रेकविंशति ॥ नामानि रमणी 
यानि जपेदेभिश्व पूजयेत्‌ ॥ गणेशात्तस्य नश्यन्ति सड्ृष्टानि महान्त्यपि ॥ महासड़ु- 
छ्दग्धोड१ह॒ गणेशं शरण गतः ॥ तस्मान्मनोरथ॑ पूर्ण कुरू विश्वेश्वरप्रिय ॥ ततः स्वर्णमय वुष्ष॑ 
विन्नेशाय निवेदयत्‌ ॥ प्रदक्षिणानमस्कारान्क्ृत्वा देव॑ क्षमापयेत्‌ ॥ यक्ञेनयक्ष० सड़ष्ठनाशनाय० 
पृष्पाअलिम्‌॥ नमोस्ठ देवदेवेश भक्तानामभय्रद ॥ विश्नानां नाशकर्त्रें च हरात्मज नमोस्तु 
ते ॥ विश्ननाशिने० नमस्‍्कारम्‌ ॥ तनः 3० नमो हेरम्ब इति मूलमन्त्र एकविंशतिवारं॑ जपेत ॥ 
अथ गणेशायाष्य दद्यात्‌-गणेशाय नमस्त॒भ्यं सर्वस्िद्धिदायक।॥ सड्डष्टहर मे देव गहाणाएवय 
नमोःस्ठु ते ॥ कृष्णपक्षे चतुथ्या ठ॒ सम्पूजित विधूदये॥ क्षिप्ं म्रसीद देवेश गहाणाएर्य नमोस्तु 
मा आल बा कम. ३3 मल मल मल शक कलम र किन सि लत जनम लक 


ड्विप्रदायक, कुमार गुरु, श्री गणराज, इन नामोंके आदिमें | « महासक्ृष्ट! इस इलोकको पढबा हुआ प्रणाम और प्रार्थना 


४ ओऑम्‌ ? तथा अन्तमें “ न्षमः इन्हे चतुर्थीका एक बच- 
नान्‍्त करके जैसे मूलमें हैं, वेसे नाम मंत्र बन जाते हैं प्र्वे 
क॒के साथ “दूर्वाकुरयुग्मं समपयामि'” छगाकर गणेशजीपर 
दो ” अन्तक एक दूर्वा चढाना चाहिये, ये सब गणेशजीके 
प्रसिद्ध नाम हैं । अब इनही ग्यारह नाम मन्‍्त्रोंका ज्ोकों 
द्वारा भी इनका अनुवाद करते हैँ कि, है गणाधिप | आपके 
ढिये नमस्कार है, हे उमा (पावति ) के ननन्‍्दन | आपके 
लिये नमस्कार हैं, हें अधा ( पापों, या उसके दुःखों ) के 
नाशन आपको नमस्कार हें, हे एकदन्‍्त आपको नमस्कार 
है; हे हस्तिके सदश मुखवाले आपको नमस्कार है, हे मूषक 
वाहन आपको नमस्कार है, हे विनायक आपको नमस्कार 
है, हे ईंश ( महादेवजी ) के पुत्र आपको नमस्कार है. हे 
समस्त सिद्धियोंके देनेवाढ़े आपको नमस्कार है, स्वामि- 
कार्तिकेयके ( बडेमाई ) आपको नमस्कार है, हे गणराज ! 
आपको नमस्कार हे इन पूर्वोक्त नाम मंन्त्रोंसे गणेशजी पर 
प्यत्नके साथ दो दो दूबके दुढ चढावे और “ १ श्रीगणेश, 
है वकतुण्ड, ३ उम्रापुत्र, ४ विश्नराज, ५ कामद, ६ गणेश्वर, 
5जीमूत ( मघोंकी ) शक्ति, ८ अखनसमप्रभ, ९ योगि- 
ध्येय, ( योगिजन जिनका ध्यानकरें ऐसे ) १० दिव्यगुण, 
१ कक महाकाय, १९ सिद्धिद, १३ महोद्र, १४ गजबकऋ?५, 
इसेमत, १६ परशुधारि, १७ झरि कुम्म, (हाथीके समान 
गण्डस्थछचाल ) १ < विश्वमूति १९ उप्रतेजा:, २० लम्बो- 
पक शव कण  र 
गे जपता या इनसे पूजन करता है गणशजीके अनुग्रहसे 
$सक घोरसे घोरभो जो संकद हों वे सब टछजाते हैं। पीछे 


कर कि, है विश्वके स्वामी श्रीमहादेवजीके प्रिय नन्‍्टन ! 
भे वार सक्भृटरूप दावानछस जलरहाहूं, अब आपकी शरण 
प्राप्त हुआ हूँ, इस कारण आप मेरे मनोरथको पूरा करिये, 
पीछ सुबर्ण सदश पीतल या सुवर्णकेही पुष्पको विप्नराजजीके 
भेंट करे। तदनन्वर प्रदक्षिणा और प्रणाम करके क्षमा 
प्राथना करनी चाहिये। फिर “ओं यज्ञेन यज्ञ” इस मन्त्रसे, 
तथा “ सद्डष्टनाशनाय नमः पुष्पाजर्िं 8 2238 सह 
टोंके सहार करनेवाढके छिये नमस्कार है; में पुष्पाजलि 
चढाता हूं इससे पृष्पाअछि समर्पित करे। 'नमस्ते' इससे 
प्रणाम कर कि हे देवदेव ! आपके छिये नमस्कार है । हे 
इश | है अक्तोंके भयको दूर करनेवाले ! हे शिवकुमार ! 
आपक लिये नमस्कार है। “ विप्ननाशिन नमः” विन्नोंके 
नाश करनेवालके लिये नमस्कार है इससे नमस्कार करे । 
फिर “ ओ नमो हरम्ब मदमोहित सम सह्ुष्ट निवारय २ 
हु फट स्वाहा” इस पूर्वाक्त मूल मन्त्रका इक्तीस बार जप 
करे | फिर गणशजीके लिये अध्येदान करे और 'गणशाय' 
इत्यादि दो मंत्रोंको पृढकर “ सकृष्टहदरगणपतये नमः” 
सझ्ष्ट हरगणपतिक छिये नमस्कार है, इस प्रकार बोलता 
हुआ दो बार अध्यंदान करे,अर्थात्‌ एक्‌ एक मुन्त्रके अन्तमें 
पूर्वोक्त वाक््यकी योजना करता हुआ गणेशजीक लिये अध्य 
दान करे। उन दो ज्छोकोंका यह अर्थ है कि; हे समस्त 
सिद्धियोंके देनेवाले गणेश ! जो आप हैं, आपके ढिये 


नमस्कार है। हे सझ्ुुटोंके हरनेबाढे देव |! आप अध्य प्रहण 


कप 


करिये आपके लिये नमस्कार है। क्ृष्णपक्षकी 'चतुर्थीको 
चन्द्रभाक उदयमें जिनका अच्छी तरह पूजन किया है ऐसे 
है इंबदेव | हे ईश | आप प्रसन्न हों,अध्य प्रहण करें;आपके 








॥ एताभ्याँ मन्जा्र्पा सड्ुष्टदरगणपतये नम इत्यप्येदयं दह्यादतिथीनासुत्तमे देवि गणशप्रिय 
वलमे ॥ सर्वेसंकडनाशाय गहाणाप्य नमो$्तु ते ॥ चतुथ्येन० इृदम० ॥ रोहिणीसहितचन्द्र 
पश्चोपचार: पूजयित्वाशक्षीरोदाणेवर्संभूत लक्ष्मीबन्धो निशाकरा।गहाणाध्य मया दंत रोहिण्या 
सहितः शशिन्‌ ॥ रोहिणीसहितचर्द्राय/ इदम० इत्यध्ये ददह्यात॥ गगनाड़ुणसंदीप क्षीरा- 
ब्थिमथनोद्धव ॥ मामासितदिगानोग सोमराज नमोःतु ते॥ चन्द्राय नमस्कारः॥ ततः 
आचार्य संपूज्य वायनं दद्यात---मोदकाम्सफलान्पंच दुक्षिणात्रि! समन्विताव॥ गृहाण त्व 
द्विजश्रेष्ठ ब्रतस्य परिपूतथे ॥ वायनम्‌ ॥ प्रतिभां गरदे दद्यादाचार्याय संदक्षिणाम्‌ ।। वस्धकुम- 
समायुक्तामादों मंत्रमिम जपेत्‌ ॥ गणेशल्य म्रसादेन मम सनन्‍तु मनोरथाः ॥ तुभ्य॑ संभददे विभ 
प्रतिमां तु गजाननीम ॥ इष्टकामार्थसिद्धच्थ पुत्रपोत्रम्वाधिनीम ॥ गणाधिराज देवेश विन्नराज 
विनायक ॥ लव सूर्तिपदानेन प्रसन्नो भव सबंदा ॥ इतिकलशमतिमादानमंत्र: ॥ अथ प्रतिग्रह- 
मंत्रः+-गणेशः प्रतिगह्ाति गणेशो वे ददाति च ॥ गणेशस्तारकोभाभ्यां गणेशाय नमी नमः ॥ 
संसारपीडाव्यथितं ॥ सदा मां कटष्टानिभूत सुसुख प्रसीद ॥ त्वं त्राहि मां नाशय रृष्ट्संघान्नमों 
नमः कष्टविनाशनाय ॥ इतिप्रार्थन ॥ यदुद्श्य कृत॑ं तेष्य यथाशक्ति प्रपूजनम्‌ ॥ संकष्ट हर में 
देव उमासुत नमो5स्तु ते॥ इति नमस्कारः ॥ इतिपूजाविधि॥। भथ संक्रष्टाशन कथा॥खूत उवाच॥ 
अरण्ये बतेमान त॑ पाण्डपुत्र॑ युधिष्टिरम्‌ ॥ सबान्धव सुखासीन प्रययों व्यास आदराद॥ १ ॥ 
त॑ दृष्ठा मनिशाईलं व्यास प्रत्याययों नप/॥ मधुपक च साध्य स दत्त्वा तस्मे ह्वाच तम्‌ ॥र॥ 





लिये नमस्कार है। वदच॑तर “तिथीनां ? 


गगनाकहुण' 
करनेवाले ! हे क्षीरसमुद्रकें मथनसे उत्पन्न होनेंवाले / 
अपनी कान्तिसे दि्गन्तराहुमें प्रकाश करनेवाले ! हैं सोम 


राज ! आपके छिये नमध्कार हैं चन्द्राय नमस्कार: चन्द्र- | 
माक छिये नमस्कार यात्री इस प्रकार चन्द्रमाके लिये नम- | 
| हरें, आपके छिये नमस्कार हैँ | यह पूजनान्वध नमस्कार 
कान? इस मंत्रस वायना दे; हे ह्विजश्रेष्ठ | आप मेर ब्रतकी | करनेका सत्र है।यह पूजा करनेकी विधि पूरी हुई 


| कथा-सूतजी शौनकादिकोंसे कहते हैं, पाण्डुनन्द्न राजा 
पअहण करें फिर गुरु आचायके छिये अतिमा दुक्षिणा | 


' स्कार करना चाहिये। पीछे आचायेकी पूजा करके “मोद 
पूृणताकरनेके लिय फछ और दृक्षिणासमेत पर्च मोदक 


और वश्धसहित कलूस प्रदान करे उसके पहिछ, गणशस्य; 


यह मूते पुत्र और पोत्रादिकोंको बढानेवाली है; इस 


हे तिथियोंमें उत्तम्त | 
ह्‌ देवि | है गणशजीकी परमप्यारी | आपके लिये नमस्कार | 
है, आप मेरे समस्त सट्डूटोंकों नष्ट करनेके छिये अध्य ग्रहण | 
करें “ चतुथ्यें नमः इद्मष्य समपयामि ”' चतुर्थी तिथिकी | 
अधिष्ठात्री देवीके किय नमस्कार हैँ, म इस अध्यका दान | 
करता हूँ इस प्रकार कहकर चौथके छिये एक अध्यंदान | 
करे। फिर रोहिणीसहित घन्द्रमाकी पश्चोपचारोंस पूजा | 
करके “ क्षीरोद्णव ” हे क्षीरसमुद्रत उत्पन्न होनेवाढे ! | 
हे लक्ष्मीके बान्धव ! हे निशाकर ! हें शशी | आप रोहिणी | 
सहित अध्य ग्रहण करें, “'रोहिणीसहिल चन्द्राय नमः इंद्‌- | 
मध्य समपयामि /? रोहिणी सदित चन्द्रमाक छिये नमस्कार 
है) मं इस अध्यको समर्पित करता हूँ इससे अघ दान कर। | 
आकाशरूप आगनमे दीपककी तरह प्रकाश | 
| कष्ठोंको नष्ट करें, आप कष्टोंको विनष्ट करनेवाले है, आपके 
| लिये बारबार प्रणाम हैं यह प्राथेता पूरी हुई | मने जिस 





दानके करनेस अभिरछूषित कामना पृण हों, इसीलिय 
इसका दान करता हूँ। इस प्रकार आचायकी प्राथंना करके 
गणशजीकी पग्राथना करे कि, ह ग्रणाधिराज ! है देवता- 
ओके इच्चर ! हे विन्नराज ! हें विनायक ! मंत्र जो आपकी 
प्रतिमाका दान किया है; इसस आप खदंव मुझपर प्रसन्न 
रहें। यह कछसके ऊपर पृण पाजत्रमें गणपतिकी मूर्ति 
स्थापित करके देनेका मन्त्र हैं। अब मूर्ति छेनेके समयमें 
आचायके पढनेका मंत्र छिखते ह कि, ' गणशः ? गणेशजी 
ही प्रदाता है; गणेशजी ही ग्रहीता हैं; गणेशजी ही अपने 
दोनोंके उद्धार करनेवाले हैँ, गणेशजीके लिय बार २ प्रणाम 
है । फिर यजमान 'संसार' इस पद्मको पढे, कि, हे सुमुख 

में सदा सांसारिक दुःखों ते दुःखित हो कष्ट भोग रहा हूं, 
अतः आप मेरेपर प्रसन्न हों, मेरी रक्षा करें, मरे समस्त 


कटकी निवृत्तिके लिये अपनी शक्तिक अनुसार आपका 
पूजन किया हे, हे पाबंतीनन्दुन ! मेरे उस सझ्ुंटटों आप 


युधिष्ठिर जंगलमें जाकर निवास करता था। भीमसेनादि 


| चारों भाई ओर द्रोपदीके साथ छुखपूब॑क बंठा हुआ था; 
णेशजीकी असन्नदास मेरे सम्रस्त मनोरथ पूण् हों, हे 
विग्न | म गणपतिकी स्वृणमूर्तिकों आपके छिय देता हूं । | 


उस समय उनसे मिलनेके लिये भगवान्‌ वेद॒व्यासजी आदू- 
रसे उनके पास गये-॥ १ ॥ राजा युधिष्ठटिर मुनिवर बेद्‌ 


| व्यासजीका दरशन करतेही झट सम्मुख खड़े हो गये, उत्तके 


(१८४ ) रा 








अठ्य में सफले जन्म भवतागमने कृते॥ यत्संकष्ट हि संजातं बने 
तत्सईें विलय यात॑ भवतों दशेनेन हि॥ आत्मानं साथ मन्यं5हे राज्य- 
तृष्णापराइसुखम्‌ ॥ ४ ॥ हुःखित॑ माँ पुनः स्वामिन्राज्यश्रष्ट वने स्थितम्‌॥ एते भीमादयः 
' सर्वे बान्धवा व्यथयन्ति भोः ॥५॥ दुराधषाः सुवी्यां हि मच्छासन विधोरताः ॥ इथं तठ॒ द्वोपदी 
साध्वी राजपुत्री पतित्रता ॥ ६ ॥ राज्योपभोगयोग्या साप्यक्य हुःखोपभोगिनी ॥ मया चर्कि 
कृतं व्यास पूर्व कष्टालुजीविना ॥ ७॥ दायादेलुण्ठितं राज्यं यूतच्छगझ्मरतेस्तथा ॥ पराजिता 
वय॑ ब्रह्मन्सुहृद्धिबन्धुमिस्तथा ॥ ८ ॥ वन भस्थापिता दूतरिदमच्ुस्तथेव च॥ कुबेन्तु गमन॑ 
शी वनाय भवदादयः ॥ ९॥ इत्य॑ निराकृताः स्वामिन्यदा तद्बनमागताः ॥ अहं तदाप्रभ- 
त्यहांत्रि द्रक्ष्यामि भवाद्शाम्‌ ॥ १० ॥ यद्यस्ति ब्रतमेर्क हि सवंसंकष्टनाशनम्‌॥ तद्भतं कथय 
ब्रह्मन्नलुगाह्योपस्मि सुध्रत ॥ ११ ॥ इत्युक्ततन्तं राजान॑ सर्वसंकष्टनाशनम्‌ ॥ उवाच प्रीणयब्‌ 
व्यासो धर्मज ब्रतमुत्तमम॥ १२॥ व्यास उवाच ॥ नास्ति भूमण्डले राजं॑स्त्वत्समी धमतत्पर॥ 
कथयामि व्रत॑ तेष्य ब्रतानाम्तुत्तमोत्तमम्‌ ॥ १३॥ संकष्टनाशन नित्य शुभद फलदं शुवि॥ 
यत्कतुः सर्वकार्यागां निष्पत्तिजायते छवम्‌ ॥ १४ ॥ विद्यार्थी लभते विद्यां घनाथी लगते घनम्‌॥ 
प्रोषिता या प्रस्धी च करोति व्रतछुत्तमम्‌ ॥ १५ ॥ इंप्सितं लभते स्व पतिना सह मोदते॥ 
संकष्टेपि यदाक्षित्तो मानवो प्रहपीडितः ॥१७॥ साम्राज्य दीक्षितो नित्य मंत्रिभिः परिवारितः॥ 
सुहृद्धिबन्वुमिश्वेव॒ तथा पुत्र: समस्वितः ॥१०।तसथ तु भियकर्जी च पत्नी झुणवती प्रियानाम्ता 


युधिष्ठिर उवाच ॥ 
मम निवाधपितः ॥ हे ॥ 


रत्नावलीत्यासीत्पतिब्रतपरायणा ॥ १८ ॥ तयो$ परस्पर प्रीतिरभवच्च झुणाश्रया ॥ कदा 


डिये अध्ये एवं मथुपर्कदान करके बोले || २॥ कि, आज 
मेरा जन्म आपके पधारनेसे सफल होगया, वनवासके 
कारण मुझे जो कष्ट था ॥३॥ बह सब आपके दृशन कर- 
नेसे ही विढ्लीन होगया; में राज्ययी लछाछसास विमुख 
अपनेको धन्य मानता हूँ ॥ ४॥ पर हे प्रभो | जबसे में 
वन्॒का दुःख भोग रहा हूँ और मेरा राज्य नष्ट हो गया है, 
तभ्रीसे ये सव भीमसेनादिक बान्धव मुझे दुःखित करते हैं 
॥५॥ ये मेरे भाई कभीभी दूसरोंको तेजके सहनेवाले नहीं 
हैँ और न्‌ कोई इनको जीतही सकता हे, क्यों कि, ये बडे 
पराक्रमी हैं, पर मेरी आज्ञाके बशवर्ती हैं और यह पतित्रवा 
साध्वी द्ोपदीभी द्रपद्राजकी पुत्री हे ||६॥ अतः यह भी 
राज्यके सुख भोगन योग्य है, पर ठुःख भोग रही है, इस 
लिये में आपसे पूछता हूं कि, मैंने ऐसा कौनसा पाप किया 
हूँ जिससे ऐसा हो रहा है ॥| ७ ॥ भेरे हिस्सेदारोंने जूएमें 
कपटसे भेरे राज्यको छीन लिया, है त्ह्मन्‌ ! हम अपने 
प्यारे बान्धवोंके साथ सब कुछ हार गये ॥८॥ दूतोंस हम 
इस जेगल्को निकल॒वा दिये और कहा दिया गयाक्ति, 
आप सब जल्दीही जग़छको चले जाये ॥९।॥ हे स्वामिन्‌ ! 
जब एस तिरस्कार किय गये हम वनमें चढ़े आये और 
जबस हम जंगरमें दुःख भोगने छगे हैं, तबसे आपसे 
एव महत्माओंके दशनभी नहीं करपाता | १० ॥ यदि 
कोई सब सकटोंकों दूर करनेवाढा त्रत हो तो हे ब्रह्मन्‌ 





२ प्रोषितमतकेस्यथ: । ९ सानवो राजा । 


चिंदेव- 





है सुब्रत | मुझे उसका उपदेश करें, मे दुर्खखत हूँ; मुझपर 
आपसे महात्माओंको दया करनी चाहिये ॥ ११॥ इस 
प्रकार कहते हुए घम्मपुत्र राजा युधिष्ठिरको प्रसन्न करते हुए 
भगवान्‌ वे३व्यासजीने सकष्टनाशन उत्तम ब्रतका उन्हें 
उपदेश कर दिया ॥११॥ वेद्व्यासजी बोले कि, हे राज़न्‌ 
तुम्हारे सदश प्रथिवीपर कोई भी दूसरा धमनिष्ठ नहीं है, 
इसलिय आज मे आपको ब्रतेंमेंके उत्तम ब्रतकों कहता हूँ 
|| १३ ॥ प्रथिवीमरमें सकष्टनाशव नामक ब्तके समान 
नित्य शुभफलका देनेकाछा दूसरा कोई भी ब्रत नहीं है| 
इस ब्रतके करनेसे सब काम सिद्ध होते है ॥१४॥ विद्यार्थी 
विद्याका, धनार्थी घनका छाभ छेवा हे, प्रोषिता , जिसका 
वह्ठभ परदेशगया है ) ऐसी सुन्द्री जो इस त्रतकों करती 
है वह समस्त वाज्छित पदाथोंको प्राप्त करके पतिके साथ 
आनन्द करती है ॥ १५ ॥ अब इस प्रसज्ञम एक इतिहास 
सुनाते हैं, मनुवंशर्म एक राजा था, जब उसको दुष्ट प्रहोंने 
दृबालिया तब वह भी सकटमें गिर गया ॥१६॥ वह राज 
चक्रवर्ती था, मन्त्रिगण भी नित्यही उसको घेरे रहते थे 
उसके सित्र वान्धव और पुत्र भी तेसे ही थे ॥ १७ ॥ और 
उसके अनुसार काम करनेवाढी सदूगुणसम्पन्न॒ पतित्रता 
रत्नावछी नाम की प्यारीसार्या थी ॥ १८॥. णजा 
तथा रानीका पारस्परिक गुणोंके कारण बडा भारी 


प्रेम था, फिर भी किसी समय देववश शबत्रऔंने उसका 


उदार परप-गधपापार/यददाउधकानााकामाा लग 





के 2 है | थ् ; 
हा 
वि है 

| 


ले अरण्ये च शिवा शाव्याघ्राश्व खुद पात्र पहञ्ुन्योड 


शाज्ञी 
खादाकऋन्‍्दपीडिता ॥२३॥ ता विलोक्य बृप्श्चेष्ठा हुखेनेव छु पोडिला 7 चतः ममालसमये 
कण्डेयं महामुनिम्‌ ॥ २९७ ॥ दद॒शे राजा तत्रेत बिध्मश/दिश्धमानाएट हे एटणा-- शाहोसन तु 
'डब्त्पतितों जथि | २५॥ अवब्ववीद्रजन राजा माकेण्डेयं महामानिम ॥ पकछ हल हिैमया 
'मिन्‌ दुष्फूलं कुथयस्व तत्‌ ॥ २६॥ केन कमंविपाकन राज्यलक्ष्मीः पराइलुखी ; मार:ण्डेय 
बाच ॥ श्रणु राजन प्रवक्ष्यामि यत्कृते ए [न के २७ ॥ पूछ हि झश्य 7: “ईीइडइपनि 


हने वमन्‌ ॥ सगशादलशश शाम्विनिन्नन्परितों - बने ॥ २८ ॥ तस्मित्राजीं अमनाजंश्वटथ्य॑ 
घकृष्णके ॥ दईं शुभ च्‌ कृष्णायास्तटाक पृथुनिमलम्‌ ॥ २९ ॥ तत्तीरें न-गकन्यार समूह 
हछवाससाम्‌ ॥ गणेश पूजयन्तीनाँ दृष्टवान्निरत बले ॥ ३० ॥ उपगम्ध शनेस्‍्तत्र प्ृष्टास्लत्थलु 
या विभो॥ आयोः किमेतन्मे सबे कथयध्व॑ हि. ततक््वतः ॥ ३१ ॥ नागकन्या ऊचु ॥ पूज- 
मो गणपति ब्रत॑ सिद्धिभदायकम ॥शान्तिई पुष्ठटिद नित्य स्वव्याधिव्रित्ाशरूम्‌ | ३२ ॥ पुनः 
४ त्वया तत्र कि दान पूज्यते+त्र कः॥ छिय ऊचुः ॥ यदा चोत्पच्चते भक्तिमावे माझि गणा- 
[पसू कृष्णायां च चतुथ्यं। य॑ रक्तपुष्प: जपूजवेत | घृददप से-ए-अनरलिटलआन 

२७४ ॥ विविधान्मोदकान्क्ृत्वा पूरिक्ता घुतपाबलिता। ॥ नंबझं बढ़स सबे गणेशाय 
वेदयेत्‌ ॥ ३५॥ ततो गहीत्वा राजेन्द्र व्य्या संकष्टनाशनम्‌ ॥ बते कऋूत भक्तिपृव साड़ं लस्य 








ज्य छे हिया || १९॥ खजाना, सना आदि सब कुछ | गये; वहां चारों ओर म्ग, शादूछ और खरगोशोंको मारते 
7 अ्रष्ट करद्या, तब राजा अपने बान्धव और पतित्रता | ॥ २९ | उसी वनमें रावको घूमते हुए माघ क्ृप्णा चतुर्थी 
नावढी रानीके साथ निकछुकर ,चछा गया।॥ २५॥ | के दिन हें राजन ; कृष्णा नदीका एक सुन्दर एवम्‌ निमेल 
में क्षुपा और तृषाकी पीडास क्ृश हो गया, घारणकर- | पानीका तालछाव देखा । २९ || उसके किसारेपर वाह 
फरै लिए बल्॒भी एकही रहगया, इधर उधर घूमता हुआ | कपडा पदिन गणशजीकों पूजती हुई नागकन्याओंका[समूह 
मस अत्यन्त व्याकुल हो गया। २१॥ हे राजन | | ब्रतम छगा हुआ देखा ॥ ३० ॥ हे विभो राजन्‌। आपने 
पघेष्टिर | ऐस पत्नीके साथ बनमें वह राजा इस प्रकार | शनेः शरने: उनके पास जाकर उनसे पूछा कि, है पूृज्याओ।! 
ख भोगने छंगा, एक दिन सूर्य अस्ताचछूपर चढा गया | यह तुम्र क्या करती हो ! सो ,तुम सब वृत्तान्त यथाथ 
तन समय श्गालोंने चारों ओर वनमें उपद्रव शुरू किया | कहो ॥ ३१ ॥ नागकन्याओंने कहा. कि हस गणपतिका 
२२ || व्याप्र भी भयंकर शब्द करने छगे, मेघभी वर- | पूजन करती हैं, उन्हींका त्रव किया हैं; यह त्रत सदाही 
नें गा, कांटोंने गनीके चरण बींघ दिए, जिससे यह | सिद्धि; शान्ति ओर पुष्टिका देनेवाला; सम्रस्त व्याधियों का 
ब्राकर रोने छगी || २३ ॥ राजा अपदी रानीको उत्त | नाश करनेवाा है ॥ ३९ ॥ तुमने फिर उच नागकन्याओं 
इुटमें पडी हुयी देखकर उसके दुःखस ओर भी ठुःखित | से पूछा कि, इस त्रतस क्‍या दिया जाता हैँ, किसका पूजन 
गया, इसके वाद प्रभातकाछूक समय महामुनि माक- होता हूँ नागकन्याओने उत्तर दिया कि, जब कभी भक्ति 
'यका ॥| ३४ | आकृस्पिक दशनकर चकित ह्ढो गया, $ उपज, तभी साधमे गणपलिजीका क््ष्पा्‌ चतुर्थीक दन छाल 
नें: शनै: उनके समीप जाकर दृण्डवत्‌ प्रणाम भूमिपर | पुप्पोंस पूजन करे ओर भक्तिभावसे इकटूठे किए गये धूप 
रक्र किया || २५ | पीछे उनसे अपने दुःखका कारण | दीप, नेवेद्य ओर अन्यान्य उपचारों द्वाराभी पूजन करना 
उने छगा कि, है स्वामिन्‌ ! मेने ऐसा कौनसा पापकिया | याहिए ॥ ३३॥ ३४ ॥ नानाविध मूंग, चणे, तिछ आदि- 
उसे कहिए ॥ २६ ॥ जिप्के कारण मुझसे राज्य छेक्ष्मी | कोंके लद्डद और घीकी पूरियोंका एवम्‌ छः रखवाले 
मुख हो गयी । यह घुन माकण्डेयजोन कहा कि, हे- | पदा्थोका भोग छगावे॥ ३५ ॥ ह राजन | उप नाग- 
जन्‌ ! पूर्व जम्ममें जो तुमने दुष्कर्म किया हें; उसे सुनो; | कन्याओंसे प्रहणकरके तुमन सा वधाज्ञ बा5ल भक्तिपूवक 
कहता हूं, पहिले जन्मसे आप व्याघ थे; गहन वनमें ' सझ्टनाशन त्रव करना आरस्भकर दया, फर उस बतके 
१ कृष्णा वेण्या: 








श्ड् 


बलराजः । 


५20 एयर तप » 


प्रभावतः ॥ रेदे॥ अमवद्धनचात्य ते पुत्रपोतरसमन्वितम्‌ ॥ कार मश्चित्समये शजन धनमत्तेन 
सिद्धिदम्‌ ॥ ३७ विस्छृत तद्बत नव कूते यत्वंत भुलिदूमू ॥ तंतः आंत हिं पथ्वत्वमायुषोः्ते 
खबा विभो ॥ ३८ ॥ तल्भावाद्राजडुले विशले आतमुत्तमम्‌॥ त्वया जन्म बृपश्रेष्ठ राज्यं 

न॑ तथा विभो ॥ २९ सहत्मित्रनियायुक्तः मतो$सि बिपुल व ॥ कृत्वाउवज्ा ब्रतस्यान्त- 
स्तत्मापं फलमीदशम्‌ ॥ ४० ॥ राजोबाच॥ अडुनः क्रियते स्वानिन कथ्यता मम खुब्रतम्‌॥ 
यत्कृत्वा सकल राज्य माप्यते च मया पुनः ॥ ४१॥ ऋषिरुवाच ॥ त्रतसंकल्पमाशु त्व॑ कुछ 
चादों तृपोत्तम ॥ प्राप्स्यासे त्व॑ हि राज्य च सन्दृह मा कुछ प्रभोशण्रा। इत्युकत्वा स्‌ मुनिश्रष्ठो 
हान्तर्धानमगात्ततः ॥ झुनेस्तद्वचन हत्वा ब्रतर्लकल्पमातनोव ॥ ४३॥ दाजाकरोन्सुनिभोक्त 
सकल॑ तद्घतं छझुमम्‌॥ आयातः सकलाहतस्य मल्व्रिश्त्याश्व सेनिकाः ॥ ४४ ॥ समाययों वृप- 
श्रेष्ठस्तत्क्ष णात्स्वयमेव [हि ॥ लब्ध्वा स्वकोये राज्य वे गणेशस्य मलादत:॥ ४५॥ बुझुजे 
मेदिनी राजा पुत्रपौत्रसमन्वितः ॥ तस्माखमपरि राजेल््र कुछ संकष्टनाशनम्‌ ॥ ४६ ॥ व्रत 
व्राहे कृपया कष्टनाश- 













शी 8 पार 











सिद्धिप्दं ठ्रणां खीणां चेव विशेषतः ॥ झुधिष्ठिर उवाच ॥ सबिस्तर बत॑ गृह 
नम्‌ ॥ ४७॥ व्यास उवाच ॥ यदा संकेशितो राजन डुःखः संकष्टदाइुणेः ॥ पुमान्कृष्ण- 
चतुथ्याँ ठु॒ तदा पूज्यो गणाथिकः ॥ ४८ ॥ श्रावजे बहुले पक्षे चठुथी स्थाद्विधूदुथे ॥ तस्मिन्‌ 
'दिने ब्रत॑ आह संकष्टार्यं युचिष्ठिर ॥ ४९॥ माघे वा कृष्णपक्षे तु चतुर्थी श्थाद्विधूदये ॥ 
तेघ्मिख्िने बत॑ ग्राह्म॑ संकष्टार्यं नुपोत्तरम || ५० ॥ मातः शुचिशवेत्सम्यादन्लथावनपूर्वकम्‌॥ 
निराहारोप्य देवेश यावच्चन्द्रोदथों मवेत्‌ ।। ५१॥ भोक्ष्यामि पूजयित्वा5ह गणेश शरण गत+॥। 
कृत्वेबमादों संकल्प स्तात्वा शुक्कतिलेः शुभेः ॥ ५२ ॥ आहिके तु विधायेव॑ पूजां च कुछ 


छुव॒त || यथाज्ञकत्या ठु सौवर्णी मतिमां च विधाय च ॥ ५३ ॥ सोवर्ण राजते ताप्ने मृन्मये 


वाथ शक्तितः ॥ कुम्मे पष्पेः फल पूर्ण देव तत्रेव ॥ ५४ ॥ शुमेदेशे न्यसेत्कुम्म॑ बच 


प्रभावस || ३६ ॥ तुम्हारे पुत्र, पौत्र और धन धान्यकी | 


अमित सम्पत्ति हुयी, पर कुछ समयके पश्चात्‌ संपत्तिके 
मदसे तुमने सिद्धिदायक सम्पत्तियोंका देनेबाछा || ३७ ॥ 
वह ब्रत करना भूलकर छोड दिया ओर जिस प्रकार 
करना चाहिए था उस प्रकार नहीं किया, फिर आयु बीत 
गयी, तुमारा मरण हो गया। ३८ ॥ “तुमने जो पहिले 
भक्तिभावसे ब्रत किया था उसके प्रभावसे तुम्हारा राजवंश 
में जन्म और विशाल राज्य हुआ॥ ३९॥ सुहृद, मित्र, 
पतित्रता खी और विपुर घन प्राप्त हुआ, किन्तु तुमने 
अन्तर्मे घतके मदस उसकी अवज्ञाकी थी, इसी दोषस यह 
संकट प्राप्त हुआ है || ४७० ॥ राजाने फिर प्राथंना की कि, 


जिसके करनसे फिर मुझे राज्य मिछ जाय। ४१ ॥ माक- 
८ 0७ ३ 
ण्डेय मुनि बोले कि, हे नृपोत्तम | तुम अब ४सी ब्रतको 


इनकी अनुमत्कि अनुसार ब्रत करनेका संकल्प किया 
॥ ४३ 0 छुनिजीन जो विधि बतायी थी उसी विधिसंडस 
छार पदित्र ऋतकी पूरा किया, जिसके करनेसे बिछुडे हुए 
सभी तन्‍्त्री, बान्धव, किंकर और 








आया और गणेशजीकी प्रसन्नतास अपना राज्य फिर ढे 

लिया ॥ ४५॥ राजा पुत्र पोत्नोंके सुखके साथ राज्य' संप- 
किक, 5 है 

सिको भोगने छगा । इससे है राजेंद्र ! यह सद्भ्ठनाशन 


| आपको भी करना चाहिए । ४६॥ पुरुषोंकों भी इसे 
| करना चाहिए, स्रियोंको बिशष रूपसे सिद्धि देनेवाला है | 
| यह सुत् युधिष्ठिर महाराज वबोछे कि, 
| सझ्ृशनाशन ब्रवकों यथाउथ रूपसे वर्णन करें ॥| ४७ ॥ बेद 
| व्यासजी बोल कि, जब मनुष्य बहुतस दारुण संकटोंस 
| ढ/खी हो तभी वदि चतुर्थीके दिन गणपति पूजन करना 
| चाहिए ॥ ४८ ॥ है राजन्‌ युधिष्ठिर | श्रावण कृष्णाचतुथी 


ला हे | | के दिन 'न्द्रमाके उदय होनेपर उसमें इस ब्रतको भहण 
हू विभो | अब मुझे क्‍या करता चाहिए, कोई त्रत कहिए | 


आप कृपया इस 


करना चाहिय | ४९ ॥ अथवा है नरपतियोंमें श्रष्ठ | माघ 


| कृष्णपक्षकों चन्द्रमाके उद्यम चौथ हो तो उस दिन इस 


॥ | | ब्तको ग्रहण करना चाहिए ॥| ५० ॥ प्रातःकाल दूंतुनकरके 
करनका जरदीही संकटयकरों, आप सन्दृह न करें आप | पवित्र होजाय, फिर है देवश ! जवतक चन्द्रोदय न होगा 
फिर अपने उस राज्यको प्राप्त हो जायंगे॥ ४२॥ मार्क- | बबतक में निराहार रहूंगा ॥ ५१ ॥ मैं गणेशक्की शरण हूँ 
ए्डेय मुनि इतना कहकर अन्तहिंत हो गए, उस राजाने | पीछि पूजन करके भोजन करूंगा; इस प्रकार सकरलप और 
| सफेद तिलोंसे स्तान करके ॥ ५२ ॥ हे सुत्रतत ! नित्यकमपे 

| निवत्त हो पीछे पूजा करना, जैसी अपनी शक्ति हो उसके 


सनक कि ए | अलुसार सोनकी मूत्ति बनवाकर ॥ ५३॥ उसे शक्तिके 
॥ ४४ ॥ उनको साथ छेक ड पिस | केथए4- 
क्‍ र वो भी उसी समग्र वापिस |कुभपर बैध स्थापित करनी चाहिए।५४।|कुभफोप विन्रस्थक् 


अनुसार सॉन चांदी या तांबे मिट्टीके फल पुष्पोंसे भरेहुएं . 


गन दर 4४ कु हि पश्रयथर उआायहध 
बतानि अ । ज १७ मन 
पद रा 
॥2%%0 2 ई 78072 00 00220 20 27600 000 00770 00 १8050 7/272200 70:५४: 0 कम ह १760 अ % % 00/06/0020 /030 0046, / ४2:20 06//770/7 %// 27877: 5000 %:6 20 5ड?। तह/0000 कक 770/70/ 58466 7: 








तत्र निधाय च ॥ पद्ममछदले कृत्वा गन्धाद्यः पूजयेत्तः -। ५५० ॥ रक्तएच्पेश' धूपेश्व एमिनॉम- 
पढे पृथक ॥ आवाहन गजणेशाए आसन विधनाशिने ॥५६॥ पात्र अध्य चन्द्राधे- 
घारिणे॥ विश्वव्ियायाचमर्न स्नान च- बह्यचारिणे ॥ ५७ ॥ वकत॒ण्डायोपदीत वर्त सर्वेध्र- 
दाय च | चन्दन रद्॒पुत्राय एप्पं च गुणशालितने ॥ भवानीभियकर््न च धूप दल्याद्यथा- 
विधि ॥ दीप झृद्॒पियायेति नदेद्य विश्ननाशिने ॥ ताम्बू्छ सिद्धिदायेति फर्ल संकछना 
शिने ॥ इति नामपढेः पूर्जा कृत्वा मासयमाज्छणु ॥ ६५ ॥ श्रावण सपतलडइकान्नसस्थे दाधिन्ष- 
क्षणम्‌ ॥ आशधिने चोपवासं च कार्तिके दुग्धपानकम्‌ । मागशीर्ष निराहारं पोषे गोसूत्र- 
पानकम्‌ ॥ तिलांश्व मक्षयेन्माघ फाल्यने प्रतशकेराम ॥ ५२ ॥ चत्रे मासि प्चगव्यं दूवारसं तु 
माधवे ॥ ज्येछठे घर्त प्ले मोज्यमाषादे मधुमक्ष णम्‌॥ ६३ ॥ इति मासयमान्कृत्वा नरो छच्येत 
संकटात्‌ ॥ बुद्धीयादा तथा सप्तम्रासान्‌ वा स्वेच्छया सुखम्‌ ॥ ९४ ॥ अशक्तश्वेत्ततः सिद्धि- 
भविष्यति न संशयः ॥ एवं पूजा प्रकलंव्या षोडशंरुपचारके! ॥ ६५ ॥ नानाभक्ष्यादिसंयुक्तमु- 
पहार प्रकलपयेत ॥ मोदरान्कारयेद्राज॑श्तिलजान दर्शसंख्यकान्‌ ॥ ६६॥ दवाम्र स्थापयेत्पथ्व 
पश्च विधभाय दापयेत ॥ पूजयित्वा तु॒ तं॑ं वि भमक्तिभावेन देववत ॥ दक्षिणां च यथाशक्त्या 
दत्वा पश्ेब मोदकान ॥ ६७ ॥ संसारपीडाव्यथित हि मां सदा संकष्टू्त सुसखुख भस्रीद ॥ 
त्वं त्राहि मां नाशय क्टसंघान्नमो नमः कष्टविनाशनायथ ॥ ६८ है इसि संप्राथ्य देदंश च॒ 

याध्य निवेदयेत्‌ ॥ ब्राह्मणास्णोजयेत्पश्चाहणेशभीतये छदा ॥5५॥ स्वर छुखीत पश्चव मोदकानू 





ऋष्टाजा शक हर | श्‌ 
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हक ५ ीजफ+ की) ह] 








वखसे ढककर रखना चाहिये अष्टद्छल कम्रलको बना- 
कर उसपर घरना घाहिये।॥ ५० ॥ वहां गन्धादिकोंसे 


पूजन करना चाहिये ॥ ७५ ॥ रक्त पुष्प और धूपसे इन 
जुदे जुदे नामोंसे पूजे, गणशजीक डलिय नमस्कार इससे 
आवाहन तथा विन्नोंक नाश करनेवालेके लछिय नमस्कार 
इससे आसन निवेदन करना चाहिय || ५६ ॥ रुम्बोद्र के 
छिये नमस्कार पाद्य समर्पित करता हूं, अधंचन्द्रधारीकों 
नमस्कार अध समपित करता हूँ, सबके प्यारे अथदा 
सबही जिसे प्यारे ह उसके छिय नमस्कार आचमन सम 

पिव करता हूं; ब्रह्म चारीके लिय नमस्कार स्नान कराता हूँ 
॥ ५७ | टढ तुण्डवालेके छिय नमस्कार उपवीत निवेद्न 
करता हूं,सत्र कुछ देनेवालेके लिये नमस्कार वस्र पृहिनात 

हूँ, रुदके पुत्रंके छिय नमस्कार चन्दन लगाता हूं, शुणश्ा 

लीके लिये नमस्कार पुप्प समपंण करता हूं ॥ ५८ ॥ तथा 
भवातीके प्रिय करनेदाहक छिय घूप भी विधिन्नले साथ 
दनी चाहिये कि उसके छिये नमर्कार धूप सुंघाता हूं। 
रुद्रके प्यारेद्ते लिये नमस्कार दीपक दिखाता हूँ; विज्नत्ा- 
शीके नमस्कार नेवेद्यका निवेदन ऋरता है ॥ ५९॥ सिद्धि 
दृनेवालेक लिये नमस्कार पान समपित करता हूं, स्ेकढ- 
नाशीके छिय नमस्कार फछ समपंण करता हूँ, इन नाख- 
मेत्रोंसे पूजा करती चाहिय,महीनोंके नियसोंको सुर।।६० 

श्रावणमें सात छूड्डू, भादोंमं दधि भोजन,;कारमें उपवास, 
कार्तिकसें दूध पान ।। ६१॥ सागशीषम निराहार, पोपसे 





१ बशाख शतफत्रिकाम 


गोमूत्र पान, मायमें तिछ और फाल्गुनमें घी और सकरका 
भोजन | ६२॥ चेत्रभ पंचगव्य, वंसाखम दूब रस, ज्यष्ठसें 
पलुमर घृत और आपषाढमें मधु भोजन करना चाहिये 
।६३॥ इस प्रकार मार्सोंके यरमोंको करके मलुप्य संकबस 
छूट जाला है। यदि ऐसा करनेमें अशक्त हो तो सात ग्रास 
खाकर सुखपूबवक रह जाय |॥६४।॥ यदि सासोंके यम कर- 
नेमें अश्क्त हो तो, उसे अवश्य सिद्धि होगी इसमें सन्देहँ 
नहीं इसी तरह सोहूृहों उपचारोंस पूजा करनी चाहिये 
६०! नाना विध मध्य सोज्य गणपति देवके सेंटकरें, है 
न्‌! दश तिलोंक छड़डू बसाव |] ५६ | उनमेंसे पांच 
गणशजीके आग रखदे; पांच छड़डू ब्राहप्को द॑ दे! जब 
ब्राह्णको लडूडू दे तब देनक पहिल दृवताकी तरह इस 
आचायकी भक्तिसे पूजा कर; शक्तिक अनुसार दक्षिणा द्‌॑ 
पर रूडडू पांचही होपे चाहिये ।॥६७॥ गणशझ्जीकी प्रार्थन- 


इस प्रकार करनी चाहिये कि, हे सुमुख ! ( जिनके सुख्ता 
दृशनस मकुछहो ऐसे ) में सदेव सांसारिक दु.खोंघे दुः* 


खित रहता हूँ आप सुझपर प्रसन्न होकर. मेरी रक्षा करें ! 
परे सकटसंघोंकोी नष्ट करिये सक्ृटोंके विभनाशक आपके 
छिये बारबार प्रणाम है !! ६८॥ इस प्रकार गणेशजीकी 
प्राथना करके चन्द्रमाको अध्यदान करे फिर गणशजीकी 
शाश्वतिक प्रसन्नताके छिय बांहगोंकी भोजन करावें ॥६९॥ 
पीछे बान्धवोंके साथ आपभी पांचही छट्टड्ओं की खाकर 
रह जाय, यदि पांच ठड्डओसे निवांह करनको शक्ति न 


घृतस्यभोजन ज्यछ् आषादे इतिपाठान्तरम्‌ | 


( १८4 ) ... .... 
वन्धुमिः सह ॥ अशक्तो त्वेकमन्नं वा सुखीयादधिनां सह ॥ ७० ॥ अथवा भोजन कार्यमेकवारं 
हि पाण्डव ॥ भूमिशायी जितक्रोधो लोमदम्भविवजितः ॥ करां च प्रतिमामाचा- 
याय निवेदयत्‌ ॥ ७२ ॥ गच्छ गच्छ सुरश्रेष्ठ स्वस्थाने परमंध्वर ॥ अतनानेत खप्मीतों यथोक्त- 
फलदो भव ॥ »९॥ उद्यापनं अरकर्तव्यं चत॒थ्यों मायकृष्णके ॥ गाणपत्य सदाचार सबंशाश्र- 
विशारदम ॥ ७३ :: आचाये वरयेदादो यथोक्तावि घिनाचयेत्‌ ॥ इक: लॉदिआाजद बस्ताल- 
ड्रारभूषणेंः ॥ ७४ ॥ पूजयेहोहिरण्याद्र्मोदकश्वव होमयेत्‌ | अष्टोत्तरसहझलं तु शर्त चाष्टाधिक॑ 
तथा ॥ ७५ ॥ अड्ादिंशनिस्ष्टों वा वेदोक्तैश्तिलसर्पिया ॥ संपत्नीक खुबणोदरगाभवस्थादिनू- 
पणेः ॥ ७६ ॥ छत्र चोपानहों दुद्यात्कमण्डलुगृहादिन्रिः ॥ आचाये पूजयेद्राजन गणेशस्य त॒ 
तुष्टये ॥32॥ एवं कृत्वा विधानेन प्रसन्नो नात्र संशयः | अतिमास तु यः ऊुयोत्रीण्यव्दान्येक- 
मेव वा ॥ 9८ ॥ अथवा जन्मपयसन्तं तस्य दुःख कदा च न ॥ दारिगं ने अवेत्तस्थ संकट न 
भवेदिह ॥ »९ ॥ दत्सरान्ते द्ादश वे ब्राह्मणान्योजयेत्ततः ॥ विद्यार्थी लभते विद्या धनाथी 
लगते धनम ॥ पृत्राथीं लगते पुत्रान्सोभाग्यं च सुवासिनी ॥८०॥ श्रण्वन्ति ये ब्रतमिद शुत्षमी- 
दशं हि ते थे खुखेन जवि पृर्णमनोरथाः स्युः ॥ एनत्यं भवन्ति सुखिनो लडनाः पुमाँसः सत्पुत्र- 
पोव्धनधास्ययुताः पृथिव्याम्‌ ॥ 4१ ॥ एक्मुकत्वा ततो व्यासस्तत्रेवाह्तरवीयत ॥ युर्धिष्ठिरस्तु 
तत्सबमकरोद्राजसत्तमः ॥८२॥ तेन ब्रंतप्रभावेण स्व॒राज्य प्रातवान्ुप१ ॥ हत्वा 'रेपून्‌ कुरुक्षेत्र 
स्वराज्यमलभन्व॒५ ॥<८श॥ इतैश्रीनारदीयपुर।णे कृष्णचतुर्थीसंकष्टहदरणपतित्रतकथा समात्ता ॥ 


अज्ञरकचतुर्थीब्तम्‌ ॥ 


ब्रतराज:४ । 


(5277 टीका 7 नर ट पाए: 60 /7202:0774त/ ५ कै ३7.77 57:75727 


च्च्‌ं श्र के 
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हक: कप गत 7 77507 082 ४7 50 70707 %700770:77 5 0:77:४:2 40:00, 770: 07/70/८57१ 














#ध्ाधावाधध्याधभधका 7 7४“ ऋऋइपच्ट्टट्चच्वच्व् नि 2 


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0/ ५४८०६: 





2 3०9५ अममम००तन 











हो तो दधि और एक किसी अन्नके पदाथका भोजन करे 


॥७०;; अथवा है पाण्डुनन्दन | ब्रतके दिन एकबार भोजन 

करके हो रहना चाहिये, प्रथ्डीपर शयन करे,क्रीधकौ आये 
कक, रे जे 

न दे एवम लोभ और दम्भकों पासभी न आने दे, उप- 


णका विधिपूत्रक आचाये रूपसे वरण करके पूजन करना 


च(हिये | इकीस त्राह्मणोंकों बख्र, अलड्डार और आशभूषण | 
॥७४॥ गो, झुवर्णदिल पू>+कर मोदकोंका भोजन कराना | 
चाहिये। एवम्‌ हवन करना चाहिये उसमें एक सहसतर | 
आठ, या एकसोी आठ ॥७५॥ या अठाईंस और इतनी भी | 
अक्ति न हो तो आठही आहुतियां बेदिक मन्न्रोंसि तिल | 
घू 5 कक 
पृतके द्वारा दूनी चाहिये. फिर सुवणकी दक्षिणा और गौ. | 
इविते, बखादि एब्र भूषण देकर सपत्नीक आजायेका' 
पेजन करना चाहिये॥ ७६ ॥ छत्ता, जूती, जोडा, छोटा | 


अश्रानपयाभााबंसार 





१ भाषसेतत । २ मत्रेरित्यथेः | मे सपर 


बद्ूथा ॥ कृतवीबपितोबाच ॥ अड्भरकचतुथ्यों च 


और मकान आदिभी आचायको दे, जिससे गणपतिजी 
प्रसन्न हों जायें, जो ब्रत तथा उद्यापन विधिपूर्वक करता है 
उसके ऊपर गणेशजी प्रसन्न हो जाते हे इसमें सन्देह नहीं 


जे ७ ई 4 भ््े 
५ ५. .:. -। है| जो तीन वर्षतक या एक वर्ष प्रतिप्तास करता है॥७०॥ 
स्करके साथ गणपतिकी प्रतिमाकोी आचायके छिये दे दे। पर ह्‌ 


॥ ७१ ॥ प्रतिमादानसे पहिले प्रतिम्ामें आवाहित देवताकी | 
कुछाका विसजन कर और कहे कि, हे सुर श्रेष्ठ | हे पर- | 
सेश्वर , आप अपने घधामको पधारें और इस ब्रतानुष्ठानसे | , है है पे गे 
प्रसन्न होकर यथोक्त फल्पद हों ॥ ७२॥ माघ बदि चतु- | * नार्थीकों धन; पुत्रार्थीको पुत्र और सुवासिनी ( ख्री ) क 
थींके दिल 8 करना 8 | उसके छिये गणपतिके | 
भक्त सदाचारों एवं समस्त शास्यॉके तत्त्वज्ञ | ७  म 

है मन शेर किक पल शक कदम व हैं और वे पुरुष प्रथिवीपर सुखी और सत्पुत्र; पात्र, घन 


अथवा जीवनपर्यन्त इस ब्रतको करता है उसके दुःख दरिः 
द्रता और सट्डूट कभीमी नहीं होते ।।७९॥ सँवत्सर बीवने- 
पर द्वादश ब्राह्मणॉंको भोजन करावे, विद्यार्थीको विद्या, 


सोभाग्य प्राप्त होता है ॥| ८०॥ और जो इस ब्बकी 
बा पू (5 २ 
कथाका श्रवण करते ह उनके मनोरथ अनायास पूर्ण होते 


एवं धान्यसे सम्पन्न होते हैं ॥|८१॥ भगवान्‌ बेद्व्यासजी 
राजा युधिष्ठिर्स ऐसा कहकर वहां ही अन्तर्धान होगये | 
चुपतिवर राजा युधिष्ठिरने यथोक्त विधिसे उस ब्रतको 
किया ॥ ८२॥ शजा युधिष्ठिर उस ब्रतके प्रभावसे अपने 
शत्रुओंको कुरुक्षत्रमे मारकर राज्यको प्राप्त हो गये ॥८३॥ 
यह श्रीनारदीय पुराणमं कही हुई कृष्णपक्षकी चतुर्थीके 
दिनकी सड्डृष्ट हरण गणपतिके ब्रतकी कथा समाप्त हुईं ॥ 


अज्भारकचतुर्थीके ब्रतकी कथा गणेशपुराणमें निरूपणकरी 


नीकमाचाय सुवर्णायः पूजयेत्तस्मे छत्रमुपानहो दुद्यादित्यन्वयः । 














ब्तानि, | ] ( १८९ ) 
विशेषोष़भिहितः छझुला।उत त्वं कृपया बहन भश्रयाववताय में ॥१॥ श्रण्बतो न च में तृप्तिगंजा- 
ननकथां शुभाम बह्मोवाच ॥ अद्वारकचत्॒ध्यास्ठु महिमान॑ महीकतेहर ८-०४ हि नो भूत्वा 





कथयामि तंवाग्रतः॥ अवन्तीनगरे राजन्‌ भारदाजों महाझुमनिः ॥ हे !! प्रो ० पविम्धाक 

सर्वशाख्विशारदः ॥ अशभिदहोत्ररतों नित्य शिष्याध्यापनतत्परः ॥ ४ ४ बदीतीर गतसि्लिछलन्न- 

नुष्ठानरतों सनिः ॥ अकस्मात्कामिनीं दृष्डा कामाए सोउर धस्लुनिः ॥५७ छामबाणाधिनुतः सन्नि 

पपात महीतले ॥ अतिविहलगात्रस्य तस्य रेतस्तदास्खलत ॥६॥ पंविष्ठट तस्य चद्नेतः प्थिवी- 

बिलमध्यतः ॥ तत एक; कुमारोपूज्नपाकुमुम सब्रियः त॑ धरित्री सनहवशात्यालथामास 
4 हर कु 


। 
सादरम ॥ जलुः स्व॑ तेन धन्य सा महुते पितरों छुलमू ॥ ८ ॥ ततः से सतववेंसता पम्रच्छ 
। 


हो | 


हे 


2] 


् 


जननीं निजाम्‌ ॥ मयि लोहितिमा कश्माम्मातु्ष देहमास्थिते ॥ ९ ॥ कश्व णें जनको मात- 
स्तन्ममाचक्ष्व साप्तम ॥ घरोबाच ४ भारद्ाजसुन रेतः स्खलित मयि सद्भतन। ततो 
जातो$सि रे पुत्र वर्धितोईसि मया शुभम्‌ ॥ सूत उवाच ॥ तहिं सल॑ में मानें मातदशेयस्व तपो- 
निधिम ॥ ११ ॥ ब्रह्मोबाच ॥ तमादाय तदा देवी भारहाजं जगाम हु।। उवाब गजिप्त्यन 
त्वद्वीयप्रमव खुतम ॥ १२ ॥ वर्धितं ते पुरोधाय स्वीकृशष्व छजेपडुना॥ तदाज्ञया ययो धादी 
स्वधाम रुचिर तदा ॥ १३ ॥ मारद्ाजः छुतं॑ लच्च्चा मुछदे चालिलिढ़ तम्‌ ॥ आफ्राय शिर 
उत्सड़े स्थापयामास त॑ मदद ॥ १४ ॥ सुझृहूर्ते झ॒ुमे लग्ने चकारोपनय झुतिः ४ बेदशाखाण्यु- 
पाशिक्ष्य गणेशघ्य मल शुभम्‌ ॥ २५॥ उदवाच ऊुतल॒छान गणेशनीतये विरम्‌ ॥ सब्त॒ष्टो 
दास्यते कामान्‌ स्वोस्तव मनोगतान ॥ १६ ॥ ततो मन्दांहिनीतीरे पद्मासनगतों झुनिः 0 





2 


सरा झरीर ही ऐसा छाऊ क्यों हो गया | ९ | है सातः 

पिताका क्‍या नाम है, अब यह सब मुझसे कहो, उथि- 
वीने उत्तर दिया कि, भारद्वार मुनिक्ा वीये गिरकर मेरेसे 
रुक गया ॥१०। उसीस तुम्हारी उत्पत्ति हुई हैं, हे एुत्र | 





है कि,क्ृववीय राजाकेपितान ब्रह्म:जीसे पूछा कि; है ऋह्मन 
और चतुर्थीके त्रतोंकी अपेक्षा मंगलवारी चतुर्थीके दिन बत] 
करनेका माहात्म्य अधिक क्‍यों कहा है, उसे आप अत्यन्त 
प्रणत मुझको कृपा करके कहों ॥ १ ॥ गणेशजीकी पवित्र 
कथाओंक सननेसे मेरा चित्त ठृप्त नहीं हरेता | यह छुन 
ब्ह्माजीने उत्तर दिया कि, है महीपते | अगारकचतुर्थीकी | मेने तुम्हारी अच्छी तरह पाछना की,जिएसे टुम इतने वडे 





//५ 


महिमाको  २॥ तुम समाहित चित्त होकर सुनो में तुमारे | हो गये। सूदजी कहते हैं कि, यह सुन पुत्र योढा कि, यदि 
सम्मुख कहवा हूं !उज्यिनी नगरीमें महामुनि भारद्वाज | ऐसे ही मेरा जन्म हुआ है तो है प्रातः : मुझको उत्त से 
रहते थे।।१॥ वे बेद और वेदाज्ञोंके परिज्ञाता,मीमांसाउडदि | स्माओंके दर्शन करा दे ॥। १९ ॥ जह्म.जी बोले कि; फिर 
समस्त शाखोंके तत्त्ववेत्ता, नित्य अग्निहोत्र करनेवाले और + परथ्चिवीदेवी इस वाहुककों सा« छेकर महाउुनि सारदाजके 
शिष्योंको बेद्‌ पढानसें परतयण थ बच सुलि किसी ' श्रसमें गयी ओर उनको प्रणाद इब्के बोली ि, यह 
समय नदीके किनारे बैठा हुआ अपना चेत्यिक एवं चेसि- | आपके बीयस उत्पन्न हुआ झापका पत्र है ॥ १२ 

त्तिक अनुष्ठान कर रहाथा; वहांपर अकस्मात्‌ आयी हुईं एक | इतने समयतक इसझी पाडना की;अब आपके सम्रीप छायी 
सुन्दरीको देखकर कामासक्त हो गयात। फिर कामदेवके * हूं, आप इसको अज्ीकार करो | महाजुल्िकी आज्ञा छेकर 
. बाणोंस पीडित होऋर धरतीपर गिर पढ़े और जब वे | प्रश्चिवी अपने स्थानकों चछी गयी ॥। १३  मुलि 


अत्यन्त मूढ होगये तब उन महात्माजी हा वीय भी स्खलित | उस वाछकके सिडनेसे वहुत प्रश्नन्न हुए उस बाछऋका त्राण 


होगया ॥६॥ उत्तका वह वीये घरणीक बिलसें चछा गया, | एवम्‌ आलिंगन करके आतनन्‍्दस गोदमें बिठः खछिया।२४) 


इससे एक कुमार उत्पन्न हुआ, उसकी आकृति जपापुप्पके | फिर शुभ मुहूर्त एवे. शुभ छम्ममें उन्होंने उसका उग्लयंन 


सम्तान छारू थी प्रथिवीने वड ही स्नेहसे उसकी | संस्कार कराकर उस वदशाख पढाये झपैर ध्ट 
पालना की और उस बालकके उत्पन्न होनेसे उसने अपने | जप करनेकी आज्ञा दी ॥ कि है तात ! हु मणेश- 


म और मातवापिता और कुछको धन्य माना | ८ ॥ जब । ज्ीफे इस संत्रका जप करों, जिसस गण तित्री प्रसन्न 


वह बालक सात वर्षका हो गया. तब उसने अपनी मातासे | मुनि 


| होकर तुम्हारे सब सनोरथ पूण करेंगे ॥! १६ 
पूछा कि में सी जब और मनुष्योंके समान मनुष्य हूं, तब । भारद्वाज की ऐसी आज्ञा होतेही वह बारूक सुनित्रत 











ट्यक- 2! 


१ समासतः । २ ततः स नमंदा इत्यपि पाठः । 


[ चहुर्थी- 


( १९० ) किक: /5 अमन शिफिशिफि शीश 






संनियम्येन्द्रियाण्पाश ध्यायन्‌ हेरम्बमन्तरे ॥१७॥ जजाप परम मन्त्र वायुभक्षो रूशं कूशः ॥ 
एवं वर्षसहस्र॑ स तपस्तेपे सुदारुणम्‌ ॥ १८ ॥ माघक्र॒ष्णचठ॒थ्या तझुदय शंशिनः शुभे॥ 
दर्शयामास स्व रूपं गणनाथोउथ दिग्छुजम्‌ ॥ १९ ॥ दिव्याम्बर भालचन्द्रं नानायुधलसत्क- 
रम्‌ ॥ चारुगुण्ड लस॒इन्तं झूर्पकर्ण सकुण्डलम्‌ ॥ २० ॥ सू्यक्रोटिमतीकाशं नानालंकारमण्डि 
तम्‌ ॥ ददर्श रूप देवस्थ स बालः पुरतः स्थितम्‌ ॥ २१ ॥ उत्थाय मणिपत्थेन॑ तुष्ठावब जगदी- 
श्वरम ॥ नमस्ते विन्ननाशाय नमस्ते विज्नकारिण ॥ २२ ॥ सुरासुराणामीशाय सवबशक्त्युपबू- 
हिणे॥ निरामयश्य नित्याय निुणाय गुणल्छिद ॥ २३ ॥ नमो बहाविदां श्रेष्ठ स्थितिसंहार- 
कारिणे ॥ नमस्ते जगदाघार नमखेलोक्यपालक ॥२०॥ बह्ाादये बरहाविदे बह्यणे ब्रह्मरूपिणे॥ 
लक्ष्यालक्ष्यय्वरूपाय दुलेक्ष गश्छिदे नमः ॥ २५ ॥ नमः श्रीगणनाथाय परेशाय नमो नमः॥ 
इति स्तुतः प्रसब्नात्मा परमात्मा गजाननः ॥ २६॥ उद्याच ख़ुक्ष्ण्या वाचा बालक संप्रहषे- 
यन्‌ !! गजानन उबाच ॥ तवोग्रतप्सा तुष्टो मकत्या स्तुत्यानयापि थे ॥ २७ ॥ बालभावेषपि 
घेयाते दद्ामि वाब्छितान्वरशन्‌॥ एवमक्तो भूमिपुत्तो बच ऊचे गजाननम ॥२८॥ मोम उवाच 
धन्या दृष्टिजननमपि में दशनातसे सुरेश धन ज्ञान कुलमापि तथा भू! सशेलाद धन्या ॥ धन्य 


चेतत्सकलमपि तपो येन इृष्छोएइसि चश्नधेत्या वाणी वसतिरपि या संस्तुतों मूठटभावात्‌ ॥ २९॥ 


यदि ठुष्टोशसे देवेश स्वर्गे भवतु में स्थितिः ॥ 


कल्याणकारि में 


धारण कर गंगाजीके ६ पाठान्तरके अनुसार नम्पदाके ) | 


माघ बदि चतुर्थीमे चन्द्रमाके निम्मेछ उदय होतेही गणेश- 
उस भारद्वाजझ्निक पुत्र-दिव्य वल्यधारी, माल घन्द्र,नाना- 


सान, सुन्दर दुन्त एवम शूपसहश सुन्दर कुण्डछ मण्डित 
कानवाछे ॥२५॥ कोटि सूर्योक समान दीप्यमान, नानाड 
लक्षारोंस मण्डित गणशजीके उस स्वरूपको देखकर।।२१॥ 
खड़े हुय और उन जगदीश्वर गणपतिदेवकी स्तुत्ति करने 
लगे कि;हे प्रभो ! आप विज्नोंका नाश करनेवाले हो आपके 
लिये नमरकार है,आपहीविद्नोंके करनेवाले हो आपके लिये 
नमरकार हूँ ॥२२॥ देवता एवं देत्योंक अधिपति, समस्त- 


रा लत तुम ३ करोगे के क 

बेंधनके हेतुभूत गुणोंके छेदनकारी आप हैं. आपके छिये 

प्रणाम हैं ।।२३॥| है अह्यवेत्ताओंम ओेठ ! आप सबका पाछन 
न पी चक कु हि 

और संहार करनेवाले हैं आपके डिये प्रणाम है, हे जगदा- 


आपके लिये तमरकार हें २४॥ बह्माके भी पृव॑चत्ती, ब्रह्म 
( वेद ) के वत्ता, ऋ्म अपर अहयस ह 








बरूप आपके लिये नम-।| 


अमृत पातामिच्छामि देबः सह गजानन ॥३०॥ 


नाम ख्यातिमेतु जगन्नये ॥ दर्शन में चतुथ्यों ते जात॑ पुण्यप्रदं विभो॥ ३१॥ 


| स्कार है और जिनका स्वरूप छक्ष्य होते हुए भी पारः 
तटपर अपनी इन्द्रियोंकों बशझें कर हृदयमें गणपतिका। मार्थिक रूपसे अलक्ष्य हे ऐसे आपके छिये नमस्कार; कुल- 
हक आ न पलट जीप क कक भजक ५... 3. | क्षणोंके दोषकों मिटानेवाल्ले आपके छिये नमस्कारहे॥२५॥ 
एक सहस्र वर्ष पच्येन्त केवल वायु भक्षण करनेके कारण |, जेजलीके डिये प्रणाम है $रकें छिये बारम्घार 
दुवढा होकर भी घोर तपश्वर्यामें तत्पर रहा । १८ ॥ फिर |. जे डिय शणास है, परम इंवरक | 

| प्रणाम हूं। इस प्रकार स्तुति कपनेसे परमात्मा गणपतिदेव 
जीने अपने अष्टमुजी स्व॒रूपके उस दर्शन दिये।॥१९॥ फिर | प्रसन्न होकर॥२६॥स्निग्धवाणीसेड्स बालकको प्रसन्नकरते 
| हए बोछे कि, तुम्हारी उम्रतपश्चर्या, परमभक्ति तथा इस 
विध शख््रोंस विभूषित हस्तवाले, सुन्दर शुण्डस शोभाय- | स्तुतिस में परम सनन्‍्तुष्ट हैँ ॥२७॥ तुमने बारूक होकर भी 
| इतना घेय रखा,इससे में तुम्हें वांछित वरदान करता हू। 
| एस जब गणपति वरदान करने उद्यत हुए, तब भूमिनन्दून 
| गणशजीस बोछा ॥२८॥ कि,हे देवाधिराज ! आज आपके 
| दशन करनेसे मरे नेत्र और जन्म क्ृताथ हैं ज्ञान, मेरे कुछ, 
| एवं पर्वेतमालित्री प्रथिवी भी कृचार्थ है मरा यह सब तप 
| भी सफल है, जिन नेन्नोंस मेन दशन किये और जिस 
हे | वाणी से सेल स्तुति की वे नेत्र और वह बाणीभी जाजघन्य 
झरक्तियोंसे सम्पन्न, निरामच; नित्य, निगुंग और संसार | है मेरी यह वासभूमिसी धन्य है, जहांपर मेने मूढ होकर 
| भी आपकी स्तुति की ॥२९॥ हे देवेश यदि आप मुझपर 
| प्रसन्न हुए हैं तो है गजानन ! मेरा निवास स्वरगंमं हो मे 
एक लक कि | देवक्ाओंके साथ अम्ृतपान करना चाहता हूं ।| ३० ॥ मेरा 
लिये अणान हैँ। है त्रिछोकीकी रक्षा करनेवाले | नाम तीनों सुबनोंमें कल्याण करनेबाछा, थानी संगरछ 
| विख्यात हो । हे प्रभो ! मेने आपके पुण्यप्रद दशन 


आज ( माघ वदि ) चतुर्थीके दित किये हैँ॥ ३११॥ 


१शशिनोमले इत्यपि पाठ: । 







प्रतानि, भाषाटीकासमेलः ( १९१ ) 





 कच 


पा पुण्यदा नित्य सबंस जी ॥ छामदा बलकतलना त्वत्मलाइात्खुस्खर ॥ श२ ॥ 
गजानन उवाच ॥ अमृत॑ भाप्य्यसे सम्पगदेवेः सह चराछुत ॥ एहुछेते च नाब्ना त्व लोक 
र्यातिं गमिष्यसि ॥ ३३ ॥ अड्जारकाति रचत्वादसुमत्या यता छुटा! अड्गरह्चचलुथों ये 
करिष्यन्ति नरा झुबि॥ ३७४ ॥ लतेबस्मन्‍इनई पण्यं सड़ष्टीक्रतलसम्भवम्‌ :देजिशना सर्वकार्यें 
अवन्लीनगरे राजा भविष्यले परवत्तप३ ॥ शतानासुलम यस्‍मात्‌ 








भविष्यति न संशयः ॥३५ 
कूत॑ ते ऋतसुसमय ॥ १९ ॥ यस्य सड़ीतेबानमरत्यः सदझामानदास्डयतत ४ उद्चोटाःय॥ इति 
दत्वा वरान्देबोप््तर्दंधे द्विरदानन$ ॥ २७ ॥ ततसठु मडलो देव स्थापायेत्वा छयत्नतर ॥ झुण्डा- 
मुख दशभुजं सर्वावयवसुन्दरम्‌ ॥ ३े८ ॥ भमाउाद कारयामास गजाननऊुदाबहम्‌ । सर्भा मड़- 
लमूताति देवदेवस्य सोएपकरोत ॥ ३५ ॥ ततोः़्मवत्कामदात कोने सबेजनस्य तत्‌॥ अठुछानात्‌ 
पूजनाञ दर्शनात्सर्वभोक्षद॒म्‌ ॥ ४० ॥ ततो विवायकों देदोी विभानवरसत्तमम्‌ ॥ जेषयामास 
स्वगणान्भौममानेतुमा्तिके ॥४१॥ ते गत्दा तेन देहेन ( ल॑) मौममानयव्‌ बलात ॥ गणेशस्या 
निति्क राज॑स्तददभुतानिवाभवत्‌ ॥ ४२ ॥ तलो बोसोपमवत्ख्य'लस्ेलोक््ये सचराचरे ॥ यतो 
भौसेन संकष्ठचतुर्थी मौमउंथुताम्‌ ॥ ४३ ॥ कृत्वा ऋआधं यथा स्व सुधापानं रे! रूह ॥ अत- 
श्राड्रारकयुलता चतुर्थी प्रथिता जुवि ॥ विंल्तिलार्थश्रदानेद चखित्लामजिरिति अथातु 

प्रयातो मडुलमूतिः सर्वालुम्रहकारकः ॥ ४५ ४ पारिनेरादु नशरात्यश्वेस मयथितेसबत ॥ 
चिन्तामाणिरोते रखयालः आवेधिप्ननिदारणा ह ४६) अत ( खू-+<5६ इृज्यते ले विधू- 
दय ॥ ददाति वाड्छितानर्थान्‌ पुत्रपोत्रादिसंपदः ॥ ४७ ॥ इंले श्रीगणेशपुराणे बह्कृतवीये- 
पित॒संवादे अद्जारकचतुर्थीत्रतकथा सम्पू्णो ॥ इति चंठुर्थीत्रता 


अर फापाणन, 
अन्वियपकार मार, 


बन... ऋवशाता॥ 0 आाब 


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| पूर्ण करनेवालः और भजुछ्ठान, पूजन और दशेन करतेसे 
हो | इस दिन आपका जो कोई ब्रव करे हे सुरंध्वर ! | सबके लिय मोक्षत्रद होगया | ४० ।॥ फिर विन्ननायक 
उसकी समस्त कामना आपकी झृपासे पूर्ण हों ॥ ३९ ॥ | देवन सुन्दर विमानपर चढकर धरासुतकों अपने पास 
गणेशजी बोले कि, हे मूमितन्दन ! तुम अनायास देबता- | बुछानेके छिय अपने गणोंको उब्के समीप भेजा ॥ ४१॥ 
ओके साथ अमृत पान करोगे, तुम्हारा मज्गलऊ नाम सब | वे उसी मनुष्य शरीरसे मूमितन्दनको जबरदस्ती गणेश- 


जगत विख्यात होगा ॥ ३३॥ प्रथिवीके तुम पुत्र हो | जीक समीप के आये, हे राजन ! मनुप्यशरीरसे ज्वगं प्राप्त 


५ हो के ञअ्‌ ॥ 
तुम्हारा रेंग छाछ है इससे “ अज्भारक ? यह नामभी | करना अभूतयूव चरित हुआ ॥ ५२ ॥ इससे भूमिपुत्र, चर 


तुम्हारा होगा और यह अज्ञारक चतुर्थी नामसे विख्यात | अचर सहित तीनों छोकॉमें प्रसिद्ध होगया, भौसने भौम 
होगी, भूपर जो नर इस दिन मेरा ब्रव करेंगे ।३४॥ डत्को | बारी सकट चढुर्थी ॥ ४३ | करके जैस देवोंके साथ अम्र॒त 
एक व पर्यन्व चतुथीत्रतके करनेका फछ सिल्गा। उनके | पिया, उसीसे यह अगारक चतुर्थीके नाससे सूपर प्रसिद्ध 
सभी काये भें मिविन्नता होगी, इसमें सन्देद नहीं है ॥३०५॥ | उईं || ४४ ॥ एवम्‌ चिन्तित जथको देनेंक कारण इसका 
अवन्ती नगरमे तुम परन्तपनामक राजा होगे.क्योंकि तुमने | स्लन्‍्तामणि भी माम हुआ, सबपर कृपा करनेवाले मंगल 


ब्रतोंमेंके उत्तम इस ब्रतको किया हैं ॥ ३६ ॥ यह ब्रत एंसा | ज्रूर्ति यणेश जाकर ॥ ४५ | परिनेरनगरखे पश्चिममें असिद्ध 


है कि जिसके कोतेव करनस मनुष्यक सब काम पूझ होते | हुए,यह चिन्तामणि करके प्रसिद्ध हे सभी विन्नोंके नष्ट कर- 


हैं। ब्रह्माजी बोले कि; इस अकार गजनन दुव बर दुकर | भ्वाली हैं !!४६॥ इसी कारण सि गन्धवाोंदि सब चन्द्र- 
अन्तहित हो गये | ३७ | धरानन्दून मद्भछने शुण्डादुण्ड- । माके उदयमें इस का पूजन करते ह । यह सत्तो ऋामनाओंको 
वाले दशभुज,सर्वाज्ञ घुन्दर गणपति दृवका वत्न[तक सता । पूरा करती है तथा पुत्र पौत्रादि समद्धियोंकों देती है।।8७॥ 
पन््‌ करके || ३८ ॥ एक आनन्द वधक सन्दिर बनवाया । यह श्रीगगेशपुराणकी कही हुई अंगारक चतुर्थीके ब्र॒तकी 


उस मूर्तिका नाम “ संगलमूति ” रखदिया | ३५ ।॥ वहें | 
समंस्त अवन्तिदेश (उज्जयिनी राज्यमर) सभीकी कामना | कथी पूरी हुईं | यहांही चतुर्थीक ब्रतभी पूरे होजाते है 


इससे यह चतुर्थी नित्य पुण्य देनेवाली एवम्‌ सड्क॑टहारिणी 









१ सदाइस्तुचेत्यापि पोठः 





ब्तराजर । 


दर 2#मक् पा प0इ 8274 (2 कप 0५३8 ५00५४ ४220: 5080: 27/20200 70075 थे 2५6 श 8४/7३/0६2६, 79070 /0,/8/ //0/520//07%20 68 
4६ ४03:२४2 8४84 0४ १३५२८ कौर आह १:27 कक जे 0३४45: # / 0४ 70 5 48४88 64800 के: ७4००४ ५७३ 80 25047 708 0000 6406 %१8/४/४६८/९५२४४३ ५०५०: ५०८ ५७५२६ 


अथ पतञ्चमीबतानि ॥ 
हरि पूजवस ॥ 

अथ चैत्रशुक्नपमी कल्पादिः ॥ तड़॒क्त हेमाद़ी मात्त्ये--अह्णों या द्निस्थादि! कल्पादिः 
सा प्रछ्ीलिता ॥ वशाखस्य ततीयाया!! कृष्णय४ फाल्शुनस्थ थे ॥ पश्चमी चत्रणाससु्य तस्ये- 
वास्या तथा परा | तस्वेद चेहस्पेव | परा कल्पादिरितयी ॥ झुका तयोदशी माथे कातिकस्य तु 
सप्तमी ॥ नवमीमार्गशीरष स्‍्थ सप्तेताः संस्मराम्यहम्‌ ॥ कल्पानामादयों छोता दत्तस्याक्षयका- 
रिकाः ॥ अध्यां दोलोत्सवः कार्यः ॥ तद॒क्तम्‌--चेत्र मासि सिते पक्षे पश्चम्यां पूजयेद्धरिम॥ 
तत्र दोलोत्सवं ऊर्यात्पुष्पधूपेश्व पूजयेत्‌ ॥ नारी नरो वा राजेन्द्र सन्तप्य पितृदेवताः ॥ ख्ूकू- 
चन्द्दसमाएुक्तान आाह्मणाब मोजयेच्त॥ इति हेमादो मविष्ये ॥ अथ श्रावणशुक्क पथ मी, नाग- 
पूजायां परा--पंश्चमी नागपृजायां कार्यों पष्ठीसमन्विता। तस्याँ ठु ठाबिता नागा इतरा स- 
चतुथिशा ॥ अन्रेव अभासखझण्डोक्ते सपाविषापह पंचमीत्रतम्‌ ॥ इश्वर उदाच ॥ आवशे मासति 
पश्चम्यां शुबलपक्षे वरानने ॥ द्वारस्योभयतो लेख्या गोमयेन डिषोल्व॑णा: | पृतोदकाभ्यां पयसा 
स्ापायित्श। बरानने | गोबूमः पयसा चेव लाजेश्व विविषेश्तथा। पूजयोद्रथिवदेवि दर्िदूर्वा 
डकुरेः ऋमात्‌ ॥ गन्धपुष्पोपहारेश्व आह्णानां च तर्पणम्‌॥ अथवा आधवणे मासिे पश्चम्यां 
अ्रद्धबात्रितः ॥ यश्वालेख्य नरो नागान कृष्णवर्णादिवर्णकेः | गुरुकरूपांस्तथा वीथ्यां - स्वग॒हे 
वा पटे बुधः ॥ पूजयेद्रन्धधूपश्व पयसा पायसेन च ॥ तस्य तुष्टि समायाम्ति पद्मकास्तक्षका- 
दूयः ॥ आसततमात्कुले तश्य न भय नागतो भवेत्‌ ॥ दिवारात्रों नरे! कार्य मेदिनीखनन न हि॥ 





मम्तोउ्यमुच्यते सपंविषस्य पंतिवेधक/तस्य प्रजपमान्नेण न विष ऋमते सदा ॥ % कुकुहं हुं 
फर्ट्स्वाहा॥इत्यव कथित दबि नागब्रतमठुत्तमम॥यच्छृत्था च पठित्वा च झुच्यते सर्वपातकेंः॥ 


गा ००० 3 ७0७७७ 








पञ्चमी व्रतानि ॥ 

अब पंचमी ब्रतोंकों कहते हैं-उन्तमें चेत्र शुक्ल पचमी 
कल्पके आदिकी तिथि कहीं गई है, यह हेमाद्रि ग्रम्थमे 
मत्म्य पुराणसे कहा है कि, अह्माके दिनके आदिकी जो 
तिथि हैं उस कल्पादि तिथि ऋहते हैं, ये सात हैं, १-बेशाख 
शुद्वा तृतीया, *-फारगुन कृष्णा तृतीया, ३-चैन्र शुक्ला 
पेचत्ती ,४-चेन्र कृष्णा पंचसी, "-माघशुक्का त्रयोदशी, 
६ कारक शुक्रासप्रसी, ७-मागशीष शुक्वा नवमी । ज्ोकर्म 
जो “तस्येव” पद्‌ आया है इश्चका प्रन्थकार अर्थ करते हैं 
कि, उस चेन्रकी परा दूसरी पंचमी भी कल्पादि है यात्री 


चेत्रकी दोजों ही पंचमी कल्शदि हैँ | जेसा कि, हम. 


पहिले ही गिवाचुडे हैं, इन सातों तिथियोंधें जो दान दिया 
जाता हैँ उसका अक्षय फछ होता हैं | इसमें भगवानके 
डोडेका उत्सव करना चाहिय, यह हेसादरिमि भविष्य पुरा- 
णको लेकर कहा हैं कि, चेन्र शुक्छा पंचमौको सगवानका 
पूजन करना चाहिये फिर डोछका उत्सद करना चाहिये 
फूछ आर घूपसे सगवानका पूजन करना चाहिये, हे राजे- 
नद्र्‌ स्री हा अथवा पुरुष हो पितृगण' और देवताओं का 
दपषण करके सका पहिन और चन्दन छूगाये हुए आ्ाह्मगों को 
भाजत कराता चाहिय/इसीमें प्रभास खण्डका कहा हुआ 


९ इंद्मेव नागपंचमीखेन 





+27]%: भाप: 27272... "बए4अन्या, 
.>ह:" मत! ना आा८०-7०९२२०फाकम एए 2:4० ०८००] ८25%07/0ल्‍च१%*तानदास्४दछप्ददघशदप परज जन एम; १0 
है. 


हत्य छोकाः कुबतीति प्रतिआति 





-धुदरप्मथबदाक्रतमणपाशकटाधत॥ मादा काया छहतमकगतान>न प्लान हा १०७ जन मच एप 2080१: एफ 0+ादादएभााााकादय 


सर्पोके विषको नाश करनेवाछा' पंचमीका ब्रत -होता है 
शिवजी कहते हैं कि, हे वरानने | श्रावण मासकी शुक्ला 
उवमीके दिन द्वारके दोनों ओर गोमयसे ऐसे सर्प काइने 
चाहिय जिनसे व्रिष परिस्फुट दीखें,हे वरानने ! घृत, उद्क 
और दूधसे स्वान कराकर गो घू७ पय और छाजोंसे तथा 
अन्य वस्तुओंसे हे देवि ! दधि और दूब अकुरोंसे 'ऋमसे 
तिविवत्‌ पूजन करना, है देवि! फिर गनन्‍्ध पुष्प ओर 
उपहार से ब्राह्मणोंकों संतुष्ट करेअथवा श्रावणसुदि पं चमीके 
दिन जो बुद्धिमान मनुष्य श्रद्धासे काछे नीछे आदि विचित्र 
रंगवाले स्थूठ और छम्बी आक्ृतिवाले सर्पों क्ो,घरके किसी 
एक देशर्मे या अपने शयनादिक जो मुख्य घर हो उससमें 
अथवा वस्घपर छिखे गन; पुष्प, धूप, दूध और पायससे 
पूजित करे, उसके ऊपर पद्मक तक्षक आदि सब अ्रसन्न 
होते है यानी उस द्नि उत्तविधिसे नागपूजन करनेवाढा 
पद्मक तक्षक वासुक्षि प्रश्नति नागोंछा आशीर्वाद या उनकी 
कपाका पात्र बनजाताहें । सात पीढी तक उसे सर्पका भय 
नहीं होता श्रावणसुदी पंचप्री के दिन सू्यके रहते औरसूयके 
अस्तमे भूमिमें गद्ढा न करें।और “ओं कुकुछ हुँ फट्‌ स्वाहा" 
यह सन्त्र सर्पोकी विष बाधाको शान्त करनेवाछाहै,इसडिये 
का आराधन करनेवाढा सर्पोकी विषबाधा 


3 ना नि ; ] दा ] 
0070 भतिए 78 #क इनक कक 7523500 224: 08/77/0477 0 ६.१४ 


अब 087 5277 770 -:/क कब ।/: 5० कह ;कतशथ १ कं ज +ग कं है 








६ ई ) 
(7:१0४34१4६/ परे: धप हि 


002... शायर एटा एक. धाआायटश दा गाल 
' अबदहन्‍. आबहन्‍मर जी कमापनकाा कमए० ला उकाफा/0203 & गाव -पाा:ा किन. 





है. नी:५६३८) है: आहत 2५५२१, रंग 4 पर २0 (:₹] 2 





"कक 5:7खवटकफाउए 5 चट52 5, 


नागपश्चममी ॥ अथ भाद्रपदशुक्कषपश्चवम्यां नागपश्वमीत्रत हेमाद्ों प्रभासखण्डे। ईइवर उबाच॥ मासि 
भादपदे वापि शुक्पक्षे तु पश्चमी ॥ सा तु पुण्यतमा ओक्ता देवानामपि दुलेमा । कुंग्रोह्दादश- 
वषस्तु पश्चम्यां च वरानने ॥ चतुथ्यामकशुक्त तु तस्य नक्त प्रकीतितम ॥ भूरि चन्द्रमय नाग 
मथवा कंलघोतजम ॥ कृत्वा दाशहम्य वापि अथवा मुन्मय जिय!गझब्यमचयद्धक्तया नाग पश्च 
फणाभ्तम्‌ ॥ करवीर शतपत्रेज तिपुष्पेश्य पद्मके ॥ तथा गन्धादिधुपेश्ध पूजयेन्रागसुत्तमम।बाह्म- 
जान्मोजयत्पश्चमादघतपायसमोदके) ॥ अनन्त वासुकि शष पत्मे कम्बलमेव च ॥ तथा कर्कोटक॑ 
ग॑ नागमर्बतर तथा॥ धृतराष्ट शहपाल कालिय॑ तक्षकं तथा॥ पिड्ले च महानागं मासि 
मासि प्रकीर्तितँग॥ व्रतस्यान्ते पारण स्पात्क्षीसबराह्मणनोजनम्‌ ॥ सुबर्णनारनिष्पन्न नाग॑ दद्यात् 
गां तथा ॥ तथा वरस्याणि देयाति विप्रायामिततेजसे ॥ णवं संपूजयेन्नागानसदा भक्तया समन्वि-. 
त/विशेषतस्तु पश्चम्यां प्पसा पायसेत चोइलि प्रभासखण्डे नागपश्वमीत्रतम। अत्रैव नागर शत्रतम्‌ 
हेमादो भविष्योत्तरपुराणे ॥ छुमन्तुझबाच ॥ नागदष्टी नरो राजन प्ाप्य मृत्युं त्रजत्यथ:॥अधो 
गत्वा भवेत्सपों निविषो नात्र संशयः ॥ १ ॥ शतानीक उबाच ॥ नागदछ पिता यस्‍य बाता 
वा दुहिताषि च ॥ माता पुत्रो5थवा माया कतेव्य तद॒दस्व में ॥२॥ मोश्षाय तस्य विश्रेन्द्र दान 




















पीडित नहीं होता । ऐसे नागप्रश्वसी ब्र॒वंके माहात्म्यको इस ब्रतमें एक भार सुवणका नाग बनाता चाहिये, उसको 


सुनने या पढनेवाला समस्त पातकोंस छूट जावा हैं ॥भाद्र 
पद शुकह्लापब्मीको भी नागपञ्चमीका ब्रत होता हूँ | यह 


चौंदीका या सोनेका अथवा काठका या हे प्रिय | मिट्टीका 


३ शेष, ४ पद्म, ५ केबछ, ६ कर्कोटक, ७ अव्वतर, ८ '्ृत 
राष्ट्र, ९ शह्लपाछ, १० काछिय, ११ वक्षक, १९ पिज्ञलू य 


नागराजोंका पूजन कर। और एसही भाद्रपदादि अन्यान्य 


प्रधान रूपसे उच्चारण करता हुआ पूजन करे । ) ब्रतके 
अन्त पारणाकरें;ब्राह्मणोंकों दूध या दूधके पदाथ खिलाव, 


| मरनका दोष निवृत्त हो, है विभ्रवस्य 
| दान ब्रत या उपवासका मेरे छिये उपदेश करें यदि हो 





| त्रह्मवचेस्वी किसी त्राह्मणको दे देना चाहिये । उस दानके 
| साथ गो और वल्जोंको भी दे । और समीको चाहिये छि, 
हेमाद्वि अनन्‍्थमें प्रभास खण्डसे लेकर लिखा है । इंश्वर बोले | व इस प्रकार भक्ति परायण होकर नागराजोंका सबंदा 
कि; भाद॒पद्‌ मासके शुद्ध पक्षकी पच्चमी अत्यन्त श्रष्ठ कहो 
५ है गे गे है. 0 8 प्‌ | 
है, यह दृवताओंको भी दुलूम हैं | है सुन्द्रमुखवालो , इस | 
बारह बरस तक पश्चमीको करना चाहिय, इससे पहिली | 
चौथकी रावको एक वारही मोजन करना चाहिये, फिर | 


पूजन करें, विशेषरूयस शआ्ञावणसुदि ५ को नागराजोंका 
पूजन करे, दूध या दूधके पदार्थका भोग छगावे।इस प्रकार 
प्रभासखण्डमके नागपञ्चमीका ब्रत पूरा हुआ ॥ और इसी '* 
श्रावणपुदि पश्चमीमें नागदष्टब्रतभ्ी होता है | क्योंकि 


| हेमाद्रिम भविष्योत्तर पुराणका ऐसाही उद्देख मिलता हैं, ० 
ही पांच फणवाला नाग बनवाकर भक्तिभावके साथ उसका | 
पूजन करना चाहिये । इस उत्तम नागका पूजन कन्तेर। | 
शतपत्र, जाती और पद्म तथा गंधस छेकर धूप दीप आदि 
सबसे करना चाहिये । फिर ब्राह्मणोंको छुतयुक्त पायस | 
और मोदकोंका भोजन करावे | ओर १ अनन्त, रे वासुकि, 
| जाय, वो नारकी गतिको प्राप्त होता हैं, उत्त मर गतिकों नहीं 
| ग्राप्त होता,सपदष्ट प्राणी मरणके बाद प्रथम नरकमें गिरला 
द्वादश महानाग हैं, इनकी श्रावण आदि द्वादश. मासोमें | 
ऋ्रमसे पूजा करनी चाहिये ( यदि श्रावणमें नाग पूजन | 
करना हो तो “ अनन्ताय नमः, अनन्तमावाहयासि, भो | 

मन्‍त इहागच्छ इह सुस्थितो भव, व्वासचयामि” इत्यादि | 
वाक्यस अनन्तनामका प्रधान रूपसे प्रयोग करता हुआ | 
| क्या कत्तेव्य है यह मुझे बताइये ! || २॥ ऐसा कौनसा 
मासोंमें भी वासुकिय्रभृति ग्रागुक्त कम प्राप्त नामोंके नागों का | 


( किसी समय राजा शतानीकने- छुमन्तु मुनिसे पूछा कि, 
सर्प यदि किसीको डस छे ओर वह उस विषकी वेदना तल 
गतप्राण होजाय, तो उस सर्पेदंशस मत जन्तुकी कोनसी 
गति होती हैँ, आपके मुखस यह सुनना चाहता हूं। ) सुम्र - 
न्तुछ्ुनि बोले कि; है राजन्‌ ! सांपके डक छगनेसे जो मर 


है, फिर सपयोनिम्म जन्‍म लेता हैं, पर इस योनिमें जन्म 
लेकरभी अन्यान्य सर्पोकी तरह विषवाला काछा नाग नहीं 
होता; किन्तु बिना विषका होता हैं, इसमें सन्देह नहीं हे' 
। १ ॥ शवानीक बोछा-जिसके बाप, भाई, मा, बेटे या 

और प्रियबन्धुजनको सापने डस छिया हो, उसका 


दान; ब्रत या उपवास हैं, जिसके करनेस सपके डसनेसे 
आप कृपया उसी 


लिमकलि मलिक कि मिनी मल लिन लकी जलन जक नकक किक लकी जा अली लक अल आजम अजब बा कक न बभनननन॒ून१ मा 222७७४७७७७७७७४७४७८४"श""श"श//श/"/शशशशशशणशशणशणशणशशशणणणणएएए 


रत कर ४ सक 


? ब्रतमितिशेषः । 
२५ 


२ रूप्यमयम्‌ । ३ सोवणम्‌ । ४ यजोदिति शेषः | 


(१९४ ) बलराज | ः ः [ पश्चमी-« 





माप आशा का गत: 70 भर पा 'ह:३//ग 77% :आकषकर 7४९8! घटा 27 70 कट 7/07/00770070076: 77 77700 


ब्रतमुपोषणम्‌ ॥. वृहि मे द्विजशादूल यद्धवेत्तत्करो म्यहम्‌ ॥३॥ खुमन्तुरवाच ॥ उपोष्या पंश्चप्ी 
सम्यक नागानां बलवधिनी ॥ समकमेक यावच्च विधान श्वृणु भारत ॥ ४ ॥ समके सवत्परम ॥ 


कर 


उपोष्येति दिवामोजनाभावः । “ तस्याँ नक्तम्‌ इत्यग्ने नक्तोक्ते: ॥ मासि भाद्रपदे राजव्छकृ- 


पत्ते तु पश्मी॥ सापि पुण्यतमा मोक्ता आह्यासों गतिकाम्थया॥ 5॥| चतुर्थ्यामेकभक्त॑ च 
नस्यां नक्त म्रकीतितम्‌ ॥ कुर्षाच्चानद्रमसं नागमथवा कलघौतजम्‌ ॥ ६॥ में रोप्य चेत्यथेः॥ 
अथ दारुूमय भव्य मृन्मय वाप्यशक्तितः ॥ पथ्चम्यामचयजक्त्या ना।. पश्चफण तथा ॥ ७ ॥ 
करवीरेस्तथा पत्मेजीतिपुृष्पः खुगत्विभिः ॥ गंधधूपेश्व नेवेद्यः स्नाप्य क्षीरादिभिनेष ॥८॥ 
ब्राह्मणाव भोजयेत्पश्चाद्धृतपायसमोदकः ॥ अनन्त बाकि शुद्ध पद्म कबलमंत्र च ॥९॥ तथा 
कर्कोटक नाग नागमश्वतरं नृष॥ धृतराष्ट् -शब्बपाल कालिय॑ तक्षक तथा॥ ६० ।| पिड़ले च॑ 
तथा नाग॑ मासिमासि क्रमाद्मजेत्‌ ॥ पूजयित्वा भयत्नेन पश्चम्याँ नक्तअग्भवेत्‌ ॥ ११॥ एवं 
द्ादशकृत्वा वे मासि भाद्रपदे नृप ॥ वत्सरात्ते यथाशक्त्या अन्नदान॑ च कारयेव॥ १९॥ 
बआाहणानां यतीनां च नागालादिश्य भक्तित;॥ इतिहासविदें नाग काथ्वन र्नाचित्रितम्‌ ॥१९श॥ 
गां च दद्यात्सवत्सां वे सवोपस्‍्करसंयुताम्‌ ॥ दानकाले पठेदेतत्स्मरत्रारायर्ण विश्ुम्‌ ॥ १४॥ 
सर्वगं स्वेधातारमनन्तमप्राजितम्‌ ॥ ये केचिस्मे कुल्ले सर्पैंदेंद्ा: प्रात्ता ह्थोगतिम ॥ १५॥ 


ब्रतदानेन गोविन्द मुक्तिमाजो भवन्तु ते ॥ इत्युच्चायोक्षतेयक्त लितचनइनमिश्रितम्‌॥ १९॥ 
बाखुदेवाग्रतो भूष तोय॑ तोयेईथ निःक्षिपेत्‌ ॥ अनेन विधिना सर्वे ये मरिष्यन्ति वा मुता॥१०७॥ 













सकेगा तो करूंगा ॥ ३॥ सुमन्तु बोढे कि, है भारत : | कमछ, माछती, चमेंढी आदिके सु|न्धित पुष्प, घूप,दीपक, 
हक ै ए ७ ४. | 
जिस वषमें जिस किसीक बान्धव जतका सप दंश्स सरण | 


किसीके अल मधुरखीर एवं घृतके मोदकोंका निवदन करे॥ ८ ॥ ऐसे 
वास कर, 3. | खीर या मोदकोंका भोजन करावे | १ अनस्त, रे वासुकि, 


॥ ४ ॥ यहां मूठसे “* समकम्‌ ” इसका संबत्सर अथ है| हि 
और ;४ उपोष्या डे इसका अथ दिवा निराहार रहना है । । द्‌ शर्ट ४ पद, ५ कबढछ, ॥ ९ | द्‌ कृर्कोटक १ ४ अश्ववर 


क्‍योंकि, उस बतकी कथाके प्रसज्ञम आगे चलकर स्वये | < शवराष्ट्र, ५ शद्धंपाल, १० काहिय, ११ तक्षक ॥१०॥१९ 
सुमन्‍्तुमुनि कहेंगे कि, चौथको एक बार दिनमें ही भोजन | वा पिज्ञल इन नामोंके नागराजोंका महीने महीनेम पूजन 
करना रातको न करना ही इसका नक्त ब्रत कहा है; इससे | होना चाहिये, पंचमीके दिन इन्हें, प्रयत्वके साथ पूजकर 
प्रतीत होता है कि, पश्चमीके दिन दिनके ही सोजनका | रातको भोजन करना चाहिय ॥ ११॥ भाद्रपदसे प्रारंभ 
निषेध किया गया है,रातकों तो भोजन करना ही चाहिये। | करके इसी प्रकार बारह महीना करना चाहिये बष 
भादपद्‌ सुदि पञ्चमी तिथिको शास्त्रकारोंने अत्यन्त पवित्र | समाप्त होजानेके बाद अपनी शक्तिके अनुसार नागोंक 
5 । इसलिये अपने अभ्युद्यकी इच्छावाढे जन इसी | उद्देशसे ब्राह्मण और यवियोंकों भ क्तिके साथ अन्न दान 
तिथि व्रत करे || ५॥ त्रत करनेवाले मनुप्योंका कत्तेव्य | भी करना चाहिय ॥ १३ ॥ इतिहासके जाननेवाढेको 
हैं कि, वे त्रतके पहिे चतुर्थीक दिन एक बारही भोजन | रत्नजटित सोनेका नाग देना चाहिये ॥| १३ ॥ सब उप- 
करें ओर पत्चप्तीके दिन रात्रिकों एक भक्त ब्रत करें, उस | स्करके साथ बछडेवाली गाय देनी चाहिये; देतीवार नारा 
नागपूजनमें वह चान्द्रससी नागकी मूर्ति बनवानी चाहिये, | यण भगवानका स्मरण करवा हुआ कहे (के ॥१४॥ केवल 
पूजन करनेवाले विशेष सम्पन्न हों तो कछघोतज नागमूति | नारायण ही नहीं,किन्तु उनके इन गुणोंके साथ स्मरण करे 
हो ॥ ६॥ कछुधोतज सोनेकी तथा चान्द्रमस चाँदीकी | कि, सबैत्र व्यापक, सबके धारणा करनेवारे, जिसका अन्त 
कहाती हे । और सम्पत्तिका हास हो तो काष्ठ या मृत्ति- | नहीं हे ऐसे, किसीस न हासनेवाके भगवान्‌ हैं॥ “ जो 
काका ही नाग बनवा, वहः नाग सुन्दर ओर पांच फर्णोका | कोई मेरे कुछमें सॉपस काटे जाकर अधोगतिको प्राप्त 5 

बह; चाहिये। भादवा बदि पाँचेको भक्तिपूर्वक प्राणप्रति- | हैं॥ १५ ॥ हे गोविन्द्‌ ! वो मेरे इस ब्रत दानसे उससे 

के 302०० पक चाहिये।॥ ७ ॥ है राजन्‌ ! | उद्धार पाजायें ”” यह बोलकर अक्षतरोंस युक्त एब्रम्‌ लत 

उन छे चन्दन चढावे। करबीर, | चन्द्नस मिश्रित ॥ १६॥ पानीको है भूप | भगवानूक 





१ सहाभोज्य तु। २ तिकेति च पाठान्तरम्‌ । हर 


बतानि, ] भाषादीकासमेतः । (१९५ ) 








सर्पतस्तेषनियास्यन्ति स्वगोतिं नृपसत्तम ॥ ब्रती सर्वान्समुद्धत्य कुलजान कुछनन्दन ॥ १८ ॥ 
प्रयाति विष्णुसाद्निध्यं सेव्यमानोःप्सरोगणेः वित्तशाज्यविहीनों यः सवमेतत्फल लघ्लेत ॥ १९ ॥ 
नक्तेन भाकैसहिताः सितपञश्मीदु ये पूजयत्ति ४जगान्कुसमोपहारेः ॥ तेषां गरहेप्वभयदा हि 
भवन्ति सपी दर्पानिविता मणिमयूखविभासिताड्ा॥२०॥ इति नागदष्टपश्वमीद्तत मविष्योक्तम ॥ 
ऋषियश्चयमी ॥ अत्रेव ऋषिपशमीदत्रतम्‌ ॥ तन्च मध्याहव्यापिस्यां कायम ॥ तथा च माधवीये 
हारीतः--पूजाब्रतषु सवषु मध्याहृव्यापिनी तिथिः ॥ इति ॥ दिनद्वयें तब्यातों वा पूवावद्धायां 
कार्य युग्मवाक्यात्‌ ॥ प्राष्य भाद्रपदे मासि शुक्ृपक्षस्य पश्चमीम्‌ ॥तस्याँमध्याहसमये नद्यादौ 
विमले जले ॥ अपामागस्य काष्ठेश्व छ्ष्टोत्तशतोन्मिते! ॥ अथवा सप्तन्रिः कार्य दन्‍्तधावनमा- 
दितः ॥ वनस्पतिप्रार्थना----आयुबेल यश्ो वचेः प्रजा: पशुवसूनि च॥ बहा भज्ञां च मेधां च 
त्व नो देहि वनस्पते ॥ संप्राथ्यानेन मंत्रेण कुर्यादे दन्‍्तधावनम्‌ ॥ तत्र मत्र+--सुखदुर्ग श्थि- 
नाशाय दन्तानां च विशुद्धये ॥ छ्लीवनाय च गाजाणां कुर्वेहं दन्‍्तधावनम्‌ ॥ अनेन दन्तान स- 
शोध्य स्नायान्मृत्स्नानपूवकम्‌ ॥ ततो हहाकूर्च॑बिधिता पंचगव्यं संपाद्य प्राशयेव्‌ ॥ तल्चेत्थम- 
देशकालो संकीत्य शरीरशुद्धयर्थ बरह्यकूचहोमपूर्वक॑ पश्वगव्यप्राशनमहंकरिष्ये इति संकरप्य 
ताम्रादिपात्रे गायत्या गोसूत्रम । गन्धद्वारेति गोमयम्‌ । आप्यायस्वेतिक्षीरम्‌। दधिक्राव्ण 
इति दधि | शुक्रमसि ज्योतिरसीत्याज्यमादाय देवस्यत्वेति कुशोदर्क अश्िप्य अणवनालोड्य 
यज्ञियकाछ्ठेन तेनेव निर्मेध्य भ्णवेनाभिमंत्य सप्तपत्रहरितेः कुशेः पंचगव्यमुद्धत्य इरावतीति 
पृथिव्य०इद विष्णुरिति विष्णवे० मानस्तोके इति रूद्राय० बह्ामजज्ञानमिति बरहमणे* अम्रयेस्वा- 


सामने पानीमें डालदें । जो मर गये, अथवा जो मरेंगे इस | भाद्रपद महीनाकी शुक्ृपक्षकों पंचमी आजाने पर मध्या- 
आप २. है. कह मिथ» कर न] 3] ५9 

. विधिसे ॥१७। है श्रेष्ठ राजन्‌ ! बे सब सपके काटे हुए | हके समयमें नदी आदिकके विशुद्ध पानीसें स्नान करके 

स्वर्गको चले जाते हैं, हे कुर नन्दन ! वो त्रती, अपने सब | ओंगाकी एकसौ आठ अथवा सात दांतुन छेकर एक एकसे 


के || १८ ॥ अप्सराओंसे सेवित। ._. के ५ 
कुटुम्बियोंका रद्धार करके ॥ १८ ॥ अप्सर | दांतुन करनी चाहिये । करते सम्रय, हे वनस्पते ! आयु, 


हुआ विप्णु भगवानके समीप चढा जाता है जो इसके कर- | कल आह लि 
नेमें धनका छोभ नहीं करता वही इसके सारे फछको पाता | ही वे वे न ल 4 पे मिशन कक 
हैं ॥ १९॥ जो चतुर्थीको राव भोजन छोड भक्तिके साथ | नि पहिर ही वनस्पतिको प्राथना करनी चाहिये, 
शुक्षा पंचमीको फूछ और सेटसे नागोंका पूजन करते हैं पीछ दूतुन लय चाहिये । अर समय के कहना 
उनके घरमें विषके अभिमानी एवम्‌ मणियोंकी किरणोंस | "रहिये कि। सुखको दुगनन्‍्धके नाशक डिये, दातोंको शुद्धिके 
री ५ १ छर | लिये तथा गाज्रोंक्रे छीवनके छिये में दनत धावन करवा हूँ 
चसकते हुए शरीरवाले सॉप भी कभी भय उत्पन्न नहीं कर |__- गे मा विधिसे (ं कक ! 
सकते ॥२०॥ यह नाग दृष्ट पंचमीके ब्रतकी कथा पूरी हुईं॥ | ३ पीर्ठ त्रह्मकेंच विधिस पचगव्य तयार हरक उसका 
ऋषि पंचमी-का ब्रतभी भाद्रपद शुक्त पंचमीके दिल | न करना चा हिय, वो इस प्रकारसे होता है, देश 
ता है की कि, मध्याह् | “लकी कहकर शरीरकी शुद्धिके लिये अह्मकूच होमके 
होता है, यह ब्रत तब करना चाहिये जब कि, ह्ने | कस बा या सके आकर 
व्यापिनी तिथि हो | ऐसा ही माधवीय अन्य हारीतका | 0 हक सदर कक कल विवश मलिक स 0९ किक 
बचत है कि, सभी पूजा त्तोंमें मध्याहव्यापिनी तिथि | भादिके पात्में गायत्रीसे गो गोमूत्र, “ गन्धद्वाराम्‌'” इससे 
है नल आ किक है पूबे | गोमय, “ आप्यायस्व ” इससे दूध तथा “ दघिक्राव्ण ? 
लेनी चाहिये । यदि दो दिन मध्याह् व्यापिनी हो तो पूव- | है 


म ३, 
थे ५ _ ५ | इससे दृही ओर “शुक्रमसि” इससे आज्य छेकर “ देवस्य 
विद्धा ही लेनी, क्यों कि, दो वाक्य ऐसे ही मिलते हे ह | व्वा” इससे कुशका पानी डाछकर, प्रणवसे यज्ञीय काएसे 
१ इसका तात्पय्य यह है कि, जब दोनों दिन भमध्याह् व्यापिनी 


| आलोढन ओर उसीसे मथकर ग्रणवसे अभिमंत्रिव ऋरके 
तिथि हो तो हेमाहिके मतसे परा तथा माघवके मतसे पूर्वा ढेंती | कुशके सात हरे पत्तोंसे पच्चगव्यका उद्धरण करके पीछे 
कही है, अब कैसे निश्चय हो इसके लिये यह सिद्धान्त है कि, जिसके | दशा आहुति देनी चाहिये वे किस प्रकार दी जाती हैं यह 
मतमें बहुमत हो उसीके वाक्यकों ग्रहण करना चाहिये | हेसादिके | छिखते हैँ । '“ओं इरावती घनुमती हि भूर्त सूयवसिनी मनु- 
मतका पोषक दिवोदासका वचन मिलता है, इस कारण युग्मवाक्यसे | षेद्शस्या । व्यस्तभ्ना रोदसी विज्णवे ते दाघथ प्रथिवीम- 
पष्ठीयुताका प्रहण प्राप्त है। निर्णय सिश्धुमें ऐसा ही लिखा है तथा | भितों मयूखे:॥| ” इस मंत्रसे प्रथिवीको, “ इदं विष्णु: ” 
ज्वाला प्रसादजी की उसपर ऐसी ही दीका है। .यद जो मूल प्रन्थमें | इससे विष्णुको, “ मानस्तोके ” इससे रुद्रको; “ ब्रह्मजज्ञा- 
“पूर्व विद्धायां कार्य्यप्र” यह शिखा हुआ हे यह विचारणीय ही है । | नम ” इससे बत्रह्माज्ञीको, “अग्नग्रे स्वाहा ' इससे अप्निको, 










ब्रतराजः।' क्‍ 


हेत्यप्ये ःसोमायस्वाहेति सोमाय “गायत्र्या खूर्यांय० #स्वाहेति प्रजापतये० ऊजूसुवः स्वाहेति 
प्रजापतयें” अम्नये स्विष्ठकृते स्वाहेत्यश्रये स्विष्टकृते० ॥ एवं दशाहुतीहुत्वा हुतावशिष्ट यर व- 
गस्थीति मंत्र पठित्वा प्रणवेन प्राशयेत ॥ होमाकरणपक्षे उक्तमंत्रेः पंचगव्य॑ संपाद्य भाशयेव्‌ ॥ 
ख्लियस्त॒ तृष्णी पञ्चगव्य प्राशयेयुः ॥ अथ बतविविः॥ नद्यादिके तदा स्वात्वा कृत्वा नियममेव च॥ 
ब्राह्मणी क्षत्रिया वैश्या शूद्रा वापि वरानने ॥ कृत्वा नेमित्तिक कम गत्वा निजगदे पुनः ॥ 
वेदीं सम्यक्‌ प्रकुर्वीत गोमग्रेनोपलेपिताम्‌ ॥ रड्वल्लीसमायुक्ते सवतोमद्रमण्डले ॥| अग्रणं 
सजल॑ कुम्भ ताम्र मन्मयमेव वा ॥ संस्थाप्य वच्यसंयुक्ते कण्ठदशे सुशोमितम्‌॥ पथ्वरत्नसमा- 
युक्त फलगन्धाक्षतेयुतम्‌ ॥ सहिरण्यं समासाद्य ताम्रेण पटलेन वा ॥ वंशम्नन्मयपात्रेण यबपू- 
न चेव हि॥ आच्छादयेत्त चेलेन लिखेद्टद्ल ततः ॥ तत्र सतकषीरिदिव्यान्भक्तियुक्त 
प्रपूलयत्‌ ।। अथ संकल्प/॥।मासपक्षायलछिस्य मया ज्ञानतोञ्ञानतो। वा रजध्वलावस्थायों कृत- 
संपर्कजनितदोषपरिहार।र्थमरुन्धतीसहितकश्यपादिसतऋषिभी त्यथंमु षिपूुजन महं करिष्ये ॥ अब 
ऋषिपूजविधिः ॥ आगच्छः्तु महाभागाश्रतुर्वेदपरायणाः ॥ यावद्वतमिदं कुर्वे करपपा भवतामहम्‌ ॥ 
आवाहनम्‌ ॥ मूत बह्मण्यदेवस्थ बह्मणस्तेज उत्तमम॥ सूर्यकोटिप्रतीकाशमृषिवृन्द विचिन्तये॥ 
ध्यानम ॥ ऋग्यज्ञःसामवेदानां स्वरूपेभ्यों नमोनमः ॥ पुराणपुरुषेश्यों हि देवषिभ्यो नमोनमः ॥ 
आसनम्‌ ॥ गन्धपुष्पाक्षतेयुक्त पाद्य गहन्तु भो द्विजा; ॥ प्रसाद कुरुत प्रीतास्तुष्टाः सब्तु 





सोमाय स्वाहा' इससे चन्द्रमाको, “ तत्सवितुवेरेण्य”” इस | स्थापित करदे, कण्ठ भागमें उसे रक्तवस्रसे वेष्टित कर 


गायत्री मंत्रस सूयंको “ओं स्वाहा ”” इससे प्रजापतिको, 
“ओं भूसुवः-स्वः स्वाहा” इस व्याहतित्रयवाह् मंत्रसे पुन- 
वॉर प्रजापतिकों, एवम “ अम्नये स्विष्टकृते स्वाहा ” इससे 
अप्निको स्विष्टकृत्‌ होमके पश्चगव्यकी आहुति दे, इस प्रकार 
दृश आहुतियाँ प्रथिव्यादि दृश देवताओंकों देकर बचेहुए 
पश्चगव्यकों अपने दाहिनी हथलीमें रखकर “ ओ यच्त्वग- 
स्थिगत पार देहे तिष्ठति मामके। प्राशनात्‌ पश्चगंव्यस्य दृह- 
त्वप्निरिवेन्धनम्‌ ॥” जो मेरे देहमे त्वचा और हड्डियोंके 
भीतर पहुंचकर पाप रहता है वो पञ्चगव्यके श्राशनस इस 
प्रकार जलजाय जेस आगसे ईंधन जलूजाता है, इल्र मंत्रको 
बोलकर प्रणवर्से ग्राशन करना चाहिये। होम न करनके 
पक्षम कथित मेत्रोंस पञ्चगव्य बनाकर प्राशन करले, 
स्त्रियोंकों तो चाहिये कि,वो चुपचाप ही पद्चगव्यका प्राशन 
करें। [ यहां उत मंत्रादिकोंका अथ नहीं किया है जिनका 
कि, हम पहिले कर आये हैं इसी कारण उन्हें पूरा भी नहीं 
लिखा है, यही हमारी वात अन्य मंत्रोंके विषयसें भी है, 
जिनको हम एकबार छिख देते हैं उन्हें फिर दुबारा लिखना 
'नहीं चाहते । | ब्र॒तविधि-हे सुंदर सुखवाढी पाव॑ति ! 
आद्मणी, क्षत्रिया, वैद्या या शुद्रा ही ब्रत करनेवाली क्‍यों 
न हो, वह नदी तडागादिकोंमें ज्लान करके अपने नेत्यिक 
और नेसित्तिक कम्मेसे निवृत्त हो घरपर चली आय पीछे 
पदीछा निम्माण करके उसे गोबरसे लीप दे, उस पर रंग 
"टॉक सहित सबंतो सद्रमण्डल लिखे, उसके, मध्यभा- 
पृकत्तिकाका कछशके जलसे पूर्ण करके 





गर्म अश्नण तांबे या 


उसमें पश्चरत्न, पूगीकछ, गन्ध और सुवण डाछे, पीछे 
यवोंस पूण भरी हुईं तामडी या वॉसकी पिटारी उसके मुख- 
पर स्थापित करके वस्रसें ढक दे,उसपर अष्ट दल कमरढूका 
आकार लिखे, उस अष्टद्छवाल कमछूके ऊपर दिव्य सातों 
ऋषियों और एक अरुन्धतीको स्थापित करे, फिर भक्तिसे 
अपने मनको पूर्ण रखता हुआ अरुन्‍्धती सहित सप्तर्षियोंका 
पूजन करे, उस पूजनके आरम्भमें जछ और अक्षत दृहिने 
हाथमे लेकर. “ओं तत्सतः' अद्ैतस्य”” इत्यादि वाक्‍्यसे देश 
और महिने आदिका उल्छेख करके कहें कि, मेने अपने जान 
या अनजानसें रजस्वछा होनेपर भी जो सम्पर्क किया हैं 
उससे जो प्रत्यवाय प्राप्त हुआ है उसकी शान्ति तथा भरु' 
न्धती सहित कर्यपादि सप्रबियोंकी प्रीतिके लिये अरु- 
न्धती .सहित कश्यपादि सप्तषियोंका पूजन करूंगा॥ 
पूजन विधि-हे चारों वंदोंके परायणों, मद्दाभागो, अरू- 
न्यती सहित सप्तषियों | पधारो, जबतक में इस ब्रतको करूँ 
तबतक यहीं विराजे रहो. इससे आवाहन; में उस ऋषि" 
वृन्दकों याद करता हूं जिसका तेज कोटि सूय्यंके समान है 
जो कि ब्रह्मका उत्तम तेज तथा बह्मण्य देवका .स्वरूप हैं, 
इससे ध्यान; ऋग्‌ यजु ओर सामके स्वरूपोंके ढिये वारं- 
वार नमस्कार है, पुराण पुरुष देवर्षियोंके लिये वारंवार 
नमस्कार हैं अथवा एसे देवर्षियोंके लिये वारंवार नम 
स्कार है इससे "आसन; हे द्विजों | आप गन्‍्ध) पुष्प 


; अक्षतयुक्त पायको के ओर मेरेपर प्रसन्नता. प्रकढ .करें 





बतानि, ] क्‍ भाषाटीकासमेतः । 





(१९७ ) 


सदा मम ॥ पाद्यम ॥ नमस्थे शुक्रपश्॑चम्यामचिता ऋषिसत्तम॥ ॥ दहत्तु पाप॑ं में से गहन्त्वध्स 
नमो नम३॥ अध्यम ॥ लोकानां तुष्टिकतारों यूयं सर्वे तपोधना। ॥ नमो वो धर्मविक्षेम्यो मह- 
षिंभ्यो नमो नमः | आचमनम्‌ ॥ पयो दधि पृतं चेव शकरामधुसंयुतम्‌ ॥ पश्चामृतेन स्नपने 
करिष्ये ऋषिसत्तम3 ॥ पश्चामृतम्‌ । मन्दाकिनी गोतमी च यमुना च सरस्वती ॥ कृष्णा च 
नमंदा तापी ताभ्यः स्नानाथमाहंतम्‌ ॥ स्नानम ।॥ सर्वे तित्यं तपोनिष्ठा बह्मज्ञाः सत्यवादिनः 
वस्याणि प्रतिगहन्तु छुक्तिदाः सन्‍्त मे सदा ॥ वच्थयाणि ॥ नानामन्त्रेः समुद्धतं त्रिवृर्त बहासूच- 
कम्‌ ॥ प्रत्येक॑ च प्रयथच्छामि ऋषयः प्रतिगह्यताम्‌ ॥ उपवीतानि॥कुंकुमागुरुकपूरसुगन्धेमिश्रित॑ 
शुभम्‌ | गन्धाव्य चन्दन दिव्य गहन्तु ऋषिसत्तमाः ।। गन्धम्‌ ॥ च॒च्राक्षताश्व संपूणाः भक्षाल्य 
च नियोजिताः ॥ शोभाये वो मया दत्ता गह्यत्तां सनिसत्तमा; ॥ अकश्षतान ॥ मालतीचम्पका- 
दीनि तुलस्यादीनि वे द्विजा: ॥ मंयाहतानि पुष्पाणि पूजाथ प्रतिशह्यताम्‌ ॥ पुष्पाणि ॥ वन- 
स्पतिरसोद्धतो गन्धाव्य: सुमनोहरः ॥ आप्रेयः सर्वदेवानाँ धूपोष्यं मातिगह्मताम्‌ ॥धूपम॥ साज्य॑ 
च वजिसं०॥ दीपम्‌ ॥ नानापक्ान्नसंयुक्ते रसेः घढ़्मलि!ः समग्वितम्‌ ॥ गंहन्तु ऋषयः सर्वे मया 
नवेद्यमर्पितम ॥ नेवेद्यम्‌॥ मध्ये पानीयम ॥ उत्तरापो० हस्तपक्षाल० करोद्तेनार्थे चन्दु० ॥ 
नमो वेदविदः श्रेष्ठा ऋषयः सूर्यसब्रिभाः ॥ गृहन्त्विदं फल तृष्ठा मया दत्त हि भक्तितः ॥फलम॥ 
पूगीफले मह०॥तांवूलम्‌०॥हिरिण्यगर्मेति दक्षिणाम्‌ ॥ यानि कानि च पापानि बहाहत्यासमानि 
च्‌॥ तानि तानि विनश्यन्ति प्रदक्षिणपदे पदे ॥ मदक्षि णा;॥ नमो5स्तु ऋषिद्रन्देभ्यों देवषिभ्यों 


नमोनम!॥ सव्वेपापहरेभ्यों हि वेदविद्धओे नमो नमः ॥ 


नमस्कारान॥ एते सप्तपंथः सर्वे भक्त्या 


संपूजिता मया ॥ सर्वे पाप व्यपोहन्तु ज्ञानतोष्ञानतः कृतम्‌ ॥ प्रार्थना ॥ अथ वायनम्‌ ॥ 
कृतायाः पूजायाः साड्रतासिद्धथथ ब्राह्मणाथ वायनप्रदानं कारिष्ये । तथा ब्रह्मपूजनमवायन 





एवं सदा प्रसन्ष ओर सन्‍्तुष्ट रहें इससे पाद्य, भाद्रपद सुदि | 


पञ्चमीक दिन मने ऋषिसत्तमोंका पूजन किया हैं, इससे 
छोकोंको संतुष्ट करनेवाछ आप सब तपोधन और धमेवेत्ता 
महषि हैं, आपको बारंबार प्रणाम है, इससे आधचमन, दूध 
हं ऋषिसत्तमो ! आपको स्नान कराता हूं, इससे पञ्चामृत 


ओर तापी इत्यादि सहानदियोंसि आपके शुद्धस्नानाथ यह 


जछ छाया गया हैं; आप इस स्वीकार करिये. इससे शुद्ध 
स्नान, आप सभी नित्य तपःपरायण, ब्रह्मवेत्ता ओर सत्य- | करे। “हिरिण्यगभगमस्थ ! इससे दक्षिणा चढावे.  यात्ति 
वादी हैं, वस्र ग्रहण करें ओर मुझे सदा मोक्ष ( ब्रह्मज्ञान) | 
देनेवाले हों, इससे बस्तर; विविध मन्त्रोंसे त्रिगुणित ये जह्य- | 
सूत्र तेयार किये हें, आप सभीके छिये अछग चढा रहा है, | प्रणाम है, इससे नमस्कारें तथा मेंने इन सब सप्तषियोंका 
आप ग्रहण करे, इससे बह्यपूत्र; छुड्टूम। अगर; कपूर आदि | 


सुगन्धित पदार्थोसे सुगन्धित इस दिव्य चन्दनकों हे ऋषि | 


सत्तमो ! ५ आप ) ग्रहण करें, इससे गेघ; हे ऋषिश्रश्ठो 





इन सफेद चावलोंको छेकर आपको देने आया हूं, आप 


| अपनी शोमाके लिये इनको ग्रहण करिये, इससे अक्षतः है 
य पूजित हुये मेरे समस्त पापोंको दृग्ध करते हुए अध्ये ऋषियों ! माछती चस्पकादि पुष्प, तुछसी प्रश्नति पत्रोंको 


_ भहण करें इनक लिय बारबार नमष्कार है इससे अध्ये, | 


आपकी पूजाक लिये छाया हैं, आप इन्हें ग्रहण करिये) 


| इससे पुष्प; ' वनस्पति रसोद्मूतः” इससे धूप, ' साज्य च 
| वति ” इससे दीप; 'नाना पकवान ! इससे सेवद्य;। मध्यम 
दधि, घृत, शर्करा और सहत इन पश्च अमृतमय पदाथ!से 


पानीय;- उत्तरापोशन; हस्त प्रश्चाछुन एवम्‌ करोद्ठर्तनके 


| छिये चन्दन; हे वेदके जाननेवाले सूर्यके समान ऋषियों ! 
द्वारा स्नान, गछ्ला, गोतमी, यमुना, न्सरस्वती, कृष्णा, नमंदा | 


आपके छिये नमस्कार है मेने भक्तिसे आपको फल दिया 


| हैं इससे प्रसन्न होकर आप मुझे फल दो, इससे फल; 


पूगीफरछ ” इससे पूगीफल पानके मंत्रसे ताम्बूछ समपंण 


कामि व! इससे प्रदक्षिणा करे. बेदवेत्ता, समस्तपापोंके 
विनाशक, देवर्षि और समस्त ऋषियोंके छिये बारबार 


भक्तिसे पूजन किया हैं, य॑ मरे जान अथवा अनजानक 
किये पापोंको नष्ट करें, इससे पाथेना करें. सेने जो यह 


| पूजन किया हें, इसकी साज्ुपूणताके लिये ब्राह्मण (आचाय) 


? जले ग्रह्मतामिति शेष 


ब्रतराज) । पश्चमी-- 














बे को 


फलसंयुक्त समन दक्षिणान्वितम्‌ ॥ द्विजवयाय दास्यामि ब्रतसंपूर्तिहेतवे ॥ भवन्तः प्रतिगृहस्तु 
ल्योतीरूपास्तपोधनाः ॥ उभयोस्‍्तारकाः सब्तु वायनस्य प्रदानतः ॥ वायनम्‌ । । न्यूनातिरि- 
क्तकर्माणि मया यानि कृतानि च ॥ क्षमध्वं तानि सवाणि यूय॑ सर्वे तपोधना॥।यान्त देव०विस- 
जनम्‌॥एवं संपूज्य विधिवद्धक्तियुक्तेन चेतसा॥ तेषामग्रे च श्रोतव्यं शुभ चच कथानकम्‌ ॥ इति 
पूजाविधि।अय व4॥ सिताश्व उवाचाश्षुत्तनि देवदेवेश व्रतानि खुबहूनि च।।सांप्रतं मे समाचह्ष् 
व्रत पापप्रणाशनम॥ १॥।तब्रह्मोवाच॥। श्णु राजन प्रवक्ष्यामि ब्रतानाउत्तमं ब्रतम्‌ ॥ ऋषिपशथ्वमीति 
विख्यात॑ सर्वपापहर परम्‌ ।। २ ॥ येन चीणेन राजेन्द्र नरक नेव पश्यति ॥ अन्रैवोदाहरिष्यन्त 
इतिहासं पुरातनम ॥ ३॥ वेद॑में च द्विजवर उत्त़ो नाम नामतः॥ तस्य भायां सुशीलेति 
पतिब्रतपरायणा ॥ ४॥ तस्या अपत्ययुगल पुत्रों हि सुविभूषणः ॥ अधीतवान्‌ झुतस्तस्य 
वेदान्‌ साड्रपदक्रमाव्‌ ॥ ५॥ समाने च कुले तन झुता चापि विवाहिता ॥ विवाहितेव सा 
देवादवव्यं प्राप सत्तम ॥ ६॥ सतीत्व॑ पालयन्ती सा आस्ते निजपितुर्शहे ॥ तस्था हःखेन 
' संतक्तः छुत॑ संस्थाप्य वेश्मनि ॥ ७ ॥ गड्ञातीरवरन माप्त:ः सकलत्रस्तया सह || स तत्राध्या 
पयामास शिष्यान्वद॑ द्विजोत्तमः॥ < ॥ खुता च ,कुरुते तस्य पित॒ः झश्र॒ष्णं परम्‌ ॥ पितः 
शुक्षपर्ण कृत्वा परिश्रान्ता कदाचन ॥ ९ ॥ निशीये किल संसुत्ता कृमिराशिरजायत ॥ तथा- 
विधां च तां दृष्टा विवद्यां प्रस्तरस्थिताम्‌ ॥१०॥ शिष्पा निवेदयामासुस्तन्मातः करू णान्विता३॥ 
न जानीमो वर्य किंचिदेवीं साथ्वीं तथाविधाम्‌ ॥ ११ ॥ कृमिराशिमयी जाता मातः संपति 
दृश्यते ॥ वज॒पातसदक्षं तच्छृत्वा शिष्येरुदीरितम्‌ ॥ १२ ॥ सा आआान्तमानसा ज्षीघत्र तत्समीप- 


को वायनग्रदान और ब्राह्मण पूजन करूंगा ऐसा संकल्प 
करके ब्रतकी पूत्ये्थ ब्राह्मणके लिय में फल घृत और दक्षि- 
णासहित वायना देताहूँ | ब्योतिः स्वरूप तपोधन आप उसे 
स्वीकार करें,, इस वायनाक प्रदानसे मेरे ( दाताके ) एवं 
ब्राह्मण ( प्रतिगृहीता ) क॑ आप उद्धार करनेवाले हों; इससे 
वायना; * यान्तु देवगणाः सर्वे पूजामादाय मामकीम्‌ । इष्ट- 
कामप्रसिद्धूबंथ स्वधाम परम मुदा ॥ ? मैंने जो यह पूजन 
किया है, इसे ग्रहण करके मेरी अभिलूषित कामनाओंको 
पूण करते हुए अपने अपने परम घामको आनन्दसे पधारें, 
इससे विसजेन करे।। इस प्रकार भक्तिपूर्व॑क विधिसे पूजन 
करके उत्त ऋषियोंके सम्मुख उनके ब्रतकी पवित्र कथाको 
सुने ॥ ब्रतकी.कथा-सिताश्र राजाने ( ब्रह्माजीस ) पूछा कि, 
है देवदेवेश ! मैन आपके मुखसे बहुत ब्रत सुने, अब मेरे 
ल्यि किसी एक पापविनाशक ब्रतको कहो ॥ १ ॥। ब्रह्माजी 
बोले कि, हे राजन्‌ ! सुनो, मैं तुम्हें उस उत्तम ब्रतको कह- 
ताहूँ, जो समस्त पापोंको सवथा नष्ट करनेवाढ्ा है। उसका 
नाप्त ऋषिपमी है ॥२॥ हे राजेन्द्र | इसके करनेपर 
मनुष्य नरकके दशनतक नहीं करता, वहां यातना मोगनी 
दूर रही. इसी प्रसज्ञमें ही महात्मालोग पुरानी बात कहा 
करते हैं ५ ३॥ कि, विदर्भदेशकी राजघानीमें उत्त कु नामक 
0 मे ओाह्ण रहता था, उसकी सुशीढा नाम भार्या 
थी, यह पत्ित्रितम परायण थी, ४ । इस सुशीलाके दो 


नल पे दूसरी पुत्री; इनमें पुत्न बहु- 


तही सद्‌गुणोंसे भूषित था, उसने अक्ल, पद और क्रम 
सहित सब वेद पड़े ॥ ५॥ उत्तक्ल बराह्मणने अपनी कन्याका 
विवाह अपने कुछानुरूप घरमें करदिया, पर हे सत्तम ! 
प्रारष्ययोगसे वह छडकी विधवा होगयी ।॥| ६।। अपने 
पतित्रता धमकी पाछना रखती हुई पिताके घरपरदही.समय 
व्यत्तीत करने छगी। वो ब्राह्मण उस दुःखसे दु:ल्ितहोअपने 
पुत्रकों घरमें ही छोड ॥ ७॥ अपनी ख्री और उस पुत्रीको 
लकर गड्भाजीके तटपर चलागया;वहां जाकर वो शिष्योंको 
वेदाध्ययन कराने छगा ॥ ८ ॥ बह लडकी अपने पिताकी 
शुश्रूता करने छगी, किसी दिन पिताकी शुश्र॒षा करती 
करती हारगयी ॥ ९ ॥ अद्धंराज्िका समय था, एक पत्थर 
पर गयी, उसके शयन करतेही शरीर एकदम कृमिमय 
होगया, शरीरके वस्र भी कृमिरूप ही होगये ॥ १०॥ 
ऐस जब उस गुरुपुन्नीकी दशा होगयी तब उसका वृत्तान्त 
अपनी गुरुपत्नीके सम्नीप जाकर शिष्योने बहुत दुःखके 
साथ निवेदन करते हुए कहा, हे मातः | हम कुछ नहीं 
जानते, उस सचरित्रा आपकी पुत्रीकी ऐसी दशा क्यों 
होगग्नी १ ॥ ९१ ॥ आज उसका शरीर तो कुछ दिखाई 
ही नहीं देता, केवल कृमियां ही दीखती हैं। माको 
शिष्योंके ये बचन वज्रपातके सहश छगे ॥ २२ ॥| वह एक 
ईम घबराकर उठी और अपनी पुत्री जहां पडी हुईं थी 
वहां गयी, वहां जाकर ठीक बसीही उसकी अवस्था देख 


९ बैदेहेइमूदुद्विन इयपि प/ठः | 





ब्तानि, | 


धाषाटीकासमेतः । 






दिलडाय सुदुःखिलता ॥ १३॥ उस्थ ताडयामास खुतरां 
मोहमाप चा। क्षणेन प्रापतचेतन्यां ताहुत्याप्य भनृज्य च॥ २४ | समालम्ब्य च बाहुभ्याँ निर 
तत्पितुरन्तिकम ॥ स्वामिन्कथय में साध्वी केन दुष्कूतकमंणा॥ १५॥ निशीये संप्रसुप्तेय 
जायते कृमिसंकुला ॥ एतढृत्वा ततो वाक्यमृषिध्योनपरायणः ॥ १६॥ ज्ञात्वा निवेदया- 
मांस तस्याः प्राझुजन्म चेड्ितम ॥ ऋषिरुवाच ॥ प्रागिय सप्तमेप्तीते जन्मनि ब्राह्मणी हयभूत 
॥ १७ ॥ रजम्वला च संजाता भाण्डटादीस्यस्पृशत्तदा ॥ अस्यास्तु पाप्मना तेन जायत क्रिमि- 
वद॒पु+॥ २८ ॥ रजस्वलायाः पापेन युक्ता भवति सानवे। प्रथमेषहनि चाण्डाली द्वितीये ब्रह्म व- 
तिनी ॥१९॥ तृतीये रजकी शो क्ता चतुर्थःहनि शुध्यति।तदा तया सखीसड्भाद्वतं दृद्टावमानितम्‌ 
॥ २० ॥ दृष्ठब्नतप्रभावेण जाता द्विजकुलेघम ले ॥ अवमानाद्गतस्थास्य कृमिराशिमयीघुना ॥२१॥ 
एतत्त कथित सब कारण दुष्कृतस्य चोसुशीलोवाचादशंनादपि यप्यात्य विप्राणां निर्मले कुले 
॥२२॥ जन्म युपष्मद्विधानां हि जायते बरहतेजलाम्‌ ॥ अवज्ञया प्रजायत्ते निशिथे कृमिरा- 
शयः ॥र२शा। महाश्रयेकर नाथ तद्गतं कथयस्व मे। ऋषिशवाचासुशीले श्वणु तत्सम्यग्वताना- 
मुत्तम ब्रतम्‌ ॥ २७ ॥ येन चीणेंन सहला पायादस्मात्मसुच्यले ॥ दुःखब्याच्च मसुच्येत नारी 
सोभाग्यमाप्लुयाव ॥२५॥ कल्याणानि विवद्धेन्ते संपदश्ध निरापद्‌आनभ तले शुक्ृपक्षे तु यदा 
भवति पश्चमी ॥ २६ ॥ नद्यादिब तदा ह्वात्वा कृत्वा नियममेव च विधाय नित्यकमोणि गत्वा 


मुपागमत्‌ ॥ सा ता तथाविवधां दृद्ठा 


द्वावतीमृषीय ॥ २७॥ स्नापयेद्विधिवद्धकत्या पश्चामृतरसेः शुभ: ॥ दरवती-अभिवरोत्रशाला बख- 





ही अत्यन्त दु:ःखित हो विद्धाप करने छगी ॥ १३ ॥ छाती- | 
पर कराघातें करती हुईं अच्छी तरह मूछित हो धरती पर | 
तिरपडी । फिर कुछ देर्में जब उसको चत हुआ तब उस | 
छडकीको खडी करके अपने अचछसे पोछकर ॥ १४ |! | 


अपनी दोनों भुजाओंका सहारा देकर उसके पिताके पास 


हैं ॥ १५ ॥ देखिए, यह अधेरात्रिका समय है, इसमें यह 
सोती थी, इस सोती हुयीको शरीरमें :इबने कौडे पढगये 
सो कुछ कहा नहीं जा सकता, यह सुचर वो महात्मा क्षण- 


छडकीक पू्वेजन्मके पापोंको देखकर बोछा कि; है अनघे! 


इस जन्मसे पहिले सातवें जन्ममें भी यह त्राह्मणी ही थी 
| १७ ॥ उस जन्ममें रजस्वछा होकर भोजनादिकोंके 


है, पहिले दिन चाण्डाली, दूसरे दिन ब्रह्मघातिनी 0१९ 


छुस ऋषिपअ्मीके ब्रतको देखकरभी अपमान किया था 
॥ २० ॥ उस ब्रतालुष्ठानके उत्सवका दृशन किया था 








इसीसे पवित्र ब्राह्मणोंके कुछ इसका जन्म हुआ, इस | 


त्रवकी अवज्ञा की, इससे इसके शरीरमें अब कृमिराशि 

पडगयी है ।। २१। यह सब मेने तुमको इसके पापका 
|, 

कारण बता दिया हू । यह घुन सुशीला बोली कि, जिस 

ऋषिपअवमीव्रतके उत्सवका केवछ दशन करनेपर आपसे 


| ब्रह्म वचेस्वी ब्राह्मसोंके पवित्र कुछमें || २९ ॥ जन्म मिलता 
के. आयी और बोछी कि, हे स्वामिन्‌ | आप कहो कि, यह | 
सचरित्रा किस पापके प्रभावसे इस दशाको प्राप्त हो गयी | 
| इस विछक्षण ब्रतको मुझे बता दें। ऋषि बोले कि, हे- 
| सुशीढवे | तुम अच्छी तरह चित्त छगाकर सुनो, में सब 
| ब्रतोंमें उत्तम त्रतको कहता हूँ २४ ॥ जिसके करनेसे इस 
भर नारायणपराण्ण हो समाधि छगाकर ॥ १६ || उस | 
| तिक, आधिदेविक तथा आध्यात्मिक इन तीनों प्रकारक 
| दुःखोंकी निवृत्ति एवं खियोंको सोभाग्यसुखकी प्राप्तिदोती 
| हैं २० ॥ ( पाठान्तरके अनुसार यह अथ है कि-तीनों 
पात्रोंके स्पर्शास्पशेका विचार नहीं किया; सभीको हाथ 
छगाया, इसी पापके कारण इसका शरीर क़ृमिमय होगया 
है ।| १८ ॥ हे अनघ ! रजस्वछा कालमें खी 'पापिन होती | 
| सुदि पश्चमीके दिन ।। २६ || किसी नदी, तछाब आदि 
दीसरे दिन रजकी ( धोबिन ) होती हैं फिर चौथे दिन. 
शुद्ध होती हें । उसी जन्ममें इसने अपनी सखियोंके दु:स- | 


है और अवज्ञा करनेसे रातम शरीर कृमिमय्‌ हो जाता हे 
॥ २३ ॥ यह बहुत आश्चयकी वात हैँ कि, है नाथ | आप 


प्रकारके सब पापोंसे छुटकारा हो जाता हें ओर आधिभौ- 


दुःखोंका विनाश अवश्य होता हैं, इसमें सन्देंह नहीं 
करना ) एवं सब प्रकारके आमनन्‍्दों और सम्पत्तियों क्री 
प्राप्ति होती हैं । तथा आपत्तियां दूर टछजाती हू। माद्र॒पद्‌ 


जलाशयमें ज्लान करके ब्रतका नियम धारण करनाचाहिए, 
&.. ४ कक कर 
फिर नित्यकत्तेव्य सन्ध्योपासनादि कम्मोकों करके द्वार- 


 बतीमें जाकर सप्तऋषियोंकों [| २७ ॥ स्थापन करके विधि* 
| वत्‌ पवित्र पच्चदुग्धादि अम्ृतमय पदाथास स्राव कराना 
चाहिए। द्वारवतीनास प्रतिदिन हृवनकरनंक स्थानका य 


्‌ क्‍ कि है व च््क 
१ आमसूकरीत्यपिपाठः । २ अन्नाछोप आर्षः । ३ विश्रद्य | ४ ढुःखत्रयाभिघातश्र जायत नात्र सेशयः इत्यपिपाठः । 


बलशाज! | ि | पश्चैमी- 


2:५६ ॥0७०४/११४/०४ २7४ 


(१०० ) ् शक 


अण्डपे गृह वा ॥ २८ ॥ चन्दनागुरुकपरेविलिप्य च खुगन्पिनिः। आज दैधेः कलर 
दीपकेः ॥ २९॥ समाच्छाच झुनवंख्रः सोपवीतर्यथाविधि ॥ ततो ०३३४० इह्याच्छमेः 
फंलेः ॥ ३०॥ कइ्यपो5तिभेरद्वाजों विश्वामित्रस्ठ गोतम/जमदइप्िवासेष्ठश्व सतेते ऋषयः्स्मृता: 
॥२३१॥ गृहन्त्वघ्स मया दत्त ठुष्टा भवत में सदा छ श्रोतव्यमिद्माख्यान शाकाह र्‌ अकटप- 
येत ॥ ३२ ॥ स्थातव्य॑ बरहमचर्येण ऋषिध्यानपरायणः ॥ अनेन विधिना सम्यगूत्रतमेतत्समा- 
चरेव ।। ३३ ॥ तस्य यजायते पुण्य सर्वतीर्यषु यतफलम्‌ ॥ सवंदानजु यत्पुण्य तद॒स्य ब्तचार- 
णात्‌ ॥ ३४ ॥ कुरूते या बत॑ चेतत्सा नारी खुखभागिती ।। रूपलावण्यसंयुक्ता पुत्रपोत्रादिसं- 
युता ॥ २५॥ इह लोके सदेव स्पात्परत्राप्यक्षया गतिः ॥ ब्रतह्यस्थ प्रभावण जाति स्मरति 
पाविंकीम ॥ ३९॥ इति हेमाद्ों बह्माण्डे ऋषिप्ख मीकथा॥अय भविष्योत्तरोक्त त्र बैपचमी कथा ।थुधि- 
छ्िर उवाच ॥ श्रुतानि देवदेबेश व्रतानि खुबहूनि च॥ सांमत मेषन्यदाचक्ष्य ब्रत॑ परापत्रणाश- 
नम ॥ १॥ श्रीकृष्ण उवाच ।। अथान्यंदपि राजेन्द्र पश्चमीमावैसारिताम ॥ कथयिष्याप्रि 
यत्कृत्वा नारी पापात्ममुच्यतें ॥ २ | युधिष्ठिर उवाच ॥ कीद्शी पश्चमी कृष्ण कर्थ च ऋषि- 
संज्ञिता॥ पातकान्मुच्यते कस्माह्नारी यदुकुलोद्धन ॥ ३२॥ पाणाने च बहून्यत्र विद्यन्ते किल 
केशव ॥ कर्थ वा ऋषिपश्चम्याँ नारी कस्मात्ममुच्यते ॥ ४॥ कृष्ण उबाच ॥ अत्ञानाउज्ञानतो 
वापि या स्त्री जाता रजस्वला ॥ हुष्टा स्पृशति भाण्डानि ग़रहकमंणि सांस्थिता ॥ ५ ॥ पराष्नोति 
सा महापाप॑ सत्य सा नरक बजेत्‌॥ श्रणु तत्कारणं यस्माद्जनीया रजस्वला ॥ ६ ॥ भोत्सायों 
गृहतो दूर चातुर्व्॑येन भारत ॥ बहाहत्यां पुरा शक्रो ब॒त्च हत्वा ह्याप च ॥ ७॥ सया वे राज- 

















पूजनके लिए सजाये हुए मण्डपका नाम है ॥ २८ ॥ सुग- | के ब्रतका निरूपण करते हैं-राजा युधिष्टिर बोढे कि; दे 


न्धित चन्दन, अगर ओर कपूर इनको चढावे। विविध 
पुष्पोंका झड्भार करे, फिर घूप दीपक आदिस पूजे ॥२९॥ 
विधिपूवक उपवीत एवम्‌ अहतवल्र उपबस्ध धारण करावे। 
फिर अच्छे अच्छे फछ और नेवेद्य छेकर इनके साथ साथ 
अध्यदान करे || ३० ॥ उस समय कश्यप, अतन्रि, भरह्गाज, 


विश्वामित्र, गौतम, जमद्मि ओर वसिष्ठ ये सात ऋषि है: 


३ ७. 4०५ 


॥ ३१ ॥ ये सघ मेरे दिये अध्यजलूको स्वीकार करें और 
इससे प्रसन्न हों, इसको कहना चाहिए। यह कथा अवच्य 
सुनने योग्य है, इस व्तमें शागका ही भोजन करना ॥३२॥ 
तथा ब्रह्मयचय रखना एवं सातों ऋषियोंका स्मरण करना 
चाहिय | इस विधिसे इस ब्रतको अच्छी तरह करना 
चाहिये ॥ ३३ ॥ सब और ओर वीथ्थांमें स्नानादि तथा 
सब तरहके दानादि 'करनेसे जो फछ मिलता हैं वह एक 
इस ब्रतके प्रभावस मिछ॒जाता है ॥| २५ " जो ख्री इस ब्त- 
_ को करती है वह सुखियारी रूपछावण्यसे पूर्ण शरीरवाढी 
एवं सदा पुत्रपोत्रादिसे संपन्न होती है ॥ ३५ ॥ इस छोक 
में सदा सुखसे रहना ओर परछोकमे अक्षयपद्की प्राप्त 
तथा पूवजन्मके चरित्रोंका स्मरण होजाता है ॥ ३६ ॥। यह 
 इँमाद्रिम ब्र्माण्डपुराणस छेकर कही गयी ऋषिपथ्वमीके 

अनकी कथा पूरी हुईं ॥ अब भर्रिष्यपुराणोक्त ऋषिपचम्ती 


देवदेवेश |! आपके कहे बहुतसे त्रत सुने, अब आप पाप- 
विध्वसक किसी दूसरे ब्रतको सुनाओ ॥ १॥ श्रीक्षण्ण 
बोले कि, हे राजेंद्र | में अब और भी एक ऋषिपचमीक़े 
ब्रतकों कहता हूं जिसके करनेस ख्रियोंके सब पाप नह 
होते हैं ॥ २।॥ राजा युधिष्ठिरन पूछा कि, वह पंचमी 
कौनसी है, उसका नाम ऋषिप ्चमी क्‍यों है ? हे. यंदुन- 
न्द्न ! इसे ब्रतका एसा प्रभाव केसे हें जिसके करनेसे 
स्वियोंके सब पातक छूटजाते हैं || ३ ॥ है प्रभो ! पावतों 
बहुत प्रकारके होते हैं, उन पापोंसे ख्री ऋषिपथ्वमीक दिन 
ब्रत करनेसे ही केस छूटजाती है | इसमें क्‍या रहस्प है| 
कहिय || ४ ॥ श्रीकृष्णचन्द्र बोढे-हे राजन्‌ | जान वां 
अनजानसे रजखडा हुयी दुष्टा सी घरके का्मोंकी परत 
न्त्रतास घरके पात्रोंको छूती हें ॥ ५।| इससे उसको महान 
पाप छगता है, मरनेपर नरक की प्राप्ति होती हैं। 
इसका जो कारण है उसे सुनो जिससे रजस्ढ़ा श्री 
ऐसी दूषित होती है ॥ ६ ॥ है भारत ! ओह्ग, 
क्षत्रित्र, वेश्य और शूद्रकों चाहिये कि; ये रजखढ़ा 
खीको घरसे अगछ करें । पहिले देवराज इन्‍# 
वृत्रासुककों मारकर ब्रह्महत्या करनेके दोषका भागी 


&गयाथा ॥७। है राजशादूंढ ! इससे बृत्रसूदून छजित हो 


अधशधाशशरकातालाधालनातायाभाादादााभाारधारादा_कात परककाताकासानभभासाकाभ अमन सपना पद इकाभाजाधवाआया 


१शणु इतिशेषः। 


अतानि, | 


आपषाटीकासमेतः ! 





[दूल ब्रीडितों बृत्नसूदनः ॥ 





हक 


म॑ ब्मा क्षण ध्यात्ता चकार वे | शुद्धि शक्रस्य राजनद्र प्रह्ठनानतरात्मना ॥ 
प्राक्षिपद्राजशादल चतुःस्थानेषु वे तदः ॥१२० 


हाहत्यां तु चठ॒र्था च चठुसुख 


अध्ी। ज चअंल्ंपी्गचछा[त्खूल शाउइकारगात्त (4 ॥। 


ततो देव 
९१ वे 
वहा प्रथम - 





रालासु नदीष प्रथमोदके ॥ पवेतेष च राजन्द्र नारीर सि पार्थिव॥ ११॥ अतो रजस्वला 


री प्रोत्सायथों च प्रथत्नतः ॥ 


बरह्मणः शालनात _(र्थ चात॒अण्येंन सबंदा ॥ १९॥ प्रथमे5हनि 
ण्डाली द्वितीय धक्षघातकी ॥ तृतीय रजकी पोक्ता चतुर्थे5हानि 


शुद्धयलते ॥ १३ ॥ अज्ञाना- 


तानतो वापषि जात॑ संपर्कपतकम्‌ ॥ तत्पापसंक्षयाथ थे कार्येयद्पिषपश्चमी ॥ २४ ॥ सबे- 


[पप्रदामनी सर्वोपद्रवनाशिनी ॥ बहामक्षात्रेयविटश 


खीमि। कायो विशेषतः ॥ १५ ॥ अचबाय्ें 


त्पुरावृत्त प्रवक्ष्यामि कथानकम्‌ || पुरा कृतयुग राजा विदभोयां बनूव ह॥ १६॥ इथेनजि- 


धरे 2 पक 
[सं इज द्र लव छू ' 


॥ तस्य देशेपवेंसंद्विजो बदवेदाड्गपारगः 


सुमित्रो नाम 


। 
जेन्द्र स्वेभूताहते रत: ॥ कृषिवृत्या सदा युक्तः कुटम्बपरिपालकः ॥ १८ ॥ तस्य माया 
! 


ध्वी च पतिशुअषणे रता ॥ जयश्रीनोमविख्याता बहुभूत्यखुहज्जना ॥ १९ 


अतिचिन्ता- 


बता सा च प्रावृट्काले सुमध्यमा॥क्षेत्रांदिष रता साध्वी व्याकुलीकृतमानसा ॥ २० ॥ एकदा 


त्मनः प्राप्तमृतुकालं व्यलोकयत्‌ ।। रजस्वलापि सा राजन गृहकर्म चकार ह 


श्र ही 


'ण्डादीन्यस्पृशद्राजनूतों प्राप्तेपि भामिनी ॥ कालेन बहुना खाध्वी पश्वत्वमगमत्तदा ॥ 
२२ ॥ तस्या भतापि विप्रोह्सों कालघर्मसपायिवान्‌ ॥ एवं तो दम्पती राजन्त्स्वकर्मदशगों 
दा॥ २३ ॥ भारया तस्य जयश्रीः सा ऋत॒संपकंदोषतः ॥ शुनीयोनिमठुप्राप्ता सुमिद्रो: 

रेथवर ॥ २४ | तस्याः संपर्केदोषेण बलीवदों बनूव ह॥ एवं तो दुम्पती राजन स्वकम- 





वित्र होनेके डापयको पूछनेक छिये देवताओंके साथ | 
ज्ाजीके समीप गया | ८ | अद्याजीने क्षूणमर समाधि | 
गाके हे राजेन्द्र । उसको प्रसन्न चित्तसे पवित्र कर दिया | 
९॥ है राजशादूछ ! चतुमुख ब्रह्माजीने इन्द्रकी त्रह्महत्याक | 
पर विभाग किये और उन पापोंको चारजगह फक दिया | 


१०॥ एक भाग तो अम्निम गिरा, जो अभ्निको जछानेके 
मय पहिल धघूवाँ सहित ज्वाला उठती है बह उस अमप्निस 


नलद्रकी त्रद्महत्याका एक भाग हें, वर्षातमें नद्योंके प्राथ- | 
प्रक आगेक जलमे जो मेंछापन दीखता हे वह त्रह्महत्याका | 


शज्ञा दी है | १९॥ पहिछे दिन चाण्डाली, दूसरे दिन 


छहत्यारी और तीसरे दिन धोविनसी रहती है| ऐस | 


गन दिन तक ब्रह्महत्याके चतुथ भागकों महिने महिन 


गेगती हे फिर चोथे दिन शुद्ध होती है ।| १३ ।॥ इससे | 
तने या अनजानमें जो उसका किसीके भी साथ सम्पर्क | 
तैता है वह पातकी समझना चाहिये । उस पापके नाशके 


लेये ऋषिपच्मीका बत करना चाहिये ॥१४॥ यह ऋषि- 


३६ 





कर सकते हैं, विशेष करके ख्रियॉको चाहिये कि, अवश्य 
करें ॥१०॥ इस ग्रसंगरमें जो पहिले एक घटना हो चुकी हें 
उसे सुनाता हूं। पूवकारूमें सत्ययुगके समय विदर्भा नाम 
राजधानीस एक राजा हुआ था | १६ ॥ यह इ्येनजित्‌ 
राजबि चारों वणकी पाछना करता था | उसके देशमें वेद 


| और वेदोंके अज्ञोंका पारदर्शी ।। १७ | सब प्राणियों पर 


द्यादृष्टि रखनेवाला; सुमित्रनामक त्राह्मण बसता था । है 


| राजन ! वह खतीकरक अपने कुटुम्बका निर्वाह करता था 


| ॥१८॥ उसकी जयश्री नामकी खत्री अत्यन्त साध्वी तथा 
सरा हिस्सा हैं। पवरतोंके ऊपर वृशक्षोंमें जो गोंद हैँ बह | " त्यन्त साध्ची 


झहत्याका तीसरा भाग हैं; हें पाथिव ! ऐसे ही स्त्रियां 
गी तीन दिन रजस्वछा होती हैं वह चौथा हिस्सा बह्या- | -यरे बान्धव छोग थे॥ १९ ॥ वर्षाऋतु्मे खतीक कार्मोसे 
व्याका है ॥११॥ अतः रजघध्वछा ख्लरीको घरसे अवश्य | 
प्रढूग रखे, क्योंकि ब्रह्माजीने चारों वर्णवार्लोंके लिये यही | 
| देखा, पर रजस्वछा होकर भी वह अपने घरके कार्मोको 


पतिकी शुभ्रषा करनेवाडी थी, उसके बहुतस नौकर तथा 


उसे विश्राम नहीं मिलता था,इससे वह सुन्दरो मनसें घबरा 
गई ॥२०।॥ एक दिन उसने अपने ऋतुघमकों प्राप्त हुआ 


करती रही ॥ २१ ॥ हे राजन ! रजस्वछा होनेपर भी वो 
भामिनी पात्रोंको छूती रही, बहुत काछके बाद जब बह 
मरी तब ॥२२॥ उसका पति भी सझ॒त्युको प्राप्त होगया। हे 
राजन्‌ | एस वे दोनों सत्लरी पुरुष अपने किये क्माके अनु 
सार छोकान्तरके पथिक होगय ॥| २३ ॥ उस ब्राह्मणकों 


| जयश्री नामकी ख्रीन रजस्वछा होनेपर भी जो पात्रोंका 
'ध्वमी सब पाप और उपद्रवोंको शान्त करती हे | ब्राह्मण, | 

् भ्भ५ु | 
ब्रिय, वेश्य और शुद्ध चारों बणेवाढ़े सभी इस ब्रतकों | 


स्पश किया था उस दोषस वो ऋतिया बनी राजन ! 
उसका पत्नि सुमित्र भी ॥२४। उसके संपर्कके दोषसे बेर 


(३०२ ) लि 


ब्रलराज: । 








वशगों तदा ॥ २५ ॥ ऋतुसंपर्कदोषेण तियग्योनिम्रपागतों ॥ स्वधर्मांचरणाज्ञातावुन्ौ 
जातिस्मरों तथा ॥ २६॥ खुतस्पेव गहे राजन्स्म्रन्तों पर्वपातकम्‌॥ झुभित्रस्थ च॒ पुत्रो 
धभूद्युरुशुश्रषणे रतः | २७ ॥ सुमातिनाम धर्मज्ञों दवताताथवूजकः | । अथ धक्षयाह्‌ । संप्राप्त 
पितुस्त सुमतिस्तदा ॥ २८ ॥ भायो चरद्रवर्ती भाह सुमातः श्रद्धयान्वितः | अद्य सांवत्सर- 


दिन॑ पिठमें चार॒हासिनि ॥ २९॥ भोजनीया द्विजा भीर पाकसिद्धिविधीयताम्‌ ॥| तया कूंता 
पाकसिद्धिः सुमतेमंतुराक्षया ।। २० ॥ मुक्ते पायसभाण्डे वे सर्पेण गरलं ततः॥ दृष्डा ब्न- 


बधाद्वीता शुनी भाण्डाने सास्प्रशत्‌॥ ३१ ॥ द्विजभायों च तां दृष्टा उल्मुकेन जघान ह॥ 
भाण्डादीनि च॒ प्रक्षाल्थ त्यक्त्वा पाक सुमध्यमा ॥ २२ ॥ पुनः पाक च कछूत्वा त श्राद्ध कृत्वा- 
विधानतः ॥ ततो भक्तेष विप्रेष नोच्छिष्टं च ददों बहिः ॥३३१॥ भूमौ क्षिप्तं तथा शुस्या उपवा- 
पस्तदाभवत्‌ ॥ ततो राच्यां प्रवृत्तायां सा शुनी क्षाेता भुशम्‌ ॥ २४ ॥ बलीवदसुपागत्य 
प्रतारमिदमबबीत्‌ ॥ बुध्वाल्षिताद्य है मतेन दत्त भोजनादिकम ॥ १२५ ॥ ग्रासादिक च न प्रापं 
उुधा माँ बाधते ऋशम ॥ अन्यस्मिन्दिवसे पुत्रो मम लेहो ददात्यसो॥ ३६ ॥ अद्य॑ महां किम- 
'पेष उच्छिष्टमपि नो ददों ॥ पायसात्रे पपातादय गरले सर्पसंभवम्‌ ॥ ३७ ॥ मया विकिस्त्य 
प्नसा मरिष्यन्ति द्विजोत्तमा। ॥ संस्पृष्टं पाये गत्वा बद्धाहं ताडिता शशम्‌ ॥ २८ ॥ हुःस्तितं 
तन में गात्र कटिभग्ना करो मम किमू ॥ ततः प्राह च सोध्नड्रान्‌ भद्रे ले पापसंग्रहात ॥ २९॥ 
के करोमि हाशक्तो5ह भारवाहत्वमागतः ॥ अद्याहमात्मनः क्षेत्रे वाहितः सकल द्निम्‌ ॥ ४० ॥ 
गरितश्चात्मजेनाई सुख बडा बुसक्षितः ॥ वृथा श्राद्ध छुत॑ तन जाताद्य मम कछता ॥ ४१॥ 
कृष्ण उवाच ॥ तयोः संवदतोरेव॑ मातापित्रोश्व भारत ॥ शुत्वा पृत्रस्तथा वाक्य यदुक्त च तदो- 











आप ५ ते | य्‌ न्न्ज- 
गेगया, दे राजन ! इच्त प्रकार वे ( दोनों ) दम्पती अपने | वत्‌ श्राद्ध किया, ब्राह्मणोंको भोजन कराके उनका उच्छिष्ठ 


मम्मेकि वश होकर ॥ २५॥ ऋतुके सपकके दोषसे तिय्य- 
प्रोनिर्मे उत्पन्न हुए, किंतु उन्होंने और वहुतस धम्मोंका 
[चरण पालन किया था; इससे पूर्वजन्मका बृत्तान्त 
द्‌ रहा ॥ २६।॥ इससेवे ऐसी नीच योनिरसें परढ- 
र भी जातिस्मर हो पूवपःतकको याद्‌ करते हुए अपने 
त्रके यहां ही निवास करने छगे। सुमित्रका पुत्र अपने 
डॉकी शुक्षपामें छत गया || २७ ॥ यह सुमति बडाही 
स्मज्ञ एवम्‌ देवता और अतिथियोंका पूजक था | जब 
ताकी मरणतिथि आईं उस दिन वह पित्ाका श्राद्धक्र- 
के लिए तयार होकर ॥ २८ ॥ चन्द्रवती भार्यासे श्रद्धाके 
थ वोछा कि, हे चारुद्यसिनि ! आज मेरे पिताका सांव- 
तरिक श्राद्ध दिन हैं ॥२९।॥ है भीरु ! ब्राह्मणोंको भोजन 
राना हैं, तुम रसोई तैयार करो, पतिकी आाज्ञास उसने 
[क तैयार किया ॥३०।; सपने खीरमें जहर डाछ दिया | 
घुमतिकी जो माता कुत्ती होकर वहां रहती थी, उसने 
बैचारा कि; पूवेजन्मसें मेने रजस्वछा होकर भी भाण्डोंसे 
शा छुगाया था इसीसे मे कुत्ती वनी, | इस खीरको यदि 
बाह्षण खा तो मेरा पुत्र अद्महत्याका पातकी होगा, इस 
कारण उस छुत्तीन खीरके पात्रोंस मुख छृगा दिया ॥३५॥ 


घ्ुरे है" र > 
न्द्र्ब्तीने यह देख, जरूती लकडी उसके शिरमें मार दी, 


उस सुमध्यमाने अन्नको दुर गेर पात्रोंको थो रिया 
0 ९९ ॥ पीछ दूसरी बार फिर रसोई तयार करके विधि- 


अन्न बाहर नहीं गेरा || ३३ || किंतु धरवीमें गद्ढढा खुदा- 
कर उससे डाल दिया। इससे उस कुत्तीका उस दिन 
अपने आप उपवाससा होगया, फिर रातकों वह कुत्ती 
भूखस अति पीडित हो अपने पति बेठके पास जाकर 
बोली कि, में भूखी मरती हूँ, आज मुझे खानेपीनेको ही. 
कुछ न मिला है।। ३४ ॥ ३५ | पत्रावछिमें जो आस दिया 
ज पे गे (2 

जाता है वह भी नहीं मिल्धा इससे मूख मुझे अत्यन्त पीडित 
कर रही है, और दिन तो यह भेरा पुत्र छेह्म पेय दिया 
करता था ॥ ३६॥ आज तो कुछ झूठा मुझे नहीं दिया 
हैं, खीर॒में सपने जहर गेर दिया था ॥ ३७॥ मेंने शोचा 
कि, यदि ह्विजोत्तमोने यह खाड़ी तो अवश्य भरेंगे, इससे 
उसे छू छिया,में बांधकर बहुत पीटी गई हूँ | ३८ ॥| उससे 
मेरा शरीर बहुत पीडित होगया, कटि टूट गयी है, अब 
क्या करूं | यह सुन वो बेर कहने छगा कि, हे भद्दे ! तेरे 
पापके दोषस ॥ ३९॥ में इस सारवाहकी योनिंय पडा 
हुआ हूँ, स क्ष्या करूँ १ मेरी चलछनेकी शक्ति नहीं थी तो भी 
आज मुझको द्निभर अपना खत जोतना पडा हैं ॥। ४०॥ 
भरा झुंह बाँध दिया, सुझे बहुत पीठा, इसने मेरा जो श्राद्ध 
विया हैँ वह सब नि:फछ होगया, क्योंकि में तो इतने 
कष्टमें पडा हुआ हैँ ॥४१॥ श्रीकृष्ण चन्द्र बोले--हे भारत 


कि 


| एब्ले वे दोनों मातापिता कुत्ती और बैछ बनकर रातमें अपन 


बतानि, ] भाषाटीकासमेतः । ( २०३ ) 
(४ | विदित्वा तु दत्तवाव सुमतिस्तदा ॥ तस्यां' रजन्याँ तत्काल ददो 
तस्ये च ओजनम्‌ ॥ ४३ ॥ तदासों हुःखितः पुत्रों हन्‍्दाऋूइ्यां लथा तयोः ॥ मातापित्रोस्त 
राजेन्द्र हुतं संगस्थितो बनम्‌ ॥४४॥ ज्ञाठ॒मिच्छामि वे कष्टमिति निश्चित्य भारत ॥ तत्र गत्वा 
' झानवृद्धानबीन्‌ परमधानमिकान्‌ ॥ ४५ + अभिप्त्यात्रवीद्राक्य हि6त॑ चेब तदा तयोः ॥ खुमाति- 

रुवाच ॥ कथयध्व॑ विप्रवर्यो: मश्नमेक समाहिताः ॥ ४६॥ केन :४ट्टि:झेऋ पितरों में तपो- 
धनाः ॥ इमामवस्थां संप्रा्तों मोहसेत पातकात्कथम्‌ ॥ ४७ ॥ कृष्ण उबाच ॥ तदाकर्ण्य बच- 
स्तस्थ खुमतेडःखितस्य च ॥ ऋषिः सर्दतपा नाम सर्वज्ञः कझुणान्वितः ॥ ४८ ॥ छुमातें पत्यु- 
वाचद तात्पित्रोछ्ठक्तयें तदा ॥ ऋषिरुवाच ॥ तव माता पुरा विप्र स्वगहे बालभावतः ।४९॥ 
प्रातमृतु विदित्वा तु संपक्मकरोद्दिज ॥ तेन कर्मदिपाकेन झुजीयोग्हिएगता ॥५गा पितापि 
स्पशदोबेण बलीवदी बनूव हु ॥ एतयोप॑क्तिकामाय कुर त्वमृषिप्मीम्‌ ॥ ५१॥ माया 
सह विभेन्‍द्र ऋषीन्‍्संपूज्य यत्रतः ॥ आचरस्व बतं॑ तत्र सतवष द्विजोतचम ॥५२॥ अस्‍्ते 
चोद्यापनं कुयोद्धततिशाठविवर्जितः ॥ शाकाहारस्त कंतव्यों नीवारेः इयामकेस्तथा ॥ ५३॥ 
कन्दवाध फलेमूलहेलकुष्टं न भक्षयेत्‌ ॥ प्राप्य भाद्रपदे मासि शुक्षपक्षस्थ पश्चमीम्‌॥ ५४॥ 
तस्थां मध्याहसमये नद्यादों विमले जले ॥ कृत्वापामागंसमिधा दच्तधावनमादितः ॥ ५५ ॥ 
आयुबेल यशो वचेः प्रजा पशुवसूनि च ॥ ब्रह्म प्रज्ञां च मेधां च त्व॑ नो देहि वनस्पते ॥ ५६ ॥ 
संप्राथ्यानेन मंत्रेण कुर्याद्दे दस्तथावनम्‌ ॥ सुखदुगन्धिनाशाय दन्तानां च विशुद्धये ॥ ५७ ॥ 
छीवनाथ च गात्राणां कुबेर दब्तवावनम॥अनेन दन्तान्संशोध्य स्वायान्मृत्सानपूर्वेकम्‌ ॥५<८॥ 
तिलामलककल्केन केशान्संशोध्य यत्नतः ॥ परिधाय नवे शुद्धे वाससी च समाहि तः। ५९॥ 
पूजयस्‍्व ऋषीन्दिव्यानरून्धत्या समम्वितानाकश्यपो$तजिसेरद्राजो विश्वामित्रोष्थ गोतमः ॥६०॥ 





भयोः ॥ ४२ ॥ पितरों तो 





अपना दुःख कहरहे थे; उसको छुनकर ॥ ४२ ॥ सुमतिन | 


जानहिया कि, ये दोनों मरे माता पिता हैं, उसी रातकों 


उसने दोनोंको भोजन दिया ॥ ४३ ॥ वो पुत्र अपने सा: | 
बापोंकी ऐसी अवस्था देखकर हे राजेन्द्र ! वनको चल | 


बातको जाननेके छिये ही वो वनमें गया था. वहाँ उसने 


परम धामिक ऋषियोंकों | ४७ | प्रणाम करके उनके | से पहिंडे दन्तथ कक पलक 
ख ५ >> - - | समिधसे पहिल दन्तधावन कर ॥ ५०॥ दन्त धावन 
सामने मातापिताके कल्याणकारी वचन कहे कि, हे श्रेष्ठ | ह्डद द्‌ 


आप | 


बुद्धिमान्‌ आह्माणों ! में आपसे एक प्रश्न पूछता हूँ 
एकाग्र होकर कहें ॥ ४६ ॥ हैं तपोधनो ! कस कमविया: 


लिया था, उसी कमंविषाकसे वह कुतिया बनी हें ॥ ५३ || 
॥आक धर बे 
आपका पिता भी स्पशके दोषसे बेल होगया है.इन दो सोंको 





साल वषतक इस त्रतको करना || ५२॥ घन्के छोभको 

छोडकर अन्‍्तमें उद्यापन और शाकाहार करना चाहिये। 
कक का 5 कं] न 

नीवार या इ्यामाक भी काममें ले लेने चाहिये।५ १॥अथवा 

कन्द, मूठ, फछ इनसे आहार कर छे,' पर हल जोचकर 


हके समय नदी आदि निर्मेछ जलके किनारे अपामागकी 


करनेसे पहिले “ आयुबछ ? इस मन्त्रको पढता हुआ उछ 
अपामागके काप्ठका स्पश करे कि. हे वनस्पते ! तुम आयु 


कसे मेरे माता पिता इस दशाको प्राप्त हुए हैं? मैं केसे | न्‍छे) यश, बच, (तेज ) प्रजा ( सनन्‍्तान ), बसु ( धन ) 


उन्हें छुटाऊं ? सो कहिये। ४७ ॥ भगवान्‌ कृष्ण बोले | के शान और मंधा ( स्मरणशक्ति ) को मुझे दो ॥५६॥ 
कि, उस दुरिित सुमतिके ऐसे वचनोंकों सुनकर दयारु 
सर्वज्ञ सवेतपा नामक ऋषिन उसके ॥ ४८ ॥ मसातापिता- 
ओंकी म॒क्तिका उपाय बताया कि, हे विश्र | पहिल जन्ममें | 
अपने घरमें तेरी माताने बाल्भावक्रे कारण ही 9४५९ ॥ | 
प्रापहुए ऋतुकाककों जानकर भी हे छ्विंज ! सम्पक कर | 


दन्‍्तधावनके समय मनमें यह भावना रख कि, से सुखकी 
पलक # भा ३ ३2 ५५३ ८! के का. ५ 

दुगन्धीक दूर होनेके छिय एवम्‌ दौतोंके साफ होनेके लिये 
कक गे गा २2 

ओर गात्रोंके छ्ीवन ( कफ पातन द्वारा शुद्धि ) के छिये 

दन्‍्तधावन करता हूं। इस प्रकार अपामागक्क काएसे दाँतोंको 

हक, रु के. २३ 
मलकर कुल्ल करे,फिर मत्तिका ऊृगाके स्तान करे ॥|५७॥।५८॥ 


| पीछे तिछोंकी ओर ऑवलोंकी पीठी छूमाकर के शोंके मेल को 


+ छाटानेके लिये न्‍ इनका | अच्छी तरह दूरकरे, पीछे समाहित हो दो शुद्ध नूतद वस्य 
इससे छुटानेक छिय तू ऋषिषचमी कर ॥ ५१ ॥ हे त्रिप्र- | धारण करे ॥५९॥ फिर अरुन्धतो सहित दिव्य सप्त ऋषि 


हलके 7 यः कि थ्‌ ६ कप 5 ओर क 
न्द्र | खीके साथ ऋषियोंका पूजन करके अयत्नके साथ | योंकी पूजा करे । वे खात ऋषि यहें-१कश्यप, २ अबन्नि 


१ कर्तव्य: स्यामाकाहार एवं च। लीवारेवाँपि कतैव्यों हछक्ट न सक्षयेत्‌ इत्यपि पाठः अन्नाहार इति शेबः 


बतराजः । [ पश्चमी- 


















६६747 38266 #0४६57224# 52/7९/7738 





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(२०४ ) 











अपील मेसिकतिलान+ कहमलमकमि 


जमदश्विसिष्ठश्ष साध्वी चेवाप्यरन्धती ॥ मन्त्रेणानेन सतर्षीन्‌ पूजयेत्सुसमाहितः ॥ ६१॥. 
बतेन ऋषिपश्चम्याः कृतनेव द्विजोत्तम ॥ ऋतुसंपर्कजो दोषः क्षय याति न संशयः ॥ ६२॥ | 
श्रीकृष्ण उवाच ॥ तच्छृत्वा सुमातिवाक्यं परममृषिभाषितत्र ॥ गशहमेत्य तब्रत चक्र समायः 
श्रद्धयान्वितः !! ६३ ॥ व्रत तु ऋषिपथ्म्याः सर्वपापत्रणाशनम्‌ ॥ कृत्वा स्व यथोक्त च माता 
पित्रोः फल ददों ॥६७॥ ब्रतपुण्यप्रभावेण माता तस्य श्रयोनितः३ ॥ मुक्ता नृपतिशादूल विमान- 
वरसंस्थिता ॥ ६५।। दिव्याम्बरधरा भूत्वा गता स्वरग च भारत ॥ पितापि स मृतो मुक्तः 
सुमतेः पशुमोनितः ॥ ६६ ॥ स्वग प्राप्तो महाराज व्रतस्यास्थ प्रभावतः ॥ काथिक वाचिक 
वापि मानस यज्च दुष्कूलम्‌ ॥ ६७ ॥ तत्सव विलय याति ब्रतस्थास्य प्रभावतः ॥ तस्य यज्ञा- 
यते पुण्य तच्छुणुष्व नृपोत्तम ॥ ६८ ॥ सर्वेत्रतेष्ठ य॒त्पुण्ये सर्वेतीर्थे यत्फलम्‌ ॥ सर्वदानेषु 
दत्तेषु तदेतद्रतचारणात्‌ ।।६९॥ कुरुते या ब्रतं नारी सा भवेत्सुखभागेनी ॥ रूपलावण्ययक्ता च 
पुत्रपोत्रादिसंयुता ॥७०॥ इंह लोके सदेव स्यात्परत्र च पर्रा गतिम्‌॥ एततचे कथित राजन व्रता- 
नामुत्तम॑ ब्रतम्‌ । ७१ ॥ सर्वेसप्त्मद चेव नारीणां पापनाशनम्‌ ॥ धन्य यशस्यं स्वग्स च पुत्रद 
च युधिष्ठिर॥ पठतां श्रण्वतां चापि स्वेपापप्रणाशनम्‌ ॥ ७२ | इति श्रीमविष्यपुराणे ऋषिपश्वमी- 
ब्रतकथा संपूर्णा ॥ अथोद्यापनम्‌ ॥ युधिष्ठिर उवाच।किम स्योद्यापन॑ मोक्त ब्रतपूर्णफलप्रदमासुमतिः 
केन विधिना चकार वद तत्वतः ॥१॥ कृष्ण उवाच ॥ पूर्वस्मिन्दिवस कुर्यादेकभर्त समाहित) 





३ भरह्ाज, ४ विश्वामित्र, ५ गौतम ॥६०॥ ६जमदक्‍्िः ७ | दिकोंसे भूषित हुईं विधानपर चढ स्वरगम चली गई,हेसारता 


भगवान्‌ वसिष्ठ और आठवीं पतिब्रवा महाभागा अरु- 
न्धती । इनका पूजन इनके ही नामोंसे मन्त्र कर्पना करके 
समाहित हो करे कि, “ ओं भूसुंवः रवः कश्यपाय नमः 
कष्यप्सादाहयामि, कश्यपके लिये नमस्कार है कश्यपको 
बुलाता हू, भो कश्यप इहागच्छ हैं कश्यप यहां आ, इह 
तिष्ठ यहां बैठ, पूजा गृह्याण पूजा अहणकर, ओ भूशुवः स्व: 
अरुन्धती सहिताय वसिष्ठाय नमः अरुन्धदी सहित वसि* 
एके लिये नमस्कार हे, अरुन्धती सहित वसिश्ठमावाहयामि 
अरुन्धती सहित वसिष्ठको बुढाता हैँ ” इत्यादिरूपसे 
नाममन्त्रोंकी कल्पना करके अरुन्धती सहित सप्तषियोंका 
पूजन करना चाहिये। ६१ ।| ऋषिप अ्वमीक ब्रतके करनेस 
ऋतुकालके सम्पकंका पातक अवश्य नष्ट होगा इसमें 
संशय मत करो ॥ ६२ || श्रीकृष्णचन्द्र बोडे कि, सर्वतपा 
ऋषिक उत्तम वचनोंकों छुनकर सुमति अपने घरपर आया। 
फिर श्रद्धान्वितहो उसने अपनी मार्यक्े साथ उसी विधिसे 
समस्त पातकोंका अन्त करनेवारा ऋषिपच्चमीका ब्रत 
किया ॥ ६३ ॥ जैसे स्वेतपा मुनिन बत करना बताया था 
ठीक उसी रीतिस उस्र सुस्ति ब्राह्मणने ऋषिपच्चीके 
ब्तकों ( सात्‌ वर्षतक ) ररके ( उद्यापनके बाद ) उसका 
उप रठ अपने मातापिताओंके लिये दे दिया ॥६४॥इसके 


सिलनेस ही उसकी माता जयश्नी कुत्तीकी योतिसि छूटकर हे 
देती विशादक ! उत्तम विमानपर चढ़ गईं बह 


हैं महाराज/!वह सुम्तिक्ा पिताभी बेठकी योनिस छूटकर 
र्रग पहुंच गया | कायिक, वाचनिक और मानसिक जो 
जो पाप हों ॥६५-६७॥ वे सब ऋषिपच्चमीके ब्रत करनेसे 
विलीन होजाते हू । हैं तृपोत्तम ! इस ब्रतका जो पुण्यफछ 
होता है उसे म सुनाता हूँ, आप सुने ॥ ६८ ॥ दूसरे दूसरे 
जो ब्रत ह उन सबके करनेसे तथा सब तीथ्थोंके सेवन एवं 
सब दानोंके करनसे जो पुण्य होताहे बह सब इस एक ऋषि 
पञ्चमीके बतानुष्ठानसे मिछतां हे ॥ ६९॥ जो ख्री इस 
ब्रतको करती है वह सदा सुख भोगनवाढी और रूफ छाव- 
ण्यस सम्पन्न एवं पुत्र पौत्रादिशालिनी होती हैँ ॥ ७० ॥ 
इस छोकम सदा सुखभोग,परलोकर्म सद्गतिको प्राप्त होती 
है हे राजन ! मने ब्रतोंमें उत्तम ब्रत तुम्हारे छिथ कहा हैं 
॥७१ ॥ है युधिष्ठिर ! यह ब्रत सब सम्पत्तियोंका दनेंवाला 
खियोंके पापोंका नाशक, धन्य, यशस्य, स्वग्ये और पुत्र- 
सुखका देनेवाछा है। इस ब्रतकी कथाको जो पढते या छुनते 
हैं उत्क सब पाप नष्ट होते हैं | ७२ ॥ यह्‌ भविष्य पुरा' 
णका कह हुए ऋषिपेचमीके ब्रवकी कथा पूरी हुईं अब 
उद्यापनकी विधि कहत हैं-युत्रिष्टिर बोले कि, इस ब्रतका 
उद्यापन किस प्रकार करना चाहिय ! सो कहिये, जिसके 
'करनेस ब्रतको पूरा फछ मिले । सु8तिने किस प्रकार उद्या' 
पन् किया था सो आप यथार्थ हपसे कहो |। १ ॥ श्रीक्षष्ण 


दिव्य बस्तर - चन्द्र बो छे कि,ब्रत करनेवाला उद्यापनके प्रथम दिन अर्थाव 


१ प्रयत्नेनेत्यपि पाढ:॥ २ ग्राप्तोतीति शेषः । 


भाषाटीकासमेलः । 





(२०५ ) 







प्रातरत्थाय सुस्नातस्ततो गुरुमहं ब्जेत ॥ २॥ पार्थयेत्त व्यकाचायों मवोश्ापनकर्मणि।पूर्वो- 
केनेव विधिना स्नात्वा भक्‍त्या समन्वितः ॥ ३॥ शुचौदेश समालिप्य सर्वोतोभद्रमण्डले ॥ 
अव्रणं सजल॑ कुम्मं ताम्न मृन्मयमेव वा ॥ ४॥ संस्थाप्य वखसंबीत झम्यरेदं सुशोभनम।॥॥ 





॥०/ आस 


पंथ्वरत्नसमायुक्ते फलगन्धाक्षत्रेधुनय ॥ ५ ॥ सहिरण्य॑ समाच्छाद्य ताम्रेण पटलेन वा।॥ वश- 
मृन्मयपात्रण यवपूर्णन चेव हि॥ ६॥ आच्छादयेत्त चेलेन लिखदष्टदर्ल ततः ॥ सोवर्ण्यः 
प्रतिमाः कार्यो ऋषीणां भावितात्मनाम्‌ !। ७ ॥ पलेन वा तदर्घेन तदर्धाधेन वा पुन३॥। शाउत्या 
वा कारयेत्त्र वित्तशाव्यविवाजतः ॥ ८ ॥ वितान॑ पश्चवण च फलपध्पाा सत्िितिई ॥ बध्नीया- 
दुपरि श्रीमत्सेभारान्‌ संविधाय च ॥ ९ | मध्याहे पूजयेद्भधवत्या ऋषीजछद्धासमन्वित:: ।। कइय 
पोषजिभिरदाजो विश्वामित्रोषष गौतमः ॥१०॥ जमदश्निवेसिष्ठश्ष साध्वी चेवप्यरन्धती ॥ मन्‍्त्रे- 
णानेन राजेन्द्र कृत्वा पूजा समाहितः ॥| ११॥ रात्रों जागरण कुर्यात्पुराणश्रवणादिल्निः ॥ कृत- 
नित्यक्रियः प्रातज्र.हुयात्तिलसपिंष ॥ १२९॥ वेदिको वाथ पोराण अंधिकारान्मठुः स्घुतः ॥ 
अष्टोत्तरसहस्म॑ वा शतमष्टोत्तरं तु वा ॥ १३ ॥ पुनः पूजां ततः कृत्वा गुर संपजयेद्रती श्वर्णों- 


।। 


ने 


बज 


डुगुलीयवासोभिः कुण्डलामृतभोजनेः ॥ १४॥ दुष्यदेकां सवत्सां च श॒रवे गां पयस्विनीम ॥। 
पूजयेदत्विजः सप्त वासोभिदेक्षिणादिद्विः ॥ १५॥ कलशालुपवीतानि द्यात्तेम्यः खुमछितः ॥ 
आचाये च सपत्नीक॑ प्रणिपत्य क्षमापयेत्‌ ॥२६॥ भोजयेद्राह्मणान भकत्या दीनानाथान प्रतर्ष्य 


चोथके दिन समाहित हो ऋषियोंके चरणोंमें ही चित्त 
छगावा रहे, एक वार भोजन करे। दूसरे दिन प्रातःकाछ 
उठकर विधिवत स्नानादि करे, फिर गुरुके घरजाय ॥२॥ 
और प्राथना करे कि हे प्रभो | आप उद्यापन करानेके लिये 
आचार्य होवें। फिर पूर्वोक्त विधिके अनुसार स्नान करे 
॥ ३ ॥ भक्तिपूर्वेक पवित्र ख्थलमें गोमयादिकोंका लेप करे 
उसमें सर्वतोभद्रमण्डल लिखे, उसके मध्यमें अव्रण, जल- 
पूर्ण तांबेका या मत्तिकाका कछश ॥ ४ ॥ स्थापित करे 
उसके कण्ठभागम सुन्दर वस्त्र बॉधे; उसमें पन्च रत्नॉको 
छोडके पूगीफछ, गन्ध, अक्षत ॥ ५ ॥ ओर सुवर्ण भी 
डाले । पीछे तांबेके, काप्ठके या मृत्तिकाके यवपूण पात्रसे 
उसके मुखको ढक दें | ६॥। उसके ऊपर वस्त्र बिछावे, 
उसमें अष्टद्छ कमछूका आकार छिखे, उसके आठ दडोंमें 
कश्यपादि सप्त ऋषियों तथा आठवी अरुन्धतीकी सुवर्ण- 
मयी ( आठ ) प्रतिमाओंको स्थापित करे || ७।॥ वो एक 
या, आधे या चोथाई पछ सुबणकी होना चाहिये, इनके 
बनानेवाला जैसी सम्पत्तिवाला हो तदनुसार ही सुबर्णकी 
कमी बंशी करे, वित्त रहते कृपणता न करनी चाहिये ॥८॥ 
फिर सवतोभद्रमण्डलके ऊपर वितान करे; उस वितानका 
बस पांचरद्गका हो, उसके चार भागोंमें या विशेषभागोंमे 
जैसा सम्भव हो फछ और पुण्पोंको छटकावे, वित्ानके 
ऊंपर भी ध्वज पताकादि बाँध । एस उत्तम उत्तम सम्भा 

रोंसे उस सर्वेतोभद्रमण्डडठकी शोभा ठीक करके | ९॥ 


१ असंधिराष:। 


भक्ति और श्रद्धा सहित मध्याहमें अरुन्धती सहित सप्रषि- 
योंका पूजन करे । “ ओ सूझुवः स्व: कश्यपाय नमः कश्य- 
परमावाहयामि ? कद्यपके छिये नमस्कार, कश्यपको बुला“ 
ताहूँ। पूर्वोक्त नाममन्त्रॉसे हे राजन्द्र | कश्यपादि वसि- 
पछ्वान्त सात ऋषियों और अरुन्धतीका आगहनादि षोड- 
शोपचारविधिसे पूजन करना चाहिये ।। १० ॥ ११ ॥ रातमें 
जागरण करे, उसमें पुराणोंकी पवित्र कथाओंका श्रवण, 
पठन और मननादि कर फिर प्रातःकाल नित्यक्रिया करके 
तिल घृतसे हवन करे।! १९२ ॥ अधिकारिके अनुरूप वेदिक 
या पौराणिकमन्त्र समझने, यानी यदि त्रती उपनीत हो तो 
वेदिकमन्त्रोंस, यदि न हो तो पोराणिकमन्त्रोंस ही हवन 
करे । मन्त्रोंके अन्त ' स्वाहा इस पदकी योजना करनी 
चाहिय | आठ अधिक एक हजार, या एक सौ आठही 
आहुतियां दे ॥| १३ ॥ हवनान्तसे फिर पूजा करे फिर जा- 
चायकी पूजा करनी चाहिये । सुवणकी अँगूठी, वस्र: 
कुण्डडल और मधुर भोज्यपदाथे दे ॥ १४ ॥ बच्छे समेत 


| दूधवाली एक गौको भी आचायेक लिये दे । सात ऋतिवि” 


जोंको सात वसल्र और दक्षिणा देकर उनका पूजन करे 
॥ १५ ॥ इनके छिये भक्तिस कलश और यज्ञोपवीतका 
दान करें| सप्त्नीक आचार्यके समीप जाकर उनके चर- 
णोंमें प्रणाम करके क्षमा प्रार्थना करे || ६६ । कि; सेरा यह 
ब्रतोद्यापन आपके अलुग्रहसे परिपूर्ण हो, इसमें जो मेने 
न्रटि की हो वे सब आपक आशीर्वादसे पूण हो. आचय्येभी 























(२०६ ) कक 














(शकनकककाकाककणकम् शक कक मम पम्प चचन्म्य्न्स्य्य््ल्च्क्कक्् «७५ «.. 6७6 4... ७ 


च।लव्ध्वाठज्ञां ठ उख्जीत इष्टबस्थुजनेः सह ॥१७॥ डद्यापनविधिः मोक्तः स्वेत्रायं फलाथिनाम॥ 
एवं या कुरुते भूप उद्यापनवि्थि परम्‌॥१८॥ सर्वेपापविनिसृक्ता स्वर्गे लोके महीयते ॥ इह लोके 
चिर काले भत्रा सह शुचिस्मिता ॥१९॥ पुत्रपोत्र: परिवता जुक्त्वा भोगान्मनोहरान ॥ निष्पापा 
सुभगा नित्यं लभते चाक्षयां गतिम्‌ ॥२७॥ इति श्रीमविष्यपुराणे ऋषिपंचमीत्रतोद्यापनविधिः ॥ 
उपाइलकिताबतम्‌ |. ' | 

आधिनशुकृषपश्वम्पामुपाडुललिताब्रतम्‌ । तत्र दाक्षिणात्यानां शिष्टाचार एवं प्रमाणम्‌। तत्च 
मध्याहव्यापिन्याँ कार्यम “पूजाबतेष सर्वेषु मध्याह्ृव्यापिनी तिथिः” इति माधवीये हारीतोक्तेः। 
दिनद्ये तब्यातावव्याततों वा पूर्वी युगभूतानां  इति झुग्मवाक्यथात्‌ यत्तु शक्तिपूजायां रात्िव्या 
पिनी आह्यति भूरिजन्मा जजलप ततुच्छमारात्रिव्यापिन्या प्रहणे प्रमाणश्ञावात्‌ । “श्ुक्‍त्वा जाग- 
रणे नक्ते चन्द्रायाध्यत्नते तथा । ताशातेए सर्वे राजियोगो विशिष्यते॥” इति हेमाद्रबुदाहतव 
चनस्य जागरणप्रधानत्रतविषये सावकाशत्वाव अड्भातुरोधेन प्रधाननिणयश्य क्राप्यदफ्तत्वा- 


८ एवमस्तु ” ऐसे कहे, ब्राह्मणोंको भक्तिसे भोजन करावे, 
दीन अनाथजनोंकी याचत्रा पूर्ण करके उनको संतुष्ट करे, 
ब्र'ह्णोंकी अनुमति छेकर प्रियजन एवं बान्धवोंके साथ 
भोजन करे || १७ ॥ यह उद्यापनविधि है, जो ब्रतका संपू 
णेफछ चाहते हैं उनके लिये यही विधि सब शाख्रोंमें लिखी 
है । है राजन्‌ ! जो खत्री इस उत्कृष्ट उद्यापन विधिको करती 


है ।। १८ ॥ वह सब पापसि निमुक्त हो स्वगम सुख भोगती | 


है तथा इस लोकमें भी वह मन्दह्मसिनी पतिके साथ चिर' 
भोगती है, निष्पाप बह सुभगा दिव्य पदको प्राप्त होती है 


उद्यापनविधि पूरी हुई |! 


उपाज्ललिताबव्रत-आश्रित सुदि पञ्चमीके दिन होता है । | 
इसका प्रमाण केवल दक्षिणियोंका परम्पराप्राप्त शिष्टाचार | 
ही है । यह उपाइ्ुछुलिताब्रत मध्याह्व्यापिती तिथिमें | 
करना चाहिये. क्‍योंकि, काल्माधवर्म .माधवाचायन हारी- | 
तस्व्ृतिके वाक्यका आधार छेकर पूजाग्रधान सभी ब्रतोंमें | 
मध्याहव्यापिनी तिथि ग्रहण करनी लिखी है । पश्चमी दो | 
दिन सध्याहव्यापिनी हो अथवा दोनोंही दिन नहीं हो तो 


पहिल दिन ही यह त्रत क्रना चाहिये. क्‍योंकि * युगमू- 
तानाम्‌ ? यह युगमवाक्य हैं यानी जब ब्रततिथियोंके लिण- 
यक समय यह सन्देह उपस्थित हो कि, यह तिथि दोनों 


क्यस निर्णय करना चाहिये; यह शाखकःपरोंका सिद्धान्तहे। 


र्द्रेण डाइशीयुक्ता चतुद्ज्या च पूर्णिमा ॥ ग्रतिपद्यप्यम्ाव 
पा 'जुग्म सहाफलम्‌। एतद्व्यस्त महादोष॑ (दुु़ ) 
हद 3>वे पुराकुत्म ॥” द्वितीया-युग्म, तृतीया-अग्नि, 


दसचु, नवसी-रन्ध, एकादशी-रुद्रस द्वादशी, चतुद्शीसे 





पूर्णिमा, प्रतिपदा और अप्तावस्या इन तिथियॉमें दो दो 


तिथियॉका योग हो यानी ह्वितीयाके साथ दृतीयाका, एवं 
चतुर्थीके साथ पञ्चप्तीका इत्यादि ऋमसे संयोग हो तो यह 
अत्यन्त पुण्यफलका देनेवाला हें और इनका संयोग ने 
होना पूर्वोपाजित पुण्यको भी नष्ट करता है ॥ जो भूरिज- 
न्‍्माने यह कहा है कि, उपाड्भछलिता शक्ति देवी है, अतः 
इसके पूजनमेंभी रात्रिव्यापिनी ही पश्चमी प्रहण करनी 


| चाहिये, यह उनका कहनासी तुच्छ है यानी अविचार 
काल । १९ ॥ पुत्रपौत्रोंके 'सुखको देखती हुईं सुन्दर भोग | 


रमणीय है.क्योंकि, उपाकुझुलिताकी ब्रतकथामें कोई विशेष 


हे कक. ५ क्‍ वाक्य तो मिललाही नहीं कि, रात्रिम उपा[ज्भछुछिताका 


पूजन करे. शक्तिपूजाभी विशेषप्रमाणके न होने पर मध्या- 


| हमें ही की जासकतीहे इससे यहभी सिद्धान्त बाधित नहीं 
' हुआ कि दुर्गा लक्ष्मी पूजनादिभी दिनम क्‍यों नहीं किये 


जाते रात्रिमही क्‍यों होते हैं ! क्योंकि-दुर्गा लक्ष्मी आदि 
देवियों का पूजन रात्रिंस कएना स्मृत्यन्तरमें सिद्ध है। यदि 
इस ब्रतकी कथाम राजिपूजाका वर्णन मिछता तो राधिव्या- 
पिनी ही आाह्य मानाजाती | यदि ऐस कहें कि, “ रात्रों 
जागरण छुर्याद्रीतवा दित्र निःस्व ने: इस ब्रतकी कथामें यह 
लिखाहे कि, गान वाद्यादिं करता हुआ रात्रिमें जागरण करे। 
जागरण रात्रिमें ही विहित हे. इससे पूजन भी रात्रिमें ही 
करे,यह सिद्ध नहीं. क्योंकि,नागरणादिरूप पूजाके अज्ञ भूत 


4 आय | कमा अनुरोधसे प्रधानभूत पूजनादिरूप क म्मोके करनेका 
दिन उस समयमें वत्तमान है, या दोनों ही दिन उस सम- | 


यमें नहीं हैं तब किस दिन ब्रत किया जाय ! तब युग्मवा- | 


निणय करना किसीभी शाझ्में नहीं मिलता । इससे अड्ज 
( गौण ) रूप जागरणका राज़िम विधान मानकर भड्डी 


| ( प्रधान ) पूजाका विधान भी रात्रिम मानना ठीक नहीं 
युग्मवाक्य- युग्माप्ियुगभूतान [ पप्भुन्योवसुरन्प्रयो: । 


है। हेमादिने काछनिणय: प्रसज्ञमें “ भ्ुक्‍्त्वा ”' इत्यादि 


| निर्णायकवाक्य लिखा है । इसका यह अर्थ है कि, भोजन 
| करके जागरण करना जिसमें विहिंत हो बथा राजिमें जो 


| ब्रत विहित है ( जेसे कोजागरीब्रत ) एवं जिस व्रत चनद्र- 
चदेथ-युग,पत्च्नी-भूत, पष्ठी-षट्‌, सप्तमी-मुन्ति, अहमी- | 


माके लिये अध्येदानकरना लिखा हो ( जैसे क्ृष्णपक्षकी 
च॒तुर्थीत्रत ) जो जो ,ताराज़त हैं, इन सबसें रात्रिव्यापिनी 


बरतानि, ] शावाडीकाहरैंडट । 
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दड़भूतजागरणाइरोधेनेतत्रिणयस्पायोग्याइ: रा डिधिस्तु-भातसरत्थायावश्यकं॑ कर्म निर्व॑ेत्ये 
वन गत्वा--आयुवल यशो वर्चः प्रजा: पशुवसूति च ॥ बह प्रज्ञां च मेधां च त्वं नो देहि वनस्पते॥ 
इति मंत्रेण वनस्पति संप्राथ्य ॥ अपामागंसमुद्धतेदेश्तकाष्ठेोः करोम्यहम ॥ दत्तानां घावन मात: 
प्रसन्ना भव सर्वदा ॥ इति मंत्रेणाष्ट चत्वारिशत्काहान्युपादाय नद्यादों दच्छेत ॥ ततो झुखदुर्ग- 
न्विनाशाय दन्‍्तानां च विशुद्धये ॥ छीवनाय च गंजाएं कुबह दन्लधावनमिति मंग्रेणाहच- 
त्वारिशद्वांर दन्‍्तधावन कृत्वा यथाविधि स्नानानि विधाय शुके वाससी परेधाय ग्रहमाग- 
च्छेत ॥ ततः शुचौ देश मण्डपिकां कृत्वा तन्मध्ये सुबवर्णोदिनिमतां करण्डकपिदानरूप 
प्रातिमाँ स्थापथित्वा षोडशोपचारविद्येषतों दूवान्रिश्ध पूजयेत ॥ ततो विशत्या वटकेवीयने 
दर्वा तावद्विवेटकेः स्वयं भोजन विधाय विसजेन कुयोंदरति ॥ अथ पृजा--आचम्य आणाना- 
यम्य देशकालों सकीत्य पुत्रविद्याधनरोगनिमनुक्तिसडुखोविजयपुष्टचाधुष्यादिकामः, सत्री तु अबे- 
धव्यकामा, उपाड्रललिताप्रीत्यथ. यथामिलितोपचारेशूपाड्ुललिताएजनमहं करष्ये इति 
सकलप्य पूजयेत ॥ नीलकोशेयवसनां हेमामा कमलऊा[सनाम्‌ ॥ मक्तानाँ वरदां नित्य ललिता 
चिलन्तयाम्यहम ॥ ध्यायामि ॥ आगच्छ लूलिते देवि सर्वेसंपत्मदाथिनि ॥ यावद्धतं समाप्येत 
तावच्व॑ सन्निधों मव ॥ हिरण्यवर्णा हरिणी छुवर्णरजतस्रजाम्‌ ॥ चन्द्रां हिरण्मरयी लक्ष्मीं जात- 
वेदों ममावह ॥ आवाहनम्‌ ॥ कातेस्वरमये दिव्य नानामणिगयान्वितम्‌ ॥ अनेकशक्तिसंयुक्त- 
मासने प्तिगह्यताम ॥ ता म आवह जातवेंदी लक्ष्मीमनप्गामिनीम्‌ ॥ ययस्याहिरण्य विन्देय 





तिथिका ग्रहण करे, इस हेमाद्विक वाक्यस यह सिद्ध हुआ | करके अपने घर चला आये, पीछे परमिन्र ( गोमयादिद्वारा 


कि-रात्रिव्यापिनी तिथि जागरणादि प्रधान कम्मॉसम भाद्य | 
हूँ और उपाज्ञललिता त्र॒व जागरण प्रधान नहीं हैं, इसलिये | 
यह त्रत मध्याहव्यापिनी पच्चमीमभ हो करना चाहिय | एस | 
माननेसे रात्रिव्यापिनी तिथि फिर कब आशय मानी जाय £ | 
क्योंकि सभी ब्रत पूजा प्रधान & इससे रात्रिव्यापिनी | करे | फिर बीस बडे छेकर वायना दे, बीस वरडोंका आप 
शड्ढा 

भी नहीं कर सकते, क्योंकि, राजिव्यापिनी तिथिमाननेके | 
लिय हेमाद्िके कहे हुए वाक्यके अनुसार जागरणादि | 
अवशिष्ट हैं, उनमें यह वाक्य चरिताथ होजाता 6 ॥ इस 
ब्रतकी विधि-पआककाछ जागकर आवश्यकोय कश्मोस | 


तिथिका विचार करना आदि भी निष्फ्लठ होगा । य 


निवृत्त हो जगलसें जाय वहां अपामागके समीप पहुच, 
(७५ क् ए २ 
: आयुबंल ” इश मंत्रल उसकी ग्रार्थना करे । फिर उपा 


विधिके अनुसार मृत्तिका गोमयादिसे सतान करे 
सफेद दो शुद्ध, अहत और अद्ग्ध वर््बोंको धारण- 





परिप्कृत ) स्थछूमें छोटा मण्डप बनाबे। उसके बीचमें 
अपनी शक्तिके अनुसार सोने आदिकी देवीकी प्रतिमा 
दनावे | इसको पिटारीके ढकतकी भांति स्थापित करके 
पोडशोपचार विधिस विशेष करके दूवाक्ते द्वारा पूजन 


भी भोजन करे;फिर देवीका विसर्जन करे | आवचम्नन और 
प्राणायाम करके देशकाछ कहकर पूजन करनेका सद्लुल्प 
करे कि, मे पुत्र; विद्या, धन; रोगोंस छुटकारा, सुख, 
विजय, पुष्टि ( पुष्ठता ) ओर आखुप्य इत्यादि प्राप्तिके छिये 
छा हुआ, पूजा करनेवाली ख्री हो तो-सदाके सोभा- 


| ग्यके लिये कामना करती हुईं में उपाज्ञ छछिता देवीकों 
| प्रसन्न करनेके छिये इस समय जो जो उपचार सामग्री 
छुललितादंबीक) पग्राथना करे कि, है मांतः | से अपायायक | 
काष्ठोंसे दन्वधावन करूंगा, इससे आप भ्रसन्न हों। पीछे | 
अपामागकी अडतालीस छकडी कछेकर नदी तलछाव आदि | 
किसी पवित्र जलाशयके किनारे जाय । फिर “मुख” इस | 
कछोकका उच्चारण करे कि; मुखकी दुगन्धीके विनाशाथ | 
दुन्‍्तोंकी पविच्नाके लिये और गात्रोंके अर्थात्‌ मुखके अब- | 
यव रूप जिह्ला55द्कि में साफ करनेके लिय द॒न्तधावन | 
करता हूं । फिर अडवालढ्लीस बार अडतालीस अपामागेकी 
शाखाक ढुकडोंस दांत और जीभ शुद्ध करके गा । 
फेर 


जपाउ्म्स म््ि 


उपस्थित हैं उनके द्वारा व्याजह्लकलिता देवीका पूजन 
करूंगा ( स्री हो तो करूंगी ) फिर पूजन करे । * नील- 
कौशेय ' इस ज्कोकको पढ़कर ध्यान करे कि; नीले रेशमी 
वखकों घारण करती हुईं सुवणक समान उज्ज्वल गौर 


कान्तिवाली; कमलछके आसनपर विराजमान हो भक्तोंको 


अभय देती हुई छलितादेवीका अतिद्न ध्यान करता हूँ। 
« आगच्छ ? इससे तथा " हहिरण्य ?? इससे आवाहन कर। 
पहिलेका अथ यह है कि, है छलिता देवी! आप यहां 
पवारें । आप सदा सभी सम्पत्तियोंकों देती हो, जब- 
तक मेरा यह त्रत॒ समाप्त न हो तबतक यहां ही रहें । 
« कातुखर ? इस पौराणिक तथा “ तांम आवह ?” इस 


बरतशाज)।.... [ पश्चमी- 























६263५ 4:॥2. ॥३2244 2259 55 ५042 54%; ;/00 785 





4 6/8% $ 8८4 १:४४ ४ 















ब्क 


गामर्थ प्रुषानहम्‌ ॥ आसनम्‌ ॥ गड्ढादिखवेतीर्थेभ्यों मया प्रार्थयाहतम्‌ ॥ तोयमेत्तत्‌ सुर 

स्पर्श पतच्चा्थ अतिशह्यताम्‌ ॥ अश्पूवी रथमध्यां ह स्तिनादप्रमोद्नीम्‌ ॥ श्रिय॑ देवीमुपहर 

श्रीमां देवी हुषताम्‌ ॥ पाद्यम्‌ ॥ विधान स्वेरत्नानां त्वमनध्यंगरणा ह्यसि ॥ तथापि भक्त्या लि 
गहाणाप्य नमोस्तु ते ॥ कांसोस्मितांहिरण्यप्राकारामाद। ज्वलन्तीद्तां तपेयन्तीम्‌ ॥ पद्मे स्थित 
पद्मवर्णा तामिहोपहये श्रियम्‌ ॥ अध्यम्‌ ॥ पाटलोशीरकप्रसुरणि स्वाह शीतलम्‌ ॥ तोयमा 
चमनीयाय ललिल अतिशह्यताम्‌ ॥ चन्द्रां भभासां यशसा ज्वरन्तीं श्रिय॑ लोके देवजष्टामुदा 
राम तां पद्मनेमि शरणमहं प्रपद्मेड्लक्ष्मीमें नश्यतां त्वाँ वर्ण ।आचम ०॥पयोद्ि घृत॑ चेव शक 
रामधुसंयुतम्‌ " पश्चामृतेन सपने प्रीयतां परमेश्वारि॥ आप्याय० ऋक्‌ । दधिक्राव्णो० ऋक्‌ | घृः 
मिमिक्षे इति ऋक । मधुवातेति ऋक। स्वाइःपबस्वति ऋक पंचाम्ृतस्तानम्‌ ॥ मंदाकित्या/समर 
ड्वूतं हेमाम्नो दहवासितम्‌ ॥ स्ानाय ते मया भकक्‍त्या दत्त स्वीक्रियतां जलम्‌॥ आदित्यवर्णे त' 
सोधिजातो वनस्पतिस्तव वृक्षोध बिल्वः ॥ तस्थ फलानि तपसा लुद॒न्ठु मार्यांतरायाश्व बाह्य 
अलक्ष्मीः | स्ानम्‌ ॥ सर्वनूषाधिक सोम्ये ठोकललानिवारणे ॥ मयोपपादिते तुभ्य॑ वासस 
प्रतिग्ह्मताम्‌ ॥ उपेठ मां देवसखः कीर्तिश्व मणिना सह॥ प्राइभूतोस्मि राष्ट्रेस्मिन्कीतिंमाई 
ददातु में ॥ वश्चम्‌ ॥ सुक्तामणिगणोपेतमन््य च सुखमदम ॥ उत्तरीय सुखस्पर्ष ललिते पति 
गहमताम्‌ ॥ उत्तरीयवख्यम्‌ ॥ कृष्णकाचाष्टकयुतं सूंत्र ग्रेवेयकं तथा ॥ दास्यामि कण्ठसूषां: 
प्रत्यद्कलित तव ॥ कण्ठमालाम्‌ ॥ मलयाचलसम्भूतं घनसारं मनोहरम्‌ ॥ हृदयान-दन चाह 
चन्दुने मतिण्हाताम्‌ ॥ क्षुत्पिपासामलां ज्येष्ठामलक्ष्मी नाशयाम्यहम्‌ ॥ अभूतिमसमांद्धें र 
सवा निर्णुद्‌ में गृहात्‌ ॥ चन्दनम्‌ ॥ अक्षता विमलः झुद्धा सुक्तामणिसमप्रभा:॥ भूषणार्थ मय 
दत्ता देहि मे निर्मलां घियम्‌ ॥ गर्द्वारां दराध्ों नित्यपुष्ठ॑ं करीषिणीम ॥ ईश्वर्शि सर्वभूताने 











श्रीतूक्तक मन्त्रस आसन प्रदान करे। पहिलका साव यह 


है कि, विविध रत्नोंसे जडित सुबर्णक इस अनेक शक्ति- 
शालढी दिव्य आसनके ऊपर विराजें | ' गंगा! इस तान्त्रिक 
तथा “अश्वपूर्वा!” वेंदिक मन्त्रसे पा प्रदान करे । तान्त्रिक 
मन्व्रक्ना यह अथे है कि, में प्राथंनाकर गल्लाउडदि पतित्र 
तीथथॉसे सुहवना जल छाया , आप इसे पायके लिये प्रहण 
कर । * निधान ' इस तांत्रिक और “ कांसोउस्मि ” इस 
वेदिकसन्त्रस अध्य दे। तांत्रिकमन्त्रका यह अर्थ है कि, 
यद्यपि आप सब रत्नोंके आश्रय ( उत्पत्ति कारणभूता ) 
एवम्‌ परम उत्तम गुणोंस पूण हो, तथाउपि हे छछितादवी 
आप अध्य लें आपके लिये प्रणाम है. । * पाटछोशीर ' इस 
तांत्रिक तथा “ चन्द्र प्रभासां ”! इस वैद्कमन्त्रस आच- 
सन करावे | तांत्रिकका यह अथ है कि, पाटछा खशखग 
और छपूरकी सुगन्धीस सुगंधित, मधुर ठंढा यह जल है । 
है छलितादेवी | आप इसे छेकर आचमन करें । 'पयोद्धि' 
इस तांत्रिकमेरकों पढकर पंचास्ृतस स्नान कराबे। और 


_ आप्यायस समेतु ” *द्धिक्राव्णो अकारिष ” « बृतत | यों 


मिसिक्ष हि है| क्र 


गे सथुव्वाता कतायते ” तथा * स्वादुः पवस्व” 
के पांच वद्क मन्त्रोंको भी पढ़े । तान्ध्रिकका यह अथ है 


! फुँथ, दृधि, घृत्त, सक्कर और सहद इत पांच अमृ तमय 


पदौस स्नान कराता । दे परमेश्वरि | आप स्तान क्र 


ओर ग्रसन्न हों।  मन्दाकिन्या ? इस तांजिक मन्त्रस तथ 
“४ आदित्यवर्ण ” इस बेद्किसन्त्रस शुद्ध जलूद्वारा स्नान 
करावे । तांत्रिकका यह अर्थ है कि, सुवर्णसह॒श पीत कम 
लॉकी सुगन्धीस सुर्गंधित मन्‍्दाकिनी गल्लाका यह पविः 
जरू स्तान करनेके हिये प्रेमस मेने आपके समपे/ 
किया है, इसे स्वीकार करें । “ सर्वे भूषाउधिके ! इस 
तांत्रिकसन्त्रको एवम्‌ “ उपेतु मां देव ” इस वैदिकमन्त्रक 
पढकर वस््र धारण करावे । तांजिक ज्कोकका यह अथ 
कि सब भूबणोंकी अपेक्षा उत्तम, छौकिक छज्जाके निवा 
रक ये दो वस्र मैंने आपके भेंट किये हैं, आप घारए 
करें । ' मुक्तामणि ? इस ज्छोकको 'पढकर डुपट्टा धारण 
करावे । अर्थ यह है कि, हे छलितादेवी ! मोती छगे हु 
अमूल्य सुखकारी कोमछ डुपट्टाको घारण करो । 'क्ृष्णका 
चाष्ट! इससे कंठमें माला पहरावे। अथे यह हे कि,हेसमर 
अज्लॉमें सुंदरता धारण करनेवाली!काले काचकी आठम्णिं 
से सुद्र,यह हार आपके कंठमें पहरात्रा हूं । 'मछयाचढ 
इसस, तथा “ छ्ुत्पिपासा ”? इस ऋचासे चन्दन चढावें 
अक्षता? इस पद्मस तथा “गन्धद्वारां? इस ऋचासे चावह 
चढावे, पद्यका अर्थ यह है कि, शुद्ध मोतियोंके समा 
स्वच्छ य अक्षत मैने चदाये हैं । गाए पस्मय शो का निम्सई 


प्रतानिं, ! 


भाषाटीकासमेलः । 





( २०९ ) 





"नितिन निनन-ननपनम+०७ 


तामिहोपहये श्रियम ॥ अक्षतान॥ मालती चम्प्क जातितुलसी केतकानि च॥ मयाहतानि 
पुष्पाणि पूजाथ प्रतिगह्मताम्‌ ॥ मनसः काममाकूति वाचः सत्यमशीमहि ॥ पश्ूनां रूपमन्नस्य 
मयि श्री: श्रयरतां यशः ॥ पुष्पाणि ॥ अथाडपूजा--उपाडइललितायें ममः पादों पूजयामि। 
भवान्ये० गुल्फौ०॥ सिद्धेश्वर्ये० जंघे पू० । भद्गकाल्‍ये० जातुनी पू० | श्रिये० ऊर पू०। विश्वरू- 
पिण्ये० कि पू० । देव्ये० नामिं पू० । वरदाये० कुक्षि पू० | शिवाये० हृदयं पू० | वागीश्व्यें० 
स्कंधौ पू० | महादेव्ये० बाहू पू० । परक्ृतिभद्राये० करो पू० । पश्चिन्ये कण्ठं पू०। सरस्वत्ये० 
मुर्ख पू० । कमलासनाये० नासिकां पू० ।महिषमर्दिन्ये० नेत्रे पू० । लक्ष्म्ये० कर्णो पू० भवान्ये० 
ललाटे पू० । विंध्यवासिन्ये० शिरः पू० । सिहवाहिन्ये० रूवाड्र पृ०॥देवहुमरसोद्भतःकालागुरू- 
समन्वितः ॥ आज्रियतामय धूपो भवानि प्राणतपंण+ ॥ कदुमेन प्रजानूता मयि संभव कर्देम ॥ 
श्रियं वासय मे कुले मातरं रनाडिनीय ॥ धूपम्‌ । चश्षुद्‌ सर्वलोझानां तितिरस्प निवारणम्‌ ॥ 
आरतलिक्यं कल्पितं भकत्या गहाण परमेश्वरि ॥ आपः झजन्ठ स्निग्धानि चिक्वीत वस में गहे ॥ 
नि च देवीं मातरं श्रियं वासय में कुले॥ दीपम्‌॥ मोद हापूपलड इकबटकोइुम्बुरादिभि: सहित 
पायसाजन्नेन नेवेद्य प्रतिगह्मयताम ॥ आदर पुष्करिणी पुष्टिपिड्नलां पत्ममालिनीम्‌ ॥ चन्द्रां हिरण्मयीं 
लक्ष्मी जातवेदो म आवह ॥ नेवेद्यमू ॥ मलयाचलसंभूतं घनसार मनोहरम्‌ ॥ करोद्गधतनक 
चार गृहाण परमेश्वरि॥ करोद्वरतेनम्‌॥ कर्पूरेलालवड्रादितांबूलीदुलसंयुतम्‌ ॥ ऋणुकस्य फलेनेव 
ताम्बूलं प्रतिशहाताम्‌॥ आदी यः करिणीं यष्टि छुवर्णो हेममालिनीम्‌ ॥ खूयों हिरण्मयीं 
लक्ष्मी जातवेदो म आवह ॥ तांबूलम ॥ माठालिड़ नारिके् फले खजूरसंभवम्‌ ॥ जम्बीर 
पनस वापि गह्मतां परमेश्वरि ॥ इदे फल मया देवि० तांम आवह जातवेदो लक्ष्मीमनपगा- 
पव्रिनीम्‌ ॥ यस्यां हिरण्यं प्रभूतं गावो दास्यो5श्वान्विन्देयं पुरुषानहम्‌ ॥ फलम्‌ ॥ हिरण्यगर्ले० 





| / कर्दमेन प्रजा ” इस मंत्रस धूप देना चाहिये | “ चक्षुद ! 
| इस जोक तथा “आप* छजन्तु” इस ऋचाको पढ़ता हुआ 


ज्ञानका दान करो । ' मारृती ? इस ख्ोकस तथा “ सनसः 
कास ?” इस ऋचासे पुष्प चडावे। जछोऋका अथ यह है कि 


मालती, चम्पा, जाति (जुईं) तुल्सीक्ी मखरी ओर | 
केलकी आदिके पुष्प में छाया है आप स्वीकार करें। अथ | 
अगपूजा-उपाहु छछिता, भवानी, सिद्धेश्वरी, भरद्रकाछी, | 
श्री, बिश्वरूषिणी, देंवी, वरदा, शिवा, वागीश्वरी, महादेवी, | 
प्रकृतिभद्रा, पद्मिती, सरस्वती, कमछासता, महिबसदिनों, | 


भवानी, विन्ध्यवासिनी, सिंहवाहिनी ये उपाइुछलछिता 


नाम्ि; कुक्षि, हृदय; स्कन्घ, बाहू; कर, कैठ: मुख, नासिका, 
नेत्र, कण, ललाट, शिर ये शरीरके हिस्से हैँ लथा सर्वाज्ध 
कथनमें समूहावरूंबनसे सब अंगॉर्में एक बुद्धि करके 
सर्बोको एक समझ लिया जाता है, देंवीके नाम ओर 


२ 


आरती करके उनके समीप दीपकको चावलॉपर स्थापित 

करे । ज्हो ऋथे यह्‌ है कि, सब लोगोंके नेत्रोंके समान 

पदाथ दिखानवाले अन्धकारकं निवारक इस दीपकसे 

कथ्ज ॥ अर ३०७ आप >> प 

हैं परम इंश्वरी | मन भक्तिसे आपका नौराजन किया हैं, 
कक (२ 

आप इस स्वीकार करें। हस्त प्रक्षाछन करके मोदका ? 


| इस वान्त्रिक ःछोकस एवमू “ आदद्रो ” इस ऋचासे पूड़े 
देवीके ही नाम हैं तथा गुर्क, जघा, जानु। ऊरू, कि, 


लछड॒डू आदि भोग छगावे। ज्लोकका ग्रह अथ हैं कि, 


| मोदक अर्थात्‌ ठ॒प्तिकरनेवाले पूछे, रूडूडू, बडे, उदुम्बस- 
| विक्रोंक फल ओर खीर इन पद्र्थोंका नेवेद्य भोगछगाओ 
| मल्याचल ? इस तान्त्रिक मंत्रत दोनों अनामिकाओंसे 
| चन्दन चढावे । इसका यह अथे है कि, है परमेश्वरि! 
अंगोंका अथे प्रायः प्रसिद्ध ही है, पूजामें नाम और जज्ञोंका | 
उपयोग इस प्रकार है कि, जिस क्रमसे नाम औरर अज्ञ 


कपूर मिश्रित घुन्द्र चन्दनस आषका करोह्वत्तन करता हूँ 


| आप प्रहण करें | “कपूरेछा ' इस छोकको तथा “आंद्रो 
लिख हैं उसी ऋमस उनकी परस्परमें योजन्ना करें प्रत्येक | 
नामके आदिम ओमू और अन्तर्म नमः तथा उसको चतु- 


यः ” इस ऋचाकों पढ़कर ताम्बूल अपण करे | मातु- 


| छज्ग० ” इससे तथा “इद फरछ॑ सया देवि ? इस शोक और 
थींका एकवचनान्त करके, यदि दो अज्ज हों तो द्विवचनान्त | 


तथा एक हो तो द्वितीयाक्ना एक वचनान्त करके “ पूज- | मातुछुझं इसका यह अर्थ हें कि हे परमेश्वरी | मातुछुड्, 


“« ता म आवह ” इस ऋचाको पढकर ऋतुफक चढावे। 


नारियल, खजूर, जभीरा और पतस इनके फलोंका मोग 
छगाओ ।  हिरण्यगसगभरस्थ ! इस पद्मकों तथा £यद 


वासि-पूजता हूं” इसे साथ छगाकर्‌ उन उन्त अद्ञॉपर | 
चावछ या अक्षत छोडने चाहिये |  दवहुम ” इससे तथा | 
२७ 











यः शुचिः प्रयतों भूत्वा जुहुयादाज्यमन्वहृत्‌ ॥ श्रियाः पश्चद्शच हक न सतत जपंत्‌ ॥ 
दक्षिणाम्‌ | चन्द्रादित्यों च धरणी विश्ुदृप्रिश्तथेव च त्वमेव सर्वज्योर्ती, हु ऊन भति- 
एह्मताम्‌ ॥ पद्मासने पद्म ऊझ पद्माक्षि प्ससभवे॥ तन्‍मे भजसि प्माक्षि येन स ख्यं ल्ना- 
म्यहम्‌ ॥ नीराजनम्‌ ॥ उपाड्रुललिते मातनेमस्ते विन्ध्यवासिनि! । ढुगे देवि नमस्त॒भ्यं नमस्ते 
विश्वहपिणि ॥ अब्दाये च गोदाये धनदाये महाधने हे धन मे लभतां देवि सवकामांश्व देहि 
मे ॥ पृष्पाअलिम ॥ अथ इुवाकुराव्‌ साम्रांश्त्वारिशत्तथाष्टनिः ॥ अधिकान हस्त आदाय 
मंत्रमेत जपेदबु ध।॥ मंत्रः- बहुमरोहा सततममृता हरिता लता ॥ यथेयं ललिते मातस्तथा 
मे स्युमनोरथाः ॥ इत्युक्त्वा पूजयेदेवी दृवानिः कुसुमेस्तथा ॥ मंत्रेण निनाष्टचत्वारिशद्विस्तु 
समाहितः ॥ दूवाकुरान्‌ ॥ प्रदक्षिणात्रव॑ दृवि प्रथत्नेन, मया कृतम्‌ ॥ तेन पापानि सर्क॑णि 
व्यपोहन्तु नमाम्यहम्‌ ॥ प्रदक्षिणाम्‌ ॥ साष्टाड्रोषयं प्रणामस्ते कृतस्तुभ्यं यथाविधि ॥ त्वद्यास 
इति मां भकत्या मसीद परमेश्वरि ॥ नमस्कारम्‌ ॥ दीनोएह पापयुक्तोषह दास्थ्िकनिकेतनः॥ 
समुद्धर कृपासिन्धो कामानमे सफलान्कुर ॥ प्राथनामू ॥ अथ वायनम्‌ू-अथ वाणकमादाय 
विंशत्या वटकेयुतम्‌ ॥ के इदं कस्मेति मंत्रेण आचार्याय निवेदयेत ॥ पक्कान्नफलसयुक्त 
सपृतं दंक्षिणान्वितम।द्विजवर्याय दुद्यात ब्रतसंपूर्तिदेतवे॥उपाडुललितादेव्या व्रतसंपूर्तिहेतवे ॥ 
वाणकं द्विजवयाय सहिरण्य ददास्यहम॥ इति वायनमन्त्र/ततः कथा समाकर्ण्य वाणकान्नस्प 
संख्यया ॥ स्वर्य घ्ुश्जीत चेवान्न॑ वाग्यतः सह बान्धवेः ॥ राचौ जागरणं कुयान्वृत्यगीतादि- 
मड्लेः ॥ प्रभाते पूजयेदेवी ततः कुर्याद्गिसर्जनम्‌ ॥ सवाहना शक्तियुता बरदा पूजिता मया॥ 


मातमामल॒ग॒ह्याथ गम्यतां निजमन्दिरिम्‌॥ इति विसर्जनम्‌॥इति वार्षिकपूजाविधिः ॥ अथ कथा- 


खूत उवाच ॥ पुरा केलासशिखरे 


छुखासीन षढाननम्‌॥ कथयनत कथां दिव्यामिदम्‌चुमंह- 


पेयः ॥ १॥ ऋषय ऊचु॥ महासेन महादेवनन्दनानन्तविक्रम॥ आख्यानानि सुपुण्यानिश्रताति 
४७४४७ “५93 लक कील नकल शक शनि सि किक किले न कित निज 


शुचि: प्रयतो ” इस ऋचाकों पढ़कर सुबर्णकी दक्षिणा 
चढावे । ' घन्द्रादित्यों च ! इस होकको तथा “पद्मासने? 
इस ऋचाकों पढक आरती करे कि “ उपाइुछलिते' इस 
कोकसे एवम्‌ “ अश्वदाये ” इस मंत्रस प्रणाम करता हुआ 
पुष्पाखछि समर्पण करे। फ्ोकाथ यह है कि, हे उपाइुल- 
लिते ! है मातः | है विन्ध्यवासिनि ! हे दुर्ग ! हे देवि ! हे 
विश्वरपिणि | आपके छिये प्रणाम है; इस प्रकार पूजन- 
करके अडतालीस दूर्वाके अंकुर चढावे. और इस ' बहुप्र- 
रोद्दा? इस मंत्रको भी अडताढीस बार पढे | इसका अथे 
यह है कि, बहुत अंकुरोंसे सुन्दर अमृत और हरी यह दुब 
जिस ग्रकार है हे छलित | हे मातः ! उसी प्रकार मेरे मतो- 
रथ भी बहुत प्रकारस बढें, ये दूर्वादछ अढताढीस वार ही 
चढावे और इनके साथ साथ पुष्प भी चहाता रहे । “प्रद- 
क्षिणा ! इससे प्रदक्षिणा करे। इसका अथ यह है कि, हे 
दूबि ! ये मने प्रेमस जो तीन प्रदृक्षिण किये हैँ, इनके पुण्यसे 
भर सब पापोंको आप नष्ट करें में प्रणाम करता हूं। 'साष्टा- 
> रा प्रणाम करे, अथे यह हे कि, हे पर- 
हे बे के हक साष्टाज प्रणाम रे िक किया 
हो कर दास है? ऐसा समझ और मेरेपर 
हे हमले इससे प्राथेना हक यह अथ 
0 परिद्री हूं, है कृपाक सागर ! आप 


मेरा दुःखोंसि उद्धार करके मेरे मनोरथोंको पूणे करें । फ्रि 
बीस बड़े पक्कान्न एवं घृत और दक्षिणा छेकर ब्रत पूर्तिके 
अथ आचायेको वायना दे और देतीवार “ क इदं कस्मे ” 
श्स मन्त्रको पढ़कर “ उपाजड़् ? इस ज्छोकका उच्चारण करें। 
अर्थ यह हूँ कि, उपाहु छलछिताके ब्रतकी पूर्षिक लिये सुब" 
णकी दक्षिणा समेत इस वायनेको द्विजबर आचार्यके लिये 
देता हूँ, इसके देनेसे मेरा ब्रव साझ पूणे हो । फिर कथाका 
श्रवण करके बायनेमें जितनी बडोंकी गिनती थी उतनेही 
प्रास छेकर भोजन समाप्त करे, मोजन अपने बान्धवोंक 
मध्यम बैठ मौन त्रव धारण करके करना चाहिये, रातको 
जागरणमे नाच गान वाद्य आदिकोंके माह्ुलिक शब्द होने 
चाहिये, प्रभाव कारूम देवीका विसजन करती वार 'सबा'" 
हना” इस छोकको पढे इसका अर्थ यह हैं कि; हे मातः ! 
वाहन और शक्ति समेत वरदायिनी आपका मेने पूजन 
किया है, आप मुझपर अनुगप्रह करती हुईं अपने है दृव्य 
धारमको पधारें। यह प्रतिवर्ष पूजा करनेका विधान पूरा 
हुआ ॥ अथ कथा-सूतजी (शोनकादिकोंसे ) बोलें कि। 
पहिले केछासके शिखरपर विराजमान होकर कार्ति' 
केयजी दिव्य कथाएँ कहा करते थे उन्हें सुनते हुए 
ऋषियोंने आथेना की थी. ॥१॥ कि; हे महासेन: 
है महेश्वरके नम्दत । अत्तव्त पराक्रमबार्क भाष 





भाषाटीकासमेलः | (२५११ ) 


चर 
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त्वत्मसादतः ॥ २ ॥ कथास्त्वद्वदनादेव मसूता भरिन्तय+!। न तप्तिमधिगच्छामः पायंपाय॑ 
सुधामिव ॥३॥ शुश्षषवों व्य देव्या बर्त तत्कथयस्वनः ॥ मनोभमिलषिताथारना सिद्धियेस्मिन 
कूते मवत्‌ ॥ ४ ॥ स्कन्द उवाच ॥ साधु पुष्ट महादेव्या माहात्म्यं सुनिपुद्रवाः ॥ वच्मि सर्वे 
विधानेन तच्छुणुध्वं जगद्धितम्‌ ॥५॥ भूग॒क्षेत्र किल पुरा विभोष्नुद्रोत्मामिधः ॥. श्ुतिस्मृति- 
पुराणज्ञों धनी च बहुबाध्धवः ॥६॥ अनपत्यस्य तस्याथ जत्ञाते जरतः छुतों ॥ ओऔपतिगों- 
पतिश्रेव नामनी विदधे तयोः ॥७॥ अचिरेणेबव कालेन स पश्चत्वमगाद्विजः। तौ तु बाली धन 
बन्धून्हित्वा सा धर्मचारिणी ॥८॥ सती विवश दहन स्वयांतुं पतिना सह ॥ अथ तद्वान्धवाः 
सर्वे हा कष्टमिति चुऋुशः ॥९॥ रूदन्तों हःखिताश्वकुस्तत्क्रियां पारलोकिकीम्‌_ ॥ अथ तस्य 
सपत्नोभूदड्भाता स जगहे धघनम्‌ ॥१९०॥ आक्रोशन्तों च तो गेहू निजमानीय हुर्मनाः॥ नास्ति 
चक्रे धनं सब ताभ्यां किचिन्न वे ददो ॥ ११॥ ततो मोजीघरों बालो बन्घुनि। कथित बसु ॥ 
ययाचतुः पित॒व्य त॑ देहि नो द्रविणं हि तत्‌ ॥ १२॥ स तावूचे गत द्वव्यं युवां केन प्रतारितों ॥| 
निर्गच्छतां मम ग॒हादित्यादि परुष बहु ॥ १३॥ तो तद्बचोनिर्निविण्णों बाो ओऔपतिगो” 
पती ॥ बेभाषाते मिथः कष्ट थिगहो पितृहीनता ॥ १४ ॥ यावो देशान्तर यत्र स्वजनो नाएियें 
कश्चन ॥ अनाभाष्येव स्वजनाअग्मतुर्दिशसमुत्तराम्‌ ॥ १५ ॥ भिक्षाचारों बहन्देशान्वनानि 
सरितो गिरीन ॥ समतिक्रम्यप ययत॒र्विशालां नामतः पुरीम्‌॥ १६॥ कासारमीक्षालक्राते 
ततो$स्‍्याः सत्निधौँ शुभम्‌ ॥ पुण्डरीकवनाकी्ण रक्तसन्ध्याविदूषितम्‌ ॥ १७॥ सन्ध्यात्र 
भूवित चारू यथा तारकित नभः। आन्तो पथि गतो बालो क्षण विश्रम्य तत्तटे ॥१८॥ आचम्य 








प्रसन्नतासे हमने बहुत पवित्र २ कथाएँ सुनी ॥ ९॥ जितने | अपने घरसे सव घन छे आया पर उस्रने उनके लिये कुछ 
इतिहास हैं जगतूमें उनकी असिद्धि आपनेही की हं । ये | भी नहीं दिया उनको रक्षाका बंदोबस्तभी न किया ॥१२॥ 


सब कथा बहुत हैं इनकी विभूति ( विस्तार ) बहुत है, | यय्यपि उन बालकोंने यज्ञोपवीत छेकर भिक्षाटनके समय 
उनके सुननेस तृप्ति नहीं होती जसे अमृतस पेट नहीं भरता 
है ॥३॥ अब हम भगवतीक ब्रतका मसाहात्म्य सुनना 
चाहते हैं उसको कहो, वह ब्रत ऐसा हो जिसके करनेस 
अनायास मनोवा|्छित पदाथ मिलें | ४ ॥ कार्तिकय बोले 
कि, हे मुनिवरों ! तुमने अच्छा पूछा, में महादेवीके त्रतका 
सब जगत्‌का कल्याणकारी माहात्म्य कहताहूँ,उसे विधिपू- 
वेक सुनो ॥ ५ ॥ पहिले भ्रगुक्षत्रम वेद एवं धमंशाल्र ओर 
पुराणोंका तत्वज्ञ, धनवान्‌ औरबहु कुद्ठम्बी गौतम नामका 
त्राह्षण रहता था, इसके पहले तो कोइ सन्तान नहीं हुई 
पर बुढापेमें दो पुत्र उत्पन्न हुए। उसने उन पुत्रोमेंसे एकका 
श्रीपति और दूसरेका गोपति नाम रखद्िया ॥ ६७॥ 
पुत्नोंके जन्म होनेके थोडेही समय पीछे वह त्राह्मण सत्युको 
प्राप्त होगया, उसकी पतित्नता धर्म चारिंणी खीने पत्ितिके साथ 
स्वगे जानेके छिय बालक पुत्रोंको घनको ओर बान्धर्वोंको 
छोडकर ॥ ८ | अम्रिमें प्रवेश किया । उसके बान्धंबोने 
बडे दुःखकी बात हुईं ऐसा कह ॥ ९॥ रो रो अश्रपात 
करके दोनोंकी पारठोकिकी क्रिया की, उस ब्राह्मणके एक 
विमाताका पुत्र भाईं था. उसने बेटी होकर सब घन छीन 
लिया ॥१०) व दोनों बाढक रोतेही रह गये बह, दुष्टात्मा 





अपने और और बान्धवोंका बताया हुआ घन, अपने पितृ - 
व्यसे माँगा था कि हमें धन दीजिय ॥| १२ || पर पिदृव्यन 
यही उत्तर दिया कि; तुम किसके कहनेसे बावले होगयहो? 
जो धन था वह तो कभीका नष्ट होगया। पीछे नाराज 
होकर धन देना तो दूर रहा, प्रत्युत मर घरसे निकलो,णऐसे 
कठोर वचन और कहे ॥ १३॥ वे बारूक श्रीपति ओर 
गोपति पितृव्यके इन अन्याय वचनोंको घुन चित्तर्स बहुत 
दुःखित हुए पर बाछूक थे और कया कर सकते थे; केव 5 
आपसमें यही कहा कि/पिठद्दीन बालकोंके जीवनकोधिक्ार 
है यह जीवन बहुत दुःखदायी हे ॥ १४ ॥ अब ऐसे देशमें 
चलें जहां अपना कोईसी बान्धव न हो; ऐसे आपसमें 
विचार, अपने किसीभी बान्धवकों कुछ न कहकर उत्तर 
दिशाकी ओर चले गये ॥ १५॥ मिक्षा मॉगके अपनी उद्‌ 
रपूर्ति करते हुए बहुतसे देश, वन, नदी और पवेतोंका उल्ल 
घन कर, विशालापुरी आगये। १६ ॥ वहां पर नजीकमे 
सुन्दर तछाव देखा, उसमें सफेद छाल कमलोंका बन छग" 
रहा था यह रक्त सन्ध्यास बिभूषित था ॥ १७॥ जेसे 
सन्ध्याकालके बदइलोंसे विभूषित, तारोंस चमकता आकाश 
दीखता हैं वे चछते चलते धकगये थे इससे क्षणभर उसके 





१ छकपिशमित्यपि पाढ़ः । 


आकराकमाफणककल ि “तक औऔ डा ाऊझ ऑ3धाा:असससजक्‍स ४ /शआ/आआआे्ललडोकसय_क्््लक्ल- न नन्हे 





ननननाननमककाकलल- 


शिशिरं तोय सस्नठस्तों यथाविधि ॥ गताध्वसेदो विप्राध्यों पुर प्राविशतां ततः ॥ १९॥ 
वीथीचत॒प्पथय॒र्त चारुगोपुरमण्डितम्‌ |। देवतागाररूचिर सोधराजिविशजितम्‌ ॥ २० || 
नानावीथीरतिक्रम्य विप्रावासमवापतुः ॥ कस्यचित्वथ विप्रस्य क्षत्पिपासार्दितो गृहम्‌ ॥२१। 
ईयतर्वेदिकायां ताबुपविष्टी श्रमाठ॒रो ॥ स्वामी ततो5स्थ गेहस्थ विवेक इति विश्वतः ॥ २२॥ 
आयातो वेश्वदेवास्ते स ददर्शातिथी द्विजो ॥ अनापच्छेस्‍्तयोः शीले तथा च कुलनामनी' ११॥ 
ऋषिवत्पूजयामास स्मरन्धर्म सनातनम । अतिथी भोजयामास स्वाद्न्नेन दिजोत्तम:ः ॥२५॥ 
ब्रता होचारिणों विप्रों सपरया तां विलोक्य च ॥ देशबन्धुपरित्यागखेदमुक्तो बभूवतुः ॥ २४॥ 
अथापच्छत्कृपालुस्तो कौ य॒वां कृत आगतो ॥ किमर्थमल्पवयसो निगेतों स्वशृह्यादिति॥ २६॥ 
तादिवेकस्प वचनमाकण्ये श्रीपातिस्तदा ॥ आलुपूर्व्यण सकले दत्तान्त समभाषत ॥ २७॥ 
पिठहीनौच तो ज्ञात्वा त्यक्तो बर्चुजनेन च ॥ आश्वास्य स्थापयाप्तास स्वगूहे बहुवासरम्‌ 
॥ २८॥ प्रचक्रमेष्ध शिष्येश्व सहाध्यापयितु अंतिम ॥ बचूवतुश्व॒ तो बालों ग॒ुरुशुश्षषणे 
रतो ॥ २९५ ॥ गु॒रोगेंहे ॥नेवसतोरागता निर्मला शरत्‌॥ फुछपझविशालाक्षी प्रसन्नेन्दरशुभा- 
नना ॥ ३० ॥ तप्यां सशिष्यमाचार्भ चरन्तं ब्रतप्तत्तमम्‌॥ पप्रच्छतुर्भों: किमिद्मावाभ्यानिति 
कथ्यताम्‌ ॥ २३१ ॥ ताम्यामवं कृते प्रश्ने विवेक इदमजबीत ॥ विवेक उवाच ॥ उपाड्लालिता 
देव्या बत देवपिपूजितम ॥ ३२॥ सर्वकामकर नणामस्मानेः सझुपास्यते ॥ विद्याकामेन 
कतंव्यं तथेव धनकाम्यया ॥ ३३ ॥ सुतार्थिना प्रकर्तव्य ब्रतमेतद्तुत्तमम्‌ ॥ विद्याकामों च 
तो बालो ब्रतमाचरतुमंदा ॥३४॥ भक्तितो ग॒र्वत॒ज्ञाताँ यथाशाहरि यथाविधि ॥ ब्रतप्रसादात्‌ 
सकल शास्त्र वेदानवापतु: ॥ २५ ॥ अध्यस्मिन्‌ हायने भक्तया विवाहाय प्रचक्रतुः ॥ श्रीपात” 

















किनारे बठ गये ॥ १८ ॥ ठंढे जहका आचमन कर यथा 
विधि स्नान किया; रंस्तेकीथकाबट छूट जानेपर पुरीम घुस 
गये ॥ १९ ॥ बहुतसी छोटी गढियां तथा बहुतसे बड़े बड़े 
रस्ते थे, उनमें दुकानोंकी पंक्तियां छगरही थीं, चतुष्पथ थे 
पुरीके द्वार बहुत सुन्दर थे; देवताओंके मन्द्रि एवम्‌ धन्ति- 
' यॉके घरोंकी पंक्तियां बहुत शोभा देरहीथीं || २० ॥ इन 
सबको देखते एवम्‌ अनेकों वीथियोंको छाँघते हुए ब्राह्म- 
णोंके योग्य स्थानमें पहुंच गये । वे भूखसे पीडित थे, इससे 
किसी एक उत्तम त्राह्मणके घर | २१॥ जाकर आहुनमें 
वेठ गये । घरवाले ब्राह्मणगका नाम विवेक था ॥ २२ ॥ यह 
अपने बलि वेश्वदे्‌वकरनेके अन्तमें उन दो अतिथि ब्राह्म- 
णोंको आया हुआ देखकर ही बिना उनके स्वभाव, कुछ 
ओर नामके पूछे ॥ २३॥ सनातन धर्मके अनुरोधसे जैस 
ऋषियोंका पूजन करना चाहिये. वैसेही उनका पूजन किया, 
द्विजोत्तमने उनको मधुर अन्न भोजन कराया ॥ २४॥ वे 
दोनों ब्रह्मचारी त्राह्मणवालूक उसकीकौहुई शुश्रषासे प्रसन्न 
ह। देश और बान्धओंके त्यागनेके खद॒कों भूछ गये ॥२५॥ 
दुयाडु ब्राह्मणने उनसे यह भीपूछा कि, तुम कौन होकहाँसे 
आये हो, छोटी उमरमें घरसे क्‍यों चके आये !॥२६॥बिचे 
+$ चचन सुनकर श्रीपतिने अपना सब वृत्तान्त ऋमसे 
& ये सुनादिया ॥ २७ ॥ उनके कथनसे उसने समझ- 
दिया कि, इनके पिता नहीं हे, बान्धवोने इसको निकाह 


दिया है। इसलियि उनको आश्वासन देकर अपने घरमें बहुत 
दिनोंतक ठहराया ॥ २८॥ अपने दूसरे शिष्योंके साथ 
उनको भी बेद पूढाने छगे, वे दोनों भाई भी गुरुकीसेवामे 
तत्पर हो गये | २९॥ गुरुके घरमें प्रेम पूर्वक निवास करते 
हुए उन्हें निमछ शरद ऋतु प्राप्त हुईं, यह परम सुन्द्रीकी 
समता रखती है, खिले कमलोंस तो यह कमरूनयनी वा 
निमछ चाँदके उद्यसे यह चन्द्रवदनी बन जाती है || ३१० 
इस ऋतुमें गुरुदेव अपने शिष्योंके साथ एक उत्तम ब्रत 
कर रहे थे. उन्होंने पूछा कि, गुरुदेव | क्या कर रहे हो ! 
हमे भी बता दो ॥ ३१ ॥ आचाय्यने उत्तर दिया कि, हम 
उपाज्छूलिता देवीका ब्रत करते हैं, देवर्षियोंमें भी इस 
ब्रतका आदर है ॥३२॥ यह मनुष्योंकी सब कामनाओंकी 
पुरति करता है, हम भी उसकी उपासना कर रहे हैं, जेसे 
विद्या चाहनेवालेंको इसे करना चाहिये उसी तरह धन 
चाहनवालेको भी इस करना चाहिये ॥ ३३ ॥ यही नहीं; 
किन्तु, पुत्रार्थीको भी इस श्रेष्ठ ब्रदको करना चाहिये. ये 
दोनों बाढुक विद्या चाहते थे इन्होंने भी उस ब्रतको 
किया ॥ ३४ ॥ गुरुने आज्ञा देदी थी, थे भक्तिंके साथ 
विधिपूषक करते थे जेसा कि शास्में विधान है, इससे 
वे सब बेद और शा्त्रोंके पण्डित होगये | ३५ ॥ है 
तपोधनो ! किसी दूसरी वर्ष श्रीपति और गोपतिन इस 


ब्रतानि, | भाषाटीकासमेलः ! (२१ ४ 





गॉपतिश्रैव व्रतमेतत्तपोधनाः॥ ३६ ॥ अचिरेणेव कालेन मासि माघे तयोग॑रुः फामि 

विवाहोचितां कन्यां नाम्ना गुणवतीमिति ॥३०॥ विनीताय श्रतवते यूने शीएतये तदा ॥३े<८,. 
विचार बान्धवेः साके ददों पुण्यक्षवासरे ॥ २९॥ पारिवह बहु छुदा भादाहुहितृब॒त्सलः ॥ 
विवेकोषपि मुर्दे लेने साठुरागों विलोक्य तो ॥४०॥ अन्याब्दे पुनरेतर्‌ ब्त॑ देव्याश्व चक्रतुः ॥ 
आतसरो तो निज देशमिच्छन्तो च॒ धनादिकम्‌ ॥ ४२॥ अथान्याहनि कस्मिश्वित्तावुपाध्याय- 
मुचत॒ः ॥ स्वामिन्युप्मत्मसादेन लब्धा विद्या तथा बखु ॥ ४२॥ अछुजानीहि गच्छावों निज 
देशमितः पुनः ॥ इत्याकर्ण्य समालोक्य शुर्भ बासरमाहतः ॥ ४३ ॥ स्वयं भापयित विप्स्तो 
ता कम्याँ च नियेयों ॥ अथ देव्याः ऋसादेन पितृव्यस्थ तयोः किल ॥ ४४ ॥ अन्वेषणे मति” 
जाता गतौ श्रीपतिगोपती ॥ निर्गतों के गतो देश वसतः केत्याद्वि्तयत्‌ ॥ ४५॥ लोका 
निनदन्ति माँ कुवैस्तयोरन्वेषणें मातिम्‌ ॥ दिदक्ष॒ुस्तो ततः सोषपि निजंगाम निजात्पुरात्‌ ॥ ४६॥ 
किंचित्स नगरं भ्राप द्विजो बालो गवेषयन्‌॥ तदेव नगरं पात्तो विवेकाख्यों द्विजोत्तमः ॥ ४७॥ 
सशिष्य कन्यया साध ऋमन्मार्ग शने/शनेः ॥ तत्र तेषां समजाने सड़मो सुनिपुड्भवाः ॥ ४८॥ 
विदांचकार तो कृच्छान्मध्यमें वयसि स्थितों॥ श्रीपतिस्तु पितृव्याय तत्त्सव न्‍्यवेदयत 
॥ ४९ ॥ त॑ दृष्टा ताइश विप्न॑ विवेको ब्राह्मणोत्तमः ॥ प्रणम्य विधिनाभ्यच्य ततः प्रोचे बचो 
छुदा ॥ ५० ॥ अातुस्तव खुताबेतों पालितों पाठितों मया॥ भयातस्तों मरापयितुं भवतां आम- 
मुत्तमम ॥ ५१ ॥ इाति श्रुत्वा विवेकस्प वचन मुद्तोउइ्मवव्‌ ॥ आलिलिद्भ च॒ तो बालो मनन 
जिध्ने पुनःपुनः ॥ ५२ ॥ पादानतां शुणवर्ती विवेकेन प्रणोदिताम्‌ ॥ आशीमिरनिनन्द्ाथ 
सहषोपनूहिजोत्तमः ॥ ५३ ॥ विवेक वचन पोचे त्वत्मसादादिमो खुतों ॥ दृछ्छो मत्तो न धन्योस्ति 
सुहस्व॑ यस्‍्य हि द्विज ॥ ५४ ॥ अथ ते सुद्िताः सर्वे रगक्षेत्रं ययुर्मुदा ॥ ज्ञातिभिः सह संगम्थ 


कल आल लननननन-+ननननननीननानानानन---नननाननननीनीनीनीनीीननननीनननननाननीनीननीननननननीननीीीीीीत3ईणद।यीनीा।ण। 


त्रवको मक्तिके साथ विवाहके लिय किया ॥ ३६ | बहुत 
थोडे ही समयमें माघके महीने उनके गुरुने विवाहके | 
छायक जो उनकी गुणवती कन्या थी उसको विनम्र | 
विद्वान एवम्‌ दृढ सहनन युवा श्रीपतिके लिये भाइयोंके | 


साथ परामश करके पवित्र नक्षत्र और दिनमें दे दिया 





उन बालकोंकी झोंज करता हुआ एक हशरहँरमें पहुँचा | उसी 
शहरमें द्विजोत्तम विवकभी प्राप्त हुआ ॥ ४७॥ शनेः शनेः 
अपने शिप्य और पुत्रीके साथ मागे तय करता हुआ, है- 
मुनिपुक्ञवों ! उन सबका उस सहरमें एकत्र मिदाप हो 


| गया | ४८ ॥ पिठृध्यने उन बाढकोंको छोटी अ वस्थामें 
॥ ३७-३९ ॥ छूडकीपर बडा भारी प्रेम था इस कारण 
बहुतसा दहेजभी दिया एवं उन दोनोंका परस्पर प्रेम देख 
कर गुरुको बडा भारी आनन्द हुआ।। ४० | फिर तीसरे | 
वर्ष बह दोनों भाई अपने देशमें जानेके छिये धनादिकी | 
कामनासे ब्रत करने लगे । ४१॥ किसी दिन वे दोनों | 
अपने गुरुसे प्राथना करते हुये बोछ कि, है स्वासिन्‌ | 
आपकी कृपासे विद्या और धन दोनोंही पदार्थ मिछ गये. 
॥ ४७२॥ अब हमको अपने देशमें जाने की अनुमतिदें | 
तथा 'विवेकने आदर भी किया | उसने उनके बचनोंको | 
सुन प्रेमके साथ अच्छा मुहूते देखा। ४३।॥ फिर शुभ 
दिनम उनको तथा अपनी पुत्रीको पहुँचानके छिय पीछे | 
पीछे गया । इधर उपाक्ुछलिता देवीकी प्रसन्नवासे उसके 
पिठृव्यका चित्तमी उनकी ॥ ४४ ॥ खोज करनेको हुआ। | 
बह सोचने लगा कि, हाय | श्रीपति और गोपति घरसे 
निकलकर किस देशमें चले गये, अब वे कहां हैं | ४५ | | 
छोग मेरी निन्‍्दा करते हैं वे न करें एस शोचकर खोज | 
करनेलगा एवं अपने नगरसें देखने चल्ल दिया ॥ ४६ ॥वह | 


देखा था, फिर देखा नहीं था इससे बहुत देरमें कठिनतास 

पहचान सका, व्योंकि उस समय उनकी युवावस्था थी। 

जो जो हुआ था श्रीपतिने बह सब उन्हें कह सुन्ाया॥४ 

विवेक मुनि उनके पिठृव्यकों देखकर प्रणाम आर 
विधिपूर्वक अभ्यचन करके प्रसन्ञतास बोछा || ५०॥ कि 
ये तुम्हारे भाईके पुत्र हैं इनकी मेने पालनाकी है इन्हें पढा 

दिया । तुम्हार उत्तम गाममें पहुंचानके लिए मे भी आया 
है । ५१ ॥ ऐस वचनोंको सुतकर उनका पिठ्व्य परम 
प्रसन् हुआ; उनको छातीस छगाकर बारबार उनके सस्त- 
कोंको सूघने छगा ॥ ५२ ॥| और विवेकके कहनेसे गुण- 
वतीने अपने श्वसुरके चरणोंमें प्रणाम किया | वह अनेकदार 
आशीर्वादसे उसे प्रसन्न करके आपभी क्ृतार्थक समान 
आहादित हो ॥ ५३ | विवकस बोछा कि, है महात्सन्‌ : 
आपके अनुग्रहस इन बाछकोको मैंने पाया हैं। आज में 
क्ृतपुण्य है, क्योंकि आप हमारे प्रिय सम्बन्धी हो गये 
|| ५४ || वे सब मिलकर अपने भ्गुक्षेत्र नामक आमसें 
आनन्दक्क साथ गए | बान्धवोसे मिके। चाचाकी ऐसी 


शिशिम्रद्धस्तदिचेष्टितम्‌ ॥ ५५ ॥ तो पितृव्यग॒हे स्थित्वा हायनान्यष्ट सत्त च॥ लब्ध्वा फिह. 
की गेह निज॑ श्रीपतिगोपती ॥ ५६॥ इंयतुस्तदल॒ज्ञातों विवेकः स्वां पुरी ययों॥ श्रीपति- 
गोंपतेस्तत्र विवाहमकरोत्तदा ॥ ५७ ॥ तावेकचेतसों तत्र चक्रत॒द्विजतर्पणम्‌ ॥ श्रीपतिः अ्रद्धया 
युक्तः कनीयान्‌ व्ययशाहितः ॥ ५८ ॥ विचाये भायया साके विभक्तः श्रीपतरभूत्‌ ॥ स भोगा्‌ 
विविधाद सुअन्ममत्तो बहुसम्पदा ॥५९॥ न देव्याराधन चक्रे गोपातिःखुखलम्पटः॥ अथ स्वस्फे, 
कालेन नष्टं तस्य शनेर्धनम्‌ ॥ ६० ॥ अकिश्वनों गतश्रिन्तां भाययाश्वासितस्तदा ॥ तब श्राह- 
गहे विप्रा खुखते बहुवः सदा ॥९१॥ गच्छाबोःलादिन कानत तत्र भोक्तुमुभावषि ॥ एवं भोजर-' 
वेलायामागत्यागत्य तद॒शृहम्‌ ॥९२॥ घुझन्धुअन्रिजगृह गतो तो बहुवासरम्‌ ॥ कदाचिदागतो 
यावद्रोपतिभायंया सह ॥६३॥ उपाविष्टेषु विभषु प्लोक्तुं नोएविन्ददासनम्‌ ॥ अथान्नराशेरन्याशे 
भोजनाय क्षुधातुरः ॥ ६४ ॥ उपविष्टः श्रीपतेस्तु भार्यया, स निवारितः ॥ अस्माहइत्तिष्ठ ै 
तूणे त्वमुच्छिष्ठं करिष्यसि ॥ ६५ ॥ तिष्ठ तिष्ठ क्षणं चेव पश्चाउुक्ष्वोति साब्रबीत॥ गोप्हे 
कान्तया दृष्टं ततो विमनसादभों ॥ ६६ अशधुक्तावेव निष्कान्तों जग्मतुर्निजमन्दिरम॥ तह 
स्वजायां मोबाच निजमार्ग विचिन्तयन्‌ ॥ ६७ ॥ श्रात्रा मया सम॑ वित्त संविभक्तमपि प्रिये॥ 
दुर्गतोःह धनोन्मत्त; श्रूयतामत्र कारणम्‌ ॥ ६८ ॥ पुराछवाभ्यां गरुगृहे ब्रतमाचरितं शुभगू॥ 
उपाड्ुललितादेव्या विद्यादि सकले ततः ॥ ६९ ॥ प्राप्त मया तत्सकलं परित्यक्ते प्रमादतः। 











वेसी बातें सुनी ॥| ५५ | पिठ्व्यके घरमे पन्‍्द्रह वर्षतक | भोजन करके अपने घर चले जाने छगे। बहुत दिनोंका 


रहके चाचास अपने पिताका घनले अपने घर आगये 
॥ ५६ ॥ विवेक उत्तको चाचाके यहां पहुँचा अनुमति ले 
अपने आश्रम॒को चला आया । अपने घरपर आकर श्रीपति 
ने अपने छोट भाई गोपतिका विवाह किया | ५७ ॥ वे 
दोनों भाई परस्पर बहुत प्रेम करते थे, पर उनमें श्रीपति 
त्राक्मणोंकों ठृप्त करनमें बहुत श्रद्धा रखता था, गोपति खर- 
चस डरवा था । इससे श्रीपति तो ब्राह्मणोंको भोजनाच्छा- 
दनादि दालद्वारा तृप्त करने छया, और गोपति खरचसे 
घवराकर॥ ५८॥ अपनी स्रीके साथ सलछाहकर श्रीपतिसे 
अपना हिस्सा छे अछग हो अनेक प्रकारके भोग भोगने 
लगा, फिर उसको संपत्तिके मद एवं विषयभोगोंकी अस- 
क्तिसे ऐसा प्रमाद हो गया ॥ ५९ ॥ कि जिससे सुखलूंपट 
उसने उपाडु७लितादेबीका आराधन करनाभी छोडदिया। 
इससे उसकी बहुतसी भी वह सम्पति कुछही समयमें 
शर्त: शनः क्षीण हो गयी ॥| ६० || जब उसके पास भोजन 
के ढिए भी कुछ नहीं रहा, तब बह गोपति बहुत चिन्ता 
करने लगा। स््रीने आश्वासन दिया कि, तुम्हारे बड़े भाई 
श्रीपतिके घरपर नित्य बहुतस ब्राह्मण भोजन किया करतेहें' 
/ ६१ ॥ है कान्‍्त ! हमभी वहां रोज चछा करेंगे, और 
भोजन करेंगे, ख्रीने आश्वासन देकर जब ऐसे कहा, तब 
वे दोनों उसके घर भोजनके समय रोज आ आकर) ६२॥ 


ऐसाही चला. किसी दिन अपनी ख्रीके साथ गोपति 
भोजन करने आया !| ६३६ ।॥| और सब त्राह्मण तो भोजन 

। ए९ ५ 
करनेक लिए बेठ गए थे पर उसको बेठनेके ढिए के 


आसन नहीं मिला; छुधात्त गोपति जहाँ भण्डार था उसके 


पास ॥ ६४ ॥ जा बेठा, वहांपर श्रीपतिकी भार्या गुणवत्ती 
ने मनाकर दिया और कहा कि, यहां मत बेठ, यहांपे 


जल्दी उठकर दूर चला जा,नहीं तो यह सब भन्न उच्छिष् 
हो जायगा ॥ ६० ॥ दूर जाकर खडा रह, ये भोजन कर 
लेते है, थोडी देर वाद तुममी भोजन कर लेना | गोपी 
की ख्ीने भी यह वृत्तान्त देखा। इससे दोनों उदास होकर 
॥ ६६ ॥ बिना भोजन किए ही वहांसे निकलकर अपने 
घर चले आये। गोपति अपना पथ सोचता हुआ अपनी . 
स्रीस अपनी व्यवस्था कहन छगा ॥६७॥ हे प्रिये ! भाईडा 


क्या दोष हे ! मैंने उससे बराबरका हिस्सा ढिया था 


में धनसंपतिके प्रमादसे मत्त होकर दुगेतिको प्राप्त हुआ, 


धन गमादिया में द्रिद्री होगया, यहां जो कारण है उसे 
छुन ॥६८॥ जब में और श्रीपति गुरु विवेकके यहां विधा" 


ध्ययन करते थे, तबहम दोनोंने उपाज्रूलितादेवीका 


,पवित्र ब्रत किया था, उसके ग्रभावसे हम दोनोंको विधा _ 
ओर घन आदि ॥ ६९ ॥ मिले थे; पर मैने घनके प्रमरदिये 


प्रमत्त हो. सब छोड दिया, मरा बडा भाई श्रीपति उस 





स्व्जगा अआऋ- -- 


चु४0द्काएं ५ 


३ स्वरपितव्ययूददे कांश्विदुषित्वा दिवसांस्‍्तदा इति प। ठान्तरमू । ९ आसीदिति शेष, 


बा | ३ भुक्त्वाभुक्त्वा निजयूहमीयतु: 
“द्रतालरम। ४ गोपतिभाँयिया दुःख गतो इत्यपि पाद:। द 





नि, ).| | (३१५ | 





ये आचरते नित्य तध्माच्छीह्त तु सेवते ॥ 3०॥ तस्मादह तदा भोक्ष्ये यदा द्रक्ष्यामि 
तां शिवाम्‌ ॥ इत्युकत्वा निर्गेतह्तह्मादुगद्दक़तमो अन। ॥ ७१ ॥ तद्भायों चिन्तयाविष्ठा सापि 
तस्थावनश्नती ॥ जुक्तवत्सु ब्राह्मणेषु श्रीपतिः पर्यपृच्छत ॥ ७२ ॥ क गतो गोपतिरिति तच्छत्वा 
पोषि हुःखितः ॥ गोपतिस्तु सरिहुगे बनानि बहुशों श्रमन्‌ ॥ ७३॥ पृच्छंश्न पथिकान्मा्ग न 
देव्या; पदमभ्यगात्‌ ॥ पश्चमे वासरे प्राप्ति क्षुत्पिपासादितों बने ॥ ७४ ॥ अलब्धदरशंनों देव्या 
दुःखितों निषषात ह ॥ ते कृच्छाततमालोक्य भवानी भक्तवत्सला ॥ ७५॥ कृतापराधमपि 
तमतुजम्राह वे तदा ॥ गतमूच्छेः समुत्याय दिगनताव्‌ मविलोकयन्‌ ॥ ७६॥ ददझोे दूरतो गोप॑ 
चारयन्त गवां गणम्‌ ॥ ते दृष्ठा किंचिदाश्वस्तो ययों तस्यान्तिकं शनेः ॥ ७७॥ अपच्छत्क 
भवान्यातः कुत्न॒त्यः कुत आगतः । कोष्य॑ देशः कश्च भूपः कि पुरं नाम तद्॒द॥ ७4 ॥ निशम्ध 
वचन तस्य वक्त गोपः प्रचक्रमे ॥ गोप उपाच । उपाड़ नाम नगरसुपाड़ो नाम भूपतिः ॥ ७९ ॥ 
उपाइलालितादेव्या विद्यते यत्र मन्दिरम्‌ ॥ तत्रत्योःह समायातः पुनस्तत्र ब्रजाम्यहम्‌ ॥ <० ॥। 
इत्याकर्ण्य वचस्तस्य विप्रः प्रमुदितोईइ्मवत्‌ ॥ स गोपसहितः साथ नगरें प्रविवेश ह॥ «८१ ॥ 
दूराददर्श भवन पुरमध्ये तपोधनाः ॥ उपाड्रललितादेव्याः सफाटिक गगनंलिहन्‌ ॥ <२ ॥ 
सौवर्णेन विचित्रण कलशेनोपशोमितम्‌ ॥ यथोदयाचलः शोेलो दधानो भातलुमण्डलम्‌ 
॥ ८३॥ त्वरितो गोपमासंड्य मासादं स ययौ खुदा ॥ प्रणम्य दण्डवद्भूमो बद्धाखलि- 
पुटस्तदा ॥ <४ ॥ उपाड्ललितां देवीमथ सतोतुं भचक्रमे ॥ गोपलिशवाच ॥ नम” 
स्तुभ्यं जगद्धात्रि भक्तानां हितकारोंगे ॥ जगद्धीतिजिनाशिस्ये सबमद्लमूतेये ॥ <५॥ 


अंक! प्ध्य्ा 


ब्रतको करता है, इससे नित्य इतना खरच करनेपरभी | है )॥ ७८॥ इन वचनोंकों सुनकर गोप बोढछा कि, यह 
छक्ष्मी उसकी सेवा करती ही रहती हे || ७० ॥ इक्षसे में | उपाज्नामका शहर है, इसके राजाका नामभी उपाज्ञ हैं 
अब भोजन तबही करूंगा, जब कि पहिंले उस देवीका | ७९॥ यहां उपाक्ुछछधिता देवीका मन्दिर है । में भी यहां 
दृशन ऋरदूंगा | ऐसे कहकर बिना भोजन किय ही घरसे | ही रहता हूँ, यहांस वहीं जाऊंगा ॥८०॥ गऊ चरानेवालेके 
निकल कर चढलागया || ७१॥ अपने पतिकी चिन्तासे | वचनोंको सुनकर वह अत्यन्त प्रसन्न हुआ,पीछे गोपाढको 
उसकी ख्लीभी घरमें बिना भोजन किये ही वेठी रही ।इधर | 


| साथ छे सन्ध्याके समय उपाज्ञनगरमें घुसगया। “नगर” 
श्रीपतिंन जब और ब्राह्मणभोजन करचुके तब अपनी ख्ीसे | इसके स्थानपर  विवरं” पाठभी मिलता हँ.उसका यह अथ 


पूछा कि ॥ ७२ ॥ गोपति कहां गया * उसके जानेका हाढ | समझना कि, उस गोपाकके साथ सायकाछ होनेपर एक 


सुनकर श्रीपतिको भी बडा भारी दुख हुंआ। इधर गोपति | गुहाके भीतर घुसगया ॥ ८१॥ हे तपोधतो ! उस शहरक्े 
धरस निकलकर नदी; दुगेम देश और बनोंमें घूमता हुआ 


| बीच उसने दुरस ही एक मन्दिर देखा, वह भगवती उपा- 
॥ ७३॥ रस्तेंसे चछनेवालोंसे देबीके मिछ वेका स्थान पूछता | ज़्कछिताका था; उस ,मन्द्रिमें स्कटिकमणिही थी. ऊँचा- 
रहा, पर देवीके स्थानका पता नहीं छगा। ऐसे पांच दिन | इईमें इतना ऊंचा था कि, मानो आकाशकों चाटरहा हें 
बीव गये, भूख प्यासके मारे व्याकुछ एवं ॥ ७४ ॥ देवीके | ॥ <९॥ उसके शिखरपर सुबगका कलरूस रूगा हुआ था, 
दशैन हुए नहीं थे इससे दुखित हो गिरगया. भक्तव॒स्सछा | उससे उस सन्दिरकी शोभा ऐसी होरही थी, जैसे सूर्यन- 
देवी उसे दुखी देख |॥७०॥ यद्यपि वो अपराधी था तो भी | ण्डलस डद्याचछकी होती ई || <८३॥ उसको देखकर 
उस समय उसपर दया ही की,मूछ के बीतजानेपर दिशाओं | पूछा कि, यह स्थान किसका हैं ) उसने दताया कि, यही 
को देखने छगा तो ॥७६॥ कुछ दूरीपर बहुतसी गर्ऊओंकों | उपाज्ञकछिता देवीका मन्दिर है। फिर वह झटपट प्रसन्न 
चराता हुआ एक गोपाछ दौखा, उसके देखनेस कुछ आश्वा- | हो भगवती मन्दिस्के भीतर चलागया, एथिवीपर गिरकर 
सन मिला, शनेः शनेः उसके पास पहुँच गया ॥७७।॥|उससे | हाथ जोड़ दृण्डवत्‌ प्रणाम किया ॥ ८४ ॥ दृबीहा स्तवन 
पुछाकि, तुम कहां जातेहो कहां तुम्हारा निवास हू ! कहांसे | करने छगा। कि, हें जगतकी घात्रि | आपके छिये नमस्कार 
आये हो इस देशका क्या नाम दे ! यहांका राजा कौन हे ( | हैं. आप भक्तोंके भले करनेवाली हो। जगतके भयोंको विनष्ठ 
और इस नगरका कया नाम हैं (जो थोडी[ुरी पर दीखता | करती हो, सब प्रकारके मज्जछ आपहीके खहूप है॥ ८५॥ 


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हत्वा निशुम्भमहिषमझतीय्‌ खुरारीनिन्द्रादयों निजपदेजु ययान्रिविक्ताः ॥ लो ऋच्रयावनगहीत- ' 


महावतारे मातः प्रसीद सतत॑ कुछ मेःलुकम्पाम्‌ ॥८३॥ त्वां मुक्तये निजजनाः कुटिलीकृताड़ी 
गौरी तिजे वपुवि कुण्डलिनीं मजन्ति ॥ मुकत्ये च देवमलुजाः कनकारविन्दबद्धासनामविरत 


कमलां स्तुवान्ति।८»देवीं चठ॒ऊुजां चेकहस्ते चेव गदाधराम्‌ ॥शाब्रेख व्रधरां चेव सौम्याभरण- । 
भूषिताम्‌ ॥ ८८ ॥ सरस्वती पश्निनीं च पह्मकेसरवालिनीम्‌ ॥ नमामि त्वामहं देवीं तथा महिष- : 
मर्दिनीम॥८९॥अपराधाः कृंताः पूर मंया जन्मनिजन्मनि॥तत्सव क्षम्पर्ता देवि मातमें सुदि- । 
शारदे ॥ ९० ॥ सापराधो४स्मि शरण प्रातस्त्वां जगद्म्बिके ॥ इदानीमत॒कम्प्यो5ह यद्वाष्छामि 


कुरुप्व तत॥९१॥ इति स्तुत्वाथ शवोणी प्रणिपत्व पुनः पुन॥ कृतसंध्याविषिस्तत्र सुष्वापाकृत- 
भोजनः ॥९२॥ स्वप्ने मूर्तिमती देवी विम्मेव समादिशत]। गोपते वत्स तुष्टाल्मि गच्छोपाड्रमही- 
पतिम्‌ ॥ ९३ ॥ मत्पूजनकरण्डस्य. भार्थयसव पिधानकम्‌ ॥ तत्पूजयन्निजग़हे परामृद्धिमवा- 
प्स्यल्ति ॥ ९४ ॥ स्वप्न इत्यातसन्देशः प्रभाते गोपतिस्तदा॥ राजद्शनवेलायां नृपद्वारं सम- 


भ्यगात्‌ ॥ ९५ ॥ प्रविष्टोप्तों नुपसभां भतीहारनिवेद्तिः ॥ राक्ञा संभावितस्तत्र निषसादा- 
सने शुभ ॥ ९६॥ पृष्टो गमनहेतूँंअ ययाचे तृपपुद्भबम ॥ देव्यचनकरण्डस्थ पिधान देहि में 


नूप ॥ ९७ ॥ इत्पर्थितः स विभ्ेण जातादेशो नृपो दुदों ॥ पिधानक॑ नमसस्‍्कृत्य तस्मे चापंय- 


चेनादिकम्‌ :॥ ९८॥ आशीमिरनिनन्धाथ तमामंत्य च भूषपतिम्‌ ॥ उपाड्ललितादेव्या: 
प्रासाद पुनरागमत्‌ ॥ ९९ ॥ प्रणिपत्याम्बिकाँ विभ्रस्त्वरितो निययों बिलांव ॥ समीपे 








३०.० पक. 2 2220०2७०7०००0 ०० ण: 7 2722:8:6:5:2 ॥0082::2::::::2::%5::::72::0::75 0 ध्ध्य् क० कट ह्कडटी द् प्प्न् ़्ज्ख्धय्य्स् 


निशुम्भ महिष प्रभृति देवशहु ओंको मारकर इन्द्रादिक सब | साय सन्ध्या कर बिता भोजन किये वहांही सोगया ॥९२॥ 
देवताओंकों फिर अपने अपने अधिकार पर आपने पहुँचा- | खप्नमें देवीन साक्षात्‌ दशन देकर कहा कि, हे वत्स ! है 
दिया आपके अवतार त्रिलोकीकी रक्षाके डियही होते हैं । | गोपते ! ! खडा हो, में संतुष्ट हैं ॥ ९३ ॥ आप उपाडु 
है मातः | आप असन्न हो मेरेपर सदा कृपा करें ॥ ८६ ॥ | राजाके पास जाकर उससे मेरी पूजा करनेकी पिटारीके 
कर भक्त योगीजन योगपथस तुझे पानके छिय सुपुन्ना नाडी- | दक्कनकों मोगना | उसको छेकर अपने घर चछा जा वहां 
करे मुखपर छिपट फन रखकर बेठी हुईं कुण्डलिनी शक्तिके | उसकी पूजा करतेहुए परम सम्रद्धिकों प्राप्त होगे ॥ ९४॥ 

रूपमें तुझे भजते हैं । मुक्तीके ही छिये देव मनुष्य कमछाके | खप्ममें देवीका ऐसा सन्देह पा प्रभावमें गोपति खडाहो 


रूपमे सोनेके कमहूपर आसन मारकर बैठी हुई आपका | राजाक दर्शन करनेके समयमें राजद्वार पहुंचा ॥ ९५॥ 


निरन्तर ध्यान करते हैं ॥ ८७॥ सुवणक कमला ८नपर | प्रतीहारोंने आनेकी खबर दी. भीवर बुढायाहुआ राज 
निरन्तर विराजी हुईं आपकाही स्तवन करते हैं । आप चा- 


रसुजावाली हो उत्तम एवं सुन्दर आभूषणोंको पहिने हुई | अच्छे आसनपर बैठ गया ॥ ९६ ॥ राजाने गोपतिस 
हो, एक हाथरस गदा ओर दो हाथोंमें शाज्नधनुष ओर | पधारनेके कारण पूछे। उसने नृपवरसे यही कहा कि में 


खन्डको धारण करती हो, चोथे हाथस शरणागतोंको अभय | आपके पाससे उपाड्रललितादेवीकी पूजाके करण्डविधानको 
दान करती हो || ८८॥ आप सरखती हो आप कमछ- | मॉगने आयाहूं, आप मेरलिये उसका दान करें ॥ ९७ ॥ 
हरता लक्ष्मी हो, आप कमलोंके केसरॉमें वसती हो । आप | राजाने उसकी याचना सुन, अपने नौकरोंको उसे छा कर 
मसहिषासुरकोी मदन करनेवाली हो । में आपको प्रणास | 


करताहूँ ॥ ८९५ || हे सबके जाननवाडी देवि ! मेंने जन्म |॥ ९८॥ गोपति प्रसन्न हो राजाको अनेक आशीर्वाद दे 
जन्ममें दहुतस अपराध किये हैं, हे मातः | उनको आप | 
क्षमा करो ॥ ९० ॥ में यद्यपि अपराधी हूं, पर हे जगद्‌- 
स्बिके ! तुम्हारे शरण 458 हूँ,इसस अब आपकीकृपाका 
अधिकारी होगयाहूँ जो मेरी इच्छा है उसे पृणकरिये ॥९१॥ 
वह गोपति ऐस देवीका स्तवन कर बारबार प्रणाम करके 


ललिताके मन्दिर को प्राप्तहुआ ॥९९।॥| उस बिलसे (गुहासे) 
झ् बाहर निकछ आया । ( “ बिछातू्‌ ” ) इसके स्थानम 
६ ११ ८ ९ ५ ड़ 
| पुरात्‌ ” भी पाठहै, उसका अर्थ यह है कि-उपा 
नामक नगरसे ) फिर बाहर आयातो क्या देखताहँ कि, 





८१ वासोधनादि च। २ पुरात्‌ इत्यपि पाठान्तरम्‌ । 


| सभामें गया, राजाने सम्मान किया, राजाके दिये एक 


| देनेको कहा और प्रमाणकर औरभी पूजनकी सामग्रियाँ दी. 


| उसकी प्रशसा करताहुआ अनुमति छेकर भगवती उपाझ . 


अफि भाओ उहम ओऔसि जे एज 





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डीकासमेलः३ । 
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अशह 277 77745: 07 
दाता 





स्वपुरं दृष्ठा दृष्ठों गहसुपागनत्‌ ॥ १००॥ खसुहद्धिः सह संगम्य सर्वे तत्कथयन्सदा ! 
पूजयित्वा पिधानं तद्विदथे पारणां द्विजः ॥ १ ॥ एकमाराध्यमानस्तु स सउद्धोःमवत्पुनः ॥ 
सोपपि सत्र॑ समारेने द्विजापयो बहुबासरम ॥२॥ एका तस्यामवत्कन्या ललितानाम 
सुन्दरी ॥ सा तत्पिधानमादाय विहते याति सवबेदा ॥ ३॥ प्रशशनवज्थ्रियत्वाध पितम्या- 
मनिवारिता ! कदाचित स्ववयस्यानत्रिः साक गड़ाजले शुभ ॥४॥ क्रीडन्ती दद्शें तोये 
नीयमानं कलेवरम्‌ ॥ पिधानहस्ता साससिचदन्याश्राजलिभिस्तदा ॥ ५ ॥ स सर्पदष्ट उत्तस्थों 
ततो देव्याः प्रसादतः ॥ सातिकान्तं द्विज दृष्ठा मससा चकमे पतिम ॥0॥ ज्ुहादाभ्यबहाराय 
जनकस्य निकेतनम्‌ ॥ मार्गे च परिपप्रच्छ कुल शील च तस्य सा ॥ ७ ॥ सोष़षि सर्व समा 
चखरू्यों गुणराशीति नाम च॥ ललिता मंत्रथामास शुणराशि द्विजोत्तमम्‌ ॥ ८ ॥ परिविष्टेषु 
चान्नेषु पितृवेश्मनि में द्विज ॥ ग्रहीतापोशनो भूत्वा भायाथ मां त्वमर्थय ॥९॥ मयालुमोदित- 
सतातः स्‌ माँ तुभ्ये प्रदास्यति ॥ तयोक्तो गुणराशिस्तठु तथा सबे चकार हु ॥ ११० ॥ गोपति- 
भोर्यया श्रात्रा समालोच्य स्ववान्धवैः ॥ परीक्षिताय विभत्व विद्यायां कुलशीलयोः ॥ ११ ॥ 
प्रतिजज्ञे ततः कन्यां ललिता गुणराशये ॥ शुने मुह॒तें च तथोविवाह कृतवान्‌ प्रद्ध ॥ १२ ॥ 
वराय बाह्मणेभ्यश्व ददो बहुधनं मुदा ॥ विदथे च तयोगेंहँ नातिदूरं स्ववेश्मतः ॥१३॥ तत्रो- 
पतुः सालरागों मिथस्तौ दम्पती चिरम्‌ ॥ पिधानकं तथा नीत॑ निज ललितया गृहम्‌ ॥ १४ ॥ 
शनेरथ धन सर्वे गोपतेरगमदुण॒हात्‌ ॥ गुणराशिधनी जातो मंहादेव्यः मसादतः॥ १५ ॥ कर- 
ण्डस्य पिधानं तज्ननन्या बहुवासरम्‌ ॥ याचितापि न वे श्रादाछलिता पूजित गहे ॥ १९॥ अथ 








शा 5१४९१ 
कट 77:20 22707 74867 7 जले; हर ४ 


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मेरा भृग॒क्षेत्रआामभी नजदीकही है, प्रसन्ष हो अपने घर 
आगया ॥ १०० ॥ अपने सुहृदू भाई बन्धुओंस मिकछ्का। 
प्रेमके साथ सब वृत्तान्‍न्व कहा उस ढक्कननकी पूजा करके 
इतने दिन निराहार रहनेका जो ब्रत होगया था उसको 
पारणाकी ॥ १०१ ॥ बह उस ढक्कनकी पूजा रोज करने 
छगा, इससे अत्यन्त समृद्धिशाली होगया, श्रेष्ठ ब्राह्मण था; 
अतएव बहुत दिनोंतक सत्रयज्ञका अनुष्ठान किया ॥ २॥ 
उसके एक छलिता नामकी सुन्दरी कन्या उत्पन्न हुईं, वह 
डस ढक्कनको लेकर बाहिर विहारके लिये रोज जानेलूगी 
॥ ३ ॥ बह छडकी मोली थी, बडी प्यारी थी।इससे माता- 


पिलाओंन उसको लेजानसे मना नहीं किया | किसी दिन 
वह ललिता अपनी बराबरकी उमरवाद्दी और और 
कन्याओंके साथ गज्ञाजीके स्वच्छ पानीम ॥ ४ ॥ खेलते 
हुए, उसमें बहता हुआ एक मतकशरीर देखा। उसके 
हाथमें ढककन था, इससे उसने डस ढक्कनमें जछभर उसके 
ऊपर दूरसेही सींचा, सहेल्योंने अपने अपने हाथोंसे 
सौंचा ।। ५ ॥ जिसका वह गत्प्राण शरीर था, वह सौपके 
डंकसे मरगया था, ढकनके जछ पडनेसे देवीकी कृपाके 
कारण वह मुर्दा जिन्दा होगया | वह अलबन्त सुन्द्र ब्राह्मण 
था । उसे देख छलिलाका मन पति बनानेको होगया ॥६॥ 
फिर पिलाके घर भोजन करनेके छिये उसको आह्वान 
किया । रस्तेंमे छलिताने उससे कुछ स्वभाव आदि पूछ 
|| ७ ॥ उसने कहां कि, मेरा नाम “ गुणराशि ” हे। इतना 


| २८ 


कहकर अपने कुछादिभी बताये।फिर छछ्िताने उससे बात- 
चीत करके समझाया ॥ ८ ॥ कि,जब हमारे पिताके घरपर 
दूसरे दूसरे त्राह्मणोंको परोसा जायगा.तब तुमको भी पाद्‌ 
प्रश्षाछन कराकर आचमन करायाजायगा फिर भोज बनकर - 
३ कर हि कु ञ्् 

नके लिय भरा पिता कहे तो तुम कहना कि,हम भोजनार्थी 
नहीं हैं, आप देना चाह तो अपनी कन्याको देदेँ ॥९॥ 
में उसका अनुमोदन करूंगी,पिता मेरा दान तुम देद्गा। 
ललिताके समझायेहुए गुण एशिने वही किया जो समझाया 
था ॥ ११० ॥ गोपतिने भार्य्या भाई और बान्धरवोंके साथ 
विचारऋरके बिश्रत्व विद्या और कुछ शीलकी परीक्षा 
छूकर । ११ ॥ पीछे छल्ता देनेकी प्रतिज्ञा करके शुभ मुह- 
तेमें दोनोंका विवाह करदिया | १९ ॥ जामाबाके लिये 
तथा ब्राह्षणोंके लिय बहुतता धन आननन्‍्दके साथ दिया 
अपने जामाता तथा छूडकीके रहनेके छिये अपने घरके 
समीपही एक घर बनवादिया || १३ ॥ छछिता और गुण- 
राशि परस्परमें बहुत प्रेम रखते हुए वहां बहुत दिनतक रहे. 
ललिता पतिके साथ आनेके समय उस ढकनकोभी ले आईं 
॥ १७ ॥ गोपतिके घरपर ढक्कत्की पूजा नहीं हुईं, इस 
कारण उसकी सब सम्पत्ति धीरे धीरे चठी गई । ललिता 
उसकी पूजा करती थी, इससे देवीकी प्रसन्नवाके कारण 
गुणराशि घनाढय होगया ।। १५ ॥ माताने उस ढक्ननके 
छिय बहुत बार याचना की पर उसने वह नहीं दिया। 

















कं रा जब 











उरााध्भम्कम्ककंा_,. चोक। 





कै. हि 


सा गोपतेर्मायां तस्येवानचेनाहुतम्‌ ॥ इर्त्थ विचित्त्य पायात्मा जामातरमघातयव।॥ १७॥ समि 

दर्ध बन॑ यात॑ स्वयं तद्ेहमाययो ॥ शोचन्तीं किल तां कन्यां स ठ देव्याः मसादतः ॥ १८॥ 
उत्थाय विपिनादेत्य शुकक्‍्त्वा शेते सुख गहे ॥ पादसवाहन तस्थ कुहत ललिता तदा ॥१९॥ त॑ 
दष्ठा ईं:खिता भूमों मणिपत्य पुनः पुनः ॥ छाजिता कृच्छृतः इष्टा निजपाप॑ न्‍्यवेदयत्‌ ॥१ २०॥ 
स्‍्कतद उवाच ॥ गुणराशिस्तदा तस्ये प्रायश्वित्त दुदो बहु ॥ खात्मान बहुकालेन पू्त कृच्छे- 
श्रकार ह ॥२९॥ श्रीपतेस्त्वचलां लक्ष्मी समालोक्य तपोधनाः ॥ गोपतिस्तमथापच्छद्धातस्तव॑ 
बतसे कथम्‌ ॥२२॥ किमाचरासे कल्याणं येन श्रीरनपायित्री ॥ इलि तस्य वचः अत्वा श्रीपति 
विंस्मित+) पुनः ॥ २३ ॥ अध्मारयद्गत देव्या यत्कृतं गुरुमन्दिरे ॥ सोष्पि भक्‍त्या ब्रत॑ चढ्रे 
पुन्नात्रोपपशितम्‌ ॥ २४ ॥ लेम स परमामृद्धि पुत्रांत्ष मुद्तोइ्मवत्‌ ॥ उपाद्ललितादेव्या/ 
कुर्यादाराधन ततः ॥२५।॥ एक्जेतत्पुराशत्त माहात्म्य॑ कथित मया ॥ कतमन्येश्व बहुभिस्तपि 
लब्धमनोरथ॥३ ॥ २६ ॥ ब्रतमेततु यः कुयादपुत्र; पुत्रवान्‌ अवेत्‌ ॥ इदं ठु ललितादेव्याः क्ृत्वा 
ब्रतमठुत्तमम्‌ ॥ २७ ॥ पूज्यों भंबति लोकस्थ सत्यं सत्य न चान्यथा ॥ विधानमस्य वक्ष्ये5 
तज्छुण॒ुध्व॑ तपोधनाः ॥२८॥ शुक्ृपक्षे ठु पश्चम्यानिषे मासि चरेद्तम्‌॥ गर्जितं संध्ययोस्त्याज्यं 
दिनवुद्धिक्षयों तथा ॥ २९ ॥ निवत्यावश्थक कर्म शुची रागविवर्जितः ॥ ततो गत्वा बन विप्राः 
प्राथयेश्च वनस्पतिम । १३० ॥ आधुवेलं यशो वचः प्रजा: पशुवसूनि च ॥ बहा भज्ञां च मेधां 
च्‌ त्व॑ं नो देहि वनस्पते ॥ ३१ ॥ बनस्पतिप्रार्थना ॥ अपामागंसजद्धतैदेन्तकाष्ठेः करोम्यहम्‌॥ 
दन्तानां घधावन मातः अ्रसन्ना भव सबंदा ॥ १२ ।। दनन्‍लकाष्ठप्रहणम्‌ ॥ चत्वारिशनलथाष्टो | 
कल्पायित्वा विधानतः ॥ दन्तकाष्ठान्युपादाय तडागं वा नदी ब्रजेत ॥३१॥ मुखदुगन्धिनाशाय 
दुन्तानां च विश्ुद्धये ॥ छ्ीवनाय च गात्राणां कुवे5ह दन्तधावनम्‌ ॥ २४ ।। इति दन्‍तथावनम्‌॥ 
दुन्‍्तधावनपूर्वाणि मजतानि समाचरेत्‌ ॥ ततो यथाबिधि स्नात्वा शुक्रवासा गई बजेत्‌ ॥३५॥ 


५00 आशा 
4१४४ 














४७७७७ आभार 0 0 20080 ७४ /४॥ 


क् ञ्व्दँ १ दि सन लि जा भि व य्‌ क्र +ि हथ 
अपने घर पूजती रही ॥१६॥ फिर गोपतिकी खोने निः्नय | गोपतिने रिर ब्रत किया (२४।इससे उसे परम समृद्धि प्राप्त 


किया कि मर घरको सम्पत्ति उस ठक्षतकी पूजा न रह- 
नंसेही नष्ट हुईं है । गुणराशि शोमके छिय समिवा ढछानेको 
लेंगढमें गये उस अपने जामाताकोभी दुष्टात्मा गोपतिकी 
खत्रीत मरवा दिया || १ ७ ॥ फिर कृत्रिम शोौचको दिखाती 
हुई छल्िवाके घर आई, जगलमे_ मरायाहुआभी गुणराशि 
देवीके अनुभ्हस ।। १८ ॥ शयनसे डउत्थितकी भाँति उठकर 
घरमें आ भोजनकर शयन करता था, लकछिता उसके चर- 
णोंकों दवाती थी ॥ १९।॥ यह देख दुखित एवं छज्जित 
हो वारंवार मु्िम प्रणाम करके अद्यन्त कष्टके' साथ ढलि 
ताकी माने अपने सत्र पाप कह दिये। १२० ॥ स्कन्द 
कहते हैं कि, गुणराशिने उसे बहुतसा आयश्वित्त दिया,वो 
अपनेको बहुतसे सम्रयमें अनेकों कच्छोंसे पत्रित्र करतकी 
(९१॥ हे तपोधनों ! श्रीपतिकी अचछ छक्ष्मीको देखकर 
गोपतिनि पूछा कि, भाई ! आप केसे रहते हैं |! ॥२२ || 
बाप ऐसा कौनसा कल्याणकारी काय करतेहें जिससे 
] को बहा विस्मय हुआ,पीछे ॥२३॥ गुरुजीके 


घर जो चुत फिय श्र ' चाद दिल्लाइ 
"| थी उसकी चाद दिलाई, स्ीने सी ऋष्, 


हुई पुत्र मिल्ठ प्रसन्न हुआ।इस कारण है तपोधनों ! उपाडुढ- 
छिता देवीका आराधन करना चाहिये।२०।यह मैंने पहि- 
लेकी बात और ब्रतका माहात्म्य कहदियाहे और भी बहुतोंने 
इस ब्रतको कियाथा उन सबको भी उनके मनोरथ प्राप्त हुए 
॥ २६ ॥ अपुत्र इस ब्रतको करनेसे पुत्रवान्‌ होजाता है, जो 
इस ललितादेवीके उत्तम ब्रतको करता है।२७॥वो लोकका 
पूज्य होता है, यह स्वेथा सत्य है झूठ नहीं है. हे तपोधनो! 
से इसका विधान कहता है आप सावधान हो कर सुनें॥२८। 
आश्वितमास शुक्ला पंचमीके दिन इसब्रतको करना चाहिये 
यदि सन्ध्याकाछमे मंघ गरजजाय अथवा  दिनकी वृद्धि 
और क्षय हो तो न करना चाहिये | २९ ॥| पवित्र और 
राग रहित हो नित्य कमसे निवृत्त होकर बनमें उपस्थित 
हो, अपामा्गकी प्राथना करे ॥३०॥ 'आयुरबंछम्‌” यह पहिें 
कहा हुआ ग्राथनाका मंत्र है।। ३१ ॥ यह वनस्पति प्रार्थना 
हुई। विधिस अडलालीस या आठ दाँतुन बना उन्हें. तढाग 
या लदी पर ले जाय॥३२॥३३॥फिर पूरे कहेहुएं दु्तधाव- 
नक मंत्रको बोछकर दांतुन करे ॥१४।॥ यह दांतुन विधान 
पूश हुआ। दांतुन करके सज्जन करे पीछे स्वास करंके 





(२११९ ) 


2558 मा «४ «5267७ 278 पद, हू जााअकाक दर ह हि: 78 / ०४०; ५८ 














कक. >नरकामम 


शुचों देशे मण्डपिकां कृत्वातीव मनोहराम्‌ ॥ सोव्णी प्रानिर्मां शकत्या ऋष्पयेस्मेतरएचिंटम 

३२६ ॥ उपचारे: षोडशानेरेप्रिमेत्रः रूमाहितः ॥ कुर्यात्पू्जा प्रथत्नेन इतामेश विद्योषतः 
॥ ३७॥ द्विजाय वाणक दद््राहिंशत्या वटकादेशमि ततः कूथां समाकृण्य वाणकान्रस्य 
संख्यया ।।३८॥ स्वयमद्यात्तरेवान्न॑ वाग्यतः सहे बान्धवे ॥ रात्रो जागरण कुर्याननत्यगीतादि- 


मड़ंल प्रभात पूजयंदेदी ततः कुर्याद्डसजनम ॥। सवाहना शक्तियुता वरदा 
पूजिता मया ॥ १४० ॥ मातर्मामलुगहद्मयाथ गम्यतां निजम! ॥ तमचों गुरवे ददष्चराद 


दानाने च स भूरिशः ॥ ४१ ॥ ब्रतमेव च यः कुयात्पुत्रवान्धववान्भवेत ॥ विद्यायात्रोगनिसुक्तः 
सुखी गोधनवान्नवेत्‌ ॥४२॥ अवधव्य च लगते सत्री कन्या वरसुत्तमम ॥ विजय पुष्टिमायुष्य 
यज्चान्यद्पि वाज्छितम्‌ ॥ ४३ ॥ इत्येतद्रतमाख्यातं लतिहाल महषयः ॥ श्ृण्वन्नपि नरो सकक्‍त्या 
घुखमाप्नोति निश्चितम्‌ ॥ ४४ ॥ निमुक्तः स सुखी धीमाव ब्रतराजप्रसादतः॥ >ँसमथारोग्यना- 
युष्यं प्राप्तोति च न संशयः ॥ ४५॥ इलतले श्री उवांगल> कथा संपूर्णा | व्थ.दापतम- आचाय 
वरयेत्पश्चादत्विजो विंशातिं तथा ॥ उपलिपे शुद्दों देश विलिखेन्मण्डर्ल ततः ॥ १ ॥ बह्ा- 
दींश्र ततः स्थाप्य पूजयेद्विघिमन्त्रतः ॥ अग्रणे कलशे शुद्धे ललिता स्थापयत्तथा ॥ राचो जाग- 
रणं कृत्वा प्रभाते होममाचरत ॥ इश्लुदण्डलिले: शुद्ध! पायसेनादि वा ब्ती | अड्टोत्तर 
वा बलिदान समाचरेत्‌॥ वायन च ततो दषदंदापएंशे निधाय थे ॥ बद्कान बिंशलिसंख्य- 
ब्विमलानधतपाचितान्‌ ॥ आचाय इजयेहअपइजछजा लडाश्यडु५ि: ऊात्विजश्व तलथ व्छात 
वर्ख्े सदक्षिणम्‌ ॥ विछुज्य व ततः पीठमाच!याय निवेदयट्‌ ॥ मोजयेश्व ततो विधान प्यसा- 
न्नेन भक्तितशविप्राज्ञां च ततो गृह्य स्वयं शुख्धीत बन्बुन्निः ॥ इते श्रीस्क०पु० उपा० उद्यापनम्‌ ॥ 





अहतवस्त्र पहिद घरपर चछा आधे | ३५ || पव्रित्रस्थरूमें 
एक अत्यन्त सुन्दर छोटीसी संडपिका बनाकर उसमें 
शक्तिक अनुसार सोनेक्की बनीहुइई मेत्रपूवेंक वेधनिप्पन्न 
मूर्तिको स्थापित करके ॥ ३६॥ मंत्रसहित घोडशोपचार स 
एकाग्रचित्त हो प्रयत्नके साथ पूजन करे | विशेष करके 
दूर्वाओंस पूजन होना चाहिय ॥३१७॥ बीस बडोंका वायना 
आचायको देना चाहिये, पीछे कथा सुनकर वायनेक 
अन्नकी संख्याके बराबर भाइयोंके साथ मोन ॥ ३८ || 
होकर आप भोजन करना चाहिये रातमें जागरण छरे 
उसमें नाच गान ओर वाद्य होने चाहिये ॥ ३९ ॥ प्रभातमे 
देवीका पूजन करके विसजन कर देना चाहिये कि, वाहन 
ओर शक्तिक साथ वश्दाका पूजन किया हैं ॥ ४० ॥ है 
माटः ! मुझ पर कृपा करती हुईं अपने स्थानकों चछी जा 
अर्चा गुरुंके लिये बहुलसी दक्षिणा दंनी चाहिय ॥ ४१ 

जो इस ब्रवकों करता हें वो पुत्र बान्धव विद्या ओर 
गोघनवाढा सुखी तथा रोगरहित होता है || ४१ || ख्ीक! 
सौभाग्य, कन्याको उत्तम वर मिलता हैं, विजय पुष्टि और 
आयुष्य एवम्‌ जो भी कुछ मनका चाहा होता हैँ वह सब 
मिल जाता हैं !।४३॥ है महपियो ! मने यह ब्त इतिहासके 
साथ कहा है, इसे सुनकर भी मनुष्य सुखको प्राप्त होता हे 
यह निश्चित है ।। ४४ || इस ब्रतराजके प्रसादसे वो सब 


मे सफिनसाअतणाजनज न 


कम लक मर तल किक लक दट प किकल अलग अप 
कष्ठोंस रहित सुखी और वुद्धिमान्‌ होवा है तथा वित्त 
आरोग्य ओर आयुप्यको पाता है इसमें सन्दंह नहीं हे 
॥ ४५ | यह श्रीसकन्दपएुसणकी कही हुईं उपाहुछलछिता 
ब्रतकी कथा पूरी हुई ॥ उद्यापन-पहिले आचाणय्यंका निधि- 
पूवक बरण करके पौछ वीस ऋत्विजोंका वरण करना 
चाहिये, छिप हुए पवित्र स्थलूम मण्डल लिखना चाहिये, 
पीछ विधि एवं मन्त्रोंसे ब्रह्मादिक देवोंक्ी स्थापना करके 
पूजन करना चाहिय, विना फूटे शुद्ध कछशपर विधिपूबक 

छिताकी स्थापना करके पूजन करना चाहिय, रादको 
जागरण करके प्रातःकाछ होम करना चाहिये, ब्रतीकों 
चाहिये कि; शुद्ध इखके ठुकडे और तिलोंसे अथवा खीरसे 
एकसो आठ भआहुति देकर बलिदान करना चाहिये। २० 
वटकों (छडदके वडों ) को जो क्लि अच्छे घी पकाये गये 
हों उन्हें दांसके पात्रम रखकर वायना देना चाहिय। पीछे 
वस्र अ्ंकार और घनुसे आचाय्येका पूजन करना चाहिये 
तेप्तेही ऋत्विजोंकों भी दक्षिणा और वस्ध सहित कुंभ देन! 
चाहिये, पीछे विसजन कंरके पीठ आचाय्यको दें, पाय- 


साज्नसे भक्ति भावके साथ ब्राह्मण भोजन करावे, पीछे 


ह्ाणोंकी आज्ञा छेकर आप सब बन्घुओंके साथ मोजन 
करे । यह श्रीसकन्दपुराणका कहा हुआ उपाड्ुछलिता- 


देवीके उद्यापनका विधान पूरा हुआ | 





१ निशिवा स्थाहिसजनमित्यपि पाठः । 


वफत्तपञत्नप्तीविधि:॥ अथ माधशुक्षपथ्म्याँ वसन्तप्रवृत्तिः सा मध्याह्वव्यातनी आह्या।॥ 
दिनहये तब्याप्तावव्याप्तों वा पू्वां ॥ तत्र विष्णोः पूजा कायो॥ माघे मासि सिते पक्षे पश्चम्य 
पूजयेद्धरिम्‌ ॥ पर्वविद्धा प्रकतव्या वसन्‍्तादों तथेबच ॥ तेलाभ्यर्ड् ततः कृत्वा भूषणानि 
च धारयेत ॥ नित्य॑ नेमित्तिक कृत्वा पिष्टांसनाचंयेद्वारिम्‌ ॥ गन्धपुष्पश्च धूपश्व नवेद्यः पूजये- 
त्सदा ॥ नारी नरो वा राजेन्द्र संतप्ष पितृदेवताः ॥ स्लकचन्दनसमायुक्तानब्राह्मणान्‌ भोज॑ये- 
त्ततः ॥ इति हेमाद्रों बसन्‍्तपथ्वमीविधिः ॥ | 

अथ पष्ठीवतानि ॥ 
लबिताषष्ठी || 

तत्र भाद्शुकपष्ठयां ललिताव्रतं हेमाद्रो भविष्ये ॥ सा मध्याहव्यापिनी ग्राह्मा ॥ द्विनदये 
तग्रातावव्याप्तो वा पूर्वी, जागरणप्रधानत्वाव्‌ ॥ इदे गुजरदेशे प्रसिद्धम॥ कृष्ण उबाच ॥ 
भद्रे भादपदे मासि शुक्ल पछचां छुसयुता ॥ नारी ख्वात्वा प्रभाते तु शुक्रमाल्याम्बरा शुत्िः॥ 
सुवेषाभरणोपेता भूत्वा संगह्य वालकाम॥कृत्वा तस्या वेशपात्रे पश्वपिण्डाकातिं शुभाम ॥ध्यात्वा 
तु ललितां देवीं तपोबननिवासिनीम्‌ ॥ पढ़ज॑ करवीरं च नेवालीं मालतीं तथा ॥ नीलोललं 
केतक च संगह्य तगरं तथा ॥ णए्केकाष्टश्त गाह्ममष्ठाविंशतिरेव वा ॥ अक्षताः कलिका ग्राह्मा- 
स्‍्ताभिदेवी समचेयत्‌ ॥ प्राथयेदग्नतो भूत्वा देवीं तां गिरिशप्रियाम्‌ ॥ गड्ढाद्वारे कुशावते 
बिल्वके नीलपवते ॥ स्नात्वा कनखले तीर्थे हर॑ लब्धवर्ती पतिमू ॥ ललित ललिते देवि सौरूष- 
सोभाग्यदायिनि ॥ अनन्त देहि सोमाग्यं पुत्रपौत्रप्रवर्धनन ॥ मज़्जेणानन कुसुमेश्रम्पकेबकुलेः 











शुभेः ॥ एवमभ्यच्य विधिना नेवेद्य॑ पुरतो न्यसेत्‌ ॥ त्पुसेरषि कृष्माण्डेनारिकिरेः 


वसन्तपंचमी-माघ शुक्ला पंचसी कहाती है इसमें वस- 
न्तकी प्रवृत्ति मानते है, यह तिथि मध्याहृष्यापिनी छनी 
चाहिये। यदि दो दिन यह मध्याहव्यपिनी हो अथवा 
दोनों ही दिन न हो तो पूर्वाका ग्रहण करना चाहिये इसमें 
विप्णु भगवानकी पूजा करनी चाहिये | माघ शुह्ा पेंच: 
मीको भगवानका पूजन करना चाहिये, वसनन्‍्तके आदिसें 
इसे पूर्वेविद्धा ग्रहण करनी चाहिये, तैलाभ्यड करके विधि: 
पूर्वक भूषण धारण करने चाहिये,नित्य नेमित्तिक कर्तकरके 
गुलालसे भावानका पूजन करना चाहिये, गन्ध, पुष्प घूप 
ओर नवेच्यसें सदा पूजे, हे राजेन्द्र | स्री हो वा पुरुष हो 
इस प्रकार पित्रीश्वर और देव तर्पण, करके ग्ठेमें माला 
तथा शिरमें चन्दन छंगाये हुए जो बाह्मण हों उन्हें भोजन 
कराना चाहिये। यह हेमाद्विकी कही हुईं वसनन्‍्त पंचमोकी 
विधि पूरी हुई, इसके साथ ही पंचमीके ब्रतभी पूरे हुए ॥ 


पष्ठीत्रतानि । 


अथ्‌ छठके ब्रतकहते ह। रुहिताअत-साद्रपद शुछ्का षष्ठीको 
होता हे यह हेसाद्रिने भविष्यपुराणको लेकर लिखा है। यह 
मध्यहन्यापिती तिथि छत्ती चाहिये, मध्याहव्यापिनी हो 
अथवा न हो दो हों तो पूर्वा ही छेती चाहिये । क्योंकि 


सुदाडिमः ॥ 


इसमें जागरण प्रधान हे,जागरण रातमें होता है उसमें तिथि 
रहनी ही चाहिये। यह गुजर देशमें प्रसिद्ध है । भगवान्‌ 
कृष्ण बोले कि,सुन्दर भाद्रपद महीनाकी शुझ्भा पट्ठीके दिन 
समाहित चित्तवाढी ख्रीको चाहिये कि, प्रातःकाछ स्नान 
करके सफेद माला और अम्बर घारण कर पवितन्नतापूर्वक 
अच्छे वेष बना आभूषणोंसे सज बालू छे उसके पांचपिण्ड 
बनावांसके पात्र रखकरतपोवननिवासिनी रूलितादबीका 
ध्यान कर।पंकज,करवीर,नेवाली,मालती, नीलोत्पछ, केतक, 
तगर इन सबको एक एक सौ आठ या अट्टाइंस २ ले विना 
टूटी हुईं कली छे उनसे देवीकापूजन करे | अगाडी होकर 
शिवकी प्यारी देवीकी प्रार्थना करे कि, जिसने गंगाद्वार 
कुशावत्त बिस्वक ( तीर्थविशेष ) नीरूपर्वत और कनखदमें 
स्ानकर उसके प्रभावस महादेवजीका पाणिप्रहण किया है 
उस महेश्वरवह्ठभा रूलितादेवीकी प्रार्थना करे कि;हे सुन्दरि 
छलित ! हे सौख्य और सौभाग्यको देनेवाी ! आप मुझे 
अनन्त पुत्रपौन्रोंकी समृद्धिवाल़ सौभाग्य सुखको दे, इस 
मर्न्रको पढ़ती हुईं चम्पेके और मोछूसरीके सुगंधित पुष्पों 
से विधिवत्‌ पूजन करके नैवेद्य सम्मुख घरे। उसमें त्रपुस 
( फलविशेष "एजजज++-++++-.......हत_._हलशैप / कृष्माण्ड, नारिकेड/ अनार, वीजपूर कृष्माण्ड, नारिकेछ, अनार, वीजपूर 


१ गुलालेति प्रसिद्धेन 


























777९४ 7३. श] 


ब़तानि, | 


८ ०4५ ४. 2: ६5 डः या स्ः हे ह: हर 
(0770 लय: कतार 3 व्याह077 :0९ै8:३॥! 


2 
मे 224 7४६३६ 685 8 १827 ८४८६7 70 20078 220/090077 00007: प0::::7 एप: 07/70/7650 5५ २२८ इन 227 "77 एफ 47 पक मे अन्तर: 00007 ६ तप तट 0070 ॒खयव +5275 #- कह ४ 


हम पक 





8 0८0790॥ 0,57० 


पक 24 00250 40 2720: 70९१४ ५/4..2002. 0000 2: :% 7] 47 





गीजपूरे!ः सत॒ण्डीरः कारवेछेः साचिभेटेः॥ फलेस्तत्कालसंभूले: कृत्वा शोभां तदग्रतः ॥ 
वेरूटेपॉन्यसंभूलेदीपेकानिः समन्ततः॥ साथ समुदकेधपः सोहालककरखकेः ॥ पेतपक्केः 
#ऋणवेष्टेमोदकेरपमोदकेः ॥ बहुप्कारेनवेद्रेयेथाविभवसारतः ॥ एवमश्यच्य विधिवद्रातों जाँग- 
(णोत्सवम्‌ ॥ गीतवादयतेनेत्येः प्रेकश्षणीयेरनेकथधा ॥ सखीभिः सहिता साध्वी तां रात्रि प्रशम 
नयेत्‌ ॥ न च संमीलयेन्नेत्रे नारी यामचतुष्टयम्‌ ॥ दुभगा हुःखिता वन्ध्या नेचसंमीलनाद्धवेव॥ 
एवें जागरण कृत्वा सप्तम्यां सरितं नयेत्‌॥ गन्धपुष्पेरथाभ्यच्य गीतवाह्यपुरःसरम्‌ ॥ तत्व 
दइद्माहिजन्द्राय नेवेद्यादि नपोत्तम ॥ स्नात्वा वस्तं परीधाय धृत्वा सोमाग्यकुंक्मम ॥ ततो ग॒हं 
समागत्य हुत्वा वेश्वानरं ऋमात्‌॥ देवानिपितृस्थाह्मणांश्व पूजयित्वा खुबासिनीः ॥ कम्यकाश्वेव 
संभोज्य दीनानायथांश्र भोजयेत्‌ | भक्ष्यभोज्यबेहुविधेद्त्वा दानानि भूरिशः ॥ ललिता मेष्स्तु 
छुप्रीता इत्युक्त्वा तु विसजेयेत्‌॥ यः कश्चिदाचरदेतद्वत सोमाग्यदं परम॥षष्ठयां तु ललितासंत्त 
सर्वपापनिबह॑णम्‌ ॥ नरो वा यदि वा नारी तस्य पुण्यफर्ल श्वणु ॥ यत्तु लग्यं ब्रतेश्ान्येदनियां 
नपसत्तम ॥ तपोमिर्नियमेवापि तदेतेन हि लग्यते ॥ इह चेबातुला संपत्सोभ्राण्यमलुभूएट च॥। 
कृत्वा मून्नि पद पार्थे सपत्नीनां यशास्विनी ॥ झता शिवपुरं प्राप्य देवेरसुरपन्नगः ॥ पाप्नोति 
दशन देव्यास्तया तु सह मोदते॥ पुण्यशेषादिहागत्य पुण्यसौर्येकनाजनमांखा र्नी बेतायुगे 
साध्वी सीतेव प्रियवक्लणा॥इद॑ यः श्वृणुयात्‌ पार्थ पठेद्रा साथुसंसादि ॥ सो5षपि पापविनिसक्तः 
शकऋलोके महीयते॥ षछ्ठयां जलान्तरगता वरवंशपात्रे संगह्य पूजयति या सिकता ऋमेण ! नर्ते 
च जागरमन॒द्धतवेषशीला कुर्यादसो जिश्वुवने ललिलेव भाति ॥ इति देमाद्ों ललिताषब्ीत्रतम्‌ ॥ 





3: ई, 5 
'क्फपक्राममपश्पपमाऊ 


कृपपष्ठी ॥ अथ भाद्रपदकृष्णपष्ठयां कपिलाष्लीब्रतम्‌ ॥ 


तनञ्च योगबेशेषण पूवंविद्धायाँ 





( बिजोरा ) तुण्डीर ( फलविशेष ), कारवेल्ल (करेछा) और | 
चिभंट ( फलविशेष ) इन फर्लोंको रखदे, एवं जो जो फल | 
उससमयम उत्पन्न होते हों उनको चढावे। नवीन धान्यको | 
सजरियां चारों ओर छटकाकर छोटी छोटी दीपिकाएँ छूट | 
कावे, जिससे कि उस स्थानकी शोभा बढ़े, धूप करे,गुडके | 


बने हुए पदाधे, सुहाली, क'खक, घृतकी जलेवी, लड्डू 


ऐसे षष्ठीमें जागरण करके सप्रमीके प्रातःकाल नदीपर छे 


वादनादि करे । है नपोत्तम | जो सामग्री देच्चीके अपंण की 


स्नान करे, बख्र पहिरे, सोभाग्यसूचक रोली सिन्दूर आदि 


छगावे | पीछे धर आकर अप्रिमें हवन, देवता पितृजन | 


ब्राह्मण और सुवासिनी स्लियोंका पूजन करके कन्या; दीन | 
ओर अनार्थोंको बहुविध भक्ष्य-भोज्य खिलाबे और “लढलि- | 


उनको विद्दाकर पीछे विसर्जन करदे | जो कोई इस छठक 
सौभाग्यदायी सब पापोंके संहारक छछितात्रतको करता हैं 
वो पुरुष हो या सखी; जिस फलको पाता है उसे सुनो हे 
नृपसत्तम ! दूसरे सब ब्रतों एवम दान तप ओर नियमा- 
नुष्ठानोंसे जो फल मिलता है; वह सब इस ब्रतस मिल 
जाता है । व्रत करनेवाली स्री इस छोकमें अतुछ सम्पत्ति 


। कु गॉके ० ४८ 3022 
स्‍र अन् के | ग्य ग्‌ पर पेग रख 
शक्तिक अनुसार नेवेद्य छगावे, इस प्रकार विधान समाप्त | ) 


करके राजिमेंजागरणका उत्सव करे गान वाद्य और अनेक | 


हक] 4 8 औ. यॉँके फ..] 
8 3४०३७. लक हक न | पुण्य भोग यहां जन्म ले पुण्यमय ञ। नन्‍्द भोगती है। और 
कर  जागरणमही रात्रि समाप्त कर । नेत्र न सौँचें क्योंकि, | बह ज्ली त्रेतायुगर्म जेसे सीता रामचन्द्रजीकी प्रेयसी हुई 
नेत्रोंक मीचनेस दुभगा दुःखिता और वन्ध्या होजाती है || है, वेसही अपने पतिकी प्यारी होती हैँ । हे पाये | जो 
| मनुष्य महात्माओंकी मण्डलीमें बेठकर इस ब्रवकी कथा 
जाय, वहां उसकी गन्ध पुष्पादिकोंस पूजा और गान वाद्य" | 


ओर. पशञ्नगोंके अहनिश वाज्छित भगवतीके द्‌ शनोंको 
करती हुईं देवीके साथ सहेडीकी भाँति विहार करती हू। 


७, 


के शक रा च्् 
सुनता है या पढ़ता हें वह भी पापोंसे छूटकर इन्द्रलोंकर्म 


| चछा जाता हे ।जो भादों सुदि षष्ठीके दिन वदीकी 
ह. स ५ (५ पी, । रे 
हूँ उनको तथा वालुकामयी देवीको आचायक लिये दे नदीसें | 


वबालुकास पञ्चपिण्डहपा देवीको वना वांसकी प्रिठारौसें 
धरकर पूजन ओर रातमें जागरण करती हैं और झान्त 
पवित्र वेब और स्वभाव रखती है, वह ख्री त्रिढीकीर्म 
ललिता ( गौरी ) क्रे-लमार्म गिनी जाती हे यह श्री हें 
म!द्विम कह्ठी-हुईं छ| हुईं छलिताषद्ठीके ब्रतकी कथा पूरी हुईं ॥ 


तादूबी मेरे पर प्रसन्न हो” ऐसा कह बहुतसा द्रव्य दे! कपिंलाषष्ीका ब्रत-भाद्पद सुदी छठके दिन होता है । मेरे पर प्रसन्न हो” ऐसा कह बहुतसा द्रव्य दे।।. क्र्पिछाषष्ठीका ब्रत-भाद्रपद सुदी छठके दिन होता है। 


१ गुडपुष्पेरित्यपि पाठ: । २ कुर्यादिति शेषः। ३ समापयेदित्यथः । ४ ्राह्मण्यो दृश पंच चेत्यपि पाठ: * 


परविद्धायां वा कार्यम्‌ ॥ ते च योगाः पुराणसमुच्चये दश्शिताः- - "भा मास्यसिते पक्ष भानौ 
चेव करे स्थिते॥ पाते कुजे च रोहिण्याँ सा षष्ठी कपिला स्टृता (२ योग त॒ चठ॒णा च निर्दिष्ट 
परमेष्ठिना ॥ अथ बरतविधिदमाद स्कारदे॥ विक्रान्त उवाच | रूपसंपदमारोग्य॑ सन्तति चाति 
पुष्कलाम्‌ ॥ आप्लुवन्ति नरा येन नियम त॑ वद्स्व में ॥१ | । अगस्त्य उबवाच ॥ साधुसाइ महा 
प्राज्ञ यत्पष्ठोहहे त्वयानघ ॥ तत्सवे कथयिष्यामि ततः श्रेयो भविष्यति ॥ श्णु पार्थिव बक्ष्यामि 
स्वर्गमोक्षमदं तृणाम्‌ ॥ २॥ यज्ञ ग॒प्ते पुरा राजन्वहारुड्ेन्द्रदवतः। अछुराणां व सब राक्ष- 
सानां तमेव च ॥ ३॥ शंकरेण पुरा चेतत्वण्मुखाय निवेद्तिम्‌॥ षण्मुखेन ममाख्यातं॑ महा- 
पातकनाशनम्‌ ॥ ४ ॥ यच्छृत्वा बहाहा गोन्नः खुरापो गुरूतरुपगः ॥ अगारदाही  गरदः सर्व- 
पापरतोःषि वा ॥ ५ ॥। मुच्यते सर्वपापेभ्यः स्व्गलोक च गच्छति। यज्च पुण्य पावित्र च नृणा- 
मद्भुतनाशनम्‌ | ६॥ उपकाराय लोकानाँ तथा तब नृपोत्तमाश्रण भूप महापुण्य॑ षष्ठीमाहात्य 









मत्तमम ॥ ७ ॥ गैष्ठपंदासिते पक्षे पष्ठी मौमेन संयुता ॥ व्यतीपातेन रोहिण्या सा षष्ठी कपिला 
स्मृता॥ ८ ॥ आशिनस्पांसिते पक्षे महापृण्यप्रवर्धीनी॥ पष्टिसंवत्सरस्थान्ते सा पनस्तेन 


संयुता॥॥ ९ ॥ चेत्रवेशाखयोम॑ध्येडसिते पक्षे शुभोदया ॥ वेशाखे5पि च राजेन्द्र द्वारवत्याँ परा 
स्‍्मृता ॥ १० ॥ यदि हस्ते सहस्मांछुस्तदा कार्य ब्रतं बुधेः ॥ अस्यां चेव हुत॑ दत्त यत्किजित 
प्रतिपादितम ॥११॥ तस्थ सर्वेस्य पुण्यस्य संख्या वक्‍त न शक्यते ।।यस्मिन्काले भवेदतगुण; 
पष्ठीयुता तदा ॥ १२॥ पश्चम्पामेकमक्तं च कु्यात्तत्र विचक्षण॥ षष्ठचं प्रातः समुत्थाय कृत्वादो 





यह व्रत योग विशेषसे पूर्व विद्धा और पर विद्धा दोनोंम 


ही होता है यानी जो योग चाहियेंबे जिसमें हों वही 
प्रहण करली जाती है, वे योग पुराण समुश्चयर्म दिखाये 
गये हैं कि, जिस भाद्रपद क्ृष्णाषष्ठीक दिन हृष्त नक्षत्रमें 
सृय्य हो एवं व्यतीपात रोहिणी नक्षत्र और मंगलवारका! 
योग होतो वह कपिला कहायगी, यह ब्ह्माजीका निर्देश 
हृ जप किन मन कप ठेसे जो स्कन्दुपुराणस लेकर ब्रत विधि कही है उसे 
कहत हैं | विऋ्रान्त पूछते हैं कि-रूप, सपद आरोग्य और 
अत्यन्त पृष्कल सन्‍ः्ति जिस ब्रतके करनेस मिलती है उसे 
आप मुझसे कहें । १ ॥ अगस्त्यजी बोले कि, हे निप्पाप ! 
आपने वहुतही अच्छा पूछा, में सब कहृदूंगा जिससे बड़ा 
कल्याण होगा, हें राजन ! उस ब्रतकों कहताहू जिसस 
अनायास स्वगे और मोक्ष मिलजाते हैं ॥२॥ जिसे कि, हे 
राजन ! देव असुर राक्षस तह्मा ओर इन्द्र कोई भी नहीं 
जानता ॥३॥ शकर भगवानते इसे स्वामिकार्तिकजीस कहा 
था. उन्होंने पापोके प्रणाशक इस ब्रतको मुझसे कहा ॥|९॥ 
चाहे बद्महत्यारा गो मारनेवाह्ा; शराबी, गुरु पत्नीस 
सहवास करनेवाढा, मकान जछानेवारा, जहर देनवाला 
ओर सब ग्रकारके पाप करनेवाला ही क्‍यों न हो इसे सुन 
कर ॥५॥ सब पापोस छूट जाता है, स्त्रगे चछा जाता है, 
मनुप्योंके पापोंको नष्ट ऋरवेबाल्ा ज्ते भी कुछ पवित्र पुण्य 
है वो यह हैं ॥६॥ है नृपोत्तम | तेर और संसारके कल्या- 





|. 


ब्रती पथ्चमीके दिन 








णके छिय सुनाता हैं हे भूप |! इस मह खत षष्ठीक 
माहात्म्यको सावधानी के साथ घुन ॥ ४ ॥/भाद्रमासके 
कृष्णपक्षम मज्जलबार रोहिणीनक्षत्र और व्यतीपात; इन 
योगोंसे सहित यदि षष्ठी हो वो उसे कपिछा षष्ठी कहते है 
॥ ८॥ आश्रिनमासके कृष्णपक्षमें यदि षष्ठी मद्ुलवारादि 
पूर्वोत्त योगबाली हो तो उस महापुण्यप्रवर्धिनी कहते हैं| 
यह षष्ठी साठवर्षोके बाद ( प्रायः ) आया करती है ॥ ९॥ 
यह योग किसी वर्षमें चैत्र या वेशाखमें भी .कृष्णाषष्ठीके 
दिन मिलाकरता है, पर उस समय उस षड्ठीका नाम 
शुभोदया षष्ठी पाना जाता है| हे राजेन्द्र | द्वारकाजीकी 
ओर रहनेवाले छोग वेशाखकी शुभोद्याकों परा नामसेभी 
कहते हैं ॥१०॥ कपिलापप्ठीम मज्छवारादिकोंका योग तो 
होता ही है, पर उसमें हस्तनक्षत्रपर सूयंका योग परमाव” 
इयक हे यानी हस्तमूर्यक रहते भाद्रपदकी कऋष्णाषष्ठी मज्ज' 
लवार रोहिणीनक्षत्र और व्यतीपात इन योगॉवाली हो तो 
उसे कपिलछाषष्ठी कहना चाहिये, इसीमें व्रतकरे। यह पष्ठी 
भादपद्‌ या आश्रित मासके विना अन्य मासोंमें नहीं होस- 
कती । क्योंकि हस्तलक्षत्रपर सू्ये अन्यमासोंमें नहीं रहते, 
जिस समय इन गुणोंके साथ षष्ठी हो उसमें यात्ती इस 
कपिलाषष्ठीमें हवन, दान आदि जो पुण्य कमे किये गये हों 
उस पुण्यकी संख्या नहीं की जासकती ॥११-१२॥ योग्य“ 
एकबार भोजन करे, प्रातःकाछ उठ 


+ भाद्पद: । + हेसादरे तु एल्द्पेस्थाने-द्वितीया तु महापुण्या दुरभा ब्रतिनः क्वचित्‌ । इत्यधमस्ति। श्पूर्वोक्तयोनेन! 


भतानि, ] ... भाषाटीकासमेतः | ( शशहे ) 





गम थक कमा पटक प्रदायक ५. आठ 








अधि आम ०० 22229 50 22800 06602 
... सन्‍न्‍न्‍लभ»»मल अधमाकि+४७ ०५ कका..3ल्‍+५अआ+५ गेल 


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श्‌ 


दब्तवावनम्‌ ॥ जलपूर्णाअलि कृत्वा इमे मन्त्रमुदीरयेत्‌॥ १३ ॥ निराहरोड्य देवेश त्वद्धक्त- 
सत्वत्परायणः ॥ पूजयिष्याम्पहं मकक्‍त्या शरण भव भास्कर ॥ ९४ ॥ अहप्य दत्वेति संकलप॑ 
कृत्वा यत्नाच्छाचिस्‍्ततः ॥ स्नाने कृत्वा भयत्नेन नश्यां तीर्थ5थत्र। हद ।१५।तडा!गे दीघिकायां 
वा गहे वा नियतात्मवात्‌ ॥ देवदारू तथोशीर कुकुमेलामनःशिलम्‌ ॥ १६ || पद्म पत्रकं घंड़ि 
मधुगव्येन पेषयेव्‌ ॥ क्षीरेगालोब्य कल्केन स्मानं कुर्यात्‌ समन्त्रकम्‌ ।१७॥ आपस्त्वमाि देवेश 
ज्योतिषां पतिरिव च्‌ ॥ पाप शमय देयेश मनोवाक्कायक्र्म जय ॥ २८ ॥पर्वय्व्यक्ुतस्तानः पण्व- 
भड्रैस्त मार्जयेव ॥ आनेयन्म्ातिकां शुद्धां खानाये वे भयत्नतः॥ २९॥ मृत्तिके बह्लइूतासि 
काइयपेनामिमन्त्रिता ॥ पवित्र कुछ माँ नित्य सर्ववापात्समुद्धर ॥२णा अनेन मृत्तिकास्तानम॥ 
मन्त्रेणानेन वरुण म्रार्थयेद्धाक्तिमन्नरः । २९ ॥ पाशाग्रहस्त वहूस सर्ववारीखर अभो॥ अथं 
प्रार्थयामि त्वां पूत कुरू सुरेखवर ॥ २९ ॥ आदित्यो भास्करो भान्‌ रणिः खूबों दिवाकरः ॥ 
प्रभाकरो वितिमिरों देवः सर्वेचरों हरिः-॥ २२ ॥ इति जपित्व ॥ गोमयेनोपलिततायां भूम्यां 
वे हुकुमेंन तु ॥ मण्डल सबतोभ॑द्रमालिखदूइुद्धिमान्रः ४ तत्र मब्य लिखेत्पञ्ममष्ठ पत्र सकणि- 
कम्‌ ॥ २४ ॥ पूर्वपत्रे न्‍्यसेत्लूयंमाम्रेवे तपनं न्यसेत ॥ खुवणरेत्ख याम्ये नकऋत्ये च न्यछेद्र॒- 
विम्‌॥ २५॥ आदित्य वाहणे पत्र वायव्ये च दिवा करन ॥ सोम्ये प्रभाकर तत्र सूरमीशान- 
पत्रके ॥ २६॥ तीघ्रररशिमषरं देव॑ ब्रह्मा चेब विन्यसेव ॥ आधाररूषिण देव नध्ये चेबारूणं 
न्‍्यसेत्‌ ॥ २७ ॥ सहल्वरहिंम सूर्य च खुज्ष्म स्थूलगुगान्वरितम्‌॥ सबंग सर्वेरप॑ च मध्ये भासकर- 





कर पहिंल दन्‍्तधावन करे | फिर जछाजलि लेकर कहे की हैं; मुझ आप पवित्र करें। मेंने जो आजतक पाप किया 
॥१३॥ कि, हे देवश | है भास्कर ! मे तुम्हारा भक्त तुम्हारी है उन्त स बको नरक वासरूप यन्त्रण। से बचायें || २० # 
सवाभ परायग हो निराहुार रहूगा । भक्तिस पूज॑च करूंड; मृत्तिका लगाकर स्वत करनेके पीछे जलाधिआता वरुणकी 
आप मरे नियमकी पालना करानमें सहायक हों ॥। १४॥ | “ पाश्ाम्र / इससे पाथना करे ॥ ९१ ॥ है पशकों हाथम 
इस प्रकार अध्य देकर उक्त अध्येदानके मन्त्राथंके अलुसार | घारण करनेवाले : हैं समस्त जलोंके इंश्वर ! हे प्रभो हे 
सद्डुल्प करे | फिर नही, तीथे, तछाव || १७ ॥ वापिका | सुरेखर ! वरुण ! में आपकी प्रार्थना करता हूँ। जाप मुझे 
या और ऐसा जलाशय समीप न हो ता अपने घरपर ही पवित्र करें | २२॥ इसके पीछ स्नान करके सब कमोंके 





विधिवत्‌ स्नान करे । किए चित्तको सावधान करके देवदारु | साक्षी सूये देवके ग्यारह नामोंछो जपे। के नाम ये हैं - १ 
खशखश , केसर, इलायची, मनःशेल्ा ॥ १६ ॥ पद्मचक, | आदित्य, रे भारकर, २ भांछ, ४ रवि, ५ सूय, ६ दिवाकर 
पत्रक और षष्टि इन सबकोप च्गव्यम घिसकर दुधम मिला | ७ प्रभाकर; ८ वितिमसिर, 5 देव; १० सर्वेश्वर और ११हरि 
पत॒ली पीठी वैयार करके पीछे इसको जिस "छसे स्नान | ॥ २३ || फिर घोतवखादि घारणकर गोमसयस छीपी प्र॒थि- 
करे उसमें प्रथम मिछावे किर " आपस्त्वमसि ” इत्यादि | वीपर रौढी आदिसे बुद्धिमान्‌ नर विधिपूर्वक सबंतोभद्र- 
सनन्‍्त्रोंको पढदा हुआ स्नान करे ॥ १७ ॥ कि. हे देवेश ! | सण्डल लिखे; उस मण्डलक बीचमें कर्णिकासमेत अष्टद्छ 
आपही जल हैं, आपही सूये ( चन्द्र ) हैं, आप मेरेमन:वाकू | कमछ लिख ॥ २४ ॥ पूतपत्रमे सूथ, अभ्िकोजके पत्रमें 
. और शरीरके कम्मोंसे किय गये पापोंको छ्वान्तकरें । १८ || | तपन; दक्षिणपत्रण सुबणरता, निऋतिकोणके पन्ने रवि 
पीछे पश्चगव्यसे स्नान करे, फिर पथ्चवपल्ठब्ोंके जलसे अपने | ॥ २०॥ पश्चिमपत्रेम आदित्य, वायुकोण के पतन्रम दिवाकर, 
शरीरका मार्जन करे, स्रानाथे छायी हुई शुद्ध गोस्थानादि- | उत्तर पत्रमे प्रभाकर और इंशानकोणके पन्रसें लूर्तामक 
कॉकी म्त्तिका छमाकर मृत्तिकाल्ञान करे। मत्तिका रेपन | भास्कर भगवानका उछेख कर | २६ ॥ 5्सकी का काम 
करनेके समय “ सृत्तिके अह्मपुतासि ” इस सन्‍्त्रको पड़े । | तीघ्रतेजवाले एवं सबके आधाररूप बह्यनाम्रवाड़े सूच और 
इसका यह अथे हें कि, हें मृत्तिक | तुम ब्रह्म ( वदों ) के | अदुणनामवाले सूयेका स्थापन करे ॥९»| वहांपरहो सह- 
समान पविन्न हो कश्यपजीने तुम्हारा अभिमन्त्रण (पशेसा) | खरश्मि स्थूछ एवं सूक्ष्म शुणोंवाद्दे सबत्र विचरनेवाल, 


नि न जा 55» ७0७0७ ४ ७७४७७७७७७७७७४- ७४ ४७७७४:७७७४४७४-४७४०० ७ ही 820 2०420: 224:“203:3:4 20७0७ ७७७७॥७७००७७ 








00.0 5 30% 53 02208, ४०७४० 'पृष्टफरत ४5:१४: आकार 





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१ घष्टिकतण्डुछा। । ५ "रचपक्ुवः ! 


अमा्रकाक्ाकककना्ाानकाकाकाकप का सपिफफनननन-+ऊक्‍क्‍--33"3"")"ल्‍+क्‍क्‍क्‍7_77_7_॒_ सिननलकननम कार») 





कल लक लक पक के मिशन 
मव च ।! संताश्वरथमारुट पद्महस्तं दिवाकरम्‌ ॥ अक्ष सूत्रधल॒ष्पाणि कुण्डलेसुकुटेन च॥। रत्न 
नानाविधेजक्ते सौवर्ण तत्र कारयेत ॥ शक्तितस्तु॒ पलादूध्वे तदथे के अं वा ॥ सोवर्ण- 
मरुणं कुयाद्रज्छ चव तथाविधाम्‌ | सत्तावनूषितं कृत्वा रथ तस्याग्र तः थतम्‌। अरुण बिन- 
तापुत्रं रहीताश्वमन्‌रुकम) एवंरूप रथं कृत्वा पह्मस्योपरि विन्यसंत। ।तस्थोपरि न्यसेदेव रक्त- 
ब्धाविभूषितम्‌ ॥ रक्तचन्दनमाल्यादिमाण्डितं चातिशोमनम्‌ ॥ अम्रतः साराथ कृत्वा पूजये- 
दरुणं शुचिः ॥ रक्तपुष्पेस्त गन्धेश्व॒ तथान्यराप शक्तितः ॥ विनतातनयो देवः कमसाक्षी त्तमो- 
लुदः | सत्ताश्ः सप्तरज्जुश्च अरुणों में प्रसीदठ॥मन्त्रेणानेन संपूज्य सारथिं तदनन्तरम| 'देवस् 
त्वासन करुप्ये प्रभूतादिकपश्चकम्‌ ॥ भभतं विमले सारमाराध्यं परम शुभम॥ दीतादेशक्तिप्नि- 
श्षैव ततो माल मपूजयेत्‌ ॥ दीतासूक्ष्मा तथा भद्रा बिम्बिनी विमल्ानधा॥अमोघा बंचुुता चेति 
नवमी सवतोमुखी ॥ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतो5पि वबा॥ यः स्मरेद्वास्करं देव॑ स 
बाह्माभ्यन्तरःछचि।शिखायां भास्कर न्यस्य ललादे सूर्यमेव च।चक्षुमंध्ये न्यसंद्धातु सुखेतत्र 
रविं स्थसेव॥कण्ठे न्यसेद्धालमन्तं पद्महस्तं द्विहस्तयो।॥तिमिरक्ष यकूदेवं स्तनयोरेव विन्यसेव॥ 
जातवेदीमिध नाम्यां कव्यां माल तथा न्यसेत्‌ ॥ उम्ररूप॑ गुह्देशे तेजोरूप द्विजंघयोः॥ 
पादयोः सर्वरूप ठ सक्ष्मस्थूछगुणान्वितम्‌ ॥ एवं यथोक्त विन्यस्य पाँच गह्य ततों3चेयेद्‌॥ 
करवीरार्ककुसुमेरक्तचन्दनामश्रितेः ॥ पुष्पेः सुगन्धेधूपेश्च उ-कुमेरुपशोमितम। 'मातण्ड मातमा- 
दित्यं मास्करं तपनं रविम्‌ ॥ हेस द्वाकरं चोति पादतों मुकुटावधि ॥ पादों जंघे तथा जाह- 
दयमूरू कटी तथा ॥ नामिवक्षस्थलं शीषेमतेष्वद्भेष पूजय्ेत्‌ ॥ आनयेदध्यपात्र चेद्रीप्यं वा 


सवरूप, प्रकाशके करनेवाले, सात घोडोंके रथमें विराज- 
मान, कसलको हस्तमें घारण करनेवाले, दिनको करनेवाले, 
रुद्राक्ष और धनुष्को हाथोंमें धारण करनेवाछे कुण्डल एवं 
मुकुग्स शोमित भगवान्‌ सूथ्यनारायणकी प्रतिमा नाना“ 
विध रनोंस जडीहुईं ऐसीही सोनकी होनी चाहिये ' 
बैसव अधिक हो तो एक पलछसुव॒णरेः अधिककी, यदि कम 
हो तो आधे पढछुया चौथाई पछूकी होनी चाहिय। अरुण 
नामा सारथि और वेसी ही सुव्णकी घोडोंकी वागडोर 
होमी चाहिये, उस रथमे सुवर्णकेही सात धोड़ों जुते हुए 
हों | विनतानन्दन अनूरु अरुणनामके सारथिको तो रथके 
जूडेपर बिठावे उसके हाथमे सातों घोडोंकी रश्समियां देदे । 
सूयको उस रथमें विराजमान करे पर उस रथमें विराज- 
मानकरनेके स्थानमें केसर चन्दनादिस कमछका आकार 
लिखे । सूयद्वको कमरूपर रथके बीचमें स्थापित करे । 
/सूुयेभगवानकी सूर्तिको शोणवणकी धोती और डुपद्टासे 


शोमितकरे | छाछ चन्दन छगावे छालपुष्पोंकी माला गढेमें 


कक 
पहराव । फिर छाछफूछ, छालचन्दन और छाछ अक्षता- 


दिकोंस उनकी अचेत्ता करे! सूयदेवकी अचनाके पहिले' 


अरुणकी पूजा करे, एस कहे, कि, विनतानन्द्न, प्रक्ाश- 
कारी, कमरोकोीं देखनेवाले, अन्धकारके विनाशक, सप्र- 
अश्वों ओर सप्त रश्सियोंवाले भरुणदेव मुझपर अपनी प्रस- 
जत्ता प्रगट करे । फिर १ गप्रभूत, २ विमर, ३ सार, 


९ अज्रमध्य पूज्य भास्करमनूद्य तन्रध्येयागुणाविधीयन्ते 


एव ब्यम्ाणदादशाध्यसाधारणपान्रपरिप्रहो विधीयते 


रु 


४ आराध्य ओर ५ परमशुभ इन पाँच आसनोंकी कल्पना 
सूयभगवानके छिय करे, यानी ये प्रभूवादि आसनॉपर 
विराजमान हैं । १ दीपा, २ सूक्ष्मा, ३ भद्गा, ४ बिम्बिनी) 
५ विमछा, ६ अनघा, ७ अमोघा, ८ विद्यत और ९ सबं- 
तोमुखी, इन नवशक्तियोंका सूयंभगवानके समीपमें पूजन 
कर। शिखामे भास्कर, छला2में सुर्य, नेत्रोंके बीचमें भानु, 
मुखपर रवि, कण्ठमें भानुसान, दोनों हाथोंपर पद्महसत 
दोनों सीनॉपर तिमिर क्षयक्वृत्‌ देव, नाभिपर जातवेद, 
कटिपर भानु, गुश्यदेशर्म उग्रूप, दोनों जंघाओंपर तेजो- 
रूप ओर पावों पर स्थूछ ओर सूक्ष्म गुणोंसे अन्वित सबे- 
रूपका न्यास. करे । न्यास कर चुकनेके पीछे अध्येपात्र 
लेकर फिर पूज, करवीर और अर्क ( आक ) के पुष्पोंको 
छा७चन्दनके साथ लेकर उनमें ओर भी सुगन्धित लाढ' 
कमल गुलाब आदि पुष्पोंको सम्मिलित करे, फिर उन 
पुष्पोंस तथा सुगन्धित धूप और रौलीसे सूयदेवका पूजन 
करे । पीछे * ओ मातेण्डाय नमः + पादोौं पूजयामि 
इत्यादि नामसन्त्रोंकी कल्पना करके १ पाद, ३ जद्बा। 
३ जात, ४ ऊरू, ५ कटि, ६ नाभि; ७ वक्षःस्थकूः और 
८ मस्तक इन आठ अज्भॉम १ मातंण्ड, २ भातु) ३ 
आदित्य, ४ भास्कर, ५ तपन, ६ रवि, ७ हंस और 6 
दिवाकर इन नामोंके मनन्‍्त्रोंस अछग अछग पूजन कर) पीछे 
। ९ विनतेत्यपि पाठः | ३ पान्रमित्यचनान्तर्गताध्यंसमय 
॥ शोभितमिलचंयेदिति क्रियाविशेषणम्‌ ॥ ( कौ? ) ! 


श्र 28. दे दः श्‌ 
चदियनल चक्ष्यमाणद्ादज्ाध्येचु पूजान्तगंताध्यपात्रात्पात्रभद्पक्षो ज्ञाप्यते || ( कौ० ) 















कक 











०९ ५ अहे 


ताम्रमेव च ॥ अध्योथ देवत पात्रमुदकेन प्रपूरयेत ॥ पूजयेत्तत्र भागादिदेवतास्ताः समाहित॥॥। 
दिग्देवतास्तत: पूज्या गन्धपुष्पालुलेपन! ॥ पात्र तोय समादाय सपुष्पफलचन्दनम॥ जातुभ्या- 
मवर्नि गत्वा सूयोयाध्य निवेदयेत्‌ ॥ वेदगले नमस्तुभ्यं देवगर्भ नमोस्तु ते ॥ अव्यक्तमू- 
तंये तुभ्यमध्य ग्रह नमोस्तु ते ॥ बहानूतिधरायिश चतुबंक सनातन ॥ उष्टिस्यथितिविनाशाय 
गहांणाध्य नमोस्तु ते ॥ विष्णुरूपधरों देवः पीतवस्यचतुर्युजः ॥ प्रभवः सर्वलोकानामध्य गहन 
नमो5स्तु ते। ते रूद्ररूपिणं वन्दे मगवन्त त्रिशलिनम्‌॥ यो दहेच्च त्रिलोक वें अध्य गहन नमोस्तु 
ते ॥ उद्यस्थ महारूत तेजोराशिसझुद्धव ॥ तिमिरक्षयकदेव ह्यम्य ग़ह नमोस्तु ते ॥ मन्त्रएत 
गुडाकेश वृगते व्याविनाशन ॥ सत्तमिथ्वेव जिह्ामिरध्ये गहन नमोस्तु ते॥ त्वं बह्मा च त्वं 
च विष्णू रुद्गस्त्वं च प्रजापति। ॥ त्वमव सर्वभूतात्मा अध्य गहन नमोस्तु ले ॥ कालात्मा सर्व- 
भूतात्मा वेदात्मा स्वतोम्तुख/॥ अत्मसत्युजराइोकससारणशयमाशत्र)॥ दारिब्व्यसनध्वंसी 
श्रीमान्‌ देंवो दिवाकरः॥ झुबणेःस्फाटिको भातुः स्वर्णरेता दिवाकरः ॥ हारिदश्वोंशुमाली च 
अध्य गह नमोस्तु ते ॥ चताभमूत्िन्रिः संस्था त्वष्टालिः परिगीयते | सामध्वनिस्त॒ तो यत्ते 
अध्य ग़ह नमोस्तु ते ॥ अथ गन्ध च पुष्प च तथा धूप प्रदीपकम ॥ नेवेदं च यथा>शकत्या 









चांदी या बांबके पात्रको अध्ये दानके लछिए लेझर जरूसे | अध्य अहण करें, आपके लिए प्रणाम है |.< हे सन्त्ररूप ! 
पूर्ण करे, उसमें अध्यके उपयुक्त चन्दन पुष्पादि रखे, उस | हे पूत ( पविन्नरूप ) ! हे निद्रा अधीश्वर ! हू सब मनु- 
अध्यपात्रके जरूसे पूर्वाद्‌ (८) आठ दिशाओंक्े साते- | प्योंके आश्रयस्वरूप ! हे कुष्ठादिमहाव्याधियोंके नष्टकरनें- 
ण्डादि आठ देवताओं का अथवा दिऋपालों का पूजन करे, वाले आप अपग्निद्पसे सात जिह्ना धारण करते ह्दो आपके 
यानी “ओं पूर्वाधिष्ठात्रे मातेण्डाय नमः अध्य समर्पयामि” | लिएप्रणाम है । आप अध्ये ग्रहण करें। आप ब्रह्मा हो,आप 
पूवेक अधिष्ठाता मार्तण्डके छिए नमस्कार अरधध्य देता हूँ | विप्णु हो, आप रुद्र हो, आप दक्षादि प्रजापति हो और 
इत्यादि नाममन्त्रोंस आठों दिशाओंमें अध्येदान करे। | आपही समस्त आणिस्वरूप हो आपके लिए प्रणाम है आप 
गन्ध, पुष्य, चन्दन चढावे | पुष्प, फछ और चन्दनयुक्त | मेंघ अहण करिये । ८ काछ व ओर वेद्रूप स॒वंतो- स् 
जहपात्रको हाथमें छेकर जानू मोडकर सूर्यक लिए ( १९) [सुख आप हैं अध अहण करिये, आपको नमस्कार हैं।९ 
द्वादशवार अध्य दे। और “'वबेंद्गसे”? इत्यादि द्वादृश | आप जन्म झत्यु जरा और संसारके भयको नष्ट करनेवाले 
मन्त्रोंको पढे कि, १ हे वेदगर्भ ! आपके छिए प्रणाम है, | है। आपको नमस्कार हे अधे ग्रहण करिये । १० द्रिद्गता 
हे देवगर्भ ! आपके लिए प्रणाम हैं, अव्यक्तमूर्ति आपके | ओर परिभवादिकोंके दुश्खोंके विध्वेंसक, श्रीसान्‌ देव 
छिए प्रणाम है, आप मेरे इस अध्यको ग्रहण करेँ। २ हे- | (अक्राशक ) और दिनके करनेवाले आप हरिदश्व हैं। 
चतुवेक्त ! हे सनातन ! आप त्ह्याजीके खरूपको धारण | अध्य प्रहण करिये। आपके ढछिये अथाम्‌ है। १ $ सुब॒ण-- 
करनेवाले सबकी उत्पत्ति पान और विनाशके करनेवाले | सुन्दर दिव्य वर्णवाल्े, स्कोटिक-स्फटिकके पदाथकी भांति 
हैं आप अध्येको अज्ञीकार करें। आपके लिए प्रणाम हैं । | स्वच्छ, स्वण जिनका वीय हैं एस हरिदश्वनामा दिवाकर 
३ विष्णु ( सर्वान्तयामी ), के रूपको घारण करनेवाले देव | आप अध्य प्रहण करें, आपके छिए प्रणाम है। १२ चारों 
( दीप्रमाद ) पीताम्बश्धारी, चार भुजाओंबाले और सब | पेदोंसे सिद्ध जिसकी संस्था अथांत्‌ जिसका स्वहूप, आठ 
छोकोंकी उत्पत्तिके कारणस्वरूप आप हैं, आपके छिए | मूर्तियोंस याती कमढूकी आठ कर्णिकाओंमें स्थापित सूर्य 
प्रणाम है। आप इस अध्येको अज्ञीकार करें। ४ जो त्रि- | वपनादि नामवाछ आठ स्वरूपोंसे गाते हैं, सामवेद॒जि सकी 
लोकीको दग्ध करता दे उस त्रिशूछधारी भगवान्‌ रुद्के | यज्ञमे स्तुति करता हैं ऐसे, आप अघ्ये अहण करें, आपके 
स्वरूपकों धारनेवाले आपके लिए ही यह अध्ये है, आप | छिए प्रणाम है। इस प्रकार द्वादशमासोंके भेदस द्वादशा-- 
इसे अज्भीकार करें, आपको प्रणाम है । ५ हैं उद्याचकूपर | त्मा सूये नारायणके लिय द्वादश मन्त्रोंसि द्वादृशवार अध्ये 
विराजमान होनेवाले ! हे महामूतरूप तेजोंके पुखस प्रगट | प्रदान करे फिर गन्ध, पुष्प, धूप दीप और नेवेद्यस यथा- 
होनेवाले ! हे अन्धकारको क्षीण करनेवाले |! हे देव ! झ्ञाप | शक्ति पूजन करके फिर सुख्यदेबवाकी प्राथना करनी 

१ अर्थ्या वकन्‍्ष्यमाणास्तद्थम्‌ ॥ देवतं दैवकर्माह ताम्रादिजातीयम्‌ ॥ अपूरयेदिति व्यसाणाध्येपयाप्तै पूरण कार्यमित्या- 
शय: ।! पूरितपात्रेष्टदिक्षु दिशा पूजन ततो दिक्पालानासिन्द्रादीनां ततः पृवाध्येपात्रे पात्रान्तरे वा वत्तोयं सम्रादायेति 
क्रियाबीप्सया समादाय समादायाध्य निवेदयेद्त्यथ: ॥ (को? ) ३ अत्र हरिहश्व इस्यधस्थ कालात्मत्यायद्ध॑चतुष्टयान्तेषु 
प्रत्येकमनुपड्ञान्मेत्र चतुष्टये बोध्यम्‌ ।। अत एवं दारिद्रकेयघेइये दिवाकरपद्पाठनिभित्तपोौनरुक्त्यभावः | एवं सति द्वाद्‌ 
शमत्रा; संपद्यन्त (को ) ३ द्त्वेति शेष: | 

१९, 








गण ननन०त न 





रकषकाहथ-अअमतवत +लवकानन- तन पकननका।, 


प्रार्थयेत्सूयदेवताम्‌ ॥ अश्निमीव्ठे नमस्ठुभ्य नमस्ते जातवेदसे ॥ इसे त्वेव नमस्तभ्यमम्रे चेव 
नमोनमभाशत्रो देवी नमस्तुभ्य॑ जगज्जन्म नमो नम;। | आत्मरूपिन्नमस्तुभ्य॑ विश्वम्तें नमोनम)॥ 
त्वं धाता त्वं च वे विष्णुरुत्व॑ ब्रह्मा त्वे हुताशनः । मुक्तिकामम्भीप्सामि श्रार्थयामि सुरेश्वर ॥ 
विश्वतश्वक्षराख्यातो विश्वतश्वरणाननः ॥ विश्वात्मा सर्वतोदेवः प (थेयामि सुरेश्वर ॥ इति मंत्र 
समुच्चार्य नमस्कुबवीत भास्करम्‌ ॥ संबर्चसेति पाणिभ्याँ तोयेन विम्ृजेन्सखम ॥ हंसः शुचि- 
पदित्युचा सू्यस्थेवावलोकनम्‌ ॥ इहुत्यं चित्रमित्येतत्सूक्त देवाग्रतो अपेत्‌ ॥ पेह्मकेसरकोणे तु 
चाहिये। इस ग्राथनामें कुछ वेदके मन्त्र आ गए है हैं इस 


लिया जाय या इसका भी आदित्यपर अर्थंकर छिया जाय 
कारण उनका अथंपूवक उल्छेख करके कहते है-““अश्नि- | कि यजनादिके छिय आदित्य देव हमारे छिए शांति डे, 
मीले पुरोहित यज्ञस्प देव सृत्विजमू, होतारं एनथातम यू | व्यापक किरणें हमारे रक्षणके लिए हों, हुये रोगोंकी शांति 
हा पहिल स्थापित आर 5 न की | वथा बिना हुओंकी दूरही ब्रिश्वत्ति करें ] जगत्‌को जन्म 
मम मा आह | ऐनेवाले आपके डिये नमस्कार है, हे आत्मरूपिन्‌ ! आपके 


अपने भक्तको रत्नादि देनवाले हैं, बैद्रिक जीवनमें पुरो- | ६ | जाप । कह आएके 
लिये नमस्कार है. विश्व आपकी मूर्ति हें, आपके हिये 


हित पद॒का बडा सुन्दर अथ्थ किया है # सायणाचार्यके अथे | ४ हे के 
नमस्कार हैं | आपही धांता है, आपही विष्णु हैं, आपही 





की छाया इसमें और उक्त भाष्यमें पृणेहपस झलकती है ' 
अ्निके मन्त्र वो सूर्योपस्थानतकमें आजुके हैं। ऋग्वेदकी | ब्रह्मा और हुवाशन हैं, हे सुरेधर ! में मुक्ति चाहता हूं, 
सन्ध्यामे रखभी दिये हैं। तात्पर्य यह कि, ऐसे आदित्यके | आपके सब ओर चक्षु और सब ओर चरण बताये गये है 
लिए नमस्कार हू । “ऑ जातवेद्स सुनवाम सोम मरातीय | आप सब ओरे हैं विश्वात्मा देव हैं, हे सुरेखवर | आपकी 
तो निदहति वेद: स नः पषदति दुर्गाणि विश्वा नावेब |... 


ए $ गे < 
। ९ आथना करता हूं, इन मन्त्रोंकी कहकर सूयदेवको नमस्कार 
सिन्धु दुरितात्यप्िः-' 5 जातमात्रके जाननेवाढेको सोमका 3 रे 
स्तवन करता हूं हमसे बर करनेवालोंके वो ज्ञान और धन 


करना चाहिये। “ओमू संवचेसा पयसा सन्तनूमिसा 
ते हे का कई | न्माहि मनसा सेशिव्रेन, त्वष्टा खुद त्रो विद्धातु रायो5नुमा 
कण रहा है जैसे चतुर महाह समुद्रसे पार लगा देता हे। अज्ञॉसे सज्ञव होते हैं अच्छे दानी दीमिमान देव हमें मोश 
एस जो आदित्य देव हैं उनके छिए नमस्कार है। “ओं | न *८ ५८ के 
फेलोले ८ कली बल | या धन दे, शरीरम जो दोष हों उन्हें दूर कर दें, इस 
इषेत्वोज त्वा वायवस्थ देवो व; सविता प्रापयतु अश्वतमाय | मन्त्रस पानीस हाओोंद्वारा सुँद थोवा चाहिये। ओम इस: 
फसण आध्यायट्वसध्त्या इन्द्राय भागस्प्जावती रनमीवा | शुचिषद्‌: वसुरन्तरिक्षसद्धोता वेद्बिद्‌ तिथि रोगसत्‌ सृप- 
अयक्ष्मा न उस्तेन इंशत साथशेसों शुवा अस्मिन्‍्गोपतो | बरसदू ऋतसद्‌ व्योमसदब्जा गोजा ऋतज, अद्विजा ऋए 
सके हज गो, 2, "हि. बष्टिक ढिये काटता हैँ बुत" भगवान्‌ सूयरव तेजोरूप हों. विराजते हैं, अन्तरि 
का 3 जल खय ड पथ हे बछड़ो ! लगे | भ्षत बैठते है यज्ञशालामें आहवनीय कुण्डमें बैठकर देवता- 
इए है | आपकी सवितादेव पवित्र कर्मके छिय अच्छे | गे सजी सा 
हक छा ल्‍ नदी गे [« 
स्थानको ले जायें । है भहिंसनीय गऊओ ! इन्द्रके लिये | हज, कल प है।वेदीपर है 8 
दे |. 5 | आप खबके पूजनीय हैं मनुष्योंमें श्रेष्ठ जगहमे 


है 4 


इसके भागकी रक्षा करना, जिससे निरोग और उत्तम | रे के रा है न्‍ 
--अन्वतिवाली हों, तुम चोर आदि पापी न देखें न लिन्दक | कैम और जल आप रहते हैं, भूत माममें पाषाणम 
तुमपर दृष्टि पड़े, इस यजमानके घर बहुतसी हो [उप और जलमें आप किसी न्‌ किसी रझूपस विराजमान 
सदा बनी रहना । तुम इन सबको रक्षा करना। ऐसे आदि- | है आप उर्वेगत हूं एवं सबसे बड़े हैँ इस मन्त्रस सूर्यदवर्क 
कल लिए कसम है जे ले हो और हा नो [विन करे चाहिये 
वे! इंच दोनकिा पीछे अथ कर चुके हैं ऐसे आदित्य उद त्थ॑ जालमैटपर् फेल >कतरी>क 9 
लिए नमस्कार है [ यद्यपि हमारी शैली ०० पाप ओ डे ये जातबंद्स देव॑ वहन्ति केतव/ 
योगफे अनुसार अर्थ करनेकी हे इनका यहां विनियोग दशे विश्वाय सूय्येम्‌ ॥ १॥ 
भादित्यकी नमस्कारमें 40 गो रहा है अतः आदित्यकी | सबके जाननेवाले प्रकाश शील उन सूर्य देवको किसे 
नमस्कृतिक अजुसारही अथे भी चाहिये पर अभ्निके नामके उपरको चढा छे जा रही हैं ॥ १॥ 
हल आदित्यकी प्राथनाम देखेजाते हैं दूसरेमें या तो हक 


है हम हम पे 
..., व्यापकरूपस जरूदेव मानकर निर्वाह कर- 









+ यह सूक्त प्रथमाष्ठकके चोथे अध्यायमें ७रवां सृक्तदै, यहांसे सूर्य 


! अंशस्ते चेव कोणेचेस्यपिपाठ: || (कौ० ) द 





ऊ# अपत्ये तायवो यथा नक्षत्रायल्यक्तुमिः | 


सूराय विश्वचक्ष से ॥ २॥ 


हम खूब चोरी करें हमें कोई तन देख सके ॥ २॥॥। 


अल॒न्राजन्तोडअम्नयों यथा ॥ हे ॥ 


क्िस्णोंको हम सामने देख रहे हैं ॥ ३ ॥ 


४५ #%५ # ९: तिष्कूदासि स्‌ः ९ | 
णे्‌ हे ई 
ऊ तरणिविश्वदशतो ज्यों | ले इक ऐेक धुष्यंक्ों वाह हो शुललकापी: बाग 
>वादोंके | कमलछशक्षणकों पा गये ।। १०॥ 
हे सूय्येदेव | आप्‌ संसार री पार कक । 
लिये नाव हो, सबके लिये सब ओरसे देखने योग्य हो) | जग $ हरिमाण 
प्रकाशके करनेवाले हो अथवा मकाशक चांद नक्षत्रादिक | हृद्रोग मम सूख्य ह्‌ च्‌ नाशय ॥ ११॥ 
आपके ही प्रकाशसे प्रकाशित होते हैं, नामरूपस विभक्त | तय को सित्रके न 
सि ै " के र्‌ पक मरे वडे भारी हृदयके रोग और जर्दी वा 
७/+ कक... की) & च््त ड्ग्डः ५ मात । यापरः ॥ करि ये २ 
ऊ प्रत्यड़ देवानां विश भत्यडडदेषि मालु- | ० ० 


विश्वमाभारी रोचनम्‌ ॥ ४ ॥ 


इस जगत॒को भी आप ही प्रकाशित करते हैं ॥| ७४ ॥ 


पान भत्यड्गविश्व॑ स्वदशे ॥ ५ ॥ 


होते हो । ५॥ 


त्वे वरूण पश्यासे ॥ ५ 0 


भी देखिये ॥ ६ ।| 


- % विद्यामेषि रजस्पथ्वहा मिमानो5अक्तु- | न 

| बरूणस्याम्रे! । आधा द्यावा प्रथिवीईअन्तरिक्ष 
| हे 

*£ सूय्ये ! बहुतस दिनों और रावोंसे आप सब लोकोंको | सुय्य5अआत्पा जगतस्तस्थुषश्व ॥ १४ ॥| 


नापते एवम्‌ जीवोंके जन्सोंकों देखते हुए जाते हो यह में क्‍ 


मिः, पदयन्‌ जन्मानि खूय्य ॥ ७ ॥ 


जानता हूँ | ७॥। 
-सूक्त « तक चलता “चित्र देवानाम्‌ ।”” यह इसीका <अ० का७ 
वा सूक्त है यहाँ आकर सौर सूक्त प्राहजाता ई मूलमें “उहुत्य चित्र 





उन्नीस मंत्र लिये जा रहें हैं । 


डे ५... | नप्त्य), तामियांति स्वयुक्तिन्निः 
ऊ अद्भ्रमस्य केतवो विरश्मयों जनाँ&। औच्र हट 








(१.48 4:%%7/क 76 आह 7 75:/2407,: ९0 (कप १४१: 


वहा हरितो को सूः 
त्वा हरितो रथे वहानते देव खूखय्ये, 


ह*त्यशी एटा 
५८/78/६0४४ 27% 


२ सत्त 


हे सूस्य देव/चोर आकाशर्म सबको दिखानेवाले आपको | 
देखकर आपके लिये एसी भावना करते हैं कि, ये छिप | 
जाय. तो विना चौंदुकी केवल तारे भरी रात आजाय जिसमें | 


ह विचक्षण : है देव सूच्ये | अभाके केशोंब्ःछे आपको 
सात हर रंगके घोड़े खींचते है ।। ८ ॥ 
ऊ अग्वक्त सत्त शुन्ध्यवः सूरो रथस्य 
९ ॥।॥। 
शीघ्र चलनेवाली सात घोडियाँभी आपके रथमें जुतदी 
| 


धर | हैं, उन अपनी जोडी हुई घोडियोंसे सूर देव जाते हैं ॥ ९ । 
मनुष्योंके सामने जैसे स्वच्छ विद्युदादि अप्लियाँ चमका 


जउती हैं उसी त करानवाली सूय्य देवकी | जज € 
करती हैं उसी तरह सबका ज्ञान करानवाढ्ो सूर | रम्‌, देव देवता सूथमगन्म ज्योतिरुत्तमम्‌॥२०॥ 


७० उद्दय तमसस्परे ज्योतिष्पद्यन््त उत्त- 


हम देव छोकमे स्थित हो तमसे - परे सर्वोत्कृष्ट ज्योटिको 


३४ उद्यन्नद्य मित्रमह आरोहचुत्तरां दिवम्‌, 


हे सुकृतियोंकी मित्रके रूपमें देखनेवाले सूथ्य ' दिवमें 


शुकजु मे हरिमा्णं रोपणाकासु दध्मसि, 


अपने पवित्र मण्डलको दिखानेके छिये आप देवी प्रजा अथो हारद्रवेबु म हरिमाणं॑ निदध्मसि ॥१२५॥ 


और माल॒षी प्रजा इन दोनोंके 2  डद॒य होते हो) यही | 
नहीं, किन्तु इसीके लिये आप सभी सेसारक सामने उदय | रे ् 
गे | व्वच रोगादिकों हरिद्राओमें धरदें, पर मुझे उससे सवधा 


ऊ य्रेनापावकचक्षसा झ॒रण्यन्ते जनॉज्ल, | से करदें ॥| १२॥ 


आप मेरी जर्दी या हरियापनको तोता और पिद्दी मेंना 
आदि पक्षियोंमें रखदें उससे भी जो बाकी बचे सरे उस 


७ उदगादयमादित्यों विश्वेन सहसा सह, 


हे वरुण | जिस पवित्र प्रेममयी दृष्टिस पक्षीसम उत्त- | द्विषन्त महां रन्धयन्‌ मोअहं द्विषते रधमू ।१३। 
रायणके पथिकको एवम्‌ यज्ञानुष्ठानीको अपनी ओर आती. | 


बार आप देखते हैं उसी दृष्टिसे इन अपने तुच्छ जनोंको | 


भगवान सूय्य देव अपने पूरे बढके साथ मेरे लिये मेर 
हक छा ७ ७. गॉंके 
चैरियोंको दबाते एवम्‌ झुझे मेरे वेरियॉके ऊपर रखते हुए 


| उदय हुए हैं ॥ १३ ॥ 


३ चित्र देवानामुद्गादनीक॑ चक्षुमित्रस्य 


किरणोंका पूजनीय समूह उदय होगया, इसीमें मित्र 


| वरुण और अग्निकी ख्याति हैं यानी इसीको मित्र वरुण 

| और अग्नि भी कहदेते हैं, यह द्यावा प्रथिवी और अन्‍्तरि- 

क्षमे पूर्णरूपसे पूरा रद्दा है यही सूख्ये स्थावर और जगम 

| दोनोंकी आत्मा हैं | १४॥ 

मित्येतव्‌ सूक्तम” यह रखा है इससे उद्ुत्येसे लेकर चित्र तक पे 
पूक्तोंका प्रहण होजाता हैं। ये मंत्र भिन्न २ कमसे सन्ध्या आदि-। जेबामम्ये यत्रानरों देवयम्तो सगा- 

कोमें आये हैं । यदि सूक्त न देकर मंत्र पद देदिया होता तो दो। योषामभ्येति पद्थातु , नरो द्बय तो डुंगा 


मंत्रोंकाही अहण होता पर सूक्तका प्रहण किया है इस कारण ये | नि, वितन्वते प्रतिभद्राय भद्गम ॥ १५ 


७ सूय्यों देविमषस , रोचमार्ना मय्यों न 


जैसे मनुप्य खीके पीछे अभिगमन करता हैं उसीतरह 


हे 
| 


] 


फलक॑ चेव कारयेत॥ फेले ; पुष्परक्ष तेश्व भक्ष्ये्नानाविधरपि ॥ 








शय्यां तत्र च देवस्य शसुप्े 


देशें म्कल्पयेत्‌॥ पड़धान्य षड़से अब रोप्य॑ चेव महाप्र॒श्ठम्‌ ॥ पुरुष खड्बाहस्त च « कारयेच् 
बुद्धिमाव॥ वख्रझुग्मेन सब्छन्न लवणोपरि विन्यसेत्‌॥ अनेनेव ठ॒ मन्त्रेण स्नानमध्योचेन तत;॥ 
नमस्ते ऋघरूपाय खड़॒हस्ल जिधांसवे ॥ जिधघांसक॑ च त्वां दृष्ठा ढहुबश सवंदबताः ॥ त्वया 
व्याप्त मेरुप्र्ठ चण्डमास्कर सुप्रभम्‌ ॥ अतस्त्वां पूजथिष्यामि अध्य गहन नमो5स्तु ले ॥ क्षप- 

यित्वा तु तां रात्रिं गीतवादित्रनिःस्वनेः ॥ ततस्त्वभ्युदिते सूर्य होम॑ कुयात्स्वशक्तितः ॥ 





भगवान्‌ सूय्येदृव ग्रकाशमान उषाके पीछे आते हैं, जिसमें | 
क." लि हक कप सर ! 
देववजनको चाहनवाले मनुष्य भद्रक छिये भद्गके प्रति। 


युगोंका विस्तार करते हैं ॥| १५ ॥ 


भद्रा अश्वा हरितः सूख्यस्थ चित्रा एतग्वा, 
अलुमाद्यासः!, नमस्यन्तो दिव आपष्टमस्थः | 


परि द्यावापथिवी यन्ति सद्यः॥ १६॥ 


अन्न देतेहुए दिवकी पीठपर अपनी आस्था करते हैं एवम्‌ 

निरारुंबही द्यावा प्रथिवीकी परिक्रमा कर जाते हैं ॥ १६॥ 

[भागवतमें गायत्री आदि छन्दोंके नामही सातों घोड़ोंके नाम माने है) 
$ तत्सूय्यस्य देवत्वं तन्महित्व॑ मध्या- 
कतॉविंततं संजभार, यद॒ंदय॒क्त हरितः सध- 
स्थादाद्रात्रीवासस्तलुते सिमस्मे ॥ १७ ॥ 


हूँ कि छोग तो अपने अपने कार्मोमें ही छगे रहजाते हैं पर 
यह अपनी फेलीहुई किरणोंको जो कि अनेक साधनोंस भी 


न हटाई जासकें झट हटालेता है, जब यह अपने हरेरंगके | 


घोड़े या भूमिसे रसको खौंचनेवाढी किरणोंको जिस भूख- 
ण्डस वियुक्त करता है वहीं सबके लिय रात होजाती है १७ 


ऊ तत्मित्रस्थ वरुणस्यामिचक्षे सूर्यों रूप 


कण॒ते द्यौहपस्थे अनन्तमन्यदुशदस्य पाजः 
कष्णमन्यद्धारतः सम्भरन्ति ॥ १८ ॥ 


५, 5, ३ 


लिये मित्रका रूप धारण करते हैं, 


यह "और च 4 
द ऊप्ण हैं जिस ये किरणें धारण करती हैं || १८॥ 





पडधान्यानि निधाय शय्याया अधो 
१चारपूजने तदन्तगंताष्येदान स्वया< 


आकाशरूपी आह्ृणके बीच सूर्यदेव पापियोंकों दूँड़ | 
नेक लिये वरुणका और धर्मात्माऑपर अलुग्रह करनेके | 
एक इच्चका तेजरूप बह | 
७ छोर 
भप्न्त है जो कि इसके भीतर विराजमान रहता हैं, दूसरा | £ :. जिसे 
| में उस तेज सारडपी मुखवालेके केसे बराबर हो सकता हू जिसे ही 
कलश देखो की ० | अलयकालका सूर्य देखले तो यह कहने लगजाय कि मैं तो ३ 
दया देवा उदिता सूर्य स्य “7--- ता खर्यस्थ निरहसःपिपता | करोलझ्म एककाला तिल्दी है (१)॥ ____ | कॉलका एक काला तिलही है (१) ॥ 


* अन्नास्तप्रारंभसमये कोणफढकोपरि ऐशानदिशि शब्यां नि 





छवण निधाय राजत॑ खड्हस्तं पुरुष शय्योपरि 
याप्तमिति मन्त्रणेति बोध्यम्‌ ॥ ( कौ० ) 


निरवद्यात्‌। तन्नो मित्रो वरूणो मामहत्ता 
मदितिः सिन्घुः पृथिदी उत दो ॥ १९॥ 
सूयद्वकी प्रकाशशीछ किरणें उदय हो गयीं वो मुद्े 
पाप ओर झूठस बचायें मेरी इस बातका मित्र, वरुण 
अदिति, सिन्धु और प्रथिवी सब अनुमोदन करें॥ १९॥ 
इन सूक्तोंको भगवान्‌ सूये नारायणके सामने जपना 


' कक] ः कु कक ए्‌ 

० मो हि . _.  चाहियासवतोभद्रक समीप एक उत्तम स्थछूमें अथवा सबतो 
बा | | ज्ञं ; किक के, कक दान ह 

लगी बहती ह हक कम रे शोग्य हैं ये | भद्रके ४“ अ के कोनेमें एक फछक रखदे, उसपर फहछ, पुष्प; 

लि कद , & | अक्षंत और अने के भक्षोंस शभदेशमें देवकी शय्या 

सृय्य भगवानको नमस्कार एवम सूथ्यदेवके भक्तोंक छिये | क्षेत और अनेक पकारके अक्षोंसे शुभदेशमें देवकी शब्य 


बनानी चाहिये, षद्धान्य और षड्रस वहां रखने चाहिये, 


| उसपर भगवान्‌ आदित्यकी मूपिरखनी चा हिये,जो चौंदीको 
| बनी हुईं हो, हाथम तलवार छगी हुईं हो, दो कपडे धारण 
| किये हुए हो,इसी तरह नहीं,किन्तु नमकपर रखनी चाहिय 
| पीछे इन मंत्रोंसि ज्लान और अचेन होना चाहिये किःदुष्टोंको 


मारनेकी इच्छासे खड्ू ,हाथमे-छिये हुए क्रोघरूपी आपके 
9 ५ रू ध् 
लिये नमस्कार हूँ; मारनकी इच्छावाढ़े आपको देखकर सब 


<&६ | देवताएं भाग गये, ह भास्कर |! आपने चमकता हुआ मर 
में इसको भगवान्‌ सूर्य्यका देवतरव और महत्व समझता | 


दण्ड व्याप्कर रखा है इसी कारण में आपको पूजताहूँ।अपे 
प्रहण करो, तेरे छिये नमस्कार है | उस रातिको गाने बजा' 
मोम पूरी करके सुबेके उदय होनेपर यथाशक्ति होम करता 
१ कृष्ण-प्राय: सब लोक तेजका छुक्क भास्वर रूप मानते देखे 
जाते हैं, लॉकमेंभी ऐसी ही प्रतीति होती है, न्‍्यायसिद्धान्त मु 
वली वेदान्त पंचदशी न्याय और वेशेषिक ऐसा ही कहते हैं। ” 
यहां “कृष्ण भन्‍्यद्‌ ?” पर शैका होती है कि सूर्यकी लोवि 
किरणोंको ऋष्ण क्यों कहरहे हैं इस पर हमें वैदिक व्यवष्या चाहिये 
वो छान्दोग्योपनिषद्‌ प्रथम प्रपाठक षष्ठ खण्ड ५ व ६ में मित्र 
है कि, यह जो सूर्यकी सफेद दीप्ति है बही ऋगू है तथा उससे मंद 
जो कृष्ण दीखती है वही साम है, इससे यह सिद्ध होता हे ह्वि ) 
तहके भीतर काले रूपकी तह हे अथबा तेजके अन्तः्का कऋृष्णरूप ६ 
पद्मसिहजी विद्यरी सतसईकी समालोचनामें इसी नतीजेपर फँचे। 
इस विषयमें उन्होंने एक उद्‌के कविकी उक्ति भी दी है कि हे प्रभो 


थाय तत्समीपे फलपुष्पाक्षतनानाविधमक्ष्येः सह पड़ेस- 
निधाय तत्र नम॒स्त इति मंत्रण १ 


 ब्रतानि, | 





पूजयेत्तंत्र शकक्‍त्या च देवाँश्व विधिवदृगुरुम ॥ | 
संसिद्धं च चरुद्रव्यं प्रत॑ च जुहुयादादिज: ॥ आकृष्णेनेति मन्त्रेण शानमड्ोेश्ए ऋमात॥ 
॥] 


बन ि ४ । 
मी, ६4 
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06 7लकौरे॑ कक... 


होमोःकंस्य समिद्धिश्न पृतमिश्रेस्तिलेस्तथा 


होमो व्याहतिभिवोध स्विष्टकृत्तदनन्‍्तरम्‌ ॥“कपिलां पूजयेदेवीं सवत्खां पापनाशिनीम्‌ 


बख्युक्तां सघण्टां च स्वणेशड्गरविभूषिताम ॥ 


ताँम्रपृष्ठी रोप्यखुरां कास्थदोहनकान्विताम ॥ 


मन्त्रेणानेन तां दद्याद्राह्मणाय च शक्तितः ॥ कंपिले सर्वभूतानां पुजनीयासि रोहिणी ॥ सर्व- 
तीथेमयी यस्मादतः शान्ति प्रथच्छ मे ॥ या लक्ष्मी सर्वदिवानां या च देवेष्बवस्थिता ॥ 
धेलुरूपेण सा देंबी मम शान्ति भयच्छतु ॥ देहस्था या च रुद्रा्णां राइरस्य च या पिया ॥ 
घेलुरूपेण सा देवी मम पाप व्यपोहतु ॥ विष्णोवेक्षसि या लक्ष्मीः स्वाहा चेव विभावसोः ॥ 


चद्राकॉनलशक्तियाँ घेलुरूपास्त में श्रियें ॥ 


चतुमुखस्क्क था लक्ष्मीर्या लक्ष्मीघनदस्:ड 


च्‌। लक्ष्मीयों लोकपालानाँ सा धेलुवरदास्तु मे ॥स्वेंचेकत्वं पितमुख्यानां स्वाहा यक्ञ- 
भ्ुजामपि ॥ वषड़ या प्रोच्यते लोके सा. घेहस्तुष्टिदास्तु मे ॥ गावो में अम्नतः सन्तु गावो मे 

न्तु पृष्ठतः ॥ गावो में हृदये सन्तु गवाँ मध्ये वसाम्यहम ॥ गावः स्पृष्ठटा नमस्कृत्य यो वे 
कुयोत्प्रदक्षिणम्‌ ॥ प्रदक्षिणीकृता तेन सप्तदीपा वखुन्धरा ॥ नमस्ते कॉपेले देवि सर्वेपापप्रणा- 
शिनि ॥ संसाराणेवमम्न॑ मां गोमातखातुमहेसि ॥ हिरण्यगर्मगर्भस्त्वं हेमबीज विभावसोः ॥ 


चाहिये, उसमें शक्तिक अनुसार देवता और गुरुओंका 
त रे ० २ 
पूजन करना चाहिये!सूयंका होम समिध और घीके मिले- 


पूवेक बनाये हुए चरु द्रव्य और घीका हवन करे । 
“४० आकृष्णेन रजसा वर्तेमानो निवेशय- 


मर €ः 6 घर आर हे 
असू तर त्यंश्व । हरण्ययंत सावता रथता | आज गऊरूपस मेरी सम्पत्तिक लियि हो । जो ब्रह्मा,कुब्रेर 


| ओर इन्द्रा द्कोकपालोंकी विभूतिरूपा है वही गऊुरूप 
| होकर मुझे वरदान दे । तुम सब पितरोंकी दृप्तिकरनेके 
अमृत देते हुए भगवान्‌ लूथ॑ देव तेजोमयरथसे सुबनोंकों | 


देवों याति शुवनानि पह्यन्‌ 
रात और दिन पापियोंको मत और पुण्यात्माओंकों 


देखते हुए जाते हैं। इस मत्रस एकसों आठ आहुतियां 
देनी चाहिये, अथवा व्याह्ति (ओऑ भूथसुवः स्वः) योंसे 
होना चाहिये, पीछे स्विष्टकृद होम भी होना चाहिये। 
पीछे पापोंके विध्वंस-कस्नवेत्राली, बच्छे सहित कपिदा 
गौरूप षष्ठीकी अधिएछात्री देवीका पूजन करे। वद्चसे आवृत 
एवं धण्टोंसे शोभायमान 'कण्ठवाढी, सुबेणके पत्रोंस 
आच्छन्न शज्भवाली,तामके पत्रस शोभित पीठवाछी,चाँ दी के 
पन्नोंस मण्डित खुरवाडी कपिछा गऊको आचायेके छिय दे। 


अनुसार वस्रादि उपस्करभी दे ओर कहे कि, हे कपिले ! 
तुम समस्त प्राणियोंकी पूजनीया एवं समस्ततीयेरूपा और 
रोहिणी स्वहूपा हो; अतः आप मुझे शान्ति प्रदात करो । 
जो सव देवताओंकी छक्ष्मीरूपा है और सब देवलाओंमें 


| प्रतिष्ठिता है, वही आज गऊके रूपसे विराजमान कपिला- 
| देवी मुझे शान्ति प्रदान करे । जो एकादश रुद्रोंके शरीरमें 
हुए तिहोंसे करना चाहिये | द्विजकों चाहिये कि, विधि' | स्थित हें, जो महेश्वरकी प्रिया हें वही देवी गऊरूप चघनके 
| मेरे पापोंको नष्ट करे। जो विप्मु भगवानके वक्षःस्थरूमें 
| छक्ष्मी रूपसे,अ प्िकी स्वाहा एवं चन्द्रमा, सूर्य और अग्निक्की 








शीतछ, गरम और दग्ध करनेकी शक्ति स्वरूपा है, वही 


डिये स्वधा, यज्ञभोक्ता देवदा्ोंकी तृप्ति करनेमें स्वाहा, 


| एवम्‌ छोकोम क्ख्यात वषट्कार स्वरूपा हे गौ मुझे तुष्टि 
| देनिवाली हो | इनही छः मन्त्रोंसे गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, 
| नेवेद्य और लाम्बूठ गऊपर चढाकर दानकरनेके पहिले 
| उनकी पूजा करनी चाहिये। और “गावों में इसमन्त्रकों 
| पढताहुआ गऊका स्पशकरके प्रणाम कर पीछे प्रदक्षिणा 
| करती चाहिये। उत्त मन्त्रका अथहै कि, गउएं मेरे अगाडी 
| पिछाडी रहें, गऊएं मरे हृदयमें और गऊुओंके बीचमें 
| में निवास करताहू । जो पुरुष इस पूर्वोक्तमन्त्रसे गऊुकों 
उसके दोहनके छिय कांसेकी दोहनी दे, अपनी शक्तिके | 


हाथछगा प्रणाम करके उनकी प्रदुक्षिणा करता है, उसने 


| सातद्वीपॉवाली प्रथिवीकी प्रदक्षिणा करली।फिर हें कपिले! 
| हे देवि ! हे सब पापोंको दग्धकरनेवाली | ! ! आपके लिये 
| प्रणाम है । हे गोमातः ! ससारसमुद्रमें डूबहुए मेरा उद्धार 
| करिये आप भेरी रक्षा करते योग्य हैं ऐमा कहकर प्रार्थना 


१ तत्र होमारंभ ॥ २ शक्त्या पश्चोपचारैरपि । ३ देवानावाहितान्‌ । ४ सुवर्णास्यामित्यपि पाठ: ॥ ५ अस्य पूजय- 


दिति पूवेक्रिययान्वयः ॥ ६ कपिले इत्यादिसि: घप्पंत्रः क्रमेग गंधपुप्पधूपदीपनवेद्यतांबूछानि देयानि ॥ गाबो से इत्यनेन 
तु स्पशेननमस्कारप्रदृक्षिणा आवृत्त्या कार्या ॥ ततो ब्राह्मण संपूज्य नमक्षे कपिले इति सन्त्रेण गां दूद्यात्‌ ॥ हिरण्यगर्सत्य- 
नेन हेमरूपां दक्षिणां रक्ततखयुगमित्यनेन रक्ततखयुग्स च द्यात्‌ू ॥ ततो भास्करः प्रतियुह्वातीति मन्त्रेण सूर्यत्रतिप्त 
सद्क्षिणां दुद्यात्‌ ॥ (को ० ) ७ देवानामित्यपि पाठ: । 














अनन्तपुण्यफलदमतः शान्ति प्रयच्छ में ॥ रक्तबख्युगं यसनादाद्त्यस्थ च वेछभम्‌ | अदानात 
तस्य में सूर्यों ह्मतः शान्ति प्रयच्छतु ॥ खुबण वस्रयुग्मं च परिधान च कारयेत ॥ ए्तेः 

प्रकार संयुक्तां दद्य द्वेनें द्िजातये ॥ भानुं सदक्षिणं दुच्यान्मत्त्रेणानेन यत्नतः ॥ भास्कर! 

प्रतिगह्याति भास्करों वे ददाति च॥ भास्करस्तारकोमाध्यां तेन वे भारकरों मम ॥ बाह्मणान्‌ 
भोजयेत्पश्चात्पायसन गुृडेन च ॥ शक्‍्त्या च दक्षिणां दद्यासेम्यश्रेव विशेषतशः ॥ अल्पवित्तोएपि 
यः कशथ्ित्सोएपि कुयादिम विधिम॥आत्मशक्त्याइसारेण सोपि तत्फलमाप्लुयात॥ आचार्यस्य 
ततो भकक्‍त्या सर्वे पाणों विनिक्षिपत्‌ ॥ गोभूहिरण्यवासांसि ब्रीहयो छवण तिलाः ॥ एतत्सई 
प्रदत्वा तु कपिलां प्राथयेत्ततः ॥ कपिले पुण्यकर्मासि निष्पापे पृण्यकर्मणि॥ माँ समुद्धर 
दीन च ददतो ह्क्षयं कुर ॥ दिवि वादित्रशब्देश्व सेव्यसे कपिला सदा ॥ तथा विद्याधराः 
घिद्वा भूतनागगणा ग्रहाः ॥ कार्पलारोमसंख्यातास्तत्र देवाः प्रतिष्ठिताः ॥ पुष्पवृष्टि प्रम॒ुश्चन्नि 
ने देवि अग्रिकृण्डात्समुत्यिते ॥ नमस्ते कपिले पुण्ये 








नित्यमाकाशसंस्थिता।; ॥ बह्मणोत्पादिते 
सर्वदेवनमस्कृते ॥ जय नित्य॑ महासस्वे सर्वतीर्थादिमड्गल॥दातारं स्वजनोपेत बहालोक॑ नयाश्ु 
बे ॥ ततः प्रदक्षिणां कृत्वा नत्वा ब्राह्मणपुड्बान्‌ ॥ आशीर्वादान्वदेयुस्ते प््रपोत्रधनागमान्‌ ॥ 
आरोग्यं रूपसोभाग्यं सर्वदःखबिवर्जितः ॥ अन्ते गोलोकमासातद्य चिरायः सुखभाग्वेत ॥ 
यदा स्वर्गांत्‌ अपतति राजा भवति धार्मिक॥ सप्तद्वीपक्ती भुड़के सदा राज्यमकण्टकम) अहो 


व्रतमिदं पुण्यं सर्वदःखविनाशनम्‌ ॥ अतःपर॑ प्रवक्ष्यामि दानस्य फलमुत्तमम ॥ महावेदमये 
४७ए७७७७७७७॥७/७/"/"ए"एए"ए७७७७७७८/७८७८एेशशशए""श""श७॥॥७एननश"शणशणशशशणणणणाणाभासाा मप्र नरम नल ज आर ललललि तल क्रल लीक लिन न की लि निन मीन नि ली निलिनििभ नि नि की जिन लिन नकीख लिन मम कि दिन शशि विवश लक किक डिक किलि दे 


करे ।  हिरण्यग् ? मन्त्रसे दक्षिणा समपंण करें। दो 
छाहू वल्य सूयद्वकी प्रसश्नताके ढिये दे कि, ये दो छाल- 


अर (७०, «५ हे छ ७. रे 
वस्र हैं इसी कारण सूयदेवके प्रियहें इनके ग्रदानसे मुझे 


सूर्यदेव शान्ति प्रदान करें और व्रतानुष्ठानकी सम्ाप्रिक 


॥ि, 


कक सूर ९०६ आप हु 
करनेवाले हैं, अतः सूर्यके लिये वारबार प्रणाम है । गुड्खी- | तुमही हो, आपके दानसे ही बे तीथ मकुलके हेतु होते हैं । 
रसे आह्यणोंको भोजन कराकर शक्तिक अनुसार आचार्य | है देवि ! आप बान्धवोंके साथ मुझे ब्रह्म पदको शीजघ्र प्रा 
3 कक थे | कराओ,ऐसी प्राथेनाकरनेके पीछे प्रदक्षिणा करके ब्राह्मणपु- 
लिय भी द्‌ क्षणा दें। यदि ब्रतीके धन कम्न भी हो तो बह | ड्बोंको प्रणाम करे।वे आाह्यण ऐसे आशीर्वाद दे,जिससे वह 
इसविधिके करनेमें त्रुटि न करे, किन्तु दानमें तारतस्य | 


| इस छोकमें सब दुःखोंसे न 34904 त्र; पोच्र,धन) स्वाध्याय, 
| आरोग्य, रूप और सौभाग्य ( यशस्वित्ञा) को प्राप्त हो 


ओर ऋत्विजोंके लिये ज्यादा और कुछ अन्यत्राह्मणोंके 


अपनी शक्तिके अनुरूप करे | इससे नि्धनभी कपिलाषष्ठीके 
भनुष्ठानका फलभागी होता है । फिर गऊ, जमीन, सुवंण, 


वस्र, धान्य, छवण ओर तिछू इन सबको आचार्यके हाथोंम | 

सम्पंण करके कपिछा गऊको प्रार्थना करे कि, हे कपिछ! | 
४ 5 

तुम पुण्यकर्म्सां निष्पाप हो, मैं दीन हूं और इस्र पुण्यक- | कर स्वर्गस गिरता हैं तो यहां धरम्मनिष्ठ चऋवर्ती राजा होता 


कल. न दे की ३ के 
म्मेस आपका प्रदान करता हूं अतः आप मेरा छद्धार करें। है, सप्रद्वीपा प्रथिवीके निष्कण्टक राज्यसुखको जीवनपय॑नन्‍्त 


बे पद हे | भोगता है । यह ब्रत महान्‌ पविश्न एवम स्वद:खों का नाशक 
पनवले देवत/छोग तुमारे आगे बाज बजाते हुए तुम्हारी | है 8 


पडा किया करते हैं। और तुम्हारे जितने रोस हैं उन | 


५ 0. 48५, १० कक 
भरे किय कस्मेके पुण्यको अक्षय करें। हे कपिले ! स्वर 


भ५९ 








| सबमेंसे एक एक रोमसें विद्याधर, सिद्ध, भूत, नाग और 


ग्रह बसते हैं। आप जब प्रथिवीपर विराजती हो तब 
आपके ऊपर आकाशसे देवाताछोग नित्यही पुष्प वषति 


| हैं । हे देवि ! अद्याजीने आपको उत्पन्न किया है, तुम बद्या- 


समय सुन्दर वख्त ओर अल्झ्रोंसे शोभायमान गऊझ और | जीके यज्ञ कुण्डसे प्रगट हुईं हो, हे कपिछे ! सब देवताछोग 


सूयदेवर्की प्रतिमाका दान करे और दानप्रतिष्ठाके निमित्त | आपको प्रणाम करते हैं,इससे आपके लिये मेरा प्रणाम है। 


दक्षिणा दे । और दाता एवे प्रतिग्रहीता दोनों कहें कि, | आप महासत्त्वरूपा हो यानी परमात्मा स्वरूपा हो,सब ती- 


सूये देनेवाले,सू्य लेनवाले और सयही अपने दोनोंके उद्धार | 


थॉम जो पुण्य फल मिलता है उसकी प्राप्तिमें मुख्य कारण 


एवम अन्तर्त गोलोक जाकर चिरकारू सुख भोगे। ( यहां 


| गोलोक परमात्माके धामका वाचक नहीं हैं, किंतु किसी 


उत्तमपदका है, इसीसे कहते हैं कि, ) जब पुण्यफछ भोग- 


| इसके पीछे आचायको कपिछा दान करनेका फलभी 
ह पु (३ 
सुनाता हूँ कि, समस्त बेदोंके अध्ययन आदि करनेसे, 


* इंपणसलुझारं दखयुस्से च परिथान यथास्थानघृर्त कारयेत्प रिआ्राहकेण ( हे? ) 


शनिलतान, हनयह दुख अतानतयर। टी 
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पात्रे सदव्नते चाक्षयं भवत्‌ ॥ कपिलारूया यदा पट्ठी जायते भुवि म।नद॥ ब्रत॑ सर्वेत्नतश्रेष्ठ मि- 
दम्८पं मदाफझलय ॥ उद्व॒र्ध्यति दातार नूनमत्षय्पमव्य यम्‌ ॥ एवं देवगणाः सर्वे भूतसड्रन मह- 
षेयः ॥ आकाशस्थः पतृत्यत्त पुण्येसस्तिजिदिव्लागमे ॥ एञ्छू८::; ऋषये ओ्रोतरियाय कुटु- 
म्बिने ॥ एवं यः कपिलां दद्याद्विधिद्ृष्टेन कमंणा ॥ स याति परम स्थान यावतन्न च्यवते पुनः ॥ 
इते हेमाद्रव्क्तो ब्रतविधि॥अथ रसकानदे प्रभासखण्डे तु संक्षेपणोत्तो द्रतविशेष: ॥ उपलिते शुचचों 
देशें पृष्पाक्षतविभूषिते ॥ स्थापयेदत्रण्ण कुम्म॑ चन्दनोदकंपूरितम्‌ ॥ पश्चरत्तसभायुक्ते , इंबाउष्पा 
क्षतानवितम्‌॥ रक्तवख्युगच्छन्न॑ ताम्रपात्रेण संयुतत्‌ ॥ रथ रोप्यपलस्येव एकचकऋ खाबेजितम॥ 
सोवणी पलसंथुक्तां मूति सूथेस्य कारयत ॥ कुम्मस्थोपरि संस्थाप्य गन्धपुष्पेस्तथाचयेत्‌ ॥ 
आदित्य पूजयेदेव॑ नामप्निः स्वेथेथोदितेः॥ आदित्य भास्कर रवे भानो सूर्य दिवाकर ॥ प्रभा- 
कर नमस्तुम्य संसारान्माँ समुद्धर ॥। शुक्तिमुक्तित्दो यस्मात्तस्माच्छान्त प्रयच्छ में ॥ नमो 
नमस्ते वरद ऋक्ष्सामयज्ुबां पते ॥ नमो5स्तु विश्वरूपाय विश्वधात्रे नमो5स्तु ते ॥ एवं संपूज्य 
विधिवदेवदेव द्वाकरम्‌ ॥ पूजयेत्कापिलां धेलें बख्माल्यातुलेपनेः ॥ दानमन्त्र+----दिव्यसूति- 
जेगचछुद्रादशात्मा दिवाकरः ॥ कपिलछासदितो देवो मम मुक्ति प्रयच्छतु ॥ यस्मात्वं कपिले 
पुण्ये सबलोकस्य पावनी॥प्रदत्ता सह सूर्यग मम सुक्तित्रदा भव॥इतिस्कानदे कापलाष्लीज्तम ॥ 
स्कन्द्षष्ठी। । 

अथ कातिके स्कन्दषष्ठीक्षतम्‌ ॥ सा पूववेयुता भझ्राह्मा---क्ृष्णाष्टनी स्कतन्दषष्ठी शिवरात्रि- 

बतुदंशी ॥ एत पूर्वेयुताः काय।स्तिथ्यन्ते पारण भमबेद्‌ ॥ इते ऋुगूक्तेः ॥ हेमाद्रो भाविष्ये- 





वेदमूति, सदाचारनिष्ठ रहनेसे, सुपात्र आचायेके छिये | 

७ ०९ औ, 3 एफ 

देनेस अक्षय पुण्य होता हूं; अतः ऐसही आचायक लिये | 
कप ३फ छि ऐ.# ५ 

दान करे ! है मानद्‌ ।! कपिछाषष्ठी जिस सवत्सरस प्राप्त 


हो तब यह ब्रत दूसरे सब ब्रतोंसे उत्तम एवं सहान्‌ पुण्य 
फलका देनेवाढा होता हैं । कपिलछाषट्ठीका दिन जब ग्राप्त 


होता हैं ,तब सब स्वगेनिवासी देवगण भूतगण और महूषि- | 


गण बृत्य करते हुए पुकारते हूं कि, अब यह्‌ ब्रव दानियोंको | क्ियों एवं मोक्षके देनवाले हें । इससे मेरे लिये शान्ति 


न कक ही 
यहां प्राप्त करके अक्षय, अव्यय पुण्य सोगनेका अधिकारी 


करेगा सुपात्र;वद॒पाठी, कुठुम्बी और ऋषिक समान सदा- | ऋग्वेद, सामबेद और यजुरवेदके अधिपते ! आपके छिये 
चारी । ब्राह्म णके छिये जो शास्वविधिके भनुसार काॉपछा- | 


ध्ड िक कप कर |... का न 
दान करता है वह उस परमपदुको प्राप्त होता है, जिस पद्स | प्रयट करनेवाले आपही हैं, ऐस आपके लिये नमस्कार है। 


[- | विश्वको घारण करनेवाढे आपके लिये बार बार नमस्कार 
षष्ठीके ब्॒तकी विधि पूरी हुई॥स्कन्द्पुराणके प्रभासखण्डम | है ऐस विधिवत्‌ प्राथनापयन्त देवदेव सुयंभ्गवानकी पूजा 
संक्षपसे त्रतविशेष कहा है कि)गोमय और झुत्तिकादिकों स | करके कपिलछा गऊका दान करे।|इससे पहिलछे उसकी प्रथम 
| बस्र माछठा और चन्दन चढाके पूजा करें । उसको देनेका 
| यह मन्त्र हैं, कि दिव्यस्वरूप, झुवनोंके नेत्ररूप ( अर्थात्‌ 
प्रकाशक ) द्वादशात्मा, सूुय और कपिला सुझे मुक्ति प्रदान 
| करें । हे पुण्ये कपिके!आप सब जगत््‌को पवित्र करनेवाली 


| हो, मैंने आज आपको सूयेभगवानके साथ आचायेके लिये 


फिर गिरना न हो । इस प्रकार हेसाद्विम कही हुईं कापला- 


लिपी हुईं, एवं पुष्प और अक्षतोंस विभूषित पवित्र भूमिम 
धान्यराशिपर चन्द्नमिश्रितजरूसे पूण,पंचरत्न सहित दूब, 
फूछ और अक्षतयुक्त, अन्नण कुम्भको स्थापित करें, उसको 
दो छाछ वस्मोंस आच्छादित करके एक तांबकापात्र रखदे, 
एक पल चांदीके एक चेऋवाले विवित्ररथको स्थापित करे। 


उसमें एक पढ सोनेकी सूर्यमूर्तिको रखके गन्धपुष्प।दिकोंसे | 


पूजन करे। उस पूजनके उपयोगी आदित्यादि 5 
हैं। “ जो आदित्याय नमः, आदित्यको नमस्कार, ओं 
भास्करायनमः, भास्करको नमस्कार,ओं रवये नमः।रविक 
नमस्कार, आओ भसातवे नम भाधुको नमस्कार, सूर्यायतमः, 





| सूयको चमरकार,ओं द्विकरायनम+द्विकरको नमस्काए, 


पादयो: पा समपेयामि, हस्तयोरध्यमृू,मुखआचमसनीयमू:, 


चरणोॉको पाद्य, हाथोंके लिये अध्य और मुखके छियेआच- 


मनीय देताहूं,” इत्यादि ऋमले पूजन करे।पीछे प्राथना करे 
कप जि ६3 साथ क्र ज् 
कि, ह प्रभाकर | आपके लिये प्रणाम हैं, आप मराससारस 
फ्ी पक 
उद्धार करें, क्योंकि, आप ऐहिक पारछोकिक भोगसम्प- 


प्रदान करें। है वर देनेवाले ! आपके लिये नमस्कार हें, हे 


नमस्कार हैं। आपका समस्त विश्वही स्त्॒ररूप है, या विश्वको 


समर्पित किया है, इससे मुझे प्रसन्न होकर मुक्ति प्रदान 
करें ।यह स्कन्द्पुराणके प्रभासखण्डका कहा हुआ कपिला- 
षष्ठीका ब्रत पूरा हुआ ॥ 

 स्कन्द्षप्टीअत--का तक होता हैं; उसे कहते हैं । यह 
स्कन्द्पछ्लीपच्चमी योगवाली ग्राह्म हें । क्‍योंकि शुगुस्मतिम 





नाना बे चीन कमपाकाकाकफकनक -पकककमककफम परम ््लजज जप": चछ | 







प्रशआभ ० 






3 





| पिन « «० 
श्रीकृष्ण उवाचाषष्ठचां फलाशनो राजन्विशेषात्कातिक नूप 
लमकेचिरात ॥! 


॥ राज्यच्युतों विशेषेण स्व राज्य 
पष्ठी तिथिमहाराज सर्वेदा सर्वकामदा ॥ उपोष्या सा प्रयत्नेंन स्वेकाहं 
जयार्थिना ॥ कार्तिकेयस्य दयिता एवा षष्ठी महातिथिः ॥ देवसेनाजिपत्य हि म्राप्तमस्याँ महा- 
त्मना ॥ अस्यां हि श्रीसमायक्तो बस्मात्स्कन्दोःभवत्युरा ॥ तस्मात्वष्ठयां न खुजीत भाष्ठुयाद- 
भार्गवीं सदा॥दत्वाध्स कार्तिकेयाय स्थित्वा वे दक्षिणामुखः ॥ दध्ना5क्षतोद केः पुष्पेमेस्त्रेणानेन 
सुत्रत ॥ सर्ताषदारज स्कन्द सनाधिप महाबल ४ रुद्रोमािज पडुक गड्ाग् नमोष्तु ते ॥ 


२ 


प्रीयर्ता देवसिनानीः संपादयतु हृहतम्‌॥ दत्वा विभाय चामात्ने यज्चान्यदपि बलेते ॥ पदश्चाद 
मुड़क्ते त्वसौ राज्यां मूमि कृत्वा तु माजनम्‌ ॥ एवं पष्ठीत्रतस्थस्य उक्त स्कन्देन यत्फलम्‌॥ 
तब्रिबोध महाराज प्रोच्यमानं मयाखिलम्‌ ॥ षष्ठचां फछाशनो यस्ठु नक्ताहारों भविष्यति॥ 
शुक्रायामथ कृष्णायां बह्मचारी समाहितः ॥ तस्य सिद्धि पति पुष्टि राज्यमायुनिरामयम्‌॥ 
पारत्रिकं चेहिक॑ च दयात्स्कन्दो न संशयः ॥ अशक्तश्नोपवासें वे स च नक्त समाचरेत्‌॥ तेढ 
प्ठ॒यां न सुखीत न दिवा कुरुनरदन ॥ यस्तु पष्ठचां नरो नक्त कुर्याद्धशतसत्तम ॥ सववपापे 


यह कहा है कि, कृष्णजन्मकी अष्टमी, स्वामि कार्तिकेयके, 


ब्र॒वकी पप्ठी और शिवरात्रित्रतकी चतुदशी ये तीनों तिथियां 
पहिली तिथियोसे युक्त ही ग्राह्म हैं यानी कृष्णाष्टमी सप्तमी- 
विद्धा, स्कन्दपग्मी पश्चमीविद्धा और त्रयोदशीविद्धा शिव- 
राजिब्रतकी चतुदेशी ग्रहणकरनी चाहिये,कितु पारण ब्रतकी 
तिथियों के अन्तर्मे ही करे, अर्थात्‌ कृप्णा.ष्ठमीका नवमोे 
स्कन्द्षप्टीका सप्तमी में, शिवरात्रिका अमावास्यामें। और 
“तिथिभान्ते च पारणम्‌ ” यह भी सिद्धान्त वचन है यानी 
तिथिप्रधान त्रत तिथिके अन्त और नक्षत्रप्रधान ब्रत न&- 
त्रके अन्तर्मे समाप्त करने चाहिये | देमाद्िके चतुबंगे चिता- 
मणिप्रन्थम मविष्यपुराणके जो वीक्य मिलते हैं उन्हें यथा- 
स्थित दिखाते हं-श्रीकृष्ण चन्द्र राजा युधिष्ठिरसे बोले कि, 
है राजन सभी पष्टीविधियोंम फरलोंका ही आहार करनेका 
नियम पाछना चाहिये, पर हे नूप | कातिकमें तो विशष 
करके फलभोजी होना चाहिये जो राज्यसे (तुम्हारी तरह) 
च्युत हुआ हो, वह और भी अधिक नियम पाछे, ऐसा 
रहनेस वहुत जरूदी राज्य वापिस मिरूजावा है । है महा- 
राज ! स्कन्द्षष्टी सदेव सब काम्नाओंको पूण करती है। 
विजयका अभिलाषी राजा प्रतिवर्ष इस दिन विधिवत उप- 
बास करे | क्योंकि, यह छठ स्वामिकार्तिककी प्रेम पात्र हे । 
इससे यहछठ और तिथियोंकी अपेक्षा महती उत्कृष्ट है,इस 
छठमें महात्मा स्वामिकातिकेयजीने समस्त देवताओंकी 
सेनाके आधिपत्यपदका छाम किया था और इस छठके 
दिनही पहिले स्वामिकातिक विजयलक्ष्मीको प्राप्त हुये थे । 
इससे जो पुरुष छठके दिन भोजन न करेगा वह भागेवी 
6 छक्ष्मी । को सदाके लिये प्राप्त होता है । “ सप्तषि ” 
इस ढेढ शोक सन्‍्त्रस कार्तिकियके लिये दृक्षिणामिमुख 





'निकनपंड: 





होकर अध्ये दे | हे सुब्रत ! उस अध्यमें दधि, अक्षत, जह़ 


और पृप्पोंको भी छे, है सप्तषियोंकी ( कृत्तिक्रानाम ) 
भार्यासे उत्पन्न होनवाले ! है शत्रुओं ( देत्यों ) की सेना" 
ओंका स्कन्दन करनेसे रकम्द्नामसे विख्यात, हे देवता 
ओंडी सेनाओंके अधिनाथ ! हे महान बछको धारण करने' 
वाले ! हे महादेवजी पावतीजी ! और अम्निसे उत्पन्न होने 
वाले हे षडानन ! हे गंगाजीके नन्दून | आपके लिये प्रणाम 
है| है देवताओंके सेनानी | आप प्रसन्न हों, भरी वांहित 
कामनाको पूण करें । फिर द्विजवरके लिये कश्चे अन्नको 
ओर भोजनके उपयुक्त घृत सकर शाक आदि पदाथोको 
दे। पीछे रात्रिमें प्रथिवीेकोही भोजनपात्र बनाकर फढह 
भोजन करे । इस प्रकार छठके दिन व्रत करनेवाढेको 
जो फल प्राप्त होता है, उसे सख्व|मिकारतिकजीने आपही 
अपने मुखर कहा है, हे महाराज ! उस फछको यथावत्‌ 
कहता हू समझो । षट्ठी तिथि शुक्रूपक्षकी हो, या कृष्ण" 
पक्षकी हो, इन दोनों पष्टियोंमेंही जो अह्मचारी ( बद्यचारी 
के नियमोंसे स्थित ) और विषयासक्तिस पराड्सुख होकर 
फछोंका राजिस मोजनकरेगा उसेसिद्धि (जो चाहे उसीको 
प्राप्करनकी शक्ति),ध्ृति (कमीमी घबराहट न होना),पुष्टि 
(पुष्टता),राज्य (स्वतन्त्रता और दूसरों पर आधिपत्य ) एव 
निरामय(रोगपीडाशूत्य)जी वन परछोकके और इस छोक्क 
सब भोग स्वामिकार्तिक निःसन्दृहद्याकरते हैं। जोषष्टीम 
भोजन किये बिना न रहसकता हो, दह भी दिनमें भोजन 
न कर रात़िमे करे | इस कथनमें यही विशेष हैं कि फ 
न खाकर राज़िमें अन्न खा सकता है है कुरुनन्दन 


षष्ठीके दिन तेलके पदार्थीका भोजन न करे । जो पष्ठीके 


१ लक्ष्मीम्‌ । 


श्रतानि, ] भाषाटीकासमेतः । द ( शहे३ ) 





विनिर्मक्तो गाड़ेयस्य प्रसादतः॥ स्वर्ग च नियतं वास लभगते नात्र संशय: इह चागत्य कालेन 
यथोक्तफलभाग्मवेव) देवानामपि वन्धोउसो राजराजो भविष्यति ॥ इति भवि०स्कन्दष्छीव्रतम॥ 
चम्पाषष्ठी | ह 

अथ भाद्रपदे वा मार्गशीर्षे शुक्के चम्पाषष्ठी्रतं हेमाद्रों स्कानदे ॥ सोत्तयुता झाह्या-5 
४ घण्मुन्योः इति शुग्मवाक्यात्‌ ॥ सस्‍्कन्द उवाच! प्राप्तराज्य व राजान धमपत्र यु धिजिरणतव्दा- 
चिदाययों द्रष्टं दर्वासा छुनिसत्तमः ॥ त॑ पप्नच्छ महातेजा धर्मसूलः कृताखलिभाराज्यलाभः कर्थ 
जातो मम विप्र तपोनिये | तद्गतं श्रोतुनिच्छामि कर्ते च छुनिसत्तम ॥ इुवासा उवाच ॥ खझु 
राजन्महाभाग व॒तानासुत्तमं ब्रतम्‌ ॥ अस्तीह यज्चीर्णमात्र सर्वकार्मांस्त प्रयेत ।। षष्ठी भाद्गपदे 
शुक्का वेधृत्या च समन्विता ॥ विशाखा भौमयोगेन सा चम्पा इति विश्वता !दिवासुरमत॒ष्याणां 
दुलभा पटष्टिहायनेः ॥ कऋते बेतायां पश्चाशद्धायनी द्वापरे पुन:॥ चत्वारिंशत्कलों त्रिशद्धा- 
यनी दर्लभा ततः॥ आदो कृतघ॒गे पूव या चीणी विश्वकमंणा ॥ तत्फल विश्वकर्देत्व॑ प्राजा- 
पत्यमवाप्तवान ॥ पृथुना कार्तवीर्यण श्रुवि नारायणेन च॥ ईश्वरेणोमया साद्धंमितरेतरलि- 
प्सया ॥ यश्वैनां विधिवत्कुर्यात्सोउनन्त फलमश्वुते ॥ बुथिष्ठिर उवाच ॥ तद्विथिं श्रोत॒मिच्छामि 
विस्तराहदतो म॒ने ॥ के मन्त्राः के च नियमाः सापि किलक्षणा भवेत्‌ ।। दुर्वांसा उवाच॥ द्विदे- 
वत्यरक्षमौमेन वेधुतेन समस्विता ॥ भाद्रे मासि सिते षष्ठी सा चम्पेति निगद्यते॥पश्व म्यां नियम 


कुर्यादेकभक्त समाचरेव्‌ ॥ चम्पाषष्टीबत कु्याग्रयोक वचनाए पग ए॒---+- समाचरेत्‌ ॥ चम्पाषट्ठीद्॒तं कुर्याद्ययोक्त वचनाद गुरो॥ ततः मर भाते विमले दब्त- 
जी लक न सर आम, आओ 





दिन नक्ततब्रत करता हैं, वह गड्जानन्दव कार्तिकेयके अनुप्र- | मन॒ष्योंको बष्ठि वर्षोमेंसी दुलूम थी। जेतायुगर्से पच्चास 


हसे सब पापोस विमुक्त होता हे | है कुरुनन्द्न : वह स्वग | वर्षोर्म, द्वापरमें चालीस वर्षाम एवं कलियुगर्मे तीस वर्षोक 
पूव देववा आदि सभीको दुल्भ हैं । पहिले सत्ययुगममे 


प्राप्त होकर भोग सम्पत्तिको प्राप्त होता हैं, इसमें कुछ | के 
विश्वकरर्माने चम्पाषट्ठीके दिन उपबास किया था; इस से 


संशय नहीं है । फिर जब कभी इस मद॒प्यछोकर्मे श्राप्त 
होता हैं, तब भी उसको वेंसीही सुख सम्पत्ति मिलती हूँ | उसको जगत्‌के सब पदार्थोंकी अहुत सरलूतास रचना कर- 
भेकी चतुरता प्राप्त हुईं | वह विश्वकर्म्मा प्रजापतियोंकि 


और तो क्या पष्ठीव्रती पुरुषकों देवतालोग भी।| 
प्रणाम किया करते हैं, और वह कुबेरके सदश घनसम्पन्न | पद॒का अधिकारी होगया. ऐसे ही राजा प्रभु, कातेवीय; 
या महाराजा होता है। यह भविष्यपुराणका स्कन्द्षष्ठीत्रत | नारायण भगवान्‌ और महादेव पावती सहित चन्द्रशेखर- 
3.87 मु हुआ | | देवने यही ब्त दूसरे इूसरे अभिविता्थोंकों पानके लिये 
चम्मरधधीका ब्रत-भाद्रपद्‌ या सार्गेशीषे सासमें शुक्छ- | किया था, इससे ये सब कृताथ हुए, प्रथु आदिकोंका जो 
पक्षकी षष्ठीके दिन होता है, यह हेमाद्विप्रन्थमें स्करद्पुरा-। अ्रभाव सुननेमें आता है, वह इसी ब्र॒तका प्रभाव है।जो 
णसे कहा हे । यह सप्तमीके साथ सम्बन्ध रखनेवाली | पुरुब विधिके अलुसार इस चम्पाषष्ठीके ब्रवको करे, तो वह 
प्राह्म है क्योंकि घटू-छठ, और मुनि-सात यह दोनोंका | अनन्त पुण्यकूछ भोगता है | राजा युधिष्ठिर बोले कि, हैं 
वाक्य है यानी इन दोनों तिथियोंक सम्मेलनमें पूर्वां महण | मुने ! ब्रतके करनेकी विधिका विस्तारपूत्रंक वर्णन करें; मे 


करनी चाहिये, यह सिद्धान्त हैं| स्कन्द मुनियोंसे बोले कि, | उसको आपके सुखसे छुनना चाहताहूँ | इस दिन किस 
किस मंन्त्र और नियमकी आवश्यकता है; वह चम्पाषष्ठी 


हे तपस्वियो | जब राजा युधिष्ठिरकों फिर राज्य मिल- | «७ 
गया, तब किसी दिन सुनिवर दुर्वासा उन्हें देखने आये। | सी होती है, यानी यह चम्पाषष्ठी ही हे और यह नहीं 
धर्मनन्‍द्न महातेज राजा युधिप्ठिरने हाथ जोडकर उनसे | “सी कौनसा छक्षण है, किस किस नियमका पाछंन करे, 
पूछा कि, हे तपोनिधे ! हे विश्न ! मुझे जो यह राज्य मिला | किस किस मन्त्रसे कोत कौन काय करना चाहिये | यह 
हे > | सब आप मुझे कहें । दुर्वासा मुनि बोले कि, विशाखा 


हैं, वह किस ब्रतके पुण्यस मिला है है मुनिसत्तम : म | 

से करनेकी के माहार नकी इच्छा क्षत्र, भौमवार और वैध्वतियोग इनसे युक्त जो भाद्रपद॒- 

उसे करनेकी तथा उसके माहात्म्य सुननकी इच्छा कर- | नक्षत्र) भासवार जार वैद्य है. युक्त जो भाद्रपद्‌ 
मासमें षष्ठी हो, उस चस्पाषष्ठी कहते है| पर्चमीके दिल 


ताहूं । दुर्वासा बोले कि,हे महाभाग हे राजन ! इस स्वो- | 

त्तम व्रतके माहात्म्यको सुनो । यह ब्रत ऐसा है कि, जिसके | एकबार भोजन करनेक् नियम पाछून करे, आचायकों 

करनेस सब कामना पूरी होती हैं | भाद्रपद्शुक्छा षष्ठी | बरके उसको आज्ञालुसार चम्पाषछ्ठीके त्रतकों विधि- 
| बत्‌ करे | फिर दूसरे दिन स्वच्छ प्रभातमें उठकर दुन्तृ- 


बेश्वतियोग, विशाखानक्षत्र और मज्जल॒वारके मिलनेसे 
चस्पापष्ठो कहाती हैं। यह पष्ठी सत्ययुगरम देवता देत्य और | धावन करके स्नान करे, पवित्र होकर यथाविधि सह्ूकूल्प करे 


9 


























घावनपूर्वकम्‌ ॥ कृत्वा स्नान॑ झुचिभुत्वा संकलप्य च यथाविधि ॥ संकल्पमन्त्र-निराहारोग् 
देवेश त्वद्धक्तस्त्वव्परायणः । पूजयिष्याम्यह भक्‍त्या शरणं भव भास्कर ॥ ततः स्नान परकु- 
बीत नद्यादों विमले जले ॥ मृद्मालम्य मंत्रेश्व तिलः झुक्लैश्व मंत्रवित्‌ ॥ सावेत्रः परमस्त्व॑ हि 
परं धाम जले मम ॥ त्वत्तेजसा परित्रष्ट पाप॑ यात्‌ सहस्नथा ॥ इति प्राथना ॥ आपस्त्वमत्ति 
देवेश ज्योतिषां पतिरेव च॥ पाप॑ नाशय मे देव वाइमनःकमामः कृतमू।॥ इति 
स्‍्नानमंत्र:; ॥ ततः संतपंयेदेवानृषीनिपतृगणानपि ॥ ततश्रेत्य ग्रह मौनी पाखण्डालाए- 
वर्जितः ॥ स्थण्डिलं कारयेच्छ॒द्धं चतरल्ल॑ सशोभनम्‌ ॥ स्थापयेद्त्र्ण कुम्म॑ पश्धरत्नसमन्वि- 
तम्‌ ॥ रक्तवखय॒गच्छन्न॑ रक्तचन्दनचर्चितम्‌ ॥ तस्थोषरि न्यसेत्सूर्य सौवर्ण सरथारुणम्‌॥ 
शक्त्या वा वित्तसारेण वित्तशाब्यविवर्जितः॥ तमचेयेह्नन्धपुष्पोर्विधिमन्त्रपुरःसरम ॥ पदश्चा- 
मृतेन स्नपन कुर्यादकेस्प संयतः ॥ ततस्तु गन्धतोयेन परां पूर्जा समारभेत्‌ | गन्धेनानाविषै- 
दिव्येः कपूरागुरुकुंकुमेः ॥ फलेनानाविधेदिव्यः कुंकुमेश्व खुगन्धिनिः ॥ मण्डपं कारयेत्तत्र पुष्ष- 
मालाविभूषितम्‌ ॥ यथाशोर प्रकु्बीत अधश्योपरि स्वतः ॥ ततंः संपूजयेदेव॑ मास्करं कमलो- 
पारि ॥ मध्ये दलेषु पूवोदिष्वादित्यादीन सुपूजयेव ॥ आदित्याय नमः। तपनाथ० पृष्णे नः 
मालमते न० भानवे न० अर्यम्णे न० विश्ववक्नाय० अंशुमते० पहस्रांशावे नमः | खनायकाय० 
सुराय० सूथोय नमः | खगाय नमः ॥ १३॥ जन्मान्तरसहस्रेष्‌ दुष्कृतं यन्‍्मया कतम॥तत्स्व 


कि दे भास्कर ! आज में निराहार रहूँगा, में आपका भक्त 

हैं आपही मेरे परम आधार हू, में आपका भक्तिसें पूज़न 
[ के ३ आल 3 3. 

करूंगा अतः में आपकी शरण मे हूं, मेरे इस सट्डूस्पको पूणे 


कराओ। फिर नदी आदि पवित्र जलछाश्यपर जाकर उसके 


जहूमें स्वच्छ स्लान कर, इस स्लानकी यह विधि है 'मृत्तिके 
ब्रह्म पूत्तासि! इत्यादि मन्त्रोंसे प्रथम सृत्तिका छगावे, फिर 
स्नान करे, तदनन्तर फिर शुक्छूतिलोंको जलमे गेरफे 
प्रार्थना करे कि; आप परम सविता हैं 'सावित्र: परमः इस 
पाठान्तरका यह अथ हे कि, सविता ( परमेश्वर ) का जो 
परम उत्कृष्ट' प्रभाव या श्रवाप जे वह आपही हैं | आप 
अपनी किरणोंद्ारा जठका मोचन करते हैं, इससे जहूमें 
भी आपका ही धाम (तेज, प्रताप) हैं, अब मेरे पाप आपके 
तेञजसे दजारों तरह परिश्रष्ट होकर विलीन हों। एसे प्रार्थना 
करनेके पीछे ल्ानकरे | जठमें प्रवेशकरके सूर्यकी या 
तीथकी प्रार्थना करे कि हे देवताओंके ईंश | आपही जल- 
रूप हैं, आपही ज्योतियोंके अधीश्वर है । हे देव ! मैंने 
अपनी वाणी, मन या शरीरसे जो जो दुष्कम्म किये हैं 
मेरे उन सब पापोंकों आप नष्ट करे । ऐसे स्‍्नानादि कुम्मे म्मसे 
निवृत्त होकर देवता, ऋषि और पितृगणोंका तपण करे। 
फिर अपने घर आ पाखण्डके आलापोको छोड यथासम्भव 
मौन रहे ओर गोमयसे छिप्त शुद्ध चौकूटा स्थण्डिल बनावे, 
उससे अच्छिद्र जलूपूण घट रखे, उसमें प्चरत्न गेरे फिर 
दो वश्लोंसे उस ढकदें छालचन्द्नस चर्चित करे । उस 

न. । रथादि बनवाने साम्रथ्य या | जन्मोंमे मेने जो जो पाप | २ स्थापित करे । सथादि 
* फलेल्वदजुसेमूर 





इक्मेण पूजनमितिहेसादो। ३ विश्वचक्रायेति पाठान्तरम्‌ । 


अपने धनके अनुसार सुब॒ण व्यय ' वर्ण व्यय करें किंतु वित्त रहते क्रप- 
णता न करे | उस सूर्य देवका विधिवत सौरसूक्तके मंत्रोंस 

कक करे। निश्चलेन्द्रिय होकर पशञ्चामृतसे स्नोन कराक 
पुगन्धित जछसे स्नान करावे | पीछे बहुविध कपूर अगर 
और केसर आदि सुगन्धित द्रव्योंके साथ घिसे हुए चन्दू- 
नको चढावे, अनेक फछ एवम्‌ सुगन्धित रोढी आदि 


चढाव | फिर कझुशके समीपही एक मण्डपकी कट्पना 


करे, उसमें पुष्पमाला छगाकर नीचे; ऊपर चारों,ओर 
सजाबे | उस मण्डपके भीवर वस्थयको बिछाकर रोढोसे 
बारह पत्तका कमर छिखे। मध्यमें एक कर्णिकाकी रचना: 
करे | फिर “ आदित्याय चसः पूजयामि”' इस प्रथममन्त्रसे 
कमछकी कर्णिकापर आदित्यके नामके मंत्रसे पूजन करे, 
कमलके द्वादश पूर्वादि दृों पर तपन आदि द्वादश सूयोका 
पूजन करे। उनके नाम मन्त्र 'ओ तपनाय नप्तः * इत्यादि 
मूलभ लिखे हैं । इनमें “ ओ? इस अक्षरकों पहिले और 
जोड देना चाहिये कहीं कहीं * विश्ववक्राय नमः ' इस 
स्थानमें (विश्वचऋराय नमः ऐसा मंत्रभी |छेखा है। प्रागुक्त 
ह्वादशर्मत्रोंस द्वाद्श आदित्योंकी, कमलके द्वादश पत्रोंपर 
ओर * ओ आदित्याय नमः? इस नाममंत्रस कमलगकी 
कणिकापर प्रधान स्वरूप आदित्य दवका पूजन करनों 
चाहिये । तपन, पृष्णन्‌ भानुमत्‌, भानु, अयम्न्‌, व्श्विवक्र 
अगशुमतू। सहख्रांशु, खनायक, सुर, सूथ्य, खगय बारह 
सूय्यक नाम हू । इन्हींके मंत्रोंसे दुलॉपर पूजन होता हैं। 


कछशपर, सुवर्णके साइवरथ ओर सारथिसहित सूथ यको | है द्वाकर ! आजवक मेरे हजारों बार जन्म होगये, इन 
बनवानसें सामथ्य या | जन्मॉर्म मेने जो जो पाप किये हैं वे सब आपके अनुग्रहसे 
किम बकरा अल कम का “पलक मन के > नल +म«-+- मल ान्‍ गे 


३ ३. हे ् ग्ब न्‍ि दि ; 
परनकेश्व सुगेधिभिरित्यपि पाठ:। २ एपु प्रथमेण सन्त्रण मध्य पूजनम्‌, इलरेंह्रांदशणिः पृवादिद- 


ज़तानि, )।| भाषाटीकासमेतर) । | ( २३५७ ) 





नाशमायात त्वत्मससादादिवाकर ॥ विनतातनेयों देवः कर्मसाक्षी तमोलुदः ॥ सप्ताश्वः सहन 
रज्जुश्य अरुणो में प्रसीदतु ॥ इति र्थपूजामन्त्रः ॥ ततः संपूजयेदेब्मच्यूल सद्बरथस्थितम ॥ 
-अटष्टाक्ष रण मन्त्रेण गन्धपुष्पादिन्लिः क्रमाव ॥ “ओं घाणिः सूथ आदित्य: इति मंत्र: सेप्रदाया- 
दृवगन्तव्यः ॥ काछात्मा सर्वभूतात्मा वेदात्मा विश्वतो्ठदः ॥ जन्ममृत्यजरारोगसंसारभय- 
नांशन॥इति उदयेपध्ये मन्त्र: ।ततः संपूजग्रेच्छुक्लां सवत्सां गाँ पयस्चिनीम॥सवस्थघण्टाभरणा 
'कांस्यपात्रे च दोहिनीम॥बह्मणोत्पादिते देवि सवेपापविनाशिनि ॥ सेसाराणवम्न मां गोमात- 
खाठमहसि ॥ सुरूपा बहुरूपाश्व मातरों लोकमातर+ ॥ गावो मामुपसर्पन्तु सरितः सागर 
यथा ॥ या लक्ष्मीः सर्वदेवानां या च देवेष संस्थिता ॥ घेलुरूपेण सा देवी मम पाप व्यपोहत॒॥ 
या लक्ष्मीलॉकपालानां या लक्ष्मीधवनदस्थ च॥ चहद्राकेशक्रशक्तियों सा घेलुवेरदाउस्तु में । 
इति घेत॒ुपूजामन्तः ॥ तिलहोमं ततः कुयोत्साविव्यष्टीत्तर शतम्‌ ॥ ततस्ताँ कल्पयेद्धेलमकों में 
प्रीयतामिति ॥ आचार्याय ततो ददष्यादादित्य सरथारुणम्‌ ।। सकुम्भरत्नवसेश्व सवोपस्कर- 
संग्ुतम ॥ ददामि भालु भवते सर्वोपस्करसंयृतम्‌ ॥ मनोभिलषितावाति करोतु मम 
मास्करः ॥ इति दानमन्त्रः ॥ गहामि भास्कर रवे भवन्ते विश्वतोमुखम्‌ ॥ मनोमिल- 
पितावातिमुभयोः कतेमहँसि ॥ इति अतिप्रहणमंत्रः ॥ सर्वतीयमययी घेठ खर्वयक्ञमयीं 
शुभाम ॥ सर्वेदानम्थी देवीं ब्राह्मगाय ददाम्यहम ॥ इतिगोदानमंत्रः ॥ गृह्मामि सुरामें 
देवीं सर्वेयज्ञमयीं शुभाम्‌ ॥ उन्ों पुनीहि वरदे उभयोस्तारिका भव ॥ इतिप्रतिग्रहमंत्रः ॥ 
'लतस्तु भोजयेद्विपान द्वादशेव स्वशक्तितः ॥ दद्चात्व दक्षिणाँ-लेभ्यः प्रणिपत्य विसजेयेत्‌ ॥ 





नाशको ग्राप्त होजायैं । फिर सुर्यभगवानके रथका पूजन | 


करे कि, सातघोडे जिसमें जुतेहुए हैं, सावही रस्सियां 


. इसके चलनेवाले कर्मोंके साक्षी एवम्‌ सूयेके प्रक्राशस 


प्रथम ही आगे बैठकर जगत्‌के अन्धकारको शान्त करने- | 


३ हु ३, 


' बाले विनतानन्द्न अरुणदेव मेर उपर प्रसन्न हों उस रथमें 


“ काल्य्वरूप सब प्राणियोंकी आत्मा, वेदरूपी, सब ओर 
मुखवाछ संसारके जन्म, मरण वृद्धपना और रोगादिकोंक 
उपद्रव या भय हैं, उन सबके विनाशक सूयदंव अध्य अहण 


करें । फिर ग्ोदाप् करे । वह गो श्वेतवर्णा एवं बच्छेवाली | 
दुग्ध दनेवाढी, वल्र॒ घण्टा तथा कण्ठभरसे विभूषित | 


और कांसकी दोहिनीवाली होनी चाहिये और पूजन कर- 
नेके मन्त्र ये हैं कि, हे देवि | ब्रह्माजीने सब॒पाषोंकोी नष्ट 
करानेके लिय आपकी उत्पत्ति की है, हे गोमाता | संसार- 
समुद्र डूबेहुए मुझे बचा, सुन्दर एवं बहुविध रूपवाले 


छोकोंकी माता; गौमाताएं, समुद्रको नदियोंकी भांति मुझे | 
प्राप्त होती रहें । जो सब देव ताओंकी लक्ष्मी है जो देवता- 
ऑमें सुरभिरूपसे स्थित है वृह देवीं मेरे सब पापोंको नष्ट | 








| करे । जो छोकपालोंकी लक्ष्मी हैं, जो कुबेरकी भी रृक्ष्मी 
है जो चन्द्रमा, सूये और इन्द्रकी शक्ति हे वही गऊ मेरी 
_ यानी बाग्डोर जिसके घोडोंपर छगी हुई हैं; ऐसा रथ और | क्वामनाएं पूर्ण करे फिर “आओ तत्सवितुवेरेण्यम ! इस 
| गायत्री ( सावित्री ) मन्त्रसे एकसो आठ बार तिव्लोंक्ा 
। ( तिलप्रधान हवनीय द्रव्यका) हवन करे। फिर गऊूको वहां 
ताननत उपर प्रसन्न ह ने | उपस्थित कराके कहे कि; * अकों मे प्रीयताम्‌ ' सूंये मेरेपर 
सदा रहनेवाले, अच्युतस्वरूप सूयद्वका “ आओ घृणि:सूय 

आदित्यः ” इस आठ अक्षरवाले मन्त्रसे गन्ध, पुष्प, अक्ष- 
_तादिद्वारा पूजन करे । इस अष्टाक्षर मन्त्रको गुरुऑकी उप- | 
देश परम्परासे जानना चाहिये । सूयके उदय होतही | 


 काछात्मा ' इस मन्त्र सूर्यक्रे लिये अध्येदान करे कि, | आपके लिये देताहँ इससे संतुष्ट हुए सूयडव मेरी मनोका- 


प्रसन्न हों आयेके लिये रथ और अरुणसहित सूयदेवको, 


| सर्वोपस्क रसयुक्त, सब॒लछ ओर पञ्चरत्तसहित सुन्दर कल - 


शको विधिक साथ दे दे | सूरयंदानका ददामि' यह मन्त्र है 
एज 
कि में सब रथादि उपस्कर ( सामग्री ) सहित सूयदेवको 


मना पूणकरें | प्रतिग्र हका “ ग्रह्मामि भास्करम ” यह मंत्र है 


(कि, हे भास्कर ! हे सत्र | आप विश्वतोमुखहे, में आपका 
| अड्भगीकार करताहूँ |, 


तः आप हम दोनों प्रतिग्रहीता और 

दाताके मनकी अभिरछूषित कामनाओंको पूर्ति करें। फिर 
्य रथ हा. ० 

«£ सवतीर्थ ” इस मन्त्रस गोदान कर । कि में समस्त 


| तीथ; यज्ञ ओर दानरूप पवित्र गोमाताको ब्राह्मणके ल्यि 
क्‍ देता हूँ । “गृह्ाामि सुरमिम्‌ ' यह प्रतिम्रहका मन्त्र हे । 


कि, में समस्त यज्ञरूप पवित्र एवं साक्षात्‌ सुरभिरूष 
गझूको छेता हूं। है वरदेनेवाली देवि | हम दोनों दाता 
और प्रतिग्रहीताकोी पवित्र कर और उद्धघारकारिणों हो ' 
फिर द्वादश ब्राह्मपोंको भोजन कराव। पीछे अपनी शक्तिके 
अनुसार उनके छिय दक्षिणा दे ओर प्रणाम करक अनुष्ठा- 


१ द्वाकर तवाचेनातू। इति पाठान्तरस्त्‌ । 





चर के. जा "दिल, मी कि ५ 

ततस्तु स्वयमश्रीयाहिजानामवशिष्टकम्‌ ॥ सह पुत्रेः कलत्रेश्व अन्येबेहुजने्ई त : ॥ एवं यः 
कुरुते चम्पां सोप््यन्तं पुण्यमश्लुते ॥ प्रधूणां च विधि: प्रोक्तस्तत्मभणां च गोचरः ॥ सर्वेश्चेत- 
ट्रत॑ कार्य स्वशक्त्या हःखभीरुनिः ॥ प्रशुः मरथमकल्पस्य योलुकल्पेन वतंते॥ विफल तत्तु तस्य 
स्यादनीशस्त्वतुकल्पितः ॥ अथ निर्बनस्थ विधिः ॥ _ पश्चम्याँ नियम ऊयादाचायवचनाइम्रती ॥ 
पष्ठचरां स्‍्नाने अकुर्वीत संतर्प्य पितदेवताः ॥ अभ्येत्य स्वगुं मौनी ख्‌ये मनसि चिन्तयेव ॥ 
स्थापयेदवर्ण कुम्म॑ मृत्पात्र च तथोपरि ॥ तस्योपरि न्यसेत्सूय पलकेन विनिमितम ॥ सोवर्ण 
भक्तिसंयुक्तं रथं सारथिना युतम ॥ तमचंयेज्जगन्ना्थ गृहीत्वाज्ञां गुरोः स्वयम्‌ ॥ पढ़क्षरेण 
मंत्रेण गन्धपुष्पाक्षतादितिः ॥ “नमः सूर्याय'' इति मंत्र: ॥ संपूज्य विधिवदेव॑ फलपुष्पादिके 
च यत्‌॥ सू्योयावेदयेत्सव सूर्यों मे भ्रीयतामिति ॥ ततः म्भाते विमले गत्वा गुरुगृहं ब्रती॥ 
सर्वोपकरणः सूर्यमाचारयाय निवेदयेत ॥ धान्य॑ पुष्प॑ फल वस्ते । रत्नघेन्वादिक च यत्‌ ॥ गवां 
कोटिसहस्तम॑ तु कुरुक्षेत्रेव्केपर्व॑णि॥चम्पादानस्य राजेन्द्र कलां नाहेति षोडशीम्‌ ॥ सर्वेतिथंप्रदा- 
नानि तथान्यान्यपि षोडश ॥ चंपया तुलितानीह चम्पेका त्वतिरिच्यते ॥ इति श्रीस्कंदपु- 
राणोक्त चंपाषष्टीव्रत संपूर्णम॥अथ मार्गशीषशक्षषष्ठी चम्पाषष्ठ॥मार्गे मासे शुक्कपश्ले षष्ठी वेधृतिसंयुता॥ 
रविवारेण संयुक्ता सा चम्पा इते कीर्तिता॥ इति मह्लारिमाहात्म्ये॥ मार्गशीर्षेमले पक्षे पष्ठचं 
वरेशमालिन॥ शततारागते चन्द्रे लिड्ढ स्थाहष्टिगोचरम ॥ इति ॥ इये योगविशेषेण पूर्वा। 


योगाभावे परा आहया ॥ इति चम्पाषष्ठी ॥ इाते षष्ठीव्रतानि ।। 





नका विसजन करे । ब्राइणोंको भोजन करानेपर बचेहुए 
अन्नका आप अपनें पुत्र, ख्री और सब बान्धभोंके साथ 
बेठकर भोजन करे । पूर्वोक्तविधिकि अनुसार जो मनुष्य 
चभ्पाषष्ठीका ज्षत करता है, उसको विशेष पुण्य मिलताहै। 
यह जो विधि कही हूँ वह समथोकी हे क्योंकि, इस प्रकार 
सुब॒ण.रथादिका दान अत्यन्त घनशाली ही कर सकते हैं । 
और निधनभी अपने अपने दुःखोंको मिटानेके छिये त्रत 
करें, पर पूजनविधि अपनी श्षक्तिके अनुसार करे ।जो समर्थ 
होकर इसविधिसे न कर, निधनोंके अनुरूप विधिसे करता 
है उसका वह करना निष्फल होता है, किंतु निर्धन उस 
अनुकस्पविधिस यदि करता है तो वही सफल होवाहे।अब 
निधनकी कत्तव्य विधिका निरूपण करते हैं-ब्रती पच्चमीके 
दिन आचायसे पूछकर नियम ग्रहण करे,पष्ठीके दिन स्नान 
करके पिठृदवता आदिकोंका तर्पण करे । फिर मौनी होकर 
अपने घरमें आ, सूयदेवका ध्योंद करे | अब्रण कछशको 
स्थापित करके उसके ऊपर मत्तिकापात्रे रखे । उप्तपर एक्‌ 
पल सुचणकी सूर्यमूर्ति और भक्तिक साथ सुवर्णका सारथि, 
भश्व आदि रथेको स्थापित करे। फिर गुरुसे पूछकर आप 
उस जग्नन्नियन्ता स्यदेवका “ओं नमः सूर्याय ” इस छः: 
अक्षरवाले सन्त्रसे गन्ध, पुष्पादिद्वारा पूजन करएसे पूजन 
करके जो फू पुप्पादि उपस्थित हों उन्को सूयके छिय 
चढावे । पीछे 'सूर्यो मे प्रीयताम्‌! तूय मेरपर प्रसन्न हो ऐसे 

ऊँहता रहे । पीछे दूसरे दिन खच्छ प्रभातमेँ गुरुके यहां 

गाय, तथा सब उपकरण समेत सूर्यकोगुरुके छिय पएणिण--7+-7--_+ >> न [हुआ ॥ इसके ही साथ पष्ठीके ब्रत भी पूरे होते हैं। 





करे। इसके साथ अपनी सामर्थ्यानुसार घान्य, पुष्प, एक 
वस्र/ रत्न और-गऊआदि जो देन होंउनकौं भी दे दे । 
कोटिको सहख गुणित कर जितनी संख्या होती हे उतनी 
गऊओंको सूयग्रहणके समय कुरुक्षेत्रेमे देनेस जो फछ 
मिलता हें है राजेन्द्र ! वह दान पुण्य चम्पाषष्टीकों दान 
फलकी सोहद्रवीं-करछाकी भी समानता नहीं करसकता | 
सब तीथोम दानोंके पुण्योंको और षोडश महादानोंकोएक 
तरफ तुलापर रखे , दूसरी ओर चम्पाषष्ठीका पुण्य; पर 
इस चम्पापुण्यकी बराबरी उन सब पुण्योंसे नहीं होती, 
चम्पाषष्ठीकाही पुण्यफलछ भारी रहता हे । यह श्रीष्कन्द- 
पुराणकी कहीहुईं चम्पाषष्ठीके ब्रतकी कथा पूरी हुईं॥ 
मांगे शीषेशु श षष्ठी चम्पाष्ठीके ब्रतक शीषेश छ षष्ठी चम्पाष्ठीके त्रतको कहते हैं। मागशी' 
षंमासको ( पाठान्तरक अनुसार मागशीर्ष या भाद्रमास ) 


२३० शमन आज :22 कर डी यदि वेश्वतियोग ओ रसे युक्त हो 
तो उंस चम्पाषष्ठी कहते हैं, यहे मलारिमाहात्म्यमें लिखा 


हुआ हं, दुसरे प्रन्थोंमें तो यह छिखाहुआ है. कि, मागशीष- 
शुक्ला षष्ठी शतमिषानक्षत्रस युक्त रविवारी हो तो उसे 
चम्पाषष्ठी कहते हैं, इसमें शिब छिड़्के अवश्य दशन 
करने चाहिये इसके योग पूर्वामें ही पूवा यदि वरामें हो वो 
पस्र लेनी चाहिये योग । विशेष शतभिषानक्षत्र और रवि- 
बार आदिक हैं ये पूर्वा परा वा शुद्धा जिसमें हो उसीको 
चम्पाषष्ठी समझा जायगा । यह चम्पाषष्ठीका ब्रत पूरा 
हुआ ॥ इसके ही खाथ षद्ठीके ब्रत भी पूरे होते हैं॥ 


३ सा भाद्रपदे शुक्भेति पाठ: ( कौ / ९ शिवलिंगदृशनं कार्यमित्यर्थ इति ( कौ० )। 








मर 00728 00002 (07200 20, 20% 0007 0667% 7422 705.602200 6,850 32700022/6% 7 /577226% /7222243/ 20024. /020 220 40 24027: 2 0: यह कम 7772 700 4६08४ ६४४४६ कहर गीद6%:70८08/77 //340927%600 02 2420: 
नस मकाम मन + न 4५3५५७५५3»-५०७५५.५».4..०००५ अमन» ५4७७» ५+५५ नमन मम» नमन कक, हैँ कर 2 ४. 


अथ सप्तमीत्रतानि ॥! 
गन्ोपत्ति:॥ तब वेशाखशुक्सप्तम्याँ गगोत्पात्ति, तत्पजा चोक्ता 


20000 श00/8 


पृथ्वीचन्द्रोदये बराहो- 


वैशाखशुक्क॒सप्तम्यां जहना जाह्नवी पुरा ॥ क्रोधात्पीता पुनस्त्यक्ता कर्णरन्थात्त दक्षिणात ॥ ता 


को 0 दी 


तत्र पूजयेदेवीं गड़ गगनमेंखलाम्‌ ॥ इति ॥ हरिवेशे एण्यकब्॒तान्ते अब्दं प्रातःस्तानमानि- 


धाय-गड़या बतक॑ दत्त तदेवोम यशस्करि | 


स्नानमस्यधिकं त्वत्र भत्यूषस्थात्मनो जले।। 


अन्यत्र वा जले माघगुक्कपक्षे हरिभिये ॥ एतद्बब्वाव्रत॑ नाम सर्वकाशमई स्प्टतम्‌ ॥ सत सत्त च 
सत्ताथ कुलानि हरिवछमे ॥ ख्रीतारयति धर्मज्ञा गड़ाब्रतकचारिणी ॥ देय कुम्मसहर्न॑ ठ 


गड़ाया व्रतके शुभे ॥ तौरणं पारणं चेव तद्भत 


सावकामिकम | इते |] अन्यचोक्तम-व शाख- 


शुक्कपक्षे तु सप्तम्यां एजयेद्धरिम ॥ गंगाया विधिवत्स्नात्वा भोजयेद्राह्मणान्‌ दश॥ पजयेत्सूक्ष्म- 


है 


रे आर) 


बस्तेश्व पुष्पत्मक्चन्दनेः श॒भेः ॥ पूजकः स्पापेभ्यों मुच्यते नाज् संशयः ।। इयं च शिष्टाचा- 


8.2 


रान्मध्याहव्यापिनी ग्राह्मा | दिनद्वये तब्याप्तावव्याप्तावेकदेशव्याप्तो वा पूवा-श्ुग्मवाक्याव्‌ ॥ 


इति गंगासत्मीत्रतम्‌॥ 


शीतशतप्तमो ॥ अथ शुक्कादिश्रावणकृष्णसत्तम्यां 


शीतलाबतम्‌ ॥ तत्च मध्याहव्यापिन्याँ 


कार्यमातथा च माधवीये हारीतः-पूजावतेषु स्वेंदर मध्याहव्यापिनी तिथिः ॥इति॥ अथ ब्रत- 


विथिः॥ स्कान्दे-वन्दे5ह शीतलां देवी 


कृतमस्तकाम्‌ ॥ कुम्मे संस्थापयेदेवी पूजयेन्नाममन्त्रतः 


सप्तमीद्रतानि ॥ 


अब सप्तमीके ब्रतोंको कहते हैं | उनमें सबसे पहिले गंगा | 


सप्तमी-वेशाख शुछ्म आती हं,इस दिन गेगाजी पुन:प्रकट | कस 
९ दा । 5 मध्याह व्यापिनी हो उसीदिन करना चाहिये, 
हुईं थीं। इसमें गेगाजीका पूजन होता है । पृथ्वी चन्द्रोदय | हे ह दे ह्‌ 


किक कप भ््‌ आप का ज। 
प्रन्थम त्रह्म पुराणस कहा हैं कि. राजषि जन्हुने पहिल | वि हर ् 

५० २ $ कानसे | गे में ज्याहम मी हो, या न हो अथवा किसी एक 
क्रोधम आ गंगा पीछी थी,पीछे इस -सप्तमीको उनके कानसे | शक कस हे ड़ 
सम्न कन्याके रूपमें द्गिम्बर ही प्रकट हुइ;अत एवं इस दिन | 


छ् 4 हू ज् हि य्‌ रि > मन उ्य्क । निण सी 

ऐसी ही हा मा अप अल सी । | क्योंकि सप्रमीत्रत निणय ग्रसड्धसे षष्ठी युक्ता सप्रमीदी ग्रहण 
ब्रतके अन्तर्म इस ब्रतको कहा है कि, हे यशके करनेवाली ! | न कर 

पल कप आज. लीन | करनी चाहिये, ऐसा युग्मवाक्यका निर्णय हैं। यह गज्गञा- 
गंगाजीने यह ब्रत पावंततीजीक छिये कहा इस कारण यह | पीके अताही कथा पूरी हुईं ॥ 

पावतीजीके नामसे आज भी कहा जाता हैं; इसमें विधिपू: | है डे 


बेक प्रातःकाछ गेंगा स्नान करना चाहिये।हे हरिकीप्यारी! 


माघ शुक्लाको दूसरे भी किसी जरूस्थानमें स्नान किया जा 
सकता हैं, यह गेगाजीका ब्रत सब: कामनाओंकी पूर्ति 
करवा है। इस कारण इसे सब कामग्रद -भी कहते हैं। हे 
हरिकी प्यारी|जों धमके जाननवाढी ख्री इस ब्रतको कर ती 
है वो इसके प्रभावस साव पीहरके ओर सात सासरके 
तथा सात ननसारके पुरुषोंका उद्धार कर देती है।इस उत्तम 
गंगाब्रतरम एक हजार कुभोंका दान देना चाहिय, यह ब्रत 
तारने, पार करने एवं सब कामनाओंकी पूर्ति करनेवाला 
है | दूसरे पुराणोमेभी यह त्रत लिखा हुआ है कि, वैशाख 
शुक्ला सप्तमीको भगवानका पूजन करना चाहिये, गंगामें 
विधिपूर्षक स्नान करके दश ब्राह्मण भोजन कराना चाहिये, 


रासभस्थां दिगम्बराम्‌ । माज 





नी 


ऋलचोपेतां शूपालं- 
॥ शीतले पश्चपक्तान्नदध्योदनयुत 


। अच्छे पुष्प माछा और चन्दनोंसे तथा सूक्ष्मवख्रों से इनका 
। आप कप कप 
| पूजन करना चाहिये। पूजक सब पापोंसे छूटजाता है 


इसमें सन्देह नहीं है। यह गद्भासप्रमी ब्रव जिस दिन 
क्योंकि, शिष्ट पुरुष ऐसे ही मानते आये हैं, किंतु दोनों 


अशमें पहिले ( षछ्ठी ) के दिनही सप्तमीका सम्भव हो तो 
गड़ासप्रमी ब्रतमें सप्तमी षष्ठी विद्धाही अहण करनी चाहिये। 


अब शातल्ासप्तमी ब्रत कहते हैं-यह ब्रत शुकू पक्षस 
मासारम्भके मानानुसार श्रावण वदि सप्तमीको क्रनों 
चाहिये, जब कि संप्तमी मध्याह्न व्यापिनी हो। ऐसेही 
कालछमाधवर्म हारीतस्म॒ृतिका प्रमाण मिछला है कि, पूजाप्र- 
धान व्रतोंमें मध्याहृव्यापिनी तिथि ग्राह्म हैं। इस ब्रव॒की 
विधिको कहते हैं | स्कन्द्पुराणमें छिखाहें कि, प्रथम शीत * 
ला देवीके सम्मुख जाकर साखलि प्रार्थना करे कि, रासभ 
( गदभ ) वाहना, दिगम्ब॒र ( नम्न ) हाथोंमें माज नी (झाड़ू) 
और कलशको धारण क्रनेवादी, मस्तकपर जिसके झा 
(छाज) है एसी शीतला देवीको में प्रणाम करता हूं ) फिर 
कलशके ऊपर पूर्वोक्त स्वरूपा शीतछा देवीकी मूति स्थापित 
करे | * ओ शीतलाये नमः ” शीतलछाके छिये नमस्कार इस 
नाममन्त्रस उसे स्नानादि कराव, फिर पाँच प्रकारका 


१ उसासंबधीत्यथे: । २ गेगायाः । ३ बारण दुःखानां पारण मनोरथानाम्‌ । 







धभम्‌ ॥ नेवेद ग़ृह्मतां देवि घतमिश्रं च सुन्दरि । शीतले दुह में पाप॑ पुत्रपोत्रसखभदे ॥ धन 
धान्यपदे देवि पूजां ग़ह्न नमोषस्तु ते॥ शीतले शीतलाकार अवेधव्यखुतप्रदे ॥ आवणस्या- 
सिते पक्षे अध्ये ग़ह् नमो5स्तु ते ॥ सम्पूज्य सत्त गौरीश्व भोजयेच्च म्रयत्नतः ॥ अथ पूजा | 
मासपक्षाद्यल्लिर्थ मम इह जन्मनि जन्मान्तरे च अवेधव्यप्रात्ये- अखण्डितभतृसयोगपुत्र- 
पौत्रादिधनधान्यप्रातये च शीतलाबतं करिष्ये । तथा यथामिलितोपचारः शीतलां : पूज- 
यिष्ये इति संकल्प्य अष्टदलयुते पीठे अब्रणं कलश संस्थाप्य तदुपरि सोवणी शीतल 
संस्थाप्य वन्देह शीतलां देवीमिति मंत्रेण ध्यात्वा & शीतलाये नमः इति नाममन्मेण 
आवाहनम आसनम पाद्मम अध्यम आचमनम्‌ स्नानम्‌ वस्थम्‌ उपवद्धम्‌ विलेपनम अहं- 
कारान्‌ पृष्पाणि धूपम्‌ दीपम्‌ शीतले पश्चपक्कान्नमिति मंत्रेण नेवेद्यम्‌ करोद्वतेनम फलम्‌ 
तांबूलम्‌ दक्षिणाम्‌ नीराजनम्‌ पृष्पाअलि च समर्प्य प्रदक्षिणामू नमस्कारान्‌ शीतले दह 
मे पापमिति मन्जेण भार्थनां च कृत्वा शीतले शीतलाकारे इति मन्त्रेण विशेषाष्य दक्याव॥ 
ततो बतसंपूर्णफलावाप्तये बाह्मणाय वायनं दद्यात्‌। तत्र मन्त्ः--दुध्यन्नं दाक्षिणायुक्त वाणक॑ 
फलसंयुतम्‌ ॥ शीतलाप्रीतये तुभ्यं ब्राह्मणाय ददाम्पहम्‌ ॥ इति पूजनम ॥ अथकथा ॥ 
भाविष्ये “कृष्ण उवाच ॥ पसिद्धं श्रूयतां रम्यं नगरं हस्तिनापुरम ॥ इन्द्रयुम्रश्व राजा 
भून्तपतिलोंकपालकः ॥ १॥ धर्शीलानिधा चासीत्तस्य भारया यशस्विनी ॥ क्रियाकाण्डे 








पक्तान्न, सघृत दधि और भात यह नेवद्य आपके निवेदन 
करता हूं, हे देवि | हे सुन्दरि ! आप इस नेवेद्यका भोग 
छगाओ | ऐसे नेवेद्य छगाकर दक्षिणा समर्पण करे । पीछे 
पूः * (5 २ ञ े रे 
जन समाप्त करके प्राथना करे कि, हे शीतलछे ! आप भरे 
पापोंको दग्घ करो । मुझे पुत्र पोत्रादिकोंका सुख, धन और 
धान्यकी सम्पत्तिका दान करो | है देवि | मैने जो आपका 
पूजन किया है इस अद्भीकार करो, आपके छिय नमस्कार 
है | पीछे अध्यदान करे, उस समय ' शीलले' इस ख्होकको 
पढे । इसका यह अथ है कि, हे शीतछू आकारवाढी ! हे 
' ख्रियोंको सौभाग्य ओर पुत्र देनेवाली ! हे शीतल ! श्रावण 
बदि सप्तमीके दिन सेरे दिये हुए इस अध्येको स्वीकार कर, 
तुमार लिये नमस्कार है ।फिर सातवषकी सात कन्याओंका 
प्रेसेस पूजन करके अच्छी तरह भोजन करावे ! इस ब्रतके 
आरम्भमें 'ऑ तत्सत्‌ ३ अद्ैतस्थ बह्यणों? इद्यादि बाक्ष्य 
योजना करके मास पक्षादिरूप काहू और भरतवर्षादिरूप 
दुश, गोत्रादि रूप अपने खरूपका उल्लेख करके ' सम ? 
इत्यादि मूछमें लिखे वाक्‍्यकों पढकर सड्डूल्प करे | यह 
सझ्ूुस्प स्लियोंकोही उपयुक्त हे. इसका यह भाव है कि, 
' भ्रमुक गोत्रवाली अमुकनाम्नी जो मैं है, मुझे इस और दूसरे 
जन्‍्मोंस सोभाग्य मिले, पतिके अखण्डितसंयोग ( सम्भोग) 
छुखको प्राप्रि हो। पुत्र पौत्रादि तथा धनधान्यकी सम्पत्ति 
प्राप्त हो; इस लिये शीतछासप्रम्ी ब्रत और जो ये पूजनके 
उपचार इकट्ठे हुए हैँ इनस शीतछाका पूजन करूंगी | एक 
च्छिद्ट कछझ् स्थापित करे, ड्स 


४७७७७७७७७७७७७७७ए७शरऋशऋरऋ्र्र७७७ए७एर८ए७एए७७७७७एएरछण्ाणाणाााााााााा इक इलल तल ३३३. अमरीकी लक ल कक लीकन लत सील लि कील नील लिकि नी जलन न कक मन कल कि लक कली टकीलिकनिीलकी न. 


शपर सुवर्णमयी शीतलामूर्तिको स्थापित करे । फिर बन्‍्दे- 
5हँ शीतल? इस पहिल्े कहे हुए मन्त्रसे ध्यान और प्रणाम 
करे | पीछे * ओ शीतलाये नमः आवाहयामि, शौवहढाके 
छिये नमरकार शीतछाका आवाहन करताहूं इस नामम- 
न्त्रस आवाहन करे। एसेही * ऑ शीतढाये नमः आसन- 
मपृयामि, इहागत्य अन्नातिष्ठ! श्री शीतछाके लिये नमस्कार 
आसन देताहू यहां आकर यहां बैठ जो इस नाममन्त्रपे 
आसन प्रदान करे । इसी प्रकार वाक्य कल्पना करती हुई 
पाद्य, अध्यं, आचमन, स्नान, वस्सर, उपवस, चन्दन, अछ- 
छ्वार, पुष्प, धूप ओर दीपक दान कर। ' शीतले पञ्च ! 
इस पहिंले कहे हुए मन्त्रस भोग छगा कर नाम मन्त्रस 
करोद्वत्तन, फल, ताम्बूछ, दक्षिणा, आरती, पृष्पाजि 
चढावे । फिर नाम मन्त्रसे प्रदक्षिणा करके वन्दे< 
शीतर्लां ' इस पहिले कहे हुए मन्त्रसे प्रणाम, ' शीतछे दृह 
रे पाप ? इस मन्त्रसे प्राथना और * शीतक्ले शीतढछाकारे' 
इस पूर्वोक्त मन्त्रस विशेष अध्ये दान करे। फिर ब्र॒तके 
पृणफलकी श्राप्तिकि छिये ब्राह्मणके छिय वायना दें । 
उसका ' दृध्यन्न ' यह मन्त्र है । इसका यह अथे है कि; 
शीतलाकी प्रीतिके लिये में दधि, अन्न, फछ और दक्षिणा- 
सहित वायना तुमें देती है ॥। इस ब्रतकी कथा-भविष्य- 
पुराणमें कही है। श्रीकृष्णचन्द्र बोले कि, हे नपते |! आप 
सुने । हस्तिनापुर नामका एक नगर असिद्ध है, उसमें 
लोकोंका रक्षक इन्द्रयुम्न नामका राजा था ॥ १ || उसकी 


स कलछ- | पतिब्रता यशस्विनी, प्रसशीरा नामकी स्त्री थी, वो अनेकों 





ब्रताने, ] ल्‍्ट भू है कट 


रता साध्वी दानशीला भियंवदा ॥ २ ॥ बनूव प्रथमः पुत्रो महाधर्मेति नामतः ॥ नन्दते पितृ 
वात्सल्यात्कालेगन्यस्मिस्तलों मबेव ॥ ३॥ द्वितीयाथ तथा पुत्री तस्थ जाता शुणोत्तमा॥ 
पुत्री लक्षणसंपन्ना शुभकारीति नामतः ॥ ४ ॥ वद्धे सा रिठ॒गेहे सवाइग्णखुन्दरी ॥ नाम्ना 
रूपेण सा बाला सर्वा्सां च शुणाधिका ॥ ५॥ साहद्रिकमुणोपेता पह्महस्ता प्रियंवदा ॥ 
कौण्डिन्यनगरे राजा सुमित्रों नाम नामतः॥ ६॥ तत्पुत्रो झुणवान्नाम झुमकायों? पतिबंभों ॥ 
बरो हि देहमानेन लक्ष्मीवान्‌ रूपवानव्‌ गुणेः ॥ ७ ॥ झुणवाज्छुभकारिण्याः पार्णि जम्नाह 
धर्मवित्‌ ॥ गहीत्वा पारिवर्हाणि गतोइसौ नगरं ऋति ॥<८ ॥ पुत्तः समाययों राजा झुणवान 
हस्तिनापुरम्‌ ॥ वृुतः परिजनेः सर्वेस्तत्पुज्या नयनोत्छुकः ॥ ९॥ त॑ इष्ठा शुभकारी सा 
सहर्षा जातसंश्रमा ॥ प्रणम्य च पितुः पादों तमूचे चारूहालिनी ॥ १० ॥ मया तात परि- 
ज्ञात॑ यदत्त॑ पद्मयोनिना ।। पातित्रत्यसमों धर्मों नास्तीह झुवनत्रये ॥ ११ ॥ तस्मादाज्ञां देहि 
राजन्‌ प्रहष्टेनान्तरात्मदा ॥ रथमारुहय यास्यामि स्वामिना स्वपुरं श्रति ॥ १२॥ तस्यास्त- 
इचन॑ श्रत्वा पितोबाच सुरतां प्रति ॥ स्थित्वेक वासरं चुत्रि शीतलाब्रतम्॒त्तमम्‌ ॥ १३ ॥ सोधा- 
ग्यारोग्यजनकमवैधव्यकरं परम ॥ कृत्वा याहि मतं झोेतच्वन्मातुर्मंम चेव हि ॥१४॥ इत्युक्त्वा 
ब्रतसामओं पूजोपकरण तथा ॥ संपाद्य राजा तां सद्यः शीतलार्माचत दृप: ॥ १५ ॥ भ्ेषयायास 
सरसि ब्राह्मण वेदपारगम्‌ ॥ सपत्नीकं तया साथे गता सा तद्वनानतरे ॥ १६ ॥ अमरती तत्सर 
सतत्र नापद्यद्िघिसाधनम्‌ ॥ श्रान्ता अ्रमन्‍ती विजने स्मरनती शीतलों झुहुएई ॥ १७ ॥| दद्श 


सा ततो नारीं व॒द्धां रूपग॒णान्विताम्‌ ॥ विभस्तु संत्रमच्छान्तः छुततो निद्रावर्श गतः ॥ १८4॥ 





नस्न्ल्म्म््प्स्सि 


पुण्यानुष्ठानकरनेबाली उदार चित्तवाडी ओर मधुरभाषिणी 
थी | २॥ उसके पहिल्े एक पुत्र हुआ, उसका महाधमसे 
नाम रखदिया, उसपर पिताका वात्सल्य प्रेम था | इससे 
वह सदा प्रसन्न रहता था; दूसरीवार शुभकारी नामकौ 
कन्या उत्पन्न हुईं । यह कन्या भी गुणोंसे उत्कृष्ट एवमशुभ 
लक्षणोंसे युक्त थी।३॥॥४॥पिवा इस पुत्रीको भी वत्सछतास 
आनंदि्त करता था| यह शुभकारी अपने पिताके घरमें सब 


अछु और गुणोंसि सुन्दर एवं नाम ओर सुन्द्रतास भी 
सब छडकियोंमें उत्कृष्ट थी ॥५॥ सामुद्रिक शासत्रमें जो | 
शुभ लक्षण कहे हैं उनसे सम्पन्न, करमें कमल चिह्नवाली | 
और मधुरसाषिणी थी । कौण्डिन्य नगरमें एक सुमित्र | 
नामका राजा था ॥ ६ ॥ सुमित्रका गुणवान्‌ नामका पुत्र । 
शुभकारीका पति हुआ, देहके मानसे गुणोंसि श्रेष्ठ था रूप- | 
वान और छूब््मीवान्‌ था 0 ७ | धमनिष्ठ गुणवाचून राज- | 
सुताका विविवत्‌ पाणिप्रहण किया पीछे सपुराहूसे बहु- | 
तसा पारिबहे (दहेज) छेकर भपने पिताकी राजधानी चढा | 
गया।।८॥ वह राजकुमारी कुछदिन रहके अपन पतिके घरसे | 
पिताके घर चली आयी; पीछे राजकुमार अपने कोण्डिन्य- | 
पुरवाले बान्धवोंके साथ गौना करनेके लिये हस्तिनापुर | 
आया ॥ ९ || इसको देखते ही शुभकारी शुभराशिके नत्र | 
प्रेम आनन्दसे पूण होगये।फिर अपनेपतिके साथ कौण्डिन्य | 
पुर जानेके लिये उद्यत हो ग्रसन्नतासे; चारु ( मधुर मन्द्‌ 
मन्द्‌ ) हासकरने रूगी सम्भ्रम होगया, अपने पिताके | 


१ तस्य पुत्री अभवत्सा च गुणोत्तमा जातेतबि नाम देसम्‌ । 





५५2“ रकंकँ 








समीप जा उनके चरणॉमें प्रणाम करके प्राथना की ॥१०॥ 
कि है तातव ! विधाताने जो कहा हे कि तीनों छोकोंमें पाति- 
ब्र॒त्यके बराबर कोई घर्म नहीं है, यह में जान गई ॥११॥ 
उसीको पालन करनेके लिये कोण्डिन्यपुर जाती हैँ अतः 
आप प्रह्ृष्ट अन्तःकरणस अनुमति दीजिए, जिससे में र॒थमें 
बैठकर स्वामीक साथ अपने घरको जाऊं ॥ १२ | इन्द्रयुन्न 
राजा अपनी पुत्रीस बोला कि, हे पुत्रि ! तुम अभी एक 
दिन यहां और ठहरो; शीतलात्रत करो ॥ १३ ॥ यह ब्र॒त 
जियोंके सौभाग्य और आरोग्यका बढानेवाला है| इसके 
अनुष्ठानसे वेधव्य भय नष्ट होता है । यह मेरी और तुम्हारी 
माताकी सलाह हैं !। १४ ॥ ऐस कहकर उसे ठहराय शीत. 
छाके पूजनकी सामग्री इकट्ठटी करायी, शीतछाजीके पूज- 
त्तका स्थान वनमें वछावके कूछपर वताया,फिर राजाने उस 
पुत्रीकों त्र॒तकी सामिम्री दे जलाशयपर शीतापूजनके लिये 
जैज दी ॥ १५ ॥ पूजन करानेके छिये एक वेद्वेत्ता सप- 
स्तीक त्राह्मणको उसके पीछे पीछे भजा। वह शुभकारी 
( शुभराशि ) सम्भ्रमसे जागें जैंगलमें दौडकर चछी गयी 
॥१६॥ पर उसे कहीं भी शीतछा स्थान नहीं मिला । अतः 
घूमती घूमती थक गयी पर शीतछाजीका वारंवार स्मरण 
करती हुईं आगे तछावको खोजते खो जतें फिरने छगी ॥१७॥ 
उससे वहां एक वूढी सुन्दर खी देखी | जो पूजन करा- 
नेके लिये आाह्मण भेजा गया था वह न राजहृुमारीके पास 
पहुँचा और न उस वलाव परही) किंतु रास्तेमे हो भटकता 





दष्टोउहिना मृतस्तस्य भार्यों तब्निकटे स्थिता ॥| शभकारीं ततो बृद्ध 


बमपियय चलाना 


च करू णाद्रधी:॥१९॥ 








 सोवा 


भविष्यति चिरंजीवी भर्ता ते राजकत्यके ॥ आगच्छ पूजनाथाय दशेयामि सरोवरम्‌ ॥ २० ॥ 
तया सह गता साध्वी तडागं विधिपू्वेकंम ॥ प्जयामास हृषेण तोषयामास शीतलाम्‌| ।२१॥ 
तस्या वर प्राप्य मुदा स्वमाग गन्तुमुद्यता ॥ ततः सा दच्शेरण्यें बआाह्मणं द्सपकम्‌ ॥ २२॥ 
भायाँ तु तस्य निकटे रूदती ब्राह्मणी मुहुई ॥ राजपुत्री लब्धवरा शीतलाया$ पएतित्रता ॥ २ ३॥ 
तयोस्तरूुणदम्पत्योयॉग्यसौभाग्यद्शनात्‌ ॥ रूदती करुणं सापि शुशोचं च मुहुसुहुः ॥ २४॥ 
आश्वास्य बाह्मणी सा त॒ राजपुत्रीम॒वाच ह ॥ तिष्ठ तिष्ठ क्षणं सुश्न प्रविशामि इुताशनम्‌॥२५॥ 
अनेन सह गच्छामि स्वर्गलोक॑ सुखावहम्‌ ॥ तस्यास्तद्बच आकण्य राजपुत्री दयान्विता ॥२९॥ 
सस्मार शीतलां देवी महावेधव्यमखनीम॥आगच्छच्छीतला तत्र वर॑ दातुं शुचविस्मिता ॥ २७॥ 


शीतलोवाच ॥ वर॑ वरय वत्से त्व॑ कि दुःखं चार॒हासिनि ॥ शीतलात्रतजं पुण्य॑ देहि त॑ 
बाह्मणी शुभाम्‌ ॥ २८ ॥ तेन पुण्यप्रभावेण भतास्‍्या निविषों मवेत्‌ ॥ इति देव्या वचः श्रुत्वा 
अवदद्राह्मणीं तत। ॥ २९॥ बुबोधाश ततो विप्रश्चिर॑ सु्तो यथा पुनः ॥ शीतलाया ब्रते 
बुद्धिबाह्मण्याश्वाभवत्तदरा ॥ ३० ॥ अकरोत्सापि तत्पूजां भमक्तिभावपुर/सरा ॥ तत्रान्तरे 
राजउच्या: पतिरागादनान्तिकम्‌ ॥३१॥ सोपि दष्टोष्थ सर्पण गच्छन्त्यग्रे ददश तम ॥ विललाप 
ततः साध्वी सख्या सह वनान्तरे ॥ ३२ ॥ शीतलोवाच ॥ वत्से मया पूर्वमुक्त॑ समर तद्वरव- 


$ आह 


णिति ॥ शीतलाबतचारिण्या वेधव्यं नेब जायते ॥ ३३॥ स्वयमु॒त्थाय कल्याणि पा्तें सुप् 


सटकता थक गया,अतः उसे नींद आगयी।। १८॥उसके पास | देने चढी आईं |[२७॥ और बोली कि, हे वत्से ! हे प्रिय- 
त्राह्मणी वेठगयी। फिर किसी दुष्टसपेने वहां ऐसा डसा कि, | पुत्रि | वर मांगो , हे चारुह्मसिनी ! तुझे कोनसा दुःख 
उससे वह वहांही उसीक्षण मरगया । इधर उस राजकुमारी | उपस्थित हुआ है ? जिसको मिटानेके लिये मरा स्मरण 
शुभकारीसे उस बृद्धल्लीने दयाद्र होकर कहा ॥१९॥ कि हे | किया | यदि तुम इस जाह्मणीके' दुःखसे दुःखित हो, तो 


राजकन्ये! तुमारा भर्ता चिर॑जीबी होगा तुम मेरे साथ पूज- | 

३२, के न ! 
नके लिये आवो, म॒ तुझे वह तछाव दिखाती हूं ॥२० | | 
शुभकारी ( शुभराशि ) उसके साथ वछावपर गयी, वहां | 


पर प्रसन्न चित्त होकर राजकुमारीने शीतछाजीका विधि- | ३ [ कुमार 
| वश हो अपने किये शीतहात्रवके पुण्यको उस दे दिया॥ 


वत्‌ पूजन किया एवम्‌ शीतछाजीको संतुष्टभी किया।।२१॥ 


फिर शीतलछादेवीने प्रसन्न हो वर दिया,बर मिलनेपर अपने | 
घरके रस्तेकी ओर चलनकी तैयारी की तब उसके कुछ दूर | 
चलकर जंगलमें सपंके डेकसे मरा हुआ ब्राह्मणको देखा । 2 ५ 
॥२२।॥ उसके पास उसकी ब्राह्मणी भी बारंबार ऊंचे स्वरसे भी शीतलात्रत करनेका प्रेम उसन्न होगया || ३० ॥ इससे 


डे जी प्रेम वश हो आह्यणीने | इसी 
रोइन करती थी | शीतलादेबीकी प्रसश्नतासे जिस सौभाग्य बीच राजपुत्री 0503३ खिल 3कीकी हल डे ञा 
वर मिला है वह साध्वी राजघुता शुभकारीने ॥ २३ ।॥| उन्त | कि 


तरुण ब्राह्मण और ब्राह्मणीकी दशा देखती हुई करुणस्वरसे | _« 


रोती हुईं बारेवार शोच करने छगी ॥ २४॥ पत्िब्रता 
ब्राह्मणीने राजसुताको आश्वासन देकर कहा कि, जबतक 
चिदाचिन इस पतिके साथ हुताशनमें अविष्ट न हों तबतक 
तुम यहाही ठहरो, जावो मत ठहरो || २५ | पत्तिके साथ 


| ५३... ३२ कप 3२ प्‌ 
इवाशनम प्रवेश करनेस ख्ियोंके छिये स्वगेसुख होता |पूष जो कहा था उसे याद करो, शीतछाके बतको जो खरी 


के त्रा्यणिके वचन सुन शुसकारी और 
| 
ही 


५३ 


रू भी दयाविष्ट 
* ९ ॥ सहान्‌ ( अटल ) वेधव्य दुःखको भी विनष्ट 
बाली भगवती शीतलादेदीका स्मरण करने छगी । 





कीवकादेदी प्रसन्षतासे सन्द्सन्‍्द्‌ सधुर हसती हुईं वहाँ बर स्वयं 


शीतलाके ब्रतका पुण्यकल इसको दे दो | ३८ | उस पृण्य- 
फल ते सपका विष दूर होजायगा, यह झट अभी जीवित, 
होकर प्रबुद्ध होबेगा । श्रीकृष्ण राजा युधिष्ठिरस कह रहे हू 
कि, शीतछाके इन बचनोंको सुन उस राजकुमारीन दया 


॥ ९९ ॥ उस पुण्यफछके मिलनेस वह ब्राह्मण जैसे कोई 
बहुत देरसे सोता हुआ जागता है वेंसही निर्विष हो त्वरित 
प्रबुद्ध होगया ऐस पुण्यप्र भावको देखनेंस ब्राह्मणीके मन 


उसका पति गुणवान्‌ भी वहां आरहा था कि रास्तेम।।३१ | 
उसे भी सपने डस लिया ओर वह पतित्रता राजघुता अपने 
संग उच्च वृद्धा शीवछा और दोनोंकों लिये आरही थी;कुछ 


| दूरपर आगे पतिकोभी ब्रह्मा उसीतरह गिरा देख वो त्राह्म- 
| णोके साथ विछाप करने छगी ॥ ३१२ ॥ तब शीतछा वहां 


पधाश्के बोली कि, हे वत्से | हे वरवर्णिनि ! सुन्दरि ! मैंर्न 


करती है, 


हि 


उसे वेधव्यका ढुःख कभी भी नहीं होता ॥३३॥ 


| इसस तुम विछाप्‌ मत करो, खडी हो घरमें सुप्त पुरुषको 


हक 


जैसे जगाया करते हैं, बेस ही इसे भी तुम खडी होकर. 
अपने हाथस इत़के हथको पकुड कर खडा करो | 


वाषाटीकासमेतः | (२४३१ ) 





गहें यथा ॥ बोधयाशु तथा भीर श्रतं वेधव्यनाशनम्‌ ॥ रे४ ॥ इत्युक्ता बोधयामास भतोर 


सा पातिव्रता ॥ मताषि मसुदितों दृष्ठा सवा; प्रियां प्रीतिमानलूत्‌ ॥ रे५ ॥ दृष्ठा तु महदाश्वर्य 
तद्घामस्थायितनों जनाः ॥ सर्वे ते विस्मयं जग्लुवह्मणीएलिस्क्षणात्‌ ॥ ३६॥ ब्राह्मणी हर्षिता 
बुद्धां प्रणिपत्य पतिद्रता ॥ देहि मातनेमस्ते5स्तु अवेधव्यावियोगिनी ॥ ३७ ॥ अन्यापि शीत- 
लायास्‍्त॒ ब्रत॑ नारी करिष्यति ॥अवेधव्यमदारिद्रमवियोगं स्वभतेतः॥ रे८ ॥ तथेत्यन्तदेधे देवी 
शीतला कामरूपिणी ॥ शीतलाया वर लब्ध्वा जगामात्मीयवेश्मनि ॥ ३९५ ॥ पद्माकरावालिे- 
सुविश्ववन्ययासमहंणासादितविश्वमड्रला ॥ प्रसादमासाद्य च शीवलाया राक्षः छुता पावे- 
तिवद्वभूव ॥ ४० ॥ इति भविष्ये शीतलाव्रत सम्पूर्णेम्‌ ॥ 
मुक्ताभरणसप्तमीत्रतम्‌ ॥| 
अथ भाद्रशुक्लसप्तम्यां मुक्ताभरणब्रतम्‌ हेमाद्रों भविष्ये ॥ सो मध्याह्वव्यापिनी 
ग्राह्मा ॥ तब्याप्तावव्याहौ वा परा ॥ मम इह जन्मनि जनन्‍्मान्तरे वा अखण्डितसन्तति- 
पुत्रपौत्रवृद्धये सुक्ताभरणव्रते उमामहेंश्वरपुजन करिष्ये इति संकल्प्य शिवाग्रे दोरक॑विन्थस्य 
शिव पूजयत्‌ ॥ अथ पूजा---देवदेव महेशान परमात्मखगदुरों ॥ प्रतिपादितया सोम पूजया 
पूजयाम्यहम ॥ आवाहनम्‌ ॥ अनेकरत्नखचित सोवण मणिसंयुतम्‌ ॥ मुक्ताचितं महादेव 


गहाणासनसुत्तमम्‌ ॥ आसनम्‌ ॥ पाय॑ गृहाण देवश सर्वेविद्यापरायण ॥ ध्यानगम्य सता 
नि मिनी निल जिम मिल मनन ज जन कल ज न जनक जनक लत अ जज जज ज जज जब बनना ३४ ७७७७७७४७४८७४८४७७७७७७॥७७७ए"ए"ए"श"शआआआ//श//आआआआआआआआआआआआआआआआआआआशशशेश्शणण"णशणणश""शश/॥॥८८८/८/शएएएा 


और हे भीरु | पर मेरे ब्रवका अलुछान करती रहना | 
क्योंकि यह वेधव्यक्रे ठुःखका भजन करनेवाला हे ॥रे४॥ 
ऐसे जब भगवती श्ीतछाजीन कहा, तब उस शुभकारी | 


( राशी ) ने खडी होकर उस अपने मत पतिको जगाया 


रू च्थू क मिक 

देखकर दोनों प्रसन्न होगय ॥| _३५ ॥ वहाँके रहनेवाल 
का रे 

जन, इस बडे भारी आश्चय्यकों देखकर बडा मारी आश्व- 


न्‍। ९ २ २ बिका हज 
य्ये माननें छगे, ब्राह्मणी पतिके रक्षणस्र। ३१६ ।॥ परम | के 
- थे है | अपने इस जन्म जोर जन्मान्तरमं अखण्डित सनन्‍्वति(कुछ) 


प्रसन्न हुईं. क्‍योंकि, वो पतित्रता थी उसने उस बृद्धाको 


प्रणाम करके कहा कि; हे मातः | मुझे वो वर दे कि; में 
कभी विधवा और वियोगिनी न हूं ॥३७॥यह भी आपसे 
वर म।गतीहूं कि, जो भी स्री कोई शीतछाका ( आपका ) 


ब्रत करे, वह भी विधवा, द्रिद्रा ओर वियोगिनी नददो पेड हे देवोंके भी देव! है पहे 
रे ५ | पूजाविधि कहते हैं-हें देवोंके भी देव ! हे महेशान ! हे 


|| ३८॥ जैसे उस ब्राह्मणीने प्राथना की उस वृद्धा ख्रीने 
यही कहा कि, ऐसा ही हो | फिर वह अन्तहिंत होगयी | 


क्योंकि वह स्वयं अपनी इच्छास रूपधारणकरनंवाली अंक क स अकबर कक 
| अनुसार पूजन करतीहूं, इसस आप यहां पधारें इससे 


शीवलादेवी ही थी, न कि वृद्धा ओर कोई दूसरी ख्री थी : 


ऐसे शीतलछा दवीका वर मिलनेसे वह राजकुमारी अपने | 
पति और उन ब्राह्मण-ब्राह्मणीके साथ अपने पिताके घर 
चली गई | ३९ ॥:शीतला दवीके प्रसादका छाभकर विश्व- | 
ह | यह आपके विराजमान होनेके छिय उचित आसन हे। हे 


वनन्‍्या शीतढछाके समहण (पूजन ) करनेसे जिसने समस्त 


जगत्‌के आनन्दमड्छ प्राप्त किये हैं ऐसी पावतीजीकी 


भाँति पद्माकर कमलवन या रूक्ष्मीसे पूर्ण खजानोंको अपने 
भवनोंमें विछासिनी हुई || ४० ॥ इति श्रीमविष्यपुराणका 





शीतछा ब्रत ॥ 


अब भविष्यपुराणके प्रमाणसे हेमादििमें निरूषित मुक्ता- 
सके कप आह 
भरण ब्रत भाद्रशुक्लसप्रमीमें होवाहे । इसमें मव्याहव्यापि- 


तो वह तत्क्षण खडा होगया | उसका भर्ता गुणवान्‌ भी | नीका महण होता हे । यदि दोनों दिन मध्याहव्यापिनी हो 
वह तर डा गर | उस । हें हो हर 
वहां प्रियाको देखकर और प्रिया अपने पत्तिको जीविल | _.. दोनों ही दिन न हो तो पराका भ्रहण होता हूँ॥ 'ऑं 


तत्सत्‌ ३ अयेतस्य ? इत्यादि वाक्यद्वारा देश, काछ और 


| गोत्र नामादिका उद्धेख करके मम! इत्यादि मूलोक्तवा- 


क्यको बोले और खद्कुल्प करें | इसका यह अथ है कि, में 


वाले पुत्रपोत्रोंकी दुद्धिक लिये मुक्ताभरण ब्रतकी सम्पूर्तिके 
निमिच उम्ामहेश्वर ( पावतीशछ्छडर ) भ्रगवानका पूजन 
करूंगी । फिर महादेवजीकी मूर्तिके या महादेवजीकी छिऊक्छ- 
मूर्तिके अश्रभागमें दोरक रखकर उनकी पूजा करे । अब 


परमात्मन्‌ ! हे जगदगुरो ! हे सोम यान्रीं पावंती सहित 
सदा रहनेवाले | में शाख्रकारोंसे प्रतिपादित पुजा विधिके 


आवाहन करे। फिर आसन समपंण करता हुआ कहे कि, 
बहुविधरत्नोंसे खचित,सुवणस गढ़ाकर वेयार किया हुआ , 
मणियों से शोभायमान और मुक्ताओंसे चारों ओर व्याप्त 


महादेवजी महाराज | आप इस पर विरष्जमान हों। पाद्य 


| देती हुई प्रार्थना कर कि, हे देवेश ! हे समस्व विद्याओंके 
| परायण! परमाधार! हे सज्जनोंको ध्यानसे प्राप्त होने छायक! 


अराा००मथपकााा नाना भाप भा भव पा भ ७५ ५३५५४ ५५2५3 ५७७ ५3७५५ मम ५४3०५ ५७3+4७७३४>पाल५ १३३» 3 ४७७ ५७३आ३9+७3८५३++४ ७७५ ०५3++७ 3५.३3» ओ ७५५७3 
१ सा पुर्वेयुता ग्राह्या पण्मुन्योरीति युग्मवाक्यादिति निर्णयसिन्धो ।१ इस विषयपर निणयसिन्धु्ें लिखा हें कि, 
“बण्मुन्यो:” इस युग्मवाक्यसे षष्ठीयुता सप्तमीकाही ग्रहण होबा है। 


३१ 








हिना मृतस्तस्य भायो तन्निकदे स्थिता ॥। शुभकारीं ततो ब्र्द्धा सोवाच करूणाद्रंधीः॥१९ 
भविष्यति चिरंजीवी भर्ता ते राजकल्यके ॥ आगच्छ पूजनाथाय दशयामि सरोवरम्‌ ॥ २० ॥ 
तया सह गता साध्वी तडाग विधिपूर्वकेम ॥ पएजयामास हृषेण तोषयामास शीतलाम॥ २१॥ 
तस्या वर प्राप्य सुदा स्वमाग गन्तुमद्यता ॥ ततः सा दच्शररणण्य त्राह्मग दद्टलपकम | | २१२ ॥| 
भायां तु तस्य निकटे रूदतीं ब्राह्मणी मुहुई ॥ राजपुत्री लब्धवरा शीतलायाः पतिब्रता ॥ २३॥ 
तयोस्तरूणदम्पत्योयोग्यसौमाग्यद्शनात ॥ रूदती करुणं स्ापि शुशोचं च मुहुझुंहुः ॥ २४॥ 
आश्वास्य बाह्मणी सा तु राजपुत्रीम॒वाच ह ॥ तिष्ठ तिष्ठ क्षणं खुन्न प्रविशामि हुताशनम॥२५॥ 
अनेन सह गच्छामि स्वर्गलोक सुखावहम्‌ ॥ तस्यास्तद्च आकरण्य राजपुत्री दयान्विता ॥२७॥ 
सस्मार शीतलां देवी महावेधव्यमअनीम॥आगच्छच्छीतला तत्र वर॑ दातुं शुचिस्मिता ॥ २७॥ 
शीतलोवाच ॥ वरं वरय वत्से त्व॑ कि दुःखं चार॒हासिनि ॥ शीतलातब्रतजं पुण्य॑ देहि ते 
बाह्म्णी शुभाम ॥ २८ ॥ तेन पृण्यप्रभावेण मतोश्या निविषो भवेत्‌ ॥ इति देव्या वचः श्रुत्वा 
अवदद्राह्मणी ततः ॥ २९॥ ब॒बोधाश ततो विभश्विरं सुत्तो यथा पुनः ॥ शीतलाया ब्रते 
बुद्धिबाह्मण्याश्ाभवत्तरा ॥ ३० ॥ अकरोत्सापि तत्पूजां भमक्तिभावपुर/सरा ॥ तत्रान्तरे 
राजपुत्या: पतिरागाद्दनान्तिकम्‌ ॥३१॥ सोपि दुश्छोई्य सर्पेण गच्छन्त्यम्रे दुदश तम्‌ ॥ विललाप 
ततः साध्वी सख्या सह वनान्तरे ॥ ३२२ ॥ शीतलोवाच ॥ वत्से मया पूर्वेजु कं समर तद्ररव- 
णिनि ॥ शीतलाब्रतचारिण्या वेधव्यं नेव जायते ॥ २३ ॥ स्वयमुत्थाय कल्याणि पातिं सुप्त 


न कक न न सन न 
दष्टोः 





भटकता थक गया,अतः उसे नींद आगयी।।१८।॥उसके पास | 
ब्राह्मणी वैठगयी। फिर किसी दुष्टसपने वहां ऐसा डसा कि; | 
उससे वह वहांही उसीक्षण मरगया | इधर उस राजकुमारी | 
शुभकारीसे उस वृद्धखीने दयाद्र होकर कहा ॥१९॥ कि हे | 
राजकन्ये! तुमारा भर्ता चिरजीबी होगा तुम मेरे साथ पूज- | 
नके लिये आवो, मे तुझे वह तछाव दिखाती हूं ॥ २० ॥ | 
शुभकारी ( शुभराशि ) उसके साथ तछावपर गयी, वहां | 


पर प्रसन्न चित्त होकर राजकुमारीने शीतछाजीका विधि- | प्‌ ६ मार 
वश हो अपने किये शीवलात्रतक पुण्यको उस दे दिया॥ 


व॒त्‌ पूजन किया एवम्‌ शीतलाजीको संतुष्टभी किया॥२१॥ 
फिर शीतढादेवीन प्रसन्न हो वर दिया,बर मिलनेपर अपने 


घरके रस्तेकी ओर चलनेकी तैयारी की तब उसके कुछ दूर | 
चलकर जंगलमें सपके डकसे मरा हुआ ब्राह्मणको देखा | 


॥२२। उसके पास उसकी ब्राह्मणी भी बारंबार ऊंचे स्वरसे |... हे 
| प्रेम वश हो ब्राह्मणीन भी शीतछाजीका पूजन किया । इसी 


| बीच राजपुत्री शुभकारीके प्रेमसे अन्वेषण करता हुआ 


भर « | उसका गुण मेगण || 
रोती हुईं वारेवार शोच करने लगी ॥ २४ | पतिवत्रता मर कल छठ 


रोइन करती थी | शीतलादेबीकी प्रसश्नतासे जिस सौभाग्य 
वर मिला हें वह साध्वी राजमुता शुभकारीने ॥ २३ ॥ उन्त 


ब्राह्मणीने राजसुताको आश्वासन देकर कहा कि, जबतक 
चिद्चिन्‌ इस पतिके साथ हुताशनम ग्रविष्ट न हों. तबतक 


तुस यहांही ठहरो, जावो मत ठहरो ।। २० || पतिके साथ | 


नी २ ञ् र्‌्‌ 
इंपाशनस भ्रवेश करनेस खतरियोंके छिये स्वगंसुख होता 
है। ज्राक्मणीके वचन 


करनवाली भसवती औीतलादेवीका स्मरण करने छगी । 
शीतडादेदी प्रसन्नतासे मन्द्मन्‍्द्‌ सथुर हसती हुईं वहां बर 





देने चढी आईं |[२९७॥ और बोली कि, हे वत्से ! हे प्रिय- 
पुत्रि | बर मांगो , है चार॒ह्मसिनी ! तुझे कौनसा दुःख 
उपस्थित हुआ है ! जिसको मिटानेके लिये मरा स्मरण 
किया । यदि तुम इस ब्राक्षणीके' दुःखसे दुःखित हो, तो 
शीवढाके ब्रतका पुण्यफछ इसको दे दो ।। १८ ॥ उस पृण्य- 
फल स्पका विष दूर दोजायगा, यह झट अभी जीवित. 
होकर प्रबुद्ध होवेगा । श्रीकृष्ण राजा युधिष्ठिरस कह रहे हूं 
कि, शीवलछाके इन वचनोंको सुत उस राजकुमारीने दया: 


॥ २९ ॥ उस पुण्यफछके मिल्नेस वह ज्ाह्मण जैसे कोई 
बहुत देरसे सोता हुआ जागता हे वेसही निर्विष हो त्वरित 
प्रबुद्ध होगया ऐसे पुण्यप्र भावको देखनेंस त्राह्मणीके मनमें 


| भी शीवल्ात्रत करनेका प्रेम उत्पन्न होगया ॥ ३० ॥ इससे 


संग उच्त वृद्धा शीवछा और दोनोंकों लिये आरही थी,कुछ 
दूरपर आगे पतिकोभी ब्रह्मा उसीतरह गिरा देख वो ब्राह्म- 
णीके साथ विछाप करने छगी || ३२ ॥ तब शीतल वहां 
पधाश्के बोली कि, हे वत्से | हे बरवर्णिनि ! सुन्दरि ! मैं 


| पूत्र जो कहा था उसे याद करो, शीतछाके ब्रतको जो ख्री 
सुन शुभकारी और भी दयाविष्ट | 


हो ॥ २६॥ महान्‌ ( अटछ ) वैधव्य दुःखको भी विनष्ट | 


करती है, उसे वेधव्यका दुःख कभी भी नहीं होता ॥२१|| 
इससे तुम्र विछाप स॒त करो; खड़ी हो घरमें सुप्त पुरुषको 
जसे जगाया करते हैं. बेस ही इसे भी तुम खडी होकर. 
स्वय अपने हाथस इसके हथको पकुड कर खड़ा करो | 


अतानि ] शाषाटीकासमेतः ! (२७३ ) 





गहें यथा ॥ बोधयाशु तथा भीरू व्रत वेघच्यमाशुवम्‌ ॥ २४ ॥ इत्युक्ता बोधयामास भतार 
सा पातिव्रता ॥ भर्ताषि मुदितों दृष्टा सवा, प्रियां प्रीतिमानभूत्‌ ॥ रे५॥ दृष्ठा तु महदाश्वर्य 
तद्घामस्थायितों जनाः ॥ सर्वे ते विस्मयं जम्मुवाह्मणीपतल्तिसक्षणात्‌ ॥ ३६॥ ब्राह्मणी दर्षिता 
बुद्धां प्रणिपत्य पतिद्रता ॥ देहि मातनेमस्ते5स्तु अवेधव्यावियोगिनी ॥ ३७ ॥ अन्यापि शीत- 
लायास्‍्त॒ ब्र्त नारी करिष्यति ॥अवेधव्यमदारिद्रमवियोगं स्वन्नतवेतः॥ र८ ॥ तथेत्यन्तदेधे देवी 
शीतला कामरूपिणी ॥ शीतलाया वर लब्ध्चा जगामात्मीयव्रेश्मनि ॥ ३९ ॥ पतद्माकरावालि- 
सुविश्ववन्दयासमहेणासादितविश्वमड्रला ॥ प्रसादमासाद्य च शीवलाया राक्ञः छुता पावे- 
तिवद्गभूव ॥ ४० ॥ इति भविष्ये शीतलावते सम्पूणम्‌ ॥ 
मुक्ताभरणसप्तमीत्रतम ॥ 
अथ भाद्रशुक्लसप्तम्यां मुक्तामरणब्रतम्‌ हेमाद्रों भविष्ये ॥ सो मध्याह्नव्यापिनी 
ग्राह्मा ॥ तद्याप्तावव्याता वा परा ॥ मम इह जन्मनि जन्‍्मान्तरे वा अखण्डितसन्तति- 
पुत्रपौषवृद्धये मक्ताभरणब्रते उमामहेंश्वरपूजन करिष्ये इति संकरुप्य शिवाग्रे दोरक॑ विन्धस्य 
शिव पूजयत्‌ ॥ अथ पूजा--देवदेव महेशान परमात्मखगहुरों ॥ प्रतिपादितिवा सोम पूजया 
पूजयाम्यहम्‌ ॥ आवाहनम्‌ ॥ अनेकरत्नखचित सोवण मणिसंयुतम्‌ ॥ झुक्ताचितं महादेव 
गहाणासनमुत्तमम्‌ ॥ आसनम्‌ ॥ पा गृहाण देवश सर्वेविद्यापरायण ॥ ध्यानगम्य सता 


ओर हे भीरू | पर_ मेरे ब्रवका अनुष्ठान करती रहना; | 
क्योंकि यह वेधव्यके दुःखका भखन करनेवाला हूं ॥३४॥ | 


ऐस जब मगवती शीवछाजीने कहा, तव उस शुभकारी 


वहां श्रियाकों देखकर और प्रिया अपने पतिको जीवित 
देखकर दोनों प्रसन्न होगये ॥ ३५ ॥ वहांके रहनेवाल 


जन, इस बडे भारी आश्चय्येको देखकर बडा भारी आख- 


य्ये मानने छगें। ब्राह्मणी पतिके रक्षणस | । ३६ || परम 
प्रसन्न हुईं. क्‍योंकि, वो पतित्रता थी उसने उस बृद्धाको 


प्रणाम करके कहा कि, हें मातः | मुझे वो वर दे कि; में 
कभी विधवा और वियोगिनी न हूँ ॥३७॥यह भी आपसे | 
वर मोगतीहूँ कि, जो भी ख्री कोई शीवछाका ( आपका 2 | 
ब्रत करे, वह भी विधवा, द्रिद्रा और वियोगिनी नदो | ४ 
॥ ३८ ॥ जैसे उस ब्राह्मणीने प्राथना की उस वृद्धा ख्रीने | 
यही कहा कि, ऐसा ही हो | फिर वह अन्तहिंत होगयी । | 
क्योंकि वह स्वये अपनी इच्छासे रूपधारणकरनंवाली | र्‌ 
| अनुसार पूजन करतीहूं, इससे आप यहां पधारें इससे 
| आवाहन करे। फिर आसन समपंण करता छुआ कहें कि, 


शीतलछादेवी ही थी, न कि वृद्धा ओर कोई दूसरी ख्री थी 
ऐसे शीतछा देबीका वर मिलनेसे वह राजकुमारी अपने 
पति और उन ब्राह्मण-त्राह्मगीके साथ अपने पिताके घर 
चली गई ॥ ३९ ॥शीतछा देवीके प्रसादुका छाभकर विश्व- 
वनन्‍्या शीतछाके समहण (पूजन ) करनेसे जिसने समस्त 
जगतूके आनन्द्मड्छ प्राप्त किये हैं ऐसी पावतीजीकी 
भाँति पद्माकर कमलवन या छुक्ष्मीसे पूर्ण खजानोंको अपने 
भवनोंमें विछासिनी हुईं ॥ ४० ॥ इति श्रीमरविध्यपुराणका 





शीतछा ब्रत ॥। 
अव भविष्यपुराणके प्रमाणसे हेमाद्रिमं निरूपित मुक्ता- 


| भरण ब्रत भाद्रशुक्लसप्रमी में होवाहे । इसमें सध्याहव्यापि- 
( राशी ) ने खडी होकर उस अपने मत पतिको जगाया | ० हद 


तो वह तत्क्षण खडा होगया | उसका भर्ता गुणवान्‌ भी | 


नीका ग्रहण होता हे । यदि दोनों दिन मध्याहव्यापिनी हो 
अथवा दोनों दी दिन न हों तो पराका ग्रहण होवा है।। 'ऑ 
तत्सत्‌ ३ अचेतस्य ? इत्यादि वाक्यद्वारा देश, काछ और 


| गोत्र नामादिका उद्खेख करके मम इत्यादि मूलोक्तवा- 
| क्यकों बोढे और सद्भूल्प करे | इसका यह जथ है कि, में 
| भ्पने इस जन्म जोर जन्सान्तरम अखण्डित सन्तति(कुछ) 


वाले पुत्रपोत्रोंकी बृद्धिक लिये मुक्ताभरण ब्रतकी सम्पूर्णिके 
निमिच उम्ामहेश्वर ( पावंतीशछ्ुर ) भ्गवानका पूजन 
करूंगी । फिर महादेवजीको मूर्तिके या महादेवजीकी छिड्ढ- 
तिके अग्रभागमें दोरक रखकर उनकी पूजा करें | अब 
पूजाविधि कहते हैं-हे देवोंके भी देव | हे महेशान ! हे 
परमात्मन्‌ ! हे जगद्गुरो ! हे सोम यानीं पावेती सहित 
सदा रहनेवाले ! में शासत्रकारोंसे प्रतिपादित पूजा विधिके 


बहुविधरत्नोंसे खचित,सुव्णस गढ़ाकर तैयार किया हुआ , 

मणियों से शोभायमान ओर मुक्ताओंसे चारों ओर व्याप्त 
छा. बने हि अप 

यह्‌ आपके विराजमान होनेके छिय उचित आसन हे। हे 

३३२ 

सहादेवजो महाराज | आप इस पर विराजमान हों । पाद्य 
६ ३ 

देती हुई प्रार्थना करे कि, है देवेश ! है समस्त्र विद्याओंके 

परायण! परमाधार! हे सजनोंको ध्यानसे प्राप्त होने छायक! 


निरमिलनिकी किन लिनिलकि नी निकल नवीन तल अ 3 न मम अनुमान ाााााााआआआ७७७७७७४७७७७७ए/""//शशआआआशआआआआआआआआ॥४शशशशशशशशशणशशणश/शश््शणशणशशशणणश#शशशश/शशशशएछएशशआ ८ मु 
१ सा पूर्वयुता झ्ाह्या पण्मुन्योरीति युग्मवाक्यादिति निर्णयसिन्धों । १ इस विषयपर निणयसिन्धुम छिखा हें कि, 
“घण्मुन्यो:” इस युग्मवाक्यसे षष्ठीयुता सप्तमीकाही प्रहण होबा है । 
हा ३१ 






ना पल>+>>>ननमनपसग-गालकाप़धइादूबुल्‍ 













नमोस्तु ते॥पाद्यम्‌ ॥ इृदमह्यमन्यें त्वममरा' न्‍श शंकर ॥ किकरीभूतया सोम 
॥ अध्यम्‌ ॥ गड़गदिसवतीर्थेम्यः समानीत॑ खुशीतलम्‌ ॥ जलमाचमनी- 
थार्य गहाणशोमया सह ॥ आचमनीयम॥मध्वाज्यद्घिसमिश्र मधुना परिकल्पितम्‌ ॥ शहूर- 
प्रीतये तेहह मधुपर्क निवेदये ॥ मधुपकंमू॥ परयोदषिषृतं चेव शर्करामइुसडुतम्‌ ॥ पथ्वामृतेन 
स्‍्वपन करोमि परमेश्वर ॥ पश्चामृतस्नानम्‌ ॥गड़ा च यमुना चेव गोदावरी सरस्वती ॥ एताश्य 
आहत तोय॑ स्नानाय प्रतिग्रह्मताम्‌ 0 शुद्धोद्कस्नानम्‌ ॥ स्नानादूध्वे महादेव भीत्या पाप- 
प्रणाशन ॥ वख्यय॒ुग्मं मया दत्तमहते प्रतिगह्मताम॥वख्यम्‌ ॥ उपबीत सोत्तरी्य नानाभूपषणभूषि- 
तम्‌ ॥ गृहाण सोम विमले मया दंत्तमिदं शुभम्‌॥ उपवीतम॥ मलयाचलसंसूतं खुगान्धि घन- 
सारयुक्‌ ॥ चन्दन पश्चवदन गृहाण वनितायुत ॥ चन्दुनम्‌ ॥ जातीचम्पकपुन्नागबकुल: पारि- 
जातकेः ॥ शतपत्रश्व कहारेरचेय:ःहसुमापतिम ॥ पुष्पाणि ॥ त्रेलोक्थपावनानन्त परमात्मजग- 
दुगुरो ॥ चन्दनागुरुकर्पूर धर्प दास्यामि शड्टरम्‌ ॥ धूपम्‌ ॥ शुभवर्तियु्त सर्पिःसहित वद्विना 
युतम्‌ ॥ दीपमेकमनेका कप्रतिमाकलय त्विमम)। दीपम्‌ ॥ पायसापूपकूसर दुग्धान्नं सगुडोदनम्‌॥ 
दिव्यात्नं पडसोपेत खुधारससमन्वितम्‌ ॥ दविक्षीराज्यसंयुक्त नेवद्याथ प्रकल्पितम्‌ ॥ समपे- 
यामि देवाह किंकरी शहूराय ते ॥ नेत्रेद्यम्‌ ॥ पुनराचमन शुद्ध कुछ सोमाम्बुनाछुना ॥ सुख- 
शुद्धिकर तोय कृपया त्वं गहाण भोः ॥ आचमनीयम्‌ ॥ कस्तूरिकासमायुक्ते मलयाचलसंभ- 
वम्‌ ॥ गहाण चन्दन सोम करोद्वतेनद्वेतव ॥ करोद्व्तनम्‌ ॥ नालिकेरफर्ल जम्ब॒फर्ल नारिंगमु- 
त्तमम्‌ ॥ कूष्माण्ड पुरतो भक्तया कल्पितं प्तिगृहाताम्‌॥ फलपम्‌ ॥ पूगीफलामिति ताम्बूलम्‌ ॥ 

















शंभो सर्वेश्वर नमी5 
मया दत्त गहाण भाई 





हे सर्वेक्षर! आपके छिये प्रणाम है।आप पाद्य ग्रहण कीजिये। 
“इद्मब्येम! इससे अध्यंदान करे कि हें अन्य ( परसम- 
हनीय ) ! हे देवताओंके अधीश | है. शह्भर | भोः पावती 
फर्श सीके कक ऊ 

सहित ! मेने आपकी दा बराबर हो आपके लिये 
यह अध्य दिया है; आप इसे स्वीकार करें । गल्जाउंडढ़ि! 
कहती आचमन करावे कि, है इंश ! आप उमासहित इस 
जलूसे आचसन कीजिये, यह आपको आचमन करानेक 
लिय ही गड्ादि समस्त पुण्य तीथास शीतल जल छायीहूं ! 
मधुपर्क देती हुयी 'मध्वाज्य' इसको कहे कि, हे शह्डर ! में 
आपकी प्रीतिक लिये मधु, घृद और दधिको कांस्यपात्रमें 
मिलाकर तैयार किये हुए मधुपकेंकों निवेदन करती हूँ। 
“धयोद्धि' इससे पश्चामृत स्नान करावे | इसका यह अर्थ 
हैं कि, हे परमेश्वर ! दुग्घ, दृधि, धुत, शक्कर ओर मधु; 
इनसे तेयार किय हुए पश्चाम्ृतस स्नान कराती हूँ। ' गज्गा 
च्‌ यमुना ” इससे शुद्ध स्नान कराव कि,गड्जा यमुना गोदा- 
वरी और सरस्वतीस आपके स्नानके ढछिये छाये हुए 
जलको स्वीकार करो | फिर दो वल्थ समपण करे और 
कहे कि, हें महादेव ! हे पापोंके विनाश करनेवाले ! मेंने 
आपको स्नान कराकर ये दो अहत वस्र आपके समपण 
किये हैं; आप अहण कीजिये । यज्ञोपवीत चढाती हुई कहे 
कि; है पावृत्तीज्ञीके साथ विहार करनवाले | मैंने नाना- 
रस्नोंस भूषित उत्तरीय और शुद्ध यज्ञोपवीत सम्रपंण किये 
हे न प्रदण कोजिये । चन्दन चढावे और कहे कि, 
< स्थित कपूरक साथ घिसे हुए इस चन्द्तको हे पश्चा- 





नत ! आप पावती सहित ग्रहण करें । इससे पुष्प चढावे 
कि, हें प्रभो | में पावतीपति आपका पूजन जाती, चम्पक, 
पुन्नाग, बकुछ, पारिजात ( हार खुज्जार » शतपत्र ओर 


करहारोंसे करदी हू। “ ब्रेछोक्यपावना ' इससे धूप कर | 


ओर कहे कि, है त्रिकोकीको पवित्र करनेवाले ! हे अन* 
न्‍त | हे परमात्मन्‌ हे जगदगुरो ! में चन्दन, अगर ओर 
कपूर आदि सुगन्धित पदार्थां्से तेयार की हुईं इस शंकरी 
( आनन्द करनेवाढ्ी ) धूपको करती हैँ । 'शुभवर्ति' इससे 
दीपक करे | इसका यह अथे हैं कि, अनेक सूर्यकी जो 
मूर्तियां हैं उनकी कलावाले प्रज्वल्ित धृत वत्ति युक्त इस 
दीपकको स्त्रीकार करे। “ पायसापूध ” इन दो सन्त्रोंको 
पढ़कर नेवेद्य निवेदित करे कि, पायस, अपूर्ष, कसर 
( दुग्घस तैयारकिया हुआ गुडमिश्रित भाव ) ओर 8: 
रसवाले अमृतसम दिव्य अछौकिक एवं दधि, दुग्ध ओर 
घृतयुक्त यह नैवेध मेने आपके छिय तैयार किया हैं। 
में आपकी सेवा करनेवाली हूं। हे देव ! आप शक्कर है 
आपके छिय इनका समर्पण करती हूँ ।पुनराचमनम्‌/इससे 
आचमन कराती हुईं कहे कि भो सोम ! ( पावेती शहर) 
मुखकी शुद्धी करनंबाछा यह जल में छायी हूं, कृपया आप 
लीजिये। ओर इस जल्से भोजनोत्तरकाढिक आधमन 
कीजिय ! 'कस्तूरिका? इसस करोहलेन करावे और कहे 
कि, आप अपने करोद्तत्तनाथ कस्तूरी मिश्रित मुठ्यागिरिक 
घिस चन्दनकों ढीजिये। “नाछिकेरा इससे फछापण 
करे । ' पूमीफ॒र महरिंव्यम्‌! इस मन्त्से ताम्वूछ चढावे 


ब्रतानि | 





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| आइ कु 

प्रत्ाए््णएाल नमस्कारान।। मसहादव 
ज हे त गा द है ५ ध्‌ बिक 


हिरिण्यगर्मेति दक्षिणाम्‌ ॥ नीराजनम्‌ ॥ पुष्पाखलिम ॥ 
महाराज प्रीत्या पाप प्रणाशय ॥ अस्माक कुबतां पूर्जा साथ वासाधुयोजिताम्‌ ॥ ज्ञानतो- 
प्ञानतो वापि भबतों विहिता च या ॥ संपर्णयतु ता पूजा विश्वेशों विमलों भवान्‌ ॥ इति 
प्रार्थना ॥ देवदेव जगन्नाथ सर्वसौभाग्थदायक ॥ गशहीयां दोररूप॑ त्वाँ पुत्रपौत्रप्रवद्धनम्‌ ॥ इति 






६ ५, | 


दोरकप्रहणम्‌ ॥ सप्तसामोपगीतं त्व॑ धारयामि जगदुगुरो ॥ सूत्रम्नन्थिस्थितं नित्यं धारयामि 
स्थिरो भव ॥ इति दोरकवन्धनम॥ हर पापानि सवाणि ठुषटि कुछ दयानिधे॥ मसतन्नः सन्तुमा- 
कान्त दीघोयुःपुच्रदो भव ॥ इति जीणंदोरकोत्तारणम्‌ ॥ +३# वायनम---मण्डकान्वेष्टकान्वाथ 
सवृतान्दक्षि णायुताव॥ एकादशशतं कृत्वा ब्राह्मणाय कुटुम्बिने ॥ वेदशास्प्रमवीणाय दद्यात्सो- 
मस्य तष्ठये ॥ शड़रः प्रतिगह्मति शइरो वे ददाति च॥ शड्भरस्तारकोभाभ्यां शंकराय नमो 
नमः ॥ इति वायनम्‌ ॥ एवं या पूजन कुय्यात्सोमस्य खुखद॒स्य च॥ स्वोन्कामानवाप्नोति पृत्न- 
पौत्रेश्व मोदते ॥ इति पूजा ॥ अब कथा--श्रीकृष्ण उवाचासुनीन्द्रो लोमशो नाम मधुरायां गतः 
पुरा ॥ सोइचितो वछुदेवेन देवक्या च युधिष्ठिर ॥ १ ॥ उपविष्टः कथाः पुण्या। कथयित्वा सनो- 
रमा; ॥ ततः कथयितु भूयः कथामतां प्रचऋमे ॥ २॥ कंसेन ते ह॒ताः पुत्र जाताजाताः 
पुनः पुनः ॥ मृतवत्सा देवकि त्वं पुत्रदुःखेन इःखिता ॥ ३ ॥ यथा चन्द्रठुखी दीना बनूव नहुष- 
प्रिया ॥ पश्चाच्वीणेत्रता चेव बभूवाम्नतवत्सका ॥ ४॥ त्वमपि देवकि तथा भविष्यसि न 
संशयः ॥ देंवक्युवाच ॥ का सा चन्द्रसुखी बहन व्ूव नहुषधत्रिया॥५॥कि च चीण ब्र॒त॑ पुण्य 





'हिरण्यगर्भगभस्थम्‌ ? इस मन्प्रसे दुक्षिणा चढाव । प्राथना | 
कर । फिर नीराजन करके पुप्पाल्ललि समपेण एवं प्रद- | 
क्षिणा करे, बारबार प्रणाम करे। पीछे महादेव” , इन दो | 
मन्त्रोंसे प्राथना करे कि; दे महाराज ! हे महादेव | हम | 
हे ५ ट | करनेका फल कहते हैं कि, जो स्त्री पूर्वाक्त विधिसे पावती। 
वाले € इन सबके पापोंको स्वेथा नष्ट कीजिंय जाने था रत शॉकर देवों पूजन करती है वह पूर्णकाम एवं पुत्र 
अनजानसे जो आपका पूजा अनुष्ठान किया है वह यथाथ | कि आनर्द बा डी टोती * जन फिर 
किये हुएकी भांति पूर्ण हो ऐसी आप हमपर अलनुकम्पा |... का 2 हिये हे ' कस दर है कमर 
करें. क्योंकि, आप शुद्ध हैं और जिलोकीके पु हैं ।| कथा श्रवण करना चाहिये | अथ कया हर ऊृष्णचन्द्रजी 
: देवदेव ” इससे डोरा अपने बायें हाथ बांधनेके छिये | 'दाराज युधिष्ठिरस कहने लगे कि, पूहिले लोमश नामक 
लेवे कि, हे देवदेव ! है जगन्नाथ | हे सबको सौभाग्य सुख | *षि मथुरामे गये | उनका देवकी ऑर वसुद्ेवने प्रीति- 
दनेवाले | पत्नपोत्रा दि देनेवाल | आपके डोरवाली मूर्ति | पृवक पूजन किया ॥१॥ फिर वे आसनपर विराजमान हों 
को सदाके लिये हाथमें धारण करती हूं । 'सप्तसामोपष०? | नानाविध मनोहर पुण्य कथाओंको कहके इस कथाकों 
| सुनाने छगे जो अब में तुम्हारे सम्मुख कह रहा हूँ ॥२॥ 
हल 8 के | ह देवकि ! तुम्हारे बहुत पुत्र हुए, पर जैसे जेसे जो उत्पन्न 
भी स्तवन किया करते हैं, म इसीको हाथमें नित्य घारण | हुआ, वेसे ही उसे दुरात्मा केसने मार दिया। इस प्रकार 
: हर पापानि ” इससे जीणे डोरको खोछकर किसी पवित्र | हल हिना की आशिक गलडी भाप 5 जता 
जलाशयादिकमें छोड दे कि, हे दयाके निधान | आप मेरे | | + ड़ दा नहंपकी झ्री पेड 6 रहती के । 
सब पापोंको हरो, सुझपर सन्तुष्टता प्रगट करें। हे पावैती- | “९ उस चन्द्रसुखीने त्रत किया । उसके करनेसे जैसे उसके 
पते ! आप प्रसन्न होकर मुझे ऐसे ऐसे पुत्र दीजिये, जो | उंत्र नहीं मरे इससे वो अम्ृतवत्सा हो सुखियारी हो 
दीघायु और प्रभावशाली हों । फिर वायना दे । इसकी | 
यह विधि हैँ कि, घीके मण्डक (सालपूरा) अथवा वेष्टक | पुत्र भी अम्नत रहेंगे। उन्हें कोई भी नहीं मार सकेगा। 
जलेबियां ग्यारहसो इकट्ठटी करके दक्षिणा सहित किसी | 
कुटुम्बी, वेदशाख्रक्रे वेत्ता ब्राह्मणके लिय दान कर और | 


प्राथना करे कि, ' अनेन बाणकदानेन सोम: शक्कर: प्रीय- 
इत्यपि पाठ: । 


आपकी प्रीतिसे साधु या असाधु जो भी कुछ पूजा करने- 


इससे उसे बांधे । इसका यह अथ हे कि, हे जगदूगुरो ' 
सूत्रकी ग्रन्थियोंमें स्थित आपके इस स्वरूपको सात साम- 


करती हूं । आप इसी सूत्रकी ग्रन्थियोंमें विराजसान रहें । 


२ पुत्रि 


ताम! यह जो मेने कुटुम्बी ब्राह्मगके लिये वायना दिया 
हे, इससे पावती सहित शह्लुर भगवान्‌ प्रसन्न हों । देने 
और लेनवाल शह्गर भगवान दें | वो ही हम तुम दोसोंको 
पार करेंगे । उनके लिये नमस्कार हैं। इस प्रकार पूजन 


गयी ॥४॥ वेद्चे ही यदि तुम भी ब्रतको करोगी तो तुम्हारे 


यह सेशय करनेवाला कथन नहीं है । देवकीजी बोली कि 
हे त्रह्मन्‌ ! वह नहुष एवं उसकी प्यारी कौन घन्द्रमुखी 
थी ? ॥०।॥। उसने कौन सा पवित्र ब्रत किया था जिससे 





तथा सम्ततिवर्धनम्‌ ॥ सपत्नीदर्पदलन सोभाग्यारोग्यदं विभो ॥ ६९॥ लोम श उवाच ॥ अयो- 
ध्यायां पुरा राजा नहुषी नाम विश्वुतः ॥ तस्यासीदुपसंपतन्ना देवी चन्द्रसुखी प्रिया ॥ ७ ॥ तथा 
तस्थेव नगरे विष्णुगुप्तोई्मव ह्विजः ॥ आसीदुगुणवती तस्थ पत्नी भद्रसमुखी तथा॥ <॥ तथो- 
रासीदातिप्रीतिः स्पृहणीया परस्परम्‌॥ अथ ते द्वे' अपि सख्यों स्नानाथे सरयूजले ॥ ९॥ प्राप्त 
प्राप्ताश्व तत्नेव बहचो वे नगराड्रनए ॥ ताः स्वात्वा मण्डल चह्रुस्तन्मध्येध्व्यक्तरूपिणम्‌ ॥ १० ॥ 
लेखयित्वा शिवं शान्तमुमया सह शैकरम्‌ ॥ गन्धपुष्पाक्ष तेमक्त्या पूजयित्वा यथाविधि॥११॥ 
प्रणम्य गन्तुकामास्ताः पम्च्छत॒रुभे ख्ियों॥ आर्याः किमेतत्क्रियते किंनाम ब्रतमीह्शम्‌ 
॥ १२॥ ता उल्चुः शंकरोःस्मानिः पावत्या सह पूजितः ॥ बद्धा सूंत्रमर्थ तन्तें शिवस्यात्मा 
निवेदितः ॥ १३॥ धघारणीयमिद॑ं तावद्यावत्मार्णवेधारणम्‌ ॥ मुक्ताभरणक॑ नाम ब्रतं सब्तान- 
वर्धनम्‌॥ १४ ॥ अस्मान्रिः क्रियते सख्यों खुखलोभाग्यदायकम्‌॥ तासां तद्गचनं श्रुत्वा 
सख्यो ते चापि देवकि॥ १५ ॥ कृत्वा च समय॑ तत्र बड़ा दोभ्यी सुदोरकम्‌॥ तसस्ताश्व गहं 
जग्मु स्वसखीमभिः समावृताः ॥ १६॥ कालेन महता तस्यास्तद्वतं विस्मृतं शुभम ॥ चद्ध- 
मुख्याः प्रमत्ताया विस्मृतः स ठु दोरकः ॥ १७ ॥ भद्गसुख्यास्तथा भद्दे विस्मत॑ स्वमेव तत॥ 








मृते केश्विदहोरात्रेः सा बभूव प्लवड्मी ॥ १८ ॥ भद्राख्या कुक्कुटी जाता वब्रतमड़ाच्छुभानने॥ 
कल अर पवन लेक न पा मम 


पुत्रसुख होता है। हे विभो | आप उसको कहें जो सप- 
त्न्योंके दृपको शान्त करनेवाढा है सौभाग्य एवम्‌ आरो- 
ग्यका दान करनेवाला है ॥६॥ छोमझमुनि बोछे कि, 
अयोध्यापुरीमें परमविख्यात एक नहुष राजा हुआ था; 
उसको प्यारी सुन्दर चन्द्रमुखी मुख्य रानी थी ॥७॥ 
उसकी राजधानीसें एक विष्णुगुप्त नामका ब्राह्मण रहता 
था। उसके दो स्त्रियां थीं एकका नाम गुणवती एवं दूसरी 
का नाम भरद्रमुखी था ॥८॥ इन दोनोंका जेसे सपत्नियों 
का परस्परमें वेमनस्य रहता है वेसा नहीं था, किन्तु बहुत 
ही प्रशंसनीय प्रेम था । वे दोनों सखियोंकी भांति समान 
करनेको सरयू तटपर गयीं ॥९॥ उस सप्तय वहां और 
भी बहुतसी रित्रयाँ स्नानकेलिये आगयीं । उन सब रित्रयों 
ने स्नान करके सरयूके कूछपर ही समेडछ बनाया।उस 
मेडछक बीच पावेती सहित अव्यक्तात्मा तथा शान्त शंकर 
का महादेवीके स्वरूप लिखाकर गन्ध पुष्प और अक्षतादि 
जो पूजा सामग्री ढायी थीं उससे यथाविधि प्रेमपूर्वक 
पूजन किया ॥ १०॥ ११॥ फिर प्रणामकर जब वे अपने 
घरकी ओर जानेको तैयार हुई तो उन्हें गुणवती और भद्र- 
मुखी ज्ाह्मणियोंने पूछा कि, हे आयांओ ! यह तुमने क्या 
किया ? एस अतका क्‍या नाम हैं ! क्‍या माहात्म्य है? 
॥१९| उन ख्त्रियोंने कहा कि, हमने पार्वती और महेश्वर 
श्न दोनोंका यह पूजन किया है. इस डोरमें वे स्वयं रहते 
॥+ शीश, 8." कक के 

. अतः इसने इस अपने हाथमें बांध अपनेको शंकरके 
भेट कर दिया है| १३॥ यह डोरा जब तक प्राण रहें 

“उन सर मआ चाहिये। इस ब्तका नाम मुक्ताभरण 

रपक करनेस सन्तान घुख बढ़ता है ॥| १४॥ है सहे- 


 केसलो कप प7 उतर 7777 ट्वेअपिसख्यौ वें इति पचुरः पाठ: 


लियो ! हम इस ब्रतको प्रतिवर्ष किया करती हैं; क्योंकि 
यह सुख ओर सोौभाग्यका देनेवालढू। है । छोमशमुनि बोढे 
कि हे देवकि | उन स्थियोंके इन वचनोंको सुनकर उन 
दोनों जाह्मणियोंने भी संकल्प करके || १५॥ ब्त किया 
और बेसे ही पूजनकर अपनी भुजाओंमें बसे ही डोरे बांध 
अपने घरकी राह ली और सब ख्रियाँ सहेलियोंके साथ 
अपने अपने घरकी ओर वापिस चली आयी ॥१६॥ पीछे 
बहुल समय बीतनपर रानी चन्द्रमुखीको वह ब्रत करना 
याद न रहा, क्योंकि, वह राजसम्पत्तिके सुखसे प्रमत्त हो 
गयी थी। हे भद्रे | जो उस चन्द्रमुखीकी बाहुमें डोराबधा 
हुआ था वह भी उसके प्रमाद्से कहीं गिर गया । १७ | 
जैसे रानी चन्द्रमुखीका डोरा गिर गया और त्रत करने 
की याद नहीं रही वेसे ही हे भद्रे | भद्रमुखी आ्राह्मणीको 
भी ब्रतकी याद नहीं रही ब्रत करनेका जो नियम किया 
था डोरको जीवनपयन्त धारण करनेकी जो प्रतिज्ञा की 
थी वे सब भद्रमुखीकी विस्मपृत हो गये। फिर कुछ दिन 
बीतनेपर चन्द्रमुखी मरकर बांदरी बनी ॥॥ १८ ॥ हे शुभा- 
नने ! ब्रतभड़ करनेके दोषसे भद्रमुखी कुक्कुटी हुयी | पर 
पहिछे जन्मके किये हुएको याद्‌ करके साथ करती रहीं 
यानी उन दोनोंके वानर और कुक्कुटकी योनिम्मं जन्म 
लेनेपर भी पहिले जो ब्रत किया था उस पुण्यके प्रभावसे 
पूर्ववृत्तान्त विस्मृत नहीं हुआ, दूसरें जन्ममें भी स्मरण 
होगया कि, हमारे प्रमाद्से यह अनथ हो गया है, इससे 
हम इन योनियॉमें पड़ी हैं । इस प्रकार यादगारी 
होनेस वे दोनों उस दोषकी निव्ृत्ति करनेकी चेष्टा 
करती हुयी भी कुछ न कर सकी, केवछ मिलकर मनमसें 


। सत्र संधिराषे: । २ बरख्तिय इति बहुघु पुस्तकेषु पाठः। तत्र बरखीशतीत्यथेः । 


थू 8, कम कैप ५४७४, (की 4 पल 88 80 05, अल नै । ५५ हा 
ब्रतानि 4 ३ ०४६ ० १५४५ ! शर छत। १ ७ कफ 












(मदावादानदनिधधदामातनादा मा तिल न नो न लत धन न अत मर मद माल क जद भा मापा ा४०७७७७७७७एए७७७७७७७४७४७४७७७//॥/॥/॥//////"/"/श/शआआ/शआआआआआआआआआ॥॥॥॥एएश9७॥/७/॥/७॥॥७७॥७॥७॥७७॥७/७ए/"ए/"/"/"/"श/श//आआआआ//////श/आआआआआआखआखआखआ आ ख आआ आखआ आ आ आआआआआआआखख्‌आआ एन 





२ 


| 


संभूय भयः समय मार्ककृत चक्कतः सदा ॥ १९ ॥ कालेन पश्चर्ता मराप्ते सखीभावात्सहेव ते ॥ 
अदेवमातके देशे जाते गोकुलसंत्तके ॥ २० ॥ बाह्मणी ब्राह्मणी जाता क्षत्रिया क्षत्रिया तथा ॥ 










राज्ी जाया बसूवाथ प्रथ्वीनाथस्य वछना ॥२१॥ इंश्वरी नप्म विख्याता तन 
पुरो ॥नाम्ना भद्रमुखी यासीद्षणानाम साभवत्‌ ॥ २२ ॥ अश्निमीटस्य सा दत्ता पित्रा तस्य 
पुरोधसः ॥ अतीव वलभा चासीद्भधवणा भूषणप्रिया ॥ २३ ॥ भषिता भूषणवरे रूपेणालंकृता 
सस्‍्वयम्‌॥ तस्यां बभूदुरष्टो च पुत्राः सर्वशुणान्विता/२४॥मात्वदूपसंपन्नाः पितवद्धमेशीलिन,। 
सख्यों ते चेव तद्द्व जाते जातिस्मरे किल ॥ २५॥ पुननिरन्तरा प्रीतिस्तयोरासीद्यथापुरा ॥ 
काले बहुतिथे याते त्यक्ताशा त्यक्तयोवना ॥ २६॥ मध्ये वयसि राज्ञी सा पुत्रमेकमजीजनत)]। 
इश्वरी रोगिणं मूक प्ञाहीन॑ च विस्व॒रम्‌ ॥ २७ ॥ ताद्शो$पि महाभागें मृतोन्‍्सों नववार्षिकः ॥ 
ततस्ताँ भूषणा द्रष्ट्मीवरों पुउदु!/खिताम्‌ ॥२८॥ सखिभावादतिस्तरेहाद पुत्रेः स्वेः परिवारिता ॥ 
अमुक्ताभरणा भद्रा स्वरूपेणेव भूषिता॥२९॥ ( सा हि भद्रा द्विजस्यथाभूदभाय्या भुषणनामिका ॥ 
पुरोहितस्य कालेन कुक्कुटी बहुपुत्रिणी )॥ तां दृष्ठा तादशी भव्याों पजज्वालेश्वरी रुषा ॥रे०॥ 
ततो गहं प्रेषयित्वा बाह्मणीं तीत्रमत्सरा ॥ चिन्तयामास सा राक्षी तस्याः पुत्रवर्ध मति ॥३१॥ 
निश्िित्य चेतसा ऋ्‌रा घातयामास तत्छुतान ॥ कास्मिथ्विदिवसे सा च तानाहय ग्रह प्रति॥३२॥ 
भोजनस्य मिषात्तेषामन्नमध्ये विष॑ ददो | तत्परा दृष्ठवददना झुकत्वान्न गरहमागताः ॥ हेरे ॥ 


सामथ्योद्रतराजस्थ मातुन निधन गताः ॥ पुनस्तान प्रेष्यामास यम्तुनाया द्वदं त्रति ॥ २४ ॥ 


पश्चात्ताप और भगवान्‌ शद्भुर॒का ध्यान एवम्‌ उपवासकरती | 


रहीं । वे दोनों वानरी और मुरगी होनेपरभी सहेदियोंकी 


शरीरको त्यागा फिर वे दोनोंही जहां नद्दी आदि बृहज्जरा- 


शय था, ऐसे गोकुछ देशमें उत्पन्न हुईं ॥ २० ॥ ब्राह्मणी | 


भद्रमुखी बाह्मणी हुईं, क्षत्राणी चन्द्रमुखी क्षत्रिया हुई। | सुन्दर था जिससे बहुतही मनोरम दीखती थी या यह भाव 


रानी इस जन्ममें भी राजाकी प्यारी खत्री हुईं॥ २१ ॥ 
इनमें चन्द्रमुखीका इस जन्ममें इंश्वरी नाम हुआ | जो पृ्े- 
जन्‍ममें भद्गमुखी ब्राह्मणी थी वह इस जन्मे भूषणानामस- 
वाली हुईं ॥| २२ ॥ इसक पिताने इसका विवाह अप्निमीढ- 


इस भूषणाके सर्व गुण सम्पन्न आठ पुत्र हुये ॥ २४ ॥| जो 


अपनी मशताके समान सुन्दर और पिताके समान धम्मे- | 
निष्ठ हुये | इन दोनों रानी इंश्वरी और तब्राह्मणी ( भूषणा ) , 


को इस जन्ममें भी पूर्व जन्मोंका स्मरणरहा, इससे ये दोनों 
सहलियां रहीं ।| २५ | इन्होंका पारस्परिक प्रेमणी सदा 
अटल बना रहा, जसा कि, पहले बिय्यगूयोनिस था। 
बहुत समय वीतनेपर मध्यमावस्थामें भी जब इंश्वरीके कोई 
पुत्र नहीं हुआ तो इसने सनन्‍वान होनेकी आशा छोड दी | 
यौवन भी उसका गिरगया । पीछे इंश्वरीके एक पुत्रहुआ | 
वहभी सदा रोगपीडित मूक और मूढ विस्वर था ॥ २६॥ 
॥ २७ | हे महाभागे ! ऐसा सी नव वर्षका होतेही मर 











गया । इसके बाद पृत्रोंके अभावसे दुखित इंश्वरीकों देखने 


रस | के छिये ॥ २८ ॥ दुखित हुईं भमूषणा सखीभावके कारण 
भांति रहीं ॥| १९॥ तथा समयपर दोनोंने एक साथ | 


तथा अतिप्रेमके कारण समवेदना प्रकटकरने अपने पुत्रोंको 
साथ लेकर चढी आई । रूषणाने उस समय मोदियोंके 
आशभूषण नहीं घारण कर रख थे, रूप ही इसका एसा 


भी है कि, सखीके दुःखके समयसें भी आभरण नहीं त्यागे 


| और स्वभावसे भी रमणीय थी ॥ २९॥ ( और इस प्रस- 


हुसे “साहि भद्रा” यह इलोक मूलपुस्तकोंमें प्रायः सिलता 


है ढ- | हैं, पर पक्षिप्त, एवं प्रन्थके पूर्वांपर कथनको दूषित करता 
नासके पुरोहितक साथ कर दिया | यह भी उस राजाके | हे। अतः परित्याज्य है। उसका अर्थ यह है कि; जो भद्रा 
पुरोहित अग्निमीढकी परम वल्लभा हुईं। इस भूषणा | 
को भूषण घारण करनेका बहुत चाव था ॥ २३ ॥ इससे | 
सदैव यह सुन्दर अछड्ढारोंस अलंकृतही रहा करती थी। | 
| उस भूषणाकों देखकर क्रोवसे भीतर ही भीतर प्रज्वलित 


पूबजन्ममें मुरगी थी उसीका दुसरे जनन्‍्ममें ब्राह्मणकुछमें 
जन्म लेनेपर पुरोहितस विवाह हुआ । इसका नाम भूषणा 
हुआ । यह बहुतसे पुत्रोंवाली थी ) इश्वरी अपने समीपम 


हो गयी ।॥। ३० ॥ क्रोधसे ही उसे अपने घरको छोटजाने 
के लिय कहकर उस भूषणाके पुत्रोंके मरानेका बिचार 
करने रूगी ॥ ३१ ॥ दुष्टात्मा इंश्वरीने उसके पुत्रोंको मरा- 
नेका दृह निश्चयकरके उसके पुत्रोंकोी मरवाया। किसी 
दिन उनको अपने महरूमें बुछझ्वाकर || ३२ ॥ भोजनकछे 
बहाने अज्ञमें विंष खिला दिया । भूषणाके पुत्र भोजनकर 
प्रसन्नयुखहुए अपने घरको छोट आये ॥ ३३ ॥ भूषणाने 
इस जन्ममें पूब परिज्ञात मुक्ताभरण ब्रतका परित्याग नहीं 
किया था, अतः मालाक ब्रवराजक प्रभावसे वे मझुत्युको 


प्राप्त नहीं हुए। फिर उसने यमुनाके हृदकों मिजवायां 
१ आयतेति शेषः । २ अयमधिकशछोकः । 





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तच्छिक्षिता ह॒दे भृत्याः पातयन्ति सम पृत्रकान॥जाह॒दुन्नाउमवत्सा ठु. यछुना तत्मभावतशरे५॥ 
पुनः सा पापचित्ता स्वाब्‌ भत्यानाहूय यत्नतः ॥ शस्रः कृल्वाथ तानूचे वधस्तर्षा विधीयताश 
॥३ क्षानथेन्युकत्वा बन गत्वा तेः साक॑ दृष्टबुद्धयः।खद्जेस्तीक्ष्णवेधं तषाँ क॒ठु ते पापवृत्तय:॥३०॥ 
प्रहारात्रिष्दुरं चकुस्तत्पुत्रा हृष्टभानसाः ॥ तेषां प्रहारास्तृणवज्ञाता माठुः मभावतः ॥ ३८॥ 
एवं राज्ञी बहुतराठपायाव्‌ कृतवत्यथ ॥ हंताहताश्र त्‌ कु पुनजावन्‍््यनामयाई ॥ ३९॥ 
तदद्भततरं दृष्ठा सखीमाहूय भूषणाम्‌ ॥ उपवेश्यासने श्रेष्ठ बहुमानपुरःसरम्‌ ॥ ४० ॥ अपृच्छ- 
द्विस्मयाविष्टा राजी सा मृतवत्सका।बूहि तथ्यं महाभागे कि त्वया खुकृत॑ क्ृतम|।४१॥दान ब्रत 
तपो वापि शुश्रूषणसुपोषणम्‌ ॥ येन ते निहत पुत्राः पुनर्जीबन्त्यनामयाः ॥ ४२ ॥ तथा हि 
बहुपुत्रा च जीवद्वत्सा गुभानने ॥ अमुक्तामरणा नित्य भरतुश्रेतस्थवस्थिता ॥ ४३ ॥ अतीष 
शोभसे भत्रे विद्यद्धमात्यये यथा॥नषणोवाच ॥ श्णुदेवि प्रवक्ष्यामि जन्मान्तरविचेष्ठटितम॥४५ 
कि तद्धि विस्पृतं सर्वभयोभ्यायां कृत हि यत्‌ ॥ आवाब्यां ब्रतवेकल्य प्रमताभ्यां वरानने॥४५॥ 
येन त्वे प्लगगी जाता जाताहं कुक्कुटी तथा ॥ तथापि ब्रतवेकल्यं त्वया चापल्यतः कृतम्‌ 
॥ ४६ ॥ मया तु सर्वभावेन चेतसाध्याय शंकरम्‌ ॥ तियेग्योन्यछ॒तापेन मनोजृत्या ह्ाल॒ष्ठितम 
।४७॥ एतद्धि कारणं भद्दे नान्यत्किचित्करोम्यहम्‌ ॥ लोमश उवाच ॥ इत्याकरण््य बचः स्मृत्वा 
पृर्वजन्मविचेष्ठटितम्‌ ॥ ४८ ॥ इंश्वरी च तया साद्ध पुनः सम्यकू चकार ह ॥ ब्रतस्यास्य प्रभा- 
वेण पृत्रपौत्रादिसंभवम्‌ 0 ४९॥ भुक्‍त्वा तु सोख्यमतुल मृता शिवपुरं गता ॥ तस्मात्त्वमपि 
कल्याणि ब्रतमेतत्समाचर ॥ ५० ॥ आरब्पेस्मिन्त्रते दिव्यें जीवत्पुत्रा भविष्यसि ॥ देव- 





॥ ३४ ॥ रानीके सिखाय नीच नौकर बालढूकोंको यमुना 
जीके जलमें पटकते थे, पर उनकी मात्ताके किए हुये ब्रतके 
प्रभावस यमुनाजीका जछ उन बाछकोंके जानुके बरावर 
होगया ॥| ३५ ॥ फिर उसके मनमें उनके सरानेकी आईं, 
प्रयत्नके साथ अपने विश्वासी नौकरोंको बुछाकर कहाकि 
शाख्रोंस उनका बध कर डालो ॥ ३६ ॥ नौकर दुबुद्धि थे 
ही; झट कह दिया कि, अच्छी वात है मार देंगे, फिर वे 
मारनेक इरादेवाले पेनी तलवारोंसे उन्हें मारनेके करिए 
उनके साथ बन जाकर |। ३७॥ निष्टर प्रहार करने छगे। 
पर वे पत्र प्रसन्नही रहे । माताके प्रभावसे वे प्रहार तिन- 
काके बराबर हो गये ॥ ३८ ॥ इस प्रकार रानीने उप्त पुत्रों 
को मरवानेक लिए बड़े २ उपाय किए परन्तु वे बारूक 
फिर जिन्दे हो जाते थे ओर कोई कष्ट भी उन्हें नहीं होता 
या || ३९ ॥ इस आश्चय को देख उसने अपनी भूषणा 
सखी बुछाई ओर बहुमान पूवेक श्रेष्ठ आखनपर बिठा 
॥ ४० ॥ पूछने छगी; क्योंकि, इसके मनमें भारी विश्मय 
था, इसके बालक मारनेपरमी जिन्दे रहते थे, तथा अपने 
बालक जिलानेकी कोशिश करनेपर भी नहीं जिये थे । 
है महाभागे ! आपने कौनसा सुकृृत किया हे! यथार्थ 
अपस कहिये ॥ ४१ | ऐसा कोई दान, ब्रत, तप, शुश्चषषण 
और उपोषण है जिससे आपके पुत्र मरेभी जी जाते हर 
जम उन्हें कोई कप्ठभी नहीं होता | ४२ ॥ हे शुभानने | 
परम वहुत है और सब जीवितभी हैं । तू कमी आभू 
ष़्ों की स्यात् नहीं ऋरत्ती तथा पतिके भी मनसें बिराज़ी 





रहती है।। ४३॥ है भद्दे | आप अत्यन्त सुन्दरी लगती 
है, जस बरसात नीले २ बहलोंमें बिजड़ी अच्छी छगती 
है। यह सुन भूषणा बोली क्रि; हे देवि ! में जन्मान्तरकी 
बातें कहती हूं | तू सावधान होकर सुन॥ ४५॥ क्या 
उन्त सब बातोंको भूछगयी जो आयोध्यामें की थी। हें 
वरानने ! हम तुम दोनोंने प्रमत्त हो त्रत विगाड दिया था 
|| ४५ ॥| उस दोषसे तुम दूसर जन्ममें वानरी और में 
मुरगी हुईं | तुम वानरी थी, इसलिये अपनी स्वाभाविक 
चपछताके कारण उस जन्ममें भी तुमसे यह ब्रत यथा 
नहीं हो सका ॥ ४६ | किन्तु मैंने नही छोडा मनमें शकर 
का ध्यान किया ओर पश्चात्ताप भी किया कि, हाय ! कब 
इस तिय्यग्योनिसे छूँटू और सगबानकी सेवा करूं। ऐसे 
सनमें, पूर्वजन्ममें त्रत विकछता करनेका और उस जन्ममें 
भी शक र भगवानका यथाथे पूजन न कर सकनेका अलु- 
ताप प्रकट किया था | ४७॥ - और कुछभी मेरे इस सुख- 
सम्पत्तिकी स्थिरतामें कारण नहीं है। छोमशसुनि बोलेकि 
इस प्रकार जब भूषणाने कहा, उन बचनोंसे इश्वरीने अपने 
पूवज़न्मकी चेष्ठाका स्मरण किया।| ४८।॥ ईइवरीने भूष- 
एके साथ विधिवत्‌ मुक्ताभरणब्रत किया । उसके प्रभावसे 
उसकेभी बहुतसे पुत्र पोत्र होगए ॥ ४९॥ उनके अतुल 
सुखको भोग मरके कैछाश पहुंच गईं । इसलहिए हें 
कल्याणि ! तुमभी इस ब्रवकों करो ॥५०॥ इस दिव्यत्रतके 
क्रनेसे तुमारेभी पुत्र जीते रहेंगे । देवकी बोढ़ी कि, 





धाषाटीकासमेलः । ( २७७ ) 
क्युवाच ॥ बह्न्न ख्याहि मे सम्या्ाममेसत्दुडतइम्‌ ॥ ५१॥ सम्तानवृद्धिकरणं शिवलोक- 
स्थितिभदम ।| लोगश उवाच ॥ भद्रे माद्रपदे मासि सप्तम्यां साडेलाशयें॥ ५२॥ स्वात्वा 
शिव मण्डल लेखयित्वा तथाम्बिकाम्‌ ॥ मकत्या संपूज्य समय॑ कु्याद्रद्धा करे गुणम्‌ ॥ ५३ ॥ 
यावज्जीवं मयात्मा तु शिवस्य विनिवेदितः ॥ इत्येब॑ समय॑ कृत्वा ततःप्रदृति दोरकम्‌ | ५४:॥। 
सौवणण राजतं वापि सौत्र वा भारयेत्करे ।। मण्डकान्वेष्टकान ददच्यान्मासे पश्लेड्थवाब्दके ॥ ५५ ॥ 





00222: ४2 046६, 


अनिल 





स्वयं तांश्रेव भुजजीत व्रतमडद्रमयाच्छुमे ॥| अतिमासं तु सप्तम्षां शुक्ल पक्षे 


 आभालिलिका. 


विशेषत३) | ५६ ॥! 


कुयदिवं ब्र॒त॑ मद्रे बषोन्तेशपि ठ॒ देवाके ॥ पारित सुद्विकां चेब हेमी रूप्यां स्वशक्तितः ॥ ५७॥ 
ताम्रपात्रीपरे स्थाप्य बराह्मगाथ ।नवेदयत्‌ ॥। आचायाय विशेषेण सुब॒गस्यांगुलीयकम्‌ ॥ ५८ ॥। 

९ आये, आप कप के आर कु 
फृप्पकंकम सिन्दूरताम्बूलाखनखूत्रके: ॥ खुबासनी पूजयच्च ब्रतसंपूरतिहितवे ॥ ५५।॥ सहाय 


शक 


तृतीया ॥ एवं तत्पारयित्वा ठ॒ ब्रतं सन्‍ततिवर्द्धनम्‌ ॥ सर्वेपापविनिर्ेक्ता खुकत्वा सौख्यमनाम- 


यम्‌ ॥ ६० ॥ सनन्‍्तान दद्धेयित्वा 
ब्रतम्‌ ॥ ६१॥ कुछ देवाके यत्न 


करे ७ 


श्रेष्ठ स्तत्रेैवान्तरधीयत ॥ ६२ ॥ चकार सर्व य॒त्नेन यदुक्त तेन 


च शिवलोके महीयते ॥ एतते सर्वमाख्यातमाख्यानसहितं 
न जीवत्पुत्रा मविष्यप्ति ॥ कृष्ण उदाच | इत्युकत्वा तु सुनि- 


घीमता ॥ ब्रतस्थास्य भभा- 


क्र 


बेण देवकी मामजीजनत्‌ ॥ 5३ ॥ तस्मात्पार्थ नरें: कार्य ख्लीनिः कार्य विशेषतः । ब्रतं पाप- 


प्रशमन खुखसन्ततिवद्धनम्‌ )। *ड 


सहित सो5पि पापेः 


॥ इद या श्वणुयाद्ध कत्या यब्तत्मलिपादयेत्‌। वब्रतमाख्यान- 


कक #“ 5. ३ 


प्रमुच्यते ॥ ५५ ॥ आख्यानक ब्रतमिई सुखमोक्षकामा या स्त्री चरिष्यति 


शिवं हृदये निधाय | हुग्खं विहाय बहुशो गतकल्मषोवा सा ख्री बताद्धवाते शोभनजीव- 


बत्पा ॥ ६६ ॥ इति हेमादो मविष्ये छुकानरणससशाकर 
स्‍्प्ता॥९६॥ इति हेमाद्रो भविष्ये उकामणइममझन संपर्णभू॥__|“$“$|_|_ 


है?५ 


संपूणम्‌ ॥ 





हे अह्मन ' तुम इस सुखकारी इंकर भगवानके ब्रतका | ते र 
| ब्रतको करती हें वह सब पापोंसे निम्मुक्त होकर निः्कण्टक 


निरूपण करो | ५१॥ जिस ब्रतके करनेस पुत्र पोत्रादि 


सनन्‍्तान सुख और केढासका निवास मिलता हैं। लोमश- | 
मुनि बोले कि हे भद्दे ! भादवा (सुदि ) सप्तमीके दिन 
जलाशयमें ॥५२॥ स्नान करके कूछपर एक मण्डल | 
लिख । सके मध्यमें पावंती और महादेवजी इन दोनोंके | 


आकारका उलेख करे | फिर घ्थापना करे | भक्तिसे सम्यकू 


नियम यह करना चाहिये कि, मेने जीवन पय्यैन्‍त अपनी 


मण्डक वेंष्टकोंका भोजन करे। हे शुमें ! अन्यथा ब्रत भंग 


होता हे। प्रतिपक्ष यह व्रत करना चाहिय, किंतु शुद्धपक्षमे | 
सप्तमीके दिन इस ब्रतको अवश्य करे ॥५६॥हे भद्र देवकि! | 
वर्ष बीतनेपर ब्रतके अन्तमें पारणाके समय अपनी शक्ति | 
अनुरूप सुबर्ण या रजतकी जँगूठी वनवा ॥५७॥ उसेताम- | 
डीमें घर ब्राह्मणके लिये यदि सम्भव हो तो भाचायके लिये | 


सुवर्णकी ही अँगूठी समपंण करे ॥५८॥ उस अँगूठीकेसाथ 
पुष्प, कुंकुम, सिन्दुर, ताम्बूठ, अखन ओर खुबर्ण चान्दी 
या सूतके डोरेका दान करना म्वाहिये । ब्र॒तकी पृतिक लिय 





विधिसे सनन्‍्तवति सुखके बढानेवाले इस मुक्ताभरण नामक 


सोभाग्यसुखके राज्यको भोगती हैं। ६० ॥| इस लोकमें 
सन्तानकी वृद्धिकेआनन्दका छाम करती हैं और परलोकमें 
महादेवजीके पदमें प्रतिष्ठा प्राप्त करती है। एसे मेने यह सब 
कथा तथा विधि समेत चतका माहात्म्य तुमारे सम्मुख बर्णन 


| दिया ॥६१॥ अब हे देवकि ! तुम विधिवत्‌ इस मुक्ताभरण 
पूजा करे, नियम करके अपने हाथमें डोरा घारण करे॥५३॥ | 
| ( राजा युधिष्टिरस ) बोले कि हे राजन्‌ ! मुनिवर छोमश 
आत्माको महादेवजीके अपेण करदिया हैं; इसप्रकारभ्रतिज्ञा | 
करके उसी समयसे ॥ ५४ 8 डोरेको चाहे वो सुवणका हो' | 
चांदीका हो या सूतका ही हो; पावतीशड्डर स्वरूप सम- | 
झती हुई हाथमें धारण करे। फिर श्रतिमास या अपिपक्ष 
अथवा प्रतिबष सप्तमीके दिन मण्डक और वेष्टकोंका (माल- | 
पूए और जलेबियोंका ) दान करे ॥ ५५ ॥ आपभी उनही | 
| सनन्‍्तानका बढानेवालछा हैं ॥ ६४ ॥ जो भक्तिस्त इस ब्रतको 


ब्रतको करो जिससे जीवत्पुत्रा हो जाओगी। श्रीकृष्ण चन्द्र 


महात्मा इतना कहकर वहांही अन्तधांन हो गये ॥॥ ६२॥ 
जिस विधिसे त्रत करनेके लिय महात्मा लोमशमुनिन कहा 
था वद्नुसारही हमारी माता देवकीजीने यह बत्रत छिया। 
उस ब्रतके प्रभावस देवकीजीके हम पुत्र चिरायु हुए॥६३॥ 
हे पाथ | इससे यह ब्रत पुरुषों और विशेष करके ख्ियोंको 
करना चाहिय। यह पापोंका विनाशक और छुख एवे 


पी न 5३३ ७... कप 

करता हे एवं जो इस ब्रतकों करनेका उपदेंश करता है 
दे, कक कक 

कथा सुनाता हैं और विधि बताता हैं वह भी सव पापोंसे 
छूट जाता है | ६५ ॥ ऐहिक एवं पारठोौकिक सुख ओर 
मोक्ष पदकी कामना रखती हुई जो ख्री अन्त-करणमें महे- 
श्वर सगवानका ध्यान घर इस बतको करके कथाका 


| श्रवण करती है, वह इसछोकमें जो दुःख होते हू उन सब 


दुःखोंसे निस्दीण हो चिरजीबी पुत्रोंवाली अवश्यही होती 
है ॥ ६६ ॥ यह देमाद्विमं भविष्य पुराणस कहागया मुक्ता 


सुवासिनीको भी पूजना चाहिये ॥५९। जो स्त्री इस पूर्वोक्त | भरण सप्तमीका ब्रत पूरा हुआ ॥॥ 


ह/मआवा्नमकाभ्भान++न नम ध्जनजनज बम. ३३३७७७७७एछ जाए: 
परशाभाभ अिकााओ, 





बिलवशाख!प्रवेशादि । 
अथ आखिनशुक्कसतम्यां बिल्वशाखाप्रवेशपूजनादि ॥ अन्र च्‌ सप्तमी उदयव्यापिनी 
प्राह्मा--युगाया वर्षवृद्धिश्व सतमी पावतीभिया ॥ रवेशदयसीक्षन्ते न तत्र (तिथियुग्मता ॥ इति 
प्रतापमातंण्डे भाविष्योक्तेः ॥ वषदाद्वि--जन्मा[तोथेः ॥ 
सरस्वतीपूजाविधिः ॥ ह 
तत्रेव मूलनक्षत्र पुस्तकस्थापनझुक्त रुद्रयामले--मूलऋश्ले सुराधीश पूजनीया सरस्वती॥ 
पूजयेत्म॒त्यहं देव यावद्वेष्णव मुक्षकम्‌ ॥ नाध्यापयेन्न च लिखेन्नाधीयीत कदाचन ॥ पुस्तके 
स्थापिते देव विद्याकामो द्विजोचमः ॥ अहं भद्रा च भद्राहंनावयोरन्तर क्चित्‌ ॥ सर्वसिद्धि 





विल्वशाखा प्रवेश पूजनादि-भाश्विन शुद्धा सप्तमीको 
विल्र क्लाखाका प्रवेश और पूजवादिक होते हैं।इसमेंडद्य- 
व्यापिनी सप्तमी लेनी चाहिये | क्योंकि, अताप माहेण्डमें 
भविष्य पुराणका बचन है कि युगादि तिथि, वर्षबृद्धि और 
पावेतीकी प्यारी सप्तमी ये सूर्यके उद्यकी ग्रदीक्षा करवीहें । 
इनमें तिथियोंकी युग्मवा नहींहोती यानी कथितयुग्मवाक्यसे 
प्रथम नहीं ठेची चाहिये | केवछ उदय कारूमे सप्तमीका 
योगही देखना चाहिये । वर्षवृद्धि जन्मतिथिको कहते हैं ॥ 


१-इस विषयपर कुछ निणयसिन्धुसे आवश्यकीय उद्धुत करते हैं- 
गोड निबन्ध प्रन्थमें देवी पुराणुसे कहा गयाहे कि, ज्येशनक्तृत्र युक्त 
पष्ठीके दिन सामको विल्वकों नोता दे आना; तथा मूलयुक्ता सप्तमीके 
दिन उसकी शाखा ले आनी चाहिये। पूव्वाषाढायुक्त अध्मीको पूजा 
होम ओर वबत आदि करने चाहिय।|उत्तराषादासेयुक्त नवमीको शिवाक्रा 
पूजन करना चाहिये। श्रवृणयुक्त दशमीके दिन प्रणाम करके विसजन 
कर देवा बाहिये। कालिका पुराणमें लिखा हुआ हे कि षष्ठीकों बिल्व 
शाखा और फल्ञोंमें देवीका बोधन करें एवम सात्तेंके दिन घिल्वशाखाको 
घरपर लाकर उसका पूजन करता चाहिये । फिर अष्टमीके दिन विशेष 
करके पूजा करे । उसी पहानिशामें जागरण और बलिदान भी होना 
चाहिये एबम्‌ नवमीको विशेष करके बलिदान करना चाहिये | दशमीके 
दिन शरदकालके उत्सव जो धूलि ओर कीचके पटकने हैं उनसे तथा 
क्रीडा कोतुक ओर मज्ञलेंसे विसजन कर देना चाहिये।यहां सब जगह 
तिथि और नक्तत्नके योगका आदर मुख्य है।नक्षत्रके अमावमें तिथिका 
ही अहरा करलेवा चाहिये;क्यों कि,विद्यापतिने लिखितके वचनसे कहा 
हू कि, देवताका शरीर तिथि हे नक्षत्र भी तिथिप्नें ही होता है इसी 
कारण तिथिकी भ्रशेशा करते हैं तिथिके विना नक्षत्रकी बडाई नहीं है, 
तिथि ओर नक्ष॒त्रके योगमें दोनोंका ही पालन करता चाहिये, यदि 
वो योग न हो तो देवीकी पूजामें तिथि ही ग्रहण करलेनी याहिये। 
तहां ही देवलका यह वाक्य हूँ । यदि विल्वप्रबोधिनी सप्तमीसे पहिले 
सायकालमें बष्ठी न हो तो उसके पहिले दिनही बिल्वका निमंत्रण पूजन 
करना चाहिये । पत्री प्रवेशसे पहिले दिन सायेकालमें पट्टीका अभाव 
दो तो उससे भी पहिले बिश्ववृक्षमें अधिवासन करना चाहिये।यदि उस 
दिन मी सानेकालनें पप्ठी न मिले तो अधिवासन ( निमंत्रणादि ) न 
करने चाहिये; क्योंकि सायकालको पह्ीमें बिल्वमें अधिवासन करना 
चाहिये । चह पहिंले ही कहचुके हैं। यह कल्पतर्का मत है। आचार्य 
हरि तो यइ कहतेई कि सापंशलका श्रवण फलातिशयको दोहन 


कल लि जल आल दलील लक 
सरस्वती पूजन-इसी सप्तमीको कहा है कि इसी दिल 
मूल नक्षत्रमें पुस्तकोंको देवताकी तरह स्थापित करे। यह रद 
यामछमें लिखा हुआ हे कि, हे सुराधीश! मूल नक्षत्रमें सर" 
स्वतीका आवाहन कर उस रोजसे श्रवण नक्ष्‌त्रवक बगाबर 
पूजन होनाचाहिय।इसमें पढना पढानाओरलिखना तीनोंही 
काम कभीभी न करने चाहिये। विद्याकासी हविजको चाहिये 
कि पुस्तकोंको स्थापित करके पूजन करे। सरस्वतीजी कहती 
हैं कि में भद्रा और भद्रा मरा स्वरूप हे। हम दोनोंमें कुछ 
भी अन्तर नहीं हे । भद्रामें पूजित हुईं मं सब सिद्धियोंको 
करनेके लिये है।यदि उसमें षष्ठी न हो तो भी अखिवासन कर्मका लोप 
नहीं होता । इसमें बिल्वके पास जाकर देवी और बिश्वकी प्रा्थता 
करनी चाहिये कि, रामपर कृपा करने और रावणुको मारनेके लि 


अप्तमयमें ब्रक्माने हे विल्व | तुमसे देवीको जगाया था । इसी कारण मं 
भी आपके अत्याश्रित होकर शामकों छटमें तुमसे देवीकी जगवाताह। 


हे बिल्व | आप कैलासके शिक्षर पर पैदा हुए हैं श्रीफल हैं और श्री 


निवास स्थानहें आप लेजाने योग्य हैं। इस कारण आइये। मैँदुगाबपप 
आपका पूजन कहूंगा। इस प्रकार देबीका अधिवासव करके दूसरेदिन 
निमनत्रित बिल्वशाखाको लाकर प्रवेश पूजा करनी चाहिये, यही हेमा 
द्विने लिंग पुराणसे लिखा हैकि,मूल नहीं हो तो भी केवल सप्तमीम%म ही 
प्रवेश करायेन्वीन बिल्व शाखाकों दो फलोके साथ लाके उसी तरह 
देवीकी प्रतिमाकी ल्लान करा छिडककर प्रवेश करावे।यहां उपवास ओर 
पूजादिकोंसं उदय कालमें रहनेवाली सप्तमी तिथिका प्रहण करना 
चाहिये यह न द्वोना चाहिये कि,युग्मवाक्यसे पूर्वाकाही प्रहण दिया 
जाय | इसमें दो ह्वी प्रमाण इत्यतत्वावके नामसे दियादे जो ततराज 
मूल्में प्रताप मार्तण्डके नामसे दियादै।तिथिततवमें दन्दिकेखर पुराण 
लिखा हे कि, विद्वानक्त कार्य होना चाहिये कि, भगवतीके अ्रवेशपे 
विसजन तकके सब काम डदयःयापिती।तिथिमें करें।दुर्गाभक्ति तरंपि' 
णीमें यही लिखा हुआ दे । इसमें भी एक घडीसे कम होनेपर परा 
ने करनी चाहिये; क्योंकि अत डपवास और नियमोंमें कठिन घटी भी 
जो तिथि हो, यह देखनेका एक चडीका उपादान किया है ऐंवा 
गोड कहता है। पर द्र्तिणात्य तो पूर्व वचनकों बिना देखेही बुग्म 
बाक्यसे पूर्वाद्दी ग्रहण करते हैं । ऋत्यतत्वारवमें कहा हे कि, पंत्रिक 
पूजा पूर्वोहमें ही करना चाहिये न कि मूल नक्षत्रके अनुरोधसे मध्या* 
हमें दी हो यह छत्यतत्वाणावर्में कहा है । ये बिल्वकी शाखाका प्रवेश 


2 और उसकी पूजा आदिके विधान पूरे हुए ॥ . 





2 एप पा एउहा 7 उ कद 0 फेक फष्दद७ 220 पद सक्षएक भा काका: थलारानकादा एकल एधटापउ जा पता त 7 हाएएएएशप प्रा जब 2 क छ 2 एकता 


प्रदास्यामि भद्रायां झाचितास्म्यहम ॥ संग्रहे--आाखिनस्थ सिले पक्षे मेधघानाम सरस्वती ॥ 
मूलेनावाहयेदेवी श्रवणन विसजयतव्‌ ॥ इति सरस्वतीपूजनम्‌ ॥ 
अथ रथसप्तमीवतस ॥ 

अस्याँ सस्‍नानविधिः॥ तशञ्च अरुणोदयव्यापिन्याँ कार्यम्‌ ॥ तदुक्त मदनरत्ने स्मृतिसंग्रहे-- 
सूयग्रहणतुल्या सा शुक्ला माघस्य मत्तमी ॥ अरुणोदयदेलायां: सनाने तत्र महाफलम्‌ ॥ माघे 
मासि सिते पक्षे सप्तनी कोटिपुण्यदा ॥ कुर्योत्स्नानाध्सेदानाभ्यामायुरारोग्यसंपदः ॥ 
द्विनदथे अरूुणोदव्यापित्वे पूर्वेव ॥ एतदविथिस्त अविष्ये--ऊहृत्वा पष्ठचामेकमक्त सप्तम्याँ 
निश्वल जलम्‌ ॥ राचज्यन्ते चालग्ेथास्त्व दत्वा शिरसि दीपकम ॥ तथा जले प्रक्रम्य---न केन 
चाल्यते यावत्तावत्स्नानं समाचरत्‌ ॥ सोवणें राजत ताम्न भकत्यालाबुमये5थवा,॥ लेलेन 
वर्तिदातव्या महारजनरश्िता ॥ समाहितमना चूत्वा दत्वा शिरप्ति दीपकम्‌॥ भास्कर हृदये 
ध्यात्वा इम॑ मन्त्रमुदीरयेत्‌ ॥:नमस्ते रुद्ररूपाय रखानां पतये नमश॥| वरुणाय नमस्ते5सुतु हरि- 
दश्व नमो5स्तु ते॥जले परिहरेदीप ध्यात्वा संतप्य देवता; ॥ इति ॥ लोलाके रथसत्तम्याँ स्नात्वा 
गड्ादिसंगमे॥सप्तजन्मकृतेः पापेमुक्तो भवति तत्क्षणाव॥इति गगे। ॥ षष्टिसप्तामिसंयोंगे वारश्े- 
देशुमालिनः ॥ योगोएयं पद्मकोनाम सहस्लाकेग्रहे! समः ॥ एतचञ्च स्नान तिथ्यादिस्मरणानस्तरं 
शिष्टाचारात्‌ । इक्षुदण्डेन जले चालयित्वा सत्ताकंपत्राणि सत्त बदरीपच्राणि च शिरखिं 
निधाय सनायात्‌ ॥ तत्र मन्त्र-यद्यजन्मकृतं पाप मया सप्ततु जन्मसु ॥ तन्‍समे रोग 

शोक च माकरी हन्तु सतमी ॥ ख्लानानन्तरमप्य च दातव्य॑ मन्त्रपूवकम्‌ ॥ सप्तसछल्तिवह- 
प्रीत सतलोकप्रदीपन ॥ सप्तम्या सहितो देव गहाणाधष्य दिवाकर ॥ अध्यम ॥ जननी सब 








देती हूँ । संग्रह अन्थर्म छिखा हुआ हूँ कि, आश्रिन शुक्डा | 
सप्तमीको मधा नामकी सरस्वतीका पूजन होता हैं। मूलमें | 


आवाहन और श्रवणमें व्फक््लिम करना चाहिय। यह 
श्रीसरस्वतीजी का पूजन पूरा हुआ || 
रथ ९४” मीजक कहते ह-इसमें भी सब स पहिल स्नानकी 





मुद्रन 
 अहणके बराबर है, अरुणोद॑यक्ें समयमें इसमें स्नान महा- 
फलवाढा होता हैं । जो मनुष्य स्तान दानादि करता हैं उस 
मनुप्यको स्नानादिकों का कोटि गुणित पुण्यफल मिलता है। 
स्नानदान और अध्यसे आयु आरोग्य और सम्पत्ति प्राप्त 
होती है । यदि माघ सुदि सप्तमी दो दिन अरुणोदयमें 
मिल्ठे तो पूर्व सप्तमी ही ग्राह्म है। इसमें जो करना चाहिये, 
इसको विधि भविष्यपुराणमें कही है कि, माघसुदि छठके 


सानमे निश्चछ जछूको तुम हछाना चढछाना शिरपर दीपक 
रखके, फिर प्रदृक्षिणा करनी चाहिये | पीछे जबतक दूसरा 
कोई आकर उस जछूको न हलावे तबतक उसमें: स्नान 


करता रहे । वह दीपक सुबण, चांदी, तामे या तृूम्बेके 


काप्ठका हो, उसमें तेछके साथ कुसुम्भस रगी हुईं बत्ती 


देनी चाहिये। दीपकको शिरप्र देकर अपने चित्तको और | 


ओर वासनाओंसे तिवृत्त करके भगवान्‌ सूर्यद्‌वका ध्यान 





रूप हैं, आप जलोंके अधिपति जो समुद्र है तत्स्वरूप ह 
आप वरुण स्वरूप हैं, आपके छिये बारंबार अणाम है | 


| आपही हरिदश्व ( सूये ) हैं। आपके ढछिय॑ प्रणाम है। ऐसे 
| ध्यान और देववाओंका तर्पंण करके शिरके ऊपर रखे हुए 
| दीपकको जरूपर रखदे । [ और गगसहिताकार गर्गाचा- 
रे रुणोद्य ज्यापिनी लेनी चाहिये !यही 

रनमे संग्रहस कहा है कि, माघ शुक्ला सप्तम्मी सूथ | 


ने यह कहा हें कि, जहां गद्भगा यमुना आदि महानदियोंका 
सम्मेछन होता हो वहांपर साध सुदि रथसप्रमीके दिल 


(जलमें जलके हछनेस हलछता हुआ सुथंका स्वरूप दीखता 
| हो उस समय स्नान करनेस पूव साव जन्‍्मोंके किये 
| पापोंके दुःखभोगस उसी क्षण निमुक्त होजाता है ] ब्ठी 
| ओर सप्रमीके सेलमें सूयवार यदि हो तो इस पद्मक योग 
| कहते हैं, यह एक सहख सूर्य ग्रहणके समान है। इस दिन 
| धनान करना जो वूत कहा हैं, वह सक्कस्प करनेके पश्चात्‌ 
ही क॒तंव्य हें; क्योंकि शिष्टोंका ऐसा ही आचार है। और 
दिन एकभक्त ब्रत करके दूसरे दिन प्रातःकाछ राजिके अवब- | 


पूष जो निश्चठ जछूको चच्चढ करना कहा है उसकी विधि 


| यह है कि, झखके दण्डको पकडकर उच्चस जलूको चश्चल 
| करे, फिर आकके सात पत्त और सात बदरी फरलोंको 
| अपने शिरपर रखकर स्नान करे। उस स्नानका “यदयज्न्स? 


यह मन्त्र हैं इसका यह अथ हैं कि, सात जन्मोंमें आज- 


| तक जो जो पाप मेले किये हैं उनसे होनेवाले रोग और 


शोकको यह रथसप्तमी दूर कर । स्तान करनेके पीछे 'सप्र- 


के | सप्तति! सन्त्रस सूय्यमण्डरस्थ भगवान्‌ सूयेदेवका ध्यान- 
कर । औरर “नमस्ते रुद्र!”' इस संत्रको पढे कि, आप रुद्र॒स्व- 


करके उनको अध्य दें | इसका यह अथ हूँ कि, हे स्ाब , 


२ कुछुम्भम्‌ 


डर 


2.८2: 06/ ट| 


कया कर धरम मर पलक ८7627: 476 3 77 हक 77/२६/००52 20/:-7(.-/८० ८: 2000/0 2 20.4 ४००३० ००००0. 220... 20:52. 0,00५ 70:40, 


द मूतानां सतमी सप्तततिके ॥ सप्तव्याहतिकले देवि नमस्ते सूर्यमण्डले ॥ प्राथना इति स्तान- 
विधिः ॥ अनेनेव ठ मन्त्रेण पूजयच्च दिवाकरम्‌ ॥ कृत्वा घोडशधा राजन्‌ सत्ताश्वरथमण्डले॥ 
अब कया ॥ युधिष्ठिर उवाच।कर्थ सा क्रियते द्दष्प मलुष्ये रथसप्तमी ।। चकऋतवातत्वकछदा या हि 
व्याता त्वया मम ॥ १ ॥ कृष्ण उवाच ॥ आसीत्काम्बोजविषये यशोबमा नराधिपः ॥ वृद्ध 
वयसि तस्थासीत्सवैव्याधियुतः खुतः ॥ २ ५ तत्कर्मपाक॑ सो5पचछद्विनीतो द्विजपुद्धवम्‌ ॥ स 
प्राह राजन्वेश्यो5ये कृपणः पूर्वजन्मनि ॥ ३ ॥ ददश रथसत्तम्याः क्रियमाण व्र॒त नृप ॥ ब्रत- 
दशनमाहात्म्याइत्पन्नो जठरे तब॥.४ ॥ अदाता विभवे यस्मात्तेनायं व्याषितोःभवत्‌ ॥ ततः से 
राजा पम्नच्छ किमेतस्थ विधीयताम्‌ ॥ ५ ॥ ब्राह्मण उवाच ॥ यस्य संदशेनात्माप्तो लोभी तब 
निकेतनम ॥ तदेव क्रियतां राजन रथसप्तमिसंज्ञितम्‌ ॥६॥ ब्रत॑ पापहरं येन चक्रवतित्वमाप्यते ॥ 
राजोबाच ॥ ब्रृहि विप्न व्रत कृत्ल॑ सविधानं समंत्रकम्‌ ॥ ७ ॥ रोगेणां च दरिद्रा्णं सर्वलपत्म- 
दायकम्‌ ॥ द्विज उवाच | शुक्कपक्षे तु माघस्य बछचामामंत्रयेदगुही ॥<॥ स्वाने शुक्कतिलेः का 
नयादों विमले जले ॥ वापीकूपतडागेषु विधिवद्वणधर्मतः ॥ ९ ॥ देवादीन्पूजयित्वा तु गला 
सूर्यालयं ततः ॥ सूर्य पूज्य नमस्कृत्य पुष्पधूपाक्षतेः शुभेः॥ १०॥ आगत्य भवन पश्चात्पथ- 
यज्ञाँश्व निवषत ॥ संभोज्यातिथिल्ित्याश्व वालवृद्धाश्रिताव्‌ स्वयम्‌ ॥१९॥ विद्यमाने5दिनेःश्षीया- 








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५2 7९-2५ नि 





घोडेवाल रथमें स्थित होकर प्रसन्न दीखनेवाले ' हे सात 


रु 


चेसे भगवानके रथका ध्यान कुर उसमें स्थापित या विराज- 


मान सूयद््‌वका घोडश उपचारोंस पूजन करे | उन षोडश | 


उपचारोंकाभी 'पूर्वोक्तः जननी यही मंत्र है। कथा-राजा 
युधिप्टिरने पूछा कि. है कृष्ण ! आपने जिसका माहात्म्य 
चक्रवर्ती राज्यके देनेवाला कहा था; मनुष्य उस रथसप्तमीके 
दिन किस विधिसे स्नातादि करें ? सो आप कहिये।॥ १॥ 
श्रीकृषप्णचन्द्र बोल कि, पृवकाछम काम्बोज देशका यशो- 
वर्मा नाम एक राजा था। उसके पहिले तो कोई पुत्र न 


हुआ, फिर वृद्धावस्थामें एक पुत्र हुआ। वह भी नानारो- | 


गोंसे ग्रस्त ही हुआ ॥२॥ तब यशोवर्माने नम्नतापूर्वक रुक 
किसी महात्मा ब्राह्मणसे पूछा कि हे श्रभो | इस बालकने 
ऐसा कौन्‌ पाप किया था, जिसके फलोंको भोगता है । 
डसा पूछनंपर वह भहात्मा कहने छगे कि, हे राजन ! 
इस्‍्हरा यह पुत्र पूवजन्ससे कृपण ॥३॥ वैद्य था हे नूप ! 

कोई पुरुष रथसप्तमीका ब्रत करता था, 


श्र कि बा 
इसने दशत किय थे और कोई पुण्य कम्म इससे नहीं 









हर इंश्वराणापित्यपि कचित्वाट: | का 





उस पुण्यात्माके | 


| क्रिया, इस ब्रहीके दशन करनेके प्रभावसे तुम्हारे घर 
हि ५५ २2 सा 5 ओं भू फ+ ४ हट ब्र्‌ 
( बंजुवःरमहोजनंतप:सत्व ) भूरादि छोकोम प्रकाश कर- | उत्पन्न हुआ है ॥| ४ ॥| इसके सम्पत्ति बहुत थी. पर इसने 
नेवाल | है दिवाकर ! है देव | आप सप्तमी ( रथसप्रम्ती ) | 


सहित मेरे अध्येदानकों ग्रहण करिये। “जननी ” इससे | 


५ कल एः बह, ५ के |] 
प्राथना करे | इसका यह अथ है कि, है रथसप्रमि | है सात | राजे पूछ ॥$ 0 
हा थे | वर्म्मो राजोने पूछा कि, अ ये 
सप्ति घोडेवाली | हे भूरादिक सात व्याहति स्वरूपवाली ! | पूछा कि, अब कया उपाय करना चाहि 
हा | ५ का 
हे छूयमण्डलमे विराजमान होनेवाढी | आप समस्त भूतोंकी | अगवा लि 
हे जज तु» 
जननी हो । आपके लिये प्रणाम हैं। यह स्लानविधि समाप्त | ७ ० के जिस जेब गवाढ़क केत्रद्न दशन 


९ ्‌ ्ु । क ३ रे थ्‌ हि गये हि अप 
हुईं | फिर हे राजन्‌ | सात घोडोंवाढ़े रथको वनवाकर या | रे परम जन्म हुआ हैँ उसी रथसंप्तमीके त्रक़॒त अंत 


कछभी कभी दान नहीं किया, इसी दोषसे यह रोगग्रस्त है! 
श्री कृष्ण चन्द्र राजा युधिष्ठटिरस कहते हैं कि, फिर उस यशो- 


जिससे इसका पू्वेधाप निवृत्त हो और प्रसन्न हो ॥ ५॥ 
छान कराना योग्य है ॥६॥ आप अपने पुत्रके पापोंके निव- 


तक कर॑नेवाली पुण्यवृद्धिक लिय रथसप्तमीके ब्रतको करें| 
यह सब पापोंका विनाशक और चक्रवर्ति राज्यक्का देने- 


| वाढ्धा है। राजा बोढछा कि, हे वित्र ! आप विधि और मंत्रों 


सहित उस ब्रतको कहें ।। ७॥ जिसके प्रभावसे “रोगियों 
रोग द्रिद्वियोंके दरिद्र नष्ट होते हैं और सुख सम्पत्तियाँ 
भात्त होती हैं । ब्राह्मण बोला कि, ग्ृहस्थी माघपुदि पष्ठीके 
दिल आमंत्रण करे ॥८॥ पीछे शुक्छ तिलोंकों छेकर नया' 
द्कोंके कूछपर पहुंचे | नदी न होतो वापी, कूप या तढा' 


| पके तटपर ही जाय । फिर निम्मेल जछमें उन श्वेत ति 
| मिलाकर विधिवत स्तान करे, अपने अपने वण धर्म्मानुसार 


॥5॥ देवादिकोंका पूजन करे पीछे सूयेमगवानके मन्दिर 
जाकर प्रणाम करके पवित्र पुष्ष धूप और अक्वतादिकोंसे 

पूज _ ३ पीछे 
उनका पूजन कर।।१० || अपने घर पर पञ्चमहा[यज्ञ करे। पीछे 


अभ्यागत, श्ृत्य, बाहक, वृद्ध और आश्रित जनोंको उत्तम 
रोतिसे भोजन करावे। पीछे ॥ ११ ॥ सूर्यके अस्त होनेपर 


+ नंयभाव तु छुत्नचित्‌ । विमछे सद्धिछि राजन इति हेमागादौ पाठः । 











द्राग्यतस्तेलबर्जितम्‌ ॥ रात्रों विप्र॑ समाहूय सर्वज्ञ वेदपारगम्‌ ॥ १० ॥ संपूज्य नि 

कुयात्सूयमाधाय चेतसि ॥ सप्तम्यां ठनिराहारों भूत्वा भोगविवर्जितः ॥ १३ ॥ भोक्ष्येषष्टम्याँ 
जगन्नाथ निर्विन्न॑ तत्र मे कुर॥ इत्युच्ाये वष्श्नेष्ठ तोय॑ तोयरेष निश्चिपेत ॥ १४ ॥ ततो विस्॒ज्य 
त॑ विभ्र॑ स्वपेदभूमों जितोद्धियः ॥ ततः भातः समुत्थाय कत्वावच्य॑ झुचिनरः ॥ १५ ॥कारयित्वा 
रथ दिव्यं किड्षिणीजालमालिनम्‌ ॥ स्वोपस्कररंयुक्त रत्न सर्वाह्चित्रितम ॥ ११६॥ काखन 
राजतं वाथ हयसारथिसंयुतम्‌ ॥ ततो मध्याह्ुसमयरें क्ृतम्नानादिकों ब्ती ॥ २८ ॥ अति- 
संवीक्षमाणस्तु पाषण्डालापवर्जितः ॥ सोरसूक्त जपन्माज्ञः समागच्छेत्स्वमालयम ॥ *<4 ॥ 
निर्ेत्तनित्यकायस्तु कृत्वा ब्राह्मणवाचनम ॥ वस्यमण्डपिकामध्ये स्थापयेत्त रथोत्तमम्‌ ॥ १९॥ 
कुंकुमेन खुगन्धेन चर्चयित्वा समन्‍ततः ॥ मालानिः पुष्पदीपानां समनन्‍तात्परिवेष्ठयेत ॥ २० ॥ 
धूपेनागुरामिश्रेण धूपयित्वा तथोपारे ॥ रथस्य स्थापयेद्धालुं सबसंपू्णलक्षणम्‌ ॥ २१ ॥ बित्ता- 
तुरूप॑ हेम॑ च वित्तशाठअविवर्जितः ॥ शाठब्ाद्रज॒ति वेकल्यं बेकल्याद्वेकल फलम्‌ ॥ २२ ॥ 
ततो देव॑ समभ्यच्य सरथ सहसारथिम्‌ ॥ पुष्पैर्धूपेस्तथा गन्धेवेश्ालड्रारभूषणेः ॥ २३ ।। फले- 
नानाविधेभक्ष्येनेवेद्रकतपावतेः ॥ पूजयेद्धास्कर भक्त्या मन्त्रेरोभिद्धचिन्िः ऋमात)। २४ ॥ जानो 


दिवाकरादित्य मालेण्ड जगतांपते ॥ अपांनिधे जगद्गरक्ष भुतनावन भास्कर ॥ २५ ॥ प्रणतार्ति- 
हराचविन्त्य विश्वचिन्तामणे विभो ॥ विष्णो हेसादिमूतेश आदिमध्यान्तकारक ॥ २६ ॥ भक्ति- 





विभिन्न मिल मजा 22३३ ७७७७७४७४७४७४८४८४४७७८एे््शणशणशशशशशणशशशणशण 


राज्िस मौनी होकर भोजन करें; पर तेडका कोई पदाथ 
भोजन नहीं करे!सर्वेज्ञ बेदवेत्ता आह्णको आचास्य बनाने 
अपने घरपर निमन्त्रित कर बुछावे ॥ १९ ॥ उनका विधि- 
बत्‌ पूजन करे | वद्नन्तर अपन चित्त सूथका ध्यान करता 
हुआ नियम करे कि) में सप्तमीके दिन आहार न करूंगा 
अ्‌ पर न मभोगविलछास ही करूंगा ॥ १३ ॥ अष्टमीके दिन 
भोजेस करूंगाहे जगन्नाथ | आप मेरे इस कार्यम विप्नोंको 
टारें। हे ृंप | इस प्रकरक्ा नियम अपने हाथमें जल लेकर 
करना चाहिये | फिर उस जरूको जलूमेंही डाल देना चा- 
हिये ॥१४॥ आचायको उस समय अपने घर छोट जानेके 
लिये विदा करे और आप जितन्द्रिय हो पय्य्कपर शयन 
न कर भूमिपर ही शयन करे। प्रातःकाछ्ू उठकर आवश्यक 
मलमूत्रादि त्वाग और र्लानादिं काय करके पवित्र हो 
॥ १० ॥ दिव्य एक सुवण या चांदीका रथ तेयार करावे, 
उस रथके चारोंओर छोटी छोटी किल्लिणियोंके जाछकों भी 
लगवाबे | उसमें आसनादि सामग्री स्थापित करे । जहां 
तहां चारों ओर र॒त्न जडवा अतिसुन्द्रतासे सजावे । रथके 
सात घोडे और सारथि ( अरुण ) की मतियोँ भी यथा- 
स्थान सुसज्जित करावे। फिर ब्रतीपुरुष मध्याहम स्तानादि- 
कॉंसे निवृत्त होकर सरलूदृष्टि घाम्मिकसाषी हो,फिर सोर- 
पृक्तका जप करता हुआ अपने घुरकी ओर चला आगे 
॥ १६-१८ ॥ नैतिक कम्माँसे निवृत्त होकर आचार्यादि 
ब्राह्मणोंको बुछाकर स्वस्तिवाचनादि करावे।वंखोंसे सज्जित 
एक सण्डप तैयार कराके उसके बीचमे सूर्यदेवके उत्तम 


स्थको स्थापित करे | १९॥ सुगन्धित रोली या केसरस्ि- 


थ्ित चन्दनस उसको चारों ओर॒स चचित करे। सुन्द्र 
पुप्प माछाओंस परिवेष्टित कर ॥ २०॥ अगरु सिश्चित 
धूपसे धूषित करे, रथके ऊपर सर्वेक्ृक्षणोंस युक्त सूर्येको 
स्थापित करे ॥ २१॥ (सूयकी मूर्ति ऐसी हो, जिसके 
चारभुजा, हस्तोंमें सुवणके कमछ, चक्र, गदा आदिहों, 
मसस्‍्तकपर मुकुट; कानोंमें कुण्डल, चरणों नूपुर, प्रकोष्ठ 
ककुण और कण्ठादिमिं मणि आदि, कटिभाग ओर स्कन्ध- 
मागोंमें घौत और उत्तरीय वस्त्र .हों। ) अपन घन स॒म्प- 
सिके अनुरूप सोनेकी सूय्ये भगवानकी मूर्ति बसानी चा* 
हिंये | वित्तके रहते कृपणता करनेसे विकलरूता होती है । 
विकलता होनेसे किया हुआ सब कम्मे निष्फछ होता हें 
॥ २२ ॥ रथ सूर्य भगवानकी प्रतिमाको सुन्दर कमलास- 
नपर बैठा रथ सारधि' और दीप्िि आदि शक्तियों समेंत 
पूज । पुष्प, घूप, गन्ध;, वल्ल अलंकार दिव्य आमूषण 
[२३॥ विविध फल, भक्ष्य ओर घृतसें पकाये हुए भोज्यान्न 
चढाकर भक्तिस इन मंत्रोंस प्रथकछू २ ऋपसे पूजन करे 
॥ २४ ॥ इन पृष्पादिकोंके समपेणके समयमें  भानो 
इत्यादि तीन मन्त्रोंको ऋमसे पढे । इनका अथे यह हैं कि, 
हे भानो ! हे दिवाकर ! हे आदितय | हे मार्तंण्ड ! हें जग- 
न्नाथ ! हे जलोंके निधान ! हे प्राणियोंको आनन्दित करने- 
वाले ! हे भास्कर ! आप सब जगतकी रक्षा करें ॥ २५ ॥ 
हे प्रणाम करनेवाले जनोंकी जातिको हरने वाले ! हे अचि- 
न्य | है तरिलोकीकी कामनाओंको पूर्ण करनेमें चिन्तामणि 
सदश ! हे विभो ! प्रभो! हे विप्णो ! हे हंस मिन्रादि 
नामोंस एवम्‌ द्वादशमासों में द्वादश नामोंसे प्रसिद्ध ! हे 
इंग ! हे सब त्रिछोकीकी उत्पत्यादि करनेवाले ! ॥ ९६ ॥ 





जगत्पते ॥ प्रसादात्तव संपूर्णमर्चनं यद्हास्‍्तु मे ॥ २७ ॥ एवं संपूच्य 
# १ च हा ३7] आप 
देवेश प्रार्थयेत्समनोगतम ॥ ददाति प्राथित भाठमकत्या सनन्‍्तोषितो नर) २८ रे वित्तदीनोएपि 
विधिना सर्वमेतत्मकल्पयेतारथ ससाराथें साथ॑ वर्णकेरनिंत्तिलेखितम्‌ ॥२९॥ सोवण च तथा भाहं॑ 
यथाशक्त्या विनिर्मितम॥मागक्तेन विधानेन पूजायैत्वा खुविस्तरम्‌ ॥ ३० ॥ जागरं कारयेद्रात्रो 
गीतवादिचनिस्वनेः ॥ म्रक्षणीयेविचित्रेश्व पुण्यार्यानकथादिभिः ॥ ३९१ ॥ रथयात्रां अ्रपरयेत 
भानोरायतन अतः ॥ आनिमीलितनेत्रस्तु नयेत्तां रजनीं बुधः ॥ ३२ ॥ प्रभाते बिमले ख्रात्ा 
कृत कत्यस्ततों द्विजाव॥ तर्पयेद्विविषेः कामेदानि्ांसोविभूषणेः ॥ २३ ॥ अखश्वमेधेन तुह्य॑ 
तदिद बह्मविदों विहः ॥ अतो देयानि दानानि यथाशवत्या विचक्षणेः॥र२४॥ रथस्तु गशु॒रवे देयो 
यथोपस्करसंयुत/॥ सरक्तवखयुगलो रक्तथेठसमन्वितः ॥३५॥ एवं चीणबती राजन्‌ कि नाप्नोति 
जगत्रये ॥ तस्मात्सवेश्रयत्नेन कुरु त्व॑ रथसप्तमीम्‌ ॥ ३६॥ येनारोग्यो भवेत्पुत्रस्त्वदीयों नृप- 
सत्तम ॥ व्रतस्पास्य पभावेण प्रसादाद्धास्करस्य च ॥ ३७ | भविष्याति महातेजा महाबल- 
पराक्रम: ॥ भुक्‍त्वा भोगान्सुविपुलान्कृत्वा राज्यमकण्टकम्‌ ॥ ३८ ॥ दत्वासों रथसप्तम्यां मृते 
त्वयि महाभ्ुजः॥ उत्पाद्य पृत्रान्पात्रांश्व सूर्यलोके स यास्यति॥ रे९ ॥ तत्र स्थित्वा कहरप- 
मेक॑ चक्रवर्ती भविष्याति ॥ ऋष्ण उबाच ॥ इति सबब समाख्याय तपोयक्तो द्विजोत्तमः॥ ४०॥ 
यथागत॑ जगामासौ नृपः स्व चकार ह ॥ यथादि्ट द्विजेन्द्रेण तत्तत्सवे बभूव है ॥ ४१॥ एवं 
स चक्रर्वातित्व म्रातवान्तृपनन्दनः ॥ श्रूयते यस्तु मान्धाता पुराणेषु परन्तप३. ॥ ४२॥ य इई॑ 


हीन॑ क्रियाहीन मन्त्रहीन 








है जगतके पाछक ! मेने भक्ति, क्रिया और मन्त्रसे शून्य जो 
पुजन किया हैँ वह सब आपकी कृपासे यहांही पूरा हो 
जाय ॥ २७ ॥ इस,प्रकार देषेश सूय्यकी पूजा करके अभि- 
छूषित वरकी प्राप्तिके ढिये प्राथंना करे । भक्तिसे प्रसन्न 
कियेहुए सूर्य देव भक्त जो कुछ प्राथना करता हे उसे पूर्ण 
करते हैं | २८ ॥ यदि घन न हो तो भी उक्त विधिस सब 
कुछ करें। परधनसाध्य सामग्री न करे | रह रेखा आदि- 
कोंसे भित्त्यादिकोंपर चित्रादिखूपस कल्पना करे ॥ २९॥। 
अथवा अपनी जैसी शक्ति हो उसीके अनुसार सोनेंका 
सूय्य बनाबे | यथोपस्थित फल पुष्पादि द्वारा पूजन करे | 
( सवधाही भिक्षुक और रुग्ण हो तो मनसे पूर्वोक्त पूजन 
विधिका स्मरण ही करे ) आगुक्तविधिसे अच्छीतरह सूय- 
देवका पूजन कर ॥ ३० ॥ जागरण करे गान वाद्य देखने 
छायक नाना नृत्यादि पवित्र इतिहास ओर कथा वाचना- 
दिसे रातमें जागरण करे ॥ ३१ || सूयके मन्दिरमें बैठ कर, 
सूर्य न्ारायणकी रथ यात्राकों देले। रात्रिभर नेत्र सीरून 
नहीं कर ।। ३२९ | दूसरे दिन प्रभाव काल निम्मेठजरसें 
: स्नान करके नित्य अवश्यकत्तेंव्य सन्ध्योपासनादि कर्मोको 
करे, पीछे नानाविध वाउिछत पदार्थ तथा वल्र आभूषणा- 
दिका दान देकर आचार्य दि ब्राह्मणोंको सन्तुष्ट करे।३३॥ 
इस प्रकार किया 
प्रद्‌ होता है ऐसा वेदवेत्ता छोगोंका सिद्धान्त है। अत; 
.. विद्वान ब्रतीजनोंका करेव्य है कि, 


नानाविध दान करें ।। ३४ ।। रथपर सब उपस्कर सहित 
रथ आचार्यके छियेही देना चाहियें। छाल घोती और 
डुपट्टा जो भगवानके चढाय थे वे ओर छलाछरंगकी गड 
भी आचायको देदे ॥ ३५॥ हे राजन ! जो इस प्रकार 
त्रतकों साहृु समाप्त करता है उसको त्रिछोकीमें अग्राप्य 
वस्तु कोई भी नहीं हैं। इस कारण आपभी अच्छी वरह 
प्रयत्नपूरवक रथसप्तमीका ब्रत करिये ॥३३॥ हे दर्पसत्तम ' 
इससे तुम्हारा पुत्र आरोग्य होगा, ब्रतके प्रभाद एव सूचदे' 
बकी प्रसन्नतास तुम्हारा पुत्र ॥ ३७॥ अर्त्यन्त तेजसी! 
अत्यन्त बलबान्‌ और अत्यन्त उत्साही होगा । इस छोकमे 
नाना सुखोंको भोगेगा ॥ ३८ ॥ तुम्हारे मरनेपर निष्कण्टक 
चक्रवत्ती राज्य करेगा। फिर पुत्र और पोत्रोंको राज्य देकर 
सृयधामको पधारेगा ॥ ३९॥ वहाँ एक करप वास करके 
जब इस लोकमें जन्म लेगा तब फिर चक्रवर्ती राजा होगा। 
श्रीकृष्णचन्द्र ( राजा युधिष्ठिरस ) बोले कि; इस प्रकार वह 
तपरवी ब्राह्मण राजा यशोवर्म्माक्ो त्रत और उसकी विधि 
तथा माहात्म्य कहके ।| ४० ॥ जैसे आया था वैसही अपन 
आश्रमको चछा गया'रा जाने उसके कथनानुसार रथसप्तमी- 
का त्रत वेसेही किया ।। ४१॥ उससे राजपुत्र रोगरहिव पु 
पौत्रादि सम्पत्तिमान्‌ और निष्कण्टक चक्रवति राज्य 

भोंगसम्पत्तियोंकी प्राप्ति जो कुछ कहा था वह सब होगया | 


हुआ रथसप्तमीत्रत अश्वमेषके समान पुण्य- | पुराणोंमें जिस मान्धाँता राजाकों परसप्रतापशाली सुनते 


हा 


हो वह पृवजन्ममेंरथसप्तमीकेत्रतको करनेवाले यशोवर्ग्मकी 


अपनी शक्तिके अनुरूप पुत्नही था।वह इस जन्ममें भी सावेभोम राज्यका करनवाढ। 


१अशेआद्यजन्तमू । 





श्रणुयाद्धकत्या आवयेच्च यथाविधि ॥ तस्थेव तुष्यते भालयच्छम्वेबाषि संप 


॥७४३१।॥ एच 
विध रथवर वरवाजियुक्त हम च हेमशतदीधितिना समेतम ॥ इह्याच्च मायथसितसप्तमिवासरे 
यः सोउसड्रचक्रगतिरेव महीं श्ुनक्ति ॥ ४४ ॥ इति भविष्योत्तरे रथसममीत्रत संपूर्णम्‌ ॥ 

अन्रेव अचहासप्रमीब्रठम ॥ युधिष्ठिर उवाच ॥ कर्थ ख्वियः सुरूपाः स्पुः सुभगाः सुप्रजास्तथा ॥ 
पुण्यस्थ महतश्वात्र सवमेतत्फर्ल यतः ॥ अल्पायासेन खुमहत्येन पुण्यमवाप्यते॥ ख्लरीमिमांधे 
मम दृहि स्थान तद्धि जगदुगरों ॥ श्रीकृष्ण उवाच ॥ श्रयतां भरतश्रेष्ठ रहस्यं सुनिमाषितम ॥ 
परन्मया कस्यचित्रोक्तमचलासप्तर्मश्रतम्‌ ॥ वेश्या चेन्हुमतीनाम रूपोदाय्यगरणान्विता ।आसीव 
कुरुकुलश्रेष्ठ सगरस्य विलासिनी ॥ सा वसिष्ठाश्रम॑ पुण्य जगाम गजगामिनी ॥ वसिष्ठमृषि- 
मासीन प्रणम्यानतकन्धरा ॥ कताअलिपुटा भृत्वा प्राहेद जगतों हितम्‌॥ मया न दत्त न हुते 
नोपवासव्रतं कृतम्‌॥मक्‍त्या न पूजितः शम्ध्ुः स्वामिष्छाड्ंधरों न च ॥ साम्प्रतं॑ तप्यमानाया 
ब्रतं किखिद्ददस्वः मे ॥ येन दुःखाम्बुपड्ोघाइत्तरामि भवाणवात्‌ ॥ एतत्तस्थाः  सुबुहुशः 
श्रुत्वातिकरुणं वचः ॥ कारुप्यात्कथयामास वासेष्ठों मुनिपुदड्गवः ॥ माघस्थ सितसप्तम्याँ सर्वे- 
कामफलप्रदम ॥ रूपसोभाग्यजनन स्नान कुरू वरानने॥कृत्वा षष्ठयामेकश्॒क्त सप्तम्यां निश्चले 
जलम ॥ राज्यन्ते चालयेथास्त्वं दत्वा शिरसि दीपकम्‌ ॥ माघस्य सितसमम्यामचरल चालितं 
च यत ॥ जले मलानां सर्वेषां स्‍्नान॑ मक्षालन ततः ॥ वसिष्ठवचन श्वत्वा तस्मिन्नहनि भारत ॥ 
चकारेन्दुमती स्नान दान सम्यग्यथाविधि॥स्नानस्थास्य प्रभावेण शुकत्वा भोगान्यथेप्सितान्‌ ॥ 





परन्तप हुआ ॥ ४२ ॥ जो मनुष्य भक्तिस इस आख्या 
नको विधिवत्‌ सुनता या सुनाता हैं,उसके लिये भी सनन्‍्तुष्ट 


कर ५, आर 


हुए भगवान्‌ सूयदेव सब सम्पत्तियां अवच्य देते है ॥॥४३॥ 
पहिली कहीहुई विधिसे,्ननवाय हुए अश्व ओर सारथि 
युक्त सुवणके रथ और सूर्यदेवकी प्रतिमाको,माघशुदि सप्र 
मीके दिन त्रत करक जो किसी द्विजवरकों दान करता हे 
वह अप्रतिहत रथकी गतिवारा होकर प्रथिदीका शासन 
करता हें; यानी निष्कण्टक साम्राज्यपदक ऐश्वयको भोगता 
है ।४४॥यह भविध्योत्तरपुगणका कहा हुआ रथसप्तमीका 
ब्रत पूरा हुआ | 


>अतन्रलासप्रमी-त्रतभी इसी दिन करना चाहिये । इस | 
प्रसद़्म राजा युधिष्ठटिर एवं श्रीकृप्णचन्द्रका संवाद कहते | 
हैं । राजा युधिष्टिर बोले कि हूं प्रभो | स्त्रियां सुरूप,छुभाग | 
औरपुत्रोंवाली किसमहान्‌ पुण्य ब्रतादिकोंके करनेसे होती | 
है!जिस अनुष्ठानमें परिश्रम अल्प हो महान्‌ पुण्य फल मिले | 
सो कहो । हे जगदगुरो ! ख्ियां है कह | हिछाया न हो । क्योंकि, हिछाया हुआ जछ पहिले हिल्ाने 
करती हैं, उसका फल क्या होता हैं : उस भी कहिये ।। आहोके मलोंको प्रक्षालित करते हैं,अतः आपही यदि शिर- 
श्रीकृष्णचन्द बोले कि, हे भरतश्रेष्ठ | वसिष्ठमुनिन जिस | २ दीपक रख पहिले स्नान करके हिलायेगी तो तेरेही 
| पापोंको वे दूर करनेवाले होंगे । ऐसे वसिष्ठके कथनको 
सुन इन्दुमतीने माघसुदि सप्तमीक दिन श्रथम तो बहुत 
कहता हे आप सुने | है कुरुकुछके श्रेष्ठ । सगरराजाके साथ | 
विहार करनेवाछी सोन्दर्यकी उदारतासे परिपूण इन्दुमद्ी 


ब्रतका निरूपण किया था, मने जो कभी किसीके सम्मुख 
7 नहीं, जो परमगोपनीय हें उसी अचछासप्रमीकेत्रतको 











नामकी वेश्या हुई थी | वह किसी समय महात्मा वर्सिष्ठ- 
जीके परम पवित्र आश्रमको हस्तिक समानमत्त होकर धीरे 
धीरे चली गयी |.-वहांपर महात्मा ब्रह्मषिवय्यं वसि- 
छजीविराजमान थे,उनको देख मस्तक नवा हाथजोड प्रणाम 
करके जगत्‌का हितकारी प्रश्न किया कि; हे प्रभो 
कोई दान,हवन,उपवास; ब्रत और शज्भुर या विप्णुके पूजन 
भी भक्तिसे नहीं किये। मरा चित्त इस समय सनन्‍्तप्त हो 
रहा है। इससे आप ऐस किसी ब्रत दानको कहें जिसके 
अनुष्ठान करनसे मे दुःख रूपी पंकपरिपूण संसार समुद्रस 
उत्तीण हो जाऊँ । उस इन्दुमती वेश्यान जब अत्यन्त दीन 
होकर बारवार प्राथना की तब मुनिपुद्धन वसिष्ठजी दया 
करक बोले कि; है वरानने | माघछदि सप्तमीके दिनस्रान 
करो। यहर्नान सब मनोरथोंकीपूर्ति सौन्दय्य औरसोभाग्य 
देता है । इसकी विधि यह हे कि, पद्चिले दिन छठको एक 
वार भोजन करे | फिर दूसरे दिन प्रातःकाछ उठकर किसी 
से जलाशयपर जाय, जिसके जछूको किसीने स्लानकरकें 


विधिसे स्नान किया, पीछे दान दिया | इस स्नानके प्रभा- 
वसे इस छोकके सब वांछित भोगोंको भोग अन्‍्लम स्वगे 





१ एठदुत्तरं छोकत्रय विछासिनीत्यतदम व साधलछोकनवक हेमाद्रावधिक दृश्यते | तत्त त्रताकेडलिखनादुनेन छ्विखि 
तम्‌ । २ मांगधस्येत्यपि पाठः। ३ यदस्माश्ालितं ज़ू सर्वेषां मलानां क्षालने ततो हेतोः स्ाने कुर्यादित्यर्थ 





कप पा त0त00..क्‍__...... ““““““““““////»/»ण"/४//इ€ “४ “४ टसकटपको 


इद्धलोकेःप्सरोमध्ये नायिकात्वमवाप सा ॥ अचलासतमीस्नान कथित ते विशांपते॥ सर्व 
पापप्रशमन सुखसौभाग्यवर्द्धनम॥युविष्ठिर उदाच ॥ सप्तमीस्नान माहात्म्य श्व॒त निरवशेषतः | 
साम्पतं श्रोत॒मिच्छामि विधिं मन्तसमस्वितम्‌ ॥ श्रीकृष्ण उवाच | एकभ्क्तेन संतेष्ठेत्‌ षष्ठ्ा 
संपज्य भा करम।सप्तम्याँ ठ बजेत्मातः सुगम्भीरं जलाशयम)॥ सरित्सरह्तडार्ग जा देवसात- 
मथापि वा ॥सुखाबगाहा लिल दृष्टसखवेरदूषितम्‌ ॥ व्याह्ाम्बुपक्षिमिश्वेव जलगेमत्स्यकच्छप॥| 
न केन चाल्यते यावत्तावत्स्नान॑ समाचरेवासौवण्ें राजत पात्रे भक्त्यालांबुमथ्रेष्थवा ॥ तलस्य 
वर्तिदातव्या महारजनरखिता ॥ महारजनम कुसुम्मम ॥ समादितमना भूत्वा दत्वा शिशराले दीप- 
कम्‌ ॥ भास्कर हृदये ध्यात्वा इम॑ मन्नरमुदीरयेत्‌ ॥ नमह्ते रूद्वरूपाय रखानां पुर्तये नमः॥ 
वरूणाय नमस्तेःस्तु हरिवास नमोस्ठ ते ॥ जलछोपरि हरेदीपं ल्वात्वा संतप्ये देर्बताः॥ चन्त- 
नेन लिखेत्पप्ममष्टपत्रं सकर्णिकम्‌ ॥ मध्ये शिव सपत्नीक प्रणवेन च संयुतम्‌ एशाक्रे दले रविः 
पूज्यों माठलैवानले तथा ॥ याम्ये विवस्वाब्रेकत्ये | झास्कर॑पूजयेत्ततः ॥ पश्चिमे सबिता 
पूज््यः पृज्योडफेश्वानिले दले ॥ सौम्ये सहश्लकिरणभरशीवे सर्वांत्मकी नूप ॥ पूज्याःप्रणवपूबास्तु 
नमस्कारान्तयोजिता;॥ पृष्पेः सुगन्धेधूपेश्व उथक्त्वेन युधिष्ठिर । विछुज्य वसखसवबीतं स्वस्थान॑ 
गम्यतामिति ॥ विसजिते सहर्नांशों समागम्य स्वमालयम्‌ ॥ ताम्रपात्रेष्थवा शक्त्या मृन्मये 
वाथ भक्तिमान। स्थापयेत्तिलपिष्टं च सघृतं सगुर्द तथा ॥ काँचनं तालक कृत्वा अशक्तस्तिल- 
पिष्टजम्‌ ॥ सब्छाद्य रक्तवख्नेण पुष्पेधूपेरथाचयेत्‌ )-ततः सथ्वालगेद्विप्रेदृद्यास्मन्त्रेण तालकम्‌॥ 











यो ग कह इतओो या बल अल । [शेप विफल यार गापय बे हार रखे गयी । वहां इन्द्रकी सब भप्सराजओंमें म्ुरूय हुईं । दौपकको शिरस उतार जछाशयके जछके ऊपर रखदेस्तान 
| करे | देबताओंका तपण करे | फिर चन्दनस कर्णिकासहित 
हैँ । यह सब पापोंका नाश करनेवाल्ा तथा सुख सौभा- | अष्टट्ल कमल छिखे, जिसके भीतर कर्णिका वतुछ आकार 
ग्यका बढानेवाल्मा है । युविष्टिर बोल कि हे प्रभो ! मेंने | ठिखेकर्णिका भागमें पावतीसहित भगवान्‌ शझ्डुरकास्थापन 
तुम्हारं मुखस अचछा सप्तमीके स्लानका फल अच्छीतरह | करे। उनके समीप “ ओं ? इसको भी लिखे फ्र इनका 
जो 2 कं! के हि करनेकी विधि और | पूजन करे,पुबके पत्तेपररवि,अप्निको के पत्तेपर भानु,दृक्षि: 
न्त्र एवं जो क ड़ 5७ ९_ ५७ ५४ ५ 
हक कि बन व दिन विधिवत | “मेँ विवंखान, नैऋलमे भारकर,पश्चिममें स॒विता/वायब्यमे 
पी िय है राजन, 5ठ5क ।दन विधिवत | हुँ,उत्तरमे सहखकिरण और ऐशानमें सर्वोत्माको इन्हीके 
स्नानादि एवं नेत्यिक नमित्तिक कार्योंको समाप्त करे; फिर | व कक की कि गेसानवेनम: 
समाहित चित्त शुद्ध होऋर भगवान्‌ सूर्यदेवका पूजन | मन्त्रों से पूज । 'ओरवये नमःस्नापयामि,ऑँभानवंनम: 
कं... पाक, न ५ )! हे डर कै ल्न्र 
प्रमसे अच्छी तरह करे, उस दिन रातमें एकबार सूथ्येको | स्तापयासि'इत्यादिरूपस उस उस नामके अनुरूप मन्त्रकी 
मर मद रे | करपना करके स्नापनादि उस उस क्रिया करानेकी प्राथना 
पूजकर भोजन कर । सप्तमीक दिन प्रभातकार उठकर | टों +। हे यथिष्निर | 
हु आधार | करता हुआ रवि आदि आठोंका पूजन करे। हे युधिष्निर : 
मलमूत्रत्याग एवं साधारण स्नान कर शुद्ध हो अत्यन्त | | का 
| सुगन्धित पुष्प, धूप, वस्र ओर यज्ञोपवीत आदि चढावे 


गम्भीर जलूवाली नदी, सरोवर, तछाव या किसी देवखात | 


जलाशयदबे ॥ ते गच्छन ) नेर्सथानको जॉय 
(!शयके तटपर जाय, पर वह जहूशय ऐसा न हो | उस्वस्थान गच्छन्तु भवन्तः आप अपने रेस्थानको जाय, 


(0 कक 
जिसमें नक्रादि दुष्ट जन्तु उपद्रव करते हों, खडडे आदिका | “सीदन्‍्तु चानया इतया पुजया इसकी हुई पूजाउगस कप 
उपद्रव भी नहीं हो, क्योंकि ऐसे जलाशयोंमें स्तान ररने- | ईंस प्रकार कहके उतका विसजन करे एस सूर्य देवकेरवि 
वाढेको मरण भयभी उपस्थित होता हैं, सपे, जलजन्तु | अश्रेति आठ स्वरूपोंकों तथा पावेती महेश्वरदेवको विस्ेन 
मत्स्य एवं कच्छपोने भी जबतक न चलाया हो, उससे | करके अपने घरको चढा आवे। फिर तामेके यदि शक्ति 
पहिलेद्दी स्नान करे । अपनी शक्तिके अनुसार सुवर्ण,चांदी | न हो तो ग्रेमस मृत्तिकाके ही पात्रमँ तिलोंकी पीठी 
या अछाजुके ही पात्रमें तैठकी महारजन (कुसुंभ) से छाछ- | धवं, गुड और सुवर्णका तालपत्राकार आभूषण यदि 
रज्ञी हुई बत्तीको प्रज्बलितकरे और एक!प्रचित्त होकरआप | सामथ्य न हो तो तिलकी पीठीकाही वो भूषण बना उस 
उस दीपकको अपने शिरपर घरे, सूयदेवका ध्याव अपने | छाडबखसे आच्छादित करे । पुष्प धूपादि द्वारा उसका 
मतम करता हुआ * लमस्ते ! इस सनन्‍्त्रकों पढे, फिर उस | पूजन करे। पीछे आचाय और अन्यान्य ब्राक्षणोंका 





















१ ताम्नसय इत्यपि पाठ; । 


ज्ड्क् 








न्‍क 


आदित्यस्य पसादेन प्रातःसनानफलेन चा॥दुष्टदोर्भाग्यहुःखन्ने मया 


०. 


कर पलक बज व ( दत्त तु तालकम्‌ ॥ दाहकम 
तालकपत्रं कणाभरणविज्वेष: ॥ पूजयित्वोपदेष्टारं वित्रानन्पांश् पजयेत्‌ ॥ ततो दिन समर च 


ऊँ 8“ के शरातमा हे हटनबड कु हुए थक १मव्लका- 
के हर चड, 


भास्कर ध्यान तत्पर;॥ भांस्करस्य कथाः <एःक्षन्या वा घर्मसंहिता।॥ पाषण्डादिभिरालापदर्श- 
नस्पशनादिकम्‌ ॥ वजेयेत्क्षपयेत्पाज्ञस्ततो वन्धुजनेः सह ॥ नह शुझीत च नरो दीनान्‌ 
संभोज्य शक्तितः ॥ एतसे कथित पाथ रः्ट्ोशाम्शकारऋमस ॥ अचलासपतमीस्यानं सर्वकाम- 
फलभदम्‌ ॥ इति पठति समग्न॑ यः शुणोति प्रसड्भात्कलिकल॒बबिनाश समभीस्नानमेतत्‌ ॥ मति 
मापे च जनानां यो ददाति प्रयत्नात्छुसर्सदनगतोउसो सेव्यते चाप्प्रोनिः ॥ इति भविष्ये 
अचलासप्तमीव्रतकथा समात्ता ॥ अस्यामेव पुत्रस॒प्मीब्रतर ॥ मदनरत्ने आदित्यपुराणे ॥ जादीत्प 
उवाच ॥ माघमासे तु शुक्वायां सप्तम्यां संसुपोषितः ॥ यः पूजयेत माँ भक्त्या तस्याहं पुत्रतां 
ब्रज ॥ एवं चोमंयसप्तम्यां मासि मासि छुरोत्तम ॥ यस्तु मां पूजयेद्धकत्या सम कमेकमादराव॥ 
समकः-संवत्तर। ॥ प्रयथच्छामि सुत॑ तस्य द्यात्मनो छड्रसंभवम्‌ ! विस यशस्तथा पुत्रमारोग्य 
परम सदा ॥ माचमासे तु यो ब्रह्मज्छुकपक्षे जिलेन्द्रियः ॥ पाबण्डान्पतितानन्त्यात्र जल्पेद्वि- 
जितेन्द्रियः ॥ उपोष्य विधिवषत्छ्याँ श्वेतमाल्यविलेपने! ॥ पजयित्वा तु मां मक्‍त्या निशि 
भूमों स्वपेदबुधः ॥ प्रातरुत्थाय रूप्तम्याँ कृत्वा स्नानादिकाः क्रिया) ॥ पूजयित्वा तु मां बहन 
वीरहोम समाचरेत्‌ ॥ वीरहोंगी नाम अभिदोत्रहोमा । मीजयपित्वा हरि महत्तया हावेषा पद्मलोचनम॥ 
हरिः-आदित्य।॥ दध्योदनेन पयसा पायसेन द्विजांस्तथा॥ तस्येव क्ृप्णपहूण्य घष्ठयां सम्यग॒पो- 
पित/तस्वेवेति माधमासस्य ॥ रक्तोत्पलेः सुगन्धात्ये रक्तयुष्पेश्न पूजपरेत्‌ । एवं या पूजयेद्धक्त्या 
नरो मां विधिवत्स॑दा ॥ उम्रयोरषि देवेन्द्र स पुत्र छमते वरम्‌ ॥ इति पएुच्च उत्तमीत्रत संपूर्ण ॥ 





पूजन करके 'ओं आदित्यस्य” इस मन्त्रकों पढवा हुआ | 
९. हक बाप आप कप 
उसे अपने घरपर छेजानेको अनुमति दे, उसका यह अथ | 


हैं कि, आदित्य देवके प्रसाद और अचलासप्रमीको प्रातः- 


8३) 


कथाओंको सुने अ 


दी हें यह ध्नान सोन्दर्यसम्पत्तिको ही नहीं, किंतु स्नान 
कंरनेवालेके सब मनोरथोंकी पूर्ति भी करता हैँ । जो पुरुष 


किसी झादुणान्तरसे भी इस पूर्वोक्ततिधिवाडे अचलासप्र- | 


मीके समग्र स्नान माहात्म्यकों सुनता है उसके भी कंलियु- 


गके प्रभावसे किये पाप नष्ट हो जाते हैं | स्तवान करनेवाला 


सरतेके बाद सुरपुर प्रस्थान करता है, जो कथा झुनावा हे 
बह अप्सराओं से सेवित हुआ विहार करता हैं । यह 


समाप्त हुईं ॥। 
१ ता एवं चत्यपि पाठः | 


और जो धासिक और ओर कथाहों उनत- 
कामी श्रवण करें, किंतु नास्तिक पापी जनोंक साथ सम्भा- | 
.ु हक] किक 

षण और मिलाप न करे । होसके तो ऐसे जनोंक्ा दृष्टिपा- मी 
दे । !॒ 

तभी न होनेदे। इस प्रकार उस अवशिष्ट दिनको बिताकर | रे 

राज्रिम वान्धवोंको अपने पास बेठाकर आप भोजन करे | अपिय कक कह जल 

और दीनोंको भी यथाशक्ति भोजन करावे | श्रीकृष्ण बोडे | भूमिपर सोजाय । सप्रमीर्म प्रातः:काक उठकर सना 


८5 है पाथ | मने अचछा समप्रमीके र 
-है पाथ | वेधि कह | 
कि-हे पाथ ! मेने अचछा सप्रमीके स्वानकी सब विधि कह | वीरहोम नाम जशिहोत्र होसका हैं । 


'हरिको प्रसन्न करके, हरि आदित्यकों कहते हैं। दृध्योदन 
| पथ और पायससे जाह्यण भोजन कराये उसी माधमासके 
| क्ृप्णपक्षकी षष्ठीको भद्वीभांति उपोषण करके ( डसीकेसे 
| मतलब साधमासस 
| फूोंसे पूजन करे. जो मनुप्य हसेशा इ 
| पूजन करता है एवम्‌ दोनों सप्तमियोॉमें ब्रत करता जाता हू, 
है देवेन्द्र | वो अरष्ठ पुत्र प्राप्त करता है। यह उतर सप्तमीके 
5३ 4 न 
भविष्यपुराणकी कही हुईं अचछा सप्तमीके त्रतकी कथा | 





तो न कट कक 
य इत्थमिति पाठ: | ३ षष्ठयामुपोषितः सन्सप्रम्यां पूजयेद्त्वन्तरय: । अमर घष्ठयामवो* 


पुत्र सतमी-यह्‌ ब्वभी इसी सप्तमीच होता हूँ, संदन- 
है (५ ., ५३ तय ३ 
र्नॉने आदित्य पुराणसे छेकर कहा ”हैं। आदित्य बोले 


| के जो उपोषणके साथ साथ शुद्ढा सप्तमीके दिन भक्ति- 
काछके स्तानके पुण्यस यह बालूपत्राकार कण भूषण मेरे | 
दुष्ट दौर्माग्य दारिद्रथादि दुःह्लोंको नष्ट करे | में इस इन 
ब्राह्मणोंको दे चुका हूं फिर अवशिष्ट जो दिन रहे उससें | 
भास्कर भगवानका अपने सनमें ध्यान रक्खे,उन्हींकी पवित्र | 


पूवक मेरा पूजन करता है मे उत्तके पुत्॒भावकों आ्राप्त हो 
जाता हूं। हे सुरोत्तम ! जो एक समछ-अत्येक सासकी 
प्रत्येक सप्रम्ियोंमें सक्तिभावके साथ इसी तरह मेरा पूजन 
करता हैं, मे उस औरस पुत्र इता हूं। समझ संवत्सरको * 
ऋहते हैं। उसे सदा वित्त, यश पुत्र और परम आरोग्य 
भी देता हूं! हे अह्य न्‌ ! माघ मासके शुक्तहुपक्षम जित- 
न्द्रिय हो एवम सली भांति इन्द्रियों जीतकर पतित 

सं के पष्ठीमें बेच उपोषण 
करके सफेद साला और विलेपनों से मक्तिपूर्वेक सेरा पूजन 


३. 5५५, 
नादि किया करके मेरी पूजा कर, हें जह्मन्‌ ! बीरहोम करे। 
हविस पद्चलोचन 


हक 


है ) रक्त उत्पछ एवं सुगन्धिदार लाछ 
हमेशा मेरा इस प्रकार बेध 


ब्रवक्ी कथा पूरी हुईं । इसके साथी सप्तमीके ब्रतभी 


मिलकर सनक /ककक००न ० कनमरारीनिकक बाज कक 


हा 
पोषणप््य विधानातू | ४ शुक्लकूप्णस्प्स्यापु । ५ प्रीणयेदति शपः। ६ सप्तस्योः 





अथ अष्टमीब्रतानि लिख्यन्ते ॥ 


चेत्रशुक्लाष्टम्यां भवन्युतत्तिः ॥ तत्र युग्मवाक्यात्परा ग्राह्मा ॥ अन्न भवानीयात्रोक्ता काशी- 
खण्डे-भवानी यस्ठु पर्येत युक्काष्टम्यां मधों नरः॥ न जात शोकें लभमते सदानन्दमयो 
भवेव ॥ अज्रैव अशोककलिकाप्राशन्मुक्त हेमाद्रों लेड्रेट-अशोककलिकाश्राष्टो ये पिबन्ति पुत्र- 
वंसो | चेत्रे मासि सिताष्टम्यां न ते शोकंमवाप्लुयुः ॥ प्राशनमत्जस्तु--त्वामंशों कवराक्रीएं 
मधुमाससमुद्धवम्‌ ॥ पिवामि शोकसन्तत्तो मामशोक॑ सदा कुरू ॥ अत्रेव विशेषः प्रथ्वीचद्धो- 

_ दये-पुनवेसुबुधोपेता चेत्रे मासि सिताष्टमी ॥ प्रातस्तु विधिवत्स्नात्वा वाजपेयफर्ल लमेत॥ 
बुधाष्टगो ॥ अथ बुधवारयुक्तायां गुक्काष्टम्यां बुधाष्टमीत्रतम्‌ । सा च परयुता गआह्या ॥ गुक्क 
पक्षेट्टमी चेब इक्कपक्षे चतुद्शी ॥ पूर्वविद्धा न करतव्या कतंव्या परसंयुता ॥ दिनद्वये तद्या- 
तावव्याप्ों वा पूर्वा ॥ मुहृर्तमात्रसच्वेषपि परा ॥ चेत्रे मासि च संध्यायां प्रखुप्ते च जनाददने ॥ 





अष्टमीव्रताने । 

अष्टमीके ब्रत-लिखजातेहँ । चत्रशुक्ला अष्टमीकों भवा- 
सीकी उत्पत्ति हुईं है, इसलिये भवानी जयन्त्यष्टमीत्रत चेत्र 
सुदि अष्टरीके दिन करना चाहिये । यह अष्टमी नवमीसे 
सम्बन्धवाली ही ग्राह्म है, क्योंकि अष्टमी नवमीके योगमे 
अष्टमी नवमीसे सम्मिछित ग्रहण करे। ऐसा युग्मतिथि- 
योंके निश्यमें धम्ममीमांसकॉने कहा हैं। इस अष्टमीके 
दिन भवानीक दशनोंकेलिय यात्राकरे । यह काशीखण्डसें 
लिखाहें कि, जो पुरुष चैत्र सुदि अष्टमीके दिन भगवती 
पावंतीजीका दशन करता है, वह पुरुष कभीमी पुत्रादि- 
कोके मरणजन्य शोकका भागी नहीं होता, किंतु सदेव 
आनन्द मूर्ति रहता हैं। अशोककलिका प्राशन-यानी इसी 
चेन्रसुदि अष्टमीके दिन अशोकवृक्षकी कछिकाका भक्षण 
करना चाहिया यह हेमाद्विने लिक्लपुंरणस लिखा हैं कि,जो 
पुरुष चेत्रसुदि भ्रष्टमीके दिन पुनर्वेश्नु नक्षत्रके रहते जशो- 
ककी आठ कलियोंकों पीसके पीते हैं, वे कभी भी शोकके 
भागी नहीं बनते । पीनेके समय 'त्वामशोक” इस मन्त्रको 
पढ़े कि, है अशोक ! तुम परमपवित्र हो। चेत्रमासमें 
तुम्हारा प्रादुर्भाव हुआ है। में शोककी यादसे सन्‍्तप्त हुआ 
आपकी कछिकाओंके रसका पान करता हूं, आप मुझे सदा 
अशोक करें ॥ इस विषयम प्ृथ्वीचन्द्रोदयमें कुछ विशष 
डिखा हे कि, चैत्रसुदि अष्टमी पुनर्वश्ु नक्षत्र और बुधवा- 
रसे संयुक्ता हो तो इप्में प्रातःकाछू स्नान करनसे बाज- 
पेय यज़्क फलको पाजाता हैं ॥ बुघाष्टमीत्रत-बुधवारी 
 अष्टमीको होता हैं । इसमें अष्टमी नवमीसे युक्ता लेनी 
चाहिये, क्योंकि, शुक्लपक्षकी अष्टमी और शुक्लपक्षकी 
चुद श्षी पूेविद्धा न करे किल्तु पर संयुक्ता करनी चाहिये, 
बक दिन उसकी व्याप्तिहो अथवा न हो तो पूर्वा छेनी 
भी हो तो भी परालेनी चाहिये ! 


» यदि मुहतेभाज 
४रने चुधवारी शक्लाष्टसीको बुधाष्टमीत्रतका विधात्त 


किया हैं । अष्टमी तिथि पूविद्धा और परयुता दोनोंही 


मिलसकती हे, केवछ अष्टमीका ही विचार हो तो पूर्वाके 
अहणका ऊपर कहाहुआ विचार होसकता है पर यह व्रत 
वारप्रधान सादूम होता हैं, बार दो नहीं हो सकते, इस 
कारण लछेखककी कहीहुईं बुधवारी अष्टमी दो दिन नहीं 
मिठ्सकती । इस कारण उसके छिये ऐसा विचार करना 
उचित नहीं जानपडता । इसीवरह अष्टमीके अहणका 
विचार भी केवल त्याग ओर ग्रहणमात्रकाही मारुम होता 
है कि, बुधवारको पूवविद्धाका ग्रहण न करे परयुता हो वो 
उसमें ब्रत करें पर इस पूर्बनि्णीत खिद्धान्तके साथ भी 
“४ दिनद्वयो: ”” इस पंक्तिका विरोध होता है, इसके सिवा 
निणयसिन्धुमें छिखा है कि, श्रतमाज्रमें क्ृष्णाष्टमी पूर्वा 
और शुक्छाष्टमी परा ग्रहणकी जाती है ऐसा माधवका मत 


है । दीपिकार्स भी यही लिखा है कि, परयुत्ता शुक्छाष्टमी 


और पूवविद्धा कृष्णाष्टमी प्रहणकी जाती है, किन्तु शिव 
ओर शक्तिके उत्सबोमें क्ृष्णाप्टमी भी परयुता या उत्तराही 
लीजाती हैं| यह माधवका कथन है, दिवोदासीयमें भवि- 
पे ध््‌ च 

प्यसे लिखा हैं कि है राजन्‌ | जब जब शुक्छाष्टमी बुध 
वारी हो तब तब उस एक भक्तवाल् पुरुषको प्रहण करनी 
चाहिये किन्तु संध्याकाढू चेत्र और जनादैनके शयनमें 
बुधाष्टमी न करनी चाहिये, क्‍योंकि, करनेस पूर्व पुण्योंका 
नाश करती हैं, इसका आखिरी “ हन्ति पुण्य पुराक्षतम्‌ ” 
इतना टुकडा नहीं रखा है। इससे नियेध तक लो उसके 
यहां भी सिद्धहीहे कि,इनमें वुधाष्टमी भी करनी चाहिये॥ 
इस देखकर हम इसी सिद्धान्तपर पहुँचे हैं कि, वार प्रधान 
माननेपर तो इस विचारकी कोई संगति ही नहीं है। यदि 
वार प्रधान न हो तो उस समयभी पूंवेविद्धाके अहणका 
निषध करनेवाढा वाक्य स्वयंही निर्णायक होगा । उस 
पक्ष भी इसकी आवश्यकता नहीं हैँ इस सबके ऊपर 
दृष्टिपात करनेसे सुतरां हम इस निश्चयपर पहुँच जाते है 
कि यह पाठ सवंधा असंगत है इख्रकी कोई आवश्यकता 
नहीं है. । ) 


अन्दर ० 


बुधाष्टनी न कतेव्या हन्लि पुण्य पुराक्ृतम्‌ ॥ अथ ब्रतविवि:--मासपकश्षाहुछ्िर्प मम इहजन्मनि 
जन्मान्तरे च बाल्यादारभ्य कमंणा मनसा वाचा जानताजानता वा कृतपरस्वाद्यपहतिदोष- 
परिहाराथ पुत्रपोत्रादिसकलमनोरथसिद्धिसाप्त्यथ औपरनेशरफीत्य/ बुधाष्ठमीवतमह करिष्ये' 
तत्र विहित॑ बुधपूजन च करिष्ये इते संकल्प्य ॥ बुध घोडशोपचारेः कलशोपरि पूजयेव॥चतु. 
बाँहूँ प्रहपति सुम्रसन्नमुखं बुधम्‌ ॥ ध्यायेहह शहचक्रासिषाशहस्तमिलाओियत्‌ ॥ पीतेमालया- 
म्बरधरः कर्णिकारसमद्यतिः | खड़चमंगदापाणिः सिंहस्थों वरदों बुधः ॥ ध्यानम्‌ ॥ ताराखुत 
नमस्ते5स्तु नक्षत्राधीश्वरप्रिय ॥ सहाण पूजा मगवन्समागत्य ग्रहेश्वर ॥ आवाहनम्‌ ॥ उद्बु धय- 
स्वेत्थ्चा मध्य बुधमावाह्म अविदेवतां विष्णुमिदंविष्णरोति मन्त्रेण प्रत्यधिदेव्ता नाशयणं 
सहस्नशीर्षेति सूक्तेनावाहयेत्‌ ॥ इलापते नमस्ते5प्तु निशेशभियसूनवे॥हमसिंहासन देव ग्रहण 
प्रीतये मम ॥ आसन स०॥शीतलोदकमानीतं झुपुण्यसरिदुद्भधवम्‌ ॥ पाष्य॑ गहाण देवेंश ममाघ- 
परिशुद्धये ॥ पाद्य स० ॥ ताराखुत नमस्त5सतु सततं भगवत्मिय ॥ झहाणाध्य अहपते नाना- 
फलसमान्वितम ॥ अध्य स॒० ॥ सुगन्धद्रव्यसंयुक्तेः शुद्धेः स्वाइसरिजजले। ॥ आचम्यतां निशा 
नाथनन्दन भीतये मम ॥ आचमन स० ॥ प्योदथिवृतमधुशकेरासंयुत्त मया ॥पश्चामर्त समा- 





चेनत्रभासमें; सन्ध्यामें, जनादंनके शयनमें बुधाष्टमी न कर, | अश्नि देवता, परमेष्ठी ऋषि और आर्षीत्रिप्दुय माना है। 


करे तो पूर्वपुण्यका माश होता है ॥ ब्रतविधि-अ्रथम् 
चावछ जछ और छुछ द्वब्य हाथ लेदर “ओ तत्सत्‌ 
इत्यादि देश, काछ और अपने गोत्र नामादिकोंका उस्छेख 
करके 'मम्र! इस मूलसें उल्लिखित वाक्यसें सकलप करे 
और उन चावरू, जछ ओर द्र॒व्यकों छोडें। मप्र! इसका 
अर्थ है कि, मंने अपने इस जन्‍्ममें तथा दूसरें जन्मके 
बाल्यावस्थासे लेकर अबतकके शरीरसे, मनसे और वाणी 
स एवं जानस या अनजानसे दूसरेके द्रव्यादिका जो अप- 
हरण किया हैं; उस पापकी निवृत्ति तथा पुत्र पौत्रादिकोंकी 


| हक दूर है रम॑ थ्‌ रथ थ्‌ 
सम्पत्ति एवं दूसरे दूसरे सभी मनोरथधोंकी पूर्षि तथा श्री- | ज्ञरायण भगवानका पुरुषसू 


भू सिक्ले बा ु २ +क ञ <्‌ कक का पी. 
परमेश्वरकी प्रीतिके लिये बुधाष्टमीके ब्रतको करूँगा ओर | पहिले अर्थ कर चुके हैं. ] 'इलापते' इस मेत्रसे बुघदेवके 


उस बुधाष्टमीमें विहित बुधपूजनकों भी करूंगा । बुधदेव 
की मूर्ति बनवाकर कलशपर स्थापित करे, षोडश डउचारों 
से पूजन करे। ' ध्याये5३ ! इस मन्त्रसे प्रथम बुधदंवका 
ध्यान करें। इसका यह अथे है कि, चतुभुज, ग्रहोंमें श्र 
अत्यन्त प्रसन्न मुखारविन्द्वाले, शख, चक्र, खद्, ओर 
पाशसे शोभायमान चार हा"वाले इलाके वलछभ ( पति ) 
बुध देवका में ध्यान करता हू । पीत पुष्पोंक्ी माछा और 


इसका अर्थ भी अप्नि देवके विषय ही किया है। पर 
कम्तकाण्डके मंत्रसंगहरस इसे बुधके आवाहनमे इसका 
विनियोग किया हल इस कारण इसका बुधपरक अर्थ करते 
हैँ--आप बुधदेव हैँ आप सावधान हों मेरे आह्यानको 
सुनकर यहाँ पधारें । आप इष्टापूते और निरो गवाके देने 
वाल ह, इन सबके साथ बेठनेके स्थानमें आप बेठें जहां 
कि, सब देवता और यजमान बेठे हैं। इस मंत्रस मध्य 
बुधका आवाहन करके '"'इद्‌ विप्युविचक्रमे ” इस मेत्रसे 
अधिदेव विष्णु भगवानका झावाहन करके प्रत्यधिदेव 
_क्तते आवाहन करे [ इनका 


छिये आसन दे | इसका यह अथ हैं कि, हे इछावल्छभ ! हे 
चन्द्रमाके प्रियनन्दुन | आपके ढिये प्रणाम है । आप मुझ्न 
पर प्रसन्न हों, सुवणके सिंहासनपर विराजिय | 'शीवछो- 
दको इस मंत्रस पाद्य दान करे | इसका यह अथ हैं कि, 
देवेश | आपके वाद प्रक्षारून करनेके एवं पापोंसे निमुक्त 
होनेके लिये पवित्र नदियोंस शीतछ पानी छाया हूँ । इस्र 


हि 


हल्थ६ कम ॥ दब । कै." े करे 
पीवाम्बरकों घारणकरनेवाल, कर्गिकारके समान कान्ति- | पायको आप ग्रहण करें। 'ताराघुत” इससे अध्यंदान कर। 


वाले, खज्ज चम्मे और गदाधारी, सिंहवाहन बुधदेव बर 
देनतार है । 'तारासुव ? इससे आवादन करें| इसका यह 
अथे है कि; हे तारानन्द्न | हूँ नक्षत्राधीश चन्दरप्ताके 
प्रिय पुत्र ! दे प्रहोंमें मुख्य बुध ! आप यहां पघारें मे आप- 
का पूजन करता हूँ । आप स्वीकार करें। आपके लिय भम- 


शक 


अर्थ यह है कि, है वारानंदून ! है. भगवानके पियारे ! हे 
प्रहपते बुध! आप पू्गीझृठादि समेत इस अध्येपान्नको 
ग्रहण कीजिये। छुगधद्॒व्य इससे आचमसनीय पात्रस आच- 
सन करावे | इसका यह अथ है कि दे निशानाथके नन्‍्दन ! 
आप मेरे भछेके लिये सुगन्धित, पवित्र, मधुर नदीजछसे 


धूः 


स्कार है “ ओ उद्बुध्यस्वाप्रेप्रतिजागृहि त्वमिष्टापूर्ते सेस्- | पूण इस आचमनीय पात्रको छेकर आचमन कीजिये। 


कक 3५३ ७. 
लेथामय स्व, अस्मिन्‌ सधस्थे5अध्युत्तर॒स्मिन्‌ विश्वेदेवा यज- 
मानइच सीदत ” इस मंत्रका यज्ञर्म विनियोग किया है| 


'पर्योदधि! इससे पंचाम्रत स्नान करावे । इसका यह अथ 


दि 


१ छुदे ध्यान मापत्योआमन्य पद । 


३३ 


हीन॑ सस्‍्तानाथ्थ स्वीकुद प्रभो ॥ पश्चामृतय्‌ ॥ वासितले गन्धकर्पूरनिंमल जलमुत्तमम | स्वानाय 
ते मया भकत्या दीयते व्रतसिद्धये ॥ अतो देवादिकेः बड्निः स्वापनीयह्ततों बुधः ॥ पोह- 
देण च सुक्ेन उद्वुध्यस्वेत्यूचेरया ॥ स्नानम्‌॥ पीतवख्चद्वयं देव राजबंशकर मभो॥उर्वशीनाथ 
जनक गहाण मीतये सदा ॥ बख्थम्‌॥ यज्ञोपवीतकं सूत्र त्रिगणं तिद्शनिय ॥ मम -पाशदवि- 
नाशाज गहाण प्रीतये बुध॥ उपवीतम्‌॥ हरिचन्दनकस्त्रीकपूरादिसमन्वितमू ॥ गदर 
समपये तुभ्यमिलानाथ नमो5स्तु ते ॥ गन्ध स०॥ अक्षताँश्व० अक्षतान०ा।माल्यादी०पुष्पाणिग। 
बथाडपुजा---बुधाय० पादौं पू० । सोमपुत्राय० जाछुनी पू० । तारकाय०कांडिं पू०। राजपुत्राय० 
उदर पू० । इलाभियाय०हृद॒य पू० । कुमाराय० वक्षःस्थलं पू० । पुरुश्व+पिन्रे ०बाहू पू० । सोम- 
सुताय० स्कन्धों पू० । पीतवर्णाय० सुख पू० । ज्ञानाय० नेत्रे पू० । बुधाय० सूधोन॑ पू०। 
सोमसूनवे० स्वांड्रं पू० ॥ बनस्पतिर० घृपम्‌ ॥ साज्य॑ चेति दीपम ॥ नेवेदं ग० नवेशम॥ 











पूगीफलमिति ताम्बूलम्‌ ॥ इदं फलमिति फलम्‌ ॥ हिरण्यगर्भाति दक्षिण 


पेचोंअम्नर्तोंको आपके स्नान कराने छाया हूं। आप ग्रहण 
करें। वासित ! इस मेत्रस शुद्ध स्नान करावे। इसका 
यह अथे है कि,चन्दन कपूरस पुगन्धित निम्मेछ जरू आप 
के स्तान करानेके लिये लाया हूँ। एवं भक्तिसे समर्पित 
उरता हूँ आप इसे छीजिये, जिससे यह ब्रत पूण हो । 
अतो देवा यह ऋग्वेद अष्टक १ अध्याय दोका सातवां छः 
ऋचाओंका सूक्त है ॥ [ इसमेंसे--“अतोदेवा” तथा 
“ इदे विष्णु: ” इन दोनों मेत्रोंक्नी व्याख्या ३९ वे प्रष्ठमें 
कर चुके हैं |“ ओ त्रीणि पद विचकर्ें विष्णुोपाउअ- 
दाभ्य:। अतो धर्माणि धारयन्‌ ” किसीसे किसी तरह भी 
न॑ दुबाये जानेवाले सबके रक्षक विष्णु सगवानने हृव्य- 
वाह अग्निक्क रूपसे तीन अग्नि कुण्डो्म अथवा वासन रूप 
से तीन पदोंसे अतिक्रमण किया। अप्रिसे यज्ञादिक धर्म 
तथा उपेन्द्ररूपसे इंद्रका परिपारुन और वात्सल्यादि धर्मों 
को धारण किया ।“ ओं विष्णोः कर्माँणि पश्यत यतो 
त्रतानि पस्पशे, इंद्रस्य युज्यः सखा।" जिस कारण ब्रतोंका 
निर्माण किया हैं विष्णु भगवानके उन कर्मोंको जानों । ये 


इंद्रके योग पाने योग्य सखा रत !। “ओऑ तंदू विष्णों: परम 


पर्द सदा पश्यन्ति सूरय:, दिवीव चश्लुराततम्‌ ” प्रकाश- 
शील वंकुण्ठमें जिसके छिये कि, ऋषि मुन्रि य॒त्न करते 


हि थ दि हक 
करते थंक गये पर न पासके उस परमपदको यात्ती 


आश्नितवत्सछ भगवदश्चवरणको विष्वकू सेचादि अनत कोटि 


सूरि निरनिमेष दृष्टिसे देखते रहते हैं, अथवा जैसे आवरण | औौ 


रहित आकाशमें आँख खोलकर सब कुछ देखलेते हैं इसी 
त्तर 0 अल भक्त परसात्माके परमपदको देखा करते 
है अ तदूविप्रासो विपन्यवों जागृवांसः समिन्धते, 
विप्मो पदम्‌ ४? विष्णु भगवान्‌का जो परमपदहै 


+ कृति शील सुजन ही देखतेई । थे ही बैकुण्ठमें जाकर 





$ 





देदीप्यमान होते हैं । इन छः सन्‍्त्रोंसे पुरुष सूक्त और 


म्‌॥ भ्रियेजात इते 








'उदबुध्यस्थ' इससे बुधको स्नान कराना चाहिये। [अधि' 
देवता प्रस्यधिदेवता और देवताके ऋमसे तो यही ध्यानमें 
आता है कि, अतोदे वा आदि छः मनन्‍्त्रोंस विष्णु भगवार 
को तथा पुरुषसूक्तसे नारायणका एवम्‌ उद्बुध्यस्व इससे 
बुबको स्तान कराना चाहिये क्‍योंकि आवाहनमें यह क्र 
हैं| पीत वस्र, इससे वस्य चढ़ावे | इसका यह अर्थ हैं कि। 
राजाओंके वशको उत्पन्न करनेवाले हे प्रभो ! है उ््शीके 
पति पुरूरवाके जनक ! आप मुझपर कृपा करनेको इन 
दोनों पीववस्थोंको स्वीकार करें । “यज्ञोपवीतकम्‌' इससे 

७ च्क, 0 जि. . 
यज्ञोपवीव चढावें। इसका यह अथे हैं कि, हे देवताओंके 
पियारे हे बुध ! आप त्रिगुणित सूत्रवारे यज्ञोपवीतको 
लीजिये । मर पापों का नाश करनेके लिये मुझे अनुगृहीत 
करें|  हरिचन्दन! इससे चन्दन चच्चित करे । यह इसका 
अथ है कि, है इलाके प्राणनाथ | चन्दन, कस्तूरी, कपूर 
ओर केसर इनसे मिश्रित इस गन्ध्स आपको घर्चित 
करता है, आपके छिय प्रणाम है । “ अक्षत्रांश्व ' इससे 
चावल और “ माल्यादीनि ? इससे पुष्पोंको चढावें। अज्ज' 
पूजा--बुध, सोमपुत्र, बारक, .राजपुत्र, इछाभ्रिय, कुमार 
पुरुरवः पिता, (पुरूरवाराजाके पिता ) सोमसुत्र; पीतवर्ण 
ज्ञान, बुध, सोमसूनु ये बारह नाम हैं तथा पाद जातु कट 
उद्र, हृदय; वक्ष'स्थल, बाहु, स्कन्द, सुख, नेत्र) मूथा 
र सर्वाज्ञ ये बारह हैं; पहिले कहे हुए नामोंके मन्त्रो्म 
से छकएकसे एक अद्भका पूजन होवा है | वाक्य योजवा* 
का वही पहिलछा तरीका है। ' वनस्पति! इस पूर्वव्याख्या 
तमत्रस धूप, 'साज्य च वत्तिसंयुक्ते' इससे दीपक “नंबय 
गृह्नतां ! इससे नव, पूणीकृर सहहिव्य! इससे त'म्वूल 
ओर पूगीफछ,  .इदू फर् -मया'. इससे ऋतुफछ, * हिंर 
'ए्यमभेगभस्थ ! इससे दुक्षिणा, “ अ्ियेजातः ” इससे 


सकल: अपल अपर थ  >त पी व मल लीड जन दल लक _अअयश+“पीतमकाा जी ३3004 ० कसा 4०७ मान गहरी ३७००० मा म >> न्‍करमकाम>म-मे-सक8 3५3० > या: -. अअ-+- पल सकीकााआथ2अ कान गही,.. ५5 -म + 


नीराजनदीपम ॥ उद्वुध्यस्वेति पुष्पाखालिम ॥ 


अहमध्ये खुरूपो यो बुधो नः सम्मसीदत ॥ विशेषाध्येम्‌ ॥ यानि कामनि चेति भदक्षिणाम्‌ 


के 


उर्वश्याश्र पतियसतु यः पुरूरवसः पिता ॥| 
; 


नमस्कारान ॥ आवाहन नेति मार्थनाध्लठुह्दों वायमादस्मादिलानाथों ग्रहेशवरः ॥ सतदुलाष्ट- 


लड़्डक॑ मतिरहात वायनम्‌ ॥ वायनम्‌ ॥ हे 


पूजलम्‌ ॥ जब 5था ॥ श्रीकृष्ण उबाच 


॥ बुधाडू- 


मीज्रते भय वक्ष्यामि शणु पाण्डव ॥ गन चीर्णेन नरके रूरः पश्यालिे न छँित्‌ हे १॥ डुधि 


अथच त्ध्ज्थाय सी 


हिर उदाच ॥ चुधाइमीघर॑ 


है 


दि तत्कस्मात्यापाच सुखति ॥ तत्सवे दद्‌ निड्ित्य मम देव दया- 


निथ॥ २॥ श्रीकृष्ण उवाच ॥ पुरा कृतझुगस्यादौ इलो राजा बभूव ह ॥ बहुमभ्वत्यसहन्मित्रं 
रे आप हि कक | दि क्‍ हा 
मीम्म्रिज्निः परिवर्तित: ॥ ३॥ जगाम हिमवत्पाश्ल महादेविन पालितम्‌ ॥ योषस्यां अविशते 


भूमों स स्री मवति निश्चितम्‌ ॥ ४॥ 
हयमःरूठः क्ष णात्खीत्व जगाम है ॥५॥ 


कुल आता न साबइुध्यत किश्वन ॥ ६॥ ता दद्‌ 


बुधवारे च तस्यास्तुष्टो बुधम्रहः ॥ ७ ॥ ददो 
दयामास योपसो ख्यातः पुरूरवाः 


८ 


॥ ८ ॥ चन्द्रबंशकरों राजा आद्यः 


स राजा मृगयासक्तः प्रविष्टस्तइमावनम्‌॥ एकादी 
सा बच्चाम वने शन्ये पीनोन्नतपयोधरा | काह कस्य 
गे बुधस्तन्वी रूपोदायेगुणान्विताम ॥ अष्टम्यां 
गहाअरम रम्यमात्मीयं रूपतोषितः ॥ इच्नडुर . 


सर्वेमहीभाताम ॥ तत$- 


इथ्वाति पूज्येयमष्टमी बुधसंसुता ॥ ९॥ सर्वप्कम्शमनी सर्वोपद्रवनाशेनी ॥ अथध्य#ई: ते 
आओ 3 अााा अप, 

बच्मि धर्धेराज कथानकम ॥९ ० कृष्ण उबाच॥।आसीद्राजा विदेहायां (नेमिनोमा स बेरिनिः ॥ 

संग्राम निहतो वीरस्तस्य भायातिनि्षना ॥ ११ ॥ ऊमिला नाम बंच्ााम मही दाहकऋहाइला ॥ 


॥००-4६/७यामकिकी एक आम ने ५०० ०५ + मकर 200५० ९६०४०8::286%6 ++ 3 पड: - करन ए3स्‍+० बा पा? 








उर्वश्याश्व ” इससे विशेष अध्यंदान करे। अथ यह है| 
कि, जो उर्वशीका वचद्धम राजा पुरूरवा हुआ हे/उसके पिता | 
और सब ग्रहोंमें- सुन्दरमें सुन्दरजो बुध हैं वे हमपर असन्न | 
हों अध्यग्रहण करें | * यानिकानिच ! इससे अदक्षिणा | 
करके अंजलि जोड साधाइप्रणाम वारबार करें; आवाहन | 
न जानामि ? इससे प्रार्थना करे । 'सन्तुष्टो वायना' इससे 
गुरुको वायना प्रदान करे। अथ यह हे कि, ताम्वूछ और | 
आठ छड्डूके वायन देनेस इलापति ग्रहश्रष्ठ बुध असतन्न | 
होते हैं। अतः ताम्बूछादिकोंका वायनता दान करता हू, 
आप अज्भीकार करें ॥ कथा-श्रीकृष्णचन्द्र बोछे कि; हे 
राजन | हे पाण्डुनन्दन ! जिस व्रतके करनेसे मनुप्य कभी 
भी नरकका द्वार नहीं देखता में डसी बुधाष्टमीके ब्रतको 
कहता हूं ॥ १ ॥ युधिष्टिर बोले कि, हें दयानिधान . वह : 
बुधाष्टमी ब्रत किस अकारका होता है! उसके करनेसे किस 

पापकी निवृत्ति होती हैँ?! आप निश्चयकरके एक यथाथ 

तत्व जो उसे कहिये ! ९॥ श्रीकृष्णचन्द्र बोले कि, पहिले 


जंधव४$#9057 १९5८० उकक. 


सत्ययुगके आरम्भकाल्‍ूमें एक इछनामक राजा हुआ था। | 
( इस राजाका दूसरा नाम “सुझुज्न ' था ।) वह किसी | 
समय बहुतसे किंकर पियारे मित्र एवं मन्त्रियोंको संग | 
ले ॥ ३ | हिमालय पर्वतके एक पाश्चववर्त्ती प्रदृशर्म गया 
जो महादेवजीसे पालित था । उसमें घुसनंवाला जरूरही 
स्त्री बनजाता था ॥ ४॥ झूगया विहारमें आसक्त हो उमा- 
वनमें घुसगया, जेसे कि सबसज्लियोंकों पीछे छोड घोडेपर 
आरूढ़ हुआ एकाकी हो उस वनमें प्रविष्ट हुआ वसेही ख्री 


अिवफबाटपनका:2: 


नीराजन “ऑडद्बुध्यस्वामे” इससे पुप्पाजाल प्रदान करे | 














होगया ॥ ५॥ [ वो पावतीके विहार करनेका रहोवन था, 
इसीस इस उम्ावन रहते हैं। इसमें प्रवशक विषयमें महा- 
देवजीकी यह आज्ञा है कि, जो कोई यहां पुरुष चिह्ृवाढा 
प्राणी आवेगा, वह उसी क्षण अवश्यही स्री चिह् धारी हो 
जायगा।  इसीडिय बह पीन उन्नतस्नों से सुन्दर, सुश्र हो 
शूल्य वनमें इधर उघर अपने अजुयायियोंकी खोजसे धृप्नने 
छगा | वह इछारानी अपने मन शोचने छगी कि, में 
कहां आगयी, यह स्थान किसका है ? में यहां केसे चली 
आयी ? पर उस पहल नामरूपका भी स्मरण न रहा ॥६॥ 
ऐसे सुन्द्ररूप और दिव्य यौचनसे सम्पन्न हुईं उस इत्छा- 
रानीको चन्द्रसुत बुध देखकर कामासक्त होगये । बह 
वुधाष्टमीका दिन था | जिस दिन बुधजीन उस इल्ारानी 
पर संतुष्ट हो आसक्ति की थी | ७ ॥ उसके सौन्दर्यको देख 
चन्द्रलन्द्तते अपने गृहकी नायिका बनायी । उससें उन्होंने 
एक पुत्र उत्पन्न किया | उसका नाम पुरूरवा” हुआ ॥८४ 
यही पुरूरवा चन्द्रवंशी सब राजोंका वंशप्रवर्तेक आदियमें 
सम्राट हुआ इसी समयसे यह बुधाष्टमी अत्यन्त पूज्य हुई 


| ॥ ९ ॥ इसीसे इस दिन बुधकी प्रसन्नताक निमित्त जो 
| बुधका पूजन, व्रत और दानादि करते ह डनके सब पापोंकी 


्थू 


हर 


शान्ति एवं समस्त उपद्रवोंकी निवृत्ति होती हे। है धम्मे- 


| राज ! इस बुधाष्टमीके विषयमें और भी कुछ कथा कहता 


हूं, उस भी सुनो ॥ १० ॥ पूवकालमें विदर्भा ( मिथिला ) 
नगरी/ निमिनामका राजा था। शनत्रवॉने परस्पर में मिककर 
उस दीरको संभाममें मार उसका राज्य अपने अधीन कर 
लिया उसकी रानीक पास कुछ न रहने. दिया।॥ ११ ॥ 
निधना ऊमिला रानी अपने छोटी अवस्थावाल़े पुन्रीपुत्रोंको 





3ननननकीनिनननीननननन नमन कननन+%+34५»>ण मनन पता जा क 


अवल्तीनगर मराप्य बाह्मणस्य निकेतने ॥ १२ ॥ चकारोदरप्त्यंथ नित्य कण्डनपेषणे ॥ हत्वा सा 
सप्तगोधमान्ददों बालकयोस्तदा॥ १३॥ कारुप्यात्युत्रवात्सल्याःछष घासंपीडचमानयो: ॥ कालेन 
बहुना साध्वी पश्वत्वमगमत्तदा ॥ १४ ॥ पुत्रस्तस्या विदेद्दायां गत्वा स्वपितरासने ॥ उपदिष्ट 
सच्योगादुबुधुजे गामनाकुछाम्‌ ॥ १५॥ आन्वेष्य धमराजन सा कन्या निमिय शजा ॥ विवा- 
हिता दिता भठेंः सा महानायिकामबत्‌ ॥१३॥ इ्यामलानाम चाव ड्री संवलक्षणसंयुता | तांजु 
बाच वरारोहां धर्मराजः स्विकां प्रियाम॥१७।।वहर२व स्वेध्यापारं इ्यामले त्वे ग़हे मम ॥ कुरुष् 
संर्वभत्यानां दानाशिक्षां यथोचिताम्‌ ॥ १८ ॥ किल्त्वते भवराः सप्तकीलकेरतियन्त्रिताः । 
कदाचिदपि नोदाट्ास्त्वया वेदेहनन्दिनि ॥ १५॥ एबमस्त्वाति वे प्रोक्ता निजकर्म चकाए 
ह ॥ ( तंतो झुक्त्वा बुधस्याग्रे बान्धवेः प्रीतिप्षकम्‌ ॥ तावदेव हि भोक्तव्यं यावत्सा कथ्यते 
कथा ) कदाचैब्याकुलीभत्वा पर्मराज वैदेहजा ॥२०॥ डउद्घाययित्वा प्रथम ददर्श जननीं 
स्थिकाम ॥ पच्यमानां च रूदतीं भीषणेयमाकिहुरेः ॥ २१॥ लीलया क्षिप्यते बद्धा तप्ततेलेए 
सा पुनः ॥ तथेव तां समालोक्य ब्रीडिता सा मनारविनी ॥ २२॥ द्वितीये प्रवरे तद्गत्तां ददश 
स्वमातरम्‌ ॥ यन्त्र निष्पीडयमानां सा शिलायां लोष्टकेन च ॥ २३॥ तूतीये प्रवरे तद्गत्तामेष 
च्‌ ददर्श सा )। कारिभिः पीड्यमाना सा घण्टायइक्तेश्व काल्पितेः ॥ २४ ॥ श्वानिश्वतुर्थे भवरे भीष- 
शेदोरुूणाननेः ॥ अमक्ष्यभक्षणादेश्रा ऋन्दन्तीं तां पुत+ पुन+ ॥ २५ ।। पश्चमे भवरे भूमों कण्टे 








साथ लेकर अन्न वस्रकी चिन्तामें इतस्ततः धूमती हुईं उज्ज- 
यिनी नगरी आ पहुची । एक ब्राह्मणके ॥ ११ ॥ कूठने 
पीसनेके कामपर नियुक्त होकर उद्र पुर्ति करनेछगी।उसने 
उसके गेहूंओमेंस सात गेहूँंके दाने उठाकर अपने दोनों 
बाढकोंको चाबनेके छिये दे दिये ॥१३॥क्योंकि वोबालूक 
क्षुघास अत्यन्त पीडिब हो रहे थे । सन्तानमें स्वाभाविक 
वात्सल्य प्रेमभी हुआ ही करता हे। वह साध्वी बहुत 
समय बीतनेपर मर गयी ॥ १४॥ उसके पुत्रन अपने 


पिताके अनुरूप स्वाभाविक ओजस्विता धारणकर उसी | ते 


विदर्भापुरीमं अपने पित्ाके आसनपर बेठकर अपने बलसे 
भूमिको निःसपत्न करके भोगा ॥ १५ ॥ उस अपनी 
बहिनको, वरकी खोज करके धम राजके साथ व्याहदी ! 
वो पतिफी हितकारिणी महानायिका हुई ॥ १६॥ दइयामठछा 
उसका नाम था | अगना थी सबी श्रष्ठ छक्षण उसमें थे। 
धमेराज सर्वाज्ग सुन्दरी अपनी प्यारीस बोला ॥ १७॥ कि 
हे श्याम ! मेरे घरका सब कामकाज तू कर | एवम्‌ नोकर 
चाकरोंको यथा रीतिस शिक्षा दे ॥ १८ ॥ किन्तु देख , 
ये सात कोठे या पिंजडे कीछोंस खूब बन्दकर रखे हैं, हे 
वेदेह नन्दिनि ! इन्हें कभी भूलकरभी मत खोलना ॥ १९० 
फिर “एवमस्तु” अर्थात्‌ जेसी आपने आज्ञा की है, वैसेही 
सब किया जायगा, ओर वेसाही हो । इस प्रकार स्वीकार 
कर अपने उचित काय करने लगी । ( यहांपर एकछोक 
पूर्बापर रथासे विरुद्धाथेक मिलता है, अतः वह अक्षिप्तहै । 
उसका अधे यह है कि, फिर अपने बान्धवोंको समीप बैठा- 
१ प्रसिद्धा श्रूयते श्रतविति 


कर बुधके सम्सुख प्रसन्न चित्त होकर भोजनकर।भोजनभी 
तबतकही करना चाहिये, जबतक वह कथा कही जाय। 
अथांतू कथा सुननेके समयही ब्रतका विसजेन करके भोजन 
करे ) पीछे हे धमेराज ! किसी समय प्रमादवश हो विदर्भ 
नन्दिनी श्यामछा देवीने २०एक कीछा निक्ाढूकरपहि- 
छाप्रवर ( पींजरा ) देखा। उसमें देखा कि, मेरी माता यहां 
केद है । यमराजके भीषण किड्कूर उसे पीडित॒कर रहेहे । वह 
रोती है ॥ २१॥ निर्दय किल्लर उस बारबार बांधकर का 

लसे भरेहुए कडाहोंमें पटकते हैं । यह उन्होंने एक, खेढ- 
कर रखा है । इस प्रकार अपनी माताकी दृशा अपन यहां 
देखकर वह मनस्विनी श्यामढादबी छज्जित होगयी ॥९९॥ 
फिर उसके मनमें आतहू होगया।इससे दूसरे प्रवरे (पींजर) 
को उद्धाटित करके देखा । वहांपरभी वही अपनी भात्ा है| 
जेस ऊखको या कपास आदिको यन्त्रम देकर पेलते तथा 
शिलापर पीसते हैं, ऐसेही उसभी करते हैं । २३ ॥| कभी 
शिलाके ऊपर बेठाकर छोष्टकोंसे पीखते हैं । फिर वेसही 
तीसरा प्रवर ( पिखरा ) खोला; उसमेंभी वेसेंही अपनी 
माताको देखा | बडीबडी घण्टा जिन्होंके दोनों ओर ढटक- 
रही हैं, ऐसे हाथी उसे अपनी सूडस उठा उठाकर नीचे पट 
क॒ते हैं बारबार ठोकरोंसेडकराते है ॥९४॥ फिर चतुर्थ प्रवर 
( पिंजर ) देखातो उसमें भी भयद्डूर दंध्टा ओर दन्तवाल 
भयदूर मुख कुत्ते खारहे हैँ और कभी जो अभक्ष्य 
( मलमूत्रादि ) सक्षण करनेके लिये उद्यत कर उसे रुलाते 
है) कभी कुवाक्ष्योंस बारबार दुखी करते हैं। वही माता 
रोरही है ॥२५॥ पश्चम प्रवर (पिखर) खोला वो 


कल पाठ: २ जोश भाषया अेक्शणलेन बिता । इक व जक सर 
पजरझब्दो रश्यते ।३ अय दैंन सिद्धा: ॥ हेसाद़ों तु 


0 है।शयी पी दशर 





णानेतरभोजनत्यागरुपो दृश्यते । ४ 'युधिष्ठिससबोधनमू । 


कः पूवोत्तरसबंधाभावादुष्रानुपयुक्त: । छोकव्यवहारस्तु चकारहेत्यन्त कथा 


है। मय लक 


पादेन ताडिताम ॥ सन्दशधनपातिश्व छिह्यममानां सहस्यशः ॥२७॥ पष्ठे तामिश्ष॒यन्त्रस्थां मस्तके 
मुह्राहताम॥ संपीव्यमानामनिर्श छुदृशें दारुखण्डवत)।२७॥ सप्तमे प्वरे चेव कृमिरूपेः सदा- 
रूणे ॥ इष्ठा तथागतां तां तु मात्तरं हुःखकशिलास ॥२८ | स्यामला ब्लानवदना किचिन्नोबाच 
भामिनी ॥ अथागतो यमः पभाह सशोकां इयामलामिति ॥ २९ ॥ किमय म्लानवदना सिष्ठसि 
त्वमनिन्दिते ॥ कारण तत्र मे बहि कब्ित्रोद्घाटितास्त्वथा ॥३०॥ एले प्रवर॒काः सप्त निषिद्धा 
ये पुरा मया ॥ इत्युक्ता श्यामला प्राह भतार विनयान्विता ॥३१॥ कि तु पाप कृत राजन मम 
मात्रा खुदारुणम्‌ ।। येनेत्थं विविषेघेरिबाध्यते बहुशस्त्वया ॥ ३२ ॥ इत्युक्तः प्रियया पाह ताँ 
यमः प्रहसब्रिव ॥ तव मात्रा सुतस्नेहाहोधूमा वे हता।किल ।। ३३॥ किन जानासि तद्ध 

येन पच्छसि मामिह ॥ बहास्व॑ प्रणयाद्धक्त दहत्यासत्तमं कुलम।।३४॥ तदेव क्मिरूपेण छ्लिश्षा- 
त्यासप्तम कुलम्‌ ॥ गोघूमास्त इमें भूत्वा कृमिझूुपाः खुदारूणाः ॥ र२५ ॥ ये पुरा ब्राह्मणगहे 
हतास्ते त्वत्कृते मया ॥ जानाम्येतदहं सब यत्ते मात्रा कृतं पुरा ॥३६॥ इयामलोवाचातथःपि 
त्वाँ समासादध देव॑ जामातरं विश्वुम्‌॥ झुच्यते तेन पापेन यथा त्वमघुना कुछ ॥३०। तच्छत्वा 
चिन्तयाविष्टश्चिरं ध्यात्वा जगाद ताम्‌ ॥ धमराजः सुखासीनः प्रियां प्राणधनेश्वरीम्‌ ॥ ३८ ॥ 
इतस्त्वं सप्तमेपतीले जन्मनि ब्राह्मणी झुभा ॥ आसीस्तस्मिस्तदा सद्गाव्टखीनो पर्युपासिता 
॥ २९ ॥ बुधाष्टमी तु संपू्णो यथोक्तफलदायिनी ।। तस्याः पुण्य ददस्व त्व॑ सत्य कृत्वा ममा- 
प्रतः ॥ ४० ॥ तेन मुच्येत नरकात्ते माता पापसंघकृत ॥ तच्छ॒त्वा त्वरितं स्नात्वा ददौ पुण्य 


ककया पटएय 8: एप क्ार25002:७७७५६६०६८२ करा ऊड 82 











उसमें भी माताको सताते मिले । उसे नीचे पटककरशिरसें | 
छात मारते हैं। संडासियॉसे कण्ठको पऋकडकर वस््॒रकी | 
भांति निचोडते हैँ। कभी सहसख्रों घनोंस पीडितक्र छिन्न- | 
भिन्न करते हैँ ॥ २६॥ छट्ठे प्रवरको ( पिंजडे को ) जब | 
खोलकर देखा, तब उसमें भी अपनी माताकी वेसी दुदंशा | 
हो रही है । ऊुखके रस निकाढूनेक यन्त्रमें दृबाक उसके | 
मस्तकपर मुद्टरोंका प्रहार करते हैं। कभी जेसे काष्ठको | 
७ ॥ पीछे | 
सप्तम प्रवर ( पिजर ) के द्वारका कीछा दूरकर खोला। | 
उसमें भी माला उसीग्रकार पीडित की जाती हैं। भयंकर | 
कृमियाँ खारहे हैं वो अलन्त दुःखी हैँ ]२८॥ पर उस | 
सकटमें जीती हुईं अपनी दुःखित माताके दुःखको देखके | 
श्यामछा देवी शोकपग्रस्त होगयी। मुखम्ठान होगया | चुप- | 
चाप होकर एक जगह पडगयी | फिर यमराज आये, | 


तछते है, ऐसे ही बारबार इसी ताछते है 


उन्होंने अपनी प्रियाको शोशूप्रस्त देख पूछा कि || २९ 


उनके चरणोंम टिकाके प्रार्थना की ॥ ३१॥ कि, हेराजन्‌ 
उरी माताने ऐसा कौनसा घोर पाप किया था, जिसके 


॥ ३३ | 





प्रश्को सुन सन्‍द्सन्द हंसते हुए घमराज बोले कि, तुमारी 
माताने तुमार स्नेहसे ( ब्राह्मणके सात ) गोधूम उठाछिए थे 
॥ ३३, हे भद्दे | क्या तुम उस चोरीकों भूछ गयी हो ! 
नहीं जानती हो ! जो मुझसे तुम पूछती हो । याद 
रखना कि त्राह्मणगका अन्न प्रेमसे भी यदि खाया जाय तो 
भी वह अन्न खानेवाढेके सात कुलोंको दग्ध करता हे 
॥३४॥ इसीसे तुमारी माता सप्तम कुछडतक कृमि आदिकों 
से पीडित हो रही हँ। [ ये प्रवर ( पिखर ) कुलही हैं | 
वेही गोधूम भयंकर कोडे हो गए हू ॥ ३५॥ जो प 
तुमार छिए त्राह्मणक घरसे चोरे थे, जो तुमारी माताते 
पहिल किया था उसे मे जानता हैं ॥ ३६ ॥ ध्यामढाबोली 
कि, हे प्रभो ! फिरभी आप उसके जामाता हैं, सवंथा प्रभु 
हैं; आपका इस प्रकार आश्रय होते हुए बह किसी प्रकार 
उस पापसे छूटे, उस उपायकों आप करें | ३७ ॥ श्याम- 


| छाझे वचनसुनकर घमंराज पहिले तो बहुत चिन्तामें हुए, 
हे भामिनी ! क्‍यों उदास हो रहीहो ! हे अनिन्दिते | खडी | 
हो । तुमे क्या चिन्ता हें | उसका कारण कहो। कया । 
तुमने वे प्रवर ( पिखरे ) तो नहीं खोले हैँ ॥ ३० ॥ मैंने | 
इत्को खोलनेकी मनाही पहिल ही कीथी। एसे जब क्षपने | 
प्राणप्रिय धम्मराजजीन पूछा, तब श्यामछाने अपनेशिरको | 
| वह ब्रत संपूण किया था | अब तुम अपनी इस मसाताकों 
| मेरे सम्मुख सत्यप्रतिज्ञाकर उस ब्रतके पुण्यको दे दो 
कारण आप उसे इस प्रकार नाना तरहसे पीडित करते हो | 
है राजन ! जब इस प्रकार श्रियाने पूछा तो उम्त । 


बहुत समयतक विचार किया, फिर शोचकर अच्छी तरह 
अपने आसनपर विराजमान हो अपनी प्राणश्वरीस बोले 
(३८ ॥ कि, इस जन्मसे पू्व सप्तम जन्ममें तुम त्राह्मणी 
थी । उसमें तुमने अपनी सखियोंस मिरकर बुधाष्टमीका 
त्रल किया था उसकी जो विधि हे वदलुसार उपवासकर 


30 8 5. जिसके प्रतापस अभी तुमारी माता पाप 
पुखके छुशस निमुक्त हो जायगी। अपने प्राणप्रिय घम- 






त्रिवायिकम ॥ ४१ ॥ स्वमात्रे इयामला तुष्ठा तेन मोक्ष जगाम सा ॥| ऊनिला रूपसेपत्ना दिव्य 
देहा वराशुका ॥ ४२॥ विमानवरमारूढा दिध्यमाल्याम्बरादृता ॥ भतुः समीपे स्वग॑स्था 
द्ययतेध्यापि सा जनेः ॥ ४३ ॥ दुधश्य पा नमसि निमिराजलमीपगा ॥ बिस्फुरन्ती महा- 
राज बधाइ्म्याः अरभावतः ॥ ४४॥ झुधिष्ठिर उवाच ॥ यद्यव मदरा कृष्णा तिथि तु बुधा- 
छमी ॥ तस्या एवं विधि ६हि यदि ठुष्टोईलसि माषव ॥ ४५ ॥ श्रीकृष्ण उवाच ॥ श्रणु पाण्डव 
यत्नेन बुधाष्टम्या विधि शुभम्‌ ॥ यदायदा सिताष्टम्याँ बुधवा रो भवन्दप ॥ ४६॥ तदातदा 
हि सा ग्रादया एकमकाशननेलिः ॥ स्नात्वा नद्यां तु परवाह गहीत्वा करके नबस । ४७ ॥ जल- 
पूर्ण च सद्त्नेः कृत्वानप्येंः समस्वितम्‌ ॥ पूजयेच्व शृह नीत्वा बुधमेत कऋ्रमेण तु ॥ ४८ ॥ एक- 
मापसुवर्णेन तदर्धाधेंन वा पुनः ॥ कारयेदबुधरूप॑ ठु स्वशक्‍त्या वा प्रयत्नत३ ॥ ४९॥ अँगुष्ठ- 
मात्र पुरुष चठुबाहुं सुलक्ष णम्‌ ॥ पद्ममध्येध्रण कुम्म॑ पूजयेत्सिततण्डुलेः ॥ ५० ॥ हेमपात्रे च 
संस्थाप्य पीतवद्धयुगेन च ॥ बस्चोपरि स्थित देव पीतवस्थाक्षतादिनिः ॥ ५१॥ पश्चाम्ृतेन 
संस्नाप्य तत्तन्मन्त्रः ऋमेण तु॥। नेबेदा गुल धूप दरश्शाड्ेन सुग न्धितम्‌ ॥५२॥| पायसेधृतप्रेश् 
मोदकाशोकवर्तिनिः ॥ फलेश्व विविवैश्वेव शर्कराशियेडेः शुभेः ॥ ५१॥ ततः पुष्पाक्षतेः पीते- 
वेक्ष्यमाणेश्व नाममिः ॥ नमो बुधाय पादों ठु सोमपुत्राय जाठनी ॥ ५४ ॥ तारकाय कटी 
चेव राजपुत्राय चोदरम्‌ ॥ इलाजियाय हृदयं कुमारायेति वक्षसि ॥ ५५॥ बाहू पुरूरवःपित 














राजके इन वचनोंको सुबर व्यामदादवीने झठ स्नान किया 
ओर प्रसन्न हो तीनवार प्रतिज्ञा करके यानी संकल्प वाक्य 
को तीनवार पढके, पुण्यफल दे दिया ॥ उसके मिलते ही 
श्यामलाकी माता उमिला पीडासे निमुक्त हो दिव्यशरीर 
दिव्यास्वर धारणकर ॥ ४१॥ ४२॥ दिव्य विभानपर 
आरूढ हो दिव्यमाला घारणकरती हुईं अपने पति निमिके 
समीप पहुँच गयी ; आज भी सब सनुप्य उसे अपने पतिके 
समीप स्वर्में ( आकाशमसें ) दीप्यमान देखते हैं।॥। ४२ ॥ 
उसका वह स्थान बुधके पास तिमिक्रे पाश्चेमें है। वह 
बुधाष्टमीत्रतके प्रभावस हे राजा युधिष्ठिर | अबसी चमक 
रही हें ॥ ४४ | युधिष्ठिर बोले कि, है कृष्ण ! यदि ऐसी 
ही उत्तम बुधाष्टमी तिथि हे तो उसीकी विधिको आप मुझे 
कहे. हे माधव ! यदि आप मुझपर अनुग्रह रखते हैं ॥४५॥ 
श्रीकृ्णचन्द्र बोले कि, हे पांडुनन्द्न |! आप चिन्तकों 
एकग्र करके सुनिय, में बुधाष्टमीके ब्रतका विधान कहता 
६४ जब जब सितपक्षर्म अष्टमी बुधवारी हो ॥ ४६ ॥ तब 
तव ब्रवके लिए एकवार भोजन करनेवारा हो ब्रतका 
आदर करना चाहिय। प्रातःकार उसदिन नदीसें स्नान 
करक एक नूतत करवा अपने हाथोंमें छेवे ॥ ४७॥ इसे 
जलस पूण करे, उस जलूसें अमूल्य उत्तम रत्न ढाले | उसे 
घर रत उसका पृप्पादिकोस पूजन करे, फिर बुधको 
_गापित कर उनका पूजन करे ॥| ४८ ॥ वह मूर्ति एकमासे 
(७२88 कक करानी चाहिये, शक्तिहास हद 
॒ आय +7 सुदणको, अधिक शक्तिहास हो उससे 
भे। अीध पुदण को हो । झपनी शक्तिक अनुसार और 


भी कमावेश हो सकती है। वेंसीही सामग्री इकट्ठी कर 
उसका पूजन करे (। ४९ ॥ एक अगुष्ठ परिमाण मूतिहोनी 
चाहिये | पुरुषाकृति हो, चार भुजा हों, दीखनेस सुन्दर 
हो । उसके पूजनका प्रकार यह है कि, किसी पवित्र देशमें 
कमलका आकार छिखके उसके मध्यभागमें कर्णिकाके 


ऊपर अब्रण कछशको कलछशस्थापनकी विधिके अनुसार 
स्थापितकर उसका श्रेत तण्डुछोंस पूजनक्र ।। ५० ॥ उसके 
उपर श्ेततण्डुलोंसे पूण सुबण पात्रको रखे। ( शक्तिहासमें 
मिट्रीतकके पात्रको रख छ ) उसे दो पीतवख्थोंसे ढकदे | 
उसपर बुधदेवको विराजमान करे, फिर उनका पीतवख 
पीतअक्षत पीलपुष्प आदि उपचारोंसे पूजन करे।। ५१॥ 
पभ्चामृत॒त्त अछग अछूग और एकबार सम्मिलितकी रीति 
सेभी स्नान करावे | उस स्नान करानेके वेदिक ओर तंत्र 
8 कप कल हि धर 
कमन्त्र ( पूर्व कह आये ही हेया) असिद्धही हैँ । संवेद्य 
बढावे; दशाज्गभ सुगन्धित गुग्गुछकी घृप करे, ॥ .५२ ॥धृत" 
पूण खीर घीके लड्डू अशोककी कछिका नानाविध फढ 
तथा पक्व और पीत गुडके पदार्थोका भोग छगावे ॥५३॥ 
पीछे एकादश नामसन्‍्त्रॉको बोछता हुआ पीतल पुष्प और 
पीताक्षवों द्वारा चरणादि अद्भोंकी प्रथकू प्रथकू पूजा करे। 
उसका प्रकार यह है कि, १ आओ बुघाय नमः, पाद 
पूजयामि” २ ४ ओ सोमपुत्राय नमः जानुनी पूजयामि 
॥ ५०४ ॥ ३ “ओों तारासुताय नमः, कटी पूजयामि' 
४ “ओं ह्विजराजपुत्राथ नम उद॒र॑ पूजयामि? ५“ओं 
इलाप्रियायनमः, हृदय पूजयामि? ६ * ओ कुमारायनम। 
वक्षः पूजयामिं! ॥ ५५] ७ “झों पुरूरवपित्रे नम 









भर 


अंतौ सोमझुनाय व ॥ झुब् तु पीतबर्माय ज्ञानाथ मयनद्यम्‌ ॥४५८॥ घूर्धाद तु. बुचायेति एज 


स्थानिवु पूजयेव्‌ ।! झोब राजन वा - जय हा शोसनन्‌ ।। ५७ ॥ गन्दउप्यक्ष ते: * पी 
मिश्राम्वुपूरितेंः । जात॒म्घामदरनिं गत्वा तेन चार्य निवेदयेत ॥ ५८ | उर्वेश्याः श्वशुरों यस्तु 
यः पुझरवसः पिता ॥ यो अहायामदिपरिदुधों मे संमसीदतु ॥ ५९ ॥ वरांश् विष्णुना दत्तात्‌ 
दकंलाडः भयस्छतु ॥ मन्चेणानेन दत्वास्य जत्वा मन्वमिन पुदः ॥ ६०॥ अथमे मोदकान्‌ 
द्याईदीये फेणिफ्ास्तथा | वूतीये घतरूराश्च चहुर्थे बडझा हाथ ॥६१॥ पथनमे मण्डकान्‌ 
दहयात्वप्ठे सोहालिकाश्तथा ॥अद्येक॑तिकबश्ेव सतमे मासे इदयेत ।! ६९ । अहमसे शकेरा- 
मिश्रेः खाग्डवैश्व यर्विप्ठिएविप्राय वयन दद्चाद्ती मोजनमाचरंत्‌ ॥६३२॥ एवं क्रमेण कतेव्यं 
बुधाष्टम्यां झुधिष्ठिर ॥ बांघवेः सह मित्रेश्व भोक्तव्यं जीतियूवेकम्‌ ॥ सोम्यमार्यानक श्ण्वन्नर- 
केम्यो विशुच्यते ॥ ६४॥ यश्वाष्टमी बुचयुतां समवाप्य भकत्या संपूजयेच्छशिलुतं करकोपरि- 
स्थम्‌ | पक्कान्नपात्रसदितं सहिर्ग्यवद्ध॑ पश्यत्यघों यमपुरीं न कदाजवेदेव ॥ ६५ ।॥ इते भवि- 
प्योत्तरपुराणोक्का बुबाष्टमीज्तंकथा ॥ अवोब,नम्‌ ४ शुधिष्ठिर उबादउद्यावणविर्यिं त्रहि कृपया 
भक्तवत्सल ॥ कश्मिन्काले च कि. द्रव्य॑ कर्थ सफलभाग्भवेद्‌ ॥ श्रीकृष्ण उवाच ॥ आदो 
मध्ये तथा चान्ते कुयौदद्यापनक्रियाम्‌ ॥ सत्तम्यां अयतो चूत्वा कुयांदे दन्तथावनम्‌॥ 
आचम्य कुर्यात्सडूल्पं दशविपान्रिमन्त्रयेत्‌ ॥ अष्टम्याँ आलतरत्थाय झुचिक्रृत्वा ब्रती ततः ॥ 
गड्ााद्यादिमद्ातीर्थ स्वात्वा नित्यक्ृतक्रियः एहमध्ये शचों देशे रड्रबलछया विराजिते॥ 
पुण्याहवाचन कृत्वा कुयोद्रक्ञाविधानकम्‌ के भाणानायम्य विधित्रत्क्वा संड्डूल्पदादिकम्‌॥ 





पक. एति-सा00२४०च-अ: 2४६. 








| धभीमें इसी प्रक्ार करना चाहिय। पीछे प्रीतिपूवेक भाइ- 
| योंके साथ खाचा चाहिये । जो पुदष भक्तिपूवके बुधाष्ट- 
' सीडी कथा उुनते हूँ वे सब पापोसि छूट जाते हे | ६४॥ 
| जो इससें भक्तिपूवेक बुधकों करवेपर स्थायितकर पूजते हैं 
| पक्कान्न और कछडझपात्रादि तथा सुबण एवं बल्चको उत्तम 
ा देते हैं, वह फिर ऋभीभी यसयुरीका दर्शन 
रा जे।ये अगसी | ४ (्‌ ण्य णकी क हुईं 
वा मस्तक, इन अज्ञोंपर पीत कल चढावे 3 हे बाग के | पलक हे पक हे ० 
पूजनको प्रक्रियाके सा कप । हम ही न रे  ब्रतवके उद्यापनकी विधि-राजा युधिष्ठिर बोछे कि, हे भक्त- 
सोने चांदी या तांबेके सुन्दर पात्रस | ५४ |! का गा !” | बत्सछ | आप कृपा ऋर वुधाष्टमी त्रतके डद्यापनकी विधि 
उप ओर अक्षतोंको छह अपनी जाय की | कहिये। यह उद्यापन किस समय करना चाहिये ? कौन 
मिडा विशेष अध्ये दान करें || ५८ ॥ कि, जो उवशीका | कतैत पदार्थ इसमें चाहिय ? जिससे यह उद्यापन एवं ब्रत 
श्वशुर एवं पुरूरवा राजर्षिका पिता और सब प्होम श्रठ | सफल हो । श्रीकृष्ण चन्द्र बोले कि, प्रथमत्रतके अन्त या 
हैं वह वुधदेव अध्यको प्रहण करके मर ऊपर बअसन्न है | चतु-अतके अन्दर्म या अष्टम ब्तको करके उद्यापन करना 
॥ ५९ ॥ विष्णु भगवान्‌ ततद्धोगसे मोक्षपय्येन्त जिन | चाहिये बुधाष्टमीके पूवेदित यात्री सप्तमीके दित आतःकाल 
बरोंका प्रदान करते हैं, उन सबोंको बुधदेव मेरे लिये दान | उठकर मल्मृत्रद्यागादि एवं दन्‍्वधावन करे; पीछे साधारण 
करें | इस मत्रसे अध्य देकर फिर इस मंत्रको जपे ॥३० | | स्वान करके शुद्ध हो आचमन करके सकह्ूल्प करे । दश 
प्रथमवार बुधाष्टमीके दिन मोदक,द्वितीय बार फेनी, तीस री ' उत्तम सदाचारनिष्ठ ब्राह्मणोंकी निमन्च्रित करें | दूसरे दिन 
बार घृतपूर ( पकाज्नविशेव ) चतुर्थवार वठक ॥ ६१ ॥ | अष्टसीसें प्रातःकाछ उठकर मलमूत्रत्यागादि करें! सिर 
पञश्चम बार सण्डक, छठी बार सुहाछियां, सातवीं वार | स्‍्नानादि करे और पवित्र होकर पवित्र नदी आदि जला- 
अशोककी वर्जियां करावे | ६२॥ आठवीं बार सक्क्॑के | शयपर स्नान करे । पीछ नंतिक सन्ध्योपासनादि कर्म्ना- 
खाण्डबोंको बॉँसके पात्रमें धरकर हे युविष्ठिर | योग्य आ- | नुछ्ठानसे निदश्नत्त हो रज्ञ वल्चिआदिसे सजाय हुए पवित्र 
चार्यके लिये वायनादे फिर भोजन कर ॥६३ | मोदकादि | घरके मध्यभागम पवित्र होकर पुण्याहबाचत और रक्षा- 
पदार्थोका ही पूर्वोक्तक्मस भोजन करे। हे युधिप्ठिर | बुधा- (विधान करे। विधिवत्‌ प्राणायाम करक _सहूुस्पादि कर, 


'०-#उूढ' 


१ अन्न हमादों पाठवेषस्थ हहझोकाधिक्ण च बडुत्तरे दृश्वते ! 


बाहू पूजयामि ”! ८ “ओं सोमसुताय नमः, स्क्न्घों 'अर्सो) 
पूजयामि” ५ “ ओ पीतवर्णाव तमः, मुख पूजयामि * 
१० “ओं ज्ञानमूतेये नमः, नयने पूजयामि ? ॥ ५६ ४ 
११ “ओ बुध'य नमः मूर्घा वे (मस्तक) पूजयासि? ॥ एक) 
दृशमन्त्रोंसे १ चरण, रे जाज्लु, ३ कटि; ४ उद॒र, ५ हंद॑व- 
६ वक्षःस्थछ, ७ बाहु, ८ स्कन्ध, ९ मुख, ९० चत्र आर १६ 





तिथ्यायुल्लेखनानतें च ब्रतनाम त्रकीतंयेव ॥ मया कृत बुधाष्टम्थाँ ब्रत॑ साड्फलात्तये ॥ 
उद्यापन॑ करिष्ये-्हमित्यक्षतकुशोदकम्‌ ॥ त्यक्त्वाचार्यादिवरणं कुर्यादख्ादिनिः फलेः॥ 
व्रह्माण॑ बृणुयात्तत्र बख्तांडूलभूषणेः ॥ ततः पूजादिक कुयोद्धहयज्ञपुरःसरम्‌ ॥ ततस्त्व- 
ए्दल कुर्यान्मध्ये कर्णिकया सह ॥ पश्चवर्णेः समापूय दुलाप्राणि च केसराब्‌ ॥ कर्णिकायां 
न्यसेद्वान्यं पश्चप्रस्थप्रमाणतः ॥ दलेषु च दलाग्रेष यथाशक्तया विनिक्षिपेत्‌ ॥ तत्रेव स्थापयेत्‌ 
कुम्मान्मध्ये पूर्वांदिदिक्षु च ॥ गड़ाजलेन संपूर्य वख्ादिनिरलडइकृतान्‌ ॥ पश्चत्वक्पक्वोपेता- 
न्रवकुम्भान्यथाविधि ॥ तदुत्तरे ग्रहान्सवॉन्मंडले स्थापयेत्ततः ॥ तत्पूर्व स्थापयेत्कुम्म॑ वारुणं 
च विशेषज्ञ: ॥ वखत्वकूपकवफले। पथ्वरत्नेः! सकाश्वनेः॥ तत्तन्मन्त्रेः प्रतिष्ठाप्य पूजयेच्च यथा- 
विधि॥ सप्तजन्माजितं चोपपातकादि च यत्कृतम्‌ ॥ तद्ोषपरिहाराय बुधाष्टमीव्रतं कृतम ॥ 
तस्य साइफलप्राप्त्य पूर्जां होम॑ करोम्यहम्‌ ॥ बुधमीत्ये च तत्सवमिति सड़ुल्प्य पूजयेव॥ 
कषमात्रेण राजरद्र तदधार्षेन वा पुनः ॥ बुधष्य प्रतिमां कुर्यात्छुवर्णन विचक्षणः ॥ कर्णिकायां 
मध्यऊुम्ने ताम्पात्रे बुर्ध न्यसेत्‌ । पश्चामृतेन स्नपन वस्रयुग्मेन वे्टयेत्‌ ॥ ध्यायन्नारायणं देव॑ 
बुध बाणसमाकृतिम॥चतुझुज शइ्चक्रगदाशार्डूघर जयेत्‌ ॥आज्रेयं पीतवर्य च पीतपुष्पाक्ष- 
तादिभि:॥उपचारे! षोडशप्रिः पुरुषसूक्तत्रिधानतः ॥ तदक्षिणे विष्णुमिदंविष्णुरित्यधिदेवतम। 
सहस्नशीषोपुरुष वामे प्रत्यधिदेवतम्‌ ॥ दलेबु विन्यलेदेवान्‌ प्रागारभ्य प्रदक्षिणम्‌ ॥ रविं चद्धं 
कुजगुरू शुक्राकी राहुकेतुकी ॥ अनन्त॑ वामन॑ विष्णुं शौरिं सत्य॑ जनादनम ॥ हंस 
लेकर की अर जम लटक + डे “किक आस सदन किगेक की नि तह: किक + हि कप कली कल अल । सरल 


2, + ताक 











सहझ्ृस्पकी यह विधि हे कि,प्रथम जहाक्षवादि दक्षिण हाथमें 
लेकर “ओं तत्सतू सत्‌ ” इत्यादि वाक्यकश्पना द्वारा देश 
तथा तिध्यादि काछका उल्लेख करके अपने गोत्रनामका 
उल्लेख करता हुआ कहे कि, मे्र जो अद्यावधि बुधाष्टमीके 
ब्र॒त किये हैँ उनके साह्पूण होनके फछोंकी प्राप्तिके छिये 
बुधाष्टसीत्रतका उद्यापन करूंगा। पीछे अपने हाथमें स्थित 
जढाक्षत कुश ओर द्रव्यको प्रथिवीपर छोड दे । पीछे वस्र 
पात्र गन्ध द्रव्याभूषणादि द्वारा आचाये, ऋत्विगादिकोंका 
तरुण कर | वद्ध तास्वूल एवं भूषणादिद्वारा ब्रह्माका वरण 
कर। गणपति पूजनपूर्वक नवप्रहोंका पूजन करे। फिर 
महान्‌ विस्तृत अष्टट्छ कमछका आकार लिखे, उसके मध्य- 
भागमें कर्णिकाका आकारभी छिखे। पाँच रंगोंको दुलभांग 
एवं केसरॉमें उत्तम रीतिस पूर्ण करके उसे सुन्दर बनावे। 
फर्णिकास पांच प्रस्थ धान्‍्य रखदे। पत्ते एवं पत्तोंके अग्रमा- 
गोमें भी यथाशक्ति घान्य रखदे । घान्यराशियोंपर नब 
कलशोंको स्थापित करे । गज्ञाजलसे उनको पूर्ण करके वख्र 
तथा माछासे वेष्टित करके पश्चत्वऋ तथा पच्चपल्षवोंसे शो- 
भित करे। इन कछशोंको ऐसे देशम रखे, जिसके उत्तरमें 
महभण्डल हो । या उस प्रहपूजनपालीको इन कछशोंके 
उत्तर स्थापित करे । प्रहमण्डहके पूर्व अर्थात्‌ इंशानमें, 
का कछश अवश्य रखे! उस कछशरमे जछूपूर्ण करके 
उजेई कण्ठभागसें वस्र वेश्त करे, उसके मुखमें पहुब, 
कक फछ रखे । उसके उद्रमें पच्चरत्त और 
छुतए । इनके जो जो मन्त्र हैं, उन उनसे धान्यादि 





१ कृश्वेलि शपः |. . 


स्थापन करे | विधिके अनुसार प्रतिष्ठा करके पूजन करे | 
जलाक्षत दृहिन हाथमें लेकर सद्कल्प करे कि, मेने सात 
जन्मोंमें जो जो पाप किये हैं, उनके दुष्ट भोगोंकी निवृत्तिके 
लिये बुधाष्टमीत्रत किया है ( किये है ), में अब उस (उन) 
की साह्षफढछ प्राप्तिक अथ बुधका पूजन ओर हवन करता 
हू। यह सब पूजनादि बुधदेवकी प्रीतिके लिये हो। श्रीक़' 
पणचन्द्र राजा युधिष्ठिरसे कहते हूँ कि; एक कष (तोढे) 
या आधे कष (आधे तोले ) या एक पाद कर्ष ( चार 
आने ) भर सुबवर्णकी ही बुधप्रतिमा बनवा पूर्व उल्लिखित 
कम्तल कर्णिकारमं स्थापित किये कल्शके ऊपर तामडी 
रखके वस्ध आस्तीण कर उसपर उसको स्थापित करे|प 
मृतसे स्नान कराकर कटि तथा असोमें पीत धौतवख्र एवं 
पीत डुपट्टा धारण कराके बाणाकार बुधको, भगवान्‌ नारा- 
यणखरूपस ध्यान करे । यही ध्यान करे कि ये बुधदेव 
साक्षात्‌ चतुभुज; शट्ढ, चक्रगदा, और शाहइघलुर्धारी मग* 
बान्‌ हैं। अत्रि गोन्रीय बुधका पूजन पीतवस्त्र, पीतपुष्प; 
पीताक्षवादिद्वारा पुरुषमूक्तके षोडश मन्त्रोंस घोडश उपचा* 
रॉसहित करना चाहिये।डस बुधके दक्षिणमें“ओं इवं विष्णु" 
विव्रचक्रम्रे! इस सनन्‍्त्रसे अधिदेव विष्णुकी, “ओं सहस* 
शीर्षा”इस मन्त्रसे बुधके वामभागमें प्रत्यधिदिव नारायणकी 
स्थापना करे।कमलक पूर्वादि अष्ट कोणोंमें स्थापित कलशोंके 
ऊपर अदक्षिणा ऋमसे सूर्य, चन्द्र, मद्ठछ, बुहर्पति, शुक, 
शर्नेश्वर, राहु और केतुके स्थापतादि करने चाहिये ॥| 
कम्नलक अग्रभागोंमें १ अनन्त, २ वामन, ३ विष्णु,४ 


जि रा 


नारायण चाष्ठो दलागेबु च पूजयेत ॥ धूपदीपश्व नेवेद्रे! फलश्थ विविधयंजेत्‌ ॥ बहिरि- 
न्द्रादयः पूज्या दरशादेक्यालकास्तथा॥ यम च चित्रगुम च ब्य >उझा दक्षिण यजेत्‌ ॥ 
कुम्भ बंशपात्रेप अष्टावष्टो च लड॒दुछावा। यज्ञोपवीए:फछदाओिणालहितास्यसेत । प्जयित्वा 
ततो होम शाखोक्तविधिना खुधीः ॥ मण्डलास्पश्विमे भागे स्थण्डिल -+. ..६५६- ॥ कृत्वा तूलछे- 
खनंदीनि क्ृत्वाप्न स्थापयेत्खुधीः ॥ इध्मं दर्ः परिस्तथे पाचा/|सादनमाचरेवाप्णपात्रविधानानते 
ब्रह्मासनमतः परम्‌ ॥ दृष्माधानमुखनान्ते प्रधानाहुतिहावनम ॥ अपामागहमिद्धिय यवत्रीहि- 
तिलेष॑लेः ॥ गोधूमंः सतिलहाम प्रथकप्थगतन्द्रितः ॥ उद्बुध्यग्पंति मन्त्रेण होममष्ठोत्तरं 
शतम ॥ कृत्वा तु॒विष्णुमन्त्रेण तथा नारायण हुनेत ॥ अधिप्त्यधिदेवों च मन्चार्भ्या जुहुया- 
त्तथा ॥ ग्रहादिभ्यश्व ज्ञुहुयात्मायश्रित्तादिक तथा ॥ पूणाहुति च हुहुगत्कुयद्रक्नविसुजनम्‌ ॥ 
पूर्णपात्रेद्ासन॑ च बलिदानमतःपरम्‌ ॥ वहयारिपूजन कृत्वा देवतोद्ासन ततः॥ अभिषि- 
च्याथ तिलक रक्षावन्धचनमेव च॥ आचाय च सपत्नीक पूजयित्वा यथाविधि॥ प्रतिमावस- 
कलशान गोदानं दंक्षिणां तथा ॥ दत्वा ब्रल्लादिविभेभ्यः कलशांश् संदक्षि जानाबाह्म गान्मोी ज- 
येत्पश्चादाशिषो वाचयेत्तथा ॥ इति भविष्योत्तरपुराणे बुधाष्टमीत्रतोद्यापन संपूर्णम्‌ ॥ 
। देशाफला!ष्टमीत्रदस्‌ ॥ 








रा ०५->--.४भ० आर नज कम» «>> काम---५५३७ ३३०७4 3५०४०8नमक ७ मम मनन. ि-लल । अल न-त न चली कल भी नी-क्‍++।++ 5 








किन नििलन नल 





री जजमकजपाककाननजककेलमन 2 >न-+ 2३०७ भ ५ काज तक 





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अथ शुक्कादिश्रावणकृष्णाष्टम्यां दुशाफलब्रतम्‌ ।सा निशीथव्यापिनी आह्या ॥ तत्र पुज विधिः- 


तमहुतं बालकमम्बुजेक्षणं चत॒झुज शब्बगद 
पीताम्बर सानद्रपयोदसो भगम्‌ ॥ ऋइाहवद आल 


५ सत्य, ६ जनादेन, ७ हँस और ८ वें नारायगका स्थापन 

पूजन करे। धूप, दीप, विविधि नेवेद्य और फलादि समपण 
करे । कमल पत्रोंके बाहिर पूर्वांदि आठ भागोंमें अरक्षिण 
ऋमसे १ इन्द्र, २ अम्लनि, ३ यम, ४ निऋति; ५ वरुण. ६ 


वायु, ७ कुबर और ८ वें इंश्वानका स्थायन पूजन करें।| 
दृक्षिणमं यर्मराजक समीप वास भागमें श्यामछा और | 
चित्रगुप्रका स्थापन पूजन करे। कमलके अष्टदलों में थान्य- | 
राशियॉपर ध्यापित आठ कलछूशोंके ऊपर आठ यूयांदिं: | 
कोंका जो स्थापन पूर्व कहा हे वह कलझों के ऊपर बॉस | 
पत्रोंको पहिल रखकर करना चाहिये । ओर वांसक पात्रोंमें | 
आठ आठ छूडडू, यज्ञोपव्रीत ऋतुफल ओर दघ्चिणा रखदे | 
पीछे मण्डछके पश्चिम भागमें चतुरख्र स्थण्डिल, शुद्ध सृत्ति- 


काका बनावे । उस स्थण्डिलमें खुबेस भूमिक उद्धेखनादि- 


रूप पांच संस्कार करके अग्निस्थापन करे, विद्वान ब्रतीको | 
चाहिये कि वह्‌ समिवा; कुशास्तरण और म्रणीतादि पात्र 
इकट्टे करे | पूणपात्र तथा अद्यासतका आस्तरण कर । इस | 


हि. 


प्रकार समिधाधान करने पी 


देनी चाहिये; घी मिश्रित अपामागंक्की समिध एवं घी 
मिश्रिल यव ब्रीडि तिछ तथा घी मिश्रित वि और गोघू 
ससे प्रथक्‌ प्रथकू निराछ्स होकर हवन करे। / ओम उद्‌ 


खुदायुधम्‌ ॥ 


5 ध्ज काया व्ज् ते ्यम्म्पाः खत 
६ गीट ऊुण्डलॉन्द्यर 





छे अपनी अपनी शाखानुसार | 
गृह्मपूत्रोंक कहेहुए विधानको स्थग्डिल्में प्रधान थाहुतिहा 
हवन करे । देव अधिदेव और अत्यधिदेव इन तीनोंके लिये | 
आहुतियाँ देनी चाहिये | इसी विषयर्म यह वाक्य हैँ कि; | 
पृथक २ होम करे यानी तीनोंको भिन्न २ द्रव्योंस आहुतियाँ 
| सनणजिस शझोमायमान कण्ठवाडे; पीताम्बरचारी, सानद्र 
| जछूद सदृश रमणीय, अत्यन्त मह॒नीय वबेदूयेजटित मुहझुठ 
और कुग्डलों की कानिव्सि मिश्रित्सहुस इुन्तछों बाढ़, अभि 





ड्याकव या मषयदजएअदफ्रपदाफ। >. वमण्णक अ्वयककुड करे मै ्स। 4 

श्रीदत्सलक्ष्म गलशोलि होस्तुम 
किक दर बक्षात, 

परिष्वक्तसहह्कुम्तलम्‌ ॥ 


बुव्यस्थ ” इस मेत्रसे १०८ झाहुतियाँ बुधके लिय वथा 
जिण्णुक्े मंत्रसे विप्णुके छिये और नारायणके मंत्रसे चारा- 
यणको आहुति दे । ग्रह्मदिकोंके लिये आहुति देकर प्राय- 
थ्वित्तकी आहुतिका हवन करे। पूरनाइुविछा हवन करके 
पीछे त्रह्माका विसजन करदेना चाहिये । पूर्णपात्रका उद्घा- 
सन और बलिदान होना चाहिये | पीक अप्निका पूजन 
करके देवताओंका विसर्जत कर देना चाहिय | अभिषकके 
पीछे तिछक और रक्षाबन्धन होना चाहिये। सपत्नीक 
आचाय्यका विधिपूवंक पूजन करके गऊ। प्रतिमा, वबस्य 
और कछझश उन्हें देना चाहिये। ब्रह्मास लऋर जो वाकी 
याज्ञिक द्विजवर बेठे हुए हों उन्हें कछश देने चाहिये। 
पीछे ब्राह्मण भोजन कराकर सव्सध आश्ीवांद छेना 
चाहिये | यह श्रो भविष्य पुराणका कहा हुआ वुधाष्ट्रमीके 
ब्रतका उद्यापन पूरा हुआ ॥ 

दृश[फलत्रत-शुक्लछपक्षस मासारंभ माननेके हिसाबसे 
श्रावण वदि अष्टमीके दिन करना चाहिये इसमें अष्टमी 
अधरात्र व्यापिनी होनी चाहिये ॥। पूजाविधि-पूजाविधा- 
नको ऋहषते हैं- तमद्भुतम्‌? इत्यादि दो मन्त्रों त ध्यान करना 
चाहिये | कि, कमछसद॒श॒विशाहू सुन्दर नेत्रवाऊे, चतु* 
भुज्, शब्ब, गदा और चक्र इन छोक्ोत्तर शत्लोंको वारण 
करनेवाले, वक्षः-स्वऊमें श्रीवत्सचिहस सुधोजित, कौस्तु- 


१ क्ुयोंदिति शेषः ! 


डे 


उद्ामकाउच्य इंदकडुणादिभिविराजमान वखछुदेव ऐक्षत ॥ कृष्णाय० ध्यानम्‌ ॥ वासखुदेवाय* 
आवाहनम्‌ ॥ शेषशायिने० आसनम्‌॥ तीथपादाय पाठम्‌॥ गड्ाजनकाय० अध्यंम॥ 
यमुनावेगसंहारिण न० आचमनम्‌ ॥ नित्यमुक्ताथ० पश्चाप्षुतस्लानम्‌|श्रीगोपालाय० स्नानम्‌ ॥ 
पीतवाससे न० बद्चम्‌ ॥ यज्ञप्रियाय” यज्ञोपवीतम्‌ ॥ सर्वेश्वरायण चन्दनम्‌॥ अधोक्षजायः 
अक्षतान ॥ कमलाप्रियाय० पृष्पाणि ॥ तुलसीपत्रेनोमपूजा---कृष्णाय नमः । विष्णवे न०। हरये 
न० । होषशायिने० । गोविन्दाय० । गझडध्वजाय० । दामोदराय” । हषीकेशाय० । पद्म 
नाभाय० । उफेद्राय> ॥ १० ॥ अथ दोरकबन्धनम---संसाराण॑वमम्नानाँ नराणां पापकर्मणाम॥ 
हह मोक्षफलावातिं कुरुष्प पुरुषोत्तम ॥ इति दोरकबन्धनम्‌ ॥ पारिजातापहाराय० धूपम्‌॥ 
ज्ञानमदीपाय० दीपम ॥ चक्रिणे न० नेवेद्यम॥अघनाशिने न० तांबूलम्‌॥ सर्वव्यापिने० दक्षि- 
जाम्‌ ॥ पद्मनामाय० नीराजनम्‌ ॥ अनंताय पुष्पाखलिम्‌ ॥ देवदेव नमस्‍्ते5रतु भक्तप्रिय 
दयानिधे ॥ झहणाप्य मया दत्त देवक्या:सहित परभों॥ विशेषाष्यम्‌ त्रिलोकनाथों देवेशः 
सवभूतदयानिधि: ॥ दानेनानेन सुमीतो मवत्विह सदा मम ॥ इति वायनमन्त्रः ॥ श्रीकृष्ण! 
प्रतिगह्माति श्रीकृष्णो वे ददाति च॥ श्रीकृष्णस्तारकोमाभ्याँ श्रीकृष्णय नमोनमः ॥ इति 
प्रतिग्रहमन्त्रः ॥ यस्य स्मृत्येति प्रार्थना ॥ अथ कया ॥ खूत उंबाच ॥ श्ृणुध्वमूषयः सर्वे नेमि- 
षारण्यवासिनः ॥ पुरा च द्वापरस्यान्ते ऋृष्णदेवेन भावितम्‌ ॥ १॥ तद्गबतं वः प्रवक्ष्याम्ि 
साड्रोपाड़ सुनीखवराः ॥ पुरा च द्वापरस्पान्ते पाण्डवाः कौरवास्तथा ॥ २ ॥ झूत॑ अचक्रिरे सर्वे 


घनमनेन मोहिताः ॥ निर्जितः पाण्डवा दुःखादन जम्मुछ्ुुनीध्वराः ॥ ३२॥ कुम्ती विदुरगेहेः तु 


संस्थिता चे महायशाः ॥ तच्छत्वा कृष्णदेवो5पि कृपया परया युतः ॥४॥ आययो 


गरूडारूटो 





लषणीय मेखढा, अज्भद्‌ और कंकणादिकोस शोभमान उस 
६] भ्र्य्फ है. के. जा 

दिव्य वाल्मूति मुकुन्द देवका मे ध्यान करता हूँ, ऐसे स्वरू- 

परम वसुदवजीन जिसके दशन किये थे। फिर “कृष्णाय 


| ४ 5 
हूं ' | इस प्रकार कहे ।  बासुद्वाय नमः, आवाहयामि' 
वासुद्‌वक लिये नमस्कार, आवाहन करता हूँ, इससे आवा- 


हन करे, शेषपर शयन करनेवालेके छिय नमस्कार इससे | 


आसन; सबको पवितन्रक्तर चरणोंवालेकी नमस्कार, इससे 
पाद्म; गंगाके जनकके लिये नमस्कार इससे अध्ये; यमुनाके 
बेंगसहारीके लिये नमस्कार इसस आचमन; नित्य जो मुक्त 
है उसके लिये न० इ० पंचामृत स्नान; श्रीगोपालके लिये 
न० इ० खान; पीववख धारण करनेवालेके लिय न० इ० 
बख; यज्ञ है प्यारी जिसको उसके ढिये नमस्कार, 


क्षजके लिये न० ३० अक्षत; लक्ष्मी हें प्यारी जिसे उसके 
लिये नमस्कार, इसस पुष्प चढावे ॥ तुल्सीपत्रोंसे नाम- 
पुज्ञा-कृष्ण, विष्णु, हरि, शेषश्ायिन्‌ , गोविन्द, गरुडध्वज, 


दामोद१, हषीकेश, पद्मनाभ; उपन्द्र ये ग्यारह नाम हैं ।' 
रा एक एक साममेत्रको बोछकर डक एकस एक ए हा | हुआ पाण्डब पराजित होकर दुःखस चछे गये ॥ ३ ।| 
हे पुछसीदुछ चढाता जाय, नाम्रमंत्रकी वही प्रक्रिया हे 

जिस कइवार लिख चुके हूँ || इस मेत्रस डोरा बॉँधे कि. | इप वृत्तान्तको छुनकर कृष्ण देवभी परम कपसे  आप्डत 
| हो ।४॥| गझडपर चढके विदुरजीक घर घढे आये ! कैती 


६ पुरुषोत्तम ! संसार समुद्रमे डूबे हुए पापकर्मी मुझे जैसे 


| मनुष्योंको भी इसी जन्ममें मोक्षफलको प्राप्ति करिये। पारि- 


जातके हरण करनेवाढूके लिये नमस्कार। धूप सुंघाता हूं, 


| झञानके ग्रदीपके छिये न०, दीप रिखाता हूं। चक्पारण 
नमः ध्यायाप्रि कृष्णचन्द॒र्के लिय प्रणाम हैं, में ध्यान करता | किम 
| पापोंके नाश करनेवालेके ल्यि नमस्कार, पान समपण 
| करता हूं। स्वब्यापीके छिय नमस्कार द्क्षिणा चढाता हूं। 


भू 


ऋरनवालेके छिय नमस्कार, नेवेध्का निवेदन करता हूँ। 


पद्मताभक छिये न०, नीराजन करता हूँ । अनन्तके हि० 
| ऐप हर वि कह, 
पुष्पाजलि चढाता हूं हे भक्तोंके प्यारे | हें दयाके खजाने| 


| है श्रभो | आपके लिये नमस्कार हैं आप देवकीके सध 
| अध्य ग्रहण करिये, इससे अध्य निवदन करना चाहिये, 


इसके पोडे वायना देना चाहिये कि, तीनों छोकोॉके स्वामी 
देवताओंके मालिक दयाके खजाने भगवान्‌ कृष्ण यहां ही 


| मेरे इस दानसे परम प्रसन्न हो जायें, कथा। सूलजी बोढे- 


4४ हे | कि, नेमियारण्यमं निवास करनेवाके समस्त हे शौनका 
इससे यज्ञोपवीत; सबके इंश्वरके छिये न० इ० चन्दन, अधो- | में निवास करनेवारे समस्त हे शौनकादि 


सुवितरों | आप सुर्नें। पहिले द्वापर युगके अन्तमें श्रीकृष्ण: 
चन्द्र भगवाचने जिसका वशान किया है ॥ १ ॥ में उसी 
ब्रतकी कथा अक्ल उपाड्ञोसहित कहता हूं । पूव ्वापर युगके 
अन्तमें पाण्डक ओर कौरव ॥ २। घनके अभिमानसे 
फ्रभत्त होकर दतक्रोडा काने छगे | उसमें कौ रबोंका विजय 


सहायशाः कुन्ती विदुरजीके यहां लिवास करने छगी। 


* चुपुरादिसिविरोचसाल इस्यपि पाठः। २ दुर्लबता भ्रशसित्यपि पाठ: | 


पन-ी 


इयर पता रिरणाएए 


विदुसस्थ गहं प्रति ॥ तत्रापश्यन्महाबाहुं कुत्ती परमहर्षिता ॥ ५ ॥ विदरेणाचिंतः कृष्णः कुन्त्या 
चेंव हि भक्तितः ॥ नत्वाह छुन्ती तां देवीमश्रस्याभां, विडम्बयन्‌ ॥६॥ त्वत्पुत्रास्तु महादुःखाद 
प्रथयुगहन॑ वनम्‌ ॥ तवापि सुमहदृदुःखं सवेदा तन्ममामियम ॥ श झुल्न्दुद्च ॥ हबषीकेश महा- 
बाहो महाहःखेन काशिता ॥ कृपया परया देव रक्षिता वयमीदशा+ ॥ ८ ॥ मम चव 
महद्दुःखं त्वयि मां च्रातारे स्थिते ॥ मत्युत्नास्ठ महादुःखात्मविष्ठा गहनं चनम्‌ ॥ ९ ॥ कृपया 
विदरों मह्म॑ कौरव्यः म्रस्थसमितम ॥ दुदाति प्रीतिदः कृष्ण जीवनाय महामतिः ॥ १० ॥ 
गृहस्थ पश्चिमे भागे वंसामि च जनादन ॥ द्शिता कौरवाणां हि सर्वेषां कुमातिस्तथा ॥ ११ ॥ 
इति तस्या-वचः अ्र॒त्वा क्ष्ण परमचर्मवित ॥ आह चेनां वासुदवों म हमियतनमस्तदा ॥ १९ ॥ 
ब्रते ते कथथिष्णामि येन हुःखात्मसुच्यसे ॥ पुत्रपोत्रेः परिद्वता स्व राज्य प्राप्स्यसेडि- 
रात ।| १३ ॥ दशाफलमिति ख्यात॑ तद्घत कुछ खुबते ॥ कुन्त्युवाच ।! कस्मिन्काले तु कतेदर्य॑ 
तद्गत॑ केशव प्रभो ॥ १४॥ वद मां भांति इत्युक्तो यादवेन्द्रो जगाद ह॥ श्रावणस्थाखिते पक्षे 
अष्टम्यां च निशीथके ॥ १५ ॥ देवक्यां वासुदेवश्व प्राइलतो न संशयः ॥| तस्यामे दरशागुणितं 
सूत्र स्थाप्यं मपूजयेत्‌ ॥ १६ ॥ हस्ते बद्धा ठ॒ तत्सूत्र दशाह ब्नेर्म/चरेत्‌ ॥ संसाराणेवमम्नानां 
नराणां पापकर्मणाम ॥ १७ ॥ इहामुत्र फलावा्ति कुशष्व पुरुषोत्तम ॥ अनेन दोरक बच्चा दश- 
वर्ष व्रत चरेत ॥ १८ ॥ देवस्य पुरतो नित्य दशपत्मान ऋष्येत ॥ ततथ्व श्रणुयात्युण्यां कथा- 
मेतां शुभावहाम्‌ ॥ १९ ॥ तुलस्याः कृष्णवर्णाया दलदश मिरवयेत ॥ क्ृष्णं विप्यु तथानस्त 
गोविन्द गरूडध्वजम्‌ ॥ २० ॥ दामोदरं हषीकेश पह्मनान हारे नडम्‌ !| एलेशव नाममिर्नेत्य 
कृष्णदेब॑ समचरयेत्‌ ॥ २१ ॥ नमस्कारे ततः कुर्यात्मदृश्तिणसमन्वितम्‌ ॥ एवं दशदिन कुयों- 


कक 


द्रतानामुत्तम॑ ब्तम्‌ ॥ २२ ॥ आदो मध्ये तथा चान्ते होम॑ कुययाद्विधानतः।कृष्णमत्त्रेण जुह्दुया- 





"-न्‍भिशकादाडमााााद्ाफपपामकालपरपकतपककातनाण.. जया: 


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जी अआ>ः ् /9अ/"अ>अ्ऊ्ऊ्ऊ जज ऑफफभहतशभफ"/प/57हपप:पभ 
महाभुज श्रीकृष्णचन्द्रकों वहाँ देखकर परम प्रसन्न हुइ। ५) | बोले कि श्रावण कृष्णा अष्टमीकोी आधीरात | १५॥| 
विदुरजी और कुन्तीनेभगवान्‌ कृष्णका पूजन भक्तिभावसे | देवकीसें वसुदेवसे वासुदेव उत्पन्न हुए | इसमें कोई सन्देह 
किया | भगवान भी मेघकी आभाकों छकाते हुए देवी [न हीं हैं। उसके आगे दशहूर डोरा कर, स्थापित करके पूजे 
कुन्तीको नमस्कार करके बोले ॥ ६॥ कि तेरे पुत्र बडे | ॥१६॥ दाथमें उस सूत्रकों बांधकर दश दिन ब्रत करे कि 
दुःखों से बनमें निकछ गये।तुर्मे मी इसका बडा भारी ढुःख ; “ संसार सागरमें डूबे हुए मुझ जैसे पापकर्मी मलुप्योको 
है। मेरा भी यह अग्रिय है | ७॥ यह छुन कुन्ती बोली | ॥ १७ ॥ हे पुरुषोत्तम इस छोक और परलोकके फरछोंको 
कि, हे हृषीकेश : ह्‌ महावाहो: हम तो महादुःखोंसंदु:खित | प्राप्ति कर” इस प्रकार डोरा बॉबिकर दशवर्षतक त्रत करना 
हुए हैं । पर हे देव! ऐसे भी दम आपने पएल कपास | चाहिये ॥ १८ ॥ शत करनेवाला दशदिनपय्येन्‍्त मेरे 
वार बचाये हैं! मेर चित्तम यह वडा भारी दुख हैं कि । सम्मुख प्रतिदिन दशकमल चढातवा रहे । इस आनन्द सद्भछ 

आप जैसे । ८ ॥ रक्षक रहनेपर भी सुझे दुःख है। मेरे | देनेवाली पवित्र कथाको सुने ॥ १९ ॥ मेरा पूजन श्यामा 

पुत्र तो, बडे मारी कष्टोंके मारे गहनवनमें निकल ही गये | ठुछ सीके पत्रोंसि करे । वे पत्ते भी दशही हों। उन पत्तोंके 

हैं॥ ९ ॥ प्रीतिस देनेवाढा भारी बुद्धिमान्‌ कौरव्य विदुर | समपेण करनेके समय १ “आओ कृष्णाय नमः? २ 'ओं 
मुझे मेरे निर्वाहके छिये एक सेर अन्न दे देता हैं ॥। १० ॥ | विष्णवे नमः ” ३ ओ अनन्ताय नमः ४ “ओ गोवि- 

है जनादेन ! में घरके पश्चिम भागमे रहती हूं । पैते सबी | नदाय नमः ' ५ आओ गरुडध्वजाय नमः? ॥ २० ॥ 
- कौरवॉकी कुमति देख ही है ॥११॥ भक्‍्तोंके भियतम धमके | $ | ओ दामोदराय नमः” ७ “आओ हृषीकेशाय नमः ' 
उत्कृष्ट ज्ञाता भगवान्‌ कृष्ण कुन्तीके वचन सुनकर वोडेकि, | ८ 'ओ पद्मताभाय नमः? ९ ओं हरये नम्तः ! और 

॥११॥ मैं आपको एक ब्रत कद्दता हूं, जिसके करनेस सव | १० वा ओ प्रभवे नमः ” इन दश नामसन्त्रोंझों पढे 

दुःखों से छूट जायगी। पुत्र पौन्नोसि परिवृत्त होकर थोडही | यानी इन्हींते पूजन करना चाहिय || २१॥ पीछे नमस्कार 

पूर्वक प्रणाम करके ग्रदक्षिणा करे । ऐसे इस ब्रतको 


ह ल्‍ | 

समयमें अपने राज्यको पाजायगी ॥१३॥ उसको दशाफल | 
२ बे है >> ॥ अदा परत ही य्ये कल कं» 
कहते हैं / हें सुब्रते | उस त्रतको करो यह सुन इुन्ती बोली | दझद्तितक प्रतिवष करता हुआ दशव्े पय्वेन्त कर 
कि हें प्रभो के शव! यह वताइय किस समय वह त्रत करता [॥ 55 ॥ इस श्र॒तके आरम्भ, मध्य तथा समाप्तिमें प्रतिवर्ष 
चाहिये ॥ १४ | यह मुझे बताइये | यह सुन भगवान्‌ तीन बार हवन करें। और कूृष्णमन्त्रसे हवन करना 








(3. *िबपप: लीन परफर-ेपपपकका सर एलन पं एज ०० फसल 33++3०००-> 





चरुणाप्टोत्तर शतम्‌ ॥ १३ ॥ ततो होमानते विधिवदाचार्स पूजयेत्खुधीः ॥ सौवणें ताम्रपाते 
वा मन्मये वेजपाचके ॥ २४ ॥ सोव्ण ठुलसीपत्न के २'येत्वा सुलक्षणम्‌ ॥ प्रतिमाँ च तथा 
कृत्वा अचोयेत्वा विधानतः ॥ २५॥ वनिधाय पत्तिमां तत्र आचायाग निवेदयेत ॥ दातप्या 
गोः सवत्सा च वल्यालड्ारभाषिता ॥२६॥ दर होमे तु कृष्णाय प्रिका दश चार्पयेत ॥ दाप- 
येत्त बाह्मणाय स्वयं सुकत्वा तथव च ॥ २७ ॥ उपायन च गद्दीष्व सर्वोपस्करसंयुतम्‌ ।. संसा- 
राणवमग्म॑ मां पाहि त्वं देवकीसुत ॥ २८॥ अनेनोपायन दत्वा नमस्कृत्य क्षमापयथेत्‌ ॥ दक्षि- 
णामियता देवि दातव्याः कृष्णसब्रिधों ॥ २९ || ब्रतानते दश विभेभ्यः प्रत्येक दशपूरिकाः॥ 
एवं दशसु वर्षष ब्रत॑ कुयांदतन्द्रितः ॥ ३० ॥ एवं ब्रत॑ त्वया देवि कतव्य कृष्णसब्रिधों ॥ 
एवमुक्त तु कृष्णेन कुन्ती अ्त्वा मुदानिविता ॥ ३१ || उवाच कृष्णदेवं सा मम वित्त न विद्यते॥ 

प्रत्युवाच हषीकेशस्तब वित्त ऋषिष्यति ॥ ३२॥ ण्वमुकत्वा ययों कृष्णण कण द्र४ सुखा- 
न्वितः ॥ कर्णों।पि थे महात्मानं कृष्णं दृष्ठा प्रहर्षित: ॥| ३२३१॥ सिंहासन ददो तस्मे पाद्यमप्य 
तथेव च ॥ कर्णोप्प्टवाच देवश क्रिमथ तव चागमः ॥३४७॥ इत्युक्तः कृष्णदेवोईथ तव माताति- 
दुःखिता ॥ कण उवाच ॥ भ्ूरिभयात्तथा कृष्ण मातरं याम्यहं कथम्‌ ।| ३५ ॥ कर्थ वा दुःखतो 
माता अमुच्येत वदस्व में ॥ श्रीकृष्ण उवाच ॥ खुबणपात्रे संपूर्य पायसं क्षीरसंयतम्‌ ॥ ६६॥ 
निधाय झांतानिष्क॑ तु दातव्य॑ वायुहस्तके ॥ तब माता तथा प्रीता भविष्यति न 











| 








चाहिये। और एकसों आठ वार चरुकी आहुतियाँ अभम्रिमें 
दे ॥२३॥ हवनके अन्तर्मे बुद्धिमान ब्रती विधिवत्‌ आचा- 
यका पूजन करके उनको मरी प्रतिमाका दान करे ) इसको 
सुबणका सुन्दर, तुलसीके पत्तेक समान पत्र बनवाके रखदे, 
मेरी सुवर्णमयी प्रतिमामी उसीमें रखदे विधिवत्‌ पूजन करे 
[|२५॥फिर प्रेमसे उसको (दक्षिण हस्तमें रखके/आ चारय्यको 
_३ वछडे (ओर)कांसीके दोहरपात्रके साथ गऊका दानकरे 
| ९६ हवनके समय क्ृष्णचन्द्रके लिये दशपूरी औरइतनी 
ही आचायके छिये दान करे | और आपभी दक् पूरियोका 
शी भोजन करे | २५ || और सब उपस्करके साथ उप/यन 
खम्‌ ब्तकी साझतया पूर्ति करनेवाले दक्षिणा छेकर मेरे 
पमरपंण करं,और प्राथना करे । 
पमुद्रमे डूबा हुआ हूं आप मेरी रक्षा करें,सब आपके पूज- 
को सामग्री समत दक्षिणाकों स्वीकृत करें।२८॥|इसप्रकार 


करे | फिर कृष्ण चन्द्रके समीपमें दश बराह्मणोंको आसन्ोंप 
ईठा उन्हें दक्षिणा और दशदश पूरियाँ दे।यह सब प्रतित 
तान्तस करे और दक्षव॒पपय्य॑न्त उस ब्रतको करे ।अम्ाह 
नह करे ॥९९॥|३०॥ हे देवि | हमने जो विधि बतायी है 
पेदुचुसार तुमभी कृष्णचन्द्रकी मेरी प्रतिमा स्थापित करके 
इंजन करती हुईं दशाऋछब्रतको करो। कृष्णने इस प्रकार 


न इस सुनकर इुन्ती प्रसन्न हुई अपने समीए द्रव्य न देख. 








कस करूं।३१॥हषीकेश बोले कि, चिन्ता मत करो आपके 
धन होगा २२॥ एसे कुन्तीकों कहकर ग्रसन्नवापूवककणसे 


| मिलने चल गये | कर्ण भी भगवान श्रीकृष्णचन्द्रको देख 
यह विधि है कि, खुबर्ण, ताम्र सतत्तिका या वेणुपात्रम ॥२४॥ | 


बहुत असन्न हुआ ॥३३॥ खडा होकर उन्हें सुबणके सिंहा- 


| सनपर विराजमान करके पाद्य और अध्य दिया । पीढे 
रु कक ् छ््‌ 
| #ष्णचन्द्रस पूछा कि, हें ग्रभो ! आय आज केसे पधारे। 
श | ॥३४॥ ऐसा पूछन पर भगवान्‌ क्ृष्णचन्द्रजीने कहां कि। 
३ दे । फिर बख्च तथा सुवर्णमय झूज्ञादिद्वारा सुशोभित की | तुम्हारी भाता ( कुन्ती ) अदयन्त दु:खित होरही है । कर्ण 
बोला कि, ह कृष्ण | यद्यपि में जानता हूं पर मुझे बहु भय 
| छुगा हैं, केसे उसके पास जाऊं ! ॥३५॥ कसे उसकी सेवा 
| करूं | | “ कणकी माताभी कुम्तीही है?” यहवृत्तान्त यदि 
| राजा धम्सनन्द्न युधिप्ठटिरके सुननेमें आजायगा तो वह 
सी लीरज मन कल ओ राज्यादि मुझे दान करेगा में दुर्योचलके अधीन करूंगा ओर 
| लन्‍्दुल, में सार | दुर्योधनकों छोड यदि पाण्डवॉसे मिरके रहू वो मेरे विश्वा 
| सपर युयुत्सु होनेवाले दुर्योवनका विश्वासधातक बनूंगा। 
इससे बायना देकर पीछे बा क | दूसरे प्रथिवीके भारकों दूर करनेका आपका संकल्पभीभप्न 
रसस वायना देकर पीछे प्रणम॒ करके मेरेसे क्षमा प्राथन! होता हे | इससे में डरके इससे एक्द्स अछग रहता 
| हैं; कभी भी उससे माताघुत्रपनेका नाता नहीं दिखाता 
5 ३ हम 
हैं । यही मुझे बहुत भय है । अस्तु ] आपही ऐसा 
| उपाय वतावे जिससे वह माता दुःखित न रहे । श्रीकृष्ण 
बोले कि, सुवर्णके पात्रमें दुग्थकी खीर भरके ॥ ३६॥ 
| इसमें सौ निष्कोंको अर्थात्‌ दीनारों ( पछ प्रमाण सब 
3 मुइरोंकों ) धरे । फिर उसे वायुद्दस्तस दिवाय भेजे 
५० अर्थात्‌ कणने यह वस्तु भेजी है, यह किसीको भी मालुम 
कि,हे कृष्ण ! मेरे पास द्रव्य नहीं है । मैं इसविधिसे | ज को मल मा 
*+ सहसझबनिप्क तु दातव्य इत्यपि कित | २ 
तथा यथा न ज्ञास्यते तथा प्रेषणीयमित्यर्थ: 


स प्रकार उसे कुन्तीके पासमें पहुँचा दो। इससे 


दस्त दावव्य मित्यस्य कर्णन प्रषितमिति 


हू 





संशयः ॥ ३७ ॥ ए्वमुक्त्वा ततः कृष्णो द्वारकामाजगाम हु ॥ कष्णवाक्य ततः श्ृत्वा कर्णे- 
श्क्के महायशा॥। रे८ ॥ पायसेन समायुक्त पात्र स्वर्णन कारितम ।। दावनिष्कसमायुक्ते वायु- 
हस्ते प्रदाय सेः ॥ २९ ॥ प्रहसन्ती तथा कुम्ती पात्र दृष्ठा शरहर्षिता ॥ देवस्थ सल्निधों सा तु 
ब॒ते चक्रेडय भक्तितः ॥ ४० ॥ कृष्णेन कारते सब मम भाग्याय:वें धुवम्‌ ॥ कृष्णपूजां ततः 
कृत्वा कर्थां क्त्वाथ भक्तितः॥ ४१॥ डउपायन ददो तत्न बराह्मणेस्यों दशयय ॥ ठुलसी- 
दले सुवर्णेन कारयित्वा सुलक्ष णम्‌ ॥ ४२ ॥ प्रतिमाँ विष्णुभक्ताय स्वणपत्रे निध/य च ॥ गोदा- 
भनेन समायक्ताम चार्याय महामते ॥ ४३ ॥ कुन्ती ददों महदिदी विष्णमें प्रीयलामेति ॥ ब्रत 
दरशसु वर्षेषु चकारोद्यापनं ततः॥ ४४ ॥ तद्बतस्य मनावेण नदजाशागनास्वनः ॥ हत्वा शत्रूत 
मृथे सर्वान्क्रष्णस्येव प्रसाइतः ॥ ४५ ॥ युधिष्ठिरस्तु धर्म त्मा स्वं राज्य आ्ातवान्छुधीः ॥ पोवा- 
चेद ब्र॒त॑ कुन्ती द्रौपदी च पतित्रताम्‌॥ ४६॥ दशशाफछमिति खूयात क्ृष्णदेवित भावितम्‌ ॥ 
यूय सर्वे महादुःखं निस्‍्तीर्य स्वपुरींगताः ॥ ४७ ॥ ब्रतस्यास्य मभावेण क्ृष्णस्थेव मसादतः ॥ 
त्वमप्येव॑ ब्रत भद्दे कुरुष्ष छखुसमाहिता ॥ ४८ ॥ पुत्रपोत्रे: परिद्रता खवान्कामानवाप्स्यसि ॥ 
आचख्यो तद्भतं तस्थे कुन्ती परमहर्बिता ॥ ४९॥ सापि चक्के महाभागा द्वोपदी बतसत्तमम्‌ ॥ 
तस्मात्सरवपयत्नेन कलेव्य सुजनेः सदा॥ ५० ॥ या भक्‍त्या कुछते नारी ब्रतानाछुत्तम ब्तम्‌ ॥ 
सर्वान्कामानवाप्नोति विष्णलोके महीयते ॥ ५१ ॥ इदं ब्त॑ महाएुण्य  क्तानामुत्तम शुनम्‌ 0 
बदतां श्ृण्वतां चेव विष्णुलोको भवेदशुवम्‌ ॥ ५२ ॥ इति श्रीमविष्योत्तरपुराणे दशाकल- 
ब्रतकथा ॥ अत्र मूल चिन्त्यम्‌ ॥ 


नमन मिशन निशिशिश लिन नि नी लीन न डडककिवनीननिनि नीम मिनि शक लीकि यश किलिकीन्‍ लक कक न घी बज भा ाााााआा॥७७॥७७ए७ल्‍७ल्‍७७॥७॥७८""श////७एशशशआशआशआशआशआआआआशआआशशशशशशशशशशशशआछआछछषष 


तुम्हारी माता प्रसन्न होगी. संशय सत करो ॥३७॥ सूतजी | 
बोले कि, इस प्रकार कणसे कहकर श्रीकृप्णचन्द्र द्वारका | 
चले गये, दानियोंमें महायशवाले कणने श्रीकृष्णचन्द्रके | 
वचन सुन वैसाही किया ॥३८॥ सुवर्णके पात्रमे खीर भरके | 
| प्रभावसे सव संझूटोंस वचकर सानन्द्‌ अपनी पुरीसे आयी 
एकदम गुप्तरीतिसे कुन्तीके पास पहुँचा दिया | जब ऐसे | 

| करो ॥ ४७ ॥ ४८ ॥ उससे पुत्र पौत्रोंसे सम्पन्न हो सवंधा 
| पृणकामा होगी । ऐसे कह अत्यन्त हृष्ट मना हो द्रौपदीको 


उसमें ही सौ निष्क सुवर्णोंको अर्थात्‌ स्रो मुहरोंकों डालके 


द्र्व्य कुन्तीको मिछा तो वह बहुत प्रसन्न हुईं। श्रीकृष्णच- 
हरे हि २ 5 
न्द्रकी वेसी ही मूर्ति वनवाक उसको अपने सन्निद्वित कर 


उन्‍्हींकी बतायी हुईं विधिके अनुसार भक्तिपूण हो त्रत 


करने छगी ॥| ३९ ॥ ४० ॥ छुन्‍्ती मनमें यह विचारके 


बहुत असन्न हुईं कि, श्रीकृप्णने मेरे कल्याणोद्यके ल्यि'| ह् 
| सज्लनोॉंकों करना चाहिय ॥ ५७० ॥ जो स्त्री भक्तित इस 
होगा ! श्रीकृष्णचन्द्रका भक्तिपूवेक पूजन करके पीछे कथा | 


कहकर यह ब्रत कराया है। इससे मेरा अवश्य अभ्युद्य 


सुन ॥ ४१॥ दश ब्राह्मणोंके लिये ऋमगप्राप्त उपायन ( भेंट, 
दृक्षिणा ) दी | सुवणमय सुन्द्र तुलसी पत्रके साथ ॥ ४९ ४ 


सुवर्णमयी भगवानकी प्रतिमा सुबणके पात्रमें स्थापित कर | 


गऊके साथ महामति आचायको ॥ ७३ ॥ महादवी ( महा- 
राज्ञी ) कुन्ती ने देदी इससे वासुदेव भगवान्‌ प्रसन्न हों। 
ऐसे दशवषेपय्यन्त ( प्रतिवष दशदिनपय्यन्त ) त्रत करके 
पीछे कुन्तीने उद्यापन किया ॥ ४४ ॥ उस ब्रतके करनंसे 
उसके पुत्र सानन्द वनसे लोट आय | भगवान्‌ कप्णचन्द्रकी 
ही सहायतास सब शत्रुओंको संग्राममें मारकर ॥ ४५ ॥। 





धर्मात्मा सुधी युधिष्ठिर अपने राष्यको प्राप्त होगये, इुन्तीने 
पतित्रवा स्‍्न॒वा द्रौपदीसे यह सब वृत्तान्त कह सुताया॥४६॥ 
कि मैंने ऐसे दशाफल ब्रत किया था। श्रीकृषप्णचन्द्रन आप 
मेरे समीप आकर यह कहा था | द्ोपदी ! तुम उसी ब्तके 


हो | अतः हे कल्याणि ! समाहित चित्त होक₹ उस ब्रतकों 
दशाफल्ाष्टमीके त्रत करनेकी विधि वतादी ॥ ४५९ || फिर 
उस परम भाः्यशा लिनी द्रॉपदीने यह उत्तम ब्रत किया। 
हें मुनिजनो ' इसलिये वह दशाफल त्रत अवश्यही सभी 


उत्तम त्रेतक्ो करती है; उसकी सब कामनाएँ पूण होतो हैं, 


| अन्त विष्णुभगव: नके धासमें आनन्द्विहार करनेवात्ी 


होती है॥ ५१ ॥ यह त्रत महान्‌ पुण्यफलछका देनेवाला, 
उत्तम और पत्रित्र है; जो अमसे इसकी पब्रिन्न कथाका 
कीनैन या श्रवण करते हैं, वेभी मरनेपर बेकुण्ठघामको प्राप्त 
करते हैं || ५२॥ यह श्रीमविष्योत्तरपुराणकी कही हुई दशा 
फुरके ब्रतकी कथा समाप्त हुईं। यद्यपि परम्परासे यह 
आख्यान चला आरहा हैं;पर भविष्योत्तरपुराणमें यह पाठ 
मिलता नहीं है, अतः इस आख्यानकी <।सतविक खोज 
करनी चाहिये || 


००००७» ललक+3५3५५४५७+५५७ आन) 3थ मल न क++५+++भ+ मनन मनन न न न नननन न न न नमन 33 न +नमन न न नमन नमन नमन मन कनन-++ नमन न न मनन नन तन न नम मन न न नननननननन नल 


१ प्रषयामासेति शेष: | 








जन्माष्टमी बतम्‌ || 


अथ कष्णादिमासन भाद्रकृष्णाष्टम्यां जन्माष्टमीव्रतम्‌ ॥ तच्च अधरात्रव्यापिन्याँ कार्यम- 
“सोहिण्या सहिता कृष्णा मासि माद्रपदेडष्टमी॥ अर्धरात्रे 8 योगो5यं तारापत्युदये तथा॥ निय- 
तात्मा शुचिः सम्यक्पूजां तत्र मवर्तयेत ॥ ” इति विष्ण॒धरमोत्तरे 'तस्य पजाकालत्वोक्ते! -॥ 
दिनद्वये अरधरात्रव्याततावव्या्ती वा परेवा। प्रातः सड्डल्पकाले सत्वादिवारात्रियोगात्‌ “वर्जनीया 
प्रयत्नेन सप्तमी संयुताष्टमी' इति बहावेवतें सतमीयुक्तानिषेधान्व॥यदापूर्वच्चुनिशीय केवलाष्टमी 
उत्तरेद्यनिशीयास्पर्दिन्यष्टमी रोहणीयुक्ता तदा पूर्वव ग्राह्मा-कर्मकालसत्त्वात्‌ ॥ रोहिणी- 
योगस्तु केवल फलातिशयार्थों नवमीबुधादियोगवतन्न ठु निर्णयोपयोगी।इतरथा--भेतयोनिगताना 
तु भेतत्व॑ नाशितं नरें! ॥ ये। कृता श्रावणे मासि अष्टमी रोहिणीस्ता ॥ किं पुनवेधवारेण 
सोमनापि विशेषतः ॥ कि पननेवमीयुक्ता कुलकोव्यास्तु झुक्तिदा॥ इति सरोहिणीमप्यष्ठमी 





जन्माफहमीव्रल । 


प्रध्माय वेणु रुचिर कदम्बे कदम्बसाहुब वरा्ननानाम्‌ || 


केशप्रसारण यत्र कामिन्याः कामिना कृतम्‌ । 
तन्न तस्येव रूपस्य देहि में दशमच्युत ॥ 
संसारसागरे घोरे माधवस्त्वां समाभित, । 
कृपया पाहि देकेश ! शरण्योडसि जनादेन ॥ 


प्रजा करना भी भांति प्रारंभ करदे। ब्रतमें केवछ अध॑- 
राज़व्यापिनी अष्टमीको सामान्यरूपसे ग्रहण किया हू कि, 


पुष्टिस अधरात्रको पूजाविधान करनेवाछा वचन रख दिया 


है । इससे अतीत होता हे कि, केवछ राजिके पूजनमा | 
त्रको दिखानेके लिये ही वचन रख दिया है । बकी उस | 


बचनके पदाथंका साध्य अधराज्रव्यापिनीपनेमें कोई उप- 


योग नहीं है। यह जन्माष्टमीके ब्रतकी सामान्यव्रिविचना | 
हैँ कि, और कुछ हो वा न हो पर निशीथश्यापिनी अष्टमी | 


अवर्य होनी चाहिये ॥ वैसीही दो दिन रहनेवाली अष्ट- 
मीयोमेंस ब्रताष्टमी कौनसी है ? इस बातके निणयके लिये 
लिखते हैं कि, यदि दो दिन अर्धरात्रव्यापिनी अष्टमी जिले 
तो परका ही ग्रहण होता है। दोनोंही दिन अधेराज्रव्या- 
पिनी न हो, वो भी पराकाही ग्रहण होता है । इसमें 
कारण तीन हैं-पहिरा तो परा माननेसे प्रालःकाल ब्रत 

सैकस्पके समय अष्टमी सिक़्जायमी । दूसरे रातदिन यह 








अष्टमी रहेगी । तीसरे अह्यवेवर्तपु राणमें ऐसा कहा हे कि, 


| सप्रमीके साथ रहनेवाली अष्टम्मीको प्रयत्नके साथ छोड दे। 
बंधन डर | इन तीनों कारणोंसे दो दिन अधेरात्रव्यापिनी होने या न 
निधूयमान याम्रुनानिकुज रतोड्च्युतः सोडव॒तु मां प्रपन्नम्‌ | | होनेमें पराकाही प्रहण कएना चाहिये ॥ पूर्वाका प्रहण-उस 
| समय होता है जब कि, पहिछे दिन अधरात्रव्यापिनीअष्टमी 
| हो, दूसरे दिच रोहिणी नक्षत्रके साथ अष्टमी हो तो सही, 
| पर निशीथका र्पश न करती हो, इसमें कारण यही हे कि 
| पूर्वां में अधरात्रके पूजनके समय अष्टमी बनी रहती हे पर 


कृप्णपक्षसे मासका प्रारंभ माननेपर आाद्रपद कृप्णा | परम नहीं रहती। विरोधपरिहार-तो केवछ यही विचार 
'अष्टमीको जन्माष्टमीका ब्त होता है। इसमें अधेरात्रव्या- | 


पिनी अष्टमी होनी चाहिये. इसमें प्रमाण देते हैं कि, | “गत दोनों ही दिन हो तो पराका ्रहण है, पर एक दिन 


हा हा ग्य रु सरे पूः €ः 

इसका पूजनविधान रातमें किया है कि, भाद्रपदमासकी | वसा है के दूसरे, दिनहों तो कॉम भेद 
रोहिणी सहिता कृष्णाष्टओ आधीरातके समय हो वो समा, |... + | | पर ओर पूताक अहण करनक हतु आम मद 
हित चित्तवाल पवित्र पुरुषको चाहिये कि, ऐसे समयमें | 
| योगविशेषका विचार-कऋरक तो इसी निष्कष पर पहुँचे है 


+ | कि, योगविशेष फलके अतिशयके छिय है; खास नहीं है । 
अधंरात्रव्यापिती अवध्य होनी चाहिये । फिर इसीकी | यही बात नीचे सिद्ध करते हैं। सबसे पहिले रोड3िणीकेही 


| योगपर विचार करते हैं कि रोहिर्ण.का योग तो कंव्रढ 


करनेस हो जाता हे कि, दोनों दिन अधरात्रव्यापिनी न हो 


होगया। इससे दोनों वाक्योंमें कोई विरोध नहीं दीखताहै। 


हि ५, मे ४ 


फछका अतिशय दिखानेके लिय है जेस कि नवमी ओर 
बुधके योग हैं उक्त नक्षत्रका योग किसी निणयके योग्य 
नहीं है। यदि ऐसा न मानोगे तो यह जो पाद्ममें छिखा 
मिलता हे कि “ उन मनुष्योने प्रेत योनिको प्राप्त हुए अपने 
पुरुषोंका प्रेलपना मिटा दिया जिन्होंने श्रावण (भाद्रपद ) 
मासकी रोहिणी नक्षत्रके साथ रहनवाली कृष्णा अष्टमीका 
ब्रत किया है।यदि्‌ उस दिन बुबवार भी हो औरसोम्वारके 
उदयके साथ हो तो उसके विशेषफछका कहना ही क्या है 

यदि एसी अष्टमी नवमीके साथ संयुक्त हो लो कोटि 
कुछोंकी मुक्ति देनेवाडी हैं।” इससे रोहिणीयुता अष्टमीको 


ह40»७५५०५४न५०+नआल+9भआ ७५००५» «>> अल एएशणा प्स्ड ४ 








विहाय बुधनवमीयुता का्यापचेत ॥ सोमेनेत्यस्य सोमवरिणेत्यरथ इति कंचिता “तारापत्युदये 
तथा इति विष्णधर्मोत्तेकमूलऋल्पनालाबाबन्द्रोदय चेति मयूख ॥ उदय चाष्ठटमी किंचिन्नवमी 
सकला यदि ॥ भवेत्त इधसंयुक्ता प्राजापत्यक्षेसंयुता ॥ अधि व्षशतिनापि लछम्यते यदि वा 
न वा ॥ तत्र उदयशब्दश्न्द्रोदयपर/सूर्योदयपरत्वे ठ यदा[ पूर्वच्चनिशीय केवलाष्टमी उत्तरेश्ु- 
निशीयास्पशिन्यष्टमी रोहिप्या युक्ता सती बुधय॒क्ता तदेवोत्तरा स्यात्न लदभमावरे ॥ यावद्वचर्न 
वाचमिकमिलि न्‍्यायात ॥ यदि तु बुधामावेषपि रोहिणीयोगमात्रादेवोत्तरोच्यते तदा रोहिणीयो- 
गाभावेषपि बुधमात्रसद्भधावादुत्तरा स्थात्‌ ॥ अन्य तरापायेप्प्येतद्रदनमद्त्तेर ड्रीकारात ॥ ऋक्षयो- 


5 5 6. था परटेद्ार 3 लत पनिशा हट न 
गवद्ारयोगस्य पि प्राशस्त्यहत॒त्वानच्च ॥ किच-यथा पूल इ्डटेजालाडस स्जें उत्तर व 


निशीथात्पूवम॒क्षयोगे बुधसच्वे च एतद्वचनाइत्तरेइब्रेत तेवं पूर्वथुनिशीयेशऋश्ष ष्टमी सच्चे वु धा- 


विक्यादुत्तरेयुत्रेतापत्तिरिति ॥ यच्च विष्णुरहस्ये -्राजापत्यक्षेसंयुक्ता कृष्णा नभसि चाष्टमी ॥ 


मुहतमपि  लम्येत स्तोपोष्या च महाफला॥इति॥ अब्ापि मुहलेपद निशीथाखू्यसुहतपरम॥यर्वि- 
५ हक] $80५. ७ ५: 
दमत्यन्ताशुद्धम।तथात्व वाक्यस्थेवानथेक्यप्रस छाव ॥ यदा ।ह शुद्धाप्यड्म्पछधराते बलतमाना 
 ्््््् ७ __[_॒_(_(_क्‍_/“/“+औ+#ऑ विभपय२प-पौभभ३णए॥»भ3)पभ/£: “॒एण//-ः 
छोडकर एसी ही बुव और नवमीसे युक्ता करनी चाहिये | दोष होगा कि; पहिले दिन खाली अष्टमी निशीथव्यापिनी 
यह सिद्धान्त हो जायगा; इस कारण यह माननाही चाहिये | हो पर दूसरे दिन निश्शीध काहका स्पक्ठो न करनेबाली 


70 ४. हि ७ धर शी न्‍ः > - हर 5 
कि, रोहिणी आदिका योग: फलविशेषके छिय हैं। कोई | अष्टमी रोहिणी युत होती हुई दुघदता होगी दब ही उत्तरा 
| छी जायगी इसके अमभाजमें बद्टों छठी जा सकती। क्योंकि, 


खास बात नहीं है कि, ये आवश्यक हो हो । सोम-शब्द | ० 
आया है “ सोमेनापि विशषतः ” इस पद्यके अन्द्र:इसपर | जितने वचन धोते हैं बे सब मुखसेहो कहे होने हैं, यादी 
या ५ ॥। ् 
विचार होता हैं कि, इसका क्या अथ॑ है | किसीने इसका | जो प्रमाण हो या विधान हो वो कहा हुआ होना चाहिये 
रे रू ९५ ही प्र न, को. भ्भ्् कि ० बी 
चन्द्रवार अथ किया है जो कि, निणयसिन्धुमें झछकता हैं | ऐसे स्वछूम उत्तराका अहंण नहीं दैखा जाता. बह डद्यक्रों 
हक । ५ चर, (/",, 
कि; ऐसा बुधवार या चन्द्रवार हो पर इसका यह कहना | सूय्यके मानलेमे दोब होगा । यदि यह कहो कि, विना भी 
का कप चर 
| बुधके रोहिणीके योगमात्रसही उत्ततका ग्रहण हो जायगा 
श्ु कं, | कल 0. र्ज॑ पा ० 8. 
यानी तारापति बन्द्रमाके उदय होनेपर; यह वाक्य पड़ा | तो यह भी होना चाहिय कि, रोहिणीके योगके विना भी 
ऐप कक धन 2 स्शपया | ५ ३ है हि ५४५ 
है; इससे चन्द्रोदबंका छाभ होजाता हैं. कि, चन्द्रमाका | कंबल बुधवारक ही योगसे उत्तराका अहम हो जाना चाहिये 


ठीक नहीं है क्योंकि, विष्युघम् तारापत्युद्य सति ? 
उदय हो इसीके आधारपर सोमका “ चन्द्रवार अथ न | क्योंकि,रोहिणी और बुधवार इन दोनोंका योगमेंस एकके 
हैक कु 
| न रहनेपर भी यह्‌ वचन भ्रवृत्त होता है यह स्वीकार किया 














यूर हि. 0. किक 
कर चन्द्रोदय करना चाहिये यह सयूरवस लिखा हू इसस 


ए हि. 
यह निश्चय हुआ कि, “सोमन ' का अथ च न्द्रोद्यके | 


साथ है सोमवारी नहीं है ॥ परयुताका माहात्म्य--भी 


स्‍स्कान्दमं वणन किया हैं. कि; 
बुधवार और रोहिणी नक्षत्रस उक्त | 

उत्तम है पर यह सोवषेमें भी मिले या न मिले। उदय शब्द 
जा इसमें आया दे, इसका 


यह्‌ कहना उनका ठीक नहीं, क्योंकि, 
सन्दृह रहेगा, दूसरा वे हेतु देते है कि, 


अं, 


यदि ' सब नवमी हो यहां अयोग होनेस याती चन्द्रोद्य- 


कारूम कुछ अष्टमी रहनेपर संपूण नवमीका वारसें योग 
हो नहीं सकता वथा दूसरा कोई प्रमाण भी नहीं ह'इस 
कारण उद्यका सूर्योदय अथ करना चाहिये॥ इसपर त्रद 
राजकार कहते है कि। यहां उद्यशब्द चन्द्रोद्यपरही है; 


विकद 5 


सृय्यौद्यपर नहीं हैं। यदि सूथ्योद्यपर मानोंग तो यह 


उद्यकालछमें थोड़े समय | 
तो अष्टमी हो और बाकी सघ नवमी हो) वह भी अट्टमा 
हो तो अत्यन्त हे 


निर्णयसिन्धुकारने सूय्थाद्य | 
अर्थ किया हैं कि, कोई इसका चन्द्रोदय अथ करते हैं पर | 
चन्द्रोद्यक सत्वमें | 

« न्वम्मी सकला | द्‌ 
| हस्यमें छिखा हुआ है कि. भाद्रपद कृष्णाएमी यदि रोहिणी 





है, दूसरे नक्षत्रके योगकी तरह वारका योग भी प्रश्ेसाका 
[>म ऊ. कत 
कारण होत्है। इससे यह वात सिद्ध होगयी कि; ' थदये ? 
५३ २ $ ५ (९ हभक 
इससे चन्द्रकेही उदयका ग्रहण हैँ सूचका नहां. एक अ 


| बात है कि, जैसे पहिले दिन आधीरातके समय केवला- 


ष्टमी हो और दुसरे दिन अथेरात्रस पहिल रोहिणी नक्षत्र 
और बुधका योग हो तब इस बचनसे दूसरे दिन ब्रव होगा। 
इसी तरह पहिले दिन आधीरातके समय चन्द्रदाका उदय 
और रोहिणी नक्षत्र हो पर दूसरे दित बुधकी अधिकतासें 
भी दूसरे दिन त्रत होना चाहिये । किन्तु ऐसा होता नहीं 
है इससे भी घन्द्रोदयही छेना चाहिये । यह जो विष्णुर- 
नक्षत्र सहित एक मुहूर्त भी मिले तो उसमें त्रव करनेस 
सहाफल होता है इसमें जो मुहृतेपद पडा हुआ है वो 
विशीथ नामके मुहूर्तस तात्पये रखता हैं ऐसा को ई कहते 
हैं।पर यही इसका तात्पय है तो यह तात्पय अत्यन्त अशुद्ध 
है क्‍योंकि,एऐसा माननेसे बचनही व्यथ होगा जब कि,शुद्धा 





सति इति जज फझखयय झल्दइतिपटाल्स्म । 














निशान ामााआआआर 


आ्रह्या, तदा रोहिणी हिता सुतरामिति कि बचनेन॥ छहृतमप्यह रात्रे यहस्मिन्यक्तं हि लम्यते॥ 
अष्टम्यां रोहि गीऋक्ष तां छुठ॒त्यःडुपादसेव्‌ ॥ इति विष्णुरहस्ये एबं स्पष्टवादोराजसंबंधि यत्कि: 
विन्मुह्ृतमतीतिरिति कालतसवविवेचने तद्विपरीतम्‌ ॥ ऋक्षयोगस्य स्तावकत्वेन सार्थक्यात्‌॥ 
किज्वेतद्रचनद्रयग तापिशब्द्स्यथ स्वार्थ तात्पयोभावेत्र ऋक्षयोगस्तावकत्वेन प्राशस्त्यबोधक- 
ल्स्येवोचितत्वादिति ॥ यत्वुनरतब्रोके कर्मकालव्यातिशाल्वादेव प्रधानभूताया अष्ठम्या 
एवं अर्धराजसच्वेन प्राप्त प्राह्मत्वम्‌ ॥ दिवा बा यदि वा रात्रों नास्ति चेद्रोहिणी कला ॥ शात्रि- 
युक्तां प्रकुवीत विशेषेणन्दुलयुतम्‌ ॥ इति वचनेन रोहिणीयोगाभावविषये विशेषः क्रियते। 
एवं तस्यांर्थ:-- दिनावच्छेदेन राध्यवच्छेदन वा कलामात्रापि चेद्रोहिणी अष्ठम्यां नास्ति 
तदेव चन्द्रोदयसहितामधेरात्रव्यापिनीमिति यावत्‌ ॥ दिनद्येषपि ताइशया अभावे बहुरात्रि- 
संगुतातुत्तरां मकुर्ब॑तिति ॥ तन्न ॥ नेदं कमेकालशाख्वाघकम न्यथाप्यर्थ पंभवात्‌ ॥ तथाहि, 
दिनद्वये वेषम्येण निशीये स्पशों अहोरात्रावच्छेदेन रोहिणीयोगाभावे व विशषणावधिक्पेने- 
दुघंगता अधिकनिशीथन्‍्यापिनी झ्राहोति यावत्‌ ॥ रोहिणीयोगे त्वधिकनिशीथव्यापिनीमपि 


विहाय स्व॒ल्पा|पि निशीथयोगिनी रोहिणी बुतेव ग्राह्मंति व्याख्यान्लर मयूखे द्रष्टव्यम्‌ ॥ 


प्री अष्टमी अधराजमें रहनेवाली ग्रहण की जाती हे, यदि 
पेहिणी सहित मिछ जाय तो अच्छी तरह ग्रहण करती 
नायगी वचनकी कया आवश्यकता हे। जिस अहोशम्रमे 
अष्टमी रोहिणी नक्षत्र मुहृतेभर भी युक्त मिछ जाय तो उस 
ुपुण्यामें उपवास करे | यह विष्णुरहस्यमें दिनरात सम्ब- 
न्ध रोहिणी नक्षत्र युत अप्टमीकी किचिन्मुहृत भी ग्रतीति 
ग तो भी अहण करछे, यह स्पष्टही छिखा है इससे यह 
त परिस्कुट प्र्तीति हो जाती हे कि, पूर्वोदाह्नत विष्णुरह- 
यके बचनमें जो झुद्दृत पद्‌ ह वह दिनरातमें किसी भी 
हूर्ते हो यह अथ रखता हे निशीवाख्य मुहृतपरक नहीं 

। जो उसके मुह्तपदका निशीथका मुूते अथे करते हैं 
(छतरवसें उनसे विपरीत अर्थ किया है, यदि यह कहो 
5 यह क्यों रख दिया है तो यह भी नहीं कह सकते 
योंकि नक्षत्रके योगकी प्रशसाके छिय वचनके होनेसे 
क्य साथंक हो जावा हे. एक और यह बात है कि, 
मुहृतमपि ” इस वचवसें अपिशब्द पडा हुआ है तथा 
परे वचनमे भी इसी प्रकार अपि शब्द आया है इसका 
॥इं स्वाथंम तो तात्पय्य है नहीं, इससे नक्षत्रके योगकी 


ति करनेवाला होतेके कारण प्रश्साका बोधक माननाही 


०, 


चित जान पडता हे. जो फिर वहां ही यह कह है कि, 
में ( पूजादिकक ) कालप्त व्याप्ति (उपस्थिति ) हो विष- 
़रके कहुनेवाले शाससे ही प्रधान मूत अष्टमीक आवी- 
पम् रहनेके कारण उस ग्राह्मत्व प्राप्त हैं यात्री पूजाका 
सय जो आधी राद हें उसमें अट्टमीक रहते उस अष्टमी 
त होगा, ऐसा शास्र अतिगादन करता दे । इस है. विष- 
भें यह कहना है कि, “ दिन या रात दोनोमें रोहिणीकी 
ऋ भी कला नहीं हें तो आधी रातको रहनेवाडी चन्द्रो - 
सहिदा अष्ठभीको ब्रत करना चाहिये” इस वचनसे 


ही योगके प्रभावमें भी यह विशेष विधान किया है बषें 


कि, चन्द्रोदय सहिताकों ही के के इसी प्रकारही इस 
वाक्यका अथ हैँ कि, दिन या रातमें एक कला भी 
रोहिणी न द्वो दो चन्द्रोदयके साथ आधी रावको पूजनके 
समय रहनेवाढी अष्टमीही छेनी चाहिये | यदि दो दिन 
हो पर दोनोंही दिन वेसी न हो तो जिस रातको ज्यादा 
देरतक अष्टमी रहे उसी उत्तरामें ब्रत करना चाहिये। 
ऐसा कोई कहते हैं। पर ऐसा नहीं होना चाहिये. क्योंकि 
यह कम्काछके शाखका बाधक नहीं है इसका दूसरी तरह 


भी अथ हो सकता है| वही दिखाते हैं. कि, दोनों दिन 


समानतासे अधंरात्रव्यापिनी न हो तथा अहोरात्रभर 
रोहिणी नक्षत्रका योग न रहता हो तब विशेषणकी अधिक- 
तास चन्द्रोदयके साथ रहनेवाढी जो अधंरात्रमें अधिक देर 
तक रहनेवाली अष्टमी दो उसका ग्रहण करना चाहिये'रोहि- 
णीके योगमें तो अधिक रात्रतक रहनेवाली अष्टमीको छोड- 
कर थोडी भी अधेरात्रके साथ योग रखनेबाली रोहिणीयुवा 
अष्टमी प्रहण करनी चाहिये | यह इसकी दूघरी व्याख्या 
आचारमयूखमें देखती चाहिये ( निणयसिन्धु--सबके 
मत क्प्णाष्टम्ी पूर्वा और शुक्माए्ममी परा प्रहण की जाती 
है, ब्रत मात्र, क्रृष्णाष्टमी पूर्वा और शुह्लाष्टमी परा 
ली जाती है एसा माँबवका मत है,दीपिकामेभी यही लिखा 
है कि, सप्तमीयुता क्ृष्णाप्रओ) और नवमीयुता शुद्ल- 
प्टमी छेनी चाहिये।यह अष्टसीके ग्रहण का सामान्य विचार 
है कि, ब्रतमें कृष्णाष्टमी पूर्वा और शुक्लाष्टमी परा छी जाती 


श्र धर 


है। शिव और शक्तिक उत्सवॉमें तो दोनोंही पक्षोंकी उत्त* 
राका ही अहण होता है यह विशेष है क्वि,शक्ति और शिव 
अतोमें दोनों ही पश्चोंकी उत्तरा अष्टमी ढी जाती है ,जन्‍्मा- 
प्टमी-भगवाब्‌ ऊ5णक्ो हुए पांच हजार सत्ताइंसके छगभग 
वर्ष बीत गये | कस्ततरुमें जन्म पुराणका प्रमाण दिया है कि! 














पारणं तु तिथिमास्ते कार्यम्‌ ॥ तदाह रूग--जन्माष्टमी रोहिणी च शिदपत्रिन्‍्तथत च 
विद्वेव कतेव्या तिथिमानते च पारणामा इति ॥ 


॥ पूर्व- 
नि दि योएपि 5 5 पागणिएएणण पक के 
पधोषपि हार -झाप्रणामथ रोटिण्पां 


न कुर्यांत्परण कवित्‌ ॥ हन्यात्पुराकृतं कम उपवासाजितं फलमू॥ जिपिरश्ठ४र्ण हस्ति नक्षत्र 


च्‌ चतुगणम ॥ तस्मात्मयत्नात्कुवीत तिथिभानते च 
परणमिति मुख्यः पक्ष॥ एकतरान्ते त्वठुकल्पायदा तु निथिनक्षत्रयोरन्वतरस्थेत 
स्तदा राजो पारणानिषेधादन्यतरान्ते पारणाम्यतज्ञानादिववान्यतरान्ते छार्या | 
बद्विपुराणे--भान्ते कुयौत्तिथिवापि शस्तं मरत 


 छक हि॥.] द कि 
अट्टाइसबें कलियुगर्म माद्पद्‌ कृष्णा अष्टमीके 


एक तो केवछ जन्माष्टमी ओर दूसरी जयन्ती। जयन्ती 


कक, 


त्रत करना चाहिय। दूसरा प्रमाण 


घिद्ध होगया कि, रोहिणीयुक्ता अष्टमी जयन्ती कहाती हें । 


दिन दोनोंका अधरात्रमं सम्बन्ध नहों | 
पारणा-तिथि और नक्षत्रके अन्तमें पारणा करनी 
चाहिये; यही भ्रगुने कहा भी दे कि। जन्माष्टमी दृशरथ- 


कण 


और चौथगुना नक्षत्र अपनेमे पारणा किएसे नष्ट कई 


३५ 


पारणम॥ इलि ॥| 





| द्क् 
| सकता दे । 
५ करने कु न्‍्ती। जयन्ती | होनी चाहिये, चाहे नक्षत्रकी समाप्रिमें की ज्ञाय चाहे 
. किसे कहते ह/अब हम इसीपर विचार करते है । रोहिणी | ब्रततिथिक्री समाप्तिमे की जा रही हो | तबह। अग्निपुराणमें 
सहिताको जयन्ती कहते हैं क्योंकि, वहिपुराणमें लिखा | छिखा है कि, हे भारत - चाहे तो नक्षत्र 
हुआ है कि; भाद्रपद कृष्णा अष्टमी यदि रोहिणी नक्षत्रस | करे चाहे तिथिके बीत जानेपर पारणा करे पर दिनमें ही 
युक्ता हो तो वह जयन्ती कहलाती है, उसमें प्रयत्वके साथ | करना अप हें || 
विष्णु रहस्यका हैं कि; | 


भाद्रपदमासमें कृप्णपक्षकी अष्टमी रोहिणी नक्षत्रस युक्ता | जद विचार करते हैं, दर 
सव्पाण हा ध्यो ७ हि प्र किक प्र ण्‌्‌ गेंसे न | ई व । | 
हो वो वह जयन्ती कहाती है । इन दोनों अम्ाणोंसे यह | रणा कहते हैं, बह दूसरे दिन 


यह उत्तमा मध्यम्ता और अधमा इन भेरोंसे तीन तरहको (जे कि # आओ आह कल जज लिए 
ही शदि अदा रोहिणी गत तो पड हर | नछुके विचार छ््खिते हूँ-“थदि केबछ तिथिका उपचास ह। 
हती है। यदि अहारात्र रोहिफाका योग है तो उत्त ० तो उसके बीतजानेपर तथा नक्षत्रयुक्त तिथिका उपवास ह 
अधराजमाजमें योग हो तो मध्यमा, तथा दिवस वा शज्िस | तो दोन्रोंके अन्वर्म पारणा करनी चाहिए, यदि ऐसा हो 
थोडासा था हो तो अधमा है हे तीनोंके ड लिए वसिष्ठ- | कि, ब्रतके तिथिनक्षत्रोंमले किसी एकका अन्त दिल 
जे आजा, काीबो | मिलता हो पर दोनोंका अन्त रातमें हो मिले वो किखीभी 
6 दिल रन! ना २ दिन रो जब 2 पक कक मकर 
दोनों दिन ही या ४-हो वो सही पर निशीयके समय न | में दोनोंके अन्त्म दिनमें ह। पारणा करें ऐसा छिखा है 
हो, इनमें चौथा योगभी तीन वरहका होता है १-पहिले | यदि ब्रदके दूसरे दिन बत्रततिथि और ब्रवनश्षत्र दोनों 
पल मी न वरहका होता ह *-ररडड | कही अन्त मिल गया तो ठीकह्दी हैं, नहीं तो फिर तीसरे 
दिन अधैरात्रमें अष्टमी हो और पर दिन रोहिणी हो, ९- | दिन जाके पारणा विधानका सुख्य सिद्धान्त समझना 


पर दिन अप्टमी हो और पहले दिन रोहिणी हो ३-दोनों 





कली 
ते हें । 
इस कारण ब्रततिथि और ब्रत नक्षत्रके वीतजानेपर पारणा | 
करे । इसमें भी दो पश्ष हैं, दिनमें त्रततिथि ओर नक्षत्रके | 
बीतजानेपर पारणा करे यह मुख्यपक्ष है, एकके बीतनेपर | 
पारणा करनेका गौणपक्ष है जब कि, ब्रततिथि या त्रत्त | 
नक्षत्रमेंस किसीका दिनमें ही अन्त हो जाय तब. रातसें तो 


7पए:थय ॥ इलि | सत्र दिचसे इन्‍यस्ले 
दिमेपन्त- 
पल एव 
इति जअन्माष्टमीनिणयः ॥ 


्ै 
श्ा 


'प दिन देव- | पारणाका निपथ है। पर किसीके भी अन्‍न्तमें पारणाकर 
कीके पुत्र कृष्ण प्रकट हुए थ, + यह अष्टमी दो प्रकारकी हें, | 


इस +४कारका विधान है; इससे दिननही पारणा 


८ 


अन्त पारणा 


हैं (इस कारण पार- 

चर कु कप का ञ्ञ 

के दूसरे दिन वध भोजचको 
कब ऋरनी चाहिये ; इस 


कप रू छ 


पारणा प्रत्येक अ्तके अन्तम होती 
त्‌ 


अब  धमसि- 


चाहिये | निर्णयसिन्धुकार कहते हैं कि, यदि ब्रततिथि 


| और त्रत नक्षत्र इन दोनोंमेंस दिलमें किसीकामी अन्त न 
| भिरूता हो तो आधीरातस पहिल एक किसीके अन्‍्तर्मे 
| अथवा तिथि और नक्षत्र दोनोंके ही अन्तर्मं पारणा कर 
छलिता और शिवरात्रि इनको पूर्व विद्धा ही करनी चाहिये | 
तथा तिथि और नशक्षत्रके समाप्त होनेपरही पारणा करना | 
चाहिये ( व्रत तिथि-अष्टमीमैं पारणाका निषधभी त्रह्मवे- | 
बरतें किया हैं कि, अष्टमी ओर रोहिणीमें कभी पारण न | 
करे, क्‍योंकि ऐसा करनेसे पहिले पवित्र कम और उपवास | 
से इकट्ठें किए फछको नष्ट कर डालता है ) अठगुणा तिथि | 


लेती चाहिय | यह कबतक करनी चाहिये इसपर निर्णय- 
सिन्धुकार कहते हैं कि, निशीयके एक क्षण पहिलसमी 
दोनोंमेंस किसी का वा दोनोंका अन्त हो तो पारणा निशी- 
थर्में भी करछेनी चाहिये | ऐस समय भोजन हो नहीं सके 
तो फलादिकसे ही पारणाकर छेनी चाहिये। अनुकस्पमे 
ब्रवराजकार तो किसी एकके अभावसें पारणा मानते हुए 
भी रातमें पारणाका निर्बेध होनेसे दिनमें ही त्रततिथि या 
ब्रतनक्षत्र किसीकी भी समाप्ति होनेपर दिनिमेंही पारणा 
चाहते हैं । निणयसिन्धुकार केचित्तु करके इस वावका 
खण्डन्‌ करते हैं कि, कोई तो सा कहते हू कि, अधराज्र्में 
पारणा न करनी चाहिये, किन्तु एसे बखेड़ेमें तीसरे दिन 


| पारणा दिनहीमें ही किन्तु यह ठीक नहीं है, क्योंकि यदि 


अथ ब्रदप्रयोग३ || 


ाअइढअअऑअअशअअ:ए//खऊइ इक"? ह/णल्लऑसल्अस्‍क्‍इ अइअचछ 





ब्रतपृ्व॑दन दल्तधावनपूर्वक कृतेकमक्तो ब्तदिने कृतनित्यक्रियों देवताः प्रार्थयेत--सर्यः 
सोमो यमःकालसन्ध्या भूतान्यहःक्ष पा।पवनो दिक्पतिर्भूमिराकाशं खेचरा नरा॥बह्मशासनभा- 
स्थाय कल्पन्तामिह संनिधिम॥इत्युक्त्वा सफल पुष्पाक्षतजलपूर्ण ताम्रपात्रमादाय मासपक्षायु- 
छ्विस्य अमुकफलकामः्पापक्षयकामो वा कृष्णपीतये कृष्णजन्माष्टमीवतं करिष्ये इति संकरप्य। 
वासुदव सम्मादिश्य सर्वपापप्रशान्तये॥उपवासं करिष्यामि कृष्णाष्टम्यां नमस्यहम॥ अद्य कृष्णा- 
मी देवीं नमश्चन्द्रं सरोहिणीम्‌॥ अचोयेत्वो पवासेन मोक्ष्येप्रमपरेडहनि एनसो मोक्षकामो- 
$स्मि यद्ोविन्द्वियोनिजम्‌ ॥ तंन्मे मुखतु मां ब्राहि पतितं शोकसागरे॥आजन्ममरणं यावद्य- 
न्‍्मया इुष्कृत क्ृतम्‌ ॥ तत्मणाशय गोविन्द श्सीद पुरुषोत्तम ॥ इत्युक्त्वा पात्रस्थ॑ जलूं निक्षि- 


पेत्‌॥ततः कद्लीसतेन्रवासोमिराम्रपछवयुतसजलपूर्णकलशोदी पैः 


पुष्पमालाभियुतम गुरुधूपित- 


मश्निखड्ठकृष्णच्छागरक्षामाणिद्वारन्यस्तमुसलादियुत॑ मंगलोपेत॑ षष्ठचा देव्याधिष्ठित॑ देवक्य; 





खूतिकागृह विधाय तस्य समन्‍्तादित्तिषु कुसुमाशली “देवगन्धवांदीन्‌ खड़चर्म धरवसुदेवदेवकी- 
जा. ७ 


असक्त हो तो विना ब्रततिथि और नक्षत्रकी समाप्ति हुए 
भी विना ब्रवके दूसरे दिन प्रातःकालू देव पूजनादिककर के 


पारणा इरलेनी चाहिये | नि्णयसिन्धुरें ब्रतराजकी तरह | 


ब्ह्मवेवतेका बच व छिखा है, दूंसरा हेमान्द्रिका वचन रखा 
दे कि, तिथि ओर नक्षत्रकी जब समाप्ति हो अथवा नक्षत्र 
या तिथिकी सम्राप्ति मिछ जाय तो अधेरात्रमें पारणा की 
ना|सकती है, पीछे तो तीसरे दिन पारणा होगी इससे 
पत्िके पारणा पक्षकों निगयसिन्धुकारने मुख्य माना हे 
7 ब्तराजने रातिकी पारणाका निषेध किया है यह ब्रत- 
उज और निणयतिस्धुम भेद है । अहम रैवर्वमें लिखाहुआहे 
के; “सब उपवासोंमें दिनमें ही पारणा करना इृष्ट हे” 
नी दातमें पारणा न करनी चाहिए। निरणयसिन्धुकार 
ते हैं कि, दूसरे दिन्र द्निमें ही त्रवतिथि और ब्रतनक्षत्र 
न दोनोंकी सप्ाप्ति वथा एककी समाप्ति मिलजाय तो 
(नम ही पारणाकरे । धर्मसिन्धुकी तरह निर्णयसिन्धुभी 
पशीथत्त पूरवपक्षतक दोनों वा किसीकी समाप्तिमें पारणा 
'नता हैं। यदि दो दिन ब्रत न कर सके तो उसके लिए 
स्सवके अन्त अथवा नित्यकमंसे निव्रत होकर प्रातःकालू 
| पारणा करलेनी चाहिय । यह उसने सिद्धान्त 
या हें। 


अतप्रयोग-बतद्निसे पूर्वेदिन दन्‍्तधावनादि समस्त 
त्यिक नेमित्तिक कमेंकरके एकबार भोजन करे। दूसरे 
“व्‌ मलमूत्रद्यागकर नित्यकतेव्यकम्मेसे निवृत्त होकर देव- 
ओंकी प्रार्थना करे कि , सूये, चन्द्र, यम, काछ दोनों 
“या; पातःसन्ध्या, ( सार्येसन्ध्या ), भूत ( प्राणिमात्र ), 
(न, रात्रि, वायु, दिक्पाल, प्रथिवी, आकाश, नक्षत्र और 
डे यू ये सभी नद्याजीकी आज्ञा छेकर यहां सन्निहित हों । 
“| अकार साखढ्ि प्राथना करनेके पीछे फछ, पुष्प, अक्षव 





$ उनमे बियोनिजे विविधजन्मज एन इति शेषः। तन्मा मु चतु इसन्वयः ! विभोजनमित्यपरि पाठः । तत्र यस्से विभो- 





ऋए एक 
५४ ५ 


एवं जरूसे पूण ताँबेके पात्रको हाथ छेकर “ओम वत्सत्‌' 
इत्यादि वाक्य कल्पना करके देश काछ और अपने गोत्र 
एवं नाम्का स्मरण करके जिस कामनासे ब्रत करता हो 
उसको कहता हुआ जमुक फलछकी अभिदाषावाढा, या 
( यदि कामनाथ नहीं किन्तु कत्तेव्य भावनासे ब्रत करता 
ह तो उसको कहता हुआ ) पापोंके क्षयका अभिदाषी मे 
श्रीकृष्ण भगवान्‌की श्रीतिके छिए जन्मराष्टमीके ब्रतको 
करूँगा, ऐसा सझ्डूरप करे। पीछे भगवानका साखहि 
ध्यान करता हुआ ग्रतिज्ञा करे कि, वाहुदेव भगवानकी 
असन्नतास समस्त पापॉक क्षयके छिय. आज में भाद्रपद- 
कृष्णा/मीके दिन उपवास करूँगा,क्ृष्णाष्टमीतिथिकी अधि- 
दृवता एवं रोहिणीसहित चन्द्रमाका आज उपवासपरायण 
हो पूजन करूंगा। दूसरे दिन भोजन करूंगा। हे गोविन्द! 
में आपसे सोक्षपदकी प्राप्तिक छिए प्रार्थना करता है । मैंने 
अबतक दूसरी २ नींच योनियोंमें पाप किया है उसके 
2 एः कप चर ५ भर 
दुःखसे मुझे निमुक्त कीजिये | आप मेरी रक्षा कीजिये । में 
शोकससुद्र्म डूबा हुआ हूं । मैने जन्मसे अबतक इस जन्म 
में भी पापकर्म किय हैं हे गोविन्द ! उसे आप विनाशिये 
पक पु २ 
हे पुरुषोत्तम ! आप प्रसन्न हों। इस प्रकार कहे पीछे ताम्र- 
पात्रके जढादिकोंका भूसिपर या किसी जहूपात्रेम डाले। 
फिर अनेक केलेके स्तम्भ तथा वस्॑र और आमके कोमढ 
पत्रॉंसहित जह़पूर्ण अनेक कछश, दीपक, एवं पुष्पमाला- 
ओंसे चारों ओरस सजाया हुआ एवम्‌ अगरको धूपसे 
सुगन्धित अम्ि, खड्ढ, कृष्णच्छाग और रक्षासूत्रोंसे सुरः 
क्षिव, द्वारभागोंमें मुखछादिकोंसे सुशोभित, माज्ञलिक 
दृषंण आदिसहित पष्ठी देवीकी मूर्व्सि युक्त देवकीका 
सूतिकागृह बनावे | उसके चारों ओर भित्तियोंमें कुछुमा- 
अछि लिए हुये दंव गन्धव और यक्ष नागादिकोंके 


उनका सकल पिन मकभका, 


जनमुपवासस्तन्सा मुच्चतु मोचयत्वित्यर्थः । 


4८28, 2%: 0३०३३ 4: कहर किस रश»सो5 ५६ मार: पसे/8३०) उकिकेकिट” 0८7 श प्वलबकारार 2 है। ६४१ आन 8००४ ४३२०५: पर कल अमन वेककारकाााायापाबाकं»७ कक भाअत दाना कम शककन 








नकंसनिय्क्तान गोवेलुकुजरान्यघुनां तन्मध्ये छकालियमन्यज्य तत्का- 
लीन गोकुलचरित॑ यथासंभव लिखित्वा सूतिकाग्रहमध्य प्रस्‍च्छश्रप्टा॥ न मथश्क स्थापयित्वा 
मध्याहे नयादों तिलेः स्नात्वा अधेरात्रे श्रीकृष्णं सपरिवारं पूजयेत्‌ ॥ अब पृजरविधिः- ग्रेभ्यो मा- 
तैवापित्रे इति मन्त्रों जंपित्वा आगमार्थ त्विति बण्टानादं कृत्वा अपसपोन्विति छोटिकासुद्रया 
भूतास्य॒त्साय तीक्ष्णदंष्टूति क्षेत्रपालं संभाथ्ये आचम्य प्राणानायम्य देशकालो संकीत्य मम 
सहकुटुम्बस्य क्षेमस्थेयंत्िजयामयायुरारोग्ये्रयानिवृद्धबथ धमोर्थकाममोक्षासूयचतुर्विधपुरु- 
पायसिद्धयथ निशी्े संपरिवार श्रीकृष्णभीत्यथ च पुरःप्णेक्तमकारेण पुरुषसूक्ताविधानेन च यथा- 
संभवनियमेन यथामिलितद्वव्येजन्माष्टमीवताडुन्देव परिवारसाहतश्रीकृषप्णपजनमह करिप्ये 
इति संकल्प्य कंलशा्चन शद्भाचेने च कुयोत । पुरुषसक्तेन न्यासान्कुर्याव ॥ रड्रवल्लीसमा- 
गक्ते सर्वेतोभद्रमण्डले ॥ अनव्रणं सजल॑ कुम्म ताम्ने मृन्मयमेव वा॥ संस्थाप्य वख्रसंबीत कण्ठ- 
देशो सुशोमितम्‌ || पञ्वरत्नसमा युक्त फलगन्धाक्षतेयुतम्‌ ॥स हिरण्य समासाद्य ताम्रेण पटलेन 
बा॥ वेशम॒न्म यपात्रेण यवपूर्णन चेव हि॥ आच्छादयेच्च चेलेन लिखेद्ष्टदुर्ल ततः॥ कायनी 
राजती ताम्री पेचली मृन्मयी तथा ॥ वार्कश्षी माणेमयी चेव वर्णकेलिंखिताथवा॥ इत्युक्तान्य- 
तमां प्रतिमा विधाय अग्स्युत्तारणं कृत्वा तिमाकपोलो स्पृष्ठा तदेवतामूलमन्तं॑ म्रणवादिचतु- 
श्यन्त नमोन्त॑ नामाअस्थे भाणाः प्रतिष्ठन्त अस्य प्राणाश्वरस्तु च ॥ अस्यथे देवत्वमाचोये मामहे 
ति च कश्चन॥इति मन्त्र च पठन्‌ माणपतिष्ठां कुयोत॥अस्या इत्यस्य स्थाने तत्तदेवतानाम आह्यम्‌ 


ननन्‍दय शोदागर्गगोपीगोप 


लिन लि मिल कमर मर कक जल मम ली मम जज. मल मर मजा लाला मत वलक लत मलिक गज अकाल का नम कि लाल बलि 
चित्र, खड़ चमे खद्भ रक्षक, ढाल पाणि बसुदेवजी, देवकी । 

कि हे ह 
| नियमसे तथा जो प्राप्त हो जाय उसी द्रव्यसे जन्माष्टमीके 


ननन्‍द, यशोदा, गर्गांचायं, गोप और गोविकाओंके चित्र, 


कंसकी आज्ञासे प्राप्त पूतनादि तथा इनके मरणादि सूचक | 
चित्र एवं वृषभ, गौ, कुजर यमुना, यमुनांगत कालियके | 
दमनावस्थाके चित्र और गोवधन धारणादि एवं उस | 
| तांबे या मिट्टीका पानीस भरा हुआ सावित कलश स्थापित 
सम्भव लिखकर सूतिकागृहके मध्यभागमें चारों ओर | 
कपडेस ढके हुए प्यड्ूको विछावे मध्याहमें ही आप नद्यादि | 
| सहित हो, उसे जोके भरे हुए तांबेके अथवा बांस या 


बाल्यावस्थाम गोकुछक किये चरितोंके चित्रोंको यथा- 


किसी पवित्र जछाशयपर तिरछ स्नान करे । अध रात्रिके 


पस्येन्‍्त भगवानके ध्यानादि करता रहे । अधरात्रिक | 
पीछे परिवार सहित श्रीऊष्णचन्द्रकी तथा देवकी आदिकों | 
| काठ और मणि आदिसमेंसे किसीकी भी बनी हुईं प्रतिम्ता 
| अथवा चित्रपट तैयार कराक अग्न्युत्तारण करने योग्यका 
| अग्निउत्तारण संस्कार करके प्रतिमाके कपोलको छूता हुआ 
पूर्वव्याख्यातमत्रकों पढ़कर घण्टा बजावे। आं अपस- | 
| चतुर्थीका एक बचन करनेसे उसी देवताका मूलसंत्र बन 
| जाता है । इसी प्रकार “ ओम श्रीकृष्णाय नमः ' इस सूट्ठ 


की प्रतिमाओंका पूजन करे। अब पूजनविधि िखते-- 
/ओं येभ्यो माता मधुमत्‌ पिन्वते। एवापित्रे विश्वदेवाय”” 
इन दो मँत्रोंको जपकर ' ओम आगमार्थ तु देवानाम्‌! इस 


पन्‍्तु भूतानि' इस पूर्वोक्त मंत्रकों पढता हुआ चुटकी बजाबे 
और चुटकी बजानेकेसानो भूतपिशाचोंकों यहांसे निकाल 


दिया है ऐसी भावना करे । पीछे “ ओ  तीक्ष्णदृप्ट महा- 
| बोलकर ग्राणप्रतिष्ठा करनी चाहिये | [ प्राणप्रतिष्ठाका 


काय ” इस पूर्वव्याख्यातमंत्रस क्षेत्रपालकी प्राथना कर। 


पीछे आचमन और प्राणायाम करके देश काछकों कह, | 
| ना हो तो पांचरात्र शास्र देख छेना चाहिये | मंत्रा्थ 
आरोग्य और ऐशच्वयंकी अभिवृद्धि तथा धमं; अथे, काम | 
मोक्ष इन चारों दरहके पुरुषा्थोकी सिद्धिके लिये अधे- | 
रात्रके समय बछदेवादि सब परिवारसहित श्रीकृष्ण भग- | 
'हढ्ाषी भक्त देवपनको पूज्य भावसे प्रतिश्चित करता है ! 


कुटुम्ब सहित मेरी क्षेम, स्थेय्ये विजय, अभय, आयु, 


बानकी प्रसन्नताके लिये पुराणोंकी कदी हुई विधिके अनु- 








सार तथा पुरुष सूक्तके विधानसे जैसा हो सके डसी 
ब्रतके अज्भजरूपसे परिवार सहित श्रीकृष्णचन्द्रजीका पूजन 


करूँगा ऐसा संकल्प करके कछ॒श ओर झंखका पूजन 
९ 
करना चाहिये । रक्नवल्ली सहित सर्वेतोभद्र मण्डछपर 


करे, वह पूजाक्रमस ढका हुआ क॒ण्ठ देश?में सुशोभित 
पंचरत्नोंसे समायुक्त कछ और अक्षतोंसे युक्त एवम्‌ सोनें 


मिट्टीके पात्रसे ढक दे, पीछे सबको कपडास ढक दे उस- 
पर अष्टद्छ कमरू लिखे, सोना, चांदी, तांबा, पीतल, मिट्टी 


नामके आदियमें प्रणः और अन्तरमें नमः तथा नामकों 


मंत्रको एक स्तरों आठ वार जपे, फिर * अस्ये ? इस संत्रको 
सामान्य विषय पीछे लिख चुकेहेँ इस विषयमें विशेष देख- 
इस देवताके लिये. प्राण्रतिष्ठित हों; इस देववाके 


लिये प्राण संचार करें: इस देबताके लिये पृजनाथे 
अथवा इस अचावतारक लिये कोई पुजनका अभि- 








गायदधिः किन्नराद सततपरिवृता वेणवीणानिनादेभेड्रारादरीकुम्मभ्वरदइतकरेः किड्डरेः सेव्य- 
माना ॥ पड़े स्वास्वते या सुदिततरसुखी पुत्रिणी सम्यगास्‍्ते सा देवी देवमाता जयति छुब- 
दना देवकी दिव्यरूपा ॥ इति देवकीम्‌ ॥ मां चापि बालक छत पयक् स्तनपायिनम्‌ । श्रीवत्स- 
वक्षसं शान्‍्तं नीलोत्पेलेद्लच्छविम॥इति श्रीकृष्ण च हट नम इति देवकीम्‌। ३ 
श्रीकृष्णाय नम इति तत्मतिमायां कृष्णमावाह्म क नमो देव्ये भ्रिये इति श्रियम्‌ । बहुदे- 
वाय नम इति वखुदेवम्‌ | 3“यशोदाये नम इति यशोदाम्‌ । #नन्‍्दाय नम इति नन्दम्‌ | ४ 
बलदेवाय नम इति बलदेवम्‌ । ऊ चण्डिकाये नम इति चण्डिकां चावाह्म । ३ सपरिवाराय 
कृष्णाय नम इति नाममन्त्रेण कृष्णं पूजग्रेत्‌ ॥ तद्यथा--# सपरिवाराय कृष्णाय नमः 
आसनम्‌ ॥ ऊ सपरिवाराय कृष्णाय० पाद्यम्‌॥ # सपरिवाराय कृष्णाय० नमः अध्यम्‌॥ 
७ सपरिवाराय कृष्णाय० आचमनीयम्‌ ॥ योगेश्वराय देवाय योगिनां पतये विभो॥ योगो- 
द्ववाय नित्याय गोविन्दाय नमोनमः ॥ स्नानम्‌॥४सप०कृष्णाय० बस्यम्‌ ॥ ७४ सप० कृष्णाय० 
यज्ञोपवीतम ॥ ऊ सप० कृष्णाय० चरदूनम्‌॥ स०कृ० पुष्पाणि० ॥ अथाडरपूजा- गोविन्दाय० 
पादों पूजयामि ॥ माधवाय० जंघे पूृ० ॥ मधुसूदनाय० कटी पू० ॥ पद्मनाभाय० नाभि पू० | 
हृरीकेशाय० हृदय पू० ॥ संकर्षणाय० स्तनों पू० ॥ वामनाय० बाहू पू० ॥ देत्यसूदनाय" 
हस्तों पूृ० ॥ हरिकेशाय नमः कण्ठ पूृ०।चाहमसुखाय ० सुख पू०॥ त्रिविक्रमाय० नासिकां पू० ॥ 
पुण्डरीकाक्षाय० नेत्रे पृ०नसिहाय० श्रोत्रे पू०॥उपेन्द्राय” ललादं पू० ॥ हरसे न० शिरः पूणे 
श्रीकृष्णाय० सर्वाड़ पूजयामि ॥ ग्षेश्वराय देवाय तथा यक्षोद्धवाय च॥ यत्ञानां पतये नाथ 
गोविन्दाय नमोनमः ॥ बूपदीपो ॥ विशेश्वराय विश्वाय तथा विश्वोद्धणाय च ॥ विश्वस्य पतये 











'अस्ये” इसके स्थानमें उस उस देवताका नाम ग्रहण 
करना चाहिये | “ गायद्धिः ” इस मंत्रसे देवकीजीका 
ध्यान करे | इसका यह अर्थ है कि, किन्नर, अप्सरा, यक्षा- 
 दिगण, गान वेणु और बीणाकी घ्वन्तिसे जिसको प्रसन्न 


बलदेवादि परिवार सहित कृष्णक छिये नमस्कार इस नाम। 
मंत्रसे कृष्णका पूजन करना चाहिये। इसी मंत्रको पथ 
प्रथकू बोलकर आसन, पाद्य, अध्य और आचसनीय; सम- 
रण ; तर | पण करना चाहिये, हे विभो! मक्तियोगसे भक्तोंके हिये 
रेकर 33404 अंडे 2 कक और गा प्रकट होनेवाढे स्व॒तः शाश्वत योगियोंके, अधिपति योगेश्वर 
बह हे लव, बाग पा क्यि हे हि १६ | पैंव गोविन्द्को बारंवार नमस्काए है, इससे स्लान, ढिंए 
हे दि हि कक / ड5 पर्यक्षार | सस्ती पूजनके नामम॑त्रस ऋमशः वस्म, यज्ञोपवीत, चन्दन 
आरूढ, प्रसन्नसुख ओऔक्षृप्णचन्द्र जिसके गोदमें विराजपान | सैर पुष्प, समर्पण करना चाहिये | अग॒ पूजा-गोविन्द, 
हूं ऐसी दिव्य सोन्दय्य शाहिनी, मन्‍द मुसकान करती हुई का! ढ़ हे 
देवकी विजयको प्राप्त हो। “ बन्देडह ? इससे श्रीकृष्णच- | +ई भाधव, जंधा, मधुसूदन, कटी | पद्मनाभ) नाभि । 
न्द्रका ध्यान करे। इसका यह अर्थ है कि, पर्यक्षपर शयन हृषीकेश, हृदय । संकर्षण, स्वन। बामन, बाहू। वेत्यपूदत 
करके माताके रतनपान करते हुए वालमूर्ति वक्षःस्थलूसें | दस्त | हरिकेश, कंठ। चारुसुख,सुख | त्रिविक्रम) नासिका। 
श्रीवत्सचिहसे शोभायमान, शान्त, नीठकमलके दलूके | एण्डरीकाक्ष, नेत्र। नूसिह, श्रोत्र । उपेन्द्र छछांठ । हरि, 
समान सुन्दर भगवान्‌ श्रीकृष्णचन्द्रको में प्रणाम करताहूं - | शिरः। श्रीकृष्ण, स बांड्र । ये ऊपर लिखें हुए ऊपर सोलह 
'ओं देवक्‍्ये नमः देवकीके छिये नमस्कार इससे देवकीका | | नाम तथा इनके .साथ पाद आदि अंग तथा सोढहवों 
'ओ श्रीकृषप्णाय नमः” श्रीकृष्णके छिये नमस्कार इससे | स्वाह्ञ हे, इनमें एक अगकों हवितीयाका एक बचलान्त 
श्रीप्णकी प्रतिमा श्रीकृष्णका आवाहन करके पीछे * ऑ तथा दो होनेवाढे जंबा आदिको द्वितीयाका ह्विवचनान्त 
नमो देव्ये अिये ” इससे श्रीका, 'ओं वसुदेवाय नमः बसु- | करके आये हुए भगवानके नामका नूमसंत्र बनाके 
दृवक लिय नमस्कार इससे वसुदेवका; ओं यशोदाये नम | सबसे पीछे “ पूजयामि ” छूगाकर पुष्पोंस पूजन करना 
यशोदाके लिये नमस्कार इससे यशोदाका; ' ओ नन्दाय | चाहिये यानी एक एक बोलकर एक एक अंगपर फूड 
नमः ! लन्‍्दके डिये नमस्कार इससे नन्दका; ओ बल- | चढाने चाहिये। यज्ञस प्रकट होनेवाके वा यज्ञोंको 
पिला, बलदेवके छिये नमस्कार इससे बलदेवका;ओं | प्रकट करनेवाढे यज्ञोके अधिपति यज्ञेश्वर देव गोविन्दके 
परिवार य कृष्णायदसः | विश्वके उत्पन्न करनेवाले विश्वके अधिपति सर्वेरुप 


तुभ्ये गोविन्दाय नमोनमः ॥ नेवेद्यम्‌ ॥ ऊ स० क्रू० आचमनीयम करोद्धतेनम्‌ फलम्‌ ताम्बू- 
लम्‌ दक्षिणाम्‌ लीराजनम्‌ पुृष्पाखलिम्‌ ॥ दाते भविष्यपुराणोक्त:ः प्जाऋमः ॥ गारुडे तु-यज्ञाय 
यज्ञेश्वराय यज्ञपतये यज्ञसंभवाय गोविन्दाथ नमोनम इति अछ्यें ॥ सवेषां यक्ञपदानां स्थाने 
योगपदयुक्तोड्यमेव मन्त्र: स्नाने॥तथव विश्वपदयुक्तो नेवेद्ये। (तथेव धर्मपदयुक्तः स्वाहाम्तस्तिल- 
होमे ॥ विश्वपदयुक्त एव शयने ॥ सोमपदयक्तश्वद्धपूजायां इति मन्त्रा उक्ताः॥ ततो गव्य- 
घृतेनामौं बसोधोरा, कवचिदृग॒डघृतेनेति ॥ ततो जातकमंनालच्छेद्पष्टीपूजानामकरणकर्माणि 
संक्षेपण कार्याणि।ततश्रन्द्रोदये रोहिणीयुत॑ चन्द्र स्थण्डिले प्रतिमायाँं वा नाममन्त्रेण संपृज्य । 
शह्ढे तोय॑ समादाय सपुष्पकुशचनदनम॥ जाठभ्यामवर्नी गत्वा चन्द्रायाप्य निवेदयेत्‌ ॥ क्षीरों- 
दार्णवसंभूत अन्रिगोत्रसमुद्धव ॥ गहाणाव्य शशाहंदें रोहिण्या सहितो मम ॥ इति अध्येम्‌ ॥| 
स्योत्स्नाया: पतये तभ्ये ज्योतिर्षां पतये नमः ॥ नमस्ते रोहिणीकान्त सुधावास नमो5स्ठ ते॥ 
नमो मण्डलदीपाय शिरोरत्नाय घूर्जदे।कलामिवेघेभानाय नमश्वन्द्राय चारवे ॥| इति प्रणमेत्‌ । 
अनधघं वामन॑ शोर वेकुप्ठ पुरुषोत्तमम्‌ ॥ वाखुदेव हृषीकेश माधव मधुसूदनम्‌॥ वराहं पुण्ड- 
रीकाक्ष न्सिहं देत्यसूदनम्‌ ॥ दामोदरं पद्मनाभ केशव गरूडध्वजम्‌ ॥ गोजिन्दमच्युत॑ कृष्ण- 
मननन्‍्तमपराजितम्‌ ॥ अधोक्षजं जगद्वीज॑ सर्गस्थित्यन्तकारणम्‌ ॥ अनादिनिधरन विष्णु त्रिलो- 





केश जिविक्रमम ॥ नारायण चत॒बाहुँ शह्ृचक्रगदाधरम्‌ ॥ पीताम्बरधरं नित्य बदमालाबिल- 


वितम/श्रीवत्साडुं जगत्लेतुं श्रीकृष्ण श्रीधरं हॉरिमशरणं त्वा प्रपद्मे5ह 


करना चाहिये। यह भविष्यपुराणका कहा हुआ पूजाका 


व्की जगह योग आदिक पद डालढनेसे अथ भी ायः 
बैसाही होजायगा ॥ फिर गऊके घीकी धाराया गुडमि- | राजित, अधो5क्षज, जिभुवनके बीज ( कारण ) खरूप, 
श्रित घृतकी घारा अ्रिम ढाछता हुआ वसोर्धारा करे । | उत्पन्ति, पाछन और सहारके कारण, अजन्मा, असर, 
| स्वेब्यापी ( विष्णु ), त्रिछोंकीनाथ, तीनों छोकोंकों तीन 
| पादोंसे आक्रान्त करनेवाले (त्रिविक्रम ) नारायण ( जल" 


; हट रेल पिन 
| शायी ); चतुभुज शद्ड, चक्र और गदाके घारण करनेवाले: 


पीछे जातकम्म, नारूच्छेदन, पष्ठीपूजल और नामकरण 
संस्कारोंको सूक्ष्म रीतिस करे। चन्द्रोदयके समयर्मे भूजिपर 
रोहिणीससेत चन्द्रमाका चित्र चावलोंस लिखकर व्या 


प्रतिमामें पूजन करे | पीछे शद्झमें पुष्प, कुश, चन्दन और | 
जल छेकर घरतीमें जानु टेककर रोहिणीसहित चन्द्रमाके | 
लिये अध्यदान करे । उसका ' छ्वीरोदाणव ! यह मन्त्र है। | 
इसका यह अथ है कि, हे क्षीरसमुद्रस अवतार घारणकर- 


( नस सस सससससलफरर--नान घर 8 

| हि ३ 8 है घर » । राजील ह 
ध्ध् गोौविन्द्रक छ [ सरकार सस । गा चर कं है ९ पे 

विश्वेश्वर तुझ गोबि 3 लिये वारंवार नमकार हैं; इस । आप रोहिणीसमेत इस मेरे दियेहुए अध्येको प्रहण करें । 

हख ट्टि प्र दा पर रोदत । प्‌ 

नवेद्य। पहिले कईहुए मूढमत्रस अमन व हे 5 | ४ ब्योत्सनायाः ” इस्यादि दो मन्‍्त्रोंसे ग्रणाम करे; अर्थ 

फल) ताम्बूछ, दक्षिणा, नीराजन और पुष्पांजलि के 3 0 कल ह6 कम कक अली सिह मा 

| हैं कि, ज्योत्स्ता। ५ चाँदनी ) रात्रिके नाथ, ज्योतियों 


हम 3५ +। | ( त्क्षत्रों ) के स्वामी रोहिणीके प्राणप्रिय और असृतके 
क्रम पूरा हुआ।। गरुडपुराणमें तो--ओं यज्ञाय यज्ञेधराय | सिघान आप हैं आपके छिय प्रणाम हैं। गगनसण्डरमें 
यज्ञपतये यज्ञसभवाय गोविन्दाय नमो नमः ” यह्‌ मूल" ,क्षाश करनेवाले दी व हि 
मंत्र रखा है। इसका अर्थ हें कि; यज्ञसे प्रकट होनेवाले | " हर हक बा कप जग रिललह प 
है 2 आ क | कलाओंसे बढनेंवाले सुन्द्र मूर्ति चन्द्रमाक लिये प्रणाम हैं। 
यज्ञपति, यज्ञरूप, यज्ञबर गोविन्दके छिये वारंवार नमस्कार | अन्नन्न ? इत्यादि छः मूलमें ऊपर लिखे मन्त्रोंस मगवान्‌ 
है इससे दोनों अध्य दे । इस मंत्रके सब यज्ञ पदोंकी जगह | श्रीकृप्णचन्द्रको प्रणाम करे, इनका यह अर्थ हैं कि, निर्मल 
योगपद्‌ करदेनेसे यह मंत्र स्नानका हो जायगा, विश्वपद्‌ कर | ( अनघ ), वामलावतार धारण करनेवाले या दैत्योंसे देव, 
देनेसे नेवेद्यका होगा । तथा अन्तर्म नमः की जगह स्वाहा | 


तथा यज्ञकी जगह सवंत्र धर्मंपद्‌ करदंचस तिलहोममें | शुरवंशर्मं अवतार धारण करनेवाले, बेकुण्ठके नाम, पुरुषो- 


५ आवक के | । तर न 
प्रयुक्त होजायगा | विश्वपद॒के लगानेसे शयनमे तथा सोम | त्तम, वासुदेव, हषीकेश, माधत्र, मधुसूदत, वराह ( यज्ञ- 
पदके लगानेस चन्द्रमाकी 5 होजायगा । ये | स्वरूप » पुण्डरोकाक्ष-श्वंदेकमलछ सचश नत्रवाले; नर्सिह+ 
पूजाके मैत्र कहदिये । रही अथकी वात, उसमें भी यज्ञश- | देत्योंके शत्च, दामोदर, पद्मताभः केशव, गरुडध्वज, गो- 


| विन्‍्द, अच्युत, दुष्टोंक दूमन कारी ( कृष्ण ») अनन्त अप- 





शे ६ छल को 
हरकिकाक भे फ्रक़ ममए %ाौनह २ ५. ० हा + नरवड्रस्धदाआकाण अजआत्क हे 7 ५ 
बज. असि+ ४ ६ ! 
ध्ु कक 


पकक । टधालज के 
भर पडा है नि जब के न पड़े | ४ 5 पतन मम 
पक ० भ्द्दी पछह पे हक 





अविऋषिके गोत्र प्रगट 'होनेवाछे | हे शशाइर | 


ताओंकी निगीणे की हुई विभूतिको वाजिस करानेवाले, 


पीताम्ब्रघारी, नित्य वनमाछासे विभूषित, श्रीवत्सचि- 
हसे शोमित वक्षःस्थलवाछे) जगतके सब्योदारवरूप, 
श्रीकृष्ण ( लक्मीके मनको हरनेवाले » शीधर, हरि आप 
हैं, में अपनी कामनाओंकी पूर्तिक लिये आपके शरण जाया 


१ 
के 
, 


- करन भालकपानननपनागा गाए धगागगणिण गणित 


सर मनवा नस ीवननक्नानप +क जज भकन्‍< ७9 ० 


मामि सदा देव॑ वाछुदंब जगत्पतिम्‌ ॥ इति मन्त्रेः प्रणम्य ॥ जाहि माँ सर्वलोके श॒ हरे संसार- 
सागराव / वाहि माँ सर्वपापच्च दःखशोकाणंवातल्यभो । रु सवलोकेश्वर त्राहि प ततमा भवाणंवे॥ 
देवकीनसदन श्रीश हरे संसारसागरातद ॥ त्राहि मां सबढःखन्न रोगशोकाणेवाद्धरे॥ इबृत्ताबायसे 
विष्णो ये स्मरन्ति सकृत्सकृत्‌॥ सो5ह देवातिढदेत्तत्बाहि मां शोकसागरात्‌ ॥ पृष्कराक्ष 
निमग्नोहह मांयाव्यज्ञानसागरे ॥ त्राहि मां देवदवेश त्वत्तो नान्यो$स्ति रक्षिता ॥ यद्वाल्ये यंत्र 
कौमारे योवने यज्च वा््धके॥तत्पुण्यं वृद्धिमायात॒ पापं हर हलायुध॥इति मन्त्र भाथयेत्‌ ॥ ततः 
स्तोत्र पठन पुराणश्रवणादिना जागर॑ कुर्यांव॥ द्वियीयेषद्नि प्रातःकाले स्नानादिनित्यकर्म क्त्वा 
पूरववहव पूजयित्वा ब्राह्मणाव्‌ भोजयेव।तेभ्यः खुवर्णघेलुब्थादि दत्वा कृष्णो में प्रीयतामिति 
बदेत्‌ ॥ य॑ देव॑ देवकी देवी वखुदेवादजीजनत्‌ ॥ भोमस्य बह्मणो गुप्त्थे तस्मे बह्मात्मने नम॥ 
नमस्ते वासुदेवाय गोब्राह्मणहिताय च ॥ शान्तिरस्तु शिव॑ चास्तु इत्युकत्वा मां विस ज॑यत॥ 
;ति प्रतिमाम॒द्रास्य तां बराह्मणाय दत्वा पारण कृत्वा ब्रतं॑ समापयेत ॥ सर्वस्मे सर्वेश्वराय 
पर्वेषां पतये सर्वसंभवाय गोविन्दाय नमोनम इति पारणे ॥ भूताय भूतपतये नम इति समा- 
पने मन्त्र: ॥ इति पूजाविधिः ॥ जथ कथा ॥ युधिष्ठिर डवाच ॥ जन्माष्टमीव्र्त बूहि विस्तरेण 
ममाच्युत ॥ कस्मिन्काले समृत्पन्ने कि पुण्य को विधिः स्मृतः॥ १ ॥ श्रीकृष्ण उवाच ॥ मह- 
द्धे पराइते शमिते कुकुरान्धके ॥ स्वजनेबं-्धुमिः स्रीनिः समेः स्निग्बैः समावते ॥ २॥ हते 
रसाझुरे इष्टे मधुरायां युधिष्ठिर ॥ देवकी मां परिष्वज्य कृत्वोत्सड्रे रुरोद ह ॥३॥ वसुदेवो5एपि 





. | सदा क्रीडादि करनेवाले, जगदीश्वर वासुदेव जो आप 
! आपको प्रगाम करता हूं । “ ब्राहि मां? इद्यादि साथ 
चि मन्त्रोंको पढ़के श्रीकृष्ण चन्द्रकी प्राथंना करे | इनका 
ह्‌ अर्थ हे कि, हे सब लोकोंक नाथ ; हे हर ! आप ससा- 


मिरेपर प्रसन्न हों इस प्रकार कहे । देवकी देवीने वसुदेवसे, 
धारण करके जिस द्वको भौम ब्रह्मकी रक्षा करमेंके लिये 
प्रकट किया है। उस अह्यास्वरूप श्रीकृष्णचन्द्रके लिये नम" 
स्कार है। गऊ और ब्राह्मणोंके हितकारी वासुदेवके हिये 


पागरस मेरा उद्धार करें | हे समस्त पापोंके अन्तक ! 
प्रभो | आप दुःख और शोकोंके समुद्रसे भरा उद्धार 
रें ॥ हे सबवछोकेश्वर ! संसा रसमुद्रभ पडा हुआ, मुझको 
प बचाइये। हे देवकी नन्‍्दन ! हे लक्ष्मी पते | ( श्रीश ), 
दर : आप जन्ममरणरूप सागरसे भरी रक्षा कीजिये, 
सब दुःखोंके नाशकारी ! हे हरे ! आप दुःख एवं शीक- 
गरस भरी रक्षा कीजिये! हे विष्णो ! आपका जो स्मरण 
पते ह उनकी सदेव बार बार पालना करते हो। हे देव ! 
अत ढुराचारी है, आप शोकसागरसे भरा उद्धार 
जिये। हे पुण्दरीज्षाक्ष ! मैं मायावी हूँ र्वयम्‌ अज्ञानस- 
(में हवाहुआ हूँ, हे देव ! देवोंके भी नाथ ! आप मेरी 
[ करें, आपसे इतर मेरा कोई रक्षक नहीं हैं। मेंने बाल्य, 
वन और बुढापकी अवस्थामें जो धघर्म्माचरण किया है 
: बढ, है हलायुध | जो सेने पापाचरण किया है उसे नष्ट 
जिये। फिर भगवान्‌ श्रीक्षप्णचन्द्रके स्तोत्र भागवतादि 
/ग अवण करताहुआ जागरण करे। दूसरे दिन प्रातःकाड 
गनादि नित्य कम करके पूर्वोक्त विधिस संगवानका 
>ने कर, ब्राह्मणोंको भोजन करावे ! उन्तको सुबण, गौ 

र वश्चादि देकर, शरीकृष्णो में प्रीयताम? । श्रीकृष्णचन्द्र 





९ मायाविज्ञान्रेत्यपि पाठ: । 


नमस्कार है। शन्ति हो, कल्याण हो “ ये देव ' इसको पढ- 
कर भरा, ( श्रीकृष्ण चन्द्रका ) विसजन करे इस प्रकार 
प्रतिमाके विसजनके पीछे डसे आचायेको दें दे । पीछे 
सर्वस्प ? सर्वात्मा, सर्वेश्वर, खभीके रक्षक (पति) सभीसे 
सम्भव होनेवाले, गोविन्दके लिये बारबार प्रणाम है इतना 
हक पारगा कर। ' भूताय” (भूतात्मा ) भूतपतिक हिये 
नमस्कार है इससे ब्रत समाप्त करे। यह श्रीक्ृष्णाष्टमीके 
त्रतके प्रसज्ञमें श्रीकृष्ण पूजाविधि समाप्त हुईं ॥। कथा-राजा 
युधिष्ठिर बोले कि; हे अच्युत् ! जन्माष्टमीके ब्रतकी कथा 
आप विस्तृत रूपसे कहिय। इस बतका प्रचार किस समय 
हुआ है| इसका क्‍या फल है इसके करनेकी विधि क्‍या 
हे ! ॥१॥ श्रीकृष्णचन्द्र बोले कि, हे युधिष्ठिर | जब मह- 
युद्धका भय निवृत्त होगया कुकुर एवम्‌ अन्धक ( यादव 
विशेष ) आनन्दित होगये अपने बान्धव, ख्री, बराबरवाढे 
और सुहज्जन परस्परमें मिु गये ॥ २ ॥ मधुरामें दुष्टात्मा 
कंस » देत्य मारदिया गया, ऐसे समय अत्यन्त 
आह्वदित हुईं देवकी देवी मुझे छातीसे छगा, गोदमें 
बेठा मेर श्र पर प्रेमसे अश्रसेंचन करती हुयी 
रोने ढगी ॥३॥ दहांपर व्सुदेबजीभी वत्सड 








तंत्रेव वात्सल्यात्मररोद ह्‌॥ समालिड्ल्‍डदाअवदनः पत्रपुत्रेत्यवाच हु ॥ ४ ॥ समगद्गदस्वरो 
दीनो बाप्पपयोकुलेक्षणः ॥ बलभद्र॑ च मां चेव परिष्वज्य मुदा पुनः ॥ ५॥ अद्य में सफल जन्म 
जीवित॑ च सुजीवितम्‌ ॥ उसाभ्पामद्य पुच्राभ्यां समुद्धतः समागमः ॥ ६ ॥ एवं हर्षेण दाम्पत्यं 
हष्ट॑ पुष्ठ तदा हाभत्‌ ॥ भ्रणिपत्य जनाः सर्वे बधठुस्ते प्रहषिताः ॥ ७ ॥ ण्वं महोत्सव दृष्ठा 
मामूचुमंबुस्‌ूइनम ॥ जना ऊचु)॥ प्रसादः क्रियतामस्य लोकस्यातेस्थ दुःखहन्‌ ॥ < ॥ 
यस्मिन्दिने च आखूत देंवकी त्वां जनादन ॥ तदिन देहि बकुण्ठ कुमेस्तत्र भहोस्तश्य ॥ ९॥ 
एवं सतुतों जनोघेन वाखछुदेवो मयेक्षितः॥ विलोक्य बलभद्?वूं च माँ च हृष्टतनूरूहश ॥ १० ॥ 
उवाच स ममादेशाछ्ोकाअन्माष्टमीव्रतम॥मथुरायां ततः पश्चातपार्थ सम्यकू प्रकाशितम्‌॥११॥ 
कुव॑न्तु बाह्मणाः सर्वे व्रत जन्माष्टमीदिनिे।क्ष त्रिया वेश्यजातीयाः शञ॒द्रा येज्न्येषपि धार्मिण॥१२॥ 
युधिष्ठिरः उवाच ॥ कीदशं तद्घतं देवदेव सर्वेरतष्ठितम्‌ ॥ जन्माष्टमीति सक्ञं व्व पवित्र पापना- 
शनम्‌ ॥ १३ ॥ येन त्वं तुष्टिमायासि कात्सन्थेंन प्रभवाव्यय ॥ एतन्मे तत्वतों बृहि स्वि- 
धान सविस्तरम ॥ १४॥ श्रीकृष्ण उवाच ॥ मासि भाद्रपदेष्ठम्यां निशीये कृष्णपक्षके ॥ 
शशाह़े इृषराशिस्थे ऋक्षे रोहिणीसंक्षके ॥ १५ ॥ योगेःस्मिन्वसुदेवाद्धि देवकी मामजीजनत्‌ ॥ 
भगवत्याश्र तत्रेव क्रियते सुमहोत्सवः ॥ १६ ॥ योगेःस्मिन्क्थितेषष्टम्याँ सिंहराशिगते रवो ॥ 
सप्तम्यां लघ॒झ्॒क कुयोदन्तथावनपूर्वकम्‌ ॥ १७ ॥ उपवासस्य नियम रात्रों स्वप्याजितेन्द्रियः ॥ 
केवलेनोपवासेन तल्मिश्रन्मदिने मम्त ॥ १८ ॥ सप्तजन्नक्ृतात्पापान्छुच्यते ना संशयः ॥ 
उपावृत्तस्य पापेभ्यो यस्तु वासोगुणेः सह ॥ १९॥ उपवासः स विक्तेयः सर्वभोगविवर्जितः ॥ 




























तास रोदन करने छगे, अश्रपूण मुख हो 'हैं पुत्र पुत्र” इस | पत्रित्र पापोंको नष्ट करनेवाला ब्त किस प्रकार किया 


प्रकार कहके अपनी छातीसे मुझे छगा छिया ॥ ४ ॥ गहद | जाता है; जिसे सब मथुरावासी जन मिलके करते हैं।!१३॥ 
स्वर एवं प्रमाश्रओंसे नेत्र डबडबागये हृदय भर आया; | हे प्रभवाव्यय ! जिस ब्रतके करनेसे आपकी प्रसन्नता होती 
बल्भद्रजी और मेरा प्रेमसे आछिगन फिर करके आनन्द | ह इससे आप इस जन्माष्टमीके ब्रतकी विधि विस्दूत रूपसे 
पूवंक बोले कि ॥ ५।॥ आज जन्म सफर हुआ, भाँज॑ मेरा | कंहिय ॥ १४ ॥ श्रीक्ृ-णचन्द्र हक कि; भाद्रपद सासके 
जीवन सुधरा है । क्योंकि आज तुम दोनों पुत्रोंसे मिला |» पतक्षम अष्टमीको अद्धरात्रिके समय रोहिणीनक्षत्र और 
॒ व्य ६ || हे राजम्‌ ! इस प्रकार बे दोनों स्व्री पति देव- । इपका चन्हुमा था ॥ ९५ ॥ एस योगके श्हत वमुदेवजीसे 
कौजी एवं वसुदेवजी उस समयमें हृष्ट पुष्ठ होगये । अत्यन्त | वकीने मुझ उत्पन्ञ किया था। अतः सत्र छोग उसी समय 
आनन्दित होते हुए सभी मथुरावासी छोग उस महो- मर जन्मोत्सवको मनाते हैं। भगवती (देवकीजी या यशो- 
त्सवको देख मुझको प्रणाम कर पूछने छगे कि, हे सभी | दाजीके यहां प्रगट हुईं कात्यायनी देवी ) का महोत्सवभी 
दुखित छोगोंके दुखोंको नष्ट करनवाछे है कृष्ण , आप | वे इसी द्न मनाते हैं ॥ १६॥ यह योग जब सिंह राशि- 
अनुग्रह कीजिये [[७॥॥८॥ दे जनादव ! जिस दिन देवकी- | "र सू्ैनारायण हो) तब प्राप्त होता हैं। इसलिये जत करने- 
जीने तुम्हे जन्मा था हे वकुण्ठ ! वह दिन फिर आप | अष्टमीसे पूरे सप्तमीके दिन दन्तधावनादि नित्य- 
कीजिये, जिससे उस दिन आपके जन्मोत्सव मलानेका | मे करके भोजनुके समय एक बार भी बहुत इलका 
हमें अवसर मिले ।। ९।| जब इस प्रकार बहुत जनोंने |भोगन करे; जिससे म्राद: आइए हद आदि न्‌ हों 
प्राथैना की और वसुदेवने भी मेरी तरफ दृष्टि डाढी यानी | ४ । दूसरे दिन जन्माज वीक तन कला 
उस दिनको देखनेकी अमिराषा प्रगट की तथा मुझे और | नियम कर । रात्रिमें ब्रतके पृवंद्नि जितेन्द्रिय ( त्रक्न चय्य॑- 
बलरामको देखकर उनका शरीर रोमांचिव होगया ॥१०॥ | निछ ) हो; शयन कर । खीसज्ञसे पराजसुख हो भूतछूपर 
पीछे मेरे आदेशसे वसुदेवन छोगोंको जन्माष्टमीका अत | पवित्र देशमेंही शयन करें, न कि; प्यक्पर भौर न ख्ीके 
बता दिया, हे पाथे ! सथुरामं इस प्रकार होनेपर पीछे | साथ भेरे जन्साष्टमीके दिन ( दूसरे दिन ) कंव॒छ उपवास 
सर्वत्र भल्ली भांति प्रकाशित हो गया ॥११॥ मैंने कह कि, | करे इसे करनेस | १८ ॥ मनुष्य सप्तजन्मोंमे किये पापोसि 
हे जाज्मणो ! मेरे जन्माष्टमीके दिन तुम भी क्षत्रिय, वैश्य | अवश्य निमुक्त होता है।इसमें संशय नहीं है “पापोस निवृत्त 
शुद्र एवं गसवती स्लरियाँ भी ब्रतकों करो ॥ १९॥ राजा | हुए पुरुषके; ब्रताधिकारियोंक जो गुण बताये हैँ उन गुणोंके 
युधिष्िरने पूछा कि, हें देव देव |! वह जस्माष्टमी नामक ( साथ रहनेको उपवास कहले हैं, उसमें कोई भी भोग 










ततोःइम्यां तिलेः लात्वा नद्यादों विमले जले॥ २० ॥ खुदेशे शोभन कुयोदेवक्याः सूतिका: 

कि ६५ ७६ किक] $ ब्प् 'ड,पमनयर शह थ कर 

गहम्‌ ॥ सितपीतेस्तथा रक्तेः कबुरेरितररपि॥ २१॥ वालोमिः शोलितं कृत्वा समन्‍्तात्कदे- 

नंवः ॥ पृष्पेः फलेरनेकेश् दीपालिमिर्तिस्ततः॥ २९॥ पुष्पमरालाबिवित्नं च चन्दनागुरुधूपि 
तम्‌ ॥ अतिरम्यमनोपम्यं रक्षामणिविभषितम्‌ ॥२ ३ हरवशस्य चरित गोकुल च विलेखयेव। 
ततो वादित्रनिनदेवीणावेगु रवाकुलम ॥२७॥ वृत्यगीतकमोपेत॑ मडलेश्व समनन्‍्ततः ॥ वेष्टकारी 
लोहखड़ कष्णछान च यत्नतः॥ २५ ॥ द्वारे विन्यस्य मुसलं रक्षित रक्षणलके: ॥ पष्ठया 
देव्याधिष्ठितं च तदुण॒हं चोत्सवैस्तथा ॥ २६ ॥ एवंविभवरसारण कृत्वा तत्सूतिकाणहम्‌ ॥तन्मध्य 
प्रतिमा स्थाप्या सा चाप्यड्रविधा स्मृता ॥ २७ ॥ काथनी राजती ताम्ी पेत्तली मुन्मयी तथा ॥ 
वाक्षी मणिमयी चब वर्णकेलिखिता तथा ॥२८॥ सर्वेलक्षणसम्पूणों प्यड्े चाष्टशल्यके ॥ परत 
काथनाभासां महाहाी सुतपस्विनीम्‌ ॥ २९ ॥ प्रसूतां च प्रसुततां च स्थापयेन्मशकोपरि ॥ मां 
तत्र बालक खुत्त पर्यड्ढे तनपायिनम॥२०॥श्रीवत्सवक्ष्स शान्तं नीलोत्पलद्लच्छविभ्‌ । यशोदां 
तत्र चेकस्मिन्‌ प्रदेशे सतिकागहे ॥ ३१ ॥ तद्बल्च कल्पयेत पार्थ असूतां वरकन्यकाम्ातथेव मम 





नहीं होता” सप्रमीकी रात्रि बीवनेपर, अष्टमीके दिन प्रातः | 


कालछही उठकर मल्पृत्र त्यागादिस निवूत्त हो नदी तकाव 
का #2९०... क्न्क 3. 
आदि किसीएक जलाशपके पवित्र जलमें तिछ डाछके स्ञान 


करे ॥१९५॥२०॥ अपने घर सुन्दर पत्रित्र देशमें एक सनो- 
रम देवकीजीका पूतिझाग्रह वनावें। उस स्थानको चारों 


हि ध्‌ कर. । 
ओर सकेद, पीव, छाल, हरे और विविध रझ्वाढे॥२१॥ | जावे, उसके आ5 भागोंमें भूतबाधाकी निवृत्तिके हिये 
नवीन वात सजाबे तथा नूतन अन्रण जहपूर्ण घट जहां | आठ कीड़े छगावे उसपर शय्या बिछावे । उसपर सुन्दर 
पहा सत्र ओर ( भर्थात्‌ द्रबाज तथा कोगोमें ) रख दे | | 


अनेक रंगके पुष्प अनेक तरहके फछ सब जगह रखे । दीप- 


अद्भुव सुन्दर बनावे ॥ २३ ॥ हरिवेशमें जो मेरे चरित 
वर्णन किये हैं, जो मेने गोकुछमें गोवधेन धारण नागसथ- 
नादि कम्म किये हैं इन सबके चित्र छिख । फिर वीणा, 
वजु, मुदग, पटह गोमुख एवं शझ्जलादिकोंके शब्दस उसको 
गुंजित करे।। २४ ॥| नाच गान करें और करावे। स्वयं 


माज्लिक गान करे | उस स्थानके चारों ओर वेष्टकारी 


अर्थात्‌ भूतवाधादिभयको दूर करनेब्ाली औषधि एवमू | 
छोहकी तलवार और काले रंगका बकरा यातुघानादिके | 
भयको निवृत्तिके छिये बांवे ॥२५॥ द्वारपर मूसल रक्खे, | 


द्वारपालोंको द्वारोपर समाहित करके खडा करे ॥२६॥ उस 
सूतिकापूहमें पष्ठीदृवीका स्थापन करे, नानाविध उत्सव 


9 है राजन इस प्रकार अपनी सम्पत्तिके असुसार उस 
घूतिकागृहको सज्व, उसके सध्यमें सेरी प्रतिमा स्थापित 





करे | वह अतिभा आठ तरहकी होती है ।। २७ ॥ ! घुव: 


| मंयी, ९ राजतमयी; ३ ताम्रमयी,४ पित्तठमयी, ५सृन्मयी, 


६ काप्ठमयी, ७ रल्लमयी और आठवीं रंगोंसे चित्रित की 


| हुई | २८ ॥ यह प्रतिमा ऐसी हो, जो मरे लक्षण हैं वे सब 


जिसत्न सुन्दर दिखाई देँ। एक पय्येड्ु उस सूतिशागृहमे 


तपायें हुए सुबर्णक समान दिव्यकानित शालिनी, महामाग/ 


कप के 
के ज हे । थापि तु | 
कोंकी श्रेणि प्रज्वल्षित करके उसे करों ओर सजाके ऊप- | पतिब्रता ॥ २९ ॥ देबकीजीकी प्रतिमास्थापित करे। वह 


कर हि ५ ऐं ज््ू स्‍ ट | 

रकी ओर रखे ॥२२॥ विचित्र २ पुष्पोंकी माछाओंको इत- | अ्तिप्ता ऐसी अवस्थावाली होनी चाहिय, मानों पुत्र उत् 
/ 77३ नह ५ 

स्ततः बांधे, चन्दूनसे चचित करे, अगरकी धघूपसे धूपित | 

करे। सषप और रायी उुपारी एवं रक्तवृत्र इनकी पोट- | 

लिया ( रक्षामणि ) बांधकर उस सूत्िक्रागृहकों अत्यन्त | " 

| चिहसे चिहित वक्ष:स्व॒छ्वाढी, शान्ताकृति, नीलकमढके 

| +त्रक सम्रान कान्तिशाहिनी वह अतिमा होनी चाहिये | 


| ( यद्यपि सुवर्णादि धातुओंसे कलि्त प्रतिम्तामें श्याम- 


कर शबत कर रहीं हे | कृष्ण उसी पय्यद्टपर देवकीजीके 
मानों स्तनपान करते हैं ऐसी अत्यन्व बाहूक अवस्थाकी 
भरी प्रतिमाको शयनावस्थाके रूपमें रख || ३० ॥ श्रीवत्स" 


च्छ्वि हो नहीं सकती, तथापि कस्तूरी एवं हरिचन्दनते 
वंसी वही बनाछे यानी कस्तूरी या और किसी सुन्दर डे 
पुगन्धित पदाथेस उसे ऐसी आपच्छादित करे जिससे 
श्यामही प्रतीत हो । श्रीवत्सचिह्न तो सुवर्णाकार रोमोंकी 
दृक्षिणकी ओर घुमेरीका है, या भक्कजन उस प्रतिमा 
वेसही भावना करे ) एक ओर उसी सूंतिकागृहम यश 


| दाजीक्ी सुवर्णादिकोंकी श्रतिमा या रघ्जकरिपतमूर्त 


सुशोभित करे ३१ ॥ जैसे देवकीजीके समीपमें स्तन 
पान करती हुईं सगवाबक्ी सुप्तवस्थावालढी प्रतिमा सनाई 


थं का ३. 
गे. वेसेही यशोद्धाजीके पासमें सुन्द्र कन्या मानों अं 


पार्श्रस्था: कृताअलिपुटदा वृप॥श्शादेवा अहास्तथा नागा इफलि अग्एमण० 5 ॥ प्रणता+ पृष्पमा- 
लाग्रचासहस्ता: सुरासुरा। ॥३१॥ सख्धरन्त इवाझाशे महारेंटदितोदितेः ॥ हशवेडोएपे लत्रेव 
खड़चमंधरः स्थितः ॥३४॥ कद्यपों वखुदवोउयमदितिश्वेव देवकी ॥ शेते वे बलदवो5यं॑ बशो- 
दादितिरन्वभूव ॥ ३२५॥ नत्दः प्रतापतिदेक्षोगर्ंश्यापि चतुछुखः ॥ सोप्यश्चाप्लरसश्रेव 
गोवाश्वापि डिवो रकूसः ॥३६॥ एबोउवतारों राजेन्द्र कंसोई्य कऋलूपरेजिकः: ॥ तत्र कंसीनियुक्ताश्व 
मोहिता योगनिद्रया ॥ २७ ॥ गोपेलुकुखराश्रेव दानवाः शस्यपाणयः ॥ न॒त्यतथाप्खरोमिस्ते 
गरन्धर्वा गीततत्परा; ॥ ३८ ॥ लेखनीयब्व तत्रेव कालियो यघुनाहददे ॥ इत्येत्रमादि यत्क्चिचिदू- 
विद्यते चरितं मम ॥ ३९॥ लेखयित्वा भयत्नेन पूजयेद्धाक्तितत्परः॥ रम्यमेंव॑ बीजपूरः पुष्प- 
मालादिशो नितम॥४०॥कालदेशोद्धवः पुष्पेः फलेश्वापि युविष्ठिरपाद्या्यः पूजयेद्धक्त्या गन्ध- 
पुष्पाक्षतेः सह ॥ मन्त्रेणानेन कौन्तेय देवकी पूजयेन्नरः ॥ ४१॥ गायद्धिः किन्नरायेः सतलपरि- 
बृता वेणुबीणानिनादेश् ड्रारादशेकुम्मप्रवरव् तकरेः किड्रेः सेव्यमाना 0 पयेड़े: स्वास्तृुते या- 


मुद्तितरमुखी पुत्रिणी सम्यगास्ते सा देवी देवमाता जयठ च सखुता देवकी कान्तरूपा॥४२0 


पादावभ्य ख़यन्ती श्रीदेवक्पाश्वरणान्तिके ॥ नि 


बण्णा पड़जे पूज्या डिव्यगन्थघालुलेपन: ॥ ४३ ॥ 


पढ़जेः पूजयेदेंवी नमो देव्ये अय। इति ॥ देववत्से नमस्तेउस्तु कृष्णोत्पादनलत्परा थे ४४ ॥। 


पापक्षयकरा देवी तुष्ठटि यातु मधाचिता ॥ 


प्रणवादिनमो5न्त॑ च प्रथडनामालुकीतेनम्‌ ॥ ४५ ॥ 


कुर्यात्पूजा विधितश्व सर्वेपापापतुत्त ये ॥ देवक्पे वछुदव(य वाछुदेवाय चेव हि ' ४६ ॥ बलदे:- 
बाय नन्‍्दाय यशोदाये एथरू एथकू ॥ ब्वीरादिश्नपन॑कृत्वा चरदुनेनातुलेप्यत्‌ ॥ ४७ ॥। 
दा 2 की वन कम मनन कस ससक 


जन्मी है ऐसी स्थित करे ' मेरे पाषदों के चित्र या प्रतिमाएँ 
मानों ये | 
भजलि बाँधके स्तवन करते हैं ॥। ३९॥ ऐसही नवसूर्यादि- | 
प्रह, शेष, वासुकिप्रश्नति नाग, कुबेरादि यक्ष, चित्रकेतु प्रभू- | 
तिविद्याघर, इन्द्रादि देववा प्रणव होकर पुप्पमादा हाथोंमें | 
लेकर गेम पहरानेके छिय खडे हुए हैं ऐस स्वरूपमें | 
स्थापित या चित्रित करे | ऐसेही और सभी देवता एवं | 
दानवोंके ॥ ३३ ॥ चित्रादि हों कि, मानों आकाशर्मे वे | 


खड़ी करे, इनका ऐसा स्वरूप होना चाहिये, 


॥ ३४ ॥ वलुदेवजी कश्यप मुनि 


भर हि 


इच्छास प्रसूतिका घरका न | 
कराया था, पर वे उस समय यशोदाजीसे प्रगठ हुईं योग 


माया रूपा कन्याके प्रभावसे ऐसे निद्वित हुए कि, जिसूसे | | है ह 

किसीको कुछ भी ज्ञान न रहा ॥३७॥ बृषभ) गऊ; हस्ती | आदिका पूजन उनके नाम मन्त्रोंत्त होना चाहिय ॥ ४४॥ 

एवं देत्योंको शख्रपाणि तथा अप्सरा और गन्धबॉको दृत्य- | 

गान परायणसा छिखे (।३८॥ एक यमुनाहदका चित्र छिखे, | 

उसमें कालियनागका निवास छिखे । ऐसही जो जो मेने | 

चरित किय हैं ॥३९५॥ उनके चित्र भी जहां तहां छिखने | 
3. 





चाहिये । भक्तितस्पर हो पूजन करना चाहिये । सूतिकागृ- 
हके वीजपूर, एवं पुप्पमाछादिकोंके विवानस शोभायमान 
करे ॥४०॥ है युधिष्ठिर ! ऋतु ओर देशक अनुकूल उत्पन्न 
हुए पुष्प फछ एवम्‌ गन्व और अक्षत मिले हुए पाद्य अघोसि 
इस सन्‍्त्रसे देवकीजीका! पूजन करे ४१॥ “ गायद्धिः ? 
इस मूलोक्त पहिल कहें मन्त्रसे देवकीजीकी प्राथना करे 
॥७२॥ बहांपरही छक्ष्मीजीका चित्र ऐसा स्थापित झरे कि, 


देवकीजीके चरणोंके पास, अभ्यजन करती हुई कमछपर 
प्रहार, रोदन एवं विल्लाहट करते हैं। खड्॒ एवं चम्म | विराजमान है। सुन्दर चन्द्नस चचित् कर उन लक्ष्मी जी- 
हाथम लिये हुये वसुदेवजीका चित्रभी वहांपर सजाबे | काभी पूजन करना चाहिये । ४३ ॥ कमल चढावे और 
हैं, दवकीजी साक्षात्‌ | 
अदिति है. बलदेवजी शेषभगवान्‌ हैं और यशोद। दिति हैं| देवी ओर शिवाके छिये निरंतर 


॥ ३५ || ननन्‍्दजी दुक्ष्रजापति; चतुमुंख भ्रगवान्‌ ज्ह्मा,। 


: ऑ नमो देव्यें मह्ादेव्ये शिवायें सतते नमः ” देवी महा* 
तसमस्कार हैं, इस 


| मन्त्रको पढ़ता रहे | इसी मन्त्रस और और भी उपचार 
गर्गाचार्य, गोपिका, अप्सराय और गोप दूसरे दूसरे देवता | करे किए प्रा थे करे ' देववस्से' इस मन्त्रसे देवकीजीको 
हैं। ब्रती ऐसी भावना रख ॥ ३६॥ हे राजेन्द्र युविष्ठिर : | 

कंस कालनेमि देग्यका अवतार है । इससे मुझे सारनकी | 
ध्दोवस्त, अपने बीर नोकरोंते | 
| नष्ट करनेंवाली आप प्रसन्न होकर मेरे सब पापोंको क्षीण 


प्रणाम करे कि, सब देवता जिसके वालरूक हैं ऐसी दे 

देवकि देवि ! आपके लछिय नमस्कार है। आपही श्रीक्ृष्ण- 
कक हर 

चन्द्रको उत्पन्नकरनवाल्ली हो आपका पूजन किया हे पापोंको 


करें । प्रणव आदिम और नमः अन्तर्मे हो ऐसे देवकी 


॥४७।॥ इससे सब पाप नष्ट होते हैं यह पूजा, विधिज्ञकों 
करनी चाहिये । देवकीके लिये, वसुदेवके छिय वासुद्वक्रे 
लिये ॥४७६।॥ बलदेव, नंद,यशोदा इन सवको इनके नास 
मन्त्रों से क्षीरादिका स्तात कराकर चन्दुनका ढेप करे।।४७॥ 


अहाओ 



















# 00700: 0000000ी4भ 7 शश/ नह 7 6 आाअ्द कल! 








है 3, 8 28277: 77 200: क 7: 





























रं 
विध्यन्तरमपीच्छन्ति केंचिदत्रेव सूरयः॥ चन्द्रोदये शशाह्राय अहष्स दत्वा हरिं स्मरन्‌॥ ४८॥ 
अनध वामन॑ शोरिं बेकुण्ठं पुरुषोत्तमम्‌ ॥ वासुदेब हपीकेश माधव॑ मथुखूदनम्‌ ॥ ४९ | 
वराहं॑ पृण्डरीकाक्ष नृर्सिहें बह्मणः प्रियम्‌ ॥ संमस्तस्यापि जगतः खाश्टिस्थित्यन्तकारकम ॥५०| 
अनादिनिधन विएएं बेलोक्येशं तिविक्रमम ॥ नारायणं चतुबांई शब्बुचक्रगदाधरम्‌ ॥५१॥ 
पीताम्बरधरं नित्य वनमालाविभूषितम्‌ ॥ श्रीवत्साडुं जगत्सेतुं श्रीपतिं श्रीधर हरिम ॥ ५१॥ 
भ्रोगेश्वराय देवाय योगिनां पतये नमः ॥ योगोद्धवाय नित्याय गोविन्दाय नमोनमः॥ ५३॥ 
येज्ञेश्वराय देवाय तथा यक्षोद्धवाय च॥ यज्ञानां पतये नाथ गोविन्दाय नमोनमः ॥ ५४॥ 
विश्वेवराय विश्वाय तथा विश्वोद्धवाय च॥ विश्वस्य पतये तुभ्य॑ गोविन्दाय नमोनमः ॥५५॥ 
जँगतन्राथ नमस्तुभ्यं संसारभयनाशन ॥ जगदीशाय देवाय भूतानां पतये नम$ ॥ ५६॥ 
धर्मेशराय धर्माय संभवाय जगत्पते ॥ धमज्ञाय च देवाय गोविन्दाय नमोनमः॥५७॥ एताम्या 
चैव मन्त्राभ्यां नेवेश् शयनं तथा ॥ चन्द्रायाध्य च मन्त्रेण अनेनेवाथ दापयेत ॥ ५८ ॥ क्षीरो- 
दार्णवसंभूत अन्रिगोत्रसमुद्धव ॥ गहाणाध्य शशाड्रेश रोहिण्या सहितों मम ॥ ५९ ॥ छ्यो- 
त्लापते नमस्तुभ्यं ज्योतिषां पतये नमः ॥ नमस्ते रोहिणीकान्त अध्य नः पतिगहाताम॥९० 
स्थग्डिले स्थापयेदेव शशांक रोहिणीयुतम्‌ ॥ देवक्या वसुदेव च नन्द॑ चेब यशोदया॥६१॥बह- 
देवं मया साथ भक्‍त्या परमया नृप ॥ संपूज्य विधिवद्देहि कि. नाप्नोत्यतिदुलेभम ॥ ६२॥ 
पकादशीनां विशत्यः कोट्यो याः प्रकीतिता॥ तानिः कृष्णाष्टमी तुल्या ततो5ननन्‍्तचतु्दशी 
॥ ६३ ॥ अधेरात्रे बसोबोरां पातयेद्ृव्यसपिषा ॥ ततो वर्धापयेन्नाल पष्ठीनामादिकं मम ॥ ६४॥ 
अप: 2 कि कप कद सर 5 कम कर सिर दिल कि “कप कप पक से “की आल रन्‍क 




















॥४७॥(पूजाविधिवत्ता उच्चारण करता रहे । ये नाम मन्त्रही 
सब पापोंकों नष्ट करनेवाले हैं। अतः इनकी नामसन्त्रोंस 
सभीकी अछग अलग पूजा करके प्राथना करे कि,मैं अपने 
पापोंके विध्वंसके लिये पाद्य चढाता हूँ । अध्य दान करता 
हूँ, श्रीकृष्ण आप नाममन्त्रोमे नामोंको किस प्रकार चतु'* 
ध्यन्त रूपसे पढे । इस आशेकार्म “ देबक्ये ” इत्यादि 
एकशछोकस उन नाममन्त्रोंका क्रम दिखाया है ) यहां कुछ 
विद्वान्‌ भगवज्न पूजनकी दूसरी विधिभी चाहते हैं कि; 
चन्द्रमाक निमेल प्रकाश रोहिणीसहिल चन्द्रमाके लिये 
अध देकर निम्न लिखित चार क्ोकोंस भगवानऊका स्मरण 
कर इनका अथ पूजन विधानमें कर चुके हैँ ॥ ४८-५२॥ 
* योगेश्वराय ? इससे स्नान कराना चाहिये कि, योगसे 
प्रत्यक्ष होनेवाले नित्य एवम्‌ योगियोंके अधिपति योगेश्वर 
गोविन्द कृष्णके छिय वारंबार नमस्कार है ॥५३॥ “यज्ञे- 


राय! इससे धूप चढावे कि,(यज्ञसे प्रगट होनेवाढ़े एवम्‌ | 


यज्ञोंकी प्रकट करनेवाले ) यज्ञपति यज्ञेश्वर गोविन्द देवके 
लिये वारंवार नमस्कार है ॥ ५४॥ “ विश्वश्वराय ? इससे 
दीपक दिखावे कि,विश्वके उत्पन्न करनेवाले विश्वरूप विश्व- 
पति विश्वेश्वर तुझ गोविन्दके छिये बारवार नमस्कार है 
॥ ५५ ॥ * जगन्नाथ ? इससे उन्न पदाथोंको भोग छगावे 
जो कि, प्रसूतिके समय ख्लरियाँ खाया करती हैं कि,हे संसा- 
रके भयको तप्ट करनेवाले | हे जगन्नाथ ! तुम्हारे लिये 
नमस्कार है आप जगदीश एवं भूतोंके स्वामी है ॥ ५६ ॥ 
८. मैश्वेरय ' इंसस शयन कराव कि, धर्यके जाननवाले 





है स्‍्मानमन्त्रसाहू । २ वूषदीपसन्त्राबाह ' ३ नेवश्ध 


धर्मके इंश्वर धर्मके उत्पन्न करनेवाले धमंरूप देव गोविन्दड 
लिये बारंवार नमस्कार है। “ जगन्नाथ ' इससे नैवेद्य तथा 
' धर्मेश्राय ? इससे शयन कराना चाहिये । पीछे ' क्षीरो- 
दाणेव ! इससे एक अध्य दे तथा दूखरा “ ज्योत्स्वापते ' 
इससे दे। पहिछा-हे अत्रिगोत्री क्षीरसमुद्रस उत्पन्न होने- 
वाले | हे शशके चिह्॒वाले नक्षत्र और रात्रिक ईश ! रोहि- 
णीसहित आप भरे अध्यको ग्रहण करिये | दूसरा-हे चौंद" 
नीरातके स्वामी ! तेरे लिये नमस्कार है, हे नक्षत्रोंके अधि 
पति ! तेरे लिय नमस्कार है, हे रोहिणीके प्यारे ! तेरे ढिये 
नमस्कार हैं।हमारे अधेको ग्रहण करिये।५७-६०॥स्थण्डि- 
रूपर रोहिणीसमेत चन्द्रमाकी स्थापना करे । देवकीसहिक 
वसुदेवजीकी तथा यश्ञोदा हित नन्‍्दृवावाकी तथा बलदेव- 
सहित मेरी । हे राजन्‌ | परमभक्तिके साथ पू नाकरे। इससे 
ऐसा कौनसा पदाथ है जो नहीं मिछ्सकता।।६१॥ ६२॥ अब 
जन्प्राप्टमीके उपवास एवं महोत्सव मनानेका माहात्म्य 
स्वयं श्रीमु खसे कहते हैं कि,बीस कोटिबार कियहुए एकाद” 
शीत्रवोंके समान अकेला क्ृष्णजन्म्राष्ट मीत्रत है।इसके समा- 
नही अनन्‍्तचतुदेशीका ब्रत है ॥६३॥ निशीथकारूम धृतसे 
वसोर्धाराका सचन करे। सात वसोर्धारा लिखके उनपर 
पृतकी धारा वहावें।फिर वर्घापन कम्मे कराये, यानी जन्म 
दिनमे मार्केण्डेय आदिकोंके पूजनपूरवेक षष्ठीपूजनादि, 
नालच्छेदून, नाभकरणादि सब कम्म मेरा ॥ ६४ ॥ 





न्त्रमाह। ४ केषांचिन्मतेन नेवेद्रशयनमन्त्रावाह ! 





कर्तव्यं तत्क्षणाद्रात्री प्रभातें नवमीदिने ॥ यथा मम तथा कार्यों भगवत्या महोत्सव३॥ ९५ 
ब्राह्मणान भोजयेद्धकत्या तेभ्यो दरच्याच्च दक्षिणाम्‌ ॥ हिरण्यं मेदिनी गावो वासांसि कुसुमानि 
च ॥ ६६ ॥ यद्यदिष्टतम॑ तत्तत्कृष्णो मे त्रीयतामिति ॥ य॑ देवं देवकी देंबी वखुदवादुजीजनत्‌ 
॥ ६७ ॥ भौमस्य बहाणों ग॒प्त्ये तस्मे बह्मात्मने नमः ॥ नमस्ते वासुदेवाय गोवा ह्ताय च 
॥ ६८ ॥ शान्तिरस्तु शिव चास्तु इत्युकत्वा मां विसजेयेत्‌ ॥ ततो बन्धुजनोघं च दीनाना- 
धांश्व मोजयेत्‌ ॥ ६९ ॥ भोजयित्वा खुशान्तांस्ताव्‌ स्वयं खुझ्लीत वाग्यतः ॥ एवं यः कुरु ते 
देव्या देवक्‍्या: खुमहोत्सवम्‌ ॥ ७०॥ प्रतिवर्ष विधानेन मद्भधक्तो धमेनन्दन ॥ नरो वा यदि वा 
नारी यथोक्तं लमते फलम ॥ ७१॥ पुत्रसन्‍्तानमारोग्यं सोभाग्यमतु् लभेत्‌ ॥ इह धमराति- 
भुत्वा मृतो वेकुण्ठमाप्ठुयात्‌ ॥ ७२॥ तत्र देवविमानेन वषलक्षं युधिष्ठिर ॥ भोगान्नाना- 
विधान अु॒कक्‍त्वा पुण्यशेषादिहागतः ॥ ७३॥ स्वेकामसमृद्धे च सर्वाशुभविवर्जिते ॥ कुले 
नृपतिशीलानां जायते हच्छयोपमः ॥ ७४ ॥ यस्मिन्‌ सदेव देशे तु लिखितं ठ॒ पटार्पितम ॥ 


र्‌ः ५ आर बक 


पम्रम जन्मदिन भकक्‍त्या सवालंकारनूषितम्‌ ॥७५॥ पूज्यत पाण्डवश्रेष्ठ जनेरत्सवर्सयुले३ ॥ पर- 
चक्रमस तत्र न कदापि भवेत्पुनः ॥७७॥ पर्जन्यः कामवर्षी स्थादीतिभ्यों न भय॑ भवेत्‌ ॥ ग्द्दे 


वा पूज्यते यत्र देवक्याश्वरितं मम ॥७७॥ तत्र सर्व समृद्ध स्थान्नोपसगांदिक मवेत ॥ पशुभ्यों 


लेकार 


नकुलाग्यालात्पापरोगाच्च पातकात्‌ ॥७८॥ राजतश्वोरतों वापि न कदाचिद्धयं भवेत्‌ ॥ संसर्गे- 


णापि यो भकक्‍्त्या व्रत पश्येदनाकुलम ॥ सोड5पि पापविनिसुक्तः 


कर्मकाण्डानुसार रात्रिम करे दूसरे दिन प्रभातकालमें उठके 
जैसा महोत्सव मेरे जन्मकेनिमित्त किया था उसी प्रकार 
भगवती योगमायाके जन्मोत्सवक्के निमित्त भी करे ॥६५॥ 
फिर भक्तिपूवक ब्राह्मणोंको भोजन कराके उनको शक्तिके 
अनुसार दृक्षिणा दान करे। सुबर्ण, प्रथिवी, गऊ, वख्र 
और पुष्प, एवम्‌ और और | ६६॥ जो जो इस छोकमें 
अपनेको प्रिय मालूम हों वे सब दक्षिणाके स्वरूपमें दे दे । 
या आह्वणोंकों शकक्‍त्यनुसार दक्षिणा देकर त्रतीपुरुषको इस 
छोकमें जो सुवर्ण, प्रथिवी, गऊ,वबख््र, पुष्प, आदि रुचिकर 
हों वे सब पदाथ मेरे अपंण करे। दक्षिणादान या मेरे सम : 
: ईणक समय किसी पदार्थके बढढ़ेमें प्राथंना न करे; किंतु 
« कृष्णों में प्रीयताम्‌ ? इससे भगवान्‌ श्रीक्षप्णचन्द्र श्सन्न 
हों इतनाही कहे | जछको जमीनपर डाछ मरा विसर्जन 
करता हुआ “ये देवं? यहांसे ' शिंव चास्तु यहाँलक 
मूलोक्त वाक्यकों पढे । इनका अर्थ पूषं लिखआये 
हैं। पीछे सब बान्धवों एवं दीन अनाथजनोंको भोजन 
कराने ॥। ६७-६९ ॥| इन सभी शान्त सज्लनॉको भोजन 
४ क्राके आपभी भोजन करे, उस समय मोनी रहें । जो 
. पुरुष देवकीदेवीका महोत्सव प्रतिवर्ष विधिवत्‌ करता है । 
है धम्मेनन्दन | वह मेरा भक्त है। इस महोत्सवका मना- 
नेवाला पुरुष हो या सत््री वह यथोक्त फलको प्राप्त करता 
है॥ ७० | ७१ ॥ इस छोकमें ऐसे पुरुषको ध्ममें 
निष्ठा होती है; और पुन्नोंकी सन्‍्तान, आरोग्य ओर 
स्नी हो तो अतुछ सौभाग्य ढाभ करती हे। मरनपर 


री 


प्रयाति हरिमान्दिरम्‌ 3३९ || 


वैकुण्ठधाम प्राप्त होता है ।| ७२ ॥ हें युधिप्विर ! वह वेकु- 
ण्ठमं जाकर विमानमें बेठ एक छक्षवर्षपय्यन्त विहार 
करताहुआ नानाप्रकारके दिव्य भोग भोगता ह। पुण्यफलूके 
भोगनेपरभी जब वेकुण्ठसे यहां वापिस आता हैं || ७३ ॥ 
तबभी वह पुण्यास्मा महाराजाओंके समान समद्धिसानोंके 
कुलमें जन्म छेता हैं, जिसमें कि, सब मनो5मिलषित 
भोग्यपदार् हैं; अशुभ पापाचरण, या ( प्रतिकूछ ) काये 
कोईभी नहीं हैं; आप कामदेवके सदशअत्यन्त सुन्दर दिव्य 
शरीरवान होता हैं ॥ ७४ ॥ जिस देशमें वस्तपर चित्रित 
५ ४. ५२ च्‌ तिं 3 से 
मेरे जन्मोत्सवर्के दृधयकों सदेव प्रतिवर्ष सब आभूषण 
शोभायमान करके ॥ ७५।॥ पूजन किया जाता हैं। हे 
पाण्डवश्रेष्ठ ! जिस देशमें मेरे जन्साष्टमीके दिन अत्यन्त 
आह।दितल महोत्सव मनाते हैं, उस देशमें दुसरे शच्चुराजाके 
आक्रमण करनेका उपद्रव या उसकी शासनाका कभी भी भय 
नहीं होता ।। ७६ ॥ मेघयण उस देशवासियोंकि इच्छानु- 
कूछही समय समयपूर वृष्टि किया करते हैं। और जिस 
घरमें मेरा पूजन तथा देवकीके यहां मेरे अवतारकामहोत्सव 
मनाया जाता हैं ।७७।॥ उस घरमें सब प्रकारकी सम्प्तियाँ 
रहती हैं । महामारी आदि किसी उपद्रवकामय नहीं होता ' 
न किसी व्याप्रसिंहादि पशुका, न बान्धवोंका, न सर्पोंकाइन 
कुष्ठादि पापरोगोंका न पातकोंका ॥७८ || न किसी राजद - 
ण्डका और न चोरका भय या कभी उपद्रव होताहभऔरजो 
किसीके संगर्गस न कि अपनी स्व॒लन्त्रतासे इस सुन्दर महो- 
३ के है. के सि क 
त्सवको प्रेमसे देखलाहे वह मनुष्यभीपापोंके भोगोंसे छूटके 















जन्माष्टमी जनमनोनयन न ह 
भजेद्धि भकत्या पुत्रानवाप्य समुपेति पद स विष्णो॥॥८०॥इति भविष्योः 
अथ शिष्टाचारघाता जन्माष्टमीव्रवकथा ॥ 


व्यास उवाच ॥ निद्त्ते भारते ग्द्धे कृतशोचों झुधिष्ठिरः ॥ उदाच वाक्य धमोत्मा कृष्ण 
देवकिनत्दनम ॥ १॥ युथिष्ठिर उवाच ॥ त्वत्मसादाज् गोविन्द निहताः छत्रवों रणे॥ 
कर्णश्व निहतः सेन्‍्यें त्वत्मसादात्किरीटिना॥७२॥ जेता को युधि भीष्मस्थ यस्य प्ृत्यने विद्यते॥ 
अजेयो5पि जितः सोषि त्वखालादाज्ननादन ॥ ३॥ पजाप्त निष्कण्टक॑ राज्य कृत्वा कर्म सुद- 
प्करम्‌ ॥ आचारो दण्डनीतिश्व राजधमोंः क्ियान्वितों) ॥ ४॥ अघछुना ओोतुमिच्छामि शुप्र 
जन्माश्टमीवरतन्‌ ॥ जन्माष्टमी बतं ब्रृहि विस्तरेण ममाच्यत॥५॥ कुंतः काले समुत्पन्न॑ किपृण्य 
को विधिः रुप्ठतः ॥ श्री क्ष्ण उवाच ॥ शृणु राजन्मवक्ष्यामि ब्रतानामत्तमं ब्रतम्‌ ॥ ६॥ यतः 
प्रभति विख्यातं फलेन विधिनान्वितम्‌ ॥ राजवंशसमुत्पनर्देत्थानीकेः सुपीडिता ॥७॥ 
धरा भारसमाक़ान्ता बह्माणं शरण ययो ॥ ज्ञात्वा तदा प्रभुतंहा भूमेभारं समाहितः ॥<॥ 
चेतदीप समागत्य सर्वदेवसमन्वितः ॥ समाहितमतिबंदा मां ठुद्याव विशापते ॥ ९ ॥ स्त॒त्या 
तयाहं संभीत८तेषां दृग्गोचरोप्मवम्‌ ॥ दृष्ठा मां प्रणिपत्याशु भक्तिभावसमन्विता) ॥ १० ॥ 


मिरामा पापापहाँ सपदि नब्दितननन्‍्द्गोपाम्‌ ॥ यो देवेकी खुतयुतां व | 
तर जन्माष्ठमीत्रतकथा ॥ 





हरिमेदिरको प्राप्त होता हे | ७९॥ सब जन्ोंके मन एवं 


! नहें इस लोकमे 


(* साधवाचार्य विरचित अविष्योत्तरपुराणकी कही हुई 
जन्माष्टसी व्रत कथाकी भाषाटीका समान्न हुई ॥| 


| भगवान्‌ ( सूचसे ) बोे-जब महाभारतका युद्ध 
समाप्र होगया तब क्रियाओंसे निवृत्त हो पविन्रात्सा धर्म- 
मूर्ति र जा युधिष्ठिर ( अपने पाश्चमें विराजमान ) भगवान्‌ 
पत्रकनन्दन श्रीक्ृषष्णसे बोढ़े ॥ १॥ कि, हे गोरिन्द ! 
अं पर्क अडुप्हके शतापसे हमने संग्राममें शत्रु सारदिये। 
किरीटी अजुनने कर्णका जो वध किया वह भी आप कीही 
टैयाद्ना प्रताप है | २॥ जिसको कोइसी बीर संग्रामसें 
जीतनेवाल्ा नहीं, जिसकी मृत्युभी नहीं थी, ऐसे सभीक्के 
> मय महात्मा भीप्सजीको जो अजुनने विजय किया वहभी 
है जनादुन ! आपकाही असाद है ।॥३।| अत्यन्त दुष्कर कम 
रे निप्कृण्टक राज्य प्राप्त किया । मैंने आपके मुखसे 
पर सुने, दृण्डन्चीति सुनी, राजधम तथा उनको निभाने 





| चलानकी व्यवस्थाके उपायभी सुने ॥ ७ ।॥ अब में पवित्र 
नेत्रोंको जाहादित करनेबाली, पापोंकी संहारिणी, नन्दएवं | 
गोपगो पैयोंके आनन्दसे सुन्दर इस जन्प्राष्टमी का महोत्सव | 
तथा पुत्रसडित देवकी जीका जो मनुष्य भक्तिसे पूजन करता | 
पुत्रोंके सुखको प्राप्त करता हैं, अन्तमें | 
विप्णुपदमें प्राप्त होता है ॥८०॥कहीं पर इस झोकका तृतीय | 
चरण-४ यो देवकीत्दमिद प्रकरोति मकत्या ? इस प्रकार । 
भी लिखा हैं। तदसुसार इसका यह अथ है कि, जोमनुष्य | 
भक्तिपूवक इस देवकीजीके महोत्सवरूपजन्मा्टमीके ब्रतको | 
करता है। ओर अर्थ पूवके समानही है, यह सर्वतत्रस्वतत्र | 


न्माष्टमीके ब्रतकों घुनना चाहता हूँ । इसलिय है अच्युत! 
आप विस्तारसे जन्माष्टमीब्रतको कहिये || ५)। यह जन्मा- 
प्टमीका त्रत किस समयमें प्रथम प्रचक्तित किया गया इसका 
| है, इसके करने है? सो कहिरे 
कौनसा फछ है, इसके करनेका प्रकार क्या हे ? सो कहिय। 
श्रीकृष्णचन्द्र बोले कि, हे राजन ! में सभी त्तोंमें उत्तम 
जन्माष्टमीत्रतका निरूपण करूंगा, उस आप सुने | ६ ॥यह 
हक ७ ह.." 
जन्माष्टमीका ब्रव जिस समयसे छोकमें विख्यात हुआ है 
इसका जो फल तथा जो विधि हैं वह सब कहता हूँ, पहिले 
हमने जिन देत्योंका बध किया था वे सभी दुरात्मा देत्यगण 
७ 5०३५ कक । कप ० 
राजवशोंमें उत्पन्न हो, राजवेशको धारण करके प्रुथिवीपर 


| बडी भारी पीढा उपस्थित करने छगे इससे अत्यंत पीडितवा 


॥ ७ ॥ यानी उन राजाओंके वेषसे जिन्होंने अपना स्वरूप 


ढक रक्खा था ऐसे दैत्योंके भारस दबी हुईं प्रथिवी देवी * 


(गऊका रूप घारण कर ऋन्‍दन करती हुई) ब्रह्माजीकीशरण 
प्राप्त हुई ( अपना दुख निवेदन करनेलगी) उस समय बद्षा* 
जीने अपने शरणागत भूमिके भारको समझ समाहित हो 
॥८॥ उसके मिटानेका उपाय सोचा. पर जब समझमें न 
आया, तब शरणागववत्सल श्रेवद्दीपनितरासी भगवान्‌ नारा” 
यणकी शरण गये, अपने साथमें सबदेवताओंकोसी हे गये। 
फिर ब्रह्माजी समाहित चित्त हो +र हे विशाम्पते राजन ! 
मरी ( क्ृष्णचन्द्रकी ) स्तुति करने लगे ॥॥९॥ मैंने नारायण 
ब्रह्मादि देवताओंकी की हुईं स्तुति सुन अत्यन्त प्रसन्न 
हो अपना दशन करादिया। वे सभी मेरे दशेनकर 
भक्तिस न कम नम आह हक मत करन का. 035 ॥ होकर मुझे प्रणाम करने छंगे ॥.१०॥ 


३ योदेवकीब्वर्सिंद ५ | दे 
द प्रकरोति भत्त्येल्पि पाठः । २ प्राप्ता इतिशेषः । ३ सावविभक्तिकरतसिः | कस्मिन्काले इत्यथः । 





॥ 
] 
। 
4 










4॥#: 
०४४६ 


ब्रह्माणमग्नतः कृत्वा ठुद्ा+ सर्वे दिवॉकसः ॥ दिक्ित्तयुर्रेहु राज अधशिरारप्लुसये ॥ ११ ॥ 
उपधाय तदा ते वचन चान्वचिन्तयम्‌ ॥ केनोपायन हन्तव्या दानवाः क्षत्रियोद्धवाः ॥ १२ ॥ 
स्वधमनिरताः संबं॑ं महाबलपराक्रमा: ॥ तलो निश्चित्य मनसा बव्हद्माणमहमद्रव॒म्‌ है २३ ॥ 
वसुदेवों देवकी च प्रजाकामों पुरा नृप ॥ भक्त्या माँ भजमानों तो तप्तवम्तों महत्तप: ॥ १४ ॥ 
तयो: प्रसन्नः सुभीतो याचर्त वरसुत्तमम्‌ ॥ अश्ुव॑ तावपि ततो वरयामासतः छिलती २०३ 
यंदि देव प्रसन्नोईसि त्वादशों नो भवेत्छुतशातथेति च मया ताभ्यासक्ते जीतिन चेतला ॥ २६ ॥ 
तत्कामपुरणाथाय संभाविष्याम्यहं तथोः ॥ दिवोकसो$पि स्वांगोन संभवन्त सुरक्चियः ॥ १७ ॥ 
योगमाया च नन्दस्य यशोदायां भविष्यति॥ देवक्या जठरे गर्मंभननन्‍त धाम मामकपम के १4 ॥ 
सह्निकृष्य च सा तूण रोहिण्या जठरं नयेत्‌ ॥ इति सन्दिश्य ताव्‌ सर्वानहमन्तहिंतोइमवम्‌ ॥ 
॥ १९ ॥ ततो देवेः सम बह्या ता दिश प्रणिपत्य च ॥ आश्वास्य च महीं देवीं वरधाद्षि जगा- 
मह॥ २० ॥ ततोएह देवकीगभेमावेशं स्वेन तेजसा ॥ हतेषु घट्ख बालेषु देवक्या आमसे- 
निना॥ कारागहस्थितायाश्र वखछुदेवेन वे सह ॥२१॥ गतेः्धरात्रसमये ऊुप्ते सर्वजन निशि॥ भाद्े 
मास्यसिते पशक्षेषष्ठ म्याँ बहमक्षसंयुजि ॥ २५॥ सर्वग्रहशुभे काले प्सन्नहदयादशये ॥ आविरासं 
निजेनेव रुपेण हावनीपते ॥ २३ ॥ वसुदेवोइपि मां दृष्ठा हर्षशोकसमत्वितः ॥ भीतः केसादति- 


02 220/2/000232 20002: 














तर तष्टाव च कृताखलिः ॥२४॥ पुनः पुनः 


प्रणम्याथ प्रार्थथामास सादरम्‌ ॥ वखुदेव उवाच | 


अलोकिकमिद॑ रूप॑ देश योगिनामपि ॥ २५ ॥ यलेजसारिट्रणहमनदत्समकाहिलय उद्धिजे 


हे महाराज | फिर सब प्रसन्न हो ब्रद्माजीकों अम्रणीकर 
मेरी प्राथना करने छंगे कि. है प्रभो ! एथ्वीपर राजवेष- 
धारी दुरात्मा देत्योंका भार बहुत बढ़ंगया है सो आप 
उसको नष्ट कीजिय ॥ ११ ॥ में ( श्वतद्वीपवासी ) नारा" 
यण उन देवताओंके वचनोंकों सुन विचार करने छगा कि, 
क्या उपाय किया जाय ! जिससे क्षत्रिय कुछमें छिप हुए 
दैत मारे जाये ॥। १९ ॥ स्वधमनिष्ठ सभी राज्य डोगव'चाये 


॥ १४ ॥| मेँ उनपर श्रसन्न हुआ, बर देनेको कहा, तो 
उन्होंने मरेसे बडे भारी वरकी 


हु 


करेगा ॥१८॥ मेरी योगमाया उन्हें देवकीके गभसे निका 


लके रोहिणीके गर्भम ग्रविष्ट करेंगी। त्र्मादिदेवताओंको | 
इतना सन्देश देकर मैं ( इ्वेतद्वीप निवासी विष्णु-क्ृष्ण- | 
चन्द्र ) अन्तहिंत हो गया | १९॥ ब्रह्माजी और सब 


देवता जिस दिशामं मैंने उन्हें दशन दिया था इस दिशा: 








की ओर मुखकर मेरे लिए प्रणाम करते हुए गोरूपधारिणी 
पृथ्वीको आश्वासन देकर यानी भगवान्‌ पुराणोत्तम आप 
तुम्हारेपर अपने चरणोंस अहाादित एवं पूर्णक्षाम॒ करेंगे, 
तुम्हारे भारको शीघ्रही दूर करेंगे शोच चिन्ता मत करो; 


ऐसा कह सत्यलोककों चले गये ॥ २० | में; अपने अश- 


रूप शषसहित ) अपन तेजसे देवकीके गर्भभ उस समय 


५ रह र | प्रविष्ट हुआ जब कि, कारागारसें वसुद्ेव देवकी उम्रसेनके 
जायें वे बल तथा पराक्रमशाली केसे हों ! इस प्रकारशोच | 
कर उसका उपाय समझा फिर मैं ( कृष्णचन्द्र ) त्ह्मासे | 
बोला ।| १३ ॥ कि वासुदेवजी एवं देवक्नीजीने सन्वानके | 
लिए पहिले मेरा भक्तिस पूजन करके घोर तप किया था | 


पुत्र दुरात्मा केसने कैद कर रखे थे, एवं डस केदर्स उनके 
पहिल उत्पन्न हुए छः पुत्रोंका वध कर दिया था।॥ ९१॥॥ 
( फिर सप्रमगर्भको योगमाया देवकीके जठरस निकालके 
रोंहिणीके गर्म प्रवेश करके आप तो नन्‍्दके यहां यशोदा 


याचना की ॥ १५॥ कि | हे हे है. कक हो प्रगट हुइ और मे आठवीँ चार 
हे देव ! यदि आप प्रसन्न हुए हों तो आपके समान हमारे | देवकीके ग॒र्भस प्रविष्ट हुआ ) भाद्रपद 
पुत्र हो। है राजन | उनके तपसे प्रसन्न हुआ में बोला कि, | 
अच्छा, जैसी तुम्हारी इच्छा हो वसाही हों, में ही तुम्हारा 
पुत्र होऊँगा ॥ १६ | इसलिये में अब उन वशुदेव देवकी | 
की काम्नाको पूर्ण करनेके छियें उनके पुत्ररूपस मभगठ | 
होऊकँगा | अतः सभी देवा एवं देवाज्ञना अपने अपने | 
अशोंसे मथुराके आस पासमें ही उत्पन्न हों ॥ १७॥ मेरी 
योगमाया नन्‍दकी यश्ञोदा ख्रीमें प्रकट होगी | मेरा अनन्त | 
एवं शयनका आश्रयरूप शेषभी देवकीके गर्म प्रतेश् | प्‌ र मेरी र 
| ॥ २४ ॥ बारबार सुझे प्रणामकर प्रेस एवं सम्मानपूर्वक 


रूप्णापमीके दिन 
आधीरातको जब कि, प्रायः सभी छोग सो गए थे; रोहि- 
णीरक्षत्र विद्यमान था॥। २२ ॥ सूर्यादि सभी ग्रह अपन 
अपने उच्च या अनुगुणपद॒पर थे। हे अवनीपते ! और सभी 
सज्जनोंका चित्त स्वतः प्रसन्न हो गयाथा ऐसे पवित्र वत्तम 
समयमें में अपने दिव्य हपसे ही प्रगट हुआ ॥ २३ ॥ वसु- 
देव और देवकी मेरे अवतारकों देखकर प्रथम तो आह्वा- 
दित हुए, पर फिर केसके भयकों यादकरके शोकसे अत्य: 
न्‍त स्छानमुख हो गए, हाथ जोडकर मेरी स्तुति करने ढूगे 


भरी प्रार्थना करने लूगे | वसुदेवजी वोले कि, हें प्रभो! 
यह आपका खरूप अछौकिक हें। इसे देखनेकी योगीजन 
सदा इच्छा रखते हैं, पर उन्हें भी इसके दर्शन नहीं होते 
॥ २० ॥ आपके तेजसे यह अन्धकारपूण प्रसूतिकागृह भी 


हा 


( २८६ ) 





ब्रलशज: । 


प्रगवःकंसादों में बालानधातयत्‌ ॥ २९॥ उपसंहर तस्मानशच चना उप्संहर तस्माव् एतदूपमलौकिकस॥ शइतचक्र ॥ शहचक्र- 
गदापग्रलसत्कोस्‍्तुममालिनम्‌ ॥ २७ | किरीटहारसुकुटकेयूरवलयाड्रितम्‌ ॥ ताडेदसनसंवीत- 
कणत्काथनमेखलम ॥ २८ ॥ स्फुरदाजीवताम्राक्षे ख्लिग्वाजनसमप्भ म्‌ प्हामरकतस्वच्छ॑ 


कोटिसर्थयसमभभम्‌ ॥ २५ ॥ कृष्ण डवाच 


॥ एवं संप्राथितों राजन्वखुदेवेन वे तदा॥ तेनेव 


निजरूपेण भूत्वाहं भाकृतः शिक्ष। ॥ ३० ॥ नय माँ गोकुलमिति वसुदेवमचोदयम्‌॥ समादा- 


यागमत्सोषपि नन्‍्दगोकुलमखसा ॥ हेरे 
मार्ग च कालिग्दीजलकलछोलमालिनी ॥ रे२ 
तत्पयंडे स्थितां गह्म दारेकामगमत्युनः 


॥ द्वारण्यपाकृतान्यासन्मत्ममावात्ध्वयं प्रभो ॥ ददौ 
॥ ततो यशोदाशयने न्‍्यस्थ मा5नकदुन्इतिः ॥ 
॥ ३३॥ द्वाराणि पिहितान्यासन पू्ववन्निगर्ड ततः॥ 
विम्यस्य पादयोरास्ते शयने न्‍्यस्य दारिकाम्‌ ॥ 


३४७ ॥ ततो रुरोद महता स्वरेणापूर्य सा 


दिशः ॥ तस्या रुदितशब्देंन उत्यिता रेक्षका शहात्‌॥ ३५ || कैसायागत्य चाचरूयुः प्रसूता 
देवकीति च ॥ स्रोषपि तल्पात्सम॒त्थाय भयेनातीव विह्वलः॥ ३९॥ जगाम खसूतलिकागेह देवक्याः 


0 


प्रस्वख लन्पथि ॥ दा। 


रेकां शयनादगह्म रुदत्याश्वेव स्वस्वछुः ।। 


३७ ॥ अपोथयच्छिलापृछ्ठे सापि 


तस्य कराच्च्युता ॥ डवाच केसमाभाष्य देवी ह्वाकाशगा सती ॥ रे८ ॥ कि मया हतया मन्द 


जातः कुबापि ते रिएः ॥ इत्युक्तः सोप्प्यभूत्कंसः परमोद्धिभ्रमानसः 
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ततो बालानां कदनाय वे ॥ दानवा आपि बालानां कदन चक्रुरुद्यताः ॥ 


॥ २९५ ॥ आक्ञापयामास 
४० ॥ वनेषपवने चेव 


पुरआमव्रजेष्वपि ॥ अहं च गोकुले स्थित्वा पूतनां बालघातिनीम्‌ ॥ ४१ ॥ स्तन दतु प्रवृत्तां 
...................................3>०+ न» «नमन नमन नमन मनन नमन मनन नव» नमन मनन लक न» जन मऊ +> 3 ++3+++भनथ++3+9+ मन रमनभतभ ना ऊन न न +++++++ मनन ऊन ३५५ ५++ न काकननननन नल ननसनसफ#फ#ग 


दिनकी भांति प्रकाशमान हो रहा है. | अब में उस दुरात्मा 
कंससे डरता हूँ, जिसने हमारे सब॒बारूक मार दिए हँ। 
॥ २६ || इसलिए इस अपने दिव्यखरूपकों छिपाइये | 
आप शब्ड, चक्र, गदा और कमछसे सुशोभित चार हाथों 
वाछा, कोौस्तुममणिमाछाकी दीपिसे शोभायमान मांछा- 
धारी ॥ २७ ॥ किरीट्स शोशित मस्तकवाछ मोतियोंके 
हारबाढा मुकुट और कुण्डलॉको धारणकिय हुए कह्ुणोंस 
सुन्दर हाथवाके विद्यस्सद॒श खच्छ पीतबल्लसे रुचिर, 
सोनेकी वजनी ताधघडीसे वेष्टित नितम्बबालढे ॥ २८॥ 
खिलते हुए छाल कमछके सहश  छाहल्‍नेत्रोंसे मनोहर, 
स्तिग्य ( सस॒ण ) अखनके सप्तान श्याम, नीूमणिके 
समान खच्छ कोटिसूर्योके बराबर दीप्यमान हैं ! २९॥ 
श्रीकृष्णचन्द्र बोले कि, हे राजन्‌ | जब इस प्रकार कंसके 
मयसे उद्दिन्न हुए वसुदेवजीने मेरी प्राथना की, तब मेंने 
भी उस अपने दिव्यरवरूपको साधारण शिशु बना लिया 
॥ ३० ॥॥ और कहा कि; आप मुझे यहांसे गोकुछ ( नन्दू- 
जीके यहां ) पहुँचा दें | बसुदेवजी सेरी आज्ञा होते ही झट 
मुझे अपनी गोदम लेकर ननन्‍्दके गोकुछ पहुंचे।| ३१॥ 
उस समय हे प्रभो ! केदखानेके द्वार भेरे प्रभावस आपही 
आप खुल गये, जिस बडी ९ वरहेँः डठ रहीथों शसी 
यमुनाजीन भी आपही अपने बी चसे बसुदेवजीकों गोकुछ 
को जानेका रास्ता दें दिया ॥ ३९॥ आजनकदुन्दुमि-वसु- 
देवजी यशोदाकी शब्यापर मुझे रखके उसके पलंगपर 
सरोई हुयी कन्यारूपा योगमायाको गोदमें हे मधुराके उसी 


मकानमें आगये ॥ ३३ ॥ जैसे पहिले दरवाजे बंद थे बेसे 
ही फिर सभी द्रवाज आपही आप बंद होगए | बसुदेव- 
जीने देवकीकी शबय्यापर उस कन्याको रखके अपने चर- 
णोंमें पहलेकी तरह बेडी पटक छी ॥ ३४ ।॥ कन्याने सब 
दिशाओंकों पूण.ं करनेवारे. उच्चस्वरख रोदन किया | 
उसको सुनकर पहरेदार खडे हुए ॥ ३५ | उन्होंने तुरन्त 
जाकर केसको, खबर दी कि, देवकीको बालक हुआ है | 
कंस उस समय सो गया था; पर इन बचनोंको सुन भयसे 
विहलछ हो खडा हुआ ॥ ३६ ॥ निद्रा एवं चिन्तासे रास्तेमें 
इतस्ततः पडता गिरता हुआ देवकीजीके सू्तिकाघर आया; 
देवकीजी रोतीही रही, उनके पास सोती हुई कन्यको 
छीन || ३७ || जैसे किसी घडेको जब फोडना चाहते हैं 
उस समय उसे शिंढापर जोरसे फेकके मारते हैं उसी तरह 
उसे भी मारा कन्या केसके हाथसे तिकछ आकाश 
निराधार खडी हो बोली कि; रे दुष्ट कंस | ॥ ३८ | रे 
मूढ ! मुझे मारकर तू क्‍या चाहता है ? मेरे सारनेसे तेरे 
प्राण नहीं बच सकते ।तुझे मारनेवाढा तो जिस किसीभी 
स्थान उत्पन्न हो गया है । तब वह कंस भयसे ओऑंरमी ी 
अधिक उद्विम्न होगया । ३९॥ बाछकोंको मारनेके लिये 
अपने किट ऐंको आज्ञा दे दी | दानवकोगभी वन (जज्गछ) 
उपक्त ( बगीचे ) पुर ( शहर ); प्राम( छोटीवस्ती ) और 
ब्रज ( गोपालकोंके खान ) इत्यादि सब जगह छोटे 
बच्चोंका कद्न(कतलछ)करनेमें सभी प्रकारके उद्यम करनेलगे। 





मैँ गोकुछमेंरहकर बालू घातिनी पूतनाको ॥ ४० ॥ ॥ ४१॥ 
विन मिनिनिननी मिनी लिन निकल दी भदक ७७ 


१ मा इतिसामू। ९ यामिका इतिप्रचुरः पाठः | 





च आ्राणेः सममशोषयम्‌ ॥ तृणावतेबकारिष्ठान घेलुक॑ केशिन तथा ॥ ४२ ॥ अन्यानपि खलान्‌ 
हत्वा स्वप्रभावमदशंयम्‌ ॥ ततश्व मथुरा गत्वा हत्वा कंसादिदानवान्‌ ज्ञातीनां परम 
हे कृतवानस्मि सादरम्‌ ॥ देवकीवसुदेवों च परिष्वज्य मुद्रा मम ॥ ४४॥ आनन्दजजलेमेध्नि 
सेचयामासतुर्नंप ॥ तस्मित्‌ रड्रवरे मछान्‌ हत्वा चाणूरसुख्यकान्‌ ॥ ४५॥ गज कुबलयापीडे 
कंसभातव॒ननेकशंः ॥ एवं हतेषसुरे कंसे सवेलोकेककण्टके ॥ ४६॥ अन्यषु दुष्ददेत्येष सवेलोका 
भयंकरम्‌ ॥ लोकाः समुत्खुकाः सर्वे मांसमेत्योचुरादताः ॥४७॥ कृष्ण कृष्ण महायोगिन्‌ भक्ता- 
नामभपम्मद ॥ प्रल्यात्पाहि नो देव शरणागतवत्सल- ॥ ४८॥ अनाथनाथ सवत्ञ उ्दरु“ हिल 
रत॥ किबचिद्धिज्ञाप्यतेषस्मामिस्तन्नो वक्त त्वमहेंसि ॥ ४९ ॥ तव जन्मदिन लोके न 
ज्ञातं केनचित्कचित ॥ ज्ञात्वा च तस्वर्तः सर्वे कुमों वधापनोत्सवम्‌ ॥ ५० ॥ तेषां दृष्टा 
तुता भक्ति श्रद्धामपि च सोहदम्‌ ॥ मया जन्मदिन तेभ्यः ख्यातं निमलचेतसा ॥ ५१ ॥ 
श्रत्वा लेईपि तथा चक्रार्वेधिना येन तच्छणु ॥ पाथ तदिवसे शाते दत्तधावनएवबंफरश ॥ ४२॥ 
स्‍्नात्वा पृण्यजले शुद्धे वाससी परिधाय च ॥ निवत्योवश्यक कमे व्रतसड्ूल्पमाचरेत्‌ ॥ ५३ ॥ 
अद्य स्थित्वा तिराहारः श्वोभूते तु परेडहनि ॥ भोक्ष्यामि एुण्डरीकाक्ष शरणं में भवाव्यय ॥५४॥ 
गहीत्वा नियम चेव संपाधाचनसाधनम्‌ ॥ मण्डप शोमने कृत्वा फलपुष्पादिभियुतम्‌ । 
तस्मिन्मां पूजयेद्धकत्या गन्धपुष्पादिनिः ऋमात्‌ ॥ उपचारे: शेड्शमिद्वाइश /क्षरविद्यया ॥५४॥ 
सद्य/प्रसूतां जननी वसुदेव च मारिषः ॥ बलदेवसमायुक्तां रोहिणी शुणशोमिनीम्‌ ॥५७॥ 
दूं यशोदां गोपीशछ्य गोपान गाश्ेव सवेशः ॥ गोकुल यघझ्तुनां चेच योगमायां च द्रिकाम॥५८ 





जो कि, मुझे स्तनपान करानेमें प्रवृत्त हुईं थी; प्राणोंके साथ 
चूस गया । मैंने और भी जो ठृणावततें, बक; जरिष्ट, घेलुक, 
केशझी || ४२ ॥ एवम्‌ दूसरे भी बहुतसे खलोँको मार करके 


अपना प्रभाव दिखादिया । इसके पीछे मधुरा जा कंसादि | जन्मदिन प्राप्त होनेपर मल्त्यागादि दन्तशुद्धि आदि करके 


नवोंको मारकर | ४३ ॥ अपने ज्ञातिबन्धुओंकोी आदर | 
पूवक हृ्ष किया, देवकी ओर वघुदवने मुझे आनन्दुसे हृदय 
वूगाकर ॥ ४४ ॥ मेरे शिरपर आनन्दाश्र॒ुओंका सिंचत्त | 
किया । मैंने उस प्रसिद्ध रंगभूमिसें चाणूरादि मछोंको 
मारा ॥४५॥ कुबलयापीड हाथी ओर बहुतस कंसके भाई है आय जार शत किया मे ओपन जजित “विधा! 


भी मुझसे मारे गये। सब छोकोके एकमात्र कटक कंसक | ऐसे नियम ( संकल्प ) को कर मेरी पूजाकी सामग्री इकट्ठी 


इस प्रकार मारे जानेपर ॥|४६॥| भी ओर बहुतसे बाकी 

इस कारण सबको अभय देनेवाले मेरे पास वे छोग भाय 
जो कि, उन देत्योंकी मृत्यु देखनेक उत्छुक थे | मंने उनका 
आदर किया वे मुझस बोल कि ॥४७॥ है क्ृष्ण | हू कृष्ण | 


हे महायोगिन्‌ ! हे भक्तों को अभय दनेवाले ! हे शरणाग- | 


तबत्सल | है दंव ! हम प्रठढयस वचाइये ॥ ४८ ॥ हैं अना- 
थोंके नाथ ! हैं स्वज्ञ | हे सब प्राणियोंके हितकारी प्रभो 
भापसे हमारी कुछ प्राथना है) सुननेकी कृपा कोजिये।।४९॥। 


आपका जन्म देवकीजीके यहां कब हुआ था यह दृत्तान्त | 
आजतक किसीने कहीं भी न जाना न सुनाही हूँ | वदि | 
आप उसे बतानेकीद्या करें हम आपके जन्म दिनका उत्सव | 
करें ॥५०॥| हे राजन्‌ ! में उनकी भक्ति; श्रद्धा और प्रेमको | 
देखके प्रसन्न हुआ | उन सबको अपना जन्म दिन बता-। 





| दिया उन सबने उसे प्रसिद्ध कर दिया ॥५१॥ हे पाथ ! 
| फिर वेभी सब छोग मुझसे मरे जन्मदिन सुन, विधिस 


मेरा वर्धापनोत्सव करनेलग. उस विधानकों आप सुनिये । 


०५२ | शुद्ध जलाशयपर जा स्नानकर शुद्ध बस्र और 


| उपबस्द्र धार आवश्यक सन्ध्यो पासनादि नेत्यिक कम करे । 


फिर तब्रत करनेका सद्भुटरत्य करे | ५३ | आज निराहार 
रहूंगा; फिर दूसर दिन भोजन करूंगा | हे पुण्डरीकाक्ष ! 


कर । पूजाके छिय सुन्दर एक मण्डछ वनावं, उसम फल 
घुप्प, पाद्य, अध्य, आचमनीय, स्त्नपात्रादि तथा गनन्‍्ध; 


| घूप भौर दीपकादि उपस्कर अच्छी तरह उपस्थित करे 


५०५॥ फिर उस सण्डपके भीतर शाख्रोक्त पूजनविधिके 
ऋ्रमके अनुसार गन्धपुष्प्रादि षोडश उपचारोंसे “ओ नमो 


| भगवते वासुद्वाय ? इस द्वादशाक्षरमन्त्रकों पढता हुआ 
| मरा पूजन करे ॥ ५६ ॥ मानों अभी प्रसव किया है ऐसी 


अवस्थावाली देवकी, ज्ञानी वचुदेवजी, गरुणवती रोहिणी 
और उसकी गोदमें बलदेवजी || ५७ | ननन्‍्द, यश्योदा- 
गोपिका, सब गोप, गोकुछका चित्र), यमुना ओर यश्ञों 
दाकी शय्यापर सोती हुई, मानों इसी क्षण जन्म लिया है 
ऐसी सुन्दर तेजवाली कन्या मेरी रूपा योगमायाकों 


१ मम मू्नॉस्यन्वयः । २ हत्वा अतिष्ठमिति शेष: । ३ लहिनसित्यपि पाठः । 


( २८८ ) ब्रेतराज३ । 











यशोदाशयने सुप्तां सद्योजातां वरप्रभाम्‌ ॥ एवं संपूजयेत्सम्यड़ नाममन्त्रेः प्रथकप्रथरू ॥ ५९॥ 
छुपर्णतोप्गताणारमदाइिणिरंकृताः । काष्टपबाणरचिताश्ित्रमथ्योथ लछेखिता: ॥ ६० | 
प्रतिमा विविधाः मोक्तास्ताखु चान्यत्नाँ यजेत]रात्रों जागरणं कु्योद्नीततृत्य/दिनिः सह ॥६॥ 
पुराणेः स्तोत्रपाठेश जातनामादिखूत्सवः ॥ श्वनूते पारण कुर्याद्विजान सप्ोज्य यत्ततः ॥ ६२॥ 
एवं कृते महाराज ब्रतानामुत्तमे ब्रते ॥ स्वान्कामानवाप्नोति विण्णुलोके महीयते ॥ ६३ ॥ 


मोहान्न कुरते यघ्तु याति संसारगहरे ॥ तस्मात्कुवन्प्रयल्लेन निष्पापो जायते नरः ॥ ६४॥ 
अन्रवोदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम्‌ ॥ अड्गभदेशोद्धवों राजा मित्रजिन्नाम नामतः ॥ ६५॥ 


तस्य पुत्रों मंहातेज5 सत्यजित्सत्प्थे स्थितः ॥ पालयामास धर्मज्ञो विधिवद्रअ्अयन्मजा३ ॥६९७॥ 
तस्येब॑ बतम/नस्थ कदाचिदेवयोगतः । पाषण्डेः सहसंवासों बभूब बहुवासरम्‌ ॥ ६७ ॥ तत्सं- 
सगांत्स नृपतिरधमंनिरतो5भवत्‌ ॥ वेदशास््रपुराजानि विनिन्द बहुशो नुप ॥ ६८ ॥ ब्राह्मणेष 
तथा धर्मे विद्वेष परम गतः ॥ एव बहुतिथे काले गते भरतसत्तम ॥ ६० ॥ कालेन निषन 
प्राप्तो यमदूतवशं गतः ॥ बढ़ा पाशेनीयमानों यमदूतेयमात्तिकम ॥ ७० ॥ पीडितस्ताइच- 
मानोसो इृष्टसड्रवश गत/॥नरके पतितः पापों यातनां बहुवत्सरम्‌ ॥ ७१ ॥ खुक्त्वा पापस्य 
शेषेण पेशार्ची योनिमास्थितः ॥ तृवात्ुधासमाक्रान्तो श्रमन्स महघन्वसु ॥ ७२ ते कस्यचि- 
त्वथ वेश्यस्य देहमाविश्य संस्थितः ॥ सह तेनेव संज्राप्तो मथुरां पुण्यदां पुरीम्‌ ॥ ७३॥ तज्रत्पै- 
रक्षकेः सोधथ तदेहानु बहिष्कृतः॥ बच्चाम विपिने सोएपि ऋषीणामाश्रनेष्यपि ॥ ७४ ॥ 





स्थापित करके पहिले कहीहुईं विधिसे नाममंत्रो]ंस प्थक्‌ 
२ अच्छी तरह पूजन करे ॥ ५८ ॥५५९॥ हे राजन ! पूजा 
प्रतिमा अनेक प्रकारकी हो सकती हैं, उनमें जिस समय 
पे कह लि का 

जी उपस्थित हो या करसके उसी) प्रमसे पूज्यदेवताकी 
भावना करके पूजन करना चाहिय। प्रतिता जैंसे-सुवर्ग, 
रूपा, तामा। पीवछ, सत्तिका, काठ और राजणादिक्ों की 
तथा रंगोंस सजाके चित्रित छिख्वी हुईं | पूजवर अन्चर्न 
या पूजनेंस पहिलभी पूजासे अवशिष्र समयमे रात्रिये मेरे 
उद्शस ग/न नाच कीजेनादि करता हुआ जागरण करें। 
अवशिष्ट रात्रिको निद्रास न गमावे ॥ ६० ॥ ६१ ॥ पुराण 
ओर स्तोत्र पाठोंसे एवं जन्म्के अनुरूप देवकी तन्दन वसुदे- 
वननन्‍्दन यदुनन्‍्दनप्रश्नति नास दूसरे दूसरे सुन्दर उत्सवों के 
प्रमोद आमोद मनाते हएही वितावे । दूसरे दिन तब ब्ाहा- 
णोंको प्रेमसे भोजन करा आपनी पारण करे ॥ ६२ ॥ है 
महाराज : इस प्रकार इस ब्रतकों क के सब कामना संपूरो 
होती हैं. अन्त बेकुण्ठधाममें विहार करता है ॥६३॥ जो 
मनुष्य मोहवश हो मेरे जन्मोत्सवकों नहीं सनाता, वह 
जननमृ रणरूप ससारकी गुहाके सीतर अन्धकारमेंही पडा- 
रहता हैं| इस कारण यदि अपने पापोंसे छूटकारा चाहे तो 
इस ज्तकों और महोत्सवक्नो करे, जिससे पापोंसे छूट्के 
निम्मेछ होजाय ॥ ६४ || इस प्रस॒हझसे महात्मा लोग एक 
भाचीन इतिहास कहा करते हैं। बह यह है कि -अंगदे शर्म 
एक सित्रजित्‌ नाम राजाथा।॥ ६५ ॥ डसके परमप्रताप' 


| शाढी' सववभारायण सत्यजिन्नावक्का पुत्र हुआ | वह धर्म- 


वेत्ता सत्यजितू अपनी प्रजाको पुत्रकी भाँति प्रसन्त करता 
हुआ राज्यको रक्ष। करने छगा।॥ ६६ || वह राजा यद्यपि 
वपनिष्ठ ध्मेत्रेत्ता था, पर उसके राज्यशासनकाढमें कभी 
पवबशा बहुत सपयतक पाबण्डियों का साथ होगया ॥६७॥ 
उन दुष्टों 8 सहवाससे राजाकी बुद्धि धर्मत्रागंसे डिगगयी, 
वह अवमेतरायण होगय। । हे राजन | फिर वो राजा वेद, 
वमशाख्र औव पुराणोंक्री बदुतसी निन्‍दा करके ॥ ६८॥ 
ब्राह्मण एवं घममसे देष करने छगा | है भ(तसत्तम ! ऐसे 
उसकी बहुतसमय ब्रीवगया ॥ ६९ ॥ फिर काढने डे 
अधिरा, यमंदूतोंके वश हो गया, वे उसे गढेमें हृढपाशोंसे 
बांधकर बसीटतेहुए यभ्राजक्रे समीप लेआये ॥७०॥ दुष्ट 
पापण्डियों के संगपे बर्म विभुद्च हो जो जो पाप किय्र थे वे 
उनको सुगानेक्ते छिय्रे आज्ञा दी | यप्ररिंक ऐेंने उसे ताड- 
नाएं दी. वह पापी बहुत वर्षेतक नरकमें गिरके नरक की 
याववाओंकी भोगता रहा।॥ ७१ ॥ ऐसे जब उसने प्रायः 
बढुतस पापोंका फछ नरकमें भोगलिया, कुछ पाप अव« 
शिष्ट रहगया, तब॒पिशाचयो निर्में पडा । ठुबा छुबासे 
पीडिव हो मारवाडमें ( जहां जछू नहीं है ऐसे घोर निज 
लदृशभ ) इधर उधर भठकने छगा।॥ ७२ ।| फिर कभी 
तेश्यके शरीर अ्रवेशकर उसके साथ पुण्य मूमि मथुरा 
( यप्ुुनाजी ) चढाआया ॥७३ ॥पर मथुरावासी रक्षको्ने 
उसको वैश्यके शरीरस निह्ाछ ९ अछत करदिय!। फिर 
वनमें गया, यहां ऋषियोंके आश्रमोंमें घूमने छगा ॥ ७४ ॥ 


१ सहासत इत्यपि पाठ: ।' 


ध्रतानि, ] भाषाटीकासमेतः । ( २८९ ) 












कदाचिदेवयोगेन मम जन्माष्टमीदिने ॥ क्रियमाणां महापूर्जां बतिमिर्॑निनिद्धिजेः ॥०५७ रात्रौ 
जागरणं॑ चेव नामसंकदीतेनादिशिः ॥ ददश सब विधिवच्छुश्नाव च हरेः कथा! ॥ ७६॥ निष्पा- 
पस्तत्क्ष णादेव श॒ुद्धनिरमेलमानसः ॥ भेतदेहं समत्छज्य विष्णलोझ विभानतः ॥ ७७ ॥मम दूतेः 
समानीतो दिव्यभोगसमन्वितः॥ मम सांनिध्यमापन्रों व्रतध्यास्थ प्रभावतः॥ ७८ ॥ नित्य- 
मेव व्रत चेतत्‌ पुराणे सावकालिकम्‌ ॥ गीयते विधिवत्लम्धइुजुनिनिष्तखदर्शिमिः ॥ ७९ ॥ 
सार्वकालिकमेवेतत्कृत्वा कामानवाप्लुयात्‌ ॥ एतत्ते सर्वमाख्यातं ब्रतानामत्तम॑ ब्रतम॥ मम 
धात्रिध्यकृद्राजन्क भूयः शओ्रोठुमिच्छासे ॥ ८० ॥ इति भविष्ये जन्माष्टमीव्रतकथा ॥ 
अथोधापनम्‌ू-युधिष्ठिर उदाच ॥ उद्यापनविध बूहि सर्वदेव दयानिधे॥येन संपूर्णतां याति व्रतमे- 
तदनुत्तमम्‌ ॥ श्रीकृष्ण उवाच॥ पूर्णा तिथिमनुआ्राप्य वित्तचित्तादिसंथुतः ॥ पूर्वेद्यरेकभक्ताशी 
स्वपेन्मां संस्मरन्ह॒दि/प्रातरुत्थाय संस्मृत्य पुण्यछोकान्‌ समाहितः४निवेत्याबद्यक कर्म बाह्म- 
णान्स्वास्ति वाचयेत्‌ ॥ गुरुमानीय धर्मज्ञं वेदवेदाइपारगम्‌ ॥ वृणुयाहत्विजश्वेब वस्घालड्ूरणा- 
दिलमिः ॥ पलेन वा तदघेन तदधार्थेन वा पुनः ॥ शक्तत्या वापि नृपश्रेष्ठ वित्तशराव्यविवर्जितः ॥ 
सोवर्णी प्रतिमां कुयात्पाद्याध्योचमनीयकम्‌॥पात्र संपाद्य विधिवत्पूजोपकरणं तथा॥गोचर्म मात्र 
संलिप्य मध्ये मण्डलमाचरेत्‌ ॥ बह्माद्या देवतास्तत्र स्थापयित्वा प्रपूजयेत्‌ ॥ मण्डपं रचयेत्ततर 
कदलीस्तम्भमग्डितम्‌ ॥ च॒तुद्ॉस्‍समोपेत फलपुष्पादिशोमितम्‌ ॥ बिताने तत्र बध्नीयाद्विचित् 
चेव शोमनम्‌ ॥ मण्डले स्थापयेत्कुम्म ताम्े वा मझुन्मयं शुचिम्‌ ॥ लस्योपरि न्यलेत्पात्र राजतं 
वेष्णवं तु वा॥ वाससाच्छाद्य कोन्तेय पूजयेत्तत्र मां बुध: ॥ उपचारेः षोढशमिम न्त्रेरेतेः समा- 





फिर कभी देवयोगसे मेरे जन्नाष्टरीके दिल जब कि मुन्ति- 
जन और द्विजञाति महान उत्साहके साथ ब्रत करके मेरी 
पूजा करते थे उसे उसने देखा।॥ ७५॥ एव रात्रिम मेरे 
नाम ( भजन ) कीतेन जागरणादि सब देखे मेरी जो वहां 
विधिबत्‌ कथा होरही थी, वेभी समाहित चिंचस सुनों 
॥ ७६ ॥ इस प्रकार जन्माष्टमीके दिनकी मेरी महापूजादि 
।+ पक ० सी कप के. हक. 

देखने सुननेके पुण्यस उसके सव पाप दुग्ध होगये, वह 
प्रेत उसी क्षण शुद्ध एवं पवित्र अन्तःकरणका होगया। 
पीछे प्रेत शरीरको त्यागकर विमानमें बठ विष्णुपदको प्राप्त 
होगया ॥ ७७ ॥ भरे दूत उस विमानपर विठाके वेकुण्ठ 
ले आये। इस प्रकार मेरे जन्साष्टमीवाले ब्रतके प्रभावसे 
३ 5 र्‌ हा 
मर समीप पहुंच द्व्यभोग भोगने छगा ॥ ७८ | पुराणोंमें 
तत्त्वद्शी मुनियोने इस जन्माष्टसीके ब्रतका प्रभाव ऐसाही 
सदा गाया है॥७९॥अवः जोनर जन्म्रभर प्रतिवर्ष विधिवत्त्‌ 


इस ब्रतको करेगा वह सब्था पृणकाम होगा। जो तुमने 


जन्माष्टमीकेविषयम प्रश्न किया था,वह सब हसने कहृद्या। 
हे राजन्‌ ! यह सब ब्रतोंमें उत्तम ब्रव है, इसके अनुछानसे 
मर (विष्णुके) सह्निहित होता है। अब तुम्हारी क्यासुननेकी 
इच्छा हें उस कहिय ॥ ८० ॥ यह श्रीभविष्यपुराणकी कद्दी 
हुईं शिष्टपरिप्रहीत जन्माष्टमीके ब्रतकी कथा पुरी हुई ॥ 


ऋष्यकिपातातंधनपापातक्षाततपयारााद, ४73:5%&57:.. 75, पदवकदका2 कवर, पड िरकबद्यव2:2094 772 %522:2%2 2577. 


(25502%गदातारिकनकिदाधयाधा2 दा आजा 2धकत अकाल सिलाना 


उद्यापन-युधिष्ठिर बोले कि, हे. सब देवताओंकी दुयाके 
भण्डार!|उद्यापनकी विधि कहिये जिसके कियेसे यह उत्तम 
व्रत संपू्णलाको प्राप्त होजाय ॥ श्रीकृष्ण बोले कि, वित्त 
चित्तसे संयुक्त पृर्णसंज्ञक तिथिम उद्यापन करनेवाला नर 
पहिले दिन एकबार भोजन करके मुझे हृदयमें स्मरण 
करता हुआ सोये | प्रातःकारू उठकर एकाभ्रचित्त हो पुण्य 
सलोकोंका स्मरण कर आवश्यक कामोंस निवृत्त हो ब्राह्म- 
णोंसे स्वस्तिवराचन कराये । घमके जाननेवाले वेदवेदान्तोंके 
ज्ञाता गुरुको आचाय्य बना; वल्ध और अलंकारोंस ऋत्वि- 
जोंका भी वरण करना चाहिये | है नृउश्नेष्ठ ! एक पढूकी 
आधेकी अथवा आधेस भी अआंधिकी जैसी अपनी शक्ति हो 
धनका छोम छोडकर सोनेकी अतिमा बनाये। पाद्य, अध्ये, 
आचसनीय पात्रोंकों विधिंके साथ इकट्ठा करके पूजाका 
उपकरण इकट्ठा करे। गोचममात्र भूमि छीपकर बीचमे 
मण्डल बनाये | ब्रह्मादिक देवताओंको वर्द स्थापित करके 
उनकी पूजा करनी चाहिये । वहां केछाके स्तेभोंत्रे सण्डित 
एक मण्डप बनावे; उसमें चार द्वार हों एवं फल और 
पुष्पोंस सुशोभित हों। उसमें रह विरंगा सुन्दर विवान 
बाँघे । उस मण्डलमें तौँबे या मिट्टीफे पवित्र कुंभको स्थापित 
करे | उसके ऊपर चांदी या वॉसका पात्र रख दे । पीछे 
उसे कपडेसे ढकऋर हे कोन्तेय ! योग्य ब्रती उसपर सुझे 
पूजे,सोलहों उपचार तथा उनके मन्त्रोंस एकाग्नरचित्त होकर 


'*__्घ”.. हू आाफाप 3०६. 





८0 ७०७४०७०००७७००+ ४०४० 


(२९० ) इधर 









हितः ॥ ध्यात्वाबाह्यामृती कृत्य स्वागतादि मिरादराव॥ ध्यायेच्चतुसुजं देव शब्बचक्रगदाधरम्‌ | 
पीताम्बरयुगोपेत॑ लक्ष्मीय॒क्ते विभुषितम्‌ ॥ लखत्कौस्तुमशोमाव्य॑ मेघस्यामं खुलोचनम्‌॥ 
ध्यानम्‌ ॥ आगच्छ देवदेवेश जगद्योने रमापते ॥ शुद्धे छसि प्न्नधिष्ठ।ने संनिधेहि कृपां कुछ.॥ 
आवाह० ॥ देवदेव जगन्नाथ गरडासनसंस्थित ॥ ग़हाण चासनं दिव्य जगद्धातन॑मोषस्तु ते ॥ 
आसनमू॥नानातीथा हते तोय॑ निर्मल पुष्षामिश्रितम॥ पाद्य॑ गंहांण देवेश विश्वरूप नमोस्तु ते॥ 
पाद्यम॥गड्ढादिसवंतीर्येभ्यों भकत्यानीत॑ खुशीतलम ॥ गन्धपुष्पाक्षतोपेत॑ गहाणा््य नमोस्तु 
ते ॥ अध्यंम॥कृष्णावेगीसमद्भुत कालिन्दी जलंयुतम ॥ ग़हाणाचमन देव विश्वकाय नमोप़सत 
ते ॥ आचमनम्‌॥दृधि क्षोद्र पृतं शुद्ध कपिछायाः खुगन्धि यत्‌ ॥ सुस्वादु मधुरं शौरे मधुपरई 
गृहाण में ॥ मथुपकेम्‌ ॥ पुनराचमनम्‌ ॥ पश्चामृतेन स्नपन करिष्यामि खुरोत्तम ॥ क्षीसौदधि- 
निवासाय लक्ष्मीकान्ताय ते नमः ॥ पश्चामृत०॥मन्दाकिनी गौतमी च यमुना च सरस्वती। 
ताभ्यः ख्ानार्थमानीत॑ ग़हाण शिशिरं जलम्‌॥ स्नानम्‌ ॥ पुनराचमनम्‌ ॥ शुद्ध जाम्बूनद- 
प्रख्ये तडिद्वासुररोचिषी ॥ मयोपपादिते तु॒भ्य॑ वाससी प्रतिगहाताम ॥ वच्ययुग्मम्‌ ॥ यज्ञो- 
पवीतमिति यज्ञोपवीतम्‌ ॥ किरीटकुण्डलादीनि काथ्वीवलययुग्मकम्‌ ॥ कौस्तुमं॑ घनमालां व 
भूषणानि भजस्व मे ॥ भूषणानि ॥ मलयाचलसंभूत घनसारं मनोहरम्‌ ॥ हृदयाननरदनं चाह 
चन्दन प्रतिगृहमताम्‌ ॥ चन्द्नम्‌ ॥ अक्षताश्र सुरश्रेष्ठोत्ति कुंकुमाक्षताव ॥ मालतीचम्पकादीनि 
यूथिकाबकुलानि च ॥ ठुरूसीप्ंरमिश्राणे ग़हाण सुरसत्तम ॥ पुष्पाणि ॥ अधथाड्रपूजा--अप- 
नाशनाय०पादों पूणवामनाय०गुल्फौ० पू० शौरये० जंघे पू० वेकुण्ठवासिने० ऊरू पू० । पुरु- 
पोतमाय“मेढ़ें पू० । वासुदेवाय० कटी प्‌०। हृषीकेशाय० नामिं पू० | माधवाय० हृदय प्‌० | 
मथुसुदनाय० कण्ठं पू० | वराहाय० बाहू पू० । नृरस्तिहाय० हस्तौ पू० । देत्यसूदनाय० 
कल न सनम “मनन न 2 


पूर्जे ध्यान करे आवाहन करे; आदरपू्वक स्वागतादिकोंसे 
अन्य विधि संपन्न करे। पांचरात्रके विधानसे अर्चाका 
( अर्चावतारका ) अम्ृतीकरण करे इन सन्त्रोंसे ध्यानकरना 
चाहिये कि, चार सुजावाले, शट्ठ चक्र गदा पद्मके धारण 
कि 3 

करनेवाले, दो पीतवसनवाढे,द्व्य आभूषणोंस्रे विभूषित, 
दृदीप्यमान कौस्तुभकी शोभासे सुशोभित सुन्दर नयनों- 
वाले लक्ष्मी हित श्रीविष्णुदेवका में ध्यान करता हूं । हे 
दृवदेवोंके इंश ! हे ससारके कारण !-हे रमापते ! पा: 
रिये। इस पवित्र बेंठनेके स्थलूमें विराजिये और कृपा 
करिये, इससे आवाहन; हे देवदेव ! है जगके नाथ! हे 
गरुड़के आसनपर बेठनेवाले | इस दिव्य आसनको प्रहण 
करिये ; हे जगतके धाता ! तेरे छिय नमस्कार हैं, इससे 
असन,अनक तीथेसे छाया हुआ निमछ पानी पुष्प मिल्ता- 
की रखा है। हू देवेश ! विश्वरूप ! पाद्य ग्रहणकर, तेरे 
डिये नमरकार है, इससे पाय्य,, गंगादिक सब ती्थोंसे भक्ति 
के साथ ठण्ढा पानी छाया हूँ। गन्ध पृष्प और अक्षत 
इस पड़े हुए हूं, इस अध्यको ग्रहण करिये, आपके छिये 
नमस्कार है, इससे अध्ये, जिसमें कृष्ण और वेणीका जल 
7 है काडिन्दीकाभी पानी मिछा हुआ है, इस आच- 
भ्नको स्वीकार करिये। हे विरादपुरुष ! तेरे छिये नम- 
७५५ ० रैंसस आाययन, हे शोर ! मेरे स्वादिष्ट सधु- 


पऊको ग्रहण छर, तेरे छिये नमस्कार है, देख इससे शहद 


ओर कपिछाके शुद्ध दृधि घृत मिले हुए हैं, इससे मधुपर्; 
फिर आचमन; क्षौरसमुद्र्म निवास करनेवाले रक्ष्मीकान' 
आपके हिये नमस्कार है। हे सुरोत्तम | मैं आपका स्नान 
पंचामृतसे कराऊँगा, इससे पंचासृत स्लान, मे न्दाकिनी, 
गौतसी, यमुना और सरस्वतो इन दिव्य नदियोंसे आपके 
स्नानके लिये शीतछ पानी छाया हूँ आप अहण करिये, 
इससे ख्तान, पुनराचमन, शुद्ध खोनेकी तरह चमक 

बिजली और भासुरकी तरह चमकनेबाक्के ये दो बल 
आपके लिये छाया हूँ; आप ग्रहण करिये, इससे दो वस्, 
“ यज्ञोपवीतम्‌ ” इससे यज्ञोपवीत, किरीट कुण्डलादिक 
कांची और दो कडूढे तथा कौस्तुभ और वनमालाये 
आभूषण आपके ढिये छाया हूँ | आप ग्रहण करिये, इससे 
भूषण, “ सलछयाचलछ ?”' इससे चन्दन, “अक्षतांश्र पुरअष्ठ 
इससे कुंकुम और अक्षत, माढती चेपकादिक, यूथिक। 
बकुछ, इन पुष्पोंकी तुछसीपत्रोंके साथ चढता हू | है 
पुरसत्तम्॒ ! प्रहण करिये, इससे पुष्प समपण करे ॥ अई' 
पूजा-अधनाशनक छिये नमस्कार पादोंका पूजन करता 
हैं, वामनके छिये न० गुल्फोंका पू?, शौरिके छिये न९ 
जघाओं का पू०, वेकुण्ठवासीके छिये न० ऋरूओंका पू० 
रु रुषोत्त मर लिये स० मेह्का पू० धवाशुदेंवके लिए० कटोडा 
पू०, हृषीकेशके लिए न० नामिका पू० साधवके लिए न* 
हंद॒यका पू०, मधूसूदनके छिए न? कण्ठका पूजन करवा 
है, बाराहके लिए न० बाहुओंका पू७, नूर्सिदक खिए न? 








मुर्ख पृ० । दामोदराय० नासिकां पू०। पुण्डर 


गेविन्दाय० ललाद॑ पू० । अच्युताय० 


काक्षाय० नेत्र पृू० | गरूडध्वजाय० ओजते पू० । 
शिरः पू० | कृष्णाय ० सवा पूृ०। अथ परिवारदेवतापूजा-- 


[20७] 


हा के द्वं के के वा * - 2 अहम अल व कल हम: के शी लण ते नल व कक अल 
देवकी वखुंदव॑ च रोहिणी सबलाँ तथा ॥ खात्यार्क चूहा हराइप्रसनादियादबाद ॥ 


ढ 


नम यशोदां तत्कालम्रसूर्तां गोपगोपिकाः ॥ काछिन्दीं कालियं चेव पूजयेन्नाममन्त्रतः ॥ 
वनस्पतिरसोहूत कालाशुरूसमन्वितम्‌ ॥ धूप शद्दाण गोविन्द झुणसागर गोपते ॥ घूपम्‌ ॥| 


के हल के 


साज्य च व[तसयुक्तम्‌ ॥ 


ब्रसंयुक्ते नेवेद् मतिगशह्मताम्‌ ॥ नेवेद्यम्‌ । उत्तरापोशनम्‌ ॥ इदे फलमिति फलम॥ 
मिति तांबूलम॥हिरण्यगर्मेति दक्षिणाम्‌ ॥ नीराजयेत्ततों भकत्या 


दीपम्‌ ॥ शाल्योद् पायस॑ च सिताधृतविभिश्चितम्‌ ॥ नानापक्का- 


पृगीफल- 
मड़ल ससलुदीरयन॥।जयमड़ल- 


नि्धोर्षेक्विंदेव॑ समचयेव ॥नीराजनम॥दत्वा पृष्पाआर्लि चेव प्रदक्षिणपुरःसरम। प्रणमेदण्डवद्भधूमों 


मक्तिमह्ृर/पुनःपुनभा स्तुत्वा दानाविधेः स्तोत्रेः 


तनय प्रभो ॥वसुदेवात्मजानन्त यशोदानन्दवर््धनागोविन्द गोझुलाधार 
ते॥ ततस्तु दापयेद्ध्यमिन्दोरूदयतः झुचिः ॥ कृष्णाय प्रथर्म दद्याइंव 
नालिकेरेण शुद्धेन मक्तमध्य विचक्षण ॥कृष्णाय परया भक्‍त्या शद्धे 


कंसवधाथोय भूमारोत्तारणाय च ॥ कोरवाणां 


प्राथयेत जगत्पतिम। ।नमस्तुभ्यं जगन्नाथ देवकी- 


गोपीकान्त नमोष्स्ठु 
देवकीसहिताय च ॥ 
कृत्वा विधानतः ॥ जात: 


विनाशाय देत्यानां निधनाय च॥। पाण्डवानाँ 


हितार्थाय धर्मसंस्थापनाय च ॥ गहाणार्य मया दत्त देवकीसहितो हरे ॥ क्ृष्णाध्यमन्त्रः ॥ 


शद्ढे ऋत्वा ततस्तोय सपुष्पफलचनदनम्‌ ॥ जातुभ्यामव निं 
क्षीरोदाणबसभूत अविगोत्रससुद्धव ॥ गहाणाध्य मया दत्त 


गत्वा चन्द्रायाव्ये निवेद्येत्‌ ॥ 
रोहिण्या सहित प्रो ॥ ज्योत्स्ना- 


पते नमस्तुभ्यं नमस्ते ज्योतिषांपते ॥ नमस्ते रोहिणीकान्त गहाणाध्य नमोस्तु ते ॥ चरद्वा- 
ध्यमन्त्रः ॥ इत्थ संपूज्य देवेश रात्रों जागरण चरेव्‌ ॥ गीतनृत्यद्ना चब पुराणश्रवणादिन्निः ॥ 
प्रत्यूष विमले स्नात्वा पूजयित्वा जगद्गुरुूम्‌ ॥ पायसेन तिलाज्येश्व मूलमन्त्रेण भक्तितः ॥ 
ते नीली दथथथदथदी.त डक िेस नौ“ ““॒ए्ै5ै्््््ण््ौजफ््सक्ः 


हस्तोंका पू०; दैत्योंके मारनेवाढेके रियि न? मुखका ५० 
दामोदरके लिय न० नासिकाका पू०, पुण्डरीकाक्षके लिये 
न० नेत्रोंका पू०; गरुडध्वजक लिय न० श्रोतोंका पू०; 
गोविन्दके छिये न० छछाठटका पू०; अच्युतर्क लिये न० 
शिरका पू०; कृष्णके लिय न० सर्वाज्ञका पूजन करता हूँ।। 
परिवार देवताओंकी पूजा-वसुदेव, रोहिणी, बलरूदेव, 
सात्यकि, उद्धव, अक्र, उमग्रसेनादिक यादव, नंद और 
उसी समय ग्रसव्म हुई श्री यशोदाजी, गोप, गोपिका, 
कालिन्दी और कालिय इन सबकी नाम मंत्रोंस पूजा होनी 
चाहिये | '£ वनस्पति रसोदभूत” इससे धूप; “साज्य च 
वर्तिसंयुक्ते ” इससे दीप; घी मिल्लेहुए शाल्योदन, खीर 
और अनेक तरहके पक्वान्न इनके नेवेध्धकों ग्रहण करिये. 
इससे नैवेद्य, उत्तरापोशन; “ इद फलम्‌ ” इससे फल; 
“पूणीफ्” इससे ताम्बूल; “हिरण्यगर्भ” इससे दक्षिणा 
समपण करे। भक्तिपूवक मज्जलालुशासन करता हुआ नीरा- 
जन करे, पीछे जय और मज्गछके शव्दसे देवदेवका सम- 
चल करे, इससे मीराजन करना चाहिये, प्रदृक्षिणाके साथ 
पृष्पांजलि देकर परम भक्तिके वेगस गद्गदूं हो वारंबार 
भूरिमें दण्डकी तरह प्रणाम करे। अनेक प्रकारके स्तोत्रॉसे 
लगतपतिकी_ मार्थना करे । हे 25 नाथ ! तेरे छिय 
नमस्कार है,हूं देवकोके नन्‍्दन | हे प्रभो ! है वसुदेवात्मज: 
है अनन्त ! हे यशोदाके आनन्द बढ़ानेवाले ! हे गोविन्द 





है गोकुलके आधार ! हे गोपियोंके प्यार | तेरे छिय नम- 
स्कार है । इसके बाद पवित्रव्ञके साथ चन्द्रमाके उदय 
होनेपर अध्य देना चाहिये । देवकी सहित कृष्णके लिये 
पहिले अघ दे । बुद्धिमानको चाहिये कि शुद्ध नारियरके 
साथ अध्य दे | पीछे परम भक्तिके साथ भगवान्‌ क्ृष्ण- 
जीको शंखमें करके अध्य दे कि कंसके मारने भूमिके 
भारको उतारने, कौरवोंका विनाश कराने ओर दैत्योंको 
मारने पाण्डवॉका कल्याण करने और धमकी स्थापना 
करनेके लिये आप प्रकट हुए थे। हे हरे |! आप देवकीजी 
समेत मेरे अध्येको म्रहण करिये। यह भगवान्‌ कृष्णको अध्ये 
दनेका मंत्र है। इसके पीछे पुष्प फछ ओर चन्दनके साथ 
शंखमें पानीमर. जानुंटक चन्द्रमाके लिये अध्ये दे कि 

क्षीर समुद्रस उत्पन्न होनेवाले ! हे अन्निके नेत्र जात | हे 
प्रभो | रोहिणीके साथ मेरे दिये हुए अध्यको ग्रहण करिये, 
हें चौँदनी रातके मालिक ! तेरे लिय नमस्कार है, हे नक्ष- 
त्रोंके स्वामिं ! तेरे छिये नमस्कार हे | हे रोहिणीके 
कान्त ! तेरे लिये नमस्कार हैं; मेरे दिये हुए अध्येको 
ग्रहण कर । ये चन्द्रमाके अध्यके मन्त्र है । इस 
प्रकार देवेशकी पूजा करके रातकों जागरण करना 
चाहिये, उसमें गीत बाजे और नाच तथा पुराणोंके श्रवणा- 
दिक होने चाहिये, प्रातःकाढ निर्मछ पानीमें स्तान करके 
जगदूगुरु श्रीकृष्णचन्द्रजीका पूजन करके तिछ धी मिली- 


&7282:0:22 70:3६ -->>-_नन्‍ननअन्‍न>अनछऋऋ मर्ज] पट 


अष्टोत्तरशत हुत्वा ततः पुरुषसक्ततः ॥ इद॑ विष्णुरिति भोकत्वा ज्ुहुयाद्रे घताहुतीः ॥ 





के के रू “5 


शोष॑ समाप्याथ पृर्णाहुतिपुरःसरम्‌ ॥ आचार्य पूजयेद्धवत्या भषणाच्छादन! दिशिः हे गामेकां 
कपिलां दब्याद्वतसपूर्तिदेतवे ॥ पयस्विनीं सुशीलां च सवत्सां सगुर्णां तथा ॥स्वर्ण शरड्धी रोप्य- 
खुरां कांस्यदोहनिकायुताम्‌ रत्लपुच्छां ताम्रपृष्ठी स्वर्णघण्डासमन्विताम्‌॥ वस्बच्छन्नां दक्षि- 
णाह्यामेव सम्पूर्णतां ब्रजेत्‌ ॥ कपिछाया अभावे तु गोरन्यापि परदीयते ॥ ततो दच्यात्व ऋत्वि- 
ग्योप्स्येभ्यश्रेव यथाविधि ॥ शय्यां सोपस्करां दक्याद्गतसम्पूर्तिहेतवे ॥ बाह्मणान्भोजयेतपक्ा- 
दष्टों तेभ्यश्व दक्षिणाम्‌ ॥ कलशानब्रसम्पूर्णान्‍दद्याश्वेव समाहितः ॥ दीनान्धकृपणश्रिव | यथाह 
अतिपूजयेत्‌ ॥ प्राप्याठज्ञां तथा तेभ्यो खुश्चीत सह बन्घुनिः ॥ एवकते महाराज ब्रतोद्यापन- 
कमंणि ॥ निष्पापस्तत्क्ष णादेव जायते विद्धोपमः ॥ पृत्रपौन्नसमायुक्तो धनधान्यसमन्वितः॥ 
भुक्‍त्वा भोगांश्विर कालमन्ते मम पुर ब्रजेत्‌ ॥ इति श्रीमविष्य पुराणे कृष्णयु धिष्ठि रस॑ंवादे जन्मा- 
छमीव्रतोद्यापन सम्पूणम्‌ ॥ े 
अथ ज्यष्ठात्रतम्‌ |। 


भादरशु क्ाष्ट म्यां ज्येष्ठक्षे ज्येष्ठाप्रतमुक्त 
न्विता ॥ महती कीततिता तस्यां ज्येष्ठादेवीं 
लिड्गपुराणेषि--कन्यास्थाकोष्टमी शुक्का ज्येष्ठां 
प्राशस्त्याथां ॥ इद॑ च्‌ ज्येष्टायोगवशोन 
भाद्पदे शुक्के पक्षे क्‍्येछक्षेसंयुते ॥ 


कालादरशों---भाद्रे शुक्काष्टमी ज्येष्ठानक्षत्रेण सम- 
 भ्पूजयेत ॥ उपहारबेहुविषेरलक्ष्मीविनिवृत्तये ॥ 
तत्र प्रपूजयेत ॥ इति॥ अत्र कम्यास्थाकोंक्तिः 
पूथविद्धायां परविद्धायां बा कार्यम ॥ मास 
' यास्मन्कस्मिश्दिन बाषि 


ज्येष्ठादेवी भपूजयेदिति 


माधवीये स्कान्दोक्ते: ॥ दिनद् पैन क्षत्रयोगे तु परदिने मध्याद्वादूध्य नक्ष्त्रसत्वे परा गाह्मा॥ 
अन्यथा रात्रावषि नक्षत्रयोगे पूर्वव ॥ यस्मिन्दिने भवेज्ज्येद्ठा मध्याह्वदूध्वेमप्यणुः ॥ 


तरस्मिन्हाविष्य पूजा च न्यूना चेत्प्वेवासरे 
हुई खोरसे मूछ मंत्रसे भक्तिपू्वक १०८ आहतियाँ देनी 


चाहिये, पीछे पुरुषसृक्तसे और “ इई॑ विष्णु ” इस मंत्रस , पर ब्ये 
घृत्रकी आहुतियों दनी चाहिये। पूर्णाहुतिक साथ ही शेष | वि 


पूरा करके भूषण और वख्बोंसे आचारयंका पूजन करना 
चाहिये। ब्रतकी पूर्तिके छिये रस्सी सहित एक दूध देले- 
वाली सुशीला बछडेवाली कपिछा गाय देनी चाहिये। 
सोनेकी सींग चौंदीके खुर काँसेकी दोहनी रत्नोंकी पूछ 
वाँसकी पीठ ओर सोनेका घण्टा देना चाहिये । देती वार 
वचन उढाना चाहिये। साथमें दक्षिणा देनी चाहिये, जिससे 
कि ब्रत पूरा हो जाय । यद्दि कपिछा न हो तो दूसरी 
गायही दे देनी चाहिये इसके बाद दूसर ऋत्विजॉको 
विधिएृवक दक्षिणा देनी चाहिये अतको संपूर्तिक लिये उप- 
स्कर सहित शय्याका दान करना चाहिये, आठ आाह्मणोंको 
जित कराकर दक्षिणा दंनी चाहियेएकाग्रचित्त हो अन्नके 
भरेहुए कछशोंका दान करे । दीन और क्ृपण जो जिस 
य उसका उसी तरह सन्मान करे, ब्राह्मणोंकी आज्ञा 
लेकर बन्धुओंके साथ भोजन कर है महाराज ! इसप्रकार 
क्‍ गा दयाइस पूरा करके उसी ससय निप्पाप होकर देव- 
समान होजाता है | उस यथेष्ठ पुत्र पौत्र धन धान्य 
का जाते हैं। गे उत्तम भोगोंको चिरकाछ तक भोग- 
पल सेरे पुरको चला जाता है। यह श्री भविष्य. 

उरा गे श्रीकृष्ण और युधिष्तिरके जवादक 205 
उचयापत्न पूरा हुआ ॥ 





॥ नवमीसहिता कार्या अष्टमी नात्र संशयः॥ 





ज्येष्ठात्रत-भाद्पद शुद्धा अष्टमीमें ज्येष्ठा नक्षत्रके होने- 
ज्यष्ठाब्रत होता है । यह काहादर्शमें लिखा हुआ है 
के; भाद्पद शुक्छाअष्टमी ज्येष्ठानक्षत्रके साथ हो तो उसे 
बडी कहा है। उसमें ज्येष्ठा देवीका अनेकों उपचारोंसे 
इंजन करता चाहिये, जिससे कि दारिद्रका नाश हो। 
लिज्ञपुराणमें भी लिखा हुआ है कि कन्याके सूयमें भाद्रपद 
शुक्छाअष्टमी हो तो उसमें ज्यघ्ठा देवीका पूजन करना 
चाहिये, इस बचनमें कन्याके सूय्येका -कहना प्रशसाके हिये 
है। यहू त्रत ब्येष्ठाके योगसे पूर्वविद्धा और पर विड्धा दोनोमे 
होता है। ऐसाही माघवीय ग्रन्थमें स्कन्ध पुराणका प्रमाण 
रखा है कि भाद्रपद मासके शुह्पक्षकी अष्टसी ज्येप्ठा नक्ष 
त्स युक्त हो चाहे पाहछे दिन हो चाहे दूसरे दिन हो जिस 
किसीभी दिन हो उसमें ज्येष्ठा देवीका पूजन करे। यदि 
दो दिन नक्षत्रका योग हो तो पर दिनमें मध्याहसे ऊपर 
कक] किक 
ज्यष्ठा नक्षत्रका योग रहे तब दूसरे दिनही ज्येष्ठाका ब्रत 
करना चाहिये। यदि ऐसा न हो यानी मध्याहसे ऊपर दूसर 
दिन ब्येष्ठाका योग न हो तो,पूर्वा में रातकोभी यदि ज्येष्टाका 
योग मिल जाय तो उसीमे ही त्रत करना चाहिये | जिस- 
दिन ज्यध्ठा नक्षत्र मध्याहसे ऊपर अणु मात्र भी हो उसी 
दिन हृविष्य और ज्येष्टा देवीकी पूजा करे। यदि ऐसा व 
हो तो पहिले दिन ही बत और पूजा करनी चाहिय | 
“नवमी सहिता कार्या अष्टमी नात्र सशयः सिह 





१३दमंथ सामान्यम्‌ । 





सि भाद्रपदे शुक्क पक्षे ज्येब्रक्नेतंयुता॥ राजियेस्मिन्दिने कुर्याज्ज्येष्ठायाः परिपूजनमिति 
स्कानदात ॥ दिनद्दये ल्येष्ठायोगाभावे त्वष्टम्यामेबेद काय न तु तथचक्ततिथ्यन्तरेएपि ॥ प्रत्या- 
ब्विक तिथादुक्त यज्ज्येष्ठादेवतं ब्रतमूशप्रतिज्येष्ठाव्रत य्च विहित॑ केवलोहनि ॥ लिथावेदाचर 
दाद्य द्वितीय केवलक्षतः ॥ इति मत्स्यवचनात।मदनरत्ने भविष्ये तु नक्षत्रमात्रे उक्तम--मासि 
भाद्रपंदे पक्षे शुक्ले ज्येप्ठा यदा भवेव॥रात्रों जागरणं कुयादिभिमन्त्रेश्व पूजयेत ॥इति॥ दक्षिणा- 
त्यास्त्वक्ष एव कुवेन्ति ॥ एवं निर्णीतपृजाईनात्पवोदिनेडतराधायामायाहनझुत्तरदिने पूजन मूले 
विसजन कायम्‌॥ तथा च स्कानदे-मंत्रेणाबाहयेदेवीं ज्येप्ठायां तु मपूजयेव ॥ मूले विसर्जयेदेवीं 
त्रिदिन ब्रतमुत्तमम्‌॥अथपूजा॥ तिथ्यादि संकीत्य मम मुतवन्ध्यात्वादिदोषपरिहाराथ पुत्रप्रपौ- 
ब्रादिवृद्धये दरिद्रनाशाथ च यथामिलितोपचारेज्येप्ठापूजनमहं करिष्ये ॥ त्रिलोचनां शुक्कदन्ती 
विश्वंती काथनी तल॒म॥विरक्तां रक्तनयनां ज्येष्ठां ध्यायामि सुन्दरीम्‌ ॥ध्यानम॥ णट्नेहि त्वं महा- 

गे सुराखुरनमस्कृते॥ज्यष्ठा त्व॑ सवेद्वानां मत्समीप॑ गता मव ॥आवाह+ ॥ श्वेतसिंहासनस्था 
तु चेतबस्त्ररलंकृता ॥ बरद॑ पुस्तक पाशं विश्वत्थे ते नमोनमः ॥ आसनम ॥ ज्येप्ठे श्रेष्ठे लपो 
निष्ठे धर्मिष्ठे सत्थवादिनि ॥ समुद्रमथनोत्पन्रे पाद्य गृह नमोष्तु ते॥ पाग्मम ॥ श्रीखण्डकर्पर 
यृत तोय॑ पृष्पेण संसतम।|गहाणाध्य मया दत्त ज्येष्ठादेवि नमोउस्तु ते ॥ अध्यम॥ ज्येप्ठाये ते 
नमस्तुथ्य श्रेष्ठाये ते नमोनमभाज्येष्ठे श्रेष्ठे तपोनिष्ठे बह्मिष्ठें सत्यवादिनि।आचम० ॥ पथो 
दधि घृतं चेव क्षोद्रं शकेरयान्वितम्‌ ॥ पश्चाम्ृतं मयानीतं स्नानार्थ देवि गह्मयताम ॥ पंचाम्न० ॥ 
मन्दाकिन्याः समानीत॑ हेमाम्मोरुहवासितम्‌ ॥ स्नानाथ ते मयादत॑ तोय॑ स्नाहि जगन्मये॥ 





स्नानम्‌ ॥ सूह््मतन्त॒भत्रे खेते धोते नि्मलवारिणा ॥ वारणे लोऋलज्जाया वाससी भति- 





सहिता अष्टमीको करना चाहिये इसमें सनन्‍्देह नहीं हे । 


ऐसाही वाक्य निर्णयसिन्धुमं रखा हे कि 'नवम्या सह | 
काय्यां स्थादष्टमी नात्र सशयः नवमीसहिता अष्टमीको करे | 
इसमें सन्देह नहीं हें इन दोनोंका अर्थ भी एकसा हे। इसे | 
परके ग्रहणसे दिया है । तात्पय वही है जो लिख चके हैं। | 
भाद्रपद शुक्लाअष्टमी ज्येष्ठा नक्षत्रसे युक्त रीतिमें हो तो इस | 
दिन ज्यष्ठा देवीका पूजन करना चाहिये | यह श्कन्द्‌ पुराणमें | 
लिखा हुआ हे। यदि दोनों ही दिन ज्यछाका योग न मिल्ठे तो | 
| हुए है, ऐसी वरद मुद्रा पुस्तक और पाशको धारण करने 


ज्यप्ठाका पूजन अष्टमीमेही करना चाहिये। ज्यष्ठायुक्तदूसरी 


किसी तिथिमें ज्येप्ठाका पूजन न करना चाहिये; क्योंकि | 
मात्स्यम छिखा हुआ है छि, प्रतिवर्ष तिथिमें ज्यछ्ठा देवताका | हि 

| श्रष्ठ ज्येष्ठ | पाद्य म्रहदणकर । तेरे छिये नमस्कार हें, इससे 
इनमें पहिले 'ब्रतको तिथिंस तथा नक्षत्रके त्रवकों केवछ | पा; श्रीखण्ड, और कपूर युत पुष्प पडा हुआ पानी उप- 
नक्षत्र करना चाहिये। मदनरत्नग्रन्थमें तो मविष्यके असा- | स्थिंव है । है ज्येा देवि : इसकाम जच्य दवा ई। आप 
गस नक्षत्रमात्रस यह त्रत कद्दा है कि भाद्रपदमासके शुक्ल | 
पक्षम जब अ्यघ्ठा नक्षत्र हो तो रातमें जागरण और इत्र | 
मंत्रोंसे पूजन करे । दाल्लिणात्य तो नक्षत्रमेंही पूजन करते हैं | 
इस प्रकार निणय किये हुए द्निस पहिछ दिन अनुराधामें | 
आवाहन ब्येष्टामें दूसरे दिन पूजन और मूलमें विसजत | 
| किनीसे छाया हूँ इसमें सुवणके कमछकी सुगन्धि आ रही 
| है ! यह पानी में आपके स्तानके लिय लाया है । आप इससे 


ब्रत कहा हैं तथा प्रतिवष नक्षत्रम ज्यष्ठाका ब्रत कहा हैं। 


करना चाहिये। यही स्कन्द॒पुराणमें लिखा हुआ हूं कि; 
अनुराधामें देवीका आवाहन ज्येष्टामें पूजत और मूल 


विसजन करना चाहिये। इस प्रकार यह तीन दिनितक उत्तम | 
ब्रत होता है। पूजा-तिधि आदिको कहकर मेरे झूटवन्ध्यापन | 





| आदि दोषोंकी निवृत्तिके लिये एवम्‌ पुत्र प्रपोत्र आदिकों 


की वृद्धिक लिये वथा दरिद्रके नाश करनेक छिय जो उप 
चार मिल रहे हूं उनसे ज्येष्टाका पूजन में करूँगा ! शुक्दांतों 
और छाल तीन नेत्रों तथा सोनेके शरीरवाली बिरक्ता 

द्री ज्येष्ठटाका ध्यान करता हूं, इससे ध्यान; है सुर और 
असुर दो बॉसे नमसस्‍्कृत हुई महाभागे ! आप आयें। आप 
सब देवताओंम ज्येट्टा हैं । मेरे समीप आजाये,उससे आव 
हन; खवेतर्सिहासनपर बेठीहुई श्वेतवर्खोको ही धारण किय 


वाली आपके छिये वारंवार नमस्कार हैं, इससे आसन, हे 
मुद्रक मथनसे उत्पन्न होनेवाली सत्यवादिनी धममंनिष्ठ 


हण करें आपके लिये नमस्कार हू इससे अध्य; तुझ ज्यप्रा 
के लिय नमस्कार तथा तुझ अ्रष्टाके लिय वारंबार नमस्कार 
है।हे ज्येष्ठे ! हे श्रष्ठे! हे तभे निष्ठा रखनेवाली | हे त्रह्मि्ठ 
है सत्यवादिनि |! आचमनीय ग्रहण कर, इससे आचमनीय 
“पयोद्धिध्ुतम्‌ ? इससे पंचामत स्लान; है जगन्मये ! मन्दा 


स्नान करिये, इससे स्नान; ये दो पतले सफेद वस्तु निमेछ 
पानीसे धोये हुए हैं छोक छब्जाके निवारक हूँ 


हु 
ब्रतराज! । | अध्टमी-- 









गहमताम ॥ वख्युग्मम्‌ ॥ आचम० ॥ हारिद्राकुकुम॑ चेव कण्ठसूर्ज च ताडकम्‌ ॥ सिन्दूर॑ कजल॑ 
देवि पटसौभाग्यानि गह भोः ॥ सोमाग्यद्रव्याणि॥ श्रीखण्ड चन्दनम्‌ ॥ अक्षताश्व खुर० ॥ 
अक्षतान ॥ नूपुरों मेखला काशी कड्ढणानि सुशोमने ॥ नासिकायां मया दत्तमुक्ताकाश्न- 
संपुता ॥ अलेकारान्‌ ॥ माल्यादीनि सुगनन्‍्धीनि० ॥ पुृष्पाणि॥ वनस्पतिरसो० धूपम्‌॥ साज्य॑ 
चोति दीपम॥गोधूमपिष्टशाल्या।दितण्डुलानां च कारिताः ॥ स्वाब्यः प्रसतिमात्रास्त पूरिका घृंत 
पाचिताः ॥ शाल्योदन सूपयुक्तं दाधे दुग्ध घृतं तथा | नानाव्यअ्ञनसंयुक्त नेवेद्य प्रातिगह्मताम ॥ 
नेवेद्यम्‌ ॥ उत्तरापो” । करोद्गर्तनम्‌ ॥ फलम्‌ ॥ हिरण्यगर्भेति दक्षिणाम्‌ ॥ नीराजनम्‌॥ प्रदक्षि- 
णाम्‌ ॥ नमस्कारान्‌ ॥ शाड्रबाणाब्जखड़ाारिप्रासतोमर सुदूर! ।। अन्येरप्पायुधेयुक्तां ज्येष्ठे त्वा- 
मर्चयाम्पहम्‌ ॥ पुष्पाअलिम ॥ त्व॑ लक्ष्मीस्त्व॑ महादेवी त्व॑ ज्येष्ठे सबदामरेः ॥ पूजितासि मया 
देवि वरदा भव म॑ सदा ॥ प्राथनाम्‌॥ इति पूजाविधिः ॥ बथ भविष्योक्तत्रतविधि। ॥ युधिष्ठिरटवाच॥ 
मृतवन्ध्या तु या नारी काकवन्ध्या तथापरा॥ गर्भस्नवा वृतीया च नानादोषेस्तु दृषिता ॥ निर्ध- 
नाश्व नरा ये व दारिद्रण हताश्व ये।कर्मणा केन मुच्यन्ते तन्‍्मे त्रुहि जनादन॥ श्रीकृष्ण उवाच॥ 
मासि भाद्रपदे शुक्ल पक्षे ज्येष्टा यदा भवेत्‌ ॥ रात्रो जागरण कु्योद्रीतवादित्रनिःस्वनेः ॥ एवं 
विधविधानेन एमिमन्त्रेश्व पूजयेत्‌ ॥ णह्ोहि त्वं महाभागे सुरासुरनमस्कृते ॥ ज्येष्ठा त्व॑ं सवेदे- 
वानां मत्समीर्ष गता भव ॥ शेतसिंहासनस्था तु श्वेतवस्रेरलंकृता ॥ वरद॑ पुस्तक पाशं विश्वत्ये 
ते नमोनमः ॥ ज्येष्ठे श्रेष्ठे तपोनिष्ठे धर्मिष्ठे सत्यवादिनि ॥ समुद्रमथनोत्पन्ने ज्येष्ठाये ते नमो- 
नमः ॥ शाड्जेबाणाब्जखड्ारिप्रासतोमरसुदरे) ॥ अन्येरप्यायुधेयक्तां ज्येष्ठे त्वामचेयाम्पहम्‌ ॥ 
सुरासुरनरेवेन्धा यक्षकिन्नरपूजिता ॥ पूजितासि मया देवि ज्येष्ठे त्वामचेयाम्यहम्‌ ॥ विभप्रिये 
महामाये सुराखुरसुपूजिते ॥ स्थुलसूक्ष्ममये दवि ज्येप्ठे त्वामचेयाम्पहम्‌ ॥ त्व॑ लक्ष्मीस्त्वमुमा 
देवी त्व॑ ज्येष्ठे सवेदामरेः पूजितासि मया देवि वरदा भव मे सदा ॥ पुत्रदारविवृद्धयर् 
लक्ष्म्यश्वव विवृद्धयये ॥ अलक्ष्म्याश्चल विनाशाय सर्वकालं भजेत ताम्‌ ॥ गुरू संपूजयेद्धक्त्या 








इन्हें आप प्रहण करे; इससे दो वस्र, * हरिद्रा कुकुमम्‌' 


हक. 


तथा जिसके एकही होकर रह जाय या जिसका गर्भ गिर 


इस से सोभाग्य द्रव्य, 'श्रेखण्ड चन्दनम्‌' इससे चन्दन, 
अक्षवाश्व॒ इससे अक्षव, नूपूर मेखछा कांची और कंकण 
एवम्‌ नासिकाका मुक्ता जडा सेंठा आपके लिये छाया हूं 
आप ग्रहण करिये, इससे अलछेकार, भाल्यादीनि सुगन्धी नि! 
इससे पुष्प, 'वनस्पति रसोद्भूत' इससे धूप, 'साज्य च 
वि! इससे दीप; गेहूँ, शाली और तण्डुछोंके पिष्टस बनाई 
हुई स्वादिष्ट प्रख्तति भर घीकी पूरी शाढ्वीका भाव दधि 
दुग्ध घृत और सूर्प ओर अनेक तरहके व्य ज्ञन इनके नेवेद्य 
को प्रहण करिये, इससे नवेद्य, उत्तरापोशन, करोद्वतन, 
फल, हिरिण्यगभ' इससे द्क्षिणा, नमस्कार, शाह, बाण, 
अब्ज, खड्ढ, भाछा, तोमर ओर सुंदर बथा और भी दूसरे 
२ आयुधोंको धारण करनेवाढ़ी जो आप ज्यपष्ठा हैं आपका 
पूजन करता हूँ, इससे पुष्पांजलि, आप छक्ष्मी हैं आप 


क्‍ भहादेवी हैं, आप ज्यष्ठा हैं, आप सदा अमरोंसे पूजित 
होती हैं ने भी आपका पूजन किया है आप सदा मुझे बर 
&» इससे प्राथता समर्पण करनी चाहिये। यह पूजाकी 
विधि पूरी हुईं ॥ भविष्यपुराणकी कही हुईं ब्रतकी विधि 
कहते हं-युधिष्ठिर बोले कि, जिस ख्रीके वाढुक मरमर जाएँ 





जाय अथवा और भी भनेकों दोषोंस दूषित हो वे मनुष्य 
निर्घन हो अथवा दारिद्रने जिसे दबाढिया हो वे किस- 
कस्क करनेसे उस पापसे छुट, है जनादुन | यह मुझ सुना- 
इये। श्रीकृष्णजी बोछे कि; भाद्रपद शुक्धपक्षम जब ज्यप्ठाः 
नक्षत्र हो तो उस दिन रालको गाने बजानेके साथ जागरण 
करना चाहिये | इस विधानके साथ इन्हीं मंत्रोंसे ज्येष्ठाका 
पूजन करना चाहिये | पूजनके मंत्र “एहि एहि” यह 

ही ४... म्‌ः । कट ड्ड सक ज् # त्रोंका 
छेकर_“भजेत ताम” तक हैं ) इनमें जिन मंत्रॉक 
पूजनके प्रकरणमें अर्थ कर चुके हैं उनका अर्थ न्‌ करके 
जिनका अर्थ नहीं किया हें उनका ही अथ करेंगे। हूँ ज्गप् 
देवि ! सुर असुर और मनुष्य तेरी बन्दना करते हूँ यक्ष 
ओर किन्नर पूजा करते रहते हैं मेने आपका पहिले पूजन 
किया है अब भी पूजन करता हूं। हे आह्मणोंकी प्यारी : 
हे प्रहमाये ! हे सुर और असुरोंस भी भांति पूजित हुई . 
हे स्थूल और सूक्ष्म दोनों सरूपोंबाली ज्येष्ठे देवि ! में तेरी 
हैं स्थूल आर सूक्ष्म दोनों सरुपॉवाछी ज्यष्ठे देवि दे 
अचो करता हूं। पुत्र दार और छक्ष्मीकी बृद्धिके ढिय 
तथा अलक्ष्मीके नाश करनेके लिये उसे भजना चाहिये। 
बस्र और आभरणोंसे भक्तिपूवेक गुरुकों पूजे, इसके वाद 





१ तण्डुलशब्देन तत्पिष्टमू | २ अभयस्याप्युपलक्षणम्‌ । 





ब्ंतानि, | | (१९५७ ) 





वर््बचेरामरणादिनिः |॥ ततो द्वादशवषोणि पूजनीया प्रयत्ततः ॥ यावज्ञन्माथवा पूव॑वि- 
घिनानेन मानवेः ॥ ददाति जितं पुत्राँ्ष अचेनीया सदा स्विया ॥ अनेन विधिना युक्तो यो 
हि पूजयते नरः॥ नारी वा पूजयेज्ज्येष्ठां तस्‍्या लक्ष्मीविवद्धेते ॥वनध्या तु लग्नते पुत्रान्डुभेगा 
खुभगा भवेत्‌ ॥ ण्वंविधिविधानेन ज्येष्ठादेवीं समचयेत्‌ ॥ विन्नास्तस्य प्रणश्यान्ति यथाप्छु 
लवण तथा ॥ तथा ग्राह्मे कुरुश्नेष्ठ ज्येष्टायाः शोभन व्रतम्‌ ॥ नीराजने कते चेव दीपो आाह्यः 
सुमक्तित॥ नेवेद्य सुहितं प्राइय ब्तिनाग्रे युविष्ठिर ॥ गुरूहस्तात्‌ सदा ्ह्यो दीपः अऋज्वलितो 
महान्‌ ॥ ब्रतस्थो भक्तियुक्तत्न शुचिः प्रथलमानसः ॥ अनेन विधिना चेब ब्तं छुयोंयु- 
घिष्ठिर॥ ज्येष्ठा नाम परा देवी सुक्तिछक्तिपदायिनी ॥ यघ्तां पूजयतें राज॑स्तस्मे सब 
प्रयच्छति ॥ इति भविष्ये ज्येनश्नात्तकथा ॥ स्करपुराणेएपि--मालत्रि भाद्रपदे शुक्कपश्षे 
ल्येष्क्षेसंयुते ॥ यस्मिन्कस्मिन्दिने कु्योज्ज्ये्ठायाः परिपूजनम्‌ ॥ तत्राष्टम्यां यदा वारों 
भानोज्येंडक्षेमेव च ॥ नीलज्यछ्ठेति सा भोक्ता दुलेमा बहुकालिकी ॥ कृतस्नानो नरः कु्यात्त- 
स्पामन्यत्र वा दिने ॥ भक्तियुक्तः शुचिः कुयोज्ज्येष्ठादेव्यास्तु पूजनम्‌ ॥ जलांशयात्ु पूर्वच्चरा- 
नयेत्पथ्वशकर।॥ ॥ देवीरूप च तत्रेव कृत्वा वा स्थापयेत्ततः॥ गोमयेनोपलिते च हेमी वा 
स्थापयेदबुधः ॥ स्थापयेद्राजतीं ताम्नीं लेख्यां वा पटकुडययो:॥ आवाहयेच्ततो देवीमथवा 
पुस्तकेषपि वा ॥ त्रिलोचनां शुक्कदन्तीं बिश्वती राजतीं ततुम्‌ ॥ विरक्तां रक्तनयनां ज्येष्ठामा- 
वाहयाम्पहम्‌ ॥ इति मन्त्रेण तां देवीमावाह्म खुकूती ब्रती ॥ स्नान दष्रात्तथा पाद्य पादयोरू- 
भयोदिज ॥ श्रीखण्डकर्परयतं दद्यादघ्य च माक्तितः ॥ पश्चामृतं तथा स्नान॑ निर्मेलेन जलेन 
च्‌॥ वस्च गन्ध तथा पुष्प॑ धूपदीपादिक च यत पूजयित्वा च सोमभाग्यब्रेव्येनोनाविधेः श॒ु्ेः ॥ 





बारह वर्षतक प्रयत्नसे पुजना चाहिये, या जबतक जीवित | ज्येष्ठा कहते हैं यह दुलेभ हैँ बहुत द्नवाद जाती हैं। 
रहे पहिंले कही हुई विधिस मनुष्योंकों पूजन करना | इसमें मद॒ष्य खानकर पवित्र होकर भक्तिभावसे ब्येष्ठादे- 
चाहिये। यह बिच और पुत्रोंको देती है. इस कारण | द्वीका पूजनकरे अथवा दूसरे दिन करे । पहिले दिन वाला- 
खियोंको सदा पूजना चाहिये | जो ३ लोगो इस | बच व करलिक वेहारी वंसेकी देवी वलाकर पीठ 
विधिसे ज्येष्ठाका पूजन करते हैं उनकी लक्ष्मी खूब बढती | वापित को हलक लग कटी ऐसी पाठ कै कि पहि। 
है बन्ध्याको पुत्र मिलजाते हैं दुअंगा सुभगा हो जाती हैं। | पित करे इसकी जगह कहीं ऐसा पाठ हैं, कि, पहिडे 
इस प्रकार विधिविधानसे बज्येष्ठा देवीकी पूजा कर तो दिन नदीकी शुद्धस्थलकी रेतीलाकर उसको देवी बनाये । 
उसके विप्न इस प्रकार नष्ट होजाते हैं जैसे पानीमें नमक | पहिलछे दिन नदीसे पांच शकरालछाके वहां देवीको पूजन 
विडा जाता है। हे कुरुअरेष्ठ | ज्येछाके इस सुन्दर ब्रतकों | करते हैं आचार देखा जाता है। अथवा शक्ति हो वो गोव- 
तेसेही प्रहण करना चाहिये | नीराजन करके भक्तिपूतक | रसे छोपकर सोनेकी मूर्ति स्थापित करनी चाहिये। अथवा 
दीपक करना घाहिये, हे युधिष्ठिर ! फायदा पहुँचानेवा् | तँबिकी या चौंदीकीही वनाढे अथवा चित्रपट या भीतपर 
बाय करत नर । अवकाहये | चग्केजववा पस्वकमेटी देवीका मादादन करें किले 
भक्तिपूवेक सयमक साथ पवित्र रहें, हे युधिष्ठटिर ! इसी तीन नि कक हक के आन बे हि 
विधिसे ब्रत करे। हे राजन्‌ ! ज्येष्ठाना मकी देवी सबसे बडी [3 2 हर कक ड्श हज कब जप 
हैं मुक्ति और मुक्तिकी देनेवाली है, जो उसकी पूजा करता | आवाहन करवा हू। इस मन्त्रसे छंद गन पे ऐप किक 
है उसे वो सबकुछ देती है यह भविष्यपुराणकी कद्दी हुईं | दोनों चरणोंको पाथ दे,शऔीखण्ड ओर कपूर॒के साथ भक्ति- 
ब्येष्ठाके ब्रतकी कथा पूरी हुईं ॥ स्कन्दपुराणमें भी-लिखा पूवेक अध्ये दे, पेचामरतसे स्लाथ वथा नि्मलज्लसे खान 

करावे, वस्च। गन्व) पुष्प और धूप दीपादिकका उपचार 


हुआ हैं कि भाद्रपदके शुक्लपक्षमं जिस किसी दिल ज्ये- व् कर आर कर 
करे, अनेक वरहके शुभ सोभाग्वद्रव्योंसे पूज पीछे गेहूँ, 
इसमें अष्टमीको रविवार और ज्येष्ठानक्षत्र होतो इसे नीडी जो, शाली आदि अनेक द्वव्योंसे दयार किया डुआ नवेद 





छानक्षत्र हो उसी दिन ज्येष्ठाका पूजन करना चाहिये, 





१ नद्याः पूर्वद्चराहत्यं सिकेतो: शुद्धेदशजा इत्यन्यत्र पाठ: पूर्वेद्चनंधा: सकाशात्पंच शकरा आनीय 
२. हे... 35 


2-०० सा... भा या: आवक माह ममकच हे ८>चन्कक है 


जिष्मी- 










(१९६ ) ब्रंतराज: । 





अललन्‍न्‍न्‍कक. 








पूरिका पबृतपाचितः।॥ 
निरेदनीया यत्किचिदयादेव्ये मयत्नतः॥ भकक्‍त्या मया सरेशानि यदतन्न॑ दीयते तव।तदगहाण दे 
महादेवरि ज्येष्ठे श्रेष्ठ नमोपस्ठु ते॥ ततः स्ठ॒त्वा महादेवीं स्बकाम ऋलप्रदाम्‌ ॥ ज्येष्ठाये ते 
नमस्ठम्य॑ं श्रेप्ठायें ते नमोनमः॥ डज्येष्ठे श्रेष्ठे तपोनिष्ठे धर्मेष्ठे सत्यवादिनि॥ ततः 
क्षमाप्य तां देवीं सतुवीत स्तवनोत्तमेः ॥ बाह्मणान्मोजयेत्पश्चात्सुवासिन्यस्तथा बहु ॥ दास्यो 
दासाश्व संभोज्या दीनानधकृपणास्तथा॥ देवी विप्रमठ॒ज्ञाप्य स्वयं खुखीत वाग्यतः॥ भ्रक्ष- 
कित्वा तथाचम्य देवी नत्वा पुन) पुन३ ॥ शयीत बहाचयेंण कु पोलातविसजेनम्‌ ॥ एवमेद 
प्रडुयाद्र ब्रतं तु परिवस्तरम्‌ ॥ ज्येष्ठाविसजनानले तु शर्करा वारिणि क्षिपेत्‌ ॥ दध्योदन तथा 
शाक॑ देय स्वस्य शुभाततये ॥ ज्येष्ठे देवि नमस्तुभ्यमलक्ष्मीनाशहेतवे । पुनरेहि वत्सरान्ते 
मम गेहे शुभमदे॥ एवं संग्राथ्य तां देवीं गीतवाद्मपुरःसरम ॥ अपूपवटकान्इच्चाद्राह्मणे- 
भ्यस्ततों द्विज ॥ कुयादेव अयत्ननेन सायं चाथ विसर्जयेत॥ विद्यार्थी प्राप्लुयाद्रियां ख्ीकामः 
ल्वियमेव च ॥ लक्ष्मीवाजायते मर्त्यः खली ठ मोदेत भतेरि ॥ विनायकेन सहित॑ देव्य॥ कुया- 
द्विसजेनम्‌ ॥ ( सो्वणी राजतीं ताम्ी मुन्मयीं वापि शक्तितः ॥ ब्तं स्वयं च कतवान्‌ पिद्धं 
चाप्यक्रताहगः ॥ ) देव्या महर्खय कथितं तवेदं॑ विधिश्व॒ मंत्राचनसंयुतस्तथा ॥ मंत्रोईपि 
सायुज्यकरों ब्रतस्थ तथा मया ते कथित सदेव ॥ इति स्कानदोक्तो ब्रतविधिः-- 
अयोद्यापनम्‌--उद्यापने तु प्रतिमां खुवर्णपलसंभिताम्‌ ॥ कृत्वा चाइदले पद्चे स्थापयेत्कलशो- 
परि ॥ तामब्निवर्णानिति च॒ मंत्रेण कुर्वीतात्रणाबाहवेद्रती ॥ नाममन्‍्त्रेण कवीतासन पाद्य- 
मथाध्यकम्‌ ॥ आपोहिष्ठाति तिछतनिरिसण्यवर्णाक्षतसतिः॥ अभिषेक चाचमर्न म शुपक चे 
कज्चुकीयू॥दर्त्र गन्धाक्षतान्पुष्पधूपदीपान्‌ प्रथत्वत:॥ नेवेद्याचमनीये च करोद्वतनक शुभम्‌ ॥ 


गोबूमयवशाल्यादिनानाइव्येश्व निर्मितम्‌ ॥ कृत्वा पद्ातिमात्राह्तु 





तथा गेंहूकी एक प्रसतति भरकी घीकी पूरी निवेदन करदे | चढी आनाइस् प्रकार गाने बजानेके साथ देवीकी प्राथना 
जो भी कुछ दो प्रयत्नके साथ देवीको निवद्न कर दें कि | करके पूआ और बडोंको ब्राह्मणोंको दे । इसके पीछे हूं 
है सुशानि मन भक्तिक साथ जो अन्न तुझे दिया है उसे ड्व्जि | इसप्रकार प्रयत्न पूवेंक करके सायकार विसजन 
के का न जी कच छू है. ०५ >> 
अहण कर । है सहादधि | है श्रष्ठ ।ह ज्येष्ठे ! तेरे लिय | करद, विद्या चाहनेवालको विद्या, ख्री चाहनेवाढेकी तब 
नमस्कार है इसके बाद सबकामोंके फलोंको देनेवाली महा- | मिंल जाती हैं, मनुष्य लक्ष्मीवान्‌ होजाता है; पतिमें सी 
३५, #* 5 ््‌ हि. ज्ञ 
दूवी जछ्ठाकी प्रार्थना करे, कि तुझे ज्येद्ठाके छिय नमस्कार | शेदित होती है, विनायकके खाथ देवीका विसजन करे 
हे तुझे श्रष्ठाके लिय वारबार नमस्कार हे हे ज्येष्ठ ! हे अड्डे! ( सोने चाद ते'बा ओर मिट्टी की शक्तिके अनुसार होनी 
हैं तपन्न निछठा रखनेवाली ! हे धर्मंम्र निष्ठा रखनेवाढी ! | "दिय) । दै वाइणन इस सिद्ध श्रतको स्वयेही इक 
है सत्य बोलनेवाली | तेरे लिय नमस्कार है। पीछे क्षमा- | 3 लोक असंगवसा दीखता हे । यह मैंने आपको बे 
पन्र करके उत्तम स्तोन्नोंस स्तवन करे पीछे ब्राह्मण भोजन | की महत्त्व कह दिया भनन्‍्त्रोंस पूजाके हा विधि डे 
था ' 7 सह डर ह- यह मे 
तथा सुवासिती स्लियोंको भोजन करावे दासी. दास,दीन, | “पी: नैपेका सन्‍्त्रभी साथुज्य करनेवाला है । यह मेन 
अन्ध पे जोंको ने 3 380 पक 2 | आपके लिये कह दिया है | यह स्कुृनद्‌ पुराणकी कह हु३ 
नव और क्ृप भौजन करावे। दुवीको ब्राह्मगर्के की विधि ९ इसमें तो सोनेकी 
लिय कहकर मोव हो भोजन करे, पीछे आचमन करके | जप तप हुई ॥ उद्यापन--इसमें तो सो 
देवीको बार लि ... | एकपलछकी प्रतिभा बनाकर अष्टद्छ कसकपर कंढ 
देवीको वारंवार नमस्कार करके ब्रह्मचय पूर्वक नींद छे, 


भातःदार विस हैं शक ऊपर स्थापित करें; “ ब्ाम्नप्निवर्णाम्‌ ” इससे 
रे जा३ क. 5 0 इसमकार प्रतिवर्ष देवीका ब्त | आवाहन करे। नाम सन्त्रस आसन पाद्य और अर्ध्यादिक 


ञ्र्य्‌ सह . *$ का 5 । आम का 
हक 8 अन्त रेतीकों पानीमें फेंक दे | निवेदन करे । « ओम आपो हिछठा ” इत तीनों ऋचाओंँसे 
ञ्‌ न! रू हिरे हु छ छः की गा 
ये कर थे उसके साथ दृध्योदन भी दे, है | तथा “ हिरण्यवर्णा ?! इत्यादि चार ऋचाओंस अभिषर्क 
_पष्ठाद तर, तेर छिय नमस्कार है। हे शुभके देनवाली!'मेरी | आचसन, मधुपर्क और कंचुकी दे । बख्र, गंध, अक्षत; हूँ। 
अलद्मीको तप्ट करनेके डिय एकवर्षके पीछे फिर मेरे बे नेदे नौय 
बंसल ऊवर्षेक पीछे फिर भेरे घर | और दीपोंको प्रयत्नके साथ दे, शुभ नेवेद्य, 5 3 कं । 





, १ अये. कोकी5बसेगत इत्र आति। 





व्तानि ] भाषाटीकासमेंतः ' ( २९७ ) 





ताम्बूलं दक्षिणां दत्वा ततो नीराजयेच्च ताम्‌ ॥ यस्यः लिंहो रथे थुक्तो व्याध्श्वापि महा- 
बल; ॥ ज्येष्टामहमिमां देवीं प्रपच्े शरण शुभाम्‌ ॥ इति आथयेत ॥ स्थापिलेध्यों ततः पश्चाद्धों- 
ममष्ठोत्तर शतम्‌। द्रव्येदेधिमधुक्षीरवृतेंः कुयाल्मयत्नतः ॥ तर्पणं च ततः कुर्यादेधिमत्रीविच- 
क्षण; ॥ ज्येष्ठाये नमः ज्येष्ठटां तपेयामि ॥ एवं सबत्र ॥ श्रेशायें” सत्यत्यें> कलिनाशिस्ये० 
विद्याये० वेनायक्ये० तपोनिष्ठाय० श्रिये० कृष्णाये० बहिएछाये नमः ज्पेष्ठां दर्पयामि | विसज्य 
च ततो देवीं ज्येष्टायाः प्रतिमां शुभाम ॥ क्ृष्णवस्धण संयुक्तामाचायांय निवरयेत ॥ वसखा- 
भरणमाल्यादिलपनेः पूजितं द्विजम्‌ ॥ प्रणिपत्य ततः पश्चात्तस्मे सव॑ निवदयेत्‌ ॥ ब्राह्मणान्भो- 
जयेत्पश्चात्स्वर्य छुखीत वाग्यतः ॥ बाह्मणांश्व ततो नत्वा याचयेत्सवेम डलम्‌ ॥ एवं सुवासिन्यों 
भोज्याः पूज्याः सर्वेसमुद्धये॥णव कूते ब्॒ते सम्यकू स्वेशातन्तिः अजायते ॥ धनधान्यसद्नद्धिश्व 
आरोग्य भवति धैवम ॥ इति श्रीभविष्योत्त पुराणे ज्येष्ठादेवीतव्रतोद्यापनं सम्पूर्णम्‌ ॥। 
दर्वाष्मीजबतस ॥ 

तत्रेव भाद्रशुक्ाए म्यां दर्वाष्टरमीवत भविष्ये ॥ अब सा पूवों आाह्या--“ आआबणी दुर्गनवमी 
दूवाष्टमिहुताशनी ॥ पूर्वविद्धा ठु कतंव्या शिवरात्रिबलेदिनम्‌॥ ” इति दृद्धयमवचनात्‌ ॥ 
शुक्काष्टमी तिथियां तु मासि भाद्रपदें भवेत ॥ दूवोष्टमीति विक्तेया नोचरा सा विधीयते ॥ 
इति हेमाद्रविक्षतपुराणससुश्बयवचनाव ॥ य३---समुहतें रोहिणेष्डम्याँ पूत्रो वा यदि वा परा॥ 
दूवोष्टमी तु सा कार्या ज्येष्ठां मूल च वर्जयेत्‌ ॥ इति तन्रेव परा कार्येःत्युक्ते तत्पूवेत्र ज्येष्ठामूल- 
योगेकर्मकालव्याप्त्यभावे च द्रष्टव्यम ॥ दूवोष्टमी तु सा कार्या ज्येष्ठामूलक्षेसंयुता ॥ तथा च- 





प्रापे माद्पदे मासि शुक्काप्टम्यां तु मारत ॥ दूवोमभ्यचेयेद्धकत्या ज्येष्ठां मूर्ल च वर्जेयेत्‌ ॥ 


करोद्ठतेन, ताम्बूठ और दृक्षिणा देकर पीछे नीरा[जन करे, | 
जिसके रथमें महाबलशाली सिंह और व्यात्रन जुतते हैं ऐसी 
परमशुभ ज्यष्ठा देवीकी मे शरण हे, इस सा प्रार्थना हक | गया है, इसे पूर्वा हेनी चाहिये क्योंकि बृद्ध यमने कह्दा है 
हक धपपना करके दिया हा #त्य हे कि आवणी दुर्गानवमी, दूर्गाष्टरमी, होडी, शिवरात्रि और 
सावधानीके साथ १०८ आहुति दे | पीछे बुद्धिमानडी इन | 
मेत्रोंस तर्पण करना चाहिये; ज्येज्लाय नमः--ज्येछ्ठाके लिये | 
नमस्कार है; ज्यष्ठां लपेय।मि--ज्येष्ठाको ठृप्त करता हूं, यह | 
पद्‌ हरएकके साथ छगाना चाहिये कि, अमुकीको नमस्कार 
ज्येष्ठाको ठप्त करता हूं, श्रष्ठाके छिय०; सत्याके छिये नम- | 


स्कार०; कलिके नाश करनेवाडीके छिये न०; विद्याके लिये 


स्यष्ठाको हप्त करता हूँ, इसके वाद ज्येष्ठाका विसजन करके 


जाती है । घन, धान्य; समृद्धि और आरोग्य मिलता है | 
बह अीभविष्य पुराणका कह्दा हुआ ब्येघ्वा देधीके व्रतका 





उद्यापन पूरा हुआ ॥ 
दूर्वाषट्रमीत्रत--भादरपद शुद्माष्टमीको भविष्यपुराणमें कहा 


बलि (दिवाली ) का दिन ये सब पूवविद्धा महण करनी 
चाहिये । हेमाद्विंम रखाहुआ पुराणसमुच्चयका वचन हे कि 
भाद्रपद महीनामें जो शुद्धाष्टमी हो उसे दूवाष्टमी समझे 
यह उत्तरा नहीं की जाती। जो यह लिखाहुआ है कि, अष्ट- 
मीमें रोहिण यानी प्रातःकाछके मुहतेमें पूरा वा परा जो हो 


न०, वैनायकीके लिये; तपमें निष्ठा रखनेवालीके लिये न० | उसको दूर्वोष्टमी समझता चाहिये, इसमें यदि ज्येष्ठा ओर 
श्रीक लिये न०, कृष्णाके लिय न०; त्रह्मिष्टाके छिय नमस्कार | 
| हैं कि; रोहिण मुह॒र्तमें परा जो हो तो उसको भी करनी 
शुभ प्रतिमाकों काले वस्रके साथ आघचायके लिये देदे, | 
वश्न आभरण एवम्‌ माछा आदि तथा छेपन आदिकोंसे पूज 
हुए द्विज आचायके लिय प्रणाम करके सब निवेदन कर.- | 
. देना चाहिये। ब्राह्मणोंकों भोजन कराके पीछे स्वयं भी | 
मौनी हो भोजन करे। ब्ाह्मणोंको दुण्डवत्‌ कराके सबके | 
भज्ुछकी याचना करे। इसी प्रकार सबी समृद्धियोंके लिये | 
घुवासिनी स्लियोंकी पुजा करनी चाहिये; मोजन कराना | 
चाहिये, इस ब्रतको भरी भांति करलेनेसे सबकी शान्ति | 


मूल हों तो न करना चाहिये, इनमें यह भी कहदिया गया 


चाहिये किन्तु पीछे पुराणसमुच्चयका वचन यह रखा हुआ 
है कि. उत्तरा ही नहीं जा सकती, तव इन दोनों परस्पर 
पिरुद्ध वाक्योंका केसे अन्बय होगा ? इसके लिय कहते हैं 
कि, यह कथन उस समयका समझना चाहिय जब कि, 
पहिले दिन ज्येश्ना और मूछका योग हो तथा कमकालकी 
व्याप्ति न हो तो परा छीजा सकेगी क्योंकि, वहीं यह छिखा 
हुआ हैं कि, ज्येष्ठा और मूलसे युक्त दूवाष्टमीकों सदा छोड 
देना चाहिये। इसकी पुष्टिम यह और लिखा हें कि, है 


| भारत ! भाद्रपद शुक्द्ाष्टरमोके दिन भक्तिसे दूर्वावूजन॥ 
| करना चाहिये, पर ज्येप्ठा और मूछको छोड देना चादिये। 


(२९८ ) ह ब्रलराज: । 


[ अंश्पी- 





ऐेख्धकें पिता दूवों हन्त्यपत्यानि नान्यथा ॥ भर्तुरायुहरा मुले तस्माततां परिवजेयेत्‌ ॥ इति.. 
नत्रेव ब्रतनिदेधात्‌ ॥ इृदमगस्त्योदये कम्याके च न कायम ॥ शुक्कमाद्रपदे मासि दूवासंज्ञा 
तथाष्टमी ॥ सिंहाके एवं क॒र्तव्या न कम्याकें कदाचन ॥ सिंहस्थे सोत्तमा सूर्यडतद्विते मुनि- 
सत्तमे इति मदनरत्ने स्कानदोक्तेः ॥ अगस्त्य उद्िति तात पूजयदमूतोद्धवाम) बवेधव्य पृत्रशो्॑ 
च दशजन्मानि पंच च ॥ इति तत्रेव दोषोक्तेश्व ॥ यदा- तु भाद्रशुक्काष्टम्यामगस्त्योदयस्तदा 
तत्पूष कष्णाष्ठम्यां कार्यमाशुक्षपक्षाभावेषपि पोर्णिमान्तमासेन भाद्गरपदमात्रलाभात्‌ ॥ यदा तु 
भाद्रपदोईधिकस्तदा सिंहाक एवेति उदाहतवचनात्‌ ॥ अधिमासे तु संप्राप्ते नमस्य उदये मुनेः ॥ 
अवांगेव व्रत कांस परतो नतु कुत्रचित्‌॥ इति निणयदीपके स्कान्दाच्वाधिके एव कतेव्यम्‌ ॥ इदे 
ह्लीणां नित्यम । या न पूजयते दूवा मोहादिह यथाविधि ॥ त्रीणि जन्मानि वेधव्य लभते नात्र 
संशयः ॥ तस्मात्संपूजनीया सा प्रतिबंध वधूजनेः ॥ इति पुराणसमुच्ययात्‌ ॥ यदा तु ज्येष्ठा- 
दिकं विनाष्टमी सवेधा न लग्यते तदा तत्रेवोक्तम्‌ -.॥ कतेव्या चेकभक्तेन ज्येष्ठामू्ल यदा 
भवत्‌ ॥ ज्येष्ठामभ्य चेयेद्धकत्या न वन्ध्य दिवस नयेदिति॥ इति भविष्योत्तरे5तुकल्पेनालुष्ठान 
नतु स्वेथा लोपः॥ अथ दूव्वाष्टमीव्रतं हेमाद्रों भविष्ये---विष्णुरुबाच ॥ बहान्भाद्रपदे मासि 
शुक्काष्टम्याम्ुपोषितः॥पूजयेच्छ ड़कर भकक्‍त्या यो नरः श्रद्धयान्वितः ॥ से याति परम स्थान यत्र 
देवखिलोचनः ॥ गणेश पूजयेद्नस्तु दूबया सहितं झुने ॥ गणिश। शिव ॥ फलोनां सकलेदिंग्ये- 
गेन्धपुष्पेविलपने: ॥ दवा पूज्य तथशानं मुच्यते सर्वेपातकेः ॥ शुचौ देशे प्रजातायाँ दूवोयां 
ब्राह्मणोत्तम ॥ स्थाप्य छिड्ढे ततो गन्धेः पृष्पंपे:ः समचयेत्‌ ॥ खम्रेनारिकेलेश्र मात॒लिड्गफले- 
घ्तथा ॥ पूजयेच्छइकरं भक्‍त्या दूधोयां विधिवद्विज ॥ दध्यक्षतेह्वि जश्रेष्ठ अध्य दव्यात्रिलोचने ॥ 
दूवाशमीण्यां संपूज्य मानवः श्रद्धययान्वितः ॥ स वे सुकृतजन्मा स्थात्सवेदेबेस्तु वन्दितः॥ 





ज्येष्ठानक्षत्रम दूवापुजन करनेस अपत्योंका नाश करती हैं 
दूसरी वरह नहीं करती,,मूल्म पूजनसे पतिकी आयुको नष्ट 
करती है, इस कारण इसे छोड देना चाहिये | यह वह ही 
ततका निषध मिलता है । इस अगभत्यके उद्यमें कन्याके 
सूर्यमें न करना चाहिये. क्योंकि मदनरत्नमें स्कान्दका 
प्रमाण दिया हुआ है कि, भाद्रपद शुक्छाष्टमीको दूर्वाष्ट्रमी 
कहते हैं उस सिंहके सूर्य ही करना चाहिये, कन्याके 
सू्यम न करे; क्योंकि यहअगस्त्यके उदय न हॉनेपर सिंहके 
सूर्य उत्तम होती है । अगस्त्यके उदयमें पूजनेस क्‍या दोष 
होता है | इसपर वहांदी छिखा है कि, हे तात ! जो अग- 
स्यके उद्यम दूवाका पुजन करती हें वह पंद्रह जन्मतक 
बेधव्य और पुत्रशोकको देखती हें। यदि भाद्रपद शुक्छा- 
प्रमीको अगस्त्यका उदय हो तो उससे पहिले क्ृप्णाष्टमीमें 
ही करलेना चाहिय क्योंकि, शुक्छपक्षके अभावमें भी 
पौर्णिमान्त सानसे साद्रपद तो मिल ही जायगा जब दो 
भादपद्‌ हों तो लिहके सूये हों तबही करना चाहिये ॥ यह 
व्रत स्लियोंको अवश्य करना चाहिये, क्योंकि पुराणसमुच्न- 
ये लिखा हुआ है कि, जो ख्री मोहस यहाँ दूरवां पूजन 

नहीं, करती वो तीन जन्म विधवा होती हे इसमें सन्देह 

नहीं है, इस कारण वधूजनोंको चाहिये कि प्रतिवर्ष 


पूजन करें| यदि ज्यष्टोदिकके बिना किसी तरह भी 
अष्टमी न मिले तो उसीमें पूजन करे; यह पुराणसमुचयमें 
लिखा हुआ है कि, ज्येष्ठा और मूलके विना अष्टमी न मिढे 
तो एकभक्तवालेकी चाहिये कि, विधिपूवक ब्येष्ठाका 
ब्रत करे दिलको व्यथ न गमावे; यह बचन पुराणसमुच्यप्ें 
भविष्योत्तरका हैं यह अनुकल्पविधिसे अलुष्ठान हे ऐसा न 
हो कि, कमका छोप हो जाय-ब्तप्रक्रिया दुाटमोकी हेमा" 
द्विने भविष्यस लिखी है विष्णु भगवान्‌ बोले कि; देवहमन: 
भाद्पद शुद्धाष्टमीको ब्रत किया हुआ जो पुरुष, अद्धापूवक 
भक्तिके साथ शंकरका पूजन करता है वो उस परम स्थानकी 
चढा जाता है जहाँ शिव भगवान्‌ विराजते हैं । हे मुने! 

दूर्वाके साथ गणेशका पूजन करला है, गणेश शिवको कहा 
हैं, सब पवित्र फछों और गन्ध पुष्प और अनुलूपनोंस 
शिव और दूर्वांका पूजन करके सब पापोंस छूट जाता है 
हे ब्राह्मणोत्तम | पवित्रस्थरूमे पेदाहुई दूर्वापर; लिंग, स्थापित 
करके गन्ध पुष्प और घृपसे पूजनकरे ।+हे हविज ! हि 
नारिक्रेछ/ और मातुर्िंगके फलोंसे विधिपूवक भक्तिक 
साथ दूवापर शकरका पूजन करे, है द्विजश्रेष्ठ | द्धि और 
अक्षतोंके साथ त्रिलोचनके छिय अध्ये दे | मनुष्य दूर्वा 
ओर शमीसे श्रद्धाकं साथ पूजन करके सुकृतजन्मा होजाता 


१ फछानां सकछः फलेरित्यथेः ) 


ब्रतान, | भापादाकासबलः ।! ६ ९८ 9 
विद्या प्राप्नोति विद्यार्थी पुत्रा्थी पुत्रमाप्तुयात ॥ धर्मानाप्नोति धर्मा्थों कन्यार्थीं लभते च॑ 
ताम्‌ ॥ मनसा ययदिच्छेत तत्तदाप्नोति मानवः ॥ य एवं पृजयेद्दूवों भतेर्श मानवः फलेः ॥ 
स सप्तजन्मपापोधेसंच्यते नात् संशयः ॥ कृतोप्बासः सप्तम्यामष्ठम्यां पृजयेच्छिवम ॥ 
दूरवांसमेतं विप्रेन्द्र द्यक्षतफलेः शुभः ॥ दूवोमेत्र-त्वं दूव5स्ृतजम्मासि वन्दितालि झुरेरपि ॥ 
सोभाग्य सन्तति देहि:सर्वकायंकरी भव ॥ यथा शाखाप्रशाखानिर्विस्ततासि महीनले ॥ तथा 
विस्वृतसन्तान देहि त्वमजरामर ॥ तंलछिद्गमन्त्ररीशानमचेयेत्‌ प्रयतःझुचिः ॥ ततः--संपूजये- 
द्विपान फलेनानाविधेद्विंज ॥ अना्रिपकमश्नीयादत्र॑ दधि फल तथा ॥ अक्षारलव्रणं ब्ह्मन्ना- 
श्ीयान्मघुनान्वितम्‌ ॥ दद्यात्फलानि विश्रषु फलाहारः स्वये भवेत ॥ प्रणम्य शिरसा दूवा शिव 
शिवमुपादलुते ॥ एवं यः कुरुते भकक्‍त्या महादेवस्थ पूजनम्‌॥ गणत्वं यात्यसों ब्रह्मन्छच्यते 
ब्रह्महत्यया ॥ एवं पुण्या पापहरा अष्टमी दूवेसंज्ञिता ॥ चतुणोमपि वणानां स्रीजनानां 
विशेषतः ॥ इति भविष्योक्त दूवांष्टमीव्रतम ॥ अथादित्यपुराणोक्ते दूधोध्टमीद्रते)।दीपूजनमुक्तम॥ 
शुक्काष्ट्म्यां तु संप्रात्ते मासि भाद्रपदे तथा॥ दूवाप्रताने: खुश्वेतसुत्तराशामिगामिनम्‌ ॥पूजयेद 
गृहमानीय गन्धमाल्याल॒लेपनेः ॥ फलेमूलेस्तथा धूपदीपेश्वाथ विसर्जयेत ॥ अनशक्‍़तिपक्त यत्सवे 
नेवेद च कर्थचन ॥ भोक्तव्यं च तथा बह्मन्नग्निषकविवर्जितम ॥ दूवाकुरस्थां संपएज्य विधिना 
यौवनंश्रियम्‌ ॥ योवन स्थिरमाप्नोति यत्रयत्राभिजायतें ॥ भविष्योत्ते तु विशेषः ॥ अष्ठम्यां 
फलपुष्पेश्च ख्जूरनोरिकेलकेः ॥ द्राक्षमोदकपिष्टेश्व बदरेलेकुचेस्तथा ॥ नारिड्रेजेम्चुकेश्वेव बीज- 
प्रेश्व दाडिमे ॥ दध्यक्षतेश्व स्लनग्मिश्वच॒ धूपनेबेद्रदीपकेः ॥ मेन्त्रेणानेन राजेन्द्र श्वणुष्चावाहितो 
नप ॥ दत्वा पिछ्ानि विपभेयः फल च विविर्ध प्रमो ॥ तिलपिष्टकगोधूमधान्यपिष्टानि पाण्डव ॥ 





है वो सब देवोसिवन्दना करने योग्य हैं । विद्यार्थीकोविद्या, 


| वो हे ब्रह्मन ! वो शिवका गण बन जाता हैं, एवं नह्महत्या 
धनार्थीको धन; पुत्रार्थीको पुत्र, धर्मार्थीकों धम औरकन्या- 


से भी निमुक्त होजाता हैं। इस प्रकार यह दुर्वा्टरमो पुण्या 


धींको कन्या मिलजाती है, मनुष्य जो जो वस्तु मनसे 
चाहता है उसे वह सब मिलजाती है, जो (संलुष्य फलोंस 
शिव और दुर्वाका इसप्रकार पूजन करती है वो सावजन्मों 


उपवास करके अष्टमीको शिवका पूजन करे। हे विग्रेन्द्र ' 


मुझे भी खूब पुत्र पोत्रादिकोंसे बढा । नियम पूर्वक पवि- 


इरह सिद्ध हुए अन्न दूधि और फरछोंका भोजन करे, क्षार 


ओर छवणको छोडकर हे अह्यन्‌ ! मधुके साथ भोजन | 
| इस मंत्रस पूजन करे, हे राजन्‌! सावधान होकर सुन, हे 
| प्रभो ! पिष्ट और अनेक तरहके फछ ब्राह्मणोंके छिए दे, 
| तथा है पाण्डव ! तिरछ, पिष्टक,गोघूम,वान्य और पिष्ट दे । 


करे, त्राह्मणोंकों फछ दे तथा स्वयंभी फलाहारही करे, 
शिरस शिव और दूर्वाको प्रणाम करके कल्याणको पाता 
हैं, जो इस प्रकार भक्तिके साथ महादेवका पूजन करता है 





है तथा पापोंके नाश करनेवाली है, एकके ही लिए नहीं 
किन्तु चारों वर्णोंके छिए तथा विशेष करके ब्वलियोंके लिए 


ः हे | पुण्यजनक और पापनाशिनी हैं । यह श्रीभविष्यपुराणका 
के पापोंसे छूट जाता है इसमें सन्देह नहीं है। सप्तमीको | 


कहा हुआ दूर्वाष्टमीका ब्रत पूरा हुआ ॥ आदित्य पुराणके 


की [शः द्र . | कहे हुए दूर्वाष्टमीके ब्रतमें श्रीपूजनन कहा है कि, दूवोंअष्ट - 
द्धि अक्षत और अच्छेफछोंस दुर्वासमेतको पूजनाचाहिये । | शीके दिन भाद्रपद मासमें उत्तर दिज्यामें कैली हुई दुर्वाकी 
दूर्वाका मंत्र-हे दूवें तू अमृत जन्मरा हैं; सुर और असुर | उुताको घर छाकर गंध, माल्य और अलुलेपन, धूप, दीप, 
दोनोंन तेरी बन्दना की है, मुझे सोभाग्य ओर सन्‍्वति दे | 

ठथा सब कार्मोंके करनेवाली हो ।हे अजर अमर दूवें !| 


कप हि ध्फ्‌ 
जेंस त्‌ शाखा और पर शाखाओंसे विस्तृत हैं उसी तरह | व कर 
मी गीर पर इ के | अभ्निपककों छोडकर सब कुछ खालेना चाहिये । दुवांकुरभ 


; ५ जो ख्््क 
हे लत आर पूः ० है इल न्ममें उर 
ब्रताके साथ शिवके मन्त्रोंस शिवका पूजन करना चाहिय। | रहनेवाली योवनश्रीका पूजन करके जिस ३ जन्मसे उत्पन्न 


े २३ 5 खा कक] ३ 
हैं विज ! इसके बाद अनेक तरहके फर्ोंस ब्राह्मणोंका | 
पूजन करना चाहिये,अप्विके पकाये हुएको छोडकर दूखरी 


फछ और मूछोंस पूजकर्‌ विसजन कर देना चाहिये । जो 
०६ रे २25 ४० दक 
भी विना आगके पकी हुई हैं वे सबही नेवेद्य है, है लहान्‌ : 


होता हे स्थिर यौवनको पाता है ॥ भविप्योत्तरमें तो विशेष 
कहा हैं कि,अष्टमीके दिन फल पुष्प खजूर,नारिकेल द्राक्षा, 


| मोदक,पिष्ट,बदर ,लकुच,ना रिह्ञ/जम्बुक, वीजपूर, दाडिस) 


दृधि, अक्षत, माछा; धूप, दीप/नेवद्य, दीपक इनसे स्व दूर्वे” 





१ समापीति पाठान्तरम्‌ । २ सर्किंइति पाठ:। ३ यौवनावस्थदूर्वोकुरगतांश्रियमित्यथ:) ४ ल्वंदूवे5मृतनामासीत्यनेन । 


अपर जक । 





( ४०० ) ' 


| अष्टमी- 





है अमिशक ललित 0 क, ४७ 





22808: "६:४६ 75/4 ण्की.४८ 04%. 











+ ३० ता! 
रा मा १ मा भा ४७४७४७७७७७॥७॥७॥/७॥७॥/ए/ए/७॥/"/"श/शशशशआ/श/श/श/श//श//आशआआआआशशशशशशशशशशशशश्शशशआ््श/ शरण" 
फ्ै 
६.० 


प्रोजयित्वा सुहन्मित्र स्व बन्धुं स्‍्वजनांस्तथा ॥ ततो सुज्जीत तच्छेष॑ स्वयं अंद्धासमन्वितः॥ 
कंतंव्या चेकभक्तेन ज्येष्ठा मल यदा भवेत्‌ ॥ दूवोमभ्य्चय्रेद्धक्त्या न वन्ध्यं दिवस नयेत पक्ष 
भाद्रपदस्येवं श॒क्काष्टम्यां युधिष्ठिर ॥ दूर्वा्टमीजतं पुण्य यः करोतीह मानव ॥ न तंस्य क्षय- 
माप्नोति सन्‍्तातिः साप्तपोरुषी॥नरदते वद्धंते नित्य यथा दूबों तथा कुलम॥इति दूवाष्टमीवतम॥ 


महालक्ष्म्ीतरतम ॥ 


अथ भाव्शक्काष्टमीमारभ्य षोडशदिनपयेन्त॑ महालक्ष्मीवतम्‌ ॥ तच्चाद्धराचमतिक्रम्प 
वर्तिन्यामष्टम्यां कार्यम्‌ ॥ तदुक्त चन्द्रमकाशो स्मृत्यन्तरे-- अधरात्रमतिक्रम्य वर्तते योत्तरा 
तिथिः ॥ तदा तस्यां नरेः कार्य महालक्ष्मीत्रतं सदा ॥ अर्स्याँ ज्येष्ठायुतायां प्रारम्भः कार्य: ॥ 
तथा च स्कानदें- मासि भाद्रपदे शुक्के पक्षे ज्येष्ठायुताष्टमी ॥ प्रारब्धव्यं ब्रत॑ तत्र महालक्ष्म्या 
यतात्मानेः ॥ तदभावे केवछायामपि कार्यम्‌ ॥ समापन तु कृष्णाएटम्याँ चन्द्रोदयव्यापिन्यां 





कार्यम-- “चर्द्रोदयव्रते चंच 


तिथिस्तात्कालिकी भवेत्‌” इत्युक्तेः ॥ दिनद्वयेः चहद्रोदये सरवे- 


एसत्वे च “कृष्णपक्षेष्टमीचेव' इत्यादिवाक्यात्पूरवैव अपरदिन चन्द्रोदयोत्तर त्रिम्ह्ता चेत्परेव ॥ 


तदुक्त मदनरत्ने पुराणसमुच्चये--पूर्वा वा परविद्धा वा ग्राह्मा 


चन्द्रोदये सदा ॥ त्रिम्नह॒तातु 


सा पएज्या परतश्रोध्वेगामिनी । अशभ् पूजनम्‌ू--महालक्षिम समागच्छ प्मनाभपदादिह ॥ पश्चोप- 
चारपूजेय॑ त्वदथ दंवि संभ्ता ॥ आवाहनम्‌ ॥ आलयस्ते हि कथितः कमल कमलालये ॥ 


कमले कमले हास्मिन्‌ स्थितिं त्वे कृपया कुछ ॥ स्थापनम ॥ 
सन शुभम्‌ ॥ गहाणंद मया दत्त भक्तियुक्तेन चेतसा ॥ 


कमल पाहि मे देबि स्वर्णसिहा- 
आसनम्‌ ॥ गड़ादिसलिलाधार 


तीर्थमन्ताभिमन्त्रितम्‌ ॥ दूरयात्राश्रमहर पाद्य॑ में प्रतिगह्मताम्‌ ॥ पाद्यम्‌ ॥ तीर्थोदकेम॑हा- 


अपने सुहृद मित्र, वेधु और खजन इनको मोजन कराके 
पीछे जो वचे उसका आप श्रद्धाकेसाथ भोजन करे ज्येष्ठा 
और मूल हो तो एक भक्त करके ब्रत करे । मक्तिके साथ 
दूवोका पूजन करे, समयको व्यर्थ न खोये | हे युधिष्ठिर ! 
इस श्रकार भक्तिके साथ जो मनुष्य भाद्रपद शुह्मष्टमीको 
दूर्वात्रव करते हैं उनकी सात पीढीतक सन्‍्तति नष्ट नहीं 
होती । जेसे दूर्वा बढ़ती हे उसी तरह उसका कुछ भी 
बढता है, एवं आलंदित रहता है । यह दूर्वाष्टमीका ब्रत 
पूरा हुआ ॥ 


महालक्ष्मी त्रत--भाद्रपद गुझ्काष्टरीसे छंकर सोलह 
देनतक सह होता हूं, यह ब्रत आधीरातको अतिक्रमण 
फरके वर्तनंदाली अष्टमीमें करना चाहिये, यह चन्द्रप्रकाइ! 
न्‍न्थमें दूसरी स्प्ृतियोंस कहा गया हे कि,उत्तरातिथि अध' 
(त्रिका अतिक्रमण करके वर्तें, उसमें मनुप्योंको चाहिये 
के, महालक्ष्मी ब्रत करें । ब्येप्ठानक्षत्रयुत अष्टमीमें प्रारंस 
$रना चाहिये, यही स्कन्दपुराणमें लिखा हुआ है-भाद्रपद 
गसके शुहृपक्षम जब ब्येष्टा नक्षत्रके साथ अष्टमी हो तो 
पतात्स पुरुषोंको उससें ब्तका प्रारंभ कर देना चाहिये । 
यदि ब्येप्रानक्षत्रके साथ अष्टमी न प्रिल्ले तो केवछमें भी ब्रत 








करदेना चाहिय ओर समाप्ति तो चन्द्रोदयव्यापिनी क्ृष्णा- 
ष्टमीमें ही करनी चाहिये क्योंकि ऐसा कहा गया है कि, 
चन्द्रोदयके ब्रतमें तात्कालिकी ( चन्द्रोद्यव्यापिनी ) अप्ठ- 
मीमें त्रत करनाचाहिये । यदि दो दिन चन्द्रोद्य व्यापिनी 
हो अथवा दोनोंहीँ दिन चन्द्रोदय व्यापिनी न हो, ४ और 
कृष्णपक्षमें अष्टमी” इत्यादि वाक्‍्योंसे पूर्वाकाही ग्रहणहोवा 
हे । अपर दिनमें यदि चन्द्रोदयक वाद तीन मुह हो तो 
परकाही ग्रहण होता है, यदि मद्नरत्नने पुराणसमुश्ययसे 
कहा है कि, पूर्वा हो अथवा परविद्धा हो सदा चन्द्रोद्यके 
बाद तीन मुहूत हो, तो पूज्य है इससे और अधिक समय 
रहती हो तो और भी अच्छा है। पूजन-हे महालूक्षिम ! 
पद्मनाभके पदोंसे यहां आ, हे देवि ! यह परश्वोपचार 
पूजा तेरे लिये रखो हे, इससे आवाहन; हे कमछालये ! 
तुम्हारा आहृय कमछ कहा गया हे । हे कमले! इस 
कमलपर आप कंपाकरके विराज जाये, इससे _स्थापन; है 
कमल : मरी रक्षाकर, हे देवि ! मैंने परम भक्तिसे यह शुभ 
स्वर्णसिहासन दिया है आप इसे ग्रहण करें । इससे 
आसन; गंगा आदिके पानीका आधार तीर्थ मन्त्रोंस अभि- 
मंत्रित दूरकी यात्राके श्रमको हरनेवाले मेरे पाद्यकों मरहण 
तीज... *रिये'इससे पाथहे देवेशि: हे देवताओंका उपकार करने" पाय,हे देवे शि! हे देवताओंका उपकार करने- 





१ अष्टमीति शषः । 


उनके... जन 


ब्रतानि, । आाषाटीकप्सलेलः । 


(३०१) 












दिव्येः पापसहारकारकेः ॥. अध्य ग्रहाण देवेशि देवानामुपकारिणि ॥ अध्यंम्‌ ॥ आचाम्य 
जगदाधारे सिद्दि लक्ष्मि अधत्यिये ॥ चपले देवि ते दत्त तोय॑ ग्रह् नमो5स्तु लत ॥ आचमनम्‌ ॥ 
पयो दि घत॑ क्षोद्रं सितथा च समत्वितम्‌ ॥ पखाझुतरूरेला<: कुछ स्नाने दयानिधे ॥ पथ्चा 
मृतम्‌ ॥ तोय तव महालक्ष्मि कपूरागुरुवासितप् ॥ तीर्थेभ्यः सुत्तमानीतं स्नानाथ मातिगुहा- 
ताम ॥ स्नानम ॥ सूक्ष्मतन्तुभवं वस्ते निर्मित विश्वकमंणा ॥ लोकलजाहरं दवि गृहाण छुर- 
सत्तमे ॥ वस्यम ॥ कव्चुकीम ॥ नानासोभाग्यद्रव्यम्‌ू ॥ मलयाचलसंभूतन॑ नानापन्नगरात्ति तम्‌ ॥ 
शीतल बहुलामोद चन्दनं प्रतिगृह्मयताम्‌॥ चन्द्नम्‌ ॥ मिलत्परिमलामोद मत्तालिकुलसंकुलम ॥ 
आनरिद नन्दनोत्पत्न पद्माये कुसुमं नमश॥।पृष्पयाणि। अथ नामपूजा॥ श्रिये न०्लह्ष्म्य ०वरदाये ० 
विष्णुपत्ग्ये - क्षीरसागरवासिन्ये० हिरण्यरूपाये ० सुवर्णमालिन्ये० पद्मवासिन्ये” पद्म्रियाये० 
मुक्तालड़ारिण्ये० सूयोये० चन्द्राननाये० विश्वमूर्त्य० सुकक्‍त्ये” सुक्तिदातंय " ऋद्चे० समृद्धचे० 
तष्टये" पुष्टय० धनेश्वर्ये ० अद्धाये० मोगिन्ये 'मोगदाये० घाउ्ये० ॥गन्धसभारसन्नद्कस्त्रीमोद- 
संभवम॥ सुराखुरनरानन्द घूपप देवि ग़हाण में शधूपम। मार्तेण्डमण्डलःखण्ड्चन्द्रविम्वाम्रेतेज 
साम्‌॥ निधान देवि दीपोष्यं निर्मितस्तव भक्तितः ॥ दीपम्‌ ॥ देवतालयपातालभूतलाधार- 
धान्यजम्‌ ॥ षोडशाकारसंभारं नेवेद्य ते नमः सदा ॥ नेवेद्यम्‌ ॥ स्तानादेक बियायापि यतः 
शुद्धि मजायते ॥ एतदाचमनीय च महालक्ष्मि विधीयताम्‌॥ आचमनम्‌ ॥ करोद्गतनम्‌ ॥ 
पातालतलसंभूत वदनाम्भोजनूषणम्‌ ॥ नानागुणसमाकीण ताँदूले ऋतिगृह्मताम्‌ ॥ तांबूलम्‌ ॥ 
हिरण्यगर्मेति दक्षिणाम्‌ ॥ नीराजने खुमंगल्य॑ कर्प्रेण समन्वितम ॥ चर्द्राकेबादेसदर्श महा- 
लक्ष्मि नमोस्तु ते। नीराजनम॥।शार देन्दुकलाकान्तिः स्निग्धनेत्रा चतुछुजा ॥ पद्मझुग्मा चाभ- 





वाली | पापोंको नष्ट करनेवाले महादिव्य तीथोंक पानी: 
द्वारा संपादित अधेको ग्रहण करिये, इससे अध्य; है संसा- | 
रकी प्यारी ! हे जगतकी आधार | हे ल्द्षिम | हे सिद्धि ! | 
है चपे | हे देवि ! तेरे लिये तोय द्‌ दिया है इसे प्रहण | 
कर तेरे लिये नमस्कार हैं; इससे आचमन; “ पयोद्धि ! | मुगन्धि आरही है जिससे कि, सुर असुर और महुप्य 
इससे पंचासृतस्नान; हे महालक्षमि ! यह पानी कपूर और | ६ हि 
अगरसे सुगन्धित हे तीथोंसे छाया गया है आप इसे | 
स्नानके लिये ग्रहण करें, इससे स्नान; “ सूक्ष्मतन्तु ” इससे | 
वद्र; केचुकी, अनेक तरहके सोभाग्य द्रव्य, मछय गिरिपर 
पेदा हुआ अनेक तरहके सपोसे रखाया अलन्त सुगन्धित | 
एवं ठण्डे इस चन्द्नकों ग्रहण करिये, इससे चन्दन, सगम | 
होते ही सुगन्धिसे तरकर देनेत्राछा जिसपर कि मत्त भाँरा' 
गैजार कर रहे हैं आनन्द करनेवाछा नन्‍्दनसे उत्पन्न हुआ | 
यह फूल है, पद्माके लिये नमस्कार इसे अहण करिये, इससे | 
पुष्प समपण करना चाहिये ॥ नाम पूजा-अब नामोंसे पूजा | 

कक, रे & +७,% न भ. ४ 
कहेंगे, नाममंत्र मूलमें दिये हैं पहिले (ओं श्रिय न० ' ऐसा | 
लिखा है, विन्दीका मतछव नमः से है यानी 'श्रिये नमः | 
श्रीक लिये नमस्कार इसी तरह जितने मी नामसंत्र हैं 
उनका भाषामें अथ करती बारके छिये ' नमस्कार ? इतना | 
और छगानेस नाम मंत्रका अर्थ हो जायगा | श्री, छक्ष्मी, |. 
बरदा, विष्णुपत्ती, क्षीरसागरवासिनी, हिरण्यरूपा, सुब- | 
णे्नठिती, पद्मवासिनी, पद्मग्रिया, सुक्तालड्ारिणी, सूर्य्या, । 





चन्द्रानना, विश्वमृति, मुक्ति; मुक्तिवात्री, ऋद्धि, सम्रद्धि, 
तुष्टि, पुष्टि, धनेश्वरी, अद्धा, भोगिनी; भोगदा, धात्री ये 
लक्ष्मीजीके माप हैं | ऊपर लिखे नाम मंत्रोंसे पुष्प चढाने 
चाहिये | गैधके संभारस भरा हुआ जिसमें कि; कस्तूरीकी 


सबको आनन्द पहुँचता है, हे देवि ! मेरे उस धूपकों प्रह- 
णकर, इससे धूप; हे दवि ! आपकी भक्तिस यह दीपक 
बनाया है | यह माठंण्डके मण्डछके खण्ड तथा चन्द्रबिम्ब 
और अश्नि तथा तेज इनका निधान है, आप इसे ग्रहण करें; 
इससे दीप, देवाछय, पाचाछ और भूतरूपर होनेवाले 
धान्योंस बनाया गया सोलह तरहका नेवद्य हें इसे म्रहण 
करिये इससे नेवे्य; स्नानादि करके भी जिससे शुद्धि होती 
है, हे महालर्ृक्षमि ! इस आचमनीयको आप करें: इससे 
आचमन; क रोइतेन; पाताछके ऊपरसे पेंदा हुआ जो मुख- 


| कमछका भूषण हैं ऐसे अनेक गुणोंसे व्याप्त इस ताम्वूछको 


प्रहण करिये, इससे ताम्बूल;  हिरिण्यगर्भ ' इससे द्क्षिणा; 
है महालक्षिम ! तेरे लिय नमस्कार है | खुसंगलीक कपूंरसे 
समन्वित एवं चन्द्र सूचे और वायुके समान इस नीराज- 
नको ग्रहण करिये, इससे नीराजन; शरद ऋतुके चन्द्रकन 
लाकीतरह कान्तिवाली अ्रेमपूण नवनोंवछ्ी चतुसुजी तथा 
दो हस्तकूमलोंसे कमछ तथा एकमें अभय और एकहाथ 


| ३०४ है बलराज: । 


| अहमौ<« 























यदा वरव्य्रकराम्बुजा ॥ पृष्पाअलिम ॥ बविष्णोव॑क्षप्ति पद्मे च शद्भे चक्रे तथाम्बरे । लक्षिम 
देवि यथासि त्वे मयि नित्य तथा भव | प्राथना ॥ उत्ताये दोरक बाहोलेक्ष्मीपार्च निवेदयेत ॥ 
लक्ष्मि देवि गहाण त्वं दोरक्क॑ यन्‍्मया धृतम्‌ ॥ बे संपूर्णतां यातु कृपा कार्यों मयि त्वया॥ 
कथा श्रत्वा खुबर्ण च दच्यादाचाययदक्षिणाम्‌ ॥ एवं निवर्त्य विधिवत्पूजनं बहुकश्रियः ॥ चातु- 
वैण्स च सम्भोज्य यथाशकक्‍त्या च दक्षिणाम्‌ ॥ दीपाँश्व पोडशापूपान्गोधूमानां द्विजातये ॥ 
दत्वा तत्संख्यया भुक्त्वा रात्रों जागरणं चरेव्‌ ॥ चन्द्रोदय च सजखाते दष्याद्घ्य ततो ब्रती॥ 
मन्त्रेणानेन विभेन्‍द्र शंखेनाम्वुफलान्वितम्‌ ॥ नमोस्तु ते निशानाथ लक्ष्मीश्रातनंमो5स्तु ते।ध्रत॑ 
संपर्णता य [तु गह (णाध्स नमोस्तु ते चन्द्रयाध्यम्‌ !। प्रातविसजयेदेवीं मंत्रेणानेन छुब्रत ॥ 
पड़ुज देवि संत्यज्य मम वेइमनि संविश ॥ यथा सुपुत्ररृत्योह़ सुखी स्याँ त्वम्सादतः॥ 
विसजनम्‌ ॥ इति पूजनम्‌ ॥ अब कथा॥ स्कन्द उवाच ॥ सोमाग्यजनन स्त्रीणां दोमांग्य- 
परिकृन्तनम्‌ ॥ परमेश्वर जनक तद्भत॑ व्रहि शद्गर ॥ १॥ इश्वर उवाच ॥ साधु साथु महावाहो 
घत्पृष्टोएह त्वयानघ ॥ तत्तेषहे संप्रवक्ष्यामि व्रतानासत्तमं॑ वब्रतम्‌॥२॥ येन चीर्णन न नरो 
ढुगेति याति कहिंचित्‌ ॥ खुभगा दु्भंगा वापि खियो न विधवा गुह ॥ ३॥ अस्ति देव्या व्रत 
पुण्य महालक्ष्म्याः पढानन ॥ नारीणाँ च नराणां च सवहंखापह तथा ॥ ७ ॥ स्कन्द उवाच ॥ 
दव्याश्वरितमाहात्म्य मत्ये केन अकाशितम्‌ ॥ विधान कीद॒शे ब्रहि ध्तस्यास्य महाविभो ॥५॥ 
शड्गर उवाच ॥ देवासुरमभ्चुद्ध पूणमब्दशत पुरा ॥ वत्रे खुशणामधिपे देवानां च पुरनदरे ॥ ३ 
तत्र देवेमंहावीयनारायणबलाश्रयात्‌ ॥ असुरा निर्जेताः सर्वे पातालतलमाययु३ ॥9॥ केचिह्नडं 
गताः केवित्मविष्ठटा वरूणालयम्‌ ॥ गिरिदुग समाश्रित्य केचित्तस्थुरमहाबलाः ॥ ८ ॥ तत्र कोला- 





ब्र्‌ देनमें ही व्यस्त है, इससे पुप्पाजलि: ह लक्ष्मी देवि ! 
जेस आप विष्णुके वक्षस्थल, पद्म, शख, चक्र और अबरमें 
सदा विराजी रहती हो इसीतरह मरेमें मी सदा रहो,इससे 
प्राथना समपंण करनी चाहिये । डोरेको उतारकर छक्ष्मीक 
पास रखे कि, है देवि ! जो डोरा मन घारण किया था 
उसे तू प्रहणकर, मुझपर कृपा करिये, भरा ब्रत पूरा 

जाय । कथा सुनकर आचाय्य दक्षिणामें सोना दे, इस 
प्रकार विधिके साथ ब्रतको पूरा करके बुक और सौमा- 
ग्यशालितनी स्लरियोंका पूजन करके चारों वर्णोंके छोगोंको 
भोजन कराकर शक्तिके अनुसार दृक्षिणा दे सोलह 
सोलह दीपक और गेहूके पूओंको ब्राह्मणके छिये दे | 
सोलही आप खाकर रातमें जागरण करे । ब्रतीको 
चाहिये कि घन्द्रोदयके समय अध्ये दे; हे विम्रेन्द्र ! 
शेखमें पानीमर उसमें फछू डाछू इस मंत्रस दे कि, 
हे निशाके नाथ ! तेरे लिये नमस्कार है, हे लक्ष्मीक आतः । 
रे छिय चमसकार हैं, मरा ब्रत पूरा हो जाय अध्य महण 
कर, इससे चन्द्रगाकों अच्य दे । हें सुब्रत | देवीकी प्रति- 
माका विसजन करदे | उसका यह संत्र है कि, हे देवि ! 
कमलकी छोड़कर मेरे घरमें प्रविष्ट होजा, जिससे में 
आपके प्रसादस पुत्र भृत्योंके साथ सुखी रहूँ, इससे विस- 
2000 निनन नमी 


जन करना चाहिय। यह पूजन पूरा हुआ ॥ कथा-स्करू 
बोले कि, हे शकर | सौभाग्यके कारण तथा स्तियोंके दोर्भा: 
ग्यको काटनेवाले एवं परमेश्वयेके जनक किसी ब्रतको 
कहिये ॥१॥ ईश्वर बोले कि, हे महाबाहो ! बहुत भच्छा है 
बहुत अच्छा है द्वे निष्पाप | जो तुमने पूछा बह सववोत्तम 
है।सतुझे ब्रतॉमेंस एक उत्तम ब्रतको कहता हैँ ॥२॥ 
जिसके करनेसे मनुष्य किसी तरह कभी भी दुगतिको 
नहीं प्राप्त होम, दुभगा सुभगा होजाती हे। है गुह ! कभी 
विधवा ही नहीं होती ॥३॥ है घडानन ! सहालू&्ष्मी दवीका 
पुण्यत्रत है वो स्त्री पुरुष दोनोंके सब दुखोंको नष्ट करता 
है ॥४॥ स्कन्द बोले कि, दवीके चरितका माहात्म्य मनुष्य 
छोकमें किसने प्रकाशित किया ? है महाविभो | इसका 
क्या विधान है ? यह कहिये ॥५॥ शेऋर बोले कि, पहिंडे 
सौवषतक देवासुर संग्राम हुआ था, छडाईमें असुरोका 
अधिप बृत्र तथा दवों का प्रधान इन्द्र था ॥ ६ ॥ उस युद्ध 
नारायण भगवानके बढके आश्रयसे महाबढी बने देवता" 
ओंने असुरोंको जीव लिया सब असर पाता तह चल गये 
॥७॥ कुछ लंका चलढेगये, कुछ वरुणके आलयमें प्रविष्ट हो 
गये; कोई बलवान मिरिदुर्गंका आश्रय लेकर बेंठ गये॥6। 
उनमें एक महाबली महा वीय्येवान्‌ कोछामुरनामक। 






३ दीपान्षोड्शपिंडांश्विति कचित्पाठ: | 


#+॥ 


५ * 
चियणएतएशण आय एटा, ताफएा धमभादु पु 
बना बल पं ० || र्् हे इक व्रत शी, 5 || 
ड़ धो! है ५ आया ६ ३४७ ५ जि] + ] 


लि के आत 2 


सुरो नाम महावीयें! महावलः ॥ गोमसतं दुर्ग ढुगे गिरिमाथत्य निर्मेय॥९॥ या राजकन्यका 
लोके रूपवत्यों महागुणा; ॥ आनीय गिरिदुर्गस्थोी रमयामास सर्वेश। ।| १० ॥ रमगित्वाक्षि- 
पत्तत्र कामरूपी विहृद्दमः ॥ एतस्मित्रेव काले ठु आगतो मुनिसत्तमों ॥११॥ शअ्रतमभावसं- 
पत्नों पुलसत्यो गौतमस्तथा ॥ तीर्थयात्रामसगेन श्वत्वा वाक्यं. जनास्थातः ॥ १२ ॥ कोलासुरो- 
त्पातजन्य॑ कन्याहिेतोः शिखिध्वजः ॥ ताउूचतुजन सर्वमगस्त्योष्टित महासुनिः ॥ १३॥ य्रेन 
तोयनिधिः पीतो विन्ध्याद्रिश्व निपातित॥वातापील्वलनामानों देत्यों येन विनाशितों ॥ १७ ॥ 


त॑ गच्छामो वर्य सर्वे कोलाखुरवधाय च ॥ इत्यामन्च्य जनाः सर्वे गत्वा तमभिदाद् 


म्िदाद्य च ॥ था 


उचुः सर्वे यथाव्रत्त कोलासुरविचेष्टितम्‌ ॥ तच्छुत्वा भ्गवानाह मेत्रावहणिरग््यधीः ॥१६॥ 
छृष्टिस्थितिविनाशानां कारण भक्तवत्सलाः ॥ रामस्याद्रों तपल्‍्यन्ति बह्मविष्णुमहेश्वराः ॥२७॥ 
तिख्रः सन्ध्याम[तमत्यस्तेवां शुश्रषण रत ॥ आवश्य ता महालक्ष्मी: शक्तिरूुपेण संस्थिता 
॥ १८॥ स्वशक्तियुता देवी लोकानां दितकाम्पया ॥ इत्युक्तास्त्वारितं गत्वा कोलाखुरवधा 


का 90 


प्ये ॥ १९ ॥ 


निवेद्य निव्चिल तेम्यस्तस्थः प्राअलूयों जना; ॥ तच्छुत्वा निखिल तेभ्यो ब्रह्मवि- 


रुमहेश्वराः ॥ २० ॥ सन्ध्याजयं समाहय वाचं प्रोचुजनेश्वराः ॥ वन्दारुसुरव्न्देन्द्र- 
मोलिमाणिक्थमण्डना ॥ २१ ॥ हरिष्याति महालक्ष्मी ३ कोलाखुरं रिपुम्‌ ॥ भगवत्यो मूलि- 
मत्यो दण्डशलादिभिवरेः ॥ २२ ॥ आय्धेविंविधेः कृत्वा जयमाप्स्यथ संयखुगे ॥ य्रुष्मा्क तु 
सहायेषसौ युष्मत्क्रोधसमुद्धवः ॥२श॥ भूतनाथों भूतपूर्वो वः सहायो भविष्यति ॥ इत्यक्तास्त्व- 
रितं गत्वा रूर थु कोलराक्षसम्‌ ॥१५॥ निरूष्य च पुरी देव्यो जगज्ञेजेलदुम्बनाः ॥ मिन्दनन्‍्त्यश्र 
दिशां बन्द ब्घेयन्त्यश्व तत्कुधषम्‌ ॥ २५ ॥ कोलाखुरोएपि नच्छुत्वा मोत्पपात महासनात ॥ 


कि 


रोषणः ऋषधताम्राक्षो मेरोरिव मुगान्तकः ॥ २६॥ हस्त्यश्वरथपादातचतुरद्भबछान्वितः ॥ 


नििलिलिलि मिनी किलिमिनिकीन दल लि फनी लि नि नल कील नल लि कि लकी निज जि मिनभि लडकी लि लिन निकल कलम ज जल ड अल जनक जन «नम 2३३३७४७७४७७७७४७७७७/७७॥/"शआआआशशआआआआआआशआआश/शश#शशशशशशशशशशशआशशशशशश##श#शशथश#श#े#शओस्‍््#्न्!श# 
असुर था, वो पोमन्तनामके दुगगेध गरिरिदुगंका आश्रय | महारूक्ष्मी उनमें ्रविष्ट होकर शक्तिखूपसे संस्थित है 


लेकर निभय हो गया।॥ ९ ॥ छोकमें जो राजकन्याएँ 
परम गुणवती तथा सुन्दर थीं सब ओरसे उन्हें अपने गिरि- 


दुर्गम छाकर रमग करने छगा॥ १० | वो कामरूपी | 
आकाशका विचरनेबाला, राजकन्याओंस रसण करके | 
उन्हें दुगम फेक देता था, इसी समय दो श्रेष्ठ मुनि चले | 
आए ॥११॥ ये बेदके प्रभावसे सम्पन्न थे एकका नाम पुलछ- | 
स्व तथा दुसरेका नाम गौतम था, इनका आना तीथयात्राके | 
लिए था, इन्होंने मनुष्योंसे सब समाचार सुने १२॥ | 


कि, कोछाछुर कन्याओंके छिए कितना उत्पात करवा है, 


हे शिखिध्वज | उनसे सब जनोंसे कहा कि, अगस्य महा 
मुनि हैं॥ १३ ॥ जिन्होंने समुद्रको पिया था, विन्ध्याचछ | 
लिटा दिया था, वातापी और इल्बछ नामके दो दैत्योंको | 
भी उससे सारा था ॥ १७ || हम सव कोछासुरके वधके | 
ढिए उसके पास चलें इस प्रकार सलाइकरके सबने अगर- | 
स्यजीके पास पहुंच उन्हें प्रणाम किया ॥ १५॥ सबने 
कोछाघुरके सब कोछ कारनामे कह सुनाए उसे सुनकर | 
परमबुद्धिमान अगस्यजी कहनेछगे ॥ १६ | कि, रचनः | 


खिति ओर विनाशके कारण भक्तवत्सछ बल्या विष्णु और 





|| १८ ॥ वो देवी सवशक्तिमती छोकोंके कल्याणके छिये 
ही ऐसा कर रही हैं। इतना कहनेपर वे सव वहां शीत्रही 
उपस्थित हो गये क्योंकि, य तो कोछासुरकी मौत चाहते थे 
॥ १९ ॥ तोनों देवोंसे सब कुछ कहकर हाथ जोडकर 
खड़े हो गये उस सव समाचारको सुन, त्रह्म। विष्णु और 
पहादेवजीने ।। २० ॥ तीनों :सन्ध्याओंको वुदाकर यह 
बचत कहा कि, नम्र सुरोके सम्तुदायोंके इन्द्रॉके मौछिके 
माणिक्यों का चरणोंक सण्डनतवाली ॥ २९ | महालक्ष्मी 
युद्धमे कोछासुरको मारेगी। आव सब ॒मूर्तिमतीही रह 
अच्छे दण्ड शूछादिक || *२ ॥ एवं अनेक तरहके आयु- 
धोंको ले युद्ध जिजय प्राप्त करें. आपकी सहायता तो 
आयके क्रोधस उत्पन्न हुआ ॥ २३।॥ पहिला भूवनाथ 
( भेरव ) है यह होगा इसप्रकार कहनेपर शीघ्रही पहुँच 
कर कोलछनामके राक्षसको घेर छिया ॥ २४ ॥ देवी 
पुरीको रोककर बदलकी तरह गजन रूगी जिससे दिशायें 
शूज उठी और इसका क्रोव॒ बढने छा ॥ २५ ॥ कोछा- 
सुर उस शव्दको सुन कोबस छालूआर्ख करके अपने बड़े 
आधपनसे इस प्रकार उठकर झपटा जसे क्रोचन मारे छाह 


भहेशजी रामके पंवपर तप्श्चर्य्या करते हैं ॥ १७॥ तीनों छाल नेत्र किए हुए ववर शेर मेरुसे झपठता हो ॥ २६ ॥ 
सन्ध्यायें शरीर धारण करके उनकी सेवार्में छगी हुईं हैं, | वो हाथी घोडा और रथके सवार तथा पद्ाति इस चारों 
शा «न ननमिलोमिल कील लनि न मिनी न मिनी निकली नि लिन लिन लिन नी लि वन कीश किक लिन ज डक न न तअ जम. ३2 आए: ॥३३७७४७७७७७७७७॥॥॥/एएए"एश"श"शशश//श/आआआआशआआआशशशशशशशशणएणएाएणएए दापत्ताद/ककशेलालभ्रपककपपंाकपन पाक छल मबेटेधउ& कक दा ऋष्कलमर 5 कदाकाप 5 -रडअसातफमकााेपताकतयालताज कक, 





१ सहेत्यपिपाठः । ३ तान्मरतिगच्छवेत्युक्ता: । ३ भेरवः । 


(३०४ ) बरलेराज१ | 


























3905: 80820) 0 कनित/ ३80 कि 7020 207: 
अल ुां३ 0 मअ अबराम ३३७ आाए्एणणशएश्ाणणाणणाणणणणाणा ७७७७७ ७॥७णाणाण 





निर्ययों पतनाद्योई कालिझाया इवाशनिः ॥ २७ ॥ सकुण्डलशिरखाणः कवचीश्ञतवाणायिः ॥ 
बद्धरी रंउजीजाज) कुद्धो बत्र इवापरः ॥२८॥ ततो राक्षससेर्र तद्भतनाथेन संगतम्‌ ॥ देवता- 
रिमेहोल्कामियद्ध चक्रेतिभीषणम्‌ ॥२९॥ महारावेधीमधोषेबाणेः केड्रारनिःस्वनेः ॥ गोखराणां 
निनद्श्व लोकः शब्दमयोःसवत्‌ ॥३०॥ जहि मिनन्‍्धीति बदतां घावतामितरेतरम्‌॥ वे समर 
घोर॑ मुष्टासष्टि कचाकचि ॥ ३१ ॥ उद्धते राक्षतवल्ले भूतनाथोी महाबलः ॥ ममद्द राक्षसानीक॑ 
शरवर्षश्व दारुणः ॥ ३२ ॥ हत॑ दृष्ठाखुरब्ल छुद्धः कोलासुरो रण ॥ अभिद॒त्य गदापाणिस्ताड- 
पामास भेरवम्‌ ॥ ३३ ॥ ययो मच्छा महाबीय॑स्तेनाभिहतमस्तकः ॥ ततो देव्योडइतिदेगेन 
द्यामेदुदुप॒रुद्धतग्‌ ॥ ३४ ॥ जिशलेरमिजब्तुस्तं पद्िशेश्र व्यधातवव्‌॥ सुष्टिनिस्ताड्यामासु- 
नेखरेथ्व व्यदार्यन्‌॥३५॥पादवातेः समाजब्तुः सिंहः करिवरं यथा॥ सकुण्डलशिर-खाणो दष्टोष्टो 
_्तलोचन॥३६॥क्तभुकुटिवक्रोएसो राक्षसस्ता सुहुसुंहु॥गदया ताडयामास शिरःकण्ठांस- 
कृक्षियु॥२०।वभज्जुस्तां गदां ताश्तु हसन्त्यः संनदाकुला॥ततो घहु्धरों भूत्वा बाणजालमवा- 
किरत॥२८॥तासां शरीरममारे निन्‍दव्छरपुरोगमेशननाद बद्धवेरोडसौ हृदयंचानिनच्छरेः ॥३९ 
ततः छुद्धतरास्तास्त त॑ पादे जगहुस्ेशम्‌ ॥ आकाशे त्रामयित्वा तु चिहक्षिपुगेगने कृधा ॥४०। 
कोलाखुरोउपि पातितो यावद॒त्थात॒मिच्छति ॥ तावन्निम॑थ्य लक्ष्मीसत पादाभ्यां प्रत्यपीडयत्‌ ॥ 


॥ ४१ ॥ तत्पादपीडितो देत्यो विवृत्थ नयने रूुशम्‌ ॥ सुक्तकण्ठस्वन॑ कृत्वा ततो मोहसुपेयि- 


वान॥४२॥ ततो दवाः सगन्धवों मतुष्या ऋषयोपउस्तुवन्‌॥ 
॥४३॥ देवदुर्‌इुभयों नेदुए पुष्पव्ष्ठिः पपात है ॥ दिशः 


देवनाथाश्व देव्यश्व ननृतुशसंमदाकुलाः 
प्रसेहमंरुतो ववुमन्दस्थिरं जगत ॥४श। 


धर 


तुरासरशिरोरंत्नापीडितांध्रिसरोरुहाः ॥ देव्यो द्व्यिन यानेन यान्ति कोलापुरं प्रति ॥४५॥ 
2७७७७७७७७॥७॥७॥७७७७७७७७७७७एा०००७७७७४ नह“ /कक तक १७ ॒कलललन्‍ ४४४७७ तप... लक शा, मलिक कक नरक कि नकिक नकल गग इिि 


प्रकारकी सेनाओं के साथ था, अपने नगरसे युद्धेके छिए 
'स प्रकार निक॒छा जैसे काछी मेघमालाओंसे वज निऋक- 
वा हो || २७ ॥ यह कुण्डछ और कवच पहिने हुए था 
शरपर शिरखाण था निखज्ग पीठपर था, तीर फेंकनेक 
म्यकी हाथ और अंशुदियोंकों बचानेवाढी पढ्टियां बांधे 
7 वह ऐसा दीखता था मानों दूसरा वृत्रकद्ध हो रहा हो 
| ९८ ॥ उसकी सेना मूतनाथके साथ मिडगई, अपुर- 
मूह आगकी बडी भारी उस्काओंकों ढेकर भीषण युद्ध 
रने छगा | २९ ॥ बढ़े भारी रावोंत्ते, मयझ्ूर घोषोंस 
कारके शब्द करनेत्रा़ बागोंस, गो और गद्होंके शब्दों 
+ छोऊक शब्दमय होगया ॥ ३०॥ मार दो मार दो भेद: 
भेद दो इस प्रकरर कहते हुए एकपर एक झपठते थे, 
सा घुस्सी, वार पकड़ा पकडीका घोर समर उत्तरोत्तर 
ढने लूगा॥ ३१ || महाबरशाढी भूतनाथने जब यह 
दवा कि, राक्षसोंकी सना कुछ उद्धत हो चडी हेतो 
(णोंकी कठोर वषसि उसका मर्देनकर दिया || ३२॥ 
उसमें अपनी सनाको मरता देख कोलछातुरको बड़ा रोष 
या झट सैरवके ऊपर झपटकर गदाका वार किया। 
| रे३े ॥ उससे उसका माथा फूट गया जिससे मैरवकों 
[उ्छो भआगयी देवियों यह देख उद्धत कोछासुर पर एकद्म 
पपर्टी ॥ ३४ ५ जिशुलोंसि उस अभिहत किया पद्टिशोंसि 
$खका असिघात किया मुक्कॉोंस उसे खूब ताडना दी 


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नाखूनोंसे खूब नोंचा ॥ ३५ ॥ जैसे शेर अपने पओोसे बडे 
सारे हाथीकी दुरुस्‍्ती करता हे, इसी तरह छात्रोंसे खूब 
ठीक किया । तब वो असुर अपने होठोंको चवा आंखोंको 
छालठ २ करके ॥ ३६ ॥ मुंह और भअ्रकृटियोंको चढा, देवि- 
योंके झिर कण्ठ कन्घे और पेटपर बारबार गदा मारने 
छगा ॥ ३७ ॥ युद्धमदस हँसती हुईं देवियोंने उस गदाकों 
तोडडाछा, इसके बाद वो घनुष ले हर बाण वर्षा करने छगा 
॥ ३८ ॥ उसने.बडे २ तीरोंसे देवियोके मर्म छेडदिए तथा 
वसही तीरों से उनके हृदयको छेदकर अत्यन्त वैर मानने- 
वाला यह हष प्रकट करनेछुगा ।। ३९ ॥| उसके इस हाढूसे 
देवियॉन क्रोध करके झट उसके पैर पकुड ऋोधस आकाश 
से घुमाकर फेंक दिया॥४०॥ जबतक कि, कोछासुर उठना 
चाहता है उसी आकाश्म लक्ष्मी उस पेरोंस मथकर दुःख 
पहुंचाती हे ।| ४१ ॥ उसके चरणोंसे पीडित हुआ दैलय 
अपनी आंखॉोंको एकदम खोछकर गछा फाड सिंघाड मार 
कर भरगया ॥ ४९ ॥ उसके इस प्रकार मर जानेपर मारे 
आनन्द॒के देवनाथ, मनुष्य, गन्धर्व और ऋषि स्तुति करने 
लग, देवियां नाचने छूंगीं ॥ ४३ ॥ देवता दुन्दुमि बजाने 
रे पे छगीं 
लग, पुष्पवृष्टि गिरने छगी, दिशाएँ प्रसन्न होगयीं, मन्द 
मन्द्‌ हवायें चछने छगीं, जणत सित होगया ।। ४४॥ सुंर- 
और असुरोंके शिरके रत्नोंस पीडित है चरणकमर जिनके 
ऐसी देवियों दिव्य विमानसे कोछापुर गयीं॥ ४५॥ 


३ निःसाणलनिनदेश्येत्रेयपि क्वचित्पाठः | २ रततच आअत्पदा महंबढ इसपि पाठ । 


भाषाटीकासमैलः) । ( ३०५ ) 



















आायाण्ती पह्तजां वीक्ष्य मुक्तपादाब्जशूद्धलः ॥ तुष्दाव परया रवत्या राजकन्यागणो सुदा॥४ दा 
राजकन्या ऊडुः ॥ वन्दाहवीरसरवन्दक्रीट्रत्नरोचिश्छटानिकरकाल्पेतरत्नदीपम्‌ ॥ देवि 
त्वदीयचरणण शरण जनानां सेबामहे सकलमाइलघर्चनाथ ॥ ४७ ॥ इबड्ुद्धकेरवदइलायनलोच- 
नाये गण्डोछसच्चटुलकुण्डलमण्डिताये ॥ राकाशशिक्षतिभदाननकोमलाय तस्ये नमः कमल- 
लोचनवकछभाय ॥ ४८ ॥ सद्धक्तकल्पलतिकां हरिकण्ठभूबां केयूरहेमकूटकोन्ज्वऊछकड्ुणाहाम्‌ ॥ 
संसारसमगरसुखे पततो ममाश देहि त्वदीयकरयष्टिमनड्रमातः ॥४९॥ दृट्टा! देवि जनास्त्वयाषि 


विविधा ब्रह्माधिपत्य॑ गता विष्कुर्वक्षद्धि या चकार तरला लीलाव्जमालाश्रमम्‌ ॥ कलशाद्वेमह्॒त- 


त्वदीयवरणद्वन्द्राब्जसवारतं कारुण्यामृतसारप्रितदर्श मामम्व पाहीखवरि ॥ ५० ॥ मछीमफुछ- 
कुसु मोज्ज्वलमध्यभागधम्मिल्ठभारजिततासकचित्रिताता ॥ उत्ततहेमनिकषोज्ज्वलकायकान्ति- 
लक्ष्मी: स्वयं मणमता अियमातनोतु ॥ ५१॥ इति सतुता महालक्ष्मीमेक्तानामिष्ठदायिनी ॥ 
योगिन्योद्य मविष्यध्वामिति तासां वर ददों ॥ ५२ ॥ दृष्ठा तास्तु झुदा देवी सारूप्यं तास्वदाप- 
यव्‌ ॥ तामिनिषेविता देदी वर वय ददौ सुदा] ॥ ५३ ॥ राजकन्पास्ततः सवा सुक्ताः स्वपुर- 
मायथु+ ॥ ततःप्रद्भति लोकेय पूज्यासताः स्वेकामदाः ॥ ५४॥ ताश्वतुःपष्टियोगिन्यों महा- 
लक्ष्मीपरिप्रहात ॥ नृत्यत्ति निवहेस्तत गीतवादित्रनिःस्वनेः ॥ ५५॥ पुरो देव्या महालक्ष्म्याः 
करहाटपुरे निशि ॥ एवेप्रभावा सा देवी विष्णुरामा बडानन ॥ ५६॥ बनूत सवभूतेडु विख्याता 
कमलालना ॥ प्रभावम ध्यां देव्याश्व नाले वक्‍ते चतुर्खुख/ ॥ ५७ ॥ ब्रतस्यास्थ विधान च शशजु 
मत्तो विधानतः ॥ मासि माद्रपदे शुके पक्षे ज्येष्ठाशताष्टमी ॥ ५८ ॥ ऋररब्धव्य त्र्त तत्र महा- 
लक्ष्म्या यतात्ममिः ॥ करिष्यामिं व्रत देंवि त्वद्धकस्त्वत्पताथगः ॥ ५९ ॥ तदविन्नेन मे यात॒ 


ना ाम "अ»कननक-ककमनवनाअ करके ना “नमन नकल अाज-क्‍3क्‍५230.... >डलनमल्‍न अन्‍ननन के. हटा रतन. रोल ममता ककिनिनननिनानननकननागप जन कननत अमन शा 
पल 
लक 














दी] 


| खिले हुए फूलोंस उज्ज्वल हैं; मध्यभाग जिसका ऐसे केश 
| पाशके भारसे जीत छिया हें तारे खिला हुआ अश्र जिसने 
एवम्‌ अच्छे तपाये हुए सोनेकी जांचके पत्थरपरकी छकी- 
करनेको आये हुए जिनम्र दौर देव समुदायके किरीटर - | रक्की वरह शरीरकी उज्बछ कान्विवाडी छक्ष्मी देवी स्वयही, 
त्नोंकी आभाके निकरस बनादिया हे रत्न दीप जिनका; | प्रणाम करनेवाले जनोंको श्रीका विस्तार करे ॥ ५१ ॥ 
ऐसे आपके युगछ चरणोंको हम भजते हैं जो जता को | भक्तोंके इष्ट देनेवाी महालूब्सीकी, जब इस प्रकार प्राथ- 
शरण हैं हम चाहती ई कि, हमारे मंगल) आपक चरगात | वबाकी गई तो उसने यह बरदिया कि;,जाओ भभी योगिनी 
वें ॥४७॥ खिल हुए कमझकी तग्ह बडे ९ है नेत्र जिसके | दोजाओ ॥ ५२ || उन्हें देखकर देवीने आवन्द्स अपना 
गण्डस्थछपर छटकते हुए हिल रहे हैं कुंड जिसके चन्द्र सारूप्य दे दिया एवम्‌ उनसे सेवित हुईं उखने बरने योग्य 


ठ5 गयी है पैरोंसे छ्ठछा जिसके ऐसा राजऊन्याओोंका 
गण छक्ष्मीको आता हुआ देखकर आनंदसे भक्तिपूत्रक 
स्तुति करने छगा ॥४६॥ राजकन्याएं वोछीं कि, नमस्कार 


५ 2 2 पर ण गे 
माके मुका विलेका हैं कोमछ मुख जिसका एसी परस 


शोभामयी कमठनयनकी प्यारी कमछाके छिय नमस्कार 
हैं।॥ ४८ ॥ अच्छे भक्तोंकी कस्पवृक्षकी छता, भगवानके | 
कटक तथा | 
है छक्ष्मीदेवि ! | 
सेसाररूपी समुद्रके मुखमें गिरते हुए मुझे; हे प्रगुज्ञको मा : | 
अपने हाथका अवर्ंब दे दें ॥॥४९%॥ है देवि ! आपने भी | 
अनेको जनोंको देखाहे आपने त्रह्माका तो आधिपत्य प्राप्त 
किया जिस चंचलने विष्णु मगवानके वक्षस्थलमें खेलको | कक ड 
। शक्ति नहीं रखता ॥| ५७ ॥ में इसके ब्रतकों विधानके साथ 


केठकी अकृति, केयूर ( कड्टूछे ) और देसके 
उज्बछ कंकर्णोंसे अच्छीतरह सुशोमित 


का 


कप्तल्माढाका भ्रम करदिया । छेशरूपी अभनिसे जडछे हुए 
जो जन आपके दोनों चरणारविन्दोंकी सेवाम छगे ड5 है। 
हे अम्ब | हे ईश्वरि ! कारुण्यरूपी अमृतके सारसे भरे 
हुए नन्नोंप ऐसे अपने जनोंकी रक्षा कर || ५० ॥ मल्ीके 


कल 





बरभी आतननन्‍्दस दे दिया।॥ ५३ | राजऊन्यायें छूटकर 


| अपने घर चढी आईं, उसी दिनसे वे छोकर्स पूजी जाने 
| छगीं और सब कामनाओंकी देनेवाली हुई | ५७ ॥ वे 


चोंसठ योगिनी महालूक्ष्मीके परिग्रहरूं हां गानेबजानेके 
निनादोंके साथ समुदायसे नौचती हैं|] ५५ || करहाट- 
पुरमे रातको महारूक्ष्मीजीके सामने, है षडानन | विष्णुकी 
प्यारी लक्ष्मीदिवीका यह प्रभाव है ॥ ५६ ॥ सब भूतोंमें 


लक्ष्मी प्रसिद्ध होगई इसके प्रभावको जह्मा भी कहनेकी 


कहता हूं आप सुने, भाद्रपदशुद्धा व्वेध्ठानक्षत्र सद्दिता अष्ठ- 

मीके दिन।५८॥नि्यमवालोंको महालद्मीके ब्रतका प्रारम्भ 
8] कक के है 3 दें 5 नें 

करना चाहिय कि,हे दवि'म तेरा भक्त तेरेमें परायण होकर 





(३०६) नतराजः | 








है 


समातिं त्वटमसादतः ॥ इत्युश्वाय ततो बद्धा दोरक॑ दक्षिणे करे ॥ ६० ॥ षोडशम्रन्थिसहित॑ 
गण पोडशलनियुंतम्‌ ॥ ततोरत्वह महालक्ष्मी पूजयेन्रियतात्मवान्‌ ॥ ६१ ॥ गन्धपुष्पेः सनेदेदे- 
याँवत्कृष्णाएमीदिनम्‌ ॥ तस्मिन्‌ दिने तु संप्राप्ते कुयाइुद्यापनं ब्रती ॥ ६२॥ वस्व्रमण्डपिका 
कृत्वा माल्यामरणशोमभिताम्‌ ॥ त्रिभूमिकां ता खुलक्ष्णां नानादीपेश्व शोमिताम ॥ ६४॥ 
सतस्नः प्रतिमः कृत्वा सोवर्णीस्तत्स्वरापणीः! ।। स्नपन॑ कारयेत्तासां पश्वामृुतविधानतः ॥६५ 
षोडशेरूपच रेश्व धूपदीपादिभिस्तथा ॥ जागरण तु कतेव्यं गीतवादित्ननिःस्वनेः ॥ ६५॥ 
ततो निशीये सम्प्राप्तेभ्युदितिड्मुतदीथितों ॥ कृत्वा तु स्थण्डिले पद्म सबपडड़ों प्रपूजयत ॥ ६६॥ 
दद्यादष्य च रागेण ब्रती तस्मे समादितः ॥ क्षीरोदाणबसम्भूत चन्द्र लक्ष्मीसहोदर ॥ ६७॥ 
पीयूषधाम रोहिण्या सहितोहू्य गृहाण वे ॥ श्रीसूक्तेन ततो वहां पद्मानि जुहुयाच्छुनिः 
॥ ६८॥ पायसं चव बिल्वानि तदलाभे तथा पृतम्‌॥ ग्रहेभ्यश्रेव होतव्य॑ समिशच्चरुतिला- 
दिकम्‌ ॥ ६९ ॥ जातुभ्पामवनि गत्वा मन्त्रेण प्राथयेत्ततः ॥ क्षीरोदाणंवर्सभूते कमले कम- 
लालये ॥ ७० ॥ प्रयच्छ सर्वेकामान्मे विष्णुवक्षःस्थलालये ॥ पुत्रान्देहि यशो देहि सौर्य॑ 
सोभाग्यमेब च ॥ ७१ ॥ कालि कालि महाकाल विकरालि नमोःस्तु ते ॥ जेलोक्यजनतनि 
त्राहि बरदे भक्तवत्सले ॥ ७२ ॥ एकनाथे जगन्नाथे जमदस्निप्रियेनंघे ॥ रेणुके त्राहि मां देवि 
राममातः शिव कुरू ॥ ७३॥ कुरू श्रियं महालक्ष्मि हाश्रिय त्वाशु नाशय ॥ मस्‍्मेरे- 
तेमहालक्ष्मीं भ्राथ्य ओतिययोषिताम्‌ू ॥ ७४॥ चन्दन तालपत्र॑ च पुष्पमालादिक॑ तथा॥ 
नवे शरावे भक्ष्याणि क्षिप्त्वा बहुविधानि च ॥ ७५ ॥ प्रत्येक षोडशैतानि पूगपूर्णानि चैव हि॥ 
तानन्येन समाच्छाद्य ब्रती दष्यात्समन्त्रकम्‌ ॥ ७६९॥ क्षीरोदार्णवर्सभूता लक्ष्मीश्रन्द्रसहोदरी | 
ब्रतेनानेन सन्तुष्टा पीयतां विष्णुबक्कणा ॥ ७७ ॥ इन्दिरा प्रतिगह्माति इन्दिरा वे ददाति च॥ 








ब्रव करूंगा॥५९।|आपकी कपास वहनिविन्न समाप्त होजाय 


ऐसा कहकर दाँये हाथमें डोरा बाँध ।। ६० ॥ उसमें सोलह 
गांठ भौर इतनी ही छर होनी चाहिये | पीछे रोज समा- 
हित चित्त होकर महारूक्ष्मीको पूजा करे ॥६१॥ गंध पुष्प 
ओर नेवेद्स जबतक क्ृप्णाप्टमी न आये तबतक रोज 
पूजता रहे उसदिन तो ब्रतीको उद्यापन ररना चाहिय।।६२॥ 
वखका एक छोटासा मण्डप बनाये उसे माछा और आभ- 
रणोंस सुशोभित करे अनेकों दीपक जाके इसमें तीन 
भूमिकाए हों एवं सुन्दर हो ॥|६३॥ लक्ष्मीकी चार सोनेको 
प्रतिमा वनावोप ध्वामृतके विधानसे उन्हें स्नानकरावे॥६४।) 
सोलहों उपचार तथा धूपदीप आदिसे पूजन करे,गानेव जा- 
नेके साथ रातमें जागरण करना चाहिये ॥६५॥ जब आधी- 
रातकों चन्द्रमाका उदय होजाय तब स्थण्डिक्पर पद्म 
बनाकर पडज्गनपूजन करना चाहिये ॥ ६६॥ एकामग्रचित्त 
होकर ब्रतीकों अध्यं देना चाहिए कि,हे क्षीरसमुद्रसे उत्पन्न 
होनेदाले लक्ष्मीके भाई! ॥ ६७ ॥ हे अम्ृतके घर ! रोहिणी 
सहित, अघ्ये प्रहण कर, इसके वाद पवित्र हो श्रीसृक्तस 

आम कम्रलोंका हवन करे | ६८ ॥ पायस और बिट्व 


। इनक अभाज़से घृतको हवन करे । प्रहोंके लिये समिधू | 


देती और इन्दिरा ही छती हैं हम तुम देनवाले 


चरु और तिढकी आहुति दे ॥ ६९॥ जानु ( घोंटू ) को 
भूमिपर टेककर मंत्रस प्राथना करे कि, क्षीर समुद्रसे उल्तन्न 
हुई कमलके आसनपर विराजमान होनेगली कमढे!॥७०॥ 
है विष्णुभगवानंके वक्षस्थछकों स्थछ करनेवाली ! मुझे सब 
काम दे तथा यश, सौख्य, सौभाग्य और पुत्रोंको दे।७१॥ 
हे कालि ! फालि | हे महाकाहि ! है विकरालि . तेरे लिये 
नमस्कार है । हे तीनों लोकोंकी जननी ! दे भक्तवत्सले ! है 
वरोंके देनवाली ! मेरी रक्षा कर ॥७२॥ है एकही स्वोंपरि 
मालकिनि | हे जगत॒की माढकिनि ! हे जमदभ्िकी प्यारी: 
है निष्पाप!हे रेणुके! हे देवि! मेरी रक्षाकर,हे रामकी माता! 
कल्याण कर ॥|७३॥ है महालध्मि ! आप श्री करें, अश्रीका 
शीघ्रही विनाश करेंइन संत्रोंस महालूछ्मीकी ग्राथना करके 
वेद पाठियोंकी स्वियोंको ॥ ७४ | चन्दन, ताछूपत्र, पुष्प” 
माढादिक तथा नये शरावसें ओर भी भनेक तरहके भक्ष्य 
रख ॥७५॥ सुपारीस भर दूसरे शराव ( सकोरा ) से ढकदें 
ओर उनमेंस सोलह २ मंत्रस देंदे । ७६ । क्षीरसमुद्रसे 
पेदा हुईं चन्द्रमाकी सहोदर वहिन विप्णुकी प्यारी 
लक्ष्मी इस ब्रतस सनन्‍्तुष्ट हो प्रसन्न हो ।। ७७ ॥ गा हद 

र॒ देव 


7 तदददिक्रालापरीशिदाशाओिि 





जप 


$ 


$ व्यय इत्यपि पा० । २ अस्य दुष्यादिलि इतीय 'ोकस्थेनान्वयः । ३ नवे शूपें चेत्यपि पा० । ४ शराबेण शुपण बा | 


( ३०७ ) 





७ हक, 


इन्दिरा तारिकीमाब्यामिल्दिशाओ नमोनमः ॥७८ ॥ दत्वा हपायनादीनि श्रोत्रियार्णा च योषि- 
ताम्‌ ॥ चतत्नः प्रतिमास्तास्त ब्राह्मणाथ निवेदय्रेद ॥ ७९ ॥ एवं रहूत्यं तु निर्व॑त्य बती मोज- 
नमाचरेत्‌ ॥ स्कन्द उवाच ॥ केनेद स्वीकृतं पूवे कथमस्मिन्प्रकाशितम्‌ ॥<८०॥ बृहि में तत्वतों 
देव यद्यह॑ तब बकभः ॥ शैकर उवाच ॥ आसीद्वाजा सावभौमो मड्रलाण इति श्रक्नः ॥ ८१२ ॥ 
कुण्डिने नगरे रम्ये तस्य पद्मावती जिया । तमागतः कश्चिदेकः सेवकों बाह्मणोत्तमः ॥ 
अज्ञातनाम्नस्तस्पासौ नाम चक्रे नृपस्तदा ॥ तवकक इति ख्यातों बभूव द्विजसत्तमः ॥ 
कदाचविन्मृुगयासक्तो भूपालो वनमाविशत्‌ ॥ तत्र विद्वा दशहइदीट्युट “हत्शा सहस्तद्यः ॥ 
क्षुतृट्पारिगतः आन्तो दक्ष मूलझुपाश्रितः ॥ उदकान्वेषणे चारास्मेषबणामास सर्वशः ॥ ८५८ ॥ 
वने जल तु नापश्यन्कचिच्छान्ताः प्रयत्नत/॥ते गत्वा नृपातिं प्रोचुनोच्राम्भ इति दुःखिता॥<६॥ 
तवलछकोएपि बच्चाम विपिन तदतर्द्वितः॥ अममभाउस्नदापद्सत्कास्ंटसिडअिद्रमभगड़रे ॥ 2७ ॥ 
रम्य॑ सरोवर दिव्य कमुदोत्पलमण्डितम्‌ ॥ तत्नापह्यदेवक॒त्था दिव्यक्षपा मनोरमाः ॥ <८ ॥ 
चार्वद्रीश्ारनयना पीनोन्नतपयोधरा। ॥ हारकंकणकेयूरनूपुरालंकताः शुभाः ॥ <९ ॥ पूजय- 
न्तीमंहालक्ष्मीत्रतरूपेण चादरात्‌ ॥ तवक॒को5पि पप्तचच्छ किमिद॑ कथ्यतामिति॥ ९० ॥ स्तलिय 
उचु ॥ महालक्ष्मीत्रतमिर्दे सर्वकामफलप्रदम्‌ ॥ क्रियतेःस्मामिरकाग्रमनोभिस्त्वत्न भक्तितः 
॥ ९१ ॥ तवकको$पि तच्छुत्वा बत॑ जम्नाह भक्तिमानव्‌ ॥ तदलु॒त्ञाँ गहीत्वाच जलमादाय सत्वरः 
॥ ९२ ॥ आजगाम जल तस्में दत्वा पाखलिरास ह॥ जले पीत्वा दृपस्तस्य दृष्टवान्दोरकं 
करे ॥ ९३ ॥ किमिदं दोरकं विद्वन्कि ब्रतं कतवानसि ॥ राक्षा पृष्टस्तवको5पि कथयामास तद्भ- 
तम्‌॥ ९४ ॥ तच्छत्वा राजशादूलो बरत जग्नाह भक्तिमान्‌ ॥ तबछकेन सहितों राजा स्वपुर- 
माययों ॥ ९५ ॥ पद्मावत्या ग्रह गत्वा तया रन्तुं गतो रहः ॥ रममाणाथ सा देवी तेन राज्ञा 
प्रियेण वे ॥ ९६ ॥ त॑ दृष्ठा दोरकं हस्ते कुपिताउत्यन्तकोपना ॥ कया त्व॑ वच्ितो ब्ाहे कया 





वाले दोनोंकी इन्द्रि ही तारक है, उस इन्दिराके छिय 
नमस्कार हैं | ७८ | श्रोत्रियॉकी स्रियॉकों ओर भी अनेरू 
तरहकी भेटदे चारों प्रतिमाओंको त्राह्मणके लिये दे दे।७९। 
ब्रती इस कृत्यको समाप्त करके भोजन करे, स्कन्द बोले कि, 
इस ब्रतकों सबसे पहिले किसने किया!किसने “इसे प्रका- 
शित किया ॥ ८० ॥ जो आप मुझसे प्यार रखते हैं तो 
इस वृत्तको यथाथरूपसे कहिये, शह्लर बोले कि, पहिले 


९ 


कोई संगछाण नामका चक्रवर्ती राजा था यह हमने सना हे 
॥ ८१ ॥ सुन्दर कुण्डन नगर उसकी राजधानी थी। उसकी 
स्रीका नाम पद्मावती था। उसके पास एक उत्तम ब्राह्मण 
नोकरी करने आया ॥। ८२॥ राजाने उसका नाम अज्ञात 
रख दिया, पीछे वो सुयोग्य द्विजवर्_य्य तबल्लकके नामसे 
प्रसिद्ध हुआ | ८३ ॥ किसी दिन राजा शिकार खेलनेमे 
आसक्त होकर वनमें चछा गया । वृहोँ उसने वहुतसे वराह 
धायछ किये और अनेकों सग मारे ॥ ८४॥ पीछे भूख 
ओर प्याससे व्याकुछ होकर एक पेडकी जडमें बैठगया 
ओर पानीको खोजनेके लिये चारों ओर नौकर दौडा 
दिये | ८० ॥ वे हूँढत २ थक्षगय पर कहीं भी पानी 
नहीं मिला तब सब दुखी होकर राजासे बोले कि, मद्राज! 
पानी नहीं मिकछा ॥ ८६ || तवछक भी निरालस होकर 
बनमें घूमने छगा घूमते २ उसने किसी गहरमें देखा।।८७॥ 


कि, कमछोंसे मण्डित्‌ एक सुन्द्र दिव्य सरोवर हे वहां 
उसने परमसुन्द्री मनोहारिणी देवकन्याएं देखी ॥ ८८॥ 
उनके सब्‌ अग सुन्दर्‌ थे नयन भी परम, रमणीय थे, ऊँच 
उठे हुए मोटे २ स्तन थे | वे सबहार कंकड केयूर और 
नूपुर पहिने हुऐं थीं ।| ८९ ॥ वे सब बअतरूपसे आदरके 
साथ महालक्ष्मीका पूजनकर रहीं थीं, तवहक ने भी पुछा 
कि; यह क्याकर रही हो कहो तो सही | ९०॥ खस्तियाँ 
बोलीं कि, यह्‌ सब कामनाओंका देनेवाछा महारुबमीका 
ब्रत हैं। हम यहां एकाग्रचित्तसे भक्तिपू्वंक इस ब्रतरों 
कर रहीं हैं।॥ ९१॥ भक्तिमान तबहकन सी यह सुनकर 
इस त्रतको महण कर छिया । पीछे उन देवकन्याओंकी 
आज्ञास शीघ्रही पानी लेकर ॥| ९२ ॥ चछदिया, राजाकों 
जछ देदिया और हाथ जोडकर बेठगया। राजाने पाती 
पीकर उसके हाथमें ढोरा बैंधा देखा ।॥! ३ ॥ तो पूछा 
कि, हे विद्न्‌ ! यह हाथम डोरा क्‍या है कोई ब्रत्‌ किया 
है? तवलकने भी सब बातें कहदीं ॥ ९४ ॥ राजान उस 
ब्र॒तकों सुनकर ग्रहणकर लिया और तबह्लकके साथ अपनी 
नगरीमें चला आया | ९० ॥ घर जाकर एकान्तम पद्म“ 
बतीके साथ रमण करने गया वो भी अपने प्यारे राजाके 
साथ रमण छरने छगी ।। ९६ ॥ वो कोपिनी थी ही हाथसे 
डोरा देखकर अत्यन्त नाराज हुईं और बोली किस ल्लीने 


( ३०८ ) 
। 
हे कााणकानााकााद अर मापाकानाणकाज परत ++++““77777+7+++++..3तहत॥तंतख॥अशशाश्यधाधाओ, ० ४० 2208 22 2227: 772 कक 75% अदी/ 202 777/27 20%: ५ या ०:८2 क00/क चर पर 207 20/8:2% 24462: कक क 4 40९06: 30 24 4%0ल्‍0427%2% 








बद्धः सुदोरकः ॥ ९७ ॥ तस्यास्तद्वचन श्व॒त्वा प्रोवाच च्‌ नर्‌ 
छक्ष्मी्रतममलुत्तमम्‌ ॥ ९८ ॥ इत्युक्तापि जियेणासों हस्ताओिच्छेद दोरकम्‌ ॥ 


ब्रतराज: । 








का  स्स्टिड प्र 





22220220050 हैं. 0780 20.20 


नराधिपः ॥ मावादीरम्यथा होत- 
ज्वालामालाकुहे 


78002 


अष्टमी- 


बढ़ों क्षितवत्यपि कोपिता ॥ ९९॥ हाहा कष्टमिदं पाप कृत सूठढतया त्वया ॥ इति निर्भर 
तां राजा तत्याज वनगह्वरे ॥ १०७ ॥ सा च हानि ययो पापा न चर हानि ययों नृपः॥ महा- 
लक्ष्मयपचारेण सारप्ये जलवजिते ॥ १॥ श्रममाणा बने तस्मिन्न कचिद्तिमाप सा॥ विचरण्ती 
वने तत्र ऋषेः कस्यचिदअ्रमम्‌ ॥ २॥ ददश मृगसड्डीण शान्तकृष्णमगएन्दितम्‌ | तत्रापह्य- 


द्वने रम्ये वसिप्ठे मुनिपुदड्ध़ञम ॥ ३२॥ वबरदे 


चरणों तस्य विसंत्ञा हुःखकाशिता ॥ दिए 


ध्यात्वा मुनिस्तस्या ज्ञातवान्डःखकारणम्‌ ॥ ४।। महालक्ष्म्यपचारेण ज्ञातं विज्ञानचश्त॒षा॥ 
तद्धत॑ं कारयामास तया इाखोपशान्तये ॥ ५ ॥ तहुःख तत्क्षणादेव विनष्टठममवत्तदा॥ 
पुनश्च मृगयासक्तो भूपालो बनमाविशत्‌ ॥ ६॥ ऋणतिन्मृगं समाविध्य बाणेनेकेन बाहुमाव्‌॥ 
अन्वगच्छन्मुगपद तस्या शुषि यदागतः ॥ ७ ॥ वर॑ मुनि ददशांम्रे वलिष्ठे बीतकल्मपम्‌॥ 


कृतातिथ्यक्रियो दृष्ठा चरफ्तीं बहिरम्तिके ॥| ८ ॥ 


हावभावविलासाझेहरनती हरिणेक्ष- 


णाम्‌ ॥ मदात्निगंत्य नृपातिः प्रोवाच मधुर बचः ॥ ९ ॥ रम्भोरू कासि कल्याणि किम चरसे 
बने ॥ किन्नरी मालुषी वा त्वं यक्षिणी चार॒हासिनी ॥१०॥ किमत्र बहुनोक्तेन भजमानं मजस्व 


माम॥नृपेण तेन भक्‍त्योक्ता सस्मिता वाक्यमबबीत्‌ ॥११॥ पुनर्मजामि चाहं त्वामवेहि महिर्षी 
तव ॥ महालक्ष्म्यपचारेण त्वया हीना वसाम्यहम्‌ ॥ १२॥ मुनीन्‍न्द्रस्याश्रमे रम्ये तरुगल्मो- 
पशोनिते ॥ ममोपरि कृपाविष्टो महालक्ष्मीत्रतोत्तमम्‌ ॥ १३ ॥ कारयामास विधिवत्सर्वविध्रोप- 
शान्तये ॥ तयोक्ते वचन श्रुत्वा स चोत्फछबिलोचनः ॥ १४ ॥ ऋषेरत्॒ज्ञामादाय प्रियामादाय 


सत्वरः ॥ हृष्टपुष्ठजनेज्ुष्ट पताकाध्वजशोनमितम्‌ ॥ १५ 


तुर्में ठप लिया ? किसने आपके हाथमें डोरा बाँधदिया | 


॥९७ ॥ रानीके इन वचनोंकों सुनकर राजा बोला कि 


हा. 


हे भा 
किया ऐसा कहकर पीछे उस डरा धम्तका वनके गहसमें | 


छोड दिया ॥ १०० ॥ पापिनी रानीछी 
राजाकी हानि नहीं हुई, 


कोई ठिकाना न मिछा विचरते हुए उसने किसी ऋषिका 
आश्रम देखा ॥ १०२ ॥ वो मगोंसे सकीणे हो रहा था 
तथा शान्तकृप्णम्गोंसे घिरा हुआ था | उस रमणीक वनमें 
उसे वसिष्ठजीके दशेन हुए ॥१०३॥ रानी उनके चरणोंमें 


विज्ञानकी दृष्टिस जान 
सब्र हुआ है पीछे उसके दुखोंको मिटानेके लिय उससे 
महालक्ष्मीका ब्रत कराया ॥ १०५ ॥ वो दुख क्षण मात्रमें 
विढागया फिर शिकार खेलनेके लिये राजा उसी वबनमें 
की आया।॥ १०६॥ कहीं किसी सगे एकत्तीर सार 


दिया था उसको खाकर मृग भा आया राजा उस है पीछ२ 


भूमिमें चछः आया | १०७॥ उससे तिप्पाप सुलिवर 








१ वच्चिप्राश्षमममों । २ परमिति 


॥ प्रविव्श तथा साझ्ध स पोरेरमि- 








वसिष्ठजीकों अपने अगाडी देखा राजाका आतिथ्य किया 


और कछ न कहें गे गे | गया पीछे बाहिर घूमती हुईं।। १०८ ॥ एक सुन्दरी मृग- 

3 ऐड हक न व डोर ह हक | नयनी द्खी जो अपने हावभावों ओर विछासोंसे मन हर 

तोड़ गुस्सेमे आकर, दृगदगाती हुईं आगमे फेंक गलियों हा थी मदसे बाहिर निकछकर उससे मीठी बानी॥१०॥। 
ट ठ्र 3 ई ; ३ कम ३ बन आर 

९ हे ० बोडा वि म्भोंके वाली ! हे कल्याणि : 

॥ ९५ | राजाने हा ह। ! मूखतासे तूने बडाभारी पाप | हे लि, भोंकेसे कर लक 

| आप कोन हैं इसवनमें क्‍यों घूमरही हैं, ऐ सुन्दर हसतेः 


नीकी ही हाति हुई, | डी आप किन्नरीहें वा मालुषी हैं वा कोई यक्षिणी हैं! 
_ नहीं हुई, महाह्लक्ष्मीके अपचारसे वो जरू- | 
रहित अरण्यमें पहुँचाई || १०१॥ वनमें घूमते २ उसे | 


| कह दी तो वो मन्द मुसकान करती हुईं बोली ॥ १११॥ 


|॥ ११० ॥ बहुतसी बातोंसे कया पडा है में तुम्दें चाहवा 
हूं तुम मुझे चाहों राजान जब भक्तिके साथ यह बाव 


में तेरी महिषी हूँ, मुझे पहिचानल्ले अब फिर में तुझसे 
प्यार करती हूं मेंने महालक्ष्मीका अपचार किया था इससे 


0 अर ९ ५ | परिलक्ताकी दुशामें यहां रहरही हूं जो कि, मुनीन्द्र वसि' 
जम क तेल मर बहोश होगई मुनीश्वरजीने वहुत सम- | हि 


से भ्रम मुनिजीने के महाल्क्ष्मीके अ- 
छिया कि, महारूद्मीके अपचारस | * “मे मुनिजीन मुझपर कृपा करके महार्क्ष् 


४जी सहाराजका सुन्दर तर और गुल्मोंते सुशोमित इस 


ब्रतको।१११॥मुझसे विधिके साथ कराया था जिससे कि; 
सश्र विन्नोंकी शानित होजाय, उसके ऐस वचरनोंको सुनकर 
राजाही आंखें कम्ठछकी तरह खिलछगई ॥ ११४ ॥ ऋषिकी 

5 <. कक 
आज्ञाल्ले-अपनी प्यारीको साथ लेकर शीजत्रदी-हृष्टपुष्ट जवाध 
सब्ति तथा ध्वजा पताफाओंसे शोसित || ११५ !! अपन 


नगरमें प्रपिष्ट हुआ नगर निवासी असिवनद॒त कर 








शाप, । 





ब्रतानि, ] भाषाटीकासमेतः (३०९ ) 
बन्दितः ॥ ८्ाहलाप्मीशरत भूयस्तया सह चकार ह भुकत्वेह हि लपएधपौश्साए- 
बुतः) ॥ मूपाल) सार्वभोष्मोमत्तनछोउमात्यतां ययों ॥ १७॥ हद फट सह्निधिः 


अका6980074 १-० पर एप 7१०मह ऋष्वृरशद्रा जप 7; 





॥ ए्व॑शणावा सा देवी नराणामिज्दासनी | ?ट के दइ४पए 


५ 
सा 
४ 
श्र 
ई 


रे देवी सबदधखा।प- 


५ हे ॥॥ 


हारिणी ॥ एवं षोडशवण तु कतेव्यं ब्रतछुत्तमम्‌ । यः करिष्याति त॑ पीत्या स्वयं सिद्धि- 
रसुपासते ॥ लोकपालाश्व तुष्यन्ति ददाति च मनोरथन्‌ ॥ १२० ॥ नारी वा पुर्पः करिप्यति 
मदा भकत्या व्रत॑ यत्नतः सेवनते हरिरतुपद लझुरा। कुबोन्ति तस्य भियम्‌॥ तत्पाद परिरज्ञ- 


यत्ति मत॒जा मोलिप्रभामण्डलेस्तस्मिन्नेव छुटट 


ह ्र्तह््था | जुबुथं ९४. 228, 


: प्रदम ॥ ब्रतमेक समाचक्ष्य विचाय पुरुषोत्तम ॥ १ ॥ कृष्ण उवाच ॥ दुवार चेंच 


बनी वसति सा लक्ष्मी! स्वयं विष्णना 
सुभवत्या वाप्यभवत्या वा कुर्वाश्ति ब्रतझुत्तमम्‌ ॥ 


रक्षातेि । २२॥ ये इर्द शणुयात्रित्य श्रावयेद्रा समाहितः सपगायाओं 
नैंव जायते ॥ सबपापविनिम्तक्तः स्वगंलोके महीयते ॥२३ 


०२१] 
न्तकाले च तातबन्विष्ए+ संसारात्पारे- 
ते लक्ष्मीरलओर्मी- 
इसि स्कन्दपुराणोक्ता महालक्ष्मी 


मदर अथड ड(चाजएए 5०७७४००७28 73/6 कपल 


कथा ॥ युधिछ्विर डबाच ॥ र्ाइ्थानलाड ८ 


गरऊः: ६:६६ सर्वेश्वयसुस्थ- 
हे 


व्याप्तजिवि छपे ॥ एलदेव कृतस्यादों दवेन्द्र! प्राह नारदम ॥ २॥ तस्य अ्वत्वा ततो वाक्य स 


मुनिः प्रत्यमाषत ॥ नारद उवाच ॥ पुरन्दर पुरा पूर्व पुरमासीत्स शोमितम्‌ 


भवद्भूमिथत्र रएल ट्रं-> 825 ६ व्द्र्‌ | हर | | झ्य्द 7 पद्म और सन 


रे 
इ१३४३४०६६४३३ ६४८, | ल्ाचर पर 5छ 
चक्रे देवः कुसुमसायकः ॥ चतुर्बग जनियंत्र यच्च विश्वस्य भूषणम्‌ ॥ ५ 
कम्पयत्यनिशं- शिरः ॥ तत्राभवम्महीपालो मड्लो मड्गलालय५॥ वा 
गेझा बभव हाअन्या तु चोलदेवी या महिषी सा यशपस्विनी। 


रत्मगर्ो- 
चलोक्य॑ स्ववर्शं 
२ गद्वीक्ष्य 
छदेवी जिया तस्य दुस- 
कदाबिन्मड्रलो राजा चोलदेः 


की 


चड म अल 
पे च्या च्ब्ग्छ. अ# ४! 


सशयवान ॥ प्राशादशिखरारूठः स्थलीमेकामपश्यत ॥ ८ ॥ तामालोक्य महीपालः स्मरस्मेर- 
मुखाम्बुज॥चोलदेवीं प्रति प्राह दन्तदोतितदिडसुख॥९॥चश्चलालिे तवोद्यान कान्तनिश्वित- 





हुए चलने छगे फिर उसके साथ महालुक्ष्मीका ब्रत किया | 
| प्लिर बोढे कि, अपने स्थानका छात्र, पुत्र, आयु, 
| और सुखके देनेवाले किसी एक. अ्तको, हे पुरुषोत्त 

| विचार कर कदियें ॥ १ ॥ त्रीक्षप्ण बोडे कि; जब अलेय 
| देत्योंने इन्द्रकी नगरीपर पृणहपसे अधिकार कर लिया तब 


११६। अनेक तरहके भोगोंकी भोगा अनेकों बटे चाती 
हुए राजाचऋवर्ती हो गया और तबररूक ह्विज उनका 
प्रधान सेत्री बना ॥११७॥ महालद्मीकी कृपासे सब सप 
त्तियाँ घरमें रहती थीं इष्टोंकी देनेवाली नारायणी लक्ष्मी 
देवीका ऐसा प्रभाव है यह सब पापोंके हरनेवाली तथा 
सव दुखोंको मिटानेवाली हैं ॥११८॥ पर इस श्रेष्ठ ब्रतको 
सोलह बरसतक करना चाहिये ॥११९॥ जो इस ब्रतको 


358 दर क 30 कट गा करगी | रे पव॑त थे जहांकी स्थियोंके अपाज्ञ श्ंग और नयनोंके 

मा ड्ो कोई ख्ी दा मर, हो पा दे | वाणोंसे ॥ ४॥ पुप्पोंके तीरोंवाछे कामदेवने तीनों लछोकों को 
सावधानीके साथ इस त्रतको करेगा उसको ब्रह्मा विष्णु 03 वहां चारों वर्णोकी खरियां विश्वका 
महेश सेंवेंगे और उसके प्रियको करेंगे मलुप्य अपने शिरो- | कल कल 
र्नॉसे जसक चरणोंको रगगे हट मी देवी वि प्फु भगवान | ह्िलाया च्य्र्ता था वहा छ्क सगलका ही स्व्य स्थात्त स्प* 
के साथ उसके कुटम्वमें सदावास करेंगी ॥१९१॥ और तो | वेपामका राजाडइआ था। ह 
क्या चाहें भक्ति हो या न हो जो इस अछ ब्रवको कछरतपे हैं | नामकी दुभेगा खी थी दूसरीका नाम चोलदेंबी थावों 
अन्त ससयसे विष्णु भगवान उमको संसार सागरसे पार | अच्छी थी '७॥ एक दिन संगछ राजा चोल्दवीको साथ 
जो एकाग्रवृत्तिसे इस सुनता या सुनाता | >कर राजसदलूक ऊपर चढगया ऊपरस उक स्थली देखी 
।॥ ८॥ उसे देखतेही राज़ाका मुख कमछ कामके समान 


वो सब पापोंसे कछूंटकर स्वगर्मं चछा जाता है ॥ २२३ ॥ यह | खिल गया दाँतोंकी उमदसे दिज्ञाओंकी चमकाता हुआ 


कू रगे [१२० 


कर देते हूं 
है उसे कभी छक्ष्मी नहीं छोडती अलक्ष्मी कमी नहीं आती 


श्री स्कन्द्‌ पुराणकी कही हुईं महालुक्ष्मीके ब्रतकी कथा पूरी 





हुई ॥ रविप्यपुराणकी 


कही हुई लक्ष्मीत्रतकी कथा-यथि 
02 ॥ 


द्र मारदजीस बोला ॥२॥ छि, कोई इस समयक्ता उपाय 
बतलाइये । नारद बोले कि. हे इन्द्र | पहिले एक परम 
सन्दर नगर था ॥| ३ ॥ उसकी भूमि रत्तगभा थी रत्दोंस 


| विश्वकर्मा भी इसे देखकर रातदिन शिरही 


उसकी एक चिएलदेयी 


चोलदबीसे बोला ' चंचलनयचोंवाली ! तेरा बाग 





(३१० ) ब्रतराजः ! तक ... [स्टमी- | 





नन्दनम्‌॥ कारंयामि तयोदिष्टस्तत्रोद्यासमकारयत्‌ ॥ १० ॥ संपन्न तु बरहुद्यानं नानाहुमलुतानि 
तम्‌ ॥ नानाफलसमायुक्त नानाषक्षिसमाइतम्‌ ॥११ | तत्रागत्य महाक्रोडस्ततुन्यस्तनभ्नस्तल॥ 
प्रावट्कालयनव्यामश्वक्षुराक्षितचखलः ॥१२॥ देष्ट्राकक्ष्चरद्राकेः प्रलयाम्भोधरध्वनिः ॥ उदच्चान॑ 
भज़यामास नानाठुमलतान्वितम्‌ ॥ १३ ॥ कांश्िद॒त्पाथ्यामास पादपान्पाण्डनन्दन ॥ कांध्रि- 
दन्तम्रहारेण कांश्रिदस्तप्रधषणेः ॥ १४॥ जथान कांश्रित्पुरुषात्रक्षकानन्तकोपमः ॥ तद्भनक्तीति 
विज्ञाय संहत्योद्यानपालकाः ॥ १५ | सभ्नयास्तस्थ वृत्तान्तमूचुश्च नृपतेः पुरः ॥ तदाकाप्प 
ततो राजा क्रोधाराणितलोचनः ॥ १६॥ वधाय दुृष्ट्णिस्तस्थ सन्दिदेशाखिल बलम्‌ ॥ततश्र- 
चाल भूपालबखिगण्डगलिनेगजेः ।। १७॥ आप्लावयन्महीं सर्व! वजिबृन्दकृताम्बराम्‌ ॥ चाल- 
यन्सकलाउछेलान्स्यन्दनोघमरूजवेः ॥ १८ ॥ पत्तितग्रातमहाध्वाने! प्सयात्रेखिला दिशः ॥ ततो 
गाठं समावृत्य तदुद्य न॑ नरेश्वर: ॥ १९ ॥ उवाचोच्चरतिध्वानदिशो सुखरखन्दश ॥ पथि यस्य 
वराहोःय॑ प्रयात्युपवनान्तरम्‌ ॥ २०॥ तस्यावर्य शिरच्छेद॑ विद्धामि रिपोरिव ॥ तस्य 
भूपस्य तद्ाक्प॑ं समाकण्ये स सूकर; ॥ २१॥ जगामास्येव मार्गंण प्राणिनां चेष्टितं यथा॥ 
ततः से सूकरासक्तःकशयाउश् प्रताद्य च ॥ २२॥ब्रीडाकलड्लितास्येन्दर्माग तस्थेव सोषगमद।॥ 
गत्वाथ विपिन॑ घोर॑ सिहशादूलसंकुलम्‌ ॥ २३॥ तमालतालहिंतालशालाजुनलत।|न्वितम्‌ ॥ 
झिल्लीझड़ारसम्भारवाचाटितदिगन्तरम्‌ ॥ २४ ॥ तत्रेकचेताः संपहय वने बश्राम भूपषतिः॥ 
कोलो वेलामवाप्याथ सो5भवद्राजसंमुखः ॥२५॥। भल्लेन सो5व्धीत्कोले वज्लेणाद्रिं यथा भवान्‌-॥ 





अथ व्योग्नि विमभानस्थः स्मरझुन्दरविग्रहः ॥२६॥ क्रोडरूप॑ परित्यज्य सोध्बवीन्मड्रल नृपम्‌॥ 





अपनी शोभासे नन्‍्दनवनकों भी सात करनेबाढा बना 
दूंगा,रानीने कहा कि कराइये, फिर वहां वाग बनवा दिया 
॥ १० ॥ वो बाग तयार होगया | अनेकों हुम और छवाएँ 
लगाई गयीं। अनेकों फलवृक्ष ढगाये गये जिसकी बहारपर 
अनेकों पक्षिगण उस घरेही रहते थ || ११ ॥ एकदि्न उस 
वागम एक बड़ा भारी सूकर चछा आया | वो इतना बड़ा 
था कि मानो शरीरसे आकाशको फेंक रहा हो बरसातके 
मेघसा व्यास था चंचल आंखें फार रखो थीं ॥ १२ || जब 
वो मुँह फाडवा थातो ऐसा भाछूम होता था कि ऊपर 
नीचेके कीछोंसे चाँद सूरजको खींच रहा है । प्रत्यके 
सेघोंकी गजनाके बराबर तो वो चिघाडही देता था ।उसने 
अनेकों वृक्षोंक और छवाओंके साथ बागको छिन्न भिन्नकर 
डाछा ॥ १३ || है पाण्डुनन्दन ! कुछ पेड तो उसने उखा- 
डकर फेंकदिये। बहुतसोंको दातोंके प्रहारस तथा अनेकोंको 
दांतोंकी टक्रोंस उखाड़ दिया || १४॥ काल्के समान उस 
सूकरने बहुतसे रक्षक पुरुषोंको मार दिया यह बागको 
उजाड डालता है ऐसा जान सब रक्षक इकट्रे हो ॥ १५ ॥ 
भयभील हुए राजसभामें पहुंचे । वहां जाकर राजाके 
सामने सब निवदन किया | यह सुनतेही राजाके नेत्रक्नोघसे 
छाल छाछ हो गये ॥| १६ ॥ सारी सेनाको आज्ञा देदी कि 
बागके सूकरको सार छाओ आप भी ऐसे मत्त हाथियोंके 


ढकता तथा रथ समुदायके पवन वेगसे पर्रत्तोंक्रो विलाता 
॥१८॥ एवम्‌ सिपाहियोंके बडे रास्तेसे सारी दिशाओंको 
भरता हुआ बागको चारों ओरसें अच्छी तरह रुकवाकर 
॥ १९॥ दशों दिशाओंकों पूरता हुआ जोरसे बोला कि 
जिस रासतेसे यह सूकर ज॑गलको भाग जाता हे में उसी 
मार्गसं अपने हाथस इसका बेरीकी तरह शिर कादूँगा। 
सूकर राजाके इन वचनोंकों सुनकर ॥ २१ ॥ जैसी ग्राणि- 
यॉकी चेष्टा होती है उसी तरह उसी रास्तेसे निकढा। 
राजा चाबुक्से घोडकों ताडना देकर सूकरके मारनेंमे 
आसक्त हो ॥ २२ ॥ हा सूकर मुझसे निकला जाता है इस 
लज्जासे मुखचन्द्र कुछ कर्ूंकित होगया है जिसका ऐसा 
आप उसके पीछे हो लिया और एक ऐसे वनमें पहुँचा 

कि परस भयानक था तथा शेर बवर शरोंसे भरा पडा था 
॥ २३ ॥| जिसमें तमाल ताल हिन्ताल, शाल, अजुन और 
अनेक तरहकी लताएँ थौँ, झिल्लियोंकी झंकारके सभारस 
दिशाएँ गूँज रही थीं ।। २४ ॥ उसमें एकाग्र चित्तस सूक- 
रको खोजता हुआ घूमने छगा सूकर मौका देखकर राजार्क 
सार्मने आगया ॥ २५ || उसने भलछेसे उस सूकरको एंसे 
मारा जैस इन्द्र बझ्नसे पवत विदीण करे। मरते ही काम* 


देवके समान सुन्दर हो विभानपर चढ दिव्य आकाशम 


द हर हक जिनके कि गण्डस्थछोंस मद चुचा रहा था पहुँचा ।। २६ ॥ क्योंकि सूकरका शरीर छोडत ही उसका 
। ईनके परद््स भूमिको आप्छुत करता तथा घोडोंसे | दिव्य नाभि 3. छिप करता तथा घोडोंसे | दिव्य देह होगया था। फिर मेगलछ राजासे बोला 3ि होबेया था फिर का राजा बोढा कि 


: १ इत्युक्त्वेति शेष: । १ ऋद्धोधराशक्र इत्यपि पाठः । 


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हा 8 पग खा 2205 7/07/ 000८ 0 0600 2668 20204 2:26 70 2/00:/60॥802027 40777 0 260 को 2020 07084 802 शद 
कैफण्पत फसाषय क 


गन्धव उवाचास्वष्तित तेःस्तु महीपाल त्वया मुक्ति; कृता मम॥३१ यम्माकर्णय दुत्तान्त यनाहँ 
श् ०] के अरे शक, 
जात इृद्श) ॥ एकदा देवतावृन्‍्दे! संदतः कमलासनः | २८ ॥ चच्चत्युटादिभिस्तालेः बइजादे. 


ओ्रोषीद्वीतरुत्तमम्‌ ।। गीयमानब्युतः स्थानात्ततोईह कर्ृणाइसना ॥ ३० ॥ पिवसशमनेने 
ब्रह्मणा सष्टिकमेणा ॥ बह्योवाच ॥ कोलो रूव त्व॑ मेदिन्याँ सुक्तिस्तेपस्तु लदा यदा ॥ 

निर्जिताखिलभूपालो मड़लस्त्वां हनिष्यति ॥ तदद्य घटितं सर्व त्वत्मसादान्महीपते ॥ 
तदुगृहाण वर॑ भूप यद्वस्यथापि इुलेमम ॥ महालक्ष्मीत्रत दिव्य चतुबगफलप्रदम्‌ ) ३१३ ॥ लभस्व 
सार्वभोमत्व॑ गच्छ राज्य निज हुतम्‌॥ नारद उवाच ॥ चित्ररथोध्थ गन्धवे डकत्वेद भूपतिं 
प्रति ॥ ३४ ॥ अन्तधान गतस्त॒ष्ठ: शरत्काल इवाम्डुद; ॥ अथ मद्लनूपालः पाश्वेसथं द्विज- 
मागतम्‌ ॥ ३५ ॥ विलोक्य बटुक॑ कंचित्कक्षानिक्षिप्तशम्बंलम्‌ ॥ उवाच मधुरां बाचं स्मितपृा 
शुचिस्मितः:॥३७॥ देवस्त्वं दानवस्त्वे वा गन्धरवों वाष्थ राक्षस/।सत्ये वद बटो कस्मात्किमय् 
त्वमिह्गत॥२७॥ श्रत्वेत्याशिष्य त॑ विभ्रः भाह त्वदेशसम्भवः ॥ अह सादे त्वया यातस्तदा- 
दिश यथोचितम॥३८॥ राजाथ तमुवाचेद॑ त्वे बटो नूतनाह्ुय॥अपल्याणं विधायाश् तूर्ण तोय॑ 
ममानय ॥ ३९ ॥ अथ विश्वाम्य ऋपालं बदुको वट्पादप ॥ तथाक्ृत ठरड्“ च समारुहय महा- 
मतिः ॥ ४० ॥ जगाम पक्षियोवेण यत्रास्ते सुन्दर सरः ॥ कमलेकनिवासेन रधाह्रानरणेन च ॥ 
॥ ४१ ॥ वनमालालयत्वेन देंधन्नारायणी ततठुम्‌ ॥ मगश्नवायु शतोद्योगमक्षारं शिषदजहए ह४रा। 


कि पे 
० मै 
६ 


नाशितागस्तितृष्णालिप्रसन्न॑ सागराधिकम्‌ ॥ पढ़े मग्नोए5्य तत्राख। 25इुसीे तस्य रः ॥४२॥। 


"रा 


चतुदिशं निरीक्ष्याथ तस्यैव सरछस्तस्टे ॥ दिप्यवस्थपरीधान दिव्याभरणभूषितम्‌ ॥ ४४॥ कथ- 


है. है 

श्री ञँ ड् कि हु ड 
हि] जमकर की 
अमनकिकी हर * 





हक कर पक ० 

है राजन | आपका कल्याण हो आपने मेरी मुक्ति करदी 

एकबार ब्रह्मजी देवताओंके बीचमें बेठे हुए थे ॥ २८॥ 
डे ५ह ] ऐ 

मिलरही हैँ पुर जिनकी ऐसी तालों वे तथा षद़्ज आदिक 


उस उत्तम गीतको सुनने छगे गाता ३ में पीछे कुछ चूक- 


हू यह अथ ध्मं काम और मोक्ष चारों पदार्थोका देनेवाल्ा 


बंठुक ; आप देव दानव वा राक्षस 
२ २ 


लिये आये है सत्य कहें ३७ 





9 व्यक्सिलि ठाघ: । २ प्राथेयम | हे कराम्ति किसित्यपि पाठ: 


है ॥३३॥ आप चक्रवर्ती राज्यको ले अपने स्थानपर शीत्र 
ही चले जायें, नारदूजी बोले कि चित्ररथ गन्धवे राजासे | ( वनकी मालछाओंको ) चारों 30 कक मी 
एसा कहकर ॥ ३४ ।॥ प्रसन्न होता हुआ अन्लर्धान होगया | ईैंसकी और नारायणकी समता है. वाउुक सक हब 
जैसे शरदऋतुरम मेघ बिला जाते हैं। इसके वाद मंगढ़रा- | ईस पर भन्न होगये तथा न तो यह खारा था, न इससे विष - 
जाने पास आये हुए आह्यण।३५॥ ब्ह्मचारीको जिसने कि | 
वगलमे टोपा छगा रखा था देखा । सुन्द्रस्मितवाढा राजा | 
मन्दस्मित करता हुआ मीठा वचन बोला | ३६ ॥ कि हे | 
इनमेंस कोन हैं यहां 
॥ यह सुन राजाको | 





| आशीवांद दे ज्ाह्मण बोला कि मैं तो आपके ही साथ यहां 
॥२७॥ मेरे वृत्तान्तकों सुनिय जिससे में ऐसा हो गया4ा; | 
|. ३ हा... कक ३ के, 
| बोछा कि हे बटो | आपका नूतन नाम हैं पहिछे घोडेके 
ह ( घर क | पछानकों खोलकर शीघ्रही पानी रू आओ ।॥ ३५९ ॥ बटुक 
सातों स्वरॉस, मेंद्र आदिरू तीनों मानों ते; हे राजन ! से | 


गा रहा था ॥२९॥ ब्रह्माजी अनेक स्थानोंके गुणोंत युक्त | सवार हो ॥ ४० ॥ पक्षियोंकी आवाजके सहारे उस जगह 
९ ९ | पहुँच गया जहां कि सुन्द्र ताछाव था यह तालाव कमलछके 
गया॥३०।|इसीसे मुझ चित्ररथको सृष्टिकर्ता त्रह्माजीने शाप | सिवाससे र्थाइके आभरणसे वनमाछाओंके आल्यपनेसे 
दे दिया कि तू भूमण्डछ पर सूकर होजा | तब तू इस 


योनिसे छूटेंगा जब कि ॥ ३१॥ चक्रवर्ती मंगल महीपति | थे 
मे अपन गाय और 8 हि की | कैमलाके निवास हैं तो यह कमलोंका निवास बना हुआ 
तुझे अपने हाथस मारेगा हे राजन | वो सब अब आपकी | « बानके हाथका भूषण है ते 
कृपासे पूरा होगया ॥३२॥ हे ठूपते ! जो देवताओंकोभी || जे * पेन ना भगत भक हक व 
दुड़भ हैं उस वरको म्रहणकर । देख ! मद्दालक्ष्मी जीका ब्रत | ससके ६ रथाज्ञ ) चकव भूदंग हरे ईद दै जे लिप लीक 
यह 3 पर + पदार्थों | बनमाछाओंको इतना पहिनते हैं कि उनका घर कह जाय 


आयाथा मेरे छायक जो काम हो कद्दिय ॥३८॥ राजा 


वृक्षकी जडमें राजाको बिठाकर विना पलाडके घोड़े पर 


नारायणकी शोभा धारण कर रहा है; यात्री विप्णु भगवान्‌ 


तो कोई अत्युक्ति नहीं हैं इसी तरह यह भी वनमाला 
ओरसे पहितने हुए हैं, यह 


ही था ॥४०॥ जिसने अगस्त्यजीकी प्यास सिटादी है ऐसा 
समुद्रसें भी अविक स्वच्छ जलूका यह सर था। घोडा को चसे 
मम्न होगया यानी लेटनेलगा । त्रह्मचारी पीठस उतर पडा 
॥ ४३ ॥ उसी वालावके किनारे चारों दिशा[ओंको देखकर 


७०. भूः है भ्ू्‌। | थक 
दिव्यवर्खोंकों पहिनि हुआ दिव्य आमूषणोंसे सूषित दिव्य 





किक ४ 78 2,333 कई 


। ४ बिश्नद्त्यपि पाठ: । 





(३१२ ) ब्रेलराजः | [ अष्टमी- 


वतन सटा३ ० क 7 भक्ष+रग क्र 2 पा ४ करन किक ५५०४: ग्भा्ाा तारक ताज न 





न न ््ि्रट््म्ममर््म्ण्ि्ूूएणननमम_म््््म्म्म्ऊ्ग्ग्ग्! दुआ अकमपप (हक लि कए कआ+क क्थलसतत काश 70 7 स्‍#टत ११7, 2 का गरकअग कर ८7 065: 70785 7727 /इलंट 5८: 





अरारककलयअम-ाजन॒ताल॑प ५ पाप) कम कक, 


पत्ते कथा दिव्यां ल्लीगां सार्थमह्श्यत ॥ उपछृत्याथ त॑ साथ स्ववृत्तान्त निवेध्य च॥ ४५॥ 


कृताअलिरिति माह बटुमेबुरया गिरा ॥बढुरुवाच॥एतरत्कि क्ियते साथ त्वया भक्तिपरेण वे ॥ 
॥ ४६ ॥ को दिचिः कि फल चास्य बृहि तन्‍्मे यथातथम्‌ ॥ श्रुत्वा च तझवाचेद स्ाथः कह- 
णपा गिरा ॥ ४७ ॥ सार्थ उवाच ॥ श्रणु विभेकवित्तन श्रद्धाक्तिसमन्वितः ॥ या माया भकृति। 
गत्तिश्लेलोक्येप्पमिधीयते ॥ ४८ ॥ ब्रतमेतन्महालक्ष्म्यास्तस्थाः स्वेफलमद्म ॥ आकरणय 
विधि चास्य कथ्यमाने मया बटो॥४९॥ भाद्रि मासि सिताष्टम्थामारमोस्य विधीयते॥ प्रातः 
पोड्शकत्वस्तु अक्षाल्याडूत्री करो सुखम ॥ ५० ॥ त॑ तु षोडशससिद्ध अन्थिषोडशसंयुतम्‌ ॥ 
मालतीपुष्पकर्परचरनागुरुचार्चितम्‌ ॥ ५१ ॥ लक्ष्म्ये नमोह्तु मन्त्रेण प्रतिप्रन्थ्यनिभन्व्रितम ॥ 
धन धान्य॑ परां धर्म कीतियायुयेशः श्रियम्‌ ॥ ५२ ॥ तुरगान्दम्तिनः पुत्रान्महालक्षम प्रयच्छ 
मे ॥ मज्ेगानेन बद्धाथ दोरक दक्षिण करे ॥ ५३ ॥ काण्डानि षोडशादाय दूवोयाश्वाक्षताति 
च्‌। एकचित्तः कथा श्वत्वा पूजगेत्तेश् दोरकम्‌ ॥ ५४॥ ततस्तु परातररभ्य यावत्स्यादसिता- 
छमी ॥ तावस्मक्षाल्य हस्तों ठ॒ पादादीनि कथां तथा ॥ ५५॥ शृणुयात्मत्यहं विप्र तत्लंख्यर- 
क्षतादिनि! ॥ अथ कृष्णाष्ट मी त्राप्य नक्तकाले जिनेश्द्रियः ॥ ५६।॥ सनातः शुक्लाम्बरधरो 
ब्रती पूजाग् विशेत ॥ तत्नोपविश्य पूवीस्यशारुघोतासनोपरि ॥॥ ५७ ॥ शेतव्श्ले लिखेदष्ट- 
दर्ल कमलत॒ुत्तमम।एन्यादिशक्तिययुक्तपा्थपत्र सद्ेसरम्‌ ॥९८॥हणिकायाँ ततो लक्ष्मी कपूर- 
क्षोदपाण्हुराम्‌ ॥ शुश्रवल्लपरीवानां सुक्ताभरणनूपिताम्‌ ॥ ५९ ॥ पड़ुज सनसंस्थारना स्मेरा- 
ननसरोह्हाम्‌ ॥ शारदरइकलाकएनत स्निग्धनेत्रां चतुसुजाम्‌ ॥ ६० ॥ पद्मयुग्मामरूयदां वर- 
व्यमकराम्बुजाम्‌ू ॥ अजितों गजयूग्मेन सिच्यमानों करांडुना।६१॥सशित्येव लिखेदेदी कपूरा- 
गुरुबन्द न ॥ तत व्वावाहने कुयान्मंत्रेणानेन उुबती॥ ६२ ॥ महालस्मि समागच्छ पद्मताम- 
कथाओंको कहदा हुआ एक खियोंका संग देखा। उस | पुने और डोराको पूज॥॥५४॥ इसके बंद जबवक ढुंण्णा?: 
साथके पास पहुच अपना इत्तान्त कहा॥४४॥४५।फिर हाथ | मी आये रोज प्रातःकार हाथ और पावोंका ग्रश्नालन क्रे 
है यह मुझे यथार्थ रूपसे कहिये, यह सुन करुण वाणीसे | न शायर पता सब 8 कक किक 
वो साथ बोला कि ॥ ४७॥ है भक्ति ओर श्रद्धासे युक्त हुए | बा दो कमर कि जल हे रा पा कह 
ब्राह्मण ! चित्त छगाकर सुन) जिसे तीनों छोकंमें माया, | न ' उसमें पूर्वेकी की मुल्क कल 
प्रकृति और शक्ति कहते हैं. ॥४८ ॥ उसी महारू्नीका सव | "पर अष्टद्छ कमछ लिखे, पूवांदि आठ दिल्वाओंरे 
कामनाओंकी पूर्वि करनेवाढा यह व्रत है। हे बटो! हम कह- | उसके केशर सहित द्ोंमें शक्तियोंकी स्थापना करे ।। ५८ 
तीं हैं. आप इसकी विवि सुनें ॥ ४९॥ भाद्रपद्‌ श॒ुक्का अष्ट- | कर्णिकामें कपूरकी की चसे सफेद हुई श्वेत बर्सोंकों पहिर 
मीको इसका ग्रारंम होता है | प्रातःकाछ, सोलहवार हाथ | हुई मुक्तामणियोंक्रे आभरणोंसे विभूजित ॥ ५५९ ॥ कमढः 
पर और सुख धोकर सो छह छरका एवं सोलह गांठोंह्ा | आसनपर विराजमान अत्यन्त सुन्दर मुखकऋघल बड़ी शरद 
संसिद्ध डोरा बॉधना चाहिय/मालती पुष्प कपूर चन्दन | कालछके चन्द्रमाके समान कान्तिवालली स्तिग्ध नेत्रवाढी ए। 
हल कर किन ० हक 308 कस ओम छद्षम्ये | जारमुजावाली ॥ ६० ॥ कमर छिये हुए अमयके देनेत्रा 
नमः-लक्ष्मीके लिय्रे नमस्कार है इस मंत्रस गाठोंको अभि- | ही भक्तोंपर इतनी दयाछ हो रही है कि करकमल भक्तोंक 
मंत्रित करें और कहे कि धन; धान्य; घरा; घमे, कीवि, | «. उस् ही वर्दग्र है एपी एवं दोनों ओर दो हाथी पँँड 
जायु यश, श्री।५२॥ घोड़ा हाथी और पुत्रोंको, हें महान ही व्य्न हैं एंघी एवे दोनों और दो हाथी | 


३ ४.5. ८ >> की ; कक 2 5९ ट हक आटा 
किम ! मुझे दे इस मंत्रस दोँये हाथमें डोरा वॉच ॥ ५२ ॥ | न्‍ती भरकर अभिषेक कर रदे हूं।६१॥४ेसो सहालइमीर 
इस प्रकार ध्यान करके देवीको कपूर अगर मैं 


घोड़ा हाथी और पुत्रोंकों, हे महारूद्धिति ! सुझे दे इस । 

5५] ५३ ॥०. नी # # क ५४ $ या कर कर म््‌ को ऋण, व्वि दस्त मंत्र 
न्‍न्त्रसे दौँये हाथम डोरा बाँघे | ५३ ॥ दूबोके | चन्दनस लिखे । पीछे सुत्रतीको चाहिय कि ईल मेरे 
सोल्दुकाण्ड और अक्षत छेकर एकचित्त हो कथा | आवाहन करे ॥ ६२ ॥ है महारूद्षिम : अनार 


१ अक्षतदृवाकाण्डादिसिः | 























पदादिह ।। पश्चोपचारपूजय त्वदथ देवि कल्पितां ॥ ६३१॥ ४६ ६६.5३ तु सम्पर्ण कृयोइद्यापनं 
ब्रती ॥ विधिना येन विप्रेन्र शरण श्रद्धासमन्वित: ॥ ६४ ॥ दालव्या घहरेका वे स्वणश्द्गा दिस- 
युता ॥ ओतियाय खुबर्ण च तथान्रवसनादिकम्‌ ॥ ६०॥ यथाशकत्या खुवण च दत्वा पूण 
भवेद्रतम ॥ दिजेम्यः षोडशेन्यश्व प्रद्धाहसनादिकम्‌ ॥ ८६६ ॥ साथ उवाच ॥ एतत्ते कथित 
विप्र ब्रतानामुत्तम॑ ब्रतम्‌ ॥ लद्घबिधानाइनायथापाहनते बाडिछत फलम्‌ ॥ ६७ ॥ कूत्वा ब्र॒तं पर 
विप्र त्व॑ राज्षा तच्चकारय ॥ व्रतमेतखया विम्र देये श्रद्धावले परम ॥5८॥ नास्तिकार्ना पुरस्तात्त 
न प्रकाइ्य कथशवन ॥ नमस्कृत्वाथ त॑ साथ पढ़काहुत्थाप्प वाजिनम्‌ ॥ ६५ ॥ सरसोषम्भस्तथा- 
दाय पद्मिनीपत्रयन्त्रिम ॥ आरह्य तरम विप्रोी राजान्तिकछुपागमत्‌ ॥ ७० ॥ निवेद्य तद्भतं 
विप्रो राजानं तदकारयत्‌ ॥ नानाम्कार सम्भूत शम्बल बटुकस्य च ॥ ७१॥ ब्रतम्भावा- 
द्भवत्स भूदद्धद्वतां वर: ॥ अथारुह्म महीपालो बटुपयाणितं हयम्‌ ॥ ७२॥ तद्भतस्य अभा- 
बंण तण स्वपुरमागतः ॥ तमायानते समालोक्य राजाने भूपुरन्द्रम्‌ ॥ ७३ ॥ उत्सव चाँक्रेरे 
पौरास्तृयोदिकपुरःसर॥ ॥ चलत्पताकदोर्मालं लसत्कलशमोलिकम्‌ ।॥ ७४ ॥ पुर नृत्यदिवा- 
भातिच्छत्रघण्टो घवघरे। ॥ अथोत्कालिकया का्चिद्धावति सम वराड्ना ॥ ७५॥ स्खलमन्मुक्ता- 
लताजालिश्वतुष्कामिंव कुबती ॥ काचिदिमुक्तकेशव कृतकनवनाखना ॥ ७६॥ कांचेबन्रिलम्ब- 
झारातो कावेत्पीनपयोधरा ॥ अधाविशम्पहीपलों बटुना सहितों ग्रहम्‌ ॥७७॥ पौर- 
नारीजन क्षितलाजेः प्रितविग्रहहः ॥ अथोत्तीय हयात्तस्माद्वदबाह्व॒लाम्बितः )। 3८4 ॥ जगाम 
मड़लो राजा चोलदेवी तु यत्र वे ॥ दृष्टा तु चोलदेवी सा दोरक राजबाहुके ॥ विमृइय 
मनसा कद्धा शड़कां चक्रे नपे त्विमाम्‌॥ अआखेटकस्प व्याजेन गतोषन्याँ वलमभाँ भति ॥ <० ॥ 
सौभाग्याय तया बद्धो दोरकों राजबाहुके ॥ तथेव बढुकश्वाय द्वष्ठ मां भेषितों छ्ुवम्‌ ॥<१॥ 





खानसे यहाँ पधारिये। हे देवि | आपके लिए पश्चोपचार- | नगरके निवासी उत्सव करने छग, बाज वजन छगे, हर 
की पूजा तयार की है ॥ ६३ ॥| सोलह बे पूरे हो जानेपर | एकके हाथमें पताकायें -हिलरहीं थीं दरवाजोंमें कछश रखे 
उद्यापन कर, हे विप्रेद्र / श्रद्धाके साथ इस विधिसे उद्या- हुए थे ॥ ७७ ॥ छत्रके घण्टोंके घधरों ते नगर नाचते हुएकी 
पन करे ॥६४।॥ सोनेके सींगोंक साथ एक घेनु श्रोत्रियके तरह रूगता था। कोई सुन्द्री विकास वंचित्रस ऐसी 


ज् 
लिय देनी चाहिये तथा अन्नवस्र भी दे ॥ ६५ | शक्तिके भागी ॥ ७५ ॥ मानों शिस्के खुलेहुए बालोंके मोतियोंको 


ह्व्जिं सीके 
पोल कप | नर नोकिवोण चोर एप ही 


हमने तुम्हें इस ब्रतको व॒ता दिया है इसको विधिके साथ | ईसी अकार शिरके बाल खुले हुए थ । पर आंखें एके 
करनेस अनायासही वांछित फछ मिछ जाता हैं। ६७॥ | ही अजन था ॥ ७३ ॥। कोइ नितम्बके भारस दुखी थी 
है विप्र | इस श्रेष्ठ खतको आप करके राजासे कराना और | तो किसीके बडे २ मोटे स्तन थ। इधर यह सब हो रहा 
भी कोई श्रद्धालु जन हो उसे भी इस ब्रवकों कह देना | था उघर राजा बढ़कके साथ घर चढे जाते थे ॥ ७७॥ 
६८ ॥ पर नास्तिकोंके सामने कभी भूछकरभी न कहना | कन्यायें आचारके खीलॉकी वर्षा कर रहीं थीं जिससे 
प्रीछे बटुक उस साथंको प्रणामकर कीचसे घोडेको उठा शरीर मरगया पीछे घोडेस उतरकर वदुकक्की वाह पकड 
| 3 ले पते वात परी के पट खरा | ी॥ ४६ ॥ सह रण बह पंच झड़ देकी दी, 
चोछूदेवीन राजाके ह/थर्म डोरा बेवा देखा । ७९ ॥ सनस 


ब्रतकों राजासे तके प्रभावस बटुकवे 
राजासे कहकर कराया इस ब्र 5 | विचारकर ऋध हो राजापर यह झड्ढा की कि; शिकारके 


बेहुतसा टोसा हो गया ॥ ७१ ॥ राजा ब्रतके प्रभावस सब 
राजोम श्रेष्ठ हझोगया, बठुकके छाये हुए घोडेपर चढ़कर | हाय किसी दूस सी प्यारीके यहां ये गये थ। ८० ॥अपने 


| ७२ || इस ब्रतके प्रभावसे शीघ्रही अपने पुर चछाआया | सोभाग्यके रहिए उसने आपके हाथम यह डोरा बांध दिया 
भूके इन्द्र उस राजाको आया हुआ देखकर ।॥ ७३ ॥ | इसीतरह यह वढुकभी मुझे देखनेके लिए भजाहें || ८१ 


है 








१ ययप्येवद त्तरमाव्यस्तेहि कथित इति स्थायनमन्जप्रदति पंकज दुर्वि संदब्यति विसजनसत्रा 7? हक | बताकर प्र 
भृंतिपवघधिक उपछभ्वते तथाप्येतदग्रन्थक्ृता अथकथेद्यतः प्रागेव पूजा प्रकारों छिखिलस्वत्रेवतन्मंत्राणों लिखितत्वादत्र 
ते. द्िखितास्ते. ! 


















ततो दईंवदुष्टात्मा कोपादाच्छिद्य दोरकम्‌ ॥ चिक्षेप च महीएष्ठे स्‍्वसोभाग्यखुखेः सह ॥4२॥ 
न बुबोध च तां राजा त्रोट्यन्ती च दोरकम्‌_॥। सामन्तमखिश्त्याद्ेः कुदेत्वाता वनोद्धवार 
॥ ८३ ॥ चिह्लदेव्यास्तदा काचिदासी द्रष्ट समागता ॥ तया दोरकमादाय बटुमापृच्छच तद्भतम्‌ 
॥ ८४ ॥ तद्गभतस्थ विधान च स्वस्वामिन्ये निवदितमू ॥ ततो नूतनमाहूय चिह्तदेव्यकरोद्गतर 
॥ ८५ ॥ अथ संवत्परेषतीते लक्ष्मीपूजादिने नप ॥ तोयत्रिकस्प निस्वानं चिह्लदेव्या गृहेःशणोर 
॥ ८६॥ तदाकण्य महीपालो नूतन बटुमबबीत्‌ ॥ अहहाद्य दिन लक्ष्म्याः स ब्रतस्य क दोरक 
॥ ८७ ॥ इति प्ृष्टो दृप प्राह दोरकत्रोटनकऋमम्‌ ॥ तच्छृत्वा मड्गलो राजा चोलदेव्ये प्रकुप्य व 
॥ ८८ ॥ मयाद्य पूजन कार्य चिह्लदेवीग॒ह प्रति ॥ अथ मड्रलभूपालो बटुबाह्ृवलूम्बितः ॥८९ 
चचाल कमलाचांये चिल्लद्वीगह प्रति ै॥९०॥ अत्रान्तरे महालक्ष्मीबृद्धारूपं विधाय च ॥ जिज्ञा 
सार्थ ग़हं तस्याशोलदेव्याः समागता ॥ ९१॥ गच्छ गच्छाद्र दुष्टे किमिहागत्य करोषि में॥ 
तया दुराशयात्यथ लक्ष्मीः साप्यवमानिता ॥ ९२ ॥ चोलदेवीं शशापाथ महालक्ष्मीरतिक्षधा॥ 
कोलास्या भव हुऐ्टे त्व॑ं यतोहहमवमानिता ॥ ९३॥ चोलदेवी श्रियः शापात्कोलास्पा तत 
साभवत्‌ ॥ कोलापुरमिति ख्यातं क्षितों तन्मडूले पुरम्‌॥ ९४ ॥ अथायाता महालक्ष्मीश्रिलवदे 
वीनिकेतनम॥ बहुधा चिह्कंदुव्या सा लक्ष्मी: संमानिताचित!॥९५॥ वृद्धारूप॑ परित्यज्य पत्यक्ष 
साभवत्तदा ॥ पश्चोपचारपूजानिः श्रिय राक्षी ततोःचेयव॥ ९६ ॥ आतितुष्ठा ततो लक्ष्मीशिल्ल" 
देवीम॒वाच ह ॥ लक्ष्मीरवाच ॥ अचनात्ते प्रसन्नास्मि चिलछ॒देवि वर॑ं वृणु ॥ ९७ ॥ बत्रे वरं ततो 
राज्षी चिलदेवी शुभाशया ॥ चिल्लदेव्युवाच ॥ ये करिष्यन्ति ते देवि ब्रतमेंतत्सुरेश्वरि ॥ ९८॥ 
तद्देश्म न त्वया त्याज्य यावचन्द्रदिवाकरों ॥ अद्यारभ्य कथा होषा भूपसंबन्धिनी तु या ॥९ 
ख्यातिं याठ॒ क्षितों देवि भक्तिभवतु मे त्वयि ॥ सद्भविन कथामेता ये श्ृण्वन्ति पठत्ति च 
॥ १०० ॥ तेषां च वाज्छितं स्व त्वण देय सदेद हि ॥ तथेत्युक्वा महालक्ष्मीस्तत्रेवान्तरपी* 














इसके पीछे बुरे दिनोंके कारण अ्रष्टमनवाली चोरूदेवीने | तब चोलदेवी बोछी कि. दुष्टे | यहांसे अभी चली जा चढी 


क्रोषस उस डोराकों अपने सौभाग्यके सुखके साथ भूमि- 
पर तोडकर गेर द्या-॥ ८२॥ डोरा तोडतीवार राजाको 
पताभी न चला क्योंकि, वे खामन्‍त और मंत्रियोंके साथ 
वनकी बातोंमें छगे हुए थे ॥ ८३१ ॥ कोई दूसरी चिह्नदेवी 
नामकी देखनेको चली आईं उस टूटे डोरेकों हाथमें उठा- 
कर बटुस उस ब्रतकों॥ ८४॥ और उसके विधानको 
पूछकर ब्रतप्रहण किया । उस बढुने यह सब अपनी स्वामि 
नीको सुना दिया । उस चिह्नदेवीने नूतनकों बुछाकर दह 
प्रत किया ॥ ८५ ॥ है नप | एक सार बीतजानेपर 
लक्ष्मीकी पूजाके दिन चिह्नदेवीके घर गाने बजाने और 
नाचनेकी आवाज आने छगी ॥ ८६ || इसे सुनकर राजा 
नूतन द्विजसे पूछने छंगे कि, अहम हा मुझ ब्रतीका लक्ष्मीका 
डोरा कहां है | ८७॥ राजाके पूछतेपर नूतनने ड्ोरेके 
दा सब हाल सिलठसिलेवार कह दिया, यह सुनचोल- 

बढ़ा नाराज हुआ || ८८ ॥ अब मैं चिह्ददवीके घर 
जाकर पूजन करूँगा, ऐसा कह सज्डलराजा बटुककी बाँह 
पकड़कर 0 ८९ ॥ कम्रछाके पुजनके छिए चिह्नदवी के 
घरको चला १९० ॥ इसी बीच महालक्ष्मी बुढ्ी बनकर 
जाननके किए उस चोछदेवीके घर चल्ली आयी ॥| ९१॥ 


जा, यहाँ आकर तू सरा क्या करती है। उस दुराशाने 
इस प्रकार लक्ष्मीकाभी अत्यन्त अपमान किया ॥ ९९॥ 
फिर महारूक्ष्मीने भी कोधस चोलदेवीको शाप दिया ढकि। 
ह दुष्ट : तू सूकरक मुखबाली हो जिम मुखसे कि, तूने 
मेरा अपमान किया हैं ॥ ९३॥ चोढदवी छक्ष्मीके 
शापसे सूकरमुखो हो गई जहां वो ऐसी हुईं वो मंगढ३९ 
कोलापुरके नामसे प्रसिद्ध हो गया ॥ ९४ ॥ इसके बाद 
चिह्नदेवीके घर लक्ष्मी मां आयी उसने उसका अलन्त 
सम्मान किया ॥ ९५॥ उस समय वो' वृद्धाके रूपकों 
छोडकर प्रद्यक्ष हो गयी, रानीने पंचोपचार पूजास « 
जीका पूजन किया ९६ || उससे रूक्ष्मीजी परस्र प्रसन्न 
होकर बोली कि, है चिह॒देवी ! में तेरी पूजोसे प्रसन्न हूंतू 
वर मांग ॥ ९७ ॥ पवित्र हृदयवालढ्वी चिल्नदेवीन लक्ष्मीजी 
से वर मांगा कि, हे देवि ! हे सुरेश्वारि | जो आपका ब्रत 
करेंग ॥ ९८॥ जबतक चाँद और सूरज रहेंगे उनके घरको 
कभी सत छोडियगा अबसे लेकर राजा और अ 


कथा ॥ ९९ ॥| भूमिपर प्रसिद्ध होजाय । हे देवि ! मेरी 
प्रा 


आपमें भक्ति हो । इस कथाको सद्भावसे जो कहे या 
॥ १०० | उनके वांछित कार्मोकीं आप सदादईी 
करना, महारूुश्सो 'एव्मरतु' ऐसाही हो, यह कहकर वह 


अतानि, | भाषाटीकासमेलः ! ( ३१७५ ) 








यत ॥१०१॥ अथ मड्लभूपालस्तत्रागत्य श्रियोप्चंनम ॥ चक्रे परमया भक्‍त्या चिल्लदेव्या सम- 
न्वितः ॥ २ ॥ अधेष्यंया दराचाराचिछदवीग्रह॑ प्रति॥ चोलदेवी समायाता द्वारस्थवारिता 
जनेः ।।३॥ ततो जगाम विपिन यत्रासीदर्धिरः मुनि: ॥ अझधाजलोइ्याइडलाकारा ज्ञानदष्टधणा वि 
चित्त्य ताम्‌ ॥ ४ ॥ मुनिस्तु श्रीत्रतं दिव्यं चोलदवीमकारयत ॥ ब्रते कलेः्थ सखाता चोलदंबी 
महायशा। ॥ ५ ॥ दाक्षिण्पकेलिलीलानिलावण्येकनिकेतनम्‌ ॥ ततः कदाचिदागत्य वनमाखे- 
टके बृपः ॥६॥। मुनेर्वेश्मनि राजा ता ददर्श बामलहोचनाम्‌ ॥ अथ राजा छुनें प्राह केय॑ धन्यति 
कथ्यताम्‌ ।।७॥ तदृवृत्तान्तं समाख्याय राक्षे तां प्रददों सुनिः। अथागत्य निज राज्य चोलदे- 
वीसमन्वितः ॥ ८ ॥ चिह्लदेव्या च सहितो बुझ्चुजे मड्रलो तृप: ॥ चिछदवी वर चक्रे चोलदंवी 
समागमम्‌ ।। ९ ॥ समुद्स्य यथा गड़ायमुने सड़ते सदा ।। तथा मड्गलभूपस्य जाते ते वाम- 
छोचने ॥ १० ॥ परस्पराधिके ते त॒ पिये राज्ञों बभूवतः ॥ चिल्॒देव्या सम॑ सोड्थ चोलदेव्या 
सहाखिलाम ॥ ११ ॥ सप्तद्वीपवर्ती प्रथ्वीं बुछुजे मड्रलो नुप: ॥ व्रतस्यास्येव सामथ्याद्विटुकः 
सोएि नूतन ॥ १२ ॥ अभूनन्‍्मड्रलभूपस्य मन्त्री लव यथा गुरु॥ अआुक्त्वाथ सकलान्भोगान्‌ 
मड़लो भूमुजां वरः॥ १३ ॥ स पुनः स्वगेमेत्य।भून्नक्षत्रं विष्णुदेवतम ॥। नारद उवाच !॥ 
एतत्ते कथितं शक्त ब्रतानामुत्तमं ब्रतम्‌ ॥ १४ ॥ यत्कथाश्रवणेनापि लगते वाज्छितं फलम्‌ ॥ 
प्रयागमिव ॒तीर्थेषुदेवेब भगवानिव ॥ १५॥ नदीयु च यथा गड्जा ब्रतेप्वेतेष तद्धतम्‌ ॥। धर्म 
चाथ च कार्म व मोक्ष च यदि वाज्छसि॥ १६॥ तहींद च ब्तं शक्र कुर श्रद्धासम- 
न्वितः ॥ धन धान्य॑ धरां धर्म कीतिमायुयेशः श्रियम्‌ ॥ तरद्भाव्‌ दन्तिनः पुत्रान महालक्ष्मी 
प्रयच्छाति ॥ १७ ॥ श्रीकृष्ण उबाच ॥ व्रतमिदमथ चक्रे नारदेनोपदिष्टे सुरप्तिरपि यस्मादा- 
विछिता्थ स लेमे ॥ त्वमपि कुछ तथैतद्धर्मसूनों यथा स्थादमिमतफलसिद्धिः परत्रपोत्राभिवृद्धिः 
॥ ११८॥ इति श्रीमविष्योक्ता महालक्ष्मीत्रतकथा संपूर्णा ॥ 


हीं अन्तर्घान हो गई ॥ १०१ ॥ संगछराजान वहां आकर 
छक्ष्मीका पूजन चिह्देवीके साथ परम भक्तिसे किया 
॥१०२१॥ दुष्दा चोलदेबी इंप्यंके मारे चिल्देवीके घर 
जाने छगी । पर द्वारके पहरेदारोंने उस भीतर नहीं जाने 
दिया ॥ १०३ ॥ इसके बाद वो उस वनमें पदँची जिसमें 
कि, अगिरा ऋषि तप कर रहे थे उसकी निराली दशा देख 
कर वे ज्ञानदृष्टिसे जानगये ॥ १०४ ॥ मुनिन चोलदेवीसे 
छक्ष्मीजीके दिव्य ब्रवकों काराया उस ब्रतके करतेही चोल- 
देवीभी बड़ी सराहना योग्य बन गईं ॥ १०५ ॥ दाक्षिण्य 
केलि और लीलाओंस रावण्यका एक स्थान बनीहुईं थी, 
कभी राजा शिकार खेलता हुआ उस वनमें चलढाआया 


. ॥ १०६ | मुनिके घरमें उस बाम छोचनाकों देखा इसके 


बाद राजा मुनिस बोछा कि, यह धन्‍न्या कोन हैं यह 
बदाइये !(॥| १०७ ॥ मुत्रिन उसके सब वृत्तान्तकों कहकर 
दर, देदिया कर ५२३ का 

उस राजाको 7, इसके बाद वो चोहदेवीके साथ 

४ुफ कक है “५ 

अपने राज्यमें चछा आया ॥ १०८ | चिल्देवी ओर 
चोलपवीके साथ राज भोगने लगा,चिलरदेवीने चोलदेवीकि 
साथ अच्छीतरह समागम क्िय१०९।॥ जेस समुद्रम गया 


आपसमें अधिक प्यारीहुई राजा चिहदेवी और चोडदेंवी 
दोनोंके साथ सारी॥१११॥सातद्वीपवाली प्रथिवीको भोगने 
छगा इसी बतके सामथ्यस नूतन नामका बुक ॥ ११२॥ 
समंगछ राजाका मंत्री हुआ जैसे कि; तुम्हारे बृहस्पतिजी 
मंत्री हैं। राजाओंमें सवश्र्ठ भूमिके सब भोगों की भोगकर 
॥ ११३ ॥ स्त्रगेभ जा विष्णुद्वताका नक्षत्र हुआ । नारद 
बोल कि; है शक्र ! यह हमने त्रतोंका उत्तम ब्रत सुना दिया 
है | ११४ || इस ब्रतकी कथा सुननेसे भी वाडिछतफछ 
मिल जाता हैं। जैसे. तीर्थांमें प्रयाग ओर देवताओंमें आप 
॥ ११० | नदियोंमें गंगा है इसी तरह ब्र॒तोंमें यह महा- 
लक्ष्मीका त्रत है जो आप धर्म, अथे, काम ओर सोश्षको 
चाहते हों।। ११६ ॥ तो हे शक्त | इस ब्रतको श्रद्धांके साथ 
करें; इस ब्रतके कियसे धन, घान्य, घरा/धर्म, कीति, आयु, 
यश श्रो, घोडा, हाथी और पुत्रोंको मह्ाल्क््मीजी देती 


हैं ॥ ११७ ॥ भगवान्‌ श्रीकृष्ण बोले कि, नारदजीके उप- 


देंशसे इन्द्रन जिसने इस ब्र तक किया उसे इसके प्रभावस 
सत्र मनोरथ मिलगये। हे घमेराज ! आप भी इस ब्रतकों 


करें जिससे आपके भी सव मसनोकास पुरे होजायेँ और 


और यमुना दोनों संगत हो जाती हैं उसी तरह मंगल | पुत्र पौत्रोंकी बृद्धिहो ॥ ११८ ॥ यह श्रीमविष्ययुराणको 
राजासे वे दोनों संगत होगयीं ॥९१०॥ राजाकी वे दोनों | कही हुईं महालक्ष्मीके ब्रतकी कथा पूरी हुई ॥ 
8 नकल कील न अप लत कद तल दम फरि नतस लकी ल डिश मिड अल कल कल तल कक लक तल लक मम नली लि म लि कड जमकर कल तल कील वी लि लत अत निकल डील डक ला बा 


१ एतठदुत्तरं सविस्तर उद्यापनविधिश्नताके उत्तस्तत एवाव पंतव्यः । 


पलराज:३ | . 





अथ महाष्टमी ॥ 


आशिनशक्काष्टमी ॥ महाष्टमी॥तत्राष्टम्यां भद्काली दक्षयज्ञाविनाशिनी॥प्राइु्नूता महाघोत 
योगिनीकोटिलिद्वता ॥ इयं च सत्तमीविद्धा न कायों ॥ तदुक्त दवीपुराण--सप्तमीवेधसंयक्ता ये; : 
कृता ठ महाद्रमी॥पुत्र॒द रधनेहींना श्रमन्तीह पिशाचवत्‌॥ शरज्न्माष्टमी पूज्या नवमीसंयुता 
सदा ॥ सप्तमीसंयता नित्य शोकसन्तापकारिणी ॥ जम्भेन सप्तमीयुक्ता पाजिता च महा्टमी। | 
इन्द्रेण निहतो जम्भस्तस्यां दानवपुद्धव! ॥ तस्मात्सवेप्रयत्नेन सत्मीसहिताष्टमी ॥ वजनीया 
च सतत मलष्यः शुभकांक्षिनिः ॥ सत्तमी कलया यत्र परतश्राष्टमी तथा॥ तेन शल्यमिदं प्रो | 
पुत्रपोत्रक्षयप्रदम्‌ ॥ पुत्रान्हन्ति पशन्हर्ति राष्ट्र हन्ति सराजकम। हन्ति जानपदांश्वापि सप्तमी- 
सहिताष्टमी॥शक्ृपक्षेष्टमी चेव शक्ृपक्षे चतुदंशी॥पूर्वविद्धा न क॒तेव्या कतंव्या परसंयुता॥अत्र 
त्रिमुहूर्तत्यूनापि सप्तमी वर्जेन्रयोजिका न तु त्रिमहर्तत-सप्तमीस्वल्पसंयुक्ता वजनीया सदा- 
ष्टमी॥स्तोकापि सा तिथि; पुण्या यस्यां सूयोदयों भवेत।नवमीयुक्ताया अलाने तु सप्तमीयुतेव 
कायों ॥ उपवास महाष्टम्यां पुत्रवान्न समाचरेत्‌॥ सप्तशत्यास्तु पाठेन तोषयेजगदम्बविकाम ॥ 
अशोकाप्टमीवतम्‌ ॥ अथ आशिनकृष्णाष्टम्पामशोकाष्टमीव्रतम्‌ । हेमाद्रावादित्यपुराणे - अष्टमीष 
च सर्वासु पूजनीया हाशोकिका ॥ गन्धमाल्यनमस्कारधूपंदीपैक्ष सर्वदा॥ तस्मिन्नहनि या 
भ्ुड्धत्ते नक्तामेन्दविवार्जुते॥ भवत्यथ विशोका सा यत्र यत्रामिजायते ॥  अष्टमीए च सवार 
न चेच्छक्नोति वे मुने ॥ प्रोष्ठप्यामतीतायां 


कामफलप्रदम ॥ इत्यशोफाएमी ॥ 


. काब्नैरवाष्टमी ॥ अथ मार्गशीषकष्णाइमी कालमभेरवाष्टमी 


भवेत्कृष्णाष्टमी तु या ॥ तत्र कार्य बश्रत॑ त्वेतत्सब 


॥ सा च राजिव्यापिनी गआाद्या॥ 


म।गंशीपसिताष्टम्यां कालमेरवसब्रियों ॥ उपोष्य जागर कुवेन्सवेपापेःप्रमुच्यतें ॥ इति काशी 


खण्डाद्रात्रित्रतत्वावगतेः 


महाट्टमी आश्विन शुक्ला अष्टमीको कहते हैं-इसी अष्ठ- 
मीके दिन कोटि योगिनियोंके साथ दक्षके यज्ञका विध्वेंस 
करनेवाली परम भयकर भद्गरकाडी प्रकट हुई थी । इसको 
सप्तमी विद्धा न करनी चाहिये, यही देवी पुराणमें लिखा 
हुआ है कि, जिन्होंने सप्तमीविद्धा महाअष्टरमीकी है बे पुत्र 
ह्लीहीन हुए पिशाचोंकी तरह घूमेंगे । यह अष्टमी सदा 
पवसी विद्धाही करती चाहिये। सप्तमी संथुता सदाही 
शोक सन्तापको करती हैं | जभने सप्तमी युवा महाष्ट- 
प्रीका पूजन किया था इसी कारण दानवशिरोमणि जँ भको 
न्द्रने मार दिया था। इससे जो अपना भरा चाहें उन्हें 
वाहिये कि; सप्ततीसहित अष्टमीकों कमी पूजन न करें । 
नह सप्तती एक कलाके साथ भी अष्टमी युक्त हो तो उसे 


गाछकी नोक कहेंगे वो पुत्र और फौत्रोंके नाशको देने 


गली है वो पुत्रोंको मारती है, पशुओंको मारती है तथा 
एजासहित राष्ट्रको नण्ट करती हैं; देशोंका नाश करती है; 
प्प्सी सहिता अष्टमी इतना कौतुक करती है । शुह्ुयक्षकी 
अष्टमी तथा कृप्णपक्षकी चतुद्शी इनको पृवेबिद्धा न 
करनी चाहिये, पर संथुता करे। इसमें तीन मुहतेसे कमभी 
वजित्‌ की गई हैं यह बात नहीं हे कि, ज्िमुहूर्ताही वर्जी 
गई हो, है हे संयुक्त अष्टमी भी हो तो उसे 


भो छोड दे चाहें लिज-+-.+-7 हे पर सूर्योदय उसमें हो तो _ क्योंकि भेरवकी उत्पत्ति प्रदोषके समयमें हुई थी ऐसा कोई हो पर सूर्योदय उसमें हो तो 





- १ अष्टसी। २ दीपान्न संपदा 


रे ॥ रूद्धब॒तेड सर्वेषु कर्तव्या सम्मुखी तिथिः। इति बहावेबर्तान॥ 
दिनद्रयेंडशतो रात्रिव्याप्तावत्तव ॥ भरवोत्पत्तेः 


प्रदोषकालीनत्वादिति केचित ॥ तत्न । 


वो तिथि परम पुण्य शाह्िनी है। यदि नवमी युक्ता न 
मिले तो सप्तमीयुक्ताही करछे। पुत्रवानकों चाहिये कि। 
महाप्टमीके दिन उपवास न करे पर सप्तह तीके पाठसे 
जगद॒म्बिकाको प्रसन्न करदे ।॥। 

. अशोकाष्टसीतव-आख्रिनक्ृष्णाष्टमीके दिन होता है । 
ही] ७ ५2 च्छै 
हमाद्रिम आदित्य पुराणस छिखा है कि, सब अप्टमि- 
यॉमें अशोकिकाका सदा गंधसाल्य नमस्कार धूप और 
दीपोंस पूजन करे। जो ख्लवी इस दिन चन्द्रमाके विना 
को रातमें भोजन करती है वो जहां जहां पेंदा होती है वहां 
वहाँ विशोका होती है। हे मुने | जो सब अप्टमियोंमे ब्रव 
न्‌ कर सके तो उसे चाहिये कि; भाद्रपदके बीत जानेपर 
जो क्ृण्णाष्टमी आये उसमें सब कामनाओंके देनेवाले इस 
त्रतकों करे।यह अशोकाप्टमीके ब्रतका विधान पूरा हुआ। 

कालभेरबाष्टमी-मार्गशीर्ष क्ृष्णा अष्टमीकों कहते हैं 

इसे रात्रिव्यापिनी छंनी चाहिय | मार्गशी्ष क्ृष्णाप्टमीमें 
काल भेरवके समीप उपवास करके जागरण करता हुआ 
सूत्र पापोंसे छूट जाता है, इस काशीखण्डक्षे वाक्‍्यसे अतीत 
होता है कि, यह रात्रित्रत है ! त्रह्मवेवतमें लिखा हुआ है 
सभी रुद्रब्रतोंमें समुद्री तिथि करनी चाहिये । यदि दो द््वि 
अशसे राज्िम व्याप्ति हो तो उत्तरा ग्रहण करनी चाहिये, 
क्योंकि भेरवकी उत्पत्ति प्रदोषके समयमें हुईं थी ऐसा कोई 
इत्यपि पाठः। 









ब्तानि, ] 


भाषाटीकासमेतः । 





५4940: % 8६ ॥22202568 00242 76% 

















०० पी लक ७ ३ | 


शिवरहस्ये मध्याद्दे भेरवोत्पतेः अबवणाद ॥ तथा च तत्रेव ॥ नित्ययात्रादिक॑ कृत्वा 
मध्याहे संस्थिते रवौ | इत्युपक्रम्य बहाणा रुद्रेधवज्ञात उक्तए--लंदोप्रसणदतघान्मत्त 
श्रीकालमैरवः ॥ आविरासीत्तदालोकान्‌ भीषयन्नखिलानपि ॥ इति ॥ अत्र कालमेरवपजोक्ता 
काशीखण्डे--कृत्वा च विविधां पूजा महासम्भारविस्तरे! ॥ नरो मार्गासिताष्टम्याँ वाषिंक॑ 
विप्नम॒त्खजेत ॥ तथा पिवृतपेणमपि तत्रेवोक्तम-तीर्थे कालोदके स्थात्वा तपणं विधिपूर्वे- 
क्रम ॥ विलोक्य कालराजान निरयादुद्धरेत्पितृव्‌ ॥ ज्वय ऋष्पटनीइतकथ-- खत डवाच ॥ 
ब्रतानि च प्रवक्ष्यामि श्रणध्वं मुनिपुद्धबा: ॥ तत्र कृष्णाष्टमी पुण्या सर्वपापप्रणाशिनी ॥ १ ॥ 
विश्णुत्व॑ प्रातवान्विष्णसुरेशत्वं शचीपतिः॥क्ुबरो यक्षराजत्व नियन्द॒त्व॑ यमः स्वयम्‌॥ ॥ २ ॥ 
चन्द्श्नर्द्वत्वमापन्नों गणेशत्वे गणाधिपः । स्कन्दः सेनापतित्वे च तथा चह्यश्गशरत॥ हे 
कृत्वा चेश्वयेमापत्राः सौभाग्य देवेवक्रमाः ॥ ब्रतस्यास्य ्रभावेण लक्ष्म्याः पतिरनुद्धरिः ॥ ४॥ 
ययातिः सार्वभौमत्व॑ तथा चान्ये नृपोत्तमाः॥ ऋषयो सुनयः सिद्धगन्धवाणां च कल्यकार ॥५॥ 
क॒त्वों वे परमां सिद्धि प्राप्ताश्व मुनिषुद्भवाः ॥ नन्‍्दीखेरण यत्मोक्ते नारदाय महात्मने॥ ६॥ 
कृष्णाष्टमीव्रत श्रेष्ठ सवेकामफलम्रदम्‌ ॥ मेरोयदक्षिणं श्वई्ट सुराखरनमस्कृतम्‌ ॥ ७ ॥ तत्र 


नन्दीश्वरं दृष्ठा सर्वज्ञ शाम्भवकछूमम्‌ ॥ उपाध्यमा् सुनिन्निः स्तूयमार्न मरूठ्ण ॥ 


६ 
८ ॥ स्वाल- 


प्रहकर्तार स्तुत्वा तु विविधेः स्तवेः ॥ अबवीत्मणिपत्याथ दण्डवन्नारदों खुनिः | ९ ॥ नारद 


उवाच ॥ मगवन सर्वतत्वत्ष सर्वेषाममयप्रद्‌ ॥ केन ब्रतेन भगवंस्तपोद्रद्धिः 


प्रज्ायले ॥ १० ॥ 


सौभाग्य कान्तिरेश्वथमपत्यं च यशस्तथा ॥ शाश्वती साक्तिस्‍न्ते च छः व्व्िरोच्रनी ॥११७ 


भगवंघ्तद्वतं बृहि कारुण्याच्छड्टरमिय ॥ नत्दिकेश्वर 
तच्छुणु ॥ १२॥ गणेशत्वं मण लब्घं येन पुण्येन भो 


' 2 कहै३+ श्र 
कहते हैं पर उनका यह कहना ठीक नहीं हे क्‍योंकि शिव- 
रहस्यमें मध्याहका लसे भेरवकी उत्पत्ति सुनी जाती हे | | 
ऐसा ही वहां लिखा हुआ हैं कि नित्य यात्रादिक करके 
मध्याहमे सूर्यके रहते यहांसे प्रारंभ करकर “ त्रह्माने जब | 
रुद्रका अनादर क्रिया ” यह कहा है उस समय निष्याप | 


इगप्ररूप शिवजीसे, संपूण छोकोंको डराते हुए श्रीकालभेरव 


प्रकट हुए। यहांही काशीखण्डमे काडमैरवकी पूजाभी कही | 
है कि सनुप्य अगहन-क्ृष्ण पक्षकी अष्टमीके दिन महा-। 
संभारोंके विस्तारस भेरवकीौ अनेक तरहकी पूजा करके | 
भपने साल भरक विष्नोंकों छोड देता हैं इसी तरह पित: 
रोंडा तरपण भी इस दिन कहा है कि काछोदक तीथमें 
स्नान करके विधिपूर्वक तर्पण कर काछराजाकों देखकर | 
हुःखसे पितृगणों का उद्धार करता हें ॥ क्ृष्णाप्टमीत्रत कथा- | 
सूतजी बोले कि हे अरष्ठ मुनियों | सुनो में ब्रतोंकों कहूंगा | 
उनमें सब पापोंके नाश करनेवाली क्ृप्णाष्टमी परमपवित्र | 


है॥ १ ॥ विप्णुको विष्णुपना सुरेशको सुरेशपना; कुबेरकों 
यक्षोंका राजापना, यमको नियन्तृपता ॥ २ ॥ चन्द्रमाको 
चन्द्रपना, गणशको गणपृतिपना स्कंदुकों सनावतितनातथा 
दूसरे एश्वयशालियोंको इश्वरपना ॥ ३ | इसके करनेसेही 


् १, 
मिला है। इसी ब्रतके प्रभावसे अप्सराओंको सौभाग्यमिला 





१ अप्सरसः । २ ब्रतमिति शेषः । 





उबाच ॥ कृष्णाष्टमीव्रते श्रेष्ठमस्ति नारद 
सुने ॥ मासि मार्गशिरे जाते कृष्ण 


ध््‌ कप क्र नह भू 

है| इसी ब्रतक प्रभावसे भगवान्‌ छक्ष्मीके पति बने ॥४॥ 
इस ब्रतकों राजा करके उसी प्रकार चक्रवर्ती वन जावा 
है जैसे कि दूसरे चंक्रवर्ती होते हैं। ऋषि मुनि तथा सिद्ध 
गन्धवाँकी कन्याएँ ॥०। है मुन्तिपुंगवो | इस ब्तको करके 
ही परम सिद्धिको प्राप्त हुईं हैं जो नन्‍्दीश्वरने महत्मा नार- 
दक लिये।६।सब कामनाओं का देनेवाल्ा स्वश्रष्ठ कृप्णाष्ठ- 
मीका ब्रत कहा था मेरुके दाहिने झंगपर जिसे सुर ऑर 
असुर दोनों नमस्कार करते हैं ]»॥ जिसे शिवजी अत्यन्त 
प्यारा मानते हैं जिसकी मुनिछोग उपासना कर रहें हैं जो 
स्वंज्ञ हैं जिसकी मरुदगण स्तुति कर रहें ह।॥ <॥ जो 
सबपर कृपा करनेवाढ हैं एसे नन्दिकेश्वरजीको स्तुति- 
पूर्वक दण्डवत्‌ प्रणाम करके नारद सुनि बोढे ॥ ५ ॥ 
भगवन्‌ | आप सबके दत्त्वको जानते हो अभयके दाताहो | 
है भगवन्‌ ! जिस त्रतके करनेंस तपकी वृद्धि हो ॥ १० !| 
जिससे सौभाग्य, कानित, ऐश्वय्ये, अपत्य, यश, ५४88 
अन्तमें सब कर्मबन्धनोंके नष्ट करनेवाली मुक्ति मिल्जाय 
॥१९॥ हे जकर के प्यारे ! कृपाकरके उस ब्रतकोी कहिय। 
सन्दिकेश्वर बोले कि, हे नारद ! ऐसा कृप्णाप्टीका श्रष् 
ब्रव है उसे सुन । हे मुने | उसीके पुण्यल सुझे गणेशपना 
मिछा है | २२ ॥ मागशी्ष झासकी ऋृष्णाष्टमीको 


घबलतराज३ । [ भष्टनी-- 




















0००० |०/००६७०।भण॥०००॥०००००००००००००००००००००००- हा ाएशशशशशशणशणशशशशशाशशशशआ#श#शआशशशशशशशशशशशथशशशशशशशशशशशशशशथशथशथशशथशशशशशशशशशशशशशशशश%एणशश च ६१ का रा 


छम्याँ जितेन्द्रियः ॥ १३१॥ अश्वत्थस्य च काप्ठेन कृत्वा वे दुल्तधावनम्‌ ॥ स्ान॑ कृत्वा तु 
विधिवत्तपंणं चव नारद ॥ १४॥ आगत्य भवन चेव पूजयेच्छकरं श्रम ॥गोमूत्र प्राइय विधि- 
बढुपवासी भरवेत्रिशि ॥ १५ ॥ अतिरात्रस्य यज्ञस्थ फल चाष्टगुु्ण लमेत्‌॥ सपिषः पाशन पौरे 
दन्तकाष्ठ॑ च॒ तंत्स्मृतम्‌ ॥१६॥ पूजयेच्छम्शुनामान भगवन्त महेश्वरम्‌॥ वाजपेयाष्टक॑ पुण्य 
प्राप्नोति श्रद्धबान्वितः ॥१७॥ माघे वटस्य काठ च गोक्षीरप्राशनं स्मृतम्‌॥ महेश्वरं छुसं- 
पूज्य गोमेधाडग्ण फलम॥ १८ ॥ फागुन दुन्तकाछठ तत्सापिषः प्राशन स्मृतम्‌॥ संपूजये- 
 न्महादेवं राजसूयाष्टक फलम्‌॥ १९ ॥ काष्ठमोहम्ब्रं चत्र भाशने भजिता यवा॥पूजयेच्छम्थु- 
नामानमश्वमेधघफले लम्ेत्‌ ॥ २० ॥ शिंव सम्पूज्य वशाखें पीत्वा चेव कुशोदकम्‌ 4 मर 
मेधा्टक॑ पुण्य प्राप्नोत्थेव हि नारद ॥ २१॥ ज्येष्ठे प्लार्श भवेत्कार्ठ सम्पूज्य पश्ुपति विश्वम॥ 
गवां श्रड़ोदर्क प्राइय स्वपेदेवस्य सत्रिधो ॥ै २२ ॥ गयवां कोटिप्रदानस्य यत्पल तद॒वापतलुयात्‌ || 
आाठे चोग्रनामानमिष्ठा संप्राइय गोमयम्‌ ॥ २३.) सोत्रामणेस्ठ यक्ञस्य फलमष्टग्रणं लमेव्‌॥ 
पालाशं श्रावणे काठ शर्व संपूज्य नारद ॥ २४ ॥ प्राशयित्वाकंपंत्राणि कल्प॑ शिवपुरे बसेत्‌॥ 
मासे भांद्रपदेड्टम्यां उयम्बर्क संप्रपूजयेत्‌ ॥२५॥-प्राशनं बिल्ब॒पत्रस्थ स्वदीक्षाफल लम्ेद्‌॥ 
आश्ििने जम्बुवृक्षस्य दन्तकाष्ठमुदीरितम्‌ ॥ २६९ ॥ इश्वरं पूजयेद्धकत्या म्राशयेत्तण्डलोदकम ॥ 
पौण्डरीकस्य यक्ञस्थ फलमष्ठगु्ण लभेत॥ २७ ॥मासे तु कांतिकेःष्म्पामीशानाख्यं अपूजयेव॥ 
पश्चगव्यं सकूत्पीत्वा अप्निष्टोमफल लगत्‌ ॥ २८ ॥ उद्यापर्न च वर्षान्ते प्रकुर्याद्धक्तितत्परः॥ 
विरच्य लिड्डतोभद्व पूजयेत्सवंदेवताः ॥ २५ ॥ वितानं तत्र बन्नीयात्प्ववर्ण खुशोभनम्‌॥ 
आचार्य वरयित्वा च गोया रुद्र॒स्य संयुताम्‌ ॥ ३० ॥ सुवर्णप्रतिमां तत्र व्रषभ॑ रजतस्थ च॥ 
कलशो पूजयित्वा च रादो जागरमाचरेत्‌ ॥ ३१ ॥ झभात च पुनः पूज्य अप्लिस्थापनमाचरेत्‌॥ 
हुनेदशशतं चेव तिलद्गव्यं बृतप्लुतम॥३१शाच्यम्बकेण च मन्त्रेण गोयाश्रेव पृथकपृथक्‌ ॥ वर्षान्ते 





जितेन्द्रिय होकर !। १३ | अश्वत्थके काठसे दुन्त धावन 
करके हे नारद ! विधिपूव कु स्वान और तपंण करके॥१४॥ 
घर आकर शेकर प्रभुका पूजत करे । गोमूत्रका विधिपू्वेक 
प्राशन करके रातको उपवास रखे ॥ १० ॥ इससे अति 

रात्र यज्ञका अठगुना फछ मिलता है, पोषमें धीका प्राशत 
भोर अश्वत्यके काठकी दातुन कही है ॥१६॥ शंभुनामऋ 
भगवान्‌ महेश्वरकी पूजा करे श्रद्धावालेको वाजपेय यज्ञका 
आठगुना फछ मिलता है |॥१७॥ माधमें गोक्षी एका प्राशन 
और वटके काठकी दांतुन कही है। इसमें महेश्व॒रकी पूजा 
करके गोमेघका अठगुता फछ मिलता है ॥१८॥ फारणुनमें 
वटके काठका दांतुन तथा सर्पिका प्राशव छिखा दै इसमें 
महादेवकी पूजा करके आठ राजसूययोंका फल मिरजाता है 
॥ १९ ॥ चेत्रमें उठ न्वरके काउकी दांतुन तथा भुजेहुए 
जोओंछा ग्राशन छिखा हैं इसमें शंभुवामा शिवका पूजन 
करके अव्वप्तषका फल पाता है॥२०।वैज्ञाखमें शिवकोपूज 
कुशके पानीको पी, है नारद आठ नरमेधके पुण्यको पाता 
६ ॥२१॥ ज्येठ्रम पिछलनके काठकी दांतुन तथा विशभु- 
पशुप्तिकी पूजा क एके गोखगोदक परिमाण मात्र पानीका 
क्‍ का करके देवकेही समीप सोजाय ॥ २२ ॥ कोटि 
गऊ दनेका जो पुण्य है वो उसे मिलता हैं। आबवाढमें 
इप्ननास रा शिवका पूजन और गोमय रा प्राशन करे।२३॥ 


७॥७ए७/"ए#ए"ए"-७८/-८"७७४७७७एएशए७०७०७७७७७७ए्शरऋश""शआशआआआआआआआ॥७७/शश"शआशआआआआआआआआ७७एएएछएछएए७८ए्एश॥श््रण्णणणणणाणणणणणणणाणाणा आया अललभलमललललबललल नल बल लक 
वो सोत्रामणी यज्ञके सौगुने फछको पाजाता है । है नारद! 


आरवणमें पछाशके काष्ठका दांतुव और शवेका पूजन करता 


है ॥ २४ | एवम्‌ आकके पत्तों का प्राशन करता है। वह 
एक कटय शिवपुरम रहता है। भाद्ररदमें अष्टमीके दिन 
तउयेबक भगवानकी पूजा करे || २५ || बिटत पत्रका प्राशन 
करे उसे सब दीक्षाओंका फड मिछता है) आख्ििवर्म जबु 
वृक्षके काप्ठको दांतुन कही है ॥ २६ ।+सक्तिपूवे क ई ध्ररकी 
पूजा कर चावलों का पामी पीये पॉडरीक यज्ञके आठउगुने 
फलको पाता हू ॥ २७ | कार्पिक्त मासमे अष्टमीके दिन 
इशान नामके शित्रकी पूजा करनी चाहिये | एकवार 
पत्काव्यकों पीकर अभिशोपकरे फछको पाता हैं ॥२८॥ 
5 वरके बाद भक्तिफे साथ उद्यापत करना चाहिये 
डितवोमद मसर्डछ बता!कुए सब देवताओंका पूजन 
करना चाहिये ॥ २९ | वहां एँँवरंगा सुन्दर बितान 
बंधता चाहिये। आचायये का वरण करे रुद्र सदित गौरीकी 
|| ३० || सोवेकी सूर्ति बनावे । चांदीका बृत्रभ बनाये 
इनक! विधिके साथ करू धपर पूजन करके रातकों जागरण 
करे। प्रभावमें फिए पूजन करके अप्लि स्थापत करे छ्ृतते 
॥ ३१ ॥ भीगे हुए तिल द्रव्यकी एकसों आठ आहुवि 
॥ ३२ || “आओ ज्यम्बऊ यजञामहे ” निन+-+-ब----०००_ शक हे! | ॥ ३२॥ “ओं ज्यम्बऊ यजामहे ” इस सन्त्रसे शिवकी मन्त्रसे शिवकों 


९ अध्वत्यकाप्म । २ बटसग्बन्धि। ३ दन्तकाएं पुर्वोक्तमंव । ४ दुन्वकाएं तु प्लक्षमेव । ५ दुन्तकाईँ पाछाशमेव | 


६ दन्तकाएूु जम्बूवृक्षस्य । 


ह 
है] 


















श्रतानि, | ल१ । ( है१९ ) 








0 








भोजयेद्ित्राज्छिवमक्तिसमस्वितान्‌ ॥ रे३ ॥ पायसे बृतसंयुक्ते मचना च परिप्छुतम्‌ ॥ शकत्या 
हिरण्यवासांसि भक्त्या तेभ्यो निवदयेत्‌ ॥ ३४ ॥ देवाय चापि दध्यन्न॑ं वितानं ध्वजचामरम्‌ ॥ 
कृष्णां पयघ्विनीं गां च सघण्ठां वाससा युताम्‌॥ २५ ॥सरत्नदोहऋलशीमलंकृत्य च॒ नारद ॥ 
अलड्डारं च बल्ब च दक्षिणां च स्वशकितःरेद॥भक्‍त्या मणम्य विधिवदाचायाय निवेदयेत ॥ 
करोत्येब व्रत पुण्य॑ वषमेक निरन्तर॒म्‌ ॥ र२े७ ॥ महापातकनिशुक्तः सर्वेश्व्यंसमस्वितः ॥ कलप- 
कोटिशतल साभ शिवलोके महीयते ॥ रे८ ॥ कृष्णाष्टमी ब्त॑ संम्यर्ंदेवर्षं कथिते मया ॥ 
यदुक्त देवदेवन देव्ये विश्वर्जा पुरा ॥ रे३ ॥ खूत उवाच ॥ ण्व नन्‍्दीशराक़त्वा नारदों स॒नि- 


पुड़वः ॥ कृष्णाष्टमीव्रत पुण्य ययों बद्रिकाअ्रमम्‌ ॥ ४० ॥ ब्रतस्यास्य भभाव॑ यः पठेद्रा खणु- 
यादपि ॥ स याति परम॑ स्थान यत्र देवो महेंववरः ॥ ४१॥ इति श्री आदित्यपुराण क्ृष्णा- 


हक है 


मी व्रत नाम एकादशोईध्यायः ॥ इत्यष्टमीत्रतानि ॥ है 
अथ नवमीत्रतानि लिख्यन्ते ॥ 


रामनवमीत्रतस ॥ 


चैत्रशुक्ननवम्यां रामनवमीद्रतम्‌ ॥ इदं च परविद्धायां मध्याह्नव्यापिन्यां कायेम्‌ ॥ तदुक्त- 


मगरत्यसंहितायामू---चेत्रशुक्का ठ॒ नवमी पुनवेखुयुता यद्दि । सेव मध्याहयोगेन महापृष्य -चेत्रशुक्का तु नवमी पुनवेखुय॒ता यदि । सेव मध्याह्ययोगेन महापुण्य- 
मगस्त्यसहितायाम---चत्रशुक्का ठ न | रे ॑े 


तथा गौरीके मंत्रस गौरीको दे | वर्ष बीते शिव भक्तिके 
साथ ब्राह्मण भोजन कराये ॥रश॥ मधुसे परिछत इंते 
सहित पायसको भोजन कराये। अपुनी शक्तिक अडुसाए 
अक्तिपूवक उन त्राह्मणोंको हिरण्य ओर वस्त्र दे ॥ रे४ || 
देवक लिये दृध्यन्न भोग लगाना चाहिये । वितान, ध्वेज) 
चामर, घण्टा और वख्रसहित दूध देनेवाली काछी गाय 
रत्नसहित सजाया हुआ दोहना और है नारद : अलकार 
और शक्तिक अनुसार दक्षिणा ये सब ॥ ३६॥ भक्ति- 
पूवेक प्रणाम करके विधिक साथ आधाय्यको निवेदन 
करदे। जो इस ब्रतको एक बर्ष निरन्तर करता है! ३७ [| 
वो महा पातकोंस छूट जाता हें। सब ऐश्वय्य उस मिल" 
जाते हूँ। पूरे एकछों कोटि कषप शि वल्लोक्से सम्मानके 
साथ रहता है। ॥ ३८॥ हे देवषें ! मैंने कृप्णाष्टमीका 


२ 


त्रब्नव आपके लिये अच्छी तरह कह दिया है जसाकि 


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सष्टिकी रचना करनेवाले देबदेवने पहिल छ््यि 
कहा या || ३९ ॥ सूतजी बोर कि; इस प्रका: मुनिपुज्ञव 
नारद नन्दीश्वरके मुखसे कृष्णाप्ठमीके पवित्र अतकों सुन- 
कर बद्रिकाश्रम चले गये ॥ ४० ॥ जो इस जअतके प्रभाव 
को कहता या सुनवा है बह उस छोककोी चला जाता हे 
जहां शिवजी विराजवे हैं ॥ ४१ | यह श्री आदित्य पुराण 
के कृष्णाष्टमी ब्रतका ग्यारहवां अध्याय पूरा हुआ ॥ इसके 
साथ अष्टसमीके ब्रत भी पूरे हुए ॥ 
अथ नवमीत्रतानि । 

अब नवसीके ब्रत लिख जाते हैँ। इन ब्रतोंमें चेत्रशुक्‍्छा 
नवम्तीको रामनवमीका ब्रत होता है, इस ब्रतकों मध्याह 
व्यापिनी दशमी विद्धा नवमीमें करना चाहिये। यह 
अगस्व्यसहिलामें कहा हैं कि यदि चेन्र शुक्छा सवसी 
पुनवसु नक्षत्रस युक्त हो और वही मध्याहके समय 


जा 


शत कक कक आस 
१ निर्णय सिन्धुमें-“चेत्रे नवस्याम्‌ ' यहांसे लेकर “ कोसल्यायां | हव्याप्तो तदभावे वा पूर्वदिने पुतवेसु ऋत्युक्तामपि त्यक्त्वा परत कार्यो 
परः पुमान्‌ _ यहातक का पाठ सबसे पहिले रखा है। फिर वे सब | इस वाक्यका ओर 'द्विनद्वय ऋत्षयोगे मध्याहव्याप्ती एक देशव्याप्तो 


वाक्य आगये हैं जो त्रतराजने अगस्त्य सैदिताके रखे हैं, गौविन्दा्चन- 


करदेवा चाहिये । इसी विषयपर गोविन्दाचनचन्द्रिका्में कुछ विशेष 


मध्याहु व्यापिती हो । इस वाक्यके आधारपर मध्याह्व्यापिनी मानते 


खेद | वा परा अन्यथा पूर्वा'इसका हमें तो प्रायः एकसाही तात्य्य दीखता 
चुन्द्रिकाने अगस्त्यसंहिताके वचन हरिभक्ति विलासके नामसे रखेहें । | 


ब्रतराणने यह लिखा है कि, वेध्णवरोंको अष्टती विद्धा नवमीका त्याग 


हैं-पहिलेका यथाश्रत शब्दार्थ यही है कि, दो दिन मध्याहमव्यापिनी 
हो वा उसका अभाव हो तो पूर्व दिनमें होनेवाली पुन नत्तत्र 


| युक्ताकों भी छोडकर प५राद्दी करनी चाहिये, व्रतरजकी पंक्तिका 
लिखा है उसेभी लिखते दें कि, नवमीके ज्ञयमें दशमीके दिन पार-| 
शंका निश्चय होनेसे वष्ण॒वॉकोमी निःपन्देह अश्मीविद्धाही नवमी | 

चाहिये | नर. नि. गो, य तीनों ' सेव मभ्याह् योगेन”-वही 


तात्पर्य पहिले लिखा जाचुका है । ऋत्षयुक्ता भी जो दो दिनकी 
व्याप्तिमें नि. ने त्याग कहा है उप्से यह खुतरां सिद्ध होगया कि, 


उनका त्याग दोनों दिनही नक्षत्रके योगमें है ) यदि पहिलेददी दिनके 


नक्षत्र योगमें भी त्याग होता तो पुनर्वेखु युताकी जो इतनी प्रशंसा की 


हैं। यदि दो हों और पहिले दिन मध्याहवव्यापिनी'हो तो व्रतराजेके | है वो निरर्थक होजायगी। तथा-'पुनवेशुऋश्षसेदुक्ता सा तिथि: सर्व 
बहु “८ मध्याह योगेन ” इसी वाक्यसे उसका प्रहण होजायगा । | कामदा ? यह जो निर्णेयसिस्धुमें कहा ६ इसकी कोई विशेषताही न. 
गोबिन्दाचन ० में तो पंक्ति रखते हैं कि, 'पूव्वचुरेव मध्याह्ययोगे सत्वे | रहजायगी | “ तदभावें-उसके अभावसें ?? यह जो कहा दें इसमें 
सेक प्राह्मए-पहिलेही दिन मध्याद योगिनी होतो उसीका ग्रहण करलो। | एक देश व्याप्ति आजाती है । एक देश-माध्याहुके किप्ती एक भागमें 
नि. भी यही लिखते हैं पर “ कर्मकालव्याप्तेः-कर्म पूजनादिकके | व्याप्ति द्ोना-पर पूरे मध्याहमें न होता एक देश व्याप्ति है पूर्णव्याप्ति' 
कालपरें नवपीके होत्ेसे””इस देतुको अधिक देते है । 'दिलदूओ मध्या- | चाइनेवालॉके यहाँ यह नहीके बराबरही है | गो० में थी कहा हे- 





(शेर०) 





५8 725: /6 टेक 
32: || 





तमा भवेद ॥ दिनद्यये ऋक्षयोंग मध्यादह्वव्यातावकेदशव्यातों वा पराउन्यथा पूरा ॥ तहुक्त 


त्रतराजई। 


[ नवैमी* 









किया शा» 


तत्रेव---नवमी चाह्रमीविद्धा त्याज्या विष्णुपरायणेः३ ॥ उपोषणं नवम्पां वे दशम्यां पारण भवेत्‌| 
तत्रेव--चेत्रमसि नवम्यां तु जातो रामः स्वयं हरिः॥ पुनवस्वृक्षसंयक्ता सा तिथिः सर्वेकामदा॥ 
श्रीरामनवमी शोक्ता कोटिसूयग्रहाधिका।केवलछापि सदोपोष्या नवमीशब्दसड़्प्रहात्‌ ॥ तस्मात- 





रहे तो बड़े भारी पुण्यवाली होती है । यदि दो दिन नक्षत्र 
का योग और नसच्याहुज्याप्रि हो अथवा एक देश व्याप्ति 
हो यानी दोनों दिन तिथि या नक्षत्रमेंस मध्याहके समय 
एक न एक रहे तो परा लेनी, नहीं तो पुवाही लेनी चाहिये 
यह भी अगस्त्य संहिता कहा हे कि, अष्टमी विद्धा 
नवसीको विष्णुभक्तोंकरो छोड देनी चाहिय वे नवमीमें 
ब्रत तथा दशसीमें पारणा करें )( निर्णयसिन्धु्म “दशम्यां 


-द्विनद्रय मध्याहव्याप्तों अव्याप्ती वा परा'-दोनों दिन मध्याहव्यापिती 
होवान व्याप्त हो तो पराग्रदण करनी चाहिये। इसमें अव्याप्तो ” 
यह पाठ वतराजसे अधिक है तथा *' एकदेशव्याप्ती ? यह पाठ 
ब्रतराजमें श्रधिक हे तथा धर्मसिन्धुमेंधी एक देश व्याप्तिका ऐसाही 
प्रसंग आया है। परा माननेका हेतु सबमें एकही है कि,अष्टमी विद्धाका 
निषेध है इस कारण दशभी विद्धा लेलिेती चाहिये | गो० लिखा हैं 
कि-पूर्व्चरेव मध्याह्े सत्वे सैव प्राह्मा-पहिले दिनही मध्याहृव्यापिनी 
हे तो उसीका प्रहण होता है यही निर्णय सिन्धुमें भी है तथा व्रतराजके 
विरुद्धभी नहीं है। मध्याहम्यापिनीडे प्रकरणसे इतना विचार किया है 
फिर प्रकृतमेंढी आये जाते हैं। गो० कहते हैं कि, पुनर्वसु नक्षत्रसे 
युताभी नव्याह्वत्या पिदी अश्मी विद्वा पूर्वो नवमीकोी छोडकऋर दूसरे 
दिन तीह मुद्त भी हो तो उसी दिन विष्णु ऋक्तोंकों उपवास करना 
चाहिये क्यों कि वेष्णवोंके यहां उदय व्यापिती तिथिका ग्रहण द्वोता है। 
अब वैष्णवोंके ब्रतके विषयतें विशेष विचार करते हैं-गो, में जो तीन 
मुहर्तभी दशमी विद्वाक्ा ग्रहण किया हैं यह निर|श्रय नहीं है ,रामाच- 
नचन्द्रिकामें कहा हे कि, अश्मी विद्वाही यदि पुनर्वसु नज्षत्नसे युक्त हो 
तो उसमें ब्त केसे होगा क्योंकि अष्टमी विद्वाका निभेंध सुना जाता 
है तथा,रामजन्मकी नवमीका व्रत है यह नवमीक श्रवण होता हे । 
दशमी आदिमेंनवमी आदि वृद्धि हो तो वेष्णवॉकी अश्मी बिद्धाका 
त्याग करना चाहिये । वेष्णवृतरोंको तो अश्मी विद्वामेंही व्रत करना 
चाहिये, इस वाक्यमें दो बातें हैं पहििली: यह है कि, दशमी आदियें 
नवमी आदिक्की वृद्धि हो तो अश्मी विद्वाका वेष्णवोंकों त्याग करना 
चाहिये यानी उदय कालमें नवमी तीन मुहूत भी हो बादमें दशमी 
लगजाती हो तथा सूर्योदयसे पहिले क्षय होनेके कारण समाप्त हो 
जाती हो तो ऐसी नवमी जो सूख्योंदयर्स तीन मुहूर्त हे, वेष्णवोंके 
यहाँ उस दिन उपवासद्ोों सकेगा;क्यों कि,बैंष्णुवोंके यहां नवमी बतकी 
प्रणा उस एक्ादशीमें हो सकेगी जो कि,सूथ्योदयसे पहिले समाप्त 
हुई दशमीके वाद एकादशी आती है। तात्पर्य यह है कि, वैष्णवोंके 
यहां सृध्योदियके समयमें भी दशमी विद्धा एकादशीमें नवमीके ब्रतक्की 
पारणा होती है;क्यों कि वे अरुणोदय कालमें भी दशमीसे वेघ होजा- 
नेसे एकादशीक प्रहरा हीं करते । यदि दशमीक्ी बृद्धिका अ्रभाव हो 
चानी एकादशी आनेदुल्ले, दिन सूध्योदयके तीन मुहूतके पहिलेदी 


इशसी समाप्त होजाव तो भी वेष्णवों को अथ्मी विद्वाही नवमीके दिल्- 


/र, काना चाहिये; क्योछि, तीन मुहूत्तसे कममें: वेष्णवोके यहां भी 





भ पर कर भ् है $25.. 28४8 
चव पारणम्‌”' ऐसा पाठ रखा है ) अगस्त्य संहिताम ही 
लिखा हुआ है कि-चेत्र मासकी नवसीके दिन रंवयं हरिने 
रामावतार छिया, वो पुनर्वंसु नक्षत्रस संयुक्त नवमी 
तिथि सब कार्मोंक्ो देनेवाली हे। यह रामनवमी एड 
कोटि सूय्य ग्रहणोंस भी अधिक हैं। यह भी उसी संहिता 
में लिखा हुआ है कि--नवमी शब्दका' प्रहण है, इस 
कारण हमेशा केवछा नवमीको भी उपवास करे अतः पूरे 


परामें त्रत करनेका विधांन नहीं हे, पर यह मध्याह्नव्यापिनी होदी 
चाहिये। यदि नवमीका क्षय हो यानी पहिले दिन सूथ्योंदयके तीन 
मुहृत बाद कभीमी लगती हो एवं दूसरे [दिन सूर्ब्य निकलनेसे पहिले 
ही समाप्त होजाती हो तो वेष्णवॉकी अश्मी विद्वाही नव्री कसी 
चाहिये । ऐसे स्थलमें स्मात वैष्णवोंके यहां भी एऋद्दी दिन व्रत होता 
है सिद्धान्त यह हुआ कि, नव्रमीके जो गुश कहें हैं वे योगादिक 
शुद्धामें मिल तो उसीमे उपवास करना चाहिये। सिवा उक्त कारणोंदे 
अष्टमी विद्धामें त्रत न करना चाहिये | ब्रतराजमें जो यह लिखाहुग्ा 
है कि, पर विद्वा ( दशमीयुता ) नवमीनें इस जतको करवा चाहिये 
यह कोई प्रधान बात नहीं है | प्रायिक सिद्द वचन है कि, यह बत 
विना किसी खास बातके पूर्वविद्धामें नहीं होता शुद्गा या प्रायः परः 
विद्वा ( दशमीयुतामें ) होता है। उत्तरामें भी यदि तीन मुहृतसे कम 
नवमी होगी तो भी अष्टमी विद्धाही लीजायगी | यह गोविन्दावन 
चन्द्रिकामें लिखाहुआ है । ज्तराजने जब वैष्णवोंकी ओर कुछ संकेत 
करके कहदिया है तो उउसे अवेष्िणवोंके विधान जाननेकी आकांगा 
होती है। इस कारण उनके विधानपर भी विचार करते हैं कि, उनका 
रामनवमीका क्या व्रत दिन जिधान हे,। वैष्णव शब्दके मुकाविले उन्हें 
स्माते शब्दसे याद करते हैं । यय्यपि वैष्ण्य और अवैष्णव दोनोंदी 
घ्मृतियोंकों मानते हैं पर वैष्णव कहलानेवाले संप्रदायोंसे इतर समाते 
नामसे भी बोले जाते हूँ, पूर्व जो वचन गया था उसके एक अ्रेशपर 
विचार करते हुएतो वेप्णवोंकी रामनवसीके अतकी व्यवस्थापर विचार 


करडाला । अब उपके * तदन्येषाम्‌ वेष्णवेतरोंके ? यह अर्थ जिसका 


किया है उसपर विचार करते हैं,इस शब्दका मतलब स्मातपे है यावी 
दशमीव्राले दिन तीन मुहूत रहनेवाली तवमी को उपवास प्रारंभ करनेपर 
पारशावाले दूमरे दिन सूर्योद्यपे पहिले दशमीका क्षय होनेसे सूट्यों- 
दयके समय एकादशी आजायगी | तब यहमी दिन स्मातोंके वह 
उपवासकादी होगा । नवमीकी पारणा विना हुए नबमीजतके एक अंग 
पारणाके बिना हुए ब्रतकी अपूर्णताही रहजायगी; इस कारण ऐसे 
स्थरमें ध्मातांको अ्टैमी विद्वाही करनी चाहिये जो दूसरे दिन पारणा 


करसके | ऐवा करनेसे उन्हें नवमीके अतकी पारणाका समय एक: 


शीके बतसे पहिले मिलजायगा । अन्तर यहां यह होगा कि,स्मा्तोके 
यहां पह्िली ओर बैष्णवोंके यहां दूपरी होजायगी । यह इमने सतरके 
मतोंकों दश्कोणमें रखकर सामान्य विचार किया है । अधिक बढा:. 
नेसे अनावश्यक विस्तार बढ़ता है । .. .. . ५५ बह 


ब्रतानि, ] आाषाटीकासमेलः । 

सर्वात्मना सर्वेः कार्य वे नवमीत्रतम्‌ ॥ लत्रेव--चेच्रे नवम्यां £#उक्षे दिवा पृण्ये पुनर्वेसों॥ 
उदये गुरुगौरांशे स्वोच्स्थे अहपथ्वके ॥ मेषे पूषणि संभ्ाते लग्न ककेटकाहये ॥ आविरासी- 
त्स कलया कौसल्यायाँ परः पुमान्‌ ॥ प्रावपक्षे शक्लपक्षे ॥ उदय ल्ग्े॥उुरुगोरांशे गुद्नवर्माशे ॥ अस्या- 
मेवोपोषणपूर्वेक॑ श्रीरामप्रतिमादानमुक्त॑ तत्रेव ॥ तस्य प्रयोग;--अष्टम्यां प्ातनित्यकृत्य॑ 
विधाय दन्तधावनपूवर्क नद्यादों ल्लात्वा ग़हमागत्य वेदशाख्पारग राममत्क विभ्रमाह्यानपर्वक- 
वखालड्ारादिभिःसंपूज्य-श्रीरामप्रतिमादाने करिष्ये5हं द्विजोत्तमांतवाचायों भव प्रीतः ओीरा- 
मोपसि त्वमेव मे इति मन्त्रेण त॑ प्राथयेत/ततः--नवम्यामड्रबूलेन एकभक्तेन राघव ॥ इश्ष्वाकु 
वंशतिलक प्रीतो भव भवश्रिय ॥ इत्येकमक्ते संकलप्य साचायों हृविष्य श्ुकक्‍त्वा रामकथाः 
भ्रण्यन्‌ राजावधःशायी भवेत॥ ततः आतन्नित्यविध्यनन्तरं स्वगृहोत्तरमागे शझ्नचकऋहलुमणुत 
प्रा्द्वारं गरुत्मच्छाड़बाणयुतदक्षिणद्वारं गदाखड्ाड्दयुतं पश्चिमद्वारं पञ्मस्वाशिकनीलयुलो- 
त्रद्वारं मध्ये हस्तचतुष्कविस्तारबेदिकाय॒तं खुवितानं खुतारेणं पजामण्डपं विधायोपवासस- 
कल्पपूर्वक॑ म्तिमादानम्‌ ॥ उपोष्य नवमीं त्वध्य यामेष्वष्टु राघव ॥ तेन प्ीतो भव त्वे मे 
संसारात्राहि मां हरे॥ अस्यां रामनवम्यां तु रामाराधनतत्परः ॥ उपोष्याष्टसु यामेष पूजयित्वा 
यथाविधि ॥ इसमां स्वगमर्यी रामस्मतिमां च मयत्नतः ॥ श्रीरामप्रीतये दास्ये रामभक्ताय 
धीमते ॥ ज्ीतो रामो दरत्वाशु पापानि खुबहूनि च ॥ अनेकजन्मसंधिद्धान्यभ्यस्तानि महा- 
स्पपि इति मन्त्रः सड्ल्पयेत्‌॥ ततो वेदिकामध्यलिखित पर्वतोभद्रे कलशमतिष्ठाविबिना पूर्णे- 
कुम्म॑ निधाय तदुरपरि सौवण राजत बेणवं वा पीठ वस्थाच्छन्न निधाय तत्र सिंहासन राम- 
प्रतिमामग्न्युत्तारणपूववक संस्थाप्य पाद्य प्रदतिपुष्पान्तोपचारेमहापृजां कृत्वा ॥_ रामस्य जननी 
चासि रामात्मकमिद जगद। अतस्त्वाँ पूजयिष्यामि लोकमातनमोस्ठ ते॥इति मन्त्रेण कौसल्या 


मनसे सबको लवमीका ब्रत करना चाहिये । यह भी वहां 
छिखा मिलता है कि-चैत्र पहिल पक्ष नवमीमें दिनके समय 
पवित्र पुनवंसु नक्षत्रके योगमें उद्यम गुरुके गोरांशमें 
उच्चके पाँच प्रहोंमें सूथ्येके मेष राशिपर रहते ककट छूम्मम 
पर पुमान्‌ कछासे कौशल्यामें प्रकट हुए। प्रागुपक्ष-पहिलठ 
पक्षकों कहते हैं, शुकुपक्षत मासका आरंभ माननेवालोंक 
यहां शुक्छपक्ष पहिला पक्ष होता हैं। उदय छम्मको कहते 
हैं, गुरु गौरांशका गुरुके नवमांशमें यह अथ होता है । 
इसी रामनवमीको ब्रतपूृवक भगवान्‌ रामकी प्रतिमाकादान 
लिखा हैं। रामकी प्रतिमा देनेका श्रयोग-अष्टमीके दिन 
प्रातटःझाछ नित्यकर्स करके दन्‍्त धावन पूर्वक नदीमें स्नान- 
कर घरको आ वेद वेदाड्लोंके पारंगत रामभक्त विप्रको 
बुछा, वल्लालंकारसे उसका पूजन करके प्राथेना करे कि दे 
द्विजोत्तम ! मैं रामचन्द्रजीकी मूतिका दान करूंगा उससे 


आप प्रसन्न होकर मेरे आचाये होजायैं; क्योंकि, आप मरे 


लिय रामही हैं, इसके पीछे संकल्प करे कि हे राघव : हे 
इध्वाकुकुलतिलक! हे भवके प्यारे! नवमीत्रतके अगभूत एक 
भक्तसे प्रसन्न होजाइये । पीछे आचायेके साथ ह॒विष्याञ्ञ 
भोजन करके रामचन्द्रजीकी कथा सुनाता हुआ रातको 
भूमिपर शयन करें । पीछे प्रातःछाछ, नित्यकमेसे निदृतत 

कर अपन घरके उत्तर भागमें एक सुन्दर मंडप बनावे 
उसके पूरबके दरवाजपर शंख चक्र और हनुमानजीकी 
स्थापना करे या काढ़े, गरुड और बाण सह्दित शाज्ले धनु- 


पको दक्षिणद्वारपर बध्ला गदा, खद्ढ और अगद इनको 
पश्चिम द्वारपर एवम्‌ पद्म स्वस्तिक और नीलको उत्तर द्वार 
पर काड़े या स्थापित करे। बीचमें चार हाथके विस्तार की 
बेदिका होनी चाहिये सुन्दर विवान हो तोरण भी अच्छे 
लगे हों इस प्रकार मण्डप॒ तयार करके उपवासके सक- 
स्पके साथ प्रतिमादान करे, उसकी विधि यह हें हे राघव ! 
आदो यामोंमें नवमीका उपवास करूंगा उससे आप प्रसन्न 
हों, हे हरे ! संसारस मेरी रक्षा करें, में रामके आराधनर्म 
तत्पर हुआ इस राम नवसीके दिन आठटों परहर उपवास 
कर विधिपूवेक रामकी पूजा करके, सोनेकी रामचन्द्रजीकी 
मूर्तिको श्रीरामचन्द्रजीको असन्न करनेके छिय बुद्धिमान 
रामभक्तके छिये देगा, अनेक जन्मोंसे संसिद्ध तथा वार- 
वारके अभ्यस्त बड़े २ भी बहुतसे पार्पोको श्रीरामचन्द्रजी 
प्रसन्न होतेही क्षणमात्रमें नष्टकर देते हैं, इस मंत्रसे संकल्प 
करे, वेदिकाके वीचमें सवेतो भद्रमंडड लिख उसमें विधि- 
पूर्वक कछशकी स्थापना करें। उसके ऊपर सोना चांदी 
बांस जैसी श्रद्धा हो उसीका सिंहासन स्थापित करे वस्त्र 
बिछाये अग्न्युत्तारण भादि संस्कारोंसे संस्कृत हुई रामप्रति 
माको विधिपूर्वक स्थापित करे । पीछे पायसे लेकर पुष्प 
समर्पण पय्यन्तके उपचारोंस रामकी पूजा करें । आप 
रामकी जननी हैं यह सब जगत्‌ राम त्मक हैं इस कारण 
मैं आप रामका पूजन करता हूँ हे लोकमातः ! तेरे लिये 
नमस्कार है, इस मेत्रसे कौसल्या माका पूजन करे, ओम 


[ नवमी 
मम्पच्य आओ नमो दशरथायेति दशरथ सम्पूज्य|वरणपूजामभतिवू्जा समाप्य मध्याहे फह- 
पुष्पाम्बुपर्णणशो ककुसुमरत्नतुलसीदलछसयुत शइ्ढ॑ गहीत्व---दशाननवधार्थाय. धर्मसंस्थाप 
नाय च ॥ द्वानवानां विनाशाय देत्यानां निधनाय च ॥ परिवाणाय साधूनां जातोराम 
स्वयं हरिः ॥ ग़हाणाध्ये मया दत्त च्रातृनिः सहितोश्यघ ॥ इति मन्त्रेणाब्य दच्यात ॥ तत 
यामचतुष्टयेषपि श्रीराम संपूज्य रात्रो जागरणं विधाय दशम्यां नित्यपूजान्तं कृत्वा मूलमर 
णाष्टोत्तशतं साज्यपायसाहुतीहुत्वा$चाय॑ वख्रभूषणादिल्निः संपूज्य तस्मे प्रतिमाम | 
इमां स्वणमर्थी राममरतिमां समलइक्ृताम्‌ ॥ चित्रवद्थय॒गच्छन्नां रामोःह राधवात्मने ॥श्रीराम- 
प्रीतये दास्ये तुष्ठो भवठ राघवः ॥ इति मन्त्रेण ददह्यात्‌ ॥ ततोःन्येभ्योषि यथाशक्ति दक्षिण 
दृत्वा--तत्र प्रसाद स्वीकृत्य क्रियते पारणं मया ॥ व्रतनानेन सन्तुष्ठःस्वामिन्माकं प्रयच्छ में। 
इति संप्रार्थ्य पारणं कुयोत्‌ ॥ अब रामपूजा--आचम्य प्राणानायम्य मासपक्षाद्यल्लिख्य सकलपए 
क्षयकामः श्रीरामप्रीतये रामनवमीत्रतमहं करिष्ये तदड्भत्वेन रामपू्जां करिष्ये तथा राम- 
मंत्रेण पडड्ल्यासान्कलशाचन च करिष्य इते संकल्प्य फलपुष्पाक्षतसहित॑ जलपू्णताम्रपाः 
गृहीत्वा--उपोष्य नवमी त्वद्य यामेष्वष्टछु राघव॥ तेन प्रीवो भव त्वे भोः संसारात्राहि मां हे 
इति मंत्रेण पात्रस्थ जले क्षिपेत्‌॥ततः शक्तितो हेमी रामभातिमां कृत्वा अग्य्युत्तार णपूर्वक कपोह 
स्पृट्ठा मूलमंत्र प्रणवादिचतुथ्येत नमोन्त ३० रामाय नम इति ॥ अस्ये प्राणाः प्रतिष्ठन्त अस्े 
प्राणाश्वरन्ठु च ॥ अस्ये देवत्वमचाये म।महोतिच कश्वन इति च मंत्र पठन्माणप्रातिष्ठां कुर्यांत्‌ | 
तत/-कोमलाक्ष विशालाक्षामिन्द्रनीडललमग्रमन्‌ ॥ दक्षिणाड़े दशरथ पृत्रावेक्षणतत्परम ॥ पृष्ठते 
लक्ष्मण देव सच्छत्न कबकप्रभम्‌॥ पावें भरतशच॒न्नो तालडइन्तकराव॒भों ॥ अग्रेण््यम्न हनूमर 
रामालग्रहकां कि णम॥ इति ध्वात्वा षोडशोपचारेः पूजयेतव॥ आवाहयामे विश्वेश जानकीवह् 





( 2२१२ ) ब्रलराज 








दृशरथाय नमः दृशरथक छिय नमस्कार इस नाम मंत्रसे 
शरधजीका पूजन करे | आवरण पूजासे ढेकर पूरी पूजा 
समाप्त करे | पीछे शंखमें पानी तुछ्सीदुछ और रत्न डाल- 
कर भगवान रामको अध्य देना चाहिये, कि रावणके मार- 
नेक छिय घमकी स्थापनाके लिय दानवोंके विनाशके लिये 
देत्योंके मारनेके लिये साधुओंकी रक्षाके छिये हरि स्वय 
रामके रूपमे अव॒त्तरे थे। हे निष्पाप | भाश्योंके साथ अध्ये 
प्रहण करिये, पीछे चारों पहरोमेंमी रामकी पूजा करके 
रातकों जागरण करके दशमीके दिन नित्य पूजातक सब- 
कम समाप्त करके मूल मंत्रके द्वारा घी मिली हुईं खीरसे 
१०८ आहुवि देकर वख भूषण आदिंस आचास्येको पूजे, 
पीछे आचायको राम मृतिका मंत्रसे दान करे कि लिस रंग 
विरंगे दो वस्ध उठा रखे हैं जो कि सोनेकी बनी हुई है भी 
वि पा ७, बडी के 

'भांति गहने पहिनारख हैँ ऐसी रामकी ग्रतिमाको, राघव- 
रूप आपके छिय आज रामके जन्मदिन रामचन्द्रजीकी 
प्रसन्नताके लिये देताह इसके बाद दूसरोंके लिये भी शक्तिके 
अनुसार दक्षिणा दे। पीछे आपके प्रसादको स्वीकारकरके 
मे पारणा करूंगा हे स्वासिन्‌ ! इस ब्लसे सन्तुष्ट हो मुझे 
अपनी भक्ति दें, इस मंत्रस प्राथेना करके पारणा करनी 
चाहिये। अथ सामपूजा-आचमन प्राणायाम करके मास- 
पक्ष आदिका करके सब पार्षोंके माशकों चाहता 
हुआ में श्रीरामकी प्रसन्नताके ढिये रामदवमीका ब्रत करूंगा 
पथ इश्क अगरूपसे रामकी कुजा भी करूंगा एम राम- 


मेत्रस छः अंगन्यास और कलछशका पूजन भी करूंगा, यह 
सकत्प करना चाहिये। फल पुष्प और अक्षत जढस भरे 
हुए पूण पात्रको छेकर कहे कि हे राधव ! में अब इस नव 
मीमें आठों पहर उपवास करूंगा, हे विभो ! उससे भा 
परम प्रसन्न हो जाओ, हे हरे ! संसारसे मेरी रक्षा करिये 
पीछे उस पात्रके पानीकों पानीमें छोड दे। इसके बाद 
शक्तिके अनुसार सोनेकी प्रतिमा बनवा अप्नि उत्ताए 
आदि प्राण प्रतिष्ठा प्रकरणके कद्दे हुए कमे करके पीछे प्र 
माके कपोलॉपर हाथ रखकर पहिल मूछ मंत्रको पढे राम 
इस शब्दको चतुर्थीका एक बचनान्त करके आदियमें ओः 
और अन्त नमः छगानेसे मूछ संत्र ओमू रासाय नमः यह 
बनजाता है । फिर अस्में प्राणा इस मंत्रकों जपे । [ अप 
आणा: इसका अथे २७५ पृष्ठ कर चुके हैं | भगवान 
रामका ध्यान करता चाहिये कि-बड़े २ कोमल नंत्रवार 
इन्द्रनील मणिके सम प्रभावाले भगवान्‌ रास हैं, दाईं औः 
पुत्रको देखनेंम छंगेहुए दशरथ उपस्थित हैँ। पीछे 8 
हिय हुए लक्ष्मण खड़ हुए हैं । अगछबगछ भरत और शर्त 
हन्‌ तालका वींजना हाथमें लिये खड़े हैं। आागाडीशान्त मूर 
भगवान्‌ मारुति खडे हुए हाथ जोडकर रामकी कृपा चाहरः 
हैं | इस प्रकार यह ध्यान रामपंचायत॒नका होना चाहिये। 
इसके बाद षोडशउपचारोंसे पूजन करना :चाहिये, में उ8 
रामक्ा आवाहन करता हूँ जो विष्णु है प्रकृति भी परे 


व्रतानि. ] भाषाटीकासमेलः । ( १२३ ) 











इरनाराधादापरवावालावाामवत माया।चाकादद" न प्रधा2ककाप++- 2अध्यग्क पदियश वधाााताशा कफ टदयअउ आय 5853. श्वद5धपधयता चार: ाउ परन्या ०72 चक्कादय5 २९८52 52 
3आनकललनननतलननननिनानननकनननन ५3०. लरल-मालनतनीयियोंपनवननन्‍न्‍वीकन अमन के कमल द 0077 77/077 कक 9.8... . ७...०-०-२२०००५५-५०- “नीन--कनाानीकननानन-क+ अत नननननन बनी कनीनिनन- 43 ननननननननिन नी नीननीकननीनीजनीीनीयणथणीिडी ध डल्‍&&इन-ीओ-ओ-ओ-- 5 अ खक्‍फञ घस्‍न्‍स्‍ञस्‍अ+ा>तेोआससअसअससससससइअअइ 





कलम 





प्रमुम ॥ कौसल्यातनय विष्णं श्रीराम प्रकतेः परम्‌॥ सहस्वशर्षित्यावाहनम्‌ ॥| श्रीरामागच्छ 
भगवद्रघुवीर नृपोत्तम ॥ जानक्या सह राजेन्द्र सुस्थिरो भव स्वेदा॥ रामचन्द्र महेष्वास रावणा 


इक 


व्तक राघव ॥ यावत्पूर्जां समाप्येईह तावच्व॑ रून्निधों भवा। इति सन्निधापनम रघुनायक राजे 
नमो राजीवलोचन॥ रघुनन्दन में देव श्रीरामानिसुखों भद॥ इंति सन्सुखीकरणमा! राजाधिराज 
राजेन्द्र रामचन्द्र महीपते ॥ रत्नसिंहासन ठुभ्यं दास्यामि स्वीकुरु प्रो ॥ पुरुष एवेदमासनम्‌ ॥ 
ब्रोक्यपावनानन्त नमस्ते रघनायक ॥ पा््य रहाण राजे नमो राजीबलोचन ॥ एतावानस्यति 
पाद्मम ॥ परिपृणपरानन्द नमो रामाय वेधसे ॥ गृहाणाध्य मया दत्त क्रष्ण विष्णो जनादेन ॥ 
ज्रिपादू्व इत्यध्यम्‌ ॥ नमः सत्याय, शुद्धाय नित्याय ज्ञानरूपिणे ॥ गृहाणाचमन नाथ सर्वे 
लोकेकनायक ॥ तस्मादिराडित्याचमनीयम्‌ ॥ नमः श्रीवामुदेवाय तस्वज्ञानस्वरूपिण ॥ मधु- 
पर्क ग़हाणद जानकीपतये नमः ॥ मधुपकंम्‌ ॥ पञ्चास्‍्टतं मयानीत॑ पयो दधि पृतं मधु ॥ शकेरा 
चेति तद्धवत्या दत्त ते प्तिगह्मताम्‌ ॥ पथ्चाम्न०॥। पश्चाप्ठतस्मानाडुं: शुद्धोदकेन स्मानम्‌ ॥ पुष्प 
धूप दीप॑ नेवेद्यं निवेद्य निर्माल्यं विसज्य - बह्माण्डोद्रमध्यस्थेस्तीर्थेश्व रघुनन्दन ॥ स्तापयि- 
ध्याम्यह भक्‍्त्या त्वं भसीद जनादेन ॥ यत्पुरुषेणतति स्मानम्‌ ॥ तप्तकाखनसंकाशं पीताम्बर- 
मिर्द हरे ॥ त्व॑ ग्रहाण जगन्नाथ रामचंद्र नमोस्तु ते ॥ त॑ यज्ञनिति वस्॒म्‌ ॥ श्रीरामाच्युत यक्ञेश 
श्रीधरानन्त राघव ॥ बह्मसूत्र सोत्तरीयं ग्रहाण रघनन्दन ॥ तस्माश्ज्ञात इति यज्ञोपवीतम ॥ 
कुंकुमागुरुकस्त्रीकर्प्रोन्मिश्रचन्दनम्‌ ॥ठभ्यं दास्थामि राजेन्द्र श्रीराम स्वोकुर प्रभो॥ तस्मा- 
बत्त/त्सवेहुतेति गन्धम्‌ ॥ अक्षताः परमा दिव्या: कुकु ० अक्षताव्‌ ॥ तुलसीकुन्दमन्दारजाती 


3] ४] 


पुत्नागचम्पकेः ॥ कदुम्बकरवीरेक्ष कुखुमेः शतपत्रकेः ॥ नीलाम्बुजेबिल्वपत्रेः पुष्पमाल्येश्व राधघव ॥ 


कीके पति ! तेरे लिये नमस्कार है इस मधुपककों प्रहण 
करिये, इससे मधुपक; पय; दीप, छव, मंथु ओर शकरा 
ये पांचों अमृत द्रव्य, भक्तिस आपको दिय हैं आप अहण 
करिये, इससे पंचाम्रतर्लान; पीछे पंचामृत ख्लानका अंग 
शुद्ध जढका स्नान समपंण करना चाहिये । पुष्प, घूप,दीप 
और निवेद्य निवेदन करे | निर्माल्य भेंटकी वस्तुका विस- 
जन करे; हे रघुनन्दन ! त्रह्माण्डके सब तीथॉसे में भक्ति- 
पूवेक आपको स्नान कराता हूं। हे जनादन ! असन्न हूजिये 
इससे और “ यत्पुरुषेण ” इससे स्नान; हे हरे ! यह तपे- 
हुए सोनेके समान चमकना पीताम्बर है आप इसे अहण 
क्रिये, हे जगन्नाथ राम | आपके लिये नमस्कार हैं; इससे 
और “ते यज्ञम्‌” इससे वस्र; हे राम | हे अच्युत ! हे यज्ञेश! 
हे श्रीधर | हे अनन्त | हे राघव ! हे रघुनन्दन | उत्तरीय 
सहित ब्रह्मसूत्र अहण करिये इससे ओर “तस्माबज्ञात्‌ ”' 
| इससे यज्ञोपवरीत; छुंकुम अगरु, कस्तूरी और कपूरसे मिले 
हुए घन्द्नको है राजेन्द्र ! आपको देवाहूं हे श्रीराम : आप 
उसे स्वीकार करिये इससे और: तस्माग्ज्ञात्‌” इससेगन्घ; 
४ अक्षता परमा दिव्या! इससे अक्षत; तुलसी, कुन्द्‌,मन्दार, 

जाती, पुन्नाग, चंपक, कदुम्ब, करवीरः कुसुम, शतपत्र, 
जिसका ऐसे नित्य शुद्ध सत्यके लिये नमस्कार है, हे नाथ ! | नीलाम्बुज, बिल्बपत्र और पुष्प, माल्योंसे हे राघव ! में 
सब लोकोंके एक नायक | आचमन अहण करिये, इससे | भक्तिके साथ पूजूँगा । हे जनादेन ! आप ग्रहण करिये, 
और “ तस्माद्‌ विराड ” इससे आचमन; वत्जज्ञानही हें | इससे और “ तस्मादशा० ” इससे पुष्प समपेण करना 
हप जिसका ऐसे वासुदेवके लिये नमस्कार हैं, है. जान-' चाहिये ॥ अक्लपूजा-मूछमें नामसंत्र और अंग दोनोंही 


विश्वका स्वामी हैं जानकीका प्रिय तथा कोसल्याका प्यारा | 
पुत्र है इस मंत्रसे तथा “सहखशीर्षा” इससे आवाहन कर- | 
ना चाहिये । हे राम | हे रघुनाथ ! हे रघुवीर ' है भगवन! | 
भाइये, है राजेन्द्र | जानकीके साथ यहां सद्दा सुस्थिर हू- | 
जिये, हे बडे भारी घलुषके घारण करनेवाले ! है रावणके | 
काल ! हे राघव |! जबतक में पूजा समाप्त न करू तबतक | 
आप मेरी सन्निधि्में रहिये, इन मत्रोंस रामको सन्निहित | 
करना चाहिये । है रघुनायक | हे राजपें | हे कमलकेसे | 
नयनोंवाले | है मेरे देव रघुनन्दन ! हे श्रीराम ! मरे सामने | 
हजिये, इससे सामने करे। है राजाधिराज | हे राजेन्द्र : 
है राजारामचन्द्र | में आपको रत्नोंका सिंहासन देता हूं । | 
है प्रभो | उसे स्वीकार करिये इससे और “पुरुष एवेदम्‌” 
इससे आसन; हे तीनों छोकोंके पवित्र करनेवाले,द्दे अनन्त ! | 

' रघुनायक ! तेरे रिय नमस्कार है, हे राजपें ! पा प्रहण 
. ऋर है राजीवछोचन ! तेरे लिये वारवार नमस्कार है इससे 
और “ एतावानस्य ” इससे पाद्य; हे परिपृणपरमानन्द- 
स्वरूप ! तुझ सृष्टिकर्ता रामके लिये नमस्कार हें, हे कृष्ण ! | 
हें विष्णो | हे जनादंन | मेरे दियिहुए अध्येको अहण केर, | 


३ श 


इससे और “ त्रिपादूध्व० ” इससे अध्ये; ज्ञानही हैं रूप | 








(२९५) _ 


ब्रतराज: । [ 























नवमी- | 





पूजयिष्याम्यहं भक्‍त्या ग्रहाण त्वं जनादन ।। तस्मादश्वेति पृष्पाणि।। अथज्पूजा---श्रीरामच- 
न्द्राय० पादों पूजयामि ॥ राजीवलोचनाय० गुल्फोी पूजयामि० ॥ रावणान्तकाय० जाहुनी 
पूजयामि ॥ वाचसपते० ऊरू पू० ॥ विश्वरूपाय० ज॑ंघे पृ० ॥ लक्ष्मणाग्रजाय० कटी प्‌ृ०॥ विश्व- 
मूतये० मेढ पू० ॥ विश्वामित्रश्मियाय० नामें पू० ॥ परमात्मने न० हृदय पू० ॥ श्रीकण्ठाय/ 
कण्ठं॑ पूजयामि ॥ स्वोख्धारिणे न० बाहू पू० | रघूद्ृ॒हाय सुख पू० ॥ पद्मनाभाय० जिह! 
पू० ॥ दामोदराय० दन्तान्‌ पू०॥ सीतापतये० ललादं पू०॥ ज्ञानगम्धाय० शिरः पू०। 
सर्वात्मने न० सवोड्रं पूजयामि ॥ वनस्पतिरसोद्धतों गन्धाठणों गन्ध उत्तमः॥ रामचछ 
महीपाल धूपो5यं मतिगृह्मयताम॥यत्पुरुषपिति धूपम॥ज्योतिषां पतयें तुभ्यं नमो रामाय वेधसे 
गृहाण दीपक चेव भेलोक्यतिमिरापहम्‌ ॥ बाह्मणोस्येति दीपम्‌॥ इद॑ दिव्यान्नममृतं से 
पड़्निः समन्वितम्‌ | रामचन्द्रेश नेवेद्यं सीतेश मतिगहाताम्‌॥।| चन्द्रमा मनस इति नेवेद्यम। 
तत आचमनीयम्‌ ॥ इदं फलमिति फलम्‌ ॥ नागवल्ीदलेयुक्ते पूगीफलसमन्वितम्‌ ॥ ताम्बूह 
गृह्मयतां राम कपूरादिसमन्वितम्‌ ॥ इति ताम्बूलम्‌ ॥ हिरण्यगर्मेति दक्षिणाम ॥ नाथ्या आसी 
दिति प्रदक्षिणाम्‌ ॥ नृत्यगरीतश्व-वाझेश्व 'पुराणपठनादिभिः ॥ पूजोपचारेराखिलः सन्तष्ठो म 
राघव ॥ मड़लाथ महीपाल नीराजनामद हरे ॥ संगहाण जगन्नाथ रामचन्द्र नमोस्तु ते 
नीराजनम्‌ ॥ नमो देवाथिदेवाय रघुनाथाय शाहरिणे॥ चविन्मयानमन्तरूपाय सीतायाः पतः 
नमः ॥ यत्तेन यज्ञमिति मन्त्रपुष्पाअलिम्‌ यानि काने च पापाने बहाहत्यासमानि च ॥ ता 
ताने विनश्यन्ति प्रदक्षिणपदे पदे ॥ इति प्रदक्षिणाम्‌॥ अशोककुसुमेयुक्तः रामायाध्ये निवे 
दयेत्‌ ॥ दशाननवधार्थाय धर्मसंस्थापनाय च ॥ राक्षसानां वधा्थाय देत्यानां निधनाय च 
परित्राणाय साधूनां जातो रामः स्वयं हरिः॥ गहाणाप्य मया दत्त आवृप्तिः सहितोपनध 
इत्यध्यम्‌ ॥ इति पूजनम्‌ ॥ अथ कथा---अगस्त्य उवाच ॥ रहस्थ॑ कथथिष्यामि सुतीक्षण झुरि 


+ 7 -ऋएएएऋफएएछएएएएएए८एरएएएछजनरए॒रएशआशआआशआआआआआआआशशश८एशशणणन्‍णणणणण्ऋऋऋ ऋऋट: : त> €म्व्पातफ 





हि 2 आल हम 


साथ लिख दिये हैं। अन्तर कवल इतनाही हे कि, कहीं 
पूजयामि की जगह केबछ पू० लिखकर अगाडी बिन्दी 
देदी है | इन नाम मंत्रोंकी बोलकर उन उन अंगोंपर अक्षत 
चढाने चाहिये । श्रीरामचन्द्रकें छिय नमस्कार, चरणोंको 
पूजवा हूँ, राजीव छोचनके ० गुरफोंका पू०, रावणके मारने- 





दीपकको ग्रहणकर, इस से और “ब्राह्मणो उस्य”” इससे दीपः 
यह अम्ृतके समान स्वादिष्ट दिव्य, अज्न छओं रसोंसे सः 
न्वित हैं। हे सीताके इंश रामचन्द्र | इस नेवेय्कों ग्रह 
करिये, इससे और “चन्द्रमा मनसो०”” इससे नेवेद्य, इस् 
बाद्‌ आचमनीय, “ इदं फलम्‌ ? इससे फल; “ नागवड्ी 


वालके० जानुओंका पू०, वाचस्पतिके छिये न० झरूको 
पू०, विश्वरूपके० जघाओंको पू०, लक्ष्मणके बडे भाईके 
लिय न० कटीको पू० विश्वमूर्षिके छिये न० मेद्रको पू० 
विश्वामित्रके लिये न? नाभिकों पू० परमात्माके छि० 
हृदयको पू०; श्रीकण्ठके छिये न० कण्ठकों पू०, सब अन्न 


धारण करनेवालेक लिये न०. बाहुओंको पू०,रघूदहके लिये | 


न० मुखको पू०, पद्मनाभके लिये न० जिह्ाको हे 
दामोदरके लि० दाँवोंको पू०; सीताके पतिंके छिय नर 
. छलाटको पू०, ज्ञानगम्यके छिये न० शिरकों पू०, सर्वा- 
''स्माके ढिये नमस्कार सर्वाह्कको पूजता हूँ || बनस्पतिके 
रसका बनाहुआ गन्धादय उत्तम गन्ध यह धूप है। हे राम 
महीपाढ | इस ग्रहण करिये, इससे और “ यत्युरुषम्‌ ? 
इससे घृप,ज्योतियोंके पति बेघा तुझ रामके लिये नमस्कार 
है। हे दीनों छोकोंके अन्धकारकों नह्ठ करनेवाले ' इस 


लेयु क्रम्‌ ' इससे लास्बूछ, “ हिरण्यगर्भ ” इससे दक्षिण 
४ त्ञाभ्याआसीत्‌ ” इससे ग्रदक्षिणा, नृत्य गीतवाद्य अं 
पुराणोंके पठनोंसे तथा संपूणे पूजाके उपचारसे हे राधव 
सन्‍्तुष्ट हजिये, हे महीपाछ ! हे हरे ! यह नीरा> 
आपके मंगछूके छिये किया हैं! हें जगन्नाथ राम 
तेरे छिये नमस्कार है इसे ग्रहण करिये; इससे. नीराज 
चिन्मय अनन्तहूप देवाधिदेव शाह घतुषधारी सीः 
पर्ति रामके छिय नमस्कार है । इससे और “ बह 
यज्ञम्‌ ” इससे मंत्रपुष्पांजछि, “ यानिकानिः च पार्पाः 
इससे प्रदक्षिणा, अशोकके फूलोंके साथ रामको अ 
निवेदन करे अध्य देनेका संत्र-दशानतवधार्थाय ! ' 
हैं इसस अध्य समर्पण करना चाहिये । यह पूः 
पूरा हुआ ॥ -कथा--अगस्थ॒ .बोछे कि, दे ग्रुनिः 












ब्रतानि, ] . भाषाटीकासमेल: । ( ३२५ ) 


















; 3० 














सत्तम ॥ चेत्रे नवम्याँ प्रावपक्षे दिवापुण्ये पुनवेसों ॥१॥ उदये शरुगोरांशे स्वोच्चस्थे अहपथ्वके ॥ 
मेष पूषणि संप्राप्ते लग्म कर्केटकाहये ।। २॥ आविरासीत्स कया कोसल्यायाँ परः पुमान ॥ 
तस्मिन्दिने तु कतेव्यमुपद|सब्रते सदा ॥ ३ ।। तत्र जागरण कुयाद्रघुनाथपुरों श्ावि ॥ झुवीति 
खट्वादिव्यावृत््य्थं६घ्‌ ॥ अतिमायां यथाशाक्ति पूजा कायों यथाविधि ॥४॥ आतदेशम्याँ 
स्‍्नात्वेव कृत्वा सन्ध्यादिकाः क्रिया ।| संपूज्य विधिवद्रामं भकक्‍त्या वित्तातलुसारतः ॥ ५ । बाह्य- 
णान्‌ भोजयेत्सम्यक्‌ दक्षिणामिश्र तोषयेव्‌ ॥ गोबूतिलहिरण्याद्रेबेल्वालड्ररणेस्तथा ॥ ६॥ 
रामभक्तात्मयत्नेन प्रीणयेत्परया मुदा ॥ एवं यः कुरते भवत्या श्रीरामनवमीत्रतम्‌ ॥ ७ ॥ 
अनेकजन्मासिद्धानि पापानि सुचबहूनि च ॥ भस्मीकृत्य ब्रजत्येव तद्विष्णो5 परम॑ पदम्‌ ॥ <॥ 
38 धर्मों झक्तिमुवत्येकसाधनः ॥ अशुविवांपि पापिष्ठः कृत्वेद द्रतमुत्तमम्‌ ॥ ९ ॥ 
7 पूज््यः स्थात्सवेभूतानां यथा रामस्तथेव सः ॥ यस्तु रामनवम्याँ वे झुंक्ते सठु नराधमः ॥१०७ 
कुम्भीपाकेषु घोरेषु गच्छत्येव न संशयः ॥ अक्ठत्वा रामनवमीत्रत सर्वेत्रतोत्तमम्‌ ॥ ११ ॥ ब्रता- 
न्यस्याने कुरते न तेषां फलभाग्मवेत्‌ ॥ रहस्यकृतपापानि प्रख्यातानि बहून्यपि ॥ १२ ॥ 
महान्ति च प्रणश्यन्ति श्रीरामनवमीत्रतात्‌ ॥ एकामपि नरो भकत्या श्रीरामनवर्मी खुने ॥१३॥ 
उपोष्य कृतकृत्यः स्थात्सवेपापेः परमुच्यते ॥ नरो रामनवम्याँ तु ओऔराममतिमाप्रदः ॥ १४ ॥ 
विधोनेन मुनिश्रेष्ठ स मुक्तो नात्र संशयः॥ खुतीदण उवाच ॥ ओऔ शमप्रतिमादानविधानं वा 
कर्थ मुने । १५ ॥ कथय त्वं हि रामेषपि भक्तः्य मम विस्तरात्‌ ॥ अगस्त्य उबाच ॥ कथाये- 
ध्यामि तद्विदन म्तिमादानमुत्तमम्‌ ॥ १६॥ विधान चापि यत्नेन यतस्त्वं वेष्णवोत्तमः ॥ 
अष्टम्यां चेत्रमासे तु शुक्षपक्षे जितेन्द्रियः ॥ १७ ॥ दुब्तबावनपूर्व तु मातः सनायाद्रथाविधि ॥ 
नद्यां तडागे कूपे वा ह॒दे प्रस्तवणेषपि वा ॥ १८॥ ततः सलत्ध्पादि हा काया. संस्मरव राघवं 
हृदि ॥ गहमासाद विभेन्द्र कृयोंदोपासनादिकम्‌ ॥ १९॥ दानतं कुटुम्बिनः विप्न वेदशास्त्रपर 


सुतीर्ण ! ऐसे दिव्य दिन भगवान्‌ रामने रामाववार लिया 
इस दिन सदाही उपवास ब्रत करना चाहिये।॥ १-३ || 
[ बाकीके कछलोकोंका रामनवमीके निणयमसें पहिलेही अर्थ- 
कर चुके हैं | उस दिन रघुनाथ परायण होकर भूमिपर 
जागरण करना चाहिये | भ्रुवि यह जो छिखा है यह खाट 
आदिकी निवृत्तिके लिये है यानी भूमिपरही त्रह्मचय्येपूवंक 
जागरण करे। प्रतिमारमेंही शक्तिके अनुसार सगवान्‌ रासकी 
पूजा करनी चाहिये ॥४॥ प्रातःकारू दशमीमें स्वान संध्या- 
द्क करके भक्तिस अपने धनके अनुसार विधिपूर्वक पूजन 
करके ॥ ५ ॥ ब्राह्मणोंको भलीभांति भोजन करा, पीछे 
दक्षिणा देकर संतुष्ट करना चाहिये। गो, भूमि तिलछ* हिर- 
ण्यादिक वस्र और अलंकारोंसे ॥६॥ परम प्रसन्नताके साथ 
प्रयत्नपूनेक रामसक्तोंको प्रसन्न करे। जो इस प्रकार श्रीरा- 
मनवमीका व्रत करता है ।। ७ ॥ अनेक जन्मोंके किये हुए 
परिपृणे पापोंको भस्म करके, जो विष्णु भगवानका परमस- 
पद है उसे प्राप्त होता है ॥ ८ ॥ सबका यही धर्म हे, झुक्ति 
और भुक्ति दोनों का साधन हैं; अशुचि हो चाहे पापिष्ठ हो 
इस उत्तम ब्रतको करके ॥९ वो सब प्रणियोंका रामके 
समान पूज्य होजाता है। जो रामनवमीको भोजन करता है 
त्रो बाडाही अधम मनुष्य हैं।। १० ॥ वो घोर कुंभीपाकोरमें 


जाताही इसमें सन्देह नहीं है । जो राम नोमीके ब्रतको न 
करके ॥११॥ दूसरे त्रतों को करता हैं उसफा उसे फल नहीं 
मिलदा | जो एकान्तर्म महापाप किये है जो कि बहुतसे हैं 
॥ १२॥ और बडे बडे हैं वे सब राम नवमीके ब्रतसे नष्ट 
होजाते हैं । हे मुने | रामनवसीको भक्ति पूवंक एक भी 
॥१३॥ उपवास करले तो कृतकृत्य हो जाता हैं । सब पापोंस 
छूट जाता है । जो रामनवमीके दिन श्रीरासचन्द्रजीकी 
प्रतिमाका दान करता है ॥१७४॥ प्रतिमाके दानकी विधिसे 
वो मुक्त हो गया इसमें सन्देंह नहीं है सुतीद्ण बोले कि हे 
मुने |! रामकी प्रतिमाका दान केसे किया जाता हैं ॥ १५॥ 
इसे मुझ रामके भक्तके लिये आप विस्तारके साथ कहें। 
अगस्त्य बोले कि हे विद्वन्‌ ! में आपको इस उत्तम प्तिसा- 
दानको सुनाऊंगा ॥१६॥ विधान भी अ्यत्नके साथ कहूंगा 
क्योंकि आप ओष्ठ बेष्णव हैं चेत्र शुक्ला अष्टमीके दिन जिते- 
न्द्रिय हो १७॥ पहिले दांतुन करके पीछे विधिपूर्वक स्तान 
करे | वो नदी, तडाग, कूआ, हद ओर झरना किसीपर 
होना चाहिये ॥१८॥ भगवान्‌ रामचन्द्रका ध्यान करते हुए 
पीछे संध्या आदिक करने चाहिये। है विप्रेन्द्र! घर आकर 
विधिपू्वेक उपासना आदिक करनी चाहिये ॥ १९ ॥ सदा 
बेदशा्सखरोंके पाठ करनेवाले जितेन्द्रिय कुदुम्बी दभरहित 


२ प्रतिमादानविधिना । 


6 नवग्री- 
सदा ।। श्रीरामपूजानिरतं सुशील दम्भवर्जितम्‌ ॥ २०॥ विधिज्ञ राममन्चाणां राममन्त्रेक- 
साधनम्‌ ॥ आहूय भकक्‍त्या संपूज्य दृणयात्याथयात्रेति ॥ २१॥ ओरामप्रतिमादान करिष्पेए 
द्विजोत्तम ॥ तत्राचायों भव जीतः श्रीरामोईइसि त्वमेव च ॥२२॥ इत्युकत्वा पूज्य विप्र 
ने स्लापयित्वा तत+ परम्‌॥ लेलेनाम्यक्य पयसा चिंतयन्नाघवं॑ हांदे ॥ २३॥ शखेताम्बरधरः 
शेतगन्धमाल्याने धारयेत्‌॥ अंचितो भूषितश्वेव क्ृतमाध्याद्विकक्रियः ॥ २४॥ आचाई 
भोजयेद्धवत्या साचिकातन्रें! सुविस्तरम ॥ सुठ्जीत स्वयमप्येव हृदि राममलुस्मरन्‌ ॥ २५॥ 
एकभक्तव्रती तत्र सहाचारयों जितोद्वियः॥ शृण्वन्नामकथां दिव्यामहःशेष नयगरेन्मुने ॥ २६॥ 
सार्यसम्ध्यादिकाः कुर्यात्किया राममलुस्मरन्‌ ॥ आचार्यसहितो रात्रावधःशायी जितेच्दरिय: 
॥ २७ ॥ वसेत्स्वर्थ न चेकानते शीरामापितमानस+ ॥ ततः प्रातः समुत्थाय स्वात्वा सब्ध्या 
यथावोधि ॥ २८॥ प्रातः सर्वाणि कमोणि शीघ्रमेवब समापयेत्‌ ॥ ततः स्वस्थमना भूत्वा 
विद्वाद्ेंः सहितोघनध ॥२९॥ स्वगहे चोत्तरे देशे दानस्योज्ज्वलमण्डपम्‌ ॥ स्वणएहे स्वग॒हसभीपे । 
चतुद्वार पताकाढठ्य सवितान सतोरणम्‌ ॥ ३० ॥ मनोहर महोत्सेथ पृष्पागे! समलड़कृतम्‌ ॥ 
शहचऋहनूमादः प्राग्दारे समलड्कतम्‌ ॥ २१ ॥ गरुत्मच्छाड्रेबाणेश्व दक्षिण समलडकृतम्‌॥ 
गदाखड्डाडुदेशवेव पश्चिमे च विभूषितम्‌ ॥ २१ ॥ पद्मस्वस्तिकनीलेश्व कोबेयी समलड़कृतम्‌ ॥ 
मध्य हस्तचतुष्काट्यवेदिकायुक्तमायतम ।। ३ ॥ प्रविश्य गीतनृत्येश्व वाह्येश्वापि समन्वितम्‌॥ 
पुण्याहं वाचगित्वा च विदद्धिः प्रीतमानसे! ॥ ३४७ ॥ ततः सद्भृत्पयेदेव राममेव स्मरन्मुने ॥ 
अस्यां रामनवम्यां तु रामाराधनतत्परः ॥ रे५ ॥ उपोष्याष्ठसु यामेषु पूजयित्वा यथाविधि॥ 
इमां स्वणम्यी रामप्रतिमाँ तु भयत्नतः॥ ३६॥ श्रीरामप्रीतये दास्ये रामभक्ताय धीमते॥ 
भीतो रामो हरत्वाशु पापानि खुबहुनि मे॥ ३७ ॥ अनेकजन्मसंसिद्धान्यभ्यस्तानि महान्ति च। 


( ३२६ ) ब्रलराजः । 











सुशील श्रीरामकी पूजामे छूगे रहनेवाले ब्राह्मणको ॥। २० ॥ 


जो कि रामजीक संत्रोंकी विधि जानता हो तथा रामसंत्रोंका 
एकही साधन हो उसे बुलाकर भक्तिपूवक पूज प्रार्थना 
करके वर छे ॥ २१ ॥. कहे कि, हे द्विजोत्तम ! में रामचनद्र- 
जीकी मूर्तिका दान करूंगा। आप प्रसन्न होकर मेरे आचाय 
होजायेँ आप रामही हैं ॥ २२ | ऐसा कहकर आचास्येका 
पूजन करे। भगवान्‌ रामको हृदयमें याद करते हुए तेह 
ओर दूधसे उबटना करके स्नान करावे ॥| २३॥ आप भी 
बैतस्र पहिलकर रहे तथा श्रेतही गन्ध माल्योंको उन्हें 
धारण करावे पूजन करे भूषण घारण करावे मध्याहकालकी 
क्रियाओंको समाप्त करके ॥ २४ ॥ भक्तिके साथ विस्तार- 
पृवक सात्विक अन्नोंस आचायको भोजन करावे | हृदयमें 
भगवान्‌ रामका स्मरण करता हुआ आपभी भोजन करे 
(२५) उसमें आचाय्यके साथ जितेन्द्रिय रहकर एकवार 
भोजन करनेवाल्त ब्रती हे मुने | रामचन्द्रजीकी दिव्य कथा 
घुनता हुआही बाकी दिन व्यतीत करे॥२६।|भगवान्‌ रासका 
ही स्मरण करता हुआ सायेकालकी क्रियाओंको पूरा करे । 
रातम जितेन्द्रिय रहकर आचायेके साथ भूमिपर शयन 
5 ॥९७॥ सगवान्‌ रामका ध्यान करता हुआ एकान्त्म 
इसके वाद भातःकाछ उठ स्तानकर विधि पूर्वक संध्या 


करके ॥२८॥ प्रातःकाछके सब कर्मोंको शीघ्रही समाप्त कर 
दें । हे अनघ ! इसके बाद स्वस्थ मनको कर विद्वानोंके 
साथ ।२९॥ अपने घरके उत्तर देशमें दानका सुद्र मंडप 
वनवाये स्वगृहे-यानी अपने घरके समीपमें उत्तरकी तरफ 
उसके चार द्वार होने चाहिये, पवाक्राएं छगनी चाहिये 
तोरण सहित वितान बनाना चाहिये ।|३०।॥ वो सुंदर तथा 
उचित ऊँचा चाहिये। उसका पूरब॒का दरवाजा शैख पढ़ 
ओर हनूमानजीस अलंकृत होना चाहिये ॥३१॥ दक्षिणका 
दरवाजा गरुड शाह और बाणोंस अलंकृत हो पश्चिमका- 
द्वार गदा खड़ और अगदसे भूषित हो ।।| ३९ ॥ उत्तरका 
द्रवाजा पद्म स्वस्तिक और नीलरूसे विभूषित हो वो वी चसे 
चार हाथकी वदीसे युक्त चोडा होना चाहिये ॥३३॥ नृद् 
गीत ओर बाजोंके साथ उसमें घुसकर प्रसन्न हुए विद्वानोंसे 
पुण्याह बाचन कराकर ॥|३४॥ है मुने |! इसके पीछे रामका 
स्मरण करता हुआ इस प्रकार सकरप करे कि रामके आरा- 
धनमें तत्पर हुआ में इस रामनवमीके दिन || ३७ ॥| आठ 
पहर उपवास करके विधिपूवेक रामको पूज प्रयत्तके साथ 
इस सोनेकी राम प्रतिमाको | ३६ ॥ बुद्धिमान रामभक्तक 
लिये दूगा प्रसन्न हुए राम मेरे बहुतसे भी पापोंकों शीघ्र 
नष्टकर दते हैं। ३२७॥चाहे वो अनकों जन्मोंके इकट्ठे किये हुए 


श्षेतानि, | द भाषाटीकासमेतः । ह ( ३५७ ) 





विलिवेत्सवैतोनद्र वेदिकोररे खुतदइरम ॥ ३८ ॥ मद्ये तीवोइकयु के पा संत्याप्य चाचितव ॥ 
सौबणें राजते ताथे पाते पदक्ो गना।डिखेत ॥ ३९ ॥ ततः स्वर्णनयीं रामप्रतिमां पलमात्रतः ॥ 
निर्मितां द्विुुजां रम्पां वामाइृस्थितजानकीम्‌ ॥ ४० ॥ विश्वर्ती दक्षिणे हस्ते ज्ञानमुद्ठां महा- 
मुने ॥ वामेनाधःकरे गारादेवीमालिंय संस्थितामू ॥ ४१ ॥ सिंहासने राजते च पलद्यविनि- 
मिते ॥ पश्चामृतल्लानपूर्तव सम्पूज्य विविवत्ततः॥ ४२॥ मूहमन्तवरेण नियतो स्यासपर्वमत- 
निद्रतः । दिवेव॑ विधिवत कृत्वा रातों जागरणं ततः॥ ४३ ॥ दिव्यां रामकर्थां श्॒त्वा रम- 
मक्तिसमन्वितः ॥ गीतनृत्यादिनिश्वेव रामस्तोत्रेरनेकथा ॥ ४४ ॥ रामाड केशव संसतुत्य गन्ध- 
पुष्पाक्षतादिनिः ॥ करपरागुरुकस्त्रीकट्ठाराद्ररनेकथा ॥ ४५ ॥ संपृज्य विधिवद्धकत्या दिवा- 
राज नयेदबुधघः ॥ ततः आतः समुत्याय स्लानसन्ध्यादिका क्रिय5 ॥ ४६॥ समाप्य विधितरद्राम 
पूजयेद्रिघिवन्मुनें ॥ ततो होम॑ प्रकुत्नीत मूछमज्जेण म्जावत्‌ ॥ ४०॥ पूर्वोक्तर्नकुण्डे वा 
स्थाग्डिले वा समाहित: ॥ लोकिकामों विधानेन शतमष्ठोत्तरं सुने ॥ ४८॥ साज्येन पायसनेंव 
स्मरन्‍्राममनन्यधीः ॥ ततो मंकंत्या खुसन्तोष्प आचाय पूजयेन्छुने ॥ ४९॥ कुण्डलाभ्यां सर- 
त्नाभ्यामड-जुलीयेरनेकथा ॥ गन्धपुष्पाक्षतवेस्रेविचित्रेस्तु मरोहरेः ॥ ५० ॥ ततो राम॑ स्मरन्‌ 
द्यादिम मन्तरमुदीरयेत ॥ इमाँ स्वर्णमर्यी रामब्रतिमां समलडक्ताव॥५१॥चित्रच्च् पुन च्छत्न 
रामोह राघवाय ते॥ श्रीरामप्रीतये दास्‍्ये तुष्ठो भबतु राघवः ॥ ५२॥ इते दुत्वा विधानेन 
दद्ादे दक्षिणां घवम्‌ ॥ अन्नेग्पश्व यथाशकक्‍त्या गोहिरिण्यादि भक्तितः ॥ ५३॥ दुच्याद्वासोग॒गं 
धान्य तथालड्गरणानि च ॥ एवं यः कुछते रामप्रतिम[दानसुत्तमम्‌ ॥ ५४ ४ बहाहत्यादियापेम्यों 
मुच्यते नात्र संशयः ॥ तुलापुरुषदानादिफलमाप्नोति छुद्त ॥५५७॥ अनेकजन्म संखिद्धपापेम्यो 
मुच्यते ध्वम्‌॥ बहुनात्र किमुक्तेन सुक्तिस्तस्य करे स्थिता ॥५६॥ कुरुक्तेत्रे महाएुण्ये सूर्य पर्वण्य 


| 
डे 


वारंवारके अभ्यस्त भी क्‍यों न हों । वेदिकाके ऊपर सब | पद्मकुण्डमें या स्थडिछुम लोकिका प्रिंस हे मुने विधानके साथ 


ओरसे सुन्दर स्वेतोभद्र बनावे ॥ १८॥ बीचमें तीयथके 
पानीस भरा हुआ पात्र संस्थापरित करके उसका पूजन 
करना चाहिय | सोदा चांदी: तांबा इनमेंस किसीके भी 
पात्रपर षघट्कोण छिखे ॥३९।| इसके वाद एकपल सोनेकी 
भगवान्‌ रामकी दविय्रुंजी प्रतिमा ववाते । सुन्दर जानकी 
जीडो वामसाड़ुसें बिठावे ॥ ४० ॥ हे महामुने | व दांये हाथ 


हि मा, हा हि। कि । 
में ज्ञानमुद्राको घारण किये हुए हो बांये नीचे हाथसे देवी | 
का आलिज्ञन करके स्थित हों ॥ ४१॥ उन्तका दो पहके | ईंस रास के कर 

हि | हुई हैं उसे रामरूप स, श्रीराम चन्द्रजीकी प्रवन्नताके छिय 


बने हुए चांदीके सिंहासनपर पंचाम्ृतके स्तानपूजक विधि 
पूवेक पूजन करके ॥ ४२॥ निराछल हो नियम पूरक 
मूल्मंत्रस न्यास करके दिनमें ही इसी प्रकार विधिपूर्वक 
पूजनादि करके रातमें जागरण करे ॥ ४३ | रामचन्द्रजी 
की भक्तिक साथ रामचन्द्रजीकी दिव्य कथाएँ छुनते हुए 


नृत्य गीतादिकों तथा अनेक तरहके रामचन्द्रजीके स्तोत्रों | 
स के ४४ ॥ एवम्‌ राम्तचन्द्रके अष्टकोंस हम हा 
स्तुति करके गन्व पुष्प, अक्षत. कपूर, अग॒ह, कर्तूरी ओर | 
3 कील लेट जल कक हि | है, हे सुत्रत ! वो तुछा पुरुषक दान आदिकोंका फल पाता 
है न इसमें सन्देह है ०० वो अनेक जन्मोंके किये हुए 
| पापोंसे छूट जाता हैं इसमें मी क्या सन्‍्देह हे, वहुत कहने 


कल्हार आदिकोंसे अनेक तरह ॥ ४५४ भक्तिके साथ 

हू कस ५ रच 0. मु 
विधि पूवक पूजनमे ही दिनरात पूरे करे । फिर प्रातः 
काल उठ स्तान सन्ध्या आदिक क्रियाओंकों ॥ ४६॥ 


विधिपूवक पूरा करके पीछे विधिपू्वेक भगवान्‌ रामका 
पूजन करे। फिर समंत्रवेत्ताको चाहिये कि मूलमंत्रस विधि- | के कप कली थे मा 
| पुरधदान अ'दिर्क करतेस जो फड़े मिछता हूँ ॥ ०७ ॥| दूँ 


फ्धेक़ होम करे! ४७ || एकाप्र चित्त हो पहिे कहे हुए 





एकसो आठ || ४८॥ घी मिली हुईं खीरकी आहुति दे। 
७८ २ छत 
एक्ा्ममनस रामका स्मरण करता हुआ, हे मुन ! पीछे 


| सनन्‍्तोषपूव कु आचाय्यका पूजन करे ॥| ४९ ॥ रत्नसमेत 
| कुण्डछ छाव तथा अनेक वरहके गन्ध पुष्प अक्वत तथा 
| मनोहर विचित्र तरहके वस्र इससे होना चाहिय ॥ ५० ॥ 
| इसके बाद रामका स्मरण करता हुआ इस मंत्रको बोलकर 


प्रतिमाका दान छझरदे कि मरी भांति सजाई हुई सोनेहझी 
इस राम प्रतिमाको ॥५१॥ जो कि रंगे हुए दो वर्बोस ढक्की 


स्वये रासजीरूप आपके लिये देता हूँ इससे भगवान्‌ राम 
मुझपर प्रसन्न हो जायें॥ ५२ ॥ इस विधानसे अतिमा 


| देकर उसकी दक्षिगा भी अवश्य ही देनी चाहिये। इसको 
| भी अपनी शक्तिके अनुसार भ्क्तिपूबक गो सोना ॥५३॥ 


दो वस्र घान्य ओर अछंकार दे इस प्रकार जो सर्वेभ्रेप्ठ 
रामचन्द्रजीकी अतिमाका दान करता है ॥ ५४ ॥ वो ब्रह्म- 
हत्या आद्क सब पापोंसे छूट जाता हैं इससे सन्देह नहीं 


में क्या हैं मुक्ति उनके हाथोंमें स्थित रहती है ॥ ५६ ॥ 
| (कल प्‌ ऐ न 
महापुण्यशाली कुरुक्षेत्र तीथम सूय्रहणक्क समय सारे तुला 


इलंसंजई | | नवैमी- 

















जाए आक्रककाा ऋमायाला ब्रकाा। चाक- च् ॥्रधंशककर 





शोषतः ॥ तुलापरुषदानाबः कृतेयलभते ॥ ५७ ॥ तत्फलं लभते मत्यों दानेनानेन सुब्रत ॥ 
खुतीक्षण उवाच ॥ म्रायेण हि नराः सर्वे दरिद्राः कपणा झने ॥ ५८ ॥ के! कतंव्यं कथमिद॑ ब्रत॑ 
व्रहि महामुने ॥ अगस्त्य उवाच ॥ द्रिद्रश्च महाभाग स्वस्य वित्तालइसारतः ॥ ५९॥ पलायेंग 
तदर्धेन तद्धर्धेन वा पुनः ॥ वित्तशास्यमकृत्वेव कुयादेवं ब्रत॑ सुने ॥ ६० ॥ यादि घोरतरं दुष्ठ 
पातक नेहते कचित्‌ ॥ अकेखनोपि यत्नेन उपोष्य नवमीदिन ॥६१॥ एकचित्तो5पि विधिवत्सद 
पाप: पमुच्यते ॥ आत/ल्वानं च विविवत्कृत्वा संध्याददिकाः क्रियाः ॥ ६२ ॥ गोमूतिलहिरण्यादि 
दद्याद्वित्तालुसारतः ॥ श्रीरामचर्द्रभक्तेम्पो विद्ृद्धबः श्रद्धयान्वितः ॥ ६३ ॥ पारण त्वथ कुर्दीत 
ब्राह्मणेश्व स्ववन्धानेः ॥ एवं यः कुहते भकत्या सर्वपापेः प्रग्नच्यते॥ ६४ ॥ प्राप्ते श्रोरामनवमी- 
दिने मत्यों विमृढधीः॥ उपोषण न कुछते कुम्भीयाकृषु पच्यते ॥ ६५॥ अयत्किचिद्राममहिध्य 
क्रियते न स्वशक्तितः ॥ रोरवे स ठु मूढात्मा पच्यते नात्र संशयः३॥ ६६॥ सुतीक्ष्ण उबाच॥ 
यामाष्टके तु पूजा वे तत्र चोका महामुने मूलमन्ज्रेण संयुक्ता तां कथां वद सुब्रत ॥ ६७॥ 
अगस्त्य उवाचा।सववेबां रामनन्त्रार्णा मन्रराजं पढक्षरम। इंदं तु स्कानदे मोक्षंघ॒ण्डे श्रीराम प्रति 
रुद्रगीतायां रुद्ववाक्पम्‌ ॥ ममूजॉमंणिकण्यान्ते अधोंदकनिवासिनः ॥ ६८ ॥ अहं दिश्ामि ते 
मन्त्र तारकस्यो रेशतः श्रीराम राम रामेति एतत्तारक॒घ्च्यते ॥ ६० ॥ अतरत्व॑ जानकीनाथ 
पर ब्रह्मामिधीयसे ॥ तारक बह् चेत्युक्ते तेन पूजा प्रशस्यते ॥ ७० ॥ पीठाड़देवतानां तु 
आदत्तीनां तथेव च॥ आदावेब प्रकुर्वीत देवस्य प्रीतमानप्त ॥ ७१ ॥ उवचारेःषोड शन्तिः पूजा 
काय। यथाविधि॥ आवाहन स्थापनं च सम्पृखीकरणं तथा ॥७२॥ एवं छुंद्रां म्ाथतां च पूजा 
मुठ मयत्तनतः॥ शब्भपूर्जा प्रकुर्वीत पूर्वोक्तिधिना ततः ॥ ७३ ॥ कलश वामभागे च पूजा- 


४30७७७७७७2७2 छाया रू या 2 ॥ 365 मा ० अल अशननजलनर ल कि क ज मगर हल शल जद कील न्‍ कलम द कवि जल अ मल कर लि किक डक 


सुब्रत ! वो फल इस दिन रामजीकी प्रतिमाका दान करने 
से मिल जाता है। सुतीक्ष्य बोढे कि, हे मुने प्रायः करके 
सब मनुष्य दरिद्र और कृपण हैं ॥५८॥| हे महामुन ! 
यह तो बब्ाइये कि इस ब्रतकों किसे करना चाहिये । 
अगस्त्यजी बोल कि, हे महाभाग ! द्रिद्र भी अपने घनकऊे 
अनु पार ॥ ५९ ॥ आधे पछ अथवा आधेके ओवे अथवा 
उसके भी आधे पलकी प्रतिमा बनवालें। घनके लोभको 
छोडकर ही हे मुन ! इस ब्रतको करे | ६० ॥ यदि कोई 
बोर तर बुरा पाप किसी तरह भी नष्ट नहीं होता, उसको 
भर्कि वन भी प्यत्तके साथ नौमीके दिन उपवास करके 
पप्ट कर देता है तथा विधिपूवेंक एक चित्त होऋर भी 
[वक्त विवानसे सब पापोंसे छूट जाता है । प्रातः स्नान 
5 एके विधिपूवक सन्ध्या आदिक क्रियाओंको कर ॥६१॥ 
।३२॥ गो, तिछ, हिरण्य, अपने धनके अनुसार जो 
वेद्वान्‌ रामचन्द्रजीके भक्त हों उन्हें श्रद्धापृ्षक देदेना 
वाहिये ॥३३॥ ब्राह्मण और बन्धुओंके साथ पारणा करे। 
नो इस प्रकार भक्तिक्के साथ इस व्रवको करता है वो सब 
ग़पोंसे छूट जाता है | ६४७॥ जो सूढ बुद्धिका मनुष्य 
एप्रनवप्नीके दिन ब्रत नहीं करता वो कुँभीपाऊसें पचता 
असल अब लिलप सकल कल कक। कक 





है ॥६५॥ जो अपनी शक्तिके अनुसार रामके छिये कुछ 
भी नहीं करता वो बोरा कुम्भीपाकर्म पक्राया जाता हैं 
इसमें सन्देह नहीं है !।६६ ॥ सुद्तीण बोले कि हैं महा' 
मुने , जो आपने ब्॒तमें आठ पहर पूज। मूछ मन्त्रके साथ 
कही है उस आप विस्तारके साथ कहूँ ॥६७॥ अगस्त्यबोढे 
कि, रामच-द्रजीके सब मन्त्रोंमें पढक्षर मन्त्र राजाके 
समान है । यह तो स्कन्द पुराणके मोक्ष खण्डमे आईं हुई 
रुद्र गीतामें रुद्रका वाक्‍व हें--मणिकर्णिका घाटपर आपः 
पानी और आधा पानीके भीतर पडे हुए मरनको इच्छा 
वाले पुरुषको ॥ ६८ ॥ तारनेवाले तेरे मेत्रका उपदेश देता 
हूं “श्रीराम राम राम” इसको तारक कहते हैं ॥६९॥ इसी 
कारण हे जानकीनाथ | आप परद्य कहाते हो क्योंकि 
तारकको ब्रह्म कहते हैं इस कारण आपकी पूजाकी प्रशंसा 
है| ७० ॥ देवके पूजनके आदिम पीठके अज्ञदेवता दवा 
आवरणोंके देवताओंका प्रसन्नचित्तके साथ पूजन करें 
॥ ७१ ॥ फिर विधिके साथ सोछहों उपचारोंसे पूजाकरनी 
चाहिये। आवाहन, स्थापन, संमुखी करण ॥७२॥ इसौवरह 
प्रार्थनामुद्रा, पूजामुद्रा इनको प्रयत्न के साथ करे।फिरपदिल 


कहीहु३ विविसे शख पूजा करे।७श।बांय मागमें कछश अ र्‌ 
रा अली न कल ललनीकि मनी लिनिनद नल जिन लिन मिलन लिन न शीश नश वन डनन लकी नकल लकी लीकिननी ली कक नि लिक कब. 


९ झुतोद्ण उवाच ॥ व्रा्टकेरिवत्यादियातित्रद्न तवातयमिस्पन्तो अन्‍्यो यद्यपि बवाडें च हृ्यते तथाप्यस्थ शोपमने 


पाथनभूत'ति प्रन्वास्तरतति ज्ोयछब्यानीति तप 


स्थापितःप च सुधीमिविंचारणीय: । 






भाषाटीकासमेतः । 


( ३२१९ ) 





द्रव्याणि चादरात्‌ ॥ पीठे संपूज्य यत्नेन आत्मान॑ मन्त्रकुच्चरेव ॥ ७४॥ पात्रासादनमष्येव कुयों- 


द्यामेष्वतन्द्रितः ॥ पीताम्बराणि देवाय प्रापेयन्नचयेत्सुधीः ॥ ७५ ॥ स्वणयज्ञोपवीतानि दवह्या- 


देवाय भक्तितः ॥ नानारत्नविवित्रा्ि दह्यादाभरणानि च ॥ 
मनोहरम्‌ ॥ ऋमात मूलमन्त्रेण उपचारास्पकल्पयेत्‌ ॥ ३७ 


७६ ॥ हिमाँडश्ष्ट रूचिर घनसार- 
॥ कहूरेः केतकेर्जात्येंः पुन्नागाद्येः 


प्रप्‌्णयव ॥ चम्पकेः शतपत्रेश्व खुगन्घेः खुमनोहरेंः ॥ 3८ ॥ पाद्यचरुदनधूपेश्न नत्तन्मन्त्रे; 


प्रप्जयेत्‌ ॥ मक्ष्यमोज्यादिक नकत्या देवाय विधिनापय्ेत्‌ ॥ 
िओ कप करे कर कर 

पाप: प्रमुच्यते ॥ जन्मकोटिकृतेघोररनानरूपेश्व दाझुणें: ॥ <० 

एव भवेम्मुने ॥ श्रद्धानस्य दातध्य श्रीरामनवर्मीद्रतम्‌ ॥। 


शनि | 


७९ ॥ येन सोपस्करं देव दच्चा 
॥ विम्क्तः स्थात्क्षणादेव राम 
८१ ॥ सर्वेलोकहितायेद पवित्र 


पापनाशनम्‌ ॥ छोहेन निर्मित वाषि शिलया दाहूगावि वा ॥ <२ ॥ एकेनेव प्रकारेण यस्मे 
कस्में च वा सुने ॥॥ कृत॑ सर्वे अयत्नेन यत्किविदति भाक्तितः ॥ <३ ॥ जवेदे ऋान्त मासी दो 
यावत्स दशमीद्निम्‌ ॥। अनेन स्पात्युतः पूजा दशम्यां मोजये द्विजाव्‌ ॥ <४॥ भक्त्या भोज्ये- 


बहुविपेदद्यद्धकत्या च दक्षिणाम्‌ ॥ ऋतकृत्यों मवेतेन सद्यो रामः प्रत्तीदति ॥ <५ 
तिहब्नगे बावि पुनराबातिवरजितः । द्वादशाब्दे कृतेनानि यत्वापं चापे झुच्यते ॥ <+ 


॥ तृष्णों 
॥ विलय 


बति तत्सई श्रीरामनवमीत्रतम ॥ जयख राममन्त्राणां यो न जानाति तस्य वे ॥८७॥ डयोष्य 
संस्मरेद्र।्म न्यासपूर्वमत/ब्द्वितः ॥ श॒रोलेब्वॉनिम मन्जे न्यतेम्यासपुर/सरम्‌ ॥<<4॥ यामे यामें 


के 


च विधिता कुय्यात्पूजां समाहितः | छुपछुछुश् सदा कुर्याच्डी रामनवमीत्रतम्‌ ॥ मुच्यते सर्वे- 
पावेभ्यो याति बह्म तनातनम्‌॥ <९॥ इति श्रीस्कर्दपुराणे अगस्त्यलेहितायामगल्तिछुतीदण- 


संवादे रामनवमीत्रतजितिः संपूर्ण: ॥ 


पूजके द्रव्यों को आदरके साथ रख | पीठपर प्रयत्नके साथ 
अत्महृप भगवान्‌ रामका पूजन करके मन्त्रका उच्चारण 
करे | ७४ ॥ इसो तरह निएलप होऋर पात्रोंडो इकट्ठा 


करे, देवके लिये पोताम्बर सनपण करता हुआ पूजन | 
| दशमीमें झिर पूजा करे आाह्यण भोजन करावे ॥ ८४॥ 
| मक्तिके साथ बहुतसे भोच्योंसे जिम्रा दक्षिणा दे । इससे 
| वो कृत हुत्य होजाता हैं उर ९ भगवान्‌ राम शोन्नही अन्न 
| होजाते हैं ॥ ८५ ॥ चरिं मजुप्य चुपचाव मुनिवृत्तिस भी 
 बठा रहे तो झिर उसको आधृत्ति नहीं होतो । बारह वष 
| करले तो जो पाप हों उनसे भी छूट जाता है ॥ ८६ ॥ बे 
| सब पाप रासनवमीके त्रतसबविछाजते हैं,जो राममन्त्रॉका 
मन्त्रेसि पाच्य चन्दुत और घूय दें। भकद्ष्य भोज्य आदि भक्ति- | जप नहीं जानता वो ॥८७॥ उपवासपृर्च # न्‍्यासोंके साथ 

| निराछस हो रामका स्मरण ही करे । यदि गुरुसे यह सन्‍्त्र 
| मिला हो तो न्‍्यासोंके साथ इसका न्यास करे ॥८८॥ एक 
क्‍यों | एक पहरमें विधिके साथ एकाम्रचित्त द्यो पूजा करे। सुमु- 


| क्षुके: चाहिये कि सदा रामनौमीका ज्त करें। वो सब 


करे | ७५॥ भक्तिके साथ सोतेके उपवीत एवम्‌ अनक 
तरहके ब्रिचित्र रत्न तथा आभरणों को दे | ७६ ॥ हिमके 
पानीस बिसुएहविर मनोईर घनसारको देवके लिये मेट 
करे | एक चनदतही नहीं फितु ऋवर अठुसार मूडमन्त्रस 
सब उपचारोंको ऋरे || ७७ ॥ कहार। केंतकी, जाति, 
पुन्नागादिक चंपह, शतपत्र,तथा और भी सुगन्धित मनो- 
हर पुप्पोंस्त पूजा करें ॥ ७८॥ पा चन्दन और धूपके 


पूक जिविक्रे खाथ देवकों अप करे ॥७२॥ क्योंकि उर- 

सर सहित रामकी सू विका दान करक सत्र पापोस छूट 
3 ० कप कक. कप * 

जाताहे चाहे व अनेक जन्मोंके किये परमसयेकर ही क 

ते हों ॥ ८०॥ हे मुने ! एक क्षणम ही मुक्त होकर रामही 


दोजाताहे जो श्रद्धालु हो उसे रामनवमी हा ब्रतदेना चाहिये 

थे यह | श्रीस्कन्द्पुराणमें कही गईं अगध्त्यसंहितामें आये हुए 
| अगस्त्य और सुतीढणके संवादके श्रीरासनवसी ब्रतकी 
| विधि पूरी हुईं |! 


॥८१॥ सब छोकोंके कल्याणके छिय यह हु; पावका नाश 
करनवाल्ा एवं परमपवित्र हे लोह ( सोनकी ) बनी हुई या 
पत्थाक्ली बनी हुई अववा काठकी बनी हुई त्रतिमाका दान 


घर 









| करे॥८१॥/जिस किसी भी प्रकारसे जिय किसीफे भी लिये 
|! * ऐ ( श्छ 
| इस ब्र॒तकों करावे । जो भी कुछ प्रय॒स्वपूवेक भक्तिके साथ 
| ञ्् ् 
| करे वो सब सकहछ होता है॥८३॥अथवा जव॒तक दुशमीका 


दिन न आये तबतक एकान्तमें वेठकर मन्त्र जयकरता रहे। 


पापोस छूटकर सनातन अक्को त्राप्त होता है ।| <५॥ यह 


९ (770060ए87 हक 2 किम लक/4 6५८ 27776 72060 7377-8९ ०७८ 727 76770: 582 722 8/%::5:7 एरसि उप: 
तक आह दाह १0 एथाश लाइक गा 0 आए शक शा ४00११ रा (70700 6625: 624 ; 
हद! 07000 कक मनननमनननममननिननीनिनिननिनननानाननिननीनिननननननननननननयतिनिनननिनननीनननननतननन-+ 05 क 0 /280,7 6008 6 


ब्रतराज: ! [ नवप्री- 








अथ रामनामलेखनब्रतम्‌ ॥ 


तत्व रामनवमीमारभ्याथवा यस्मिन्कस्मिन्काले कार्यमू ॥ आचम्य प्राणानायम्य मासपत्ना- 
चुल्चिस्य सकलपापक्ष यकामो विष्णुलोकप्रातिकामों वा श्रीरामश्रीतये रामनामलेखन करिप्य 
इति संकरुप्प लिब्वितरामनामपूजा नाममंत्रेण घोड शोपचारेः कायो ॥ अथ कथोद्यापर च--पावेत्यु- 
वाच || न्यास्म्यतुगहीतास्मि कताथास्मि जगत्पश्नो ॥ विच्छित्नो मध्य संदेहग्रन्थिभवदतुप् । 
हात्‌॥ १॥ लन्‍्ठुखाइलित रामकथामृतरसायनम्‌ ॥ पिबन्त्या मे मनो देव न तृप्यति भवाप- 
हम्‌ ॥ २॥ श्रीरामस्थामुत नाम खत संक्षेपत्रो मया ॥ इदानीं श्रोठुमिच्छामि विस्तरेण स्फुदा- 
क्षरम्‌॥ ४ ॥ श्रीमहादेव उवाच ॥ श्वणु देवि प्रवक्ष्याम गुह्यादूगह्मतरं महत्‌ | आप्नोति परमां 
सिद्धि दीवाएु पुत्रसंपदम्‌ ॥ ४ ॥ रामनाम लिखेद्य शतु लक्षकोटिशलाबंधि ॥ एकेकमक्षर पुप्ां 
महापातकनाशनम्‌ ॥५॥ सकामो5पि लिखेद्य॒स्तु निष्कामों वा स पार्वति । इहेव सुखमाप्नोति 
अम्ते च परम पदम ॥ ६॥ आदावन्ते च मध्ये च ब्रतस्योद्यापनं॑ चरेत्‌ ॥ उद्यापन विनानैव 
फलसिद्धिमवाप्ठुयात्‌ ॥ ७ ॥ तस्मात्सवेशयत्नेत्र नाम्न उद्यापन कुछापार्वत्युवाच ॥ नतातिमि 
देवदेवेश भकतालम्रहझार्ऊ ॥ <॥ नाम्न उद्यापन बूहि विस्तरेण मत प्ग्तो ॥ श्रीशिव उवाच | 
श्रूणु देवि प्रवक्ष्यमि जिस्तरेण यथाविधि ॥ ९ ॥ नाम्न उद्यापान॑ चात्र प्तक्त्या भवदतुअहाम्‌ ॥ 
सौवणी प्रतिमां कुर्याच्छीरामस्य सलक्ष्मणाम्‌ ॥ १० ॥ हनूमत्मतिमां तत्र चतुर्थाशेन हाटकेः ॥ 
सुबर्णस्य प्रमाण तु पल/ष्ठकछु दीरिलम्‌ ॥ ११ ॥ अशक्त बत्पलेनेव तदधां्धेन वा पुन ॥ श्रीरा- 
मभपतिमां कुबन्वित्तशात्य न कारयेत्‌ ॥ १९ ॥ राजत चासन कुर्यान्माषे! षोड शसंमितः ॥ पीत- 
वस्नेण संवेध्य स्थापयेत्तण्डुलोपरि ॥ १३ ॥तण्डुलानां प्रमाणं तु भवेद्ोगचतुष्ट यम ॥ शुचौ देशे 
ग॒हे तीर्थ मण्डप॑ कारयेत्खुधीः ॥ १४॥ तोरणानि चत॒द्वारे बन्धयेदाम्रपछवेः ॥ भूमों गोमयलि- 
तायां स्वतोभद्रमण्डलम॥१५॥ रचयेत्सतथान्येश्व नानारहडेः खुशोभनम्‌ ॥ कुम्भानछौ च पूर्वांदौ 





भी समय कर लेना चाहिये। आचमन प्राणायाम करके 
मास पक्ष आदिकोंको कह,सारे पा्पोंका नाश चाहनेवाला 
एवं विष्णुलोक मुझ मिल एसी इच्छावाछा श्रीरामचन्द्र- 
जीकी ग्रसन्नताके छिये रामनामकों डिखूंगा ऐसा सकटप 
करके लिखित रामनामकी पूजा नाममंत्रस सोलछहों उप- 
चारोंसे करनी चाहिये ॥ कथा और उद्यापन-पावतो बोलीं 
कि, है जगग्ममो ! में धन्य हूँ आपने सुझपर पृण कृपाकीहे 
आपकीपरिपूर्ण अनुकंपास मरी संद्‌हकी गांठों आपही खुल 
गयी ॥ १ ॥ आपके मुखसे रामकी कथारूपीअम्रत रसायन 
निकली । उस सवतापह्यारिणीको पीते २ मेरा मन तृप्त नहीं 
होता ॥ २॥ मेने श्रीरामका अभ्ृत-नाध संक्षपसे छुना है । 
इस समय से विस्तारके साथ खुलासा सुवना चाहती हूँ॥३॥ 
श्रीमहादेव बोले कि, हे देवि | गुछ्मसे भी परममहागुद्न 
कहूगा आपसुर्े,इसको सुननेसे परससिद्धि दीघे आयु और 
पुत्र सेपत्ति प्राप्त होती हें ॥9॥ जो रामनाम छिखेगा उसका 
पक एक अध्षुर पुरुयोंके महापावकोंको छक्षकोटि शततऋ 
थ करता है ७७॥ हे पवेति | सकाम हो वा निष्काम 


द्फ्‌ 
वो यहां सुख पाता है तथा 


हैं जो! रामदास छिखता हद 
अन्न प१रम्पद को पाजाता हर ।6६॥ आदि अन्त ओर मब्य के 


रामनास लेखनत्रत-यह रामनवीस केंकर जिस किसी | ब्रतक्वा उद्यापन ऋरना चाहिये। क्‍योंकि बिना उद्यापनकेफर 


सिद्धि नहीं होती ॥ ७ ॥ इस कारण सारे प्रयत्नसे नामक 
उद्यापन कर । पावती बोलीं कि, हे देंव देव ! हे भक्तोंपर 
दया करनेवाले ! हे देवदेवेश ! मैं आपको प्रणाम करती हूँ 
॥८॥ है प्रभो ! विस्तारके साथ नामकः उद्यापन करिये | 
ओशिव बोले कि, हे देवि | आप सावधान होकर सुने ॥९ 
मे आपकी भक्ति और आपपर अनुप्रह होनेस में नामका 
उद्यापन कहता हूं | छक्ष्षण सहित श्रीराम चन्द्रजीकीस नेकी 
प्रतिमा बनवाये ॥१०॥| उसके चौथे हिस्से की हतुमानजीरी 
प्रतिा बचावे । श्रीरामकी प्रतिप्तामें ८ पछ झुबणे होता 
चाहिये ॥९॥ यदि सामथ्य न हो तो पछकी अथवा पला- 
घेकी ही बनवाले श्रीराप्की प्रतिमाकों बनवातीबार क्ृप- 
णवा नहीं करनी चाहिये ॥ १२ ॥ सोलह माघका चांदीका 
आजन वनवावे,पीतवखसे वेष्टितकरके चावलोंके ऊपर रख 
द्‌॥१शाव चार द्रोणतण्डुल होनेचाहिय जिनपर कि। आसव 
रखाजाय । घरके पवित्र देशमें अथवा तीर्थमें मण्डप करावा 
चाहिये॥ १४॥अआमके पहवके तोरण बनाकर चारों दवारोंपर 
बांध दे।गोबरस लिपोहुई भूमिसें सर्वतोभद्र बनावे॥ १5 ! 
अनेक रघ्डोंस रंगेहुए सात धानोंस सुझोभन बनाये पृ्ाइ 


भाषाटीकासमेलः (३३१९ ) 


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व्रतानि, | 





स्थापयेदब्रणाचछुमान ॥ १६॥ कुम्भमेक मध्यदेशे स्थापयत्तण्डलोपरि॥ शुद्धोदकेन संपर्थ पद्च- 
स्तन: सपछवे: ॥१७॥ नारिकेरफलान्यष्टावेके रामाय दापयेत ॥ आचाय वरयेत्तत्र वेदशा 

वेशारदम ॥ १८ ॥ बह्मादिऋत्विर्जा तत्र वरणं कारयेत्ततः संपृज्य वस्थालइगा- 
भूषणेः ॥ १९ ॥ ऋत्विजः षोडशाष्टी वा वरयेद्वेदपारगान्‌ ॥ स्नात्वा नित्य विधायादों पृजये- 
दणनायकम्‌ ॥ २० ॥ पुण्याह वाचयित्वा तु पूजयरेद्रामचन्द्रकमातनोउडं च प्रतिष्ठाप्य स्वशा- 
खोक्तविधानतः ॥ २१ ॥ विष्णसूक्तेन होतव्यं मूलमंत्रेण वा पुनः ॥ नवग्रहाँश्व दिक्पाठास्मंत्रा- 
तुकत्वा च होमयेत्‌ ॥ २२ ॥ पुरुषसूक्तेन होतव्याः समिदाज्य चरूस्तिलांः॥ अष्टोत्तरसहस्त॑ 
तु राममंत्रेण होमयेत्‌ ॥ २३॥ होमानते पूजन कुयाद्रामचन्द्रादिदेवता।।पजग्रित्वा ततो हुत्वा 
बलि पूर्णाहुलि तथा ॥ २४॥ श्रेयःसंपादन कुयादर्मियेके समाचरेत्‌ ॥ राम नत्वाचंग्रित्वा च 
प्राथयित्वा पुन+पुन॥ २५॥ अञचाय पूजयेत्पश्चात्खुनणवख्रघेतठाने। । प्रतिमां दानमंत्रेण आचा- 
यांय निवेदयेत ॥ २६॥ मतोएईस्मि देवदेवेश बहुबुद्धिमहात्माने! ॥ यश्चिन्त्यते कर्मंपाशाददि 
नित्य मुसुक्षुन्रि!॥ २७॥ मायया गुणमय्या त्व छजस्यवास लुम्पसि ॥ अन्त्वत्पादभक्तेडु 
त्वद्गधक्तिस्त श्रियोषचिका ॥ २८ ॥ भक्तिमेव हि वाज्छन्ति त्वद्धक्ताः सारवेदिनः ॥अतस्त्वत्पाद- 
कमले मक्तिरेव सदास्तु मे ॥ २९॥ सखंसारामयतत्तानां भषज्य भक्तिरव ते॥ सीतासोमित्रि- 
हतमद्गक्तियक्तो नरेश्वरः ॥३०॥ दानेनानेन मे राम उक्तिमुक्तिमदों भव ॥ प्रतिमादानसिद्धचथ 
शक्त्या स्वणे तु दापयेतद॥२१॥दान यदक्षिणाहीनं तत्सव निष्फल भवेत्‌॥ ब्राह्मगाउ्छतसाहल 
भोजग्रेन्म धुर्सापषा।।३२॥ पक्कानेःपायसेःखायेलइडुकःशकरान्वितेः । ऋत्विग्म्यों दक्षिणां दच्या- 
दृभूयसीं दक्षिणां ददेत॥२१॥तदन्ते पृतपात्न च तिलपात्र च दापयंत॥शाय्याँ च रथदानाने दश- 
दानानि शक्तितः ॥३४॥ अशक्तश्वेत्‌ स्वणमेक दच्वा राम नमेत्‌ पुन)॥तिलूक करायेत्पश्चादा्िे- 


सा 
कप जे धलका 


७ ०७००७७४७आाईँ 


दिशाओंमें आठ सावित शुभ कलूशों की स्थापनाक रे ॥१६॥ 
बीचमें एक कुम्भ चावल्ोंके ऊपर स्थापित करे | उस टाद्ध 
पानीस भरदे । पच्चरत्न और पलछव उसमें पटकदे ॥ १७ ॥ 


एक एक कलशपर एक एक नारियछ स्थापित करे | एक | 
। इस कारण आपके चरणकमलोंके भक्तोंमं आपकी प्रीति 
| लक्ष्मीजीस भी अधिक है । 
लेकर बाकी सब ऋत्विजोंका वरण करे। उनकी पूजा | 
सधुपक ओर वस्त्र अलकारोंसे करे ।। १९ ॥ वें ऋत्विज १६ | 


नारियल रासचन्द्रजीकी भंट कर। वहांही बेदशाख्रोंको 
जाननंवाल आचायका वरण कर || १८ ॥ वहांही ब्रह्मसे 


वा आठ होने चाहिय, सव वेद शासत्रके पारंगत हों । स्लान 
ओर नित्य कमंकरके पहिले गणशजीका पूजन करना 

२० ॥ पुण्याहवाचन कराक रामचन्द्रजीकी पूजा करे 
पीछे अपने शाखाविधानके अनुसार अग्निका प्रतिष्ठापन 
करक॥ २१ | विष्णुसूक्तस अथवा मुछमंत्रस हवन करना 
चाहिए। नवग्रह और दिक्पालोंके मन्त्रोंकी भी कहकर 
उनका हवन कर || २२ 
भर तिलोंका हवन करे | एक दजार आठ बार राममंत्रसे 
हचन कर 
पूजन करना चाहिए | पीछे पूर्णाहति और बलि करनी 


प्राथंना करके।। २० || पीछे सुवण वल्े ओर घेनुस आचा 
भका पूजन कर ! दानके मन्त्रस आचायको देदे ॥ २६॥ 


| उसके बहुतसी दक्षिणा होनी चाहिए 
चाहिए।॥ २४ | पीछे अयका संपादन और अभिषेक्रका | 
आरस्म करे। रामकी वारम्बार नमस्क्रार अचन ओर 
| ही देकर रामको नमस्कार करले। अच्छे पह्योंसे अभि- 
| पिक्त होकर तिलक करावें ॥ ३५ 








| हे देवदेवेश ! में आपके छिए प्रणाम करता हूँ कमयाशोंकी 
| काटनके लिए बड़ी बुद्धिवाले महात्मा जो कि, मोक्ष चाहते 
।ह6 वे सब आपकोही हृदयमें याद करते रहते हैं | २७ ॥ 


हक. 
आप गुणमयी मायासे उत्पत्ति स्थिति और प्ररूय करते है | 


५ 
सारको जातननवाले 
सीप्रकार आपके 
२० ॥ ससाःरकी 


रु 


आपके भक्त आपकी भक्तिही चाह तेहे 
रणकमछोंमें मेरी सदाही भक्ति हो 


| व्याधियोंसि तपे हुए पुरुषोंके किए आपकी अक्तिही दवाई 
| है । सीता लक्ष्मण और८ हनुमान्‌ इनकी भक्तिके सहित 
| आप नरेशर हैं ॥ ३० ॥ है राम ! इस दानसे मुक्ति और 
| भुक्ति देनेवाले हो जाओ। प्रतिमाके दानकी सिद्धिके 
| लिए शक्तिके अनुसार सोना और दें ॥ ३१ ॥ क्योंकि, 
| जो दान दक्षिणासे हीन होता हू बह सब निष्कल होता 
रुपसूक्तस समिद आज्य चरु | 


है । एक हजार एक सौ ब्राह्मणोंको मधु और बृतसे भोजन 


| करावे |! ३२ || उसमें पकक्‍यान्न पायस खाद्य लइडू और 
२३ ॥ होमके बाद रामचन्द्रादि देवताओंका 


शर्करा रहनी चाहिए । ऋत्विजोंछो दक्षिणा दे जहांतक हो 
३३! उसके 
अन्तम तिछपात्र ओर घृतपात्र दे शय्या ओर रथदानादि 
दश दान करे ॥ ३४ ॥ यदि शक्ति न हो तो सोलामात्र 


॥ ब्राह्मणोंस आश्ञीर्वाद 


ब्रतराजज |, [ नवमी 











्गनननचकक्मन््न्््कमििि मिमी मम मल ममिपफफगननमिमििमममममकक मम >म मम मम मम मपपििफषममवंधच चचिचज सास सर 3+ 


पिक्तः सपल्नवः ॥ २५ ॥ द्विजेम्य आशिषो ग़ह्य नत्वा स्ठुत्वा विसर्जयेत ॥ उमामहेश्वरौ पूज्यौ 
भोजयेद्टइुक॑ तथा ॥ ३९॥ कुमारीणां शतं भोज्य योगिराज॑ च भोजयेत ॥ क्षेत्रपालबलिं दक्ता 
ध्यात्वा राम॑ सदा जपेत ॥ २७ ॥ ब्रह्मादिभिस्तु तत्पुण्यं वक्तु शक्य॑ न किशन ॥ अश्वमेष- 
सहस्नस्य वाजपेयशतस्य च ॥ ३८॥ एकेन रामनाम्ना ठु॒ तत्फल॑ लभते नरः ॥ नारी बा 
पुरुषों वापि झद्रो वाप्यधमों नरः ॥ रामनाम्ना तु मुक्तास्ते सत्यंसत्य॑ दरानने ॥ ३९ ॥ मूल 
कल्पठुमस्याखिलमणिविलरद्वत्नसिहानस्थ कोदण्ड धारयन्‍्तं ललितकरयुगेनापित लक्ष्म- 
णेन ॥ वामाइन्यस्तसीत॑ भरतध्ुतमहामोत्तिकच्छत्रकाम्तं जीत्या शहब्नहस्तोद्धतचमरयुग 


रामचन्द्र भजेपहम्‌ ॥ ४०॥ वन्देषनिश महेशानचण्डकोदण्डखण्डनम्‌ ॥ जानकीहदयाननदव- 
घेन॑ रघुनन्दनम्‌ ॥ ४१ ॥ इति श्रीम० उमामहेश्वरसंवादे” रामनामलेखनोद्यापनं संपूर्णम ॥ 
अथादःखनतमीत्रत म्‌ ॥| 

भाद्रपदे शुकृननवम्याँ मुहूर्तमाचरसस्वेषपि परणुतायामदुःखनवमीत्रतम्‌॥ देशकालौ स्मृत्वा 
दृह जन्मनि जन्मान्तरे च भर्त्रा सह विरागःसोमाग्यप्रातये सकलपातकढुःखनाशाएँ 
ब्रतकल्पोक्तफलावाध्यथ. श्रीगोरीदेवताभीत्यर्थमहुःखनवमीत्रताड्रगौरीपूजनमह॑ करिष्ये ॥ 
तत्रादो निर्विन्नतासिद्धय्थ गणपतिपूजन च करिष्ये। इति संकरप्य गोमयेनोपलडितभमौ 
वेदिकां गुडलितामिक्षुच्छादितामपूपपायसान्विताछु परिमण्डपिकायुता कृत्वा तत्र पीठे आस- 
नादिकलशप्रतिष्ठान्त कृत्वाग्य्युत्तारणपूर्वक गौरीप्रतिमां संस्थाप्य गौरीमिंमायेति नमो देव्या 


लेकर नमस्कार स्तुति करके विसजन कर देनाचाहिए। 
उम्ता और महेश्वरकोी पूजा करे, वटुककों भोजन करावें।| 
| आप्तिके छिए श्रीगोरीदेब॒ताकी प्रसन्नताके लिए अडु:खनव- 
| मीत्रतके अज्ञके रूपमें गौरीका पूजन में करूंगी। उसके 


॥ ३६ ॥ एकसों कुमारी और योगिराजको भोजनकरावे, 
क्षेत्रपाऊको बलि देकर रामका ध्यान करके सन्त्रको 


जपता रहे || ३७ || ब्रह्मादिक देव इस पुण्यकों कह नहीं | 
सकते | एक हजार अश्वम्ेंधष तथा एक्सों वाजपेयका जो | 
फल है | ३८ ॥| वह मनुष्य एक इस रामनामसे ही श्राप्त | 
| पायससे युक्त ऊपर मण्डपिका करके तहां पीठपर आसनसे 


कर छेता है | ख्री हो या पुरुष हो अथवा शूद्र हे या और 


कोई अधम ग्राणी हो हे वरानने ! में सत्य कहता हूँ वे सब | 
| की प्रतिमाकी खापित करके; “ ओ गौरीनिमाय ” इस 


रामनामसे ही मुक्त हो जाते हैं ॥ ३ ९॥ में उन श्रीरास- 


चन्द्र देवका ध्यान करता हूँ जिनपर प्रमसे शज्रुन्न दोनों | 

थोंरे छः 
हाथों से चमर ढुछा रहे हैं, भरतजी कीमती मोौक्तिकोंडा 
9त्र रख रहे है जिससे उनकी शोभा बढगयी हे, बाँयें | 


अड्डूमे सीताजी बैठी हुई हैं, छक्ष्मणजी दोनों सुहुमार 
हाथोंस धनुष धारण करा रहे है जिसे कि, आप धारणऋर 


कक 2 की आप घूः + ली शी. २. कह 
रह है. केल्यवृश्षक मूलम ऐसे सिंहासनपर विश रहे हैं, 

कक ५ ए ओके ट 
जिसमें सब तरहकी श्रेष्ठ म णि लगौहुईं हूँ तथा जिसका । 
निर्माण रत्नोंस ही हुआ है एवं गजबक्ी जिसकी चमक हे | 


॥ ४० ॥| महेशक्रे चण्ड धनुपक्ों तोडनेतराछे जो जानकीके 
की आनन्द वढादनेवाले भगवान्‌ राम हैं उनकी रात 
द्न 


जप वी शुक्ल सवसीमें, मुहतंमात्र 
हे र्‌ भें अदुःख्ध नवमीका बत होता है । देश 
/ > हो स्सरण करके इस जन्म और जन्‍्मान्तामें  भवाके 


पे बन्दना करता हू। ।४९॥ यह श्रीमविष्यपुराणके उम्माम- | 
हडाफ सवादका रासनामके छिखनेका उद्यापन पूरा हुआ || | 





साथ चिरायु और सौमाग्यी प्राप्तिके लिए सकल पातक 
ओर दुखक नाशके लिए ब्रतकल्पके कह हुए फलकी 


आदियें निर्विन्चतकी सिद्धिक किए गणपतिका पूजन 
करूंगी; यह संकल्प करके गोबरले छिपी हुयी मूमिं। 

ए 5 कप 5 अिक, ५ 
बनी हुई वेदीको गुड़ते छिपी, इंखसे ढकी, अपूओ ओर 


लेकर कलशस्थापनतक करके अशिके उत्तारणपूर्वक गौरी 


मन्त्रसे अथवा 'ओं नमो देव्ये महादेव्ये शिवाये सके 
नमः ” इत्यादि मन्त्रस गौरी का आवाहन करके पूजन करे 
+हिला मन्त्र वेदिक तथा दूसरा पेराणिऊऋ है दूसरा प्रसिद्ध 
है सम्शतीमें छिखा है। वेद्िकि सन्‍्त्रकों यहीं लिखकर 


| साथही अथ करते हं--''ओं गौरीपिंसाय सलिरानि वक्ष 


व्येकपदी ह्विपदी सा चतुष्पदो अष्टापदी नवपदी बमूवुषी 
सहसख्ाक्षरा परमेव्योमन्‌ || ”' जब गौरी सट्टि रचनेढगी 


| तो पहिे सहिछिका निर्माण किया फिर वो एक अधानको 
| वना एक पदी तथा दूसरे आदिल्को बना ह्विपदी होगयी, 
| चारों दिशाओंके निर्माणके बाद चतुष्पदी तथा आठोंके 


बनानेके बाद अष्टापदी, नौओंस नवपदी और दशोसे 
द्शपदी बनगयी । फिर वो भनेकों उद्कोंवाढी हो गयी | 
इस परम सृष्टिक निर्माणमें वो एक अनेक रूपसे हो 
गयी सबमे उसीका एक आत्मा है ॥ यह टीका 
हमने भाष्यकार दुर्गाचाय्यके अनुरोधसे की; है पर 


| हमें कुछ ओर ही ,अभीष्ठ हे उसेही छिखते हैं, गौरी” 


ब्रतानि | ( डेडेरे 


भाषाटीकासमेतः । 









मम 2 320203038. 5२23 29000300% 4५७ 8००००४- ४,०8३ ३ ७३० ७७३५३ 
द | जैव -९-०-- ८ जल कपपकतकल 





व ०० एप जा, जो ०४ ००-६५५०६३ »८ मम्मी (०५५०० ६७:४०कम०»५ ५५०१३: ५१००३: आई: ०५ ७ 7“-“ “की 
नल नियत >डी अटनिनबीननीननी ली नन आन + विन अजननओत+ जलन चलन नीजकनननन--+-++-न नम “मनन जन->>+-+-+++->»>+--.००. न > 


इति वा मंत्रेण गोरीं गणपतिमिन्द्रादिलोकपालाश्ादाह्म संपूजयेत ॥ गोरी दुःखहरां देवीं शित्र- 
स्पाद्धाइधारिणीम ॥ खुनीलवखसयुक्तासुमामावाहयाम्यहम्‌ ॥ आवाहनम्‌ ॥ दिव्यपात्रधराँ 
देवीं विभूतिं च बिलोचनीम ॥ दुग्धान्नदाः निरतां गोरी त्वां चिस्तयास्यहम्‌ ॥ ध्यानम ॥ 
प्रसत्रवदने मातनित्य देवबिंसस्तुते ॥ मया भावेन यहत्त पीठ तत्-ननिगह्मताम्‌ ॥ आसनम ॥ 
सर्वतीयमयं दिव्य सर्वभूतोपजीवनम्‌ ॥ मया दत्त च पानीय पाद्याथ मतिगहाताम ॥ पाच्यम ॥ 
गड्गादिसवतीर्येभ्यों भकत्यानीतं जले शुति॥ गन्धपुष्पाक्ष तोपेत॑ गहाणाध्योर्थमादरात ॥ 
अध्यम ॥ मातः सर्वाणि तीर्थानि गड़ाद्याश्व तथा नदाः ॥ स्लानार्थ तब देवेशि मयानीता: 
सुशोमना। सस्‍नानम्‌ ॥ सर्वभूषाधिके सोम्यपे लोकलज्ञानिवारणे ॥ मयोपपादिते ठुभ्ये 
वाससी म्रातिग० ॥वद्धम ॥ श्रीखण्डमिति गन्धम्‌॥ माल्यादीनीति पुष्पाणि ॥ वनस्पतिरसो- 
द्वुत इति धूपम्‌ ॥ साज्य॑ चोति दीपम्‌ ॥ अन्ने चठर्विधमिति नेवेद्यम ॥ प्गीफलमिति ताम्वू- 
लम | हिर्यगर्भाते दाले णाम्‌ ॥ यानि कानीते प्रदक्षिणाम्‌ ॥ नमो देव्या इति नमस्कारान ॥ 
चन्द्रादित्यों च धरणीति नीराजनम्‌ ॥ मन्त्रपुष्पन्‌ ॥ अन्यथा दरणामीति प्राथनामू ॥ ततो 
नवपकत्रि! पूरितं वायनं दद्याव॥ स्कन्वमातनमःल्तुध्य दःखत्याधिविनाशिलने ॥ उत्तिष्ठ गच्छ 
भवन वरदा भव पावेति ॥ विसजेनम्‌|इ्ालि पूजा ॥ अथ कथा-ऋषय उत्चु) ॥ कदाजित्नमिषारण्ये 
व्यास॑ धर्मविदां वरम्‌ ॥ कथयन्त॑ छूथा विव्यानिदरमुचुमंहषयः ॥ १॥ यज्ञवमीवदां श्रेष्ठ 
ब्रताने विविधाने च ॥ विपाकात कमणां चेव प्राणिनाँ विविधा गतीः ॥ २॥ आकप्ये 
विस्मिताः सर्वे कोतृहलसमान्विताः ॥ न तृप्तिमथिगच्छामों नात्ियं व कथामृतम्‌ ॥ ३ ॥ 


नया 
,-+न्‍न्‍न्‍न्‍_+५०ज७, 





गौरी देवी, सलिछानि-भमलीभांतिछयको प्राप्त हुए पदा्थ- | 


| जछ छाया हूँ इसमें गन्ध पुष्ष और अक्षत॒ पडेहुए हैं 
जातोंको, तक्षती-रचती हुई एकपदी रचनाकी प्रथमाव- | 


इसे आदरसे दवाहू आप ग्रहण करिये, इससे अर्ध्य; 


॥[ए 56 | 


स्थाको प्राप्त, बमूबुषी-हो जाती है, फिर वो ट्विपदी-चिद्‌ | 


और अचधिए रूपमें होजाती है । फिर चतुण्पद्दी-कूटम्ध ब्रह्म 


मच रे 
सार इसका अर्थ हो सकता है| गोरीके आवाहनमे इसका 


विनियोग प्रकृतमें किया हैं. इस कारण हमने भी और | 
अधाकी तर कम ध्यान देकर गौरीकेही कतृतस्वपर इसको | 
अथ किया है। इसीतरह मन्त्रोंस गणेशजी और इन्द्रादिक | 
लोकपालोंका आवाहन करे । शिवके अर्थाज्ञ़कों घारण करे- | निकल । 
| व्याधिक नप्ट करनेशछी पावती | हमें वर देनेवाडी हो, 
| भवन जा. यह पूजा पूरीहुई ॥ कथा--ऋषि बोले कि! 


रे 


नह कि कप 
नंबाडी अच्छे नील्वर्खोंको पहिननेत्राली दुःखोंके ह चेवाली 
गौरी उमारेबीका में आवाहन करताईूँ, इससे आवाहन; 


दिव्य पात्रोंको धारण करनेबाढी दुग्धदाननें छगीरदनेबाली | 
तीन नयनॉवाली तुझ विभूतिरूपा गोरीडा में स्मरण करू- | जीके 
| कि हें 


तहूँइससे ध्यान हे देवषियोंस सदाही प्रतवितकी गई प्रसन्न 


मुखबाली मातः ! मेने सावसे जो आसन देदियःओ इसे ग्रहण | फेक 7 टी क 
सुब'ः हम सव कौतूइडके साथ विस्मित होगये है ।हम छत 


रियि कर ७ भू 
फरिये, इससे आसन सब तीर्थमय तथा सब तोंक। उप- 
जीवन यह पाती मेंने दियाहे इस पाद्के छिये ग्रहण करिये, 


०४ >किक] 


इससे पाद्य। गंगाआदि सब तीथोंसे 





भक्तिपूवंक पवित्र | होता है ॥ ३ ॥ 


मातः | गंगाआादिक सब अच्छे तीयथ ओर नद्‌ में आपक 


| स्नानके छिय लायाह हे देवेशि ! ग्रहण करिये, इससे स्लान; 
जीव ओर इंशहपमें होजाती है, फिर वो जिवेकादि आठ | 
रूपमे होती हे जो सात रूपोंसे संसार और एकहूपसे मुक्त 
करती है। फिर दशपदी-दशद्श्ञाओंके रूपमें भी वही होती 
हू | इस मेरे अथ्मे प्रायःशाकरसिद्धान्तकी छाया आगई हे. 
पर इसका अथ इतनेसे समाप्त नहीं है प्रत्येक दर्शनके अजु | 
| £ नमो देव्य ?' इससे नमस्कार; “* चन्द्रादित्यों च घरण्ये”? 


४ स्व मूषाधिक सोये ” इससे वस्र; * श्रीखण्डम्‌ ” इससे 
गन्घ “ मसाल्यादीनि ” इसस पुष्प “बनस्ततिरसोदुभूत” 
इससे घूप, * साज्य॑ च ” इससे दीप, “ अन्न चतु थम? 
इससे नेवेद्य,  पूर्गी झछम्‌ ” इससे ताम्वूछ; * हिरण्व- 
गर्भ ” इससे दक्षिण; '' यानि कानिच ” इससे प्रदक्षिण, 


इससे नीराजन; मन्त्र-वुप्प; *' अन्यथा शरणम्‌ ” इससे 
प्रावना समपंण करता चाहिय। इसके बाद नये पकाहसे 
पूर्ण करके वायना दे । पीछे मन्त्रसे विसजन्‌ कर दे कि? 
हे स्कन्दकी मातः | तेरे लिये नमस्कार है| हे ठुख और 


कभो नेमिपारण्यमें धमके जाननेत्राडोंने श्रेष्ठ व्यास देव- 
ज्ीको जो कि दिवय कथा कह एप; थे ऋषि यह बोले ॥१॥। 


यज्ञ धमके जान व 2 इक, श्र्पर ! अनेकतरहक स्ज्त्‌ 
तथा कर्मोंके नतीजेस प्राणियोंकी ऊंची नीची गति ॥ २ ॥। 


नहीं होते क्‍यों कि कथारूपी अखत कभीभी अग्रिय नहीं 
अब हम आपसे एक एसा त्रत सुनेंगे या' 


बलराजः । | नपमी- 






( क ॥ 


शणुमश्व वर्य सद्यो ब्रतं इःखहरं त्विदम्‌ ॥ येत्र चीर्णेन धर्मज्ञाज्ञानदुःख न जायते ॥ कृपां कुछ 

महावुद्धे वहि ढःखहर ब्रतम्‌॥ ४ ॥ व्यास उवाच ॥ *ण्वस्तु पुरुषाः सर्वे शोनकाश्ा 

महर्षयः ॥ ये नराःपुण्यकमाणों दम्भाहंड्रारवर्जिताः ॥५॥ श्रद्धया यमिनो नित्यमहिंसानिरताश्र 

ये ॥ यथामिलितभोक्तारः सखुखिनस्ते भवान्ति हि॥ ६॥ गुहायं चान्यत्त वक्ष्यामि दुःखनाशन- 

सूचक्रम्‌॥ येपःखनव्मी प्राप्य नराश्चववाप्यपाण्डिताः ॥ ७॥ शिवां गच्छल्ति शरणमसृत्पत्ति 
ख्ितिकारिणीव॥ जन्मात्तरशतेनापि न ते हुःखस्यथ भागिनः ॥ ८॥ ऋषय ऊत्छु ॥ अदुःख- 

नवमीनाम त्वया केय॑ निरूपिता ॥ भविष्यति कदा चेय॑ यज्व कार्य माविष्याते ॥९॥ पूजनीया 
कर्थ गोरी विधान कीदशं तथा ॥ एतत्सव यथावर्तव वक्‍तुमईस्यशेषतः ॥ १० ॥ व्यास उवाच। 
एतदूगह्मतमं पुण्य शणुध्वं गदतो मम ॥ न देय॑ नास्तिकायेतद्मक्ताय शठाय चा॥९ १॥अहं दः 
श्रदधानेभ्यो विधि सर्वमशेष्तः ॥ समाहितमना वच्मि भूतिद॑ पुण्यदायकम ॥१श। सर्वस्याद्या 
महादवी त्रिगुणा परमेश्वरी ॥ नित्यानन्दमयी देवी तमःपारे प्रतिष्ठति ॥ १३॥ बह्माण्डजननी 
चेयंमुत्पत्तिस्थितिक्ारिणी ॥ पुरुषः प्रकृतिश्रेयमात्मानं विनिदे द्विया ॥ १४ ॥ यथा शिवस्तथा 
गोरी यथा गोरी तथा हर:॥ यथा गौरी तथा लक्ष्मीडुःखपापापहारिणी ॥ १५॥ तासां 
पृज।विधानेन न कश्रिदुःखभाग्मवेत्‌ ॥ नभ्नस्ये शुकृनवमी या वा पूर्णा तिथिमंबेत ॥ १६॥ 
अस्तदोषादिरहिताः सवदुःखहरा परा ॥ लस्यां परातनरः ख्ात्वा कृत्वा नित्यविधिं तत॥ २७॥ 
मोनेन गहमागत्य संयतस्तत्परायणः॥ अदुःखदायी भूत्वा च शुविस्थानगतस्तथा ॥ १८॥ 
गोमयेन विलितायां शुचो मण्ड्पिकां शुभांम्‌ ॥ सुकुम्भ॑ स्थापयेत्तत्र कुकुमाद्रिमिरड्धितम॥ १९॥ 
आच्छादितं सुवस्नेण ह्यमामानन्द्दायिनीम्‌ ॥ आचार्यातुत्तया तस्मिअगद्धाओं प्रपूजयेत्‌ ॥२०॥ 
पूजयित्वोयचारे हतां नत्वा नत्वा घुनः पुनः ॥ बाणक॑ च ददतस्याः पक्कान्नफलसंयुतम ॥ २१॥ 
सुनना चाहते हैं जो झीत्रही दुर्शोक्ा नाश करता हो, हे 
धमज्ञ ! जिसके करनेपर अज्ञानजन्य दुख न हो। है महा- 
बुद्ध | कृपाकर इस दुखहर त्रतकों कहिये। ४॥ व्यासजी 


नित्य आनन्द्मयी परमेश्वरी देवी तमके पार प्रतिष्ठित हैं 
॥ १३ ॥ यह ब्रह्माण्डकी जननी एबं उत्पत्ति-स्थिति ओर 
अलयको करनेवाहीहे यह प्रकृति और पुरुष इस भेद्स अप- 


बोले कि, है देभ और अहंकारस रहितो पुण्यकर्मोंके करने" 
वाढो ! सब श्ौनकादिक महर्षि पुरुषों ! सुनो ॥ ५ ॥ 
अद्धाके साथ यमसे रहनेवाले तथा जो सदा अहिंसामें रत 
रहते हैं एवम्‌ जो मिलगया इसीसे अपने सोजनका लिर्बाह 
करढ्ेते हैं वे सदा सुखी होते हैं ।। ६ ॥ में आपको दुखनाश 
करनका गुप्त उपाय बताताहँ-चाहे मूखे ही हो पर अदुख 
नवमीक दिव (७ | उत्पत्ति स्थिति प्रछयकी करनेवाली 
शित्राको शरण जाते हों तो वे सौ जन्ममें भी दुख नहीं पाते 
॥ ८ ऋषि बोले कि.महाराज! आप अदुखनवमीके नाभसे 
क्या कहगये ! यह कब होगो ? जब कि वो काये हो ॥ ९॥ 
गौरी केसे पूजनी चाहिये उसझा विचान कैसा है ? यथार्थ 
एपस यह सब पूरा समाचार कहिय | १० ॥ यह बढाही 
उम्यदायक हूं स कहता हूं आप सुनें। इसे अभक्त शठ एवं 
नास्तिकके लिये न देना चाहिये | ११ ॥मैं श्रद्धालु जन 

आपके लिये एकाग्रचित्त होकर भूतिकी देनेवाली पुण्यदा- 
' यक सब विधि कहूगा जिससे कि कुछ भी बाकी न रहेगा 


नेको दोवरहका करदी हैं ॥१४॥ जेसे शिव वसी ही गोरी 
एवं जेसी गौटी बेसेही शिव, जेसी गौरी वैसी छक्ष्मी दुख 
और पापोंकों नष्ट करनेवाली हैं | १५ ।| उनकी पूजाके 
विधानको करनेसे कोई भी दुखी नहीं रह सकता, माद्पद 
महीनामे जो शुक्ला नवमी हो अथवा कोई भी पूर्णा तिथि हो 
|| १६ ॥ जिसमे अस्तदोष आदि न हों वो सब ढुखोंको 


ते | निवान्त हरनेवाली है । उस तिथिमें मनुष्य प्रातःर्ान करके 


पीछे नित्य विधिकर ॥ १७ | मौत पूर्वक्प घर आ संयत 
हो ब्रतभ छगजाय, किसी का दुखदायी न व्ने,पवित्रस्थानरम 
रहे (| १८॥ गोवरसे छिप हुए पवित्र दे शर्में शुभ सण्डपिका 
वनावे उस जगह कुछुम आदिसे अंकित अच्छा कुंभ स्थापित 
करे। १९ उस्त अच्छे वखसे विधियूवक ढक दे । उसपर 
विधिके साथ आचाय्यत्त आज्ञा छेकर ससारको घारण करन 
ओर पाछनेवाली एवं आनन्दकी देनेवाली उम्राका पूजन 
करे | २० ॥ उषचारोंसे पूजकर वारवार प्रणाण करे किर 


& कु है| न्त्‌ न ञ्ञ्‌ ८ गो ैब न 
|: | संव॒की आदि कारण रज तप सत्वर सथी स्व॒भावसे पा. सयी स्वभावसे | पक मे और फलोंके साथ देवीका वायता दे॥ २१ ॥| और फरलोंके साथ दवीका वायता दें॥ २१ ॥ 


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कम 


बतानि , ] 


भाषाटीकासमेतः । ( 3३५ ) 






शकतग्रेदुपवासन निर्शा च जागरेनयेत ॥ अशक्तेन च भोक्तव्य पथ प्राइयमथापि वा ॥ २२ 
फल वापि प्रपत्नेन न हिंलारतचेत ता ॥ रातों जागरण कार्य वत्यगीतादिपिस्तथा ॥ 

प्रभाते विमले जाते कृत्वा नित्यविधि पुनः ॥ बाह्यणान भोजयेच्छक्त्या ली 
सतथा ॥ २४ ॥ देवी विसजयेत पश्चादाचार्य पूजयेत्तथा ॥ आचायंम्त स्वगागोक्तो नववर्षाणि 
कारयेत्‌ ॥ २५॥ सोवर्णेनूषणेवेल्नेनेवा त॑ च समपंय्रेतव ॥ पंचमिर्नालिकरैवां युक्तमेतेन 
वायनम्‌ ॥ २६॥ पक्काननवर्संख्याकेब्राह्मणाय निवेदय्रेत ॥ पश्चाद्रन्धुजनः साड्धे सुख्ीयात्रियतः 
शुतिः ॥ २७ ॥ शुत्वा कथां पुण्यतर्मां वाग्यतस्तत्पो सवेत॥ से कदाबिन्न दुश्खेन युज्यन 
नात्र संशय) ॥ २८ ॥ चुक्त्वा भोगान्यथाकाम स याति परम॑ पदम ॥ अतन्नेबोदासरन्तीम मिलि- 
हासं पुरातनम्‌ ॥ २९ ॥॥ अरण्य विषमे प्राप्ता शापदम्घाप्सरा। किल ॥ जासीजानिस्मरा काचि- 
ततियग्योनिं समागता ॥ ३२० ॥ कुककुटी नामतो हासीत सदा दुःखेन पीडिता। तत्सम्बी 
मकंटीनाम ते चोभ शोककरिले॥ ३१॥ अथ तसल्मिन वनोदेशे परस्परहिते रते ॥ उसे 
अभूता सहिते विचरन्त्यों दिशो दश ॥ ३२॥ ततः कालेन महता वर्षान्ते चागता निधिः 

अदुःखनवमीनाम दुःखव्याथधिविनाशिनी ॥ र२३॥ गत्वा ता कुककछुटी भाह मकेटी देवयोगतः 

अद्य किचिन्न मोकतव्यमावान्यां श्वुणु कारणम्‌ ॥ ३२७ ॥ तियंग्योनिगते चादों पृर्वेकर्मविपा- 
कतः ॥ दुःखापल॒ुत्तये चाद्य न भोक्ष्येपह त्वया सह ॥ ३५॥ त्वे चेश शरण गत्वा नवमी 
सुब्रतस्थिता ॥ मव च त्वमशक्ता चेदओंक््व शी्णफलानि च ॥ २६ ॥ महामायाप्रसादिन याहि 
भद्रमाहिंसया ॥ इत्युक्त्वा कुक्डुदी तृष्णीबनूवानश्षती तदा ॥ ३२७ ॥ मकत्यप्युररीकृत्य ब्तस्था 
सम्बभूवतुः ॥ अथ सा मकंटी नाम गत्वा पूर्ववनं भ्ति ॥ ३८॥ स्थित्वा तदिनशेष ठु क्ुबिता 
पीडिता भशम्‌ ॥ अजानाती तमेवाय पू्वकमंविषपाकतः: ॥३२९।। निशान्ते तरसा गत्वा बनदेशोे 


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विचिन्वती ॥ 


यदि उपवासमें समर्थ हो तो रातकों जागरण करके &) | 
| रस थको हुई रहती थीं || ३१ ॥ पर दोनों उस वनमें ए 


वितावे जो शक्ति न हो तो भोजन कर छेचा ना । 


पानी पीछे ॥२२॥ अथवा सावधानीके साथ ब्रतके खानक | 
| दिज्याओंमें विचरती थीं | ३२ | वहत समयके वीतनेपर 
| दपके वाद अदुखनवमी नामकी तिथि आगइ जो दुख और 
| व्याधियोंके व्रित्ाश करनेवाढी थी ॥ 
| कुक्‍्कुटी सकटीके पास जाकर बोडी कि, आज अपनेका। 
, कुछ भी न खाना चाहिये । इसमें थोडासा करण हैं उसे 
| छुनिय ॥ ३४ ॥ हम तुम दोनों पहि 
वाढ्म आचाये तो नो वर्ष इसे कराये ॥२५॥ सोनेके भूपण | 
ओर वलोंके साथ उसे नमस्कार करके समर्पित कर दे पांच | 
नारिकेलॉंका इसके साथ वायना युक्त ह ॥ २६ ॥ नो | 
संख्याके पक्काञ्नेंक साथ ब्राह्मणको निवेदन कर दे पीछे | 
यतात्म हो पवित्रतापूवक बन्घुजनोंके साथ बैठकर भोजन | अर || ३६ 
करें| २७ | मौन होकर चित्तछगा परम पवित्र इस | 
कथाको सुने वो कभी भी दुखी चहीं होता इसमें सन्देह | 
इच्छानुसार भोगोंको भोगकर अन्ममें | 
परम पदको चढछा जाता हैँ। इसी विषय एक पुरातन | 
|| २९ || कोइ ज्ापित हुईं अप्सरा | 
।॥ ३५० ॥| प्रातःछाछ जलूदीस वनमे दूढती हुईं मोरके 
| अडॉको पागई । वो उस समय अत्यन्त भूखी थी | 


फल खाल, चित्तमें कोई तरहकी हिंसा न हो । नाचगानके 
साथ रातमें जागरण करना चाहिये | २३ | स्वच्छ प्रभा- 
तके निकछनेपर अपनी निल्य क्रियाओंकों करके शक्तिक 
अनुसार पवित्र सपत्नीक त्राह्मगोंको भोजन करावे ॥२४। 
गीछ देवीका विश्चज॑ंत्न और आचायेछा पूजन करना चा 
हिय | अपनी शाखाका यानी देवीके विधानोंको जानन- 


नहीं ह 


इतिहास कहा करते 
जो कि, जातिस्मर यानी अपने अनेक जन्‍्मोंका हार ज 
नती थी तिय्येगू योनिम हो बनको प्राप्त हुई डसका 
उस समय कुकक्‍्छुटों नाम था बो सद्‌ 





शे बहिंणोएण्डानि अतीव क्षुघिता तदा ॥ ४० ॥ श्क्षयित्वा मर्ंटी सा सुख 


थी उसकी सखीका नाम सकटी था | ये दोनों सोच फिक- 


दूसरीक भलेम रहती थीं साथ ही रहती थीं साथ ही दद्यो 
| दब योगल 


कम।क नतोजेसे 
अब तियग्‌ योनि पंदा हुई है । भ अब अपने ओर तेरे 
दोलोंक दखोंको मिटानक लिये तेर साथ उपवास करूंगी 
(३० ॥ तू इशकी शरण जाकर नत्रमीका ब्रत कर | यदि 
शक्ति 'न हो तो पककर स्वतः गिरेहुए फ़ढोंका भोजन 
महामायाके प्सादसे तू अर्हिसापूवक भद्रा 
को प्र'प्त हो, एसा कहकर कुक्कुटी उपवास करती हु 

मौन होगई || ३७ ॥| मकटी भी उसके कथनको स्वीकार 
करके त्रती होगईं | फिर मकेटी पहिल्ले वनसें जा।। ३८ ॥ 
ब्राकी दिन वहां रहकर एकदम भूखस दुखी होगई ।पहिले 
कर्मों विपाकस वो ब्रतका प्रयोजन उस याद न रहा 


को अक... ु#ँ 


| इस कारण उन्हें खा पानीस सुंह थो बहानक रूपमें ऋूत- 






पुनस्तदम्तिक माप्ता 





प्रज्ाल्य वारिणा ० यु 
वाक्यमुवाच मऊटी मात्रि ॥ किखिद 
वाया त्व॑ं वारितापि मया त्वधे 


ब्रतराज! । 








| नंवेभी - 





दर्शयन्ती क्षुघोप्यथाम्‌ ॥४१॥ कृषिता कुक्कट 


उक्त त्वया दुष्टे हह्यसे हर्षसंयुता ॥ ४२ || अतनभ्रष्टापि 
॥ नाकरोस्त्वे मम बचः प्राणाः कि न गतास्‍्तव॥ ४३॥ 
केदार शरणं याहि मया स हामयडुरः ॥ देहत्यागेन तत्रैव 
अथ ते निगंते चोमे केदार भूतभावनम्‌ ॥ गते मनः 


गच्छावः परमां गातिम ॥ ४४॥ 
समाधाय कुक्छुटी मनसाभ्मस् 


॥ ४५ ॥ उत्तत्स्यें सत्कुले चाह घनाव्ये वेदपारगे ॥ इति मत्वा स्वदेहं सा वह्विमध्ये न्‍्यपात- 


यत्‌ ॥ ४६ || भय राजपत्नीति मत्वा सापि च म्कंटी 
बोधिता ॥ ४७ ॥ कुक्कुटी सा महादेव्याः प्रसादाद्धिमले 


॥ अकरोत्‌ स्वतलुत्याग तद्राक्पेनेद 
कुले ॥ सा विप्रकन्याभृत्तस्य भरत 


विमलरत्नदः ॥४८॥ पुण्यवरद्धनशीला सा निरता पतिसेवने ॥ तथैद राजपत्नीत्व प्राप्ता सापि 


च मककंटी ॥ ४९ ॥ उसे जातिस्‍्मरें जाते महादेव्याः मसादतः 


|| अथ सा कुक्कुटी पश्चपुत्राश्ने 


पितुः समाव्‌ ॥ ५० ॥ बनूव धनसम्पत्ना रूपशीलणशुगान्विता ॥ मर्कटी पुत्रशोकार्ता बभूव 
व्यथिता ऋशम्‌ ॥ ५१ ॥ पूर्वकर्म स्मरन्ती सा कदाचिदेवयोगतः ॥ अपशयत्‌ कुककुटी पुत्रार 


पश्वेव च पिठुः समान्‌ || ५२ ॥| 


अमारयत्‌ स्वन्त्येस्ताव पुत्राव्‌ सा मर्कटी तदा ॥ तब्छिरांपि 


गहीत्वा तु कुककुटर्थय बाणके ददो | ५३ ॥ अढुःखनवमी प्राप्य ब्रतस्था च बभूव सा ॥ गोरी 


कृपाविष्टमना जननी भक्तवत्सला ॥ ५७ ॥ शिरांध्यादाय 


णक खुवर्णश्य शिरोमिः पर्यकल्पयत्‌ । ५५ ॥: 
मुदा समाप्य तां पूजां भोकतुं गृहमगारतः 
स्वभत्रें पुत्रयुक्ताय न्‍्यवदेयत नम्दिती ॥ ५७ 
दृ्ठा! पुनः पुनः साथ रुरोद 
आगत्य सरूषाः सदनमात्मान बद्ननिम्दयत | 


है 


४७७॥७७॥७/७॥७७॥७७७७०७७७  , अमन कलरनद 





नाराज होकर कुबछुटी मकेटीसे बोढी कि, हे दुः ! तूने 
कुछ खा लिया हैं इससे प्रसन्न दीख रही है ॥| ७२ ॥ तूने 
वाणीसे ब्रत भ्रष्ट जिया है ए पापिनि ! मैंने तुझे कितना 
रोका था।तूने मेरी वात वात नहीं मानी ? क्या तेरे प्राण न 
निकले ! मरजाती थी क्‍या !॥ ४३॥ भयके मिटानेवाडे 
केदारनाथके शरण मेरे साथ चछ वहां हम तुम दोनों देह- 


का त्थांग करक परम गतिक्नो श्राप्त करेंगी ॥ ४४ ॥ फिर 


वे दोनों भूतभावत केदारकों चछदी बहां एकाग्र मनसे 
ऊकक्‍्कछुटी केदारकों याद करनेलगी ॥ ४५ ॥ हैं वेदके जान- 


नेवाले किसी धताढय कुछमें जन्म छूगी ऐसा मानकर 
कुक्‍्कुटीने अपने शरीरकों अप्नि्म गिरादिया ॥ ७६॥ है 
राजाकी रानी बनूं ऐसा कुक्कुटी के ही वाक्यसेही बोधित 
हो सन कहकर सकेटीय अपने शरीरका त्याग किया 
॥ ४७ || छुक्कुटी मद्रादेवीकी असन्नतासे पत्रित्र त्रद्मण 
कुलम किसी ब्राह्मगककी छढकी वन्ी उसका वि्मलरत्त 
नामके द्विजवालक के साथ विवाह हुआ | ४८ ॥ उसका 
. + उप्य बदानस था। वो पतिकी सवामें सदा मन लगाये 
 'डनेडगी | भकेटी भी उसी तरद राजाकी रानी होगई 
५ ४५९ ॥ सहादेवीके प्र 





१ हे अधे पापरूपे | 


सादुूस इस जन्मसें भी उन्हें अपये 


सा पुत्रकाँ त्तानजीवयत ॥ तद्वा- 
ईक्कुटो पूजवाश्रक्के गौतें हुःखजिन,शिनीप ॥ 


॥५४॥ तदा तद्बाणकं तत्र भेक्ष्य स्वर्णशिरोयुतग 


भकटी जीवतस्तास्तु सा ददश लिपुत्रकान ॥ 


भशदुःबिता ॥५८॥ आत्मान निन्‍दयामास मर्केटी विहला सती ॥ 
55 ॥ पाप्त्यिह दुराचारा दुर्भगाइश्वुतपृर्वकम॥ 


'प्राकहाण कर बघआए१ 07. आष्प्र।क के जहन्ए>काए'॥४"३:७३० का क्ा०क 9 ४04, आकर ाए, १४:४१ 5: +.सटटआ ७४७2५ 


की तकलीक दिखाती हुई कुक्कुटीके पास आईं ॥ ४१॥ | 


परिले जन्मोंकी याद रही कुक्कुटीन पिताक्ले ही समान पांच 
पुत्र पंदा किये ॥ ५० ॥ दो रूप शीढ गुण ओर धनसे 
संपन्न हुईं। पर मकंटी पुत्रके शोकसे एकदम दुखी होगई 
| ५१ ॥ पहिले कमको स्मरण करती हुईं उसने कभी दव- 
योगसे कुक्कुटीके पांचों पुत्रोंको देखा जो पिताके समान 
ही थे ॥ ५२॥ उद्े अपने नौररोंमें उन पांचों छडकोंको 
मराडाठा | एवम्‌ उनके झिर्रोंच्ा वायना कुक्कुटीको दिया 
| ५३ | कुक्कुटी अदुखनवमीके दिन ब्रतमें बैठगई) 
स्वभावसही कृपा करनेवाली भक्तवत्सछा सँसारकी +- 
ननी गोौरीने ॥ ५४ ॥ उन शिरोंको छेकर पुत्रोंको 
जिलादिया । सोनेके शिरोंस उन्तका वायना शिया 
| ५५ ॥ कुक्‍्कुरीने दुखोंको मिटानवाल्ली गौरीकी पूजा 
को फिर पूजा पूरी करके भोजन करनेके लिये घर चढी 
आईं॥ ५६ ॥ आनन्द करनेवाढी वो सोनेके शिरोंओे साथ 
उम्तका वायना देखकर पुत्रयुत पतिके लिये देदिया ॥५७॥ 
मकटीने अपनी सहेलीके बटे जोते देखे वो उन्हें वारंबार 
देख दुखो हो हो रोने छगी ॥ ५८ ॥ और विह॒छ होकर 
अपनेकी निन्दाकरने लगीसखीके घरआकर अपनी बहुतसी 
लिन्‍्दाएँकी ॥५९॥ कि, में पापिनी दुराचारिणी दुभगा है| 





२ कृदारमित्ति शषः | 


ब्रतानि, | भाषाटीकासमेतः ! ( ३३७ ) 













बालहत्यात्मकं पाप॑ चेरित नात्र संशयः ।)। ६० ॥ इत्याकण्ये सखीवाक्य॑ कुक्कुटी विस्मिता- 
भवव्‌ ॥ अपृच्छत्‌ कारणं क्षित्त शोकसागरदायकम्‌ ॥ ६१ ॥ इदं शीलू कर्थ भद्रे कस्माद्रोदियि 
तद्॒द ॥ विभोगा राजपत्नी त्वं मान्या से सखीप्वपि ॥ ६२ ॥ मकेटी कुक्कुटीवाक्यं श्रुत्वा बृत्तं 
न्यवेदयत्‌ ॥ तस्याश्र कुक्कुटी उ॒त्रेः मायश्ित्तमकारयत्‌ ॥ ६३ ॥ स्मरन्ती च॒ ब्र॒तं देव्याः कु 
तव॑ च यथावित्रि ॥ कुक्कुश्यति समादिद्धा ब्रत चक्रे यय।वित्रि ॥ ६४ ॥ मकेटी तत्मभावेण 
सगर्भा संचभूव ह॥ अथ देव्याः प्रसादेन म केटी सुबवे सुतम्‌ ॥ ६५ ॥ सुन्दर सुन्दर नाम पृथ्दी- 
भारसहं वरम्‌ ॥ राजपत्नी विप्रपत्नी खुबिन्यों सम्बभूवतुः ॥ ६६ ॥ इह लोके च विख्यातम- 
दःखनवमीत्रतम्‌ ॥ सीतया यत्कृत चेतदमयनत्या कृत तथा ॥ ६७ ॥ अन्यानिषेहुनिः खीमि- 
ब्रतमाचरित सदा ॥ या करोति बततिदं शगोति _चकबामेन/म्‌ ॥ ६८ ॥ सा दुःखनाइन 
भवति सत्य सत्ये वदाम्यहम ॥ सवदुःखहर लोके क्रिमन्यच्छोठुमिच्छथ ॥ ६९ ॥ इति श्री- 
स्कन्दपुराणे अदुःखनवमीत्रतऋथा संपूर्णा ॥ 
भद्गरकालीवतम्‌ | ह 

अंथाश्विनशुकनवर्म्पां भद्रकालीवरतं हेमादी विष्णुधमें-राजोबाच ॥ विधिना पूजयेव केन 
भद्रकालीं नराधिप ॥ नवम्यामाखिने मासि शुक्रपक्षे नरोत्तम ॥ पुष्छर उवाच ॥ पूर्वोत्तरे तु 
दिगभागे शिवे वास्तुमनोहरे॥भद्गराकाल्‍या ग़ह कार्य चित्रवल्चेरलइक्नतम ॥ भद्रकालीं पटे कृत्यो 
तत्र संपूजयेद्रिजाअष्टादशबुज्ञा कार्या भद्रकाली मनोदरा॥आलोीठस्थानसंस्थाना | सिहएये 
ह्थिता।अक्ष माला त्रिशूलं च खड़श्वर्म च पार्थिवाबाणचापे च कतेव्ये शझ्ठपत्मे तथेव च। खुकू- 
ख्बों च तथा कार्या तथा वेदिकमण्डल्‌॥ दन्तशक्ती च,कर्तव्ये तथा पाशहुताशनों ॥हसतानां 
भद्रकाल्याश्व मवेव कान्तिकरः परः ॥ एकश्ेव महाभाग रत्नपात्रथरों भत्रेत्‌ ॥ आशिने शुक्क- 
प्षस्य अष्टम्यां प्रयतः शुविः॥ तत्र चायुधवर्माद्य छत्रे बच्चे च पूजयेर॥रा जलिड्ठमनि सर्वाणि 





मैते अज्ञान पूर्वक बालह॒त्यारूप पाप किया है। इसमें सन्देह 
क्या कारण है यह पूछा ॥ ६१ ॥ कि तेरा ऐसा शीढ क्‍यों 


॥ ६२ ॥ मकटीने कुक्कुटीके बाक्योंकों सुनकर सब समा- 


पुत्रोंत कराया ॥ ६३ ॥ देवीके ब्रतका स्मरण करती हुईं 


साथ देवीका ब्रत किया ॥६४॥ उस ब्रतके प्रभावस मकंटी 
गर्भवती होगई एवं देवीकी कृपासे पुत्र पेदा किया ॥ ६०॥ 
वो पुत्र देखनेमे भी सुन्दर था | घुन्द्रही उसका नाम था। 





2.एए॑एणणएशाण २२2 कमान कल जज मन मल बज कल चुबलुलुइ 





| | होता। यह मे निः्सन्देह सत्य कहता हू | यह संसारमें सब 
नहीं है ॥ ६० ॥ सबीके एस वाक्य सुनकर कुककुटीको | 
बड़ा विस्मय हुआ। शीघ्नही शोकके समुद्रोंकों देनेवाला | 


दुःखोंका हरने वाला हैं। अब ओर क्या सुनना चाहते हो 
॥ ६९ ॥ यह्‌ श्रीस्कन्द पुराणकी कही हुईं अदुःखनवमीके 


जब हे रे या | ब्रतकी कथा पूरी हुईं॥ 
है ए भद्र ! तू रोती क्‍यों हे सो कह । तुझे सब कुछ है । | 
राजाकी प्यारी रानी है, सब सखी तेरा मात करती हैं. 


भद्॒कालीतवरत-आश्रिन शुद्धा नवमीके दिन होता है । यह 


| हेमाद्विमँ विष्णुधमस लिखा हे राजा बोले कि, हे नरा- 


रे | घिप ! भद्गरकालीका पूजन किस विधिस करना चाहिये 
चार कह सुनाया । कुक्कुटीने उसके प्रायश्वित्तकों अपने | 


जब कि, हे नरोत्तम ! आश्विन शुक्छा नवमी हो । पुष्कर 


हे रे £5 | बोछे कि, सुन्दर पूर्वोत्तर दिशामें जो कि वास्तुके लिये 
सकटोसे बोली कि देवीका ब्रत कर फिर उसने विधिके | 


मनोहर हो उसमे भद्रकालीका रंगे वर्खोंसे अछुकृत घर 


| बनाये । है द्विज | उसमें भरद्रकालीकी पटपर बनी हुई 
| मूर्तिको पूज, यह अठारह भ्ुजी छुन्दर होनी चाहिये ।! 
| आलीढ नामके स्थानपर बेठी एवम्‌ चार शरोंके रथवाली 
वो इतना श्रेष्ठ था कि प्रथिबीके भारकों धारण कर सकता. 
था| अब राजपत्नी और विप्रपत्नी दोनोंदी सुखी होगई 
| ६६ ॥ इस संसारमें यह बल प्रसिद्ध है इसे सीताने किया | 
है दमयन्तीने इसे किया है ॥ ६७ ॥ और भी बहुतसी | 
श्लियोंने इस वब्रतकों सदा किया था। जो इस ब्रवको करती | 
और इस कथाको छुनती है| ६८ ॥ उसे कभी दुःख नही | 


होनी चाहिय। हे पार्यिव ! अक्षमाला, त्रिशछ, खड़े, चमे 
बाण, चाप, शंख, पद्म, स्रक खुब, वंदी, कम्ण्डलु, दुन्‍्त, 
शक्ति, पाश और हुताशन, इन सबोंको अपने हार्थोर्मेधारण 
किये हुए हैं, सब हाथोंमें एक सुन्दर हाथ हैं जिसमें रत्न- 
पात्र लिये हुए हैं । ये सब वातें चित्रपटमें होनी चाहिये। 
आश्रिन शुक्ला अष्टमीके दिन तियसपूर्वक पवित्र होकर 


. ९ पयेति शष: ' 





तया शबत्राणि पूजयेव । 


ब्रंतराज; । 


_ नवमी 


। पुष्पेमेध्ये: फडनेशपेमोज्येय सुमनोहरै॥बलितिश्व॒ विचित्रेश्व प्रेकष्या 


दान स्तथेव च ॥ रात्रों जागरण कु्यत्तत्रेव बखुधाथिप ॥ उपोषितों द्वितीयेषद्धि पूजयेत्‌ पुनरोव 
ताम्‌ ॥ आयुधाद्य च सकल पूजयेद्रसुधाधिपाएव॑ संपूजयेदेवीं वरदां भक्तवत्सलाम्‌ ॥ कात्या- 
यनीं छामगर्मा बहुरूपाँ वरप्रदाम्‌ ॥ पूजिता स्वकामः सा युनाक्ति बखुधाथिप ॥ एवं हि 
संपृज्य जगत्यधानां यात्रा तु कार्यो वखुधाधिपेन ॥ प्राप्तौति सिद्धि परमाँ महेशों जनस्तथा- 
न्योएपि च वित्तशकत्या ॥ इति भद्रकालीब्रतम्‌ ॥ 
ु नवरात्रत्रतम ॥ 
अथ देवीपुराणोक्त नवरतप्रतयू-्वझोवाब ॥ शणु श॒क्र प्रवक्ष्यामि यथ। त्व॑ परिषिच्छाप ॥ 
नहापसिद्धितई धन्य सर्वशत॒ुनिबदणम्‌ ॥ स्रेलोकोपकाराथ पूजयेत्‌ सर्वश्त्तिज ॥ ऋत्वथ ब्ाह्म- 
जातेश्र क्षत्रिय नूमिपालने ॥ गोबनार्थे वत्स वेहये! शूद्रेः पुत्रसुखार्थिन्िः ॥ सौमाग्या्थ तथा 
ख्रीमिर्धन।थ घनकांजषिन्रिः | महंजत महापुण्यं शाडर्ेरजछितय्‌ ॥ कतेव्यं देवराजेद्र देवी 
क्तिप्मश्वितेंः ॥ कम्यालंस्थे रवो शकः शुक्लामारभ्य नन्दिकाम ॥ नख्दिका प्रति ॥ अयावी 
व्वथयेछाणशी वकाझी त्वथवा युनः॥ मातःझनायी जितदन्द्स्षिकाल शिवपूजकः ॥ शिव 
शिवा च शिंगरे तयीः पूतका ॥ जपहो मखमासतक्तः कन्यकां मोजबेत्‌ सदा॥ अष्ठम्यां नवगेहारि 
दाहजानि शुभानि च ॥ एक वा वित्तमावेन कारयत्‌ सुरसत्म ॥ तस्मिन्‌ देवी मकतेव्या हेपी 
वा राजती तु वा ॥ मुद्रारक्षी लक्षणोपेता खड़शले व पूजयेत ॥ सर्वोपहार संपन्नवल्ञरत्तफला- 
दिल्िः ॥ कझार्वेहबदोल:दिरुजां च बलिशोबेकीम॥ बलिग्राहिणो देव। दिनायकादयएदस्संउन्विनीवहि 
डविशेय !! पुष्पेश्न द्रोगबिल्वाद्यजातिपुन्नागचब्वकेः द्रोण: कुछषकः | विचित्रां रचयेत पूजा- 
अड़म्बालु पासयेंद ॥ दुर्गाभतों जपेन्मन्त्रमेकचित्तः सुमावितः ॥ तदद्धयामितीशोेपे विजयाएप 


ढाड तलवार छत्र और वल्चों का पूजन कर । राजाके सब | इसे करना चाहिये, इस महापुण्यशालढ्वी बड़े भारी ब्रतको 
कक न नर ध््प कक गज शि ंस रे च ५० बिक धर 
चिह्ोंकों वथा श्रोंकों पूजे, पुष्प, मेच्य, फछ और सनो- | शिवजीने भी किया है, हे राजेन्द्र | देवीकी सक्तिके सा 


हर भक्ष्य सोज्य एवं अनेक तरहकी बलि दे | है वसुधाधिप 
रातंम जांगसण करे। दूसरे दिन उपवास पूवक फिल्काली 


काम्मोंको देती है । इस प्रकार जगतकी प्रधान काछीकी 


पूरा हुआ | 
टे इन्द्र : जो मुझे आप पूछवे हैं उसे में कहता है । यह महा 


साय हैं। सबके उपकारके छिय सभी वृत्तियोंमम 


ऊ 


थे कि 2 | किक गोघतके के 
शिया हो सौभास्यतने: 





| से अवश्य ही करना चाहिये, कन्याके सू्येमें शुद्ध नल 
| से छेकर । नंदिका प्रतिपदाका नाम है | बिना मांगे फछा' 
का पूजन करे । हे वसुधाधिप ! आयुध आदिक सबकी | 
पूजा करें। इस प्रकार बरके देनेवाढी भक्तत्रत्सछा वरदा| 
बहुतसे रूपोंवाली कामनाओंको पूराकरनेवाली कात्यायनी | 
देवीका पूजन करे | हे बसुधाधिप ! पूजित हुई काली सब | 


हारकों करतेवाला अथवा एकवार करनेवाला या रातको 
करनेवाला बने, प्रातःकाछ स्तान करे, क्रोध मोहादिको 
जीते, तीतवार शिवका पूजन करे । झ्षिद और शिवाढ 
एक शेष करके शिव रह जाता है । उन दोनोंको जो पूते 


दुता है | _ जगतृ्‌क | 'वो शिव पूजक कहाता है यानी महादेव पावेती दोनोंकाही 
पूजा करके राज्ञाको यात्रा करनी चाहिये | वो परम सिद्धि | 


को पाता हैं और भी जो कोई अपने शक्तिके अनुसार | 
हे. 2 हा कप बे 
कालीका पूजन करता है उसके भी सब मनोकामत पूरे होते | 


है हा, क्र डी 
ज हट ज्ञ णु श्त्ति [| चक्र मा | यह भ्ं हा ष्छी ।क्‍ तक च्छ न णों 
६ महादेवजी उसपर कृपा करते हैं। यह भद्रक्वालीका ब्रत | सत्तम ! उसमें सोने चांदी मिट्टी वा काठकी सब दक्ष 


० कि | सहित देवी स्थापित करे, उसके साथ खड्ड और झुह॒की 
_ चवरात्रब्रत-देवी पुराणमें कहा हुआ हे--अद्मा दोके क्रि | 


पूजन करे । जप ओर होममें मन छगाये रहे, कन्याओंको 
सदा भो जन करावे | अष्टमीके दिन काठक बतायहुए सुदर 
नये घरोंको अथवा धन न हो तो एक घर बनवाये, हे हुए 


भी पूज। करे। सब उपहारोंके साथ एवं वख रघ्व ओर 


8 व ५ | ऋलादिकोंके सहित रथ और डोडा आदिकी पूजा करे 
क्‍ सिद्धि देनेवारा हू धन्य ईँ, सभी वरियोंक्ा दमन करने- | 
के |. | 
इस पूज | 
यज्ञये प हे 

चज्ञक लिये जह्मणको भूति पालमके लिये क्षत्रियक्रो एवम्‌ 
' डैजेस.गोधनके छिय बेश्यको पुत्र अुखके छिये शुद्रोकी 


कस. का 3! 7 का 5 2. हक पे क््च्न्क 5 * २ 83 
छिये घनदे चारत्बाजेको घना छिये 


तथा जिन देवताओंको वुलि दी जानेवाछी है उनकी 
पूजा करे । पुष्प द्रोग बिर्द जाति पुन्नाग और चम्पकोर्स 
विचित्र पूजा रच । द्रोग कुरुबकको कहते हैं। तथा भट्ट 
के दित डपवास भी करें । एक चित हो प्रसन्नता 
लाथ दुर्गाक सामने सेत्र जय करे उसकी भावीरात बशी 


श्रतानि, ) आपषाटीकासमेलः । (३३९ ) 

















४ 32800: 6 07:77 




















/०2232222/:3.42 73 
७. 





नपोत्तम/॥पश्चाब्द लक्षणोपेत्त महिष॑ व छुपृजितम्‌॥ विजिवत्‌ कालि कालीति जप्त्वा खड्जेन 
घातगेत ॥ तंस्थोत्थं रुधिरं मांस ग्रहीत्वा पूजनादियु ॥ निऋताण भदातव्यं महाकोशिक 
मत्तितमातस्यात्रतों नृष स्वायाच्छतु कृत्वा तु पिष्टजम्‌॥ खड्डेन घातग्रित्वा तु दह्याव स्कर्द- 
विशाखयोः ॥ ततो देवीं पुनः भीतः क्षीरसपिजेलादिमि!ः ॥ कुकुमागुरुकपुरचन्दनेश्वाच्ये धृप- 
गेत्‌ ॥ हेमादिपुष्परत्नाने वासांसि भूषणानि च ॥ नेवेद्य सुमभूतं ठ॒ देय॑ देव्याः खुमाबितः ॥ 
देवीभक्तान्‌ पूजबीत कम्यकाः प्रमदर्धिकाः ॥ द्विजातीनन्धपाखण्डानन्नदानेन तोषयेत ॥ 
दृगभिक्तिपरा ये तु महाव्रतपराश्व ये ॥ पूजयेत्तान्विशेषेण तदूपा चण्डिका यतभा। मातृ्णां चंब 
देवीनां पूजा कायो तदा तिशि ॥ ध्वजच्छत्रपताकादीलच्छयेच्वण्डिकागुहे ॥ रथयात्रां बलि- 
क्षेप पटुवादरबाकुलम्‌ ॥ कास्येक्तष्यते येन देवीशॉखरविधानकेः ॥ अद्व्मेधमवामोति 
भाक्तितः सुरसत्तम । महानवम्याँ पूजेय सवकामझदयिका ॥ सूबेषु वत्स वर्णबु तव भक्त्या 
प्रकीर्तिता ॥ कृत्दाउप्रोति यशो राज्य पुत्राधुर्धनसंपद: ॥ इति देदीपुराणेक्ते नदराजब्रतम्‌ । 
अथ मह|नवस्यां दुगीपूजविधिः--आश्वयुकइ छप्क्षस्थ गबम्यां श्रयतात्मवान।भक्‍त्या सपूऊये 
देवदेवीं संभाययेत्ततः ।। महिषन्नि महामाये चाझुण्डे झुण्डमालिनि 0 द्रव्यमारोग्य्रिजय दहि 
देवि नमोस्तु ते॥मूतप्रेतपिशाचेभ्यों रक्षोम्यश्व महेश्वरि ॥ देवेभ्यो माठषेम्यश्व भूयेभ्यों रक्ष 
मां सदा॥ उमे बह्याणि कौमारि विश्वरूप प्रसीद मे ॥ कुम्टीलेंजदिःयः च दुद्यादाच्छादनादि- 
कम्‌ ॥ नव सप्ताष्ठ पञ्चेब स्वस्य वित्ताठलारतः ॥ शास्त्र च यस्‍्य यज्चेव स तब्त्नेन पुजग्रेद ॥ 
यतः शस्त्रेष सर देवी निवसत्येव सम्ततम्‌ ॥ शा्चिति पाठ:॥ झर्ख +टपआए ॥े इंगोसाँ 
द्विण्यां देव्या। स्तपनारी विशेष:-शिवरहस्थे-ये मेझमूथैेगलसइ्डक्ृतामिषिकां पखशुतोनीरे- 


 आ 
के अं > 5 हैं हट उत ये तत जन 
८“ मे कलर । कह है है, कक 


आस लननननननननननननननीननीननननीनिननीनननीनीनिनीनिननीनीनीनीनीनीननीनननाना--ा 


रहजानेपर राजाको चाहिये कि, जीतके छिये पांचवषक 


सब लक्षणों सहित पूजा किये गये भसेको विधिके साथ 


“काली खाली 'ऐसे जपकर तल्आारस काट दे । हे इन्द्र ! 


उसके जो खून मांस हों उन्हें मत्रके साथ निऋतको दें दे । | 
उसके सामने राजाको स्तान करना चाहिये । पिष्टका वेरी | 
बनाफर उसे खड्से काट उसे स्कन्द ओर विशाखाके | 
लिये दे दे । इनके बाद प्रसन्न होकर क्षीर, सरपि, जलादिक | 
इुंकुम। अगरु, कर्पूर और चन्दनसे पूजकर धूप दे । 
देमादि, पुप्प, रत्न, बस्ल्‍र, भूषण और बहुतसा नेवेद्य | 
देवीकी भेंट करना चाहिये । देवीके भ्क्तोंका पूजन करे | | 

कन्याएँ और प्रमदाएँ जो हों इनकासी पूजन करे | द्विजाति | 
तथा आँधरे और पाखण्डियोंको अन्नदानसे ग्सन्न करें ।| 
| कुमारिथोंकों भोजन कराकर पीछे बस और आच्छादस 
परायण हों उनका विशेष रूपसे पूजन करे; क्योंकि, वे तो | दे । वे नो हों सात हों आठ हों वा पांच हों जेसी शक्ति है 
चण्डिकाके स्वरूपही हैं | ढसी रातकों माठ्का देवियोंकी | 
भी पूजा करत्ती चाहिये। चण्डिकाके स्थानमें ध्वज- छत्र, | 
ओर पताकाओंकोसी लूगाये, सुन्द्र बाजोंके साथ रघख्च- | 
यात्रा ओर बलि होती चाहिये | ये सब इस तरह झास्के 
विधानसे किय जायें कि, देवी प्रसन्न हो यह महानवमीम | 
पूजा होती हैं सब का्मोंको पूरा करनेवाली हं। यह सब ' 


के शाप क कि 
: जो दुगगोंकी भक्तिमें छगे रहते हों अथवा जो महत्रतमें 





वर्णोमें होती हैं। सबकेही कार्मोको पूरा करती हैं। हे वत्स ! 
तेरी भक्तिसे. मने तुझे कहदी है; इसे करके यश, राज्य, 
पुत्र, धन; संपत्ति सबकी प्राप्ति होती है । यह देवी पुराणका 
कहा हुआ नवराज्रका ब्रत पूरा हुआ | सहानवमीम दुर्गा 
पूजा विधि-नियमवाला आदमी आश्रित शुद्ष लवमीके 
दिन भक्तिके साथ देवीका पूजन करके उसकी आना कर 
कि-हे महिषासुरकों मारनेवाली महामाये ! हे मुण्डोंकी 
माला “हिमनेबाली चासुण्डे ! मुझे दृव्य आरोग्य और 
विजय दे, है देवि ! तेरे लिये नममस्कार हा गा 
भूत प्रेत पिशाच और राक्षसोंस एवम देव ओर सलुष्य 
होनेवाले सब वरहके भयोंसे मेरी सदा रक्षा कर; है उसे * 
हे त्ह्माणि ! हे कौमारि ' हे विश्वरूपे . मुझपर पसन्न हो 


वैसाही भोजन करावे, जो जिसका शख्र हो वो उसही' 
प्रयस्तके साथ पूजे, क्योंकि देवी सदाही शल्ोंमें निवास 
करती है, कहीं शाख ऐसा पाठ है। शाल्र यानी देवी 
सम्बन्धी पुस्तक । दुर्गाभक्ति तरंगिणीमें कुछ देवीके स्थाप - 
नादिशोंमें शिव रहस्यमें विशेष लिखा हे कि; सरुके ऊपर 
रहनेवाले देवगणोंसे जिसका अभिषेक किया हूँ उस गिरि" 


बलराज३ । 


















तक फत! 7 किक, 





77022: 


५ ३४० ) 











प्रतामभिषेचयान्ति ॥ ते दिव्यकल्पमठुभूय सुवेषरूपा राज्याभिषेकमतुल पुनराप्त॒वान्ति ॥ देवी 
पुराणे- खुगान्धिपुष्पतोयेन स्नापायित्वा नरः शिवाम्‌ ॥ _नागलोक सम/साद्य क्रीडते पत्नगे 
सह ॥ द्रोणपुष्पं विल्वपत्रं करवीरोत्पलानि च ॥ स्नानकाले प्रयोज थानि देव्ये भीतिकराणि च॥ 
भगवत्ये नरो दत््वा विष्णुल्ोके महीयते ॥ स्नापयित्वा नरो ढुगी नवम्यां हेमवारिणा॥सौवणं- 
यानमारूढो वसुन्निः सह मोदते ॥ रंत्नोदकेविंप्णुलोक॑ लभते बान्धवेः सह ॥ घृतेन स्नापये- 
चस्तु तस्य पुण्यफर्ल श्रुण् ॥ दशपूवान्दशपरानात्मानं च विशेषतः ॥ भवाण॑वात्समुद्ृत 
दुर्गालोके महीयते॥क्षीरेण सनापयेद्यस्तु श्रद्धामक्तिसमन्वितः ॥ चण्डिकां विधिवद्वीर इम्द्रलोके 
महीयते ॥ स्नापयेद्विधिना वीर दध्ना ढुगो महीपते ॥ राजतेन विमानेन शिवलोके महीयते॥ 
पश्चगव्येन यो हुगो तथा च कुशवारिणा ॥ स्नापयेद्धिधिवन्मन्तरैबेह्मस्नानं हि. तत स्मृतम्‌॥ 
एकाहे।पि च यो दुर्गों पश्चगव्येन चण्डिकाम्‌॥ स्वापयेन्नपशादूल स॑ गच्छोद्रिष्णुसत्रिधौं ॥ तह 
चण्डीगायच्या।।|सा च--“ नारायण्ये च विज्यहे चण्डिकाये च धीमहि ॥ तन्नश्चण्डी प्रचोदयाव' 
रति॥ कालिकापुराणे--कपिलापश्वंगव्येन दुध्िक्षीरयुतेन च ॥ स्नान॑ शतग्॒ण प्रोक्मितरेथयो 
नराधिप ॥ भविष्ये--चण्डिकां स्नापयेद्यस्तु नर इक्षुरसेन च ॥ गाझंडेनस यानेन विष्णुता 
सह मोदते ॥ पितृल॒द्विय यो हुगो मधुना पयसापि च ॥ स्नापयेत्तस्थ पितरस्तप्ता वर्षसंहस्त- 
कम्‌ ॥ पोर्णमास्यां नवम्यां वा अष्टम्यां वा नराधिप ॥ स्नापयित्वा तीर्थजलेवाजपेयफर 


लभेत्‌॥ स्नापयित्वा नदीतोयगन्धचन्दनवारिणा॥चन्द्रांशनिर्मलः श्रीमांश्रन्द्रलोके महीयते। 


स्नापंयेद्स्तु दे देवी नरः कप्रवारिणा ॥ स गच्छति पर स्थान यत्र सा 


चाण्डिकां स्नापयित्वा तु श्रद्धयाई्गुरुवारिणा ॥ 


सुताका पंचामृतसे अभिषक करते हैं वे दिव्यकल्पत्क दुर्गा 
एवं दिव्यलोकोंका अनुभव करके सुवेष और भृषायुत 
होकर अतुल राज्याभिषेकको प्राप्त होते हैं | देवी पुराणमें 
लिखा हुआ हैं कि भनुष्य सुगन्धित पुष्प और पानीसे 
शिवाको स्नान कराकर अन्‍्तर्में नागलोककों पा पश्चगोंके 
साथ खेल करता है । द्रोण, बिल्वपत्र, करवीर और उत्पछ 
इनका सस्‍्नन काढसें प्रयोग करे; क्योंकि ये दंवीके प्रीति 
करनेवाले हैं, मनुष्य इन्हें भगवतीके छिये दे ऋर विष्णुल्ो 

करें पूजित होता है । मनुष्य नवमीके दिन सोनेके पानीसे 
दुगाको स्तान कराकर सोनेके विमानपर चढ़ वसुओंके 
साथ खेलता है । रत्नोदय या तिछोद्कों से स्तान कराकर 
बांधवोंके साथ विष्णुलोकको प्राप्त होता है। जो घृतसे 
दुगांके स्तान कराये उसके पुण्यको सुन, दशा पूवक और 
दृशपरोंके पुरुषोंका और विशेष करके अपना संसार साग- 
रसे उद्धार करके ठुग्ोके छोकमें प्रतिष्ठित करता है, जो 
श्रद्धा और भक्तिक साथ दूधसे दुर्गाका स्नान कराता है हे 
वीर ! वो इन्द्रढोकको जाता है, हे बीर ! महीपते ! जो 
विधिके साथ दुर्गाको द्धिस नहव्मता है वो चांदीके विमान 
र पढेकर शिवछोकर्मे चला जाता हे। जो पंचगव्य या 
ऊँशाजलस विधिपूवेक मंत्रोंद्ारा दुर्गको स्नान कराता हे 





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चाण्डिका सघ्थिता॥ 
इन्द्रलोक॑ेसमासाद्य क्रीडते सह किन्नरे॥ 


उसे ब्रह्मस्तान ही समझ, हे नृपशादूल ! जो एकदिन भी 
चण्डिका दुगाकों पंचगव्यसे स्नान कराता है वो विष 
भगवानके पास चढा जाता है । कहीं यह भी लिखा है कि 
वो छुरभी पुर चला जाता है ॥ यह स्नान चण्डीगायत्रीे 
होना चाहिये, वो यह है कि में नारायणी की उपासना 
उसीक छिय करता हूं। चण्डिकाका ध्यान करताहूं।वो 
मेरी बुद्धि अपनी तरफ छगाये | कालिका पुराणमें लिखा 
हुआ है कि-कपिलाके द्धि क्षीरके साथ पंचगव्यसे किये 
गये स्तान हे राजन्‌ ! औरोंस सौशुने होते हैं। भविष्य 
पुराणमें छिखा हुआ हैं कि-जो इंखके रससे 'चण्डिका 
देवीको स्नान कराता है वो गरुढवाहन सहित विष्णुक 
साथ आनन्द करता है । ज्ञो पितयोंके उद्देशसे सधु और 
पयस स्वान कराते है उनके पित्तर एक हजार वषतक हू 
रहते हैं । हे राजन्‌ ! पौणमासी नवमी और अष्टमीके दिन 
तीथंके जलोंसे दुर्गोको स्नान कराके वाजपेयके फढको 
पाता है। गन्ध चन्द्नके पानीके साथ नदीके पानीसे स्नान 
कराक॑ चघन्द्रढोकम प्रतिष्ठित होता हे । जो कपूरके 
एनीसे चण्डिका हा स्नान कराता हे वो परम स्थानको 
चलाजाता है जहां कि, चडिका विराजती है जो 
चडिकाको श्रद्धापूवंक अगरुके पानीसे स्नान कराता है 


इन्द्रढोक्में पहुँचकर किन्नरोंके साथ क्रीडा करवा हैं | 


+टिल्योप कत्रचित्पादः । २ सगच्छेत्सुरमीपुरमिति क्वचित्पाठः । ३ बषशतद॒यमिति क़्वचित्पाठः । 





ब्रतानि, भाषाटीकासमेलः । (३४१ ) 


वाराहीतन्त्रे--षडक्षरेण मन्त्रेण पाद्ादीनथ षोडश ॥ इतरेरुपचारेश्व पूर्वभोक्तेश्न मेरव ॥ जध्य!- 
द्रादशाड्रेन योप्ष्येण चण्डिकां पूजयेन्ररः ॥ दशपग्मसहस्माणि व्षोणां मोदते दिव्र ॥ आपः 
क्षीर॑ कुशाआणि अक्षता दधि तण्डुला।सहा लिद्धाथका दूर्वा कुडकुम रोचनं मधु ॥ अध्योंठ्य 
कुरुशादल द्वादशाड़ उदाहतः ॥ ६ह] सहदवा ॥ कुमारीसुपक्रम्य ॥ अनेन पृजयद्यस्तु स याति 
परमां गतिम्‌ ॥ अष्टाड्राप्य समापूर्थ देव्या मून्ति निवेदयेत्‌ ॥ दशवर्षसहस्प्ाणि दुर्गालोके मही- 
यते॥आप$ क्षीरं कुशाग्राणि दधि सर्पिश्व तण्डुछाः ॥ तिल सिद्धाथकाश्रेव अष्टाड्ोड्येः प्रकी- 
तित/॥मविष्ये-रत्नबिल्वाक्षतेः पुष्पेदघिदृवाइकुशस्तिलेश।सामान्यः सर्वदेवानामध्योपय पारे- 
कीतितः ॥ अध्यपात्रफलम- मृत्पात्रेण नरो दत््वा वाजपेयफल लमेत ॥तासरपात्राध्ये दाने न पौण्डरी क- 
फल लगेत्‌ ॥ दत्वा सोवणेपात्रेण लभेद्वहुसुवणकरम ॥ हेमपात्रेण सर्वाणि ईप्सितानिे लमेद्धवि ॥ 
अध्य दच्वा तु रोप्येण आयू राज्य फल लभत्‌। पलाशपद्मपत्राभ्यां गोसहस्मफलं लभेत्‌ ॥ सौप्य- 
पात्रेण दुर्गाये विष्णुयागफर्ल लभेत्‌ ॥ चन्दनेन सुगन्धेन आया यस्तु समालभेत्‌ ॥ कुड्कुमेन च 
लिपाड़ां गोसहस्फल लमेत्‌ ॥ विलिप्य कृष्णागुरुणा वाजपेयफल लमेत ॥ मगालुलेपन 
कृत्वा ज्योतिष्ठोमफले लभेत्‌ ॥ मुगः कस्तुरी ॥ तथा-चन्दनागुरुकर्प्रैयेस्तु ढुगा विलेपयेत ॥ 
संवत्सरशतं दिव्यं शक्रलो के महीयते ॥ देवीपुराणे--चन्दनागुरुकपूरेः क्क्ष्णपिष्टः सकुडकुमः ॥ 
ढुगामालिप्य विधिवत्कल्पकोटिं बसेदिय्रि ॥ चन्दन मदकर्पूररोचनं च चतुष्ठयम्‌ ॥ एतेन 
लेपयेदेवीं सर्वकामानवाप्लुयात्‌ ॥ पृष्पाणि--देवीपुराणे-मछिका उत्पले पद्म झमीपुन्नागव- 
म्पकम्‌ ॥ अशोक कर्णिकारं च॒ द्रोणपुष्प॑ विशेषतः ॥ करवौीर शमीपुष्प कुसुम्भ॑ नागके- 
सरम्‌॥ कुन्दश्व यूथिका मलछी पुतन्नागश्वेश्पक॑ नव॒म ॥ जपा च केतकी मी बहती शतप- 
त्िका ॥ तथा कुम्तुदकहारबिल्वपाटलमालति ॥ यावनीबकुलाशोकरक्तनीलोत्पलानि च ॥ 
दमन मरूबकं॑ चेव शतधा पुण्यवृद्धये ॥ केतकी चातिमुक्तश्व बन्धूकं बकुलान्यपि ॥ कुमुद 
कणिकार च पिन्दूराभं समुद्धथे ॥ बिल्वपत्रेरखण्डेश्व सकदेवीं प्रपूजयेत्‌ ॥ सर्वपापविति- 
मुक्त शिवलोक महीयते ॥ मणिमौक्तिकमालां च वितान हुकुल तथा ॥ घण्टादि सबदा 





बाराही तंत्रमें छिखा हुआ है कि-भेरव | छ अक्षरके मंत्रसे | 
पहिले कहे हुए पाद्य आदि सोलह उपचारोंस तथा द्वाद- 
शाज्ञ अध्येस चण्डिकाका पूजन करता है वो दश हजार | 
पद्मवर्ष स्व आनन्द करता हे । द्वादशाज़् अध्य-जलछ;/ 
दूध, कुशाम्र, अक्षत, दधि, सहदेवी, तण्डुछक, यव, दूर्वां, | 
कुंकुप, रोचन और मधु, हे गुरु शादूंड ! इनके अध्यको 
द्वादशाज्ञ अध्य कहते है। कुमारी का प्रकरण छेकर, कहा 
है कि, जो इससे पूजन करता है वह परम्‌ गतिको पाता | 
है। अष्टाज अध्यकी समापूरति करके देवीक मूर्धापर निवे- | 
दून कर, वो दृश हजार बच्ष दुर्गाके छोकमें निवास करता | 
हूं।( अष्टाह् अध्ये १६ प्रष्ठम गया ) भविष्यमें लिखा | 


आ है कि-रत्न, बिरव, अक्षत, पुष्प, दृधि, दूवों, कुश, | 
दे के रतन, विस, अबत, उप; नें 9 अब हू? | कर्णिकार, और विशेष करिके द्रोण पुष्प, करवीर, शमी 


तिल, इनका अध्ये, सब देवोंका सामान्य कहा है ॥ मलु- 
प्य मिद्टीके पात्र्मे अध्ये देकर वाजपेयके फलछको पाता है 


तामेके पात्रम दकर पॉंडरीकके फलको पाता हैं, सुबर्णके 
पात्र कर बहुतसे सुवणको पाता है. हसके पात्रसे संब | 
सनोकामनाएँ पूरी होती है । चांदींक पात्रम अध्य देकर | 
आयु ओर राज्यफल मिलता है,पछाश ओर कमलके पत्तोमें 
देकर एक हजार गऊ दानके फलको पाता है। रोष्य पांजमें | 
दुरगांक लिय देकर विष्णुयागका फछ पाता हे | जो सुग- | 
ज्थित चन्दुनसे आया दुगांको छूता है कुंकुमसे लिप्त करक | 





वो गोसह स्रके फलको पाता है । कृष्ण अगरुसे छीपकर 
वाजपेयके फछको पाता है। कस्तूरीको रूग'कर ज्योति- 
प्टोमके फछको पाता हें | मूछमें सग है । प्रन्थकार उसका 
कस्तूरी अथ करते हैं । जो चन्दन अगरू और कपूरको 
दुगाक लगाता हैं वो सो द्व्य संब॒स्सर इन्द्रक छोकमें 
प्रतिष्ठित होता है।। देवी पुराणमें छिखा हुआहे कि-चन्दन, 
अगरु और कपूरको खूब पीसकर उसमें कुंकम डाछ उसे 
विधिपूर्नक दुगाके छगाकर कोटिकल्प दिवमें वसता है। 
९ " लक 
चन्दन मद कपूर और रोचन इन चारोंकों देवीके छृगा- 
नेस सब कार्मोको पाजाता है। देवीपुराणमें पुष्र भी-कहे 
हैँ कि मछिक्रा, उत्पल) पद्म, शमी, पुन्नाग, चपक, अशोक, 


पुष्प, कुछुम, नागकेशर; झुन्द, यूथिका, मल, पुन्नाग, नया 
चंपक , जपा, केतकी, मही, बृहती, शतपत्रिका, कुमुद, 
कहार, बिल्व, पाटछ; माछती, यावनी, बकुछ, अशोक, 
रक्त और नीढ उत्पछ, इमन, मरुवक इनसे अनेक तरह 
पुण्य व्धनके लिये एवम्‌ केतकी, अंतिमुक्त, वन्धूक, बकुछ, 
कुमुद, सिंदुरके रंगंके कर्जिकार इसको सम्रद्धिके लिये 
और भखण्ड बिल्वपत्रोंसे एकवार देवीकी पूजा करे । सव 
पापोंस छूटकर शिवलोकमे प्रतिष्ठित होता है । मणिसो- 


... ब्रतराजः। 





दत्वा हेमपुष्पं तु शक्तितः ॥ तावद्धिश्व द््ताः पुत्रः पोचेश्रेव हक श्रिया सहेव 
यज्यन्ते हम पुष्प: शिवाचनात्‌ ॥ भविष्थे -भ त्यकऊु क्तडुप्व३ दशनिष्कफले लग्त ॥ स्नग्बद्वेष 
च तेष्वेव द्विगुणं काखनस्य तु ॥ करवीरस्जानिश्व पूजयेद्यस्तु चण्डिकाम्‌ ॥ सोइग्रिष्टोमफ 
लब्ध्वा सूर्यलोके महीयते ॥ पूजयित्वा नरो भकत्या चण्डिकाँ पद्ममालया ॥ ज्योतिष्टोमफह 
प्राप्य सूर्मलोके महीयते ॥ शमीपुष्पत्चजानिश्व आयी संपूज्य यत्रतः ॥ गोसहस्फले प्रप्य 
विष्णुलोके महीयते ॥ पूजयित्वा तु राजेद्ध श्रद्धया विधिवन्नप॥ कुशपुष्पत्मजाभिस्तु पितलोक- 
मवाप्तुयात ॥ सुगन्धयुतपृष्पेस्तु पूजयेब्रस्तु चण्डिकाम्‌ ॥ मालाभिमोलया वापि सोडश्वमेघफल 
लनेत्‌ ॥ सुवणानां छुष्णेस्य शते दत्ते फल लभवामालया बिल्वपत्राणां नवम्यां शग्शुलेन च॥ 
नीलोत्पलस्रजानिश्व पूजयद्यरतु चण्डिकाम्‌॥ वजपेयफल प्राप्य रद्॒लोके महीयले ॥ नीढो- 
त्पललहस्लेण यो वे माला प्रयच्छति ॥ वर्षकोटिसहस्लाणि वर्षकोटिशतानि च ॥ दुर्गातचरतां 
यातो रुद्वलोके महीयते ॥ तथा----विलितां पूजयेद्ढुगा. दिव्यपृष्पधिवासिताम ॥ ताल्वन्तेन 
संवीज्य महासत्रफल लभेत्‌ ॥ भविष्पे----सर्वेषामेव धूपानां हुगोया गुग्गुलः शियः ॥ मन्रस्तु- 
धूपोष्यं देवदेवेशि पृतगुग्गुलयोजित)गृहाण बरदे मातुगें देवि नमो5स्तु ले ॥ कृष्णागुरुं नरो 
दत्ता गोसहल्फले लमेत॥माहिषाख्यवुलाभ्य कं दवा विल्वमथापि वा॥ वाजपयफल प्राप्य 
सू्यलोके महीयते ॥ सकृष्णागुरुधूपेन माहिषबारुपेन मड़छा ॥ शोधयेत्वापकलिलं यथा कप्निरिव 
काशथवनम्‌ ॥ कृष्णागुरु सकपूर चन्दन सिल्हक॑ तथा॥तथा शब्द्सझुच्चये--भगवत्ये नरो धृपमिम् 
दत्वा नराधिष॥इह कामानवाप्यान्ते दर्गालोके महीयते॥ वृतदीपप्दानेन चण्डिकां पूजयेन्नरः॥ 
सो5श्वमेघफले प्राप्य दुगोयासतु गणो भवेत्‌ ।। तेलदीपप्रदानेन पूजयित्वा च चण्डिकाम्‌ ॥ बाज- 


पेयफर्ल प्राप्य मोदते सह छिन्नरे 
क्तिककी माला, वितान, दुकूल और सदा घंटादिकोंको 
एवम्‌ शक्तिके अद्वुघार हेस पुप्पोंको देता है जितने हेमके 
पुष्प दिये हो उतनेही उसे बेटे पोते मिड जाते हैं क्‍योंकि 
हैमके पुष्पोंस शिवार्चन करनेसे श्रीके साथ युक्त होता है। 
भविष्य पुराणमें लिखा हुआ है कि जो पुप्प कहे हैं, उन- 
मेंस चढानेसे दश निष्कके फछको पाता है । यदि इसम् 
फूछोंकी मादा बनाकर चढादे तो दूने सोनेके फलको पाता 

। जो करवीरकी माछासे चण्डिकाक्ा पूजन करता है । 
वो अम्निप्टोमके फलको लेकर सुर्य लोकमें अ्रतिष्ठित होता 
है । मलु-ब भक्तिक साथ कमछकी माछाओसे चंडिकाको 
पूजता हूँ वो ज्योतिष्टीमका फछ पाकर स्यलोकर्में प्राप्त 
होता हू । शमीके फूछोंसे दुर्गांका प्रयत्तसे पूजन करके 
एक हजार गझओंके दानका फल पाकर विष्णु छोकमें प्रति- 


प्ठित होता है। है राजेन्द्र जप ! कुश पुप्पोंकी मालछासे ! 3 
अद्धाक साथ विधियूवक पूजकर पितृछोककों पाजाता हैं। 
सुगन्धित पुप्पोंस चेडिकाझा पूजन करता है अथवा एक | इस धूउको वे ग्ेकमें मतों झामता- 
भाला वा बहुतसी मार्यओोंसे पूजता है वो अश्वमेधक्ा फल | वध मजाक तक कप कप पक की. 
६। सोनोंके वा सोनेके सौके फेलकों पाता है जो | भोंकों पाकर अन्त दुर्गाोक्में प्रतिष्ठित होता है ॥ 
बिल्‍्वफ्त्रकी माला चढाता है नवसीके दिन गुग्गुलुसे और | 
भीड़ कसलकी साढासे जो चडिकाको पूजता हे वो सौ | 
वी जप कै; फछ पाकर रुद्रलोकम प्रतिट्ित होता है । जो | के 
र | यहा फू पाकर किन्नरोंके साथ आनन्द करता है| दौपका 
सहस्त वर्ष और कोटि शत वर्ष दुगोंका अनुचर होकर रुदट- | 


पाता है 


एक दजार नीले कमछोंकी माछांको चढाता है वो कोटि 





र ॥ मन्जस्तु--अभ॒िज्योती रविज्योतिश्रन्द्रज्योतिध्तथेव च ॥ 


छोकमें प्रतिष्ठित होता है | छुगन्धित द्रव्य छगा फृूहोंसे 
खूब सुगन्धित करके जो दुर्गाकों पूजता हैं तथा वालके 
वुन्तेस पंख ऋरता है वो महासत्रके फडको पाता है। 
भविष्यपुराणमे छिखा हुआ है कि सब धूव्ोंमें दुर्गाको गूग- 
लका धूप प्यारा है। धूपके मंत्र हे देवदेवेशि | घृत और 
गूगछका बनाया हुआ यह धूप है। हे बरों के देसेवाछी मात 
इसे ग्रहण कर, तरे छिय नप्तस्कार है । सनुः्य कृष्ण अग- 
रुकी घृप देकर एक हजार गोदानका फछ पाता है। माहिप 
नामक धूपको घीस मिगोकर देनेप्त एबम्‌ बिल्यपत्र भेंट 
करनेस वाजपेयके फलको पाकर सूर्यके छोकमें प्रतिष्ठित 
होता है | माहिष और कृष्ण अगरु इनकी धूपसे मेगढा है 
पाप कछिछो ऐसे सोधती है जेसे अग्नि सोनेको सोधती 
है । कृष्णअगर, कपूर, चन्दन और सिह इनकी धूप भी 
देती चाहिये। शब्द्‌ समुच्चय्म लिखा हुआ है क्रि-हें नरा 


का 


ई ्छ अश्व- 
जो घोका दीपक दे चंडिकाका पूजन करता हू बो 
मेधका फुछ पाकर दुर्गांड्ा गण बन जाता है, जो तेलड़ा 
दीपक देकर चेडिकार्का पूजन करता है वो वाजपे- 


मन्त्र-अग्नि रवि. और चरद्र ये क्ीत्नों भ्योति ही $।. 


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ज्योतिशतुततनों इगे दीरोईय अतिमहाताम ॥ शिवरहस्पे -देदीप्पते सकनकोउज्वलपनञ्मरा- 
गरत्नममभरणहेममये विमाने ॥ दिव्या इन।परिव ते झयटामिएर्म प्रच्वाल्य दीपममर्ल भवने 
भवान्या। ॥ भविष्ये--बृतेव कुछ शादूल हाममाबास्पां तु कारलतिके ॥ जिशेवतों नवम्यां तु मक्ति- 
समन्वित॥ यावन्त दीपसंघातं पृतेदापूय बोघयेतातावत्कटपसलहसाणि दुर्गालोझे म 
यते॥दीपप्रदान यो दद्यादेवेबु आह्यणेद च॥ लेन दीपप्रदानेन अक्षय्पां गतिमाप्छुयाद "एप उखणड 
धृतात्र च तथा शकरयापि चाइलेन परिपक्कान्न॑ दत्वा च बहायणः पदमा॥र गदिति शेषा ।शाल्योदर्न 
रसालां च॒ पाने बदरर्ज तथा ॥ यश प्रयण्छाते दुगांये सगच्छलि शिवालयप  दुगा्साड़: 
सूपशास्रे---इ१दम्लद्विशकरा|पयःसाबितेन्दुमरेचेः सुगालिता।पिष्रनाशम रुचि नेहति न॑ मदन व कु 
रतालिका ॥ पानक वेदक्चे---गोडमम्डमनम्ल वा पानक इस्वीकुरद)॥। तदेव खः 'रातईिति 
म्ल॑_सुतीदर्ण सुहिते पानके स्थानिरतर् तत्कालमू ॥ अश्रेद्धया पायल युक्त शकरासहि 
नरः ॥ यः प्रयच्छति दुर्गाये तध्य राज्य करे स्थितम्‌ ॥ झालिझापुराणे---आभिक्षां प्रमात्न च 
दधि चापि सदयकरम ॥ महादेव्ये निदंधित वाजपेयकर्ल लगेत्‌ ॥ दुर्गासुदिश्य पानीर्य ऋलदा 
शशिवासितम्‌ ॥ यश प्रयच्छति राजेड्ट स गणाजिप्तिमंबताआखं च नःरिक्रेर च खजरं बीज- 
पुरंकम ॥ यः प्रयच्छति दुर्गाये स याति परम पहम्‌ ॥ फल व विदरव स्व नाशुम छिखिदाप्लु- 
यातव्‌ ॥ भश््यदि पथ कद दी दत्तरबामितुष्यति प्रेच्नोग्यं ये लेझ ये पेय चोप्यं व प्चणन ॥ 
परमात्न पिष्ठक व यावक कसर तथा ॥ मोर ४ छाडीवि हंब्य यछानि चोहइजत | इंच 


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त्थः ॥ निवेदयेन्महादेव्ये स्बाशि व्यक्षनात्रि च # क्षीताईीमिय गव्याति माहिशागि च॑ 


सबशः ॥ ताम्बूछानि च दत्वा तु गन्धवः सह मोदले ॥ जिष्शुवने--तन्तुसत्तान सन्रद्ध रकित 
रागवस्तुना ॥ दुर्ग दंवि मजस्वेदं वासघ्ते परिवीदवताम ॥ भविष्ये---वल्लागि तु विचित्राणि 


अम्ककएपतराएच2 काका", /का। कक कर! पथ, 














'प्रडाशक्ताओ८?कशद) 2८, 


हा 


हू दुर्ग | यह दीपक ज्योजियोंत उतर है । इसे आप ग्रहण | निछाहुआ झुगन्वित द्रव्य डाछा हुला पादक धनता हे 
करिये। शिवरहस्यमें छिखा हुआ हैं कि देखनेंग सुन्दर ही खांड, दाख ओर शर्ंरा सहित हो जट्टा पद्या हो 
भिमछ दीपकको सगवतीके भवनमें जरूकर वो ऐसे जिमा- | तीखा हो तो हितकारी वो उसी सन पीजेकी वस्तु होगी 
ने देदीप्यमान होता- है जिसमें अनेकों सुन्द्रियाँ बेठो हुई | निरत्वव- तत्छाड़ बानी उस्ती समय । जो मलुप्य श्रद्वापू: 
हों, कनकसहित पद्मरागमणि'और रत्नोंकी प्रभा जिसका ) बेंफ़ पायल सहित शक्रा संुक्त डुर्याक्रा देता है उसके 
आधभधरण बत्तीहुई हर जोकि हमका चनाहुआ सांवप्य- ! रशाज्य हाथपर रखादडु आ दे | कालि गाय रागम छजा हुआ 
पुराणमें छिखाहुआ हैं कि है कुदशाईल! कापिककी अना | है क्लि- आमिश्वा परमान्न एवम्‌ शकराखड््द ही महादे- 
वत्याके दिन विशेष करके नव॒प्तीके दिस भक्ति औरनद्धाके | वीके निवेदन करके वाजपेयका फछ पाता हैं। केतझों ओर 
साथ जितने दीपक घीके भरे जछाता है उतनेही सहख्र-। कपूरस सुगन्धित किये पत्रीको जो दुर्धाकों देता हूँ है 
कर्प दुर्ग छोकप्त प्रतिष्ठित होता हे । जो देव और त्राह्न | सजेन्द्र ! वो गयों 5: अजिपति बवाता हे । आम। नारि 
णोंप् दीप देवा है उसका वो उस दीपक दान अक्षय गति- | यछ, खजुर और शिजारा जो दुर्वाक छिप दंतः हैं वो पर- 
को देता हैं । गुड. खांड, घृतका अजञ्न शरकरा और घीसे | मपदको प!ता हैं। सच फडोंकों दतः डु जा कुछ भी अशुभ 
पकाया हुआ अन्न देकर ब्रह्मपद होता है। स्वात्‌ ओर ज्को- | वहीं पाता देबीको द्य हुए भद्वादद पंचकोंस ही प्रसन्न 
के छगता है जिसका “होता है! यह अप है | शाल्योदन, | होजाता हैं। भक्ष्य, सोज्य, छेश्व, पेध और उप्ण ये पांच 
रसाछा, पानक्त और बदरज इनझो जो दुगके छिये देता | अज्ञ ह परमाज्न; पिष्टक, य[वृक, कलर) मादक ओर प्रवक्‌ 
हैं वो शिवराके छोऋको जाता है। शिव्रा यानी दुर्गा | सूप | इन पकाज्नोंको देवीके डिये दे! सहादेवीक डिये सब व्ये- 
शाब्रमें रखाछा बताई है कि-कुछ खट्टे देही शाकरा और | जन सेंट चढाव,क्षी या दिक जज यक्के हों चाह में पके 
पत्रस बनाई हुईं जिसमें कि खूब काछो मिरच डाली गई | हों इन्हें तथा ताम्वूडॉकोी दछर गन्यबक सत्थ आनन्द 
हों वो रसाछा कहाती हैं। यह पित्तका नाश करती है । | करता हैं। विय्गु बममें हिला हुआ है [क-अच्छ त्तार छूग 
र्साचको मिदाती है वित्तको प्रसन्न करती है । वेयकर्मे | 


एवम्‌ संगकौ बस्तुसे रंगेहुए इस बच्जछो हे दुर्ग देवि 
पानक लिखा हैं कि-सढक्का बना हुआ खट्टा मीठा जिसमें | धारण करिये । भविष्य पुराणनें डिखाठुआ हं कि रगे हुए 


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१ श्रद्ुया युक्ते चथा स्थात्तथा । 


ब्रतराज: । | नवभी- 





सूक्ष्मणि च मुदूनि च ॥ यः प्रयच्छति ढुगाये स गच्छति शिवालयम्‌ ॥ यावतस्तन्तवों वीर 
तब बल्लेषु संस्थिता॥ तावद्र लहल्लाणि मोदते चण्डिकागहे ॥ अलड्डारं तु यो दद्याद्वित्रायाथ 
सुराय वा॥स गच्छेदारुणं छोके नानाभूबगनूवित॥ज।तः प्थिव्यां कालेन ततो द्वीपपतिभंवेद | 
विश्णुधमें---विभूषणप्रदानिन राजा भवति भूतले॥ सुवगतिल# यह्तु भगवत्ये प्रयच्छति ॥ 
गच्छति पर॑ स्थान यत्र सा परमा कलछ॥ सोवणें राजते वापि अक्षिणी यः प्रयच्छति॥गोसहस्न- 
फल प्ाप्य खूयंलोऊे महीयते ॥ श्रोगिसूज्मदानेन महीं सागरमेखलाम्‌॥ प्रशास्ति निहता- 
मित्रो मित्रवृद्धया च मोदते ॥ हेमनूपुरदानेन्‌ स्थान सर्वत्र विन्दति ॥ शिवरहस्ये---देदीप्यते 
कनकद॒ण्डविराजितेश्व सच्चामरेः प्रचलकुण्डललुन्दरीनिः ॥ दिव्याड्नास्तनाविराजितभाषिताड! 
कृत्वा तु चामरयुत/म्परवस्रपूजाम ॥ भविष्ये---गेरिकस्य तु पात्राणि हुगाये यश प्रयच्छति॥ 
तस्य पुण्यफले प्रोके तारागणपदं दिवि ॥ गेरिक छुवर्णय्‌ ॥ नि५हकोटिभदानादधि रजतस्य ततो: 
इपिकम्‌॥ हेमपात्राणि यदत्वावृण्य॑ स्याद्रेदुपारगं ॥ ताम्रपात्रप्रदानेन देंव्ये शातग॒ु्ण भवेत॥ 
तस्माच्छतगुणं प्रोक दत्वा मृन्मयमादरात्‌ ॥ ध्ृन्मय॑ कर का ॥ उपस्करप्रदानेन प्रियमाप्नोत्य- 
छुत्तमम्‌॥ उपत्करः पुजा4 धूररीताई पात्रधशादे॥ चंद्रांशुनिमलं स्वच्छ दर्पणं मणिभूपषितम॥पग्मोप- 
शोमितं कृत्वा द्व्यमाल्याठुलेपने! ॥ दुर्गायाः पुरतः कृत्वा विष्णोबों शाह्नरस्य वा ॥ राजसूब- 
फल प्राप्य हेललोक महीपते ॥ इंस थूबः ॥ शिवरहस्थे---दुत्वा तु यः परमभक्तियुतों भवास्ये 
घण्टावितानमथ चामरमातपत्रम्‌ ॥ केयूरहारमाणिकुण्डलभूबितोउसो र॒त्नाजिपो मत्राति भूतल- 
चक्रवर्ती ॥ भविष्ये--शहइडकुन्देन्डुसड्राशं भवालमाणिभूषितम्‌ ॥ हेमदण्डमयं छत्र॑ हुर्गाये यः 
मयच्छाते॥सच्छत्रेण विवित्रण ऊिड्रिणीजालमालिना॥पार्यमाणेन शिरति शिवलोके महीयते। 


विष्णुधरम-यान॑ श्यां मर्णि छत्न॑ पाढुके वाप्युपानहों ॥बाहन॑ गां गृहे वापि जिदशायै प्रयच्छति/ 


पतले कोमल वद्चों को जो दुर्गाक़ो देता है वो दुर्गा ह लो हमे 
चढाजाता है। है वीर ! जितने बन्तु उन वस्ोमें होते हैं 
उतनही हजार वर्ष चण्डिकाके घरमें प्रसन्न होता है । जो 
नाहाण और देवके लिय अलंकार देता है वो अनेक अलं- 
कारोंसे भूषित होकर बरुण छोकको जाता है यदि वहांके 
भोगोंको भोगकर प्रथिवीपर जम्मभी छेता है तो यहां द्वीप- 
पति राजा होता है । विष्णुबममें लिखाहुआ है कि-भूषणके 
दानस भूतछपर राजा होता है । जो सोनेका तिड़क भग- 
वर्तीकों सेट करता है वो उस परमस्थानको जाता है जहां 
परम कछाहप दुर्गा रहती हे । सोने वा चांदीकी जो आंखें 
डुगकि यहां चढाता है वो एक हजार गोदानका फछ पाकर 
छ््य लोक प्रतिष्ठित होता है। जो कमरकी कोंदनी देता है 
२ सदर है मखछझा जिसकी ऐसी भूमिका शासन करता 
है उसका बरी कोई होता नहीं एज मित्रों की वृद्धिसे प्रसन्न 
हॉता है हेसके नूपरोंक दान करनेसे सब जगह स्थान श्राप 
फरता हूं,शिवरहस्यमें छहिखा हुआ है कि-जो चमरके साथ 
इन्द्र वल्चों ते देवीकी पुजा करता है बह सोनेके दण्डे रूमे 
है५ अच्छे चामरोत्ति एवम्‌ हिल रहे हैं कुण्डल जिनके ऐसी 
हलक ५5 0 कल 8 होता दे तथा उसका शरीर द्व्यि 
अधि लक *रहनेवाले भूषणोंसे आषित रहता है। 
देदा है उसके हे हुआ-है कि-जो भेस्किके पात्र दुर्गाको 

उम्यक्ना फछ यह है कि, उसे तारागणोंका 


स्थान मिलता ६ । गेरिकस्तोनेकों कहते हूँ । रजव्े कोटि 


निष्क देनेस जो फल होता है बह हे वेदपारगे ! हेमपा- 
त्रोंके देनेस होता है। तॉबेके पात्र देंनेसे सौगुना होता है। 
उससे भी सौगुना अधिक तब होता है जबकि मिट्टी *ही 
देता है पर देता है आदरके साथ । वे मिट्टीके पात्र कखे 
आदिक होने चाहिये | उपस्करके दानसे श्रेष्ठ इृष्टको पाता 
है | पूजाके छिय धूप, दीय ओर घटपात्रादि हों उन्हें उ५- 
सकर कहते हैं।चन्द्रमाकी किरणोंकी तरह निमछ मणियोंते 
विभूषित दृपणकों पद्मॉंसे सुशोमित करके दिव्य माल 
और अलुलेपनोंके साथ शिवके वा विष्णुके सामने रखकर 
। सामच रछ 

हेसलोकर्म प्रतिष्ठित होता हें । हँस सूथ्यको कहते है | 
शिव रहस्यमें डिखा हुआ है कि-जो भवानीके लिये घढ। 
वितान, चामर और आतपत्र ( छत्र ) चढाता हैं वो कहूढ 
हाल और मणि कुण्डलोस विभूषित होकर रत्नोंक/मालिक 
एवं भूतलछका चक्रवर्ती होता है. । भ्रविष्यपुराणमें दिखा 
हुआ हैं कि-शैख, कुंद और इन्दुके समान एवम्‌ अवाढ 
और मणियोंसे विभूषित हेमके दण्ड पडे हुए छत्रको जो 

दुर्गाकी भेंट 'करता है वह किंकिणियोंके जालोंकी मा 
लगी हुई है जिसमें ऐसे विचित्र शिरपर धारण कियेसच्छ 
त्रसे शिव छोकमें प्रतिष्ठित होता है । विष्णुधमेमें भी दिखे 
हुआ है, यान; शय्या, मणि, छत्र उपानत्‌, पाठुका: बहिन) 
गो और गृह इसमें जो एकसी देवको देता है वो उसएकक 


ब्रतानि, | क्‍ 


_भाषाटीकासमेत ( ३४५ ) 





एकेकस्मादवाप्नोति वद्धिद्रोमफर्ल शुभम॥न्नविष्ये--ताम्रदण्डविचित्रे वे हुगोये यः प्रयच्छति 

स गच्छाति पर स्थान मातृणां लोकपूजितम।हिमदण्ड विचित्र वे चार यः प्रयच्छति ॥ वायु- 
लोक समासाय ऋडढते वायुना सह ॥ आयायाश्वामरं दस्वा मणिदण्डनिभूबितम्‌॥ सुवर्णसूप- 
चित्र वा दुर्गालोके महीयते भयूरापच्छव्यज्न नानारबाज या शनेंद | अगवत्य नरो द्त्वा 
लमेद्वहुसुवर्णकम्‌॥ तालश्न्तं महावबाहो चित्रकमोपशोमितम्‌ ॥ भगवत्ये नरो दत्ता वेब्ण- 
बस्य फल लमेत्‌ ॥ 5ष्णदो यज्ञ/॥ घग्ठां निवेदयद्य सतु लभते वाजिछत फलम्‌ ॥ हिनल्ति देत्य- 
तेजांसि स्वनेनापू्य या जगव्‌ ॥ खा घण्दा पाठु नो देवि पापेभ्योपनः सुतानिव ॥ इति संपूज्य 
घण्टांनिविदयेत ॥ अनः शक्रद्मात्तरीति कोश ॥ आदित्यवुराणे--यः शबख्पां तु प्रयच्छेत देवष च 
गरुष्वाप ॥ ज्ञानवृद्धव वश्षतु दाता न नरक्ष ब्रज्त्‌ ॥ भविष्ये---रत्नोप हर जय का सारदाशह- 
मी शुभाम ॥ शय्यां निवेदयद्यत्तु भगदत्यं नराधिष ॥ हुकूलबरल्यतन्तूतां परिसंख्या तु 
यावती ॥ तावद्रबसहझ्लाणे हुगोलोके महीयते ॥ पिष्जुधर्म---पाइुकासनदानेन भगवत्ये क़तेन 
तु॥ अप्निष्टो मफर्ल आप्य विष्णुलोके महीयते ॥ यो गां पयाल्विनीं शुद्धां तरूणीं शीलमण्ड- 
नाम ॥ मगवत्ये नरो इष््यादश्यमेधफल लमेत्‌ ॥ वृषभ परिपृर्णाइसदासीन शशिप्रमम्‌ ॥ 
यरतु दब्यानव्नरों भकत्या मगवत्य सकुब्वरः॥ यावन्ति रोमझूपाणिद्रषद्हस्थितानि तु ॥ तावत- 
कल्पसहस्राणि रुद्॒लोके महीयते ॥ सुविनीतां स्विप॑ दासीं श्ुत्यकं वा नराशिप ॥ प्रयच्छति 
च्‌ दुर्गाये रांजसूपाशथ मे उज्ाकू ॥ विष्णु वर्मं--अधिपाद्य तथा ककत्या ध्वज जिदशवइमनि 

निदेहत्याशु पापने महापातकन्नागपि ॥ सविष्ये--ध्वर्ज श्वेतपताकाइयमथवा पथ्चरक्षिकम ॥ 
किड्िगीजाललंबीतं खेतपद्मोपशोमितम्‌ ॥ दत्वा देव्ये महावाहों शकऋलोछे महीयते॥ ध्वज- 
मालाकुल यस्तु कुषांद चग्डिकालयमब॥महाध्वजाष्टर्क चापि दिशासु विडिशासु च ॥ कलपानां त 
शत साम्र दु्गोलोके महीयते।यावद्धलुः्भममाणेन पताका प्रतिपादिता ॥तावदष घहलाणि दुर्गा 





देनपही अप्निश्रोमका फछ पाता हे वो माठकाओंके उस 
स्थानको प्राप्त होता हैं; जिसे छोक पूजता हैँ । जो बिचित्र 
हेम दण्ड और चामर देवताके छिय देता है बहवायुलो हमें 
पहुंचकर उसके साथ आनन्द करता हूँ, जो दुर्गाको मणि 
दण्डस विभूषित चामर देता है वो सुवणके समान झुन्दर 
दुर्गाक छोकमें प्रतिष्ठित होता हैं। मोर पंखक बीजनेकों 
अनेक रत्नोंसे सजा भगवतीके लिये दे बहुतला सुवर्ण प्राप्त 
करता है । जो मजुपष्य हे महाबाहो |! कसीदेका काम किया 


पाता हैं । वेष्णब यज्ञको कहते ह जो देवीके घटा चढाता 
हैँ वो बांछित फल पाता हैं। जो खवनसे जगतको पूरकर 
दृत्योंके तेजको नष्ट करती हे वो घंटा पापोस हमारी इस 
प्रकार रक्षा कर जेसा मां बेटोंकी रक्षा करती ह,इस मंत्रस 
घंटाक़ों पूजकर चढावे । अनस्‌ शब्द, शकट ओर मातामें 
बतेता है। आदिल पुराणमें लिखा हुआ है कि-जो देव, 
गुरु, ब्राह्यम ओर ज्ञानवृद्धोंकी शय्या देता है वो दाता 
नरक नहीं जाता । भविष्यपुराणमें रछिखा हुआ हें कि 
रत्तके उपकरणोंक साथ सार काठकी बनी हुईं अच्छी 
शय्याको हू नराधिप ! जो भगवतीकी सेंट करता है 
जितनी दुकूछोंके वल्लोंके शत्रुओंको सेख्या है उतने हजार 

५ दुर्गाक छोकमे विराजता हैं। विष्णुधममें छिखा हुआ 





| हैं कि, भगवतीक लिये पादुका और आसनके दान करनेंस 
| अभिष्टोमके फछको पाकर जिप्णुछोकरमें प्रतिष्ठित होता है 

| जो मनुष्य दूध देववाली सुशीर शुद्ध तरुणी गायको भग- 
| वतीक लिये देता है वह अश्ववंघके फऋछको पाता है | जो 
| मनुष्य चांदकी चांदनीको तरह सफेद भरे हुए उदासीन 


सॉडको एक वारभी भगवतीके लिय दे देता है बह उतने 


| हजार क॒टप रुद्रके स्‍्वगरभ रहता हैं जितने कि, उस सांडके 


| शरीरम रोमकप होते हैं। हे राजन्‌ | जो भडडी भांति नम्न 
हुआ तालबुन्त भगवतीकी सेट करताहे वह वेष्णवक्के फछूको 


हुईं दासी ख्रीकों अथवा किसी दासको चण्डिकाके लिये 


| देता हैं वो राजसूय और अश्वमेघक फछको पाता है। 


बेप्णुधनमें लिखा हुआ है कि, चाहें महापावक्रीदी क्‍यों न 


| हो जो दृवस्थानपर ध्वजा छगावा है वह अपने पार्पोको 
| शीघ्रही नष्ट कर डालता हें । भविध्यपुरागमेँ लिखा हुआ 
| हैं कि-सफेद वद्धक्ती वा पां वरंगकी ध्वजा जिसमें किकिणी 
| ओर सफेद कम छगा हुआ हैं वह देवीके छिय दे ऋर 
| है महाबाहो ! इन्द्रके छोकमें श्रतिष्ठित होता ६ । जो ध्वजा 
| और माकाओँसे छद॒पद चंडिकराके रंदिरकों करता हें 

| अथवा आठों दिशाओंमें जो बडी बडी ध्वजाएं चढाता 
| हैं बह समग्र सौकल्प दुर्गाके छोकमें प्रतिष्ठित होता है 

| घनुक प्रमाणकी जिसने पताऋा चढादी वह उतनेही हजार 
बंप दुर्गाके छोकम प्रतिष्ठित होता है । घतनु चार हाथका 


( ३४६ ) 


बतराजः । निंकगी 


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लोके महीयते | चतुहंस्‍त पु! ॥ कालि झापुराणे---प्रभूतवलिदान च नवम्पाँ विधिवच्चरेत। 
कृष्माण्डमिक्ुदण्ड च मद्ममांसानि चेव हि॥ एते बलिसमाः भोक्ताश्तृत्तों छागसमा मताः। 
भविष्ये---न तत्र देशे दुनिश्षे न च दुःख प्रवतेत॥ ना काले प्रियते कश्चित्‌ पूज्यते यत्र चण्डिका॥ 
शरत्काले महाष्टम्यां चण्डिकाँ यः प्रपूजयेत्‌ ॥ विमानवरमारुह्म मोदते ब्रह्मणा सह ॥ अथावर- 
पुजा-देव्या दक्षिण सिंह मपूज्य पूर्वादिक्रमेण। # ही जयन्त्ये नमः। ऊँ दीं मड्लाये नम३ ऊ हो 
काल्ये०ऊ हीं भद्रकाल्ये न०। दीं कपालिन्ये० ३ दैं। हुगांये०।७ हीं क्ष माये ०।ओं है। शिवाय 
ओं हो धाउ्ये "ओं है| स्वाहाये०इति प्रथमावरणम्‌ ॥ आओ है स्वधाये०१ओं हीं उप्नरचण्डिकाये० 
ओं हीं प्रचण्डाये० ३ आओ ह्वी स्वाहाये० ४ आओ ह्रीं प्रह्यये० ५ ओऑ हीं चण्डवत्ये० ६ ऑ हैं 
चण्डरूपाये० ७ ओंद्वी उग्रदृष्टाय० ८ ऊद्ढीं महादंष्ट्रायेण ९ आओ द्वी दृष्ट्राकरालाये० १०। इति 
द्वितीयावरणम्‌ ॥ ओ हीं बहुरूपिण्ये” ओ हीं म्रामण्ये० ऑ हीं भीमसेनाये० आओ हीं विशा 
लाक्ये? भ्राम्य० मद्ठडलाये० नन्दिन्ये० भद्राये० लक्ष्म्ये० भोगदाये० इति तृतीयावरणम्‌ | 
पृथिव्ये० मेधाये” साध्याये० यशोवत्ये० शोभाये० बहुरूपाये० धृत्ये० आनंदाये० सुनंदायै' 
नन्‍्दाये० इति चठुथोबरणम्‌ ॥ क्रय चुुधच्ठि देव्य:---विजयाय० मड़नलाये० महीशत्येः शिवाये' 
क्षमाये” सिद्धचे० तुष्ठये० जयाये० पुष्टये० ऋद्धचे० रत्ये० दीप्त्येण कान्त्ये० पद्माथि० लक्ष्म्यै 
ईंश्वथें०बृद्धिदाये० शक्‍्त्ये० जयवत्ये० ब्राहये : जयनत्ये० अपराजित|मे ० अजिताये० मानिः्ये' 
चेताये० दित्ये० मायाये० मोहिन्ये० रतित्रियाये० लालसाये० ताराये० विमलाशै' 
कौमायें० शरण्ये० गोरूपिण्ये० क्षमाये० मत्ये० दुर्गाये० क्रियाये० अरून्धत्ये ० घण्टाये० करा- 
लाये० कपालिन्ये० रोथे० कालिकाये० तिनेत्राये” खुरूपाय्े० बहुरूपाये० रिपुहरूये 
अंबिकाये० चर्चिकाये० देवपूजिताये० वेवस्वत्ये० कौमार्ये० माहेश्वर्य० वेष्णव्ये० महालक्ष्म्य 
काल्ये० कौशिक्ये० शिवदूत्ये० चाम्ुण्डाये० शिवत्रियाये० हुगोगै० महिषमर्दिस्थे० ॥ ९४॥ 
बिक के को घर... जे कु के रे, हक 
जय मातर:--बाहय० महिश्वर्य०कौमायें० वेष्णव्ये० वाराह्मे० इन्द्राण्ये० चास्ुण्डाये० मध्ये महा- 





होता है। कालिका पुराणमें लिखा हुआ हे कि नवमीके | महादुष्ट्रा, दृष्ट्र, कराछा इनसे दूसरेकी तथा बहुरूपिणी, 
दिन विधिके साथ बहुतसा बलिदान करे। क्ुष्मप्राण्ड, | म्रामिणी, मीमसेन, विशालाक्षी, आम री, मह्ुछा, नेदिनो 
इंखके दण्डे और मद्य मांस ये बलिके बराबर हे एवं | भेद्रा, लश्मी, भोगदा, इनस तीसरे आवरणकी; एवित्री 
हप्तिंम छागके समान हैं। भविष्य पुराणमें लिखा हुआ | “० साध्या, यशोवती, शोभा, बहुरूपा, श्रृति, आनन्दा। 
20:250202॥055%5 5 
न तो कोई दुख होता है एवं न अकालही पडता है न | नहीं छगाया है।डसे छगाना चाहिये। चॉसठ देवी-विजय! 
असमयमें किसीकी मोतही होती हे। शरतऋतुममं महा- | संगढछा, महीध्ृति, शिवा, क्षमा, सिद्धि, तुष्टि, जया, पुष्टि 
अष्टमीके दिन जो चंडिकाका पूजन करता है, वो अच्छे | ऋद्धि, रति, दीप्लि, कान्ति, पद्मा, लक्ष्मी, इश्वरी, वृद्धिंदा 
विमान पर चढकर त्रह्माके साथ आनन्द करता हैं। अथ | शक्ति, जयबती, ब्राह्मी, जयन्ती, अपराजिता, अजिवा! 
आवरण पूजा-यह देवीके दक्षिणमें सिंहको पूजकर पूरबसे | मानिनी; श्वेता, दिति, माया, मोहिनी, रतिप्रिया, छाढस, 
प्रारंभ करनी चाहिये | आवरणका अर्थ हम पहिले लिख- | तारा, विमछा, कौमारी, शरणी, गोरूपिगी, क्षमा, मत! 
चुके हैं | पहिले आवरणोंकी पूजा बीज युत नाममंत्रसे देखी | दुर्गा, क्रिया, अरुन्धती, घंटा, कराडा, कपाडिनी) रोदी' 
जा रही है।मूछमे पहिला नामसंत्र पूरा द्यिा है। पीछे आगे | कालछिहा, त्रिनेत्रा, सुरूपा; बहुरूपा, रियुदंत्री, अंबिका 
ही नमः की जगह विन्दुही रखा है, ओम्‌ प्रणव तथा | चचिका;देवपूजिता, वैवस्त् वी, कोमारी, माहेश्वरी; वेष्णवी 
का ज्ञह हे नम. छगा हुआ नाममसन्र है । जयन्ती, | महा उध््मी,काली,को शिकी, शिवदू- न्‍ चामुण्डा, शिवश्रिय, 
हट ! मल, भद्॒काली, कपालिती, दुर्गा, क्षता, शिवा, | दुर्गा, महिषमर्दिनी । ये सब चतुथ्यन्त रखे हुए हैं। इन 
) हे जद इससे पहिछेकी, स्वधा, उम्रा; चण्डिका, | अन्तमें नमः तथा आदि ओम्‌ और हीं लगाना चाहिये | 
भें चुछ हु, स्वाहा ) नही, - संण्डवत्ी, चण्डरूपा, उम्नदृष्द्रा, मातरः “जी, ॥ माहेश्वरी, कोमारी, वेष्णबी: बाराही। 


छ् 


ज़तानि, | भाषाटीकासमेतः । ( ३४७ ) 










७/१३/४श ०४5: म छा पक २75: 2 











लक्ष्म्मीण। ततः कालि कालि स्वाहा हृदयाय नमः ॥ इत्यप्रीशानानिऋतिवायव्यकोणेडु॥ कालि 
कालि लोहदण्डाये स्वा० ॥ अश्याय फट्‌ ॥ कालि कालि लोहदण्डाये स्वाहा नेत्रे पुरतः॥! 
भथ पश्चक्राणि ] ईशानाये० शिरत्ति० कालि कालि तत्पुरुषाये० मुखे ॥ वजेश्वरीघोराये० 
हृदये० लोहदण्डाये० वामदेवाये०” पादयोः स्वाहा ॥ सद्योजातायें० स्वोद्भे” अथ जाबुधानि 
दक्षिणोध्वैकरादि० ॥ त्रिशुलम ॥ खड़म्‌ ॥ बाणम्‌ ॥ शक्तिम ॥ वामे खेट्म पाशम॥। 
अंकुशम्‌ ॥ घण्टाम्‌ ॥ ततो वज्ननखद॒ष्ट्रायथाय महासिहासनायथ ओं हुं फट नमः ॥ इति 
सिंहम्‌ ॥ महिषासनाय० नागपाशाय० इते नाममन्त्रेः पूजा कायो। भविष्ये- वर्ष: प्मसह- 
ज्नैस्तु यत्पापं समुपार्जितम्‌ ॥ तत्सव विलय याति पृताभ्यद्वेन वे नप ॥ पृतेन पयसा दुक्ना 
ज्ञापयेच्वाग्डिकां नृप ॥ निम्बपत्रेश्व ग॑न्धाव्येधघेषयेद्यत्नतस्ततः ॥ इति $दुर्गाभक्तितरद्विण्यां महा- 
नवमीदुर्गापूजाविधिः ॥ 
अथ अक्षग्यनवप्ती || 

अथ कार्तिकशुक्कनवम्पां अक्षय्यनवमीत्रतकथा--वालखिल्या ऊचुः ॥ कार्तिके शुक्रनवमी 
तत्राइभूहापरं सुगम ॥ पूर्वांपराहगा आह्या क्रमादानोपवासयोः ॥ १॥ अजच्रकृष्माण्डको नाम 
हतो देत्यस्तु विष्णुना | तद्रोमानेः समुद्भध्ता वल्‍्ल्यः कृष्माण्डसंभवा॥ २ ॥ तस्मात्‌ कृष्मा- 
ण्ददानेन फलमामोति निश्चितम्‌॥ कूष्मार्ड पूजयेच्चेव गन्धपुष्पाक्षतादिना ॥ ३॥ यद्चरत्नः 
समायुक्त गोवुतेन समन्वितम ॥ फलात्रदक्षिणायुक्त बाह्मणाय निवेदय्रेत्‌ ॥ ४ ॥ कृष्माण्डं बहु- 
बीजात्य॑ बरह्मणा निर्मित पुरा ॥ दास्यामि विष्णवे ठुम्ये पितृर्णां तारणाथ च ॥५॥ देवस्य 
त्वेति मन्त्रेण पितणां दत्तमक्षयम्‌ ॥ अस्यामेव हुढ्टीविवाह:अस्यामेव नवम्याँ ठ कुंयात्‌ ऋष्ण स्यथामेव नवम्यां तु कुर्यात्‌ कृष्णे 


इन्द्राणी, चामुण्डा ओर बीचमें महारूक्ष्मीके छिये नमस्कार | 


है। इसके वाद हे काली ! हे काली ! तेरे लिए स्वाहा हें 
दृदयके लिए नमस्कार इससे अग्नि “ईशान और निऋति 
और वायबव्य कोणोंमें, हे कालि ! है काहि ! तुझ छोह- 
दण्हाके लिए स्वाहा है, अख्नाय फट, हे काछि ! हेकालि ! 


भ्थ पांचचक-इंशानाके लछिए नमः शिरपर काढछि काछि 


तत्पु, इस मन्त्रस मुखपर, वजेश्वरी घोराके लिए नमस्कार | 


इससे हृदयमें छोहदंडाके लिए बामदेवाक लिए पदोंमें 


को सीधेमें एवं वायेम खेट पाश अंकुश और घण्टाकों 


सिंहपर बैठी हुयी भगवतीक लिये हैं फट और नमः है 
इससे सिंहको, महिषासन लिये नागपाशके लिये इन दोनों 


नृप ! पद्म सहख्रवर्ष जो पाप इकद्वठा किया है वो सब पाप 
पयसे और दूधसे चण्डिकाको स्नान करावे। सुसन्धित 


निम्बपत्रों से चचित करे यह दुगां मंक्ति तरेंगिणीमें महा- 
सबमी विधि कही हें । 


१ तांब्रिफ विषय समझकर व्रतराजनेभी विशेष परिस्फुट नहीँ क्‍ हे दे 
। कार्तिक शुक्लानवमीके दिन जलितनिद्रिय होकर तुल्सीसहि 


लिखा है न हमारीही इच्छा है । 





अक्षय्यनवमी-कार्तिक शुक्ला नवमीको कहते हैं। अब 
उसके ब्रतकी कथा लिखते हैं। कार्तिक महीनामें शुक्ला- 


| नवमी आती हैं। इसी दिल द्वापरका प्रारम्भ हुआ था। 
| वो दानमें पूर्वाह व्यापिनी तथा उपवश्ससे अपराध व्या- 


हक. मो जम पिनी लेनी चाहिये ।| १ ॥ आजके दिन ,विप्णु भगवानने 
तुझ लोहदण्डाक लिए स्वाहा हैं, इसस नंत्रॉर्क सामन | | फ्ाण्डक देत्यको मारा था उसके रोमसे कुप्साण्डकौ बेल 
| हुयी ॥ २ ॥ इसकारण कुप्म्राण्डके दानसे उत्तम फलूपाता 
| है यह निश्चित है, इसमें गन्ध, पुष्प और अक्षतोंसे कुष्मा- 


| ण०्डका पूजन करना चाहिये ॥ ३॥ प्चरत्न, गोघृत, फल, 


हर १ ७७ पा 
स्वाहा है “सद्योजाताये” इससे सवाज्ञमें, आयुध दाये | ५ और दक्षिणाकें साथ उसे ब्राद्मणकों देंदे | ४॥ 


कक आर कप ५ शक शूर । जोकि श | 
और वायें आदिके कहे जाते हैं । त्रिशुछ, खद्भ, बाणशक्ति | बहुतसे वीजोंके साथ अद्माने कुप्माण्ड ( काशीफट बॉ) 
कई नके | को इस लिए बनाया कि पितरोंके उद्धारके लिये विप्णुको 
इसके वाद वज जैसे नख और दाढोंके आयुध वालो महा | हि हक हर 


दूंगा । ५ ।॥ “ ओं देवस्थ व्वा सवितु: प्रवस5खिनोबोहु- 


| भ्याम्‌ पृष्णो हस्ताभ्याम्‌, अम्ये जुष्टे ग्रह्ममि अम्नीषोमास्यां 
के व नावहा है कि हे | जुष्ट गृह्मामि” में सबके उत्पादक देवकी आज्ञार्मे चलता 
नाम मंत्रोंस पूजा करनी चाहिये । भविष्यम कहा है कि हे | हुआ हे कुप्साण्ड ! अश्विनीकी बाहुओं तथा पूषाके हाथोंसे 
कु ५ म 5 | ७ | अभिके जुष्ट ( प्रीति विषय ) तुझको प्रहेण करता हूँ अप्नि 
इठका अभ्यज्ञ करनेसे नष्ट हो ,जाता हे । है हप : इंतस | और सोमक छिए कामिव तुझे प्रहण करता हूं । इस मंत्रसे 
(दिया पितरोंके रिए अक्षय होता हैं। मलुष्यको चाहिए कि 
| इसी नवमीके दिन कंष्णको नमस्कार करे ॥ ६ ॥ अपनी 


| शाखाके विधानके अनुसार तुलसीक् विवाह कराये । 


उसे कन्यादानका फछ होता है इसमें सन्देद्द नहीं हें ॥७॥ 


१ झेरचेयद्ति पाठः | 


ब्रतराजः। [नवमी- 















नमो नरः ॥ ६॥ स्वशाखोक्तेन विधिना तुलस्या; करपाडेनम्‌ ॥ कन्यादानफर्ल तस्य जायते 
तात्र संशयः ॥ ७ ॥ कार्तिके शुक्लनव्मीमवाप्य विजितेन्द्रियः ॥ हरि विधाय सोवर्ण तल्स्या 
सहित शुभम्‌ ॥ ८ पूजयेद्विघिवद्धकत्या ब्रती तब्र दिनत्रयम्‌ ॥ एवं यथोक्तेविधिना कुययाहि- 
वाहिक विधिम्‌ ॥ ९॥ आय ज्िराजमत्रेव नदस्था अतुरोधतः॥ मध्याहव्यापिनी आह्या नवमी 
पू्वदधिता ॥ १० ॥ धाचज्यश्वत्थो च एकत्र पाल्यित्वा सझुद्दहेत्‌ ॥ न नश्यते तश्य पुण्य कहप- 
कोटिशतेरपि॥ ११ ॥ अन्रेवोदाहरन्तीमोमतिहासं पुरातनम्‌ ॥ बभूव विष्णुकाच्च्यां त॒ क्षत्रिय: 
कनकामिधः ॥ १२ ॥ धनाव्यो वेश्यवृत्तिश्व बेष्णवो राजपूजितः ॥ बहुकालो गतस्तस्य विना- 
पत्य॑ छुनीववराः ॥ १३ ॥ ततो नानावलेजाता कन्या कमललोचना॥ सुरूपा लक्षणोपेता नाना 
गुणसमन्विता ॥ १४ ॥ पिता तस्यथा नाम चक्रे किशोरीति च विश्वुतम्‌ ॥ एकदा तद्गहं यातो 
जन्मप्रनिरीक्षकः ॥ १५ ॥ दशंयित्वा जन्मपत्न कथ्थ कन्या भवेदियम॥इति पृष्ठः क्षणं ध्यात्व| 
कनक श्रणु मे बच दायदि बदीमि सत्य॑ चेत्तव ढुःखं भविष्यति ॥ यद्यसत्यमहं बयां मिथ्या- 
त्वं मम जायते॥१०॥तस्मात्‌ सत्य वदिष्याति रोचते यत्तथा कुर ॥अस्याः करमत्हं कुर्याद्योहसो 
वज्नान्मरिष्यति ॥१८॥ इति तद्गचन शुत्वा कनको दु/खितोइ्नवत ॥ विवाह न चकारास्याः 
सा च बाह्मणपूजने ॥ १९ ॥ नियुक्तान्यदगहं दत्वा नानेया मन्सुखाग्रतः ॥ दृ्टेमाँ रूपसंपत्नां 
ढुःखं मेपद्धा भविष्याति ॥ २० ॥ स्थित्वान्यस्मिव गहे सा तु द्विजातिथ्यमचीकंरत्‌ ॥कदाचिदेव- 
योगेन तत्रागादविजपुद़़वः ॥ २१ ॥ यात्रा विष्णुऋजच्च्यां तु वेशाखे मासि शड्गरः ॥ कनको 
विभप्रशुश्रषी ज्ञात्वातेच समागतः॥ २२ ॥ आगत्याड्रणमध्ये तु उपविष्ठो द्विजोत्तमः ॥ २३॥ 
किशोपयागत्य चातिथ्यं शड्रस्य कृतं तदा॥२शाहष्ठा तां तरुणीं नम्जां सुवेषां विनयान्विताम। 
अजातकरपीडां च॒ सखीं दृष्ठाभ्युवाच सः ॥२५॥ शह्भगर उवाच ॥ चह्दने बद शीत त्व॑ किशोर 





भाषी हो जाऊंगा ॥। १७ ॥ इससे सच्ची कहूँगा पीछे जे 
तुझे दीखे सो करना। जिसके साथ इसका विवाह होग 
वो इसका पाणिग्रहीता विजल्ीके गिरनेसे मरेगा ।.१८। 


सॉनेके भगवान्‌ बनावे ॥ ८ ॥ पीछे भक्तिपूबंक विधिके 
साथ तीन दिनितक पूजन करना चाहिए एवं विधिक साथ 
बिवाहकी विधि करे | ९॥ नवमीके अनुरोधसे यहांही 
तीन रात्रि ग्रहण करनी चाहिये, इसमें अष्टमी विद्धा मध्या 


हृव्यापिनी नवमी छेनी चाहिय ॥ १० ॥ धात्री और अश्व- 
त्थको एक जगह पाठकर उनका आपसमें बिवाह करावे। 
उसका पुण्यफछ सो कोटि कल्पमें भी नष्ट नहीं होता 
॥ ११ ॥ इस तिषयम एक पुराना इतिहास कहा करते ह- 
विष्णुकांचीमें एक कत्तक नामका क्षत्रिय था। १२ 0 वो 
घनाव्य था व्यापारादि करता था। राजस उसका मान था । 
वेष्णव था। है मुनी इवरो ! विना सन्‍्तानके उसे बहुतसमय 
हो गया ॥ १३॥ अनेकों ब्रतोंके करन्के वाद उसके एक 
कमलनयनी कन्या उत्पन्न हुयी । वो सुन्दरी सब छक्षणोंसे 
युक्त एवम्‌ सवंगुणसम्पन्न थी ||१४॥ पिताने उसका नाम 
किशोरी रखा, एक दिन एक जन्मपत्नी देखनेवाला चला 
आया।॥ १५ || उसके पिताने उस जन्मपन्र दिखाकर पूछा 
कि ये लडकी केसी होगी ? पीछे कुछ देर शोचकर वो 
वोढा कि; हे कन॒क ! मेरे वचन घुन ॥ १६ ॥ यदि में सच्ची 

* बात कह दू तो तुझे दुःख होगा जो झूँठ बोदूँ तो मिथ्या 


उसके ऐसे वचन सुनकर पिता दुखी हुए और उसके 
विवाहही न किया किन्तु उसे ब्राह्मणोंके पूजनम ॥ १९। 
नियुक्तकर दिया उसे दूसरा घर दे दिया, और यह कह 
कि रूप सम्पन्न इसे देखकर मुझे अवश्य दुख होगा इ 
कारण इसे मरे सामने ही न आने दो॥ २० ॥ वो दूस 
घरमें रहकर ब्राह्मणोंकी अतिथिचर्या करने छगी, सं 
दिन देव योगसे वहां एक श्रेष्ठ ब्राह्मण चछा आया ॥९१| 
वो विष्णु काअ्वीमें वेशाखके महीनेमें आया था उस$ 
नाम शेकर था । कनकको ब्राह्मणोंकी सेवा करनेका शो' 
था जानकर वहां पहुँचा ॥]२२॥ वो ब्राह्मण आगण 
आकर बैठ गया ॥ २३ ॥| उस समय किशोरीने आई 
सड़रका आतिथ्य किया ॥ २७॥ वो ब्राह्मण 5 
नम्न सुवेशवाली विनययुत अविवाहित तरुणीको देस् 
कर उस सखीसे बोझहा ॥ २५॥ इंकरजी बोलछे** 
हे चन्दन ! तू जल्दी कह कि, किशोरीका के 


१ अन्नवीदिति शेष: । 


ज्रतानि, | 


भाषाटीकासमेत: ! 


( ३४९ ) 














के 


न विवाहिता ॥ किमत्र कारण जाता तरूुणी कामरूपिणी ॥ २६॥ इते तद्बाचनं श्व॒त्वा 
चम्दना सवमब्रवीत॥ तदा कृपाठुना तेन तत्पित्रमे निदेंदितम्‌॥ २७ ॥ अस्ये मंत्र प्रयच्छामि 
श्रीविष्णोद्रोदशाक्ष रम्‌ ॥ करोठ वष॑त्रितथं जपमस्य सुलोचना ॥ २८ ॥ प्रातःस्लानदती चास्तु 
तुलसीवनपालिका ॥ कातिकस्य एिते पक्षे नवम्यां विष्णुना सह ॥ २९ ॥ सौदर्णन तलस्याश्व 
विवाह कारयात्वियम्‌ ॥ तेन व्रतम्रभावेण विधवा न भविष्यति ॥ ३० ॥ तात्पिशापि तथेत्यक्ते 
प्रयथ्वित्त स दत्ततान ॥ किशोर्ये वेष्णब॑ धर्म समग्र चादिदेश सः ॥॥|३१२ ॥ द्विजेन तन 
यत्मोक्त किशोयेपि तथाकरोत्‌ ॥ वर्षत्रयं यथाशासत्र किशोरों तद्गतं क्ृतम्‌ ॥ २२॥ चलर्थे 
कार्तिक मासि किशोरी ह्लपनाय च॥ प्रातःकाले गता बाला तस्मिन्मागें खुलोचना॥ ३३ ॥ 
क्षेत्रयिण यदा दृष्टा माप मोह जडात्मकः ॥ प्ष्ठे तस्यास्तु संलमो मावयस्तामनिन्दिताम॥३०श)॥। 
केचित्तां दद्शुद्रात्‌ केचित्‌ पश्यन्ति शातित३ ॥ छ्वियो5पि तां प्रपशयन्ति पुरुषाणान्तु का कथा 
॥ ३५ ॥ यथा द्वितीयाचरद्वस्य दर्शने चोत्सुका जना; ॥ तथा रात्रों प्रतीक्षन्ति तहारे सकला 
जन ॥ ३२६ ॥ तिमेषमात्रमकेंण दृष्टा स्थित्वा तु बालिका ॥ अधिक कि वर्णनीयं तत्सोन्दर्य 
मुनीखवरा: ॥ ३२७ ॥ कचिद्ददन्ति देवीय॑ नागकन्येति चापरे॥ रूद्रसंमोहनार्थाय जाता सा 
किल मोहिनी ॥ ३८ ॥ सा न पश्यति लोकांश्व न मार्ग न सख्ीगणम्‌ ॥ ध्यायन्ती हृदये विष्णु 
तुलसी देवरूपिणीम ॥ २५ ॥ तां गृहीतुं मनश्चक्रे विलेपी द्वव्यवान बली ॥ नानातेदाः कूता- 
स्तेन न लेमे चान्तरं कछचित ॥ ४० ॥ मालाकझाश्म्िहं गत्वा तस्ये द्रव्ययमयच्छत ॥ येन केन 
प्रकारेण किशोर्या सह सड़्म$ ॥ ४१ ॥ यथा स्थात्कियताँ भद्े देयमस्माचतुगुणम्‌ ॥ अतिमासे 
किशाया दीयगानादइव्यादविरक ददामीत्यवें! ॥ तया च जिविधोपाया इृष्टास्तदम्रहणाय च॥। ४२॥ 
न ददर्श तथोपायमवदत्सा विलेपिनम्‌ ॥ न दृहयते मयोपायस्त्वया यत्मोच्यतेईयुना॥ मया 





न्‍सरलरन->नमनननतन्‍न्‍५म्भत- 





तदेव कतेव्य॑ द्रव्यग्रहणछिद्धये ॥ ४३ ॥ विले 


विलेप्पयुवाच.॥ तव कन्या तु भूत्वाहं नयामि कुछु- 





नहीं विवाह किया क्‍या कारण हे कि, यह सुन्दरी इतनी 
जवान हो गईं ॥ २६ ॥ इंकरके ये वचन सुनकर चन्दना 
ने सब कुछ बता दिया । उस समय उस दयाछुने उसके 
पिताके सासने कहा कि ॥२७॥ में आपकी फन्याको विष्णु 
भेगवानका बारह अक्षरका मंत्र बताता हूँ यह सुनयनी 
उसका तीन वर्ष जप करे ॥२८।॥ प्रातःकाछू स्नान करके 
तुल्सीके वनमें पानी छगाये और कार्तिक शुक्ला नवमी के 
दिय विष्णुभगवानके साथ ॥२९॥ जो कि विष्णु मूर्ति 
सोनेकी हो उसके साथ तुछसीका विवाह कराये उस ब्रत 
के प्रभावसे यह विधवा नहीं होगी ॥ ३०॥ उसके पिता 
ने स्वीकार किया और किशोरीसे प्रायश्वित कराकर 
सपृण वेष्णव धर्म उसे बता दिया ॥३१॥ जो कुछ ब्राह्मण 
कप कह. हक 
ने कहा था किशोरीने वही किया जेसा कि झासमें लिखा 
हैं उसी विधिसे तीन वर्षतक जब्त किया | ३१॥ चौथे 
कातिकर्मे बाछा सुलोचनी किशोरी स्नान करनेके छिय 
पयी उस मार्ग ॥३३॥ उस समय क्षत्रियने देखी वो 
सूख उसे देख मोहको प्राप्त होगया और उस निर्दोषकी 
भावना करता हुआ उसकी पीठसे छग गया ॥३४॥ कुछ 
से दूरस देखते थे कुछ शुपचुप देखते थे ओर तो क्‍या 


१ विद्ेप्याख्येन । 


स्त्रियां भी उसे देखती थीं पुरुषोंकी तो वात ही क्‍या है 
॥३५॥ जसे दूजके चांदको देखनंके छिये लोग द्वारपर 
व्याकुछ खडे प्रतीक्षा करते रहते हैं इसी तरह सब उसकी 
प्रतीक्षा करते रहते थे ॥३६ ॥ हे मुनीश्वरो ! उसकी सुन्द्‌- 
रताकी कहांतक प्रशंसा करें ? एक निर्मेष तो सूचने भी उसे 
खडे होकर देखा।।३।॥कोई उस देवकन्या कहते थे तो कोई 
उसे नागकन्या बताते थे। कोई कहते थ कि महादेवजीको 
मोहनेके लिये मोहिनीने अवतार लिया हैं।३८॥न वो लोकों 
को देखदी थी न मागंको न सखी जनोंकों। वो हृदयमें 
देवरूपिणी तुझली और जिष्गुका ध्यान करती थी ॥३९॥ 

धनवान वली विछेपीने उसे लेनका जिचार किया बहुतसे 
भेद कियेपर उस कोई मोका ही न मिला ॥४०॥ वो 
माढिनिक घर पहुँचा उसे धनदिया कि किसी तरह 
किशो रीके साथ संगम ॥०१॥ कराय तो हे भद्रे ! इससे 
चौगुना दूँगा। यानी जो ठुझे किशोरी देती हे उससे 
अधिक दूंगा। उसने भी बहुतसे उपाय किये पर कोई 
उसके ग्रहण करनेके लिये पार न पडा |।७२॥ जब उससे 
कोई भी उपाय पार न पडा तो वो विलेपीसे बोली कि 
मुझे तो कोई उपाय दीखता नहीं अब जो आप कहें सो 





(३५० ) ब्रतराज: । क्‍ [ नवमौ-- 





मानि च | अग्रे यद्धावि भवतु गहाणाहि शर्त शतम्‌॥ ४४ ॥| तयापि च॑ तथेत्युक्ते सत्तम्यां 
निश्वयः कतः ॥ अष्टम्यां सा गता तत्र किशोरी ताछ॒वाच है ॥ ४५॥ मालाकारि श्वो नवमी 
तुलूस्याः पाणिपीडनम्‌ ॥ वर्तत$तस्त्वयाउनेया सुकुटाः पुष्पसम्भवाः ॥ ४६॥ मालिस्युवाच ॥ 
मत्कन्या चागता म्रामान्रानाकौत॒ककारिणी ॥ यद्यत्पोक्ते त्वया बाले समानेष्यति सत्वरम्‌ 
॥ ४७ ॥ तयापि च तथेत्युक्ता मालिनी स्वग॒हं ययथो ॥ कथितः सवंबत्तान्तों विलेप्यग्रे ततो- 
_म्वत्‌ ॥ ४८ ॥ प्राप्ता मयेन्द्रपदवीत्येवं सुखमवाप सः ॥ मालिन्या रचिता रात्रों सुकुठा विवि- 
धास्तदा ॥४९॥ विष्णुकारूयाँ तदा राजा जयसेनो बभूव हु ॥ तस्य पुत्रों सुइन्दो$भूत्सूयभक्ति- 
परायणः ॥ ५० ॥ किशोर्यास्तु श्रता तेन वार्तेयमतिखुन्दरा ॥ तदा तेन मुकुन्देन संकल्पः कृत 
एवं हि ॥५१॥ किशोरी यदि भार्या में भविष्यति दिवाकरातदातन्नमहमश्चामि अन्यथा स्यास्मृ- 
तिर्मम॥५२॥क त्वेत्थ स तु संकल्प्तपवासान्मचक्रमे ॥ सप्तमेपहहनि सूर्योसो स्वप्ने वचनमत्रवीत्‌ 
॥ ५३ ॥ सूर्य उवाच ॥ किशोरयां विधवायोगो वर्तते$सों कर्थ भवेत्‌ ॥ सा ते पत्नी प्रदास्यात्रि 
त्वन्यां पद्मायतेक्षणाम्‌ ॥ ५४ ॥ मुकुर्द उवाच ॥ यदि देव प्रसन्नोईसि विश्व रुजसि त्वं प्रभो ॥ 
वालवेधव्ययोगं च हन्तुं त्वं च क्षमो ढासि ॥ ५५॥ इति तस्य वचः श्षत्वा सान्त्वना बहुला 
कृता ॥ न मन्यते मुकुन्दोससो तथेत्युकत्वा गतो रविः॥ ५६॥ तुलसीब्रतंमाहात्म्याद्वधव्यं तु 
गमिष्यति ॥ रात्रो स्वप्नः किशोर्यास्तु तस्यामेवाभ्यजायत ॥५७।॥ आगता कन्यका काचिद्धत्रा 
सह मुदान्विता ॥ भर्तारं बदति स्वप्ने मम माता किशोरिका | ५८॥ तद्धव्रोषि तथेत्युक्ते 
प्रदास्‍्ये बलिमुत्तमम्‌ ॥ एतद्धस्तेन पश्चात्त विवाहोईस्था भविष्यति ॥ ५९॥ श्रुत्वा बलिप्रदान 
सा स्वप्ने चिन्तातुरामवत्‌ ॥ कक द्वादशाक्ष री विद्या कद विष्णुसमचेनम्‌॥ ६० ॥ नरकद्वारमूलं 
क मद्धस्तात्पशुमारणम्‌ ॥ एवं सा तु समुत्थाय स्वप्नोड्यमिति निश्चितम्‌ ॥ ६९१ ॥ भावयित्वा 
संमोहूय चन्दुनां वाक्यमत्रवीत्‌ ॥ निवेद्य दृष्टं स्वप्न तु कीहगस्य फर्ल वद्‌ ॥९२॥चन्दनोवाच॥ 





करूं क्योंकि मे धन लेनेके लिये वही उपाय करूंगी |॥४३॥ | करना प्रारम्भ कर दिया। सातवें दिन सूय भगवाव्‌ सवप्त 
विलेपी बोला कि में तेरी छडकी वर्नूँगा ओर रोज फूछ ले | में आकर उससे बोले ॥५३॥ कि किशोरीके विधवा योग 
आया करूँगा तो सो रोज लेले ॥४४॥ मालिनिने स्वीकार | हैं उसके साथ तेरा कैसे व्याह करा दूँ? वो तवेरी 
क्र ल्या्‌ | उस दिन सप्तमी थी। अष्टमीके दिन मालिन | कैसी पत्नी हो? मैंकिसी दूसरी कमठनयनीको तेरी पत्नी 
किशोरीके यहां पहुची | उससे किशोरी बोली ॥॥४५॥ ए | बन्नादूँगा ॥*४॥ मुकुन्द बोला कि, हे प्रभो ! आप विश्व 
मालिन : कलके दिन नवमी है | तुलसीका विवाद है, इस | की रचना करते हैं। यदि आप प्रसन्न हैं तो उसके बाल 
कारण फूलोंके मुकुट बनाकर छाना ॥४६॥ मालिन बोली | वैधव्य योगकों नष्ट कर सकते हैं ॥५५॥ रविन बहुत कुछ 
कि मेरी लडकी अपनी सुसराछूसे आगई हे वो अनेक तरह | समझाया पर जब मुकुन्द न माना तो “अच्छा ऐसा ही 
के कोतुक करनेवाली है हे वाले ! जो तू उससे कहेंगी वो हो” यह कहकर चछे गये |५६॥ उसी रातमें क्रिशोरीको 
सब श्ञीत्र ही छा देगी ॥४७॥ किशोरीने स्वीकार करलिया | स्वप्न हुआ कि तुलसी ब्रतके महात्म्यसे तेरा वैधव्य नष्टहो 
मालिनी अपने घर चली आईं उसने सच हाछ विलेपीके | जायगा || ५७ ॥ कोई कन्या आनन्दके साथ अपने पति 
सामने कह दिया। विलंपीको तो वो आनन्द आया कि | से स्वप्सस कह रही हैं कि मरी किशोरी माता है ॥ ५८॥ 
मानों इन्द्रासन ही प्िल गया हो माहिनिने रातोरात | इसका पति भी बोढा कि ठीक हें में उत्तम वि दूँगा पीछे 
अनेक तरहके सुकुट वना दिय ॥४८। विष्णु कांचीमें उस | इसके हाथसे इसका विवाहहोगा ॥॥५९॥ स्वप्नमें बलिग्रदा- 
कम कक पजा था उसका छडका मुकुन्द सू्यकी नको बात सुनकर चिन्तित हुईंकि कहां द्वादशाक्षरी विद्या 
बट क्र सब कि था ॥५०५०॥ जा किशोरीक सोन्द्य एवम्‌ कहां विष्णु भगवाब्‌का पूजन !६०॥ कहाँ यह भरक 
भी सकश्प कर पा वो हा सुन्दरी है तो उस मुकुन्दने | का द्वार खप्नमें हाथसे पशुका मारना इस अकार इक 
री मेरी सत्री हो जार ५१४ हे दिवाकर | यदि | निश्चय कियाकि यहस्व॒प्नहे ॥६१॥ चन्दनाको कोड 
मितशर रह ये तबहं मे भोजन करूंगा नहीं | आदर करके बोढी कि मैंने ऐसा२ स्वरृप्त देखा हैं इस 
'* रहे कर भाण देदूगा ॥५२॥ पीछे उपवास | क्या फछ होगा यह कह ॥| ६९ ॥ चन्दूना बोली कि, 


ब्रतानि | 


भाषाटीकासमेंलः । (३५१ ) 








फल तु सम्पकल्याणि नवानिष्ट विनंक्ष्यांते ॥ विवाहों भविता शीघ्र तुलसीब्रतकारणात्‌ ॥६३॥ 
इत्थं स्वप्नडल अआत्वा ततः कुककुटशब्दितम्‌ ॥ क्षत्वा सा सहसोत्थाय स्नानोद्योगमची- 
करत ॥ ६९४ ॥ यावदायाति सा स्नान कृत्वा गेहँ फझिशोरिका ॥ तावदिलेपी मालिन्याः 
पुत्री भूत्वा समाययों ॥ ६५॥ कृत्वा केशांश्र गोपुच्छेः इमश्रु चोत्पाटितं बलात्‌ ॥ इतरे शाटके 
गृह्य निंबुभ्यां च स्तनों कृतों ॥ ६६ ।, स्वालड्रारशोभाव्या कटाक्षयाति चापराव ॥ न ज्ञाता 
सां तु केनापि पुमान स्रीरृपधारकः ॥ ६७ ॥ ध्यान कृत्वा तया हस्तों प्रसायेते यदा तदा ॥ 
दत्ते विलिपी पुष्पाणे विलोकयति स्वत) ॥ ६८॥ कथमप्या मम स्पशों भविष्यतीति चिस्त- 
यन्‌ ॥ एवं दिनत्रय तस्य प्रयात तु मुनीखरा। ॥ ६९ ॥ तस्मिन्नहति सजातः कनकः शोछे- 
पीडितः॥ कि कार्यमधुनास्मामी राजपुत्रो वरिष्यति ॥ ७०॥ एवं चिंतयतस्तस्य प्रातः- 
कालो बनूव है ॥ राजलोकाः समायाता गहीत्वा वस्थवाहनम्‌ ॥ ७१ ॥ अभ्यन्तरे समागत्य 
मनन्‍्त्री बचचनमबबीव॥गहेषस्ति तव कम्येका सुकुल्दा्थें भदीयताम॥७२॥ मा विचारो5सठु भवतो 
नृपाज्ञा परिपाल्यताम्‌ ॥ कनकेन तथेत्युक्त मम भाग्यमुपास्थितम॥७ ३॥महाराजकुमारस्य वधू 
कन्या भविष्यति ॥ तत$ प्रोवाच मन्त्री त॑ द्वादश्यां लप्नचुत्तमम ॥ ७४ ॥ रात्रों तिष्ठति 
पुग्मारुय रविः षष्ठे विधुश्ध खे ॥ आये भोतो शुरू बमें पश्चमे बुधभागवों ॥ 3५ ॥ शनिस्दतीये 
'रोराहुविवाहलमयः स तु ॥ उम्रों संभतसंभारावभावषि धनान्वितों ॥ ७६ ॥: द्वादशयामाययों 
साय राजपुत्रः ससेनिकः ॥ अश्ववीत्तत्र कनक॑ तेकी राजपुरोहितः ॥ ७७ ॥ तेकह्युवाच ॥ अथो 
निरोधः क्रियतां क्िशोर्याश्व नृपाज्ञया ॥ भावेष्यति महांदेवी नो दृश्या पुरुषेः कचित्‌ ॥ ७८ ॥ 
इति तद्बचन अत्वा पुरुषासतु निराकृता: ॥ जायारूपो विलेपी ठु देवात्तत्रेव संस्थितः ॥०९॥ 
ततो5द्वराजवलायां स॒ुकन्दोःभ्यन्तरं ययो ॥ तुलस्यम्र स्थिता बाला किशोरी त्वस्मरद्धरिम्‌॥८०॥ 





है कस्याणि | इसका बडा अच्छा फछ हैं। आपके अनि- | बीचम मन्त्रीने आकर कनकस कहा कि आपके यहां ए% 
न कक हे द्दी मक 
कन्या है उसे मुकुन्दके लिये दृदीजिय ॥७२॥ आप विचार 


ष्रॉका निवारण होगा । तुढसी ब्र॒तके प्रभावस आपका | 
शीत्रहदी विवाह होगा | ६३ ॥ इस्र प्रकार स्वप्न फल सुन | 
| बहुत अच्छी बातहे यह तो मेरा भाग्य आज डउस्थित हुआ 
| है | ७३ ॥ कि मेरी छडकी महाराजकुमारकी बधू होगी । 


ऐ 
मुरगेकी आवाजके साथ एकदम खडी हो स्नानका उद्योग 
करने लगी ॥६४। जबतक किशोरी स्तान करके अपन घर 


आईं इतनेमें ही विढेपी मालिनकी रडक्की बनकर चढा | 
आया |[६५| उसने गऊकी पूछ शिरके बाछ बनाये बल- | 
खक मूछ नोॉंच डालीं किसीकी चोढी और सांडी ली, | 
नींवूके स्तन छगाये ॥| ६६॥ सब जनाने जेवर पहिन लिये | 

# भांति खूब सजगया छोगोंकी तरक सेन चढछाने | 
| थे दोनों जनोंने ही अपनी २ तयारी की ॥७६॥ द्वादशीके 
| दिन सामको सेनिकों समेत राजपुत्र चछा आया, कतकके 


छगा उस कोई भरी न जान सका कि पुरुष सत्री बना हुआ 
है ॥ ६७ ॥ जब वो ध्यान करके फूछोंके रिय हाथ फेछाती 
8 यह भी उसके हाथोंमें फूछ देदेता था। दिये पीछे 
* सब ओरसे फूछोंको देखता था 8८॥ कि, किस 
वरह इसमें मेरा स्पश् हो, हे मुनीश्वरो | इस तरह उसे तीन 
दिल बीत गये ॥ ६९ ॥ तीसरे दित कनक बडा शोक़ित 
हुआ कि अब में क्या करूँ। राजपुत्र इसके साथ व्याह 
फरंगा ॥७०॥ इस प्रकार चिन्ता करते २ ग्रातःकाल होगया 
वेश्व और वाहन लेकर राजसेवक चले आये ॥ ७१ ॥ इसी 








न करें राजाकी आज्ञाका पालन करें, कनकने कहा कि, 


तब वह मन्त्री बोला क्रि, द्वादशीका उत्तम लुप्त हैं ॥ ७७ ॥ 
रातमें युग्मनामका लग्न है रवि ओर चन्द्र छठे स्थानभे हैं, 
आयमें मौम, घमे स्थानमें गुरु, बुध और बृहस्पति पाँचवे 
स्थानमें हैं ।७०७।॥ तीसरे स्थान शनि और छठे स्थानमें 
राहु हे । यह विवाहका समय समीप दी है| दोनोंही धनी 


पास आ।, तेकी नामका राजपुरोहिड बोला ॥ ७७ । कि; 
राजाकी आज्ञासे किशोरीका विवाह कर दीजिये यह 
महारानी होगी इसे कोई देंखभी कभी न सकेगा ॥ ७८ | 
पुरोहितके इन वचरनोंकों सुन सब पुरुष हटादिये पर 


मालिनकी वेटी बनाहुआ जिलेपी रहगया || ७९ ॥ इसके 


बाद आधीरातके समय सकुन्द भीतर चहागया वाला 
० के ५८ ९ 'नका र 
किशोरी तो तुलसीके सामने बठी हुई भगवानका स्मएण 


पल _दान++०9कलऊण«+भतन तभमन4० न रारञमकन+नन«+ न जात" तृत_ 5 +लूस्‍ण+ “कक मल» क_भुफमकाकतश३+ 3 भप्कसन्‍्ग १8» _ममा०“ "कलश रिट*क (००० पाप रेश लि तर नाक भभ गाते 








? प्रष्ठस्थाने | 





प्रतराज३ । 




















2 >्वब्न्श्च्य्थ्ज्करर्शथ्थथय् या कफ भाप 2० 


पढे 7: भरकर ताकक७ कप 4,०7६ ५५ पसपपन! २०. 














ततो घनधघटाशब्दस्तुम॒ुलः समपतच्यत ॥| महावाधुवयों तत्र अशारत्ता$ सवेदी पका: ॥ <१॥ 
विद्वछताशथ स्फुरिता अन्यीभूतोखिलों जनः ॥ निथ्या न भारकरवचो सुकुन्दोईचित्त- 
यद्धदि ॥ ८२ ॥ अत्येः प्रकी्तितं लोडेबंधव्यस्य तु कारणम्‌।भ्ीतो मुकन्दों हृदये यावद्धचायति 
भास्करमा८शात स्यां सन्‍धौ घृतत तस्थाः करपझं विलेशिना॥ तस्याःकरस्प संसर्गात्‌ स्वर्गाद्रज 
पपात हा<४॥नी तस्तेन विलेपी तु तत्काल यममन्द्रम्‌॥ बाह्य आसीत्‌ कलकलो मुकुन्दोप्य॑ 
मृतस्त्विति ॥<५॥ क्षणादेव ततो ज्ञातं मालाकारखुता मुता ॥ ततरुतयों विवाहो5स द्राज्य॑ प्राप 
किशोरिका ॥८6॥ किशोर्याश्व समुत्पन्ना श्रातरस्तु ल्तीततात ।। आदो शास्त्र सत्यमासीत्ततो 
देवो दिवाकरः ॥ ८७ ॥ तुलसीजतमाहात्म्यात्‌ कर्थ न स्युमेनोरथा: ॥ सोनाग्याथ घनार्थ व 
विद्याथ रुइनिव्वत्तये ॥ सम्तत्यथ प्रकर्तव्य तुल॒त्याः पाणिपीडनम्‌ ॥८4॥ इति श्रीसनत्कुमार- 
संहितायां कार्तिकंशुक्ननवम्पां कृष्माण्डदानात्मऊक॑ ब्रत॑ तुलतीबियाहब्तं च सम्पूर्णम्‌ ॥ इति 
नवमीत्रतानि समाहानि ॥ 


अथ द्शमीत्रतानि लिख्यन्ते ॥ 
दृशहरा--ब्रतस || 
अथ ज्येप्ठशुकदशम्पां दशदराख्यायां स्नानदानाद्यात्मकं ब्रतन्‌॥ स्कान्दे-ज्येष्ठस्थ शुक्क- 
दुशमी संवत्सरघछुखी स्मृता ॥ तस्वां स्नान प्रकुर्वीत दान॑ चेव विशेषतः ॥ यां काँचित्सरित॑ 
प्राप्य दद्यादेब्य तिलोइकम्‌ ॥ झुच्यते दशनिः पपेः सुमहापातको रमेः ॥ ड्येष्ठ शुक्क द शम्यां 
त॒॒ भवेद्वोनदिन यदि ॥ ज्षेया हृस्तक्षेलेशुक्ता सरेयापहरा तिथिः ॥ वराहपुराणे-दशमी 
शुक्कयते तु ज्येप्ठम/से बुबेहनि ॥ अवतीगों यतः स्वर्गाद्ध स्तक्लषें च सरिदरा॥हरते दशपापाति 
वस्माइशहर! स्मृता॥सकारदे-ज्येष्ठे माति लिते पक्षे दशम्पां बुधहत्तयोः॥गरानन्दे व्यतीपाते 
कम्याचन्द्रे ब्षे रवो | दशयोगे नरः स्नात्वा खबगापेः प्र्भुच्बते ॥ भजिष्पे-तस्याँ दशम्यामेतञ् 








कररही थी ॥। ८० ॥ इसके व[द्‌ घतघोर तुमुठ शब्द होने | दानका और तुछसीके विवाहरा ब्रत संपूर्ण हुआ । इसके 
लगा, बडी भारी आँवी चढछने ढुगी, वहांके सब दीपक | साथ नवमीके ब्रत भी पूरे होते हैं ॥ 

घुझ गये | ८१॥ बिजली चमकने छगी, किसीको कुछ दशमी--ब्रतानि । 

नहीं दीखता था। मुकुन्द्‌ मनमें सोचने -रूगा कि; सूर्यकी 


वात झूठी नहीं है ॥। ८२ ॥ दूसरे छोगोंने मी तो वैधव्यके 
कारण कहे थे । इस प्रकार डरकर मुकुन्द हृदयमें सूयेक्षा 
ध्यान करता हें इसी बीचमें विछपीन उसका हाथ पकड 
लिया । उसके हाथके छूतेही स्वगेसे उसके ऊपर वञ्ञ पडा 
॥ ८४ ॥| उससे विलेपी तो उसी समय मरगया। वाहिर 
यहू हल्ला मचगया कि, मुकुन्द मरगया ।॥|८५॥ थोडी देरके 
बाद पता चलछगया कि मालीकी छोरी मरगई ) इसके बाद 
उन दोनों का- विवाह हुआ किशोरी राजरानी बनी ॥८६॥ 
तुलसी ब्र॒तके प्रभावस कई भाई उत्पन्न हुए सबसे पहिले 
शाझ्ष सत्य हुआ इसके पीछे सूयदव सत्य हुए ॥ ८७ ॥ 
तुछसीत्रत्के साहात्म्यस मनोरथ क्यों न हों? सौभाग्यके 
अथ घनके लिये विद्या प्राप्ति और रोगनिवृत्तिके छिये और 

सन्वानके लिये तुछती ऋा वित्राह कराये।॥ ८८ ॥ यह श्री 
सनत्कुमार सेद्रिताके कातिक शुकह्वानवमो के दिन कृप्माण्डके 


६ अध्येमिति पूलोपकक्षणघ । निलोद कमिति ती * पाप्रिनिसित्तकनपंणश्तुवादः कौशुे 


छूट जाता है । भविष्यपुराणमें छिखा हुआ है कि जो 


ज्येष्ठ गुक्लाद्शरमीको दशहरः कहते हैं। इसमें स्तान।दान- 
रूपात्मक ब्रत होता हैं । सकन्द॒पुराणमें छिखा हुआ है कि, 
ज्यछ शुक्ला दशमी संवत्सरमुखी मानी गई हे इसमें स्वान 
करे ओर दान तो विशेष करके करे। किसी भी नद्दीपर 
जाकर अध्य ( पूजाआदिक ) एवम्‌ तिछोदक ६ तीर्थ ग्राप्ि 
निमित्तक तपंण) अवश्य करे। वो महापातकोंके वरातरके 
दश पापोंस छूट जाता है । यदि ज्येष्ठ शुक्का दशमीके दिन 
मंगलवार रहता हो हस्तनक्षत्र युवा तिथि हो यह्‌-सबपापोंके 
हरनेवाली होती है । वाराहपुराणमें छिखा हुआ है कि, 
ज्ये)ठ शुक्का दशमी बुधवारीमें हस्तनक्षत्रम श्र्ठ नदी स्वृर्मेस 
अबवीण हुईं थी वो दश पापोंको नष्ट करती हैं इसकारण 
उस तिथिको दशहरा कहते हैं । ज्येष्ठ मास, शह्भउक्ष) बुध" 
वार, हस्तनक्षत्र, गर, आनन्द, व्यतीपात, कनन्‍्याका चल्डे। 
व्ूषके सूय इन दश योगोमे मनुष्य स्तान करके सब पापों 





(८००४० 


२ कुज्न इति कचित्पाठः । 


ब्रतानि, ! भाषाटीकासमेलः | ( ३५३ ) 

स्तोत्र गड़ाजले स्थित: ॥ यः पठेदशऊकत्वस्तु दरिद्रो वापि चाक्षमः ॥ सोडषपि तत्फलमा- 
प्नोति गड्ढां संपूज्य यत्नतभाइति दशहरायां स्वानादिविधित अथ रुक्तानदोत्त इश्हराख्यगद्नस्तोत्रम्‌ 
तताठ्पकारथा।चतु भ्ुजों जिनेत्रां च सर्वावयवशोमितामरत्नकुम्भसिताब्मो जवरदामयसत्कराम्‌ ॥ 
श्रेततखपरीधानां मुक्तामणिविन्वूषिताम्‌ ॥ एवं ध्यायग्रेत्सुसोम्याँ च चन्द्रायुतसममभाम्‌ ॥ 
चामरेवीज्यमानां च खेतच्छत्रोपशोमिताम ॥ सुप्रसन्नां च बरदां करुणाड्री निरन्तराम ॥ 
सुधाप्लावितभूष॒ष्ठां दिव्यगन्धालुलेपनाम्‌ ॥ त्रेलोक्यपूजितां गड्ढां सर्बदेवेराधिष्ठिताम्‌॥ दिव्य- 
रसलविभूषां च दिव्यमाल्याठुलेपनाम्‌ ॥ ध्यात्वा जलेएथ मन्त्रेण कुर्यादतरी च भक्तितः॥ ओं 
नमो भगवाति हिलि हिले मिलि मिलि गड़े माँ पावय पावय स्वाहा ॥ अनेन मन्त्रणागमोक्त- 
प्चोपचारान्पुष्पाखलिं च श्रीगड़ाये निवेदयत्‌ ॥ एवं श्रीगड्राया ध्यानाचने विधाय पश्चाजजल- 
मध्ये स्थित्वा अद्येत्यादिज्येष्ठमासे सिते पक्ले प्रातिषदुमारभ्य दशमीपयेरत भातिदिन दशदश 
वारमेकोत्तरवृद्धचा वा सर्वपापक्षया्थ गड्जास्तोत्रजपमह करिष्ये इति संकलप्य स्तोत्र पठेत्‌ ॥ 
इश्वर उवाच ॥ ओऑ नमः शिवाये गंगाये शिवदाय नमो नमः ॥ नमस्ते विष्णुरूपिण्ये ब्ह्ममूर्त्स 
नमो5स्तु ते॥१॥ नमस्ते रूुद्ररूपिण्ये शाडुये ते नमी नमशासवदेवस्वरूपिग्ये नमो भेषजमूलेये 
॥ २॥ सव्वेस्य सर्वव्याधीनां मिषक्श्रेष्ठथे नमोस्तु ते ॥ स्थास्तुजड्रमसंभरतविषहच्य नमोस्तु 
ते॥शासंसारविषनाशिन्ये जीवनाये नमोस्तु ते॥ तापत्रितयसंहच्य माणेह्ये ते नमो नमः ॥४॥ 
शान्तिसन्तानकारिण्ये नमस्ते शुद्धमूतेय ॥ सर्व्ंशुद्धिकारिण्ये नमः पापारिसूतेये ॥५॥ 
बुक्तितुक्तिदायिन्ये भद्दायें नमो नमः ॥ भोगोपन्नोगदायित्ये भोगवत्ये नमो$स्‍्तुते ॥ ६४ 
पन्द्राकिन्ये नमस्‍्ते5स्तु स्वगंदाये नमो नमः ॥ नमब्नेलोक्य नुबाय पत्रिपथाये. नमो नमः ॥ ७ ॥ 





मनुष्य इस दशहराकेदिन गगाके पानीमें खडा होकर दश- | 
बार इस स्तोत्रको पढ़ता है चादे वो द्रिद्र हो चाहेअसमथ्थ | 
हो वह भी प्रयत्नपूवक गेगाको पुजकर उस फलको पाता | 
है। यह दशहराके दिन स्नान करनेकी विधि पूरी हुईं ॥ | 

छून्‍दू पुराणका कहा हुआ दशहरा नामका गेगा स्तोत्र | 


ओर उसके पढनेकी विधि-सब अवयवॉपे सुन्दर तीन 


नेत्रॉंवाली चतुभुजी जिसके कि, चारों झ्ुज) रत्नकुंभ, | 
धेतकमछ, वरद्‌ और अभयस सुशोभित हैं, सफ़ेद वर्र | 
पहिने हुई हे, मुक्ता सणियोस विभूषित है, सौम्य हैं।अयुत 
चन्द्रमाओंकी प्रभाके सम मुखवाली हैं जिसपर चामर | 
 वैद्या तेरे लिये. समस्कार, स्थावर और जंगर्मोंके विषषोंको 
| हरण करनेवाली आपको नमस्कार | ३ ॥ संसाररूपी 


ढुढाये जारहे हैं, श्रव॒ छत्रसे भूलीमांति शोभित हे, अच्छी- 
तरह प्रसन्न हे,वरक देनेवाली हे, निरन्तर करुणद्रचित्त हैं, 


भूपप्ठकों अमृतस प्रावित कररही है, दिव्य गन्ध लगाये हुए | 


हैं, त्रिोकीसे पूजित हें, सब देवोंसे अधिष्ठित हैं दिव्य 
रत्नोंसे विभूषित हे,द्व्यिही साल्य और अलुलेपन हैं;ऐसी 
गंगाका पानीमें ध्यान करके भक्तिपूर्वेक मंत्रस अर्चा कर। 


'ओ नमो भगवति हिलि हिलि मिल्ति मिल्लि गेंगे मां पावय 
पावय स्वाहा? यह गंगाजीका मंत्र है। इसका अथ है कि,हे | 
भगवति गेगे | मुझे बारबार मिल; पवित्र कर पवित्र कर, | तुझ गगाक? ॥ ६ पे 
| वालीके लिय वारंवार नमस्कार, तीनों छोकोंडी भूषण 


इससे गेगाजीके लिये पंचोपचार और पुष्पाखलि समपंण 


कर । इस प्रकार गंगाक्वा ध्यान और पूजन करके गंगाके 





पानीमें खडा होकर “ ओ अद्य ” इत्यादि वाक्यसे सकरप 
० पक, 8 ९ 4... कक 

करे कि, ऐस एसे समय ज्येप्ठ मासके शुद्धपक्षमें प्रति- 

पदासे लेकर दृशमीतक रोज रोज एक बढाते हुए सब 

पापोंको नष्ट कश्नके लिये गंगा स्तोत्रका जप करूंगा | पीछे 

स्तोत्र पढ़ना चाहिये! ईश्वर बोले कि, आनन्द्रूपिणी 


| आनन्द॒के देनवाली गेंगकेलिये वारंवार नमस्कार हैं -विप्णु- 


रूपिणीके लिये और तुझ तह्म मूतिके लिये बारंवार नम्‌- 
स्कार है । १ ॥ तुझ रुद्ररूपिणीके छिये ओर शांकरीके 
लिये वारंवार नमस्कार हें,भेषज मूर्ति सब देव स्वरूपिणी 
तेरे लिये नमस्कार हो ॥ २ ॥ सब व्याधियोंकी सब श्रेष्ठ 


विषके नाश करनेवाली एवम्‌ संतप्तोंको जिलानेवाली तुझ 
गंगाके लिये नमस्कार; तीनों तापों झे मिठानेवाली ग्राणिशी 


| तुझ गेगाको नमस्कार ॥ ४ ॥ झान्तिकी वृद्धि करनेवाडी 
| शुद्ध मूर्ति तुझ गेंगाके लिये नमस्कार, सबको संशुद्धि कर- 


भक 


नेवाली पापों झो वेरीके समान नष्ट करनेवाली तुझ ० ॥५॥ 
सुक्ति,मुक्ति, भद्र,भोग और उपभोगोंको देनवाली भोगवती 


का 


तुझ गंगाकं० ॥ ६॥ तुझझ मन्दाकिनीके छि० स्वग देंनें- 


स्वरूपा लेरे छिय एवम्‌ तीन पर्थोंसे जानेवाढीके ढछिये 


शा मनन तलि न नि नि नकड नम नमन ड न नल लिनि किशन लिन फन किन नल भी न वनडे क्र मन. म३७७७७७७//७४८ए८्"शशश"शआशआआशआआआआआआआआलशशणशआआआआआणआ८एआा% 
कर के यु हद # अ- जञ्ञ नया च्ये दल न 
१ चतुभुंजामित्यार॒भ्य भक्तित इत्यन्तप्रन्थः काशी खण्डे केपुचित्स्थलेप्वन्यपाठयुक्तो दृश्यते । ९ जयड्भाऊ नमोनमः 


झ्यपि पाठः को ० । 


(३५४ ) ः 


के 


24] 
भ्ज २ या ए५ प्र ५:०४ अधयकात 


नमप्रिशुकुस घ्थाये सजादत्थ 


पृथ्व्ये शिवाय्ताय च सुदृषाये नमो नमः 


अलराजई । ह 


नमो नमः ॥ जिहुताशनसंस्थाये तेजोवत्ये नमो नम: 
च्ख नु 5 सी क श् ० त्थै बा 
लिड्धारिण्ये सुधाधारात्मने नमः ! ८ ॥ नमस्ते विश्वन्नुरूयाये रेवत्ये ते नमो नमः 
हि पआच कप क् 0. किक 
च नमस्तेउस्तु ल्लेकधातये नमोस्तु ते ॥ ९॥ नमस्ते विश्वमित्रायें नन्दिन्ये ते नमो 


. देशमौ- 


॥ नर्दाये 
॥ वृहत्ये 
तम। ॥ 


॥ १० ॥ परापरशताढबाये ताराये ते नमो नमः 


पाशजालनिकृन्तिस्ये अभिन्नाये नमोस्तु ते ॥ ११ ॥ शास्ताये च॒वरिष्ठाये वरदाये 
करे नर | 0 औ तर ५6 आप चर रितज्ञै 
नमो नमः॥ उस्साय खुखजग्ध्य च सद्जीविन्य नमोस्तु ते ॥१२॥ ब्रह्मिष्ठाये बह्मदाये हरित: 


नमो नमः ॥ प्रणतातिप्रभजिन्ये जगमन्मात्रे नमोउस्तु ते ॥ १३ ॥ 


सवापत्पालिपक्षाये मड़लाये 


नमो नमः ॥ शरणागतदीनातपरित्राणपरायणे ॥ १४ ॥ सर्वेस्यातिहरे देवि नारायणि नमोः्स्तु 
क५ की ७१ ९ स़् हम $ १ किक की १. 

ते॥ निर्लेपाय दुर्गहन्ज्ये दक्षाये ते नमो नम। ॥ १५ ॥ पर्त॑पपपराये च॒ ग हैः निवोणद।यिनि॥ 
गड्ढे: ममाग्नतों भूयथा गड्ढे में निष्ठ पृश्नत॥१६॥ गड्ढे मे पाश्योरेघि त्वयि गड़े5्स्तु में स्थितिः॥ 


अप 


आदो त्वमन्ते मध्ये च सब त्व॑ गा गते शिवे ॥१७ ॥ त्वमेव मूलप्रक्ाति ईैत्वे पुमान्पर एव हि॥ 
गड्ढे त्वे परमात्मा च शिवघ्तुभ्यं॑ नमः शिवे ॥ १८ ॥ य इदं पठते स्तोत्र श्वणुयच्छुद्धयापि यः ॥ 
दशधा मुच्यते पा 4 कायवाक्चित्तसमवेः ॥ १९ ॥ रोगस्थो मुच्यते रोगाद्विपद्धचश्व विपडतः ॥ 
मुच्यते बन्धनाद्द्घों भीतो भीतेः अमुच्यते ॥२०॥ सर्वान्कामानवाप्नोति भ्रेत्य बैह्मणि लीयते॥ 


दिव्यं विमानमारुहाय दिव्यस्वीपरिदीजितः 


| २१ ॥ 


इम स्तव॑ गहे यस्तु लेखयित्वा विनिक्षि- 


पेत्‌ ॥ नाभ्रिचोरभय तस्य पापेभ्यों हि सय॑ न हि ॥ २२॥ ज्येष्ठे मासि सिते पक्षे दशमी हस्त- 


संयुता ॥ संहरेत्रिविध पाप॑ बुबवरेण संयुत्ता 


बारव/र नमन्कार्‌। कोई इस जहोकमें “ त्रिपथायै ” इसके 
सानमें “जगद्धाञ्ये” एसा प.ठ करते है , इसका अथ होता 





अपर शर्तोंसे आढ्य। तुझ ताराक्ो बारबार नमस्कार हें । 
फन्दोंके जालांकों 
| ११ ॥ झान्ता वरिप्ठा ओर बरदा जो आप हैं आपके 
लिए नमस्कार, उम्रा, सुखजग्धी और संज्ीविनी आपके 
लिए नमस्कार ॥ १२ ॥ अह्िष्ठा, अह्मदा और दुरितोंको 
जाननेवालीतुझको वारबार समस्क्वार.प्रणत पुरुषों केदु खों को 


0 ९३। सत्र आपत्तियोंको नाश करनेवाली तुझ महक 


छाके लिए नमस्कार | शरणमें आये हुए दोत आतंजनोंके | 


६ नारायण्वे तम्तो नम: । २ परात्परतरे तु 





॥ २३॥ तस्‍्याँ दशम्यामेत्व स्तोत्र गड़ाजहे 
मय मल कक कील अीलेकीपर गडप+-म सना पलक जल अप कक एज 204 कह 80८ 


| रक्षणमें छगे रहनेवाली ॥१४॥ सबकी आतिको हरनेवाही 
; | तुझ नारायणी देवीके ड्विए नमस्कार है। सबसे निहेंप 
है कि, जगन्‌की धात्रीके लिये नमस्कार || ७ | तीन गुक्ल | 
संस्थाव'लीकोी ओर क्षमावतीकों वारंवार नमस्कार तीन ; है।।? पी ली हे पणिजे हे 
ह कार शक | है।|१५|।प९ ओर अपरसेभी जो पर है उप्त निर्वाणके देने- 
अप्निकी संस्थावाली तेजोबरतीके लिये नमस्कार है, लिंग | « है पलक हि 
धारिणी नन्‍्दाके छिए नमस्कार, तथा अमृतकी थारारूपी | सहित की) हा 
आत्मावालीके लिए नमस्कार कोई “ त्ारायण्ये नमोनमः” | सा मर पीछे हों ॥ १६ ॥ मेरे अगलबगल है गेगे' 
५ 38 रा | उह। रह हैं गये ! मेरी तरमेही स्थिति हो।ह गंगे ! तू आदि 
नारायणीके छिए नमस्कार हैँ ऐसा पाठ करते हैं || ८ ॥ | व्योअर अल अल कि 7 हद दागिशी 
लि व लत रब | यू आर अन्त सबमे है संगत हैं तुही आनन्द द्‌ 
ससारम आप मुख्य है आपके लिये नप्रस्कार, रेबती रूप | ३ ! मूः ५५ के राग लि पु 
दल ५ ५. | 5 १७।तुही मूछ प्रकृति है, तुही पर पुरुष है,हे गंगे|तू 
आपके लिये नम॒म्कार , तुझ बहतीके लिए नमस्कार एवं | मात्मा शिवरूप हैहे शिवे! तेरे लि 3 (१८॥ हो 
तुझ लछोकधात्रीके लिए नमः हे । ९।| संसारकी पिन्ररूपा | हैं,है शिवे! तेरे छिए नमस्कार है 
तेरे लिए नमस्कार, तुझ नेदिनीके लिए नमस्कार, प्रथ्वी | 
शिवाम्रता और सुब॒पाके लिए नमस्कार || १० ॥ पर और कं 


है । १९ || रोगी रोगसे, विपत्तिवारू। विपत्तियोंसि, वद्ध 
काटनेबाली अभिन्ना तुझको नमस्कार | 


रहनेवाली दुर्गोंको मिटानेव्राढी तुझ दक्षाके छिए नमस्कार 


वाछी गेगाके छिए प्रणाम हैं ! हे गंगे ! आप मेरे अगादी 


कोई इस स्तोत्रको श्रद्धांके साथ पढता या सुनता है वो वाणी 
शरीरऔर चित्तसे होनेवाल्े पापोंसेद्श तरहसे मुक्त होता 


वन्धनसे ओर डरसे डरा हुआ पुरुष छूट जाता है ॥ २०॥ 
च्‌ ' है मरकर ब्रह्ममें छप्न होता हैं! वो 
सब॒ का््ोंको पाता है सरकर त्रह्मयमे छग्म होता है। व 


| घगमें दिव्य विधान बैठकर जाता है । दिव्य ख्री उसका 


पद्ला करती रहती हैं ॥ २१ ॥ जो इस स्तोन्रको लिखकर 


ल गा | वरमें रख छोडवा है उसके घरमें अग्नि और चोरसे भव 
नाश करनेवाल्ी जगतकी माता तेरे लिए बारबार नमत्कार | नहीं होता एवं न पापीही बहां सताते हैं ॥ २२ न्येष्ठ 
| झुक्ा हस्तश्नहिला बुधवारी दशमी तीनों तरहके पापोंको 
ह॒रती हैं ।। २३॥ उस द्‌ शरमीके दिन जो कोई गंगाज 





नमस्ते मोक्षदे सदा । ३ सं हि नारायण: परः । 


४ व त्रिदिव ब्रजतू इति व पाठ: | 


व्रतानि, ] भाषाटीकासमे तः । ( 


| शै०५ ) 








| ०-२ साल पपामममममकन१भ5क ५; भरती नानक. 








स्थितः ॥ यः पठेदशक्त्वस्तु दरिद्रो वापि चाक्षमः ॥२४॥ सोषपि तत्फलमाप्रोति गड्ढां संपज्य 
पलतः । पूर्वोक्तेन विधानेन यत्फले संप्रकीलितम्‌ ॥ २५ ॥ यथा गोरी तथा गड्ढा तस्माद्रों- 
यास्‍त पूजने ॥ विधियों विहितः सम्यक्सो5षपि गड्जाप्रपूजने ॥ २६॥ यथां शिउस्तथा 
विष्णयथा लक्ष्मीस्तथा उमा ॥ यथा उमा तथा गड्ा चतरूप न भिद्यत ॥ २७ ॥ विष्णु 
झुद्रान्तर ये श्रीगोयोरन्तरं तथा '॥। गड़नगोर्योरम्तरं चयोबइ्ले सूदथीस्त से ॥ २८ ॥ 
सैरवादिषु घोरेषु नरकेवु पतत्यथः ॥ अदत्तानासुपादानं हिंसा _ चबाविधानतः, ॥ २९ ॥ 
परदारोपसेवा च कायिकं तिविध स्पुतम्‌ ॥ पारुष्यमनतं चेव पेशुत्य॑ चापि सर्वतः 
॥ ३० ॥ असंबद्धमलापश्च वाडमय स्थाखतुविदम ॥ परद्रव्येष्वशिध्यानं मनसानिष्ठाचि- 
न्तनम ॥ २१ ॥ वितथामिनिवेशश्व मानस त्रिविध॑ स्मृतम्‌ ॥ एतानि दह्मपापानि हर त्वमथ 
जाह॒वि ॥ ३२२ ॥ दशपापहरा यस्मात्तस्मादशहरा स्म्ृता ॥ एनेदेशविधेः पापेः कोटिजन्मससु- 


ह्वरवः ॥ ३२ ॥ मुच्यते नात्र सन्देहः सत्य सत्यं गदाधर ॥ दरशजिंशच्छताउसर्चान्पितूनथ पिता- 
“598 नमो भगवत्ये नारायप्ये दह्मपाप- 


महान्‌ ॥ उद्धरत्येव संसारान्मंत्रणानेन पृजिता ॥ ३४ ॥ 
हराये शिवाये गंगाये विष्णुमुख्याये क्षयाये रेवत्ये भागीरथ्ये नमोनमः ॥ " ज्येष्ठे मासि लिते 
पक्षे दशम्याँ बुधहस्तयो: ॥ गरानरदे व्यतीपाते कन्याचन्द्रे दषे रवो ॥ दशायोगे नरः स्नात्वा 
सर्वपापेः प्रमच्यते॥ ३५ ॥ सितमकरनिषण्णां शुश्रवणों जिनेत्रां करषतकलशोश्त्सोत्पलाभी- 
व्यभीष्ठाम ॥ विधिहरिहररूपां सेःहुकोटीरज़ुष्टां कलितासेतदुकूलां जाह्॒रवी ता नमामि ॥ ने५ ॥ 
आदावादिपितामहस्य नियमध्यापारपात्रे जल पश्चात्पन्नग शायिनों लगवतः+ पाडोइक पावनम्‌ ॥ 
भूयः शम्घुजटाविभूषणमणिजद्वोमहर्पेरियं कन्या कल्मषनाशिनी मगदती भागीरथी दृष्खते।३७ 


इति काशीखण्डे दशहरास्तोत्रे संपूर्ण || 


खड़ा होकर इस स्तोत्रको दशवार पढता हे जो दरिद्र हो। 
वा असमर्थ हो ॥ २७ ॥ वो गेगाजीको प्रयत्तपूवेक पूजता 
हैं तो उस भी वही फठछ मिछ जाता हैं जो कि पहिले 
विधानस ऋछ कहा है ।। २५ ॥ जेसी गौरी है वसीही 
गाजी है इस, कारण गोरीके पूजनमें जो विधि कही हैं 
वही विधि गंयाके पूजन भी होती हैं | २६ ॥ जैसे शित्र 
रैसेही विष्णु तथा जेसी लक्ष्मीजी वैसीही उम्रा एप. जेसी 
उम्रा वैसीही गंगाजी हैं इन चारोंमें कोई भेद नहीं हे 
॥ २७ ॥ डिण्णु और शिवमें तथा श्री ओर गोरीसें तथा 
गंगा और गौरीसें जो स्रेद बताता हे वो निरा मूंख हे 
॥ २८ ॥ वो रौरवादिर घोर नरकॉमें पडता है। अदत्तका 
इपादान, अविधानकी हिंसा ॥ २९ ॥ वूसरकी ख्रीके साथ 
रमण, ये तीन ( कायिक ) शारीरिक पाप; पारुष्य, अनु त 
और चारों ओरकी पिशुनता ॥ ३० ।| असंबद्ध श्रछ्ाप यह 
चार तरहका बाणीका पाउ; दूसरेके धनकी चाह, मचसे 
किसीका बुरा चीतना ॥। ३६१ [| मिथ्याका अभिनिवेज्ञ यह 
दीन तरहका सनका पाप, इन दशों तरहके पापोंको है 
गेगे आप दूरकर दें ।३२॥ ये दक्ष पापोंको हरती हैं इस 


कारण इसे दशहरा भी कहते हैं, कोटि जन्मके होनेवाले 





नहीं है | है गदाबर ! यह सत्य है सत्य हैइसमें संशय नहीं 
है | यदि इस मन्त्रस गेगाका पूजन कर दिया तो तीनोंके 
दश तीस ओर सो पिनरोंकों संसारस उधारती है 
॥३७॥ कि, “ भसत्रती तारायणी दश पापोंकों हरनेवाल्ी 
शित्रा गंगा विष्णुुख्या पापनाशिती रेंव्रती भगीरथीकेलिय 
नमष्कार है ” | ब्येपमास, ग॒कृपश्च दशमी तिथि; बुधवार, 
हस्तनश्षत्र गर, आनन्द, व्यतीपात, कन्याके चन्द्र, बुपके 
रवि इन दशोंके योगमें जो मनुप्य गेगा ख्लान करता दे 
वो सब पापोंसे छूट जाता है ॥ ३७ ॥ में उल गेगादेबीको 
प्रणाम करता हैँ जो सफेद मगर पर चेठीहुईं श्रतवर्णको 
है.तीन नेत्रोंवाछी हँ.अपनी सुन्दर च'रों शुजाओँम कछश+ 
खिला कमल, अभय और अभीष्ट लिये हुए है जो तह्मा 
विप्णु शिवरूय है चांदसमेत अप्र भा ।से जुष्ट सरेत दुकूछ 
पहिने हुई जाहइवी माताकों में नमस्कार करता हूँ ॥ ३३ || 
जो सबसे पहिले तो त्रह्मजीके कमण्डछनें विराजती थी 
पीछे मगवानके चरणोंका घोवन वनकर शिवजीकी जटा- 
ऑमें रह जटाओंका मूषणवनी पीछे जन्हु महर्पिकी कन्या॥ 
वनी यही पापोंको नष्ट करनेवाल्ली भगवती -भागीरथी 
दीखती है || ३८ ॥ यह श्रीकाशीखेडका ऋह! हुआ दश- 


इन दश तरहके पापोंसे ।॥३३॥ शनद्शतरहके पापोसि ॥२३॥ छूट जाता दे इसमें सन्देह हरास्वोत्रपूप इुआा।__३_३__  -_- है इसमें सन्देहो। हरास्तोत्र पूरा हुआ || 


१ स्व तथाह तथा विष्णों यथा स्व तु तथा छाहम्‌। इसे पाठ: के 'शीखेडे । २ काशी 
पृदधीस्तु स इस्यन्तमेव स्तोत्रमस्ति ॥| अप्रे रौरबादिप्वित्यादयों दृ्बन्ते इस्येला: ठोक 
काशीखण्डे भिन्न एवोपलम्यते || काशीखंडमें तो नम: शित्राय इस प्रवध सतोकसे अदाईमकी समाधि तकदी 


्खउडे तु नमः शित्रायें इत्यारम्य 
: कौस्तुभ दृष्टाः ॥ सन्‍्त्रोडपि 
। जो व्रतराजम इससे 


ध्ी 
प्‌ 
च्ह 
प्र 
प्‌ 


अ्रगाडीके क्तोक रखे हुए हैं ये सब कोस्तुभमें मिलते हैं | गगा।जीका मंत्रमी काशीखण्डमें दूसरीही तरह मिचताई ॥ 
है 


जो 


30300, शशिशिरिलिसिलिक 


पाल एक मकान ाप्कााव, 


बलराज: । [ दशमी- 





आशादशमीब्रतमः । 

आपषाटशक्नदशमी मन्वादि: । सा पूवोहव्यापिनी आह्या ।' अथ यस्‍्याँ कस्याँचिच्छुक्दश 
म्यामाशादशमीव्ते हेमादों भविष्ये--यरायिश्ठचिर उवाच ॥ कंथमाशादशम्येषा गोवित 
क्रियते कदा ॥ देमयन्त्या नलस्येव यथा जातः समागमः ॥ कृष्ण उबाच ॥ राज्याशय 
राजपुत्रः कृष्यथ च कषीवलः ॥ वाणिज्याथ वणिक्पुत्रः पुत्राथ गर्विणी तथा।। धर्मकामार्थतं 
सिद्धये लोकः कन्या वराथिनी ॥ यष्टुकामों द्विजवरों योगी श्रेयोईर्थमेव च ॥ चिरप्रवसिते 
कानते बाले दन्तनिपीडिते ॥ एतदन्येषु कतेव्यमाशात्रतमिदं तदा॥ यदा यस्य भवेदाति 
कार्य तेन तदा व्रतम्‌ । शुक्कपक्षे दशम्यां तु स्‍्नात्वा संपूज्य देवताः ॥ नक्तमाशाः सुपूज्य 
वे पुष्पालक्तकचन्दनेः। गृहाड़णे लेखयित्वा यवेः पिड्ठातकेन वा ॥ स्वीरूपाश्वाधिदेवस्थ शज्त् 
बाहनचिह्विता३ ॥ अधिदेवस्य ततहिक्पालर न्द्राउस्वत्तच्छ जवाहन थ॒रचिह्विता लेखयिल्वेत्यथं: ॥ दर्ता 
पृताक्त॑ नेवेद्य पृथदीपांश दापयेत ॥ फलानि कालजातानि ततः का निवेदय्रेत॥ आशा: 
स्वाशाः सदा सनन्‍्तु घिद्धचन्तां मे मनोरथा;॥ भवतीनां प्रसादेन सदा कल्याणमस्त्विति॥ 
एवं सम्पूज्य विधिवदत्वा विप्राय दक्षिणाम्‌॥ अनेन ऋमयोगेन मासि मासि समाचरेत ॥ 
वर्षमेक कुरुअष्ठ ततः, पश्चात्ससुच्यजेव ॥ अवारू संवत्सरस्यापि सिद्धचर्थ वा समुगजेत॥ 
सोवर्णीः कारयेदाशा रोप्याः पिड्ठातकेन वा ॥ ज्ञातिबन्धुजनेः साद्धे ततः सम्यग्लंकृतः। 
पूजयेत्क्मयोगेन मंत्ररेनिगेहाड़ृणे ॥ त्वयि सन्निहितः शक्रः छुरासुरनमस्कृतः ॥ पूर्वा त्॑ 
खुवनस्यास्य ऐन्द्रिदिग.्देवते नमः ॥ अस्नेः परिप्रहादाश त्वमापग्नेयीति पठ्यसे ॥ तेजोछप 


आषाढ शुक्लादशमी यह मसन्वन्तरके आदिकी तिथि हैं, 
इसे पूर्वाह्न व्यापिनी छेता चाहिये क्‍योंकि पद्मपुराममें 
लिखा हुआ है कि शुहृपक्षकी मन्वादडि तिथि पूर्वाह वँया- 
पिनी लेनी चाहिये। जो मन्वादि तिथियोंमें कृत्य होते 
है वे सब इसमें भी करन चाहिये। आश्वादशमीजत-किसी 
भी शुकृपक्षकी दशमीक दिन होता हैं यह भविष्यपुराणसे 
छेकर हेमाद्विन लिखा हैं। युधिष्ठिर बोछे कि हे गोविन्द! 
यह आश्ादशसी क्‍यों कहती है कब की जाती है? (हेमा- 
द्विम तो इससे पहिले की 'इतः प्रथर्म पार्थ ” यहांसे लेकर 
/ भर्त्रां सछ॒ समागमः ” यहांतककी कथा अधिक दी है 
प्र त्रतराजके छेखकने उसे छोडऋर केव्रछ तिथिमात्रही 
अपने ग्रन्थमें ली है । ) जिस ब्रतके करनेसे दमयन्तीका 
नछके साथ समागम होगया (हेमाद्विम इसके मूछकी जगह 
हि सर्वमेतत्समाचक्ष्व मासतिथ्यादि यादव ” यह पाठ कहा 
हैं । इसका अधथ हैं कि, है यादव ! मास तिथि आदि सब 
मुझ्यस कह दीजिय ॥ ) श्रीकृषप्ण बोले कि,राज्यकी आशासे 
राजकु पारोंको, इस ब्रतकों करना चाहिये, वाणिज्यके लिये 
वेश्य चाऊूकको, पुत्र जननेके लिय गर्मिंगीको, घमम अर्थ 
और कामकी सिद्धिके छिये छोकको, वर चाहनेवाली 
कन्याको, यज्ञ करनेके लिये दि जको, श्रेयके लिये योगीको, 
जिसका पति बहुत द्नोंस विदेश गया हो उस प्रोषित 


पतिकाको, दांतोंके निकालनेसे दुःखी बच्चेके अभिभावु 
कोंको इस आश्ात्रतकों करना चाहिय | जिस समय जिसे 
कष्ट हो उस समय उस यह ब्रत करना चाहिये। शुह्प 
क्षकी दशमीके दिन देवताओंका पूजन करके राततमें पुष्प 
अछक्तके और चन्दनसे आशाका पूजन करना चाहिये, 
अधिदेवके शल ओर वाहनोंके साथ घरके आंगनमें श्र 
रूपी अधिदेवको चूनसे लिखे।अधिदेवका अथे उस दिशाक 
दिक्‍्पालसे है उसके शल्र और वाहन साथ छिख । घृतका 
सनाहुआ नेवेद्य और प्रथछू दीपक दे। इसके बाद ऋतुफ 
छोंका निवेदन करे और कहे कि, मेरी आशा अच्छी आश्ष| 
हो ! मेरे मनोरथ सिद्ध हों, आपकी प्रसन्नतास मेरा सद| 
कल्याण हो,इस प्रकार विधिक साथ पूज,ब्राह्मणको दक्षिण! 
देकर इसी ऋमसे महीनारमे ब्रत करे. हे कुरुश्रे्ट (एक व 
करके पीछे उद्यापनकरे अथवा संव॒त्सरसेभी पहिले सिद्धि 
छिये उद्यापन करडाले,आशा देवी सोनकी वनानी चाहिये 
अथवा चाँदी या पिष्टालककी होनी चाहिये, भछी भौंति 
सजकर बन्धुजनोंके साथ घरके आँगनमें ऋमसे मन्त्र 
द्वारा पूजन करे कि, सुर और असुरोंका पृज्य इन्द्र तेरे 
स्रनिहित रहता है तू इस सुवनक्षी पूर्वा है । हे ऐन्द्री दिग् 
देवते ! तेरे छिये नमस्कार है, हे आशे ! तू अभिके परिः 


द के गा तु इतःपाथ प्रथम पवि इस पारभ्य भत्रां सह समागम इत्यन्ता कथाउघिकास्ति तां विहायानेन मन्थक्ृत 
ञञ हे वधिमात्रे छिखितम्‌ ॥ अत्र यद्यपि देमादो बड़ुबु स्थद्यु पठभेदों दृइय ते तथापि ब्तार्कावुरोधेनदं लिखितरमिति 
हैशन्यम । २ सवसतत्सभाचइ्व मासतिथ्यादि यादव इति पाठो देमाद़ो । ३ सम्यगुयापन कुर्या दित्यथः 


ब्तानि, | 





परा शक्तिराग्रेयि वरदा भव ॥ धर्मराज समाश्रित्य लोकान्संयमयस्यमृन्‌ ॥ तेन संयमिनी 
॥ खड़हस्तोएतिविकृतो निरतिस्त्वासुपाओितः ॥ तेन नेके- 


चासि याम्ये सत्कामदा भव 
तिनामासि त्वमाशां प्रयस्व में ॥ त्वय्यास्ते 
मम धर्मांथ वारुणि भ्रवणा भव 


त्वमतः शान्ति नित्य यच्छ ममालये ॥ धनदेनाधि४ष्ठितासि अ्रख्याता 


भाषाटीकासमेलः । 


( ३५७ ) 


सुवनाधारों वरूुणों यादर्सांपतिः ॥ कामा्े 


॥ अधिष्ठितासि यस्मात्व॑ वासना जगदायुना ॥ वायबि 


त्वमिहोत्तरा ॥ 


निरूत्तरा भवास्माक दत्वा सद्यो मनोरथम्‌। ऐशानि जगदीशेन शम्भुना त्वमलंकृता। 
प्रयस्वाशु में देवि वाज्छितानि नमो नमः॥ अ्ुजड्गाष्टकुलेन त्व॑ं सेवितासि यतों ह्यधथः ॥ 
नागाड़नामिः सहिता हिता भव ममाद्य वे ॥ सर्वलोकोपरि मता सदंदा त्व॑ शिवाय 
च॥ सनकाद्येः परिव॒ता बाह्ि माँ पाहि सर्वदा ॥ नक्षत्राणि च सर्वाणि ग्रहास्तारागणास्तथा॥ 
नक्षत्रमातरों याश्र भूतप्रेतविनायकाः ॥ सर्वे ममेष्ठलिद्धायथ मवनतु श्रवणाः सदा ॥ एनिमेन्जरेः 
समभ्यच्य पुष्पधूपदिना ततः॥ वासोनिरभिषेकादेः फलानि विनिवेदय्रेत्‌ ॥ नलतो वनिद- 
निनादेन गीतवादित्रमड्गलेः॥ नृत्यम्तीमिवरखीमिजांगत्यों च निशां नयेव्‌ ॥ केंकमाक्षत- 
ताम्बूलदानमानादिभिः खुखम्‌॥ पभाते वेदविद॒बे बोह्मणाय निवेदय्रेत ॥ अनेन जिबिना 
सर क्षमाप्य प्रणिपत्य च | खुखीत मित्रसहितः सुहृद्धन्शुजनेन च ॥ एणवं यः कुरुते पार्थे 
दशमीत्रतमादरात्‌ ।। सर्वान्कामानवाप्नोति मनोंइमिलवितान्नरः ॥ सक्रीमिविंशेबतः कार्य 
ब्रतमेतद्यधिष्ठि र ॥ प्राणिवर्ग यतो नार्यः श्रद्धाकामपरायण८ ॥ धन्य यशस्यमाशुष्यं॑ सबे- 
कामफलम्दम ॥ कथितं ते महाराज मया व्रतमतुत्तमम्‌ ॥ ये मानवा मतुजउद्नव॒कामकामाः 
सम्पूजयन्ति दशमीयु सदा दशाशाः ॥ तेषाँ विशषनिहिताव हृदयेषपि कामानाशा+ फल- 


न्यलमलं बहुनोदितिन ॥ इति श्रीमविष्योत्ते आशादशमीत्रतम्‌ ॥ __ ० श्रीमविष्योत्ते आशादशमीत्रतम्‌ ॥ 


प्रहसे आग्रेयी कहाती हे, तेजो रूपा है, सबसे बडी शक्ति | मुझपर सदा ्रवण रहें'इन मं नत्रोंसे पुष्प, धूप; वास अमभि- 
है, है आम्रेयी | तू बरकी देनेवाडी होजा। धमराजका | षेकादि दीपादिकाँस पूज, फर्डोंको भेंट करे | इसके बंदि- 
आश्रय लेकर तू इन छोकोंका संयमन ( नियंत्रण ) करती | योके निनार ओर गाने ब जानेफे शब्दोंस तथा अच्छी स्तन 

, इंख कारण है. यास्‍्यें ! तुझे संयमिनी भी कहते हैं, तू | योंक नाचसे जागते हुए राव व्यतीत करे! केकुम, अक्षत; 
मुझे सब कार्मोंके देनवाली हो।| दहाथम तलवार छियेहुए | ६ सस्‍्वूछ, दान, समान इनके साथ सु खपूरव क वेदके जानने- 
अलन्व विक्रृत निऋति तुझे उपाश्रित होता है. इस कारण | वाले ब्राह्मणके छिये दें दे, कहीं » तत्सवे प्रतियादयेत्‌ ” 
तुझे निऋति भी कहते हैं तू मेरी आशाको पूरीकर, भुव - | ऐसा भी पाठ है कि, उसे त्राह्मणके लिये दे दे । इस वि 
नका आधार पानीका स्वामी वरुण तेरेमें रहता है। हैं वा- | से सब करके पीछे क्षमापन कर। प्रणाम करके सुद्ृद्‌ 


रुणि | तू काम धमके लिये दयालु होजा, संसारकी आयु- 
रूपवायुने तुझे आधार बनाया है, इस कारण तुझे वायवी 
कहते हैं । ६ वायवि ! तू मेरे आलयमें शान्ति दे । धनद्‌ 
कुबेरसे अधिष्ठित हुई उत्तराके तामसे पसिद्ध हुईं, हमें. 
शीघ्रही मनोरथ देकर निरुत्तर होजा | जगदीश शंजुने तुझे 
अल्ेक्ृत किया हैं इस कारण तुझे इशानी भी कहते हैं, हे 
देवि | मेरे सनोरथोंकों शीज्रद्दी पूराकर तिरे लिये नमस्कार 
है| भुजगोंके अष्टकुलोंसे आप सेवित हैं इसकारण नागां: 
गनाओंके साथ मेरी हिता हों।तू सब छोकोके ऊपर हें 
सनकादिकोने शिवके ढिये तुझे सदा स्वीकार किया हे । 
है त्राह्मि | मेरी रक्षा कर; नक्षत्र नव ग्रह तारागण, नक्ष - 
त्रमाव॒का, भूत, प्रेत, विनायक सब मेरी इष्ट सिद्धिके लिये 


और बन्घुजनोके साथ भोजन करे, हे पाये! इस प्रकार 
जो आदरके साथ दश मीका त्रत करता है वो सनके चाहे 
सब कार्मोकों पाजाता हैं। हे युविप्ि' ! विशेष करके इस 
ब्रतकों खिर्योंको करना चाहिये. क्योंकि, प्राणिमात्रमें स्तर 
याँ श्रद्धालु हुआ करती हैं, हे महाराज ! मैंने इस श्रेप्ठ अत- 
को आपके सामने कदृदिया है. यह धन्य है यशस्य है आ- 
युका देतेवाला है सब कार्मोका ,पूरक हूं, है मनुजपुज्ञव : 
जो कार्मोकों चाहनेवाले मनुष्य दशमीके दिन दशों  दिशा- 
ऑको पूजपे हैं उनके मनके सब विशेष काम पूरे होते हैं 
सव आशाएँ फलती हैं अधिक कहनेसे क्या हे । यह श्रीम- 
विष्यपुराणका कहा हुआ आशादशमीका ब्रत पूरा हुआ ॥ 





१ तत्सव प्रतिपादयेत्‌ ) इत्यपि पाठः | 


(३५८ )  ब्रतराजः । [ दशमी- 





अायादानाधाकाधानधााधकयाधादााकाभाका काला कक मकर कककम मा...“ 











अथ दशावतार्तम ॥ 


भाद्रपदशुक्कदशम्यां दशावतारबतं भविष्योत्तरे--युधिष्ठिर उवाच ॥ ब्र॒त॑ दशावताराख्य 
कृष्ण वृहि -सविस्तरम्‌ ॥ समन्‍्त्र सरहश्यं च सर्वपापोपशान्तिदम्‌॥ कृष्ण उबाच ॥ दशम्यां 
शुक्कपक्षस्थ मासे श्रौष्यदे शुचिः॥ स्नात्वा जलाशये स्वच्छे पितृदेवादितपेणम्‌॥ कृत्वा 
कुरुकुलओष्ठ गृहमागत्य मानव॥ गह्दीयाद्धान्यचूर्णस्य स्वहस्तमसतित्रयम्‌ ॥ क्रमेण पाचये- 
ततु पुंसंज्ञ घृतसंथुतम्‌ ॥ वर्ष वर्षे दिने तस्मिन्नेव वषोणि वे दश ॥ प्रथमे5पूषकान वर्षे द्वितीये 
घृतप्रकान्‌ ॥ तृतीय पृपकासारांश्रतुर्थे मोदकाउछुमाव ॥ सोहालिकान्पश्वमेःब्दे पष्ठेहदे 
खण्डवेष्ठकान्‌ ॥ सप्तमे्दे कोकरसानकंपुष्पांस्तथाष्टमे ॥ नवमे कर्णवेष्टांश्व दशमे मण्डकाउछ 
भाव ॥ दशात्मनों दश हरेद॑श विप्राय दापयेत॥ क्रमेण भक्षयेदर्वा यथोक्तविधिना नृप॥ 
अधांध विष्णवे देयमर्धाष च द्विजातये ॥ स्वत ण्वाद्धमश्नीयाद्त्वा रम्ये जलाशये॥ दशाव- 
तारानभ्यच्स पृष्पधूपविलेपने! ॥ मंत्रेणानेन मेधावी हरिमभ्युक्ष्य वारिणा ॥ मत्स्य कूम वराह 
च नारसिंहं च वामनम्‌ ॥ राम॑ राम च कृष्णं च बौद्ध चेच सकल्किनम्‌0 गतो$स्मि शरण देव॑ 
हरि नारायण विश्वुन्‌ ॥ प्रणतोःस्मि जगन्नाथ स में विष्णु; प्रसीदतु ॥ छिनत्तु वेष्णवीं मायां 
भकत्या भीतो जनादेनः ॥ श्वेतद्वीप॑ नयत्वस्मानव्‌ मयात्मा सत्रिवेदितः॥ अन्र हेमीमंहाहाँश्र 
दशम्‌र्तीः सुलक्षणाः ॥ गन्धपुष्पेश्च नवेद्यरचेयद्रिधिपू्वकम्‌ ॥ एवं या कुरुते भकत्या विधिना- 
धनेन सुब्रत ॥ ब्ते दशावताराख्यं तस्य पुण्यफले शणु ॥ श्रूयत्ते यास्त्विमा लोके पुरुषाणां 
दशा दश ॥ ताश्छिनत्ति न सन्देहश्क्रर्हरणों विश्ु॥ संसलारसागरादोराव समुद्धृत्य जगत्पति॥ 
धतद्वीप नयत्याशु ब्रतेनानेन तोषितः ॥ कि तस्य न भवेक्लोके यस्य तुष्ठो जनादनः | यहदू- 
दुलेभ यदभाप्यं मनसो यत्र गोचरम॥ तदष्यप्रार्थितं ध्यातो ददाति मथुसूदनः ॥ सो5हं जनादनः 
साक्षात्‌ कालरूपधरोष्च्युतः ॥ मत्यलोके स्वयं पाप्तो भूभारोत्तारणाय चाया खी ब्रतमिदं पा 





दुशावतार ब्रत-भाद्रवद शुक्ला दशक दिन होता है 
यह भविष्योत्तर पुराणमें छिखा है । युधिष्ठटिर बोले कि, हे 
कृष्ण | दशावतार नामके ब्रतको विस्तार पूवंक कहिय,मंत्र 
ओर रहस्यकोभी साथ कहना वो सब पाषोंकी शान्ति 
करनेवाल् है । कृष्ण बोले कि, भाद्रपद शुद्धा दशमीके 
दिन पवित्र हो अच्छे जलाशयमें स्लान करके पिठ्देवादि, 
तर्पण करके हे कृदकुछके श्रेष्ठ ) घर आ धान्यके चूनकी 
अपने हाथको तीन प्रस्ृति छेकर ऋ्रमसे उसे धीमें सिद्ध 
करे पुलिद्गनाम रखे प्रतिवष इस ब्रतको करे नौ या द्‌ शवर्ष, 
इस ब्रतकों करना चाहिये |पहिले वषे अपूप, दूसरे वर्ष घृ त- 
पूरक, तीसरे वर्ष पूषकासार,चोथे वर्ष अच्छे मोदक,पाँचवें 
वर्ष सोहा छिका; छटे बष खण्ड वेष्टकू, सातवें वर्ष कोक- 
रस, आठवे अकपुष्प,नौवें कर्णवेष्ट, दशर्भ वर्ष अच्छे मंडक 
हों इनसेंस हरवार दश अपने लिये रखे,द्श आह्मणके लिये 
दे, फिर हे नूप | विधिके साथ ऋमसे भोजन करे, आधेका 
आधा विप्णुको एवम्‌ आधेका आधघा बत्राह्मणके लिये दे दे | 
आप सुन्दर जलाशयके किनारे जाकर आधेका भोजन करे। 
दरिका पश्नीसे जभ्युक्षण करके पुष्प धूप और विलेपनोंस 
श्स मंत्रस दश अवतारोंका पूजन करे । मत्स्य,कूमे; वराह, 


नरसिंह, वामत राम; परशुराम, कृष्ण, बौध और कल्कि 
अवतारकों धारण करनेवाले व्यापक दुखोंके नष्ट करनेवाढे 
नारायण देवकी में शरण हूं, जगन्नाथको प्रणाम कएता हूँ, 
उसके शरण हूं,भक्तिसे प्र तन्न हुआ जनादन वैष्णबीमायाकी 
दूर करदें | मैंने अपनेको उसको दे दिया है वो मुझे खतद्वी: 
पको ले जाय । इसमें सोनेकी दश अवतारोंकी अष्ठडाक्षण्य 
शाहिनी दश मूृत्तियोंकों गंध, पुष्प और नेवेद्ोंसे विधि 
पूवेक पूजे,हे सुब्रत!इस प्रकार जो भक्तिपूर्वक विधिके साथ 
इस ब्रतकों करता है उसके पुण्य फछको छुतो, मनुप्योंकी 
जो दश दशाईँ सुनी जाती हैं चक्रायुध भगवान्‌ उन्हें काट 
देते हैं इसमें लन्देह नहीं है इस ब्रयसे प्रसन्न प्‌ जगन्नाथ 
उसका संसार सागरसे उद्धार करके श्वतद्वोपक। छ जाते है 
ससारमें उसका क्या काम पूरा नहीं होजाता जिसपर क्नकि 
भगवान्‌ प्रसन्न होजते हैं| जो दुछ । है जो अगय्य हैं जो 
मनके भी गोचर नहीं है उस वस्तुको विना ही मंगि भग- 
वान्‌ दे देते हैं | वो में जनादंव साक्षात्‌ कालरूपधार 
अच्युत भूके भारकों मिटानेके छिये स्वयं ही मत्येडोकर्म 
प्राप्तहुआ हूं। हे पार्थ ! जो स्त्री मेरे कह हुए ब्रतको करेगी 


व्तानि, | भाषाटीकासमेलः | (३५९ ) 






















करिष्यति मयोदितम ॥। 





सा च लक्ष्म्या युता नित्य पत्रमक्तिसमच्चिता ॥ मत्यलोके चिरं 
घ्थित्वा उिष्ण लो के महीयते॥ ये पूज्यन्ति पुरवाः पुरुषोत्तमस्य मत्स्यादिकांस्तु दशमीष दशा- 
वतारान्‌॥ मन्ये दशस्वषि दशासु सुख विहत्य ते यान्ति यानमधिरुहझ्म सुरारिलोकम्‌ ॥ 
इति भविष्ये भावद्रपदशुकृद्शम्याँ दशावतारबत्रतम्‌ ॥ 


अय विजयादशमी वतन । 


आखिनशुक्रदशम्थाँ विजपादशमी ॥ सा च तारछोदुपत्यायिती ग्राह्म! तदुक्त चिन्ता- 
मणों आधविनस्थ सिते पक्षे दशम्यां तारकोदये ॥ सकालो विज्यों नाम स्वेकामार्थ्ाघकः॥ 
स्नकोशे--ईबत्सन्ध्यामतिक्रान्तः किखिइृद्धिब्नतारकः ॥ विजयों नाम कालोडये सर्वकामार्थ- 
साधकः ॥ दिनद्रये ततथ्मातावव्यातों वाअपराजिताएजायां पूर्वव ॥ तदुक्त हेमादी स्कानदे--- 
दरशम्पां तु नरेः सम्यकू पूजनी वाउपराजिता ॥ इंशानों दिशम/श्रित्य अपराहे प्रयत्नतः ॥ या 
पूर्ण नवमीयुक्ता तस्यां पूज्यापपराजिता ॥ क्षेमाथ विजयाथ च पूर्वोक्तेत्रेबिना नरेः॥ नवमी- 
शेषसंयुक्तदशम्याम पराजिता ॥ द॒दाति विजय॑ देवी पूजिता जयवर्धधिनी ॥ तथा--आखिने 
शुक्कपक्षे तु दशम्यां पूजयेन्नरः ॥ एकादर्याँ न छुजात पूजन चापराजितम्‌ ॥ यात्रा त्वेकादश- 
मुह्॒ते कार्या ॥ तथा च भूगुः--आशिनस्प सेते पश्ष द्शम्याँ सवराशिष ॥ सायंकाले शुभा 
यात्रा दिवा न विजये क्षण ॥ एकादशसुहृतों यो विजयः संप्रकीतितः ॥ तस्मिन्लवेविंधा- 
तव्या यात्रा विजयकांक्षिमिः ॥ दिनद्वये एकादशछझुहूर्ते व्यात्तावव्यात्ो वा श्रवणयुक्ता आया ॥ 
तथा च हेमाद्रौ मदनरत्ने कश्यपः--उदये दशमी किचित्‌ संपर्णकादशी यदि ॥ श्रवणक्षे यदा 
काले सा तिथिविंजयामिधा ॥ श्रवणक्षें ठ॒ पूणायां काकुत्स्ः मस्थितों यत। ॥ उलछडघयेयुः 
सीमान्‍्तं तदिनक्षें ततो नरा१ भत्र ऋत्यम्‌ ॥। मविष्ये--शर्मी खुलक्षणोपतामी शान्याशाप्रतिष्ठि ताम। | 


वो सदा लक्ष्मीसे युक्त रहती हैँ और पुत्रोंकी भक्तिसे सम- 
न्विव होती हैं वो मनुष्य छोकमें वविरकाछतक रहकर अन्त 
में विष्णुलोकम प्रतिष्ठित होतो हैं। जो पुरुष द्शमीके दिन 
मत्स्यादि दुशों अववारों को पूजते है में ऐसा मानता हूँ कि 
वे द्शों दिशाओंमें सुखपूर्वक जिचरकर अन्‍्तर्मे विभानपर 
चढ़ मुरारिके छोकको चले जाते हूँ । यह भाद्रपद शुक्ला 
इशमीके र्िनिका दृशावत्तार ब्रत पूरा हुआ।। _ 

विजयादशमी--आश्विन शुक्ला दृश्मीको कहते ह उस 


कर 


वरोंके उद्यकालमें व्याप्त रहनेवालीको 


भ्र्छ 


५५३2 5३ ५ 
हैं। वो सारे काम और अथाका सिद्ध करनेवाला हैं है, 


जिताकी पूजामें पूर्वाही छीजाती हे, यही भविष्यपुराणसे 


लेना चाहिये, | 
चिन्तामणि ग्रन्थमें यही कहा है कि; आश्विनशुक्छा दुशसी | 


के दिन तारोंके उद्यमें जो समय है वो विजयका सम्बन्ध | शज़य कहते हैं जो जीत चाहते हैं उन्हें उसीमेंयात्रा करनी 
| चाहिये । यदि दो दिन एकादश मुहूते व्ययपिनी अथवा 
रत्नकोशर्म छिखा हुआ है कुछ सन्ध्याका आक्रमण कर्ऊे। 
कुछ तारे निकछ आये हों. उस समयका नाम विजय हूं | 
वो सारे काम और अर्थोकों पूरा करनेवाला है। यदिद्धों | 
दिन वारोंके उद्यमें व्यापक हो अथवा न हो तो अपरा- | हो जब श्रवण नक्षत्र हों उस तिथिको विज्ञया कहते हैं, 
| पूर्णामें श्रत्रण नक्षत्रमें रापने प्रस्थान किया था इस कारण 
लेकर हेमाद्विने लिखा है कि दशमीके दिन तो मनुप्योंको 
भ्पराजिता देवीका मढी सांति प्रयत्तपूवरक पूजन करना 
चाहिय, अपराइके समयमें इंशाती दिशास लेकर । जो ' 








दशमी नवमीस युक्त हो उसमें क्षेत्र ओर विजयके लिये 
अपराजिताका विधिपूवक पूजन करना चाहिये। नवभीके 
शपसे संयुक्त द्शमीके दिन पूजी गई अपराजिता देवी 
विजय देती है. क्योंकि पूजित हुई अपराजिता जयकों 
बढानेवाली होती हैं. इसकी पुष्टिम और भी प्रमाण देते हैं 
कि आश्रविन शुक्‍्छा दशमीको पूजना चादिये. क्योंकि, 
एकादशीमें अपराजिताका पूजन न करना चाहिय,विजया 
दशमीके दिन यात्रा तो ग्यारह मुह॒तेमें करनी चाहिये। 
यही भ्रगुने कहा है. कि-आश्विन शुक्का दशमीके दिन 
सबी राशियोंमें सायेकालके समय विलय मुहूर्तमें यात्रा 
करना जच्छा हें द्वम नहीं | जो ग्यारहवां मुद्ृ्ते हे उस 


अव्यापिनी दश्षमी हो तो श्रवण युताका ग्रहण करना 
हा आप हल ७ 

चाहिय। यही हेमाद्विने तथा मदनरत्नने कश्यपका प्रमाण 

रखा है कि उदय काछने दक्षमी हो बाकी संपू् एकादशी 


विजया थी। मनुप्य्ठसी दिन उसी नक्षत्रमं सोमाका 
अतिक्रमण करे । उसम क्‍यों करना चाहिये यह भविष्यमें 
लिखा हुआ हैं कि, सव लश्षणोपेत इशान दिशाक्री झमीकी 


[ दर्षमौ- 
संत्राथ्य तां च संपूज्य त्वीशानीसंमुखों मवेत्‌ ॥ तत्र मंत्रः-शमी शमयते पाप॑ शमी शा 
विनाशिनी ॥ अज्ञुनस्यथ धलुधोरी रामस्थ भ्रियवादिनी ॥ शमी शमयते पार्ष शमी लोहितक- 
ण्टका ॥ धारिण्यज्ञुनबाणानां रामस्य प्रियवादिनी | करिष्येमाणयात्रायां यथाकालं खु्ख मया। 
तत्र निर्विन्नकर्त्ी त्व॑ भव श्रीरामपूजिते ॥ गशहीत्वा साक्षतामाद्रों शमीमूलगतां मृद्म। 
गीतवादित्रनि्षषिरानयेत्‌ स्वग॒हं प्रति ॥ ततो भुषणवस्थादि धारयेत्‌ स्वजनेः सह। 
शम्यमभावे वनराजपूजा काया ॥ ततन्न मन्त्र+-आदिराज महाराज वनराज वनस्पते॥ दइृष्टदर्शर 
मिष्ठात्नं रात्रणां च पराजयः ॥ अथापराजितद्शम्यां पूर्वोक्ते विजपास॒हूतलें उक्त प्रास्थानिकः 
मिल्युपक्रम्य गोपथबाह्मणे तदप्येते छोकाः-अलड़कृतो भूषितभृत्यवर्गः परिष्कृतोत्तड्रतुरड- 
नागः ॥ वादित्रनाइम्तिनादिताशः मुमड्रलाचारपरम्पराशीः ।। राजा निर्गत्य भवनाव पूरो 
हितपुरोगम३। भास्थानिक विधि कृत्वा अतिष्ठेतूवेतों देशि ॥ गत्वा नगरसीमान्तं वास्तु 
पूज़ां समाचरेत्‌ ॥ संपूज्य चाथ दिक्पालानू पूजयव पाये देवता ॥ .मन्त्रेवीदेकपौराणेः पूजयेच् 
शमीतह्म॥ अमद्लानां शमनी सर्वाधिद्धिकरीं शुभाम ॥ ढुःस्वप्नशमनी घन्यां प्रपद्येपह शर्मी 
शुभाग॥ ततः ऋताशीः पूर्वस्याँ दिशि विष्णुऋमात ऋमेत॥शत्रोः प्रतिकृति ऋत्वा ध्यात्वा राम॑ 
तथार्थदम्‌ ॥ शरेंण स्वर्णपुद्धेन विध्येदधृद्यममोणि। दिशाविजयमन्त्राश्व पठितव्याः पुरोधसा। 
एवमेव विधि कृत्वा दक्षिणादिभिरंचयेत्‌ ॥ पूज़्यानिद्रजाँध संपूज्य साँवत्सरपुरोहितो ॥ 
गजवाजिपदातीनां प्रेक्षाकोतुकमाचरेत्‌ ॥ जयमड्गलशब्देन ततः स्वभवन विशेत्‌ ॥ नीरा- 
जमानः पुण्यात्रिगाणिकानिः सुमड्रलम्‌ ॥ य एवं कुरुते राजा वर्ष वर्षे सुमड्रलम्‌ ॥ आयुरा- 
रोग्यमेश्वय विजय॑ स च गच्छाति ॥ नाथयो व्याधयश्रेव न भवन्ति पराजयाः ॥ अश्रिय 





तब्रतराजई | 




















दिल आज की 
हुआ 








40 का कद 
वनजआननननल+ 
»-तम/ ० प-ननकककनल«त---3५०३++नन ४स5...रलॉकनमगल्‍मकाक + क्‍कओ-मन-ज4“+“न++ पका 











पुण्यमवाप्नोति विजय च सदा झ्ुवि। इति ॥ परास्थानिकप्रकारश्वेत्थमू--अआशिनस्य सिते पह्ष 


पूजा करके प्रार्थना करे फिर इंशानी दिशाके सन्मुख हो 

जाय । यह प्राथनाका मन्त्र हैं कि, शमी पापोंको नष्टकरती 

है, शमी वेरियोंक्ा विनाश करती हैं, अजुनकी घनुष- 

धारिणी ओर रामकी प्यारा बोलनेवाली है, शमी पापोंको 

नष्ट करनेवाली है झमीके काटे छोहेके है तू अजुनके बाणों 

को धारण करनेवाली है रामकी प्रियवादिनी हैं । में अपने 
'मुहूर्तमे यात्रा करूंगा । हे श्रीरामपूजित - उसमें तू निषिन्न 
क्रना, अक्षतोंके साथ भीगी हुई शमीके मूलकी मिट्टी 

छंकर गाजेबाजिके साथ अपने घर के आये। पीछे अपने 
'स्वजनोंक साथ भूषण बखादि धारण करें शमी न मिले 
'तो बनराजकी पूजा करे! उसका सन्त्र-हे वनस्पते ! हे 
आदिराज ! हे महाराज ! हे वनराज ! इष्टका द्शन, इष्ट 
'अन्नका दान ओर शजत्नुओंका पराजय सुझे दीजिये।। अप- 
'राजित दुश्षमीक दिन पहिले कहे हुए विजया मुहूतमें 
प्रास्थानिक कृत्यों करा उपक्रम लेकर गोपथत्राह्मणमें यद्यपि 
ये इलोक कहे हैं कि-स्वय अलंकार किय हुए हैं सब 
नोकरोंको सजादे बडे २ घोडे हाथी सिंगारे हुए हों नगाड़े 
आदि बज रहें हों जिससे दिशाएं गूँज रही हों सुमझ्गला- 
चारके साथ आशीर्वाद दी जारही हॉं। अगाडी २ पुरो- 
हो नगरकी सीमाके अन्त्तक जा बार हट 

तक जा वास्तु पूजा करे दिगपालों 





* शम्ननी दुष्कृतस्य च । २ वा मनसाथ तम्‌ | 


का पूजन करके मार्गमें देवताओंका पूजन करे, पुराण व 
वेदके सन्त्रोंसे शमीके वृक्षोंका पूजन करे । अमज्जडोकेन! 
करनवाली, सब सिद्धियोंके करनवाली दुःस्वप्वोंके नप् 
करनेवाढी शुभ धन्या शमीकी शरण प्राप्त हुआ हूँ ( कही 
“शमनीं दुष्कृतस्‍्य च” सब दुष्कृतोंको नष्ट करनेवाढी 
यह अन्तिम पाठ है इसके बाद आशीर्वाद द्वोनेपर पूष 
द्शाम विष्णु ऋमस जाय, शत्रुकी मूति बना अथेक देने 
वाले रामका ध्यान करके । “वा मनसाथ ते”? मनसे उसे 
यह अधके अन्तका टुकडा है।) रवणेपुंख शरसे हृद्यके 
मममें भद्‌ दे, पुरोहितको चाहिये द्शाके विजयके मन 
का स्वये पाठ करे; इस प्रकार सब विधियोंडो करके 
दुक्षिणादिके साथ पूजे कहीं '(मिरचंयत्‌' की जगह 'दिशा' 
स्वपि! दक्षिणादिक द्शाओंमें मी पूजे यह भी पाठ है| 
पूज्य ब्राह्मणों और सांवत्खर एवं पुरोदितका पूजन करऊे 
गज घोडा और पदातियों के दिखानेके कॉतुक आरस्भ कर 
दे । पीछे जय और मजह्ढछके शब्दोंस अपने घरमसें मे 
करे।अच्छी २ वेश्याएँ मज्ञलूपूक आरती करे। इस मका 
जो राजा प्रतिवर्ष सज्ललठ करे आयु जारोग्य ऐश्वय गो 
विजय उच्त मिलते हैं।न आधिया होती दैँ एवम्‌ न व्या' 
धियाही होती हैं न पराजय ही होतीहै पवित्र श्रीको पाता 
पाजज+-_-.._.२६३॥॥ टेंगपाडों भूमिपर सदाविजय होतीदे॥ प्रस्थानका प्रकार-आशिनयु संदाविजय होतीहें॥ प्रस्थानका प्रकार-आश्िनयुक्क 


३ दिशास्वपि | इत्यपि पाठः | 


ब्रतानि, | 


ध्राषाटीकासमेलतः ! 


पद 2 





90057 





बस. न्‍न्‍्णमनन 


धिवश्व॒ इन्दुभीन्वीणाश्ोपवादयेताततो घटोत्थापनानन्तरं सुचारू 
वेषः सुभूषितः संभाराठुपकल्प्प एकादशसुहूतें श्रवणयोगे सीमानते गत्वा पश्चाद्गहे जने। 
सह सुबर्णसहिल आममाविशेत्‌ ॥ योषिद्धिः कोतुकेश्व प्रज्वालितेदिपेनीराजनाअनाललेपन 
कारयित्वा वासोगन्धेस्नवपुष्पेश्व पूजयित्वा हिरण्यरूपमिति मन्त्रेण खुवणेपृजन कृत्वा आशिषः 
प्रतिग्य लक्ष्मी नमसस्‍्कुर्यात्‌ ॥ सर्वा भगिनीवेखाल रघूबणेः पूजयेद्राह्मणांश्व गन्धपुष्पधूपदी- 
पके! ॥ इति विजयादशमी ॥ इति दशमीत्रतानि समात्तानि॥ 
अथेकादशीत्रतानि । 
एकादशीनिणय$ || 

तत्रोपवास एकादशीनिणयः । उपवासश्वच निवेधपरिपालतात्मक्ो ब्रतरूपथ्च ॥ सा च॑ 
द्विविधा | शुद्धा दशमीविद्धा च ॥ वेधो४पिः द्विविधः ॥ अरूणोद्यद्शमीसम्बन्धात्‌ खूयोंदये 
च॥ तवाद्यो वेष्णवैस्त्थाज्यय । तथा च भविष्ये---अरूणोदयकाले ठु इशमी यदि इृर्यते ॥ 
सा विद्वेकादशी तत्र पापमूछछ॒पोषणम्‌ ॥ तथा-दशमीशेषसंयुक्तो यदि स्थाइरुणोदयः ॥ 
तेवोपोष्य॑ वेष्णवेन तहिनेकादशीतव्रतम ॥ अरुणोदयल्वरूप ठु हेमाद्रों स्परत्यन्त दर्शि- 
तम-“निशित्रान्ते तु यामादँव देववादितनिःस्वने ॥ सारस्वतेइनध्यसने अरूणोद्य उच्यते ॥ 
यामा्मू -छुददवेदयल॒क्षकम्‌ ॥ अत एवं सौरधमें--आदित्योदयवेलायां या सुहूर्तेद्रयान्विता ॥ 
सैकादशी त संपूर्णा विद्धाउल्या परिकी्तिता ॥ यज्च माधवीये स्कानदे--- उदयात्माकूचतस््रस्तु 
घटिका अरूणोदयःइति । तदपि द्वार्तिशदटिकारात्रिमानपक्षे. सुहृतद्॒यस्य तावत्परिमाणत्वा- 
दशमौके दिन जब मनुष्य चलने छगें तब राजा नक्काई़े | हैं) एकादशी दो प्रकारकी होती है,शुद्धा और दशमीविद्धा 
और वीणाओंको बजवाये, इसके बाद घटके उत्थापनके * शुद्धा जिसमें किसीका वेध न हो,जिस एकादशीके दिन भी 


दशम्यां जनेषु गमिष्यत्सु पा 


पीछे अच्छे वेषभूषास भूषित होकर संभारोंकी कल्पना | 
करके ग्यारहवें मुहृतमें श्रवणके योगमें सीमान्त जाकर | 
पीछे घरके जनोंक साथ सुवर्णसहित गाममें घुस जाय | | 
जिन्होंने कौतुझस जले दीपक हाथमें लिय हुईं स्लियोसे | 
नीराजन और अनुरेपन कराकर वास गन्धमाढा और 
पृष्पोंसे पूज, 'हिरण्यरूपम्‌! इस मन्त्रसे सुबणका पूजन | 
करके आशीर्वाद ले लक्ष्मीको नमस्कार करे, सत॒बहिनों | 
को बस्ध अछंकार और भूषणोंसे पूज तथा गन्धघ, पुष्प, धूप | 
ओर दीपकोंसे ब्राह्म॒गोंका पूजन करे | यह विजयादश्ी ' 


पूरी हुईं! इसके साथ ही द्शमीके ब्रत भी पूरे होजाते हैं । 
एकादशीव्रतानि । 


अब एक्कादशीके ब्रत कहे जाते हैं, उनमें उपवासकों | 
एकादशीका निणय किया जाता है-डपवास दो तरहका | 
होता हे. एक निषेध परिपावबन रूपी, दूसरा ब्रवरूपी | 
( पहिछा-जैसे कि, दोनों पश्चोंकी एकादुशीमें भोजन न | 
करे, यहां जो भोजनका निषध किया हैं इस निषंघके 
पाछन करनेसे एकादशीके दिन निषध मुखस भोजनाभाःव | 
रूप उपवास आ उपस्थित होता है | दूसरा-जैसे कि,एंका- | एस जो यह माधः 
दशीके आनेपर दशमीके दिल ही उपवासका संकस्पकरक | स्कान्दका प्रमाण लिखा हैं कि-सूय्योंद्यस पहले चारघडी 
व्रत करे,ऐसे वाक्योंमें जो कि,एकादशीके दिन उपवासका | 
विधान करते हैं उनमें त्रतरूपस उपवास आ उपस्थित होता | 





९ तद्धि नेकादशीत्रतम्‌ इत्यपि क्चित्पाठ: | ३ 


दृशमी किसी रूपसे आजाय वो दह्ममीविद्धा एकादशी 
कहती है। बेध भी दो प्रकारका होता है, पहिछा-अरुणो* 
दयवेध दूसरा सूर्योद्यवेघ, ( अरुणोद्यके समयमे दश्चमी 
का वेध एकादशीमें आये तो उस अरुणोद्यवेध कहैँगें ) 
अरुणोदयवेघ वेष्णबोंको न लेना चाहिये, यद्दी, भविष्य 
पुराणमें लिखा हुआ हैं. कि--अरुणोद्यके समयमें यदि 
दशमी दीखे तो उसे विद्धा कहेंगे, इसमें उपवास करना 
पापका कारण हैं | दूसरा एक वचन ओर भी हैँ कि-- 
दृशमीके अवशिष्टांशसे संयुक्त यदि अरुणोद्य हो तो उस 
दिन वेष्णवको एकादशीके ब्रतका उपवास नहीं करना 


चाहिये | अरुणोदयका सर्व हूप-तो हेमाद्विने स्मृत्वन्तरस 


दिखाया है कि; रातके आखिरी हिस्सेंस अधिेपहर जबकि 
देवताओंके नक्कारे बजते हैं, पडनेकी अनध्याय रहदी है 
उसे भरुणोद्य कहते हैं। इसमें आया हुआ यामाधशब्द्‌ 
आधापहर यानी दो मुहृर्तस मतछब रखता हैं; तबही सोर 
धर्मम कहा है कि, आदित्यके उदयके समयमें जो पहिले 
दो मुहृत ( चार घटिका ) एकादशी रहे वो सम्पूण हैं 
वाकी सबको विद्धा समझना। जो यह माधवीयभन्थर्ते 


अरुणोदयकाहू रहता हैं; इसपर द्वेतनिणयमें लिखा है कि, 
चार घडीका अरुणोदय तो बत्तीस धडीकी रात होती है 





३ रह 


ध्ि $ जे ब्यूत्कक + +:5 न की श्र हर 
बादने इत्यपि पाठ: | डुवेरिति कचित्याटः : 


( ३६२ ) ब्रतराजः | | एकांदेशी- 








दुकंमिति द्वैतनिर्णय ॥ येडपि अह्मवेबलें--“चतसल्लो घटिकाः प्रातररुणोद्यनिश्चयः ॥ 
चजुट्ठयविमागोउत्र वेबादीन। किलो दितः ॥| अह गोदयवेधः स्थात्‌ सारू ठ घटिकात्रयम्‌ ॥ 
अतिवेधो द्विवटिकः म्रभासनदशैनाद्॒वेः ॥ महावेधो5पि तत्रेव दृश्यतेःकों न दृश्यते ॥ तुरीयस्तत् 
विहितो योगः खुबोंदयि सति ॥ इत्यादयो वेधा उक्तास्ते चावाग्दोषातिशयार्था द््ति 
मयूथें ॥ अन्यश्च--पश्चपञ्व॒ उषः्कालः सतपश्चारणोदयः ॥ अष्टपश्व भवेत्‌ भातः शोषः 
सूर्योदयः सुप्गुतः ॥ वेश क्षण तु स्कानदे-“परमापदम।पत्नो हषे वा सझुपस्थिते ॥ नकादर्ी 
त्पनेद्यस्तु यंध्य दीक्षा तु वेष्णवी ॥ भविष्ये--यथा शुक्षा तथा कृष्णा तथा कृष्णा तथोत्तरा॥ 
तल्ये ते मन्यले यस्तु स हि वेष्णव उच्यते ॥ स्मातानां वैध: || अतिवेधादय: सर्वे ये वेधा- 
स्तिथिषु स्मृताः ॥ सर्वेप्यवेधा विज्ञेया वेधः खू्योद्यः स्घृतः ॥ इति मदनरत्रठ्ठतस्प्त्युक्तः 
सूर्योदयवेधः स्मार्तविषय एवं ॥ एकादशीभेददाः । तत्र छुद्धा विद्धा एकादशी चठतुद्धां ॥ 
एकादशीमात्राधिका ॥ द्वादशीमात्राथिका ॥ उम्याधेका ॥ अछ भयाषेका च।॥ परेचव्रतर्‌-- 
तत्र शुद्धायामेकादश्याजिक्ये परेश्यृहपवासमाह नारद----सम्पूणकादशी यत्र द्वादरयां बृद्धि- 
गामिनी ॥ द्वाददर्या लदा-घन कार्य त्रयोदद्यां तु पारणम्‌ ॥ उपोषणस्‌--प्रृद्धवसिष्ठ।णकादशी यश 





इस मानके पक्षमें दो मुहूतीको चार घडीका होनेके कारण 


छू व्फ ध् * से ४ 
कह! हे। तरह्मवैवर्तमें जो यह छिखा हुआ है कि। प्रातःकाल | होती हैं। शुद्धा और विद्ध। दोनों ही एकादशी चार चार 
चार घडीका अरुणोद्य होता हैँ यह निश्चय है, यहां वेध 


श्र अर तरहकी होती हैं। सबसे पहिले श॒द्धाकेद्दी भेदोंको दिखातेंह 
के चार भाग कहे हैं। अरुणोद्यवेध साढे तीन घडीका | ड़ हल शुद्धाकहा भदा का दखातह 


सु ह गा प जल ५ <“उकाद तैम्तात्र ध्टि कृ ५ हि र्श [, 3८ ५ 
होता हैं, रविकी प्रभाके दीखनेसे पहिले दो घडीका अति- | शीमात्राविका, २-द्वादशीमात्राधिका, ३-उभ्या 


बेध होता हे, इसीमें अवशिष्ट का महावेध होता ह । यदि | धिक्का, ४-अनुभयाधिका, (जिसमे एकादशी ही अधिक 
[] का] कर | स्‌ः 2५ ५ रु सा 
तूय्य न दीख तवतक यह अरुणोदयके वेधोंमं आखिरीवेध हो यानी सूर्योदयके बाद अधिक रहे वो अधिक कहाती 
कप कप ७ | २ दे 
होता है, इस समेत ये तीन अरुणोदयके भद्‌ ह। यह | है| जैसे दशमी ५५ घडी दो, एकादशी ६० हो द्वादशीक्रा 
आखिरी साढ़े तीनस अगाडी होता है, सूर्योदय होनेपर 


हैं कि, पहिली शुद्ध और दूसरी दममीविद्धा (या विद्धा) 







दे ५ हम जे है नपर | क्षय होकर ५८ रह गया हो। जिसमें द्वादशी सूस्यके 
जो वेध हो उस चोथा वेध कहते हैं । यह ब्रतराज॑के यहां 


है,इस वातको दिखानेके छिय किये गये हैं।यह मयूखग्रन्थम 
हिखा हुआ है। २ 
है। यदि घटता है तो ६ घटिकातक घट जाता है यदि 
बढता है तो ५ बढ़ जाता है, साधारण मानकी दृष्टिसबोलछ 
रह हू कि, पचपनपर उषः:काछ तथा ५७ पर अरुणोदय, 


छक्षण-स्कन्द पुराणमे कहे हैं कि, चाहे उस परम आननन्‍द 
करे एवं जो वेष्णवी दीक्षास दीक्षित हो वो वेष्णब है। 


भविष्यम कह है कि, जैसी शुक्ल वैसी ही कृष्णा एवं 
जख्ी कृष्णा वेसीही शुक्ल दोनोंको बराबर माने वही वैष्णव 


कहा जाताह ॥ सूर्योदयके वेघकी प्रधानता--स्मातके यहां | 


हैँ के विक्यका वाक्य मद्नरत्नथृतस्म॒तिमें हैं कि-जो 
। वंधा यॉ ऊ किक ऐ 

अति वेधादिक सबवेघ तिथियों 

हैं. उन्हें अवेध समझना च 


है (हिय, केवल स्‌ः योदिय बेध 


के भदु-दो तो पहिछे करही आये 


| साठ घटिकाका साधारण अहोरात्र होता | 


थयॉमे बताये है वे सब वेध नहीं | 


दूसरी वेध हैं क्‍योंकि पहिले तो अरुणोद्यम आ | अनन्तर अधिक हो जैसे दशमी ५०५ एकादशी ५८ ओर 
सरी वर्‌हका वेध हूँ क्योंकि पहिले तो अरुणोदय्म आ* | (दी ६० घड़ी के शविकहों जैसे दशमी 
गये । ये वेध पूर्व उत्तरोत्तर दोषके अतिशयको दिखानेके |. दृशी ६० बडीही। जिपमें दोनों अधिकहों जस दश 


लिये हैं यानी पूर्वेके वेधेस उत्तरका वेध दोष अधिक होता | 


०० एकादशी ६० घडी एक पक तथा द्वादशी ६५ हो 
इसमे एक पल एकादशी तथा ५ घडी द्वादशी अधिक हुईं 


| जितमें दृशमी ५५ एकादशी ५७ और द्वादशी अटूठावत 


हो इसमें एकादशी भी कम है और द्वादशी भी कम हैं ) 


| इसी तरह विद्धाके भी येही चारभेद होते हैं ) जेसीदशमी 
हे अरुणोद्य, | ४ घड़ी अधिक हो, एकादशी २ हो एवम्‌ दादेशीका क्षय 
अद्वावनपर ग्रावःकाल तथा शेषपर सूयादय होताहे । वेष्णव 


होऋर ५८ रह गयी हो | दशमी २, एकादशी ३ ओर 


> | हाइशी चार इसमें एकादशी और दादशी दोनोंही अधिक 
हो चाहे परम आपन्न हों जो एकादशीके ब्रतका त्याग न | हैं। जिसमें दशमीकी एक घडी वृद्धि हो एकादशीका क्षय 
| होकर ५८ रह गयी हों दवादशीकी वृद्धि होकर वो ६०घडी 


| १ पलकी हो गयीं हो, यह हुईं द्वादशीमात्रकी इंड्विवाढ़ी 


विंद्धा । एबम्‌ दशमी २ एकादशीका क्षय होकर ५६ रह 
गयी हो तथा द्वादशी भी ५० हों. इसमें न .तो एकादशी ह्द 
अधिक है, एवं नद्वादशी ही है ) इनमें शुद्धाम एकादशी 
की अधिकतामें नारद दूसरे दिन उपवास कहतेहेंकि-जिलर्म 


| पूरीएकादशीहो और द्ादशीवालेदिन बढती होतो आदश 
| में त्रत करके त्रयोद शीसें पारणाझइरनी चाहिये। दुद्धत॒सिकवत 


००५५-४0 ०33 52 ७७७७०८ ५६५ २७८४४ ७०००४ 22 ५ ४४ 205 2222० 5.0 


ब्रतानि, ] 


भाषाटीकासमेतलः । ( #६३ ) 








लुप्ता परतो द्वादशी मवेत्‌ ॥ उपोष्या द्वादशी तन्न यदीच्छेच्च पराइनिम्‌ ॥ मुगुः--संपर्णकादशी 
यत्र प्रभाते पुनरेव सा ॥ तदोपोष्या द्वितीया ठ परतो द्वादशी यदि ॥ स्काप्दे--प्रथमेःहनि संपूर्णा 
व्याप्याहोरात्रसेयुता ॥ द्ादश्यां तु यदा तात दृश्यते पुनरेव सा ॥ पूर्वा कार्या गहस्थेश्व यति- 
भिश्वोत्तता विभो॥ माक्कंण्डेयः-सम्पूणकादशी यत्र प्रभाते पुनरेव च ॥ पूर्वासपवसेत कामी 
निष्कामस्तु परां वसेत्‌ ॥ हेमाद्रो-विद्धाप्यविद्धा विज्षेया परतों द्ादशी न चेत्‌ ॥ अविद्धापि च 
विद्धा स्थात्परतो दाइशी यदि ॥ मचेताः--एकादशी विव॒द्धा चेच्छक्ले कष्णे विशेषतः ॥ उत्तरां तु 
यतिः कुयोत्‌ पवासुपवसेहही ॥ सनत्कुमारः--न करोति हि यो मूठ एकादद्यासुपोषणम्‌ ॥ ख 
नरो नरक याति रोरवे तमसावते॥यदीच्छेद्धिपुलान भोगान स॒क्तिं चात्यन्तदुलेभाम ॥ उपोष्येका- 
दशी नित्य पशक्षयोरुभयोरपि ॥ माधवष्प्युक्तम-्कादशी द्ादशी चेत्युभय॑ वद्धेते यदा ॥ लदा 
पूर्वेदिन त्याज्य स्मार्तेग्राह्म॑ पर दिनम्‌ ॥ तयोदरयां न लबभ्येत द्रादशी यदि किश्वन ॥ उपोष्ये- 
कादशी तत्र दशमीमिश्रिता यदि॥इति स्कानदाव ॥ हेमाद्रविमते एकाइशीभेदा--शुद्धा विद्धा दसी 
नन्‍्दा विधा न्यूनसमाधिकेःपषट्प्रकाराः पुनखेघाद्ादश्यूनसभाविकेः ॥ इत्यट्टादशेकाद शीमेदा$॥ 
विश्:- ॥पाग्मे--सम्पूर्णकादशी त्याज्या परतो द्वादशी यदि ॥ उपोष्या द्वादशी शुद्धा द्ादद्या- 
मेव पारणमपारणाहे न लभ्येत द्ादशी कंलंयापि चेत्‌ ॥ तदानी गैबिद्धा उपोष्येकादशी 
तिथिः ॥ बहुवाक्यविरोधन संदेहो जायते यदा ॥ द्वादशी ठु तदा आहया त्रयोदद्यां तु पार- 
णम्‌ ॥ ति माकेण्डेयः ॥ कात्यायन+-अष्टव्षाधिको मत्यों छशीतिन्यूनवत्सरः ॥ ए्कादइया- 
मुपवसेत पक्षयोरुभयोरपि ॥ भविष्ये--एकाददयाँ न छुब्जीत पक्षयोरुभयोरुपि ॥ बह्ायचारी च 
नारी च शुक्वामेव सदा यही ॥ सधवायास्तु भत्रोज्ञयाधिकारः ॥ तथा च विष्णु--पत्योजीवति 





कहा है कि, जब एकादशीका छोपहो और अगाडी द्वादशी 
हो तो द्वाद्शीक दिन उपवास करना चाहिए । यदि परम 
गतिका अभिलाषी हो तो । भगवान्‌ भ्वगुनेभी यही कहाहें 
कि; जिस दि प्रभावकाछमें एकादशी हो और दूसरे दिन 
भी वही हो तो द्वादशीका उपवास करना चाहिए। स्कन्द्‌ 
पुराणमें--यदि पहले दिन अहोराज्रको मिलाकर सब एका- 
दृशी हो ओर द्वादशीके दिनभी वही हो तो यृहस्थियॉको 


पहिली और यतिलोंगोंको दूसरी करनी चाहिए । मार्के- 
ण्डेय पुराणमें कहा हें--जिस दिन सम्पूर्ण एकादशी हो | हु 5 * 
| हो वो सपृण एकादशीको छोड देना चाहिये ओर वहां 


ओर दूसरे दिनभी प्रभातकालमें यदि एकादशी हो तो 


कामना रखनेवाला मनुप्य पहिल्ी और निष्कास वेष्णव | 
दूसरे दिनकी एकादशी करे । हेसाद्विमं यदिं दूसरे दिन, 
द्वादशी न हो तो विद्धामी अविदड्धा और यदि दूसरे दिन | 
द्वाइशी हो तो अविद्धामी एकादशी विद्धा मानी जाती हैं। | न 
| सन्देंह होवा हो तो द्ादशीका अहण करना चाहिये और 


प्रचेढाने कह हैं-शुक्वमें या कृष्णपक्षमें यदि एकादशी बढी 


हुयी हो तो दूसरीको यति और पहिलीको गृहस्थी करे। | 
सनत्कुमारने कहा है कि जो मूख मनुप्य एकादशीका उंप- | 
वास न करता हो वह अन्धकारपूर्ण रौरव नामके नरकसें | 
जाता है । यदि विपुरू भोगोंकी अमिलाषा हो ओर अत्यन्त | 

| एकादशी करें। गहरी, शुह्पक्षकी हो एकादशी करें। 


दुल्भा मुक्तिकी इच्छा हों तो दोनों पक्षोंकी एकादशीका | प द्शी क 
ध | तथा सौभाग्यवतती खीको अपने पतिकी आज्ञासे करवेका 


भवश्यही उपवास करना चाहिये । तथा माधवमें भी ।| 


श $ हे कक श्र न गति 
नद्स कहा हे कि--जिस दिन एकादशी और. ढादशी | अधिकार है-विप्णुपुराणमें कहा हैं. कि। पतिके जीते हुए 





दोनों बढती हो तो उस दिन पहलीका त्याग तथा दूसरी 
का स्मार्त लोगोंकों ग्रहण करना चाहिए। त्रयोद्शीक दिन 
यदि द्वादशी न हो तो उस दिन एकादशीका उपवास 
करना चाहिये, चाहे वह दशमी मिश्रित भी हो | हेमाद्विके 
मतसे १८ प्रकारकी एकादशी होती हैं अर्थांत्‌-शुद्धा, 
विद्धा, ये दोनों न्‍्यून, सम, अधिक इन तीन भेदोंसे छः 
प्रकारकी हुयीं फिर भी ये छओ दादशीसे न्‍्यून, सम, 
अधिक इन भदोंस तीन तीन प्रकारकी होकर १८ प्रकारकी 
होती हैं । पद्मपुराणमें कहा है कि; यदि दूसरे दिन द्वादशी 


शुद्ध ढादशीका ही उपवास करना चाहिये और उसी 
दिन पारणाभी करना चाहिये। यदि पारणाक दिन अंश- 
मात्रमी द्ादशी न हो तो उस समय दशमी विद्धा एका- 
देशी करनेका विधान हैं! यदि वहुतसे वाक्योंके विरोधसे 
त्रयोदशीकों पारण करें ऐसा माकंण्डेय ऋषिने कहा है। 
कात्यायनने कहा हैं कि-आठ वर्षकी अवस्थासे ऊपर ८० 
वर्षप्यन्‍त मनुष्यको दोनों पक्षकी एकादशियां करनी 
चाहिए। भविष्यम कहा हैं कि-अह्य चारी विधवा खरी दोनों 


(रेब४)....ख़ 


बतराजः ! | [ एकाइशी-- 






















है 4 +280 088 ॥2४५४४१५ 














या नारी उपोष्यत्रतमारचरेत ॥ आयुष्य॑ हरते भतुंः सा 
नीमध्ये या कृष्णकादशी भवेत्‌ ॥ सेवोपोष्या गहस्थेन नान्‍्या कृष्णा कदाचन ॥ अच्र नात्या 
कृष्णेति न निषेधः ॥ संक्रान्त्यामुपवासं च कृष्णेकादशिवासरे ॥ चन्द्वसूर्यग्रहे चेव न कुर्याद पृ 
वान्गही ॥ इतिनारदवाक्यात्‌॥ आदित्येःहनि संक्राग्तों महणे चन्द्रसू यंयोः ॥ पारण चोपबासंब 
न कुयात्पुत्रवान्गही ॥ इति वचनान्तराज्रोधान्व कृष्णेकादश्याप्ुपवासभात्प्यभावात्‌ ॥ बताकर 
प्रायश्चित्तमाह माधवीये कात्यायन--अर्के पवद्वये रात्रो चतुर्दश्यष्टमी दिवा ॥ एकादर्यामहोराई 
भ्ुक्‍्त्वा चान्द्रायर्ण चरेत्‌ ॥ अथ दश्म्यांविधि।॥ तत्र दशम्याँ विधिः । कोर्में--कांस्यं मांस मसरांश् 
चणकान कोरेंदूषकान्‌ ॥ शाक॑ मधु परात्न च त्थजेडुपवसन्‌ स्वियम्‌ ॥ तथा शाके मौष॑ मस्‌- 
रांश्व पुनमॉजनमथुने 0 झतमत्यम्बुपानं च दशम्यां वेष्णवस्त्यजेत॥मदनरत्रे नारदीये--अक्षार- 
लव॒णाः सर्वे हृविष्यान्ननिषेविणः । अवनीतल्पशयनाः प्रियासड्रविर्वाजताः ॥ ब्तन्नान-ह हेमाडौ 
देवल+-असकूज्लपानाञ सकृत्ताम्वूलचवंणात्‌ उपवास प्रणश्येत दिवास्वापाश्च मेथुनाव | 
अशक्तोतु मदनरत्रे देवल:-अत्यगे चाम्बुपानेन नोपवासः प्रणश्यति ॥ अत्ययेन्‍्कष्ठे बतेबज्येम। विष्णु 
रहस्ये-गात्राभ्यड्रं शिरोपमयडुं ताम्बूले चातुलेपनम्‌ ॥ ब्रतस्थों वर्जयेत्‌ सबे यज्चात्यज्च निरा- 
कृतम्‌ ॥ एपषुप्रायश्रित्तमुक्तर्‌ ऋग्विधाने--स्तेनहिंसकयो:सरूय कृत्वा स्लेन्य॑ च हिंसनम ॥ प्रायश्षितं 





जो उपवास करे तो वह अपने पतिको अल्पायु बनाऋर | 


नरकमें जाती है | पद्मपुराणमं कहा है कि; शयनी और 


बोधनीके बीचमें जो कृष्ण एकादशी हों वेही ग्रहस्थीके | 
उपवास योग्य हैं, दूसरी न करे | 'नान्या कृष्णा कद्ा-| 


चन” कभी भी दूसरी क्ृष्णामें ब्रत न करे, यह जो निषेध 


है 


करना विषय नहीं है क्योंकि नारद्जीका वचन है कि- 


राजने पहिले कुछ गृहस्थके लिए कहकर पीछे पुत्रवान गृह: 


स्थके लिए निषध किया है इन दोनों वाक्योंक्ा मिलकर 
अथ होना चाहिए कि, पुत्रवान्‌ गअहणकों छोडकर बाकी | 


गृहस्थोंको देवशवयनी ओर देवबोधिनी एकादशीयोंके बीच । करता हुआ केबल हवि प्यान्षका भोजन करें, प्थ्वीमे शयत 
| करे, ख्री सज्गका त्याग करे ॥ देवढने हेमाद्विमें लिखा हैं- 


का तात्पये है । तथा निणयर्सिघुने इन वाक्‍्योंको ब्रतराजसे | एकसे अधिकवार पानी पीनेसे या एकबार पान खाने 
उलटा रखा भी है, इसी लिए उन दोनोंका ऐसाही सम्ब- | दिलमें शयन करनेंसे और मेथुनसे उपवास नष्ट हो जाह 
व हैं | इसी डिए वे रखे भी हैं इनसे पहिले यह कह चुके | है ॥ शक्तिरहित मलुष्यके बास्ते सदनरत्नमें देवडकी उपि 
हू कि, गृहस्थ शुक्छा एकादशीको ब्रत करें, तब क्ृष्णाकी | 


की कृष्णा एकादशी भी कर लनी चाहिए इसीमें इस वाक्य 


प्राप्तिके बिना निषध भी कहांसे होगा? तब “लान्या कृष्णा 


करनेको कहनेवाछा भी न माना जायगा। अत एव ब्रत- 


द्शी का रविवार सक्रान्ति चन्द्र और सूर्यका ग्रहण इस दिलों 
शरण ओर उपवास बेटावाले गृहस्थको न करते चाहिये 





हूँ इसका कृष्ण एकादशीको ग्ृहस्थोके किए ब्रतका निर्षेध | 





इत्यादि वचनोके अनुरोधसे कृष्णा एकादशीमें उपवासकी 
प्राप्तिही नहीं है।॥ प्रायश्रिर्त्रतके न करनेपर मापवते 
कातद्यायनके वचनसे कहा हैं कि, अकंसे और दोनों पर्व 
यानी अमावस और पूर्णिमा रातको चतुर्थी और अष्टमी 
के दिनको तथा एकादशीक दिन अहोरात्रमे [भोजन करके 
चान्द्रायण ब्रत करना चाहिये । अथ दशमीविधि:--कृष्म 


| पुराणमें दक्नमीके सम्बन्धर्में छिखा हे कि,-दृशमीको व्रत 
सेक्रान्ति कृष्ण एकादशी चन्द्र और सूय प्रहणके दिल पुत्र | 
वान्‌ गृहस्थको चाहिंए कि ब्रत न करे”! यह विषय प्रायः | 
किसी न किसी तरह सभी घर्मशाजकारोंने रखा है । ब्रत- 


क्‌ रनेबाढा मनुष्य, कांसी, मांस; मसूर, चणे, कोदू आदि 
धान्‍्य शाक, शहद्‌ या शराब तथा दूसरे घरेका भोजन 
ओर ख्रीका द्याग करे और नात्ाप्रकारके श्ञाक, उदद, 


| मसूर, दुबारा भोजन, मेथुन, घृत .तथा बहुत जलूपानको 


दशमीके दिन वेष्णव न करे । मद्नरत्नमें नारदीयका 
वचन लिखा है कि, ब्रती मनुष्य क्षार या छृवणका भोजन 


लिखी हैं कि-यदि शक्ति न हो तो अल्यमें जल पीलेनेस 


हरि हे य्‌ | उपवास नहीं नष्ट होता ॥ अत्यय-कष्टको कहते हैं । विधु' 
कंदाचन” यह निषेध भी छृप्णाके ब्रतको गृहस्थोंके छिए न | रहस्यमें कहा है कि-शरीरमें या मध्तक् तेल मछते। पार 
कप न कर ० । | खाने; और उबटन आदिके छगाने तथा और और शात" 
ने कहा कि, यहां “त्ान्या कृष्णा” और कृष्णाको | 


॥* हब न्‍ हु कुक 
. . ७ यह निषध नहीं छगता यह कहा है। कृष्णा एका- | इस पूर्वोक्त बातोंके छहिए ऋग्विधानमें आयश्रित् 


वर्जित वस्तुओंके सवनको ब्रत करनेवाल् मलुष्य छोड ईं। 


कहा है-चोर या हिंसककी मित्रता करके चोरी 


निभा -_+-+त+++.......... ७4 या हिंसा हिंसा करके ब्रती मनुष्य प्रायश्रित्तमें गायत्रीका 
रनलिनननीक अबकी न दल विवी नि की कि नी किक आज जज ० ता ४४ ७७७७७ आक्रालाप 24 30 20058 86३५ ,४०४००७७७४७७७७ हे हि 


१-मांसमित्यषि पाठ: । 


| 
। 


4 
4 
4 


नारी नरक ब्रजेत्‌ ॥ पाह्मे-शयनीबोधि- 


श्रतानि, | धाषाटीकासमतः ! ( ३६७ ) 





ब्रती कर्याज्मपेन्नाम शतत्रयम्‌ ॥ मिथ्यावादे दिवास्वापे दहुश्ोःम्डुनिषिदणे॥ अष्ठाक्षरं जपे- 
नमंत्रं शतमष्ठोत्तरं शुच्िः ॥ # नमो नारागणायेत्य्टक्षरः ॥ दन्तघवहनियेषः ॥ हेमाद्रों वसिष्ठः- - 
उपवासे तथा शआआद्धे न कु्योदन्तवावनम्‌ ॥ करणे हानि: ॥ इन्तानां काष्ठसंयोगो दहत्यासह्म 
कुलम्‌ ॥ पिशेषविषि: ॥ एकाददयाँ शा प्राप्ते माधवीये क/त्यायनः-- टपवासो यदा नित्यः श्राद्ध 
नेमित्तिकं मंवेत ॥ उपवास तदा कुर्यादाप्राय पित्सोवितम॥ मातापित्रोः क्षये घाते भवेदिकादणशी 
यदि ॥ अभ्यच्य पित॒देबांध आजिप्रेत. पितलसेबितम्‌॥ उपवाधग्रदणविधिः ॥ बल्मत्ेवर्ते--मातते 
हरिदिने सम्यकू विधाय नियम निशि ॥ दशम्याम्ुपवासं च अकुयद्ििष्णवं त्रतम्‌ ॥ तत्र एचदर्यां 
सं$र१६- ग़हीत्वोहुम्बरं पात्र वारिपूणम॒दडःमुखः॥उपवासं तु गह्दीयाद्यथासंकटपर्येद्वु घ:॥ ओदुम्पाम्‌ 
तंम्रपयम्‌ ॥ मंत्रस्तु विष्णूक्तः ॥ एकादइ्यां निराहारः स्थित्वाहमपरे5हनि ॥ झोक्ष्यामि पुण्डरी- 
काक्ष शरण में भवाच्युत ॥ रैवादीनां तु हेमाद्रों सोरपुराणें---साविज्याप्यथवा नाम्ना संकल्प ठ॒ 
समाचरेव/वाराहे--इत्युच्चोर्य ततो विद्वान्‌ पृष्पाखलिमथापेग्ेत॥ ततस्तज्जल पिबेत- -अष्टाक्ष- 
रेण मंत्रेण त्रिजप्तेनाभिमन्त्रितमाउपवासफल प्रेप्छुःपिवेत्पात्रगतं जलम्‌ ॥ इति कात्यायनोक्तिः ॥ 
रत्रो संकल्ाः--मध्यरात्रे उदये वा दशमीवेधे राजो संकल्प इति माधवः ॥ दशम्याः सद्भदोषेण 
अधेरात्रात परेण त॒ ॥ वर्जयेच्वठ्रों यामान्‌ संकल्पाचेनयोध्तदा॥ विद्धोप्वासेःनवैस्तु दिन 
त्यकत्वा समाहितः ॥ रात्रौ संपूजयेदिष्णं संकल्प॑ च सदाचरेव॥ इति नारदीयोक्तेः | तत्र पुजाम 


भिधाय ॥ जाग्रणम्‌ ॥ देवल$--देवस्य पुरतः कुयौज्ञागरं नियतो ब्रती ॥ हादश्यां निवेदनमल्र इक्तः 
कात्यायनेन---अज्ञान्तिमिराम्धस्य ब्रतेमानेन केशव ॥ प्रसीद सुसुखो नाथ ज्ञानइष्टिपदो 


भव ॥ ह्वादद॒यां वर्ज्यतादह बृहरुपतिः-“दिवा निद्वां पराज्न च पुमभाजनमंथुन 


तेल द्वाददयामष्ट वर्जयेत्‌॥ हेमाद्री बह्माण्डे--पुनर्भोजनमध्यायों 


तीनसी जप करें । झूठ बोलकर, दिनर्में सोकर, बड़त 
पाती पीकर अष्टाक्षर मन्त्रकों १२०८ बार जपे। “ओं | 
नमो नारायणाय यह अष्टाक्षर मन्त्र ह। हेमादविंस वसिछ्ठने | हा ह५ रे 
| नका वचन है।। माधवाचार्य्यने दुशुमी के वेध होनपर रातस 


कहा है कि-उपवासके दिन तथा शआद्धके दिन दांतुन न 


करे क्योंकि काष्ठका दुन्तस्पशद्दी सात पीढीतक जला देता | 
हैं। एकादशीके श्राद्धविधानमें कात्यायनन कहा हूं कि- | 
नित्य उपवासमें यदि नेमित्तिक श्राद्ध पडता हो तो उसदिन | 
पिठ्सेवित भोजतको सूँघकर उपवास्त करे। मातापिताके 
क्षय दिनमें यदि एकादशी आवे तो पिततरों ओर दुवता- | 
ओंकी पूजा करके प्रिद्सवित लूघकर उपवास करे | बह्य- 
वेबत्तमें कहा है कि-एकादशीके प्राप्त होनेपर दशमीकी | 
रातमें नियमपूर्वक रहकर एकादशीके दिन वेष्णब उपवास | 
करे । ओर उस दिन उदुम्बर ( ताम्बेका ) बत्तन हाथमें | 
लेकर उत्तर मुख हो जल्स उपवास करनेका सेकल्प करे । | 
इस समयमें मंत्र दो विप्णुने कहा हे कि-एकादशीके दिन 
निराहार रहकर में दूसरे दिन भोजन करूंगा इसलिय- हे | 
पुण्डरीकाक्ष ! विष्णो | मुझे आप शरणमें छीजिये।|हेमादििन | 

सोर पुराणसे शैवोंके वास्ते कह्य हे कि-साविन्नीसे या शि- | 
वादि गायत्नीसे नामपूवक सकरप करे | वराहसे कहा है | 
कि-विद्वान्‌ मनुष्य सकलपकर के पुप्पाखजलिका समर्पण करे। | 


१ यथाकाम फलमुलिखेदित्यथः । २ शिवादिगाय 





का कपल 2 


_ क्षोद्रं कांस्य माष- 
६ कि" 
भार आयासमंथनं ॥ 


अकाए-के/ममाकिलपपरपवर्कए 


फिर उस अछको पीवे | पान्रके जलकों तीन बार जपे हुए 
“ओ नमो नारायणाय ” इस अष्टाक्षरमन्त्रसे अभिमन्त्रित 
करके पान करे, जिसे पूरे फछकी इच्छा हो; यह कालाय- 


वा सध्यरातर्मं अथवा उदयकालमे सद्छुल्र करे ऐसा कहां 
है । दशमीके सह दोपसे अध रात्रिके आगेकी चार मह- 
रोंको बुद्धिमान मलुप्य संकल्प और पूजाके वास्ते छोड दें। 
विद्धा तिथीके उपवासमें भोजन कर दिनको छोड रातमें 
विप्णु भगवानकी पूजा करे और सह्लुल्प करे एंसा नार- 
पु कक कु ऐप 

दीय वचन हें | पूजाको कहकर देवलने कहा हैं कि, भग* 
वानके सम्मुख नियत होकर ब्रती जागरण कर | कात्याय- 
नने दांदशीके दिन निवेदन करनेका मन्त्र केंहा हैं कि, ह8 

केशव ! अज्ञान रूपी अन्धकारसे अन्धे हुएके इस अ्रतस 
सुसुख हो असन्न हूजिये हे नाथ ! ज्ञान दृष्टिक देनवाल हूं 
जिये । त्याग-बृहस्पतिन द्वादशीके विन निम्त लिखित 
बातोंका त्याग करनेके छिये कहा है. कि, अर्थात्‌ दिलसे 
सोना, दूसरे घरका भोजन; दूसरी वारका भोजन, मेथुन, 
कांसीका वत्तेन, शहद,उडद्‌, तेंछ इन आठ ची्जोंका त्याग 
करे |। हेमाद्रि तथा ब्रह्माण्ड पुराणमें कहा हें कि-फिरसे 
भोजन, स्वाध्याय, भार उठाना, परिश्रम करना, मेंथुन 


ज्या । ३ सकत्प्येत्य्थ)। ४ कांस्यामिषमितिपाठः । 


(३६६) ब्रतराजः । [ एकादशी- 

















20 पिन पत तल मत कक पा 2प २7: पड अर्धल नेनभा कल्प १०: जज 

















उपवासफल  हम्युदिवानिद्रा च पश्चमी ॥ शद्धि। विष्णुधमें--असंभाष्यान्‌ हि संभाष्य तुलस्याश्रा- 
पिंतं दलम ॥ आमलक्याः फल वापि पारणे प्राइय शुद्धचति॥ विष्णु---भोजनानन्तर॑ विष्णो- 
रपिंत॑ तुलसीदलम्‌ ॥ भक्षणाव्‌ पापनिसुक्तिश्ान्द्रायणशताधिका ॥ एतद्गत॑ उतकेषपि कार्यम॥ 
सूतके मृतके चेव न त्याज्यं दादशीव्रतम।इति विष्णूक्तेशतत्र त्यक्त दानादि सूतकास्ते कार्यम्‌ ॥ 
सूतकान्ते नरः स्नात्वा पूजय्रित्दा जनादुनम्‌ ॥ दान दरवा विधानेन व्रतस्य फलमशल॒ते ॥ इति 
मात्स्योक्तेः ख्ीमिस्तु रजोदर्शनेषषि कार्यम॥ एकादइयां न भ्रुद्धीत नारी दृष्टे रजस्थापि ॥ इति 
पुलस्त्योक्तेः ॥ द्वादश्यामुपवासः ॥ यदा द्वादश्यां श्रवणक्षे तदा शुद्धामप्येकादरशी त्यक्त्वा द्वाद- 
शीसुपवसेत्‌ ॥ शुक्का वा यदि वा कृष्णा द्वादशी श्रवणान्विता॥ तयोरेवोपवासश्व तयोदहयां 
तु पारणमाइति नारदोक्तेश॥ अथाष्टी महाद्वादश्यः॥ तत्र शुद्धाधिकेकादशीयुता द्वादशी उन्मीलिती 
द्ादरयेव शुद्धाधिका वद्धेते चेत सा वज्जुली॥ वासरत्रयस्पशिनी निस्पशा॥अगम्रे प्णः संपूर्णा 
धिकत्वे पक्ष वर्धिनी॥पुष्यक्षेयुता जया।श्रवणयुता विजया ॥ पुनर्वखुयुता जयन्ती ॥ रोहिणीधुता 
पापनाशिनी ॥ एताः पापक्षयमुक्तिकाम उपवसत्‌॥ अजच्र मूल हेमाद्रों सेयम ॥ पारणात्मय; ॥ 
द्ादश्याः प्रथमपादमतिक्रम्य पारणं कार्यम्‌॥ द्वादश्या। प्रथमः पादो हरिवासरसंज्ञितः॥ 
तमतिक्रम्य कुर्वीत पारणं विष्णुतत्पर॥इति निर्णयामृते विष्ण॒धमोक्तिः ॥ यदा भूयसी द्वादशी 
तदापि प्रातसंहूतंत्रये पारणं कार्यम्‌॥ सर्वेषामुपवासानां शातरेव हि पारणम्‌ । इति 
वचनात्‌ ॥ इत्येकादशीनिणंयः॥ अथ शुक्ककृष्णेकादश्युथापनम-“-म्रबोधसमये पाथ कुर्या- 
हुद्यापनक्रियाम ॥ मार्गशीर्ष विशेषण माघे भीमतिथाव्ि ॥ तद्विधि---दरम्यामेकलुर्त 
तु दन्‍तधावनपूर्वकम ॥ एकादद्यां शुचिलूत्वा आचार्य वरयेत्तत।॥ तत्र संकरप:-गणेश- 


स्मरणपूर्वक मासपक्षाइल्चिस्य मया आचरितस्याचरिष्यमाणस्थ वा शुक्लककृष्णेकादशीत्रतस्प 


और दिलनमें गाढी नींद सोना ये सब काम उपवासके फल- 
को नष्ट करते हैं | विष्णुघममें कहा है कि, उपवासके दिन 
असंभाष्यछोगोंस बाव करके समगवानको अर्पित कियाहुआ 
तुलसीदछ या आवलको खाकर शुद्ध होता है ॥ विष्णुपुरा- 
णर्मे कहा हे कि, भोजनके बाद विष्णुको अर्पित किया हुआ 
तुल्सीदल भक्षण करनेसे जो शुद्धि होती है वह एकसो 
'चान्द्रायण ब्रव करनेके फलछसे भ्री अधिक है| इस ब्रतको 
सूतकर्म भी करना चाहिये क्योंकि बिप्णुपुराणमें लिखा है 
कि, सूतकके होने और रझत्युके होनेपरभी द्वादशीके ब्रतको 
ने छोडना चाहिये। ऐसे अवसरपर त्यक्त दानादि कर्मको 
लूतक बीत जानेपर करे ॥ सात्स्यपुराणमें कहा है कि सूत- 
कके समाप्त होनेपर मनुप्य स्नान करके भगवानूका पूजन 
कर, शाब्रविभिसे दान देकर ब्रतका फ्ल पाता है । ख्ियां 
रजोद्शेन होनेपर भी व्रत करें, क्‍योंकि पुरुस्त्यने कहा है 
कि; ख्री रजोदशेत होनेके बादभी एकादशीको भोजन न 
करे। जव द्वादशीके दिन श्रवण नक्षत्र हो तो शुद्ध एकाद- 
 शीकाभी त्याय करके द्वादशीका उपवास करना चाहिये 
: ( त्याग कास्य विषयक है ) शुकुपक्षकी हो या क्ृप्णपक्षकी, 
: यदि द्वादश्शीके दिन श्रवण नक्षत्र हो तो दोनों दिन डप- 

जनक त्रयोद आज | ऐसा नारदका वचन 
ु मठ महाद्वादशियोंकों कहते हैं-जो अधिक गुद्ध 

एकादशीसे संयुक्त हो वह उन्मीढिती है वही शुद्ध दवा- 


किक री आन के 
दृ्शीक आधिक्यमें अंजुली होदी हे है हैं इनसे तीन बारोतक। किया हो तो कियेजानेवाले, शुद्ध : हो तो शुक्ल एव हे तीन बारोंतक- 





सम्बन्धोंवाली उक्त त्रिस्पुशा, पर्वेस अधिक छाढबा- 
पिनी होती हुई जो सम्पूणतया हो वही पक्षवर्धिनी, 
पुष्यनक्षत्रवाली जया, अश्रवणयुक्ता विजया, पुनवेसुबुक्त 
जयन्ती, रोहिणीयुता पापनाशिनी कहाती हैं।ये आठ महा' 
द्वादशियाँ होती है । इन पूर्वोक्त द्वादशियोंमें पापक्षयके लिये 
ओर मुक्तिकी इच्छासे उपवास करे। इसका मूल हेमा 
कहागया हैं। द्वादशीके पहले पादको छोडकर पारण करन 
चाहिये । द्वादशीका पहछा पाद “ हरिवासर ” होता है। 

पी क्र ५. 
इसलिये वेप्णव मनुष्य उस पादको बिता करही पारण करे 
ऐसा निणयाम्रतमें विष्णुधमंस कहा हु । यदि दादशी 
बहुत हो तोभी प्रातःकाल तीन मुह चढेजानेपर पारण 


करना चाहिये । क्योंकि सब उपवासोंके लिये प्रातःकाढ्ही 


पारणका विधान: हैं। यह एकादंशीनिर्णय पुराहुआ | 
अव शुद्ध और कृष्णपक्षकी एकादशियों काउद्यापन करनेको 

विधि कहते हैं-हे अजजुन ! देवताओं के ,प्रबोधसमयर्म उद्यी" 
पन करें। विशेषकर मारगेशीषेके महिनेंस माधमें या भीम 
तिथिके दिन उद्यापन करना चाहिये । उसकी विधि नि 
हिखित प्रकारसे है ।द्शमीके दिन एक समय भोजन केरके 
दतुबन करे और इसप्रकारएकाद्शीको पवित्र होकर॒आचा- 
यका संवरण करे | सकत्प-गणशजीका स्सरण करके मंर्सि 
पक्ष आदिको कहकर यदि किया हो तो कियेहुए यदि मे 
किया हो तो कियेजानेवाछे, शुक्ु ; हो तो शुक्ल एवं ( 


- - १ अपिते यत्तुरुसीदुर्क तस्य भश्षुणादित्यध्याह॒त्यान्वयः । | 


्रतानि, | भाषाटीकासमैलः । 





[20:52 गए"% नह 






साइतासिद्यर्य तत्संव्‌ गंरु्राप््पव देश झालावतुसरतो यथातज्ञानेन श॒ुक्कऋष्णैकादशीजतरतो- 
द्यापनमहं करिष्ये तइड्रत्वेन गणपतियूजन पुण्याहवाचनमाचायवरणं च करिष्ये इति सड्ूलप्य। 
गणेश घोडशोपचारेः पूजयित्वा पुण्याहं वाचयेत्‌॥ तश्चवा-करिष्यमाणशुकऋष्णेकादशीजब्रतो- 
द्यापनकर्मणः पुण्याहं भवन्तों तुबन्ठु | अस्तु पुण्याहम्‌ ॥ स्वस्तिं मवन्तो ब्रुवस्तु । आयुष्मते 
स्ति ॥ ऋद्धि भवन्तों बुवन्तु | कम ऋष्यताम्‌॥ श्रीरस्त्विति; मवन्‍्तो बुबन्तु | अस्त श्री! ॥ 
वर्षशतं पूर्णमध्त ॥ शिव कमासस्‍्तु ॥ गोजालिवर्द्धिस्तु प्रजापति: प्रीपताम्‌ ॥ तत उद्यापन- 
करमंणि आचार्य वरयेत्‌ ॥ उपोष्य नियतो राजवाचार्य्हितों ब्रती ॥ कु्यादाराधनं विष्णों- 
यथाशक्त्य। जगदुगुरोः ॥ देवाऊपये गयां गोड़े शुची देशोधयषा गहे ॥ अ्टांगुलोब्छितां बेदी 
चतुरञआां प्रकल्पयेत ॥ वितछतिद्वयविस्ती्ा तिले। कृष्णेः प्रपूरयेत/त ध्यामष्टदर्ले रम्यं कमल 
परिकल्पयेत ॥ तन्मध्ये स्थापयेव कुत्म॑ नवीनमत्र्ण शुमम्‌त॥ ऋष्णेस्लिलेश्व संयुर्त्त ऋष्णवस्थो- 
पशोमितम्‌ ॥ अश्वत्थपर्णयुग्मेन पश्चर॒त्नें! समन्वितमृ॥ उमन्तादड्डित चेव संकषणादिनामानें: ॥ 
उपचार षोडशनिः पूजयेत प्रयथतों नरः॥ आप्रेयादिचतुष्पन्रे पूजयेद्रणमातृकाः ॥ गणेरं 
मातृकाश्रेव दुर्गा क्षेत्राथिपं तथा ॥ समाहितमनाः कोगेष्वाग्नेयादिषु विन्यसेत्‌ ॥ तथेव शुके- 
कादरयां तिलेः शुक्केश्व योजयेत ॥ शुक्कबल्लेग संवेष्ठय पूजयेत्परया मुदा ॥ समन्तादड्ठितं चेव 
नामनिः केशवादिलिः ॥ ततो देव च सौर स्ताप्य, पद्यामुतादितिः ॥ गनन्‍्धपुष्पाश्षतोपेले- 
रथ पुण्यजलेः शुभेः ॥ संस्थाप्यावाहयेस्कुम्मे रमायुक्ते चतुश्चेजम ॥ पूर्वद्त आंच सबतो- 
भद्रमण्डलदेवताः संपूज्य तद॒परि स्थापिते कलशे देवतासात्निध्याथ कृताग्न्युत्तारणां विष्युमार्ति 
संस्थाप्य तत्र विष्णुमावाहयेत्‌ ॥ ओझ नमो विष्णवे तुभ्यं मगवन्‌ परमात्मने ॥ कृष्णो$सि 
देवफीपुत्र परमेश्वर उत्तम ॥ अजोउनादिश्व विश्वात्मा सर्वद्ोऋपितामहः ॥ क्षेत्रज्ञः शाश्वतों 









2४ (4 यह ४ हर४0 ० है प०८क५ "८ सट/.55 72547 




















है। तो कृष्ण एकाद्शीके ब्रतकी सांगवासिद्धिके लिए एवम्‌ 


उसके संपृणफहकी प्राप्तिक छिए देश काछके अनुप्तार 
यथाज्ञान शुक्क एकादशीके ब्रतके उद्यापनकों में करता हूं 
इसका भंग हो नेके कारण गण तिपूज रन; आचायबरण 
ओर पुण्याहवाचन भी करूं या कराऊंगा। इस संकट्पके 
पैछे घोडश उपचारोंस गणेशपूजन करा पुण्याहवाचन 
कराव। यजमान-आप पुण्याह कद, त्राह्मग-हो पुण्याह, 
पजमान-आप स्वस्ति कहेँ, ब्राह्मण -तुझ् आयुध्यमानको 
खत्ति हो,यजमान-आप ऋद्धि कहें, त्रह्मण-कप् ऋद्धिको 
प्राप्त हो, यजम्नान-श्री हो ऐसा आप कहें, त्राह्मण हो श्री, 
पजमान-पूरे सो वर्ष हों; ब्राह्मण-हों ५९ सौ वर्ष, यज- 
मान-शिव कर हो; ब्राह्मण-हो शिवकसे, यजमान-गोत्रकी 
अभिवृद्धि हो, ब्राह्मणग-हो गोत्रक्ी अभिवृद्धि यजवान- 
अजापति प्रसञ्न हो, आाह्मण-हो अ्रजापति अ्सन्न । इसके 
पद इधापनकर्मम आचार्यका वरण करना चाहिये,रावको 
नियमपूरवेक उपवास करके आचायके साथ ब्रती रहकर 


शक्तिक अनुसार जगद्गुरु विष्णुभगवानका आराधन | पित्त [ 
| आवाहन करे, “ ऑनमो ” यहसे छेकर आवाहनके मन्त्र 
$ भर 5 हक बे वी 
| हैं कि-हे विष्णु भगवान्‌ तेरे डिए नमस्कार हैँ हैं देवकौ- 
पावे जो दो वितस्ति चौडी हो और उसपर काले तिल | 

के ५ 
| है,विश्वास्मा है) खब छोकोंका पितामह्‌ 


५२३ पर कु आह 
रे | गड़ओंके गोपदे देवालयमें अथवा और किसी 
रे नेजगहसे या घरमें चौरस आठ अंगुरू ऊँची बंदी 
नावे 


६! उसमें अष्दलका चनावे । ओर 


उसके बीच बहुत सुन्द्र नीरन्ध नवीन कुम्मको स्थापित 
करे। काले तिछोंसे संयुक्त हो उसे काे बखसे शोमित 
करे! उसमें दो पीपछके पत्त रखकर पचरन्‍्त भी रख ओर : 
चारोत्रफ संकर्षणादि नाम्नोंफों छिखि दे। फ़िर पवित्र 
होऋर षोडशोपचारसे पूजन करे । आम्नियादि चतुप्कोगर्म 
गणमाद्का आदिकी पूजन करे । गंणेश,साठ का;दुर्गों क्षेत्र 
पाझ आदिको चारोंकोगोर्में सावधान होकर रखे । उसी 
प्रकार शुक्कषएकादशीके दिनभी वेदीकों सफेद तिलोंसेपूरित 


' करे । और सफेद वल्यस वेष्टित कर वडी प्रसन्नताके साथ 
। ऐच श्र जप 

| पूजन करे ।चारों ओर केशव आदि नामोंस वेदीको अद्डित 
करे । सुवर्णके बने हुए मगवानको प च्व[म्ृतस स्नान कराक्े 


स्थापित करें। गन्ध; पुष्प, ्रक्षत आदिख संयुक्त और 


| परवित्रजलसे पूर्ण कुम्मपर स्थापित कर/चतुर्सुज भगवानका 
| रब््मी जीके साथ आवाहन करे । पहले वरण किया हुआ 
| आचाये, सर्वेतोभद्र मण्डलके देवताओंकी पूजा कर 
| स्थापित किय हुए कछशरर देव सान्निध्यके वास्ते अग्नि- 


उत्तारणकी हुईं विप्णुमूतिको स्थापित करके उसमें विप्जुका 


हि ओप ३ क्र८ रु 
पुत्र | है उत्तम परमेश्वर ; वू कृष्ण हैं, तू अज है, अनादि 





१ भ्रर्थास्कक्शमित्यथ: । 


( ३६८ ) ब्रंतराजः । [ एकादशी- 


॥0: 0 अं आशा 


तेनेमा वेदिकां विश ॥ ओं भूः पुदबरमावाहयामि ॥ ओं झुबवः पुरुषमावाहयाने॥ ओ रद! 
पुरुषमावाहयामि ॥ ओं भूवः स्वः पुरुषमावाहयाम्रि ॥ विष्णो इहागच्छ इह तिष्ठ पूज 
गहाण सुप्रसन्नो वरदों मव इति॥ भत्यक ख्रीचतुःसहल्लीसहितां रुक्मिर्णी जाम्बबर्ती सत्य- 
भामां कालिःदी च पू्वद्सिणपश्चिमोत्तरदलाभ्यः्तरेष्वाबाह्मय शड्ढ चक्र गदां पद्म चेशानादिष्वा- 
बाहयेत ॥ तद्गहिः पूर्व प्रादिष्यष्टप्रेष्यलुक्रमात्‌ ॥ विमछो १ त्कर्षिंणी २ ज्ञाना ३ क्रिया ध्योगा 
५ तथेव च ॥ प्रद्वा ६ सत्या ७ तथेशाना < लुप्रह। पतद्ममृष्याग। ॥ देवघ्याम्रे ततः कृत्वा वेदि- 
कार्यां खगेश्वरम ॥ खगेबरं गहई चावाह्य लोऋपालानवस्थाप्य दिक्षु पूर्वांदिषु ऋमात्‌ ॥ तत! 
पृर्वादिक्रमेण केशवादीव ॥ कशवाय नम) केशवमाबाहयात्रि १, नारायणाय ०२,माधवाय० ३, 
गोविन्दाय०४, विष्णबे०५, मधुसूदनाय०६, त्रिविक्रमाय०७, वामनाय० ८, श्रीधराय०९, हृपी- 
केशाय० १० पद्मनामाय० ११ दामोदराय० १२ एताउजुड्डे कादश्याम्‌ ॥ एबमेव कृष्णेकादव्या 
संकबणाय० संकर्षणं आ० वाखुदेघा० मद्यज्ञा० अनिरुद्धा० पुदषोत्तमा० अधोक्षजा० नार- 
लिंहा०अच्युता०जनादना०उपेन्द्राय० हरये० श्रीकृष्णाय० १२ इत्येव प्रकारेणावाह्य तंदस्त्विति 
प्रतिष्ठाप्य च ओ अतो देवा इतिंयो डशोपच।रेविष्णमावाहितदेवताश्व नाममंत्रेण पूजयेत॥ प्रद- 
धादासन पाद्यमव्यमाचनीयकम्‌ ॥ समान बस चोपबीत गन्धपुष्पाणि, वे ततः ॥ धूप दीप॑च 
नवेध नीराजनप्रदक्षिण ॥ उनयेकादइ्योयेदा एक आचार्य हतदाष्ट्प्मदुलेब परवादिक्रमेण एकत्र 
देवताः संस्थाप्य पूजयेत्‌ ॥ स्तवन विष्णसूक्तेश्व परिचयों च नामत्तिः ॥ नमोःस्तेबेंप्णवेमले- 
स्तन्मू्ती पूजयेत्‌ सुधीः ॥ उपचारादिक कुयात्रेव कार्य विसजेनम्‌ ॥ गीतवाणग्रेश्तथा वृत्ये- 
रितिहालेमनोरमे; ॥ पुराणेः सत्कथामिश्र राश्िशेष नयेत्‌ खुधीः ॥ प्रभाते विमले ख्वात्वा कृत 





रहनेवाल्ा है; विष्णु है, श्रीवान्‌ पर नारायण है, तुडी सर । ओके ऋमते नाममन्त्रोंसे के गवादिकों छा आवाहन करेकि 
किक है के ल्‍्नि आप श्र ञ्द्‌ के 
पुरुष है। हे जगत्पत | तुही अवीन्द्रिय है जो आपका सवसे | केशबके छिए नमस्कार है, केशवक्ा आवाहन करता हूं। 


प्रशस्त उत्कृष्ट सूक्ष्म तेज है उससे इस बेदीमें प्रविष्ट होजा। 
“ओं भू: ! यह व्याह्मति है, पुरुषका आवाहन करता हूँ, 
हैं विष्णो ! यहां भा, यहां बेंठ, पूजा अ्रहण कर, अच्छी - 
तरह प्रसन्न होकर वरंका देनेवाढा होजा ।* ओ सुवः ” 
पुरुष क्र आवाहन करता हूं “ ओ स्वः ? पुरुषका आवाहन 
करता हूँ [ इन तीनों व्याह्मतियों का प्रधंग छान्‍्दोग्योपनि- 
परमें आया हे] प्रत्येक पश्चिम और उत्तर आदि दिश्ा- 


३ ५0, हक कर 
आके दछमें चार चार हजार स्रियोंके सहित रुक्मिणी, 3 रे 
जे । आसन, प घ | बख्र+ उपयवर्त। 
जाम्बवती, सत्यमामा और काहिन्दीका दक्षिण और ) पाद्य, अध्यं, आचमनीय, स्नान, वर) 


पश्चिसोत्तर दुलमें बी वे आवाहन कर; इंशानादि दिशा- 
विभागम्तें शब्ड, चक्र, गदा और पद्मका आवबाहन करें। 
उसके बाहर पूअपत्रोंसें अनुकमसे-विमछा उत्कर्पिणी, 


ह्ना, क्रिया, योगा, प्रह्म, सत्या; इंचाना आदि देवि- 
योंको प्रहोंके साथ पद्मके मध्यमें स्थापित करे । भग- 


वानके आगे वेदिकापर गरुडकों सूर्विभी स्थापित करे । 
ए्‌ हद हृ पूवे कद 
व्‌ उसका आवाहन कर पूर्व आदि दिशाओंमें ऋ्रमस 


जम अ न 
छोकपालोंको स्थापित करे । इसके वाद पूर्व आदि दिशा- | इतिहासोंस जागरणकर रात्रिको समाप्त करे ! 


केशव, नारायण, माधव, गोविन्द, विष्णु, मधुसूंदन। त्िवि- 
क्रम) वामत, श्रीव७ हृपीकेश, पह्मताभ, दामोदर्‌ इन 
ब(रहोंको शुह्व एक्ाद्शीके दिन तथा सकषण, वासुदेव, 
प्रयुन्न, अनिरुद्ध, पुरुषोत्तम, अबो श्षज, नारसिंह, अच्युत) 
जनादन, उपेन्द्र, हि श्रीकृष्ण इन्हें कृष्णएकादशीके दिन 
इसी प्रकार आवाहन करके “ तद्स्तु ” इससे उन्हें प्रतिष्ठित 
करके ' अतो देवा ”' इस संत्रत विष्णु भगवान्‌ तथा $/६ 
बुढायहुए देवताओंको नाम मंत्रस घोछहों उपचारॉस एन 


गन्घ, पुष्प, धूप, दीप, नेवेद्, आरती और प्रदृक्षिगा हैं 


दोनोंही एकादशियों का एकद्दी आचाय्ये हो, वो अष्टदृढ 


पके दढ्ोंमें पूर्वादिक्मस एक जगह सब देंववाओंक 

स्थापित करके पूज।विष्णुसूक्तसे स्तुतिकरते हुए वैष्णव नाम 
मत्रों ने परिचय्यांकरे।अन्तमतसःशब्द का प्रयोगकरके वेद 
अन्द्र प्रतिष्ठित भगवानकी मूत्तिकी पूजा करे। पोड्शी' 
पचारसे पूजन करते हुए मूर्तिको वहीं विराजमान रह। 


विसजन न करे संगीतसे तथा दृत्यसे वा 20882 





९ एताअवाह्य । 


| 
] 
| 
] 
। 


विष्णाः श्रीमात्नारायणः परः ॥ त्थमेव पुरुष: सत्योउ्तीर्ियो'सि जगत्पते ॥ यत्तेजःपरम॑ सूह 


श्रतानि, | न्‍ाषाटीकासमेलः) । ( २६५ ) 









*:॥ 





20/77/7078 (270४ कक अप फयाहम कद पक लग मरर: ताक शाम 
४5०४ 20 अदा 4220 28] के अ 


वह मम न 5576 काम पाए 

















हि 


शोचादिकाः क्रिया ॥ चतुजिशनिर्संख्यालश्ििपानागमदशिनः ॥ अाकारयेत्तनः पश्चात्‌ पूज- 
ग्रे समागतान ॥ आचार्येण सम॑ कुयादुपचारादि&छ ततभे होम लख्याठु सारेण स्थण्डिले कार- 
ग्रेत्तत। ॥ उछेखनादिफकं कृत्वा प्रणीतास्थापन ततः) ॥ अश्लिध्यानानत कृत्वा ततोषन्वाधानं 
कुर्याव । क्रियमाणे शुक्ककृष्णेकादशीत्रतोद्यापनहोंमः देवतापरिप्रहार्थमन्वाधाने करिष्ये 
इति संकरुप्य चश्षुषी आज्येनेत्यन्तमुक्त्वा । अब्र प्रधानम्‌--अप्निम्‌ इन्द्र गजारतिं विश्वान्दें- 
वान्‌ बल्माणं, पुरुष नारायणं पुरुषसूक्तेन प्रत्यचमाज्येन | बाखुदव बलदेव॑ श्रिय॑ विष्णम अभि 
वायूं सूचे प्रजापतिम्‌ एताः प्रधानदिवताः पायसद्रत्येण ॥ केशवादिदाइशदेंदता आज्यमि- 
श्रितपायसद्रव्येण । विष्णुम्टोत्तरशताहुत्या पायसद्रव्येण । प्रत्येक स्रीचतुःसहस्नसद्दितां 
हक्मिणीं सत्यमामा जाम्बबती कालिस्दी च शह्ढ चक्र गदां पत्च॑ गर ढम्‌ इन्द्राइ्ष्री लोकपालाब 
विमलाद्या अन्लप्नहान्ता देवता बल्लादिदेवताथअ एकेक्याउपज्याहुत्या । शेषेण स्विष्टकतमि- 
व्यादिप्रणीताप्रणयनानत कृत्वा अन्वाधानसभि द्विजुहुयात्‌ ॥ पायसं चह अपयिेत्वा ओ पवित्र 
ते इति मन्त्र जपन्‌ आपणमुद्धरेत्‌॥ पायलाइद्धतं छिखित्‌ प्रापणं लस्मकीलितम्‌ ॥ आज्य- 
संस्कारादिकमाज्यभागान्तं कृत्वा इदसुपकऋलिपितं हवनीयद्गव्य यथादेवतमसरुतु ॥ पश्च अनादे- 


शाहुतीः सर्पिषा हुत्वा पुरुष नाराययं पौरुषेण सूक्तेन प्रत्युच॑ सर्पिषा ॥ वासुदेवाय स्वाहा* 


बलदेबाय स्वाहा” श्रिये स्‍्वा० विष्णबे० ओं विष्णोत्तु कम्ृ० 





स्तातादि कर्म करके शाखवेत्ता चौबीस ब्राह्मणोंकों बुला | 
कर उनको पूजा करे । आचाय्यके समान उनका उपचार | 
कर | होम संख्याके अनुसार वेदी बनाकर उसपर प्रणीता | 
स्थापन करे । अग्रिके ध्यान आदि कर अन्वाधान करे। | 


उसके लिये-कि शुक्छा वा कृष्णा एकादशीके ब्रतके उद्या- 


| 


देवताओंको एक एक आहुति दे । शघसे स्विष्टछूतसे लेकर 


प्रणीताके प्रणयनतक कम करके अन्वाधानकी समिधोंसे 
इतने करें | पायस जरुका श्रषण करके पवित्र ते ” इस | 
को आपणका उद्धारण करना चाहिय । ( स्विष्टकृत्‌ हृव-। 
नादिक पहिले कहचुके हैं। इस कारण विस्तारके सप्य' 2 जप 
नहीं लिखते ) “ है पवित्र जे वितवे त्रद्मणस्पते प्रभुर्गा-| मस्य सहि बन्धुरित्था विष्णोः पदे परसे सध्चर उत्सः।॥ है 

| पं ञ ५ अल न 
ज्राणि पर्येषि विश्वतःअतप्रतनून तदामों अइ्लुते खलाश इद्व- | दस उसके प्यारे अन्नकों चारों ओरसे श्राप्त होते हैं जहां 
इन्तस्तत्समासत ॥ ” सायण-हे मंत्रके स्वामी सोम 
अंगोको तुम्॒ पीनेबालके | 
ग्ोंको प्राप्त होते हो । पयोत्रत आदिसे जिनका शरीर | 


श्रापका शोधक अंग सबंत्र विस्तृत हैं 


बा 


१.4 





90“ 


ऊ नदस्यनियमन्तिपाथों० 


सन्तप्त नहीं हुआ वे नहीं प्राप्त होते, परिपक्कद्दी यागोंकों 
करते हुए पवित्रको व्याप्त होते हैं ॥ यह मंत्र तप्रमुद्राधा- 
रणमें प्रभाण माना गया है। *' मनासाका शास्राथ ” इस 
नामके छोटे द्वक्टमें हमने इसका अथ तप्रमुद्राके विषयर्मे 


: उद्या- | किया है । हे जगतके अधियति पुरुषोत्तम ! आपका झुब- 
पन होममें देवता परिप्रहके छिय अन्वाधान करूँगा ऐसा | शत्त अद्भुनद्धारा सव जगह फेछा हुआ हैं आप सबके शरी- 
सक्लप कर “ चक्षुपी आब्येन ” यहातिक उच्चारण आदि | द्ध॑ व्यापक हैं | शेखचक्रोंस जिसका शरीर नहीं तपाया 
इय करें। अप्नि, इन्द्र, श्रजापति, विश्वर्त्रा। बद्मां उुरुप | आया वो अपरिपक उसको नहीं पाते। जो तयायेगये हैं 


५ स्‌ः ० किक, विश लिर ७८ ५ न 
ओर नारायण इनको पुरुषसूक्तस प्रत्यक ऋचान्तस घृता | एवम्‌ धारण करते हैं वे भगवानक शरण होकर उत्तमप- 


हुति पूरक यजन करे। ऐसेही वासुदेव-बलदेव.श्री, विष्णु, | _ -. उाते हैं के भाजाय तो उसे 
अभि, बायु, सूर्य, जञापधि के न देववाओंकों खीर, | पक पाते हैँ ॥। पायससे कुछ इडत कर डियाज! व तो इर 
शवादि द्वादश देवताओंकों घीमिश्रिव खीरसे, विष्णुको | वपण कहग ! आज्य सरकार आदिक आज्य भाग्यके 
खीरकी १०८ आहुतिस तथा प्रत्येक चार.हजार सी सहित | 
रुक्पिणी, सत्यभामा, जाम्बव॒ती और काहिन्दीको; शह्ढ, | 
चक्र, गदा, पद्म, गरुडको; इन्द्रादि अष्टलोकपाछोंको; | 


विमछास लकर अलुग्रह्म पयन्त देबताओंको तथा ज्ह्यादि | 


अन्ततक करके यह उपकल्ियित हृवनीय द्रव्य देवताओोंके 
अनुसार उपकल्पित हो, पांच अनादेशकी आहुतियोंकों 
घीसे हवन करके नारायण पुरुषको पुरुषसूक्तकी एक एक 
ऋचासे घीकी आहुति देनी चाहिये । ओ वासुदेवके छिये 
४ स्वाहा ” यह आहुति हैं, वरदेवके लिय यह आहुति हें, 
श्रीके लछिय यह आहुति है, विप्णुके लछिय यह भाहुति हे । 
( विप्णोनुक यह १०२ पेजमें कह चुके हैं ) ” ओं तद्स्य 
प्रियमभिपाथों अस्याम्‌ नरो यत्र देवयवों सदन्ति । उरुऋ- 


देवताओंसे योग रखनवाले मनुष्य आनन्दको प्राप्त होते हैं 
उसका सत्यही बन्चु हैं उसके परम पदमे आननन्‍्दका मेघ 
बरसता रहता हैं । " ओम्‌ प्रतदू विष्णु: स्तवते वीय्यण 


(३७० ) ब्रतराजः | 









दककलाल 5. 0०१०४८ 





7० डाक आाामकक आदत बड नेता 








ओऑ पतद्रिष्िणः० आ परो मात्रया० ओं विचक्रमे” ओं -विर्देव० इति मन्जेव्योह॒तिलिश्व पायसेन 
हुत्वा शक्केकादश्यां केशवादिद्वाइशभ्यो नाममिः क्ृष्णकाइइयां सड्डबंगादिदादशभ्यः शुह्न- 
कृष्णेकाइदयोरेकाचार्यक्स्थण्डिलपक्षे चतुविशतिभ्यो नामनिषृतमिश्रपायसेन ज्ुहयात्‌ ॥ 
ततो विष्णु पायसेन अष्टोत्तरशत हुत्वा मत्येक॑ ख्लीचतुःसहस्न प्हिता रक्षिमण्यादीः शब्जादीर्‌ 
लोकपालान्विमलाद्या देवता बह्मादिदेवताश्रेकेकया:ल्याहुत्या ज्ुहुयात्‌ ॥ ततः प्रापणार्ष 
भगवत्माथेना-त्वामेकमार पुरुष पुराण नारायण विश्वद्धज॑ यजामः ॥ मयकभागो विहितो 
विधेयो गहाण हव्यं जगतामधीश ॥ इति आपणं निवेद्योपतिष्ठेत॥ ततख्तविवारं चतुर्वा धवसूक्त 
वा प्रदक्षिणमाप्न वेदिकां च परिक्रम्य मित्िधि विश्वा इति जालुनी निपात्य धुवसूक्त 
जपेत्‌ पुरुषखूक्त वा ॥ ततोष्ष्रो पदानि प्रानिदिशमेतेमन्त्रेगच्छेत ॥ क्ृष्णाय वाझुदेवाय 








2४७७७७॥//७७"शशशशशणना्रकशशशशश#श था भा भाप शा झा आल आया भा ामाााााााआााभााााक्‍आ गें रे हे ः 
सृगों न भीमः कुचरों धिरिछ्ठा,, यस्योरुपु विक्रमेषु अधि- | हजार ख्तरियोंकी टोलियोंकी अधिपाओं रक्प्तिणी आदि- 


क्षियन्ति भवनानि विश्वा |" हे जगदीश | आप सिंहभी | योंको एवम्‌ शंख आदिकोंको छोकपालोंको तथा विमहा 
नहीं कहे जा सकते किन्तु आपका कुछ अथ सिंह जेसा 


६ | भादिक देवताओं एवम ब्रह्मादिक देवताओंको एक एक 
के की के. $ । 8. हे की] ब कक 
होनेके कारण सिंहकी तरह भरयंक्रर हो रहे हो मुष्टि छग- | आहुति दसी चाहिये। इसके बाद प्रापणके हछिये प्रा्ेवा 
है हे निशा के ७७. छह ७ ै हिट कक ३ कक बैक २ 
तही आप खंमसे निरुछ पड़े सो क्या उसमे बेंठ थ। आपत | करती चाहिये-स॒ष्टिके रचवेवाल सबके पहिंे पुराण 
नाखूनोंसही उस मार दिया आपने बुरीदरह उसे मारा, | पुरुष एक तुझ तारायणका यजञञन करते हैं, करनेके योग्य 
जिस तीनों बड़े पाछती आदिम आज में परे हुए अपुर ,सैन एक भाग किया है, हे जगतके अधीश्वर ! हृ्यको 
' राजका दुख रहा हूं इसने सुझ बड़ा सताया था अथवा जब । ग्रहण कर || इससे प्रापणका निवेदन करके उपस्थान करें 
कब हिल जहर तीन पहल संब: कुछ मत । पीछे तीनशर या चार वार प्रदक्षिणक्रमस अश्निकी और 
तब कर से आपका सतानके यत्स करूगा । “आम परो। ६ गा करके “ फल न ; 
मात्रया तनन्‍वा वृधाव तल ते महित्व सन्वश्लु वन्ति उप ते विद्य | कह हाई + कर भ कि ए हे 
पक ५... . | हिबः परिवाधो जही मसधः वदुस्पाहँ तदा भर ” हमारे सारे 
रजसी प्रविव्या विष्णों देदस्व॑ परमस्थ वित्से । ” सबसे | वैर्यों और बेरोंको बुरी तरह भेदिये, आप हमारी बाधा: 
89 - कक लि हक महिमाकों कोई | ओंडे बाधनेवाले हैं इस कारण युद्ध या युद्धकी वाधाओंको 
नहीं पासकता आपके हम दोतों छोकॉको जानते हैं। है | हु ठ ५ 
3 | >े ऊँचे । अप सन -ा हे है ब्विटा दीजिये जिस धनकी छोग चाह किया करते हैं उस 
विष्णी ; हैं दंव , आप इसका पर जातते हैु। -* ओम ! 500० 88 5 भर 
विचक्रम प्रथिवीमेष एतां क्षेत्राय विप्णु्मनुष दृशस्यन्‌ | | वनको हमारे घरमें खूब भर दीजिये, हज घोद़ू टक्कर 
अ | | न्‍ हि 
चिं सजञनिजा< घुवसूक्त या पुरुषसूक्तरक्ा जप करना चाहिये । पुरुषमृक्त तो 
ध्रुवासो अस्य कीरयो जनास उरुक्षितिं सुजनिमाचकार 7 | हिल के ० कक हि कक स 
यह विष्णु इस प्रथिवीको निवासके लिये वा आसनके लिये | मम क हि जा स्‌ः हे मुक्त है 
दी ग * कि, यह वाप्तका बत5उ३ | 5. ऊगवेद अध्याय ८ का इकत्तीसवों सूक्त धुवसूक्त हे। 
भा शक पाए हल 3 5 यह वामनका कांथ्य | शान चतुर्थी छालजीने भी इसेही प्रव सृक्त करके मान! 
देवता ओर मनुप्यक कल्याणका था इसक स्तुति करलेवा- | ५ | सर पीध न । ने ्रांही लिखते हैं!'ओए 
छेजन नित्य हो जाते हैं यानी दिव्य सूरियोम स्थान पाते | | अं ७ सत्र के हक, का जि कर 
हैं।इसमे अमुरोंक| संहार करके अवतारादिक लेकर भूमिको ; जात्वा हापसनन्‍त॒र5 7205 च्तछ्ठा कक! हे 4 के (९ है 
दिव्य बतादिया ॥ “ ओम त्रि्देवः प्थिवीमेष एवं विच- | तअ्डन्तु सात्वद्राष्ट्सधि श्रशत।१।में तुझे सबके बीघमे 
प्राप्त करता हूँ।जो न चढायमान हो ऐसा ध्रुव बनकर विरा- 


क्रमें शतच संमहित्वा, प्रविंष्णुरस्तु तवसस्तवीयान्‌ स्वेध 
ह्स्य स्थविरस्थ नाध । ” इस देवने इस प्रथिवीकों तीम' | उमानहों तुझ सब प्रजा चाहे त्तेरे प्रकाशशील छोकका कऔ 
पतन ने हो [| ओम इहेंवधि मापच्योष्ठा! पवत इवाविवा« 


बार पदाकान व क्रिया | वो महामहान्‌ है| उनकी प्रार्थत 
करनेवाली अनेकों ऋचाएँ हैं. वो बल्यानोंका भी वढवात | चलिः । इन्द्र इंवेह धुवस्तिद्वेह राष्ट्रमुधारय ॥२॥ तुम यही 
छू किक के 
बढो इससे नीच ऊपर मत जाना जेसे कि भचछपवेद होक 


है।इस स्थविरका नामही बर्डा तेजस्वी है । इस मंत्रोंसि ब्‌ 
. और व्याहतियोंसे खीरसे हवन करके, यदि शुक्ल एका | है ऐसही अचछ बनो. इंद्रियोंके अधिपति बधा-“ इन 
मित्याचक्षते परोक्षश्रिया इच हि देवाः” उसे परोक्षसे प्यार 


हि की के कप छः 
देशी हे! तो केश्त्र आदि द्वादश नामोंसे, एवं कृष्णा हो तो 

सकृषण आदि द्वाइश नामोसि, यदि दोनोंका एक आचार्य | करनेवाले देव इन्द्र कहते हैं यानी परमात्माकी तरह ह्ृव तू 
। ठहर यहां ही प्रकाश शीढ बारोंको धारण कर । 


हि ओर हलक हक ह्दो इस पक्षम २४७ कोही थे नामस 
सचीई 5 सी सै पीछे 
मेल हुई खीरसे हवन करना चाहिये.पीछे विष्णु | इममिन्द्रोडअदीधरद्‌ हब शुवेण हविषा, तस्मे सोमो5अधि 
| अवत्तस्मा उ ब्रह्मणस्पत्ति: [| ३॥ जिसका फछ कभी व 


सगवानकों १५८ खोरकी आहुतियोँ! देकर फिर चार चार 








भाषाटीकासमेलः । 





हरये परमात्मने । शरण्यायाप्रमेयायथ गोविन्दाय नमो नमः ॥ नमः स्थुलाय सूक्ष्माय 
व्यापकायाव्ययायच ॥ अनन्ताय जगद्धात्रे बह्मणेप्नन्तमूर्तये ॥ अव्यक्तायाखिलेशाय चिद्रृ- 
पाय गुणात्मने ॥ नमो सताोय सिद्धाय पराय परमात्मने ॥ देवदेवाय वन्दयाय पराय परमे- 
हिने ॥ कर्जे विश्वस्थ गोप्ने च तत्सहत्रे च ते नमः ॥ अथ तत्निवेदितं प्रापण सूचि कत्वा घोष- 
येत । के वेष्णवा इत्युओेवंदेंतू । व्यय वेष्णवा वर्य वेष्णवा इाति समानाः प्रवदेयुः। तेभ्यः 
समानेभ्यों हविदेत्वा #नमों भगवते वासुदेवायेति द्वादशाक्ष रमन्जेण इदमहमम्‌त॑ प्राश्नामि इति 
प्राइय आचम्य यजमान आचार्यों वा सिद्धये स्वाहा इति आज्य जुहुयात्‌ ॥ ततो यत इन्द्रभ- 
यामह इत्यात्मानमभिमन्च्य स्विष्टकदादिहोमशेष समापय्रेत्‌ ॥ उत्तरपूर्जा ऋत्वा-ततों होमा- 
बसाने च गामरोगां पयस्वीनीम ॥ सवत्सां कृष्णवर्णा च सबस्नां कांस्यदोहिनीम्‌ 8 ददल्याद्वत- 
समाहयर्थमाचार्याय सदक्षिणाम्‌ ॥ भूषणानि विचित्राणि वासांसि विविधानि च ॥ चतुर्वि- 
शतिसंख्यानि पक्ान्नानि च दापयेत्‌ ॥ आचायांय प्रदेयानि दक्षिणां नूयली तदा ॥ यदीच्छे- 
दात्मनः अयो व्रतस्योद्यापनं चरेत्‌ ॥ विभाव द्वादश्संख्याकान्नामामेः पृथगर्चयेत्‌ ॥ उपबी- 
तानि तेभ्पो वे दद्यात्कुम्मान सदक्षिगान्‌ ॥ पक्कान्नफलूसंयुक्तान्‌ वस्त्युक्तांस्तु दापय्त ॥ भोजन 
पित्वा ततो विप्ान्‌ पक्कान्नेन च भक्तितः ॥ अन्यानपि यथाशक्ति बराह्मणान्‌ भोजग्रेद्ठती ॥ व्रत 
ममास्तु संपूर्णमित्युक्तेः पूजितेद्रिज: ॥ अस्तु संपर्गमित्यक्त्वा आचयेसहितों ब्रती ॥ जत्वा 





मिटे ऐसी जो हृजि दी थी उसीसे परमात्माने अबको उतने 

ऊँचे स्थानपर पहुंचाया | सोमने -भी उससे प्रेममयी बात 
किक कै 083. 

कीं । प्रसड़्से यहां नारदका बोध होता है । भगवानने भी 


उससे बातें कीं | यानी वेदके अधिपति भगवानने उसके | 
मुखस शझ्ढ लगाकर खूब स्तुति कराई ॥ ओं धुवा द्यौश्वेवा- | 
प्रथिवी ध्रुवःसः पवेता इमें, ध्रुव विश्वमिद्‌ जमद श्रुवों राजा | 
विशामयम्‌ | ४ ॥ दो ध्रुवा हें । प्थिवी ध्रुव हैं| ये पवत | 
। यह सब संसारभी सदा ऐसाही चछा आ रहा हैं । 
इसलिए यह भी ध्रवही हैं| वहुत समयतक राज्य करनें- 
वा राजा ध्रुव भी प्रजाका ध्रुवराजा हैँ आओ श्रुवं ते 
राजा वरुणो ध्रंव देवो बृहस्पति: श्रुवत इन्द्रश्वाप्निश्व राई-। 
पाए्यतवां घरवम ।। ५। आपका राजा भरव्र वरुण हैं| दव | 
वृहस्पवि ध्रुत्न हैं। आपके इन्द्रदेव और अभम्नि देवभी: हृंत्र 
है। आप अपने राप्ट्रको निद्य घारण करिये ॥ ओं श्र॒त | 
प्रवण हविषाइसिसो 4 सुशामसि, अथोत इन्द्र: केवलीविं | 


व 


शत हू 


शोवलिहत स्करत्‌ ॥ ६ ॥ हम ध्रुव हृविस शुत्र सोमका 


अभिमषण करते हैं। इन्द्रने कवलछ प्रजाको बलि हरनेवाढी 
बनाया ॥|”' ऐोछे प्रत्येक दिशामें इन मन्त्रोंस आठ आठ 
पंड चल कि-कृष्ण, वासुद्देव, हरि, परमात्मा, शरण्य, भम्र- | 
मेय ओर गोविन्द्के छिए बारवार नमस्कार हू। स्थूछ, | 
तूक्ष्म, व्यापक, अव्यय, अनन्त, जगतके घाता, ब्रह्म, अन-। 
हर हि गणात्माचे 
न्तमूतति,, अव्यक्त, अखिलेश: चिद्गप, और गुणात्माके लिए | 
नमस्कार है । मूले, सिद्ध, पर, परमात्मा, देबदेव, वन्द्य) | 

फू कप ५ कह कक हु 
पर, परमेष्ठी, विश्वक कर्ता, गोप्ता उसके संहर्ता जो आपड़ें 
आपके लिए नमस्कार हे। पीछे निवेदित किये हुए ग्राप- | 
णकोी शिरपर रखकर घोषणा करे कि; वेष्णव कोन हैं यह | 





ऊंचे खरस कहना चाहिये । वहां जो दूसरे बेप्णव बे हों 


उन्हें कहना चाहिये कि, हम वेष्णव है हम वेंप्णव हैं । 
उन स्वोको हवि बांटकर, “ ऑ नमो भगवते वासुदेवाय 
भगवान्‌ वासुदेवके लिए नमस्कार” इस सन्त्रस इस असू- 
तका में प्राशन करता हूँ ऐस' कहकर प्राश्न ओर आच- 
मन करके या तो आचाय्ये या यजमान-सिद्धिके छिये 
स्वाहा ( यह आहुति है ) इससे आज्य हवन ररना चाहिया 
'ञआं यत इन्द्र भयामहे ततो नोडभभय कृधि, मघवन्‌ 


| छग्धि तव तन्न ऊतिभित्रिद्दिपों विम्रधो जहि। हे इन्द्र 


जिस ओर से हम डरते है उसी ओरसे हमें अभय कर 
दीजिये | है मघवन्‌ ! हमें अपनी रक्षाओंस वलरूवान्‌ बना 
दो, एवम्‌ वेरियोंके युद्ध द्वेग एवम्‌ उनसे होनेवाले अनि- 
ष्टॉंकी हमारे समीप भी मत आने दीजिये, उन्हें नष्ट कर 
दीजिये | इस मंत्रसे अपनेको अभिमत्रित करके स्विष्टकृत्‌ 
आदिका होम शष जो हो उसे पूरा करदे। उत्तर पूजा 
कर-होमान्तमें, दूध देनेवाली निरोगी वज्चेसहिल़्-काले- 
रज्ञकी गो कालेवख्रके साथ तथा कांसीके वत्तनकीदोहनी 
सहित दक्षिणापू्वेक ब्रतकी समाप्रिके लिये आचायको दे | 
अनेक प्रकारके भूषण अनेक प्रकारके वस्र चौब्रीस प्रकार 
के पक्यान्नभी बडी दक्षिणाके साथ दे | यदि अपना भा 
करना हो तो ब्रतका उद्यापन करे। बारह ब्रह्मणोंकों निम- 
न्न्रितकर प्रत्येक ब्राह्मणको नामकेकर पूजे तथा उन्हें यज्ञो- 
पवीव दक्षिणासहित कछश, मिठाई फू और वद्न दे । 
फिर बडी भक्तिसे उन्हें पकान्नते भोजन करावे। साथही 
दूसरॉंको भी यथाशक्ति मॉजन करावे। पीछे ब्राह्मणोंसे 
कहे कि; मेरा ब्रत संपूण हो । तब ब्राह्मण कहें कि, आपका 





बलराजः । ु [ एकादशी- 





बेष्णवसूक्तानि प्रणम्य च॒ पुनः पुनः ॥ ७ भूःपुरुषमद्गरासयामीति ऋमेणोद्दासयेत्‌ ॥ है हद 
विष्णु! इति पीठमाचार्याय दत्वा ततो बन्धुजनेः साद्ध स्वयं सुदीत॥ हाते बोधायनोक्त शुकक 
क्ृष्णेकादशीवरतोद्यापनं संपर्णम॥गथपूजविजाब्ाहे-एकादर्यामुभ पक्षे निराहारः समाहितः॥ 
ह्लात्वा सम्यग्विधानेन सोपवासो, जितेन्द्रियः | संपूज्य विधिवाद्धिष्यु श्रद्धंया खुसमाहितः॥ 
गन्धपुष्पेस्तथा धूपदी पर्नेवेद्यकेः परे ॥ उपचारबहुविधे्जपहोमेः प्रदक्षिणः ॥ स्तोत्रेनानाविपै- 
दिव्येगीतवाद्येमनोहरेः ॥ दण्डवत्मणिपातेश्व जयशब्देस्तथोत्तमेः ॥ एवं संपूज्य विधिव- 
द्रातरों कृत्वा प्रजागरम्‌ ॥ याति विष्णोः पर स्थान नरो नास्त्यत्र पंशयः॥ (पश्चामृतेन संस्नाप्य 
एकाददर्यां जनादनम | द्वादश्यां पयला स्नाप्य हरिसारूप्यमझ्ले ) ॥ दइते पूजाविधिः ॥ 
अथ पुराणोक्त उभयेकादश्युचपनविषि.।अज्जुन उवाच ॥ कीहग्व्रतविसमोष्च विधान चांत्र कीद्शम ॥ 
संपूर्ण हि भवेद्येन तन्‍में बद क्पानिधे ॥ श्रीकृष्ण उवाचा। श्रणु पाण्डव यत्नेन प्रवक्ष्यामि तदू- 
व्ययम्‌ ॥ शक्तः स्वणेसहरस्न॑ तु अशक्त+ काकिणी तथा ॥ ददाति अद्धया पार्थ सम॑ स्याइभयो- 
रपि ॥ शक्तश्रेट्टिग॒णं दद्याययोक्ते मध्यमो विधिः ॥ उक्ताद्धमप्यशक्तस्य दान॑ पूर्णफलप्रदम ॥ 
तदूपविधिमप्येके कथयाम तवाग्रतः ॥ याने कष्टेन चीणानि व्रतानि कुरसत्तम ॥ विफलाम्येव 
 सवाणि उद्यापनविधि बिना ।। प्रवोधसमये पाथ रुयाहद्यापनक्रियाम ॥ माग्गशीर्ष विशेषेण 
माघे भीमतिथावपि ॥ दराम्पां दिनशेषेण रातों गुरुगहं ब्जेत्‌॥ एकादइशीदिने पाथ गुरुम- 
भ्यच्ये शक्तितः ॥ शहीत्वा चरणों मूर्श परार्थथीत विचक्ष णः ॥ पुण्यदेशोद्धव॑ विप्न॑ शात्तं सर्व- 
गुणान्वितम ॥ सदाचाररतं पाथ वेदवेदाड़पारगम्‌ ॥ अस्मदीयं ब्र॒त॑ विप्र विष्णुवासरसम्भ- 
वम्‌ ॥ संपूण ठ भवेद्रेन तत्कुरष्व द्विजोत्तम ॥ तस्याम्रे नियमः कार्यों दनतधावनपूर्वकम ॥ 
एकादरयां निराहारः स्थित्वा चेव परेपहनि ॥ भोक्ष्यामि पुण्डरीकाक्ष शरणं मे भवाच्युत॥ 


एवं प्रभातसमये शुचिक्ेत्वा समाहितः ॥ पाखण्डिनां च सर्वेषां पतितानां च सूद्धमम्‌॥ 


काम 


दुरोदर पार्थ दूरतः परिवर्जबेत्‌ ॥ स्वानं कृत्वा मन्त्रपूव नद्यादो विमले जले ॥ तपेयित्वा पितृद 
अक२3०3292ज०>पम नस >> नर न ०>०+«» नम 249 अत 52345 ८००००००००८०७ ४०-५५ ५०५२ २२२०००२००७ रे ननले> >> 2५०२० 5० नर पर भमं>ं9मअ «9५» कप कब पतन 5 2242०+०> 44० 342 ०2०२२००+००5८० ५० मनन 


ब्रद पूरा हो जाय, पीछे आचायसहित ब्ती वेप्णवसूक्तोंका 
जपकर तथा बारवार्‌ प्रणाम करके ओ भू: पुरुषमुद्दासयामि 
भू: यह तो व्याह्मति हे म॑ पुरुषछा उद्धासन ( विसजन ) 
करके “इद विष्णुः” इससे पीठ आचारय॑ को देकर पीछे 
बन्घुजनोंक साथ खये भोजन कर | यह बौधायनकी कही 
हुई शुक्दा और क्रप्णा दोनों एकादशियोंके ब्रतकी विधि पूरी 
हुई ॥ पूजाविधि-वह्मपु एणमें लिखी हुईं है 'कि, दोनॉपक्षों 
को एकादशीको एकाग्रचित्त हो निराहार रहे। विधिसे 
स्नान करे तथा उपवासपूर्वक जितेद्रिय रहे श्रद्धा भक्तिके 
साथ सावधान हो विधिपूर्वक विः्णुका पूजन करे। पूजामें 
गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, नेवेद्र आदि षोडशोपचारोंकेप्रयोग 
कर | तथा जप होम ग्रदक्षिणा, नानाप्रकारके स्तोत्र, सुंदर 


मनोहर सज्भीत आदि दण्डवत्‌ श्रणाम और उत्तम जय 


शब्दों से इस प्रकार बेध पूजनकर राजत्रिमें जागरण करे तो 
मनुष्य निःसन्देह विप्णुो कका अधिकारी होता है। अथो- 
चापनविधिः--अजुन बोले; हे कृपानिध ! ब्रतका उद्यापन 
कसा होना चाहिये और उप्तकी क्या विधि है? उसको 
आप कृपाकरके मुझे उपदेश दे। श्रीकृष्ण बोले कि, हे 
अजुन ; में तुम्हें उसकी विधि बतछाता हूं । शक्तिमान्‌ 
पड च हजार उुबण मुद्रा और असमर्थ एक कौडीसी यदि 


श्रद्धास दें तो वे उन दोनोंका फछ एक समान हैं, यदि 
शक्ति हो तो दुगुना दे जसा मध्यमविधिमें ( कहा हैं) 
जितना बतलाया है यदि उससे आधाभमी अशक्त मनुष्य दे 
दे तो दानका पूरा फल पाता है | उसकी विधिको में कहता 
हूँ । हे कोरवश्रेष्ठ | उद्यापनक बिना, कष्टस किये हुए ब्रत 
भी निष्फल हैं । जब देवताओंके जागरणका समयहो उस 
सम्रय उद्यापन विधि करे | मागेशीषम॑ अथवा मीमतियि 
पर दृशमीतिथिके कुछ दिन शेत रहनेपर रातमें गुरुके पर 
जाय और एकादशीके दिन शक्तिपूर्वक गुरुकी पूजाकैरे। 
एवं उसके चरणोंको शिरसे छग्राकर प्रार्थना करे! गुर 
पुण्यद्शर्मे उत्पन्न होनेवाला, झान्त; सर्वगुणसम्पन्न, सदा 
चारी, वेदवेदांगोंका जाननेंवाछा हो । उससे कहे कि; गुर 
महाराज ! मरा यह हरिवासरस सम्बन्ध रखनेवाला व्रत 
जिस तरह संपू् हो ऐसा उपाय कीजिये। दन्तधावनः 
पूवक उसके आगे नियम करे कि; में एकादशीको निशा: 
हरि रहकर दवादशीको भोजन करूंगा। हे पुण्डरीकाश्ष : 
भगवन! भरे आप शरणहों,हे पाथ! प्रातःकाछूसावधानमनर्स 
स्नानकर पाखंडी और पतित छोगोंका संगमदूरकरे। नदी 
आदिक शुद्ध जरूमें मन्त्रपूवंक स्लानकर पितरोंका तपण 


। शलेबाम आह र एव सेज़य जाग इसदिलि केस सी हेसाओे 


भाषाटीकासमेलः । (३७३ ) 









आकय८ हद सामक हक 5 5 पका चर दर: ३ ८6 03 





च्् 





देवान पूजयेन्मधुसूदनम्‌ ॥ उपालिप्य शचों देशे कीटकेशास्थिवर्जिते ॥ वर्णेश्व सबतोभद्र 
नीलपीत|सितासितः॥ मण्डल चोद्धरेद्धप सवकमंसु पूजितम्‌ ॥ अष्टाइगुलोल्क़ितां देदीं चतुरस्मं 
प्रकल्पयेत ॥ वितस्तिद्दयविस्तीर्णामक्ष तेः परिप्रिताम्‌ ॥ तस्यामष्टदर्ल सम्यकू कमले परि- 
कल्पयेत ॥ तन्मध्ये स्थापयेत्कुम्मं नवीन छुस्थिरं शुभम्‌ ॥ अथवा तण्डलानां च अष्टपत्राम्इजं 
चरेत ॥ वारिपूण घर्ट ताम्ं पात्र रौप्यससुद्भधवम ॥ जातरूपमर्य देव॑ लक्ष्म्या युक्त जरादेनम्‌ ॥ 
साक्षत॑ सोपवीतं॑ च सहिरण्यं सवाससम्‌ ॥ अश्षमालासमागुक्ते शइचक्रमदाघरन ॥ शक्त्या 
सुवर्णपुष्पेश्च पूजयेत्पुष्टिवद्धनम्‌ ॥ अन्‍न्येऋतृद्धवंः पुष्पेरचयेद्विघिवन्नरः ॥ नेत्रेद्यांत्व चतुवि- 
शत्यथ द्यादलुकमात्‌ ॥ भकत्या चतुर्विशतिषु तिथिप्वपि परन्तप ॥ इच्छया वा तथा दद्याद्मदें- 
वोद्यापनं भवेत्‌ ॥ मोदकान्‌ गुडकांश्वणोव्‌ पतपूरकमण्डकान्‌ ॥ सोहालिकादिक सारसेवाः सक्तव 
एवं चा।बटकान्‌ पायसं दुग्ध शालि दध्योदन तथा ५ इण्डरीकान्‌ पूरिकाँश्वापूपान्गडकमोदकान। 
तिलंपिछं कणवष्टे शालिपिष्ठ॑ सशर्करम्‌ ॥ रम्भाफलं च सपृत सुद्रचुण गरृदोदनम्‌ ॥ एवं ऋमेण 
नैवेद्यं परथग्वा चरमेहनि ॥ पजातरानि-दामोदराय पादों ठ जानी माधवाय च।॥ गुद्ं वे 
कामपतये कटयाँ वामनम्‌लंये ॥ पद्मनाभाय नामि त॒ झछुदर विश्वसूतये ॥ हृदय ज्ञानगम्याय 
कण्ठे श्रीकण्ठसड्रिने ॥ सहस्षबाहवे बाहू चक्षुत्ी योगयोगिने ॥ ललाट्सुरुगायोंते नासा नाक- 


सुरेखवरम ॥ श्रवणों श्रवणेशाय शिखायां सर्वेकामदम्‌ ॥ ५ 
। हृदि ध्यात्वा जगन्नाथ दु्यादब्सम विधानतः ॥ 


0 पा पी. 


रूपिणे ॥ शुसेन नारिकेरेण बीजप्रेण वा पुनः 


॥# 


साक्षत च सपुष्प च सजल 


जागरण कु्याद्रीतशासत्रविनोदतः ॥ इष्टं दत्त घरादानं पिण्डो दूत्तो गयाशिरे 


क्षेत्र रे । बिक | 


क्षेत्रे ये कृत॑ जागरं हरेः ॥ नृत्य॑ 


नरा। कृष्णवछभाए ॥ शासप्म्रेवाप्यथवा भकक्‍त्या शुचिवाप्यथवाइ्शाचिः 


हे 


कर और विप्णु भगवानकी पूजाकरे | कीडे या बारूअस्थि | 
आदिसे वर्जित जगहपर गोबरसे छीप कर हे भूप ! अनेक | 
रंगंसि स्वतोभद्र बनाते जो कि सत्र कर्माँमें पूजित है आठ 
अंगु ऊँची चौरस और दो वितस्ति चौडी बंदी करे, उसे | 
अक्षतोंसे परिपृणकर अष्टद्लकमछ लिखे | उसपर नवीन, | 
मुन्द्र कछश स्थापित करे अथवा चावलोंकाही अष्टद्छ | 


कमल बतावे | चांदी या ताम्वे का उसपर भरा हुआ कछश 


रखे | उसपरभगवानकी सुवणस वनीहुईं मूर्तिको लक्ष्मीजी | 
सहित विराजमान करे। चावरछ यज्ञोपवीत सुत्रण और | 
| करनेवाले पूर्वोक्त मन्‍्त्रोंढ/रा अध्य दे । रातसें जागरण करे 
विभूषितकर भगवानकी यथाश्क्ति सुब पुप्पोंसे तथा 
ऋतुक पुप्पों पे पूजा करे है परंतप ! चोवीसों तिथियोमें | 
भक्तिपूवेक क्रम ऋमसे २४ नेवेद्योंको अपंण करे। हे पर 
तप ! चौवीसों तिथियोंमें भक्तिके साथ कमसे चौबीस 
नेवेद्य दे अथवा जब उद्यापन हो तवही इच्छानुसार मोदक, | 
गुडक; चूण, घृतके पूरे, मांडे, सोहालिकादिक, सारसेवी, | 


बसे संयुक्त तथा रुद्राक्षगाठा, शंख; चऋ, गदा आदिसि 


सर, बडे, पायस, दुग्ध, शाहढि; दृध्योदन, इंडरीक, 


३ थ है 
केणवेष्ट, शालिपिष्ट, रंभाफलठ, घृतसहिल मूंगका सार, 


गीत॑ प्रकुवन्ति वीणावार्द्य तथव च ॥ ये 


मुच्यते पापकोटिलिः ॥ शुक्तो वाप्यथवाहुक्तो 





हर्लशशीषाय शिरः सर्वाह्न सर्वे 


कु 


चन्दनाग्विनम्‌ ॥ पूर्वोक्तेरेव मन्त्रेश्व ब्रतपनिकरे खुधीः | रा 


॥ कृत दाने कुछ- 
पठन्ति पुराणानि ते 
॥ कृत्वा जागरणं विष्णो- 
जागरे सम्तुपस्थितः ॥ मुच्यते सर्वेपापेम्यों 


5०.२ 


गुडमात इस नेवेद्यको ऋमसे दे अथवा अन्तिम दिनसबको 
बनावे । पूजाके नाम-चरणोंमें दामोदर, गोंडोमं माधव, 
गुश्नस्थानमें कामपति, कटिमे व.सन सूत्ति. नामिमें पद्म- 
नाभ, उदरमें विश्वमूत्ति, हृदयमें ज्ञानगम्य, कंठमें श्रीकण्ड- 
सड्जी; बाहुमे सहस्भवाहु: नत्रोंम योगयोगी, छलाटमें उरू- 
गाय, साकमें नाकसुरेश्वर, कानमें श्रवणेश, चोटीमें सब 
कामद, शिरमें सहखशीयष, सवज्ञमें सवरूपी भगवान्‌, 
हृदयमें जगन्नाथका ध्यान करके, नारियछसे या विजौरसे 
विधिपुरवक चावल, फूछ, जछ, चन्दन आदिस बतपूत्ति 
और अनेक प्रकारके गायन वाद्यका आयोजन करे ! उसने 
प्रथ्वीका दान, गयामें पिण्डदान एवं कुरुश्नेत्रम दानकर 
दिया जिसने हरिके आग जागरण किया नाच, गाना 
बीणा आदि बाजोंकों वजाते या पुराणश्रवण जो लोग 
करते हैं वे सब विप्णुके प्यारे हैं। शाखसे अथवा भक्तिसे 
पवित्र या अपेवित्र ही रहकर जो विःणुका जागरण करने- 


| बाड़े हैं वे खब करोड़ों पापोंसे मुक्त होते हैं । भोजन 
पूर पूः न न | 

री, अपूप, गुडके छड्डूं, शकंरा सहित तिलूपिष्ट, | हे 

| रणमें उपस्थित होता हैँ वह सब पापोंसे मुक्त होकर 


किए हुए या न किए हुए जो मनुप्य भगवानके जाग- 


१ खण्डपिष्टमिति पाठः । 


विष्णुलोक स गच्छाति ॥ यावत्पदानि स्वगृहात्‌ केशवायतन त्रति ॥ अश्वमेधसमानि स्युजांग- 
राथे प्रयच्छतः ॥ पादयोः पॉसुकणिकः धरण्यां निपततन्ति याः॥ तावद्पसहस्याणि जागरी 
बसते दिवि ॥ बहून्यपि च पापानि कृत॑ जागरण हरे! ॥ निर्देहिन्मेरुतुल्यानि युगकोटिकता- 
न्‍्यपि ॥ मनसा संस्मरेदेव तां रात्रिमतिवाह्य च ॥ प्रभाते विमले स्नात्वा विप्रानाकारयद 
खुधीः ।। चतविशतिसंख्याकात्रिगमागमदरशिनंः ॥ सब कुर्याद्धिधानन जपहोमाचनादिकम ॥ 
शतमष्ठोत्तरं होमः सवत्रापि प्रशस्यते ॥ इदं विष्णुद्विजातीनां होममन्त्रः प्रकीर्तितः ॥ जझ्ञद्वार्णा 
चव सर्वेषां मन्त्रमष्टाक्षरं विहुः ॥ विविधरपि वद्नेश्व भाजनेरासनेः सह ॥ पादत्रा्ं नवाड़ां च 
दह्यात्पा्थ प्रथझू प्रथक्‌ ॥ द्वादशेवाथ शक्त्या वा वस्चालड्रारभूषणे! ॥ पूजयेत्पुष्पमालापिः 
सपत्नीकार्द्रिजोत्तमाव ॥ कुम्मा द्वादश दातव्याः पक्कान्नजलपूरिताः ॥ भोजयित्वा ततो विप्रान्‌ 
भाक्तितो विचरेहुधः | एका हि कपिला देया सर्वकामफलप्रदा ॥ यथा स्वर्गश्व मोक्षश्व इह संपू- 
णता व्रते ॥ नमस्ते कपिले देवि संसाराणेवतारिणि ॥ मया दत्ता दिजेन्द्राय प्रीयर्ता मे जना- 
देनः॥ सपत्नीको गुरु पूज्यों मण्डले हरिसन्निधों ॥ भूषणाच्छादनेमोज्येः प्रणामेः परितोषयेत॥ 
समाप्य वेष्णव॑ घम दद्यात्सवे धनखय ॥ इष्ट चान्यद्यथाशक्त्या वित्तशाठचविवजितः ॥ जल- 
दाने विशेषण भूमिदानमतःपरम्‌ ॥ प्राथयेत्‌ पुरुषाधीश ततो मकत्या कृताखलि॥ मयाद्यास्मिर 
ब्रते देव यदपूण कृत विभो ।। सब भवतु सम्पूण त्वत्मसादाज्जनादन ॥ त्वयि भक्तिः सर्देवास्तु 
मम दामोदर प्रभो ॥ पृण्यवबुद्धिः सतां सेवा स्वेध्मफल च मे ॥ जपर्छद् तपश्कछिद्रं यक्छिद्र 
ब्रतकर्मीण ॥ सब संपूणतां यात॒ त्वत्मसादाद्रमापते ॥ प्रदाज्षिणां ततः कृंत्वा दण्डवत प्रणिपत्य 
च्‌॥ मण्डल मूतिसंयुक्त सोपहारं सदक्षिणम्‌ ॥ प्रीयतां विष्णुरित्युकत्वा आचार्याय निवेदयद।॥ 


[ एकादशी-- .. 


सर्वांन्‌ विसजयेत पश्चात्‌ सतोष्य परिभोज्य च ॥ तदाज्ञया ततः कुर्यात्‌ पारण बन्धुनिः सह॥ 





विग्णुल्रोकको प्राप्त होता है। भगवानके मन्दिरमें जाग- 
रण करनेके लिए जो मनुष्य जितने कदम चलता है वह 
उतनेही अश्वमेध यज्ञ करता है। पेरोंकी धूछको कण ज्ञाग- 
रण करनेवारू मनुष्यकी जो प्रथ्त्रीमं गिरती ह उतनही 
वर्षतक वह मनुष्य स्वगेमे निवास करता हैं । कोटि कोटि 
युगोंस किए हुए सुमेरु प वंतके समान पापोंकोभी हरिभग- 
वानका जागरण नष्ट कर देता हैँ । उस रातभ हरिभसिग- 
बानको आवाहन करके मनसे स्मरण करे और ग्रातःकाहुू 
होतेही स्नान करके बाह्मगोंको बुछावे । जो खंख्यामें २४ 
ओर शास्रपारज्ञत हों, उनके द्वारा जप, होम) पूजा आदि 
विधिपूर्वक करे। “ इदे विष्णु ” इस मन्त्रह्ठी १०८ आहु- 
तिस होम करना द्विजातियों # लिए प्रशस्त मानागया है। 
लथा शूद्रोंके लिए अष्टाक्षर मन्त्रका विधान हैं। हे अजुन ! 
अनिमन्त्रित ब्राह्मगोंको अछग अछग अनेक भ्रकारके वस्य, 
वत्तत; आसन, जूती आदि नवांग वस्तुओंकों दे । अथवा 
यथाशक्ति द्वादश चीजों छो दे । उन सपत्नीक ब्राह्मणोंको 
पुप्पपाला आदिसे पूजकर पक्कान्न और जछसे संयुक्त १२ 
कलझोंको देकर भोजन करा भक्तिसे विचरे । सब इच्छ- 
ओंकी पूण करनेवाली एक कपिछा गौको स्वर्ग मोश्षकी 

उ्पराचाके लिए दे। जिम्तको देते समय “ नमस्ते कपिले 

दूवि ” इस सोकका उच्चारण करे | इसका 


हे कपिले देवि ! तेरे छिए नमस्कार है। तू संसारसागरस 
पार करनेवाली हे।मैने तुझे ब्राह्मणके लिए दे दिया हें,इससे 
भगवान्‌ मुझपर प्रसन्न होजायैं; स्वतोभद्रमण्डरुके औए 
विष्णुभगवानके निकट संपत्नीक गुझरी पूजा करे और 
उसको वल्ल,भूषण,भोजन,प्रणाम आदसिप्रसन्न और सन्तुष्ट 
करे । और भी उद्यापनको समाप्त करते हुए है अजुनकृप 

णताको त्यागऋर अनेक प्रकारकी इृष्ट वस्तुओं को यथाशक्ति 
प्रदान करे | जछूदन और भूमिका दान करे । फिर थुदद 
पोत्तम भगवानके आगे हाथ जोड रऋर 'मयाद्यास्मिनूत्नरे ' 
आदि ह्ोकोंको “ सर्व सम्पूर्णतां यातु त्वठसादाद्रमा' 
पते ” इस खो कतक उच्चारण करे। इन खहोकोंका अथ यह 
है कि, हे विभो ! मेंने जो अपने ब्रतमें अपूण ता की वो अब 
आपको कृपासे हे जवान ! परिपूर्ण हो जाय, मेरी भक्ति 
तेरेमें ही सदा रदे | दे दामोदर | हे प्रभो! मेरी पुण्यमें बुद्ध 
रहे; मे सल्ननोंकी सेवा करता रहू, यही धर्मफल हो, मेरे 
ब्रतमें जो जप तपमें तरटि हो हे रसापते | वो सब आपकी 
कपासे संपूणण हो जाय,पीछे प्रदक्षिणा करके अणाम करे। इस 
के बाद विष्णु भगवान्‌ मुझपर प्रसन्न होजायैं एस वोलडए 
मूत्तिसहित मण्डलरू,-मेंट और दक्षिणा आधार्यकों दे। एंव 


अर सब छोगोंको भोजन कराके सम्तुष्ट ऋर विसर्जित करें | 
अर्थ यह है कि लेनी नल नमन थम +++ं+-+ न ं+न>०++«-+ «नल 3 और उनकी आज्ञास अपने बन्घुओंके साथ पारण करे । 
'कामाात(पराधााााा भाप साफ भातइवा। पा ५५ कराता क भास्कर 


१ श्राउ्धमू । २ प्रणमेत्प्रश्चुमित्यपि पाठः । 


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श्रतानि, ] भाषाटीकासमे नः । ( ३७५ ) 





घनञखय तव 
प्रीत्या भकत्यालम्रहकारणात ॥ यः करोति नरो अक्त्या व्रतमतद्भयापहम ॥ स यातति वेष्णवं 
स्‍्थानं दाहप्रछयवर्जितम्‌ ॥ उक्तमुद्यायनं चेवसुभमयोः कुरुसत्तम ॥ डिमन्येब्रहुनिवोक्येः 
प्रशंसापरम भुधि ॥ एकादश्या) परतरं त्रेलोक्ये न हि विद्यते ॥ अच्र दान तु मोदानं भूमिदान- 
मथापि वा ॥ गोरोमबीजमूलानां समसंख्यायुगानि हि ॥ दातारो विष्णुमतनन एकादरयाँ 
वसन्ति हि॥ येपि श्ण्वत्ति सतते कथ्यमानों कथामिमाम्‌ ॥ तेषपि पापविनिसतक्ताः स्व 
यान्ति न संशयः ॥ इत्याकण्याजुनों वाक्य कृष्णस्य परमाद्धतम्‌ ॥ आनन्द परम प्राप सोरूय॑ 
चापि निरन्तरम्‌ ॥ इति पुराणोक्तछ्ुमयेकादशीजत्तोदापन संपूणम ॥ 
गोप्झब्रतोद्यायनम | 

अथाषादशुक्लेकादर्यां गोपब्रव्रतोद्यापनविधि; ॥ ठत्र पृज|विवि:--चतुखु ज॑ महाकाय जाम्बूनद 
समग्रभम्‌ ॥ शहूुचक्रगदापद्मरमागरुूडशोपितम्‌ ॥ सेवित सुनि्भिदेवेयक्षगन्थेकिन्नरे! ॥ एवं- 
विध॑ हारिं ध्यात्वा ततो यजनमारमभेत॥ध्यानम्‌ ॥ पुरुषोत्तम देवेश भक्तानामभ्यप्रद ॥ संस्तिग्घ 
बरद॑ शानत॑ मनसावाहयाम्यदम ॥ आवाहनम्‌ ॥ खुबर्णमाणिप्तिदिव्येः खचिते देवनि- 
मिते ॥ दिव्यसिहासने स्निग्धे प्रविश त्वे सुराधिप ॥आसनम ॥ गड़ोदर्क सुरश्रेष्ठ सुव॒ण कलशा- 
स्थितम्‌ ॥ गन्धपुष्पाक्ष तेयुक्त॑ गृहाण रमया सह ॥ पादम्‌॥ अष्टगन्धसमाशुक्ते स्वर्णपात्रे स्थित 
जलम्‌ ॥ अध्य गहाण भो देव भक्तानाममभयप्रदाअध्य म्‌ ॥ देवदेव नमस्तुभ्ये उरणपुरपोसम ४ 
भया दत्तमिई तोय॑ ग्रह्दीष्वाचमन कुछ आचमनम्‌ ॥ पयो दि पृतं देव मधुशकेरया युतम्‌ ॥ 
पवामृतं मयानीते स्नानाथे प्रतिगह्मयताम्‌ ॥ पश्चयामुतस्नानम्‌ ॥ नदीनां चेव सरसां मयानीते 
जले शुभवा अनेन कुछ भो सनाने मंत्रेवांझहणसंभवेः ।। स्नानम्‌ ॥ वस्थय॒ग्मं समानीत॑ पद्चसत्रेण 
निर्मितम्‌ ॥ सूक्ष्म कार्पासतन्तूनां खुवर्णेन विराजितम्‌ ॥ वस्थम्‌ ॥ नारायण नमस्ते5्ठ बाहि 


एकादशीत्रतं चेतद्यवाविधि कृत पुरा ॥ योवताशखेन भूपेन कथित प्ररतस्नत्र ॥ 


मां भवसागरात ॥ ब्ह्मसूत्र- सोत्तरीयं शहाण उुछुषोत्तम ॥ यज्ञोपवीतम्‌ ॥ छेय्रछकुटेयु क्तान्‌ 


इस एकादझीत्रतको यौवनाश्वनामके राजाने जैसा पहिले 

कप सी ३. 

किया था उसको मेने यथाविधि तुमसे कहदिया हे । है 
फ ८ हद, ५ ५ 

अजुन | यह तुम्हारी प्रोति है, एवं भक्ति तथा तुझपर कृपा 


है जिससे मैंन तुमको यह्‌ प्रकट किया। जो मलुष्य भक्ति- 


हे जि 

प्‌ त्‌ कं << न सन २ 
आस त्तको दि: हि कक नेन्ों | देवश ! है भक्तोंको अभयदनवाले ! अत्यन्त प्रेमी व करेद्‌- 
विष्णुलोकृको प्राप्त होता है हे अजजुन ! तुमको मेने दोनों | _ ५ आप मे वाला हि पर 
शकाद शी के डंगापतको गिर ख थे अधिक | "रे शान्तस्वरूपी तुमको मनसे में बुछाता हू। हे सुरा- 
कादृशीके उद्यापनकी विधि बतछा दी | इसकी अधिक | धिप ! जिसमें कि,दिव्य मणियोंका जडाव हो रहा है जिसे 
प्रशेसा करके मे तुम्हें क्या वताऊं[सम्झ लो कि,इस त्रिछो- | 


कीमें इससे अधिक और कोई उत्तम वस्तु नहीं हे । इस | 
उद्यापनके उपछक्ष्यमें गोदान या भूमिदान दिया जाय तो | 


निःसन्देह खगेको जाते हैं। इस प्रकार अर्जुन श्रीकृषप्णभ - 


भआानन्दित हुआ। उद्यपपनकी विधि समाप्त हुई ॥ 














रमायुत शखचक्रादापद्यधारी, गरुडपर विराजमान तथा 
देव, सुनि; यक्ष, गन्धर्व, किन्नरोंस सेवा किये जाने- 
वाह हरिका ध्यान करके यज्ञारम्भ करे, इससे ध्यान; 
€ पुरुषोत्तम देवेश ? इस सो कूसे लेकर ' दिव्यसिंह!सने ? 
यहांतक उच्चारणकर आवाहन करे कि, हें पुरुषोत्तम | हे 


के 
#५००] 


| देवताओंने बनाया है ऐसे सुहावने दिव्य सिंहासनपर वि- 
| राज जाइये, इसस आसन; दे सुरश्रष्ठ ! यह गंगाजल सो- 
| नेक कलूशमें रखाहुआ हैं; गन्ध, पुष्प और अक्षत इसमें 
इसका फल गोरोमकी सख्याके बराबरके युगोंवक बना- | 
रहता हे और दाता छोग तबतक विप्युछोकमें निवास करते | 
ज् थ्‌ ०. ह कप अप, शक, आर कप हक -ु ८ 
हूँ। जो छोग इस एकादशीकी कथाका श्रवण करें वे भी | भ्क्तोके अभय देनेवाले देव!इसे ग्रहण करिये, इससे अध्ये; 
भें | हैं देवदेव ! हे पुराण पुरुषोत्तम ! तेरे छिये नसस्कार हू मैंने 
गवानके परम अद्भुत वचनोंको सुनकर बडा सुखी और | यह पानी तुझे दिया हैं । आप आचमन करें, इससे आच- 
| मन; है देव ' शर्कराके साथ पय, दूधि, घृत और मु हैं ये 
अब आपाढ सुदी एकादशीक दिन गोपदतन्रतके उद्याप- | 
नकी विधि (कहते हूँ | उसकी पूजाविधि इस प्रकार | 
भारस्भसे चतुसुज महाक्राय सुबर्णक समान प्रभावाले, | 


पडेहुए हैं, आप रमाके साथ ग्रहण करें इससे पाथ; सोनेके 
पात्रमे जछ रखा हुआ है अष्टगन्घ इनमें मिलोहुई हूं, हे 


पांचों अ 2 लाया हूँ प्रहण 'करिये इससे पंचाम्त स्नान; 

'त्दीनाओ्वेव सरसा!'इस ज्कोकसे जल्स्तान:'वस्रयुग्स समा 
है । । 5 का 

तीते'इस ऋछोकसे वस्र;'नारायणनपस्तेडस्तु इसछोकसेयज्ञे 


[ एकादशी- 


( है७६ ) पेलराजर । 





नूप॒ररड्णलीयकेः ॥ मयाहतानलड्ारान्‌ गहाण मधुखूदन ॥ आभर गानि ॥ चन्दन मलयो दूत. 
कस्तयंगरु संयुतम्‌ | कपूरेण च संमिश्र स्वीकुरुष्वातु लेपनम्‌ ॥ चल्दन मं ॥ शतपत्र कणिकाए- 

श्रम्पकेमछ्िकादिलिः ॥ पुष्पेनानाविवेश्वद पूजयामि झुरेश्वर ॥ पृष्षाणि ॥ दशाड़ो गग्गुल्द्धतः 
छुगन्धिश्व मनोहरः ॥ आप्रेयो देंवदेवेश , धूपोष्य ४तिगहाताम्‌ ॥ धृपम्‌॥ एकातिकं: सुरश्रेष 
गोपृतिन सुवर्तिना ॥ संयुक्ते तजसा कृष्ण गृहाणादित्य दीपितम्‌ ॥ दीपम ॥ अन्न च पायप्त 
भक्ष्य सितालेह्यसमन्वितम्‌ ॥ दच्िक्षीरवृ्तेशक्त गहाण सुरपूजित ॥ नेवेद्यम्‌ ॥ नागवह्ीदले- 
पुक्त पृगीफलसमन्वितम्‌ ॥ कर्पूरखदिरियुक्त ताम्बूल परतिग्रह्मयताम्‌ ॥ ताम्बूलम्‌ ॥ हिरण्य- 
गर्नेति दक्षिणाम्‌ ॥ नीराजन ग्रहाणेश पश्चववतिमिरावुतम्‌ ॥ तेजोराश मया। दत्त लोकानरदकर 
प्रभो ॥ नीराजनम्‌ ।। अश्जलिस्थानि पुष्पाणि अपैयामि जगत्पते ॥ गृहाण: खुसुखो भूत्वा जग- 
दानन्ददायक ॥ पुष्पाअलिम ॥ यानि कानीति भदक्षिणाम्‌ ॥ नमस्ते देवदेवेश नमस्ते गहह- 
ध्वज ॥ नमस्ते विष्णवे तुभ्य ब्रतस्य फलदायक ॥ नमस्कारान्‌ ॥ मन्त्रहीन क्रियाहीन भक्ति- 
हीने सुरेश्वर | यत्पूजित मया देव परिपृण तद॒स्तु में ॥ प्राथना ॥ कृतस्य कमेणः साड्ता- 
सिद्धचय वायनप्रदान करिष्ये इति सह्भुल्प्य---परमान्नमिद दिव्य काँस्थपात्रेण सेयुतम्‌ ॥ 
वाणक॑ द्विजवयोय सहिरण्यं दुद/म्यहम्‌ ॥ वायनम्‌॥ इांते पूजा समाप्ता ॥ अथ कवा--व्यास्त 
वसिष्ठ नप्तारं शक्तेः पोत्रमकल्मषम्‌ ॥ पराशरात्मज वन्दे शुकतात तपोनिधिम्‌ ॥१॥ सूत 
उवाच ! द्वापरे द्वारवत्यां च नारदः कृष्णदशनात ॥ उत्साहेनाभ्यगात्तत्र ददुश यदुनरदनम्‌ 
॥ २॥ पूजितश्वेव कृष्णेन विषड्वरादिनिरादरात्‌ ॥ ततः प्रोवाच तं. विष्णुनारद लोकपूजितम्‌ 
॥ ३ ॥ श्रीकृष्ण उवाच ॥ शणु लोकज्ञ देवष खुबन विचरव्‌ सदा ॥ लोकान्तरेषु चरिते यहदि- 
शेष वदस्व में ॥ ४ ॥ नारद उबाच ॥ भगवन्देवदेवेश भक्तोईस्मि तब चाह्ितः ॥ तत्नाश्वर्यमिद 
वक्ष्ये धमेस्थ सदलि स्थितम्‌ ॥ तत्र सर्वे समास्तीताः खुरा इन्द्राश्व॒तुदेश ॥ ५॥ तथकादश 
रुद्राश्व आदित्या द्राइशापि च ॥ वसवोष्छों तथा नागा यक्षराक्षस्रपत्नगाः ॥ ६॥ ते सं्वे यम 
माहुश्व स्थिते सिंहासने शुभ ॥ माठुष्य छुन्हुमेश्वमोच्छादनाथे बदरुव नः॥ ७ ॥ यम डवाच॥ 








देवके गोरबका परिचय होजाता हें कि, वो ऐसोंका बेट' 
नाती तथा शुक एसोॉंका पिता होता है इतनाहीं नहीं किन्तु 


आप भी निष्पाप हूँ। ) सूतजी बोढे-द्वापरयुगमे द्वारका 
नगरीके अन्द्र भगवानक दशनकी इच्छावले नारदजी 


पवीत;केयू मुकुटेयु >'ईस छोकसे आमरण;चन्द्नेसलयो- 
द्वतम्‌'इस खोकस चन्द्न;शतपत्रेः कर्णिकार:”इस छोकसे 
पुप्प; 'दरशांगो गुग्गुलूद्तः इस खछोक पे धूप; ए काक्तिक॑ सुर- 
श्रेष्ठ! इस स्छोकस दीप; अन्नेच पायस भध्य' इस ज्छोकसे 


नेवेद्य; ' नागवड्ीदलेयुक्! इस शछोकसे ताम्बूछ; 'हिरण्य- 
गर्भ इस मन्त्रसे दक्षिणा; * नीराजन गृहाणश !' इस 
कोकस आरती; * अध्जडिस्थानि पुप्पाणि ' इस रोके 
पुष्पाखलि; ' यानि कानि ? इससे प्रदक्षिणा; नमस्ते 
इस शोक ते नप्त्कार; मन्त्रहीने क्रियाहीन ? इस खोकसे 
प्राथना समपण करें| किये कर्मकी सांगतासिद्धिके लिये 
वायना दान करूंगा! इस वबचनसे संकल्प कर “ परमा- 
न्नमिद दिव्य? इस झखोकसे ब्राह्मणको कांसीकी थाली में 
उत्तत भोजन रखकर बायना दे | यह पूजा समाप्त हुई ॥ 

ऊ्ब्‌ कथा-जिसके आरम्भमें  व्यासं वसिप्ठनप्तारं ' इस 
. जोकका पाठ करे #े, वसिछ्रजीके पडयोते तथा शक्तिक 
पोते एवम्‌ पराशर पुत्र तथा शुकके पिता तपके खजाने 
प श्ोव्यसदेवजीको प्रणाम करता है ॥ १॥ 


6 यह कईनेस मंगछाचरण भी हो जाता हे तथा व्यास- 


निष्प 


ऋशषिने बढ़े उत्साहसे यदुनन्‍्दन भगवान ऊष्णके दशनकिये' 
भगवान्‌ छोकप्रान्य श्रीनारदजी ऋषिका पूजन कर पढ़े 
आद्रसे आसनपर बिठाकर बोले ॥ ३ ॥ श्रीक्षण्णजी 
8 कुक 5५ ४ निकन 
कहते हू कि, है देवषि नारद ! आप सब सुवनमें विचर* 
नके कारण उनका सब हार जानते हैं इस लिये यदि वहां 
कोई विशेष बात 'हो तो आप मुझे कहें | ४ ॥ नारदजी 
बोले-हे देवदेवश | आपसे माना हुआ में आपका भक्त 
हूँ | धम्मसभाके अन्दर होनेवाली एऋ आश्चय्येजनक बात 
कहूँगा सो सुनिय । हे स्गवन्‌ ! एक सम्रय धस्मेराजडी 
धम्मसभाके अन्द्र देवतागण १४ इन्द्र ॥ ५ ११ रु 
१२ आईत्य ८ वसु तथा सपे: यक्ष, राक्षस, पन्नग ये सब 
उपस्थित थ ॥६॥ उन्होंने सुन्दर सिंद्ासवपर विराजमान 
यमराजसे पूछा कि, महाराज ! कौनसे मनुष्यकी चम्मंस 
दुन्दुभि कों सेढा जाय सो हमें बताइये।७॥यमराज बोले कि। 









_ ब्रैजनि, ] भाषाटीकासमेलः । ( ३७७ ) 








चातुर्मास्यव्रत चेक संक्रान्तिवरसमिव च ॥ न कुवेन्ति च या नाय्यस्‍तासामाच्छादन 
त्वचा ॥ ८ ॥ कुतरन्तु दुन्ह॒भेश्वास्प विचरध्व॑ महामदाः ॥ ते तस्य वचन श्रुत्वा भठाः प्वि- 
विशुर्धववम्‌ ॥ ९॥ स्थामित्रिदं महाश्रर्यमतस्त्वां प्रवदामि च ॥ तच्छृत्वा त्वरित कष्णः माह 
लोकान्‌ पुरःस्थिताव्‌ ॥ १० ॥ तथा कुब॑न्ठ लोकाश्व नार्यः पुयी वसन्ति हि॥ तच्छत्वा चरिले 
कृष्ण नारीभिनेगरेबु च ॥ ११॥ ऊृष्णाज्षया क्रष्णदृतः प्रोचुस्ते स्वयोवितः ॥ पुरःसराः प्रकु 
वन्त्यो नगरस्थाश्व योषितः ॥१२॥अन्यत्र यत्र कुबपे ऊचुस्ता यदुनन्दनम्‌ ॥ त्वत्सोदरी बिना 
स्वामिन्नान्या नायो5त्र सत्ति हि। ३ शातच्छृत्वा भयसंत्रस्तः सोदरीं प्रत्यनाषताफ्ष्ण उदाच 
छुमद्रे कि करोषीह आगता यमसेव॒काः ॥ १४ ॥ बत यतन्न कृतं भद्दे चेके पुण्योद्धर्व पुरा ॥ घुम- 
द्ोवाच ॥ सर्वेत्रतान्यहं ऋष्णाकाषेमत्र न संशय ॥ १५॥ नोचेक्तःसोदरी न स्थां योविद्वा- 
प्यज्ञुनस्थ च ॥ न स्यां माताउन्रिमन्योंवें खमदूत! कर्थ विभो ॥ १६॥ कृष्ण उबज् ॥ कुरु त्वं 
भगिनी मेष्य ब्रतमेक शुभम्रदम्‌ ॥। १७ ॥ गोपझमिति विख्यातं ब्रत॑ लोकेबु विश्वतम्‌ ॥ सूतेन 
कथित पूवम्ुबीणां हितकाम्यया ॥ नेमिषे हिमवत्पाशें सिद्धाअ्रममठुत्तमम्‌ | || १८ ॥ तत्र 
सूतो5गमदष्ठुं सुनीनां सक्तमुत्तमम्‌ ॥ त॑ दृष्ठा सुनयः सर्वे हर्द्ताश् सुहुसुहुः॥ १९॥ अचितश्न 
ततः सर्वेरण्यादिभियेथाविधि ॥ अभ्यच्य खूतं त॑ विश्रा ऊचुस्ते सीतिप्वेकम्‌ ॥ २० ॥ ऋषय 
उचुः॥ भवांछ्ोकस्य धर्मज्तो भक्तानां ज्ञानलाधनम्‌॥ समयथे सर्वप्तत्तीनाँ सर्वसोभाग्यका- 
रकम्‌ ॥ २१ ॥ कृपया मुनिशादूल कथयस्‍स्वोत्तमं ब्रतम ॥ खूत उबाच॥ शअशध्दम पथ: खत 
ब्रतानामुत्तमं व्रतम ॥ २२॥ गोपझमिति विख्यातं सर्वपापहरं परम्‌ ॥ सर्वदुःखोपशम न सबे- 
संपत्मदायकम्‌ ।। २३॥ यमस्य दण्डन यस्माइद्रीकृतमठुत्तमम्‌ ॥ खुवासिन्यास्तु सोमाग्य- 
पुत्रपोत्रप्रवद्धनम ॥ २४७ ॥ ऋषय ऊचु: ॥ कस्मिन्मासि कर्थ कार्य कि फर्ल कस्य पूजनम्‌ किन 


चोमासेस एक ब्रतकोी तथा संक्रान्तिक एक त्रतको जो सोदरी ओर अज़ुनकी ख्री न होती तथा न में अभिमन्यु 
द्वियां न करतीं हों उनकी चस्मंसे दुन्दुभिको मंढो विचरो | की माता होती । हे प्रभो ! बताइये यमके दूत केस आये ! 
उसके इस बचनको छुनकर दूतगण प्रृथ्वीपर गये। ८ ॥ | || १६ (कृष्ण बोडे कि, हे बहिन ! आज मरे शुभफरको 
॥ ९ ॥ महाराज ) यह बडे जाइचयकी वात है इसलिये | देनेवाले एक ब्रतको तू कर ॥ १७ ॥ जो संसारमे गोपके 
आपको कहता है । यह सुन महाराज क्ृष्णने अपने सम्मु- | नामसे विख्यात हैं| जिसको ऋषियोंकी भछाईके लिय 
खस्थित सब छोगोंको कहा कि ॥ १० ॥ है छोगो ! तथा | पहले सूतजी ने कहा था। एक समय सूचजी महाराज 
स्रियों ! जो यहां रहते हो तुम छोग भी वैसा ही करो | हिमारूयके निकट नेमिदारण्यके सिद्धाश्रममें सुनियोंके 
जेसा कि, धमेराजने कहा है। यह वचन सुन भगवानकी | उत्तम यज्ञकों देखनेके लिये गये। उनको देखकर सब मुत्ति 
पटरानियोमे और दूसरे नागरिकोंने किया ॥११॥ हृ्णके | छोग बडे प्रसन्न हुए ॥ १८ ॥ १९॥ यथाविधि अध्यदा- 
दूर्तोति अपने नगरके अन्द्र बसनेवाली सब ब्नियोंको नादिसे बडी प्रीतिपूवेक पूजाकर सूतजीसे वे है मुनिोग 
और वाहरकी रहनेवाली ल्लियोंको सूचित किया | प्रधान | बोढे ४ २० ॥ कि, महाराज | अःप छोकमें ध्मक ज्ञाला हो 
स्ियोंने व्रतकरके ॥॥१२॥ किसी दूसरी जगह भगवान यदु- | भक्तोंको ज्ञान देनेवाले हो ॥२१॥ इसलिये है मुनिराज : 
नन्‍्दूनस कहा कि, महाराज ! आपको सोद्रीको | आप कृपा कर किसी उत्तम ब्रतको सुनाइयें । सूतजी बोले। 
छोड़कर और कोई ऐसी ख्रो नहीं है जिसने ब्रत न किया | है ऋषियों | आप सब पापनाशक गोपझ नामके उत्तम 
हो | १३॥ यह सुन भयसे सोदरीके प्रति बोले कि, हे | ब्रतकों सुनिय ! जो सब दुःखोंको भगानेवाला औरर स्‌ब 
मुभद्रे ! हे सोदरि | तुम क्या कर रही हो * क्या तुमे नहीं | सम्पत्तिको देनिवाला हें ॥/२२॥ २३॥ जिसने यमराजके 
मालूम हैं कि, यमराजके दूत यहां आयेहुये हैं॥ १४ ४ | दण्डको भी टाढ दिया है। जो अष्ठ, खुवासिनी यहस्थकी 
क्योंकि तुमने कोई पुण्यन्नत नहीं किया हैं | सुभद्रा बोली | ख््रीके पुत्रपौन्रोंका बढानेवाला हैं॥। २७॥ ऋषि बोर कि 

है साथो |! उस त्रतको किस मासमें किस तरह करना 


कि, हे कृष्ण महाराज ! मैन बिना किसी सन्देहके सब | हैं साह स पहिले 
ब्रतोंकी किया है ।। १५ ॥ यदि असत्य होती तो आपकी | चाहिये तथा उसका फल और पूजन क्या है उसको पह्चि 


हे हक भगि िखिख् चचचचिततर:र: करन ब अअख ख थ ओ :: सडसससकअक्‍ टइक्‍टअफदफइ सक ज हे 
१ त्रतमकुवत्यइतिशेष: । ९ आगला इति शेषः। रे तथापि भगिति त्व हि ब्रतमेक चर॒स्व हेति पाठः। 
४ मननशीढानों मध्ये श्रष्ठ । 






डे८ 





चीण पुरा साथो तत्लवे कथयस्व नः 


आओ कक. कै तिलक 
विशेषतः ॥ तदारभ्य कार्तिकल्य द्वादश्यन्त ब्रत चरत्‌ | | 
येनोपलिप्य थे ॥ बयख्ंशन्व॒ पद्मानि कारयद्रीहिफिष्टकः ॥ २७ ॥ 
पुष्पेः प्रपूजयेत्‌ ॥ तत्संख्यया च कलंव्या ममस्कारमदक्षिया३  र२े८ !। 


ब्रतराजः । 


॥२५॥ सूत उवाच । अआषाद्शुक्लउत्षस्य एकादर्यां 


[ एकादंशौ-- 








२६ ॥ गोछे च शुद्धे गोस्थाने गोम- 
शोमयेत्‌ पश्चरद्नेथ गरष- 
तत्संख्यया ह्मपृर्षांश्र 


आह्यणाय निवेदयेत ॥ बायनं द्विजवर्याय अथमे बत्लरे झुभ4॥ २५ ॥ द्वितीये वत्सरे दल्यात 
पायसं सुविनिर्मितम्‌ ॥ तृतीय मण्ड काम्दबाखत॒र्थे झुडमिश्रितान्‌॥ ३० ॥ पथ्वमे घारिकां दद्यात्‌ 


पे 


> मय अभ ५ हिल कनििकिन्तनशि ता ५ 
पूर्णे उद्यापन चोद ॥ एकाइश्याप्ुपवसेदत्तथाववपर्वकम॥ अन्यद्र ठ नडुवात स्वााातद्ाहा 


श्ब्‌ 00 «| ५ + ० 5 को बिक व्याकफ्रण 8 ण्ूह 
हु ॥ ३? . भण्डप कारयत्तत् कइली स्तम्धभणि 


बा यु 


गेडलम ॥ शे१॥ वादाउष्पेश्व शोमाव्यं मस॒रं 


तत्र कारयेद तन्मध्ये लर्वतोमद्र पथ्चरहैं: समस्दितम्‌॥ रे३ ॥ उपुण्याह बल्वयित्वा तु प्रति- 


कु ५ आज 
मायां यजेटरियम॥ कर्बमजछुबर्णेव तदधाद्धेन वा पुनः ॥| 


३७ ॥ मायमाज्खुवर्णन वित्तशादर्य 


न कारयेत ॥ आचाये बरयित्वा च कलश स्थावबेत्ततः ॥ २५ ॥ लक्ष्मीनारायणं स्थाप्य सोव- 
ऐैन पअकल्पिलम ॥ बल्लाद्रावाहन तंत्र यूजयेडूपदीपके! ॥ ३१६ ॥ द्वादशेव ठ॒ नामानि भत्यके 


पूजयेद्रती ॥ राजी जागरण 


होम॑ ठु करयेव ॥ झतिलाज्यसमिदह॒व्य इुनेहादशनामलिः ॥ रे८ ॥ 

हुत्वा पशहुलिं चरेत ॥ वत्लेन सहितां बेलमाचायाय निवेद्येत्‌ ॥ रे5 
भ्ो हा "पिंक र 

कान भोजयेत्बडसेत्रेती ॥ छुज्जीत बन्चुनिः साउंमेकाम्रकतमानसः ॥ ४० ॥ 


छत्दा गीतवाद्यादिमड्रलेः ॥ ३० ॥ ततः मनाते उत्थाय स्नात्वा 


चायर्य॑ च शत चार्ट 
॥ विप्रामग्पश्वसपत्नी- 
अन्यानपि यथा- 


शबरत्या ब्राह्मगानपि मोजयेत ॥ कत्वा चेदं ब्रं पुण्य सवोन्कामानवाप्ठुयात्‌ ॥ ४१ ॥ अत्ते 
स्वर्गपद गच्छेत्ववपापणिदर्जित: ॥ ऋषय ऊचु३ ॥ त्वत्मसादात्कृताथों भो गच्छामः स्वाश्रमाव्‌ 


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धथ4क;, 











बरस. 


जगहको गोबरस लीपकर चावरूकी पीठदीसे कमर बनावे 


करे, उसीकी संख्याके बराबर नमस्कार ओर भ्रदृक्षिणा 
कर ॥ २८ ॥ उतने अपूप ब्राह्मणके छिय दे, पहिले संवत्सर 


६४ ४, | बा 
वर्ष घेब्रका वायना देकर ब्रत पूणे होते ही उद्यापत करे | 
दृल्तथावन करके एकादर्शीके दित उपवास करं। और 
अपने पूजे ब्राह्मणोंक साथ अभ्यंग करे॥ ३० ॥ ३१॥ 


के पुष्पोंस अलकृत बेदी बनावे । उसके अन्द्र पांचरंगों 
से सवतोभद्रमण्डलकरे ॥ ३२ ॥ ३३ ॥ पुण्याहवाचन करा- 


भरीसे भथवा सापेभर सोनसे कृपणताको छोडकर मृत्ति 
कप ण हो ध्चायक्का वरणकर कलशकी स्थापना करे 
। पेड । ३५॥ सुबणकी बनायी हुईं उस छक्ष्मीनारायण 





किसने किया है ! सो कहिय ॥२०॥ सूतजी बोछ कि, | 
आपषाद शुक्द्वा एकादशीस कात्तिकको द्वादशीतक ब्रत । 
करना चाहिये ॥ २६ । जिस स्थानमें गोवें रहती होंडउस 





१ सतिसितायामिति शेषः । 


वयम ॥ ४९॥ अणम्य झुनिनिः सा सूतआन्तहितोईइभवत्‌ ॥ झुनिनिः स्वबलोकेजु कथित॑ 
॥ नातः पर्तर॑ पुण्य त्रिषु लोकेजु विश्वतम्‌॥ कृष्णस्थ वचन श्रुत्वा छुभद्रा 








भगवानकी मूर्तिको स्थापित कर अद्यादिकोंका आवाहन 
कर धूप दीपादि षोडशोप चारोसे पूजा करे॥ ३३ ॥ मल 
में वारह॒नाम मन्‍्त्रोंसे पूजे गाने बजाने आदिके आमोद- 


| प्रमोदस रातमें जागरण करे ॥ ३७ ॥ प्रातःकाल उठ स्वाद 
|| २७ ॥ उसे पंचरंगोंस सुशोभित करे गन्धपुष्पोंस पूजा, | 
| दे ॥ ३८॥ तथा १०८ खीरकी आहुति देकर पीछे पूर्णा- 
क् | हुति दे | बच्चे सहित गेया आचायेकी सेंट करे ॥ ३५ | 
में ब्राह्मणके लिय बायना दे दे ॥| २९॥| दूसरे वर्ष अच्छी | 
खीर, तीसरे वषे मण्डक्‌, चौथेवष गुडके सडक औरपांचवें 


कर होम करे | तिछू, घी। समिधास दादश नामकी आहुति 


पड्रस भोजनसे सपत्नीक पांच ब्राह्मणोंझो भोजन करावें| 
एकाप्रचित्त होकर फिर स्वये आप बन्धुओं सहित भोजन 
करे ॥ ४० ॥ तथा दूसरे ब्राह्मगोंको भी यथाशक्ति भोजन 
करावे | इस प्रकार इस पुण्यत्रतका ऋरनेवाढा मं 


आह 2 | अपनी सब इच्छाओंकों प्राप्त करता हैं। ४१॥ अन्त 
केलोंके खम्भोंस सजाया हुआ मण्डर तथा अनेक प्रकार | 


निष्पाप हो स्रगंका अधिकारी होता हैं । ऋषि बोले हि 


| महाराज ! आज हम आपकी _ कपास का होकर हे 
के मय गन | अपने आश्रमोंकों विदा होंते है॥ ४२।॥ और इसके वा 
के सू्तिस भगवानकी पूजा करे ।कर्षभर सोने या आघ- | ये 


सूतजी भी मुनियोंकों प्रणामकर अन्‍्तर्ष्यात होगये, ईहं 
उत्तम ब्रतको मुनियोने लछोकहिताथे कहा ६ ईप 
लिय ॥ ४३ ॥ इससे अधिक और कोई उत्तम तर 
तीन छोकमें नहीं सुना हैं| इस अछार भर्देण 


2.22 00% कछ 


७५240 20५५ ००५००५०००३०;8५०२५०७०००००० ०६ मंबं०००:2:4:7४ ४ ०० पदक 





बतानि, | 









सीने 


देहस्य चर्माथं चागता वयम्‌ ॥ 


भाषाटीकासमेल) ! 





तत्तथाउकरोत्‌ ॥ ४४ ॥ पद्चाब्द ब्रतमन्ते हि रा यामचतष्ठयम ॥ अकरोलागर 
व हुताशनम्‌ ॥ ४५ ॥ एवं ब्रते कृत पश्चात्ुयो यमभटाविशव्‌ ॥ यमभदा ऊचु४ ॥ छुमदे तब 
४६ ॥ लोकेइस्मिस्तु बत येन न कूृत॑ मक्तिपूवतः ॥ ते 





( ३७९ ) 





प्रातज्हाब 


कं 


8 


णापि नद्धव्यः पटहो यमशासनात ॥ ४७ ॥ छुमदोइज्ड ॥ शदढए पहयत में ची्ण गोपदद्धल- 


मुत्त्मम्‌ ॥ दत्ता पुंवत्ससहिता घेलविभाय दक्षिणा ॥ ४८ ।! गोछे पद्मानि चान्यत्र सर्वे पश्यन्तु 


रु 


है भटाः ॥ अन्योग्यवाद्समये विष्युदूताः समागतए ॥ ४ 


॥ तानदट्टा ताड्यामाखुछत- 


स्यास्य प्रभावतः ॥ पलछायिता महाभीताः स्मरत्तो बमशासनम्‌॥ ५० ॥ तान इंध्धा रक्त- 
दिग्धाड्रान्यमो भयलमन्वितः ॥ कस्येदं कृत्यमिति च ज्ञात्वातीन्द्रियद्शनान्‌ ॥ ५१॥ डवाच 
दूताः ऋणुत यत्र सम्पूज्यते हरिः ॥ न गन्तव्यं मवद्धिश्व सत्य सत्य वदाम्यहम्‌ ॥ ५३ ॥ प्रत्त- 


बन्तो देववशाद्विविशध्व महानदा: 


॥ इत्युक्त्वा धर्मराजोओसों शालायां च विवेश हू ॥ ५३॥ 


तेन देवर्षिणा मह्यं कथित ब्रतसीदशम्‌ ॥ दमयनत्या तथा बाले राज्यत्रंशात्कृत तब्रतम ॥ ५४ ॥| 
ब्रतस्यास्य प्रभावेण राज्यसौमाग्यसम्भदः | पुत्रपोत्रादिसोभाग्यं सुक्‍्त्वा मोक्षमवाप्लुयाव ॥५५॥| 
इति श्रीमविष्योत्तरपुराणे गोपनत्नतोद्यापनं सम्पू्णम्‌ ॥ 

अथ पुरुषोत्तम ःसस्येकादशी ॥ 


पुधिष्ठिर उबाचे ॥ भगवज्छोठुमिच्छामि ब्रतानाउत्तमं ब्रतम ॥ सर्वपापहरं चेव अजुक्ति- 


सुक्तिपदायकम्‌ ॥ १॥ पुरुषोत्तममासस्य कर्था 
॥ २ ॥ अधिमासे तु संभाते ब्र॒तं 
प्रभो ॥ ३ ॥ कर्थ स्नाने च कि जप्यं कर्थ पूजाविधिः स्थृतः ॥ 


तस्य को देवस्तत्र पूज्यते 
कि पुण्य कि कतेव्यं नृत्निः 


| ठृहि जनादन 


॥ को विधिः कि फर्ल 
क्रेहि जनादेन ॥ रूस्य दानस्य 


कि भोज्यसत्म चाज्न मासे वे पुरुषोत्तमे ॥ ४॥ श्रीकृष्ण उबाच ॥ कथयिप्याने राजेन्द्र 
भवतः स्नेहकारणात्‌ ॥ अविमासे ठ॒ संम्राते मवदेकादशी ठ॒ पाए ४ इस ि- विमासे तु संभाते मवेदेकादशी ठ॒ या॥५॥ कमलानाम नामात 


चन्द्रके वचनको सुनकर सुभद्राने भी वेसाही किया ॥४४॥ 
पांचवर्ष लगाबार ज़ैत करमेक बाद, अन्तमें रातमें चार 
प्रहरका जागरणकर प्रातःकाछ हवन किया ॥ ४७ | इस 
भांति व्रत समाप्त होनेके अनन्तर यमराजके दूतभी वहां 


पहुंच। और बोले कि-हे सुभद्वे ! हम छोग तुम्हारें शरीर 
का चसे लेनको यहां आये हैं ॥ ४६॥ जिसने संसारमें | 
भक्तिपूर्वक ब्रत न किया हो, उसकी चसेसे ढोल मंदा | 
जाना चाहिये यह यमराजकी आज्ञा है। ४७॥ सुभद्रा | 
बोली कि, हें दुतो | तुम छोग देख छो कि; मैने गोपग्य- | 


२ 


दासके उत्तम अवका अनुष्ठान किया हैं। और बच्चेसद्वित | 
गेयाभी क्झणको दक्षिणामें दी है।| ४८ ।| इसलियि तुम | 
लोग और कहीं तलाश करो | यह बात हो ही रही थी कि | पु हपोत्तममासकी कथामी कहिये। उसकी क्या विधि हैँ ! 
इतनेमें विष्णुके दूृतमी वहां आ पहुँचे ॥ ४९ ॥ उन्होंने इस | 
ब्रतके प्रभावस यमदूर्तोको पीटा | और ये छोग यमराजकी | हे प्रमो ! अधिकमासके म्राप्त होनेपर किस दान पुण्यको 
भाहाको स्मरण करते हुये वहांस नौ दो ग्यारह हो गये । न 
| व जप करना चाहिये; तथा उसकी पूजाकी विधि क्याई । 


_वनलरपपख+ 
हि] 


॥ ५० | उन सब अपने दूतोंको खूलस सरावोर देखक 


भीत्त हुये यमराजने भी अपने दिव्यज्ञानस समझ ढिया। 
कि, यह विष्णु भगवानकी कृपाका फल है ॥ ५१ ॥ दूतोंने | 
कहा कि, हे दूतो ! जिस जगह विप्णु भग्वानकी पूजाकी | 
जाती हो वहां आपको न जाना चाहिये यह हम सत्य कहते | 
हूं ॥ ५९॥ तुम छोग बडे भाग्यसें यहांतक पहुंच गये हो | नामकी उत्त नतिथिर भभावस * नहा सात रा उड गये हो | 





नहीं तो कया जाग तुमारी वहां क्या दशा होती ; इतना 
कद यमराजभी अपने घरतें चले गए || ५३ ॥ इस उत्तम 
ब्रतकों हे वाले ! राज्यसे भ्रष्ट हो जानेपर दुमयन्तीने भी 
किया था, इसी कारण इस उत्तम ब्तका उपदेश देवषिन 
मुझे किया है, ।। ५७ ॥ इस तब्रतके प्रभावसे राज्य, सोभा- 
ग्य, सम्पत्ति; पुत्र, पौत्र, सौभाग्य आदिका सुखभोगकर 
मोक्ष प्राप्त करता हैं ॥ ५५ | यह श्रीभ्विष्योत्तरपुराणके 
गोपझदझत्रतका उद्यापन 0 

अथ पुरुषोत्तममासकी एकादशी-युधिप्ठिर बोले कि; 
हैं भगवन्‌ ! मुक्तिमुक्तिको देनचाछा परापनाशक उत्तम 
ब्रतको मैं आपसे उनना चाहता हूँ ॥ १) तथा ऊईंपाकर 


उसका फल क्या हैं? किस देवकी पूजा “होती हैं! ॥ २॥| 
कर. १ जे का व 
करना या किस ब्रतकों करना चाहिये | | ३ | केस स्तान 


एवं किस उत्तम भोजनको छरावे ! यह सत्र आप कृपाकर 
बताइये ॥ ४ ॥ श्रीक्षणाजी बोले कि-हे राजेंद्र. अधिक 

कि होने दा पु 5-५ 
मासके प्राप्त होनेपर जो एकादशी आ्ाप्त होती हे उसको में 
तुमारे स्नेहके कारण कहता हू ॥5॥| सब तिथियोंस कमला 
तामकी उत्त नतिथिके प्रभावसे %नला अर्थात्‌ लक्ष्मी संभुख 


१ अन्र प्रश्प्रत्युत्तरयोवैंषम्य विचारणीयम्‌ । 


. (३८० ) बतराजः । [ 


शकादशी- 





तिथीनाम॒त्तमा तिथिः ॥ तस्याश्रेव अभावेण कमलानिमुखी भवेत्‌॥ १॥ बाहों मुहूर्ते चोत्थाय 
स्मृत्वा त॑ पुरुषोत्तमम ॥ स्नात्वा चेब विधानेन ब्रती नियममाचरेत्‌ ॥ ७॥ गहेत्वेकगुणं जाप्प॑ 
नयां दशाणर्ण स्मृुतम्‌ ॥ गयां गोष्ठे शतशुणमग्न्यगारे दशाजिकम्‌॥ < ॥ शिवक्षत्रेष्ठ तीथेंए 
देवतानां च सन्निधों ॥ सहल्नशतकोटीनामनन्तं विष्णुसब्रिधो ॥९॥ अवन्‍्त्यामभादित्रः शिव- 
धर्मेति नामतः ॥ तस्य पशथ्चरवात्मजेष कनिष्ठो दृष्टकमंक्ृत्‌ ॥ १० ॥ तदा पित्रा परित्यक्त- 
सत्यक्तः स्वजनबन्धुनिः ॥ स्वकर्मणः प्रभावेण गतो दूरतरं दनम्‌ ॥ ११ ॥ एकदा देवयोगेन 
तीर्थराज॑ समागमव ॥ क्षुत्क्षामो दीनवदनख््रिवेण्यां स्नानमाचरत्‌ ॥ १९ ॥ ऋषीणामाश्रमांस्लत्र 
विचिन्वन्क्षुधयाईर्दितः ॥ हरिमित्रमुनेस्तत्र त्वाश्रम॑ च ददश ह॥ १३॥ पुरुषोत्तममासे तु 
श्रद्धया कमला स्तुता ॥ एकादशी पुण्यतमा श्ाक्तिमक्तिपदायेनी ॥ १४ ॥ पुरुषोत्तममासे तु 
जनानाँ च समागमे ॥ तत्राश्रमे कथयता कथां कल्मषनाशिनीम॥ १५ ॥ जपव्छमेण तां श्रुत्वा 
कमला पापहारिणीम्‌ ॥ ब्रत॑ कृत्वा च तेः साद्धे स्थितः शल्यालये तदा ॥ १६॥ निशी्े सम- 
नुप्राते कमलात्र समागता ॥ वर ददामे भो विप्र कमलायाः प्रभावतः॥ १७ ॥ विप्र उवाच॥ 
का त्व॑ कस्यासि रम्भोरू प्रसन्ना च कर्थ मम॥ ऐल्द्री व्वमिन्द्रदवस्य भवानी शंकरस्य चा।१4॥ 
वधूरवां चन्द्रसूयेस्य गान्धवी किन्नरी तथा ॥ त्वत्सदशी न दृष्टा च न श्रुता च शुभानने ॥१९ 
लक्ष्मीरवाच ॥ पसन्ना साँप्रतं जाता बेकुण्ठादहमागता ॥ प्ररिता हरिदेवेव एकादहयाः प्रभा- 
वतः ॥ २० ॥ पुरुषोत्तम मासस्य शुक्ल कष्णे तु या भवेत्‌ ॥ कमला नाम सा प्रोक्ता कमलां 
दातुमागता ॥२१॥ पुरुषोत्तममासस्य या पश्षे प्रथमे भवेत ॥ तसयां ब्रत॑ त्वया चीण प्रयागे 
मुनिसत्रिधों ॥ २२॥ ब्रतस्थास्य प्रभावेण वशगाहँ न संशयः ॥ तब वंशे भविष्यत्ति मानवा 
द्विजसत्तम ॥ २३ ॥ लमसत्ते मत्मसादं तु सत्य॑ ते व्याहतं मया ॥ विभ उवाच ॥ प्रसत्ना यदि 








चर ० ० 
होती हैं ॥ ६ ॥ उसके ढिय ब्रती मनुष्य प्रातःकाल ब्रद्ममु- 
हमें उठकर भगवानका स्मरण करते हुए विधिपूर्वेक स्तन 
करके नियम करे !७॥ घरमें जपकरे तो एक गुणा, नदीमें 
दृशगुणा, गोशालामें सोगुणा, यज्ञालयमें सहस्रगुणित 
॥ ८ ॥ शिवालय तीर और देवालयोॉमें विष्णुकेनिकट जप 
करनेपर कक्ष कोटिगुणानन्त फछ मिलता है ॥९॥ अवन्ती 
नगरीमें एक शिवधम त्राह्मणणके पाँच बंटोंमें छोटा छड़का 
बड़ा दुष्ट था ॥१०॥ जिसको उसके पिताने तथा उसकेभाई 
बन्धुओने निकाछ दिया था। वह अपने कममके प्रभावसे 
बहुत दूर जज्जछॉमें चछा गया; ॥ ११ ॥ वो देवयोगसे एक 


बार तीथेराजमें जा.पहुचा । उस भूख दुबंछ दीनमुख दुखी 


ज़ाह्मण कुमारने त्रिवणीमे स्नान किया ॥ १२ ॥ कुछभोजन 
मिलनेकी आशास ऋषियोंक आश्रममें प्रवेश किया और 
वहां हरिमित्र मुनिके आश्रम जा पहुचा ॥ १३॥ जहां 
पुरुषोत्तममासकी बडी पवित्र सुक्तिमुक्तिको देनवाली 
कमा एकादशीकी स्तुत्रि हो रही थी ॥। १४ ॥ ऋषियोंके 
समुदायमें पापहारिणी उस कथाकों जपता हुआ सुनकर 
उससे भी कमझानामकों एकाद्शीका ब्रतकर उनके साथ 


हि १ तत्राश्रम पुरुषोत्तममासस्य कल्मपनाशितीं कथां कथयतां जनानां समागमे पुरुषोत्तममासाधिकरणिका 
क्तप्रदायिनी पुण्यतमा कम्रढाख्या या एकादशी श्रद्धया 


ऋ क्र ७ 
स्व जते कुस्वा शूल्याक््य स्थित आसीदिति खो ऊत्रयान्वयः 


शून्याल्यमें निवास किया | १५ ॥ १६ ॥ जिसके प्रभा- 
बसे आधीरातमें कमाने स्वयं आकर उस ब्राह्मणकुमारसे 
कहा कि, हे विग्र ! में तुम्हें वर देती हूँ ॥ १७ ॥ ब्राइगन 
कहा कि, हे सुन्द्रि ! तुम कौन हो; किस तरह, तुम मुझ्- 
पर प्रसन्न हो ! इन्द्रकी इन्द्राणी हो या शझ्भरकी भवानी 
हो ! ॥ १८ ॥ या चांद सूरजकी ख्री हो वा गन्धव किन्नर 
की बहू हो। मैंने तुम्हारे समान और किसीको सुन्दूर नहीं 
देखा और न सुना हैं ।। १९॥ छक्ष्मीने कद्दा कि; में तुम" 
पर प्रसन्न होकर वेकुण्ठस आई हू । मुझे तुमारी एकादशी 
फलसे प्रेरित होकर भगवानने यहां भेजा है ।॥ २० | पुरु- 
षोत्तममासके शुद्ध कृष्णपक्षम जो कमछा एकादशी होपे 
है उसीके उपलक्ष्यमें में तुमे कमछा देनी आई हूँ ॥ २६ ॥ 
पुरुषोत्तम मासके पहले पक्षम जो एकादशी होती 
उसको तुमने प्रयाग तीथेराजमे मुनियोंके निकट 
किया है || २२॥ उसी ब्तके प्रभावके वश होकर 
है ब्राह्मण श्रेष्ठ ! में तुमें आशीर्वाद देती हूँ. कि। ठु्भारे 
कुछमें जो मनुष्य उत्पन्न होंगे। २३॥ उनपर में परसत 
रहँगी इसमें कोई सन्देह नहीं है। आ्राझणने कहां कि) 
५ 
मुक्तिन 


# ह, हे अं, 


स्तुता अर्थात्तेस्तां पापद्दारिणीं कमढां श्ुत्वा जपन्‌, संस्तेजने: 
|| > 


ब्रतानि, | भाषाटीकासमेंलः | (३८१ ) 
































मे पश्मे ब्रत॑ विस्तरतों वद ॥ २५ ॥ यत्कथासु प्रवतन्ते राजानों ये जगद्धिताः ॥ लक्ष्मीरुवाच॥ 
श्रोतणां परम आव्यं परवित्राणामठुत्तमम्‌ ॥ २५ ॥ हुःस्वप्ननाज्ञनं पुण्य ओतव्य॑ यत्नतस्ततः ॥ 
उत्तमः श्रद्धया युक्तः छोक॑ छोकाद्धेमेव च ॥ २६॥ पठित्वा झुच्यते सद्यो महापातककोाटीमि/॥ 
मासानां परमो मासः पाक्तिणां गरूडो यथा ॥ २७ ॥ नदीनां च यथा गड्ढा तिथीनां द्वादशी 
तिथि: ॥ तस्यामचेन्ति विदुधा नारायणमनामयम्‌ ॥ २८॥ ये यजन्ति सदा भकत्या नारायण- 
मनामयम ॥ तानचेयन्ति सतत बह्माद्या देवतागणाः ॥ २९ ॥ नारायणपरा ये च हरिकीते- 
नतत्पराः। परिप्रजागरा ये च कृताथ्थास्ते कलो युगे ॥ ३० ॥ शुक्ल वा यदि वा कृष्णे भवे- 
देकादशीद्रयम्‌ ॥ गहस्थानां च पूर्वा तु यतीनामुत्तरा समता ॥ ३१ ॥ एकादशी द्वादशी च 
रविशेषे चयोदशी ॥ ब्ले ऋतुशतं पुण्य त्रयोदश्यां तु पारणम्‌ )। ३२॥ एक्ादहर्यां निराहारः 
स्थित्वाहमपरे5 हनि ॥ भोक्ष्यामि पुण्डरीकाक्ष शरणं मे भवाच्युत ॥३१॥ अमुं मन्त्र समुआाये 
देवदेवस्य चक्रिणः ॥ भक्तिभावेन तुष्टात्मा चोपवा्स समपंयेत्‌ ॥३४॥ देवदेवस्थ पुरतो जागरें 
नियतो व्रती ॥ गीतिवायैश्व नृत्येश्व पुराणपठनादिमिः ॥ ३५ ॥ ततः प्रातः समुत्यथाय द्वादशी- 
दिवसे ब्रती ॥ स्नात्वा विष्णुं समभ्यच्ये विधिवत्मयतेन्द्रियः ॥ ३६ ॥ पश्चामृतेन संस्ाप्य 
एकादरद्र्यां जनादनम ॥ द्वाददयां च पयः्स्नान हरेः सारूप्यमइठते ॥ ३७॥ अज्ञानतिमिर/- 
न्थस्य व्रतेनानेन केशव ॥ प्रसीद सुमुखो नाथ ज्ञानदष्टिप्रदों भव ॥ ३८ ॥ एवं विज्ञाप्य देवेदा 
देवदेव॑ च चक्रिणम्‌ ॥ ब्राह्मणान्‌ मोजयेत्पश्चात्तेभ्यों दद्याश्व दक्षिणाम्‌॥ ३५ ॥ ततः स्ववन्घुनिः 
साई नारायणपरायणः ॥ कृत्वा पश्चमहाय्ञान्‌ स्वयं छुखीत वाग्यतः ॥ ४७ ॥ एवं यः प्रयतः 
कुर्यात्पुण्यमेकादशीघ्रतम्‌ ॥ स याति विष्णुमवनं पुनरावत्तिदुलेभम्‌ । ४१ ॥ इत्युकत्वा कमला 
तस्मे प्रसन्ना तस्य वबंशगा ॥ सो5फषि विप्रों धनीमभूत्वा पितुर्गेहे समाविशत्‌।॥।४२॥ एवं यः कुरूते 














इस् लिये आप मेरी शरणता स्वीकार कीजिये ३३ ॥| इस 


हे लक्षिम | यदि तुम मुझपर प्रसन्न हो तो विस्तारपूर्वेक ॒ 
मन्त्रको उद्चारण कर भगवानकों भक्तिभावस प्रसन्न हो 


उस ब्रतकों कहो ॥ २४ ॥ जिसको सुननेके छिये जगत्‌ | 





कल्याणकारी राजाछोग प्रवृत्त होते हैं। लक्ष्मी बोली कि, 
सबस उत्तम सुनने योग्य सबसे अधिक पवित्र ॥ २५ ॥। 


कोफसी ॥ १६॥ पढले तो वह कोटि कोटि पापोंस 
छूट जाता हे | जिस प्रकार पक्षियों में गरुण उत्तम हैं उसी 
प्रकार यह महीनों में भधिक प्रास उत्तमहे ओर जिस्र प्रकार 


णकी पूजा करते हैं जो छोग भक्तिपूवक उक्त नारायणकी 
पूजा करते हैं उनकी जह्मादि देवतागणभी सदा पूजा करते 


हैं उनमें गृहस्थियॉंको पहली और यतियोंको दूसरी करली 


धाहिये ; 
पाहिद || २७--३१ ॥ एकादशी या द्वादशी तथा रात्रि- | 
शेषमे त्रयोदशीका व्रतकर शलयज्ञके फलका भागी बन | 
| पिताके घर चढछा गया ॥ ४२॥ है राजन्‌ | इस प्रकार जो 


त्रयोदशीके दित पारण करे ॥ ३२ ॥ हैं पुण्डरीकाक्ष ! 
एकादशीके निराहार रहकर दूसरे दित भोजन करूंगा 





अपने उपवासको समर्पित करे ॥ ३४ ॥ भगवानके भागे 


| जितेन्द्रिय होकर गाने बजाने नाचने तथा पुराण पठनपे 
दुःस्वप्ननाशक ब्रतको तुम ध्यानसे सुनो । सबसे अच्छी | 
वात तो यह हे कि,श्रद्धासे युक्त होकर एक ख्ोक वा आवा 


जागरण करें ॥ ३५ | द्वादशीके दिन प्रावःकाढ उठ स्तान 
कर जितन्द्रियसे विधिपुवंक भगवानकी पूजा करे ॥३६॥ 


| एकादशीके दिन भगवानको पञ्चाम्ृतसे स्नान करावे और 
| ह्वादशीके दिन जलूस्नान करावे तो भक्त भगवानके सारू- 
| प्यभावको प्राप्त होता हैं ॥ ३७॥ हे केशव :! है नाथ । 
नदियों गद्भा उत्तम हैं द्वाद्शी तिथि भी वेसही उत्तम | 

| उस तिथिके अन्दर विद्वान छोग आनन्द्मय नाराय- 
| इस प्रकार भगवानके सम्मुख निवदन कर नादझ्षणों को 
| भोजन करा दक्षिणादे ॥ ३९ ॥ फिर आपभी सोनी होकर 
रहते हैं। जो छोग सका नारायणमें मन लगाये रहते हूँ | 
हरिकीतेन करते हैं तथा जो जागरण करते हैं वे इस कलि- | 
युगमें धन्य हैं शुक्र और कृष्णपक्षम नो दो एकादशी होती | 
| मगवानके उस लोकको प्राप्त होता है, जहांसे आना कठिन 


अज्ञानरूपी अन्धकारसे भूलछा हुआ मुझ अन्घेपर इस त्तसे 
न 
आप प्रसन्न हों और ज्ञानरूपी दृष्टिका प्रदान करो ॥३८॥ 


अपने बन्धुओंके साथ पच्च महायज्ञोंको करता हुआ भग- 
वानके स्मरणपूवेक बेध ही भोजन करे ॥ ४० ॥ इस 
प्रकार जो इस पुण्य एकादशीके ब्रतको करता हैं वह फ़िर 
हैं || ४१ ॥ इस प्रकार लक्ष्मी प्रसन्न होकर उसके वेशसें 
प्रविष्ट होगई ओर वह बाह्गभी घनवान्‌ होकर अपने 


इस उत्तम कमछाब्रतकों करता है अथबा एकादशीके दिन 


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'आकनणा न्युल्त 
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अजरारदधत पाप 


राजन कमलावतघुत्तम मे ।! श्रणयाद्वासरे विष्णोः स्बेपापेः प्रसुच्यते ॥४३॥ इते श्रीजज्माण्ड- 
पुराणे एरुपोत्तममासे कमलानामेकादशीमाहात्म्य॑ संपूर्णम्‌ ॥ 
श्रवणेकादश्यां वामनावतार । 

भाद्पदे श्रवणैकोदरयां मध्याहे वामनावतारः ॥ श्रवणयुक्तशुकछेकादश्यलामे तु दशमी- 
विद्वापि श्रवणयुता ग्राह्म ॥ तथा च मदनरत्ने वहिपुराणे-दशम्येकादशी यत्र सा नोपोष्या 
भवोत्तिथि; ॥ श्रवणेन ठ॒ संझक्ता सोपोष्या सर्वकामदा ॥अथ कार्तिकशुक्ेकादहथां प्रवोवविधिः | 
हेमाद्रौ बाहों एकादद्यां तु शुक्वार्यां कार्तिके मासे केशवम्‌ ॥ अखुछं बोधयेद्रात्रों श्रद्धा 
भक्तिसमत्वितः ॥ तृत्येगीतेस्तथा वेदेऋग्यज्ञःसाममड़ले! ॥ वीणापणवशब्देश्व पुराणश्रवणेन 
च॥ वासुदेवकथानिश्व स्तोवेरन्येश्व वेष्णवेः ॥ सुमाषितेरिल्रजालेमूरिशोभामिरेव च॥ 

के एक... अ 8 थे. आह 8 चर ली... के ९ विकार 
पष्पधूपेश्व नेवेद्येदीपव क्षे: सुशोभनेः ।! होमेमेक्ष्येरप्पेश्च फलेः शकऋ्रपायसेः ॥ इश्षोविकारे' 
भधुरेद्राक्षाक्षौद्रेः सदाडिनेश।कुठेरकस्प मजयो मालत्या कमलेने च॥झुंठेरकः-पर्णा शः, कृष्णतुल' 
सीति केवित्‌ ॥ हताभ्यां श्वेतरक्ताभ्याँ चरदनाभ््याँ च सबंदा ॥ कुडकुमालक्तकाभ्यां च रक्तसूत्रे 
सकड़णे। ॥ तथा नानाविधेः पुष्पेद्रव्येवीरक्रयाहते॥ विक्रेत्रा प्रथमही5मिहित मूल्ये दत्ता क्िश्मागाः 
क्रपो वीएक्रय; ॥ तस्यां राज्यां व्यतीतायाँ द्वादइश्यामरूणोदये ॥ आदो पृतेनेक्षवेण मधुना 
स्नापयेत्ततः ॥ दध्ना क्षीरेण च तथा पश्चगव्येन शाखबित ॥ उद्धततें माषचूण मधुरामलकानि 
च॥ सपंयाश्र पियंशुश्न मातुलिगरसस्तथा ॥ सर्वोषध्यः सब्वंगन्धाः सवबीजानि काश्वनम्‌॥ 
मड़लानि यथाकाम रत्नानि च कुशोदकम ॥ णवं संशोध्य देवेश दद्याद्ोरोच्न शुभम ॥ततस्तु 
कलशान्‌ स्थाप्य यथाप्रार्तांस्त्वलंक्ताव्‌ ॥ जातीपलवसम्क्तान्सफलाँश सकाश्वनान्‌ ॥ पुण्याह- 
वेदशब्डेन वीणावेणुरवेण च्‌॥ एवं रूुंश्ताप्य गोविन्द स्वनुलित स्वलंकृतम्‌ ॥ सुवाससं तु 


संपूज्य सुमनोमिः सकुंकुमेः ॥ धूवेदीपेमनोजैश् पायसेन च भूरिणा ॥ हविष्येश्वान्रदानेश्व होमेः 













जो इसकी कथा सुनता हे वह सब पायोसे मुक्त हो जाता | अवारोंसे काडी तुछसोकी मंजरीसे ओर कमलछोंसे, इुंठः 
है ४३।॥ यह श्रीत्रह्माण्डपुराणक्री पुरुषोत्तममासका | रेक पर्णाशकों कहते हैं जिस कोई काडी तुलसी कहते है, 
कमठानामक एकादशीका साहात्म्य सम्पूरो हुआ।॥ भाद-| लायेहुए छाछ और सझेद चन्दुनस केशव ओर अछक्तः 
बके महीनेमे अ्रवणनक्षत्र युक्त द्वादशीके दिन मध्याहँमें | केले रक्तसूत्र (नाछ ) स और सखुवर्णके केकणसे नाना 
वासन भगवानका अवतार हुआ है। श्रवणनश्षत्रयुक्त यदि | प्रद्नारक्षे पुष्पोंसे और पहले कीमत दीहुईं अनेक चीजों 
शुह्धा एकादशी न मिल्ठे तो दशमीविद्धा एक्रादशीभी करनी | भगवानकों उठावे । विक्रेताके पहिंछे कहेंहुए मूल्यको 
चाहिये, यदि उसमें श्रवण हो । मदनरत्नस वहिपुरणसे | प्रथम देकर खरीदी हुईं वस्तु ऐसे ऋयकों वीरक्रय कद 
कहा है कि, दशमीम यदि एकादशी हो तो उस दिन उप- | ६ उस रातके बीतजानेपर द्वादशीके अरुणोद्य्े पहुंडे 
बास न करना चाहिये पर जिस दश्षमीमें श्रवण सक्षत्र | घीसे शक्कर और मधुस दही और दूधस तथा पतच्वगव्यत 
दो तो सब कार्मोंक्की पृण करनेवाढ़ी होनेके कारण उस | शाखवेत्ता स्तान करावे। भगवाबूको उबटता तथा उड़द 
एकादशीको अवश्य उपवास करे । प्रवोधविधि-हेमाद्विने | आटा छगा कर निमछ करे | तथा मीठे आँवरछोंके फोंसे 
पद्मपुराणस लिखी हे कि, क!रविक॒शुक्ला एकादशीके दिन | सरसों और प्रियंगुस विजोरेके रखसे स्ोषधि ओर सब 
श्रद्धा मक्तिस युक्त होकर सोते हुए मगवानको रातमें जगावे। | गन्धोंसे सब बीजों और सुवणसे यथाकाम अन्य माजलिक 
नाचे, गावे, ऋकु, यजुः सामवेदका मालिक अध्ययन | रत्नोंको लथा हरिको छुशजछसे शोव गोरोचनको भाग 
करे। बीणा मदइूसे एवं पुराणोंकी कथाओंस एवं अन्य | वानके छिय दे।फरलोॉंस और सुवर्णस जुद्दी या माछती आदि 
बासुदेव भगवानकी कथाओंखधे लथा विष्णुस्तोत्रस अद्भुत 


| के पलब्रोंति सजे हुए घडोंको स्थापित करके पीछे पुण्याई" 
' तमाशोंसे च्छ, कर । आप ० के 

वमाशोंस वाइसकोप सिनेमा आदि इन्द्रजाढसे धूपपुष्य |वाचन और वेद्ध्वनिस तथा मनोद्ारी सन्लीवसे भगवानको हक 
लि" पलक हुए ३ और अनेक भोजन | स्नान कराकर अछंकृत्‌ कर अनुछेप करें। अल 
पदार्थासे अनेक प्रकारके फछोंस अनेक प्रकारकी मिठाई | फूछोंसे अच्छेवल्र पहिन हुए भगवानकों वस्र घारण कर 
और दूधकी चीजोंसे ईंखके मीठे विकारोंसे अंगूरोंसे मधुसे | 

















बहुतस धुत्र दीप तथा खीर आदिके ह॒विष्यान्नदा 
१ इद्द्वादश्या उपकक्षकम्‌ । २ कटूफलेनेतिकचित्पाठः।. .. 


श्रतानि, | भाषाटीकासमेलः । ( ३८३ ) 











2 पका: 42/0057757/2:00:7 20772. जग पक पटक य सा किस 757 ३०० ० आपकी नी 78372: 22 














पुष्प! सदक्षिणेः ॥ वासोमिलरेषणेरन्येगोमिरवेमंनोजवेः ॥ अल्षय३ पृूजनीया: विष्णोरी- 
हाथ मूतेयः । यज्ञ शिष्टापव्वतं पश्चद्नों उव्यं बराह्मणश सह ॥ इति अ्रबोधोत्सवविधि: ॥ 
भीष्मपश्चक्त्रतस्‌ | 

अथ कार्तिकशुक्कैकादश्यां भीष्मपश्चकत्रतं हेमाद्ों नारदीये।नारद उबाच ॥ यदेतदचले पुण्य 
ब्रतानामुत्तम॑ ब्रतम्‌॥ कतेव्य कार्तिडे माति अयत्ताद्वीष्मप्रकम्‌॥ १॥ विधान तस्य जिस्पष्टें 
फल चापि ततरो वंरंमाकृथयस्व प्रसादिन शुनीनाँ हिलकाम्यया ॥ २॥ ब्ल्योबाच॥ प्रवक्ष्यामि 
महापुण्य॑ व्रत त्रेतविद्ां वर ॥ मीष्नेंगव च संञाप्ते ब्रते पबादिएल्मऋषण ॥३॥ सकाशादाहछ्ुदेवस्व 
तेनोक्त भीप्मपश्चकम्‌ ॥ व्रतस्यास्‍्य शुणान्वकुं का शक्तः केशवाइते ॥ ४ ॥ ब्रत॑ चेलन्महापुण्य 
महापातक्माशनम्‌ ॥ अतो वर प्रयत्नेन कतेव्य मीष्मपंखकम्‌ ॥ ५ ॥ सदःकृमारसंहितायाम्‌-- 
वालखिल्या ऊचुभाकार्तिकस्थामले पश्षे स्नात्वा सम्यग्यतत्रतः ॥ एकाददरयां तु गरह्दीयाद्वतं प 
दिनात्मकम्‌ ॥ ६ ॥ शरपअरखुतेन भीष्मेण ठु महात्मना॥ राहथना दानधर्मा मोशन ध्मोस्ततः 
परम ॥ ७ ॥ कथिताः पाण्डुदायादेः कृष्णेनांपि श्रुतास्‍तदा॥ ततः मीतेन मनसा वाझुदेवेल 
भाषितम्‌ ॥ ८॥ धम्यवन्योउलि भीष्म त्वं धर्मों; संश्रावितास्त्वया ॥ एकादुह्यां कार्तिकस्य 
याचित च जल॑ त्वया ॥ ९ ॥ अज्ञुनेन समानीते गाड़ बाणस्‍्य वेगतः ॥ तुष्ञानि तब गात्राणि 
नस्मादेव दिनादिह ॥ १० ॥ पूर्णान्त सवलछोकासत्वां तपेयर्त्वध्यदानतः ॥ तस्मात्सवेश्रयत्नेन 
मम संतुष्टिकारकम्‌ ॥ ११ ॥ एतद्ठत॑ ऋकुर्वन्ठ भीष्मपश्चकर्सज्ञितम्‌ १ कारतिकस्य ब्र॒तं कृत्वा 
न कुर्याद्वीष्मपश्चकम। १२॥ कार्तिकस्य ब्तं स्व दूथा तश्य मविष्याते ॥ अशक्तश्ेच्नरो भूया 
दसमधश्व कार्तिके । १३॥ भीष्मस्य पञ्चक कृत्वा कार्तिकस्य फल लमेत्‌॥ सत्यत्रताय शुचये 
गाड़ेयाय महात्मने ॥ १४॥ भीष्मायेतददाम्यध्येमाजन्मबह्मचारिण ॥ सब्येनानेन मंत्रेण 
तप॑णं सार्ववर्णिकम ॥ १५ ॥ ब्ताड्ुत्वात्यूर्णिमायां प्रदेयः परापयूछबः ॥ अपुत्रेण मकतेंव्य॑ 
| शीके दिन स्नानकर भीप्मप्तच्चक ब्रतकों घारण करे ॥६॥ 
| शर्शथ्यःपर सोते हुए भीष्मजी महाराजके कहेहुए राजध- 
प्यारे आह्मणोंकी पूजा करे क्योंकि ब्राह्मण भगवानकी पूज्य | स्मोकों दानघम्मे ओर मोक्ष धर्मोको पाण्डवॉने और भग- 
मूर्तिरूप हैं, और बचेहुए अस्ृतको अन्य ब्राह्मणोंके साथ | वान कृप्णसे सुना हैं ॥ ७॥ उनसे जिससे प्रसन्न होकर 
सय भोजन करे । यह प्रवोधोत्सवविधि पूरी हुई ॥। अथ | भगवान्‌ वासुदेवने कहा ॥ ८ ॥ कि, हे भीप्म ; आप धन्य 
भीप्सपच्चकब्रव-नारदीयसे लेकर हमाद्विन कहा है कि। | हैं आपने धर्मोको खूब सुनाया, इसी एकादशीके दिन आ- 
नारदूजी बोले कि, हे प्रजापते जो यह अचल पुण्य हे | पने जछूकी याचना की ॥ ९॥ अजुनने आपको अपने 
ब्रतोंका उत्तम ब्रव है जो कार्विकके महीनेमे मी-्स्पच्चक | बराणस निकलेदुुए गज्ञाजलको छाकर दिया इसी दिनसे 
प्रयत्नके खाथ किया जाता हे (१॥ उस का स्तिकमासकी | यहां आपके अछ्ग सन्‍्तुष्ट हुए हैं ॥१०॥ पूर्णान्त हुआ जान 


हे ने ! हे हर ३५ कक ७, शी 
गुक्क एकादशीके सर्वोत्तम भीष्समप भव के ब्रतकी विधि आर | आप को उसदिन सब लाग अध्यदान देते हू इस लिये मरे 
उसके शअ्रप्ठ फछको आप मुन्रियोंकी हितदृष्टिस कृपाकर 


| सन्तोषके देनेवाले ॥ ११ | इस मीप्म पञ्चक नामके ब्रत- 
कहिये।॥| २॥ ब्रह्माजी बोले कि, हे ब्रतवारियोंमें श्रेष्ठ नार- | को करना चाहिये । जो मनुष्य कार्थिकके ब्रतकों करक 
दज्जी | मे आपको पवित्र मीप्मपश्चक ब्रवकों कहता हूँ 


है | भीष्मपञ्चक त्रतको न करे तो ॥ १२॥ उसका कात्तिक- 
जिसे भीष्मजीने पाया था यह पांच दिनका हैं॥ ३॥ [जब्त सब निष्फल होता है । जो मनुष्य असमर्थ या अशक्त 
लिप ऊ््‌ हर हि 
भगवानके पासस पाया था इस कारण इस भीप्मपंचक 


| होनेके कारण काश्तिकके त्रवकों न करसके ॥ १३॥ वो 
छत श | 
कहते हैं इसके गुणोंको भगवानकों छोड और कोई वण्त्न 


होमसे तथा दक्षिणासहित फूलॉसे अनेक प्रकारके वस्त्र और 
भूषणसे गाये और वेगवान्‌ कीमती घोडोंसे भगवानके 









| भीप्मप व ब्रतको करके पूरे कार्थिकके ब्रतोंक फल पाजाता 

नहीं करसऋता है ।। ४ ॥ यह ब्रत बडा पवित्र और पातक [हें | परम पवित्र सत्यत्रत महात्माग गिय ॥ १४ ॥ जो कि, 

नाशक है । इस लिये कष्ट उठाकरभी इसे करना चाहिये | जन्मपय्यन्त त्रह्मचारी रहा हूं ऐसे पिवामह भीष्सके ल्यि 

॥ ५॥ सनरकुमार संहितामें लिखा है कि; वाढुखिल्य बोले | इस अब्यंको देता हूँ अप ्लोकसे सत्य होकर सब दर्पण 

कि, कार्जिक महीनेकी शुह्ञपक्षमें अच्छी प्रकारसे एकाद- करें यह सब वर्णोंके लिये है १५॥ ब्रतांग होनेके कारण 
अतब॒ तामित्यपि पाठ: | * एसद्रिस विध्यादिकवथन सविस्तरं तताकांदुवसन्तब्यम । 


जे 


[ 4८४ | बलरॉज । [ पकीदरशी< 
सर्वथा भीष्मपश्चकम्‌ ॥ १६॥ यः पुत्रार्थी त्रत॑ कुयोत्सस्रीको भीष्मपश्चकम्‌ ॥ त॑ दत्त्वा पापपु- 
रुष वर्षमध्ये सुत॑ लभेत्‌ ॥ १७ ।। अवश्यमेव कतेव्यं तस्माद्वीष्मस्य पश्चकम्‌ ॥विष्णुप्रीतिकर 
प्रोक्ते मया भीष्मस्य पदश्चकम्‌ ॥ १८ ॥ अज्रेव हि प्रकतेव्यः प्रबोधस्तु हरे! खगः ॥ हतः शज्गा- 
छुरो देत्यो नमसः शुक्रपक्षके ॥ १५ ॥ एकादर्यां ततो विष्णुश्राठुम(स्थे प्रछुतवान ॥ क्षीरो- 
द्धों जाग्रतो5सावेकादइयां तु कार्तिके ॥ २०॥ अतः प्रबोधन कार्यमेकादइ्यां तु वेष्णवेः ॥ 
प्रबोषमनरा:--उत्तिष्ठोत्तिष्ठ शद्भन्न उत्तिष्ठाम्भोधिचारक॥।कूम रूपघरोत्तिष्ठ जेलोक्ये मड़ले कुछ ॥१२॥ 
उत्तिष्ठोत्तिष्ठ बाराह दें्रीकुतवतुन्धर ॥ हिरिण्याक्षप्राणघातिश्रेलोक्ये मड्ल॑ कुरू ॥ २२॥ 
हिरण्यकशिपुन्न त्व॑ं प्रहदानन्ददायक ॥ लक्ष्मीपते समुत्तिष्ठ जेलोक्ये मड्लं कुरू ॥०३॥ उत्तिष्ठ 
बलिदपन्न देवेन्द्रपददायक॥उत्तिष्ठादितिपुत्र त्व॑ं चेलोक्ये मड़ले कुछ ॥ २४७॥ उत्तिष्ठ हेहयाधीश- 
समस्तकुलनाशन ॥ रेणुकान्न त्वमुत्तिष्ठ त्रेलोक्ये मड़ले कुछ ॥ २५ ॥ उत्तिष्ठ रक्षोदलन अयो- 
ध्यास्वगंदायक ॥ संमुद्रसेतुकतंस्त्व॑ बरेलोक्ये मड़ाल॑ कुरू ॥ २६ ॥ उत्तिष्ठ कंसहरण मदाघूर्णित- 
लोचन ॥ उत्तिष्ठ हलपाणे त्व॑ चेलोक्पे मड़्ले कुछ ॥ २७॥ उत्तिष्ठ त्व॑ गयावासिस्त्यक्त 

लोकिकवृत्तक ॥ उत्तिष्ठ पद्मासनग चेलोक्ये मड़ले कुछ ॥ २८ ॥ उत्तिष्ठ म्लेच्छनिवह खड़संहार- 

कारकाअंशंवाह युगानते त्व॑ं तेलोक्ये मड्रले कुर॥२९॥उत्तिष्ठोत्तिष्ठट गोविन्द उत्तिष्ठ गरडध्वज ॥ 
उत्तिष्ठ कमलाकान्त जेलोक्ये मड़लं कुरू ॥३०॥ इत्युकत्वा शइमेर्पांदि प्रातःकाले तु वादयेद | 
वीणावेणुमुदड्रगांदे गीतनृत्यादि कारयेत्‌ ॥ ३१ ॥ तुश्सोविताहः--उत्थापयित्वा देवेशों पूजा तस्य 
बिधाय च ॥ सायंकाले प्रकतेग्यस्तुलूस्युद्गाहनो वध्चिः ॥ ३९२॥ अवश्यमेव करततंव्यः प्रति- 
वर्ष तु वेष्णवेः ॥ विधि तस्य प्रवक्ष्यामि यथा खाड़ा क्रिया भवेत ॥ ३३ ॥ विष्णोस्तु 





प्रतिमां कुर्यात्पलस्य स्वरणेजां शुभाम्‌ ॥ तदधा तुलस्यास्तु यथाशकत्या प्रकल्पयेत ॥ ३४॥ 


पूर्णिमाके दिन पाप पुरुषका दान करे । तथा पुत्रहीन मनु- 


प्यको यह ब्रत अवश्यही करना चाहिये । जो पुत्रार्थी पुरुष 
खत्री सहित इस ब्रतको करता है उसे पाप पुरुष देकर एक 
वर्षके भीतर पुत्र पाजाता हैं॥। १७ ॥ इस कारण इस भी- 
प्मपच्चक ब्रतवको अवश्य करना चाहिये । यह भीष्मप ध्चक 
ब्रत विष्णुप्रीतिका करनेवाला है || १८ ।| हे खग | इसी 
दिन भगवाधको जगाना चाहिय । श्रावण शुक्छ एकाद- 
शीके दिन शंखासुर नामक दृत्यको मारा था ॥ १९॥ इस 
लिये भगवान्‌ चौमासमें एकादशीको ्वीरसमुद्रमं सोये 
कात्तिकी एकादशीके दिन उठे ॥ २०॥ इसी कारण वेष्ण- 
बॉको उस दिन प्रबोधोत्सव मनाना चाहिये, भगवानकों 
जगाते समय “ उत्तिष्ठोत्तिष्ठ शखध्न ” इस ज्छोकस लेकर 
अर्थात्‌ इकीसवें फछोकसे भारम्भ कर “उत्तिष्ठ कमढाकान्त 
त्रेलोक्ये मझुल कुरु” इस तीसवें झछछ्ोकतक पाठ करे | है 
शंखासुरके मारनेवाले |! खडा हो खडा हो, हे समुद्रमें 
फिरनेवा्े खडा हो, हे कृमरूप धारण करनेवालू ! खडा 
हो उठकर तीनों छोकोम मंगल ऋर | २१ ॥ है वाराहबन- 
कर दाठसे भूमिका उद्धार करनवाछे खडा होजा, आप 
हिरण्याक्षके सारनेवाढे हैं तीनों छोकोंमें मंगल करिये 
.! है | आप हिरण्यकुश्यपुको सारनेवाले हैं आप प्रह्मद- 
हे । जरा वैनेबाले है, हे उब्मीके स्वामिन्‌ | खडा हो, 
नो छोकोंसे संगछकर ।२१॥ हे ब्रलिके द्पषको नष्ट कर- 


नेवाले! हे इन्द्रको इन्द्रका स्थान द्लकानेवाले | हे अद्तिक 
पुत्र । खडा हो, तीनों लोकॉ्में संगलकार ॥ २४ || हे सह- 
खबाहुके सारे कुछको मारनेवाढू खडा होजा, है रेणुकाके 
मारनेवाले | उठ तीनों छोकोमें मंगठकर ॥ २५ ॥ हें राष्ष- 
सोंके मारनेवाले ! खडा -होजा, हे अयोध्याको स्व दने' 
वाले समुद्रका पुल बॉधनेवाले तीनों छोकॉमें मंगछकर 
॥ २६ ॥ हे कंसके मारनेवाले .! उठ बैठ, हे मदके घूमते 
हुए नेत्रोंवाले हधर ! उठ तीनों छोकोंमें मंगछकर ।२०७॥ 
छौकिकवृत्तियॉंको छोड गयामें वास करनेवाले ! खद् 
होजा, है पद्मासनपर चलनेवाले ! उठ तीनों छोकोंमें मंग- 
छकर।। २८ || युगान्तमें घोडेपर चढकर म्लेच्छोंके समु- 
दायको खड़से संहार करनेवाले उठकर खडा होजा तीनों 
लो रॉँका मंगलकर ।। २९ ॥ है गोविन्द्‌ | उठ उठ, है गरु* 
डध्वज ! उठ, है कमलछाके प्यारे! उठ तीनों छोकॉरमें मेंग" 
लकर ॥| ३० ॥ इस प्रकार कहकर प्रातःकाछ शेख मेरी 
आदि बजाबे. वीणा वेणु और मसदद्भ/दिक बजा नृत्य गीत 
कग्रावे || ३१ ॥ देवेशको उठाकर उनकी पूजा करनी चा- 
हिये | सा्यकालके समय.तुल्सीके विवाहकी विधि करनी 
चाहिये ॥ ३२ ॥ वष्णवॉको चाहिये कि; अतिवर्ष इस 
ब्रवको अवश्य करे, में उस विधिको कहताई जिससे 
पूरी 5 90354 ३३ ॥ एक पल सोनेकी विष्णु भग 
वानकी अच्छी अतिम्ना बनानी चाहिये, उसके आयेदी- 
सोनेकी प्रतिमा बनावे अ्धना जैसी अपनी शक्ति हो वेसी 


श्रतानि, | ( ३८५ ) 


भाषाटीकासमे तः ! 















प्रागमतिष्ठां कुर्यात्त तुलसीविष्णुरूपयो; ॥ ततः उत्थापयदियवं पू्वोक्तित्च स्तवादिनिः ॥ शे५ 
उपचार; घोडशसिः पुछषसक्तेन पूजयेत । दशकालों ततः स्मृत्वा गणेश तत्र एजय्रेत ॥ र६॥ 
पुण्याहं वाचयित्वाथ नान्‍्दीश्राउ समाचरत ॥ वेदवाद्य [दिनियोयदविप्णमूत्ति समानयेत ॥ ३७ ॥ 
तुलघ्या निकटे सा तु स्थाप्या चान्तरिता पढे॥ आगच्छ अगदन्देव अचयिप्यामि केशव॥ रेद। 
तुभ्य॑ ददामि ठलतीं सर्वकामप्रदों भव ॥ दग्यात्रिवारमध्य च पाद्यं विश्रमेव च॥ ३५ ॥ तत- 
धाचमनीयं च ज्िरकत्या च प्रदापायेत ॥ ततो दधि पृत क्षोद्रं कांस्यपात्रपुटीकृतम्‌ ॥ ४० 
मधुपरऊ गहाण त्वे वासुदेव नमोः्स्तु ते ॥ तनो ये स्वकुलाचाराः कतेव्या विष्णदुष्टये ॥ ४१ ॥ 
हरिद्रालेपनाभ्य ड्रकाय सब विधाय च॥ गोपेलिपघमये पूज्यों ठुलसीकेशदों पुनः॥ ४१॥ 
पृथकू पृथक ततः कार्यों सम्मुखों मड़ल॑ पठेत्‌॥ इंबहट्टे भास्करे तु संकल्प॑ ठ॒ समाचरेव्‌ 
॥ ४३ ॥  स्वगोत्रप्रवरात॒क्त्वा तथा जिपुरुषादिकृम्‌ ॥ अनादिमध्यनिधषन जेड्रोक्यप्रतिपालक 

॥ ४४ ॥ इमाँ ग़हाण तुलसीं विवाहविधिनश्व॑र ॥ पार्वतीबीजसम्भूतां द्न्दाभस्मनि संस्थि 

ताम्‌ ॥ ४५॥ अनादिमध्यनिधनां वछमभां ते ददाम्यहम्‌ ॥ पयोधटेश्व सेवामनिः कन्यावद्ध- 

घिता मया ॥ ४६ ॥ त्वत्मियां तुलखीं ठुम्य॑ दास्यामि त्वे गृहाण भोः ॥ ए४ दर्वा ठ॒ तुलसी 
पश्चातौ पूजयेत्ततः ॥ ४७ ॥ राज्ौ जञागरणं छु्यात्कारतिकत्नतसिद्धये ॥ वाहुखिलया ऊचुई ॥ 
ततः प्रभातसमये तुछसीं विष्णुमर्चचेत्‌ ॥ ४८ ॥ वह्विसस्थापन कृत्वा द्वाइशाक्षरविद्यया ॥ 
पायसाज्यक्षौद्रतिलेहुनेद्श्रोत्तर शतम्‌ ॥ ४९ ॥ ततः स्विष्टकतं हुत्वा दह्यात्ुगोहुति ततः॥ 

आचाय च समभ्यच्य होमशोेष॑ समापयेत१५०॥ चतुरों वार्षिकान्मासात्रियमी यसथ यः ऋत/। 
कथयित्वा दविजेभ्यस्त॑ तथान्पत्परिपूजयेत्‌ ॥ ५१ ॥ इद अत मया देव कृत मीत्ये तव अनो ४ 
न्यूनं सम्पूर्णतां यातु त्वत्मसादाज्नादन ॥ ५२॥ रेवतीतठुयचरणे द्वाइशीसंयुते नरः॥ न 


कुर्याव पारणं कर्बत बरतें निष्फलतां अजेत्‌॥ ५शे। ततो येषां पदार्थानां वजन ठ॒ कृत मवेद्‌ ॥ 
8 बस कक कस दल नर कर डक जल 


बना के । ३४ ॥ पीछे उब दोनोंकी प्राणप्रतिष्ठा करनी | 
चाहिये। इसके पीछे पहिले कहे हुए स्तवोंस भ्गवानका | 
उत्थापन करना चाहिये।सोछहों उपचारों और पुठषसूक्तसे | 
पूजन करना चाहिये | पीछे देशकालरका स्मरण करके गणे- | 
शका पूजन करना चाहिये ॥ ३५ ॥ ३६॥ पुण्याह वाचन | 
कराकर नान्दीश्राद्ध कराये, वेद बाजोंके शब्दोंसे विप्णुः | 
मूतिको भली भांति छवे ॥ ३७ ॥ तुल्सीके समीपमें कपड़ा | 
डालकर खापित कर दे कि, “ है देव केशव ' आज में | 


तेरा पूजन करूंगा ॥ ३८ ॥मे तुझे तुलसी दूंगा तू. मुझ 


इसके बदले मे मेरे सब कार्मोकी पूविकर! तीन वार अच्य | 
दे और पाद्य विष्टर दे । ३९ ॥ पीछे तीनवार आचसनीय | 
कहकर आचमनीय दिलावे | इसके वाद दधि धरत और | तर हर 
| एकसो आठ आहुति दें ॥ ४९॥ पीछे स्विष्टत्‌ हवन 


मधुको कांसेके पात्रमे रखकर || ४० ॥ हे वासुद्व ; मधु- 


किक. 


पक ग्रहण करिये तेरे लिय नमस्कार है पीछे अपने कुछके | 
जो आचार हों वे सब विष्णु भगवानकी प्रसन्नवाके लिये 
करन चाहिये ॥ ०१ ॥ हलदी चढाना आदि खसव बिधि | 
करके, गौवूलिके समय तुछसती और केशवका पूजन करना | 
चाहिये ॥ ७२ ॥ इसके बाद दोनोंकों अहुग * सम्मुख | 
वेठावे, जब सूर्य देव थोडेद्दी दीखें तव संकल्प करे ॥४३१॥ | 
अपने तीन पुरुष तथा गोत्र ओर प्रत्ररोंकी कहकर “ हें- | 
आदि मध्य और अन्तसे रहित ! है तोनों छोक्ोंके पाछन | 


४५ 





करनेवाले ईश्वर | ॥ ४४ ॥ विव्राहविधिसे तुलसीको अहण- 
कर, यह पा्तीके वीजसे उत्पन्न हुई हैं । यह पहिल बृन्‍न्दा- 
की भस्ममें खित थी ।! ७५ ॥ इसका आदि मध्य ओर 
अन्त यह कुछभी नहीं हैं । ऐसी तेरी बलभाकों तुझे देता 
हूँ। मैने पानीके घडे और अनेक तरहकी सवाओंसे घरमें 
कन्याकी तरह यह बढाई है ॥ ४६ ॥ में तेरी प्यारी तुठ्खी 
को तुझे देता हैँ आप अहण करें; इस प्रकार तुलसी देकर 
पीछे उसका पूजन करना चाहिये ॥ ४७॥ कार्विककी 
ब्रतर्सी सिद्धिके छिये राककी जागरण करना चाहिये। 
वालखिल्य बोले कि; इसके बाद प्रभातके समयमें तुलसी 
और विष्णु भगवानका पूजन करें॥ ४८॥ अभिर्रापन 
करके दवादशाक्षर मन्त्रसे पायख आज्य मधु और विलसें 


करके पू (हिति देनी चाहिये, आा वायेक्री पूजा करके 
होमके अवशिष्ट कृ्यको पूरा कर देवा चाहिये ॥ ५० ॥ 
चार वर्ष या चार महीनेका जो जिसने नयमकर लियाहो 
उसे आ्ाह्मणोंव सामने कहकर उसका ओर पूजन करें 
७५९ ॥ कि, देव ' हे भ्रभो , यह ह्त सेने आपकी 
प्रस॒न्नताओे छिय किया हू । हे जवाईव : अप ही प्रसब्रंतास 
वो अपूर्ण भी पूरा दो जाब ॥ 5५९ ॥ नलुष्यको चाहिये कि 
रेबतीके चौथे चरण सदित द्ादशीमं  पारण। न करें। यवि 


ब्रलराज) । [ एकादशी-- 


















चातुर्मास्येड्थवा चोजें ब्राह्मणेम्यः समपेयेत्‌॥ ५४॥ तल सर्च समश्वीयाद्यद्यत्यक्त ब्ते स्थित:॥ 
दम्पतिभ्यां सहैवात भोक्तव्यं वा द्विजेः सह ॥५५॥ ततो अुक्त्युत्तरं यानि गलितानि दल्लानि 
च ॥ तुलस्यास्तानि शुकत्वा तु सबेपापेः प्रभुच्यते ॥ ५६॥ भोजनानन्तरं विष्णोरपिंत॑ तुलसी- 
दलम्‌ ॥ तद्भक्षगात्पापम्क्तिश्ान्द्रायणशताजिका ॥ ५७ ॥ दक्षुखण्डं तथा धात्रीफर् च बंदरी- 
फलम्‌ ॥ सुक्त्वा तु भोजनस्थान्ते तस्योच्छिष्ट विनहयति ॥ ५८ ॥ एप त्रिषु न भुक्ते चेदेके- 
कमपि येन ठ॒ ॥ ज्ञेय उच्छिष्ट आवब नरोपसो नात्र संशयः ॥ ५९ ॥ ततः साय पुनः पूछ्या- 
विक्षुदण्डेश्व मण्डितों ॥ तुलसीवासुदेवों च कृतकृत्यों मवेत्ततः । ६० ॥ ततो विसर्जन कुर्या- 
इत्वा दायादिक हरे: ॥ वेकुण्ठं गच्छ भगवंस्तुलूस्या लहितः प्रभो ॥ ६१ । मत्कृत॑ पूजन ग्ह्य 
सन्तुद्ो भव सबतदा ॥ गच्छ गच्छ सुरश्रेष्ठ स्वस्थाने परमेश्वर ॥ ६२॥ यत्र बह्मादयो देवास्तत्र . 
गच्छ जनादन ॥ एवं विछज्य देवेशमाचार्याय प्रदापयेत्‌ ॥ ६३॥ मूत्योंदिके स्बमेव कृत- 
कत्यो भवेन्नरः ॥ झतिव्ष करोत्येव तुरूष्युदहनं शुभम्‌ ॥ इह लोके परत्रापि विपुलं सद्यशो 
लगेत्‌ ॥ ९४ ॥ प्रतिबंष तु यः कुयोचलसीकरपीडनम्‌ ॥ भक्तिमाव्‌ धनधान्पेश्व युक्तो भवति 
निश्चितद्‌ | ६५ ॥ इति श्रीसनत्कुमारसंहितायां कार्तिकशुक्लैकादहयां भीष्मपश्चकत्रतमबोधो- 
त्सवतुलसीविवाहविधिः सम्पूण: ॥ 





एकादश्युत्पत्तिकूथा | 

अथ मार्गशीषकृष्णेकादशीत्रतम्‌ ॥ अज्जुन उबाच ॥ ऊँ नमो नारायणायाव्यक्तयात्मस्वरू- 
पिंगे ॥ छष्टिस्थित्यन्तकर्त च केशवाय नमो5हतु ते॥ १॥ त्वमेव जगतां नाथ अन्‍्तर्यामी 
त्वमेव च॥ शाल्वाणां च कवीशश्व वक्ता त्वे च जगत्पते ॥ २॥ एकादशी करथ्थे स्वामिन्तुतपत्रा 
इति गीयते ॥ एत॑ हि संशय मे5च् च्छेतुमहसि त्वे प्रभो ॥१॥ बूयुः स्निग्धस्य शिष्यस्य गुरवो 
गुहममप्युत ॥ ममोपरि हृपां कृत्वा इदानीं वक्‍तुमहंसि॥ ४॥ मार्गशीर्ें कष्णपक्ले किनामेका: 
दशी भवेत्‌ ॥ कि फल को विबिस्तस्याः को देवस्तत्र पूज्यते ॥ ५ ॥ कृता केन पुरा देव एह- 

... 











इसमें पारणा करेगा तो उसका ब्रत निष्कल हो जायगा || | पर पधारिये | ६२॥ जहां ब्रह्मादिक देवता विरातते है 


चातुर्मास्य वा कात्तिकर्मे जिन पदार्धोक! निषेध कियागया 
हो उन्हें त्राह्मगफ्ञो देता चाहिय | ५३ ॥ ५४ ॥ जिसने 
इसके बाद ब्रतकालहमें जिन * पदाथीका त्याग किया था 
उन २ सब पदाथोंको ग्रहण करे अथवा सपत्नीक्‌ आपको 
ब्राह्मगोंके साथही खाना चाहिये | ५५ ॥ भोजनके 
वाद स्वतः पड़े तुडलीके पत्ते खाकर सब पापोंसे छूट 
जाता है ।। ५६ | भोजनके अन्नप्र हरि अर्पित तुछसी 
दृलके भक्षणसे चारद्रायणसे ज्यादा पाष छूटते हैं ।। ५७ ॥ 
इंख, आंवले, या वेरकों भोजवके अन्तमें खाबे वो उसका 
उच्चिष्ट दोष नष्ट होता है॥ ५८ | इन तीनों चीजोंमेंसे 
जिपने एकभी न खाईं हो तो वह मलुप्य एक वर्षतक्‌ 
उच्छिष्ट गिना जाता हैं, इसमें सश्यय नहीं है ॥ ५९ || तथा 
दूसऐ दिनभी इंखरे दण्डोंस झोमित किए हुए भगवानकी 
और तुछसीकी सायेकाछ फिर पूजा करे॥ ६० || भग- 
बानके दहेज आदिको देकर / बेकुण्ठ गच्छ भगवन्‌ ”इस 
मच्तसे आरस्भकर गच्छ जनादेन'! तक पाठऊद्दे । इसका 

अथ यह है कि, हें प्रभो ! हे भगवन्‌ ! तछुसीके साथ 3ैक- 
. 5 पधारिये ॥ ६२ ॥ भेरे किए हुए के त्तको हर का 
- सद्‌ सन्तुष्ट रहिये, हे परमेश्वर है 3) किक 
' हैं सुरश्रष्ठ ! अपने स्थात्- 


हे जनादेन ! वहां पधारिये । इस प्रकार विसजेन करऊे 
आचायक हछिए दे दे॥ ६३ ॥ जो मूर्ति तथा घूतिका उप- 


. करण हो उसे देकर मनुष्य क्ृतक्य हो जाता है। जो प्रति 


वर्ष ऐसे ही तुलसीका विवाह करता हैं, उसको इस ढछोक 
ओर परलोकम विपुल यश्ञ प्राप्त होता हैं ॥ ६४॥ यह 
श्रीसनतकुपार संहितामें आई हुईं कार्विकशुक्ला एकादशीके 
दिन भीष्एपंचकत्रत और तुल्सीग्रवोधकी विधिपूरी हुईं ॥ 

मागेशीषकी कृष्ण एकादशीका ब्रव-अजुन बोले, है 
भगवन्‌ ! आपको नमस्कार है, आप सृष्टि स्थिति और 
पह।रको करतेवाढू तथा अव्यक्त आत्मस्वरूप और नारा 
यण हैं | इसलिए हे केशव ! आपको नम्तस्कार है ॥| १ 
हे जवतके नाथ ! अन्तर्यामी शझाखों और कवियोंके इश 
हो। वक्ता और जगत्पति हो, इसलिए ॥ २ ॥ हे अभो ! 
हैं जक्वामिन्‌ | एकादशी किसप्रकार उत्पन्न हुईं ! इस संदें- 
हको आप दूर कीजिए ।| ३॥ गुरु छोग अपने श्रिप्यको 
गुप्त रहस्यभी प्रकट करते हैं इसडहिय आप मुझपर कृपाकर 
इसको इससमय कहें ॥४॥ मार्गेशीष मद्दीनेकी कष्णपक्षकी 
एकादशीका क्यानाम है? उसका फछ ओर विधि क्‍या है। 
उसमे किस देवकी पफूजाकी जाती है ॥५॥ तथा उसे पहढ 


| हु 80 मारा भा मा शत दत्त रात 270 # 00007: :;ै7 70:2४ रद 


गराषाटीकासमेल' 





द्विस्तरतो बद्‌ ॥ श्रीकृष्ण उवाच ॥ श्रणु राजन प्रवक्ष्यामि कथां पातलकनाशिनीम | 
च या त्वया राजँछोकानां हि. यया ॥ मागशीर्षे कृष्णपक्ष चोत्पत्तिनांम नामतः ॥ 
तस्थामुपोषणनिव चामिकों जायते नरः ॥ धर्माद्धवाति सत्य वे लक्ष्मी 

पुरा वे सुरनाशाय उत्पन्नां मम वक्लकभाम्‌ ॥ ये कुबन्ति नर॥ राज॑म्लेजर सोख्ये सवेद्भुवम्‌ ॥९ 
तथा पापानि नव्यन्ति लेन यानिति यमालयम्‌ ॥ अज्भजुन उबाच | उत्पन्ना सा कथ देव कर्थ 


पुण्याथिका झुभा ॥ १०॥ कर्थ देव पवित्रा वं कथ च देवतापिया ॥ श्रीकृष्ण उबाच ॥ पुरा 


रे कु, 
ड़ दे हक ४५ *_५ हु. ५बाकी ७ आओ का धर | | 


कूतयुगे पार्थ सुरनामा हि दानवः ॥ ११ ॥ अत्यद्धतो महारोद्रः सइलोकमयसड्गरः || इन्द्र उच्छे 
दितस्तेन ह्ात्यों देवः पुरन्दर।॥ १२९॥ आदित्या बसबो बल्ला दायगरफ्िस्दबंत च ॥ देवता- 


मिजितास्तेन अत्यग्रेण तु पाण्डव ॥ १३॥ स्वगात्रिराकृता देवा विचरन्ति महीतले ॥ साशझह्ा 


भयभीतास्‍्ते गतः सर्व महेश्वरम ॥ १४ ॥ इन्द्रेण कथित सर्वेमीखरम्यापरि चाग्रतः ॥ स्वग- 
लोके परित्यज्य विचरन्ति महीतले ॥ १५ ॥ मर्त्येपु संस्थित देवा न शोमते महेखवर ॥ उपाय 


ब्रहि में देव अमराणणां तु का गाते। ॥१६॥ शिव उवाच ॥ गच्छ गच्छ सुरश्रेष्ठ यत्रास्लि गरूड- 


ध्वजः ॥ शरणागतदीनातपरित्राणपरायण; ॥ १७ 
विदेश)! सहितः सर्वेगेतस्तत्र धनख्थ ॥१८॥ अप्सरोगणगन्धर्वः 
जगन्नाथः सुप्तो ्स्ति च जनादेन ॥ १९ ॥ कृताआलिपुटो भूत्वा 

देवदेवेश देवानामपि वन्दित ॥२०॥ देत्यरे पुण्डरीकाक्ष बराहि मां म ४ छूड़ 


इश्वरस्प बच अआत्वा देवगाजों महामानि 
स्िद्दघिद धरम: यत्रेव स 


स्‍्तोत्रय्दीरखेत ॥ 5» नमो 
॥ नमस्ते स्थिति 


कत्रें च नमसलतउएतु जगत्पत ॥ २२॥ नमो देत्पवविनाशाय बाहि माँ पदझदट गा प्शिप्पप्रार कल 
भयभीताः समागताः ॥२रशा। रारणं त्वां जगन्नाथ त्राहि मां भयावहलम्‌ ॥ बाहि मां देवदेवरा 


त्राहि मां त्वं जनादुन॥२३॥ त्राहि माँ त्वे खुरानन्द 


दानवानां विनाशक | त्वे गतिषह्त्वं मतिदेव 





किसने किया हैं! यह विस्तारस कहिये । श्रीकृष्ण बोले कि, 
हे राजन ! उस कथाकों जिसको तुमने लोगोंके हिवकी 
इृष्टिसे पूछा है और जो पापोंको दूर करनेवालो है सुनों । 
गशीष कृष्णपक्षमं उसका नास उत्पत्ति हैं| ६॥ ३ 
जो मनुष्य उस दिन उपवास करता है, वह धामिक होता 
है और धममत्त सत्य वथा सत्यसे छक्ष्मी होती हैं ॥ ८ ॥ 
पहले मुरनामक देत्यकों नाश करनेके लिए उत्पन्ना नावकी 
मेरी प्रियाका जो लोग त्रव करते हैँ उनको निश्चयही सुख 
प्राप्त होता है ॥ ९ ॥ इस प्रकार पाप नष्ट होते है कि, 
फिर यमराजके घर नहीं जाते। भजुन बोले कि, महा- 
राज | उसका नाम उत्पन्ना केस हुआ ? वह क्‍यों अधिक 


देवताओंकी प्यारी पवित्र वा पुम्यम अधिक मानीजाती | 


है !॥ १० | श्रीकृष्णजी बोड़े कि हे अजजुन ! पहले सत्‌ 
युगमें एक मुरनामक दानव हुआ था ॥ ११॥ वह बडा 

प्रचण्ड छोगोंकों भय पहुँचानेवाढा था । उस महाबछी 
दानवने सबसे पहिलेके इन्द्रको उखाडकर फेक दिया, एवं 
हूँ पाण्डव | उच्च उग्मते इन आदित्य, वसछु, श्ह्मा. वाचु, 
अप्रि आदि देवताओोंको जीत लिया | इस प्रकार स्वर्गंस 


फरकारे हुए ये देव डरके मारे प्रथ्वीपर घूमने छगे। वे. 


सब शैका और भयसे युक्त होकर महादेवजीके पास गये 





।॥ १५ ॥ महाराज ! प्रथ्वीमें देवतागण मत्येछोक होनेके 
| कारण शोभा नहीं पाते इसलिए इसका कोई रास्ता बता- 
| इये कि, देवताओंकी क्या व्यवस्था हो | १६ 
| बोल हूं इन्द्र | तुम गरुडघ्व ते सगव 
| क्योंकि, वो शरणागत जो दीन और आतेजन हैं उनकी 
| रक्षा8 रहनवाले हूँ । १७ 
| इन्द्रन ईश्वरके वचतोंकों सुनकर देवता, अप्सरा, गन्धवे; 
| प्िद्ध, विद्याधर और उरगोंके साथ 


शिव्रजी 
शरणतमें जाओ 


इस प्रहार उस बुद्धिमान 


7 घतजय . जहां 
| भगवान्‌ जगन्नाथ जनादँन सो रहे थ ।। ९ ९ || वहां 
| जाकर हाथ जोडइ स्तोत्र कह्य कि, हे देववन्दित देव- 
देवेश ! है देत्यारे ; हे पुण्डरीकाक्ष ! हे मधुसूदन | आप 


मेरी रक्षा कॉरयिा। आपको नमम्कार है। है जगरपते ! 


| आपको नमस्कार, स्थितिके करनेवाल आपको नमस्कार 
| || २० 
| छिए आपको नमस्कार है 
| हैं जगन्नाथ ' आपकी श/ण्ममे-ये सत्र देवता सययुक्त हो कर 
| आये हैं, इसलिए आप इनकी और भयसे व्याकुछ सेरीं . 
| हें. देवदेवेश . है जनादच& आप उक्षा कीजिये हू! 


२९१ | आप देत्योंका विनाश करनेबाछ हे। इस- 
सघुसूदन / सुझे बचाइयप ' 


१२३॥ आप देवताओंकों आनन्द देनेवाले तथा दानओंका 


| नाश करनेवाले हैं। अतः मेरी रक्षा करें, तुमही मेरी ग्रति 
१२-१७॥ इन्द्रने इंदवरके आगे यह सब हाल बतछाया[- | 
किस प्रकार हम लोग स्वर्गको छोडफ़र एशथ्वीमें घूमते है । 


और मति हो ओर आपड्दी कर्ता ह॒त्तां और परायण हो: 
| २४ ॥ आपही माता और गिता हो.।-आवही- जगत्‌के 


का 
ख 
कड हझ सही 


बरलतराजः । [ एकादशी- 


ल्‍>पकाटकण;परभमरपत-ादा व कप फरा७ (रीवक+नध आवक, 


तव॑ करता त्वे परायण: ॥ २७॥ त्वं माता स्व॒वेगो४सि त्वं त्वमेव हि जगत्पिता ल्‍॥ अत्युम्रेण 
तु दैत्येन निजितासििदशाः प्रभो ॥ २५॥ स्व त्यक्त्वा जगन्नाथ दिचर॒न्ति महीतले॥ इन्द्रस्य 
बचन श्व॒त्वा विष्णुवेचनमत्रवीत्‌ ॥ २६ ॥ विष्णुरूबाच ॥ कीद्शो वो भवेच्छबुः किन्नामा कीद्श 
बलम्‌ | किं स्थान तस्य इुष्टस्थ कि वीये कः पराक्रम: ॥२७॥ इन्द्र उबाच ॥ बभूव पथ देवेशा- 
छुरो बरह्मसमुद्धवः ॥ तालजइमघेतिनाम्रा च अत्युग्रोएतिमहांबलश ॥२८॥ तस्य पुत्रोइतिविख्यातो 
मुरनामास्ति दानवः॥ उत्कटश्व महावीयों ब्रह्मलब्धवरों महान्‌॥ २९॥ पुरी चन्द्रवतीनाम 
स्थान तत्र वसत्यसौ ॥ निर्जिता देवताः सर्वाः स्वगाच्चेव निराकृताः ॥ ३२० ॥ इन्द्रोप््यश्र 
कृतस्तनं अम्यो देंवो हुताशनः ॥ चन्द्रसूयों क्ृतों चान्यों यमो वरूण एबं च॥ ३१॥ स्वभा- 
त्मीकृत॑ तेन सत्य सत्य जनादन ॥ तस्य तद्चन श्र॒त्वा कोपाविष्टो जगत्पतिः ॥३२२॥ हनिष्य 
दानवे दुष्टमित्याह भगवान्‌ हरि! ॥ त्रिदशेः सहितस्तत्र गतश्रन्द्रवर्ती पुरीम्‌ ॥ ३३ ॥ दृष्ठा 
देवान्स युयुधे दानवों बलदर्पितः असंख्यातेश्व शब्ब्रात्योदिव्यभहरणायुधः ॥ ३४ ॥ हन्यमा- 
नास्तु तेर्देवा असुरेश्व पुनः पुनः ॥ त्रस्ता देवास्ततः सर्वे पछायन्त दिशौ दश ॥ २५ ॥ हरे 
निरीक्ष्य तत्रस्थं तिष्ठ तिछाबवीदचः ॥ स ठ॑ निरीक्ष्य भोवाच अखुरं मधुखूदनः ॥३६॥ रे दानव 
दुराचार मम बाहुं निरीक्ष्य च ॥ चक्र चेव परागच्छ यदि जीवितुनिच्छसि ॥ ३७॥ श्र॒त्वेतद्भग- 
वद्ाक्यं सक्ोधोरक्तडोचनः ॥सायुवेदानवेः साक॑ स दत्यो योहुमाययों ॥श८॥ ततस्‍्ते सम्मुखाः 
सर्वे विष्णुना दानदा हताः ॥ हतो बाणः पुनंदिव्येबंनूव सोइतिविहलः ॥ २९ ॥ चक्र मुक्ति तु 
कृष्णन देत्यसेन्ये च पाण्डव ॥ लेनेव स्छिन्नशिरसो बहवो निधन गताः ॥४०॥ एणकाड़े दानवे तत्र 


#९ 2:22 927 4 आि. 





सुध्यमाने सहुसेहुः ॥ नष्टाः सर्वे सुरास्तेन निर्जितो मघुसूदनः ॥४९॥ निर्जितेन च देत्येन बाहु- 


है 


युद्ध च याचितम्‌ ॥ बाहुयुद्ध क्ृतं तेन दिव्य॑ वर्षसहस्मकम्‌ ॥ ४२ ॥ विष्णुः पराजितस्तेन गतो 





पिता हो, हे प्रभो |! हम सब उस बढी दानवसे हार चुके 
हैं ॥ २० ॥ स्वर्ग छोड कर प्रथ्वीमें घूम रहे हैं। इस प्रकार 
इन्द्रके बचत सुनकर विप्णुभगवान्‌ बोछ || २६ ॥ कि, 
आपका शत्रु केसा हे ? उसका केसा बल और क्या नाम 
है तथा उस दुष्टका कौनसा स्थान है | बवीय्य और 
पराक्रम उससें केसा हे ? इन्द्र बोले कि, हे देवेश ! 
पूवे समयमें अत्यन्त अपूक खत्व ताऱूजघ नामका अतिही 
उम्र और महाबछणशाली असुर बह्मास उत्पन्न हुआ । 
उसका पुत्र मुरनामका दानव है जो ब्रह्मास वर पानेफे 
कारण बडा उत्कट वहुवान्‌ होगया है || २७-२९. पहले 
यह चन्द्रवती नामके स्थानमें रहता था जहांसे सब देवता- 
ओंको जीतकर स्वर्गंस भी निकाछू दिया ।| ३० ।| जिसने 
इन्द्रभी दूसरा वना लिया और अग्नि, चन्द्र, सूये, यम, 
वरुण आदिको भी दूसरे बनाकर ॥ ३१ ॥ सबको अपने 
अधीन कर लिया | महाराज यह विलछकुछ सत्य है। उसके 
इन वचनोंको सुनकर जगन्नाथ भगवान्‌ कुपित होग्रये 


0 ३९॥ ओर कहा कि, में उस दुष्टको मारूगा । भग- 


वान्‌ चन्द्रवती पुरीमें देवताओंको साथ लेकर गये 
0 रे३ ॥ वहां बह अमिप्ताती दानव सब देवोको देखकर 


अपने असंख्य शत्न अखोंसे तथा दिव्य आयुधोंसे ॥ ३४॥ 
देवोंको मारने छगा। अस्ुरोंकी बारबारकी मारसे सत्र 
देव डरके मारे दिशाओंम भागने छंगे ॥ ३५ ॥ उसमें 


भगवानको वहां बेठा देख * ठहर ठहर ” का वचन कहा। 


भगवानने देखकर कहा || ३६ ॥ कि, हें दुष्ट ! असुर ! 
मेरी बाहू देख, यदि तू जीना चाहता हे तो पहले मेर 
चक्रकी शरण जा | ३७ ॥ इस प्रकार भगवानके वचनको 
सुनकर वद्द क्रीधी असुर अपने दानवोंके साथ सब आधु- 
धोंको लेकर छडनेको आया | ३८ | भगवानने सम्मुखा- 
गत समस्त दानवॉको मार दिया फिर बहुतस दिव्य वाण 
उस देत्यके मारे जिनसे वो अत्यन्त विह होगया ॥३९॥ 
भगवाचने देत्य सेनाके अन्द्र अपना चक्र छोड दिया 
जिससे शिर कट कट कर बहुतसे दैत्य म॒त्युकों प्राप्त होगे 


| ४० ॥ इस प्रकार जब खारे झम्तुर नष्ट होगये, तब वो 


अकेढाही छडने छगा उसने बार बार छडकर भगवावको 


जीत छिया ४ १॥ हारनेपर उस देत्यस भगवानते बाहु” 


52 न ३. 
युद्ध करनेकी याचना की । कुश्ती छडडते छड॒तें उसने हजार 
बर्ष बिता दिये || ४२ ॥ भगवान्‌ उससे पराजित होकर 
निनिनिविशिनिनिननी लकी अब. ४७७३ 


१ देत्येन कर्जा निर्जितेन विष्णुनेत्यथ: । 


बतानि, | भाषाजीकासमेतर: ! 


बदरिकाश्रमम्‌ ॥ गुंहां सिंहवती नाम तत्र खु्तो जनादेनः ॥४३॥ दानवः पृष्ठतों लग्नअविष्टस्ता 
गुहोत्तमाम्‌ ॥ अखुछत तत्र मां दृष्ठा दानवेन तु माश्तिम्‌ू ॥४४॥ हनिष्यामि न सत्देहों दानवानों 
भयंकरम ॥ इत्येवमुक्ते बचने देत्येनामित्रकार्िणा॥ ४५ ॥ निर्गता कन्यका चेका जनाईनश- 
रीरतः ॥ मनोज्ञातिसुरूपात्या दिव्यप्रहरणायुधा ॥४७॥ विष्णुतेजःसल॒ुझूता महावलपराक्रमा ॥ 
हूपेण मोहितस्तस्था दानवों सुरनामक/॥४७॥ सा कन्या युयुधे तेन सर्वबुद्धविशारदा ॥निहतो 
दानवस्तत्र॒ तया देवः प्रबुद्धधाव॥४८॥पतितं दानवं दृष्ठा ततो विश्मघमागतः।! केनेत्थ॑ निहतो 
रोदो मम शब्र॒भयंकर॥४९॥न देवो न च गन्धवों न समो$स्यास्ति भूतले।अकम्मादेव सोवाच 
वाचा दिव्यशरीरिणा ॥५०॥ एकादइयुवाच ॥ मया च निहतो दुष्टो देवानां च भयंकरः॥ जिता 
येन सुराः सर्वे स्वगोचेव निराकृता। ॥ ५१॥ तस्यास्तद्वचनं श्रुत्वा विष्णुबंचनमत्रवीत।॥। 
विष्णुरवाच ॥ उपछकारः कृतो भद्रे मम कारुण्यमावतः ।।५२॥ दानवों निहतो दुष्टः सुराणां च 
भयंकरः ॥ सी5ह विनिर्जितो येन केसो यन तनपातितः ॥ ५३ ॥ विष्णोस्तद्॒चनं श्रुत्वा दंबी 
वचनमब॒वीत्‌ ॥ एकादइ्यस्म्यहं विष्णो सर्वशन्॒विनाशिनी ॥५७४॥ मया च निहतो देत्यः 
घुराणां तासकारकः । इत्येतद्नचर्न श्रुत्वा देवदेवों जनादईनः॥ ५५॥ प्राह तुष्ठोईस्मि भत्रे 
ते वर॑ वरय वाज्छितम्‌ ॥ निहते दानवन्द्रे च सन्तुष्टास्तत्र देवता; ॥५६॥ आननद॒स्त्ि लोकेषु 
मुनयो मुदमागताः ॥ ददाने च न संदेहः खुराणामपि छुलेश्म्‌ ॥५५॥ एकाइइ्युवाच ॥ 
यदि तुष्ठोएलि में देव सत्यझुक्तं जनादन ॥ थदि देयो मम वरस्तिस्तों वाचों ददस्व में 
॥ ५८ ॥ श्रीमभगवालुबाच ॥ सत्यमेतत्मया प्रोक्ततवद्यं तब खुब़ते ॥ तिश्लो वाचों मया 
दत्तासतव वाक्य भवेदिति ॥ ५९ ॥ एकादह्युवाच ॥ बरेलोक्येबु च देवेश मन्वन्तरयुगेष्वपि ॥ 
अह च त्वत्मिया नित्य यथा स्‍्यां कुछ में वरम ॥ ६०॥ सर्वतिथिप्रधाना च सर्वविश्न- 









( ३८९ ) 











बदरिक श्रम चले गये। वहां पिदवती नामकी गुद्याम जा* 
जा पहुंचा । मुझे सोता हुआ दे खकर कहते छूगा कि,॥४४ 


कर। इस प्रकार उस असमित्रको खींचनेवाले देत्यके ऐसा 


कहतेपर भगवानके शरीरस एक कन्या उत्पन्न हुई जो | 
अत्यन्त सुन्दर और दिव्य आयुधोंसे युक्त थी ॥४५॥४६।॥ | 
विप्णुके तेजस उत्पन्न होनेवाली उस महा बछवती कन्याके | 
रूपसे वह दानव मोहित हो गया ॥४७॥ युद्धविद्याकुशर | 
उस कन्याने उस देत्यसे युद्ध करके उसे मार दिया और | 


न  । अ ता भू धि » फओ ५ 
उससे विष्णु भगवानकी निद्रा मज्ञ हुई॥ ४८ | सगवान | से आनन्द हो रहा है मुनिगण प्रसन्न ह। अत: मे तुम्हें 


को उस देत्यको मृत्युस बडा आश्चय हुआ और बोडे कि 


मेरे इस भयेकर शत्रुको किसने मारा हैं! ॥ ४५॥ इस | 
भूतछपर मेरे समान न कोई देव है और न कोई गन्धतर हें 
इतना कहते ही दिव्य शरीर घारिणी उस कन्याने कहा 
॥५० ॥ वो कन्यारूरा एकादशी ही थी कि, उस दुए | 
| है कि; में आपकी तीनों लछोकोमें, मन्यन्तरोंमें, युर्गोममे 
दिया है और जो देवताओंको भय पहुँचानेवाल्ा है मेने | 
मारा है ॥ ५१ || उसके इप्त वचनकों सुन विण्णुने कहां 


राक्षसकों जिसने सब देवताओंको स्वगंसे निकाल कर भथा 





| कि, हें भद्दे | तुमने मुझपर कृपाकर बड़ा उपकार किया 
कर सो रहे || ४३ || पीछे छगा हुआ वह दानव वहां भी 


| ५२ || बह दानत्र आज मर गया जो देवताओंकों भय 


हे [ | पहुंचाता था । जिसने मुझे जीवा और कंसको गिराया था 
में देत्योंके भय देनेवाले तुझे मारूुगा इसमें कोइ सन्देह न | 


॥ ५३ ॥ विष्णुके इन बचनोंकों सुनकर देब्ीने उत्तरदिया, 


हू विप्णो! में सब शत्॒ओंफो विनाश करनेत्राी एकादशी 


हूँ ५४) इसलिये मैं न ही उउ देवताओं दो भय पहुंचाने 
वाछे देत्यको मार दिया है। भगवान्‌ इस बचनको सुनकर 
॥ ५५ ॥ बोले कि, हे देवि | में तुमर॒र प्रसन्न हूं इसलिये 
तुतर अपना इचिछत वर मांगों । उस देस्यके सरजानेपर 
आज सब देवोंके घर हष हो रहा है । ५६ ॥ तीनों छोकों 


देव दुल्म वर देता है ॥५७॥ एकादशीन कहा हे देवदेव ! 
यदि आप मुझपर प्रसन्न है तो आप मुझेतीन वचन दीजिये 
| ५८ ॥ श्रीभगवान बोले कि, हे देवि ! में तुम्हें सत्य वचत्त 
कहता हूँ कि, तुम्हारे मांगे हुए तीनों वचन वर तुमे देता हूं 
॥ ५९ || एकादशीने कदहा-महाराज ! पहला वर तो यह 


सदाही त्रिया रहूँ | ६० ॥ दूसरा वर यह हैं कि, सब 
विन्ञोंक्रो और पा्पोंको नाश करनेवाली मे सवतिथियोमे 


हर. छघ घ घछउस्‍उ फ७छञछ#छआछछ >> ७७ >> शकशिीीतयिीडकजस  आलसपफहडकॉहफत-तणत७फिखणजण: 
१ प्रविज्यति शषः) २ उत्तमा गुहा गुदोत्तमा तामू। ३ येत सया कंसो तिपातितः खोहं येन विनिर्जितः स 
दानवस्त्वया निहत इत्यन्वयः । 


| 


( ३९० ) ब्रतराजः । 










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हक 7० 22777 :2/27 





विनाशिनी/सर्वपापापहन्द्री च आयुबंलविवद्धिनी।९१॥ उपोषयन्ति ये मत्यों महाभकत्या जना- 
देन ॥ सर्वासद्धि्भवेत्तेषां यदि तुष्टठोशखि माधव ॥ ६२ ॥ श्रीकृष्ण उवाच। यर्व वदासे कल्याणि 
तत्सर्व च भविष्यति ॥ धर्मोर्थकाममोक्षाय थे त्वय्युपवसन्ति च॥ ६३१ ॥ मम भक्ताश्व ये लोका 
ये च भक्तास्तवापि च॥ चतुथुंगेषु विख्याताः भराप्स्यन्ति मम संनिधिम्‌ ॥ ६४ ॥ सर्वेतिथ्युत्तमा 
त्वं च मत्मसादाद्भविष्यस्ति ॥ एब्मुक्ता ततः सा तु तत्रेवान्तरधीयत ॥६७।॥ श्रीकृष्णअवाच ॥ 
अथान्यत्संप्रवक्ष्यामि पुराइस कथानकम्‌ ॥ पुरा कीकव्देश वे कर्णीकनगरे शुले) ६६ ॥ कर्ण- 
सेनोति राजर्पिन्यवसदद्धिमत्मज: ॥ बाह्मणेः क्षत्रियवेंद्रयेः शुद्रेश्रेवाठमोदितः ॥९७॥ न दुमिक्ष 
न दारिय तस्मित्राज्ञि स्थितेरज़ुन ॥ नाकालवबृष्टिने व्याधिनेंव तस्करतापि च॥ ६८॥ सम्प- 
त्सन्ततिहीनश्व को5षपि तत्र न विद्यते ॥ पुत्रढइुःख पिता क्ापि न पश्यति च कुत्नचित्‌ ॥ ६९॥ 
एताइशे महाराज प्रशासंति प्रज३ प्रभो ॥ धनहीनो द्विजः कोपि क्षुत्त्ञामो विपद गत;॥७०। 
कुटम्बभरणाशक्त आसीत्तदतवर्तिनी ॥ भत्ते! झ॒ुश्रषणे सक्ता सदाचारा गहे स्थिता ॥७१॥ 
सुदामानाम विम्रषिंभायां साध्वी च सत्तमा ॥ रहोपवदत्च भतार म्लायता वदनेन सा ॥ ७२॥ 
स्वामन्पापकृते पूरे धर्महीनस्तु जायते ॥ धमंहीने धन नास्ति घनहीने क्रिया न हि॥ ७३॥ 
तस्मात्केनाप्युपायेंन धर्मेस्य जनन कुछ ॥ एतप्मिन्नन्तरे राजनदेवषिंः सम्नुपागतः ॥ ७४॥ 
उत्थाय दम्पती तो त॑ सत्कृत्य मुनिमचतुः ॥ आसने तिष्ठ भो स्वामिन्नध्य गह नमोस्तु ते 
॥ ७५ अद्य नौ सफल जन्म अद्य नो सफलाः क्रिया; ॥ अद्य नौ सफलं सब भवतो दशनेन 
च्‌॥ ७६ अस्मिन्पुरे तु ये स्वामिन्‌ सर्वे ने सुद्चिनो जना:॥ आवां तु धनहीनत्वान्महादुःसेन 
पीडिती ॥७७॥ कथयस्व प्सादेन धनाव्यो स्थाव वे कथम्‌ ॥ धनहीनस्य लोके5स्मिख्ूथा 

जन्मोमनोरथाः ॥ ७८ ॥ एवं श्रुत्वातु राजनेद्र बचन॑ नारदो।वबीत्‌॥ नारद उवाच। मार्गशीए- 
पघिते पक्षे उत्पत्तिनांम नामतः ॥ ७९ ॥ तस्याछ्ुपोषणैनेव धनाव्यों जायते शुवम्‌ ॥ तथा पापानि 











प्रधान तिथि एवं आयु और बलके बढानेबाली रहे ॥६१॥ 
तीसरा वर यह हैँ कि, हे जनादन ! जो छोग मेरे ब्रतको 
बडी भक्तिपृवक करें ओर उपवास करें तो उनकी सब 
प्रकारकी सिद्धि हों जो आप मुझपर प्रसन्न हों ता ॥६२॥ 
श्रीकृष्ण बोले कि, हे कल्याणि ! जो तुम कहती हो वह सब 
सत्य होगा। जो ते( और मेरे भक्त घर्माथ काम सोक्षके 
वास्‍्ते उपवास करेंगे वे चारो युगोंमें प्रसिद्ध होहर मेरे 
निकट पहुंचेंगे ॥ ६६ ॥ ६४ ॥ और तुम्र मेरी प्रसन्नतमस 
छब तिथियां उत्तम्त रहोगी ऐसा सुनकर वह वहाँदी 
अन्तर्ष्यान होगई ॥ ६५ ॥ श्रीकृष्ण बोछे कि, अब मे और 
पुराना एक इतिहास सुनाता हूं कि-कीकृट देशके शुभ 
कर्णीक नगरमें | ६६ ॥ कणसेन नामका राजबि था । 
जिसके राज्यमें सरी प्रजा प्रसन्ञ रहती थी । बाह्मण क्षत्रिप्र 
वेश्य और शूद्र सब उसका अनुमोदन करते थे ॥ ६७॥ 
है अजुन |! उस राजाके राज्यमें दुभिक्ष, दरिद्रता, 
भकाब्वृष्टि, बीमारी और चोरी कभी न हुईं ॥ ६८॥ 
उसके राज्यमें कहीं भी कोई गरीब और सन्तवानहीन 
 अजुण्य तथा कोई भी मा बाप अपने पुत्रका दुःख न उठाता 
'था ॥ ६९ ॥ ऐसे सुयोग्य राजाके समयमेंसी एक ऐसा 


श्ाक्षण था जो अति गरीब और भूखसे दुबला हो रहा था 


| ७० ॥ कुटुम्बका पाछन करनेमे अशाक्त था | उसकी 
स्री बडी सदाचारिणी तथा पतिसेवा परायण थी ॥. ७१ ॥ 
उस सुदामा नाम वह्यविकी सदो खत्रोने एकद्ति अपने 
पतिसे उदास होकर एकान्तर्म कहा ॥७२॥ कि; महाराज . 

हक ५, (८: प पेही व 
पहले पाप करनेंसे मनुष्य घमेहीय होता हैं । धर्महीन होने 
पर घन नहीं होता तथा किसी प्रकारकी क्रिया भी नहीं 
होती ॥७३१॥ इसलिये महाराज | आप किखी उपायसे पत्र 
उत्पन्न होनेका प्रयत्न की जिये | इसी बीच हे राजन | देवषि 
भी वहां आ पहुँचे ॥ ७2॥ उन दोनों खी पुरुषोंने उठकर 
मुनिका सत्कार किया और आखनपर बिठाकर प्रा्थन 
की कि हे प्रभो ! हमारे दिये हुए अध्येको स्वीकार कीजिये 
यह आपको हमारा नमस्कार हैँ ॥७५॥ भाज हमारा 
जन्म सफल हैं। आज हमारी क्रिया सझूछ हैं और आपके 
दृशनस हमारा सब कुछ सफल हैं॥ 3३॥ महाराज : इस 
नगरमें सब मनुष्य सुखी हैं परन्तु हम दोनों_बडे गरीब 
और दुः:खी हैं |[७७॥ इसलिये आप प्रसन्न होकर कहिये 
कि, हम क्रिस प्रकार धनी हों । क्योंकि घनदीाः मलुप्यका 
जन्म और मनोरथ सब व्यथे हैं ॥ ७८॥ है राजेल : 
इस प्रक्लार सुनकर नारदजी बोले कि, मागशीषक 
शुक्रपक्षम उत्पत्ति नामकी एकादशी है ॥ ७९ ॥ एस 
दिन उपवास करनेसे मनुष्य निश्चयही धनो होता ै। 


ब्रतानि, | 


मापाटीकासमैलः । 








नद्यन्ति एतत्सत्यं वदामि वाम्‌ ।। ८० ॥ सवसोौख्यकर नणां हरिवासरम्त्तमम्‌ ॥ गले तु 
नारदे पश्चाचऋतुयत्नतों ब्रतम्‌ ॥ 4१ ॥ तंयोत्रेतप्रभावेण सुम्रसन्नो जनादनश॥ स्वयमवाश्रिता 
लक्ष्मीयत्रासीद्धिजमन्दिरम्‌ ॥ <२ ॥ भोगान्सुविपुलान्धुक्त्वा गतो वेकुः्ठसब्रिधों ॥ एतस्मा- 
त्कारणाद्राजन्कतेव्यं हरिवासरम ॥ <३ ॥ अन्तर नेव ऋतंव्य प्रशस्तत्रतकारिोनेः ॥ तिथिरेका 
भवेत्सववां पक्षयोरूमयोरपि ॥ ८४ ॥ एकादइयुदये स्वल्पा अन्ते चेंत्र अयोदशी ॥ मध्यें च 
द्वादशी पूर्णा त्रिःस्पृशा सा हरिप्रिया ॥८५॥ एका उपोषिता चेंब सहस्लेकादशी कला | सहस्य- 
गुणितं दानमेकादर्यां तु यत्कृतम ॥८६॥ अड्म्पेकादशी षष्ठी तुतीया च चतुर्दशी॥ पर्ब॑व्िद्धा 
न कतेव्या कलेव्या परसंयुता ॥ ८७ ॥ दशमीबेच लंयु का हन्ति पुण्य पुराकुलम्‌ ॥ एकादशी 
त्वहोरात्रं प्रभाते घटिका भवेत्‌ ॥८2८।। सा तिथिः परिहतेव्या उपोष्या द्वाइशीयुता ॥ एवं- 
विधा मया प्रोक्ता पक्षपोहमयोरपि । ८९ ॥ एकादरयां प्रकुबीत उपयास न संशयः ॥ स याति 
परम॑ स्थान यत्रास्ते गछडध्वजः ॥ ९० ॥ घधन्याघ्ते मानवा लोक विष्णुमाक्तिपरायणाः ॥ एका- 
दश्याश्व॒ माहात्मयं पबंकाले तु यः पठेव ॥९१॥ गोसहस्नसमं तस्य पुण्य भवति भारत ॥ दिया 
वा यदि वा रात्रों यः शणोतीह मक्तितः॥ ९२ ॥ कुलकोटिसमायुक्तो विष्णुलोके वसेद्यवम्‌ ॥ 
एकादश्याश्व माहात्म्य पड्ामान शुणोति य। ॥ ९३ ॥ बह्वहत्यादिपापाने नहयस्ते ना 
संशयः ॥ एकादशी समा नास्लि सर्वपातकनाशिेती ॥ ९४ ॥ इति श्रीभविष्योत्तरपुराणे मार्गे- 
शीषकृष्णेकादर्युत्पत्तिमाहात्म्य॑ संपूर्णम्‌ ॥ 
अथ वेतरणीव्रतम ॥ 


मागशीषकष्णेकाददयां बेतरणीव्रत देमाद्ों भविष्यें--क्ृष्ण उबाच ॥ शरतल्पगत भीष्म॑ 
पर्यपृूच्छ 9घिप्ठिरः ॥ ब्रतेन येन पुण्येन यमलोको न दृ्यते ॥ १ ॥ नारी वा पुरुषों वापि शोक 





ओर उसके सब प्रक्तारके पाप नष्ट होते है । यह में तुम 
दोनोंस सत्य कहता हूँ ।॥ ८० ।॥ यह हरिवासर मनु- 
प्योंको सब सुल्बोंका दनवाछा है, नारद्जीके चले जाने- 
पर उन्होंने इस ब्रतकों बडे यटनसे किया॥। ८१ ॥ उस 
ब्रतके प्रभावसे भगवान्‌ प्रसन्न होगये और छक्ष्मी स्वयं 
इस ब्राह्मणके घर आकर विराजमान होगई ॥ ८२॥ वह 
सत्र प्रकारके सहान्‌ भोगोंको भोगकर वेकुण्ठमें चछा गया। 
इस लिये हे र/जन्‌ | हरिवा[सरको अवश्य उपवास करना 
चाहिये ॥ ८३ ॥ उत्तम ब्रत करनेवाले कभी इस ब्रवको 


करनभे अन्तर न करें | हे पा4 ! दोनों पक्षों यह सब | 
एकही तिथि हैं ८७॥| उदय कालमें एकादशी और अन्त | 
कुछ त्रयोदशी हो मध्यमें पूण द्वादशी हो तो वह भगवा 
नकी प्यारी त्रिस्पुशा त्ामकी एकादशी होती हैं || ८५॥ | 
इसके दिन उपव[स करनेसे हजार एक[द्शीका फल प्राप्त | 
होता ह और ऐसी एकादशीके दिन किया हुआ दान | 
सहस्र गुणित होता हैं ॥ ८६॥ अष्टमी, एकादशी, पष्टी/। 

का ओर चतुदशी पूंतिथिसे विद्ध हाँ तो न करनी 
हिय और आगेवाली तिथियोंस्त युक्त हों तो करनी | 
चाहिये। ८७॥ दश्षमीके वेधसे युक्त एक्ादर्शी पुवेक्षत | 
पृण्यको नष्ठ करती हैं । जिस दिन रातमें एकादर्शी एक | 
पड़ी प्रभातक समयमें हो तो || ८८ ॥ उस तिथिका परि- | 





त्याग करना चाहिये । द्वादशी युक्त एकाइशीका उपवास 
करना चाहिये ! यह मेंने दोनों पक्षोक्री एक/द्शीक लिये 
कह दिया है ॥ ८९।॥ एकादशीका उपवास करनेव्राढा 
जन अवश्यही भगवानके उस परमस्थानको जाता हें जहा 
कि रवये भगवान्‌ विराजते हैं ॥ ९० ॥ वे छोंग लोकमें 
धन्य हैं जो विष्णुके भक्त हं। जो पर्वके समय एकादशीके 
माहात्म्यको कहें सुनें तो | ९१ | हे अजुन ! उन्हें सहस्र 
गोदानका फल भ्राप्त हैं। दिनमें या रातमें जो एकादशीकी 
कथाकों भक्तिसे सुनते हैँ ॥| ५२ ॥ वे कोटिक्ुकूपयेन्त 
विप्णुलोकमें निवास करते हैं । एकाइशीके पढते हुए 
माहात्म्यको जो मनुष्य सुनते है || ९३ | उनऊे ब्द्मह- 
त्यादि शाप भी नष्ट हो जाते हैं । हे. अजजन ! इस एकाद- 
शीके समान समस्त पापनाशिनी और दूसरी कोई तिथि 
नहीं है ।। ९४ ॥ यह श्री भविष्योत्तररुराणका सा्गंशीष 
कृष्णा एकाद्शीकी उत्पत्तिका माहार्य सम्पूणे हुआ ॥ 
अथ बतरणीब्रत-यह मार्गशीष कृष्ण एकादशीके दिन 
होता है ऐसा हेमाद्विम भविष्यमें लिखा है । कृष्ण बोले 
कि, युधिष्ठिर महाराजने शरशय्यापर सोते हुए भीष्म- 
जीसे पूछा कि, किस पत्रित्र ब्रतकों करनंसे मनुष्य यमल्ो- 
कुका दशेन नहीं करता ॥ १ ॥ ख्यि और पुरुषोंओों 
जिसके करनेस कभी शोक न हो उस अतको हें घमंक्ष! 


( १९२ ) बतेराजः । 


। 


[ एंकादंशौ- 


चैव न विन्द्रति | तत्समाचद्व धर्मज्ञ पितामह कृपां कुर ॥ २॥ भीष्म उवाच ॥ एकादशी 


वैतरणी ता कृत्वा च सुखी भवेत्‌ ॥ यमलोके न पश्येच्च शोक चेव न विन्द्ति ॥ हे ॥ युधिष्ठिर 
उवाच ॥ केन तात विधानेन करतंव्या सा महाफला॥ पितामह समाख्याहि तद्िधानं मम 
प्रभो ॥ ९ ॥ ज्ीष्म उवाच ॥ एकादशी तिथिः ऋ्रष्णा मार्गशीषेगता नूप ॥ तामासाद्य नए 
सम्यग्यहीयातन्रियम शुचिः ॥ ५ ॥ एकादशीतिथिः कृष्णा नाम्रा वेतरणी शुभा ॥ खा व्रतेन 
त्वया कार्या वर्ष नक्तोपवासिना ॥ ६॥ मध्याद्दे तु नरः झ्वात्वा नित्यनिवर्तितक्रियः ॥ राजे 
घुरमिमानीय कृष्णामर्चेद्यथाविधि ॥ ७ ॥ सा पवोमिछखी कायो कृष्ण गोः किल भुतले॥ 
अम्रपादात्समारभ्य पश्चात्पादद्रयावधि ॥ ८ ॥ गोपुच्छे तु समाल्लाद्य कुर्याद्धे पितृतपणम्‌ ॥ ततः 
पूज[ प्रकर्तव्या शाखव्ट्विधानतः॥ ९ ॥ गाँ चेव अ्रद्धवा युक्तश्चन्दनेनावुलेपयेत्‌॥ गरब- 
तोयेन चरणौ श्वद्गे अक्षाल्य शक्तितः ॥१०॥ ततो$ठ पूजयेद्धक्त्या पुष्पेगधाधिवासितेः ॥ मद्ेः 
पुराणसंपोक्तेयंथास्थान यथाविधि ॥ ११॥ तत्र पूजामन्त्रा+-गोरम्रपादाभ्यां नमः ॥ गोरा 
स्थाय० ॥ गोः शद्भाम्यां० ॥ गोः स्कन्घार्याँ० ॥ गोः पश्चत्पादाभ्यां० ॥ गोः स्वोद्धेम्यों नमः॥ 
स्थानेष्वेतेषु गन्धांश्व प्रक्षिपेच्छुद्धमभानसः॥ पश्चात्प्रदापयेदृप गोवूपः मतिशह्ायताम्‌॥ १२॥ 
असिपतच्रादिक घोर नदी वेतरणीं तथा ॥ प्रसादात्ते तरिष्य(मि गोमातंस्ते नमोनमः ॥ १३॥ 
सुखेन तीयते यस्‍्मान्रदी वेतरणी धुवम्‌ ॥ तस्मादेकादशी कृत्वा नाम्ना बेतरणी भवेत्‌ ॥ १४॥ 
आनन्दकृत्सवेलोके देवानां च सदा म्रिया॥गोौस्त्व पाहि जगन्नाथ दीपो3्य म्तिगह्यताम ॥१५॥ 
आच्छादनं गये दष्यत्सम्पक्‌ शुद्ध सुनिमलम्‌ ॥ सुरनिवेद्धदानन भीयता परमेश्वरी ॥ १६॥ 








भीष्म | कृपा करके बताइये ॥ २॥ भीष्मजी बोहे कि, 


कर के पूर्वक गायको चन्दनसे अलंकृत करे।चरणों और सींगोंको 
बैंचरणी एकादशीको करनेसे मनुष्य खुखी होवाह शोकको 


सुगन्धित पानीसे प्रक्षाल्ित करे ॥ १० ॥ गन्धाधिवासित 


नहीं प्राप्त होता और यमछो कको नहीं देखता हैं ॥ ३॥ 
युविष्ठिर बोले कि, है पितामह ! उच्च महाफछा छकादु* 
शीको किस विधानसे करें कृपा कर मुझे उपदेश दीजिये 
॥ ४ ॥ मीष्मजी बोले हि, मा्गेशीष महिनेकी कृष्णप 
क्षकी एकादशी दिन पत्रित्र होइर हें राजन ! नियम 
करे | ५ ॥ उस शुभ एकादशीको जिसका नाम वेतरणी 


है वर्षभर पुवेद्निसे ही रातमें उपवास करके विधिपूवक 


हे पं रे क्‍ के सवागके ढि: कह हुए 


करे | रातस काली गोकों छाकर यथा विधि उसकी पूजा 
कि ष 
करे | ७ ॥ उस काडी गोको निश्चयही भूमिपर पूर्वासि- 


३ हे ७ ५, न के रे... ३ ः 
ख खडीकर आगेके पेरोंस प्रारंभ करके पीछेक पेरों- | * ही 
हि | नरकोंको तथा वेतरणी नदीको पार करूंगा इसलिय है गो 


कोभी पूजा करे | इस ज्छोकके ' कि भूतढे” इस अन्तिम 


दुकड़ेके ' किछ ' जिसका कि, निश्चयदी ऐसा अर्थ किया | 
| बैतरणी नदीकों सुखसे निमश्चय ही तैर सकता 
इस एकादशोका नाम वैतरणी हुआ है | १४॥ * आवद 
| ऋप्सव रोके * इस मेत्रस दीपक कटे कि तू. सब छोकों# 

| आनन्द ऋरनेवाली है,देवों ही सदा प्यारी हैं; है गो ; सही 
| कर | हे जयन्नाथ! दीवकको ग्रहण कर । तेरें लिय तम््का 


है इसके स्थानमें 'छिप्त” ऐसा पाठभी कोई मानते हैं 
जिसका यह अथ होजाता है कि, ' छिपी ? भूपिमे * अग्र- 
पादात्समारम्य ! इस पाठके स्थानमें अग्रगादादितः पूज्या! 
ऐसा पाठ मानते हैं इसका यह अथ्थ परिष्फुट द्ोजाता हैं 
कि, सबसे पहिले अगाडीके पेरोंको पूज पीऊ पीछेक्त पू भने 
चाहिये ॥ ८ ॥ पितरोंका त्वग गौको पूँछ पक डर करे | 


ब:अस्पादिय नाज्ञा वेतरणी भ्वेदित्यन्वय: । 





पुष्पोंस पुराणोक्त मन्त्रोंके द्वारा यथाविधि स्नान कराकर 
भक्तियूवक पूजा करे ॥| ११॥ पूजाके सन्त्र-गोसप्रपादी' 
भयां नमः गऊके अगाडीके पेरोंको नमस्कार । गोरात्याय 
नमः-गऊके मुखक्के छिये नमस्कार है, गऊके सींगोंके 
लिये नमस्कार, गऊके स्कन्धोंके लिय नमस्कार, गउकी 
पूँछके छिये नमस्कार/ गऊके पीछेके चरणोंके लिये वम' 


अगॉमें इस मन्त्रोंस शुद्ध सनके साथ गन्धघ लगाना चाहिय। 
पीछे गऊको धूप देना चाहिये कि हे गो ! धूपको प्रहणक 
॥ १२ ॥ हैं मातः | आपकी प्रसन्नतास असिपत्रादि घोए 


कर पे 
मातः ! तुम्हे मेरी बारबार नमस्कार हैं ॥ १३ ॥ जिम्नव 
इस 


हा 


| है ॥१५॥ अच्छा शुद्ध निमछ बल्ल गौके लिय देंवा व! 


फिर जाल विहित विविसे पूजन को ॥ ९ ॥ श्रद्धा- | कि परमेध्वरी छुरभि वद्चदानसे प्रसन्न होजाय ॥| १६ ॥ 


१ गौडिप्रेति कचित्‌ पा० ।२ दितः पूज्येत्यपि क० प(०। ३ यस्मादथां 


द्मामेकादर्शी कृत्वा बैतएणी नदी ती येते नरेषेति 


प्रताकिं | ' भाषाटीकासमतः । ( ३९३ 






































आपका (7५३६ 7१६४० 
/ के 2 428४ ४८: 











उनरीकतसनल नकल". 


प्रा्शशीषादिके भक्ते यावन्‍्मासचतुष्ठयम्‌ ॥ अन्यन्मासचतुप्क तु बरावकाशनमेव च॥ १७ ॥। 
श्रावणादिषु मासेब॒ चतुष्व॑द्यात्य पायसम्‌ ॥ तदन्नस्य तयो भागा गोशुरूस्वाथंमव च॥। १८ ॥ 
नेवेद्ं हि मया दत्त खुरने मतिशहानाम्‌ ॥ ठितीय गरबे दष्यातच्तीय स्वयमेव च॥ १९॥ 
मासि मासि पभरकुर्वीत मासद्रादश्ं ब्रतम्‌ ॥ उद्यापनं ततः कुर्योत्पर्ण संवत्सर लदा ॥ २० ॥ 
शय्या सतालिका कार्यों दम्पत्योः परिधानकम॥ सबत्सा कृ्पइर्गाच घेलः कायों पय- 
ल्विनी ॥ २१५॥ सौवर्णी सुरभि कृत्वा स्थापसेतुलिकोपरि ॥ सुरभि पएजयेन्मन्लेः पूर्वों- 
क्तैमोक्तिसंयुतः ॥२२॥ ततस्तां ग॒रवे दच्चात्सवे तत्र क्षमापयेव॥ मारो लोहस्य दातव्यः कार्पास- 
द्रोणसंयुतः ॥ २३ ॥ बेलरिण्यां समाप्त्य्थ ब्राह्मगाय छट्टमित्रने ॥ नारी वा पुरुषों बापि बल: 
स्यास्थ प्रभावतः ॥ राज्य बहुदिन भ्रुक्‍त्वा स्वर्गलोके महीयते ॥ २४॥ इति श्रीभविष्योत्तर- 
पुराणे मार्गशीषकृष्णैकादर्यां वेतरणीत्रत सम्पर्णेन्‌॥ खूत उंबाच ॥ एवं जीत्या पुरा विमा; 
श्रीकृष्णेन पर व्रतम्‌ ॥ माहात्म्यविधिसंयुक्तछुपदिष्टं विशेषतः ॥ १ ॥ उत्पत्ति यः श्ृणोत्येवमे- 
कादश्यां द्विजोत्तम ॥ जुकत्वा भोगाननकास्तु विप्णुलोके अयाति सः ॥ २॥ पार्थ इवाच,॥ उफ- 
बासस्य नक्तस्थ एकमक्तस्प च प्रभो ॥ किं पृण्यं कि विधानं हि ब्रृहि सबे जनादेन॥ मे ॥ 
श्रीकृष्ण उबाच ॥ हेमन्ते चेव सम्प्रा्ते मासि मार्गशिरे छुने ॥ झुक्‍लपक्े तथा पार्थ एकाइदइ्या 
मुपोषयेत्‌ ॥ ४ ॥ नक्ते दशम्यां कुर्यात्त दन्‍्तधावनपर्वेकम्‌ ।। दिवसस्याष्टमे भागे नन्‍्दीभुते 
दिवाकरे ॥ ५॥ तत्र नक्त विजानीयाच्न नक्ते नेशिभोजनम्‌ । ततः मभातसमय सडुल्‍्पे नियल- 
श्वरेत॥६॥मध्याहे च तथा पार्थ शुत्िः स्नातः सर्मा तर ॥ नद्यां त डागे वार्प्यां वा ह्यत्तम॑ मध्यम 
त्वचः ॥ ७ ॥ ऋमाउस्ेयं तथा कूपे तदमावे म्शस्थत ॥ अश्वक्रान्ते रथक्रान्त विष्णुऋानते बखु- 
खरे ॥ ८ ॥ मृत्तिक हर में पाप॑ यत्मया पूर्वेलंचितम्‌ ॥ वया हतेन पापेन गच्छामि परमां 


मागशीर्षस फाल्गुनतक “ भात ” का तथा चेत्रस आषाढ- | 
तक यावक॒का भोजन करे | १७ || श्रावणस कार्टिकतक 
खीरका भोजन करे। और उस अज्ञके तीनभाग करे अर्थात्‌ 
एक गेयाका. दूसरा गुरुका, लीसरा अपना ॥ १८ ॥ है| 
मुरभे ! में नेवेद्य देता हे म्रहणकर, इससे गौको दे । श्खी | 
प्रकार दूसरा गुरुको और तीसरा भाग स्वये ग्रहण करे | 
'॥ १९ ॥ इस १२ महीनेके ब्रतको प्रध्येक महीनेमें करे । | 
बर्ष समाप्त होजानेपर उद्यापत करे | २० | शय्या और | 
स्रीपुरुषके वख्र; बच्चेसहित कालेवणकी दूध देनेंवाली गो 
अपने गुरुको प्रदान करे। स्वच्छ बिछोनेपर सुवर्णमयी 
गौकी प्रतिमा स्थापित कर पूर्वोक्त पुराणोंके मन्‍्त्रोंस भक्ति- 
पूर्वक पूजन करे ॥| २१ ॥ २२ ।॥ और गोौमाताकों देकर | 
अपने सब अपराधोंकी क्षमा कराबे एवं साथही इसके एक | 
भार छोहा भी एक द्रोण कपासके साथ ॥| २३ | किसी 
कुटुम्वी जाह्मणको दे । वेतरणी नदीकी यात्रा समाप्त कर- | 
के उहेब्यसे सी हे ९। 4 कर ओ 
'नंके उश्दयसे स्री या पुरुष हो इस अतक प्रभावस अनेक | 
दिन प्रृथ्वीमें राज्य भोगकर अन्त स्वर्गंोकको प्राप्त होता | 
हैं ॥ २४ ॥| यह बेतरणी ब्रच संपू् हुआ || 
पूतजी वोले कि; इस प्रकार हे ब्रा हाणों | श्रीकृष्णत्ी 
महाराजन यह उत्तम ब्त एवम्‌ विधि और माहात्म्यका पूतर | 











समयमें विशप रूपसे उपदेश दिया था | १ ॥ इस प्ररार 
है ब्राह्मगराज ' जो इस उत्पत्ति नामकी एकादशीकों कथा 
इसीके दिन सुनता है वह अनेक प्रकारके भोगोंकों भागकर 
अन्तमें विष्णुलोक चला जाता हैं ॥ ५ ॥ अजुन वोछा कि; 


| हे लनादेन ! रात्रिके उपवास करनेका: एक समय भोजन 


करनेका हे प्रभों | पुण्य और विधान क्या है / उस सबको 
आप कहें।॥३॥श्रीकृष्णजी बोले कि;हेमनत ऋतुके प्रापहोने- 
पर मागंशीपषकेमहीने शुहृपक्षम हे अजुन | एकादशीकेदिन 
उपवास करे।४॥दशमीकी रातको देतुवन करे! दिनकेआठवें 


फर्क हि हि: 
| भागमें जब कि; सूयका प्रकाश सन्द पदजाता # ॥5%। उस 


समय भोजन करना नक्त कहा जाता हूं.रात्रि भोजनकीनक्त 
संज्ञा नहीं है प्रश्चातकाल उठकर नियसपूवंक सक्रल्प करे 


। || |“ |] ह्वे अजुन | जद दिन मध्याहमें नदी, तलाव या बाब “ 
| डीमें समाहित होकर खान करे। नदीका स्नान उत्तम 


तालावका मध्यम और बावडीका अधम होता हैं ॥»॥यदि 
बावडी भी न हो तो कूवेपर स्नान करें, स्वान करते ' समय 


| "हे अश्वर्से आक्रान्तकी गई रथ आकान्तकी गई डे बसुकी . 


मच 
| हम 


धारण कम्नेवाड़ी ॥ ४ ॥ सन्तिके | मेने जो परहिले पाप 
सचित किए है तु उन पर्षाको हुरले . जिससे में १८ 


व की जल“ ५5 4:24 000 ००५५० ०७७७७४५७०७७७७७४७७७ए 


परदे को 





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'. १६४ गुर्जरदेश प्रसिद्धप | २ बुद्मस्येंत कथा बताक मत्स्य वनोफका | 


| 


( ३९४ ) क्‍ 


ब्रलराजः । [ एकादशी- 













गतिम्‌ ॥ ९ ॥ अनेन मत्तिकास्मान विद्ध्याठ ब्रती नरः ॥ नालपेत्पतितेश्वोरेस्तथा पाखण्डिप्निः 
सह ॥ १० ॥ मिथ्यापवादिनो देववेदबाह्मणनिन्दकान्‌ ॥ अन्पाश्वव डर! वारानगम्यागामन- 
सतथा ॥ ११ ॥॥ परद्रव्यापहटुश्व दवद्रव्यापहारण: | । ने सम्माषत दृष्ठाप॑ भास्कर चावलोक- 
ग्रेत्‌ ॥ १९॥ ततो गोविन्दमभ्यच्य नवेद्यादिभिरादरात्‌॥ दीप दद्यादुणहे चेव भक्तियुक्तेन 
चेतसा ॥ १३॥ तदिने वर्जयेत्पाथ निद्रां मेशुनमेव च ॥ गीतशास्त्रविनोदेन दिवारात्र नये- 
द्वती ॥ १४ ॥ रात्रो जागरण कृत्वा भक्तियुक्तेन चेतसा ॥ विभेभ्यों दक्षिणां दत््वा प्रणिपत्य 
क्षमापयेत्‌ ॥ _५॥ यथा शुक्ला तथा कृष्णा मान्या वे धमेतत्परेः ॥ एकादरयोद्रैयों राजत्वि- 
मेंदं नेव कारयत्‌ ॥ १६॥ एवं हि कुरुते यस्तु शरण तस्यापि यत्फलम्‌ ॥शंखोद्धारे नरः स्नात्वा 
दृष्ठा देव॑ गदाधरम्‌ ॥१७॥एकादइ्युपवासस्य कलां नाप्नोति पोडशीम्‌ ॥ व्यतीपते च दानस्य 
लक्षमेंक कल स्मृतम॥१८॥संक्रान्तियु चतुलेक्षं दानस्प च धनञ्ञय ॥ कुरुक्षेत्रे च यत्पुण्य॑ प्रहणे 
चन्द्रसूययो! ॥ १९ ॥ तत्सवे लभते यस्तु होकादश्यासुपोषितः ॥ अश्वमेघस्य यज्ञस्थ करणा- 
चत्फल लगत्‌ ॥ २० ॥ ततः शतगुर्ण पुण्यमेकादश्युपवासतः ॥ तपस्विनों गहे नित्य लक्ष 
यस्य च झुखते ॥ २१॥ पष्टिवषंसहस्माणि तस्थ पुण्यं॑ं च यद्धवेत्‌ ॥ एकादइहयुपवासेन 
फल प्राप्नोति मानवः ॥ २२ ॥ गोसहस्ले च यत्पुण्यं दत्ते वेदाड्भपारगे ॥ तस्मात्पुण्यं दशगुण- 
मेकादइथुपवासिनाम्‌ ॥ २३॥ नित्य च झुखते यस्यथ गृहे दश दिजोत्तमाः ॥ यह्पृष्य॑ 
तदशग्॒ुणं भोजने बहाचारिण:॥ २४॥ एतत्सहस्म भूदाने कन्यादाने तु॒तत्स्मृतम्‌ ॥ 
तस्मादशणणण मोक्ते विद्यमाने तथेव च ॥ २५ ॥ विद्यादशगण॒ण चाजन्न॑ यो ददाति बुअक्षिते॥ 
अन्नदानसमं दान॑ न भूर्त न भविष्यति ॥ २६॥ तृप्तिमायान्ति कौन्तेय स्वर्गस्थाः पित- 
देवताः ॥ एकादइया ब्रतस्यावि पुण्यसंख्या न विद्यते॥ २७ ॥ एतत्पृण्यप्रभावश्र यत्छुरेरपि 








चला जाऊं ॥९॥ ” इससे मनुष्य सत्तिका स्नान कर पतित 
चोर और गरखबडियोंके साथ विल्कुछ बातें न करें |१०॥ 
किसीको झूठा दोष छगानेवारे, देव और वेद ब्ाह्मणोंकी 
निन्‍्दा करनेवालढू, अगम्योंके साथ गमन करनेवाले एवम्‌ 
दूसरे दुराचारी ॥ ११ ॥ और परद्रव्यको चोरनवाले तथा 
देवद्रव्यकों हडपनेबाले मनुप्योंको देखकर भी सू्येभग- 
वानका दुशन करे ॥१२॥ भक्तियुक्त चित्तसे मोविन्द भग- 
बानकी आद्रसे पूजाकरे नवेद्य तथा दीपकआदि षोडशो 
पचारस पूजन कर ॥१३॥ हें अजुन | उस दिन मेंथुन और 
निद्राका त्याग करे। संगीत आदिके द्वारा हरिकीतैनसे ब्रती 
सनुष्य उस रात्रिको जागरण कर ॥१४।॥ इस प्रकार रातमें 
जागरण कर भक्तिभ्ावके साथ ब्राह्मणों की दक्षिणा दे और 


उनकों प्रणासकरक्षमायाचना करे॥ १५।हे राजन !धर्मात्मा- 


ऑकोगुद्ठा और कृष्णा दोनों एकादशीएकसी हैँ इसकारण 
दोनॉको समानजानकर किसी प्रकारका भेद त करे॥१६॥ 
इस प्रकार जो करता है उसके भी पुण्यके फलको सुनिय, 
, शड्डोद्धारतीथंम स्नान करके भगवानका दैशन करे || १७॥ 

कोई भी दूसरा ब्रत इस एकादशीके उपवासकी पोडशी- 
कछाको भी प्राप्त नहीं होता । व्यतीपातम दान करनस 
छाखगुणा फछ मिलता है ॥ १८ ॥ है अर्जु 


न! सक्रांतिमे 
न करन चार छाख गुणा फल मिलता है । तथा कुरु- 


क्षेत्रमें सूथेच नरक ग्रहणके सम्रय दान करनेसे जो पुण्यफड 
प्राप्त होता है ॥ १९ ॥ वे सब फछ एक साथडी इस एका- 
दशीके उपवाससे मिलते हैं । अश्वमेध यज्ञके करनेस नो 
फल होताहें उससे सोगुना इस एफादशीके उपवालसे फड़ 
मिछता है॥ २०॥ जिस तपम्त्रीके परमें नित्यही छा 
आदमी साठ हजार वर्षपयन्‍्त भोजन करते हैं उससे प्राप्त 
होनेवाले पुण्यस भी अधिक पुण्य एकादशीक उपवाससे 
प्राप्त होता है ॥॥ २१॥ २२ |॥ वेदांगपरंगत किसी ब्राह्म- 
णको हजार गौओंको देनेका जो फल होता हैं उप्तसे दृक्षः 
गुणा पुण्य इस एकादशीके उपवाससे प्राप्त होता है ॥२३॥ 
जिसके घरसे नित्यही दश उत्तम ब्राह्मण भोजन करते हू 
उसस दशगुना द्शत्रह्मचारी ब्राह्मणोंके भोजन करानमें है 
(२४॥ उससे हजारगुनाकन्यादान और भूद्ानमें है इनसे 
दशगुना, विद्या दानमें हैं | २५।॥ विद्यादानसे दशगुवां 
अधिक भूखोंको अन्नदानमें फल मिलता है । अन्नदानढ़े 
समान ओर कोई दान न हुआ और न होगा ॥ २६ ॥ हैं 
कौन्तेय | जिससे स्वगंस्थपितृगण तथा देवगण भी तृप्होंे 
हूँ उससे भी अधिक फल मिलता है | इस एकादशी व्रतके 


पुण्य फछकी कोई सीमाही नहीं हैं ॥ २७ ॥ हे अजुन ! 


एकादशीका पुण्यप्रभाव देवों को भी दुरूभ है, एकादशी 6 


ब्रतानि, ) 


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न पन>»कमननक मनन डणीिियओणीिछइघि घी आन: 
2 कक-ममआनममववा5धकनननमनंतनन पतन 


दुलेभः ॥ नक्तस्पाउंफले तस्य एकभक्तस्य सत्तमार८॥ एकभरक्त च नक्त च उपवासस्तथेव च ॥ 
एतेष्वन्यतर्म वापि ब्त॑ कु्योंद्धरोदिन ॥ २९ ॥ तावद्रजन्ति तीर्थानि दानानि नियमा यमाः ॥ 
एकादशी न संभाप्ता यावत्तावन्मखा अपि तस्मादेकादशी स्रूपोधष्या भवभीरुमि 

न शद्बेन पिवेत्तोय न खादेन्मत्स्यसूकरों ॥३१॥ एकादइयां न ुखीत यनन्‍्मां त्व॑ पच्छसेफहुन ॥ 
एतत्ते कथितं सब ब्रतानामुत्तमं ब्रतम्‌ ॥ ३२॥ एकादशीसमं नाप्ति कृत्वा यनज्ञसहस्लकम ॥ 
अर्जुन उवाच ॥ उक्ता त्वया कथं देव पुण्पेय सबतस्तिथि! ॥ ३३ ॥ सर्वेभ्यो5पि पवित्रेयं कर्थ 
होकादशी तिथिः ॥ श्रीकृष्ण उवच ॥ पुरा कृतयुग पाथ सुरनामा हि दानवः ॥ ३४ ॥ अत्य- 
हवुतो महारोद्र वमयडुरः ॥ इन्द्रो विनिरजितस्तेन छ्याद्यो देवः पुरन्दरः ॥ २५ ॥ आदित्या 
बसवो व्मा वायुरप्रिस्तथेव च ॥ देवता निर्जितास्तेन अत्युग्रेण च पाण्डव ॥ ३६॥ इन्द्रेण 
कथितः सर्वों वृत्तान्तः शड्भराय वे ॥ स्वरगलोकपरिश्रष्टा विचरामो महीतले ॥३७॥ उपाय वहि 
में देव अमराणां तु का गति: ॥ इंश्वर उवाचागच्छ गच्छ सुरश्रेष्ठ यत्राम्िति गरूडध्वजः ॥चन्दा 
शरण्यश्व जगन्नाथः परित्राणपरायणशाइशस्य वचन श्रत्वा देवराज़ों महामनाः ॥ २९ ॥ त्रिदशः 
सहितः सर्वेगेतस्तत्र धनअ्य ॥ यत्र देवो जगन्नाथः असुत्तो हि जनादनः ॥ ४० ॥ जलमध्ये 
प्रसुप्त तु दृद्ठा देव॑ जगत्पतिम्‌ ॥ कृताअलिपुटों भूत्वा इदे स्तोत्रमुदीर॒यत ॥ ४१॥ आओ नमो 


देवदेवाय देवदेवः सुबन्दित ॥ दत्यारे पृण्डरीकाक्ष त्राहि नो मचुसूदन ॥ ४२॥ देत्यभीता इमे 
देवा मया सह समागताः ॥ शरणं त्व॑ जगन्नाथ त्वं कता त्व॑ च कारकः ॥४३श॥ त्वं माता सबं- 
लोकानां त्वमव जगतः पिता ॥ त्व स्थितिरूत्व तथोत्पत्तिस्त्व॑ च संहारकारकः ॥ ४४ ॥ सहा- 


यरत्व॑ च देवानां त्वं च शान्तिकरः मभो ॥ त्व॑ धरा क त्वमाकाशः सर्वविश्वोपकारकः ॥ ४५ ॥ 
भवरत्वे च॒ स्वयं ब्रह्मा त्रेलोक्यप्रतिपालकः॥त्वं रविस्त्वं शशाड्ुश्व॒ त्वं च देवों हुताशनः॥ ४६॥ 





दिन जो नक्त ब्रत या एक भक्त ब्रत करता हैँ वह आधा | 
फलपाता है ।। २८ ।। एक भक्त नक्त उपवास इनमसे किसी | 
कोभी एकादशीके दिन करछेना चाहिये ।। २९ )। तबतक | 
ही तीथे, नियम और यम गजेते हैं जबतक कि एकादशी | 
नहीं मिली यज्ञमी तबही तक हूँ ॥| ३० !। जिन्हें ससारका | 
डर हो उन सबको एकादशीका ब्रत करना चाहिये | न तो | सत्र देवोंको साथ लेकर हे धनखय : विप्णुभगंवानक पास 
| गया | जहांपर कि, भगवान्‌ विष्णु सो रहेथे ॥ 9७० ॥ 


शह्से पानी पीबे एवं न सत्य और सूकर खाय ॥ ३१ ॥ 


न एकादशीको भोजन करे, हे भजजुन ! जो तू मुझे पूछता | 
है! यह मेने तुमको सबसे उत्तम ब्रत कहा हैँ॥ ३२॥ | 
सहस्र यज्ञभी इस एकादक्षीके समान नहीं हूँ । अजुन बोले | 
| है पुण्डरीकाक्ष : हे मुथुसूदन ! आप सेरी रक्षा कीजिये 


कि, महाराज ! आपने इस तिथिको सब्रस अधि 5 पुण्य 


दनेवाली क्यों बनायी ।। ३३।॥ ठथा सबसे अधिक पवित्र 


क्‍यों हुईं ? श्रीकृष्ण बोले-पहिले सहयुगर्म मुरनामका दुनव 
है अजुन ! बहुत बडा अद्भुत तथा सब दवॉकों भय 


॥ ३४ 0 ३५ || हे पाण्डव ! उस उम्र दानवने आदित्य 
विश्व, बसु; ब्रह्मा, वायु, अम्नि आदिको भी पराजित कर 
दिया था 
शब्ुरस निवदन किया कि, महाराज ! हमछोग स््रगंस 
भ्रष्ट होकर इस प्रथ्वीमं विचरण कर रहे हैं ॥ ३७ ॥ इस 





३६ ॥ अपने सारे वृत्तान्तको इन्द्रने भगवान्‌ 


; तुमही रवि, चन्द्र, अभि ॥ ४६ ॥ 


छिए आप कोई उपाय देवताओंपर कृपा करके वतडाइये 
कि, अब देव क्या करें! इंश्वर बोले कि, हे देवराज ! तुम 


” वहां जाओ जहां विः्शुमगवान्‌ विराजतेहँ ॥ ३८॥ क्योंकि 


वे दु.खितोंकी रक्षा करनेवाले तथा शरणागतवत्सल हूँ। 
महामति देवराज श्टुरक इन वचनोंकों सुनकर ॥ ३९ 


जगदीश भगवानको जलूके अन्दर सोता हुआ देखकर 
हाथ जोडकर इस स्वोत्रसे स्तुति करनेलगा | ४१ ॥ कि, 
हे देव देववन्दित देवेश ! आपको नमस्कार हें, हे देत्यारे 


(४२ ॥ देत्योंसे डरत हुए ये दव मरे साथ आपके पास 
आये ह | तम करने ओर जगनतके करानेवाडे हो इसलिए 


हे जगन्नाथ ! हम आपकी शरण हैं ॥ ४३ ॥ तुम सब छोगों 
पहुंचानेवाछा था। जिसने आदि देव इन्द्रकोभी जीत लिया | की माता और जगनके पिता हो तुमही स्थिति उत्पत्ति 


| तथा संहारके करनेवाले हो ॥ ४४ ॥ तुमही देवताओोंके 


सहायक तथा शांति करनेवाले हो और हें प्रभो! आपही 
प्रथ्वी और आकाझ्य हो तथा विश्वके -उपकारक हो ॥रणा 
आपही त्रिलोकीक रक्षा करनैवरले त्रह्मा ऑर महेश्वर हो 
व्य, होम, आहति, 





१ तस्यथ नत्तस्थार्थफ्लमेंकभत्तस्येत्यघ:। २ शरणागतदीनात्तपरित्राणपरायण । इति कचित्याठः । 





ब्रलराजः | | एकादशौ-« 


2 आकान! भएक पा 77:70: कक ७५ 72, ज 7 नगर 220 कप 00 07 60 ८ 7 प्रकट 
& “कटडक लए: आपक 776 अंक मच के ,क:- 424७ 7 अकापकक इ३०७० फेक: एड ०2०2: ०३६: ९४अक्नभ? ५२ ३९४८ 77:77" कक 4८-५३ जय 07775 230 2002 27 # *ब पक प्र आवे: ह 


हैव्ये होमो इुतस्त्व॑ च मन्व॒लन्त्रात्विजों जपः ॥ यजमानश्व यज्ञरुत्व॑ फलभोक्ता त्वमी- 
चर! ॥ ४७ ॥ न त्वया रहित किश्वित्रेलोक्ये सचराचरे ॥ भगवन्दंबदेवेश शरणागतवत्सल 
॥ ४८ ॥ तब्राहि बाहे महायोगिन्भीतानां शरणं भव ॥ दानवजिजिता देवाः स्वगेंश्रष्टाः कृता 
विभो ॥ ४९ ॥ स्थानश्रष्टा जगन्नाथ विचरन्ति महीतले | इन्द्रस्थ वचन श्र॒त्वा विष्णुवंचन- 
मबवीत्‌ ।। ५० ॥ श्रीमगवाल॒बाच ॥ कोपसोौ देत्यों महा अयो देवा येन विनिर्जिताः ॥ कि 
स्थान लस्य कि. नाम कि बले कस्तदाश्रयः ॥ ५१।: एतत्सव समाचक्ष्य मधवत्निभ्यों 
भव ॥ इन्द्र उवाच ॥ भगवन्देवदेवेश भक्ताठम्रहेकारक !. ५२ ॥ देत्यः पूत्र महानासीन्नाडीजड़ 
इति स्मृतः ॥ बहावंशससुद्धतो महोग्रः छुरसूदून: ॥| ५३॥ तंस्थ पुत्रोइतिविख्यातों सुरनामा 
महासुरः ॥ तस्य चरन्द्रवतीनाम नगरी च गरीयसी ॥ ५४॥ तथ्यां वसन्स दष्टरात्मा विश्व 
निर्जेत्य वीयवान्‌ ॥ सुराग्स्ववशमानिन्ये निराकृत्य त्रिविष्टपात्‌ ॥ ५५ ॥ इम्द्राप्नियमवाय्वीश- 
सोमानिऋतिएशिताम ॥ पदेष॒ स्वयमेवासीत्सूयों मूत्वा तपत्यपि ॥ ५६॥ . पजेन्यः स्वयमे- 
वासीदजेयः स्वदवतेः ॥ जहि त॑ दानव॑ विष्णो सुराणां जयमावह ॥ ५७॥ तस्य तद्गच्न 
श्रुत्वा कोपाविष्टो जनादनः ॥ उबाच श्र देवेन्द्र हनिष्ये त॑ महाबलम्‌ ॥ ५८ ॥ प्रयान्तु 
सहिताः सर्वे चन्द्रवत्यां महाबलाः ॥ इत्युक्ताः प्रययुः सर्वे पुरस्कृत्य हारि खुराः ॥ ५९॥ 
दृष्टो देवेस्तु देत्येय्यों गजमानस्तु दानवेः ॥ असंख्यातसहस्लरेस्त दिव्यप्रहरणायुथेः ॥ ६० ॥ 
हन्यमानास्तदा देवा अखुरेबोहुशालामः ॥ संग्रारं ते समुत्हज्य पलायन्त दिशो दश 
॥ ६१ ॥ ततो दृष्ठः हषीकेश संग्राम समुपस्थितम्‌ । अन्वधावन्नाभिकुद्धा विविधायुधपाणयः 
॥ ६२॥ अथ तान्पइतान्दष्टा शह्बुबक्ररइाधरः ॥- विव्याथ सर्वेगात्रे५ शरराशीविषोपमेः 
॥ १३॥ तेनाहतासते शतशों दानवा निधन गताः ॥ एकाड़ो दानवः स्थित्वा युध्य- 





अप्लि; यम, व य, इंश, सोम, निऋति और वरुण आदिके 
स्थानोंमें स्वये शासन करता है । एवं वह त्रिभुवन वाप- 
कारी सूर्य भी स्वय॑ होकर तपताभी है॥ ५६ ॥ मेघभी 
वही है, देवताओंके लिए अजेथ है, उस दानवका हें- 
विप्णो | आप वध कीजिए और देवताओंकों जय दीजिये 
|| ५७ ॥ इन्द्रके इन वचनोंको सुनकर क्रोघाकुछ भग- 


सन्‍त्र, तन्त्र, ऋत्विकू और जप हो | यजमान यज्ञ बे 
फलभोक्ताभी आप ईश्वरही हो ॥ ४७ ॥ इस चराचर 
जगतसें तुमसे रहित कुछभी नहीं है। हे भगवन्‌ ! हे|दय- 
दव श , आप शरणागतव्त्सल हैं | ४८ ॥ है महायोगिन ! 
रक्षा कीनिरएं, रक्षा कीजिए | आप उरे हुओंक रक्षक एवं 
उपाय बनिये। हे प्रभो | दानवॉने सब देवताओंको जीत 


लिया ओर स्वरगगंसे भी निकालछ दिया है ॥ ४९ ॥ है जग- 
ज्ञाथ ! वे सब स्थानभ्रष्ट होकर इस प्रथिवीमें विचरण कर 
रहे हैं । ऐस इन्द्रके वचनोंकों सुनकर विष्णु भगवान बोले 
॥५०॥ कि, वह कौन्सा देत्य है ? जिसने सारे डेव- 
ताओंको जीत लिया हैं, उसका नाम, धाम, शक्ति और 
आश्रय कया हैं :॥। ५१ ॥ हे इन्द्र | यह सब तुम कथन 
करो और निर्भय हो जाओ | इन्द्र बोडे कि, हे देवदेवेश ! 
हूँ भक्तोपर अनुए्ः करनेवाले भगवन ! || ०२ || नाडीआँघ 
नामका- एक अत्युप्न देत्य अह्ाके वशमें देवोंको दुःखदेने- 
वाला पहिल उत्पन्न हुआथा ॥ ५३ ॥ उसका अति विख्यात 
जुत्र मुरतामका सहासुर उत्पन्न हुआ हैं, उसकी बढ़ी 
विश्ञाक्त चन्द्रवती नामकी नमी हैं उसमें वह निव्रास 
करवा हुआ भी स्वगमे सब देवताओंको निकालकर अपने 
उद्यम कर क्षिया है और उस दुष्ठात्माने इस प्रकार सारे 
जमनको अपने आधीन ब्रना लिया है ।। ५४ || ५५ । (इन्द्र, 


। 
५, 


वानने कहा कि, हे देवेन्द्र | में ढस महावडी तुम्हारे शत्रको 
स्वयंही मारूंगा | ५८।॥| आप घन्द्रवती नगरीमें मेरे साथ 
सब मिलकर चछ्ो | भगवाब॒के इसप्रकार कद्दनेपर सारे 
द्वबता भगवानकों आगे करके चल दिए ॥ ५९॥ उस 
देत्यने देवताओंको देखकर बछौ गजना की और उसके 
साथ असंख्यात सहस्र दिव्यास्प्र शद्मचारी अन्य दानवोंने 
भी गजनाकी ॥| ६० ॥ बाहुबछी असुरोंसे आहत होनेव्राे 
देवता उस सग्रामको छोडकर दर्शों दिशाओंमें भागने ढगे 
|| ६१ | अनेक प्रकारके शखरधारी दानव उस संग्राम 
अ>्दर दवोंके भायज/नेपरमी भगवानकों उपस्थित देखकर 
उनपर दोडे ॥ ६२ ॥ शड्कुचक्र गदाधघारी भगवानने अपनी 
ओर भागते हुए असुरोंको देखकर अपने सर्पोंकी तरह 
भिनभिनाते काछतुल्य वाणोंसे उनका बंध करदियां 
|| ६३ ॥ इसप्रकार जब सेकडों आहत हो दानव 
मर गये तब खडा होकर वह अकेछा ही वीर दानव भग" 


व 


श्रतानि भाषाटीकासमेंतः । ( ३९७ ) 


८ हल. 045. 2: जज न्‍2 ८7: कक (0//7#060 87 १७४८५: कट १३६ ६ वहा, त ५०१5७ /७४:५२१४ 
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मानों सहसुंहुः ॥ ६४ ॥ तसस्‍्थोपरि हषीकेशों यद्यदायुधसुत्सखजत ॥ पृष्पवत्तत्समभ्येति 
कृप्ठितं तस्य तेजसा ॥ ६५ ॥ शखास्रेविध्यमानोईएपि यदा जेतुं न शक्‍्यने ॥ युयोध 
च तदा कुद्धों बाइनिः परिघोपमेः॥ ६६ ॥ बाहुयुद्ध क॒ले तेन दिव्यवर्धटइत्ाऋूण ।॥ लेन 
आधन्‍्तः स भगवान्‌ गतो बदरिकाश्रमम्‌.॥ ५६७ ॥ तत्र हेमवती नाम्नी गृहा परमशोथना ॥ 
तां प्राविशन्महायोगी शयनाथे जगत्पतिः ॥। ६८ ॥ योजनद्राइशायामा परूद्वारा धनझूय ॥ 
अहं तत्र मखुप्तोस्मि मयभीतों न संशयः ॥ ६९ ॥ महागुद्धेन तेनेव आप्तोहह पाप्दुनन्दन ॥ 
दानवः पृष्ठतों लम्नः प्रविवेश स ता गृहाम्‌ ॥ ७० ॥ श्सुत्त मां तदा 












2 तिज 202607 56087 ४7: 





शि 











इृष्टा।चिन्नयदानवों 
हृदि ॥ हरिमेन हनिष्य5ह दानवानां क्षयावहम ॥ ७१ ॥ एवं छुदुननेस्तम्ध व्यवलाय व्यवस्य 
च॥ समुद्धता ममाड्रेभ्यः कन्येका च महाप्रभा ॥ ७२ ॥ दिव्यप्रहदरणा देवी युद्धाय सझुप- 
स्थिता ॥ मुरेण दानवेन्द्रेण ईक्षिता पाण्डुनन्द्न ।| ७३ ॥ खुद्ध समीरित तेन ख्विया तत्र 
प्रयाचितम्‌ ॥ तेनाथुध्यत सा नित्य तां दृष्ठा विस्मयं गतः ॥७४॥ केनेयं निर्मिता रोडा अत्थु- 
प्राशनिषपातिनी ॥ इत्युक्त्वा दानवेस्द्रोएसो युयुधे कन्यया तया॥७५॥ततस्तया महादेव्या त्वरया 
दानवो बली ॥ छित्वा सर्वाणि शख्व्राणि क्षणन विरथः कृतः ॥ ७६॥ बाहुमहरणोपेतों घाव- 
मानों महाबलात्‌ ॥ तलेनाहत्य हृदय तया देव्या निपातितः ॥७»॥ पुनरुत्थाय सो चावत्कत्याह 
ननकांक्षया ।। दानवं पुनरायान्तं रोषेणाहत्य तच्छिरः ॥ ७८ ॥ क्षणात्रिप्तयामास भूमों तन्च 
समुज्ज्वलत्‌ ॥ देत्यः कृत्तशिराः सोथ ययौ वेवस्वता/लयम्‌ ॥ ७९ ॥ शेषा भयादिता दीनाः 
पाताल विविशुद्धिंष:ः | तत्त+ समुत्यितों देवः पुरो दृष्ठाउसुरं हतम ॥,.<० ॥ कम्यां पुरः स्थितां 
चापि कृताअलिपुर्श नताम्‌ ॥ विस्मयोत्फुछनयनः प्रोवाच जगता पातिः ॥ <१॥ केनाय॑ं निहतः 
संख्ये दानवों दृष्ठईमानसः ।। येन देवा: सगन्धवाः सेन्द्राश्व 'समझ॒ठ्णा३ ॥ <२ ॥ खसनागाः 
सहलोकेशा लीलयेव विनिर्जिता। | येनाहं निर्जितो भीतः श्रान्तः झुप्तो गहामिमाम्‌ ॥ <३२ ॥ 





वानसे बारबार युद्ध करनेठगा ॥६४॥ उस दानवके तेजस | 
भगवानके छोडेहुए सब आयुध उसपर ऐसे मालम होते थे | 
जसे फूछ ॥ ६५ ॥ वह दानव यों जब शख्राल्बोंसे जीता न | 
जासका तब क्रोघर्स आकर सगवान्‌ उससे बाहुयुद्ध करने | 
ढछंगे ॥६६॥ दिव्य हजार वर्षपयन्त बाहुयुद्ध करनेके बाद | 
भगवान्‌ थककर बद्रिकाश्रम चछे गये ॥ ६७॥ वह महा- 


योगी जगदीश हेमवती नामकी पर मसुन्दर शुद्दामें सोनेके 


योजन चोंडी थी और इसके एकही द्वार था। घहांपर में उस 





हुआ ॥| ७४ ॥ वह दानव यह कहता हुआ कि. किसने 
5, 5 क्ेया री, 
इस भयद्डर ख्रीको जो वज्ञपिरानेवालही है पैदा किया हैं; 
कप का प कर 
युद्ध करता रहा ॥ ७5 ॥ उस सहादेवीन बडी शौन्नतासे 
कक] 
उस बली दानवक सब शब्ोंको काटकर तुरन्तही रथहीन 
५ 
करदिया ॥७६॥ वह महावद्ली कबछ अपनी मह'सुजाओं 
आप ्ध् + आ .] न. 8 
हीस जब सारने दोडा तब उस देवीने उस छातीमें ठोकर 


| मारके गिरा दिया ॥ ७७॥ फिरमी वह उस कनन्‍्याकों 
बास्ते प्रविष्ट होगये | ६८ ॥ है अजुन ! वह गुदा १६ | 


मारनेके वियारस उठा पर उस दिव्य देवीने उस भाता 


| हुआ देखकर क्रोधस शिर काटकर ॥ 3८ ॥ फौरन 
सम्रय भयभीत होकर सोगया॥६५९॥हे अजुन! यद्यपि मे उस | 

श्रान्त 'होगया था पर तोभी वह दानव मेरे पीछे | 
पडकर उस गुहामेंसी आही पहुँचा ॥७०॥ वहां मुझे सोता | 
हुआ देखऋर वह विचार करने छगा कि; दानबोंकों नष्ट 
करनवाले हरिको मारही डाल ॥ ७१ ॥ ऐसे उस दुवुद्धिके | 
विचारकों जानकर मेरे अद्जस एक महा प्रभावाली कन्या | 
उत्पन्न हुईं॥७२॥। हे अर्जुन | वह देवी नाना प्रकारके दिव्य | 
आयुधोंसे युक्त समुपस्थित हुईं थी,उसको उस बडे दानवने | 
देखा ॥ ७३॥ उसने उससे युद्धकी -याचन्रा की । उसन | 
'दानबस नित्य युद्ध किया जिससे उस वीरको बडा आश्चर्य | 


प्रथ्वीपर गिरा दिया । वह तेज भूमिमें देदीप्यमान होने 
छगा. कटा शिर देवराज, यमराजके घर भेपन दिया 
५ ५२३ कप कक... कम बिक 
!। ७९ ॥ शेष सब झात्र डरकेमार पाताहूमें ग्रवेशकर गये । 
स्क् ४ के टर ७ बक 
भंगवानकी निद्राभज्ञ हुई और उन्होंने आगे असुरको 
मराहुआ देखा ।! ८० | जगत्पति मगदानूने अपने सन्मुख 
नेवाली 
हाथ जोडकर प्रणाम कर उस प्रसन्न मुखी कन्याकों 
देखकर कहा || ८१ ॥ छिसने इस टुष्टात्मा राक्षकों मार 
हैं जिससे सब देवता गन्धव इन्द्र और मरुठण ॥ ८२ ॥ 
नाग और लोकपाल पराजित हो चुके थ और जिससे 
कक. खा, १ २ 
डरकर तथा थककर इस गशहास मने प्रवेश किया शा।८३॥ 


(३९८ ) ब्रतराजः । 


[ एक'दरशी-« 
केन कारुण्यभावेन राक्षितो5हं पलायितः ॥ कन्योवाच ॥ रूया विनिहतो देत्यस्त्वदंशोद्भूतया 
प्रभो ॥८४॥ दृष्ठा सुप्त हरे त्वां त॒ देत्यों हन्तुं समुद्यतः॥ तेलोक्यकण्टकस्येत्यं व्यवसायं प्रबुध्य 
च॥ ८५॥ हतो मया दुरात्माइसों देवता निर्भयाः कृताः ॥ तवेबाह महाशक्तिः स्वशा- 
भयडूरी ॥ <३॥ ब्रेलोक्यरक्षणार्थाय हतो लोकभयड्गरः ॥ निहत॑ दानवं दृष्ठा किमाश्र्य 
वबद प्रभो ॥ <७॥ श्रीमगवाठुवाच ॥ निहते दानवेन्द्रेपस्मित्संतुष्टोह त्वयानघे ॥ हृष्ठाः 
पुष्टाश्व वे देव आनन्द: समजायत ॥ <<८ ॥ आनन्दल्लिष लोकेषु देवानां यघ्त्वया कृतः॥ 
भसत्नोस्म्पनबरे तुभ्यं वर॑ वरय खुब्रते ॥ <९ ॥ ददामि तन्न सन्देहों यत्छुरैरपि दुलेभम॥ 
कन्योदाच ॥ यदि तुष्टोईसि मे देव यदि दयो वरो मम ॥ ९० ॥ तारयेहं महापापादपवासपरं 
नरम्‌ ॥ उपवासस्य यत्पुण्यं तस्याद्ध नक्तमोजने ॥ ९१॥ तदद्ध च भवेत्तस्थ एकथ॒क्तं करोति 
ये ॥ यः करोति ब्रतं भकत्या दिने मम जितेन्द्रियः | ९२ ॥ स गत्वा वेष्णवं स्थान कल्पकोरि- 
शतानि च ॥ जुआनो विविधान्भोगानतुपवासी जितेन्द्रियः ॥ ९३ ॥ भगवंस्त्वत्मसादेन भवत्वेष 
वरो मम ॥ उपवास च नक्त च एकशुक्ते करोति यः ॥ ९४ ॥ तस्य धर्म च॒ वित्त च मोक्ष देहि 
जनादन ॥ श्रीमगवाहुवाच ॥| यत्त्वं बद्सि कल्याणि तत्सर्व च भविष्यति ॥९५।मम नक्ताश्र पे 
लोकास्तव भक्ताश्व ये नराः॥ त्रिषु लोकेषु विख्याताः प्राप्ल्यन्ति मम सन्नरिधिम ॥ ९६॥ 
एकाददयाँ समुत्पन्ना मम शक्ति; परा यतः ॥ अत एकादशीत्येव॑ तव नाम भविष्यति ॥ ९७॥ 
दुग्ध्वा पापानि सवाणि दास्यामि पदमव्ययम्‌ ॥ तृतीया चाष्टमी चेव नवसी च चतुर्देशी ॥९८॥ 
एकादशी विशेषेण तिथयो मे महांप्रियाः। सर्वतीांथिक॑ पुण्य॑ सर्वदानाधिकं फलम्‌ ॥ ९९॥ 
स्वंब्रताधिक चेब सत्य॑ सत्यं वदामि ते ॥ एवं दत्वा वरं तस्यास्तत्रेवान्तरधीयत ॥ १०० ॥ 
हृष्टा ठष्टा तु सा जाता तदा एकादशीतिथिः॥ इमामेकाद्शीं पार्थ करिष्यत्ति नरास्तु ये॥)॥ 


क्र 





किसने यह मुझे भागे हुयेपर करुणा की हैं जो मुझे बचाया | हो ॥ ९१ ॥ उसका आधा! एकभुक्त करनेवालेको हो! जो 
कन्याने कहा कि;हे प्रभो! आपके अंशसे उत्पन्न होकर मेने | हमारे दिनमें सक्तिपू्वेक जितेन्द्रिय होरूर ब्रत करता हैं 


इस दानवका वध किया है ८४॥ आपको सोलाहुआ 
देखकर उस त्रेलोक्य कण्टक राक्षसने आपके -मारतलेका 
विचारकों जानकरही मेने उस हा वध करदिया है ॥ ८०५॥ 
आज उस दुष्टके मरजानपर सब देवता निर्भेय करदिय 
गये हैँ । महाराज में आपहीकी सब शत्रुओंको मारनेवाली 
महाशक्ति हूं ॥ ८६॥ ज्िछोककी रक्षा करनेके लिये 
उस दुष्ट एवं भयंकर राक्षसकों मार दिया, उसे सरा- 
हुआ जानकर हे प्रभो | आपको केसे आश्चये हुआ ! यह 
कथन कीजिये || ८७ || श्रीमगवान बोले कि, ह निष्पापे ! 
उम्ध दानवको मारदेनेसे में बहुत प्रसन्न हुआ हूँ | आज 
देवताओंके घर बड़ा आनन्द मकछुछ हुआ हैं ॥ ८८॥ हे 
देवि | तीनों छोकमें जो तुमने आनन्द किया है इससे में 
तुमपर ग्रसन्न हूं हे सुत्रते | तुम वर सांगो ॥ ८९ ॥ मैं तुम्हें 
देवदुलेभ वरको दे दूंगा इसमें सन्देह मत करो । कमन्याने 
कहा कि, महाराज ! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं और यदि 
मुंझको आप वर देना चाहते हैं तो यह वर दीजिये॥९०॥ 

कि, यदि सेरा कोई उपवास करे तो महापापीको भी अपने 

पापस मुझ्नद्वावा मुक्ति मिलजाय । उपवासमें जो पुण्य हो 

इसका आधा नक्त (द्नके आठवें भाग)में भोजन करनेमें 


॥९२॥ वह जितेन्द्रिय प्रवासी कस्यकोटिशतपरयन्त अनेक 
भोगोंको भोगता हुआ वेष्णव छोकक्ोो प्राप्त होता हैं ॥९१॥ 
महाराज|आपके प्रसादसे यह वर मुझे मिल जाय,जो मनुष्य 
उपवास करे एवं नक्तत्रत ओर एऋभुक्तका नियम करे 

॥ ९४ ॥ उसको आपकी कृपास घसे-घनकी प्राप्ति त्या 
मुक्तिकी प्राप्ति हो, यही में वर मांगती हूँ। श्रीभगवान्‌ बोड़े 
कि, है कल्याणि | जो तुम कहती हो वह सब सत्य होगा 
| ९०॥ जो भरे और तेरें भक्त इस लोकझें है वे तीनों 
छोकोंमें विख्यात हो रर मेरे निकट रहनेके आनन्दुका भोग 
करेंगे || ९६ ॥ मरी पराशक्ति आपके, एकादशीके रिन 
उत्पन्न होनेके कारण तुम्हारा नाम एकादशीही होगा 
॥ ९७॥ में सब पापोंको दुग्ध करके अउ्यय +दको प्याण 
करूंगा | तृतीया, अष्टमी, नवमी, चतुर्दशी ॥ ९८॥ और 
व्रिशेषकर एकादशी ये तिथियां सुझे बहुत प्यारी हैं। सब 
तीर्थोंस अधिक पुण्य और सब दानोंसि अधिष्त फछ होआ 
है ॥९९। सब ब्रतोंसे यह अधिक है,इसे तुप्र सत्य समझी! 
इस प्रक/र भगवान्‌ बर देकर अन्वर्धाव होगये ॥ १०० ॥| 
इस समय एकादश तिथि बडी हृष्ट तुष्ट हुई । दे 
अजु न ! जो छोग इस एकादशीको करेंगे ॥ १०१ ४ 


अतानि | भाषाटीकासमे ( ३९९ ) 


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बा मामा रा भ मा ाभाा 0 भरंधभभभाभभ भा भाभभ5भाआ॥ं॥॥ ७ ०७७७७४७७७४७४७७७७७७७७/७७एएशएएाढो 


तेषां शर्त हनिष्यामि दास्यामि परमां गतिप््‌ ॥ अन्पेषषि ये करिष्यन्ति एकादश्या महाव्रतम्‌ 
हरामि तषां विन्ञाँंध सवेसिद्धि ददामि च ॥ एबमुक्ता समत्पत्तिरेकादश्याः पृथासुत 
३॥ इयमकादशी नित्या स्वपापक्षयड्री ॥ एकेव च महापुण्या सर्वपपनिबदनी ॥४॥ 
उदिता सर्वलोकेष सर्वेंसिद्धि हरी तिथि! ॥ शुक्का वाप्यथवा कृष्णा इति भेद न कारयेत्‌ ॥ ५ ॥ 
कर्तव्य तु उमे पार्थ न तुल्या द्वादशीतिथिः ॥ अन्तर नव कतव्यं समस्तेत्रतकारिनिः॥ ६ ॥ 
तिथिरेका भवेत्सवो पक्षयोहमयोरपि ॥ ते यात्ति परम॑ स्थान यत्रास्ते गरूडध्वजः ॥ ७ ॥ 
धत्यान्ते मानवा लोके विष्णुनक्तिपरायणाः ॥ एशादश्पास्तु माहात्म्यं सवकालं तु यः पठेत्‌ 
॥<॥ अश्वमेघस्थ यत्पुण्य॑ तदाप्नोति न संशय ॥ यः ऋणोति दिवारात्रों नरो जिप्णुपरायणः 
। तद्धक्तमुखनिष्पन्नां कथां विष्णो: छुमड्रलाम्‌ ॥ कुलकोटिसमायुक्तो विष्णुलोके महीयते 
॥ १० ॥ एकादर्याश्व माहात्म्यं पादमेर्क णोति यः॥ बह्महत्यादिके पाप॑ नदयत नात संशयः 
। ११ ॥ विष्णुधसः समो' नाध्िति गीतार्थीन धनखय ॥ एकादशी सम नाएिति बते नाम सना- 
तनम्‌ ॥ ११२॥ इलि श्रीकृष्णाज्ञुगनसवादे मार्गशीबकृष्णकादशीमाहात्म्य सम्पूणम्‌ ॥ 
अथ मा।शीषशुक्कुकादशीकथा ॥ 


युघधिछ्चिर उवाच ॥ वन्दे विष्णु प्रश्च॑ साक्षाक्षेकअयखुखलदम्‌ ॥ विश्ेेशं विशच्वकतार॑ पुराण 
पुरुषोत्तमम्‌ ॥ १ ॥ पृच्छामि देवदेवेश संशयोउस्ति महान्मम ॥ लोकारनां तु हिताथ।य पापानों 
च्‌ क्षयाप च ॥ २॥ मशणशीर्द स़िते पक्षे किंनामेकांदशी मवेत्‌ ॥ द्ीव्शश्व विजिस्तत्याः को 
देवस्तत्र पूज्यते ॥३॥ एतदाचक्ष्व में स्वामिन्विष्तरेण यथातथम्‌ ॥ श्रीकृष्ण उवाच ॥ सम्यक्ु 
पृष्ठ त्वया राजन खाचु ते विमला मतिः ॥ ४॥ कथथिष्यानी राजेन्द्र हारेवासरछुत्तमम्‌ ॥ 
















उनके शत्रुओंका नाश करके में उन्हें परमगति प्रदान 


करूंगी । ओर भी जो दूसरे मलुष्य इस एकादुशीके महा- 
ब्रतकों करेंगे ।। १०२ || उनके सत्र विन्नोंका नाश करके 
समस्त सिद्धियोंका वर दूंगी । हे अजुन ! 
एकादशीको उत्पत्ति वर्भन को | 


६ नेवाली यह एकही बडे भारी पुण्यकरूको देनेवाली 
भाह॥ 


दोनों पक्षों यह सब तिथि एक ही होती हैं जो इनका त्रत 
करते हूँ वे उस स्थानकों चलेजाते ह जहां कि, गरुडघ्वज 
भगवान्‌ निवास करते हैं 


पवित्र माहात्म्यको सदा पढ़ेंगे तो उन्हें अश्वमं्र 


यशका जो फल होता हे वह प्राप्त होगा | इसमें सन्देह नहीं 
है जो मनुष्य दिनरातविप्णुमक्तिमें परायण होकर ॥ ९ ॥ | 
भगवानके अक्तके मुखस वर्णन कौहुई इस मांगलिक कथा-| 


| कीपिको पाता है ॥ १० ॥ एकादशी से 
| चतुथाशको भी जो मलुप्य युनता हैँ उसके छुननस त्रह्मह- 
स॒ प्रकार इस | 
॥ यही एकादशी | ह अजुन ! विप्णु धमके समान घर्म ओर एकादशोक समान 
नित्य सब पापोंका क्षय करनेवाी है और सब पार्पोको | कोई उत्तम ब्रत ससारमें नहीं हैँ यह गीतायेभ साल्ूम 
| होता हैं ॥ १९॥ यह मागशीप कृष्ण एकादशा साहा- 
सब लोकोंमें यह ' सवंसिद्धि करी ? तिथिक | त्म्य सम्पूण हुआ ॥ 
नामुस प्रसिद्ध हैं। चाइ वह शुद्धपक्षकी हो वा कृप्णपक्षको | 
दा कोई भद्‌ इसमें न करे ॥ ५॥ इसलिय हे अजुन ! | 

नो एकादशियाँ ही सनुष् चाहि शी। 
विधि तुल्य नहीं है व व हित | जो विश्वके मालिक विश्वके कर्ता एवं पुराणयुरुषोत्तम प्रश्नु 
ना आम है इसछिय मैं पूछवाह कि,छोगोंके कल्याणके लिये पापोंके 
 क्षयक लिये 


वे मनुष्य छोकसे धन्य | एकादशी होती है ! उप्तकी क्‍या 


जो विष्णु भक्तिमें छग हुए हैं, जो इस एकादुशीके इस | 
| आप क्ृपाकर मुझे विस्तारके साथ जसका तैसा उपदेश 
| दीजिय । श्रीकृष्ण भगवान्‌ बोके-हे राजेन्द्र : तुन्हारी बुद्धि 
बडी पवित्र हं आपने यह उत्तम प्रश्न कया हू मे 
अब हरिवासरको कहताहूँ तथा उसकी पूजा व कृथावि- 





को सुनाता हैं, वह कोटि कछुछके साथ विप्णु छोकभ उस 
न्‍न्यकोी कथाके 


व्यादिक सब पाप नष्ट होजाते है इसमे सन्दृह न ४९|॥ 


अथ मागशी+ शुक्षेकाद शीक था-यु विध्विर बोल कि; में _ 
तीनों छोकोंको सुख पहुँचानेवाले साक्षात्‌ भगवान्‌ विष्युको 


हैं उन्हें प्रणाम करता हूं । १ ॥ हैं दवद॒वश सु सशय 


२ मागशीष साखक शुद्धपक्षस्त कौनसी 
विधि हैं और कौनसे 


देवताकी उसमें पूजा होती हे ( उसे है स्वामी ! 


१ तस्येति श्षः । 


(४०० ) ब्रतराजः [ एकादशी- 





उत्पन्ना सा लिते पक्षे दादशी मम वह्कभा ॥५॥ मार्गशीर्षे समुत्पन्ना मम देंहान्नराधिप ॥मुरस्य 
च वधाथाय अख्याता मम वहक्लना ॥ ९॥ कांथता सा मया चव त्वदओं राजसत्तम ॥ पृत्र॑मेका- 
दशी राजन च्रेलोक्ये सचराचरे ॥ ७ ॥ मार्गशीरषेंसिते पश्ने चोत्पत्तिरिति नामतः॥ अतः ए्‌॑ 
प्रवक्ष्यामि मागशीषेलितां तथा ॥ <॥ मीक्षानाश्षालिविख्यातां सर्वपापहरां पराम्‌ ॥ देव॑ 
दामोदर तस्या पूजयेञश्व भयत्रतः ॥ ९ ॥ गन्धपुष्पादिनिश्वेव गीतवृत्यः सुमड्रलेः ॥ शरण राजेद्ध 

वक्ष्यानि कथा पोरा/णिकी शुभाम्‌ ॥ १० ॥ यस्याः श्रवणमात्रेण वाजपेयफल लम्नेत ॥ अधघो 
गति गता ये व पिवमातद्सुतादइय। ॥ ११॥ अस्याः पुण्यप्रश्नावेण स्वरग यात्लि न संशयः॥ 
छघतल्लात्कूश्णम [द्रजस्महिमान शजुष्बच तम्‌ ॥ ९१९॥ पुरा व नगर रम्य गोकुल्ल न्यधसत्नपः ॥ 
वेखानलेति राजपिं: पुत्रवत्पालयन्त्जाः ॥ १३ ॥ द्विजाश्व न्यवसंस्तत्र चतुर्वेद्परायणाः ॥ एवं 
स्‌ राज्य कुवांणो रात्रो ठु स्वप्नमध्यतः ॥१४॥ ददशे जनक स्व तु अधोयोनिगत नृपः॥ एवं 
इृष्ठा तु तं तत्र विश्मयोस्फ्छलोचनः ॥१५॥ कथयामास बृत्तान्तं द्विजाप्रे स्वप्नसंभवम्‌ ॥ राजो 
वाच ॥ मया तु स्वपिता दृष्टों नरके पतितों द्विजा:॥ १६ ॥ तारयस्वेति मां तात अधोयो 
निगत॑ खुत ॥ इति ब्वाणः स तदा मया दृष्टः पिता स्वयम्‌ ॥ १८ ॥ तदाप्रसाति भो विप्रा 
नाह शम लभ्षाम्यहो ॥ एतद्राज्थ मम महद्सहामसखुख तथा ॥ १८॥ अच्ा गज्ञा रथाश्वव न 
मां रोचन्ति सर्वथा ॥ न कोशीःपि खुखायाले न किंचित्खुखद मम ॥ १९ ॥ न दारा न खुता 
महां रोचन्ते द्विसत्तम ॥ कि. करोमि के गच्छामि शरीर में तु दह्मते ॥२०॥ दान ब्र्त 
तपो योगो येनेव मम पूर्वजा३ ॥ शोक्ष मायान्ति विशल्‍श्द्रास्तदेव कययन्तु में ॥ २१ ॥ कि तेन 
जीवता लोक छुपुत्रेय बलीयसा ॥ पिता तु यध्य नरक तस्य जन्म निरथकम्‌ ॥२२॥ 





घिको भी हे राजनद् ! वणन करता हूं । शुक्ल्पक्षम मेरी | नगरमे बहुतस त्राह्मणभी वेदोंके जाननेवाले रहते थे | इस 
प्रिया एकादुशों उत्पन्न हुई ।। ५॥ हैं नराबविप ! मागशी | प्रकार राज्य करतहुए एकद्ति उस राजाकों अधरात्रि 
परम मर शरीरत यह उतन्न हुई दे ओर विश्येंष करके सुरके | समय स्वप्त हुआ कि ॥ १४ | मरे पिता अधोयोनिमे पढें: 
वधके वास्ते यह मेरी बल्लभा प्रतिद्ध हुई हे ॥| ६ ॥ हे | हुए हैं इस आश्थयको देखकर उसकी आँखें चोडगई।॥१५ 
राजन्‌ ! इस चराचर जगतूमें नने तुमारे ही सामने सूबे | उस वृत्तान्तको उसने किसी ब्राह्मण समूहसे निवदन किया 
प्रथम इस एकादशी का वर्णन किया है || » _॥ मा्गशीषके | कि।हे आह्यणों ! सने अपने पिताको नरकमे पडाहुआ आज 
कृष्णपक्षम उत्पत्ति एकादशी होती है और अब इसी मही- | देखा है कि ॥१६॥ हे पुत्र ! तू मुझे इस दुर्गतिमेंसे निकाढ 
नेक शुक्लपक्षुकी एकादशीको कहता हूँ ॥। ८ ॥ उस एका- वो मुझे कहते थ मेने यह अपनी आंखोंस देखा ह 
दुशीका 'मोद्दा ” नाम है जो सब पापोंकी लाश करने-। । १७ ।॥ इस समयसे मुझे कुछ झान्ति नहीं होतो 

बाली हे उसमें भगवान्‌ दामोदरको प्रयत्नके साथ पूजना | राज्य मेरे लिये असह्य और दुखरूप होगया है. ॥ १८ 
खआादिय ॥५९॥ गन्ब, पु आदि पोडशोपचारखे तथा सांग- | हाथी घोडे और रथ कुछभी मुझे अच्छे नहीं माल्म होत 
'लिक गायनवायोंसे पूजा करनी चाहिये। अब हे राजेन्द्र | | एवं ख्रो पुत्र आदि जो भी प्यारी वस्तु मेंरे राज्यमें है वे 
पुराणोक्त पवित्र कथाको मे तुम्हें सुनाता हूं ॥१०॥ जिसके | सब अच्छी नहीं मारछूम होतीं इस खम्रय मुझे सुखी करन 
सुनते मात्रस ही वाजपेययज्ञका फल प्राप्त होता हैँ । पिता, | वाढा कोई नहीं हैं | १९ ॥ कहो ब्राह्मणों ! में क्या कहे 
माता या पुत्र आदि जिस किसीकी कुछमें अधोगवति हुईं | और कहां जाऊं मरा शरीर जछू रहा है,मुझे ख्री पुत्रआदि, 
हो || ११॥ वे सब इसके पुण्यके प्रभावसे स्वगको प्राप्त | हें श्रष्ठद्विजो | कुछ नहीं झुहाते ॥॥ ९० ॥| दान; तप या ब्रएँ 
होजाते हूं, इस कारण इसकी उस महिसाकों सुन ॥९२॥ | जिस किसीसी रीतिसे मर पिताका मोझ्षहों मेर पूवज 
भ्राचीनसमयर्म गोइुछ नामक रम्य नगरस एक राजा रहता | कल्याण पावें वेसीही विधि आप लोग मुझसे कहो 

था, उसका नाम्न वेखानस था, वो शजा अपनी' ग्रजाका | बलवान सुपुत्रके जीबनसे क्या छाभ जिसका पिता नरकम 
उन्वत्‌ पालन करता हुआ राज्य करता था ॥ १३[ उस | दुख उठावे।म कहता हूं कि,उस पुत्रका जन्म व्य॑4ह्द५५ 





१ अत्र ढ्व। दशीदार इसे का दशी 


बंतानि, | 


भाषाटीकासमेलः । 








ब्राह्मणा ऊचुभापवंतस्य सुनेरत्र आश्रमों निकटे नृप॥गम्यतां राजशादूल भूतंभव्यं विजानतः 
॥ २३ ॥ तेषां श्वुत्वा ततो वाक्य विषण्णो राजसत्तमः ॥ जगाम नत्र यत्रासाँ आश्रमे पवेतों 
मुनिः ॥ २४ ॥ बाह्मणवेंड्टितः शान्तेः मजानिश्व समंततः । आश्रम्गों विपुलस्तस्य मुनिशिः 
सत्रिषेवितः ॥ २५ ऋग्वोदिभियाजुषेश्व सामाथवंणकोविदेः॥ वेष्टिनो सुनिप्िस्तत्र द्वितीय 
इव पद्मजः॥ २६॥ दृष्ठा त॑ं सुनिशादूल राजा वेखानसस्तदा ॥ जगाम चावर्नि मुध्नां दण्डवत्‌ 
प्रणाम च ॥ २७ ॥ पत्नच्छ कुशलं तसय सप्तस्व ड्रेप्क्सों सुनिः ॥ राज्ये निष्कण्टकत्वं॑ च राज- 
सोख्यसमन्वितम्‌ ॥ २८ ॥ राजोबाच ॥ तव असादारकुशलम ड्रेइ मम सप्ततु ॥ विभवेष्वल॒कू- 
लेव कश्चिद्विन्न उपस्थित: ॥ २९ ॥ एवं में संशय वह्नन्‌ प्रद्ु त्वामहमागतः ॥ एवं श्रुत्वा नप- 
वचः पर्वतो सुनिसत्तमः ॥ ३०। ध्यानस्तिमितनेत्रोस्सों भूत भव्य व्यचित्तयत॥ झुहूनेमेक॑ 
ध्यात्वा च प्रत्यवाच नृपोत्तमम्‌ ॥ ३१॥ सुनिरुवाच ॥ जाने5ह तव राजेन्द्र पितुः पाप विक- 
मंणः ॥ पूर्वज/म्मनि ले पित्रा स्वप्त्नीद्यमध्यतः ॥ ३२ ॥ कामासक्तेन चेकस्या ऋतुभड्रग कृतः 
ह्वियः ॥ बाहि देहीति जल्पन्त्या अत्यस्याश्व नराधिपार्रे॥ कमेंण। तेन सतत नरके पतितों 
हायम्‌ ॥ राजोबाच ॥ केन ब्तेन दानन मोक्षस्तस्थ भवेन्मुने ॥ रे४॥ निरयात्पापसंयुक्ता- 

तत्ममाचक्ष्य पृच्छतः ॥ सुनिझवाच ॥ मार्गशीर्ष सित पक्षें मोक्षानाम्नी हरेस्तिथिः ॥ ३५ ॥ 
सर्वैस्तु तद्गतं कत्वा पित्रे पुण्यं मदीयताम्‌ ॥ तस्य यृण्यप्रभावेण मोक्ष स्तस्य भाविष्यति ॥३७॥ 
मुनेवाक्यं ततः अत्या नृपः स्वगहमागतः ॥ आम्रहायणिकी झुछा भाता भरतसत्तम ॥ ३७ ॥ 
अन्तःपुरचरें: से! पत्नैदोरेस्तदा नूपः ॥ ब्त॑ कृत्वा विधानेन पित्रे पुण्ये ददों नपः॥ रेढ ॥ 
तस्मिह्दसे तदा पुण्ये पुष्पवृष्टिर्भूदिवः ॥ वेखानसपिता लेन गतः स्व स्तुतों गणेः ॥ ३९॥ 
तज्ानमन्तरिक्षात् शुद्धां गिर्ममाषत ॥ स्वस्त्यरुतु ते पुत्र सदेत्थथ स जिदिवं गतः ॥ ४० ॥ 


किशन नल लि मिकिलि लि लिन निमि लि लि लि लिलिलि लिन नमन नि नि निज लि लि लक ल जि लि बन न कब अमन इन ॒ाअाम३ राम ं;;३३०७३७७७७७७७७७७७७७७७७७७७७७७७७७७॥७७॥७/७७७॥/७७७॥७/७७॥७७७॥/॥७/७८/एशस्‍श"श/ए/॥/ए"शशशशश"श"श"श"शश॥र/॥॥४७७७७॥७॥७७एए। 





व्राह्मणोंने उत्तर दिया कि, हे राजन्‌ ! यहांसे भूत | किया, एक मुहृत इसीपकार रहकर राजास कहा ॥३१॥ 
। €्‌ः ३ ्े हि किम ८ शरीक ० हि] हा च ३४७ कक 
भविष्यतू ओर वर्तेम्रानके जाननवाढे पत मुनिका | कि हे राजेन्द्र में तेरे पिताफे बुरे ऋरमोक पापको जानता हूँ, 
जा 5 3 हक ७, हक का के. सं 

श्रम निकट ही हैं । पहिले जनन्‍्ममें तेरे पितान दो पत्रियॉमेंस कामासक्त होकर 


हे राजशादूछ ' तुम यहां चढे 
जाओ || २३ ॥ उसके इन वचनोंकों सुनकर दुखी हुआ | एकका ऋतुभंग किया था, जो कि एक यह पुकार रहीथी, 
कि मुझे बचा दे ।। ३९ | उस कमस यह निरन्तर नरकमें 


वो सुयोग्य राजा वहां पहुंचा जहां कि, पवृतका आश्रप्त 
गिर गया है| यह सुन राजा बोछा कि,किस दान वा ब्रतस 


था।॥ २४॥ वे मुनिराज उस समय ब्ान्‍त जआाह्ययण और 

ओरसे घिरे हुए थे वो उनका बडा आश्रम |. _. 2 जद 

प्रजास चारोंभोरस घिरे हुए थे वो उनका व हें मुने ! इसका मोक्ष हो ॥| ३३ ॥ ३४ ।॥ मेरा पिया पाप- 
न २ २ 

युद्त निरयसे छूट जाय यद्द मुझ वताइये, यह घसुन मुनि 


मुनियोंस भली भांति सवित था॥२७।वे मुन्ति ऋगू ।साम, 
ज्ञु हि थथवे ४ 5 पठु किक के ए्‌ त्ृ ले क्सरे ३६ हा ्‌ कक 
यजु ओर अथथवेदी थ, उसे घिरे हुए पर्वत मुनि दूसरे | के (कू, मार्मशीर सितपश्चमें मोक्षनामक एकादशी होती 
है ॥ ३५ ।॥ तुम सब उस बत्रतकों करके पिताके छिए उसका 


ब्रह्माकी तरह शोमायमान दो रहेथे | २६ ॥ उस वेंखानस 
किक पु रु २५ ३ दि ही हि | ल्‍ 
राजाने उस मुनिशादूंछ पत मुनिको देखकर मत्था टेक- | [छछ दे दीजिए उसके पुण्यके प्रभावस उसका मोक्ष हो 
त्तिः की 
| जायगा ॥३३६॥ मुनतिक वाक्ष्य सुनकर पीछे राजा अपने बर 


कर दण्डवन प्रणाम किया । २७ ।। मुनिने राजाके स्वामी, 


अम्ात्य, राष्ट्र, ठुगे, कोश, बरू- सुहृत्‌ इन सातों अज्ञोंकी 
कुशर पूछी हि, तुम अपने राध्यमें सुखपूबक निप्कण्टक 
हो ना? ॥२८॥ राजा बोला कि,आपकी कृयासे मेरे राज्यके 
सातों अज्जोंमें खुशी है, विभवोंके भी अनुऋुछ होचपर कुछ 
विश्न उपस्थित होगया हैं २९ ॥ सुझे सन्देह हुआ हू 
इसीको तिव्र॒ज्षिक्ते छिए में आपके पास आया हूं ऐसे 
राजके वचत्तोंको सुनकर पर्वत मुतिन ॥ ३० ॥ ध्यान 
निश्रड मयन होकर भूत भविष्यत्‌ और वर्तमानका चिन्तन 


चला आया, है भरतसत्तम ! अगहनकी शुक्ला एकादशी 
आगई ॥३७॥ राजाने अन्तःपुरवासी सब पुत्र दार आदिके 
साथ विधिपूर्वक त्रत क्रिया पीछे सबका पुण्य पिताके लिए 
दे दिया | ३८ । उसके पुण्य देनेपर स्रगेस फूर्लोंकी ब्षा 
हुईं, वेखानसका पिता उससे स्वर्ग चढ़ा गया; जातीवार 
गणोंसे स्तुतियाँ होती चली ज,ती थीं ॥ ३५९ ॥ ब्रत करनें- 
वालेंके पिताने अपन पुत्रस स्वगसे शुद्ध वाणी बोछी कि, 


हर पुत्र ! तेरा सदा कल्याण हो , इसके बाद यों ब्रिद्यवि 


ह्‌ 


( ४०२ ) बलराज$ | [ एंकादेशौ- 


एवं यः कुरुते राजब्‌ मोक्षामेकाइशीमिमाम्‌ ॥ तस्य पाप॑ क्षय॑ याति मतों मोक्षमवाप्ठुयाव 
॥ ४१ ॥ नातः परतरा काविस्मोज्षदा विमका शुभा ॥ पुण्यसख्यां तु तेरा वे न जानें तु ये 
कृता ॥ ४२॥ पठनाच्छुवणाआास्या वाजपयफल लम्ेत्‌ ॥ चिन््तामणिसमा, होषा स्वगंमोक्ष- 
पदायिनी॥४३॥ इति श्रीतह्यण्डपुराणे मार्गशीर्षें शुक्ल कादरया मोक्षानाम्त्या माहात्म्य॑ संपूर्णणा। 
अथ पोष#ष्णेकादशीकथ। || 

गुधिष्ठिर उवाचा पोषस्य कृष्णपक्षे तु दादशी या भवेत्‌ प्रभो॥ किनाम को विधिस्तस्थाः 
को देवस्तत्र पूज्य ते ॥ १ ॥ एतदाचक्ष्व में स्वामिन्विस्तरेण जनादन ॥ श्रीकृष्ण उवाच॥ 
कथयिष्यामि राजेन्द्र भवतः स्लेहकारणात्‌ ॥ २॥ तथा तुष्टिन मे राजन ऋतुनिश्वात्तदक्षिणेः ॥ 
यथा तुष्टिमवन्मह्म मेकादश्या ब्रतेन वे ॥ ३॥ तस्मात्सवेप्रयत्नेन कतंव्यो हरिवासरः ॥ 
पौषस्य कृष्णपक्षे तु द्वादशी या भवेन्नप ॥ ४॥ तस्याश्रेव च माहात्म्यं श्णष्वेकाप्रमानसः॥ 
गदितायाश्व थे राजन्रेकाददयों भवन्ति हि॥ ५॥ तासामपि हि सवोसां विकलप॑ नेव कार- 
येत्‌ ॥ अतः पर प्रवक्ष्यामि पोषे कृष्णा हि द्रादशी ॥६॥ तस्या विधिं नृपश्रेष्ठ लोकानां 
हितकाम्यया ॥ पोषस्थ कृष्णपक्षे या सफलानाम नामतः ॥.-७॥ नारायणो5थिदेवोप्याः 
पूजयेत्त प्रयत्नतः ॥ पूर्वेण विधिना राजन्‌ कतेव्येकादशी जन। ॥ <॥ नागानां च यथा 
शोषः पक्षिणां गरडो यथा ॥ यथाश्वमेयों यज्ञानां नदीनां जाह्ववी यथा ॥ ९॥ देवानाँ च 
यथाविष्णुद्धिपदां बाह्मणो यथा ॥ ब्रतानां च तथा राजन प्रवरेकादशी तिथि; ॥ १० ॥ ते जना 
भरतश्रेष्ठ मम पूज्याश्व सवश! ॥ हरिवासरसंसक्ता वतेन्ते ये भशं नप ॥ ११॥ सफला- 
नाम या प्रोक्ता तस्या।पूजाविघ श्वणु ॥ फेम पूजयेत्तत्र कालदेशोद्गधवः श॒ुमेः ॥ १२ ॥नारि- 
केलफलेः शुद्धेस्तथा वे बीजप्रकेः ॥ जम्बीरेदाडिमेश्वेव तथा पूगफलेरपि ॥ १३१॥ लवदड्ूेंवि- 
विधधाम्येस्तथा चाम्रफलादिनिः।पू तयेदेवदेवेश धपेदीपेयथ/क्मम्‌ ॥ १४ ॥ सफलायाँ दीपदान॑ 


ााभााााााााभभाााा।॥ ४४५५9 ३००२५०७७७७७७७७७॥७७७७॥७७॥७७७७७७७७७७एणएए्७७७७०७७७७७७७॒ार॑ारा॑ूणणशााााशााााआभा | कअ मम ललनलुल_ न, _भभ मतलब जकलजककीक रतन कक क कल क बी कककक अल कक लि नल मीन भा ईअ अमल बस 


चला गया ॥४०॥ हैं राजन | जो इस मोक्षा एकादशीको | जो कृप्णा एकादशी होती है ।। ४ | उसके माहएत्म्यको 
करता है उसके सब पाप नष्ट होजते हूँ. अन्त मोक्षुको | आप ध्यानपूवक सुनिय। हे राजन्‌ ! जो कही हुई एक्रा- 

















28 77% 6 20020 पट कस 0036 22020 ः 52: 5: गा का 22:52) श् 









चलाबटा 











प्राप्त करता हैं।। ४१ ॥ इससे अधिक कोई भी जुद्ध शुभ 
मोक्षकी देनवाली नहीं है, जिन्होंने इस एकाद्शीको किया 
है उनके पुण्यकी संख्या मे नहीं जान खकता कि, उनका 
पुण्य कितना बढ्ा है।| ४२ || इसके पढने और सुननेसे 
बाजपेयके फलकी प्राप्ति होती है,यह चिन्तामणिक्े बराबर 
है, स्वगे ओर मोक्षकी देनवाली है ।॥॥४३॥ यह श्रीत्रह्माण्ड - 


पुराणका कहा हुआ मागशीषशुक्लाकी मोक्षनाम्नी एक्ना- 


दृशीका माहात्म्य पूरा हुआ ॥ 

अब पोष कृष्ण एकादशी-युधिष्ठटिर बोले कि,पौष मही- 
नंकी कृष्णपक्षमम जो एकादशी है उसकी क्या विधि और 
क्या नाम है, कौनसे देवकी उसमें पूजा होती है ! ॥ १॥ 
इसको हैं प्रभो | आप कृपाकर विस्तारके साथ बताइये । 
भगवान्‌ बोले कि, हे राजन्‌ ! मे तुमारे स्तेहके कारण इसे 


ही 


कहता हूं २ | मुझ उन यज्ञोसि जिनमें कि, खूब दक्षिणा 


दी गुईं हों कोई खुशी नहीं होती जितनी कि, इस एका- 
दुह्ीके ब्रत्स होती है || ३ ॥ इसकिए हर एक अकारसे 
एकादशीका ब्रत करना चाहिय | हे राजन | पौषसासकी 
मल नस म जज 35 00: 0 मन 


दृशी हूँ | ५।॥| उन सबॉमें विकटय नहीं ऋरना चाहिए, 
इसके बाद पोष कृष्ण एकादशीको कहता हैँ । ६॥ सेस[- 
रकी कल्याणकी कामनास उसकी विधि भो कहूँगा, हैं 
नृपश्रेष्ठ | पोष कृष्ण एकादशीका नाम सझछा हैं ७॥ 
नारायण उसके अधिद्ठावा देव हैं, उसमें उतका प्रयत्ते 
साथ पूजन होना चाहिये, हे राजन! पहिले कही हुईं 
विधिसे एकादशी ब्रत होता चाहिए | ८ ॥ नागॉमें शेष, 
पक्षियोमें गरुड; यज्ञोमें अश्वमेंध, नदियोंमें जाहबी ॥%। 
देवोंमें विष्णु और मनुष्योमें ब्राह्मण श्रष्ठ है, उसी तरह 
सब ब्रतोंमें यह एकादशी ब्रत श्रेष्ठ हे ॥ १० ॥ हैं भरत 
श्रेष्ठ! जो मनुष्य सदा एकादशी करते हैं व मेरें 

पूज्य हैं | ११ ॥ विधवि--अब इस सफछा नामकी एंका- 
दृशीकी पूजाबिधि सुनिय | इसमें मुझे शुभ ऋतु फछॉसे 
पूज ॥१२॥ शुभ देशोत्पन्न नारियलछ,विजोरे, अनार,कमढा 
नींबू, छोंग, सुपारी ॥॥ १३॥ तथा अनेक तरहके आम 
आदि उत्तम उत्तम फलॉको मेरी भेट करे एवं धूप दीपादि 
पोडशोपचारसे मुझ देवदेवेश मगवानकी यथाक्रम पूजन 
करे ॥ १४ ॥ विशेषकर सफछा एकादशोकों दीप दरें 


१ अस्या। कथाया: । २ चामलकादिभिरित्यपि ऋत्ित्पाठ: ! 


॥ ताक 280 करा:5 ००४० क्या 2४५ 204/7 60347 78५, 3७००० ५०५४३ 80५५० ६. -34207:77- 0 कफ: ० निजी (२०८०।९८०००४४८ ८४:०० ५::/:07/75%,, 7:00 ४: 
7 4 | वकील न 


97% 0, पर 0 9 47820 2 वार मा 7, पाप व 2 या ता यह पंच व 02 30772 ,0 7200 /72:067% 007 कराए 75४६० इक ४ पर: ५ 275३ १८ श अरिश्मर ता हैं 
फल ललीत-4-न- 4+3तत-33+333->-ाकनका बनती ियन-क 3 +५+ पका ++:+>क 2० लीक न++-+-+4+५++५५-०>नहक। 





विशेषेण प्रकीतितम ॥ रात्रों जागरण तत्र कर्तव्य च प्रयत्नत) ॥ १५ ॥ यावदुन्मिषते नेत्र ताव 
ज्ञागर्ति यो निशि॥एकामप्रमानसो भृत्वा तस्य पृण्यफलं श्वणु ॥२८॥ नतत्समों नास्ति वे यज्ञस्तीथ 
तत्सदर्श न हि ॥ तत्सम न ब्रत॑ क्िंचिदिह लोके नराधिण॥? ॥। प्धव्धिसहस्माणि तपस्तप्त्वा 
यत्फलम्‌ ॥ तत्फल समवाप्नोति सफलाजागरेण वे ॥ १८॥ श्रूयतां राजशाईल सफलायाः 
कथानकम।चम्पावतीति विख्याता पुरी माहिष्मतस्थ च॥ १९ ॥ माहिष्मतस्य राज 
श्राभवन्सुताः ॥ तेषां मध्ये तु यो ज्येष्ठः स महापापसंयुतः ॥ २०॥ परदाराभिगामी च झत- 
वेशयारतः सदा ॥ पितुद्रव्यं स पापिष्ठो गमयामास स्वेशः ॥ २१॥ असदबत्तिरतों नित्य॑ 
देवताद्विजनिन्दकः॥वेष्णवाना च देवानां नित्यं निन्दारतः स वे ॥ २२ ॥ इंदग्विधं तदा दृष्टा पत्र 
माहिष्मतो नृप॥राज्यात्रिष्कासयामास छुम्पक नाम नामतः॥२३॥ राज्यात्रिष्कासितस्तेन पिच्ा 
चेवापि बन्धुमिः ॥ परिवारजनः सर्वेस्त्यक्तो राज्षो भयात्तदा॥ २४ ॥ लुम्पकोषपि तदा त्यक्त- 
श्रिग्तपवामास चेकलः ॥ मयात्र कि प्रकतंव्य त्यक्तेन पितृबान्धव: ॥२५॥ हाने चिम्तापरों भत्वा 
मति पापे तदाकरोत ॥ मया तु गमने काय वने त्यकत्वा पुरं पितु;॥ २६॥ तब्मादनात्वितः 
सब व्यापयिष्ये पुरं निशि ॥ दिवा वने चरिष्यामि राजावपि पितुः पुरे ॥२७॥ इत्येच स मर्तिं 
कृत्वा लुम्पको देवपातितः ॥ निर्जंगाम पुरात्तस्माद्रतोइसों गहन॑ वनम्‌ ॥ २८ ॥ जीवधानतकरो 
नित्य नित्य स्तेयपरायणः ॥ सब च नगर तन मुषित परपकर्मणा ॥ २९ ॥ ग्रहीनश एरिन्यक्तो 
लोके राज्षो भयात्तदा ॥ जन्मान्तरीयपापेन राज्यश्रष्ठ/ स पापकृत ॥ ३०॥ आमेषानिरतो 
नित्यं नित्यं वे फलभक्षकः ॥ आश्रमस्तस्य दुष्टस्य वासुद्वस्य संमतः ॥ ३१ ॥ अश्वत्थोीं वर्तेते 
तत्र जीर्णो बहुलवाषिकः ॥ देवत्वं तस्य वक्षस्थ वतते तद्ने महत्‌॥ ३२॥ तत्रेव स्यवस- 
च्ासों लुम्पकः पापबुद्धिमान्‌ ॥ एवं कालक्रमेणव वसतस्तस्य पापिनः ॥ ३३ ॥ दुष्कमनिर- 
तस्यथास्य कुबेतः कम निन्दितम ॥ पोषस्थ कृष्णपक्षे. तु प्वछ््मिन सफलादिनात ॥ ३४ ॥ 


माय आस, 0५20, पा च्कः 








| 
डरसे उसके सब परिवारने भी अपनेसे बाहर कर दिया 
॥२४॥ सबस परित्यक्त अकेछा लेपक भी सोचने छगा 


करना चाहिये । रात्रिमें प्रयस्नके साथ जागरण करे॥१५।॥ 
उस दिन जागरण करनेसे है राजन्‌ ! जो फल होता हें, 
उसको एकाम्र मन हो सुनो पर जबतक नेत्रोन्‍्मेष होता है | कि; मुझे सबने छोड दिया. अब में क्‍या करूँ 7॥ रष्प 
तबतक जगता ही रहना होता है ॥ १६ ॥ है राजन | | इस प्रकार चिन्ता करके उस समय उसने अपनी बुद्धि 
उससे अधिक कोई यज्ञ, तीर्थ या उत्तम ब्रत नहीं है, न | मे की कि, मुझ पिताका पुर छोडकर वनमें गमनकरना 
रसके बराबरका ही कोई है ॥ १७॥ पाच हजार वर्षतक | है कर हक हक _क हलक 8५३ 
| , रहूगां 
की जो फल अत होता है वह इस एक सर्फेछाके | ॥ २७ ॥ दुवसे गिराया गया छुपक इस प्रकार विचार 
रणस ही प्राप्त हो जाता है ॥ १८॥ हे राजश्रेप्ठ कक 


| करके उस्र परसे गहन बनमें चला गया 
उस सफलाकी कथा सन्तो | चम्पावती सामकी प्रसिद्धनगरी 3 


भारी पापी था परख्रीगामी, ज्वारी तथा बंश्या- 
घक्त या ।२१५ 
नष्ट कर दिया था, देवताओंकी ब्राह्मणोंकी निनन्‍दा करना 


और कुसइूसें रहना आदि उसका मुख्य काम था ॥ २२ || 


र्‌ ८9 


तामे छुम्पक था, उस राज्यस बाहर निकारू दिया ॥२३ 
उसको उसके पिताने तथा अन्य बन्धुओंने तथा राजाके 


| करते पकडा पर राजाके ढरसे छोड दिया | ३० 
उस पापिएने अपने पिताके सब घनको 
| का आश्रम जो था वह वासुदेवके समत था 
| बहुत वर्षोका पुराना एक जीण अश्वत्थ था उस वन 
भाहिष्मत राजान अपने ऐसे छूडकेको देखकर जिसकाकि | 
| छुम्पक इस प्रकार वहां रह रहा था इसी प्रकार रहते हुए 
। उस पापीको || ३३ | दुष्कर्मोमें छगे हुए एवं निन्दितकम 





| ही जीवह॒त्या ओर चोरी किया करता था, उस पापीने 


* साहिप्मद नामक राजाकी राजधानी थी ॥ १९ ॥ उस | सारे शहरकी चोरी की ॥ २९ ॥ जन्‍्मान्तरीय पापोंसे वो 


राजधिक चार पुत्र थे, जिसमें सबसे बडा छडका वडा | 


पापी राज्यसे श्रष्ट तो होही गया था छोगोंने उसे चोरी 
वो 
रोज फल और मांस खाकर गुजारा करता था पर उस दुष्ट 
३१ ॥ उसमें 
पापी 


उस वृक्षकों बडा देवत्व दीखता था ॥३२ 


१ प्रदापयदित्यपिपाठः | 


शअ्रलराज३। 









( ४०४ ) [ एकादशी- 


दशमीदिवसे राजन्निशायां शीतपीडितः ॥ हुम्पको वस्वहीनों वे निश्चेष्टो हामवत्तदा 
॥ ३५ ॥ पीडयमानस्तु शीतेन अश्वत्थस्थ समीपगः॥ न निद्रा न खुख॑ तस्य गतप्राण इवा- 
भवत्‌ ॥ ३६ ॥ पीडयन्दशनेदन्तानेव सोइगमयत्रिशाम्‌ ॥ भान्‌दयेए्पि तस्याथ न संज्ञा सम- 
जायत ॥ ३७ ॥ हुम्पको गतसंज्ञस्त्‌ सफलादिवसे ततः ॥ मध्याहसमये प्राप्ते संज्ञां लेप स 
पार्थिव ॥ ३८ ॥ प्रातसंज्ञो मुहर्तेन चोत्यितोसों तदासनात्‌॥ अस्खलंश्व पदन्‍्यास्रे पह्गुवच्न- 
लितो झुह्ु! | रे६ ॥ वनमध्ये गतस्तत्र क्षत्ृपापीडितोई्मवत्‌ ॥ न शक्तिजावधातेप्य 
ल॒ुप्पकस्य दुरात्मनः ॥ ४० ॥ फलानि भूमो पतितान्याहत्य च स लुपकः॥ यावत्स चागतस्तप्र 
तावदस्तमगाद्रवि॥४१॥कि भविष्यति तातेति विछलापातिह/खितः ॥ फलानि तानि सर्वाणि 
वृक्षमूले निवेदयन्‌ ॥ ४२ ॥ इत्युवाच फलेरेपिः प्रीयतां भगवान्‌ हरिः ॥ उपविष्टो लेपकश 
निद्रां लेने न वे निशि ॥ ४३ ॥ तेन जागरण मेने भगवान्मघुसूदनः ॥ फलेश्व पूजन मेने 
सफलायाँ तथानघ ॥ ४४ ॥ कृतमेव॑ हुंपकेन ह्यकस्माद्रतम॒त्तमम्‌ ॥ तेन व्रतप्रभावेण प्राप्त 
राज्यमकण्टकूम्‌ ॥४५॥ पुण्याइकुरोदयाद्राजन्‌ यथाप्राप्त तथा श्रणु ॥ रवेरूदयवेलायां दिव्योड- 
श्राजजाम ह ॥ ४६॥ दिव्यवस्तुपरीवारों छुंपकस्य समीपतः॥ तस्थों स तरगो राज 
वाग॒वाचाशरीरिणाम्‌ । ४७ ॥ प्रोप्ठहि त्व॑ तृपसुत स्वराज्य हतकण्टकम्‌ ।। वाहुदेवप्रसा- 
देन सफलाया; प्रभावतः ॥ ४८ ॥ पितुः समीप गच्छ त्वं झ्ुक्ष्व राज्यमकण्टकम ॥। तथेत्युक्त्वा 
त्वसौं तत्र द्व्यरूपधरोःभवत्‌ ॥ ४९॥ कृष्णे मतिश्व तस्यासीत्परमा वेष्णबी तथा ॥ दिव्या- 
भरणशोभाटचस्तात॑ नत्वा स्थितो गहे ॥ ५० ॥ वेष्णबाय ततो दत्त पिनत्रा राज्यमकण्टकम्‌॥ 
कृतं राज्यं तु तेनेव व्षाणि खुबहूस्यपि ॥५१॥ हरिवासरसंलीनो विष्णुभक्तिरतः सदा ॥ मनो- 
ज्ञास्त्वस्थ पुत्राः स्थुदाराः कृष्णमसादतः ।। ५२॥ ततः स वारह्/के प्राप्ते राज्य॑ पुत्रे निवेश्य च॥ 
वन गतः संयतात्मा विष्णुभक्तिपरायणः ॥ ५३ ॥ साधयित्वा तथात्मानं विष्णुलोक॑ जगाम 








लरते हुये पोष-कृष्ण सफलाके पहिले दिन ॥ ३४॥ हे 
राजन्‌ . शीतने अत्यन्त वाधा दी, लछुम्पक वस्त्र हीन था 
अतः सरदीका मारा बेहोश हो गया || ३५॥ वो झीतसे 
पाडित हो अश्वत्थके समीप निष्प्राणसा हो गया उसे नींद 
का सुख तो था हीं कहां ॥ ३६॥ दांतसे दांव बजवे थे 
ऐसे ही उसने रात बितादी, सूय्येके निकछनेपर भी उसे 
चेतना नहीं हुईं || ३७ ॥ द्वोते होते हे राजन्‌ ! उसे मध्याह 
का समय होगया पर चेत नहीं हुआ, जिस दिन वो इस 
प्रकार बेहोश था उस दिन सफछा एकादशी थी ॥ ३८ ॥ 
एक झुह्तमें उसे संज्ञा हुईं तब आसनसे उठा छडखडाता 
पॉगलेकी तरह बार॒बार चलने छगा || ३९॥ वनमें था ही 
भूख प्यासने व्याकु किया पर उस दुरात्मा छम्पककों 
इतनी भी शक्ति नहीं रही कि, जीव तो मारले॥ ४० ॥ 
भूमिमें पड़े हुये फछोंको उठाकर जबतक आया तब तक 
सूख्येदेव छिप गये. हा तात ! आज कया होगा ? ऐसा कह 
कर दुखी हो रोने छगा. वे सब फल वृक्षकी जड॒में रख 
दिया ३ ४९ ॥ ४२ ॥| और कहा कि, इससे सगवानपसन्न 
हम ही बेंठ गया उस रातको भी नींद न ले सका 
भगवान्‌. सधुसूदनने उसे अपने ब्रतका 


जागरण साता एवं फलोंस सफलाके ब्रतका पूजन 


समझा ॥ ४४ ॥ लुम्पकने अकस्मात्‌ उत्तम ब्रत कर दिया 
उसी ब्रतके प्रभावस उसे निष्कृण्टक राज्य मिल गया 
॥ ४५ ॥ हैं राजन ! उसी पुण्यके अकुरसे जेसे राज्यपाया 
उसे सुन, सूय्यके उदय होते ही एक दिव्य अश्व आ उप" 
स्थित हुआ || ४६ ॥| उसका छवादर्मां सबही दिव्य था वो 
छुम्पक्के समीप खडा होगया, उसी समय आकाशवाणी 
हुईं।। ४७ ॥ कि, है राजकुपार ! सफछाके प्रभावसे भग- 
वान वसुद्वके प्रसन्न होनेसेआप अनेक राज्यके निष्कण्टक 
राजा बनें ॥ ४८ ॥ तू अपने पिवाके समीप जाकर निःस" 
पत्न राज्यका भोग कर आकाशवाणीके इस प्रकार कहने 
के बाद वो ढुम्पक दिव्य देहघारी होगया॥ ४९॥ ढ्ृप्ण 
में भक्ति तथा परम वैष्णवी बुद्धि होगई । अनेक प्रकार्य 
अलेकारोंके साथ अपने पिताकों प्रणामकर जपने परम 
रहने छगा ॥ ५० ॥ पिताने भी उस वेंष्णव पुत्रकों राज्य 
दे दिया। इस प्रकार उसके अनेकवर्ष राज्य किया ॥%॥ 
हंरिवासरमें उसकी सदा ग्रीति रही तथा क्ृष्णभगवावकी 
कृपासे उसके ख्री, पुत्र भी बहुत सुन्दर थे ॥ ५२॥ वह 
अपनी वृद्धावस्थाके ग्राप्त होनेपर राज्यको पुत्रपर 

यतात्मा विप्णुभक्ति परायण हो वनमें चला गया 
॥ ५३ ॥ स्वये भी अन्तमें आत्माकों सिद्ध करके विष्यु 
छोकमें गया | इस प्रकार जो छोग इस सफडा नाभकी 


श्तानि, ] भाषाटीकासमेलः । ( ४०५ ) 








ह॥ एवं ये वे मकुबन्ति सफलेकादशीबत्रतम्‌ ॥ ५४॥ इह लोके यशः प्राप्य मोक्ष यास्य- 
व्यसंशयम्‌ ॥ पन्यास्ते मानवा लोके सफलात्रनकारिण/।«5पा। तस्मिज्रन्मनि ते मोक्ष लभम्ते 
नात्र संशयः ॥ सफलायाश्व माहात्म्यश्रवणाद्धि विशांपते।॥ राजसूयफल प्राप्य वसेत्स्व्गे 
च मानवः ॥ ५६ ॥ इति पोषकृष्णकादइया। सफलानाम्न्या माहात्म्य॑ संपूर्णम ॥ 
अथ पोयशुक्ककरादशीकथः ॥| 

युधिष्टिर उवाच ॥ कथिता वे त्वया कृष्ण सफलेकादशी शुभा॥ कथयरूव प्रसादेन शुक्का 
पौषस्य या भवेत्‌ ॥ १ ॥ किनाम को विधिस्तस्थाः को देवस्तत्र पृज्यते॥ कस्मे त्ठो हृपी- 
केश त्वमेव पुरुषोत्तम ॥ २॥ श्रीकृष्ण उबाच ॥ श्रणु राजन्‌ प्रवक्ष्यामि शुक्ला पोषस्य या 
भवेत्‌ ॥ तस्या विधिं महारान लोकानां च हिताय बे ॥ ३॥ प्ूर्वण विधिना राजन कत॑- 
व्येषा प्रथत्नतः ॥ पुत्रदेति च नाम्नासों सर्वपापहरा बरा ॥ ४ ॥ नारामणो5विदेवोउस्थाः कामदः 
सिद्धिदायकः ॥ नातःपरतरा काचित्रेलोक्ये सचराचरे॥ ५ ॥ विद्यावन्त यशस्वन्त॑ लक्ष्मी 
वन्‍्तं करोत्यसों ॥ शरण राजन प्रवक्ष्यामि कथां पापहरां पराम्‌ ॥ ६॥ पुरी भद्गावती नाम्नी 
राजा तत्र सुकेंतुमाव्‌ ॥ तस्य राज्ञोप्थ राक्षी च शेब्या नाम्नीति विश्वता॥ ७॥ पुत्रहीनेन 
राज्ञा च कालो नीतो मनोरथेः ॥ नेवात्मज नूपो लेमे वंशकर्तारमेव च॥ <॥ तेनेव राक्षा 
धर्मेंण चिन्तितं बहुकालतः॥ कि करोमि कक गच्छामि सुतप्रातिः कर्थ भवेत ॥ ९॥ न राष्ट्रे 
न पुरे सौख्य लेभे राजा सुकेतुमान्‌ ॥ शेब्यया कान्‍्तया सा भत्यहं दुःखितोइमवत्‌ ॥ १०॥ 
तावुभों दम्पती नित्य चिन्ताशोकपरायणों ॥ पितरोष्स्य जल दत्त कवोष्णमुपश्ुुखते॥ राकज्ञः 
पश्चात्र पदयामों योपस्माव्‌ संतर्पय्िष्यति॥ २१ ॥ इत्येवं संस्मरन्तो5स्य पितरों ढुःखिनोंउभवन॥ 
न बान्चवा न मित्राणि नामात्या; खुहदस्तथा ॥ १२॥ रोचसन्ते तस्य भूपस्य न गजाखपदा- 
तयः ॥ नेराहय भूपतेस्तस्थ मनस्येवमजायत ॥ १३ ॥ नरस्य पुत्रहीनस्य नाघ्ति वे जन्मतः 
फलम्‌ 8 अपुत्रस्थ गई शून्य हृदयं दुःखितं खदा ॥ १४ ॥ पितृदेवमल॒ष्याणां नानृगित्व॑ 


000 अकबर 





एकऋादशीका त्रत या जागरण करते ह ॥5४8॥ बे इस हो कमें जगतमैं इससे उत्तम और कोई एकादशी नहीं है ॥॥७।॥ यह 
ह है पाकर अन्तर्मे सोक्ष प्राप्त करते है इस में सन्देह नहीं हूँ | विद्या, यश और छक्ष्मीवाला बनाती है। हे राजन्‌ ! इसकी 

र॒ वे छोग धन्य हैं जो सफला त्रत करते हैं । ५५ || वे | पापहारिणी कथाको सुनिये में, कहता हूँ ॥ ६ ॥ भद्गावती 
छोग उस जन्‍्ममे मोक्ष पाते हैं इसमें सन्दंह नहीं है। तथा 


आता ७, पैक. ऋ ७ अर, 
है | पुरीमें सुकेतुमान राजा था; उसकी शव्यानामछो प्रसिद्ध 
है राजन्‌ | इसके माहात्म्यकोभी सुनकरके राजसूय यज्ञके हक फीि | 


बे बा पं गा रानी थी ॥७॥| उसके कोई सनन्‍्तान न थी. पुत्रद्दीन राजाने 
दा पाकर स्व चले जाते हूँ ॥५६॥ अर पॉष कृप्णाकी | अपना बहुत समय मनोरथोंसे नष्ट करदिया पर वंशकर्ता 
! नामकी एकादशीका साहात्म्य पूरा हुआ ॥। पुत्र उत्पन्न न हुआ ॥|८॥| उसने घमंस बहुत समयतक बड़ी 


पौष शुक्ला एकादशी-युधिप्ठिर बोले कि, महाराज ! | चिन्ता की वे दोनों राजा रानी रात दिन इसी चिन्तामें 


भापन बडी कृपाकरके सफलाकी कथा घुनाई. अब पोष | (प्मग्न रहने छगे । पितर लोगभी इसी चिन्तामें उसके दिये 
अदला एकाद शीकी कथा ओर विधिकों सुनाइय है| १ उसका । हुये जलका गुनगुना भोग करते लग [९| | कि, पितर लोग ै 


ञं रे ख्ि पर 8 3 *७ 
गम का है, शौक देय के एन चोसनेकने लि राजले बाद मोर कोन हू जो इस 
सपर प्रसन्न हुये थे ! ॥ २ ॥ श्रीकृष्णचन्द्र बोढे कि, हे | रंग करे; इस कारण इसका दिया हुआ शुनगुना पिया जा 
राजन्‌ ! पौषकी जो एकादशी होती है हे महाराज ! संसा- | दा है| १० | उस राजाकी बन्छु, मित्र, मंत्री, हाथी, 
रके कल्याणके छिये उसे और उसझही विधिभी साथ कहता | घोड़े आदि कुछभी प्रिय नहीं मालूम होते थे । उस राजाके 
हूँ |३॥ है राजन ! पहिले कही हुईं विधिसे प्रयत्तनके साथ | मैन चेडी निराशा उत्पन्न हुई ॥ १३॥ और विचार 
यह करनी चाहिये, इसका नाम पुत्रदा है सब पापोंको | ऊरने लगा कि, पुत्रहीन मनुप्यके जन्मका कोई फल नहीं 
न है तथा उसका घर शून्य है हृदय सदाही दुःखी है ॥१४५ 


इरनेवाली हैं ॥ ४ ॥ इसके अधिष्ठाता देव कामनाको पूरी 
छरते वाले गिजिलॉसगाका जाग याउारात लें । उस्प सारा | पिलर- ठेंव, मनप्योंका ऋण तबतक नहीं छटता जवतक 








बलराज: । | एकादशी- 
खुत॑ विना॥ तस्मात्सवेप्रथत्नेन सुतसुत्पादयेन्नरः॥ २१५ ॥ इहलोके यशस्तेषां परलोके 
शुभा गतिः ॥ येषां तु पुण्यकतृणां पुत्रजन्म गृहे भवेत्‌ ॥ १६॥ आपुरारोग्यसंपत्तिस्तेषां गेहे 
अवतंते ॥ पुत्राः पोत्राश्व लोकाश्व भवेयुः पुण्यकमंणाम्‌ ॥ १७ ॥ पुण्य बिना न च प्रात्तिविष्णु- 
भक्ति बिना तथा ॥ पुत्राणां संपदो वापि विद्याघाश्वेति मे मतिः ॥ १८ ॥ एवं चिन्तयमानोपौ 
राजा शर्म न लब्धवान्‌ ॥ पत्यूषे४चिन्तयद्राजा निशीयेषचिन्तयत्तथा ॥ १९ ॥ ततश्वात्मविनाशं 
व विचायांथ खुकेतुमाव्‌ ॥ आत्मघाते हुर्गातिं च चिन्तयित्वा तदा नृपः॥ २०॥ हइृष्ठास्मदेहं 
प्रक्षीणमपुत्रत्व॑ तथेव च ॥ पुनर्विचायांत्मबुद्धचा हात्मनो हितकारणम्‌ ॥ २१ ॥ अश्वारूठस्ततो 
राजा जगाम गहन वनम्‌॥ पुरोहितादयः सर्वे न जानत्ति गत॑ नृपम्‌ ॥ २२ ॥ गम्भीर विपिन 
राजा मृगपक्षिनिषेविते ॥ विचचार तदा तस्मिन्बनवृक्षान्विलोकयन ॥ २३॥ वटानश्वत्यवि- 
ल्वांश्व खजूरानपनर्सास्तथा ॥ बकुलांश्व सदापणोस्तिन्दुकांस्तिलकानपि ॥ २४ ॥ शाहांस्ताहां- 
स्तमालांश्व ददश सरलाच्नपः ॥ इड्जुदीककुमांश्रेव छेष्मातकविभीतकान्‌ ॥२५॥ शह्॒कीकर- 
मदांश्व पाटलान्‌ खद्रिानपे॥ शाकांश्वेव पलाशांश्व शोभितान्‌ ददशे पुनः॥ २६॥ मृगव्या- 
प्रवराहांश्व सिहाज्शाखामृगानपि ॥ गवयान्‌ कृष्णसारांश्व सगालाब्शशकानपि ॥ २७ ॥ बन- 
माजारकान्‌ क़्राज्शकृकांश्रमरानापि ॥ ददर्श शुजगान्‌ राजा वल्मीकादमिनिःझतान्‌॥ २८॥ 
तथा वनगजान्मत्तानकलभः सह संगतान्‌॥ यूथपांश्व चतुर्दन्तान्करिणीगणमध्यगान्‌ ॥ २९॥ 
तान्‌ दृष्ठा चिनन्‍्तयामास ह्ात्मनः स गजाननूप/॥तेषां स विचरन्मध्ये राजा शोमामवाप ह॥३०॥ 
महदाश्चर्यसंय॒क्त ददर्श विपिन॑ तृपः ॥ क्चिच्छिवारुतं ऋण्वन्तुझूकविरुतं तथा ॥३१॥ तांस्तार 

क्षिमुगान्‌ पश्यन्वश्नाम वनमध्यगः ॥ एवं ददछो गहने नृपो मध्यंगते रवौ॥ ३२॥ शक्षुत्ृद्ठभ्यां 
पीडितो राजा इतश्रेतश्व धावति ॥ चित्तयामास नृपतिः संशुष्कगलकन्धरः ॥ ३३ ॥ मया तु 
कि कृत कम आतं हःखं यदीदशम्‌ ॥ मया वे तोबिता देवा यज्ञेः पूजामिरिव च ॥ ३४॥ तथेव 





कि, पुत्र न हो; इस छिय पुत्र सब तरहसे उत्पन्न करना 


चाहिये ॥ १०५॥ जिन पुण्यात्माओंके घरम पुत्रका जन्म | 
होता हे उनको इस लोकमें यश और परलोकमें शुभगति | 
प्राप्त होती है ।। १६ ॥ उसके घरमें आयु, आरोग्य और | 
सम्पत्ति नित्य रहती है। पुण्यवान छोगोंकोही पुत्र पौत्रोंकी | 
प्राप्ति होती है।। १७ ॥ बिना पुण्य और विष्णुभक्तिक्के पुत्र | 7 जे > 

है कक #... ७ | उसके देखनमे आये॥ २८ ॥ अपने छोटे २ बच्चोंके साथ 
सम्पत्ति और विद्या नहीं श्राप्त होती यह मेरा निश्चय है| <सने वनके हाथी तथा मत्त हाथी देखे, एवम्‌ हथिनियोंके 


(१८।॥ इस प्रकार वह राजा रात दिन प्रातः तथा आधीरात 


जब देखो तव सुख न पासका एवम्‌ ॥१९॥ चिन्ता करता | 


हा रत ६९ कक हक 
हुआ अपनी आत्माघातकी हुबुद्धि करने गा पर आत्मघा. | बीच घूमते हुए उसने परमशोभा पाईं।॥ ३० ॥ राजाने 


रे करो | बड़े आश्रयेके साथ उस वनको देखा, कभी गाँघुआओंकी 
पुत्रहीन देखकर फिर बुद्धिसे अपने हिंतकी बात विचार 


लमे उसे दुरगति देखी || २० ॥ अपने शरीर हो दुर्बल तथा 


॥२१॥ घोडेपर चढ एक निर्जन जंगछूमें चला गया। इस 
घाचकी खबर उसके किसी मंत्री पुरोहित आदिको भी न 
..  & चन जेगली जानवरोंके अन्दर वनके वृक्षोंको 


5 बता हुआ विचरने छगा ॥२श॥ फिर अनेक प्रकारक वड, 
प्रीपक $ नेक, 





“बेर कटइछ; मौछसरी, 'सदापर्ण, लिंदुक, 


तिलक ॥२४॥ शाढहू) ताछू, तमाछ, सरछ, इंगुदी, शीशम, 
बहेडा, टिड्सोढा, विभीतक ।।२५।॥ शहकी), करों दा, सौठी 
ि्प [दि ५. न, 

खेर, शारू और पछाश आदिके सुन्द्र वृक्षों क्रो उसने देखा 
॥ २६ || तथा झृग) व्यान्न, चसिंह बराह, बन्दर, गवय। 
श्रगालछ) शशक || २७ ॥ वनविछाव एवं क्र शहक और 
चमर भी उप्तने देखे तथा बॉमीसे निकछते हुए सौंप भी 


बीचम उपस्थित चतुदन्त यूथनाथ भी देख ॥ २५९ ॥ उन्हे 


| देख वो उन हाथियोंको और अपनको झोचने छगा उनके 


हृहू सुनी तो कभी उल्लकी घू घू सुनी |।३१॥ उन्हें देखवा 


| सुदता तथा उन पक्षि सगोंको देखता वनमें घूमने छगा, 


हुईं 0२२ किक 2 न | राजा सध्याह्ृतक इसी-तरह वनको देखता रहा।॥ हे | 
हर । बहू उस शून्य जगलरूमें जिसमें कि, वन्य पशुस 


इधर उधर घूमते फिरते भूखप्यास ज्यादा सबाने लगीं, कैठ 


| सूख गया एसी दशामें सोचनेछगा ॥३३॥ कि, मैंने ऐसा 
| कौनसा पाप किया था जिससे मुझे ऐसा दुःख मिला; मे 
, यज्ञ और पूजासे देवता संतुष्ट किये थे |, ३४ !| इसी तर 


बतानि | भाषाटीकासमेलः 





ह्गा दानेघ्तोषिता मृट्टनोजनेः ॥ प्रजश्वेव यथाकाल पुत्रवन्परिपालिताः ॥ ३५ ॥ कस्मा- 
हःखें मया प्रातमीदर्श दारूुण महत्‌ ॥ इति चिन्तापरो राजा जगामाथाग्रतो वनम ॥ ३६ ॥ 
सुकतस्प प्रभावेण सरो दृष्ट मनोरमम्‌ ॥ मानसेन स्पद्ध॑ माने पद्चितीपरिशोमितम ॥ ३७ ॥ कार- 
ण्डवश्वक्रवाके राजहेसेश्व नादितम्‌॥ मकरेबेहुमिमत्स्यरस्ये न लचरेयुतम ॥ ३८ ॥ समीपे सरस- 
स्‍्तत्र मुनीनामाश्रमान्‌ बहून्‌ू ॥ ददश राजा लक्ष्मीवाब्रिमित्ते: शुभशसित्रिः ॥ ३५ ॥ सत्यात्पर- 
तरं चक्षुरपसव्यघ्तथा करः ॥ प्रास्फुरत्रपतेस्तस्थ कथयच्शोभन फलम ॥ ४० ॥ तस्य तीरे 
मुंनीन्‌ दृष्ठा कुवाणान्नंग्म जपम्‌ ॥ अवतीय हयात्तस्मान्मुनीनामग्रतः स्थित:॥ ४१ ॥ प्रथक्‌ 
पृथग्वबन्दे स सुर्नीस्तान संशितव्रतान्‌ ॥ कृताअलिपुटो भूत्वा दण्डवच्च प्रणम्य सः ॥ ४२ ॥ 
ह्षेण महताविष्टो बभूूव नृपसत्तमः ॥ तमृचुस्तेषपि मुनयः प्रसन्नाः सस्‍्मो व तव ॥ ४३ 

कंथयस्वाद्य वे राजन्यत्ते मनसि वतते ॥ राजोबाच ॥ के यूयमुग्रतपसः का आख्या भवता- 
मपि ॥ ४४ ॥ क्िमथ सड़ता यूये वदन्तु मम तत्वतः ॥ सुनय ऊचुः ॥ विश्वेदेवा वर्य राजन 
ल्ानाथॉमेह चागताः ॥ ४५॥ माघो निकटमायात एतस्मात्पमेडाने॥ अद्य ह्ोेकादशी 
राजन पुत्रदा नाम नामतः॥ ४६ ॥ पुत्र ददात्यसों शुक्ला पुत्रदा पुत्रमिच्छताम ॥ राजोबाच 

ममापि यत्नों सुनयः खुतस्योत्पादने महान्‌ ॥ ४७७ ॥ यदि तुष्ा मवन्‍्तों मे पुत्रों वे दीयतां 
शुभः ॥ मुनय उऊचु।॥ अध्मिन्नेव दिने राजन पुत्रदा नाम वतेते ॥४८॥ एकादशी तिथिः ख्याता 
क्रियर्ता ब्रतमुतमम्‌ ॥ आशीवांदेन चास्माक केशवस्य प्रसादतः ॥ ४९ ॥ अवश्य तव राजेर 

पुत्रप्तातिभविष्यति ॥ इत्येवं वचनात्तेषां कृतं राज्ञा ब्रतं शुभम ॥ ५० ॥ द्ादश्यां पारणं कृत्वा 
मुनीन्नत्वा पुनः पुनः ॥ आजगाम ग्रह राजा राज्षी गम समादधे॥५१।मुनीनां वचनेनेव पुत्रदायाः 
प्रसादतः ॥ पुंत्रो जातस्तथा काले तेजस्वी पुण्यकमकत ॥ ५२ ॥ पितरं तोषयामास अजापालो 
बभूव सः॥ एतस्मात्कारणाद्राजन्कृतंव्यं पुत्रदात्तम्‌ ॥ ५३ ॥ छोकानां च हिताथांय तबाग्रे 
काथते मया ॥ एतद्भतं तु ये मत्योः कुवेन्ति पु्दाभिषम्‌ ॥५४॥ पुत्र माप्येह लोके तु म्तास्ते 
कट; 6 ल उबर कस 6 22 657 <ट पद डर ए> कि: बपप र पक कसी लए पक ।+प तक लि 4 कि ३ लिवर कम सिर 


हलके जननी -कित-ननमनत 5 अण»++नननन 


ब्राह्मण भी मिष्टान्न भोजन ओर दक्षिणासे प्रसन्न किये थे | यह यथाथेरूपसे कृहिय । मुनियोन उत्तर दिया, है राजन्‌ 


ः | हमछोग विश्वेदृवा हैं; स्नानकेवास्ते यहांरर आना हुआ है 
मुझ यह इतना बडा भारी दुःख क्यों मिछा ! चह्‌ चिन्ता |॥ ४७ ॥ ४५॥ माघ निकट आगया हैं और आजसे पांचवें 
| दिन छग जायगा,आज पुत्रदा नामकछी एकादशी हूँ ॥४६॥ 


| यह्‌ शुद्दी पुत्रकी इच्छा करनवाले लोगों ढोपुत्र प्रदान करती 
स्पर्धा करता हो इतना सुन्दर था कमलिनियोंस सब ओरसे | है 


| उसमें कारण्डंव; चक्रराक और राज- | 


और प्रजाका भी पुत्रकी तरह पालन किया हैँ ॥ ३५॥ 


करता हुआ वनमें और भी अगाडी चला ॥ ३६ ॥ राजाते 
छुकृतके प्रभावस एक सुन्दर सरोवर देखा,मानससरोवरसे 


गेभित था 
हँस वोल रहे थे उसमें बहुतसें मगर मच्छ एवं दूसरे जलू 


इृष्टिगोचर हुए, वे सब शुभशसी निमिश्तोंके साथ लक्ष्मी 
वान्‌ राजाने दख ॥३९।॥ दाहिना नत्र और हाथ फडकने 


लगा, इनका स्फरन अच्छा होता है | ४० ॥ उसके किनारे 


पुनिछोग गायत्री जप कर रहे थे, राजा घोडेसे उतरकर 
उनके अगाडी खड़ा हो गया ॥४१॥ द्वाथ जोडकर उत्त 
सब प्रशरत ब्रतवाले मुनियोंके चरणोंमें अक्गअछूग दण्डवत 
प्रणाम की ॥४२॥ अ्रष्ठ राजा बडा प्रसन्न हुआ और मुनि 
लोगभी राजाको देखकर प्रसन्न हो बोले कि, हम प्रसन्न हैं 


राज़ान कहा कि, महाराज लपेश्वरी आप छोग भी कौन हो 
स्या ताम है तथा यहां क्यों और किसलिय एकत्रित हुए हो 





हैं। राजाने कहा कि, महाराज मुनिराज ! मरभी पुत्रक 
उत्पन्न करनेके लिय महान प्रयत्त हैँ ॥ ४७७ ॥ याँदे आप 


 मुझपर प्रसन्न हैं तो मुझेमी पुत्र दे दीजिये. मुनि बोछे कि, 
चर थ।॥ ३८॥ उसके पासही बहुतस ऋषि आश्रम भी।| 


है राजन । आजही पुत्रदा एकादशी हैं इसछिय तुम्दार 


| घरमें इसके उत्तम ब्रवके करनसे भगवानकी कृपास तथा 
| हमारे आशीर्वाइसे ।।2८॥४९॥ अवश्य पुत्र उत्पन्न होगा। 


यह सुन राजाने उनके वचरनोंसे सच्चा त्रव किया ॥ ५० ॥ 


 द्वादशीके दिन राजाने पारणा की, पीछे मुनिर्योको प्रणास 
| करके घर आया, रानी गर्भवती होगईं ॥५१॥ उस राजाक 
। घरमें मुनियोंक वचनसे ओर इस पुत्रदा नामकी एकादशी 

| की क़पासे बडा तेजस्वी ओर पुण्यात्मा पुत्र समयपर उत्पन्न 
| हुआ ॥५२॥ उसने पितठृगणोंका सनन्‍्तोषकर प्रजाकी पाछना 
४३॥ जो तेरे मनर्म हो, वो अब मांग ले, यह सुन ' 
' मेने तुम्हारे सामन छोकहिंतकी कामनास इस पुत्रदानामकी 


की। इसलिये है राजन ! पुत्रदाका त्रत करना चाहिय।।५३॥ 


एकादशीकी कभ!' वर्णन की हे।जो मतयहस पुत्दानाम | 






(४०८ ) [ एकादशौ- 














स्वर्गगामिनः ॥ पठनाच्छूवणाद्राजन्नश्वमेघफल लभ्नेत्‌ ॥ ५५॥ इते श्रीभविष्योत्तरपुराणे पौष 
शुक्केकादइयाः पुत्रदानाम्त्या माहात्म्य॑ संपूर्ण ॥ . 
अथ माधघइष्णे द्वाद शी इथा ॥| 
५ ७ $ कह फ &े 35 दि श्व्‌ 
दाल्भ्य उवाच ॥ मरत्यलोके तु संप्राप्ता3 पाप कुबान्ति जन्तवः ॥ बहाहत्यात्पिपेश्च हास्येश् 
कि ९ ६ $ ध 

विविधेर्दताः ॥ १ ॥ परद्वव्यापहर्तारः परव्यसतमोहिताः ॥ कर्थ नायात्ति नरकान्वह्म॑स्तदूवहि 
तत्वतः ॥ २।' अनायासेन भगवन्‌ दानेनाल्‍पेन केनचित्‌॥ पाप प्रशममायाति येन तद्वकतु- 


_ महंसि ॥१॥ पुलघ्त्य उवाच ॥ साधु साथु महामभाग गह्म मेतत्छुदुले प्रम॥ यत्न कस्यविदास्यात॑ 


ब्रह्मविष्ण्विन्द्रदेवतेः ॥ ४ ॥ तद॒ह कथायष्यानि त्वया पृष्टो द्विजोत्तम । पौषमासे तु संग्रापे शुद्ि 
लातो जितन्द्रियः ॥ ५ ॥ कामक्रोधामनिमानेष्यालोमपेशुन्यवजितः ॥ देवदेवं च सस्म्ृत्य पादौ 
प्रक्षाल्य वारिणा ॥ ६॥ पुष्यक्ष॑ण तु संग्रृह्य गोमये तत्र मानवः॥ तिलाम्प्रक्षिप्य कार्पास॑ 
पिण्डकांब्रिव कारयेत्‌ ॥ ७॥ अट्टोत्तरशतं होमो नात्र कार्या विचारणा ॥ माघमासे तु सम्राप्ते 
ह्याषाठक्षे भवेद्यद्दि ॥ ८ ॥ मूल वा कृष्णवक्षस्प द्वाइइयां नियम ततः ॥ गह्दीयात्युण्यफलई 
विधान तह्य में शुण ॥९॥ देवदेव॑ समम्यर्च खुल्तातः प्रयथतः शुत्िः ॥ कृष्णनामाति 
संकीत्ये एकाइइ्यारुपोषितः ॥ १० ॥ रात्रों जागरण कुर्याद्रात्री होम॑ं च कारयेत्‌ ॥ अचगेदु- 
देवदेवशं द्वितीयेद्धि पुनहरिमू ॥११॥ चरदनागुरुकर्ूरेनेबेदं कूखरं तथा ॥ संस्तुत्य नाम्ना 
तेनैव कृष्णाख्येन पुनः पुन; ॥ १२ ॥ कृष्म/ण्डेनारिकेलेव हाथवा बीजप्रकेः ॥ सर्वानावेतु 
विप्रेन्द्र शस्तपूगीफलेयुतम्‌ ॥ १३ ॥ अध्थ दद्याद्विवानेन पूजवित्वा जनादनम्‌ ॥ कृष्ण कृष्ण 
कृपालस्त्वमगतीनां गतिभव ॥ १४ ॥ संसाराणेवमम्नानां प्रसीद परमेंश्वर ॥ नमस्ते पृण्डरी- 
काक्ष नमस्ते विश्ववावन ॥ १५॥ सुबहाण्य नमस्तेषस्तु महापुरुषपूर्वज ॥ गृहाणाध्य मया 
दत्त लक्ष्म्या सह जगत्पते ॥ १६॥ ततस्तु पूज्येद्रिमतदकुम्म प्रदापयेत्‌ | छत्रोपानद्गः साध 





व्रत करते हैँ वे इसके करनेवाले इस छोकमे पुत्र पाकर 
अन्तमें स्वगंगामी होते हैं | हे राजन्‌ | पढने और सुननेंस 
अच्वमेघका फल प्राप्त होता है ॥ ५४ ॥५८७॥ यह भविष्यो- 
तरपुराणका कहा हुआ पौष शुक्ला एकाद्शोक् ब्रतका 
माहात्म्य पूरा हुआ ॥ है 

अथ मापशुक्ला एकादशीकी कथा-_दाल्म्य बोल कि; 
मत्यछोकर्मे आये हुए जीव तो पाप करते हूँ, अद्यहत्यादि 
महापावक तथा दूसरे २ और पापोंसे भी घिरे रहते हैं॥१॥ 
चोरी ओर व्यभिचारमे लगे रहते हैं पर हे ब्रह्मन नरकोंको 
क्यों नहीं आते, यह यथाधंरूपस कहिये ॥२९॥ जिस छोटेसे 
दानसे वा पुण्यंस पप शान्त हो जाय. हे भगवन्‌ | उसे 
मुझसे कृहिय ॥ ३ ॥ पुलूस्त्य बोले कि, बहुत अच्छा बहुत 
अच्छा, हैं महाभाग ! यह ब इझही गोपनीय हैं 
दुल्भ हैं यह तह्मा विष्णु महेश किसीने भी किसीसे नहीं 


स्नान कर । ५ | काम क्रोधादि विकारोंका परित्याग करे 


। 
हा विष्णु : | हे कृष्ण ! हैं कृष्ण | आप कृपाछु हैं अतः जिनको कोई 
कहा || ४ |। उस अब में आपको सुना दूंगा, आप सुनें. | 
पौषका सहीना आनेपर जितेन्द्रिय मनुष्य पवित्र होकर | ते 

| यैकाक्ष ! तेरे छिये नमस्कार हैं, हे विश्वभावन ! तेरे लिये 
इष्यों औरैर पिशुनताका त्याग करे, भ्रगवानको स्मरण 
कर हाथ पावका प्रक्षाऊून करे ॥ ६॥ पृष्यनक्षत्रके साथ 





| बनालेना चाहिये।७॥१०८ होम हो इसमें विचार न करवा 
| चाहिये ! माघ सासके आजानेपर यदि आपषाढ नहत्र 
| हो ॥ ८ ॥ अथवा मूठ हो, कृष्णपक्षकी एकादशीके रिन 
| नियम अहण करे, उसके पुण्यफलछके देनेवाले विधानकी 

! ३ नि रू कप 

| मुझसे सुनो ॥९॥ यतवात्मताके साथ स्नान करके पवित्र हो 
| भगवानक! पूजन कर, एकाद्ह्ीमें उपवास कर भुगवानर्क 
[नामोंक्ा कीतेन करता हुआ ॥ १० ॥ रातको जाग 
| रण करे एवं होम भी उसी सम्रय करे, दूसरे दिन देवदव 
| भावानका फिर पूजद करे ॥ ११ ॥ वारबार कृष्ण नामत 
| स्तुति करके चन्दन अगरु और कपूरके साथ कृसरका नव 
| द्‌ ।| १२॥ कूष्मांड और नारियछसे अथवा 
| | या इन सबके अभावम तो है जिप्रन्द्र बढ़िया सुपरीस 
ओर सुतरां | 


बिजोएससे 


॥ १३॥ भगवान्‌ जनादंनकी पूजा कर अध्यदान करे 


गति नहीं हूँ उतकी गति बन जाइये ।। १४ ॥ है परमेश्रर 
हम संसार्‌सागरमें डूबेंहुए हैं हमारा उद्धार करदें। हैं पुए्ड' 


समस्कार दे १५ ॥ हे महापुरुष सनातत्त | ततरे हिय 
_ च  आ जे च | 
नप्स्कार है, है जगत्पते ! आप छक्ष्मीके साथ अध्य ग्रह 


उससे गोबर लेकर उसमें तिल और कपास मिला पिण्ड |करिये ४ १६ ॥ ना++--_7 “डा पिण्ड करिये॥ १६॥ ओर अन्त जाह्मगकी पूजा कर उसे अन्त ब्राह्मगकी पूजा कर उसको 


१इत आरभ्य पट्तिछा: पाप 
३ ।क्‍ कफ मे के त्ता 
की दर शना 


चिदृधिकपूरणेत चेक्तो बिधिस्नेन छिल्लित 


कक ्र्न्ये धर 
इत्यन्तप्रन्थेच हेमाग्रुक्ततिढाद्वादशीतिछ॒दाह्माख्यत्रतद्यविधानयोमिश्र 
इतिभाति । २द्यादितिशेष ] ... .. . ०» 


| 
ै 
। 
४ 
। 
। 


बंतानि, | भाषाटीकासमेतः 


( ४०९ ) 





कृष्णो मे प्रीयतामिति ॥ १७ ॥ कृष्णा घेतुः अद्दातव्या यथाशकक्‍त्या द्विजोत्तम ॥ लिलवात्र 
द्विजश्रेष्ठ दबयात्तत विचक्षण। ॥ १८ ॥ स्ानमाशनयो: शबस्ता। शेताः कृष्णाश्तिला सुने ॥ 
तान्पदद्यात्मयत्नेन यथाशकत्या द्विजोत्तम ॥ १९॥ लिलप्ररोहजाः क्षेत्र यावत्संस्यास्तिला 
द्विज ॥ तावदषसहस्त्राणि स्वगलोके महीयते ॥२०॥ तिलस्नायी तिलोद्वतों तिलहोमी 
तिलोदकी ॥ तिलभाक तिलदाता च षदतिला। पापनाशका: ॥-२१ ॥ इयमेव पट्ट वेछारूया 

नारद उवाच ॥ कृष्ण कृष्ण महाबाहों नमस्ते विश्वन्नावन ॥ पदतिलकाइशीभूत कीदर्श फल- 
मश्न॒ते॥ २९॥ सोपाख्यानं मम ब्रृहि यदि तुष्टोंति यादव ॥ श्रीकृष्ण उबाच ॥ श्वृणु ब्रह्मन 
यथावत्त दृष्ट तत्कथयामि ते ॥ २३ ॥ मृत्युलोफे पुरा ह्यासीद्राह्मण्पेका च नारद ॥ ब्रतचर्पा- 
रता बित्य देवपूजारता सदा ॥ ॥ २७॥ मासोपवासंनिर्ता मर भक्ता च सबंदा॥ऊष्णोपवा स- 
संयुक्ता मम पूजापरायणा॥२५शरीर॑ कशितं नित्यम्रुपवासेस्तया द्विज।दीनानां वाह्मणानांच 
कुमारीणां च मक्तेत॥२ द्ागूहादिक प्रयच्छनती सबंकाले महामाते॥अतिकूच्छुरता सा ठु सबे- 
कालेष वे द्विजा।२७।ब्राह्मणा नान्नदानेन तरपिता देवता न चा।ततःकालेन महता मया ये चिन्तित॑ 
द्विज।।२८॥शुद्धमस्याशशरीरं हि ब्रतः कऋूच्छेन संशय: ॥ आअआजतो वष्णवों लोकः कायक्लेशेन वे 
तया॥२९॥न दत्तमन्नदान हि थेन तृप्तिपरा भवेत॥विचिन्त्येव॑ मया बल्चन मृत्युलोकस॒ुपत्य चा।।३० 
कापालं रूपमास्थाय सिक्षां पात्रेण याचिता ॥ ब्राह्मण्यवाच | कस्मात्वमागतो ब्रह्मनन वद सत्य 
ममाग्रत॥।३१॥ पुनरेव मयाप्रोक् दहि मिक्षां च सुन्दारे ॥ तथा कोपेन महता मृत्पिण्डस्तामस्र- 
भाजने ॥ ३२ ॥ क्षिप्तो यावदहं बहन पुनः स्वगं, गलतो द्विज ॥ ततः कालेन महता तापसी 
पुमरात्रता ॥ ३३ ॥ सदेहा स्वरगेमायाता वब्रतचर्याप्रभावतः॥ मुृत्पिण्डस्य प्रभावेण गुहं प्राप्त 
मनोरमम्‌॥ ३४ ॥ पर तश्चेव विप्रष घान्यकोशविवर्जितम्‌ ॥ गहं यावत्परविश्येषा न किखि- 





भरा हुआ घडा छत्र और जूती जोडा, देकर #क्णों में | 
| ही उपवासोंके करनेसे, गरीब त्राह्मणों और कुप्रारियोंकी 


प्रीयतां' पदका उच्चारण करे |। १७ ॥ है द्विजोत्तम द्विज 


श्रेष्ठ ! बुद्धिमान्‌को चाहिए कि, साथही काली गौ तथा | 

कक १ के 2० भा 
निलका पात्रभी यथाशक्ति दे ४ १८ ॥ हे मुने ! स्नानमें | 
और भोजन सफेद त्िकोंका व्यवहार करना अच्छा | 


हे। है द्विजोत्तम ! शक्तिके अनुसार उन्हींको दे भी ॥१९५॥ 


खतोंम्तें तिल पेदा होते हों ।। २० 
और होम तिलोंकाही पानी विछ भोजन और तिलोंका 


दान करना । इस प्रकार तिलोंस ये छः काम होनेके कारण | 
| हैं ब्रह्मन्‌ | यह घिचारकर में मत्यछो ककों चलछूदिया!।३० 
नारदजी बोले कि, हे विशाल- | 
बाहो कृष्ण ' आपको प्रणाम हैं। षदूतिला एकादशीको | 
इसको | 
आप कथा सहित वणन कीजिए, यदि आप मुझपर प्रसन्न 
तो। श्रीकृष्णजी बोछे कि, हे नारद ! जैसी मैंने देखी-| 
पेघीही इसकी कथा मैं तुमे वणेन करता हूं इसे तुम छुनो | 
॥ है नारद . प्राचीनकालमें मत्यलोकके अन्दर एक | 

त थी, वो सदा ब्रतों और भगवानकी पूजा किया | 
| दानके फलसे वहां सुन्दर घर मिद्ा 
भेश भक्ति मरे उपवासोंको भी किया करती थी, मेरी | 


पह घटूतिला नामकी एकादशी होती हूँ । यह पार्पोको 
करनवालो है | २२ 


फेरसवाक्ा प्राणी कंसा फल पाता हैं ! 


करती थी | २४ ॥ प्रत्येक मासके उपवासोंकों करती थी, 


पैक हे 





पूजामें छगी रहती थी ॥ ९५ ॥ जिसत अपना शरीर नित्य 


भक्तिसे श्लीण करलिया था ॥ २३ ॥ बह परम वुद्धिमती 
अपने ग्रह आदि सभी वस्तुओंको प्रदान करती रहती थी 


। इस प्रकार हे नारद ! सदा वह कष्ट उठाती रहती थी 
| ॥ २७ || उसने ब्राह्मणोंको अन्नदानसे प्रसन्न किया पर 
तिलदान करनेवाला मनुष्य उतने हजारबष पयेन्त स्वर्ग | 
निवास करता हे, जितना कि, उन तिलोंसे उत्पन्न होनवाले | 


तिलोंसे स्नान उबटन | 
| अपने कायडछ्ेशसे वेप्णवलोकको प्राप्रकर छिया हैं! किन्तु 


देवताओंकों अ्रसन्न नहीं किया । तब बहुत दिनके बीतजान 


पर मैने सोचा || “८ ॥ कि, इसका शारीर वास्तवमें कष्ठो 


पवाससे शुद्ध हो गया हैं । इसमें संदेह नहीं हैं, इसने 


इसने अन्नदान नहीं किया जिससे मरी पूण तृप्ति होती 


एक कृपाली का रूप घारणकर पात्रस भिक्षा मांगने गया । 
ब्राह्मणो बोली कि, त्रह्मन्‌ ! केस पघारना हुआ ? सो भरे 
आगे सत्य सत्य बताइये | ३१ ॥ मने फिरभी हैं सुन्दरि 

भिक्षा दे यह वचन कहा, तब उसने बडे कोधके साथ एक 
तामेक वत्तैनमें, मिट्टी का पिण्ड फेंका । ३२ | हे बह्मन्‌ ! 
इतनेम में स्वग चछा गया इसके बाद वो महात्रतवाढ्ी 
तापसी बहत समयके वीतजानपर !।' ३३ ॥ दृहसहित स्वग 
लोक चली गई इसी त्रतचय्यकि प्रभावसे । मिट्टीके पिण्ड- 
लेकिनउसका 
घर अन्नकोयसे खाली था । परमें जाकर उसने जब कुछ न 


(४१० ) ब्रतराज:। (एकादल्नी- 









तत्र पद्यति ॥ ३५ ॥ तावदगृहाद्विनिष्क्म्य ममान्तें चागता द्विज। क्रोचेत महताविष्टा इई 
बचनमत्रवीर | ३९१ ॥ मय। व्रतेथ कृच्छे व ह्युपवासरनेकशः | पूजय5$राथितो देवः सर्वहो- 
कप्य भावनः ॥ २७ ॥ न तग्र दृश्यते किखिदग॒ह मम जनादन ॥ ततश्रोक्ता मया सा तु गहं 
गच्छ यथागतम्‌॥ रेद ॥ आगमिष्पन्ति खुतरां कौतृहलसंमन्विताः ॥ द्रई | त्वां देवपत्यस्त 
दिव्यरूपसमत्विताः ॥ ३९ ॥ द्वारं नोदाटय बिना षदतिलापुण्यवाचनात्‌ ॥ एवबमुक्ता गता 
सा ठ॒ यावद्रे माल॒षी ग़हम्‌ ॥ अबान्तरे समायाता देवपत्यश्व नारद ॥ ४० ॥ ताबमिश्व कायेत॑ 
तत्र त्वां द्रष्ट हि समागत॥ ॥ द्वारसुद्धाटय त्वं च पश्यामह्तां शुभानने ॥ ४१ ॥ मातुषु- 
वाच ॥ यदि द्रईं समायाताः सत्य वाच्यं विशेषतः ॥ घटतिलाया ब्र॒त॑ पुण्य द्वारोदाटनका- 
रणात्‌ ॥ ४२॥ एकापि नावदत्तत्र पदतिलेकादशीत्रतम्‌ ॥ अन्यया कथित तत्र द्रष्टव्या माहुषी 
मया ॥ ४३ ॥ ततो द्वारं समुद्धात्य दृष्ठा तामिश्व मालत॒षी॥ न देवी न च गन्धर्वी नासुरी न 
च्‌ पतन्नगी ॥। ४४ ॥ दृष्ठा पूथ तथा नारी याहशीय॑ द्विजषम्त ॥ देवीनामुपदेशेन षटतिलाया 
ब्रतं कृतम्‌ ॥ ४५॥ मात॒ष्या सत्यत्रतया जुक्तिल्‍्॒क्तिफलमद्म्‌ ॥ रूपकान्तिसमायुक्ता क्षणेव 
समवाप सा ॥ ४६॥ धन धान्ये च बच्चादि खुबण रोप्यमेव च ॥ भवन सर्वेसंपन्न॑ पटातिछायाः 
प्रसादतः ॥ ४७ ॥ अतिवृष्णा न कतंव्या वित्तशाठ्यं विवजयेत ॥ आत्मवित्तालुसारेण तिलान्‌ 
बच्चादि दापयेत ॥४८॥ लभते चेवमारोग्यं ततो जन्मनि जन्माने ॥ दारिबं न च कष्ठं चनच 
दोभोग्यमेव च ॥ ४९॥ न भवहें द्विजश्रेष्ठ पदतिलायामुपोषणात्‌ ।। अनेन विधिना ब्रह्म॑स्तिल- 
दानातन्न संशयः ॥ ५० ॥ मुच्यते पातकेः सर्वेनात्र कार्या विचारणा ॥ दाने च विधिना सम्यक्‌ 
सर्वपापप्रणाशनम्‌ ॥ नानथः कबश्चिन्नायासः शरीरे सुनिसत्तम ॥५१॥ इति श्रीभविष्योत्तरपुराणे 
माधक्ृष्णकादइयाः बदतिलानाम्न्या माहात्मयं संपूर्णम्‌ ॥ 
अथ माधशुरलेकादशीकथा ॥ 

युविष्ठिर उवाच ॥ कृष्ण कृष्णाप्रमेयात्मन्रादिदेव जगत्पते॥ स्वेदजा अण्ड जाश्ेव उद्धिजाश 

४॥ १॥ तेषां कता विकता त्वे पालकः क्षयकारकः ॥ माघस्प कृष्णपक्ष त्‌ पढ़ 


देखा । ३५ ॥ तब बह फिर मेरे पास आईं। उसने ऋरधमे | पश्नगी है ।। ४४ | जैसे पहछे एक माजुषी स्त्री देखी थी 
आकर यह वचन कहा क्लि॥ ३६ ॥ मैने इतने कठिन। वही यह हैं। देवियोंके उपदेशस उसमे षटूतिलाका ब्रत 
अनेक उपवासों धर अतोंस और पूजासे सवेछोक हितकारी। किया ॥ ४५॥ यह मुक्ति सुक्तिका देनेवाल्य था; माहुपी 
जनादुच भगवाबूकी पूजाकी ॥ ३७॥ तो भी मर घरमें हं-। स॑स्‍्यत्रतवाली थी, रूप कान्तिसे युक्त होकर क्षणमात्रमें पा 
जनादन : छुछ नहीं सालूमहोता। तब मेने कहाकि तू झिर | गयी || ४६।॥ घन, धान्य, वस्रादि, सुबण, रौप्य इनसे घर 
जंसे आइ हैं वेसेही अपने घर जा ॥ ३८ ॥ तुमको देखनेके “कोरी था || ४७॥ नवो 
छ्विए दिव्यहूपधारिणी अनेक देवपत्नी कुतूहछूके साथ मा है की हे करे। अपनी 
आयेंगी ॥ ३९ ॥ तुम उनको बिना पट्तिलोंकी पुण्यकथाके | पथ शाही करें; और न कपणवाह इसके 
अपना दरवाजा न खोहना, जितने समयके, बाद वो | अशक्ति तिछ़ व वह आदि दान करें | ८ 
बाप सी प्रानुषी अपने घरपर आईं, इसी वीचमें उसके घर- जज मा का कक 
पर उसके दशन करनेके लिए देवखियां :आ उपस्थित हुई | 5 और दल होगी 80) शत न । इक 
॥ ४०॥। दृवपत्नियोंने कहा कि, हम आपको देखनेके लिए तिल्ल कल के कक आप लि िफक (कक के 
अं हे शुभ मुखवाढ़ी ! द्वार खोछ, तुझे देखना। गराभी सदृह न करना चाहिए। है छ्विंज : इस पूतिल 
चाहती हैं । ४१ ॥ माजुषीने कहा-यदि तुम मुझ वास्तवर्म | उपवासके बरावर कोई श्रेष्ठ नही है । ४०॥ ५ हा 
ही देखने आई हो तो में अपना द्वार तब बोहूँगी जब कि,| श्री भविभ्योत्तर पुराणका कहा हुआ पद्दूविडानामकी एकी' 
पदुतिर्ा ब्रतका पुण्य तुम॒ मुझे करोगी॥ ४२॥ कोई न| ईशीका माहात्म्य पूरा हुआ ॥ कम 
पे आम मा एक।दुशीक त्तको:दूंगी पर उनमेंसे | अथ माघशुद्धा एड्रादशीकथा-युविष्ठिरजी कहते है क 
५ 9 भें तो इंस अवश्य देखूंगी। ४३ ॥ तब हे कृष्ण | हे कृष्ण | हें भप्रमेयात्पमन्‌ | हे भादिदेव : 7 





- अ्यम-कपककम, 





उन स्‌ रे व 
जे तर खोलकर देखा कि उसके अन्दर एक।| जगत्पते | आप स्वेद्ज, अण्डज, जरायुज और उद्धिल इव 


सानपी चैटठी छल हे | ते हि छू हे तु 
.. ... / है जोन गन्धवी हे न आधुरी और। चारों तरहोंके प्राणियोंके कर्ता; हर्ता और पाठकथप है 


। 


ब्रतानि, | 


भाषाटीकासमेलः । (४११ ) 








किनामा कोविधि- 
स्तस्याः को देंवस्तत्र पूज्यते ॥ हे ॥श्रीकृष्ण उबाच ॥ कथमिप्याम राजेन्द्र शुक्के मापम्य या 
भवेत ॥ जयानाम्रीति विख्याता सेवेपापहरा परा ॥ ४ ॥ पवित्रा: पापहन्त्री च कामदा मोक्षदा 
तणामत्रह्महत्यापहन्त्री च पिशाचत्वाविनाशिनी ॥ नेव तस्या वते चीणे तत्व जायते न॒णाम्‌ 
॥ नातः परतरा काचेत्पापन्नी मोक्षद्रार्थनी।एनस्मात्कारणाद्राजन क्लंव्येयं प्रयत्नतः ॥६॥ 
श्रूयतां राजशादूल कथा पौराणेकी श्ञुभा ॥ पडुजारुूपपुराणेपस्या महिमा कथितो मया || ७ ॥ 
एकदा नाकलोके वे इन्द्रो राज्य चकार ह॥ देवाश्व तत्र सोख्येन निवसानति मनोरमे ॥८॥ पीयूष 
पाननिरता ह्प्सरोगणसेविताः ।। नन्दन तु वर्न तत्र पारिजातोपशोमितम्‌ ॥| ९॥ रमसन्ति 
रमन्त्यत्र ह्मप्सरोमिदिवौकसः ॥ एकदा रममाणोञसो देवेन्द्र: स्वेच्छया नूप ॥१०॥ नर्तयामास 
हपोत्स पश्चाशत्कोटिनायिका:॥गन्धवास्तत्र गायात्ति गन्धवे: पुष्पदन्तक/।११॥ चित्रसनश्व तत्रेद 
विप्रसेनलुता तथा ॥ मालिनीति थ नांस्रा तु चित्रसेनंस्थ कामिनी ॥ १२ ॥ मालिम्यां तु सझु- 
त्पन्नः पुष्पवानिति नामतः ॥ तस्य पुष्पषतः पुत्रों माल्यवान्नाम नामतः॥ १३ ॥ गन्धर्वी पुष्प- 
वत्याख्या माल्यवत्यतिमोहिता ।| कामस्य च शरेस्तीक्ष्णविद्धाड़ी सा बभूव ह्‌॥ २४ ॥ नया 
भावकटाक्षेत्र माल्यवांस्त वशीकृंतः ॥ लावण्यरूपसंपत्या तस्या रूप नृप श्रुणु ॥ १५॥ 
बाहू तस्यास्‍्तु कामेन कण्ठपाशों क्ृताविव ॥ चन्द्रवद्वद्न तस्यथा नयने श्रवणायते ॥ १६॥ 
कर्णो तु शोमितो तस्याः कुण्डलाभ्याँ नुपोत्तम ॥ कण्ठो ग्रेवयसंयुक्तो द्व्याभरणभूषितः ॥१७॥ 
पीनोन्नतों कुचौं तस्यास्तों हेमकलशाबविव ॥ अतिक्षाम तह॒दर सुष्टिमा्न च मध्यमस्‌ ॥ २८। 
नितम्बौ विपुलौ तस्या विस्तीण जघनस्थलम्‌ ॥ चरणों शोभमानों तो रक्तोत्पलसम इुती॥ १९। 


तिला कथिता त्वया ॥ २ ॥ शुक्के येकादशी ता च कथयस्व पसादतः । 


| 
| 








सब छोकोंके नाथ और आदि देवभी आपही हैं, आपकी | 
महिमा अचिन्त्य हें अतुल प्रभाव है, इस लिये जिस प्रकार | 
आपने माघ कृपष्णपक्षकी ' षदट्तिला ? एकादशीका वर्णन | 
किया उसी प्रकार शुक्लपक्षकी एकादशीकाभी वर्णन कृपा- | 
करके कर दीजिय उसका नाम और 0 तथा उस | 

दिन किस देवताकी पूजा होनी चाहिये | यहभी कृपाकर | _ .०« हे  साभकी अप 
बताइये ॥ १-३॥ ऑकणजो महाराज बोले कि, हे जन !। पुत्रीक साथ चित्रसनभी वहीं उपस्थित थे। इस चित्रसेन 
में तुम्हें माघ शुक्व एकादशीका वर्णन करता हूँ। हे युधि- | से 
ग्रे | उष्पवान्‌ नामका लछड़का उत्पन्न हुआ इस पृष्ण्वानके 


प्विर ! उस एकादशीका नास “ जया ' है। सब पार्पोक 


नष्ट करनेवाली, सब इच्छाओंकों पूणे करनेवाढ्ली ओर | 
मोक्षकों देनिवाली है । यह बडी पवित्र हें, त्रह्महृत्याक | 
पापको मिटानेबाली और पिशाच गतिको रोकनेवाली है। 
इसका ब्रत करनेस कभी प्रेतयोनि नहीं प्राप्त होती ॥ ४॥ 
॥ ५ ॥| इससे अधिक उत्तम पापनाशिनी और सोक्षदा- | 
यिन्नी कोईंभी एकादशी नहीं है । इस छिये हे राजन ! 


शुभ कथाको श्रवण कीजिय । इसकी महिमा मेल पह्ुंज 
( पद्य ) नामके पुराणमें वर्णव की है ||») एक समय स्व- 
गंलोकर्मे इन्द्रदेव राज्य करते थे । इसके शासनमें देवतागण 
पुन्द्र स्वगंम बडा घुखभोग कररहें थे॥ ८ ॥ सदा असम - 
त्पान करना और अप्सराओॉका भोग करना उनका प्रधान 


काम था । इस जगह पारिज़ात नामके स्वर्गीय वृक्षोस्रि । 





शोभित नन्‍दन वनभी था ॥ ९॥ जहां देवता अप्सरा- 
ओके साथ रमण करते थे | हे राजन्‌ | एक समय यह इन्द्र 
जब्‌ कि अप्सरोंस रमण कर रहा था, तब हर्षातिरेंकसे 
उसने ॥ १० ॥ पचास करोड वेश्याओंका दृत्य कराया, 
गन्धव छोगोंका गाना हुआ। प्रसिद्ध गायनाचाय गन्धव- 
राज पुष्पदन्त ॥ ११ ॥ तथा चित्रसना नामकी अपनी 


गन्धवकी सत्रीका नाम ' मालिनी ' था ॥ १* ॥ जिससे 


माल्यवान्‌ पुत्र हुआ ॥ १३॥ इस मसाल्यवान पर एक 
पुप्पवती नामकी गन्धर्वी मोहित होगई थी। उसकदी मारे 
कामदेवक तीढद्ण बाणोंसे घायछ होगईं । उसके भाव पूर्ण 
कटाक्षोंसे एवं रूप छावण्यकी संपत्तिस माल्यवान भी 
उसके वशीभूत होगया उसका छावण्य और रूप सौन्दर्य 


रु 


कैसा था ? इसको हे राजन्‌ | आप सुनिये। १४ ॥ १५॥ 
"सर उपर कह ब । | उसको भुजाएं कामदेवक साक्षात्‌ केठपाश थे | मुख चन्द्र 
बड़े यत्नस इसे कर ॥६॥ है राजश्रेष्ठ ' इप्तकी पुराणोक्त | 


माके समान सुन्दर और आंख कानॉतक हूम्बी थीं | १६- 


कान कुंडलॉस सज रहे थे | गलेमे हार तथा दूसरे अनेक 


प्रकारके अलड्ढारोंसे उसकी छुन्द्रता वढ़ रही थी । केठ 
कंठभूषा और दिव्य आमरणोंस समभर्‌हा था ॥ १७॥| 
उसके पुष्ट और ऊपर उठे हुए स्तव स्वणकरूश जेसे मालूम 
होते थे । उद्र वहुत पतला तथा मध्यमाग सुष्टियमाण था 
| १८॥ विद्याल नितम्ब ओर जबनस्थल् बहुत विस्तत था । 


( ४११२ ) बलराजः | 


( एकादशी 





०---. दि" अप्ाकांदा] आम ता बाद 770 बकरा +- ता किया +ा++- पड चाधातआटाा आयामाका 


ईंदड्यां पुष्पवत्यां स माल्यवानपि मोहित॥ शक्रस्थ परितोषाय नृत्याथ तो समागतौ ॥ २०॥ 
गायमानो च तो तत्र हप्सरोगणसड्रतो ॥ ने शुद्धगान गायेतां चित्तश्रमसमन्वितौ | २१ ॥| 
बद्धदष्टी तथान्योन्य कामबाणवरं गतौ ॥ ज्ञात्वा लेखषेभस्तत्र संगत मानसं तयोः ॥ २२॥ 
कालक्रियाणां संलोपात्तथा गीतावभखनात॥चिन्तायेत्वा तु मघवानवज्ञान तथात्मनः ॥ २३॥ 
कुपितश्व॒ तयोरित्यं शाप॑ दास्यन्निदं जगौ ॥ घिग्वां पापगतों सूढावाज्ञाभड्रकरों मम ॥२९॥ 
युवां पिशाचौं भवतं दम्पतीरूपधारिणों ॥ मृत्युलोकमठभातों खुझआानों कर्मणः फलम ॥ २९॥ 
एवं मघबता शत्तावभों इ/खितमानसों ॥ हिमवन्तमलुप्राप्ताविन्द्रशापविमोहितो ॥ २६॥ उस्नै 
पिशाचतां प्राप्ती दारुणं हुःखमेव च ॥ संततमानसो तत्र महाक़ृच्छूगतावभों ॥२७॥ गदर 
रसे च स्पश च न जानीतो विमोहितो ॥ पीडचअमानों तु दाहेंन देहपातकरंण च ॥ २८ ॥ तौ 
न निद्रासुख पात्तों कमंणा तेन पीडितो ॥ पररुपरं खादमानों चरेतुर्गिरिगहरम्‌ ॥ २९ ॥ पीड़च- 
मानो तु शीतेन तुषारप्रभवेण तौ ॥ दुल्तघंष प्रकृबाणों रोमाश्वितवपु्धेरो ॥३०॥ उऊचे पिशाचः 
शीतातंः स्वपत्नी तु विशाचिकाम्‌ ॥ किमावाभ्याँ कृत पापमत्यन्तं छुःखदायकम्‌ ॥३१॥ 
येन प्राप्त पिशाचत्व स्वेन दुष्किरककमंणा ॥ नरक दारूणं मन्ये पिशाचत्व॑ च महिंतम्‌॥ ३२॥ 
तस्मात्सवप्रयत्नेन पाप नेव समाचरेत ॥ इाते चित्तापरों तत्र ह्यास्तां दःखेन कशितो॥३३॥ 
देवयोगत्तयोः प्राप्ता माधस्येकादशी सिता ॥ जया नाम्रीति विख्याता त्तिथीनामुत्तमा तिथि: 
0 ३४ ॥ तस्मिन्दिने तु संप्रात्ते तावाहारविवजितों ॥ आखसाते तत्र नृपते जलपानविवार्जितो 
0 ३५ ॥ न कृतो जीवधातश्व न प्रफलभक्ष णम्‌ ॥ अश्वत्थस्य समीपे तु पतितों ढुःखसंयुतौ 
॥ ३६॥ रविरस्तं गतो राज॑स्तथेव स्थितयोस्तयोः ॥ प्राप्ता चेव निशा घोरा दारुणा 
शीतकारिणी ॥ ३७ ॥ वेपमानों तु तो तत्र हिमिन च जडीकृतों ॥ परस्परेंण संलझो गात्रयो- 





उसके चरण रक्तकमल जैसे सुन्दर थे ॥ १९ | ऐसी | 
पुष्ववतीपर माल्यवा! न्‌भों मोहित होगया। बे छोग इन्द्रको | 
प्रसन्न करनेके लिये नाचन ओर गानेकों आयेथे ॥ २० ॥| | 


जिस समय वे दोनों अर्थात्‌ माल्यवाद्‌ और पुष्पवती 


मानो उन्हें कोई चित्तश्रसम होगया हो॥ २१ | एक दूस- 


रको दृष्टि लगाकर देख रहे थे। दोनों कामबाणोंके वशी- 


जान ढिया कि इनका मन मिल चुका हे। २२ ॥ और 
इसके कारण अपने अपमानसे तथा सामयिक क्रियाओंके 


छोपस और गायन भह्से ॥ ९२३ ॥ कुपित होकर यह | 
शाप दिया कि; है नाछायकों ! तुमने पाप गब हो मेरी। 
आज्ञाको भंग किया है, जाओ चले जाओ, तुम्हें घिक्कार | 


है। तुम दोनों स्त्री पुरुषके रूपसेही मत्यछोकमें जाकर 
पिशाच योनिम जपने कर्मोंझा फछ भोगों | २४ ॥२०।| 


इस प्रकार इन्द्रके शापसे दुःखी होकर वे दोनों शाप 
मोहित हो हिमवानके निकट गये । २६ ॥ दोनों उस | 
शापके प्रभावसे पिशाचयोनि और दारुण दुखोंको प्राप्त 


दोगये । दोनोंका हृदय सन्तप्त रहने छूगा वे महाकष्ट पाने | रहतेहुए सूयेमी अरब होगय थे अत्यन्त घोर शीतका- 


| रिणी एवं दुःख पहुँचानेवाढ्ली रातमी वहीं भागई || २४॥ 
| वे दोनों 


छंगे ॥ २७॥ तमके बढ जानेके कारण गन्ध रस ओर. 


धक्का ज्ञान नष्ट हो नया,देहान्त करनेवाले दाहसे पीडित 





खा] ७ 


होगये ॥२८॥ उन्हें कमके प्रभावसे कभी निद्राका सुख नहीं 
मिला किन्तु एक दूसरको खाते हुए वे छोग पहाहोंके 
द्राम चल गये।। २९५ ॥ जाडेके झीतसे पीडित हो दांतोंको 


कक २ अमादवे | रगडते हुए रोमाज्वित शरीरसे दिन बिताने छूगे।।३०॥ 
अप्सराओंके साथ गा रहे थे तब उनका कामोंन्मादके | 


कारण गाबा शुद्ध नहीं हो पाता था ऐसा मार्म होता था | दु:ख कहा कि, हमछोगोंने कौनसा ऐसा दुःखदायक 


| कम किया है ! ॥ ३१ ॥ जिस घुरे कमसे हमें यह नर* 


भूत हो चुके थे का | रूप पिशाचयोनिकी प्राप्ति हुईं है । में इस निन्दित पिशार 
त हो चुके थे; इस समय इन्द्रने उनके मनक भावको | 


उन्तमेंसि एक दिन पिशाचने अपनी पिशाची ख्रीसे शीत 


योनिको दारुण नरक मानताहूँ ॥ ३२ ॥ इसढिये अब 


| कभी हमें कोई पाप किसी तरहभी नहीं करना चाहिये 


वे इस चिन्तामें दुःखके संतायहुए रहे आये | ३३ ॥ 
देवयोगसे इसी अवसरमें माघ महीनकी जया नामिकी 
शुक्ल एकादशी भी आ पहुंची, जो विधियोंमें सबसे 
उत्तम तिथि है ॥३४।॥ हे राजन्‌ ! उस दिन उन्होंने निरए" 
हार ज्ल किया, जलपान भी न किया इसी तरह रह 
आये ॥ ३५ ॥ वे दोनों एक अश्वत्थ वृक्षके नीचे १६ 
रहकर उस एकादशीके दिन जीवह॒त्या और फछ भक्षण- 
क्राभी द्याग लिये दुःखी रहे आये ॥३६॥ उन्हें इसी वर 


वहां सर्दीके मारे जड़ होकर कॉपने ढगे. 


ब्रत्ानि ] 


भाषा टीकासमेंल! । म (४१३ ) 


(६००32, 200802% 04,426 5607: 5 /7/2/0:0, ५४५-२८१११८|:.५2 





3 पदक ६ ८7 दि १५: क्र 72085 कर 





हे" के + 05 मर बल 8८: ९.०::/ 5५४८ 4 7५747. है: 


मुजयोरपि ॥ ३८ ॥ न निद्रां न रति तत्र न तो सौख्यमविन्द्ताम्‌ | एवं तौ राजशादूल 
शापनेन्द्रस्य पीडितो ॥ ३९ ॥ इत्थं तयोद!खितयोनिजमाम तदा निश्ञा॥ जयायास्‍्त ब्ले 
चीणे रात्रों जागरण कृते॥ ४० ॥ तयोवत्रेतप्रभावेण यथा झ्यासीत्तथा शरण ॥ द्राइशीडिवसे 
प्रात्ते ताभ्यां चीर्णे जयात्रते ४१ ।। विष्णोंः प्रभावान्नपते पिशाचरत्व तयोगेलम्‌ ।। पुष्पवली- 
माल्यवांश्व पूर्वरूपो बूवतुः। ४२ ॥ पुरातनस्रेहयुतां पृवालंकारसंयूनों॥ विमानमधिस्पों 
तावप्सरोगणसेवितों ॥ ४३ ॥ स्तममानों तु गन्धर्वैस्तम्बुरुप्रसबबेस्तथा ॥ हावभावसमायुन्तो 
गतों नाके मनोरमे ॥ ४४ ॥ देवेन्द्र॒स्थाग्रतो गत्वा प्रणाम चक्रत॒र्रुदा ॥ तथाविधों तु लो दृष्टा 
मघवा विस्मितोषत्रवीत ॥४५॥३-द्र उवाचावदतं केन पुण्यन पिश्ाचत्व॑ विनिगेतनमा।मम शाप- 
वशं प्राप्त केन देवेन मोचितों ॥ ४६॥ माल्यवालु॒वाचावासुदेवप्रसादेन जयायाः सुत्रतेन च # 
पिशाचत्वं गे स्वामिन्सत्यं मक्तिप्रभावतः ॥ ४७ ॥ इति श्र॒त्वा वचस्तस्य प्रत्युवाच सुरेश्वरः॥ 
पवित्रो पावनों जातो वन्दनीयों ममापि च॥ ४८ ॥ हरिवासरकर्तारों विष्णभाक्तिपरायणों ॥ 
हस्मिक्तिता ये च शिवमक्तिरतास्तथा॥४९।अस्माकमपि ते मत्याः पृज्या वस्द्या न संशयः ॥ 
विहरस्व यथासोख्य॑ पुष्पवत्या खुरालये ॥ ५० ॥ एनस्मात्कारणाद्वाजन कर्तव्यों हरिवासरः ॥ 
जया नामेलि राजेन्द्र ब्रह्म॒त्यापहारकः ॥ ५१ ॥ स्वेदानानि दत्तानि बज्ञास्तेन कृता नप ॥ 
सर्वतीर्थष सुरल्लातः कृत येन जयात्रतम॥५२॥ य करोति नरो भक्‍त्या श्रद्धायुक्तो जयाव्रतम्‌ ॥ 
कल्पकोटिशतं यावद्रेकुण्ठे मोदते धवम्‌ ॥ ५३॥ पठनाच्छ्वणाद्राजन्रग्रिष्टोमफर्ल लगेत्‌ 8 ०४ ॥ 
इति श्रीभविष्योत्तरपुराणे माधशुक्केकादइ्या जयाया माहात्म्यं सम्पूर्णम्‌ ॥ 
अथ पार्गुनकृष्णेंक्रादशीकथा || 

बुधिष्ठिर इवाच ।। फाह्शुनस्थासिते पक्षे किनामेकादशी भवेत्‌ | वाखुदेव क्ृरपासिन्धो 

कथयस्व असाइलः ॥९॥ श्रीकृष्ण उवाच ॥ कथयिष्पामि राजेन्द्र कृष्णा या फाल्युनी भवेत्‌॥ 





' शमी पर 





एक दूसरेसे शरीरस शरीर छिपटकर पड रह || ३८ ॥ न 
उन्हें निद्रा मिछी, न रति ओर सुख ही मिला, है राजशा - 
दूछ ! इन्द्रके शापसे उन्हें इस प्रकारका दुःख हुआ ॥२५॥ 
है राजन्‌ ! इस प्रकार दुःखसे उन्चकी वह रात्रि समाप्त हुई 
जया एकादशीका ब्रत भी साथ ही जागरण सहित पूरा 
हो गया ॥ ४० ॥ उस एकादशीके प्रभावसे जो फछ हुआ 
उसे सुनो । द्वादशीके प्राप्तकाछ द्ोनेपर उन्होंने जया 
एकादशीके बतका पारण लिया ॥ ४१॥ हे राजन; इस 
ब्रतके प्रभावसे भगवान विप्णुकी कृपोसे उनका पिशाच- 
पना नष्ट होगया। वे दोनों पुप्पवती और माल्यवानपहले 
के रूपको धारण करते हुए ॥ ४७१५॥ अपने पुराने प्रेमसे 
युक्त हो अप्सराओंके साथ पुराने अलंकारोंसे अछंकृत 
होकर अप्सराओँसे सेवित हुए विमानपर सवार होगये 
| 8४३॥ तुबुरु- आदि गन्धर्व स्तुति करते थे बड़े हावभाव 
से युक्त हो इस अ्रकार वे दोनों फिर उस सुर्दर स्वग्रे 
पहुंचे | ४४ ॥ उन्होंने वहां इन्द्रके आगे प्रसन्न होकर 
प्रणाप् किया। इन्द्रभी उन्हें पूर्वरूपमें देख ऋए वडाविस्मिंत 
हुआ बोछा ॥ ४५ ॥ कि, हे गन्धवों ! यह वतलाओ कि, 
भरे शापसे मिकछा तुमारा पिशाचत्व किस प्रकार दुरहुआ। 
मर शापका सोचन किस देवताने किया ॥ ४६ ।। माल्व- 
बोला कि हे देवराज ! भगवान्‌ वासुदेवर्क प्रभावसे 
भर जया श्कादशीके ब्रतसे एवं भगवानकी कृपासे मेरी 





यह पिशाचयोनि नष्ट हुई हैं।। ७७ ॥ यह वचन झुन इन्द्र 
ने उत्तर दिया कि, अब तो तुम लोग बडे पवित्र तथा भरे 
भी वन्दनीय हो गये हो ।। 2८ | हरिवासरको करनेवाले 
विप्णुमक्तिमें लीन रहनेवाले तथा जो लोग सद्दा हरिभक्ति 
ही में अपना समय बिताते हैं ओर जो शिवभक्त हैं॥४९।॥ 
वे सब हम छलोगोंके भी पूजनीय, वन्दनीय हैं । इसलिये 
तुम अब पुष्पवतीके साथ स्वरगंम आनन्दसे इच्छापूवक 
भोग करो ।। ५० ॥ इसीलिये हे राजन ! जया नामका 
हरिवासर अवश्य ही करना चाहिये | यह हद्हत्याक्रे 
दोषका भी नष्ट करनवाछा हैँ।। ५१ ॥ हे राजन , उसने 
सव दानोंको दिया और सब यज्ञोंकों किया है और सब 
तीथौमें स्नान किया है जिसने इस जयाएकादश्ञी तब 
किया दो ॥ ५२॥ जो मनुष्य श्रद्धामक्तिसे जयाके त्रक्‍को 
करता है वह कल्पकोटिपयेन्त निश्चय करके वबेकुण्टमें 
आनन्द करता है ।। ५३ ॥| इसकी कथाको श्रवण करनेसे 
अग्निप्टोम यज्ञका फल प्राप्त होता हैं। यह श्री भविष्योक्तर 
पुराणकी कही हुईं माचशुक्छा जया एकादशीका माहात्म्य 
पूरा हुआ ॥ 
अब फागुन ऊँप्णा एकादशीकी कथा-युधिप्ठिर 
8, हक का 
महाराज बोले कि, है कृपा सिन्धो : हे वासु देव ! फास्गुन्क 
क्ृष्णपक्षम कौनसी एकादशी होती हूँ इसको आप प्रसन्न 
होकर वर्णन कीजििय ॥ १ ॥ श्रीकृष्णजी सहाराज बोलेकि 


[ एक्ादशौ-- 


. (४१४ ) ब्रतराजः । द 


विजयेति च सा भोक्ता कर्तंणां जयदा सदा ॥ २॥ तस्याश्र ब्रतमाहात्म्य॑ सर्वपापहरं परम्‌॥ 
नारदः परिपमच्छ बह्माणे कमलासनम्‌ ॥ ३ ॥ फाल्गुनस्यासिते पक्षे विजयानाम या ततिथिः ॥ 
तस्या ब्रत॑ सुरश्रेष्ठ कथयस्व प्रसादतः ॥ ४ ॥ इति पृष्टो मारदेन अत्युवाच पितामहः ॥ बच्चो- 
वबाच ॥ शरण नारद वक्ष्यामि कथा पापहरां पराम्‌॥ ५॥ पुरातनं द्वतं झोतत्पवित्रं पापनाश- 
नम ॥ यन्न कस्यविदाख्यात॑ मयेतद्विजयाब्रतम्‌ ॥ ६॥ जय॑ ददाते विजया नणां चेवन 
संशयः ॥ रामस्तपोवन यातों वषोण्येव चतुर्दश ॥ ७॥ न्यवसत्पश्ववब्यां तु ससीतश्च सल- 
क्ष्मणः ॥ तत्रेव वसतस्तस्य राघवस्थ महात्मनः ॥ < ॥ रावणेन हृता भायों सीतानाम्नी तप- 
स्विनी ॥ तेन हुःखेन रामोइसौ मोहमभ्यागतस्तदा ॥ ९ ॥ श्रमअठायुष॑ तत्र दद््े विगताथु- 
पम्‌ ॥ कबन्धों निहतः पश्चाद्धमतारण्यमध्यतः ॥ १० ॥ राज्ञे विज्ञाप्य तत्सबे सोडपि मृत्युवश् 
गतः | सुप्रीवेण सम॑ सख्यमजय समजायत ॥ ११ ॥ वानराणामनीकानि रामाये संगतानि 
वे ॥ ततो हनूमता दृष्टा लड़ोद्याने ठु जानकी ॥ ११॥ रामसंक्ञापनं तस्ये दत्त कर्म महत्कृ- 
तम्‌ ॥ समेत्य रामेण पुनः सब तत्र निवोदितम्‌॥ १३ ॥ अथ श्व॒त्वा रामचन्द्रो वाक्य चेव हनू- 
मतः ॥ सुप्रीवालमतेनैव प्रस्थानं समरोचयत्‌ ॥१४॥ स गत्वा वानरेः सार्ध तीर॑ नदनदीपतेः॥ 
दृष्ठाब्धि दुस्तरं रामो विस्मितोःभ्त्कपित्रियः ॥ १५ ॥ प्रोत्फुछलोचनो भूत्वा लक्ष्मणं बाक्यम- 
ब्रवीव ॥ सौमित्रें केन पुण्येन तीय॑ते वरूणालयः ॥१६॥ अगाधसालिलेः पूर्णो नक्केभ्ीमेः समा- 
कुलछः ॥ उपाये नेव पश्यामि येनेव सुतरो भवेत्‌॥ १७ ॥ लक्ष्मण उवाच ॥ आदिदेवस्त्वमे- 
वासि पुराणपुरुषोत्तम ॥ बकदाल्म्यों सुनिश्चात्र बतंते द्वीपमध्यतः॥ १८ ॥ अस्मात्स्थानादो- 


जनाद्ध॑माश्रमस्तस्य राघव | अनेन दृष्ठा बह्माणों बहवों रघनन्दन ॥ १९॥ त॑ प्ृच्छ गत्वा 





हे राजेन्द्र | फाल्गुन महीनेके कृष्णपक्षमें जो एकादशी 
भे 0 ७ ७ | 

होती हैं उसका वण्न में करता हूँ । उसका नाम “विजया! 
है क्योंकि उसके करनेवारलॉंकी सदा विजय होती है ॥श॥ 
उसके ब्रतका माहात्म्य सब पापॉकों हरनेवाछा है।कम 
लासन ब्रह्माजीसे नारदूजीन पूछा था ॥ ३ ॥ कि; फाल्गुन 
महीनेके कृष्णपक्षम विजया मामकी जो तिथि है उसका 
त्रत हे सुरक्षे् | कपाकर वर्णन कीजिये ॥ ४ ॥ ब्रह्माजी 
बोले कि, हे नारद ! में तुम्हें उसकी पापहारिणी कथाका 
वर्णन करता हूँ उसे श्रवण करो ॥ ५ ॥ यह त्रत बहुत 
प्राचीन कालसे चला आता हैं और पापोंका नाश करने- 
वाला है । मेंने तुमको छोड अभीतक इसका रहस्य किसी 
दूसरेको नहीं बतछाया है ॥ ६ ॥| यह विजया एकादशी 
अवश्य ही करनेवाले मनुष्योंको जय प्रदान करती है। 
इसमें संशय नहीं ह.। महाराज रामचन्द्रजी १४ वर्षतक 
सीताज़ी ओर छत््मणजीके साथ तपोवनर्मं जाकर प्च- 
वढीमें जब निवास कर रहे थे उस समय महात्मा रामचन्द्र 
सदहाराजकी ॥७॥८॥ तपस्विनी भार्यां सीतामाताको 
रावणने दर लिया था इस दुःखसे भगवानको बडा मोह 
इंआ! ॥ ९) उन्होंने अमण करते करते सरणासन्न जठायु 
को देखा और प्रीछे जंगलके अन्दर कबन्धका 
किया ॥ १० ॥ वह कबन्धसरवे समय अपनी 


78% है । होने द्कि न 
१. दशा होने आाद स्ब्‌ वृत्तान्त, राम चन्द्रजीको कह- 


(५3 42४>५33५3५3६५५8५॥॥३०३४७७॥७३५५३५३५॥॥४३०७४७५-3५५६५,४+3७०७७७७०४॥७३३३५॥०३५३६७॥३३७५३३४३७++५३५५/५६५७४७५॥३७॥७७७४३५५++४७५३७७५३७५३७॥३५४७३७७५७॥॥७+४७७७७७४७७७६६७५४७३३७५४३॥॥ा५ननामा##ावावाा भा 


कर मृत्युके वश होगया । इसके बाद सुग्रीवक साथ भग- 
वानको अमिट सित्रता हुई ॥ ११ ॥। बन्द्रोंकी सेना 
रामचन्द्रजीके लिये तय्यार कीगई । पीछे हनूमानजीते 
लंकाकी अशोक वाटिकामें सीताजीको देखा ॥ १२॥ वहां 
शमचघन्द्रजी महाराजका परिचेय देकर बड़े भारी कामको 
पूरा किया और वापिस आकर सब समाचार भगवानकों 
निवेदन किया-गया।। १३॥इसप्रकार भगवाबने हनुमावजीके 
बचनोंको सुबकर सुश्रीवकी सलाहसे लंका जानेकाविचार 
किया ॥ १४ ॥ बन्द्रोंके प्यारे भगवान्‌ राम वानरसेना 
के साथ नदनदीपति समुद्रके किनारे जाकर उसको 
दुस्तर देखकर बडे विचारमें पड गये॥ १५॥ भगवाबने 
खिले नेत्रोंके साथ भपने छोटे भाई लक्ष्मणजीसे पूछा किः 
भैया यह जलनिधि किस प्रकार कौनसे पुण्यसे पार किया 
जा सकता है !॥ १६ ॥ इसमें अगाध जल हैं । बडे बड़े 
भयंकर नाकू भादि जलूचरोंस भरा हुआ है। इसढिये 
कोई उपाय नहीं मादूम होता कि, इसको केसे पार किंया 
जवि ? ॥ १७।) रक्ष्मणजी बोले कि, महाराज ! भादि: 
देव और पुराणपुदषोत्तम तो आप ही हूं। पर तो भी इस 
द्वीपफे अन्दर बकदाटभ्य नामके मुनि ॥ ३८ ॥| 
यहांसे ढो कोशकी दूरीपर आश्रममें निवास करतेंह ! 
हे महाराज ! इन्होंने अपने जीवनमें बहुतसे अज्ञात 
देखा है ॥ १९॥ इसढिये हे राजेन्द्र |! आप इन 


हा मन» >> ऊन सर पल सम कक कक ु 44945 /2 2८ 2४ पटक 04#0 3.5. ०० ६००००७- ३ कि खद 2,060.20 02747 400 /०४९००००:६० ६०५ (०६० २५०५ ८४६०८ ४८६ ६ ८०7०: 7 / ५2 2२४' 


धाषाटीकांसमेंतः 





राजेन्द्र पुराणमुबिपुद्धवम्‌ ॥ इति वाक्य ततः श्रुत्वा लक्ष्मणस्पातिशोभनम्‌ ॥ २० 


राघवों द्र०८ बकदालभ्यं महासुनिम 


। जगाम 


! 
अणनाम झुनि मूतना रामो विष्णमिदामराः ॥२१॥ सुनि- 
त्ात्वा ततो राम पुराणपुरुषोत्तमम ॥ कनापि कारणनंव भविष्ठ माठवीं ततुम्‌ 


उबाच 


सऋषिस्तत्र क््तो राम तवागमश॥ राम उबवाच ॥ त्वत्मसादादहो विप्र वरूणालयसत्निधिम ॥२३। 
आगतो$छ्मि ससेन्योत्र॒ लड्ढां जेतुं सराक्षसामभवतश्ाातऋषथन तीयेलेप्धियंथा मया ॥रण॥। 


तमुपाय वद मुने प्रसाद कुछ सुब्रत ॥ एतस्मात्कारणादिव द्र॒ष्ठुं त्वाहमुपागतः 
बाच ॥ कथथिष्याम्यहं राम ब्तानाझुत्तम व्रतम।कतेन घेत सहला व्जयस्ले मविष्यति ॥२६ 
लड़ा जित्वा राक्षसांश्व दीया कीर्तिमवाप्श्यसि ॥ एकाप्रमानसो भूत्वा ब्रतमेतत्समाचर ॥२७। 
फाल्गुनस्यासिले पक्षे विजयेकादशी भवेत्‌ ॥ तस्या ब्रते कृते राम विजयस्ले भविष्यति ॥२८। 
विजिस्तु श्रयर्ता राम ब्रतस्यास्य फलप्रदः ॥ 


निःसंशरय सद्चद्र च तरिष्यसि सवानरः 


ब्शे यह 


मुनिरू- 
| 
| 
| 


दा 


दशमीदिवसे प्राप्ते कुम्ममे्क च कारयेत्‌ ॥ हम वा राजतं वापि ताम्र वाष्यथ मुन्मयम्‌ ॥रे-। 
स्थापयेत्स्थण्डिले कुम्म॑ जलपूण सपल्लवम ॥ सतधान्धान्य चस्तस्य यवातुपारे विन्यसंत्‌ ॥३१। 
तंस्थोर्पारे न्यसेदेध हम नारायणं प्रश्चम्‌ ॥ एकादशीदिने प्राप्त आताखान समाचरेत ॥ ३२२ ॥ 
निश्वले स्थापित कुम्मे गन्धमाल्याठलोपिति ॥ गन्धेदूपेस्तथा दीपनवेश्वेविविधेरपि ॥ ३३ । 


दाडिमेर्नालिकेरेश्व पूंजयेच विशेषतः ॥ कुम्माम्रे तदिन राम नेतव्यं भक्तिमावतः ॥ ३४ 
जागरण तब्र तस्याग्रे कारयदूबुधः ॥ द्वादशीदिवसे मात्ते मातग्डस्थोदये नूप ॥ रे५ 


रातों 
नीत्वा 


कुम्भ जलोइशे नद्यां प्रस्तवणे तथा॥तडागे स्थापयित्वा वा पूजयित्या यथाविधि ४३६॥ दुद्यात्स- 
देवतं कुम्म॑ ब्राह्मणें वेदपारगे ॥ कुम्भेन सह राजेन्द्र महादानानि दापयरेत्‌ ॥ रे७॥ अनेन 
विधिना राम यूथपः सह सड़्तः ॥ कुछ व्रत मअयत्नेन विजपसते भविष्यति ॥ रे८ 





पांस चलकर उनसे पूछिय । वे पुराने श्रेष्ठ मुनि हैँ,छब्टनण 
जीके इस झुन्दर वचनको सुनकर ॥२०।॥ भगवान्‌ दाल्भ्य 
हामनिकों देखनेके छिए चल दिय | वहां रामचन्द्रजीने 
मुनिराजको वेसेही शिरसे प्रणाम किया,जसे देव विष्णुको 
करते है ॥२१॥मुनिराजने भी पुराण पुरुषोत्तम भगवानको 
मानुपी शरीर धारण करते देख ॥२९॥ यह पूछा कि,सहा- 
राज ! आपका आज कहांसे पधारना हुआ? भगवान्‌ बोले 
कि, महाराज | आपकी क्ृपासे में आज राक्षसॉंकी लूँक्राको 


जीतनेके लिए इस समुद्रके किमारे आयाहूं॥२३॥।में राश्षसों 


सहित छंकाको जीत आपकी अनुकूछतास जिस तरह इस 
समुद्रको पार कर सकूँ । ऐसा उपाय है सुत्रत . सुझ कृपा 
कर बताइये | इसलिए में आपका दशन करनेंको यहां 
आया हूं॥ २४ ॥ २५। मुनिमहाराज बोले कि; है राम 

प्र आपको बहुत उत्तम ब्रतका उपदेश करूंगा । जिसको 
करतनेस एकदम तुम्हारीही विजय होगी लंकाको 


तथा उसके राक्षसॉकों जीतकर तुम बडीकीति ग्राप्त करोगे | 
इस कारण एकाग्रमसन होकर आप इस ब्रतकों कीजिए 

२७ ॥ है राम ! फास्गुनके कृष्णपक्षम विजया नासकी 
एछादशी होती हे, उसके ब्रतको करनेसे तुम्हारी अवश्य 
निःसन्देह आप समुद्रको पार करेंगे 


विजय होगी 


मिट्टीका बनावे |! 


तथा आपकी वानर सेनाभी उसे तेर सकेगी । इस फछके 
देनेवाले ब्रतकी विधि सुन लीजिए ॥ २९ ॥ जब दुक्षमीका 
दिन प्राप्त हो तब एक घडा सोनेका या चादीकः तंवेका यः 
ओर घडेकों वेदीपर जलस भर 
और पत्ते छगाकर स्थापितकरे । उसके ऊपर सप्र धान्योंकों 
अथवा यवोंको गिरावे ।३१॥ उसके ऊपर नारायण भरग 
वानकी सुवर्णकी बनी हुईं मूर्ति स्थापित करे। एकादशीका 
दिन प्राप्त होनेपर प्रातःकारू स्तान करे ३२॥ स्थापित 
किए हुये मिश्चवक कुम्भपर गनन्‍्ध माला धारण कराव तथा 
धूप दीप और अनेक तरहके नेवेद्य ओर नाना शकारके 
फलों और अनार नारियछसे उनकी पूजा विशेषरूपसे करे 
३३ ॥ हे राम ! सब दिन बडी भक्तिस उस कुभक आगे 
बिताव।३४।॥इसीके आगे रातमे जागरण कर। हूँ राजन्‌ 
द्वादशीके दिन सूये उदय होनेपर ॥ ३५ ॥ उस कुस्मको 
किसी जलाशय फे निकट नदी या झरनेके निकट छेजाकर 
था विधि पूजन करे॥ ३६ ॥ पीछे देवतासहित उस 
कुम्भको किसी वेदपारग त्राह्मणकों दान कर दें वधा और 
भी महादानोंको उसके साथ दें | ३७ ॥ इस प्रकारसे हे 
राम! अपने सव सनापतियोंक साथ मिलकर यत्नस ब्रतको 
पूण करो; इससे तुम्हारी अवश्य विजय होगी ॥॥ ३८ 





१ नारायण्िति शप 


अतराजः 


(४१६) [ एकादशी-- 


इति श्रत्वा बद्ो रामो यथोक्तमकरोत्तथा ॥ कृते ब्रते स विजयी बनूव रघुननदनः ॥ ३९। 
अनेन विविना राजन्ये कुबेन्ति नरा ब्रतम्‌॥ इहलोके जयसस्‍्तेषां परलोकस्तथाएक्षय; || ४० ॥ 
एतस्मात्कारणात्पुत्र कतेव्य विजयात्रतमू ॥ विजयायाश्व माहात्म्यं स्वेक्िल्बिषनाशनम्‌ ॥ 
पठनाच्छवंणात्तस्य वाजपेयफर्ल लभेत्‌ ॥ ४१॥ इति श्रीसकनूदपुराणे फाल्गुनकृष्णेकादअ्या 
विजयानाम्न्या माहात्म्यं समाप्तम्‌ ॥ 
अथ फार्गुनशुक्डैकादशीकथा ॥ 

मान्धालोवाच ॥ वद बह्मन्महामाग येन श्रेयो भवेन्मम ॥ कृपया लद्ध॒हयोने यद्यत॒म्राह्मतो 
मधि ॥ १ ॥ सरहस्य॑ संतिहासं प्रतानामुत्तमं त्रतम्‌ ॥ वसिष्ठ उवाच ॥ कथयाम्यधुना तुम्य॑ 
सर्वेत्रतफलप्रदभ्‌ ॥ २॥, आमछकक्‍्पा बत॑ राजन्‌ महापातकनाशनम्‌ ॥ मोक्षद सर्वलोकानां 
गोसहसर्नफलप्रदम ॥ ३ ॥ अन्रेयोदाहरन्तीममितिहासं प्रातनम्‌ ॥ यथामुक्तिमल॒पाप्तो व्याधो 
हिलासमन्वितः ॥ ४॥ वेदिश नाम नगर हष्टपुष्टजनावृतम्‌ ॥ ब्राह्मण: क्षत्रियेवेद्यः शुद्रेश्र 
समलइकृतम॥५॥ रुचिरं नृपशादँल बह्मघोषनिनादितम ॥ न नास्तिको दुष्कृतिकस्तस्मित्पुर- 
वरे सदा ॥ ६॥ तत्र सोमान्वयों राजा विरुपयातः शाशिबिन्दवः ॥ राजा चेत्ररथों नाम धर्मात्मा 
सत्यसंगरः ॥ ७॥ नागायुतवलः श्रीमाजछल्ल शास्राथंपारगः ॥ तस्मिज्छासति धमत्षे धर्मा- 
त्मनि धरां प्रभो ॥ ८ ॥ कृपणों नेव कुत्रापि हह्यते नेब निर्धेन। ॥ सुकालः क्षेममारोग्यं न 
दु्निक्ष न चेतयः ॥ ९ ॥ विष्णुभक्तिरता लोकास्तह्मिन्पुरवरे सदा ॥ हरिपूजारताश्रेव राजा 
चापि विशेषतः ॥ १० ॥ न णुक्कां नव कृष्णां च द्वादशी झुखते जनाः ॥ सर्वधर्मानपरित्यक्य 
हरिभक्तिपरायणाः ॥ ११ ॥ एवं संवत्सरा जग्मुबहवों राजसत्तम ॥ जनस्य सौख्यथुक्तस्य हरि 
भक्तिरतस्थ च ॥१२॥ अथ कालेन सप्राता द्ादशी पृण्यसंयुता॥ फाल्युन्नस्यथ सिते पक्षे नाम्ना 





इस वनचको सुनकर भगवान्‌ रामने यथा विधि उस ब्रतका 
अनुष्ठान किया और इससे उनकी विजय हुई ॥ ३९ ॥ है 
राजन | इस्र विधिस जो छोग इस उत्तम ब्रतको करते हें 
उनकी इस छोकम जय और परलोकर्म शुसगति प्राप्त होती 
हैं | ४० | इसढिए दे पुत्र | विजया ब्रतकी अवश्य करना 
चाहिए उसका माहात्म्य सब पापोंको दूर करता है, पढने 
ओर सुननेसे वाजपेययज्ञका फछ प्राप्त होता है ॥ 9७१॥ 
यह श्रीस्कन्द॒पुराणकी कही हुईं फागुन कृष्णा विजया 


वर्णास अलंकृत नगरमें घन्द्रवेशी चेत्ररथ नामक राजा राध्य 
करते थे जिसके कि, नगस्में ब्राह्मण,क्षत्रिय, बेश्य तथाअन्य 
गेग बड़े ही सुखी थ, हे नृपश्चादूछ ! सदा वेदुकी रुचिर 
ध्वनि हुआ करती थी । तथा कोई भी नास्तिक तथा पापी 
मनुष्य कभी भी इनके नगरमें निवास नहीं कर पाता था 
| ५ ॥ ६ ॥ चन्द्रवशी शशबिब्दुका वेशधर राज चत्र 
रथ अयुत हाथियोंका बल रखता था, तथा सत्यवादी सब 
शार्तोका पारंगत था, उस धर्मात्माकों राज करते हुएकोई 


नामकी एकादशीका माहात्म्य पूरा हुआ ॥ 


अथ फारगुन शुकह्षा एकादशीकीक था-सान्धाता बोछूकि 
ह त्रह्माजीस उत्पन्न होनवाले वशिष्ठजी महाराज ! आप 
कृरपाकर एस उत्तम ब्रतका उपदेश दीजिए, जिसके करनेसे 
मेरा कल्याण हो ॥ १ ॥ वश्लचिष्ठजी बोले कि, में तुम्हें रहस्य 
सहित इतिदासयुक्त ब्रतोंके उत्तम ब्रतको कहता है जो कि, 
समस्त ब्रतोंके फ्ॉको देनवाली हैं । वो महापापोंके नाश 
करनेवाली ' आमछकी ? एकादशी है जो सोक्ष प्रांप कराने 
वाढी एवम्‌ सहस्र गोदाप्के समान .पुण्योंकों देनेवाली हैं 
॥७४३॥ यहां पर इसका एक पुरातन इतिहास कहा करते 
कि, एक हिंसक व्याथ इसके प्रभावसे मुक्त हुआ था॥४॥ 
है राजन : देदिश नामके हृष्टपुष्ट जनोंस आचत एवम्‌ चारों 


भी गरीब रोसी या कृपण मनुष्य उसके नगरमें नहीं हुआ 
था; सदा सुम्िक्ष होता था, कभो दुसिश्ष या और कोर 
उपद्रव नहीं होता था || ७-९ || उस नगरम सब ढाए 
विष्णु भगवानके भक्त थे और राजा भी विशेष करके 
हरिपूजापरायण था ॥ १० ॥ कोई भी पुरवासी मठुय 
एकादशीके दिन भोजन नहीं करता था। खब धर्मोको 
छोडकर सभी रुकेग केवछ भगवानहीकी भक्तिमें दपर 4 
«११ ॥ है राजसत्तम | इस प्रकार जनोंको छुख दनवाढे 
हरिभक्तरत उस राजाको अनेरझू वर्ष हरिभक्तिमें छीन २ 


हुए व्यतीत होगये || १९।॥ समयसे पावन तिथि डक 
दृशीभी आपहुंची जो फ़ाल्युनके शुह्॒पक्षमें आमढकीके 


१ एकादश्ीमित्यथ: ) 


ब्रतानि, 


कर 
भाषारीकासपमेल: । 


( ४२७ ) 





कान्काधामाधरकाएय ््ुँिअघचघजघओिणय?9 अ स्‍नतन-णओओ-+---_+त++ 


ह्यामलकी स्मुता ॥ १३ ॥ तामबाप्य जता; सर्वे बालझाः स्थविरा तप ॥ नियम चोपवबासं च 
सर्वे चऋनरा विनो ॥१४॥ महा हल बनते ज्ञात्वा स्नान कृत्वा नदीजलानच देवाऊुये राजा लो ऋ- 
पुक्तो महामभु) ॥ १५ ॥ प्‌णेकृुष्णमब स्थाप्प छ्रोपानहलेयुलम ॥ पशथ्चरत्नलमायु कं दिव्यग- 
वखाधिवालितम्‌ ॥ ६॥ दीपमाहुान्वितल चेव जामदम्यपघमच्ितम । पूजयामलुसव्यम्रा घात्रीं 
च मुनिभिजना ॥ १७॥ जामदग्तप नमस्तेःर्तु रेजशऋातम्दवर्घन ॥ अमलक्रीदरतच्छाय सुक्ति- 
मुक्तिवरपद्‌ ॥ १८ ॥ थात्रि चातसबघुद्धते सवेवातकताशिनि॥ आमलक्कि नमस्तुब्प एाय्यो 
दर्क मम ॥ १९ ॥ थात्रि बहा स्वरूरासि त्व॑ तु रामेग पूजिता ॥ प्रदक्षिंग विवनेन सरयापहरा 
भव ॥ २० ॥ तत्र जागरण चकुज्ेत 5 सर्वे स्वन्न हत। ॥ एतल्मित्रेव काले तु व्याचघ्तत्र समा- 
गतः॥ २१ ॥ क्षुवाश्रम परिव्यातों महाभारेग पीडितः ॥ कुटुम्बाथ जीवबाली सर्वव्रमत्रहि* 
प्कूतः ॥ २२॥ जागरे तत्र सोएपपश्यद|मलक्ष्पां श्वाजितः ॥ दीपमालाकुर दृद्ठा तजेत निष- 
साद सः॥ २३२॥ किम्रतद्नि सबिनत्य प्रातवान्विस्मयं शशम्‌ ॥ दुदर्श कुम्मे तत्रस्थे देवं 
दमोदर तथा ॥ २४ ॥ ददशाम छड्रीवृक्ष तत्रस्थांव्ेव दीपकाव्‌ ॥ वेष्णव च तथाऊख्याने शुश्राव 
पठतां तृणाम्‌ ॥ २५ ॥ एकादस्याश्व माहात्म्य॑ झुश्ाव क्ुबितोषषि सब्‌ ॥ जाम्रतस्तस्यथ सा 
ांत्रिगता विश्मितवेतलः ॥ २६ ॥ ततः अमात समये जिवि तुनेंगर जता: 8 व्याधोडईपि झहमा 
गत्य बुचचुजे प्रीतमानझ) ॥ २७॥ ततः काॉछेत महता व्यावः: पं्यत्व॒मागतः ॥ एकाइइयाः 
प्रभावेण रातों जागरणेन च ॥२८॥ राज्य प्रपेदे सुमहच्चतुर इवलाम्वितम्‌ ॥जयत्तीनत/|म नगरी 
तत्र राजा विद्रथः ॥र९॥ तह्मात्खे तनथो जज्ञे नाम्ता वसुरथों बली ॥ चतुरड्बलोपेतों घन- 
पान्यसमम्वित; ॥३०॥ दशायुतानि ग्रामार्त बुछुजे अगरवर्जितः ॥ तेजसादित्यसद्शः 
कान््या चन्द्रसमत्रभः ॥ ३१ ॥ पराक्रते विष्ठुसमः क्षमया शथिवीलमः : धार्मेकः सत्यवादी 








तामसे विख्यात है ॥ १३ | है राजन्‌ | उसके आन होनेपर | होकर उसी जगह बेंठ गय।॥।२३॥उसको नई बात शोचकर 


वहांके बूढों और बच्चों सबोनेह्री नियम्रयूवंक उपवास 


छोगोंके साथ ॥१%॥ एक पूणे कु न्तकों दीपक, छत्रः जूती- 


कुटुम्बके वास्ते जीव्रोंझा घात करता लंबा सी धर्मासे 
गिराडुआ था ।२२॥ उप्त सूखे 5र:बने आमकुकोके निकट | नर विप्णनि का 
| घ॒र्मात्मा सद्यशदी और वि्युनत्ति पशायण बा। ३5 जश्न 


जागरण होता हुआ देखा! उस जगहफी रीपावीसे उसन् 


व । 





| इकवा रगीही बडा विस्मय हुआ। तथा कुम्भके ऊपर विराज- 
किया ॥१४॥ राजानभी इस त्रतकों महाफकदायी समझ- | 
क्र नदीमें स्तानकर भगवाबूक मन्दिरिम सघ्र राजकांय । ञ्‌ मलेके वृश्षकतो ओर 26 जगहकी दीपमालाको देखा | 
“ से | तथा वेष्णबोंकी कथाको त्राह्मणोंके द्वारा कहते हुए छुना 
जोड़ा, पचरत्न एबं इत्र आदि वस्तुओंस वध सजाकर 
तथा उसपर जामरग्न्यक्ों मूँत्ति स्वापित कर पूजा की । | यमन अखकी कट 
और मतुः्योनेमी चडी साजधनीस धान्रीकी पूजा की | ैगा। और इसी आश्चर्यम इसकी वह रात्रि जागते हुए 
॥१६ ॥ १७॥ हें रेणुकके आनन्द बढानेवाले ! हे आमल- 
हर नेबाढे ! हे मुर् | गये । और व्याधनेभी प्रसन्न होकर घरमें आ भोजन किया 
कड़ी छायाको घारण करनेवाले ! हे मुक्ति और मुक्तिको | गये | और व्याधन्तभा प्रसन्न हाकर 7स्स 
देनेवाढे हे जामदरत्य ! ॥१८॥ हे खब पापोंको नाश करने- | 
वाली घातासे उत्पन्न हुईं आमदक्ति | तुर्मे नमस्कार हैं । मेरें | 
७ ६३ हक | 
इस दिये हुये अध्यको स्वीकार कर ॥१९॥ हैँ घाति : तुम 


नल पु हि. ४ कर, मन 
त्न्नसवरूपा हो; तुम्हारी पूजा रामचन्द्रजीने को हैँ। इस | भारी राजा हुआ । उसने चतुरंगसेना और धनघान्यसे 


नम] (०, ०९७. पृ । बह के कक, रा 
छिये मेरी इस प्रदक्षिणात्रे सव पारोंकीं नष्ट कर ॥ ९० | | सज्पन्न राज्य पाया || २९ ॥ उसने चतुरंग बछसे युक्त एवं 


इस । ०३ श३ हक कक य्रृ | कक 
कब कक 8 स्र॑स्व॒भक्तिप्त हज हल | धवधान्यसे समन्वित व्छुरथ नामके पुत्रकों उत्पन्न किया 
। अं ह क्र ठ्यू कु रथ ५ १] का, हू ब ञ्य 0. 
नो भूत बक्रावट हि पीडासे कष्ट पारहा था । निभय होकर दश अयुत ग्राम का राज्य किया 
बे है की | तेजमें सूचेके और 


| प्राक्रतम विस्शुके और क्षमम प्रद्ववी क सलमान था। वडा 


मान भगवान्‌ दामोदरकी सूर्तिकासी दशन किया ॥२४॥ 


॥ २५ ॥ भूखे रहते हुएमी उसने एकादुशीडे माहात्म्यकों 
समाप्त होगयी ॥ २६ ॥ प्रातःकारू सब छोग नगरफमें चढ़े 
|| २७ ॥ तव कुछ समयके बाद वह व्याध मरगया किन्तु 


उच्च एकाद्शीके प्रभावस तथा उस दिन राजिके जागरणसे 
॥ २८ ॥ जयंती नगरीमे राजा विदूरथके नामसे वह बड़ा 


सुन्द्रतार्म चन्द्रमाके समान था ॥३११ 






» 7 :पक्तिपरायगः ॥ रे२ ॥ बह्क्ञः कमशीलगश्र प्रजापएलनत तत्पर: ५ ॥ यजते विविधार 
४:॥प 5 राजा परदपेहा ॥ ३३ ॥ दानानि विविधान्तव प्रददाति च सवंदा ॥ एकदा मृगयां 
थानों दैवान्मागपरिच्युतः ॥ ३४ ॥ न दिशो नेव दिददिशो वैत्ति तत्र महीपतिः ॥ उपधाय य 
हो उमराकी गहने बने ॥ ३५॥ श्रान्तश्र क्षबितोः्यन्तं संविवेश महीपतिः ॥ अज्ान्तरे 
>मिपा पाया पर्वतान्तरवासमाक ॥३९॥ आययो तत्र यत्रास्ते राजा परबलादुनः ॥ कृतवै- 


जा छ 
॥३्५ 





पु 


रा-] ते राज्ञा स्वदेवोपतापितए ॥ रे७ ॥ परिवार्य ततस्तस्थू राजान भूरिदक्षिणम्‌॥ हन्यता 
हनन चाय॑ पूथे वेरविरुद्धवीः ॥ २८ ॥ अनेन निहताः पूव जितरों शातरः खुतः ॥. पोताश्र 
.. आय व मापलाथ निपातिता३ ॥ ३९५ ॥ निष्कासिताश्व स्वस्थानादिक्षिप्तात्थ. दिशो दश॥ 


जज 





एुयजदुरस्ता ते सर्वे तत्रेत हस्तुुद्यताः ॥ पशिश्व पढ़िशे! खड्लेबोणे्वेत्नि संस्थितेः॥ ४०॥ 
८, : शल्बाणि समापततन्ति न वे शरीरे प्रविशन्ति तस्‍्पातिचाषि सर्व हतशखसंघा म्लेच्छा 
८3 पजीवदेहए ॥ ४१ ॥ यदावि चलिठुं तत्र नशेकुस्तेरयों शशम्‌ ॥ शक्त्राणि कुण्ठता 


जग5 छर्व॒ हतचेतलाम्‌ ॥ ४२॥ दीना बल्षुव॒स्‍्ते सर्वे ये ते हम्तुं समागताः॥ एतस्सिन्नेव 


कि 


धर ी 
मी 


६ 


समर 


फ 3 ते लख्य राक्षः राशीरतः ॥ ४३॥ निःछ॑ता प्रमदा होका सर्वावयवशोमभना ॥४श॥ दिव्य- 
-.. 'जआाजका दिव्यामरणमूबिता | दिव्यमल्यथाम्बरघरा शकुटीकुटिलानना ॥ ४५ ॥ स्फुलि- 


५ 


इब्यां च नेत्राभ्यां पाव्क वमती बहु ॥ चक्रो्यतकरा चेव कालराजिरिवापरा ॥ ४९॥ अस्य- 
घाष। संकुद्धा म्लेच्छानत्यन्तदुःखितान्‌ ॥ निहताश्व यदा म्लेच्छास्ते विकमेरतास्तथा ॥ ४ण 
ततो राजा जिबुद्धः सब्‌ ददशे मह॒दद्भधतम॥हतान्‌ म्लेच्छगणान्‌ हट्ढा राजा हषेमबाप समाध्टा। 
इह ने हता स्छेच्छा अत्यन्त वेरिणो मत ॥ कन चेद॑ महत्कर्म कतमस्मद्वितार्थिता ॥४९७ 


८-+ऐ:०५ काले तु वागवाचाशरीरिणी॥ ते स्थित नर्पाति दृष्ठा निकाम विस्मयान्वितम्‌ ॥एगा | 
ज्ञ'प. १ भेबीर ओर प्रजाकी प. ऊना करनेवाला होकर भी ! 
उसमे अनेक प्रकारके यज्ञ किये॥३३१॥वह सदा अनेक प्रका- | 
रके दान %रता रहता था। एक समय शिकार खेलने गया | 
देवयोगस उसको रास्ताविस्मृत हो गया ॥३४।। उत्त दिशा | 
और रा कुछभी ज्ञान न रहा, उस गहन वनमें अके- 
छाद्दी वृश्षके मूछमें ॥ ३५ ॥ भूखा, प्यासा बेठ रहा इसी | 
त्री4 उस्ी शत्रु नाशंकारी राजके पास बहांके पहाड़ी | 
स्लेंडछ छोग ।। ३६॥ आये वेरियोंक्री शक्तिको चूर करने- | 
5. <जा जहां जाता था वे वहाँही उसके पीछे पीछे 
परुँच जाते थे क्‍यों कि, राजाने उनकी दुष्टताके कारण | 
हैं एण्ड दिया था, इसी कारण उन्होंने उससे वेर | 
या था | ३७ ॥ वे बहुतसी दक्षिणा देनेवाले उस | 
(ज/क्व। तरकर खडे हो गये, पहिले वेरसे बुद्धि तो उनकी | 

















प्रविष्ट नहीं होते थ। इस कारण म्लच्छ छोग अपने शत 
अख्रोंके नष्ट होजानपर सबके सब प्राणहीन हो गये ॥४१९॥ 
जब उसके शत्रु चछभी न सके बरहोश उन सबके शत्र 
व्यर्थ होगये ॥४२॥ जो कि, उस राजाको मारने आये मे, 
वे सब गरीब बनगये । इसी सप्तय उस राजाक ररीरधे 
॥४१॥ एक स्त्री उत्पन्न हुईं। जो बडीही स्वोगसुन्द्री थी 
॥४४॥ दिव्यिगन्धयुता और दिव्याभरणको घारण करू" 
वाली थी | माछा भी दिव्य पहिनें हुए थी, बडी सुन्दर 
पोशाक पहनकरभी अत्यन्त कुटिछ नजरसे देख रही वी 
॥४५।। भक्जर जैसे नेत्रोंसि बहुतसी अभि उगछती।हा थर्म पक 
लिये हुए दूसरी काछरात्रिके समान मालूम होती थी॥४$/ 
बह अत्यन्त कुपित हो उन परमछेशित स्‍्लेच्छोंपर टूट पडी। 
ओर जब वे पापी स्लेच्छछोग मरगये ॥४७॥ तब सा 


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अर्डक है 
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कक... आया. पटाइका 
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+ 32 कल > ; 


£. . “म - £ ४ पु आप के ९ ५ ्‌ 
६ उद्ध थीढीं,इस कारण सारो मारो चिछ्वाने ठगे।३८॥पहिले | होश आया | उसने अपने खामने यह अख्य दंड । 
इस दसारें पिता भाई सुत पौत्र भागिनेय और सामा मारे | राजा अपने बरी स्डेच्डोंकों मरा हुआ पाकर बड़ा 


न 


5 ॥ ६२ ॥ इन विफारोंको घरस निकाछ दिया जो दुशो | हैआा। ४८ ॥ राजाने मनमें शोचा कि, ये मेरे अल 
'दिश्वाओंमे मारे मारे फिए रहे हैं । वे सब ऐसे कहकर | री स्लेच्छहोग यहां केसे एवं किससे मार गये 
जाको, मारने रंग उनके पास पद्िदह,पाक्च,खाड़े और बाण | किसने मेरे हिंतकी दृष्टिसि यह गजबका काम 
बनुषपर, चढ़े हुये थे || ४० ॥ यद्यपि अनेक प्रकारके सब | हैं । ४९॥ इसी समय उस राजाको बेहद विर मय 
पडा हुआ देख आकाशवाणीने -उत्तर दिया! ५९॥ 


: आंख उस राआाक झरीरपर गिरते शे कर 
आज इस राजके करीरपर गिरतेथे पर शरीरके अन्दर | पडा हुआ देख आकाशवाणीने उत्तर रिया! |. 


कुंकिज्लसटशास्यां रक्तान्यामित्यथ: । 


४9:७४ 








भाषाटीकासमेतः 


शरणं केशवादन्यों नास्ति को४ःपि द्वितीयकः 





७८ मे की । 


॥ इति श्रत्वाकाशवाणीं विस्मयोत्कट्टः 


॥ ५१ ॥ वनात्तस्मात्स कुशली समायातः स भूमिश्चुक ॥ राज्यं चक्कार धर्मात्मा घराया ८-८ 

तेशवव्‌ ॥५२॥ वसिष्ठ डवाच ॥ तस्मादामलकीं राजन ये कुबन्ति नरोत्तमाः ॥ ते यान्ति देप्ण: 

लोक नात्र कार्या विचारणा ॥ ५३॥ इति श्रीत्रह्माण्ड० आमलक्पारुयफाल्मुन शु छे कादर गदर अल त 
अथ चेन्रकृष्णेक्रादज्ञीकथः ॥ 


युधिष्ठिर उवाच ॥ फाल्गुनस्थ सिते पक्षे ता साऊमलकी मया ॥ चेत्रस्थ कृष्णप 
को विधि) कि फल तह्या ब्रहि कृष्ण ममाश्रनः ॥ श्रीकृष्ण ९: ' 


नामकादशी भवेत ॥ * 





आक. 


ँ 
ता 


श्रृणु राजेन्द्र वक्ष्यामि पापमोचनिकात्रतम्‌ ॥ २॥ यछोमशो5्ब्वीत्पष्टो मान्धात्रा चक्कईीत। 
मान्धातोवाच ॥ भगवज्छोत॒मिच्छामि लोकानां हितकाम्पया ॥ ३े । चेत्रमास्यसिते पक्ष हद; 
नामेकादशी भवेत ॥ को विधि: कि फर्ल तस्याः कथयस्‍्व प्रसादतः ॥ ४ ॥ लोमश उदाच ॥ 
चेत्रमास्यसिते पक्षे नाम्ता वे पापमोचनी ॥ एकादशी समाख्याता पिशाचत्रविनाशिनी ॥ ४ | 


शरण तस्या; प्रवक्ष्यामि कमदां सिद्धिदां नुप॥ कथाँ विचित्वां शुभदां पायी धर्म 
॥ ६॥ पुरा चेत्ररथोदेशे अप्सरोगणसेवित ॥ वसनन्‍्तसमगये प्राप्ते पुष्पेराकुलिते बने ॥ 
गन्धर्व कन्पास्तत्रेव रमन्ति सह किन्नरेः ॥ पाकशासनसमुख्याश्र क्रीडन्ते च दिवौकसः ॥ 


की 


गा 
“| 


नाएर सुन्दर किखिद्नाजेन्रथाद्नम्‌ ॥ तप्मिन्वने तु सुनयस्तपतिति बहुल तप ॥ ९॥ :ह 


मधवा रमत मचुमाधवों 


॥ एको मुनिवरस्तत्र मेधावी नाम नामत+ः॥ १० के झ॑ -. 


कै 


मुनिवर मोहनायोपचक्रमे ॥ मऊज्ञुबोवेति विरूयाता भाव तस्य विविन्वती ॥ ११॥ क्रोशमत्र 
छिथिता तस्य भयदाश्रमसब्तरिधों ॥ गायन्ती मंधुरं साथु पीडयन्ती विपाख्विकाम्‌ ॥१२॥ गायहनीं 





कि, हे राजन ! केशव मंभवानकों छोडकर और कोई | 5 
| उसका फछ क्या हू ? यह सब कृपा करके वणन कीजिये 


दूसरा शरणागतवत्सछ नहीं हैं. ' इस वचनका सुनकर 


विश्मयस अंखिं चोर गयीं पीछे उठ वत्तस वो राजा | 
| पक्षमं पापमोचनी एकादनी होती है.। बह पिडू: हे 
| नाश करती है ॥०५ ॥ हे राजन ! सुनो में तुम्हें उसकी ५ प 
डिये जो अषठलो .  नाशिनी, धमेदायित्री, सिद्धिआदा, शुभ और जिचित्र के 
डिये जो श्रेष्ठछोग आमछकी नामकी एकादशीका त्रुत करते | 
हैँ व लोग निश्चयही विप्णुछोकके अधिका टी होते हैं, इसमें | हा 

ह के | रथनामके स्थानसें वसन्तऋतुके अन्दर समस्त - 
किसी प्रकारका भी जिचार न करना चाहिये ॥०३ | यह | _ . - ठक अन्द 


श्रीत्रद्माण्डपुराणका कहा हुआ आमछकी नामवा ही फारगुन 


अपने राज्यमें कुशछ्तापूवेंक चछा आया ॥ ५१ ॥ और 
उस धर्मात्माने देवराजकी भांति प्रथिब्रीपर राज्य किया 
॥५२॥ वशिष्तजों महाराज बोले कि, है राजन! इस- 


शक्कर एकादशीका माहात्म्य सम्पूण हुआ ॥। 


का श्रवण किया । अब न्चेत्रके कृष्णा 
नाम है।। १ ॥| उसकी विधि और उसंका फड क्‍या हे? 
इसको आप कृपाकर कथन कोजिये । श्रीकृष्णजी महाराज 
बोढे कि, है राजन ! सुनो में तुम्हें पप्रमोचनी एकादशी 
को कथा कहताहू ॥ २ || जिसको चक्रवर्त्ती राजा मान्धा 
ब्राने लोगशु ऋषिस पूछी थी । मा-प्वाता क्ेडे:कि,प्रहाराज! 





मासके क्ृष्णपक्षकी एकादशीका नाम उसकी विधि »र 


॥ ४ ॥ लोमशजी बोले कि, हे राजन ! चेत्रगाए+ कृष्ण 


का वणन करताह ।।६॥ प्राचीनसमयम अप्सरा पण्डित ५ 


पुष्प विकसित द्ोगये ॥ ७ ॥ उस स्थानपर गन्धनोंकी 


| कन्यायें किन्नरोंके साथ रमण करती थीं, बया इन्द्रबबान 
ता भी वहीं आनन्द भोगकर रहे थे ॥| ८ |! उस चेन्नर- 
अथ चेत्रकृष्ण एकाद शींकी कथा-युधिष्ठटिरजी बोले कि, 50 आकर गे कि 


फालुनमही नेके क्ृष्णपक्षकी असलछकी एकादशीकी कथा- | थस अधिक सुन्द्र ओर कोई दूसरा वन नहीं था,,जहूपर 


एक|द्शीका क्या | मुनिगण अधिक अधिक तप करते हुए पाये जात 4 ॥ ५ ॥ 
| देवताओंके साथ इन्द्र वसन्‍्त ऋ)तुके आतन्दकों भावता ।! 
| उप्त जगह एक मेघावी नामके मुनिराजमी थे |! १५ ।: 
| जिनको मोहित करनेके लिये सेजुघोधा नामछी 77 फट 
| अप्सराने बीडा उठाया; वह उनके भावकों जानकर ॥ ३१३ 
| उनके अयदा नामके आश्रमके निकट एक को£.की 

में जगत्‌के कल्याणके छिये घुनना चाह॒वाहूं ॥१॥ कि चेत्र- | 


बड़ी मीठे खरसे सुन्द्र ताणीको छु्खांदु बजाने €गी॥ : ६६४ 


( ४२० ) ब्रतराजः । [ एकाइन्ली- 
















तोमथालोक्य पृष्पचन्दनवेष्टिताम्‌ ॥ कामो5पि विजयाकांक्षी शिवभक्त सुनीश्वरम्‌ ॥ १३॥ 
तस्याः शरीरसंसग शिववेर मलुस्मरन्‌ ॥ कृत्वा श्रुवों धलष्कोटी गुण कृत्वा कटाक्षकम्‌ ॥१७ 
मार्गणों नयने कृत्वा पक्ष युक्तों यथाक्रमम्‌ ॥ कुच्चों कृत्वा पटकुटी विजयायोपसंस्थितः ॥ १५॥ 
मच्जुघोषामवत्तत्र कामस्थेव वरूायैनी ॥ मेधाविनं मुर्नें दृष्ठा सापि कामेन पीडिता ॥ १६॥ 
यौवनोद्धिन्नदेहोएसों मधाव्यतिविराजते ॥ सितोपवीतसहितो दण्डी समर इवापरः।।१७॥ मच्जु- 
घोषा स्थिता तत्र दृष्ठा त॑ मुनिपुड़वम्‌ ॥ मदनस्य वह ं पाता मन्द मन्दमगायत ॥ १८ ॥ रण- 
दलयसंय॒ुक्तां शिश्नत्रुपुरमेखलाम्‌ ॥ गायन्तीं भावसंयुक्तां विलोक्य  सुनिपुद्धवः ॥। १९ ॥ मद- 
नेन ख्सेन्येन नीतो मोहवर्श बलाद ॥ मख्ज्ञघोषा समागम्य माने दृष्ठा तथाविधम्‌ ॥ २० ॥ 
हावभावकटाशघ्षेस्तु मोहयामास चाड़ना ॥ अधः संस्थाप्य वीणां सा सस्वजे त॑ सुनीखरम्‌ 
॥ २१॥ वल्लीवाकुलिता वृक्ष वातवेगेन वेषिता ॥ सोषपि रेमे तया साद्ध मेधावी हनिपुद्वः 
॥ २२॥ तस्मिन्नेव वनोदेशे दृष्ठा तदेहम्ुत्तमम्‌ ॥ शिवतत्व स विस्मृत्य कामतत्त्ववशं गतः 
॥२३॥ न निशां न दिन सोषि रमखानाति कामुकः ॥ बहुलश्च गतः कालो मुनेराचारलो- 
पकः ॥ २४॥ मख्जुंघोषा देवलोऋगमनायोफ्वक्रमे ॥ गच्छन्ती प्रत्युवाचाथ रमन्तं मनिपुड़- 
वम्‌ ॥ २५ ॥ आदशेो दीयतां ब्रह्न स्वधामगमन/णय में ॥ मेधाव्युवाच ॥। अद्येव त्वे समायाता 
प्रदोषादों वरानने ॥ २६ ॥ यावत्ममातसघ्या स्यात्तावत्तिष्ठे मद्तान्तिके ॥ इति श्रुत्वा मुने- 
वोक्यं भयभीता बसूव सा ॥ २७॥ पुनर्वे रमयामास त॑ मुनि तृपसत्तम ॥ सुनिशापभयाद्धीता 
बहुलान्परिवत्सरान्‌ ॥ २८ ॥ व्षाणि सप्तपश्चाशन्नवमासान्‌ दिनत्रयम्‌ ॥ सा रेमे सानिना तस्प _ 
निशादंमिव चामवत्‌ ॥ २९ ॥ सा ते पुनरवाचाथ तस्मिन्काले गत मुनिम्‌॥ आदेशो दीयतां 





उस पुप्प और चन्दनसे छिपटी एवं गाली हुईं मव्जुघोषाको 
देखकर विजयाभिढाषी कामदेव भी श्िवभक्त मुनीश्रवरकों 
॥ १३ ॥ शिवजीके वेरका स्मरण करके उसके शरीरके 
साथ लिपट कर ध्रुवकी धनुषकोटि एवम्‌ कटाक्षोंकी तीर 
फेंकनेकी रस्सी बना ॥ १० ॥ पलकों समेत नयनोंके तीर- 
कर उसके कुचोंका तेवू डेरा बना जीतनेके लिये चछ दिया 
॥ १५ ॥ सेजुधोषा साक्षात्‌ कामदेवकी सेनाके समान थी 
पर बह भी मेधावी मुनिको देखकर कामपीडित हो गई 
॥ १६ | यौवनसे अपने तरुणांग समूहके द्वारा वे मेधावी 
मुनि शुक्त यज्ञोपवीतके साथ दंडधारण कर दूसरे कामदे- 
वके समान मार्म होते थे । १७॥ मंजुघोषा उस मुनि- 
राजको देखकर कामके वज्ञगत होगईं थी इसलिये मंद मंद 
गाने छगी ॥ १८ ॥ मुनिराज भी उस संजुघोषाको चूडि- 
: योंकी एवं वहयॉंकी आवाजसे संयुक्त चथा बजते हुए नू पु- 

रॉको पहिने हुए और उसको भावपूर्ण गायनको गाते हुए 
देख ॥ १९॥ सेनासहित कामदेवके बछूपूवेक मोहके वश 
करदिय | मंजुघोषाभी मुनिको उस हालतमें देखकर।।२०॥ 
... अपने हावभावों और कटाक्षोंस और भी अधिक मोहित 
'' फैन छगी, एवं बीणाको नीचे रखकर उस्र मुनिराजको 

. ; * ता सब्जुघोषासालोक्य 





+ 
॥08 
कक 

१ आय कला 


+ हैँ 3 की 
पंस स्वत: जअमुदिति ति शषः । 
| । 5] 
कं रु है दे 





विशेष करके रिझाने छगी, तथा उनके शरीरसे ढछिपट गई 
॥ २१॥ उस मेधावी मुनिराजने वातवेगसे हिलती हुई 
बलके समान का कपाती हुईं उस संजुघोषास रमण किया 
॥ २२ ॥ वह .मुनिराज उस्र वनके स्थानमें उसके उत्तम 
शरीरके मोहमें पड शिवतक्वको भूछकर कामतत्तवके वश्नी- 
भूत होगये ॥२३॥। मुनिको उससे भोग करते हुए न दिव- 
का ज्ञान रह और न रातका । इस्त प्रकार उसका बहुतसा 
आचार नष्ट करनेवाछा समय यॉदी बीतगया ॥ २४॥ 
मजुघोषा देवछो क जाने छगी और जाती बार भोग करते 
हुए उस मुनिसे यह कहा कि ॥ २० || हे त्रह्मन ! मुझे 
अपने स्थानपर ज/नेक्की आज्ञा दीजिये | मेधावीने कहा 
कि, हे सुन्दरि ! तुम आजहीतो सन्ध्यांके पहले आईं हो 
॥ २६ ॥ इसलिये प्रातः काहुकी सन्ध्यातक तुम मेरे पास 
और ठहरो । इस प्रकार मुनिके ये वाक्य सुनकर वह 
मंजुधोषा ढरगई :;। २७ | श्ापके डरके मारे वह फिर 
मुनिको प्रसन्न रखनेके लिये हे तृपसत्तम ! अनेक वर्षों 
तक पूर्ववत्‌ रमण कराती रही ॥ २८ ।। ५७ वर्ष ९ महीने 
आर तीन दिन उसको उसके साथ रम्रण करते बीत गये 
पर उनके छिये ऐसा मालूम छुआ जैसे आधीरात | ९५९। 
उस मंजुघोबान फिर सुनिसे यह नम्नतापूर्वक कहा कि; 


य॑ विजयाकांक्षी कामो5पि शिववेरमनुस्मरंस्तस्याः शरीरसंसर्गादिकं कृत्वा शिवभक्ते मुनीधर 


श्रतानि. ] .._ भाषाटीकासमेलः | ( ४२१ ) 








ब्रह्मर गन्तव्यं स्वग॒हे मया॥२०॥ मेधाव्युवाच्ताप्रातःकालोउधुनेवास्ते श्रुयतां वचन॑ मम ॥ कुर्वे 
संध्यां दिन यावत्तावत्त्वं सुस्थिरा भव ॥ २१ ॥ इति वाक्य छुनेः श्रुत्वा भयानन्द्समाकुलम ॥ 
स्मित कृत्वा तु सा किश्वित्मत्युवाच सुविस्मिता॥ ३२२॥ अप्लरा उवाचाकियत्ममाणा विभेन्‍द्र 
तव सन्ध्या गताः छकिला।मयि प्रसाद कृत्वा तु गतः कालो विचायताम्‌ ॥३१॥इति तस्या वचः 
श्रुत्वा विस्‍्मयोत्फुछलोचन;॥ स ध्यात्वा हांदि विप्रेन्द्र्रणाममकरोत्तदा॥३२४॥समाश्र सप्तपंचाश- 
दुता मम तया सहा।ेत्राभ्यां विस्फुछिड्रान्स मुख्मानोएपतिकोपन३ ॥३२५॥ कालरूपां च तां दृष्टा 
तपसः क्षयकारिणीम॥दुःखाजितं मम तपो नीत॑ तदनया क्षयम्‌ ॥३६॥ विचार्येत्थं स कम्पोष्ठो 
मुनिस्त व्याकुलेन्द्रियः ॥ तां शशाप च मंधावी त्व॑ पिशाची भवेति हि ॥ २७ ॥ घिकक्‍त्वाँ पापे 
दुराचारे कुलटे पातकप्रिये ॥ तस्य शापेन सा दग्धा विनयावनता स्थिता ॥३८॥ उवाच वचन 
छुश्रः प्रसादं वाउ्छती सानिम्‌॥ कृत्वा प्रसाद॑ विप्रेन्द्र शापस्योपशमं कुरू  २९॥ सतां सड़ेंदि 
भवति मित्र॒त्वं सप्तम पद्‌ ॥ त्वया सह मम ब्रह्मन्‌ गताः खुबहवः समाः ॥ ४० ॥एतस्मात्कार- 
णात्स्वामिन्‌ प्रसाद कुरु सुब्रत ॥ सुनिरुवाच ॥ श्णु में वचन भद्रे शापाठपअरहकारकम्‌॥ ४१ ॥ 
कि करोमि त्वया पापे क्षयं नीत॑ महत्तप: ॥ चेत्रस्थ क्ृष्णपक्षे या भवेदेकादशी शुभा॥ ४२॥! 
पाप्मोचनिका नाम सर्वपापक्षयड्धरी ॥ तस्या व्रते कृते खुश्च पिश्वाचत्वं प्रयास्यति ॥ ४३॥ 
हत्युकत्वा तां स मंघावी जगाम पिठुराश्रमम्‌॥ तमागतं समालोक्य च्यवनःप्रत्यवाच ह्‌ ॥४४॥ 
किमेतद्विहिंत॑ पुत्र त्वया पुण्यक्षयः कृतः ॥ मेधाव्युवाच ॥। पाप कृत महत्तात रमिता चाप्सरा 
मया ॥ ४५ ॥ प्रायश्वित्त ब्रृहि मम थेन पापक्षयों भवेत्‌ ॥ च्यवन उवाच।चेत्रस्पय चासिते पक्षे 
नाम्ता वे पापमोचनी ॥ ४६ ॥ अस्या ब्रते कृते पुत्र पापराशिः क्षय ब्रजेत्‌ ॥ इति श्रुत्वा पितु- 
वाक्य कृत तेन व्रतोत्तमम्‌ ॥। ४७ ॥ गत॑ पाप॑ क्षय तस्य पुण्यग्क्तो बनूव सभ।साप्येव॑ मछूझु- 








करनेसे सप्तमपदमें मित्रता होती हूँ | महाराज | 
मुझे तो आपके साथ निवास करते अनेक वर्ष चले गये 
॥ ४० ॥ इसलिए है महाराज |! आप कगार मुझको इस 
शापस मुक्त कौजिए । मुनिजी बोले कि, है भद्दे ! झापसे 
अनुम॒दद करनेवाले सरे वचन सुन ॥४१॥ क्या करूं [ 
तुमने मरे घड़े भारी तप को इस्री तरह नष्टकर रिया हूं पर 
तो भी में तुमपर कृपा कर शापमुक्त होनेका उपाय बताता 
है सुनो । चेत्रमासकी कृष्णपक्षवाली एकादशी ॥ ४२॥ 
सब पापोंकों नाश करनेंके कारण पापसोचनी नामसे 
विख्यात है । उसका ब्रत करनपर हे सुंदरि ! तुमारी पिशा- 
जवोबिका क्षय होगा। ४३ || ऐसा बोछकर वें मुनि 
अपने पिताक आश्रमर्म चले गये उप्को आते हुए देखकर 
च्यबन ऋषिने कद्दा ॥ ४४ ॥ कि, हे पुत्र | तुमने यह क्या 
किया, किस वास्ते अपन सारे पुण्यका क्षय करडाछा है। 
मधावीने उत्तर दिया कि, महाराज! मैंने बडा. पाप कर- 
लिया है। मेने अप्सरका भोग किया है ।। ४५ ॥ इपडिए 
मुझे प्रायश्वित्त बताइये, जिससे इस पापका नाश हो | 
च्यवनजी बोले कि, चेत्रमास कृष्णपक्षम पापमो चनी 
॥ ४६ ॥ एकादश्ीका ब्रत करनेसे हे पुत्र ' पापराशिका 
क्षय होता है। पिताके ऐसे वचनोंकों सुनकर उप्तने उस 
उत्तम ब्रतकों किया ॥४७॥ उसका पाप नष्ट हो गया और 
रसे पूववत्‌ पुण्यवान्‌ होगया। उस मंजुघोषाने भी तऋरत 


महाराज ! मुझे अपने स्थानपर जाने की आज्ञा दीजिये 
॥ ३० ॥ मेधावीने उत्तर दिया कि, मरी बात सुन, अभी 
वो प्रातःकाछही हुआ है इसलिए में सन्ध्या करलूँ तबतक 
तुम यहां बेठो ॥ २१॥ इस प्रकार भय और आनन्‍्द्से 
मुनिके वचन सुनकर कुछ हँसकर उसने जबाब दिया 
॥ ३२॥ कि, महाराज ! आपको मुझपर कहकृपा करते हुए 
कितनीही सन्ध्या लुप्त हो गई हैँ और कितना समय चढा 
गया है यह आप विचार कीजिए ॥३३॥ इस तरह उसको 
बात सुनकर वह आंखें फाडकर विचारने छगे। उसने 
हृदयमें ध्यानकर प्रणाम किया ।! ३४ ॥ उसे ज्ञान हुआकि, 
मुझे इसके साथ रमण करते हुए ५७ वष बीत गए और 
इसलिए क्रोधस उसकी भआंखोंसे आग निहलछनेछगी ॥३५॥ 
मेजुघोषाको तपोभड्भ करनेवाले कालके समान देखकर 
यह विचार करली, दुःखसे अजित किया हुआ मेरा इतना 
वष इससे व्यथंही नष्ट हुआ॥ उसके होठ फडकने छगे वो 
घबडा गया । पीछे उसको शाप दिया कि; तू पिशाची हो 
जा॥ ३६॥ ३७॥ और कहा कि, है दुराचारिणी 
कुढट : पापिन ! तुर्में घिक्वार हे | यद्द वेचारी मंजुघोषा 
शझापस दुग्ध होकर चुपचाप खडी हो गयी ॥ ३८ ॥ उस 
मेजुघोषाने मुनि महाराजकी क्ृपाके वास्ते एवं उस शाप 
को झान्त करनेके लिए नम्नतापूर्वक कहा कि, महाराज ! 
झापको निवृत्त कीजिये । ३९॥ महात्माओंके साथ 


। 
त 
























(४२२ ) ब्रतराजः ! एकादशी - 


घोषा च कृत्वा तद्गतमृत्तमम्‌ ॥ ४८ ॥ पिशाचत्वविनिम्ठुक्ता पापमोचनिकात्रतात्‌ ॥ दिव्यरूप- 
धरा भूत्वा गता नाकं वराप्सराः ॥ ४९ ॥ लोमश उवाच ।। इत्थंभूतप्रभावं हि पापमोचनिका- 
ब्रतम्‌॥ पापमोचनिकां राजन ये कुर्वेज्तीह मानवाः ॥ ५० ॥ तेषां पापं॑ च यत्किश्ित्तत्सवे 
क्षीणताँ ब्रजेव ॥ पठनाच्छुवणाद या गोसहस्तफलं लमेत्‌ ॥ ५१ ॥ बह्महा हेंमहारी च उुरापे 
गुरूलतल्पगः॥ वब्रतस्थ चास्थ करणात्‌ पापमुक्ता भवलक्ति ते॥ बहुपुण्यपश्रद होतत्करणाद्वतमु- 
त्तमम्‌ ॥ ५२ !। इति श्रीमविष्यपुराणे पापमोचनिकाख्यचेन्नकृष्णेकादशीमाहात्म्यं संपूर्णम्‌॥ 


अथ चत्रशुक्लेक्रादशीकथा ॥ 


युधिष्ठिर उवाच ॥ वासुदेव नमह्तुभ्य कथयस्व ममाग्रतः ॥ चेत्रस्थ शुक्कपक्षे तु किंनामे- 
कादशी भवेव ॥ १॥ श्रीकृष्ण उवाच | श्रणुष्वेकमना राजन कथामेकों पुरातनीम ।॥ वसिदष्ठो 
यामकथयत्माग्दिलीपाय पृच्छते ॥ २॥ दिलीप उवाच १ भगंवच्छोतु॒मिच्छामि कथग्रस्व प्रसा 
दुत) | चेत्र मासि सित पक्ष किंनामेकादशी भवेत्‌ ॥ ३॥ वसिष्ठ उवनत्च ॥ साधु पृष्ठ नृपश्रेषठ 
कथयामि तवाग्रतः ॥ चंत्रस्य शुक्रपक्षे तु कामदा नाम नामतः ॥-४ ॥ एकादशी: पुण्यतमा 
पापेन्धनदवानलः ॥ श्रुणु राजन कथामेता पापन्नीं पुंत्दायिनीम्‌ ॥ ५ ॥ पुरा भोगिपुरे रम्ये हेम- 
रत्नविभूषिते ॥ पुण्डरीकमुखा नागा निवलानते मदोत्कटाः ॥ ६॥ तस्मिस्पुरे पुण्डरीको राजा - 
राज्यं करोति च ॥ गतन्धवंः किन्नरेश्वेव ह्प्सरोमिः स सेव्यने ॥७॥ वराप्सरा तु ललिता गन्धर्दों : 
ललितस्तथा ॥ उसौ रागेण संगुक्तो दम्पती कामपीडितो॥<॥रेमाते स्वगरहे रम्ये धनधान्ययुते 
सदा ।। ललितायास्तु दृदये पातिवर्सात सवेदा ॥ ९ ॥ हृदय तस्य ललिता नित्य वसति 
भामिनी॥ एकदा पुण्डरीकाद्याः क्रीडन्त: सदरसि घ्थिताः ॥ १० ॥ गीतगान॑ प्रकुरुते ललितो 
दयितां विना॥ पदंबन्धे स्खलजिहो बभूव ललितां स्मरन्‌ ॥ ११॥ मनोभाव॑ दिदित्वापस्प 





किया ॥ ४७८ ॥ उसके अभावसे वह भी पिशाचत्वसे निक- | वसिष्ठजी महाराज बोछे कि, हे रजन |! आपने बडीउत्तम 
लकर दिव्य रूप घारण करती हुईं खर्गमें चडी गयो॥४९॥ | बात पूछी है इसको में प्रसन्न हॉकर कहता हू कि, चेंत्र- 


लोभशजी बोंले कि, महाराज | इस. प्रक्वारका पापमोचन्ती 


फछ मिछता हैं] ५१॥ ब्रह्मह॒त्या,. सुवरणेस्तेय, मद्यपान 


गुरुदाराभिगमन तकका पाप्रभो इससे नष्ट होता है | एवं | 

उस नगरमें पु/डरी क नामके राजा राज्य करते थे। जिसको 
| सवा गन्धवं, किन्नर और अप्सराये करती रहतीं थीं ॥» 
चनिरा नामकी चैत्रकृष्ण एकादशीके ब्रतको कथापूरीहुई || | से जुप्स छ लिता नामकी अप्सरा! और लहितनामक 


| गन्ध दोनों गी डी प्रीति रखते थ॑ 
भय. वेत्रयुढ्लेकादशी कवा--युविध्चिएजी बोले किदे- तो ला अर व सम्पन्न पे 
वापुदेव | आपको नमस्कार है | चैत्रमासकी शुद्धपक्षकी | 


ः [| 
एडादशीका क्या नाम है, इसको आप कृपाकर बतलाइये ! | (परास था ॥ ९ || और लडिताके है स्यमें सदा पतिदेव 


निवास करते थे | ए/. सत्य यहांपर किप्ती सभामे पुंढे 
रीक आदि राजाछोग 


इस ब्रतर्धा अनुष्ठान करनेसे असीम पुण्य क्राफल प्राप्त हो ता 
है। ५२ ॥ यह श्रीभविष्योत्त पपुराण कली. कही हुयी पाती 


६ १ ॥ श्रीकृष्णजी महाराज बोछे छि, हें राज॑न्‌ ! एकमन 
होकर इस प्राचीन कथाको सुनो, जिसक्रो वसिष्ठजीने 
दिल्लीपके वास्‍्ते वणन किया था २॥ दिलीप बोले हि, 
 मद्ाशर्जा चेत्रमांसके शुरु पक्षकों एकादशी हू क्ग्रानामहै ! 
इसको आए प्रसन्न होकर मुझको व्णव कीजिए ॥ ३॥ 








| मासकी शुकह्लएकादशीका नाभ कासदा! है ॥४॥ ६ 
एकादशीका प्रभात्र हैं । जो मनुष्य इस पापमोचनीके ब्रत | 
को करते हैं ।। ५० ।| उनका सब पाप श्षोण होजाता हे | 
तथा उप्तकी कथाकों सुनने और पढनेस गोसहखदानका | 
| और सुव्रणोंसे भूषित भोगिपुर नामक नगरमें जिसमें कि, 


राजन | यह एकादशी बडी-पवितन्र है। पापरूपी इन्धनक 
वास्ते दावानल है । इसकी पापदारिणी और पुत्रदायिनी 
कथाका अ्रव॒ग करो ॥ ५॥ प्राचीत काडमें , नानारत्नोंस 


पुण्डरीक आदि बढ़े २ मत्तद्याथी नित्रस करते थे ॥ ६/ 


आननरसे रमण करते थे | पति हद सद्ठा छलिताका 


ऋडा करते थे ॥ १० 


और ढछछित अपनी प्रिया लछक्िताके जिब्मा में 
कर. रहा था। इसझा अपनों प्यारी ख्रीके स्मरण 


गानक समय जोभ्रक छडु खा ज।नेके ऋरण प१दभर्े होने 


- पुण्यबद्धिनीमित्यपि- पाठ: 


ब्रतानि, ] 


कमल अंक 


भाषाटीकासमेतः । ( ४२३ ) 










च्छ्कसट 
अम॒कन++मवाराममशशकभामममका, 


ककॉयो नागसत्तमः ॥ पदबन्धच्युति तस्य पृण्दरीके न्‍्यवेदयत्‌ ॥ १२॥ क्रोधसरक्तनयनः 
पुण्डरीकोःभवत्तदता ॥ शशाप ललित तत्र मंदनातुरचेतसम्‌ ॥ १३ ॥ राक्षसों भव इुघुंद्धे 
क्रव्यादः पुरुषादकः ॥ यतः पत्नीवशो जातो गायंश्रेव ममाग्रतः ॥ १४ ॥ बचनात्तस्य 
राजेन्द्र रक्षोरूपो बसूव ह॥ रौद्राननों विरूपाक्षों दृष्टमात्रों भयड्भगरः ॥ १५॥ बाहू योजन- 
विस्तीणे मुखकन्दरसत्रिभम्‌ ॥ चन्द्रसूयनिभे नेत्रे ग्रीवा परवेतसन्रिभा ॥ १६॥ नासारन्धे तु 
विवरे चाधरों योजनाद्धकोीं ॥ शरीर तस्य राजेन्द्र उत्यितं योजनाष्टकम्‌ ॥ १७ ॥ ईइशो 
राक्षसः सोधभूद्धजानः कमंणः फलम्‌ ॥ ललिता तमथालोक्य स्वपातिं विकृताकृतिम्‌ ॥ १८ ॥ 
चिन्तयामः[स मनसा ढुःखेन महतादिता ॥ कि करोमि छ गच्छामि पातिः शापेन पीडितः 
॥१९।इति संस्मृत्य मनसा न शर्म लभते तु सा!ंचचार पतिना साद्ध ललिता गहने वने॥२०॥ 
बश्राम विपिने दुर्ग कामरूपः स राक्षस) | निर्येणः पापानरेतों विरूपः पुरुषादक।॥ २१॥ न 
सुख लभते रात्रो न दिया तापपीडितः ॥ ललिता दुः/खितातीव पातिं दृष्ठा तथाविधम्‌ ॥ २२ ॥ 
श्रमनती तेन साद्ध सा रूदती गहने बनें ॥ कद्मचिदगमद्विन्ध्यशिखरे बहुकोतुके ॥२३॥ 
ऋष्यश्वड्रसुनेस्तत्र दृष्ठाश्रम पद शुभम ॥ शीघ्रं जगाम ललिता विनयावनता स्थिता ॥ २४ ॥ 
प्रत्युवाच मुनिरंद्ठा का त्वं कस्य खुता शुभ ॥ किमथ त्वमिहायाता सत्य वद ममाग्रतः ॥२६॥ 
ललितोवाच ॥ वीरधन्तेति गन्धवेः सुतां तस्य महात्मनः ॥| लालिताँ नाम मां विद्धि पत्यर्थ- 
मिह चागताम्‌ ॥ २६॥ भर्ता में शापदोषेण राक्षसो5भुन्महासुने ॥ रोद्ररूपो दुराचारस्तं दृष्ठा 
नास्ति मे सुखम्‌ ॥ २७ ॥ खाँप्रत॑ शाथि माँ बहन मायश्वित्त करोमे तत्‌ ॥ येन पुण्येन मे भता 
राक्षसत्वादिस॒च्यते ॥| २८॥ ऋषिरवाच ॥ चत्रमासस्य रम्भोरू शुक्रपक्षेपस्ति सांप्रतम्‌ ॥ 
कामदेकादशी नाम्ना या कृता कामदा नृणाम्‌ ॥ २९॥ क्ुरुष्व तद्भतं भद्ने विधिपृषव मयोदि- 


जया 22 हा खनन ापजील्‍े॥. लडकी कर अप -कनाफक 0९ अ:ा#क॥॥::३्न ७ काक्ाकतेप्रकक, 





छगा । कर्कोटक नागराजने उसके मनकौ बात ताडकर | घूमतें हुये ॥२१॥ न रातमें सुख मिल्ताथा और न दिनमें । 
उस असंगत संगीतकी और उसके पद्‌ सेगकी पुडरीक | इस प्रकार अपने पतिको देखकर छलिता बडी दुःखिनी 
राजाके आगे चर्चा की ॥ ११॥ १२ ॥ तब उस राजा पुंड- | हुई ॥ २२ ॥ उसके साथ घूमती रोती हुईं कभी वह इसी 
रीकके क्रोधस रक्त नेत्र हो गये। ओर मद्नांध ललितको | तरह विन्ध्याचछके शिखरोंमें चलीगई ॥ २३ |; वहां ऋष्य- 
शाप | फेर १३ ॥ ओर है कि, है इुबुद्ध : तू राक्षस शृज्ञ मुनिका आश्रम जानकर झीघ्रही बडे आदरके साथ 
नसे वह गन्धर्व राक्षस हो गया । भयंकर आंखें और भय- | टैनिराजने उसको देखकर प्रश्न के कि; है झुभ! तू 
कर मुख होगया, जिसके कि-देखनहीस डर माल्म होता | कौन है और किसर्े छडकी ६ इस आश्रसमें किसवा- 
था ॥ १५ | जिसका मुख कन्दराके समान और बाहू स्ते आई ह्‌ इसको मरे सामने सत्यरूपसे वणन ऋर?॥२०:! 
चार कोसके बराबर हो गई। चन्द्रमा और सूयेके समान | छछिता बोली कि; महाराज ! में वीर॒वन्वानामक गन्धवकी 
नेत्र बने । और प्रीवा पर्व॑तके हि तुल्य हुईं ॥ १६॥ नाकके | छडकी हैँ, मेरा नाम छलिता है और इस जगह अपने पति- 
छेद बडे विवरके तुल्य थे और ओए्ठ-दो - कोसके थे। | क्ेलिय आई हूँ ॥ २६ ॥ है महाम्ुने ! मेरापति शापदोबस 
उसका सारा शरीर हूँ राजन्‌ ३२ कोसका था ॥१७ ॥ वह राक्षस होगया है । उसका रूप भर्यंकर हें। उसका पतिव 
अपने कतोंके फलको भोगनेके लिये ऐसा राक्षस हुआ। न श्र जे लट 

छलिताने उस अपने बद्सूरत पतिको देखा ॥१८। उसको [२ परे हैं; इसलिये उसे रेख कर मुझे कुछ छुल नहीं होता 
बडी चिन्ता हुईं कि,अब मैं क्‍या करूं! कहां जाऊं  पतिदिव है ॥ महक शशि आला लक 
शापसे दुःखी हैं ।। १९ ॥ यह शोचकर उसको ढुःख हुआ, [कि में क्या प्रयश्चित्त करू जिसस मेरा पति राक्षसको 
किचित्‌ भी सुख न पा सकी और बहभी अपने पतिक साथ | गतिसे मुक्त हो जाय ॥२८॥ ऋषिजी बोले कि, हे सुन्द्रि! 
ही साथ जंगलमें भ्रमण करनेलगी ॥ २० || उस कामरूप |इस समय चैत्रमासकी शुक्ला एकादशीका दिन है उसका 
राक्षसको घृणा शून्य मतसे पाप और नरभक्षण करते वनमें | नाम सब इच्छाओंको पूर्ण करनके कारण ' कामदा है 


१ गायन्त मक्नातुरमसित्यपि पाठः 


(४२४ ) ब्रतराजः । [ एकादक्षी- 





तम्‌ ॥ तस्य ब्रतस्य यत्पुग्ये तत्स्वमत्रे मद्वीयताम्‌ ॥३०॥ दत्ते पुण्य क्षणात्तस्थ शापदोषः प्रशा- 
म्याति॥ इति श॒त्वा मुनेर्वाक्य॑ ललिता हर्षिध्राभवत्‌ ॥ हर ॥ उपोष्यकादर्शी राजन्द्वादशी 
दिवसे तदा / विप्रस्येध उमीपे छ वाखुदेबाग्॒तः स्थिता ॥ ३२२ ॥ वाक्यमूचे तु ललिता स्वप- 
त्युत्तरणाय वे॥ मया उ यद्वत॑ चीण कामदाय्रा उपोषणम्‌॥ रे३ ॥ तस्य पुण्यप्रभावेण गच्छ- 
त्वष्य पिशाचता ॥ लडऊितावचन दिव वतेमानोपि तत्क्षणे ॥ ३२४ ॥ गतपापः सललितो दिव्य 
देहो बधूव ह ॥ राक्षसत्वं गत तस्य प्राप्तो गन्धवेतां पुनः॥ रे५ ॥ हेमरत्रसमाकीणों रेमे 
लाडितया सह ॥ तो विमान सम(झठों प्र्वरूपाणिकाबुभों ॥ २९॥ दुम्पती चापि शोमेतां 
कामदायाः प्रभावतः ॥ इति ज्ञात्वा नृपश्रेष्ठ कलेव्येषा प्रयत्नतः ॥ ३२७ ॥ लोकानां च हिता- 
र्थाय तबाओ कथिता मया ॥ बद्भदवत्यादिषापन्नी पिशाचत्वविनाशेनी ॥ शरे८ ॥ नातः पर- 
तरा काचिब्रेलोक्ये सचराचरे ॥ पठनाच्छुबणाद्वापि व(जपेबफल लभेत्‌ ॥ ३२९ ॥ इति श्रीवारा- 
हपुराणे कामदानामचेत्रशुक्रेकादशीमाहात्म्मं समाप्तम्‌ ॥ 
जथ वेशाखह्न्णेकादशोकथा ॥ 

युधिष्ठिर उवाच ॥ वेशाखध्यासिते पश्े किंनामेकादशी भवेत्‌॥ महिमान कथथ में वाहुदेव 
नमोस्तु ते ॥१॥ श्रीकृष्ण उवाच ॥ सौमाग्यदायिनी राजत्निह लछोके परत्र च। वेशाखकृष्णपक्ष 
तु नाम्ता चेव वरूथिनी ॥ २॥ वरूथिन्या वते नेव सौरुष भवति सबेदा ॥ प्रापहानिश्व भवति 
सौमाग्यभात्तिरिव च ॥ ३॥ दु्भगा या करोत्पेनां सा स्री सौमाग्यमाप्ठयात्‌ ॥ .लोकानां चेव 
सर्वेषां सक्तिस॒क्तिप्रदायिनी ॥ ४ ॥ सर्वेपापहरा नृणां गर्मवासानिकृत्तनी ॥ वरूथिन्या व्रतेनेव 
मान्धाता स्वर्गति गतः ॥ ५ ॥ धुन्धुमारादयश्रान्ये राजानों बहवरुतथा ॥ बह्मकपालनिछुक्तो 
बभूव भगवान्भवः ॥ ९॥ दशवषसहस्न्‍्राणि तपस्तप्यति यो नरः ॥ तचुल्य॑ फलमाप्नोति 





॥२९॥ हु सुन्दरि ! तुम उस ब्रतको मरी कही हुईं विधिके 
अनुसार करो और उस ब्रतका पुण्य तुम अपने पतविंकों 
अपण करदो ।॥।३०।॥ उसके देने मात्रस पतिके शाप दोषकौ 
शान्ति होजायगी । इस वचनकों सुनकर ललिता बडी 
प्रसन्न हुई ॥| ३१ ॥ है राजन ! एकादशीका उपवास करके 
बह द्वादशीके दिन भगवान वाघपुदेव और ब्राह्मणके निकट 
बेंठकर । ३९॥ अपने पतिका उद्धार करनेके छिय ये 
वचन बोली कि, हे भगवन्‌ ! मेने जो यह ब्रत किया है 
और काम्रदाका उपवास किया है वो पतिके उद्धारके छिये 
किया है ॥। ३३ ।। उसके पुण्यप्रभावसे मेरे पतिकी पिश्ना- 
चताका दोष दूर हो ! छंलिताके ऐसे बोढतेही वह उस्री 
समय ।। ३४ ॥ निष्पाप होकर राक्षसतास निमुक्त हो दिव्य 


रूप धारण करके फिरसे गन्धव होगया ! ३५ ॥ उससे | जो 


फिर पूर्वेकी भांति हेसरत्न आदिसि युक्त होकर छलिताके 
स्राथ रखण किया और पहलेसे भी अधिक सुन्दर रूप 


घारण करके वे दोनों विमानपर सवार होगये ॥ ३६ ||. 


दोनों स्ली पुतण इस कासदाके प्रभावसे बडे सुखीहुए | यह 
जानकर बडे परिश्रम और कष्टसे इस ब्रतको सम्पादित करे 
( ३७ की (यह ब््महृत्यादि पापोंको नाश करनेवाढी तथा 
बल्वकों दूर करनवाढी इस एकादशीकी कथाका 
: बैन छोक हितको ०३4० + आमनास तुम्हारे साधन कियाह ।३८। | हजार वर्षतक जो मलुष्य तय करता है उससे मिलनेवाब् तुम्हारे साम 4 कियाहे ।३८१ 


ड 








चर ओर्‌ अचर सहित इस संसार्‌में इससे अधिक उत्तम 
और कोई दूसरी एकादशी नहीं हैं, इसके पढ़ने और सुन- 
नेसे वाजपेययज्ञका फछ प्राप्त होता है | ३९॥ यह अवा- 
राहपुराणका कहाहुआ चेत्रशुकह्ल कामदानामझी एक्रा 
दृशीका साहात्म्य पूरा हुआ । ह 
अब वेश्ाख कृष्णएकाद स्वीकी कथा-युघिपष्ठिरजी कहते 
हूँ कि, हे वासुदेव | आपको नमस्कार हैं। वेशाखक्ृष्णकी 
एकादशीका क्‍या नाम है और उसकी कया महिमा हे! 
इसको आप कृपाकर वर्णन कीजिये ।। १ ॥ अश्रीकृष्णनी 
महाराज बोले कि, दे राजने ! इस छोक और परढोकमे 
सोभाग्य देनेवाली वेश/ख$ष्णपक्षमें  वरूथिनी ” नामी 
एकादशी होती है ॥ २ ॥ वरूथिनीके ब्रतप्रभावसे सदा 
सौख्य पापद्दानि और सौभाग्य सुखकी प्राप्ति होती हे॥३॥ 
दुभगा स्त्री इस ब्रतको करती है वह सोभाग्यको प्राप्त 
होती है यह एकादशी सब छोगोंकों भुक्ति मुक्ति अद्ाब 
करती है ॥ ४ |। मनुष्योंका सब पाप हरण करवी हे ओर 
उनके मभवासका दु:ख दूर करती है; यानी व फिर गभमें 
नहीं अति । इस वरूथिनीहीके प्रभावस मान्धाता स्वगरम 
गये थ ॥ ५॥ औरभी घुन्धुमार प्रश्ति राजागण स्वर्ण 
निवास करते हैं। वे सब इसी वरूथिनीके प्रभावसे करेई 
इसीस भगवान्‌ शकर ब्रह्म कपाछसे मुक्तहुए ॥ ६ ॥ दक्ष 
हजार वर्षतक जो मनुष्य तव करता हैं उससे मिलनेवाढ 





जतानि, । | भाषाटीकासमेतः । (४२५ ) 








बहछूथिन्या ब्रतादपि ॥ ७ ॥ कुरुक्षेत्रे रविग्रहे स्वर्णारं ददाति यः । तत्तल्यं फलमाप्नोति 
वरूथिन्या व्रतान्नरः ॥ ८ |! श्रद्धावान्यघ्तु कुरते वरूथिन्या व्रत नरः॥ वानचज्छितं लगते 
... स्लोषपि इह लोके परत्र च ॥९॥ पवित्रा पावनी होता महापातकनाशिनी ॥ अुक्तिमुक्तिप्दा चापि 
.. क्तृणां नृपसत्तम ॥ २०॥ अश्वदानान्तपश्रेष्ठ गजदान विशिष्यते ॥ गजदानादुभूमिदान 
तिलदान ततोषधिकम्‌ ! ११॥ ततः खुवणेदानं तु अन्नदानं ततोषधिकम्‌ ॥ अन्नदानात्पर 
दानं न भूत न भविष्यति ॥ १२९॥ पिद॒देवमनुष्याणां तृप्तिरत्नेन जायते॥ तत्सम॑ कविभिः 

ः प्रोक्त क्यादानं नपोत्तम ॥ १३॥ धेठ॒दान च तत्तल्यमित्याह भगवान्‌ स्वयम्‌॥ प्रोक्तेभ्यः 
... सर्वेदानेभ्यों विद्यादानं विशिष्यते ॥ १४ ॥ तत्फलं समवाप्नोति नरः कृत्वा वरूथिनीम ॥# 
कन्पावित्तेन जीवन्ति ये नराः पापमोहिताः॥ १५॥ ते नरा नरके यान्ति यावदाभूत- 
संप्लवम्‌ ॥ तस्मात्सवेप्रयत्नेन न ग्राह्य कन्यक्राथनम्‌ ॥ १६॥ यज्च ग्रद्धाति छलोभन कन्याँ 
क्रीव्वा च तद्धनम ॥ सोपरयजन्मनि राजेन्द्र ओतुभवाति निश्चि ॥ १७ ॥ क्पां वित्तेन यो 
दद्याद्यधाशक्ति स्वलडःक्ृताम्‌ | तत्पुण्यसंख्यां केतु हि चित्रग॒प्तो न वेत्यलम्‌।| १८ ॥ तत्फल 
समवाप्नोति नरः कृत्वा वरूथिनीम्‌ ॥ कांस्य मांस मसूरात्नं चगकान कोर्द्रबास्तथा ॥ शा 
मधु परात्र च पुन्भोॉजनमेथुने ॥ १९ ॥ वेष्णवब्रतकतो च दशम्यां दश वर्जयेव॥ यूतक्रीढां 
च निद्रां च तांबूले दन्‍तथावतम्‌ ॥ २० ॥ परापवादं पेशुन्यं पतितः लह भाषणम्‌॥ क्रोध॑ 
चेवानृतं वाक्पमेकादरयां विवजेयेत्‌ ॥२१॥ कांस्य मांस मध्रांश्र क्षौद्र वितवन्नाषणम्‌ ॥ 
व्यायामश् प्रयास॑ च पुनर्भोजनमेथुने ॥ २२ ॥ क्षारं तेल परात्रं च द्वादरयां परिवजजेयेत ॥ 
अनेन विधिना राजन्विहिता येवेरूथिनी ॥ सर्वपापक्षय कृत्वा दह्यात्मान्तेहक्षयां गातिम्‌ ॥२१२ 
रात्रों जागरण कृत्वा पूजितो येजनादनः | सर्वपापविनिमुक्तास्ते यान्ति परमां गतिम्‌॥ २४॥ 


१ 


५ 





फछके समान इसके ब्रवका कल होता हैं | ७ ॥ कुरु क्षेत्र । त्रहसे कन्याके धनको ग्रहण न करे ॥ १६ ह जो आदमी 
सूर्य ग्रहणके अन्द्र सुवणके दान देनेसे जो फठ़ मिलता है | छोभमस कन्याको/ बेचकर घन ग्रदण करता हे, हे राजन ! 


वही फल इसके ब्रवस मिलता है ॥८॥ जो श्रद्धावान्‌ मनुष्य 
इस वरूथिनीके ब्रतको करता हे वह इस छोकमें और पर- 
लोऋऊमें अपनी इच्छओंको पूणे करता हैं | ९ ॥ यह पवित्र 
और पावनी एवं महापापोंकों नाश करनेवाली हें । हे नृप- 
सत्तम ! करनवालोंको भुक्ति और मुक्तिका प्रदान करती 
. है॥१०॥ घोडेके दानसे हाथीका दान अच्छा हैं। हाथीके 
दानसे भूमिका दान उत्तम हें और उससे उत्तम तिलछका 
दान है ॥ ११ ॥ उससे अधिक सुवर्णका दान और उससे 
भी अधिक उत्तम अज्नका दान होता है । अनज्नदानस अधिक 
उत्तम दान न अभ्ीतक कभी हुआ हैं और न होगा ४१२॥ 
पिवरोंकी और देवताओंकी तृप्ति अन्षसें ही होती हे ओर 
उसीके समान पण्डित छोगोंने कन्‍्यादान भी कहा हैं 
॥ १३॥ उस्तीके समान गोदानकों भी भगवानने उत्तम 
कहाहे। इन सब कहेहुए दानोंसे भी अधिक उत्तव् विद्याका 
दान है ॥१४॥ उसी विद्यादानके समानफ उक्को वहथिनीका 
कर्ता प्राप्त करता है, जो विधिसे ब्रंत करता है, जो मूख 
॥ कन्याऊ धनसे अपना जीवन निर्वाद्द करते हैं ॥९५४ 
प्रछयवर्यन्त नरकमें पढ़े रहते हैं । इसलिए किसी भी | 


वह दूसरे जन्‍्ममें निश्चयद्दी बिाव होता हे ॥ १७॥ जो 
मनुष्य कन्याको अपनी शक्तिके अनुसार अछंकृत करके 
दान देता है उध्षके पुण्यफ्ठकी गणना चित्रगुप्त भी नहीं 


जानता । १८ ॥ छेकिन्‌ वही फछ इस वहूथिनीछे ब्रत 


करनेसे प्राप्त होजाता हे! दशमीके दिन वेष्णवत्रतको 
करनेवाछा मनुष्य कांसी, मांस, मसूर, चणा, कोदू, शाक, 
शहद,दूसरेका भोजन दुबारा भोजन और मेथुन इन दुझ्न 
बातोंका त्याग करे | बथा जूआ खेछना,सो वा, पान खाना, 
दुन्तुन करना | १९ ॥| २० ॥ दूसरेकी निन्‍्द[ बुराई और 
पतित छोगोंसे बात वीत, क्रोध और झूठ वचनॉकोभी एका- 
दृशीके दिन छोड दे ॥ २१॥ कांसी, मांस, मसूर, शहद 
तथा झूठ भाषण, व्याय(म, परिश्रव, दुबारा भोजन, मेथुन 
॥ २२ ॥ दइजामत, तेछकी मालिश, दूसरेंक! अन्न इन सब 
चीजोंक/ उस दिनकी तरह द्वादशी के दिनभी त्याग करे। 
इस प्रकारस हेराजन [जिन छोगोंने वहुथिनी की है उनका 
सब पाप नष्ट हो छर अन्तर्मे अक्षयगति प्राप्त हुईं है ॥२३॥ 
रातमें जागरण कर जिन्होंने मगइनकी पूजा की हे वे सब 
पापोंको घोकर परम गतिको प्राप्त होगये हैं। २४॥ इसढिए 


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इसी के ० ३. 


ब्रतराज । । एकांदेशी- 
भरा उप कह कप | “ ७-७ 
तस्मात्सवप्यत्नेन कतेव्या पापभीरुनिः) क्षपारितनयाद्धीतिनेरदेव वरूँथिनीम्‌ ॥ २५॥ पह- 
नाच्छुवणाद्राजन्‌ गो पहल्नऊले लमगेत्‌ ॥ सबपा पविनिर्ठेक्तो विष्णुलो # ु महीयते ॥ २६ ॥ 
इति श्रीभविष्यपुराण वेशाखकृष्णेकादर॒या वरूथिन्याख्याया माहात्म्यं संमाततम ॥ 
अथ वेशाखशुक्लेकादशीकथा ॥| क्‍ 
युधिष्ठिर उवाच ॥ वेश/खशुकृपक्षे तु किंनामेकादशी भवेत्‌॥ किं फू को विधिस्तस्थषट 
कथयघस्‍्व जनादन॥ १॥ श्रीकृष्ण उबाच ॥ कथयामि कथामेतां शरण त्व धर्मनन्दन॥ 
वसिष्ठो यामकथयत्पुरा रामाय प्रच्छते ॥ २॥ राम उवाच ॥ भंगंवन ओतुमिच्छामि 
व्रतानामुत्ञमं व्रत [॥ सबपापक्षयकरं सर्वदुःखनिकृन्तनम्‌ ॥ ३॥ मंयों ढुंःखानि शरक्तानि 
सीत।बिरहजानि ब॥ ततोहह भयमभीतो5$स्मि एच्छामि त्वां महामुने ॥ ४॥ वसिष्ठ उवाच ॥ 
साधु पृष्ट त्वया राम तवंष। नेष्ठिकी मतिः॥ त्वन्नामग्रहणेनेव पूतो भवति मामब:॥ ५॥ 
तथापि कथयिष्यात्रि लोकानां हितकाम्यया ॥ पवित्र आवनानां च ब्रतानामुत्तम॑ ब्रतम ॥ ६॥ 
वेशाखस्य सिते पक्षे द्वादशी राम या मवेत्‌ ॥ मोहिनीनाम सा पोक्ता सर्व पापहरा परा ॥०/। 
मोहजालात्ममुच्येत पतकानां समूहंतः ॥ अस्या व्रतम्रभावेण सत्यं सत्य वदाम्यहम्‌ ॥ ८ ॥ 
अतस्तु कारणाद्वाम कतेव्येषा भवाहशेंः॥ पातकानां क्षयकरी महादुःखविनाशिनी॥ ९॥ 


*( ४२६ ) 


श्रणुष्वेकमना राम कथां पुण्यप्रदां झुभाम्‌ ॥ यसयाः श्रवणमात्रेग महापाप॑ प्रणशयति ॥ १०॥ 


सर घ्वत्यास्तटे रम्पे पुरी मद्रावती शुभा ॥ दझतिमान्नाम नूपतिस्तत्र राज्यं करोति वै॥ ११॥ 
सोमवंशोद्धवो राम धृतिमान्सत्यसंगरः ॥ तत्र बेह्यो निवतति धनथे न्यसभद्धिमान ॥ १२॥ 
घनपाल इति ख्यात पुण्यकमंत्रवर्तकः ॥ प्रपासत्राद्यावतनतडागारामकारकः ॥ १३॥ 
विष्णुभक्तिपरः शान्तस्तस्यासन्पश्चपुत्रकाः ॥ खुमना ब॒तिमांश्वेद मेधावी खुकती तथा ॥ १४॥ 


सब प्रकारस पापसे डरनेवाले और यमराजसे डरनेवाले 
सनुष्य है राजन्‌ | सब ग्रयत्नके साथ इस वरूथिनीको करें 
॥२५॥ उसक पढने और सुननेघ्र हे राजन्‌ ! सहख्र गोदा- 
नके समान पुण्य होता है। और बह सब पापों मुक्त होकर 
अन्तम विष्णुठोकके आनन्द्को उसीमें प्रतिष्ठित हो भोगता 
है ॥ २६ ॥ यह श्री भविष्योत्तरपुराणकी कही हुईं बैशाख- 
कृष्णवरूथिनी एक।दुशीके व्रतका माहात्म्य पूरा हुआ | 
अथ वेशाख शुक्ला एकादशीकी कथा-हे जनादेन ! वैशा- 
खके शुक्कपक्षत्रे किसनामकी एकादशी होती है और उसका 
फल तथाविधि क्या है? इसको आप कृपाकर वर्णन कीजिए 
॥ १ ॥ श्रीक्षष्णजी महाराज कहते हैं कि, हे धसपृत्र ! में 
तुम्द उस कथाका वर्णन करता हूँ जिसका भगवान्‌ वस्ि- 
छूने महाराज रामचन्द्रजीके वास्तव उपदेश दिया था ॥२॥ 


भगवान्‌ राम बोड कि, भगवसण्‌ | में सब ब्रतोमें जो भ्रन्ठ 


ब्रत हो उसे सुनना चाहता हूं, जो सब पापोंको नष्ट करता 
एवम्‌ सब -दुखोंको काटता हो ॥ ३ ॥ हे महामुन | मैंने 


३ खीताजीक विरहसे अनेक प्रकारके ठुभ्ख भोगे इसलिए में 


डरकर आपसे पूछना चाहता हूं ॥ ४ ॥ वसिष्ठजी पोडे 


“शुत्म / हैं दिया 
“सम! कक बहुत उत्तम प्रश्न किया, क्योंकि, 
यह 58) की “न हे ञ_ बे न. 
| ऑस्तिक बुद्धि है । तुम्हारे नामके छेनहीसे 
३ हि ह ँ ' ! हे नंद +- ह 






/ वह बडा शान्त वेष्णव था, 


१ क्षपारि तन्यातू-यमात्‌ । 


मलुष्य पापरहित होजाता हैं ॥५॥ तौमी छोकहिक्की 
कामनासे पवित्रस पवित्र और उत्त4सेउत्तम ब्रतको तुम्दारे 
छिए में वर्णन करूंगा ॥, ६ ॥ है राम! वे शाखके कृप्णपश्चमे 
जो एकादश्ली होती है उसका नाम * मोहिनी ? हें वह सब 
पापोंका सहार करती है ॥७॥ इस ब्रतके ग्रभावसे में सल 
ओर सत्य कहता हूँ कि, मनुष्य मोहजाढस और पापोंके 
समूहसे अवश्य मुक्त होजाता हैं ॥ ८ ॥ इसी कारण 
है राम |! आप जेसी आत्माओंके डिए .पापनाशिनी और 
ढुःखहारिणी एकादशीका ब्रत अवश्य करना चाहिए 
॥ ५ ॥ है राम ! पुण्य प्रदान करनेवाली इसकी पवित्र 
कथाको भी आप एकाग्र चित्तस सुननियि जिसके सुननेहींसे 
मनुष्यके पाप घुछ जाते हैं ॥ १० ॥ सरस्ततीके सुन्दर कट 
पर एक भद्रावती नामकी सुन्दर पुरी थी । उसमें बंकि 
सान नामका राजा राज्य करता था।॥ ११॥ वह युक्ति 
भान्‌ चन्द्रयेशी धरृतिमान्‌ और सत्य प्रतिज्ञ था । वहांपर 
एक धनधान्य सम्पन्न । १९। घनपाल नामका पुण्यात्मा 
सेठ भी रहा करता था । जो सदा यज्ञ आदि शुभ $ 

करानेवाला तथा पानी शाल्रा, बाढाव) बगीचे, धरमंशाढा 
आदि पुण्य स्थानोंको बंचवाया करता था ॥ ३ # 
उसके पांच लडके हुए। छुमना 


ब्रतानि, ]  भाषाटीकासमेलः । 

पंश्मो धरष्टबुद्धिथ महापापरतः सदा ॥ वारस्त्रीसड्रनिरतो विध्गोष्ठीविशारदः . ॥ १५ 
बतादिव्यसनासक्त+ परस्त्रीरतिछालसः ॥ न देवांश्वातिथीन्बृद्धान्पितृक्रा्चे्िजानपि ॥ १६॥ 
अन्यायकता दुष्टात्मा पित॒द्रव्यक्षयड्ररः ॥ अभक्ष्यमक्षकः पाप सुरापानरतः सदा ॥ २७ ॥ 
बेदयाकण्ठक्षिप्तवाहुलेमदृष्टिश्वतुष्पये ॥ पित्रा निष्कासितों गेहात्परित्यक्तश्व बान्धबेः ॥ १८ ॥ 
स्वदेहभूषणान्येवं क्षयं नीतानि तेन वे ॥ मणिकाप्निः परित्यक्तो निन्दितश्व धनक्षयात 
॥ १९ ॥ ततश्चिन्तापरो जातो वद्धहीनः शक्षुधार्दितः ॥ कि करोमि कक गच्छाति केनोपायेन 
जीव्यते ॥ २० ॥ तस्करत्वं॑ समारब्धं तत्रेव नगरे ततः ॥ गहीतो राजपुरुषेझृक्तत्व पित- 
गौरवात्‌ ।। २१ | पुनबेद्धः पुनर्मेक्तः पुनमुक्तः स वे भटेः | धष्टबुद्धिदुराचारों निबद्धों निगडढ़े- 
ईंढ़ेः ॥२२॥ कशाघातेस्ताडितश्व॒ पीडितश्र पुनः पुनः ॥ न स्थातव्य हि मन्दात्मंस्त्वया मदेश- 
गोचरे ॥ २३ ॥ एवमुक्त्वा ततो राज्ञा मोचितो दृटबन्धनात॥ निजेंगाम भयात्तस्थ गतोशसौं 
गहने वनम्‌ ॥ २४ ॥ छुत्तृषापीडितश्रायमितश्रेतश्न धावति ॥ सिंहवन्रिजघानासों मृगसूकर- 
चित्तलान्‌ ॥ २५ ॥ आमिषाहारनिरतो वने तिष्ठति सवबंदा ॥ शरासने झारं कृत्वा निषड्ठं पृष्ठ- 
संगतम्‌ ॥२६॥ अरण्यचारिणो हन्ति दक्षिणश्र चहुष्पदान ॥ चकोरांश्व मयूरांश्व कड्ढांस्तित्तिरि- 
मूषकान्‌ ॥ २७ ॥ एतानन्यान्‌ हन्ति नित्य धृष्टबद्धि स निवेणः ॥ प्वेजन्मकृलेः पापेर्निमग्रः 
पापकर्दभे ॥२८॥ दुश्खशोकसमाविष्टश्रिन्तवन सोध्प्यहार्निशम्‌ ॥ कौण्डिन्यस्थाश्रमं प्राप्त 
कस्माचित्पुण्यगोरवात्‌ ॥ २९ ॥ माधवे मासि जाह॒वस्‍्याँ कृतस्नानं तपोधनम्‌ ॥ आससाद घष्ट- 
बुद्धि: शोकभारेण पीडिलत: ॥ ३० ॥ तदखबिनदुस्पर्शन गतपाप्मा हताशुभः ॥ कोण्डिन्यस्था- 
प्रतः स्थित्वा शत्युवाच कृताखलिः ॥ ३१ ॥ धरष्टबुद्धिरुवाच ॥ प्रायश्वित्त बद बह्मन्विना वित्तेन 
यद्धवेत्‌ ॥ आजन्मकृतपापस्य नास्ति वित्त ममाधुना ॥ २२॥ ऋषिरुवाच ॥ श्रणुष्वकमना 


( छश७ ). 























द्ुतिमान, मेधावी, सुकृती और पांचवां ध्रृष्टवुद्धि महापापी 
था, जो सदा वेश्याओंके पास रहता और बदमाशोंकी 
संगति करता था, जूआ खेलना और व्यभिचारॉमें रहना 
ढसक। मुख्य काम था, वह न कभी देवोंका पूजन करता 
था, तथा न कभी अतिथि और वृद्ध पितरकी और ब्राह्म- 
णोंकी पूज। ही करतां था ॥ १४--१६ ॥ अन्यायी, दुष्ट, 


: . पिकाके द्वव्यको नष्ट करनंवाछा अभक्ष्यभक्षी और शराबी 


था ।। ९७॥ सदा वारवधुओंके हाथ, द्विजोंकी देखता 
हुआ भी गछवाह डाछे रहता था । वेश्यासंग करनेककारण 
*.. ही उसके पितने और उसके बान्धवोंन उसे घरसेनिकाल 
... कर बाहर कर दिया था ॥ १८ ॥ उसने अपने भूषण नष्ट 

कर ढाढे एवं वेश्याओंने भी उस निधन होजानेफे कारण 
निन्‍्दाकर अलग कर दिया था।॥ १९।। तब उसे बड़ी 
चिन्ता हुईं। नंगा और भूखा रहने छगा । झोचने छसा 
कि, अब क्‍या करूँ और कहां जाऊँ ॥ २० ॥ .उसी नगर 
में उसने चोरी करना शुरू किया। पुछिलने उसे पकडोा 
भी पर पिताके लिहाजस छोडदिया ॥ २१ ॥ फिर पकडा 
गया, फिर छोडा गया और अन्तर्म उसे फिर पकडकर 
हथकडी डाल ही दीगई ॥२२।। बेंब और चा बुकोंकी 
मार पढने ढूगी । कहा गया कि, हे दुष्ट | तू हमारे देश 


मेंस निकछ जा ॥ २३॥ एसा सुनाकर उसे जेलस निकाछ 
दिया। इसी डरके मारे वह .किसी गहन वनसें जा 
छिपा ।| २४॥ भूख प्याससे व्याकुछ होकर इधर उधर 
भागने छगा। सिंहकी भांति >सग सूअर और चीलोंको 
मारने लगा ॥२०॥ मांस खाकर वनमें गुजर करने 
छगा | धनुषपर शर रख ओर तकसको पीठपर छाद 
जज्लडी जाववरोंको तथा चकोर, मयूर, कंक, दीतर, चूहे 
॥ २६ ॥ इनको और दूसरोंकों भी घृणा रहित सार सार- 
कर खाने लगा । पहले जन्मके किये हुए पापोंस पापरूपी 
कीचडर्म फैंस चुका था ॥ २७ ॥ २८ ॥ इस प्रकार सदा 
दुःख और शोकमें दिन काटता हुआ किसी पुण्य प्रभाव 
से वह कोण्डिन्य ऋषिके आश्रम जा पहुँचा ॥ २९॥ वह 
धृष्टबुद्धि शोकके भारसे दुःखी होकर वेशाख महीनेम गड्ढा 
स्नान कर आये हुए लपोधन ऋषिक पास आ उपस्थित 
हुआ उस आश्रमको उनके भागे हुए वस्थोंकी एक बँँद 


मात्रसे हर पापी शुद्ध होगया । सब पाप निवृत्त होगय 


हाथ जोडतें हुए कोण्डिन्यके आगे चढछकर उसने ग्राथना 
की कि, दे ऋषि महाराज ! आप मुझे प्रायश्वित्त बतछाइए 
जिससे कि मरे जन्म भरके किये पाप नष्ट हों जो कि, घन 
फे विना ही हो जाय क्योंकि, मेरे पास अब घन नहीं है 


घतराजः । [ एकादल्ी- 


( ४२८ ) 





॥।|॒ 


भृत्वा येन पापक्ष यस्तव ॥ वेशासस्य सिते पक्षे मोहिनी नाम नामतः ॥ शेशे ॥ एकादशी 
तस्थाः कुरू मदाक्यनोदितः ॥ मेरूत॒ल्यानि पापानि क्षय नयति देहिनाम्‌ ॥ ३२४ ॥ बहुज- 
न्मार्जितान्येषा मोहिनी समुपोषिता ॥ इति वाक्य मुनेः श्र॒त्वा कष्ट बुद्धि! प्रसन्नहत्‌ ॥१५॥ व्रत 
चकार विधिवत्कोण्डिन्यस्योपदेशतः ॥ कृते ब्रते नृपश्रेष्ठ हतपापो बभूव सः ॥३६॥ दिव्यदेह- 
स्‍्ततो भूत्वा गरूडोपरि संस्थितः ॥ जगाम वेष्णवं लोक॑ स्वोपद्रववजितम्‌ ॥ ३७ ॥ इती- 
हशं रामचन्द्र तमोमोहनिकृन्तनंम ॥ नातः परतरं किश्ित्रेलोक्ये सचराचरे ॥ ३८ ॥ यज्ञादि- 
तीर्थदानानि कलाँ नाहन्ति षोडशीस ॥ पठनाच्छुवणाद्राजन्‌ गोसहर्मफल लमेत ॥३९॥ 
इलि श्रीकूमपुराणे मोहिन्याख्यवेशाखशुक्लकादशीमाहात्म्यं समात्तम्‌ ॥। 


अथ उयेष्रऋष्णेकादश्षीकथा ॥ 


: ग्रुधिष्ठिर उवाच ॥ ज्येष्ठस्य कृष्णपक्षे तु किंनामेकादशी भवेत्‌ ॥ श्रोतुमिच्छामि माहात्म्य 
तद्॒दस्व जनादन ॥ १॥ श्रीकृष्ण उवाच ॥ साधु पृष्ठ त्वया राजेंछोकानां हितकाम्यया॥ 
बहुपुण्यप्रदा छोषा महापातकनाशिनी ॥ २ ॥ अपरा नाम राजेन्द्र अपारफलद।यिनी ॥ लोक 
प्रसिद्धतां याति अपरा यस्तु सेवते ॥ ३ ॥ बह्ामहत्यानिभूतो5पि गोत्रहा श्वरणहा तथा ॥ पराप- 
वादवादी च परस्रीरसिकोषि च ॥ ४ ॥ अपरासेवनाद्राजन्विपाप्मा भवति श्वम्‌ ॥ कूटसाए्यं 
मानकूटं तुलाकूटं करोति यः ॥५॥ कूटवेदं पठेद्वितः कूटशार्र॑ तथेव थे ॥ ज्योतिषी कूद- 
गणकः कूटायुवेंदकों भिषक्‌ ॥ ६॥ कूटसाक्षिसमा होते वित्तेयः नरकौकसः ॥ अपरासेवनाद्रा- 
जन्‌ पापमुक्ता भवन्ति ते ॥७॥ क्षत्रियः क्षात्रधर्म यस्त्यकत्वा युद्धात्पलायते॥ स याति 
नरक घोर स्वीयधर्मबहिष्कृतः ॥८॥ अपरासेंवनात्सोपि पाप॑ त्यकत्वा दिव॑ ब्रजेत॥ विद्यामधीत्य 
यः शिष्यो गुरुनिन्दां करोति च ॥ ९॥ महापातकसंयुक्तो निरयं याति दारूणम्‌ ॥ अपरा- 





॥ ३०-३२ ॥ ऋषिजी बोले कि, हे धृष्टबुद्ध ! तुम एकन- 
दिल होकर सुनो जिससे कि, तेरे जन्मभरके पापोंका नाश 
हो वेशाखके शुक्लपक्षम मोहिनीनामकी एकादशी होती 
है। उसका ब्रत तू मेरी आज्ञासे कर | उससे प्राशिभात्रके 
सुंमेद परवेतके समान भी वे" सब पाप नष्ट हो- जाते हू 
॥ ३३ ॥ ३७ ॥ बहुत जन्मोंऊे पुण्य कछसे इस मोहिनीका 
उपवास किया जाबा है | यह सुनकर वह पापी ध्रृष्टबुद्धि 
बडा प्रसन्न हुआ । ३५।॥ कौण्डिन्यजीके उपदेशस उसने 
विधिपूर्वेक ब्रत किय। और उस ब्रतके करनेपर हे नृपश्रेष्ठ 
वह पापहीन होगया ॥| ३६ | दिव्य देह धारण कर गरुढ 
पर चढ गया । निर्विष्ततापूवंक विष्णु भगवात्रके शान्त 
स्थानमें जा पहुँचा || ३७॥ इस प्रकार है रामवन्द्रजी 
महाराज ! यह ब्रत मोहको काटनेवाला हैं। इससे अधिक 
अच्छा इस विश्वर्मे दूसरा कोई भी ब्रत नहीं हे ॥ ३८॥ 
यज्ञ आदि तथा तीथ दान इसकी षोडशी कढाको भी 
नहीं पा सकते ओऔर हैं राजन ! पढ़ने और सुननेसे सहस्र 
: “मोद्रालका फछ प्राप्त दोता है ॥ ३९ ॥ यह श्रीकूृमपुराणका 
. ऋद्द हुआ वशाख शुक्काकी सोहिनी नामहझी एकादशीका 
आदिल्य सदा इुजा ॥ 
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होती है ! उसका माहात्म्य में आपस घछुनना चाहता हूँ 
॥ १ ॥ श्रोकृष्णजी महाराज बोछे कि, महाराज ! आपने 
यह बहुत उत्तम प्रश्न किया. क्योंकि, आप प्राणियोंश 
भरा करनेकी इच्छा रखते हो । यह बहुतसे पृण्यकी देने" 
वाली तथा मद्ापातकोंकों नाश करनेव्राडी हैं ॥३॥ डे 
राजन्द्र ! इसका नाम 'अपरा! है। यह अपार फूढको 
देनवाली है | जो मनुष्य इस अपराध त्रत करता है वह 
लोक प्रसिद्ध होता है ॥ ३ ॥ ब्रह्महत्या करनेवाला गो” 
क नाश करनेवासा अुगहत्याका पाप करनेत्राढा, दूसरों 
की निन्‍्दा करनेवरा/ तथा व्यसिचारी भी ॥ ४॥ इ 

ब्रतके प्रभावसे हे राजन ! पाप मुक्त -होजाता है। मिध्या 
साक्षी देनेवाछा, भिथ्यमिमात और तौछ तौढनेवाल। 
वेद्निन्दा और प्रिथ्याशाश्रका अभ्यास एवं ज्योतिषस 
छठनेवाछ्ा म्रिथ्या विकित्या करनेवारा मनुष्य ॥भक्षी 
नारकी होता है क्योंकि ये सब काम झूठी गवाहीऊे बरा. . 
बुर हैं। छेकिन इस अपराके ब्रतसे वेभी राजन | पातहीत 

हो जाते हैं ॥७॥ जो क्षत्रिय श्षात्रधमेको छोडकर युद्धसे 
भागता हैं वह अपने घमेत गिरकर घोरनरकर्न जाता है 
॥८॥ ढेकिन वह भी इस अपराके ब्रतते परापमुक्त होकर 
स्रगर्मे चछाजाताहे,जो शिष्य विद्या पढकर गुरुणिन्दा करवा 
हैं ॥ ९ ॥. बद महापापी होकर घोर नरकमें जाताहें 


ब्रतानि. ] 








मुसनपााशकरमानेकाक्रधशकारदाएतगाप्ाधा रा फहतभयाम पाक फ्काक कलम... + मासबकतरइन्णान्कान-+>भवकान 


'िजमर»नः&यानामाभकलभक+कन०५कनलनक 


भराषाटीकासमेलः हि 


( ४२९ ) 





अिल->न्‍नपररपकनत, 


फेवनात्सोपि सद्ृतिं प्राप्ठयान्नरः ॥१०॥ पष्करत्रितये स्नात्वा कार्तिक्यां यत्फलं लमेत॥ मकर स्थे 
रवौ माघे प्रयागे यत्फलं नृणाम्‌ ॥११ ॥ काइयां यत्राप्पते पुण्य शिवराज्रेरुपोषणात्‌ ॥ गयायाँ 
पिण्डदानेन यत्फलं प्राप्यते न॒भिः॥ १२॥ सिंहस्थिते देवगुरों गोतमीस्नानतो नर ॥ यत्फले 
समवाप्नोति कुम्मे केदारदशनात्‌ ॥ १३॥ बदर्याअंमयात्रायाघ्तत्तीथसेवनादपि ॥ यत्फलें 
समवाप्नोति कुरुक्षेत्र रावेमरहे ॥ १४ ।॥। गजाश्वदेमदानेन यज्ञे ऋत्लछुवर्णदः ॥ तत्फले समवा- 
प्तोति अपराया व्रतान्नरः ॥ १५ ॥ अधंत्रूतां गां दत्वा खुवर्ण बखुधां तथा ॥ नरो यत्फलमा- 





प्लोति अपराया 


| कक है बीती 


|! । 
पुत्तिका इव 


बतेन तत्‌ ॥ १६॥ पापदुमरुठारोईय॑ पापेन्धनदवानलः पापान्धकारसर्योत्ये 
॥ १७ ॥ अपरेकादशी राजन्‌ कतंव्या पापभीरामः | बुदबुदा इव तोयेषु 
जन्तुषु ॥ १८ ॥ जायन्ते मरणायेव एकादइ्या ब्रतं विना ॥ अपरां समुपोष्येव 


पूजयित्वा त्रिविक्रमम्‌ ॥ १९॥ सर्वपापविनिमुक्तो विष्णुलोक ब्रजेन्नरः ॥ लोकानां च हिता- 
धाय तवाम्रे कथित मया-॥ पठनाच्छवणाद्राजन्‌ सर्वपापेः प्रमुच्यते ॥ २० । इति बल्माण्डपुराणे 


ल्येप्रकष्णापराख्यकादशीमाहात्म्य समाप्तम्‌ ॥ 


ह अथ ज्येष्ठगुक्लेकादशीकथा ॥ 

भीमसेन उवाच ॥ पितामह महाबुद्धे शरण मे परम वचः ॥ युधिष्ठिरश्व कुन्ती च तथा हुपद- 
नन्दिनी ॥ १ ॥ अज्ञुनों नकुलश्रेव सहदेवस्तथेव च ॥ एकादुश्यां न. सखुत्नन्ति कदाचिद्पि 
खुहत ॥२॥ ते मां बुवत्ति व नित्यं मा शुंक्ष्व त्वं इकोदर ॥ अहं तानबुबं तात बुझक्षा 
दु/सहा मम ॥ ३ ॥ दान दास्याम विधिवत्पूजयिष्यामे केशवम्‌ ॥ विनोपवास लम्पेत कथमे- 
कादशीत्रतम्‌ ॥ ४ ॥ भीमसेनवचः श्रुत्वा व्यासो वचनमबबीत्‌ ॥ व्यास उवाच ॥ यदि स्वर्गों- 
त्यभीष्टस्ते नरकोनिष्ट एबं च ॥ ५॥ एकादरयां न भोक्तव्य पक्षयोरभयोरपि ॥ भीमसेंन 
उवाच ॥ पितामह महाबुद्धे कथयामि तवाग्रतः ॥ ६॥ एकमत्ते न शक्तोःहमुपवासः कुतो 
मुने। वको नामाध्ति यो वंहिः स सदा जठरे मम ॥ ७॥ अतीवान्न॑ यदाश्षामे तदा समु- 


बहभी इसके प्रभावस सदगतिको प्राप्त होता है ॥ १०॥ 
कार्तिककी पूर्णिमापर तीनों पुष्क रपर स्ताव करनेस, सक 
रकी संक्रान्तिपर साधमें प्रयागसें स्नान करनेस ॥११॥ तथा 
£ काझीमें शिवरात्रिके उपवाससे एवं गयामें पिंडदान देनेसे 
जो पुण्यफल प्राप्त होता हे ॥१२॥ सिंह राशिपर बृहस्पतिके 
स्थित होतेहुए गौतप्तीनदीके स्तानसे, कुंभमें केदारके दश- 
नसे ॥१३॥ बद्रिकाश्रमकी तीथेयात्रासे, कुरुक्षेत्रमें सूये- 
प्रहणके समय ॥१४॥ हाथी घोड़े और सुवर्णक दान देनेस, 
यज्ञमें सुवणकेही सब कार्यामें सुवण कोही देनेसे ॥॥१५॥ अधे 
प्रसृता गौंके तथा सुवण और प्रथ्वीके दान देनसे जो पुण्य- 
फन्न प्राप्त होता है वह सब उच्च अपराके ब्रतऊे करनेस 
प्राप्त होजाता है ।। १६ ॥ पापरूपी वृक्षक्रा कुठार, पापरूपी 
इईंघनका दावानछ; पापांधकारका सूये एवं पाप हूपी सृगका 
. सिंह ॥१७)॥ यह अयरा एकादशीक्ा त्रत, पापसे डरनेत्रा 

 छोको करना चाहिये। पानी में चुल्बुछोंके समान और 
जानवरोंमें मक्खियोंके समान ॥१८॥ मरनेके छियेही उस 
मनुष्यका जन्म हैं जिसने एकादशी का ब्रव एवं भगवान का 
पूंजन न किया हो | १९ ॥ अपराका उपवास करके और 
भगवानकी पूजा करके सनुष्य संब पा्पोस छूटकर विष्णु 





सामने इसका वणन छिया हैं । इसके पढने और सुननेसे 
मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता हैं ॥२०॥ यह श्रीज्श्मा- 
ण्डपुराणका कहा हुआ ज्वेछ कृष्णा अररानम की एकादशी- 
माहात्म्य पूरा हुआ! हे 

अथ ज्येष्ठ शुक्क एकादशीकी कथा-भीमसेन बोछें कि, हे 
महाबुद्धे पितामह ' मेरे इस वचनको श्रवण कीजिये । 
युधिष्ठिर, कुन्ती तथा द्रपदकी पुत्री द्रौयदी, अज्जुत, नकुछ 
लथा सद्ददेव हे सुत्रव ! ये एकादशीको कभी भी भोजन 
नहीं करते ॥0॥र॥ और ये छोग मुझे भी सदा कहे हैं 
कि, हैं भीमसेव ! तुममी भोजन न करो | तो में उन्हें 
जवाब देता हूं कि, माई ! मुझे भूखा रहना सह्य नहीं है॥३॥ 
दान देगा और विधिसे भगवान्‌क्री पूजाश्री करूंगा | पर 
एकादशीका व्रत विनाही उपवास जिस प्रकार हो ऐसा 
उपाय बताइये ॥४।॥ मीमसे तके इस व वनको छुतकर व्य/स- 


जीने कहा कि, हे भीमसेन ! याध तुमको सत्र प्यारा 
| और नरक बुरा मालूम होता हैं ॥5॥ तो दोनों एकादशि- 


योके दिन तुम्हे भोजन न करना चाहिय्रे। भीससेन बोड़े 
कि, है महावुद्धिपितामह ! म॑ आपके सामने उत्तर देवाहूँ 


।॥ ६ ॥ महराज ! में तो एक ससय भोजन ऋरकेभी नहीं 
ढोकमें चला जाता है ॥ मेने विश्वदितकी कामनासे तुम्हारे 


रह सकता तब उपवास तो कहां हो सकता हैँ ! मेरे पेट्मे 


(४३० ) | ब्रतराजः [ एकादशी-- 





















पशाम्यति ॥ एक शक्तोस्म्यहं करते चोपवासं महास॒ने ॥ ८ ॥ तदेके वद निश्चित्य येन अयो- 
%माप्ठयाम्‌ ॥ व्यास उवाच ॥ श्रुतास्ते मानवा धर्मा वेदिकाश्व अ्षतास्त्वया ॥ ९ ॥ कलौ युग 
न शक्यन्ते ते वे कतें नराधिष ॥ खुखोपायं चाल्पधनमल्पक्केश महाफलम्‌ ॥ १० ॥ पुराणानां 
च॑ं सर्वेषां सारभूत वदामि ते ॥ एकादर्यां न शुश्लीत पक्षयोरुभयोरपि॥ ११ ॥ एकादडयां 
न अुंक्ते यो न याति नरक तु सः ॥ व्यासस्य वचन श्रुत्वा केपितो:शवत्थपत्रवत्‌ ॥ १२ ॥ प्लीम- 
सेनों महाबाहुर्नीतो वाकक्‍्यमकझ्लाषत ॥ भीमसेन उवाच ॥ पितामह न शक्तोःहमुपवासे करोमि 
किम्‌ ॥ १३॥ ततो बहुफलं बूह्दि ब्रतमेक मम प्रभो ॥ व्यास उवाच ॥ वृषस्थे मिथुनस्थेफ 
शुक्ला येकादशी भवेत्‌ ॥ १४॥ जल्येष्ठमासे प्रयत्नेन सोपोष्या जलवर्जिता ॥ स्तरानें चाचमने 
चेव वज्जेयित्वोदकक बुधः ॥ १५ ॥ उपयुओीत नेवान्यद्गतभड्भोपन्‍्यथा भवेत ॥ उदयादुदयं याव- 
दजेयित्वा जले बुध: ॥ १६॥ अभयत्रादवाप्नोति द्वादशद्वादशीफलम्‌ ॥ ततः प्रभाते विमले 
द्वादरयां ल्लानमाचरेत्‌॥ १७॥ जल॑ खुबर्ण दस्वा च द्विजातिभ्यो यथाविधि ॥ भ्रुजीत कृत- 
कृत्यस्ठु बाह्मणः सहितो वशी॥ १८॥ एवं कृते त॒ यत्पुण्यं भीमसेन श्रणुष्व तत्‌ ॥ संबत्स 
रस्य या मध्ये एकादर्यों भवन्ति वे॥ १९ ॥ तासां फलमवाप्नोति अन्न मे नास्ति संशयः॥ 
इति मां केशवः प्राह शद्बाचक्रगदाधरः ॥ २० ॥ एकादह्यां सिते पक्षे ज्येष्ठस्थौदकवर्जितम॥ 
उपोष्य फलमाप्नोति तच्छुणुष्व बृतोदर ॥२१॥ सर्वतीर्थेष यत्पुण्यं सर्वदानेषु यत्फलम॥ यत्फेल 
समवाप्नोति इमां कृत्वा बकोदर ॥२२॥ संवत्सरस्य यावन्त्यः शुक्काः कृष्णा बकोदर ॥ उपो- 
बितास्‍्ताः धवाः स्थुरेकाददयों न संशयः ॥ २३ ॥ धनधान्यवहाः पृण्याः पुत्रारोग्यफलप्रदाः ॥ 
उपोषिता नरव्याप्र इति सत्य वदामि ते ॥२७॥ यमदूता महाकायाः करालाः कृष्णपिड्ुलाः ॥| 
दण्डपाशधरा रोद्रा मरणे दृष्टिगोचरम्‌ ॥२५॥ न प्रयान्ति नरव्याप्र एकादश्यासुपोषणाद । 


वृकतासका अप्नि रहता है ॥ ७॥ जव में बहुतसा अन्न 
भोजन करता हू तब ही उसकी शान्ति होती हैं हे महा- 
मुने ! में एक उपवास कर सकता हूँ ॥८॥ इससे आप मुझे 
कोई एक उपवास बतादें जिससे मेस कल्याण हो जांय ।| 
व्यास बोले कि, हे भीमपेन ! तुमने सु्निके और वदोंके 
कह्े हुए धंम सुने हैं ॥९॥ पर बे हे राजन ! इस कलियुगम्में 
नहीं हो सकते 
हो न कोई दुख हो पर जिंसका फछ बडा हो ॥ १० ॥ यह 
सुन वह बोले कि, सष पुराणोंके जो सार रूप है उसे में 
तुम्हें कहता हू, एकादशीके दिन दोनों पश्चोमें कभी भी 
भोजन न करे ॥ ११ ॥ जो छोग॑ एक्रादेशीके दिन भोजन 
करते हैं वे नरकके यात्री होते हैं । इसं प्रकार व्यासजीके 
वचन सुन भीससेन अश्वत्थपत्रकी भांति हिलने ढगा।१२॥ 
मंदाबाहु भीमसेन डरकर यह कहने छूगा कि हे पितामह ! 
| उपवास करनेमे असमयथ हूं क्‍या करूं इसलिये ऐना कोई 
एक त्रत बताइये जिसका बहुत फल हो। व्यासजी बोले 
कि, वृष या-मकरकी संक्रान्तिपर जब कि शुक्क एकादशी 
आन हो ॥१४॥१४॥ तब ज्येष्ठमासमें बडे कष्टस प्रयत्न के 
सास एकाद्शीका निजलू उपवास करे ॥ स्तान और आच 
अनको छोडंकर जछका व्यवहार न करे || १५॥ क्योंकि 
'चससे ब्रतमंग “न दोवा है । उदयसे दूसरे दिनके उद्यपरयत गोचर है। उदयसे दूसरे दिनके उदयपर्थत 


(ः 


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सकते | सुखका उपाय जिप्में विशेष ख्च भी न॑ 


जहका परिहारही करे रहे ॥१६॥ इस प्रकार विना प्रसित्र- 
सके बारह एकादशीका फछ मिलजाता है। द्वादिशीके दिन 
निमल आ्रतः का स्तान करे || १७॥ विधिपूर्वक ब्राह्मणोंको 
जरू और सुवर्ण देकर सब कृत्यको समाप्त करके आाह्मणों . 
कही साथ जिन द्रय होकर मोजन करे | १८ ॥ हे भीम- 
सेन ! इस प्रकार करनेस जो पुण्यफछ प्राप्त होता हे उसे 
सुनो | वषभरके अन्दर जितनी एकादशी होती हैं ॥ १५९ ॥.. 
उन्‌ सबका फल एकंहीसे प्राप्त होजाता हें। इसमें मुझे 
सन्देह नहीं ह इस प्रकार मुझको साक्षात्‌ शंखचकऋरगदा" 
धारी केशव भगवानने कहा है॥ २०॥ एकादशीके दिन शुद्ठ' 
पक्षम ज्येध्रमासमें पानीस रहित उपवास करके जो फह 
मिलता है, है भीमसेन ! उसे सुनो ॥ २१ ॥ सब तीथमें 
जो पुण्य ओर सब द्वानोंमें जो फल होता हैं, हे भीमसेन * 
वह इससे मिलजाता हैँ ॥ २२ ॥ हे वृकोदर ! वर्षम जितनी 
शुह्वा एकादशी होती हूं, उन सबका फछ इस एकहीके 
ब्रतसे मिलजाता है। हे नरश्रेष्ठ ! इसमें सन्देद्द नहीं है॥र३॥ 
धनधान्य देनेवाला, पुत्र और आरोग्यको बढा देनेवाढ, * 
इस “अतका उपवास होता है | यह में तुमे सत्य वणत 
करताहूँ॥ २४ ॥ मरणके समय महाका य, कराठल, ऊष्ण- 
पिंगल दृण्डपाशघारी और भयंकर यमराजके दूत दृष्टि” 
गोचर नहीं होते ॥२०॥ हे नरश्रेष्ठ ! -एकादशीक उप“ 


| + खबहोमेषु २ कँः न 2 
"आज 2 ५, , 5, ैस यत्पुण्य पाठ: । 
/ *िल 20 के, ६ है हु | श रे ण््तू रा 
हक का वह व हो हे 324५॥ ; अं न 
त ३ हक 55 ः $ ४ का । के हे रे 
+ ४ 0 हे है: की 2 पः 





( ४३१ ) 








पीताम्वरधराः सोम्याश्चक्रदस्ता मनोजबह ॥२६॥ अन्नकाले नयतत्येव मानव वेष्णव 
पुरीम्‌॥ तस्मात्सवेश्रयत्रेव सोयोष्पोदऋबरजित। ॥ २७ । जलघेन॑ ततो दसत्त्वा सर्वपापेः प्म्त- 
च्यते ॥ इति श्रत्वा तदा चऋः पाण्डवा जनमेजय ॥ २८ ॥ तत+प्रभृति भीमेन कृतेयं॑ निर्जेला 
शुभा ॥ पाण्डवद्वादशोनाम्ना लोके खूयाता ब॒भूव ह॥ २९ ॥ तथा त्वमपि भूपाल सोपबा- 
साचन हरेंः ॥ कुछ त्वं च प्रयत्रेन सर्वपापभशान्तये ॥ ३०॥ करिष्याम्यद्य देवेश जलूवजे- 
मपोषणम्‌ ॥ मोहये परेडद्धि देवेश छात्र च तब वासरात ।। ३१॥ इत्युच्ार्य ततो मन्त्रमपवास- 
_परो भवेत्‌ ॥ सवपापविनाशाय श्रद्धादमसमन्वितः ॥ ३२॥ मेहमन्द्रमानं तु ल्लियाथ पुरू- 
पस्य यव्‌॥ पाप तद्धस्मतां याति एकादरयाः अभाव॑लः ॥ ३३ ॥ न शक्तोति च यो दाठं 
जलघेद नराधिप ॥ सक/अनों घटस्तेन देयो वल्लेण संत्र॒तः ॥ ३४॥ तोयस्य नियम योएस्यां 
कुछते थे स युग्बभाझू ॥ पहुझछोटिसुय्र॑र्गत्य यामेयामेउश्वुते फलम्‌॥ २५ स्वान॑ दाने जप॑ 
होम॑ यद्स्थां कुछते नरः ॥ तत्सवे चाक्षयं मोक्तमेतत्क्ृष्णस्‍्य मावितम्‌ ॥ ३६ ॥ के वापरेण 
धर्मेंण निर्जेलेकादर्शी नप ॥ उपोष्य च नरो भकत्या वेष्णव॑ पद्माप्लुयात ॥ ३७ ॥ सुवर्णमन्न॑ 
वासांसि यद॒स्‍्पां संग्रदीयते ॥ तद्रुप च कुरुश्रेष्ठ सवंभप्यक्षयं भवेत्‌ ॥ ३८ ॥ एकादशीदिने 
योद् खुंके पाप श्रुनक्ति सः ॥ इह लोके स चाण्डालो मृतः प्राभोति दुगंतिम्‌ ॥ ३९ ॥ ये प्रदा- 
स्पन्ति दानानि द्वादर्शी समुपोष्य च ॥ ज्येष्ठे माखि सिते पक्षे शप्स्यन्ति परम पदम्‌ ॥ ४० ॥ 
बल्महा मद्यपः स्तेनो गुरुद्देट्ट सदज्नृती ॥ मुच्यन्ते पातकेः सर्वे्निर्जला गेरुपोषिता ॥ ४१ ॥ 
विशेष शरण राजेन्द्र निजेलेकादशीदिने ॥ यत्कतेव्यं नरेः स्रीमिः श्रद्धादमसमन्वितेः ॥ ४२॥ 
जलशायी तु संपूज्यों देया घेलुश्व सन्‍मयी ॥ अत्यक्षा वा नृपश्नेष्ठ घतधेतुरथापि वा॥ ४३॥ 
दुक्षिणानिश्र श्रेष्ठानिर्धष्टान्नेश्व प्रथग्विधेः ॥ तोषणीया अयत्नेन द्विजा धमम्तां बर ॥४४॥ 
30 204 2अ मं >4;2 7-9 अप कबक 40, 400 45 20 कक 5 330 लि 0४34५, शक ८ सह 
वास, पीतास्वर॒थारी, सौम्य चक्रहस्त, मनकी भांति | अन्द्र कोटि कोटि सुवर्ग रानका फल प्राप्त होता हैँ ॥३५॥ 
दोडनेवाल ॥| २६ ॥ भगवानके सुन्दर दूत विष्णुपुरीड़ो | जो इस दिन स्तान, दान; जय और होम ऋरता हैं वह सब 


(मी. 


उस अन्लम लेजाते हें । इसलिये इसकां उपवास जरूस | अक्षय होजाता है | यह भगवान कृष्णते वर्णन किया है 


रहित होकर सदाही करना चाहिये ॥२७ ॥ इसके पीछे | ॥३६॥ ह राजन ! दूसरे धर्मों क्य। प्रयोजन हैं! निजलछा 
जढपेनु (ये शास्त्रीय संज्ञा है ) का दानकरके सब पापोंतत ! एकादशीकाही भक्तिसे उपवास कंरकेही मनुष्य विष्णुछो 
मुक्त हो । यह घुनकर है जनमेजय ! पाण्डवॉने उपवास | कर्में जासकता दे ३७ ।| सुबगे, अन्न और वश्न जो कुछ 
किया || २८ ॥ तबसे भोमसेनने भी इस निर्जछाका उप- | इस रिन दिया जाता है हे कुरुअछ ! वह सब अक्षय हो- 
बास किया और इस लिये इसका नाम पाण्डव भीमसेनी | जाता हे । ३८ ॥ इस एकादशीडके दिन जो मजुष्य मोजन 
.. एकादशी विख्यात हुईं है ॥| २५॥ इस हछिय हे राजन ! करता हैं वह अपने पापोंकों खाता है एवं इस छोकमें वह 
तुम भी सभी प्रय॒त्नोंके साथ उपवास हरिका पूजन करो | चांडाछ और मरेपर दूसरे छोकमें दुगेतिको प्राप्त होता है 
निससे तुम्हारेभी सब पापोंका क्षय हो जाय | ३० ॥ हे | ॥ ३९ ॥ जो छोग ज्येघ्ठकी इस एकादशीके दिन उपवास - 
देवेश | आज में जलरहित एक्रादशीका उपवास करूंगा ! कर दान देते हैं वे पुण्यात्मा परमपदको प्राप्त होते हैं।[४०॥ 
और आपके वासरसे दूसरे दित भोजन करूंगा ॥ ३१ ॥ | इस निजेछाका उपवास करनेसे पाप मुक्त होजाता हे चाहें 
ऐसा संकल्प कर उपवास करे। सब पापोंके नाश करनेके | वो मनुष्य ब्रह्महा, सच्॒पायीं, चोर और गुरुनिन्दक तथा 
..हैतु श्रद्धा और दूमसे मुक्त होकर ब्रत करे ॥ ३९ ।। इस | सदा मिथ्यावादीही क्‍यों न हो॥ ४१॥ हैं राजेन्द्र | इस 
.. अकार ब्त कर तेंस ख्री और पुरुषोंके मेरु पव॑तके समानभी | निजंछा एकादुशीके दिन विशेष रूपसे श्रद्धावाढे सभी री 
पापराशि क्‍यों न हों क्षणम्राजमें मस्त होजाती हे । यह इस | पुरुषोंको क्‍या करना चाहिये इसका में वणन करता * 
एकादशीका प्रभाव है ॥३३॥ जो घेनुकी जछदान वा ॥ ४२ ॥ इसमें जल शायी भगवानकी पूजा करें; और तेंसी 
जेछ धनुका दान नहीं दे सके तो उसको सुवणसड्त और : ही जछ घेजुंका दान करे । प्रत्यक्ष गोका दान वा घृतगोका 
पेल्लसहित घटका दान करना चाहिए ॥ ३४ ॥ जो घटदान ' दान करे ए ४३ ॥ हे घममज्ञ ! एवं घमधारियोंमें श्रेष्ठ दृक्षि- 
देतेसमय जछका नियम करता है उसे एकएक प्रहरके णासे अनेक तरहके प्रिष्टान्न भोजनसे प्रयत्नके साथ ब्राह्म- 


१ अन्तकाढ नयन्त्येने वेष्णवा वेप्णवीं पुरीम ॥ इति हेमाद्ों पाठः । 


| एकांदशौ- 
नस्न्न्न्न्््2स.रटग 
तुष्ठो भवति वे क्षित्र॑ तेस्तृष्टेमॉश्लदों हरिः॥ आत्मद्रोहः कतस्तेस्तु येनेंपा समप्ुपोषिता ॥ ४५ ॥ 
पापात्मानों दराचारा दुष्टास्ते नात्र संशयः ॥ कुलानां च. शर्त साम्रमनाचाररतं सदा॥ ५६॥ 
आत्मना सह तर्ीतं वासुदे्‌वस्य मन्दिरम्‌ ॥ शान्तदानपरश्रेव अचेद्विश्व तथा हरिम्‌॥ ४७॥ 
कुव॑द्धिजागरं रातों येरेषा ससुपोषिता ॥ अन्न पाने तथा गावो वरस्त्े शब्यासनं शुभम ॥ ४८ ॥ 
कमण्डलुघ्तथा छत्र॑ दातव्यं निजेलादिन ॥ उपानहों च यो दल्यात्पात्रभूते द्विजोत्तमे ॥ ४९॥ 
ख सोवणेंन यानेन स्वगलोके ब्रजेदूधुवम्‌॥ यश्रेमां श्वुणुयाद्धकत्या यश्वापि परिकीतंयेत ॥५० 
उमों तो स्वर्गतों स्थातां नात्र काया विचारणा ॥ यत्फलं संनिहंत्यायां राहुअस्ते दिवाकरे 
॥ ५१॥ कृत्वा आद्ध लमेन्मत्येम्तद्स्याः श्रवणादपि ॥ एवं यः कुरूते पुण्यां द्वादर्शीं पाप- 
नाशिनीम्‌ ॥ सवपापावनिमुक्त+ पर्द गच्छत्यनामयम्‌ ॥ ५२ ॥ इति श्रीमारतपद्मयोरुक्तं ज्येष्ठ- 
शुक्षृनि जनलकादशीमाहात्म्य संपूर्णम्‌ ॥ 
अथ आपषादऋष्णेकादशीकथा ॥ 
युधिष्ठिर उवाच ॥ ज्येष्ठशुक्क निजलाया माहात्म्यं व श्रतं मया॥।आषाटकृष्णपक्षे तु किना- 
मेकादशी मवेत्‌ ॥ १ ॥ कथयस्व पसादेन ममाग्रे मथुखूदन ॥ श्रीकृष्ण उवाच ॥ ब्रतानाम॒त्तमें 
'शजन्कथयामि तवाग्रतः॥ २॥ सवपापक्षयकरं श्र॒क्तिमक्तिमदायकम्‌ ॥ आषाठस्यासिते पक्षे 
शयोगिनीनाम नामतः ॥ ३ ॥ एकादशी वृपश्रेष्ठ महापातकनाशिनी ॥ संसाराणंवमम्नानां पोत 
'रूपा सनातनी ॥४॥ जगन्नये सारभूता योगिनीति नराधिप॥ कथयामि , कर्था. तस्याः पौराणीं 
चापहारिणीम्‌ ॥ ५॥ अलकाधिपतिनाम्ना कुबेर! शिवपूजकः ॥ तस्यासीत्पुष्पबटको हेममा- 
छीति नामतः ॥ ६९॥ तस्य पत्नी छुझपासीद्विशालाक्षीति नामतः॥ स तस्‍यां सोहसंयुक्तः 
कामपाशवशं गतः ॥ ७ ॥ मानसात्पुष्वानेचयमानीय स्वगृहे स्थितः ॥ पत्नीपेम सघमायुक्तो न 


(७३२ ) प्रेतराज । 















न मम कि प्रसन्न करे || ४४ ॥ ऐसा करनेसे मोक्षदाता भगवान्‌ 
हरि जलदी प्रसन्न होते हैं। जो छोग इस उपवासको नहीं 
करते वे अपनेही साथ द्वब करते हू ॥ ४५ ॥ जो छढोय 
झान्त और दानी होकर भगवाबकी पूजा करतेहुए रांत्रिमें 
जागरण कर निजेलाका उपवास करते हैं वे छोग चाहेँपापी 
यां दुराचारी हों दुष्ट हों वे अबने अनाचारी सो कुछके 
साथ भगव्राब॒के घाममे पहुंचते हैँ | ४६ ॥ ४७ ॥ जिन्होंन 
कि, रातमं जागरण करते हुए इसका अ्रत किया ह इस 
निजेलाके दिन वे अन्न, पान, गो; वद्थ, शय्या, आसन, 
कंमंडलु, छनत्र और जूलती जोडे किसी उत्तम ब्राह्मणको अब- 
इय दें || ४८ ॥ ४९६ वह सुंवणके विमसानपर चढेकर 
अवश्यही स्वगर्मे जाता हैँ । जो इसे भक्तिसे सुनवा हैं और 
'कहता है ॥ ५० ॥ वे दोनोंही स्वगेम चछे जाते हैं इसमें 
. कोई सन्देह नहीं हे । जो फछ सूयग्रहणके समय कुरुक्षेत्रमें 
दान देनेस होता है । ५१ ॥| वही फछ इमप्कें करनेस और 
इसकी कथा कहनेसेभी होता हे ॥ इस प्रकार जो इस 
. घद्धित्र पापनाशझिनी एकादशीकों करता हे वह सब पा 

' शाँखें निवृत्त होकर विष्णुलोकम जाता है ॥ ५२ ॥ यह 
श्रीमह्राभारत और पद्मपुराणकी कहीहुई ज्यष्ठ शुह्भा निजे 
छा एकाद्शीका म्राहत्म्य पूरा हुआ ॥ 





अथाषाढ' कृष्ण एकादुशी-युधिष्ठटिरजी बोले कि महा- 
राज | ज्यष्ठ शुक्ला निजेछा एकादशीका माहात्म्य श्रवण 
किया, अब आप आपषाढ ऊष्ण एकादशीका क्या नाप होल 
है ! ॥ १ ॥ है मघुसूदन ! यह आप प्रसन्न होकर मुझको 
वणन कीजिय । श्रीकृष्णजी बोले कि,हे राजन[त्रतोंमें उत्तम 
त्रतका वन तुम्हारे सम्मुख कद्दताहूँ । २ ।। सब पाोंकों 
नाश करनेवाली भुक्ति ओर मुक्तिको देनेवाडी आपषाढक 
ऊंष्णपक्षम 'योगिनी ? नामकी एकादशी होती है ॥*३ ॥ हैं 
राजश्रेष्ठ | थह एकादशी संसाररूपी समुद्रमे ट्ूबनेवाढोंको 
जहाजके समान और पापोंका नाश करनेवाली एवं सबा- 
तनी हैं ॥ ४ ॥ है नराधिप ! तीनों जगत्‌की सारहआ 
प्राचीन एवं पापहारिणी, इस योगिनी एकादशी कथाका मं 
तुम्हें वणेन करताहूँ ॥५।॥ झिवपूजा करनेवाढे अककों की 
रोके स्त्रामी कुबरके पास हेममाली नामका एक माढ़ीश 
ढडका था | ६ ॥ उसकी विश्ञालाक्षी नामकी सुन्दर श्री 
थी । वह कामदेवक वशीमूत होकर उसमें बडा स्नेह रखता 
था ॥७॥ वह एकदिन मानस सरोवरसे पुष्ष ढाकर 
अपनी पत्नीके प्रमसे फैंतकर घरपर हीं रहगया और अपन 


१ सनिहयायाम करुशक्षित्र । 


प्रतानि, ] भाषाटीकासमेतः । ( ४३३ ) 





कुबेरालयं गतः ॥ <॥ कुबरो देवसदने करोति शिवपूजनम्‌॥ मध्याहसमये राजन पृष्पाणि 
प्रसमीक्षत ॥ ९ ॥ हेममाली स्वभवने रमते कान्तया सह ॥ यक्षराट्र्‌ परत्युवाचाथ कालातिकम- 
कोपितः ॥ १० ॥ कस्मात्रायाति भो यक्षा हेममाली दुरात्मवान्‌ ॥ निश्चयः क्रियतामस्य 
प्रत्युवाच पुनः पुनः ॥ ११॥ यक्षा उचुः ॥ वनिताकामुकों गेहे रमते स्वेच्छया नप ॥ तेषां 
वाक्य समाकण्य कुबेरः कोपपूरित॥॥ १९ ॥ आह्ययामास त॑ं तूण बटुक॑ हेममालिनम्‌ ॥ ज्ञात्वा 
कालात्ययं सोएपि भयव्याकुललोचनः ॥११॥ आजगाम नमस्कृत्य कुबेर॒स्थाग्रतः स्थितः ॥ त॑ 
हृष्ठा धनदः ऋद्धः कोपसंरक्तलोचनः ॥ १४ ॥ प्रत्युवाच रूबाविष्टः कोपादिस्फुरिताधघरः ॥ धनद 
. उवाच॥ रे पाप डुष्ट इबेत्त कृतवान्‌ देवहेलनम्‌ ॥ १५ ॥ अतो भव जित्रयुक्तो वियुक्तः कान्तया 
सदा ॥ अस्मात्स्थानादपध्वस्तो गच्छ स्थानमथाधमम्‌ ॥ १६॥ इत्युक्ते बचने तेन तस्मात्स्था 
तात्पपात सः ॥ महादुःखानिभूतश्र कृष्ठपीडितविग्रहः ॥ १७ ॥ न वे तोय॑ न भक्ष्य च बनेरोौद्रे 
लभत्यसों ॥ न खुखे दिवसे तस्य न निद्रां लमते निशि॥ १८ ॥ छायायां पीडिततल॒निदाघे- 
'त्यन्तपीडितः ॥ शिवपूजाप्रभावेण स्मृतिस्‍्तस्थ न गच्छति ॥ १९॥ पातकेंनामिभुतो5षि कर्म 
पूवमठुस्मरन्‌ ॥ श्रममाणरुततो5गच्छद्धिमाद्रिं पर्वेतोत्तमम्‌ ॥ २० ॥ तत्रापश्यन्मुनिवरं मार्क- 
ण्डेय तपोनिधिम्‌ ॥ यस्यायुर्विद्यते राजन्‌ ब्रह्मणो दिनसप्तकम्‌ ॥ २१ ॥ आश्रम स गतस्तस्य 
ऋषेब्ह्म सदः समम्‌ ॥ ववन्दे चरणों तस्य दूरतः पापकर्मकृत्‌ ॥ २२॥ मार्कण्डेयो मुनिवरो दृष्ठा 
त॑ कुछ्चिनं तद। ॥ परोपकरणार्थाय समाहूयदमबवीत्‌ ५ ९३ ॥ भाकंण्डेय उबाच ॥ कस्मात्‌ 
कुष्ठाभिभूतस्त्वं - कुतो निन्य्यतरों ह्ासि ॥ इत्युक्तः प्रत्युवाचाथ मा्कंण्डेयेन धीमता ॥२५॥ हेम- 
माल्युवाच ॥ यक्षराजस्थालचरो हेममालीति नामतः ॥ मानसात्पृष्पनिचयमानीय पत्यहं मुने 
॥ २५ !शिवपूजनवेलायां कुबेराय समर्पये॥ एकस्मिन्‌ दिवसे काललोपश्व विहेतो मया 
॥२६॥ पत्नीसोख्यप्रसक्तेन कामव्याकुलचेतसा ॥ तंतःऊुद्धेन शप्तो5ई राजराजेन वे मुने॥२७॥ 








स्वामी कुबेरके स्थानपर न गया ॥ ८ ॥ हैं राजन ! कुबेर | सारा शसीर वबिगड गया || १७॥ अयेकर वनमें न उसे 


उस समय देवालूयमें बेठकर शिवजीकी (पूजा करता था । 
मध्याहका समय हो गया था, पंर पुंप्प नहीं आये थे। इस 
कारण उनको पूरी प्रतीक्षा थी ॥ ९ ॥ हममाल्ली जिसको 
कि; पु-प ऊानके छिए कहा गया था, घरपर अपनी ख्रीसे 


भाग कर रहा था | तब यक्षराजने कालातिक्रम होनेके 


कारण कुपित होकर यह कहा || १०॥ कि, है यक्षो ! वह 
दुष्ट हेममाली आज क्‍यों नहीं आया ! जाकर इसका 
निश्चय करो, यह एकद्दी बार नहीं कई बार कहा ॥ ११॥ 
यक्षोंने जवाब दिया कि, हे राजन | वह तो अपने घर 
... अपनी कान्वाके संग स्वेच्छापूवंक रमणकर रहा हे ! उसने 

यह सुन कुपित होकर ॥ १२ | उस फूल छानेवाले मालीके 
ढछडके हेममालीको तुरतही बुछाया और वहमभी देरी हो 
जानेसे डरके मारे कांपने छगा || १३ ॥ उसने आकर कुवे- 


रस प्रणाम किया और सामने बैठ गया । उसको देखकर 


कुबेरके कोपसे छाल नेत्र होगये॥ १४॥ क्रोधावेशमें आने 
के कारण कांपने छगे और यद्द वचन कहे कि, हे दुष्ट ! 
परदमाश तूने देवापमान किया है।| १५ ॥ इसछिए जा, 


तुम्ईें स्वेत कुछ होकर सदा ख््रीका वियोग होगा। तू इस 
नस गिरकर अधमरस्थ/नर्म चछाजा॥ १६ | ऐस! कहते 
ही वह उस स्थ/नसे प्रिरगया । बडा दुःखीहुआ और कुछस 


ष्ष्‌ 


राज ! मेरा नाम हेममाली है, में कुचेरका 


पानी मिलता था और न भोजन | दिनमें न सुख मिछता 
था और न रातमें नींदद्दी श्राप्त होती थीं॥ १८॥ छाया 
और धूपमें अत्यन्त कष्ट पानेपरभी -शिवपूजाक प्रभावसे 
उसे अपनी पूव॑स्म॒ति छप्त न हुयी ॥ १९॥ पापाभिभूत , 
होकर भी उसे अपने पृूर्वकमका स्मरण था। इसछिए 
अमण करते करते वह पवतराज हिमालछयमें जा पहुँचा 
(॥ २० ॥ वहां उसने तपोनिधि मुनिराज मसाकण्डेयजीकों 
देखा. | जिसकी कि; आयु हे राजन ! अज्याके सात दिन 
पय्यन्त है ॥ २१॥। वह उस मुनिराजके उस आश्रमपर गया 
जो ब्रद्मसभाके समान था। उस पापीन द्रसेही उनके 
चरणॉमेँ प्रणाम किया ॥ २२ ।तब महाराज मार्केण्डेयजीने 
उसे दूरसेद्दी देखकर परोपकार करनेकी इच्छासे बुछाकर 
यह कद्दा ॥ २३ ॥ कि; क्‍यों भाई ! तुम्हें यह कुष्ठ क्‍यों हे 


| और किसलिए तू अत्यन्त निन्‍्दनीय हुआ हे ? इसप्रकार 


उनके वचन छुनकर उसने ह तर दिया ॥ २४ ॥ कि, महा- 
कर हूँ। हे- 
मुने! में नित्य मानसरोवरस पुष्प छाकर ॥ २५ ॥ शिवजी 


| की पूजाके समय कुबेरको अपंण किया कंरताथा | छेकिन 
' एक दिन मैंने देर कस्दी ॥२६॥ कामाकुछ होकर ख्रीसकू 
| करता रद्या, उसका सुख छेता रहगया। तब र्वामीने 
| कुपित होकर। हे मुने ! मुझे शाप दे दिया है २७ ॥ अब 


( ४३१४ ) प्रतराजः । 


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कुष्ठापिभूतः संजातो वियुक्तः कान्तया सह ॥ अधघुना तव सात्रिध्यं प्रात्तोरस्मि शुभ 
करमणा ॥ २८ ॥ सतां स्वभावतत्रित्त परोपकरणक्ष मम्‌ ॥ इति ज्ञात्वा मुनिश्रेष्ठ शाघि मां व. 


कृतेनसम्‌ ॥ २९॥ मार्कण्डेय उवाच ॥ त्वया सत्यमिह प्रोक्ते नासत्यं भाषितं यतः ॥ अतो 


ब्रतोपदेश ते करिष्यामि शुभप्रदूम ॥ ३० ॥ आपाढहे क्रृष्णपक्षे त्वें योगिनीत्रतमाचर ॥ अध्य - 


ब्रतस्य पृण्येन कुष्ठात्व सुच्यस धुवम्‌ ॥ ३१ ॥ इति वाक्यं मुनेः अ्त्वा द॒ण्डबत्पतितो भुवि ॥ 
उत्थापितश्व॒ मनिना बनूवातीव हषितः ॥ हैक माकेण्डेयोपदेशेन' कृत॑ तेन ब्रतोत्तमम्‌ ॥ तद्- 
तस्य प्रभावेण देवरूपो बभूव सः ॥ रे३े ॥ संयोग कान्तया लेभ बुभुजे सौरूयझुत्तमम्‌॥ हईह- 


ग्विध नपश्रेष्ठ कथित योगिनीत्रतम्‌ ॥ ३४ ॥ अष्टाशीतिसहस्लाणि द्विजानू भोजयते तु यः॥ 


तत्फले समवाभोति योगिनीव्रतकृन्नरः ॥ २५ ॥ महापापप्रशमनी महापुण्यफलप्रदा ॥ शुचि- 
_ ऋष्णैकादशी ते कथिता योगिनी तप ॥ ३८ ॥ इति श्रीबह्मवेबर्तपुराणे आषाटकृष्णयोगि- 
न्याख्येकादशीमाहात्म्यं समाप्तम्‌ ॥ हि द 

गा अथाषादशुह्लकादशी कथा ॥ 

युधिष्ठिर उवाच ॥ आबषाठस्य सिते पक्षे किंनामेकादशी भवेत्‌ ॥.को देवः को विषिस्तस्था 
एतदाख्याहि केशव ॥ १ ॥ श्रीकृष्ण उवाच ॥ कथयामि महीपाल कथामाश्चयेकारिणीम॥कष- 
यामास यां बह्या नारदाय महात्मने ॥ २ ॥नारद उवाच ॥ कथयस्व प्रसादेन विष्णोराराधनाय 
में ॥ आषाटशुक्रपश्ने तु किनामेकादशी भवेत्‌ ॥ ३ ॥ बह्योवाच ॥ वेष्णवोषप्ति मुनि श्रेष्ठ साधु 
पूछ॑ कलिप्रिय ॥ नातः परतर लोके पवित्र हरिवासरात्‌ ॥ ४ ॥ कतेंव्यं तु प्रयत्नेन सर्वेपाषा- 
पलुत्तये । तस्मात्तेईह प्रवक्ष्यामि शुक्र एकादशीत्नतम्‌ ।। ५ ॥ एकादंश्या ब्र॒तं पुण्य पापन्न स्वे- 
कामदम्‌ ॥ न कृत येनेरेलेकि ते नरानिरयषिणः ॥ ८ ॥ पद्मानामेति विख्याता शुच्ो होका- 
दशी सिता ॥ हषीकेशप्रीतये तु कत्तव्यं ब्रतम्ुत्तमम्‌ ॥७.। कथयामि तवाग्रेपह कर्थां पौराणिकी 





इसी कारण में कुष्ठस कष्ट पारहाहूँ और ख्लीसे भी वियुक्त 
हूँ । अब आपके निकट किसी शुभकमेस यहां आपके 
समीप आ उपस्थित हुआ हूँ ॥। २८ ॥ सज्वनोंका स्वभावदी 
परोपकार करनेका होता हैं, इसलिए आप मुझ ऐसा जान 
कर इस पापका प्रायश्रित बतछाइये ॥ २९ ॥ मार्केण्डयजी 
' बोले कि, तुमने सत्य कहा, मिथ्याभाषण नहीं किया है । 
इसलिए में तुमे शुभके देनेवाले एक सुंदर ब्रतका उपदेश 
करूंगा ।। ३० ॥आषाढ कृष्णपक्षम तू योगिनीका ब्रतकर । 
इस भतके पुण्यस तुम कुष्ठस मुक्त हो जाओगे इसमें 
सन्देह स्व करना ॥ ३१ ॥ सुनिके इन वचनोंको सुन 
उससे पूृथिवीपर दण्डवत्‌ प्रणाम क्रिया मुनिनें उस उठाया 
. हब उसे बडा हु हुआ ॥ ३२ ॥ माकेण्डेयजीके उपदेशसे 
उसने यह उत्तम त्र॒त किया और उस ब्रतके प्रभावसे 
. छसको दिव्यरूप प्राप्त होगया। ३३ ॥ सत्रीका संयोग उत्तम 
सुख प्राप्त हुआ, जिससे वह सुखी होगया। हे राजन ! इस 
. श्रकार.योगिनीका उत्तम ब्रत वणन किया ॥ ३४ ॥ अस्सी 
: “इज़ार ब्राह्मगोंको भोजन करानेसे जो फछ पमिरु। है वही 
,.. अछईंस योगिनीके त्रतस मिलता दे ॥३५ | बड़े बड़े 
:;  नापोंका चाकू करनेवाडी और बडा पुण्य फल देनवाढीहे। 
7) भ (इस प्रकोर, आपको यह आषादक्ृष्ण एकादशी 

-काउकुक कररिया दे ।!.२६ ५ श्रह श्रीजह्मवेवत्तंपुराणकी 





कही हुईं आषाढ कृष्ण योगिनीनामक एकादशीका माहाल्य 
पूरा हुआ ॥ | 
अथ आघषाढ गरुद्धा एकादशीकी कथा-युधिष्टिरजी बोड़े 
कि; है केशव ! आषाढ शुहृपक्ष की एकादुशीका क्‍या नाम 
और क्या विधि हे ! उस्च दिन क्रिस देवताकी पूजा होती 
है | इसका आप वर्णन कीजिये ॥। १ ॥ क्ृष्णजी बोले कि; 
हे राजन्‌ ! बह्माने महात्मा नार को जिस आश्ययेकारिणी 
कथाका उपदेश दिया था वही म आज तुम्हें कहवाहू॥९॥ 
नारदजी त्रह्माजीस बोले कि, विष्णु भगवानके आराषवक 
लिय आषाढशुद्धा एकादशी का क्‍या नाम है ? इसका आप 
प्रसन्न होकर कथन कीजिये ॥ २ ॥ जअह्माजी बोले कि; है 
मुन्रिज ! आप वैष्णव हैं कलियुगमें प्राणियोंका हिंद 
करनेवाले हैं वा छडाईं आपको ज्यादा प्यारी है इसडोकम 


हरिवासरस अधिक पवित्र और कोई दिन नहीं हे ह॥॥ 


सभी पापके नाश करनेके हेतु इसको प्रयत्नपूवक केसेईस 


| कारण में तुम्हें शुद्धाएकादशी के ब्रतका वर्णन करताहू॥९॥ 


प्रकादशीका त्रत पवित्र है पापनाशक्र ओर सब काम 

पूणे करनेवाला हैं। जिन-मनुष्योने इसको नहीं किया दे 
सब .नरकके जानेवाले हैं ॥ ६ | आपषाढकी इस 
एकादशीका नाम पद्मा हैं। इस उत्तम ब्रतकों भरे 
वानकी अप्राप्तिक वास्ते अवश्य करना चाहिय ॥४ # 


मैं तुम्द्वारे सामने इसकी पवित्र पौराणिक कथाकों कलाई 


अतानि, ] भाषादीकासमेतः ! ( ४३५ ) 
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शुभाम्‌ ॥ यस्याः अवणमात्रण महापापप प्रणश्यति ॥ <॥ मान्धाता नाम राजरिविवस्व- 
हृशसम्भवः ॥ बभूव चक्रवर्ती स सत्यसन्धः प्रतापवान्‌ ॥ ९॥ धर्मतः पालयामास प्रजाः 
पुत्रानिवौरसान्‌ ॥ ने तस्य राज्ये दुर्नेक्ष नाधयो व्याधयस्तथा ॥ १०॥ निरातद्वा: प्रजास्तस्य 
धनधान्यसमन्विताः ॥ नान्यायोपाजितं द्र॒व्यं कोशे तस्य महीपतेः ॥११॥ तस्येव॑ कुर्वतो राज्य॑ 
बहुवर्षणणों गत॥अथो कदाचित्संभाप्ते विषाके पापकर्मणंः ॥१२॥ वषेत्रयं तद्विषये न ववर्ष बला- 
हकः ॥ तेनोद्वि्नाः प्रजास्तत्र बधवुः क्षुबयादिताः ॥ १३॥ स्वाहास्वधावषट॒कारवेदा[ध्यय नव- 
जिता॥बभूबुविषयास्तस्य सस्याभावेन पीडिताः ॥१७) अथ प्रजाः समागत्य राजानभिदमब- 
बन्‌।श्रूयतां बचन॑ राजन्‌ प्रजानां द्दितकारकम॥२५॥आपो नारा इति प्रोक्ताः पुराणेषु मनीविभिः॥ 
अयने ता भंगंवतस्तेन नारायणः स्मृतश॥ ९ धापजेन्यरूपो भगवान्विष्णुः स्वंगतः सदा ॥ स एव 
कुरुते वी वृष्टेरन्रे ततः प्रजाः;॥ १२७ ॥ तदमभावेन नृपते क्षय गच्छन्ति वे प्रजाः॥ तथा कुरू 
नृपश्रेष्ठ योगक्षेमो यथा भवेत्‌ ॥ १८॥ राजोवाच ॥ सत्यमुक्त भवद्विश्व न मिथ्यानिहितं वचश/॥। 
अन्न बह्ममय॑ परोक्तमत्रे सबे म्रतिष्ठितम्‌ ॥ १९ ॥ अन्नाद्धवन्ति भूतानि जगदन्नेन वर्तते ॥ इत्येबं 
श्रूयते लोके पुराणे बहुविस्तरे ॥ २० ॥ नृषपाणामपचारेण प्रजानां पीडन॑ भवेत्‌ ॥ नाई पद्या- 
म्यात्मकृतं दोष ब॒ुद्धया विचारथन्‌ ॥ २१ ॥ तथापि अयतिष्यामि प्रजानां हितकाम्यया ॥ इति 
कृत्वा मतिं राजा परिमेयबलान्वितः ॥२२॥ नमस्कृत्य विधातारं जगाम गहन वनम्‌ ॥ चचारि 
मुनिमुख्यानामाश्रमांस्तपसेधितान॒॥२३॥ददर्शाथ बह्मखतमु षिम ड्विरस नृपः ॥ तेजसा द्योतित- 
दिशं द्वितीयमिव पद्मजम्‌ ॥ २४ ॥ ते दृष्टा हर्षितो राजा अवतीये च वाहनात्‌ ॥ नमश्रक्रेअस्थ 
चरणों कृताअलिपुटो बशी ॥ २५ ॥ सुनिस्तमन्रिनस्याथ स्वस्तिवाचनपूवकम्‌ ॥ पमत्नच्छ 
कुशल राज्ये सप्तस्वड्भरेष भूपतेः ॥ २६॥ निवेदयित्वा कुशल पम्नच्छानामयं नपः ॥ ततश्व 
मुनिना राजो पृष्ठागमनकारणः ॥ २७ ॥ अब्रवीन्मुनिशादूलं स्वस्यागमनकारणम्‌ ॥ राजोवाच॥ 


यत्न करो जिससे प्रजाका योगक्षेम हो | १८ ॥ राजाने , 








हूँ । जिसके सुनने मात्रस महापाप नष्ट हो जाते हैं ॥८ ॥ | 
पूर्यवेशमें एक मान्धाला नासके राजर्षि उत्पन्न हुए थे । वे | 
चक्रवर्ती सत्पप्रतिन्न और बडे प्रतापी थे ।। ९ ॥ उन्होंने | 
अपनी प्रजाका ओरस पुत्रोंकी भांति धमेस पालन किया | 
था। उनक राज्यमें आधि व्याधि या दुभिक्ष कभी नहीं 
दोता था ॥ १० ॥ उसकी प्रजा निभंय ओर घनघान्यसे | 


५ के ७६, जि 
पृ्ण थी । उस राजाके कोषमें अन्यायसे उपाजित किया 


हुआ द्रव्य नहीं था ॥ ११ ॥ उसको इस ग्रकार राज्य | 
करतेहुए अनेक वर्ष बीतगये परन्तु कभी पापकर्मके पक-| 
नेसे १२ | उसके राज्यमें तीन वर्षे पर्यत वृष्टि न हुईं; | 
इससे उसकी प्रजा भूख प्यासस व्याकुछ होगई ॥ १३ | | 


पधनधान्यके अभावस्रे उसकी प्रजा स्वाहा स्वधा ओर वषघ- 
ट्कार तथा वेदाध्ययनसे रहित हो रही थी ॥ १४॥ सब 
प्रजाने राजाके आगे जाकर निवेदन किया और कहा कि, 


महाराज ! आप इस प्रजाहितकारी वचनको सुनिये। १५॥ 


विद्यनलोग पुराणों नारा'शब्दका अर्थ आप अर्थात्‌ जछ | ९. ४ 
कहते हर । जढछ भगवानका' स्थान है; इसलिये भगवानका किया ॥ २५॥। मुनिजीने स्वस्तिवाचन पूत्रंक उसका अभि- 


नाम * नारायण ? हे॥ १६॥ सवव्यापी भगवान्‌ विष्णु | नन्‍्दन किया और राज्यके सप्तांगका कुशलक्षेम पुछा॥२६॥ 
पल्ञेन्य अर्थात्‌ मेघरूप हैं । वही वृष्टि करते हैं । वृष्टिसे 


अन्न तथा अश्से प्रजा उत्पन्न होती हैं ॥१७॥।उसके २क्षा- | 


बसे प्रजाका विनाश होता है ।“इसंलिये हूं कुरुअछ्ठ ! एसा 


। ॥ २३॥ उसने ब््ंपुत्र अगिरसनामक 





कहा कि, आप छलोगोंने सय्य कहा हैं। मिथ्याभाषण नहीं 
किया । अन्न ब्रह्मका स्वरूप है ओर अन्नहीके अन्दर सब 
कुछ स्थिर होता है ॥ १९॥ अन्नस भूत उत्पन्न होते हैं। 
अन्नहीसे सब जगत रहता है । यह सब बात बडे बडे पुरा- 
णोमें वणन की है ॥ २० ॥ राजाओंके दोषसे प्रजामें पीड़ा 


| होती हूँ पर में विचार करके भी अपने किये हुए दोषकों 


नहीं जानता ।। २१ ॥ तोभी श्रजाके हितके वास्ते यत्न 
करूंगा इस प्रकार विचार कर बहु कुछ थोडी सेना छे 
॥ २२ ॥ त्राह्मणको नमस्कार कर जेगढमें चछा गया और 
मुख्य मुख्य तपस्वी मुनियोंके आश्रसमें अ्रमण करने लगा. 

के ऋषिका दशेन 
किया, जो दूसरे ब्रह्माकी भांति तेजस सब दिशाओंको 
प्रकाशित कर रहे थे । २४ ॥ उनको देखकर राजा प्रसन्न 
हो घोडेस उतर पडा । द्वाथ जोडकर उनके चरणोंमें प्रणाम 


राजाने अपना कुशछ बताकर मुनिसे अनामय पूछा 

इसके बाद मुचिने राजाकं आगसनका कारण पूछा ॥२ण। 
हल मुनिश्ादूल कक, ७, 

राजान जीको अपने आनेका कारण निवदन- 


| [ एकादशी- 
मगवन्‌ धर्मविधिना मम पालयतो महीम्‌॥ अनावृष्टिः संप्रवृत्ता नाहं वेइयत्र कारणम॥ २८॥ 
संशयच्छेदनार्थेप्र ह्यागतो5हँ तवान्तिकम्‌ ॥ योगक्षेमविधानेन प्रजानाँ निद्तिं कुर ॥ २९॥ 
ऋषिरुवाच ॥ एतत्कृतयुगं राजन युगानाऊत्तर्म स्मृतम्‌ ॥ अत्र बद्मोत्तरा लोका धर्मश्रात्र 
चतुष्पदः ॥ ३० ॥ अस्मिन्युगे तपोयुक्ता बाह्मणा नेतरे जनाः ॥-विषये तव राजेन्द्र व्रषलो 
यत्तपस्यति ॥ ३१ ॥| अकायेकरणात्तस्प न वर्षति बछाहकः ॥ कुरू तस्य वधे यत्न॑ ग्रेन दोष 
प्रशाम्यत्ति ॥ ३२ ॥ राजोवाच ॥ नांहमेनें वधिष्यामि तपस्यन्तमनागसम्‌॥ धर्मोपदेशां कथय 
उपसगंविनाशने ॥ ३२३ ॥ ऋषिरुवाच ॥ यद्येव॑ तहिं नृपते कुरुष्वेकादशीत्रतम्‌ ॥ शुचिमासे 
सिते पक्षे पद्मानामेति विश्वुता ॥ २४ ॥ तस्या व्रतप्रभावेण सुवृष्टिभंविता शुवम्‌ ॥ सर्वेसिद्धि- 
प्रदा ढोषा सवोपद्रवनाशिनी ॥ ३५ ॥ अस्या व्रत कुरू नूप सप्रजः सपरिच्छदः ॥ इति वाक्य 
मुने। श्रत्वा राजा स्वग्रहमागतः ॥ ३६॥ आपषाटमासे संप्राप्ते पद्मात्नतमथाकरोत्‌ ॥ प्रजापिः 
सह सर्वानिश्चात॒वेण्येसमन्वितः ॥ ३७ ॥एवं कृते ब्रते राजन्भववर्ष बलाहकः । जलेन प्लाविता 
भूमिरभवत्सस्यमालिनी ॥ २८ ॥ हृषीकेशप्रसादेन जनाः सौरूष॑प्रपेदिरि ।। एतस्मात्कारणा- 
देव करतंव्यं ब्रतमुत्तमम्‌ ॥ ३९ ॥ स्ुक्तिम॒क्िप्रदं चेब लोकानां खुखदायकम्‌ ॥ पठनाच्छवणा- 
दस्याः सर्वेपापेः प्रमुच्यते ॥ ४५ ॥ इते श्रीत्र० आषाठशुक्कप्माख्येकादशीत्रतमाहात्म्यम्‌ ॥ 
'  इयमेव शय्न्याख्या ।एतस्याँ विष्णुशयनत्रत चातुमास्यवत्रतग्रहणं चोक्त भविष्ये।।क्रष्ण उवाच॥ 
इयमेकादशी राजल्छयनीत्यभिधीयते ॥ विष्णोः प्रसाद्सिद्धचर्थमस्यां च शायनब्रतम ॥ १॥ 
कतंव्यं राजशादूल जनेमोक्षेच्छुमिः संदा ॥ चातमोस्यत्रतारम्भोष्प्यस्थामव विधीयते ॥ २॥ 
युधिष्ठिर उवाच !। क्थ कृष्ण प्रकतंव्यं श्रीविष्णोः शयनव्रतम्‌ ॥ तद्बूहि क्रपया देव चातुमीस्य- 


(४३६ ) 


प्रसराज:$ । 

















किया । राजाने कहा कि हे भगवन ! धर्मनिधिसे प्रजाका 
पालन. करते हुए भी मेरे राज्यमें अनावृष्टिका दुःख है और 
इसका कारण कुछमी मेरी समझमें नहीं आता ॥२८ ॥ 
महाराज | इस संशयको दूर करनेक वास्ते में आपके निकट 
आया हूं। आप योगक्षेमक विधानसे प्रजाके इस दुःखकी 
शान्ति कीजिय ॥ २९ ॥ ऋषिजी बोले कि, हे. राजन ! 
यह सब युरगोंसे उत्तम कतयुग है। इसमें ब्राह्मण प्रधान 
वण हूँ। और चतुरपाद धमम हे ॥ ३०। इस युगमे बआाह्म- 
णऋ अतिरिक्त और कोई तपस्या नहीं कर सकता पर 
तुम्हारे राज्यमें है राजन्‌ ! एक शुद्र तप करता हे ॥३१॥ 
' उसके इस अकर्से वर्षा नहीं होती । आप उसके वधका 
यत्न कीजिये जिससे दोष शान्तर होजाय | ३२॥ राजाने 
कहा कि, महाराज ! में उस निरपराधघ लप करते हुए व्य- 
. क्तिको नहीं मारना चाहता किन्तु इस दोषके नाशके वास्ते 
कोई घमेका उचित उपदेश दीजिय ॥ ३३ ॥| ऋषिजी बोले 
_ “कि, राजन | यदि ऐसीही बात हैं तो आप आघाढ शुह्लामें 
. दिख्बात ' पद्मा ? नामकी एकादशीका ब्रत की जिये।३४॥ 
उसके अंतके प्रभावसे आपके राज्यंमें अवश्यही सुबृष्टि 
होगी। यह संथ उपदृर्वोंको नाश करनेवाली तथा सब 
सिद्धियोंको देनेवाली है 8 ३५ ॥ हे राजन! इस दिन आप 
अपने खब परिवारक्े साथ जबइुय प्रंव. कीजिय । मुनिक 


हु 


इन वचनॉको सुनकर राजा अपने घर चछा आया*॥३श्ष| 
उसने अपनी सब प्रजाके और चारों वर्णोंके साथ आपांढ 
मासके प्राप्त होनेपर पद्मा नामकी एकादशीका त्रत किया 
३७ ॥ हे राजन ! इस प्रकार उस ब्रतके करनेपर पृथ्वी 
पानीसे भरगई और सत्य सम्पन्न होगईं.॥ ३८ ॥ भगवा- 
न्‌की कृपास सब छोग सुखी होगये 'हे राजन ! इसी कार- 
णसे इस उत्तम ब्रतको अवश्य करना चाहिये ॥ ३९ ॥ 
यह छोगोंको स्ुक्ति और मुक्तिका देनेवाला है। इसके पढने 


“तथा सुननेस सभी पापोंस" मुक्त होजाता है ॥४०॥ 


यह श्री ब्रह्माण्डपुराणकी कहीहुई आषाढ रोब्ठा  प्मा 
एकादशीके ब्रतके माहात्म्यकी कथा पूरी हुईं ॥ 

- शयनी-इसीको शयनी भी कहते हैं, उसी दिन विष्णु 
भगवानके शयन करनेका ब्रत तथा चातुर्मास्यके ब्तका 
प्रहण छियाजाता है । यह भविष्यपुराणमें डिखा हुआ है| 
क्ृष्णजी बोले कि, हे राजन्‌! यह एकादशी शर्यची नामसे 
भी कही जाती है। विष्णुभगवानकों प्रसन्न करनेक हेतु 
इस दिन शयन ब्रत कियाजाता है ॥१॥ हे राजन | इस 
दिन मोक्षाभिछाषी मनुष्योंको चौमासेके ब्रतका भी आरंभ 
करना चाहिय।।२।॥युधिष्ठटिरजी बोले कि,हे श्रीकृष्णजी महा” 
राज-! इस दिन आपके इस शयन ब्रतको और चातुर्मात्य _ 
सेबन्धी ब्रतोंको किस प्रकार करना. चादिये? यह आप कप. 


ब्तानि, ]... भाषाटीकासमेलः । ( ४३७ ) 
जज न5&22222222>2 2... 
ब्रतानि चारे। श्रीकृष्ण उवाचाश्रणु पार्थ प्रवक्ष्यामि गोविन्दशयनप्रतमाचातुर्मास्थे च यान्यु- 
क्तान्यासंस्तानि प्रतानि च॥ ४ ॥ कक्राशिगते सूर्य शुचो ह कल तु पक्षके ॥ एकादद्याँ जग- 
व्राथं स्वापयेन्मधुसूदनम्‌ ॥ ५ ॥ तुलाराशिस्थिते तस्मिन्‌ पुनरुत्थापयेद्धरिम ॥ आपषाट स्य 
सिते पक्षे एकादर्यामुपोषित+॥ ६॥ चातुर्मास्यत्रतानां तु कुर्दीत निच्च्म तत+॥ स्थांपयत 
प्रतिमाँ विष्णो शइचक्रगदाधराम ॥ ७ ॥ पीताम्बरधरां सौम्यां पयंडे वे सिते शुभे ॥ सित- 
वसख्समाच्छन्रे सोपधाने युधिष्ठिर ॥ ८ ॥ इतिहासपुराणत्ञो ब्राह्मणो वेदपारगः ॥ स्लापयित्वा 
दषिक्षीरघृतक्षोद्रसिताजलेः ॥ ९॥  समालेप्य शुमेगन्धेधृपेदीपेश्व भूरिशः ॥ पूजयेत्कुसुमेः 
शस्तेमन्त्रेणानेन पाण्डव ॥१०॥ सुप्ते त्वाये जगन्नाथे जगत्सुतं चराचरम्‌ ॥ विबुद्धे त्वाये बुध्येत 
जगत्सव चराचरम्‌ ॥११॥ एवं तां प्रतिमां विष्णोः पूजयित्वा युधिष्ठिर ॥ प्रभाषेताप्रतो विष्णोः 
कृताअलिपुटो नरः ॥ १२ ॥ चतुरो वाषिकान्मासान्देवस्योत्थापनतावधि ॥ ग्रहीष्ये नियमाउछ- 
द्वात्रिविन्नान्कुरु में मन्नो ॥ १३ ॥ इति संप्रा्थ्य देवेशं प्रह्मः संशुद्धमानसः ॥ र्री वा नरो वा 
मद्भक्तो धर्मांथ च घृतब्रतः॥ १४॥ गह्ीयात्रियमानेतान दन्‍्तधावनपूर्वकम्‌॥ ब्रतप्रारम्भ- 
कालास्तु प्रोक्ताः पश्चेव विष्णुना ॥ १५। एकादशी द्वादशी च पोर्णिमा च तथाष्टमी ॥ कके- 
टारुया च संकरान्तिस्तेषु कुयांद्रथाविधि ॥ १६॥ चतुधों गह्य वे चीण चातुमोस्यत्रतं नरः ॥ 
कार्तिके शुकृपक्षे त द्वादर्यां तत्समापयेत।१७॥ न शेशवं च मौत्यं च शुक्रशवॉन वा तिथेः ॥ 
सण्डत्वं चिन्तयेदादो चातुमास्यविधों नरः ॥ १८ ॥ अशुविर्वा शुविवापि यादि सत्री यदि वा 
पुमान ॥ व्रतमेके नरः कृत्वा झुच्यते सर्वपातकेः ॥ १९ ॥ प्रातिवर्ष तु यः कुयांद्वतं वे संस्मरन्‌ 
हरिम्‌ ॥ देहान्ते5तिप्रदीतिन विमानेनाकंतेजसा ॥ २० ॥ मोदते विष्णुलोकेएसो यावदाभूतसंप्ल- 
वम्‌ ॥ तेषां फलानि वक्ष्यामि कतेणां त प्रथकपृथक्‌ ॥ २१ ॥ देवतायतने नित्यं माजेनं जल- 














-. की अन्य अप्यशकपा:  रानकम सलाम. के ५ + का के जनम यु 


कर वर्णन कीजिए ॥ ३ ॥ श्रीकृष्णजी बोले कि, दें अजुन ! 
सुनो में तुमे गोविन्द्शायनब्रतका तथा चातुर्मास्यमं किए 
जानेवाले दूसरे ब्रतोंका भी उपदेश करता हैँ ॥७४॥ आषाढ 
मासक शुकुपक्षमं जब कि,सूय ककराशिपर हों एकादशीके 
दिन मगवान जगन्नाथको स्थापित करे ॥ ५॥ और सूयके 
तुलाराशिपर चले जानेके बाद विष्णुभगवानकों आषाढ 
शुक्ला एकादशीके दिन उपवास कर ॥ ६ ॥ चातुर्मास्यके 
ब्रतोंकी आरंभ करनेका नियम भी करे। शेख, चक्र, गदा- 
पारी विष्णुकी प्रतिमाको विराजमान कर ॥ ७ ॥ हे युधि- 
प्विर ! सुन्दर श्वेत पलुंगपर पीतवाम्बर ओर सिंदव््रधारी 
भगवानकी सुन्द्र प्रतिमाको तकियोंके साथ विराजमान 
कर ॥ ८ ॥ इतिहास पुराण और वेदपारगामी ब्राह्मण 
दही, दूध, घी, शहद ओर सिश्रीके जलूसे स्नान करावे 
॥ ९ ॥ हे पांडव ! बढिया धूप, दीप और गन्धसे एवम्‌ 
उत्तम पुष्पोंस बारबार  सुप्ते त्वयि ” इस मन्त्रस पूजनकरे 
कि, जगतके स्वामी आपके सोनेपर यह संसार सोयासा 
दोजाता है| यदि आप उठजाते हैं तो यह सब चर और 
अचर युत॒ संसार अबुद्ध होजाता है ॥ ११ ॥ इस भत्रकार हे 

के ! उस प्रतिमाका पूजन कर उसके आगे हाथ जोड 
पह निवेदन करे॥ १२॥ कि, हे प्रभो ! देव प्रबोधके चार 
महिनोंतक में पवित्र नियमोंका प्रहण करूंगा, इसलिए 





आप उन्हें निविन्न पूरा कर दीजिए ॥ १३ ॥ इस प्रकार 
विनीत हो शुद्ध हृदयसे भ्रगवानकी प्रार्थना करके मेरा 
भक्त चाहे स्त्री हो या पुरुष हो धमंके वास्ते ब्रतको घारण 
करे ॥ १४ ॥ देतधावन करनेके बाद इन .नियमोंकों ग्रहण 
करे । भगवान्‌ विष्णुन ब्रत प्रारंभ करनेके पांच समय कहे 
है।। १५ ॥ एकादशी, द्वादशी, पूर्णिमा और अष्टमी कथा 
कर्ककी संक्रांति इन दिनोंके अन्द्र यथाविधि पूजन करके 
ब्रतक। प्रारंभ करे ।। १६ ॥ यह चार प्रकारके ग्रहण किया 
हुआ यह चारतुर्मास्य त्रत कात्तिक. शुक्‍्छा द्वादशीके दिन 
समाप्त किया जाता है ॥ १७ ॥ चातुर्मास्यके ब्रत प्रारम्भकी 
तिथिम गुरुशुक़रे शेशव और मोढयका तथा तिथियोंके _ 
घटने बढनेका पहलेही विचार न कर ढेना चाहिए ॥१८४ 
स्रीया पुरुष पवित्र हो या सपवित्र एक भी त्रत करे तो 
वे सब पापोंसे मुक्त होजाते हैं ॥ १९ ॥ जो छोग प्रतिवर्ष 
हरिका स्मरण करके इस ब्रतको करते हैं वे अन्त अत्यन्त 
तेजस्वी विमानके द्वारा छे जाये जाकर ॥। २० ॥ विप्णु- 
लोकमें प्रछयपयत आनन्द करते हैं। उन सब करनेवालों के 
पृथर्‌ प्रथक्‌ फ़छोंका श्रवण करो ॥ २१ ॥ जो उत्तम पुरुप 
देवालयमें सदाही जाकर उसकी शुद्धि, सिंचाई ओर 


. . . .* पारंभमिति शेषः । 


ब्रतराजः । , [ एकादशी- 





हि 






























(४३८ ) 











सेचनम ॥ मलेपन गोमयेन रड्गरवल्ल्यादिके तथा॥२२॥ यश करोति नरकश्रेष्ठश्चातुमास्यमतन्द्रित॥ 
समाप्तो च यथाशक्त्या कुर्याद्राह्षणणोजनम। २श॥सप्तजन्मछ विपेन्द्रः सत्यधर्मपरो भवेव॥दध्ना . 
क्षीरेण चाज्येन क्षोौद्रेण सितया तथा।२४॥स््नापयेद्विधिना देव॑ चातुर्मास्ये जनाधिप ॥ स याति 
विष्णुसारूप्य सुखमक्षय्यमश्नते ॥२५॥ नृपो भूर्म प्रदद्माद्यो यथाशक्त्या च काथ्वनम्‌॥ विप्राय 
देवमुदिश्य सफल च सदक्षिणम॥२६॥ अक्षयान्‌ लभते भोगान्‌ स्वर्ग इन्द्र इवापरः॥ लोक त 
समवाप्नोति विष्णोरत्र न संशयः ॥ २७ ॥ देवाय हेमप्मं तु दद्यानवेद्यसयुतम्‌ ॥ गन्धपुष्पाक्ष- ' 
_ताय्ेयों देवबाह्मणयोरपि ।। २८ ॥ पूजा यः कुरुते नित्य॑ चातुमास्ये व्रती नरः॥ अक्षय छुस- 
: माप्नोति पुरन्दरपुरं ब्रजेत्‌ ॥२९॥ यस्‍स्तु वे चतुरो मासांस्तुलस्या हरिमचेयेत ॥तुलसीं काथर्नी 
कृत्वा ब्राह्मणाय निवेदयेत्‌ ॥ ३० ॥ काशअनेन विमानेन वेष्णवी लमते गातैम्‌॥ देवाय गुग्मुहुं 
यो वे दीप चार्पपते नरः॥ ३१ ॥ समात्तो धूपिकां दद्यादीषिकां च महामते ॥ स भोगी जायते 
श्रीमांस्तथा सौमाग्यवानपि ॥ ३२ ॥ प्रदक्षिणास्तु यः कुर्यात्रमस्कारान्विशेषतः॥ अश्वत्थस्या- 
थवा विष्णोः कार्तिक्यवाये स धुवम्‌ ॥ ३३॥ विष्णुलोकमवाप्नोति सत्यं सत्य न संशयः॥ 
संध्यादीपप्रदो यस्त॒ भाड़णे द्विजदेवयोः ॥ ३४ ॥ समाप्तों दीपिकां दुद्यादवर्म चेके च काथ- 
नम्‌ ॥ वेकुप्ठे समवाप्नोति तेजस्वी स भवेदिह ॥ २५ ॥ विष्णुपादोदक यस्तु॒ पिबेच्छाद्वासम- 
न्वितः ॥ विष्णोलॉकमवाप्नोति न चास्मिज्ञायते नर; ॥ ३६॥ शतमष्टोत्तरं यस्तु गायत्रीजप- 
माचरत्‌ ॥ त्रिकालं वेष्णवे हम्थ न स पापेन लिप्पते ॥ ३७ ॥ पुराणं श्रणुयात्रित्यं धमशाखम- 
थापि वा॥ कालनेन युत॑ं वस्त्रे पुस्तके च॒ निवेदेंयेत ॥३८॥ पुण्पवान्‌ धनवान्भोगी सत्यशोच- 
परायणः ॥ ज्ञानवॉल्लोकविरुघातो बहुशिष्पः खुधारमेंक ॥ ३९ ॥ नॉममन्त्रत्न॒तपरः शम्मोवां 








और जो देवताके .वास्ते गुग्गुछढकी धूप तथा दीपढ 


गोबरसे छिपाई करं रज्नवल्ली आदिस सुन्दर खगार करता 
अपित करता हैं ॥ ३१ ॥ और समाप्तिमें घूपिया तर्थो 


हैं ॥ २२ ॥ इस प्रकार सावधानीसे जो चोौमासे भर ब्रता- 


नुष्ठान करता रहता है, समाप्तिके दिन यथा-शक्ति आ्राह्म- 

जन कराता है ॥ २३ ॥ बह सात जन्मके अन्द्र 
सत्यधमंसवी होता हैं ॥ दहीसे, दूधस, घी, शहद और 
: मिश्रीस ॥ २४ | विधिपूवक स्नान कराकर भगवानकी 
पूजा करे। इस प्रकार जो मनुष्य चातुर्मास्यके इस ब्रतका, 
हे राजन्‌ ! अनुष्ठान करता हे वह विप्णुभगवानके सारू- 
, प्यैको पाकर अक्षय सुख भोग करता हैं| २५॥ जो राजा 
. अपनी यथा शक्ति भूमि और सुवर्णका दान देता है 
ओए न्ाज्मणकेलिए और देवव'के निमिच फछमूछके साथ 
दक्षिणामेंट करता हे४२६॥ वह स्वगम दूसरे इन्द्रकी भांति- 
' अक्षय भोग प्राप्त करताहे और वह विष्णुके छोकमें निवास 
करता है इसमें कोई सन्देह नहीं है ॥ २७ ॥ भगवानको 
. जो नेवेद्य संयुक्त सुवर्णका कमछ अपंण करे तथा जो गन्ध, 
.! पुष्प, अक्षतादिसि भगवान्‌ और ब्राक्षणकी पूजा करे 
॥ २८ ॥ और जो मनुष्य नित्य चातुर्मास्यके ब्रवको कर 
भसंगवानकी पूजा करता है उसे अक्षय सुख मिलकर 


. इनदृक़ोककी आप्ति होती है ॥ २५॥ और जो चार मही 


. .नंतक तुरुख्तीजीके दछको भगवानके अपण करता है और 
>आधकरी 5४ सकी कप भेंट करता है ॥ ३०॥ 
चंद सुवर्णनिर्मित विमानसे विष्णुलोकमें. निवास करता हे 





दीपिया देता हे वह हे सहाबुद्धे | बडा श्रीमाव्‌। 
सौभाग्यवान और भोगवान्‌, भी होता है ॥ ३२ ॥ बो 
विशेष कर प्रदक्षिणा नमस्कार करता है. तथा कात्तिककी 
एकादशीपर्यत्त अश्वत्थ या विष्णु भगवानके समीप इस 
प्रकार पूजा करता है वह निश्चय ॥ रे३ ॥ विष्णुढोकर्मे 
जाता है, यह सच है, सच है, इसमें सन्देह नहीं हे जो 
मनुष्य सन्ध्याके समय दीपकका दान करता है। यानी 
ब्राह्मण या भगवानके आंगनमें उसे जगाकर रखता है।रेशॉ 


समाप्रिम दीपक और वस्र और सोना दान करवा है वह 


निश्चयही विष्णुलोककोप्राप्त करताहँ और यहां तेजस्वीहोता 

हैं। ३५॥ जो मनुष्य श्रद्धाभक्तिके साथ विष्णुचरणामृत 
पान करता है उस विष्णुंछोककी प्राप्ति होती है | वो फिए 
इस संसारमें जन्म नहीं छेता || ३६ | जो मनुष्य १०८ 
गायत्रीका जप त्रिकालमें भगवानके मंदिरमं करता हें उसे 
कभी पाप नहीं छगता ॥| ३७॥ जो मनुष्य नित्य पुराष , 
कथाका श्रवण करताहें और जो धर्मशाख्र सुनताहे घुबर्णक 
साथ पुस्तकका दान करता है || ३८ ॥ वह मलुष्य, उुम्द- 
वान्‌ , घनवान्‌ , भोगवान ,सच्चा,पवित्र,ज्ञानवान ; ्रसिद्। 
बहुतसे चेलॉंवाला और धर्मात्मा होता है ॥ ३५९ ॥ 






* “१ भवतीति झेष: । २ चातुर्स स्येति शेषः । 


ड़ 





... केशवस्य च॥ समातो प्रतिमा दद्यात्तत्पय देवस्थ काश्वनीम ॥ ४० ॥. पुण्यवान दोषनिर्मुक्तः 
/  स॒ भवेच गुणालयः ॥ कृतनित्यक्रियो भूत्वा सूर्यायाघ्य निवदयेत्‌ ॥ ४१ ॥ सूर्यममण्डलम्रध्य स्थ॑ 
देवं ध्यात्वा जनादूनम्‌ ॥ समाप्त कान दुद्यद्वक्ततसत्रं च गाँ तथा ॥ ४२॥ आरोग्य॑ पूर्ण 








.. झायुश्र कीति लक्ष्मी बले लमेत्‌ ५ तिलहोम॑ तु यः कुषोच्ातुर्मास्ये दिनादेनि ॥ 2३॥ भकक्‍त्या 


व्याहतिनिमत्रे्गायच्या वा ब्रतान्वितः ॥ अष्टोत्तरशत चाथ अष्टाविंशतिमेव वा ॥ ४४ ॥ तिल- 
पात्र समाप्तो तु दद्याद्विआय धीमते ॥ वाइममनःकायजतितेः पापेमुच्येत सखितेः ॥ ४५ ॥ न 
रोगेरमिनूयेत लमेत्संततिप्तुत्तमाम्‌ ॥ अन्नहो न॑ तु यः कुयोंचातुर्मास्यमतन्द्रितः ॥४६॥ समात्तो 
पृतकुम्म॑ तु दुद्यात्सवस्रकाखनम्‌ ॥ आरोग्यं कान्तिमतुलां पुत्रसो भाग्य सम्पदः ॥ ४७ ॥ शझांबचु- 
क्षयं च लमभते बह्मगा प्रतिमो मत्रेत्‌ ॥ अश्वत्थसेवां यः कुर्यात्सवेपापेः प्रमुच्यते ॥१८॥। विष्णु- 
भक्तो भरदेत्पश्चादन्ते बस्ले प्रदादयेव ॥ सकाथ्न ब्राह्मगाय नेव रोगाव्‌ स विन्दते ॥४९॥ तुलीं 
धारयेद्यस्तु विष्णुप्रीतिकरां शुभाम्‌ ॥ विष्णुलोकमवाप्नोति सर्वेपापः प्रम्नुच्यते ॥ ५० ॥ बाह्म- 
णान्मोजयेत्पश्चा द्विष्णुमुदिश्य पाण्डब॥ यस्तु सुप्ते हपीकेशे दूवोमृतसंभवाम्‌ ॥ ५१ ॥ सदा 
पआतवहेन्मूदिन त्व दूर्वे इति मंत्रतः ॥ ब्रतानते च कुरुअष्ट दूर्वों स्रणेविनिर्मिताम्‌ ॥६२॥ दद्याद 
.. दक्षिणया साद्धे मंत्रेणानेन सुत्रत ॥ यथाशाखामशाखानिर्विस्तृतासि महीतले ॥ ५३॥ तथा 
... ममापि सत्तानं देहि त्वमजरामरम्‌ ॥ नाशुम माप्ठुषाजातु पापेभ्यः प्रविमुच्यते ॥५४॥ जुकक्‍त्वा 
तु सझलान्‌ भोगान्‌ स्वगेलोके महीपते॥/गीतं तु देवदेवस्प केशवस्य शिवसरुष वा ॥५५॥ करोति 
पुरतो नित्यं जागृतेः फलमाप्ठुयात ॥ चातुर्मास्यत्रती दद्याद्‌ घण्टों देवाय सुस्वराम ॥ ५६ ॥ 
सरस्वति जगन्नाथे ज़गज्ाव्यापहारिणि ॥ साक्षाद्वह् ऋलत्रं च विष्णुरुद्रादिनिः सतठुता ॥ ५७ ॥ 
गुरोरवज्ञया यज्चानध्यायेपध्ययनं॑ कृतम्‌ ॥ तन्ममाध्ययनोत्पन्नं जाब्यं हर वरानने ॥ ५८ ॥ 





को छुवण भट करे तो बह कभी रोगी नहीं होता बा ॥ ४९ ॥ 
जो मनुष्य विष्णुप्रीति करानेवाली पवित्र तुठसीको समपेण 
'करे तो उसके खब पापोंका नाश द्ोकर विष्णु छोककी 


लीका या विण्णुका नामसात्रके सन्त्रको घारणकर समाप्तिके 
समय सुवणकी बनीहुईं भग्वान्‌की मूर्तिका दान करता है 
॥ ४० ॥| वह मल्ुष्य पुण्यवान्‌ सच्चा और गुणी द्वोता हैं, 


जो निद्यकमेंको करनेके बाद सूथ भगवानको अध्य देता है 
॥ ४१ ॥ ओरसूयप्रण्डलस्थित जनाइंन भगवान्‌ का ध्यान 
करता हे, समाप्तिके समय सुवर्ण, रक्ततल्न तथा गोदान 
करता है ।। ४२ ॥ वह सदा आरोग्य, दीर्घाशु) कीत्ति, 
लक्ष्मी और बढ प्राप्त करता है, जो मलुष्य चातुर्मास्यके 
अन्द्र प्रतिदिन भक्तिस १०८ या.२८ व्याहृति सहित गाय- 
त्रीके मन्‍त्रसे तिछ होम करता हैं । एवं समाप्तिके समय 
बुद्धिमान त्राह्मणके छिय तिलपात्र प्रदान करता है वह -मलु- 
प्य सत्र, धचन और शरीरके संचित पापोंसे शीज्रद्दी मुक्त 
हो जादा है | ४३-४५ जो मनुष्य बराबर चातुर्मास्यके 
अन्द्र अन्नका होम करता हैं वद्द कभी रोगपीडित नहीं 

ठथा उसे उत्तम सनन्‍्ततिका छाभ होता हें ॥ ४६, ॥ 


समाप्तिक समय घृतका कुम्भ ओर सुत्रण वस्तरसददित प्रदान 


कर तो उस आरोग्य, सौभाग्य और _कान्तिका छाभ होता 
॥ ४»॥ उसके शत्रुका नाश होता हैं। सब पापों छा क्षय 


है जो मनुष्य अश्वत्थ वृक्षकी सेवा करवा हे ५४ ४८ # | 


विष्णुभ्रक्त हो ब्रतके अन्तर्म वल्लदान करे तथा प्राहण- 


जो | कैंठ भो अशुभ नहीं के 
॥ ५३ ॥ ५४ ॥ वह सब भोगोंक्रो भोगकर सत्र 





प्राप्ति होती हैं ॥ ५० ॥ है पांडव ! विष्णुके हंतु ब्राह्मणों को 


भोजन करावे । जो मनुष्य भगवानके सोजानपर अम्ृतों- 
त्पन्ना दूर्बाको त्वें दुर्वे ” इस मंत्रसे प्रावःकाल शिरमें घारण 
करता है तथा ब्रतकी समाप्तिपर स्वण निर्मित दू्वोको)।५१४ 
॥ ५२ ॥ दक्षिणाके साथ हे सुब्रत ! 'यथाशाखा ? मंत्रसे दे 
[ त्व दूर्वे बह और यथाशाखा यह २९९ पृष्ठमें गये)डसका 
होता एवं सब पापोंसे छूट जाबा हैं 


प्रतिष्ठित होता है। जो मनुष्य भगवानके आर शित्रके गुण- 


५. | गानको !। ५७ || प्रतिदिन उनके निकट करता हैं वह जा- 


गरणके फलका भागी होता हैं; चातुर्मास्यके ब्रतीको चाहिये 


| कि, भगवानके छिये एक उत्तम घण्टा चढावे ॥५६॥ , 


है जगतकी अधीश्वरि | हे सरस्वती ! हे मूखेताको मिटाने- 
वाली ! है साक्षात्‌ अज्माकी कछत्ररूप ! आपको स्तुतिया 


| विष्णु और रुद्र करते रहते हैं ॥५७ ॥! दे सुन्दर मुखवाडी ! 


सुरुकी भ्रवज्ञास तथा अनाध्ष्यायोंके अध्यतसे एवम्‌ मेर 


“अवैध अध्ययनसे जो जाडथ उत्पन्न हो उसे दूर करिय्रे 


(४४० ) प्रतराजः । [ एंकार्दशी- 





७» 9७७७४७छऋछआआ29 22४9४ 9 ना िााणाााााणाणााॉौॉौोे जि जिया“ 
घग्टादानेन तुष्ठा त्वे बह्माणी लोकपावनी ॥ विश्रपादविनिर्मुक्त तोय॑ यःप्रत्यहं पिबित्‌ ॥५९ ॥ 
चातुभास्पे नरो भकत्या मह्ृपं बाह्मण स्मरने॥मनोवाक्कायजनितेमुक्तो भवति किल्विषेः ॥६०॥ 
: व्याविभिनोनिभूयेत श्रीरायुस्तस्य वद्धेत ॥ समातो गोयुगं दुष्याद्रामेकां वा पयस्विनीम ॥६९१॥ 
तत्राप्यशक्तो राजेन्द्र दच्याद्वासोयुग त्रती ॥ ब्राह्मणं वनन्‍्दते यस्‍्तु सर्वदेवमर्य श्वुतम । ६२ ॥ 
कृतकृत्यों भवेत्सद्यः स्वेपापेः प्रमुच्यते ॥ समाप्ती भोजयेद्विप्रानायुर्वित्त च विन्दति ॥ ६३॥ 
संत्वृशेत्कविलां यो वे नित्य॑ भक्तिसमन्वितः ॥ तामेवालंकृतां दद्यात्सवत्सां दक्षिणायुताम्‌ 
' ॥ ६४॥ सार्वभोमों भवेद्राजा दीबायुश्व भ्रतापवार्‌ ॥ स वसदिन्द्रवत्स्वर्गे वत्सरान रोमसंमि- 
ताव॥ ६५॥ नमस्करोति यः सूर्य गणेश वापि नित्यशः ॥ आयुरारोग्यमैश्वर्य छमते कान्ति- 
मुत्तमाम्‌ ॥ ६६ ॥ विश्नराजअत्ाादेन प्राप्ठयादीन्सितं फलम्‌ ॥ सर्वत्र बिजय॑ चेव नात्र कार्यो 
विचारणा ॥ ६७ ॥ विश्वेशाकों सुवर्णस्य सिन्दूरारुणसब्नरिमों ॥ निवेदयेद्राह्मणाय सर्वकामार्ड- 
तिद्धये ॥९८॥ यश्तु रौप्यं शिवभीत्ये द्याद्धकत्या ऋतुद्ये ॥ ताम्न वा-प्रत्यहं दब्यात्स्वशकत्या 
शिवत॒ष्टये ॥६९॥ खुरूपॉलछमभते पुत्रान्‌ रुद्रभक्तिपरायणान्‌ ॥ समाप्तो मधुपूर्ण तु पाज्न॑ राज॑तमु- 
त्तममूं ॥ ७०॥ प्रद्यात्ताम्रदाने त॒ ताम्रपात्रं गुडान्वितम्‌ ॥ यस्तु खुप्ते हवीकेशें स्वर्ण दबाव 
स्वशक्तितः॥ ७१॥ वद्बयुग्मतिलेः साद्ध सर्वपापेः प्रमुच्यते ॥ इह झुक्त्वा महाभोगानस्ते 
शिवपुरं व्रजत्‌ ॥ ७२ ॥ बस्च॒दानं तु यः कुर्याब्वातुर्मास्पे द्विजातये ॥ अभ्यच्य: गन्धपृष्पादे- 
विष्णुमें प्रीयतानिति ॥ ७३ ॥ शब्पां दच्चात्समाततों तु वासः काश्वनपट्चिकाम्‌ ॥ अक्षय्यं सुख- 
माप्नोति घन स घनदोपमम्‌ ॥ ७४ ॥ यो गोपीचन्दुनं दृद्माव्नित्य वर्षासु मानवः ॥ श्रीपति- 
स्तस्प संत॒ष्टो शक्ति मुक्ति ददाति च ॥ ७५ ॥ सम|त्तावरवि तदद्यातुलापरिमित शुभम ॥ तदई 
बा तद॒द्ध वा सवस्त्र॑ च सदक्षिणम्‌ ॥ ७६ ॥ यस्तु खुते हषी केशे प्रत्यह तु ब्तान्वितः ॥ दब्बाद 


॥५८॥ है छोकोंको पवित्र करनेवाढी ब्रह्म[णो ! तू घण्टक 
दानसे असन्न होती है । जो मनुष्य हर॒रोज आाह्म्णोके चर- 
णोंका चरणामृत छेता हे॥५९॥ चातुर्मास्यमें तरह्मणको मेरा 


स्वरूप मानकर वो मन, वाणी और शरीरके कियेहुए पा 


पोंस मुक्त होजाता है ।। ६० ॥ जो मनुष्य समराप्रिपर एऋ 
जोड़ा गो अथवा एकही दूध देनवाढी गौकों दान करे, 
तो वह कभी व्यिपी डित नहीं होता तथा उसकी छत्ष्मी 
ओर आयुकी वृद्धि होती है ॥ ६१॥ हे राजेन्द्र | यदि 
इसको देनमें भी जतमथ हो तो उसको एक जोडा वस्नरही 
देना चाहिये। जो मनुष्य सत्र देव तास्वरूप विद्वान ब्राह्म- 


णको प्रणाम करता हैं॥ ६९॥ वह सफर होकर निष्पाप 


होजाता है । तथा जो समाप्तिपर ब्राह्मगोंको भोजन कराता 
है उसकी भायु और घन बढता है ॥ ६३॥ जो निद्य 
. कपरिला गौका स्पशेकर बच्चेड़े साथ उसे ही भक्तिके साथ 
: अल्ंहृत करके ददे तो ।| ६४॥ वह मनुष्य सार्वभौम चक्र- 
: चर्ची राजा होता हैं, दीर्घाथ और ग्रतापी होता है। वह 
. उस गो बालों कली संख्याके समान वर्षसर्यत इन्द्रकी भांति 
स्वर्गंम निकस करता है ॥ ६५॥ जो नित्य सूर्य या गणे- 
शको नमस्कार करता है तो उसको आयु, आरोग्य, ऐश्वये 
और कान्दि प्राप्त होती है ॥ ६६॥ इसमें कमी सन्रेद मत 
ह करो कि, वह ग्रमशजीछी छूपास इच्छित फछको पाकहुर 


सत्र त्रिजयला भ करता हे ।| ६७ || सब काम्मोंक! सिद्ध 
होनेके लिये सूयंकी और गणेशजीकी सोनेकी सींदूरी भरुष 
रंगकीसी चमकनी मूर्तिको ब्राह्मणको अपंण करे ॥ ६८॥ 
जो दो ऋतुओंके अन्दर शिवजीकी प्रसन्नतके छिये रोज 
चांदीका या ताम्रक। दान कर || ६९ ।॥ तो वह शिवजीओ 
भक्त एवं बड़े सुन्दर पुत्रोंकी पावेगा और सपम्र प्रिपर सत्तम 
चांदी झा पात्र शहद्स भरकर दें ॥| ७० ॥ तथा ताम्रढा 
पात्र देना हो तो गुडस भरकर दे । एवं भगवानके सो 
जानपर अपनी शक्तिके अतुसार एक जोड़ा वश्न और 
विछके साथ सुव॒णका दान दे तो वह सब पापोंसे मुक्त 
होकर इस जन्ममें उत्तम भोग भोगकर अन्तर शिवजोड़े 
घाममें पहुंचे ७१ ॥ ७२ ॥ “ विष्णुमें प्रीयतामिति ! मुझ्नपर 
विष्णुभगवान्‌ प्रसन्न हों,इस मंत्रसे गन्ध पुष्पादिसे चर्षित- 
कर त्राह्मणको बख्रदान चातुर्मात्यमें करे ॥ ७३॥ 
समाप्तिपर शय्या, वस्र तथा सुवण दान करे तो अक्षय 
सुख तथा कुबेरके समान धन प्राप्त करता है ॥ ७४ ॥ वर्षा: 
ऋजुमें नित्य जो मनुष्य गोपी चन्दन देता है, भगवान्‌ उस 
पर प्रसन्न होकर भोग तथा मोक्ष प्रदान करते हैं ॥ ७५॥ 
ओर सम्राप्तिरर तुछापरिम्तित करे अथव्र उसका आधा वा 
डउससेभी आधा तुछादान कर। दक्षिगासहित वश्न दे॥#$३/ 
जो ब़ली पुरुष भगवानके झयनकाडमें दक्षिण[सद्दित सझर 





श्तानि, | शाषाटीकासमेतः । (४४१ ) 
......_.>..++-“““--०००-०००००००००००००००००००००००००००००००००००००-०००००००००००--००-००००-०००-कह.ब..-.....०००००..००००००००....ु2ु3॥२ुैह 8 ................ल..3333.33333>433.0७०००००००> 
दक्षिणया साद्धे शर्करक्मथवा गुडम्‌ ॥ ७७॥ एवं ब्रते तु संपूर्ण कुतरेत्नद्यापनं बुधः ॥ प्रत्येक॑ 
ताम्रपात्राणि पलाष्टकमितानि तु ॥ ७८॥ वित्तश ठचमकुवों णश्चवतुष्पलनितानि वा ॥ अष्टच- 
त्वारि चेके वा शकरापूरितानि च ॥ ७१ ॥ दक्षिणाफलवासोनिः भत्येके संयुताने च॥ सह 
धान्यानि विभेभ्यः श्रद्धया प्रतिपादयेत्‌ ॥ <० ॥ ताम्रपात्र सबस्॑ च शकेराहेमसंयुलम्‌ ॥ खूयये- 
प्रीतिकरं यस्माद्रोगन्न॑ पापनाशनम्‌ ॥ ८१॥ पुष्टिदं कीतिंद न्र्णां नित्य सन्‍्तानकारकम्‌ ॥ 
स्वंकामप्रद॑ स्वग्य माधुवेद्धनमुत्तमम्‌ ॥ ८२ ॥ तस्मादस्य अदानेन कीर्तिरस्तु खदा मम ॥ 
एवं ब्रतं तु यः कुर्यात्तस्य पुण्यफलं श्वणु ॥ ८३ ॥ गन्धर्वविद्यासंपन्नः स्वयोषिलियों भवेत्‌ ॥ 
राजापि लगते राज्य पुत्रार्थी लमते छुतान्‌ ॥ <४ ॥| अथार्थी प्राप्लुयाद्थ निष्कामो मोक्षमाप्तु- 
याद ॥ यस्‍्तु वे चतुरों मासाउ्छाकमूलफलादिकम्‌ ॥ ८५॥ नित्यं ददाति विप्रेभ्धः शकक्‍त्या 
यत्सभवेन्नप ॥ व्रतान्ते वद्चयुग्म क शकक्‍त्या द्धात्सदक्षिणम्‌ ॥ ८4६ ॥ सुखीभृत्वा चिर कार्ल 
राजयोगी भवेन्नरः॥ सर्वदेवभियं यध्माच्छाक तृघतिकर नृणाम्‌ ॥ ८७ ॥ द॒दामि तेन देवादाः 
सदा कुर्वन्त मड़लम ॥ यह्तु सुप्ते हपीकेशे भत्यहे तु ऋतुद्यये ॥ <८ ॥ दुद्यात्कट्तय मत्यों 
गृहपयातमादरात्‌ ॥ ब्राह्म गाय सुशीलाय दि्निशभ्रीतयेन्‍नघ ॥ <९ ॥ दक्षिणावश्थसद्दधित॑ मन्त्रे- 
णानेन खुबत ॥ कटुत्रयमिद यध्माद्रोगन्ने सर्वदृहिनाम्‌ ॥ ९० ॥ तस्मादस्य प्रदानेन प्रीतो भवतु 
मास्करः ॥ एवं कृत्वा ब्रतं सम्पक्कुर्वादुद्यापनं बुध। ।। ९१ ॥ कृत्वा स्वर्णमर्यी शुण्ठीं मरीच 
मागधी मपि॥ सवच्या दक्षिणयुक्तां दद्यद्विताय धीमते ॥९२॥एवं ब्रतं यः कुछते स जीवेच्छरदां 
शतम्‌॥ प्राप्ठुय|दीप्घ्ितानर्थानन्ते स्वर्ग ब्रजेत्रप ॥ ९३ ॥ मुक्ताफलानि यो दुद्या नित्य विप्राय 
सन्‍्म्ति॥।अन्नवान्कीर्ति मज्ड्रीमाजायते वछुधाधिप ॥९४॥ ताम्बूलदानं यःकुयाद्व्जपेदा जिते- 
 र्वियः॥ रक्तवस्नदयं दद्यात्सनातों च सदक्षिगम्‌ ।।९५।॥ महालावण्बमाप्रोति सर्वरोगविव- 
जिंतभा मेधावी छुमगःप्राज्ञोी रकऋण्डश्व जापते॥९६॥ग-जर्व॑त्वमवाप्तोति स्त्र्गलोझर च गच्छति॥ 


| 


ताम्वूलं श्रीकरं मद्रं बह्मविष्णुशिवात्मकूप्‌ ॥ ९७ ॥ अध्य अदानादह्ाद्याः श्रिय दुदुतु पुष्झ- 








और गुड दान करे ॥ ७७ ॥ तथा समाप्त होनेपर उद्यापन 
करे प्रत्येक त्राह्मणको ताम्रका आठ आठ पछका एक एक 
पात्र दे ॥७८॥ अथवा कृपणता न कए पाव पावर भरहाही 
दें जो सेख्यामें ४८ हों तथा शक्करसे पूण हों ॥७९ प्रस्येंक 
पात्रके साथ दृक्षिणा ओर वच्न हों ओर उनके साथ श्रद्धासे 
दियाहुआ अन्न भी हो, यह सब श्रद्धापूवक ब्राह्म गोंको देना 
चबाहिय || ८० ॥ इसी प्रकार ताम्रका पात्रभी वश्च, शकर 
क्या घुव॒णके साथ दे तो वह सूयसे प्रीति करानेवछा रोग- 
नाझक और पापप्रणाशक होता है ॥८१॥ यह सदा पुष्टि- 
कोति, सन्‍्तान एवं समस्त इच्छाओंकी पूर्ति, खगे ओर 
.. आयुको अच्छा बढानेवाला है ॥८२॥ इसछिये इसके प्रदान 
. इरनेसे भेरी सदा कीर्ति हो, यह उदच्च!रणऋर जो ब्रतको 
करता हैं उसका पुण्यफल छुनो ॥८३॥ वह भनुष्द गन्धवें 
विद्यायुक्त एवं कामिनी प्रिय होता हे । राजा राज्यको और 
सन्तानार्थी सन्तानको पाता है ॥८४॥ घनाथथी धवको ओर 
निष्काम मोक्षको पाता है । जो चार मासतक शाक, मूल, 
फंड आदि यथाशक्ति नित्य त्राह्मणोंकों देता रहे तथा त्र॒तर्के 
बन्तमें यथाक्षक्ति दक्षिणाके साथ दो वस्ल देवा हे वह चिर, 
कल सुखी राजयोगी होता हैं। सब देवों के प्यारें एवं सभी 

पतुष्योंको तृप्ति करनेवाले शक को देता हूं इक्षतत देंवादिक 






सदा मंगछ करे। जो देव शयनक्ी दोनों ऋतुओंमें रोज 
| ८५-८८ ॥ किसी सुञझ्ीडह ब्राह्मगके डिये सूथकौ प्रीतिके 
निम्ित्त क॒टुत्रयमिद” यानी ये तीनों कठुसब प्राणियोंके 
रोगोंको नष्ट करते हैं इस कारण इसके दानसे सूयदेव प्रसन्न 
हो जाय, इस सन्त्रस सोंठ, मरिच,पोप छ इन तीनों चीजोंको 
दुक्षिगा और वस्रके साथ देता है, एवं इसप्रकार ब्रतक्ी 
समाप्तिमं उद्यपन करता हैं और उसमें सुवर्णकी सोंठ, 
मरिच, पीपछ बनवाकर दक्षिण। और वस्लके साथ किसी 
बुद्धिमान ब्राह्मणकों दाव करे || ८९-९२ ॥ तो वह मनुष्य 
शवजीवी दोकर सब इच्छाओंस पूण हो अतर्म स्व॒ग प्राप्त 
करवा हैं ॥९३॥ जो नित्य त्राह्मणके लिये सब मोत्ीका दान 
करता है वह हे राजन्‌ ! अज्नवान्‌ की तिनान्‌ और श्रीमान्‌ 
होता है ॥९४॥ जो जितेन्द्रिय स्वये तांबूछ छोडकर दूख- 
रोंको तांबूछ दान करता हूँ और समाप्रिपर दृद्षिणासहित 
छालठवखका दान करता है ॥९५॥ तो वह बडा सुन्दर एवं 
सर्वरोपरद्वित, बुद्धिमान, पण्डित और छुऋण्ठ होता हे 
॥९६॥ गन्धवैपनकों पाकर अन्तर्मे स्वग जाता है, तांबूछ, 
लक्ष्मी करनेवाढछा तथा शुभ हे । ब्रह्मा, विप्णु और शिव- 
जीका रूप हैं ॥ ९७ ॥ इसके देंनेस त्रह्मादि देवता खूब 
छत्ष्मी दें । जो घातुर्मास्यमें प्रतिदिन ब्रह्मणके छिये या 


( ४४२ ) ब्रलराजः । 


[ एकादशी- 





लाम्‌ ॥ चाठर्मासे प्रतिदिन खुवासिम्ये द्विजाय च॥ ९८ ॥ नारीवा पुरुषों वापि हरिद्वां संप्र- 
यच्छति ॥ लक्ष्मीमुदिश्य गौरी वा समातों राजतं नवम्‌ ॥ ९९ ॥ हरिद्वापूरितं कृत्वा तत्पात 
दक्षिणामितम्‌ ॥ प्रदयाद्धक्तिसंयुक्त देवी में प्रीयतामिति ॥ १०० ॥ भत्रों सह छुखं छुक्ते नारी 
नाया तथा पुमाव ॥ सौधस्यमक्षय घान्यं धनपुत्रसमुन्नतिम ॥ १॥ संम्राप्य रूपलावण्य देवी- 
लोके महीयते ॥ उमामहेशछदिश्य चातुर्मास:्ये दिने दिने ॥२॥ सम्पूज्य विप्नमिथ्रुनं तस्मे 
यश्र स्वशक्तितः ॥ दब्यात्‌ सदक्षिग हेम उमेशः प्रीयतममिति॥ ३ ॥ उमेशप्रतिमां हेमीं दबा- 
दुद्यापने बुध: ॥ पश्योपचारे! सम्पूज्य थेन्वा च दृषभेण च॥ ४ ॥ भोजयेदपि मिष्टान्न॑ तस्प 
पुग्यफले श्रणु॥ सम्पत्तिरक्षया कीलिजायते ब्रतवेभवात्‌ ॥ ५ ॥ इह अकत्वाखिलान्कामानन्ते 
शिवएरं बजेद ॥ फलदानं उु यः कुर्षाबआतुर्मास्पमतरिद्वितः ॥ ६९॥ समाप्तो कलघोतानि तानि 
दच्याहिजातये ॥ सर्वास्मनोस्यान्ताप्य संतातें चानपायिनीम्‌॥ ७ ॥ फलदानस्यथ माहात्म्या- 
न्मोदले नद्थने बने ॥ पुष्पदानत्रते चापि स्वणपुष्पादि दापयेत्‌ ॥ ८ ॥ ते सोमाग्य पर भ्राप्य 
गन्धर्वेपदम(प्लुयात्‌ ॥ वाझुदेवे प्रखुते तु चातुमास्यमतन्द्रितं: ॥९॥ नित्यं वामनसुद्दिविय दृध्यत्र 
स्वाद पहले! ॥ मोजयेड्थव' दह्यादेकादहर्या न मोजयेत्‌ ॥ ११० ॥ दानमेव भक्ष॒वींत म्रहणादो 
तथेव चा। अशक्तो नित्यदाने तु कुयात्यवलु पर्चछ्ु॥१ (॥नूताह्म्याममायां च पूर्णिमायां तथेव 
च्‌ ॥ प्रत्यदवारमथवता प्रतिभागववासरम॥ १२ ॥एवं कृत्वा समातों तु बथाशक्ति महीं देव 
अद्वक्ती भूमिदसने तु घेठ॑ द्ाइलंकृताब ॥ १३॥ तत्राप्यशक्तों वालश्व सशक्‍मे पाइुके तथा ॥ 
अक्षय्पमन्नमामोति पुत्रपौत्ञादिसम्पदव्‌ ॥ १४ ॥ सुस्यिरां विशुभक्ति च अयाति हरिमद्धि- 
रम्‌ ॥ नित्य पयसिवनी ददष्य|त्सालहारां शुम/वहाम्‌ ॥ १५॥ सच्रत्सां दक्षिगोपेतां स सर्वेज्ञान- 
वान भवेत्‌ ॥ न परजेष्यतां याति बह्मछोऊफ च मच्छेति ॥ १६॥ अक्षय्यं खुखमाप्रोति पिवृद्रि 





किसी सुवासिनी स्रीकी पुछय या ख्री हलद्दीका दान करें | 
पे | िमिक.] शत ७.२ हम कप 

तथा छक्ष्मीके उद्देश्यस वा पावेतीके उद्देशयस समाप्तिपर झुबर्णपुष्पका दान करना चाहिये | ८॥ वह सब सौभाग्व 

चांदीका नवा दरिद्रास भराहुआ पात्र दृक्षिणसहित 'देके | पाकर गंध पदको प्राप्त करता है। भगवानके शयन करने" 

में प्रीयर्तां' दवी मुझपर राजी हो इसका उच्चारण करके , 


पे का न्‍ 
भक्तिपूने क दे तो ॥१००॥ वह पुरुष वा ख्री परस्परसें बडे | पर चातुर्मास्यमे निरालस होऋर ॥९॥| नित्य वामन भगवा 


करता है| यदि किसीने पुष्फ्दानका ब्रत किया हो वो उसे 


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सुखी रहते हैँ | उनका अखंड सोमाग्य घनधान्य और 
पुत्रोन्नति होकर ॥ १०१॥ उत्तन रूप छावण्यको प्राप्तकर 
दवीऊे छो मे प्रतिष्ठित होते हैं । जो शिवपार्वतीके उद्दे- 
इयसे चौमासेम प्रतिदिन ।१०१२॥ ब्राह्मणके जोडेको यथा- 
शक्ति पूजकर 'उमश्मः प्रीयवाधितरि' उमा और इंश प्रसन्न 
हों के उच्चारणस दक्षिगासहित घुबरणका दान कर ॥१०३॥ 
भगवान्‌ उम्रा शिवकी मूर्ति उद्यापनके समय सुवर्णकी बना 

कर पश्चोपचारस पुूजनकर दे साथही गो तथा बेरभी दे 
. ॥१०४॥ और ब्राह्मणादिको उत्तर भोजन करावे तो उसका 
पुण्यफल छुनिये। बढ साधक इस बतके प्रभावसे कीत्ति 
» और लक्ष्मीको रक्षापूवेक प्राप्त हो त। हैँ सब सुखोंको भोग- 
. कर अन्तर शिवपुरमसें चछा जाता है । जो मनुष्य चौसा- 
खेले निराऊस होकर फलदान करे ॥ १०५ ॥ १०६ || तथा 
संम।प्तिके सम्रय आह्यणोंको चांदीका दानकर वह सब 
सनोरधों के तथा उत्तम नर सिटनेवाढी, सन्वतिको पाकर 
॥ १०७ || उस फऋछ्धदात्ऊ साहात्म्यसे नदनव॒नभे अतंदू 


नके उद्देश्यस ब्राह्मणोंकी दृह्ी; अन्न तथा स्वादिष्ट पदरस 
| भोजन करावे अथवा उनको दे वथा एकादशीक दिन 
भोजन न करे ॥१०॥ ऐसे भोजनका दान करे तथा ग्रहण 
आदिसिभी दान करे अपनी रोजके दाव करनेकी सामभ्य 
न हो तो शक्तिके अनुसार पांच पबाँमें ॥११॥ यानी भू 
ष्टमी, अमावस्या, पूर्णिमा, रविवार ओर शुक्रवार इन 
भोजनका दानकरे ॥१२॥ और इस प्रकार करके समातिई 
यथाशक्ति भूमिका दान करे तथा भूमिदानकी अं 
सिंगरी हुईं गौका दान करे ॥१३॥ और उसकोमी जछ 
मथ्यमें वस्न या. सुवर्णसहित पादुकाका दान कर तो. 
अन्न भौर पुत्र पौत्र आदि संपत्तिकी प्राप्ति होती हैँ ॥ १8४ 
उसे स्थिर भक्तिका छाभ होकर वेकुण्ठकी आप्ति ही 
जो मनुष्य नित्यही दूध देनेवाली अ्ूकृब सुन्दर गौका दान 
करें ॥१६॥ बछड तथा दुक्षिणाके साथ तो वह से 


| द्ोता हे । वह किसी दूसरेका पराधीन न होकर त्रक्ष 


चढ्ा जाता हैं ॥ १६॥| बह अपने पितरों ्रद्त अक्षय घुखको 


ब्रतानि, | . भाषाटीकासमेतः । 
















(४४३ ) 








॥ १७ ॥ समाप्तों गोयुगे दर्वा कृत्वा 
ब्राह्यणनोजनम्‌ ।। सर्वपापविशुद्धात्मा याति बह्म सनष्तनम्‌ ॥ १८ ॥ एकान्तरोपवास तु सीरा- 
प्यज्रौ प्रदापयेत ॥ वस्थ्काश्वनयक्तानि बलीददंयुतानि च ॥ १९ ॥ अनहुह्यस्ग॒क्त लाड्ल 
कर्षणक्षमम ॥ सर्वोपस्करसंयुक्त ददामि प्रीतये हरेः ॥ १२० ॥ शाकम्‌ लफलेवांपि चातुर्मास्य 
नयेन्नरः ॥ समात्ती गोप्रदानेन स गच्छेद्िष्णुमन्दिरिम्‌ ॥ २१॥ पयोत्रती तथाप्नोति बह्ालोक 
सनातनम्‌ ॥ व्रतान्त च तथा ददष्याद्रामेकां च पयस्विनीम्‌ ॥। २२॥ नित्य रम्भापलाशें च ये 
घुक्ते तु ऋतुदये ॥ वख्ययुग्म॑ च कांस्यं च शकक्‍स्या दत्वा छुद्ी भवेत्‌ ॥ २३ ॥ कांस्य बह्ा 
शिवो लक्ष्मी: कांस्यमेव विभावसुः ॥ कांस्य विष्णुमयं बस्मादतः शास्ति प्रयच्छ मे ॥ २४॥ 
नित्य पलाशभोजी चेंत्तेलाभ्य ड्रविवर्जितः ॥ स निहन्त्यतिपापानि तूलराशिमिवानलः ॥ २५ ॥। 
ब्रह्मप्तश्ष सुरापश्च बालघातकरश्व यः ॥ असत्यवादिनों ये च ख्रीवातिब्रतघातकाः ॥ २६॥ 
अगम्यागामिनश्रेव विधवागामिनस्तथा ॥ चाण्डालीगामिनश्रेव विम््नीगामिनस्तथा ॥ २७ ॥ ते 
सर्वे पापनिमेक्ता मवन्त्येतद्वतेन च॥ समात्तो कांस्पपात्न तु चतुःषष्टिपलयुतम्‌ ॥२८॥ सबत्सां गां 
च वे दद्यात्सालड्रारां पयसट्विंनीम्‌ ॥ अलेकृताय विह॒षे खुबख्राय खुतेजिगे ॥ २९ ॥ भ्ूमों विलीप्य 
यो सुक्ते देव नारायण स्मरन्‌ ॥ दद्याद्धूमिं यथाशक्ति केष्यां बहुजलान्बितान्‌ ॥ १३० ॥ आरोग्य 
पुत्रसंपन्नों राजा भवति धार्मिकः ॥ दात्रोमय न लगते विष्णुकोंके स गच्छति ॥ ३१॥ अया- 
विते त्वनड्राहं सहि रण्यं सचन्दनम्‌ ॥ घड़स भोजन दह्यात्स याति परमां गतिम्‌ ॥३२॥ यस्‍स्तु- 
छुतते हषीकेशे नक्ते च करुते ब्रतम्‌ ॥ ब्राह्मणान्भोजयेत्पश्व/च्छिवलोड महीयते ४ २३ ॥ एक- 
भक्त नरः कृत्वा मिताशी च दृतब्बरतः ॥ योः्च॑येच्वतुरों मासान्वासुदेव स नाकभाकू ॥ ३४ ॥ 
समाप्तौ मोजयेद्विप्राउ्ठक्त्या दष्यात्च दक्षि णाम्‌॥ यस्त॒ सुप्ते हषीकेशे क्षितिशायी भवेन्नरः ॥३५प 


सहितो नरः | वार्षिकांश्वतुरों मासान्‌ म्राजापत्य चरेन्नरः 


शय्यां सोपस्करां दद्याच्छिवलोके महीयते ॥ पादाभ्यड्रं नरो यस्तु वर्जयेच्च ऋत॒द्वय ॥ ३६ ॥ 


पाता हे । जो मनुष्य वर्ष चौमासेके अन्दर ग्राजापत्य 
ब्रतकों करता है ।। १७॥ तथा समाप्रिपरएक जोडा गोका 
दान करके ब्राह्मणोंको भोजन कराता हैं वह सब पापोंसे 
रहित होकर सनातन ब्रह्मकी प्राप्ति ऋरता है ॥ १८॥ 
एकांतरका उपवास करनेपर आठ हल, सुवण वस्त् सहित 
बैंढोंसे दान करे | १९॥ और मनमें भावना करे कि; 
चढ़ाने योग्य हछको और सब सापम्मप्मी सहित दो बैलॉको 
भ्रगवानकी प्रीतिके लिये दान करता हूँ ॥९०॥ जो मनुष्य 
झ्ञाक, मूल फलसे चातुर्माश्यका ब्रत करे और समाप्तिपर 
गौदान करे तो बह वेकुण्ठमें चछा जाता है ॥ २१ ॥ कवलछ 
दूधसात्रसें त्रत करनेवालूम मनुष्य भी सनातन त्रह्मछोकको 
जाता हैं। तथा ब्रतांत जो मनुष्य दूध 'दनेवाल्ली गौको 
देवा है| २२ ॥ रोज दोनों ऋतुओमें. केछा और पलाश 
के पत्रमे, भोजन करताहै तथा वल्ल और कांखीके पात्रोंका 
दान करता है वह सुखी होता हैं ॥॥। २३॥ और दान दती- 
बार भावना करे कि, कांसी ब्रह्मा हैं, कांसीशिव है, कांसी 
ही छक्मी और सूये हे और कांसीही विष्णु है। इसलिये 
: बह मुझे शान्ति दें ॥॥ २४॥ जो मनुष्य नित्य ही तेढा- 
भ्येगको छोडकर पाछाश पत्नमं भोजन करे वह रूइईको 
अम्निकी भांति अपने पापोंकों नष्ट करता है ॥ २० ॥ ब्रह्म 


हत्य&करनेवाला, शराबी, बाल्हत्या करनेत्राछा; असत्य- 
वादी, स््रीघाती; ब्रतघाती | २६।। अगम्यागामी, विधवा- 
गामी, चांडालीगामी और बत्राद्मणस्रीगामी आदि ॥ २७ ॥ 


॥ २८ ॥ महापापी मनुष्य भी इस ब्रतके प्रभावसे पाप: 


ही # 

रहित होते हें, समाम्रिरर चौंसठ पलका कांस्यपात्र सवत्सा 
श्वद्भार की हुईं दूध देनेवाली गौ जो कोई विद्वान्‌ ब्राद्मण 
को दे ॥ १२९ ॥ एवं जो मन॒प्य नारायणका स्मरण करके 
प्रथ्वीको ढोपकर भोजन करें और यथाशक्ति बहुजला 
उवरा भूमिका दान करें ॥ १३० || वह आरोग्यवान; पुञ्- 
वाद और घर्मात्मा राजा होता हैं ।उसे शत्रओंका भय 
नहीं होता तथा वेकुण्ठमें जाता है ॥३१॥ जो मनुष्य, 
सुवर्ण, चन्दन, षड़सभोजनसहित बेढका अयाचित दान 

करता है वह वेकुण्ठमें चढा जाता है | ३२॥ जो भगवान्‌ 
के शयन करने पर रातमें त्रत करताहे और अन्तर्म ब्राह्मणों 
को भोजन कराता है. वह शिवलोकमों प्रतिघ्ठित होता है 
॥३३॥ जो एक समयसे एक मात्रासे भोजन करके चातु माँ - 
स्यमें भमगवाबका पूजन करता हे वह स्वगम जाता हैं ॥३४॥ 
जो मनुष्य समाप्तिपर ब्राह्रणॉंकों भोजन करा दक्षिणा दे 
भर भगवानके शयन करनेपर प्रथ्बीपर शयनकरें ॥३५। 
और सब सामग्री सहिल शय्याका दान करे वह शिवछोक 


. ३ कृष्याम-कृष्य हिताम । 


[ एकादशी- 

22220. 09%... ओ 
समाप्ती च यथाशक्ति कुर्याद्राह्मणमोजनन्‌ ॥ दत्वा च दक्षिणां शकत्या स गच्छेद्विष्णु- 
मन्दिरम ॥ ३७॥ आपषाटादिचतुमोसान्व्जयेन्रखकृन्तनम्‌॥ आरोग्यपुत्रसंपन्नो राजा भवति 
धार्मिकः ॥ रे८॥ पायसं लवण चेव मधुसर्पिःफलानि च चातुमास्ये वर्जयेद्यो गौरीशइर- 
तुष्टये ॥ ३९ ॥ कार्तिक्याँ च पुनस्तानि ब्राह्मणाय निवेदयेत्‌ ॥ स रुद्रलोकमाप्नोति रुद्रब्॒त- 
निषेवणात्‌ ॥ १४० ॥ यवात्न॑ भक्षयेद्यस्तु शुभ शाल्यन्नमेव वा ॥ पुत्रपौत्रादित्िः सा शिव- 
लोके महीयते ॥ ४१॥ तेलाभ्यड्रपरित्यागी विष्णुभक्तः सदा ब्रती ॥ वर्षासु विष्णमस्यर्च्य 
वेष्णवी लभते गतिम्‌ ॥ ४२ ॥ समाततो कांस्यपात्र च सुवर्णन समन्वितम्‌ ॥ लेलेन पूरित कृत्वा 
ब्राह्मणाय निवेदयेत्‌ ॥ ४३ ॥ वार्षेंकाँश्वतुरों मासाञ्छाकानि परिवर्जयेत्‌ ॥ ब्रतान्ते हरिमाहिय 
पात्र राजतमेव हि ॥ ४४ ॥ वस्थेण वेष्टितं शाकदशकेन प्रपुरितम्‌ ॥ समभ्यच्य यथाशकत्या 
ब्राह्मणान्वेद्पारगाव्‌ ॥ ४५ ॥ तेभ्यों दद्यादक्षिणया ब्रतसंपूर्तिहितवें ॥ शिवसाथुज्यमाप्नोति 
प्रसादाच्छूलपाणिनः ॥ ४६॥ गोधूमदजेन कृत्वा भोजनव्रतमाचरेत्‌ ॥ कार्तिक स्वणेगोधूमान्‌ 
वर्त्रं दत्वापध्वमेघकृत ॥ ०७७॥ गोधूमाः सबंजन्तूनां बलपुष्टिविवद्धनाः ॥ मुख्याश्र हृव्यकन्येष 
तस्मान्मे ददत थ्रियम्‌ ॥ ४८ ॥ आपषाटादिचतुर्मासान्व॒न्ताक॑ वर्जयेन्नरः ॥ कारवेहफलं वापि 
तथालाबुं पटोलकम्‌ ॥ ४९॥ यद्चत्फल भिग्प्तरं तच्चापि परिवजयेत्‌ ॥ चातुमोस्ये ततो बृत्त 
रोप्याण्येतानि कारयेत्‌ ॥ १५०॥ मध्ये विद्वमयुक्तानि ह्चोयत्वा तु शाक्तितः॥ दद्याइक्षिणया 
सा बाह्मणायातिमक्तितः ॥ ५१॥ अभपिष्ट देधमदिश्य देवो मे प्रीयतामिति ॥ स दीघेमायु- 
रारोग्य॑ पुत्रपोत्रान्सुरूपताम ॥ ५२॥ अक्षय्यां सन्‍्तातें कीति लब्ध्वा स्वर्ग महीयतें ॥ श्रावणे 
वजयेच्छाक॑ दि भाद्रपदे तथा ॥५३॥ दुग्धमाश्चयुजे मात कार्तिक द्विदल॑ त्यजेत ॥ चत्वा- 
येतानि नित्य।नि चातुराश्रमवर्तिनाम्‌ ॥५४॥ कूष्माण्ड राजमाषांश्व मूलक गखनं तथा ॥ कर- 
मर्द चेश्लुदण्ड चातुर्मास्ये त्यजन्नरः ॥ ५५ ॥ मखूरं बहुबीज च वृन्‍्ताक चेव वर्जयेत ॥ नित्याः 


में प्रतिष्ठित होता है ।। दो ऋतुओंके अन्दर पादाभ्येगको , युज्यको प्राप्त करता है ॥ ४६-॥ जो गेहँको छोड भोजन 
तु हू 


(४९४४७ ) ब्रतराज३ । | 











ट 




















छोडकर ॥ ३६ । जो समाप्रिपर यथाशक्ति ब्राह्मणोंको 
भोजन कराके दक्षिणाका दान करे तो वह वेकुण्ठलोकमें 
जाता हैं॥| ३७ ॥ जो आषाठसे अश्विनतक नख आदिको 
नहीं कराता वह आरोग्यवान , पुत्रवान तथा धामिक राजा 
होता हैं ॥ ३८ ॥ गौरीशंकर भगवानकी प्रसन्नताके ढिये 
ज़ो मनुष्य चातुर्मास्यके अन्द्र दूध, नमक, घी, शहद, 
तथा फर्ॉका त्याग करे ॥ ३९॥ फिर उन्हें कार्तिकी 
पूर्णिसापर ब्राह्मणोंकी भेंट करें वह शिवश्रतके प्रभावसे 
शिवलोकमे चला जाता हें ॥ १४० ॥ जो अच्छे जौ या 
चावछोंका भोजन करे वह पुत्र पौत्र आदिके साथ शिव- 
छोकमें प्रतिष्ठित होता है ॥| ४१॥ तवेलाभ्यगको छोड जो 
विष्णुभक्त सदा ब्रत करके वर्षामें विष्णु भगवानकी पूजा 
करे तो वह वेष्णबी गतिको प्राप्त करता है ॥ ४२ ॥ समाप्ति 
पर खुवण सद्दित कांस्यपात्रकों तेहसे भरकर ब्राह्मणको 
'द्ान करे॥ ४३ ॥ तथा वर्षमें चार मासतक शाकका त्याग 
करे। और ब्तांतमें हरिभगव।नके निमित्त दश शाक- 
सहिद एक 'घांदीका पात्र बल्लसे ढककर वेदपारग ब्राह्मणों 
का यथाशक्ति पूजन कर ब्रत सम्पूर्ण होनेके लिये दक्षिणा- 
सहित उनको दान करे तो वह शेक रकी कृपास शिवसा- 


करे ओर कात्तिकी पूर्णिमापर सुबर्णके गेहूँ बनाकर वद्धढ़े 
साथ दान करे तो उस अश्वमेधयज्ञका फल मिलता है 
॥ ४७ ॥ सब प्राणियोंको गेहूँ बढ; पुष्टि प्रदान करता हैं 
और ह॒व्यकव्यमें मुख्य है इसलिये वे मुझे छक्ष्मी अदाव 
करें यह दान करनेका मन्त्र हैं ॥| ४८॥ आषाढ आदि 
चार महीनेतक बेंगन, करेला, तूमा, परवछ, इनका त्याग 
करे ॥ ४९ ॥ तथा और अप्रिय फरलोंको छोड दे और 
चातुर्मास्यका ब्रत करे एवं उसके समाप्त होनेपर उन छोडी 
हुईं वस्तुको चांदीकी बनावें || १५० ॥ बीचरमें मूँगा रख 
और त्राह्मणोंको यथाशक्ति भक्तिपूवक पूजकर दक्षिणा' 
सहित दान करे ॥ ५१ ।॥ तथा देतीवार अपने इष्टदेवका 
स्मरण कर ' देवो मे प्रीयताम मेरा इष्टदेव मुझपर प्रसन्न 
हो ' छा उच्चारण करे तो वह दीर्घायु, आरोग्य, पुत्रपोत 
सोन्दय ।। ५२ ॥ अक्षय कीतच्ति और सनन्‍्तानकों पाकर 
स्वंगमें प्रतिष्ठित होता है ॥ श्रावणमें शाक और भादोंमें दही 
॥ ५३ || आश्विनमें दूध, और कार्पिकर्म दाल इन चारो 
चीजोंको नित्यददी चारों आश्रमवालोंको छोडदेना चाहियें। 
तथा नी ० टपात शिवसा-| तथा चातुर्मासमें कृष्मांड, डडद, मूछी, गाजर, करोदाईह कूष्मांड, डडद्‌, मूली, गाजर, करों दा:ईल 


१ सूछ पत्र करीराप्रफडकाण्डाधिरूढ कम्‌ । त्व क्पुष्पं कवच चेति शा दृशविध स्मृतम्‌ ॥ 


ब्रतानि, ] भाषाटीकासमेत्र: ! 


32222: 2 2 
व्येतानि विभेन्द्र त्रतान्याहुमंनीषिणः ॥ ५६॥ विशेषाद्वदरी धात्रीमलाबुं चिश्विणी त्यजेत ॥ 
बार्षिकाश्वत॒रों मासान्मखुप्ते च जनादने ॥५७॥॥ मशथ्खटवादिशयन वज्जयेद्धक्तिमान्नरः ॥ अन॒तों 
बर्जयेद्धायामतौ गरछत्न दुष्पति ॥ ५८ ॥ मधुवल्लीं च शिम्नं च चातुमोस्ये त्यजेन्नरः ॥ बन्ताक 
च कलिड्ं च बिल्वोदुम्बरमिस्सष्टा॥।५९॥उदरे यस्य जीयेन्ते तस्य दूरतरो हरि॥।उपवासं तथा 
तक्तमेकभक्तमपाचितम॥१६९०॥अशक्तस्तु यथाकुयांत्सायंप्रातरखण्डितम॥ स्नानपूजादिक यस्त 
स नरो हरिलोकभाऋ ॥ ६१ ॥ गीतवाद्यपरो विष्णोगांन्धर्व लछोऋमाप्लुयात्‌ ॥ मधुत्यामी भवे- 
ड्राजा पुरुषों गुडब्जनात्‌ ॥ ६२ ॥ लम्ेच् सन्‍्ततिं दीधों पुत्रपौच्ादिवर्धिनीम्‌ ॥ तेलस्य 
. बर्जनाद्राजव खुदर्शो द्ुः प्रजायते ॥६३॥ कोसुम्भतेल सन्त्यागाच्छत्रुनाशमवाप्लुयात्‌ ॥ मधूक- 
वैलत्यागाल सुसौमाग्यफर्ल लमत्‌ ॥ ६९४॥ कद॒तिक्ताम्लमघुरकबायलवणान्‌ रसान्‌ ॥ वजे- 
येत्स च वेरूप्ये दोगन्ध्यं नाप्लुयात्सदा ॥ ९५॥ पुष्पादिभोगत्यागेन स्वर्ग विद्याघरों भवेत्‌ ॥ 
. थ्ोगाश्यासी मवेद्यस्तु स बह्म पदवीमियात्‌ ॥ ६६ ॥ ताम्ब॒लवजैनादोगी सद्योम्ुक्तामयों भर्वेत्‌ ॥ 
पादाभ्यड्भपरित्यागाच्छिरोष्भ्यड्रास्य पार्थिव ॥ ६७ ॥ दीतिमान्दीतकरणों यक्षद्वश्यपतिभेवेत्‌ ॥ 
दबिदुग्वपरित्यागी गोलोक लगते नरः॥ ६८ ॥ इन्द्रलोकमवाप्नोति स्थालीयाकव्रिवर्जनाव ॥ 
एकान्तरोपवासेन ब्रह्मलोके महीवते ॥ ६९ ॥ चतुरों वार्षिकान्मासान्नरखरोमाणि घारयेद ॥ 
कल्पस्थायी भवेद्राजन्स नरो नात्र सदायः ॥१७०॥ नमो नाराय गायेति जपित्वाननस्तक फलप्॥ 
किुपादाम्बुज स्पश त्कृत्यकृत्यो भवेन्नर ॥ ७3१ ॥ लक्षवदक्षिगानियेंः सेबत हरिमिव्य यम 
हंपयुक्तविमनेन म याति वेष्गवों पुरीम्‌ ॥ ७२॥ वतिराजभोजनत्यागान्मोदते दिवरि देववत्‌ ॥ 
परात्रवर्जनाद्राजन्देवों वे.माठुवो भवेत्‌ ॥ ७३॥ प्राजापत्य॑ चरेद्यो वे चातुमॉस्ये ब्रतं नरः ॥ 
मुच्यते पातकेः सवश्चिविधेनांत्र संशयः ॥७४ ॥ तप्तकृच्छातिकृच्छाभ्यां यः क्षिपेच्छयन हरे ॥ 
स याते परम स्थान पुनराव्रनत्तिवर्जितम्‌ ॥ ७५ ॥ चान्द्रायगेन यो राजन्श्षियेन्मा सचतु छठ य भ्‌ ॥ 


( ४४७ ) 











मसूर, बेंगन इन सब चीजोंको हें राजेंद्र ! नित्यही छोड 
दूनी चाहिय ॥५४-५६|॥ विशेषकर भगवानके चार मासके 
शयन कालमे बर, तुरई, और इमलीको वर्षमें चार महीने 
बऊ दाग करे ॥ ५७ | भक्तिमान्‌ मनुष्य खाट या पलंग 
भादिपर सोना छोड दें, ऋतुके सिवा खस्रीका त्याग करे, 
ऋतुम गमन करनेयर उस कोई दोष नहीं लगता ।। ५८ ॥ 
मघुवल्ली और सदजनका चौमासमें त्याग करे। जिसके 
षेटपें वेंगत, तरबूज, बीछ, गूलर, भिस्सटा जीर्ण होते हैं 
उससे हरि भगवान दूर रहते हैं। उपवास रात्रि उपवास 
एकबार भोजन अथवा अयाचित भोजन ये करे | ५९ ॥ 
१६० ॥ यदि शक्ति नहो तो इनमेंसे किसी एकको यथा- 


ज्ञ पूजन करे। वह हरिलोकमं चछा जाता है ॥ ६१ ॥ 
पिप्णुके गीतवायमें तत्पर रहकर गन्धत्र छोचमे जाताहे ! 
शहदको त्यागकर राजा होता है और गुडकों त्यागकर 





सौभाग्यकठुका छाभ द्वोता है ॥ ६2 ॥ कडबौ. तिक्त, 





आदिंक भोगत्यागसे स्वर विद्याथर द्वोवा हैं।योगा- 
भ्यासी त्रह्मपद्वीको पाव' है ॥ ६६ ॥ तांबूछका द्यागकरने 
पर रोगी रोगसे झीघढदी मुक्त हो जावा है तथा हे राजन ! 
पादाभ्यंग और झिरोम्यह्वके त्यगगंस ऋान्तिमान्‌ तेजस्वी 
और छक्ष्मीपति होता है| दही: दूधके त्यागस गोछोक 
पाता हैं स्थालीपाकके त्यागसे इन्द्रढोक एवम्‌ एड्ान्तरोप- 
वाससे ब्रद्मछोक प्राप्त करता हैं ॥ ६७-३६९॥ जो चातुर्मा- 
स्थमें नखरोमको धारण करता है हे राजन ! वह कल्पयन्त 


| जीवित रहता हैं इसमें सन्देह नहीं है ॥ १७० ॥ “नमो- 
| नारायणाय” का जप करके अनन्त फकू तथा रि्पुचरणाँ- 
| बुजका स्पर् करके कृतकृत्यहूप सझरूझता श्राप्त करता 

शक्ति कर ! तथा प्रालःकाल वा. सायकार स्नान करके | 


|| ७१ ॥ एकलक्ष प्रदक्षिणास जो मनुष्य अव्यय हरि भग 


| वानकी सेवा करता है वह इंसयुक्तविमानस विप्णुलोकर्मे 
| चछा जाता हे ॥ ७२ ॥ तीन रातका उपवास करनेसे स्व- 
॥ ३5७७ ४. दर ध्ध्‌ < 

डे कर | गेम देववाओंके समान आनेदित होता है ओर हे राजन ! 
पुत्रपोत्रादिवर्धिनी दीर्घायु सन्तानको पाता हैं ॥ ६२ ॥ हे+ | 
राजन ! तेडक त्याग करनेसे सुंदर होता है ॥ ६३ ॥ कौ | 
भतेछका त्याग करनेस शत्रुनाश होता है। मधूकतेलकेध्याग | 


परान्नत्यागस मनुष्य देवतापदवीको पाजाता डे | ७३ ॥ 

जो मनुष्य चोमासमें प्राजापत्य ब्रतकों करता है वई तीन 
थ "३. निमु पर ५३ 

प्रकारक पापोंस निमक्त होजाता हैँ ॥७४)॥ जो भगवानके 


| शयन कालको तप्तकच्छू और अतिकृच्छूस व्यतीत करता 
खदट्टा, मीठा, कषाय ओर नमकीत रसोंको छोडकर कभी | 
कद्सूरती और दुगन्धिको नहीं प्राप्त करता || ६५ ॥ पुष्प । 


वह पुनरागप्न वर्जित भावश्रके परम धघाम॒को चला जाता 
हैं ॥ ७५ ॥ हे राजन ! जो मनुष्य चोमासको चांद्रायण 


(४५६ ) : [ एकादशो-- 


दिव्यदेहो भवत्सोे3्थ शिवलोर च गच्छति!७६॥ चातुमास्ये नरो यो वे त्यजेदत्रादिभक्षणम्‌॥ 
स गच्छेद्वरिसायुज्य न भूयस्तु प्रजायते ॥ ७७ ॥ भिक्षानोजी नरो यो हि स भवेद्वेदपारग॥ 
पयोव्रतेन यो राजन्क्षिपन्‍्मासचतुष्टयम्‌ ॥७८।। तस्य वेशसमुच्छेदः कदाचित्रोपपद्मते ॥ पश्चग- 
व्याशनः पार्थ चारद्रायणफले लमेत्‌ ॥७९॥ दिनत्र्य जलत्यागान्न रोगेरमिभूयते ॥ ए्वमादिवतेः 
पार्थ तुष्टिमायाति केशव३॥१८०॥दग्धाब्धिवीचिशयने भगवाननन्तों यास्मिन्दिने स्वपिति चाय 
विबुध्यते च ॥ तस्मिन्ननन्यमनसामुपवासभाजां पुंसां ददाते च गति गरूडासनो$सो॥१८१ 
इति श्री भविष्यपुराणे विष्णोः शयन्येकादशीमोहात्म्यं संपूर्णम्‌ ॥ 

० अय आवणकृष्णकादक्लीकथा ॥ 


युधिष्ठिर उवाच ॥ आषाटशुकृपक्षे तु यदेवशयनव्रतम्‌ ॥ तन्‍्मया श्रुतपूव हि पुराणे बहु 
विस्तरम ॥ १ ॥ आवणे कृष्णपक्षे तु किंनामेकादशी भवेत्‌ ॥ एतत्कथय गोविन्द वाखुदेव 
नमो5स्त ते ॥ २॥ श्रीकृष्ण उवाच ॥ श्णु राजब्‌ प्रवक्ष्यामि व्रत पापप्रणाश्ननम्‌ ॥ नारदाय 
पुरा राजन प्ृच्छते च पितामहः ॥श॥ परं यदुक्तवांस्तात तद॒हं ते वदामि च॥ नारद उवाच॥ 
भगवउ्छोतुमिच्छामि त्वत्तोपहे कमछासन ॥ ४॥ श्रावणस्पासिते पक्षे किनामकादशी भवेत्‌॥ 
की देवः को विधिस्तस्याः किं पुण्यं कथय प्रभो ॥ ५ ॥ इति तस्य वचः श्र॒त्वा बह्मा वचन- 
मबवीत्‌ ॥ बद्योवाच ।। श्रणु नारद ते वच्मि लोकानां हितकाम्यया।॥ ६॥ श्रावणेकादशी 
कृष्णा कामिकेति!च नामतः ॥ तस्याः श्रवणमात्रेण वाजपेयफर्ल लम्षेत्‌ ) ७ ॥ तस्म्राँ यः पूज- 
येदेव शाहचक्रगदाघरम ।  ओधराख्य हारे विष्णु माधवं मचुसूदनम्‌ ॥८॥ यजते ध्यायतेःथो 
बे तस्य पुण्यफल श्णु ॥ न गड़ायाँ न काइयां वे नेमिष न च पुष्करे ॥| ९ -॥ तत्फले समः 
वाप्नोति यत्फलं विष्णुपूजनात्‌ ॥ केद्वारे च कुरुक्षेत्रे राहुप्रस्ते दिवाकर ॥ १० ॥ न तत्फल- 
मवाप्नोति यत्फरल कृष्णपूजनाद ॥ गोदाव्यों गुरौं सिहे व्यतीपाते च गण्डके ॥ ११॥ 





चला जाता है ।। ७६ | हैं नूप | जो मनुष्य चोमाससें | श्रीकृष्णजी महाराज बोले कि, हे राजन ! सुनो में तुम्हें 
अन्नादिका भोजन परित्याग करे, वह हरिसायुज्यकोपाकर | पापनाशक ब्रतक्ना वणन करता हूं, जितको पहले त्रह्माजौबें . 
फिरसे जन्म घारण नहीं करता ॥ ७७॥ जो सह्त॒ष्य- पूछते हुए नारद ऋषिको उपरेश दिया था ॥३॥ नारदओ 
भिक्षाभोगस चौमासेमें रहता है वह वेद्‌ पारग होवा हे | बोड़े कि; हे भगवन्‌ कमछासन ! में आपस सुनना चाहता 
एवं जो केवल दूधमात्रस इन चारों महीनोंको निर्वाह करें| हूं ॥४॥ हे प्रभो ! श्रावणके क्ृष्णपक्ष में किस नामकी एका- 
॥ ७८ ॥ उसके वेशका कभी नाशही नहीं होता | हेअजुन! | दशी होती है उसकी विधि और पुण्यफछ क्या होता है; 

यह कथन कौजिए ॥ ५ ॥ उसके यह वचन सुनकर त्रह्मा- 
जीने कहा कि, हें नारद ! छोकहितकी बुद्धित में तुम्हे 
कहता है ॥ ६ ॥ कि, श्रावणकी क्ृपष्णएकादशीका नम 


ब्रतसे व्यतीत करें वह दिव्यदेंह धारणकरक शिवलोंकर्मे इसको आप वर्णन कीजिए। आपको नमस्झार हे ॥ २॥ 
पञ्चगव्यका सेवन करनेसे चांद्रायगका फछ मिलता हे 
|| ७९ ॥| तीन दिन जलछका त्याग करनेसे कभी रोगी नहीं 
होता। हैं अजुन | इस प्रकारके ब्रतोंसि भगवान्‌ केशव परम 
प्रसन्न होते हैं।। १८० ॥ दुग्ध समुद्रके अन्दर शयन करने: | 'कामिका' है, जिसके सुननेसही वाजपेग्रयज्ञका फंड 
वाले अनन्त भगवान जिस दिच सोते और उठते हैं उस | मिलता हैं ॥»| उस दिन जो मनुष्य शट्टुवक्रादाधारी 
दिन अनन्य भक्तिपूवंक उपवास करनेवाले मलुष्योंको गरु-। भगवांन विष्णु, माधव, हरि, श्रीधर, मघुसूदतका॥ ८॥ 
. डासन भगवान्‌ शुभगति प्रदान करते हैं ॥ ८१॥ यह श्री | पूजन करे और यज्ञ करे, वा ध्यान करे तो उसका पुण्यफ३ 
अविष्यपुराणकी कही हुईं 'विप्णुशयनी एकादुशीके साद्या- | श्रवण कीजिए ॥ उसे न तो गंगामें होता है और न 
. ररुबेकी कथा पूरी हुई॥ जैं; न नेमियम होता है और न पुष्केस्में । ९ ।। वह फढें 
:* आवणकृष्ण एकादशीकी कथा-युधिष्ठिरजी घोले कि, | होता हे, जो क्ृष्णकी पूजामें मिलता है। केदारमें 
'महहराज !-आपषाढशुर्वा एकादशीके पुराणोक्त शयनत्रतका | कुरुक्षेत्र सूये अहणके सप्रय | १० ॥ वह खा हे 
बर्णन मेने विस्तारंके साथ सुन लिया ॥ १॥ अब श्रावणके | नहीं मिल्ता, जो कृष्ण पूजनस मिलता है, गोद 


'ऊप्णपक्षम किस नास्की एकादशी होती हे ! हे फेविन्द || वरी नदीपर सिंहराशिके वृहस्पदिके समय व्यतीर 





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भाषाटीकासमैलर । ( डेडे७ ) 








ब्न्‍रतत्कलमवाप्नोति यत्फल कृष्णपूजनात्‌ ॥ सखसागरवन्रोपेतां यो ददाति घछुन्धराम्‌ ॥ १२॥ 


.. कामिकान्नतकारी चह्ानों सनझछो स्पुतो॥ प्रतूयनात्रां यो घेलुं द्यात्सोपस्करां नरः ॥१२॥ 
-. तत्फले समवाप्नोति क्वमिकाप्रतकारकः ॥ आवणशे श्रीधर देव पूज्रयेद्यों नरोचमः ॥ १७४ ॥ 


तैनेव पूजिता देवा गन्धवोरगपतन्नगाः ॥ तस्मात्सवप्रयत्नेन कामिकादिवसे हरिंः॥ १५॥ पूज- 
नीयो यथाशक्तत्या मठुष्पः पापन्नीदलिः ॥ संसाराणवमग्ना ये पापपकुंसमाकुछाः ॥ १६॥ 
तेषामुद्र णाथोय कामिकाब्रतछुत्मम्‌ ॥ :नातः परतरा “काचित्पत्रित्रा पापहारिणी ॥ १७ ४ 
एवं नारद जानीहि स्वयनाह पुरा हरि; ॥ अव्यात्मत्रियानिरनेयसेत्कले प्राप्पते नरे।॥ १८ 
ततो बहुलर विद्धि कामिकाज्तसेबनात्‌ ॥ रात्ौ ज्ञागरणं कुर्यात्कामिकाथनकृन्नरः ॥ १५६ ॥ 
न यश्यति यमें रौद नेद पह॒यति दुर्गतिम ॥ न गच्ठलि कुषोते च ऋामिकाब्रतसेबनात्‌ ॥२०॥ 
कामिकाया ब्रत्नेनेव केव>्प॑ योगिनो गत। ॥ तस्मात्सवेत्रधत्वेन कलैव्या नियतात्मनिः ॥२१॥ 
तुलपीममभत्रेः पत्रेयों नरः पूजयेद्धरिस ॥ न व्‌ स॒ लिप्यते पापेः पद्मपत्रमिवाम्नसा ॥ २२ ॥ 
घमुवणनारमंक॑ तु रजत च चेतुगुगम्‌ ॥ तत्फले समवाप्नोति तुलतीदलछपूजनाव्‌ ॥ २३॥ रत्न- 
मोकिकयेदूयेप्रवालदिमिराबितः ॥ न तुष्पति तथा जिष्युस्छुलूतीप्‌ जनाद्यथा ॥ २४ ॥ तुलसी 
मश्नरीनिध्तु पएजितो येन केशवः ॥ आजन्मकृतवापहय लेन संवजिता लिपिः ॥ २५ ॥ 
या दृष्ठ। निश्चविलाचसंवशमनी स्पृष्टा बउु) पवनी रोग/गामभिवन्दिता निरखिती खिकान्तक- 
ऋरतिती ॥ मत्यास्नतिविधायिनी मगवतः कृष्गस्य संरोपिता न्यस्त तबरणे विनुकछिकछदा 
तस्थे तुलस्थे नमः ॥ २६ ॥ दीप दुदाति यो मत्यों दिवारात्रो हरेदिने ॥ तस्य पुण्यस्य संख्यान 
चित्रभुप्तोषपि वेचि न ॥२७॥ ऊकृण्गाप्रे दीतछो यत्य ज्वलेरेशाइशीदितन ॥ पितरध्त स्य तृप्यन्ति 
अमृतेन दिवि स्थिताः ॥ २८॥ चतेन दीपे प्रज्वाल्थ तिलतेलेन वां पुनः ॥ प्रयाति सूर्य- 





व्यतीपातम गण्डकम ॥ ११ ॥ वह फछ नहीं होता जो | ब्रतसेढी योगी छोग केवल्य या चुके हूँ । इस छिये इसको 


कृष्ण पूजलसे होता हैं, जो मनुष्य समुद्र और जगहुस- | बड़े प्रवस्तनस करना चाहिये ॥ २१ 


हित प्रथ्वीका दान करे ॥॥ १९ ॥ अथवा केवछ कामिका! 
का ब्रतमात्र करे तो दोतोंका समान फछ दोता हँ। जो 
सब सामग्री सहित बच्चादेनवाली गौकों दान करनेस होता 
हैं॥ १३॥ कामिक के त्रतस वही फछ भमिछता हैं. जो 
उत्तम नर आवणमे श्रीधर भगवानकी पूजा करे ॥ १४॥ 
तो उससे सब देँव॒ता, गंववे, नाग भौर किन्नर पूजिव हो 
जाते हैं। इस छियें सब तरहसे इस दिन हरि भगवानकों 
॥१५॥ पापसे डरनेवाले पुरुषों ॥ यथाशक्ति पूजना चाहिये। 
संसार समुद्र्म पापझहूपी कीचके अन्दर फंसनंवारू मनु- 
ध्यॉका । १३ ॥ उद्धार करनेसे इसस अधिक उत्तम पाप" 
हारिणी औ<« कोई दूसरी पवित्र एकादशी नहीं है ॥ १७ ॥ 
इस प्रकार स्वयं भगवान्‌ हरिने हें नारद इसका वर्णन 
पहडे किया था, विशेषकर अव्यात्मविद्यार्मे रत रहवेवबाढ 
पंडितोंको जो फल मिठता एं ॥ १८ ॥ इस कांमिक्ताक 
ब्रतसे उससभी बहुत अधिक छछ मिछजातूः है॥ कामि- 
कारक ब्रत करों करनंवालढा मनुष्य रातमभ जागरण करें ॥१५५ 
बह कभी भयेकर यमराजकों वा हुगेतिको नहीं देखता। 
और न कभी कुओनिकों पाता हें ॥ २० ॥ इस कामिकाऊ 


१ दुदुतो यरकई भवती। शपबः 


जिस प्रकार कमलूके 
पत्र वानी से हित नडीं होते इसो प्र दार वह मनुष्य भी जो 
तुछ पीदछ ते भगवानकों पूजा करें कभी पापोंस छिप्त नहीं 
होता ॥ *२॥ एक भार सोचा और चार भार चौंदीके 
देनेते जो फल होता हें बद्दी फल भहाबानपर तुलसखीदुछ 
चढानेसे होता है ॥ २३ ॥ रत्नोंते, मोती, बेंदुय और 
प्रवाछ्ठ आदिसे पूज जानेपर भगवान्‌ उतने प्रसन्न नहीं होते 
जितने कि; तुछ छीके दछके पूजनसे होते हैँ ॥२४॥| जिसने 
भगवानकी तुलसी दुरूसे पूजा की. उसने अपने जन्मकी 
पाप छिपिका समाजेन कर लिया।॥ २५॥ जिसके द श- 
नसे पाप नष्ट हों, स्पश फरनेस शरीरको पवित्र करे, नम- 
स्कार करनेसे रोगोंका नाश करें, सींचनेपर यमराजकों 
भगावे, छगानेपर भगवानके निकट सबन्ध स्थापित करे 
और भमगवानके चरणोंमें रखनेपर मोक्षझठको दें; उस 
तुलनीको नमस्कार है ॥ ९६ ॥ जो द्निरात भयवानके 
समीप दीपक घरे उसके पुण्यकी संख्या तो चित्रगुप्तमी नहीं 
जानता ॥ २७ ॥ भगवानके आगे जिसका दीपऋ एक्ा- 
दुशी के दिन जछता दो तो उछ्कके दिवसे रहनेवारे पितर 
छोग अपृतसे तृप्त हाते हैं ॥| २८ ॥ घीसे वा तेःस दीफ्क् 


१ या दुद्दतू इत्यपि पाठः । 


( ४४८ ) प्रतराजः । 


[ एकादशौ- 
्नननन्म ४5४<, ् ू:€७?::_ते 
लोकेडसो दीपकोटिशतेदतः ॥ २९ ॥ अये तवाम्ने कथितः कामिकामहिमा मया॥ अतो नहे 
प्रकतंव्या सर्वपातकहारिणी ॥ ३२० ॥ बल्नहृत्यापहरणी श्लणहत्यावेनाशिनी ॥ त्रिद्विस्थान- 
दात्री च महापुण्यफलप्रदा ॥ ३१॥ श्र॒त्वा माहात्म्यमतस्या नरः श्रद्धासमान्वितः ॥ विष्णु- 
लोकमवाप्नोति सर्वपापेः प्रसुच्यते ॥ ३२२ ॥ इति श्रीत्रह्मवेबतपुराण श्रावणकृष्णेकादर्याः 
कामिकाया माहात्म्य समाप्तम्‌ ॥ 

अथ श्रावणशुक्लेकादशीकथा ॥ 

पुधिष्ठिर डबाचा।श्रावणस्य सिते पक्षे किंनामेकादशी भवेत्‌ ॥कथयस्व प्रसादेन ममाओे मधु- 
खूदन ॥९॥ श्रीकृष्ण उबाच ॥ श्वणुष्वावहितों राजन्‌ कर्थां पापहरां पराम्‌ ॥ यस्याः श्रवणमा- 
त्रेण वाजपयफलं लमभत्‌ ॥२॥ द्वापर प्य युगस्यादो पुरा माहिष्मतीपुरे ॥ राजा महीजिदाख्यातो 
राज्यं पालयति स्वकभ्‌ ॥र॥ पुत्रहीन ए्य तस्येव न तद्राज्यं सुखमदम ॥ अपुत्रस्य खुखं नास्ति 
इहलोके परत्र च ॥ ४॥ यततोः्य सुतम्रातां कालो बहुतरों गतः॥ न प्राप्तश्व खुतो राज्ञा 
सर्वंतौख्यप्रदो नुणाम्‌ ॥ ५॥ हृद्दात्मानं प्रवयर्स राजा चिन्तापरोह्मवत्‌ ॥ सदोगतः प्रजा- 
मध्य ददे वचनमत्रवीत्‌ ॥९॥ इहजन्माने भो लोका न मया पातक॑ कृतम्‌ ॥ अन्यायोपारिंत॑ 
वित्त क्षितं कोशे मया न हिं ॥ ७ ॥ बह्ास्वे देवद्रवि्ण न गृहीत मया कचित्‌ ॥ न्यासापहाशे 
न कृत परस्य बहुपापद्‌ः ॥ 4 ॥ खुतवत्पालिता लोका धर्मेंग विजिता मही | दुष्टेड पातितो 
दण्डो बन्धुपुत्रोपमेष्वपि ॥ ९ ॥ शिष्टः खुपूजिता लोका द्वेष्ियाश्रापि महाजनाः ॥ इत्येवं ब्रजते 
मार्ग धमयुत्ते द्िजोत्तमा; ॥ कस्मान्मम गहे पुत्रो न जातस्तद्विचायंताम्‌ ॥ १० ॥ इति वाक्य 
द्विजाः श्रुत्वा सत्जाः सपुरोहिताः ॥ मन्त्रायित्वा नूपहितं जग्मुस्ते गहने वनम ॥ ११ ॥ इत- 
स्ततश्र पहयन्तश्वाश्रमानषिसिवितान्‌ ॥ न्पतेहिंतमिच्छन्तो दद्झु्सनिसत्तमम्‌ ॥ १२॥ तप्य- 
मान तपो घोर॑ चिदानन्द निरामयम्‌ ॥ निराहारं जितात्मानं जितक्रोध सनातनम्‌ ॥ १३॥ 








हि + नरक >+- न अक-लकन+ ० अम«»भ «मम धम ७“ मन ५०+ ० पु +५ «कमुत++» ५ मलुम्नलम ०: कामु कसम नव ० ७» सु कू,+ न न्‍ कमल ऑन. पका. बा ब्रज. शकयताय बदन ता कं आज अवामाा 














जलाकर जो दान करे वह सूय छोकमें कोटि कोटि दीप- 
कोंके साथ जाता है ॥२९।॥ यह महिमा मेने तुम्हारे सामने 
कामिकाके त्रतकी वणन की है। इस छिय इसको पार्पोंक्य 
नाश करने ऊ वास्ते सब मनुण्योंक्रो करनी चाहिये ॥३०।॥ 
यह ब्रह्मह॒त्या हरनेवाढी, श्लणहत्याकों नाश करनेवराली, 
स्वगंमें स्थान देनेवाली ओर मद्दापुण्य फछको देनेवाढी 
हैं॥ ३१ ॥ श्रद्धासहित मनुष्य इसके माहात्म्यकों सुन 
करके थिष्णुछोकमें चछाज(ता है एवम्‌ सब पापोंस भी 
छूटजाता है ॥ ३२ ॥ चह श्रोत्रह्मवेवतेपुराणकी कही हुई 
श्रावणशुक्ककी कामिका एकादशीकी कथा पूरी हुईं ॥ 

अथ श्रावणशुद्धा एकादशोकी कथा-युधिष्ठिरजी बोले 
कि;हे मघुसूदन ! श्रावणके शुक्कूपक्षमें किस नामकी एका- 
दुशी होती हू ! इसको आप प्रसन्नतास कहिये ॥ १॥ 
ओक्षष्णजी महाराज बोले कि, हे राजन्‌ | इसकी पापहा- 
. रिणी कथाका श्रवण करो,जि पके सुननही से बजपेययज्ञका 
"फछ प्राप्त होता है ॥२॥ द्वापरयुगमे माहिष्मतीपुरीके अंदर 
'पहले सहीजित्‌ नामक राजा अपने राज्यकी पाछना करता 
या 0 ३ ॥ किन्तु उसका पुत्रहीन राज्य उसके छिय सुख 
“नहीं था. क्‍यों कह पुत्रहीन व्यक्तिकों इस लोकमें ऑर 
शक जी हे जम सुंख नहीं हे ॥४॥ इस राजाको 
पुत्र प्राप्तिक उद्योगरस बहुत्सा समय व्यतीत होगया पर सर्व- 


सुखको देनेशल्व पुत्र उत्पन्न न हुंआ ॥.५॥ इस राजाने 
अपनेको बडी अवस्था देखकर चिन्ताके साथ्‌ समामें 
अठकर प्रजाक बीचमें यह वचन कहें ॥ ६ ॥ कि,ह ढोगो! 

मेने इस जन्ममें कोई पाप नहीं किया तथा कोषमें कभी 
अन्यायका घन नहीं जमा किया ॥ ७॥ नब्राह्मणका माढ 
तथा देवसम्पत्ति मेंने कभी नहीं छी । पाप फलको देंने- 
वाली कभो अभ्ानतमें खयानत भी नहीं को ॥ ८॥ पृत्रकी 
भांति प्रजांका पाछत किया हे.घमंके साथ पृथ्वीका विजय 
किया ओर पुत्रके सम्तान पंयारे बन्चु ओंको भी दुष्टता कर- 
नेपर दण्ड दिया है ॥॥९॥ शिष्टोंक। आदर किया है | इस 
प्रंकार धमपुवंक अपने उचित रासते पर चढछनेपर भी है 
बाह्यगो ! मेरे घरमें पुत्र क्यों नहीं उत्पन्न हुआ ? इसका 
विचार करों ॥ १० ॥ प्रजा और पुरोहितके साथ त्राह्म" 
णोने राजाके इने वचनोंकों सुन आपसमें सलाह करऊें 
गहनवनमें यात्रा की ॥| ११॥ राजाका भा: चाहतहुए, 
उन्होंने इधर उधर ऋषियोंके आश्रमोंकी तछाश की | और 
नृपतिके हितक उद्देश्यस प्रेरित हो एक मुनिराजकों भी 
देखछिया ॥ १९॥ जो घोर तपश्चयमिं मप्न था । पिदी- 
नन्द्‌ ब्रह्म झा ध्यान करनेके कारण उसी्म छीन था; गिरा 


'मय था, निराहार था, आत्माकोी उस्नने जीत रखा था। 


क्रोध भी उसके पास्र नही भुटकने पाता था। सदा अक्लुण्श 


ब्रतानि, | भाषाटीकासमेत॑; । ( ४४५९ ) 











लोमशं धर्मतत्वक्ष स्वेशासत्रविशारदम्‌ ॥ दीघोयुषं महात्मानमनेकबरह्मसंभितम्‌ ॥ १४ ॥ कहल्पे. 
गते यस्येकस्मिन्रेके लोम विशीयते ॥ अतो लोमशनामान त्रिकालज्ञ महामुनिम्‌ ॥ १५॥ ता 
दृष्ठा हर्षिताः सर्वे आजग्मुस्तस्य सत्रिधिम्‌ ॥ यथान्यायं यथाहँ ते नमश्वक्र॒यंथोदितम्‌॥ १६॥ 
/.. बिनियावनताः सर्वे ऊचुश्वेव परस्परम्‌॥ अस्मद्धाग्यवशादेव माततोः्यं सनिसत्तमः ॥ १७ ॥ 
:.. त्रांस्तथा प्रणतान्दष्ठा छुवाच सुनिसत्तमः ॥ लोमश उवाच ॥ किमथोमेह संप्राप्ताः कथयध्वं चर. 
: क्वारणम्‌॥ १८॥ मदरशनाहादगिरा भवन्तः स्तुवते किसु ॥ असंशयं करिष्यामि भवतां 
.. ग्द्धितं भवेत्‌ ॥ १९ ॥ परोपकृतये जन्म माहशानां न संशयः ॥ जना ऊच्चुः॥ श्रेयताममि- 
धास्यामो वयमागमकारणम्‌ ॥ २० ॥ संशयच्छेदनाथांय तव सत्रिघिमागताः ॥ प्मययोनेः पर- 
तरस्त्वत्त: श्रेष्ठो न विद्यते ॥ २१ ॥ अतः कायवशात्माप्ताः समीप भवतों वयम्‌ ॥ महीजि- 
न्नाम राजासों पुत्रहीनो<स्ति सांप्रतम्‌ ॥ २२॥ वर्य तस्य प्रजा बह्मन पृत्रवत्तेन पालिताः ॥ त॑ 
पुत्रहितं दृद्ठा तस्थ दुःखेन दुःखिताः ॥२श॥ तपः कठुमिहायाता मतिं कृत्वा ठु नेष्ठिकीम॥तस्थ _ 
भाग्यवशा दृष्टस्त्वमस्मार्भिद्विजोत्तम ॥ २४॥ महतां दशनेनेव कार्यसिद्धिमंवेन्तुणाम्‌ ॥उपदेशं 
बद मुने राक्षः पुत्रो यथा भवेत्‌ ॥ २५ ॥ इति तेषां वचः श्र॒त्वा मुहूर्त ध्यानमास्थितः ॥ शत्यु- 
वाच मुनिज्ञोत्वा तसय जन्म पुरातनम्‌ ॥२६॥ छोमश उवाच ॥ पूवजन्मनि वश्यो5यं धनदहीनो 
नृशंसक्ृत्‌ ॥ वाणिज्यकर्मनिरतो ग्रामाद्‌ ग्रामान्तरं श्रमेत्‌ ॥ २७ || ज्येष्ठे मासि सिते पक्षे 
द्वादशीदिवसे तथा ॥ मध्याह्ने छुमणों प्राप्ते आमसीधत्षि तृपाकुलः ॥ २८ ॥ रम्यं॑ जलाशय दृष्ठा . 
जलपाने मनो दधो ॥ सद्यःसूता सवत्सा च घेलुस्तत्र समागता ॥ २९ ॥ तृषातुरा निदाघातां 
तस्य चापः पपौ तु सा ॥ पिबन्ती वारायत्वा तामपो तोयं स्वयं पपो ॥ ३० ॥ कर्मेणस्‍्तस्य 
पाकेन पुत्रहीनो नृपो5मवत्‌ ॥ पूबजन्मकृतात्पुण्यात्माप्तं राज्यमकण्टकम्‌ ॥ २१ ॥ जना ऊच्चु। ॥ 








स्थायी रहनेवाढा था ॥ १३ | उसका नाम छोम॑श था ! 
वत्वके जाननवाले थे,सब शास्त्रों में परमप्रवीण थे, महात्मा 
थे तथा अनेक त्रह्माओंकी संमिलित आयुसे भी बडी इनकी 
आयु थी ॥ १४ ॥ एक कल्पमें इनका एकही छोभ गिरता 
हैं, इसी कारण इनका लोमश नाम है| ये तीनों का्लोॉके 
जाननेवाले महामुनि थे ॥ १०॥ उन्हें देखते ही सब प्रसन्न 
होकर उनके समीप चले आये, जैसे करनी चाहिए जिसके 
कि, वो योग्य थे, उसी तरह उनके लिए नमस्कार किया 


॥ १६ ॥ विनीतभावसे झुककर सब छोगोंने परस्पर कहा 
कि, भाग्यहीसे इस मुनिराजका दर्शन हुआ ॥१७)॥ उनको 


इस प्रकार प्रणाम करते हुए देख, मुनिराजने कहा कि, 
तुम लोग यहां क्‍यों आये ? इसका कारण कहो ॥ १८॥ 
मेरे दशनके आनंदरम क्‍या तुम छोग स्तुति करते हो। मे 
निःसन्देह तुम्हारा कल्याण करूंगा ॥ १९ ॥ मुझ जेसे 


मनुष्योंका जन्म परोपकारहीके छिए होता हें । यह निः- 


सन्देह बात है, छोगोंने कह्ा-सुनिये महाराज ! हम लोग 
अपने आनेका कारण कहते हैं ।। २० ॥ हम आपके पास 
संशयको दूर करनेके वास्ते यहां आये हैं । क्‍योंकि, त््माके 
अतिरिक्त आपसे बढकर कोई दुसरा सर्व श्रेष्ठ नहीं 
॥ २१॥ इसलिए किसी कार्यवश आंपके पास आना हुआ 
हैं । यहांपर इस समय महीजित्‌ नामके एक पुत्रहीन 
* ५५७ 





राजा ह ॥ २२ ॥ हम छोग उसके पुत्रकी भांति पाछी हुईं 
प्रजा हैं, उसको पुत्ररद्दित देखकर उसके दुःखसे द्ुःखी हैं 
॥ २३ ॥ है मुनिराज ! हम लोग आस्तिकजुद्धिसे इस जगह 
तप करनको आये हैं, किन्तु राजाके भाग्यवश्; हें द्विज- 
राज ! आपके हमे यहां दशन होगये ॥| २४ | बडे आद- 
मियोंके दशनहीसे कार्य सिद्धि होती है, इसलिए महाराज ! 
आप ऐसा उपदेश दीजिए,जि घसे राजा पुत्रवान हो॥२५॥| 
एस उनके वचन सुनकर मुनिराजने ध्यानपृतक विचार 
किया और उसके पृत्र॑ंजन्मके हालको जानकर इस प्रकार 
वर्णन किया ॥ २६ ॥ छोमझ बोले कि, पूवंजन्समें यह 
घनहीन वैश्य था, जो अत्याचार करता था। प्रामग्रामर्मे 
घूम कर वाणिज्यवृत्ति करता रहता था ॥ २७ ॥ ब्येष्ठ मह्दी- 
नेक शुकृपक्षकी एकादशीके दिन मध्याहके समय वह 
प्यासा होकर किसी ग्रामकी सीमामें पहुँचा ॥ २८ ॥ उसने 
उस जगह किसी सुन्दर जछाशयको देखकर जछ पीनेकी 
इच्छा की, वहाँ हालहीकी ब्याईं हुई एक सवत्सा गो भी 
आ पहुंची ॥ २९॥ वह गर्मीस पीडित तथा प्यासस आकुछ 


| होकर उसके जछको पीने छगी | परंतु उसको पीते हुए 
है | देखकर उसे बन्दकर स्वयं उस जछको पीगया ॥ ३० ॥ 


उसी कमके फछसे राजा पुत्रह्दीन हुआ हे ओर पूर्व॑जन्मके 
पुण्यसर अकंटक उसे राज्य मिला है ॥ ३१ ॥ छलोगोंने कहा 


ब्रतराजः । [ एकादशौ- 









पुश्यात्पापं क्षयं याति पुराणे श्रूयते छुने ॥ पुण्योपदे्श कथथ येन पापक्षयों भवेत्‌॥ ३२॥ 
यथा भवत्मसादेन पृत्रोःस्य भविता तथा ॥ लोमश डवाच ॥ श्रावण शुक्कपक्षे तु पुत्रदानाम 
विश्वता ॥ ३३॥ एकादशीतिथिश्वास्ति कुरुध्व॑ तद्गरते जना;॥ यथाविधि यथान्याय्य॑ 
यथोक्त जागरान्वितम्‌ ॥| ३४ ॥ तस्याः पुण्य सुविमले देय नुपतरे जनाः ॥ एवं कृते सुनियत 
' शक्ञः पुत्रों भविष्यति ॥ ३५ ॥ श्र॒त्वा ठु लोमशवचस्तं प्रणम्य द्विजोत्तमम्‌ ॥ प्रजग्मुः स्वम्ृ- 
हाद सर्वे हषोत्फुछविलोचन! ॥ श्रावर्ण तु समासाद्य स्मृत्वां लोमशभाषितम्‌ ॥| २६॥ राज्ञा 
सह व्रत चक्कः सर्वे श्रद्धासमन्विताः ॥ द्वादशीदिवसे पुण्य ददुनंपतये जनाः॥ ३७॥ दत्ते 
पुण्ये तु सा राज्षी गर्भभाधत्त शोभनम्‌ ॥ प्राप्ते प्रसवकाले सा खुब॒ुबे पुत्रमूजितम ॥ ३८ ॥ एव- 
मेंषा वृपश्रेष्ठ पुत्रदानाम विश्रुता ॥ कतंव्या खुखामच्छद्धिरिह छोके परत्र च॥ ३९ ॥ श्रत्वा 
माहात्म्यमेतस्थाः रर्वपापेः प्रमुच्यते | इह पत्रखुखं प्राप्य परत्र स्वगतिं लमेत ॥ ४० ॥ 
इते श्रीमविष्योत्तरपुराणे पृत्रदाख्यश्रावणशुक्लेकादशीमाहात्म्यं समाप्तम ॥ 
अंथ भाद्रपदक$ष्णेकादशीकथा || 

युधिष्ठिर उवाच ॥ भाद्स्य कष्णपक्षे तु किनामेकादशी भवेत्‌ ॥ एनदिच्छाम्यहं श्रोतुं कप- 
यस्व जनाइन ॥ १॥ श्रीकृष्ण उवाच ॥ श्रणुष्वेकमना राजन कथायेष्पामि विस्तराव ॥ अजेति 
नाम्ना विरुपाता सर्वेपापप्रणांशिनी॥ २॥ पूजयित्वा हृषीकेशं व्रत तस्याः करोति यः ॥ 
पापाने तस्य नह्यन्ति ब्रतस्य श्रवणादपि ॥ ३२॥ नातः परतरा राजेंछोकद्रयहितावहा॥ 
सत्यमुक्ते मया होतेन्नासत्यं भाषितं मम ॥ ४ ॥ हसिश्रन्द्र इति रूयातो बभूव नृपातिः पुरा॥ 
चक्रवर्ती सत्यसनध: समस्ताया चुव: पाते; ॥ ५॥ कस्याएपि कम णो यो गाद्राज्यश्रष्टो बनूव . 
सः ॥ विक्रीय वनितां पुत्र स चकारात्मविक्रयम्‌ ॥ ६॥ पुल्कपत्प च दासत्वं गतो राजा स 
पुण्यकृत्‌ ॥ सत्यमालम्ब्य राजेन्द्र मृतचेलापहारकः ॥ »॥ सोउनवन्न पतिश्रेष्ठो न सत्याचलित- 

















कि, महाराज ! पुराणोंम्वें सुना करते हैं कि, पुण्य करनेसे | जाताह।४०॥यह श्रीभविष्योत्तरपुराण का कह्दा हुआ पुत्रदा 


पापका क्षय होता है। इसलिए किसी पुण्यक्रा उपदेश 
दीजिए, जिससे राजाके पापका नाश हो ॥ ३२ ॥ जिससे 
कि, महाराजकी कृपास राजाके पुत्र उत्पन्न हो । लोमशने 
कहा कि, श्रावण शुह्॒पक्षमें पुत्रदा नामकी एकादशी तिथि 
विख्यात है ॥| ३३ | है छोगो ! तुम छोग उसका विधि- 
पूतक ठीक ठीक झासत्रोक्त रीतिस जाग एणक साथ ब्रत करो 
॥ ३४ ॥ उसका उत्तम पुण्य तुम छोग राजाको देदो । ऐसा 
करनेपर निश्चयही राजाके पुत्र होगा ॥ ३५ ॥ मुनिराजके 
इन वचनोंकों सुनकर हंस उछलते हुए खिले नेत्रोंवाले वे 
छोग उन्हें प्रणमकरके अपने अपने घर चढेगये, श्रावणके 
आजानेपर छोमशके वाक्योंको यादकर || ३६ ॥| उन सब 
छोगोंने श्रद्धांक साथ राजासहित ब्रतकिया और उस एका- 
दशीका पुण्यफछ द्ादशीक दिन राजाको दे दिया ॥३७॥ 
पुण्यदान करनेपर उसी समय रानीको सुन्दर गर्भ हुआ 
ओर प्रसव काछके आनिपर रसने तेजस्वी पुत्र उत्पन्नकिया 
(॥३८॥इसलिए है राजन्‌ ! इसका पुत्रदा नाम विख्यात है। 
दोनों छोकोंके वास्ते सुखाभिलाषी मनुष्योंको यह करनीही 
चाहिए ॥३०॥ इसका माहास्म्यघुन पापोंसे छूट जाता है, 
तथा इस जसन्म्रमें पुत्नतुखको प्राप्कर अन्तर्मे स्वगको चल्ता- 


२ नाज्र सिथ्या किंचिन्नपोत्तमेति पाठः | 


नामकी श्रावण रुक्का एकादशी का माहत्म्य पूरा हुआ ॥ 
अथ भाद्रपद कृष्णा एकादशीकी कथा-युधिष्ठिएजीबोडे 
कि, हू भगवन्‌ | भाद्पद कृष्णपक्षकी एकादशीका क्या 
नाम हूँ | से यह सुनना चाहता हूं। इसका आप हपा 
कर वणन कीजिए ॥॥ १ ॥ श्रीकृष्ण महाराज बोले कि, है 
राजन | ध्यान देकर सुनो में विस्तारके साथ कहता हूँ। 
उस विख्यात एकादशीका नाम “अजिता ? दे जो सब 
पापोंका नाश करती है: २ ॥ हरि भगवानकी पूजाकरडे 
वा इसकी कथाकों सुनकर जो उसके त्रवको करता हैं उसके 
सब पाप नष्ट होजाते हैं ॥ ३ ॥ में तुर्मे सत्य कहता हूँ कि, 
इससे बढकर इस जन्म और परजन्मके हित करनेके 
ओर दूसरी कोई एकादशी नहीं हे ॥ ४ ॥ पहले हरििद 
नामके विख्यात चक्रत्रतीं समस्त प्रथ्वीके अधिपवि 
सत्य प्रतिज्ञ राजा थे ॥ ५ ॥ किसी कमके फलसे उसने 
खज्य भ्रष्ट होकर अपने स्री पुत्रका तथा अपने आपका . 
विक्रय कर डाछा ॥ ६ ॥ वह पुण्यात्मा राजा सलप्रहिवे. 
होनेके कारण चांड(छ का दास होकर शववख्रकों ढेवऋा 
काम्र करनवाछा ॥ ७॥ तो हुआ किन्तु वह सत्यस विच- 


ब्रतानि, ] माषाटीकासमेतः । (४५९ ) 










स्तथा॥ एवं गतस्य नृपतेबंहवों वत्सरा गताः ॥ ८॥ ततश्रिन्तापरो राजा बभूवात्यन्त- 
दुःखितः ॥ कि करोमि कक गच्छामि निष्कृतिमें कर्थ भवेत्‌ ॥.९ ॥ इति चिन्तयतस्तस्य ममग्नस्य 
वृजिनाणेवे ॥ आजगाम मुनिः कंथ्रिउ्ञात्वा राजानमाठुरम्‌ ॥ १० ॥ प्रोपकरणार्थांय निर्मितो 
ब्रह्मणा द्विजः॥ स त॑ दृष्ठा द्विजवरं ननाम नृप्सत्तमः ॥ ११॥ कृताअलिपुटो भुृत्वा गोत- 
मस्याम्रतः स्थितः ॥ कथयामास वृत्तान्तमात्मनों ढुःखसंयुतम्‌ ॥ १२ ॥ श्व॒त्वा नृपतिवाक्यानि 








गौत॑मो विस्मयान्वितः ॥ उपदेश नृपतये व्रतस्थास्य मुनिदेदों ॥ १३॥ मासि भाद्रपदे राजन 
कृष्णपक्षे तु शोमना ॥ एकादशी समाख्याता अजानाम्रातिपुण्यदा ॥ १४ ॥ तस्याः कुरू ब्रतं 
राजन्पापनाशों भविष्यति ॥ तब भाग्यवशादेषा सप्तमेईद्धि समागता॥ १५॥ उपवासपरो 
भूत्वा राजौ जागरण कुरू ॥ एवं तस्या बत चीणें सर्वपापक्षयों भवेंत्‌ ॥ १६॥ तब पुण्यप्रभा- 
वेण चागतोःह नृपोत्तम॥ इत्येव॑ कथयित्वा तु झुनिरन्तरधीयत ॥ १७॥ खुनिवाक्यं नृपः 


श्रुत्वा चकार व्रतमुत्तमम्‌ ॥ 


कृते तस्मिन्त्रते राज्ञ पापस्यान्तो5्मवत्क्षणात्‌ ॥ १८ ॥ श्रयतां 


राजशा्दूल प्रभावोःस्प व्रतस्य च ॥ यद्दुःखं बहुनिवर्षेभोक्तव्यं तत्क्षयो मवेत्‌ ॥२९॥ निस्तीण 
दुःखो राजासीद्रतस्पास्य प्रभावत३ ॥ पत्नया सह समायोगं पुतुजीवनमाप स$ ॥ २० देव- 


दुन्हुभयों नेढुः पृष्पवषेमभद्विः ॥ एकादर्याः 
लेमे हरिश्रन्द्रः सपुरः सपरिच्छदः 


॥ ईदग्विध॑ ब्रतं राजन ये कुवेन्ति द्विजोत्तमाः 


प्रज्नावेण प्राप्त राज्यमकण्टकम्‌ ॥ २१॥ स्व 


॥( २० ॥ सव्वे- 


पापविनिमुक्ताल्थदिवं यान्ति ते घुंवम्‌ ॥ पठनाच्छवणाद्राजन्नश्वमेघफल भवेत्‌ ॥ रहे ॥ 
इति श्रीक्रह्माण्डपुराणे भाद्रपदकृष्णाया अजानाम्न्या एकादइया माहात्म्यं समाप्तम्‌ ॥ 
अथ भाद्रपदशुक्लैंकादशीकथा ॥| 
युधिष्ठिर उवाच ॥ नभस्य सितपक्ष ठ॒ किनामेकादशी भवेत्‌ ॥ को देवः को विधिस्तस्याः 
कि पृण्यं च बदस्व न ॥ २ ॥ श्रीकृष्ण उवाच ॥। कफथयामि महापुण्यां स्वर्गमोक्षप्रदायिनीम्‌ ॥ 


छित नहीं हुआ और इस प्रकार सत्यको निभाते हुए उसें 
अनेक वर्ष बीतगये ॥ ८ ॥ तब उसे दुःखके कारण बडी 
चिन्ता उत्पन्न हुई और विचार किया कि) इसके प्रतीका- 
रके लिय मुझे क्या करना ओर कहां जाना चाहिये।। ९ ॥ 
इस प्रकार चिंतासमुद्रमें दबे हुए आतुर राजाको जानकर 
कोई मुनि उसके पास आया ॥ १० || ब्रक्माने त्राह्मणको 
परोपकारहीकेवास्ते बनाया हैं यह समझकर उस राजाने 
. छत श्रेष्ठ त्राह्मण महाराजको प्रणाम किया ॥ ११॥ और 
उन गौतम महाराजके आगे हाथ जोड खडा होकर अपने 
दुःखको वर्णन किया ॥१२॥ गौतमने बडे आश्रयंसे राजाके 
इन वचनोंको सुन इस व्रतका उपदेश किया ॥ ९४ ॥ है 
राजन ! भाद्रपद महीनेकी क्ृष्णपक्षकी पुण्यफलक देने” 
वाढी अजिता एकादशी बडी विख्यात है. ॥ १४ ॥ हे 
राजन्‌ । आप उसका ब्रत करें तो आपके पापोंका त्ाश 
होगा और तुम्हारे भाग्यस यह आजसे सातवें दिन आने- 
वाली हे ॥॥ १५ ॥ उपवास करके रातमें जागरण:; करना 


इस प्रकार इसका व्रत करनेस तुम्हारे सब पापोंका नाझ 


होजायगा ॥ १६ ॥ में तुम्हारे पुण्यप्रभावसे अप चढ्ा 
भाया था, यह कृहकर मुनि अंतध्यान होगये ॥ १७ ॥ 
मुनिके इन वचनोंको सुन राजाने ज्योंही त्रत किया त्योंही 


उसक पापोंका तुरंतही अन्त होगया ॥१८॥ हे श्रेष्ठ राजन! 
इस त्रतका प्रभाव सुनिये ! जो बहुत वर्षतक दुःखभोगा 
जाना च|हिये उसका जल्दी क्षय होजाता है ॥ १९॥ इस 
ब्रतके प्रभावस राजा अपने दुःखसे छूट गया। पत्नीके साथ 
संयोग होकर पुत्रकी दीर्घायु हुई।॥ २० ॥ देवताओंके घर 
बाजे बजने छमे । स्वगंसे पुष्पवृष्टी हुईं, इस एकादशीके 
प्रभावसे उसे अकंटक राज्यकी प्राप्ति हुईं ॥ ९१॥ राजा 
हस्थ्िन्द्र अपनी प्रजाके साथ सब सामप्रीसहित रत्र में चला 
गया। इस भ्रकारके ब्रतको हे राजन ! जो ह्विजोत्म करते 
हैं॥ २९॥ वे सब पापोंसे मुक्त होकर अन्‍्त्से स्वगंकी 
यात्रा करते हैं। तथा इसके पढने और सुननेसे अश्वमेघका 
फल प्राप्त होता हैं ॥ २३ || यह श्रीत्रह्माण्डपुराणका कहा 
हुआ भाद्रपदकृप्ण * अजा ? नाप्नी एकादशीका साहात्म्य 
पूरा हुआ ॥ क्‍ 

अथ भाद्रशुह्व एकादशीकी कथा-युधिष्ठिरजी बोले कि, 


| है भगवन्‌ ! भादवेके शुक्छपक्षमं आनवाली एकादशीका 


क्या नाम उसका देवता ओर पुण्य क्या हैं तथा उसकी 
क्या विधि हैं ! इसको आप विस्तृत वणन कीजिय । ।१॥ 
श्रीकृष्णजी महाराज बोले कि, हे युधिप्ठिर ! में तुम्हें 


, १ गौतमः । 


(४५२ ) व्रतराजः | [ एकादशौ- 








बामनेकादरशी राजन्सवैपापहारां पराम्‌ ॥२॥ इमामेव जयन्त्याख्यां म्राहुरेकादशी नप॥ यस्था 
श्रवणमाजेण सर्वेपापक्षयों भवेत्‌ ॥ रे ॥ पापिनां पापशमन जयन्तीत्रतमुत्तमम्‌ ॥ नातः एप 
तरा राजन्न वे मोक्षम्रदायिनी ॥ ४॥ एतस्मात्कारणाद्राजन्कतव्या गातिमिच्छता ॥ वेष्णवे- 
मम भक्तेस्‍्त मल॒जमत्परायणेः ॥ ५ ॥ नभस्ये वामनो येस्त पूजितस्तेजेंगत्रयम्‌॥ पूज़ितं ना 
सन्देहस्ते यान्ति हरिसन्रिधिम्‌॥ ९॥ वामनः पजितो येन कूमलः कमलेक्षणः ॥ नभस्यतसित- 
पक्षे तु जयन्त्येकादशीदिने ॥ ७ ॥ तेनाचित जगत्सवे त्रयो देवा; सनातनाः ॥ एतस्मात्का- 
रणाद्राजन्करतव्यो हरिवासरः ॥ ८॥ अआस्मिन्‍्कृते न कतेव्यं किख्विद्स्ति जगन्नये ॥ अस्थां 
प्रसुत्तो भगवानेत्यड्रपरिवर्तनम ॥ ९ ॥ तस्मादेनां जनाः सर्वे बदन्ति परिवातिनीम्‌ ॥ युधि- 
छिर उवाच ॥ संशयोएस्ति महान्महां श्रूयतां च जनादेन ॥ १० ॥ कथं खुत्तोड्सि देवेश कर्ष 
यास्यड्रवतंनम ॥ किमर्थ देवदेवेश बालिबद्धस्त््यासुरः ॥ ११॥ संतुष्टाः प्रथिवीदेवाः 
किमकुवंजनादन ॥ को विधिः कि व्रत॑ चेब चातमोस्यम॒पासताम्‌ ॥ १२ ॥ त्वयि सुप्ते जग- 
न्राथ कि कुरवेन्ति जन प्रभो ॥ एतद्विस्तरतों बृहि संशय हर में मभो ॥ १३ ॥ श्रीकृष्ण 
उवाच ॥ श्रूयतां राजशादूल कथा पापहरां पराम्‌ ॥ बालिव दानवः :३७/९५५४७॥ ४ तप 
॥१४॥ अपूजयच्च मां नित्य मद्धक्तो मत्परायणः ॥ जपेस्तु विविधेः सूक्तेयेजते मां स नित्यशः 
॥ १५॥ द्विजानाँ पूजको नित्यं यज्ञकमंकृताशयः ॥ परन्त्विन्द्रकृतद्वेषो देवलोकमजीज- 
यत्‌ ॥१६॥ मद्त्तामिह लोकश्व जितस्तेन महात्मना ॥ विलोक्य च्‌ ततः सर्वे देवाः संहत्य मत्त- 
यन्‌ ॥१७॥ सवर्भिलित्वा गन्तव्य॑ देव॑ विज्ञापितु प्रश्युम ॥ ततश्व देवकषिशिः साकमिन्द्रों गतः 
प्रश्ुुम ॥, १८ ॥ शिरसा हावनीं गत्वा सतत इन्द्रेण सक्तिभिः ।! गश॒ुरूणा देवतेः साथ बहुधा 
पुजितो ह्हम ॥ १९ ॥ ततो वामनरूपेण हावतीर्णश्व पश्चवमः ॥ अत्युग्ररूपण तदा स्वेबल्माप्ड- 
रूपिणा ॥ २० ॥ बालकेन जितः सो5थ सत्यमालम्ब्ध तस्थिवान्‌ ॥ युधिष्ठिर उवाच ॥ त्वया' 


महापुण्य फछको दनेवाी बामन एकादशीकी स्वगमोक्ष | होकर कया किया सोभी कद्दो ॥ १२॥ है प्रभो ! आपके द 
दायिनी कथाका वर्णन करता हू ॥ २ ॥ हे राजन्‌ ! इसी | सोजानेपर मन्नुष्य क्या करते है ! इसको आप विस्वासस 


एकादशीको जय॑त्रीभी कहते हैं, जिसके श्रवणमात्रस' सब॑ 
पाषोंका क्षय होता हैं ॥ ३ ॥ पापियोंका पाप नाश करने 
ओर मोक्ष दनमे इससे उत्तम कोइ दूसरा ब्रत नहीं है।।४४ 
इसलिये मेरेमें लग रहनेवाल वेष्णव भक्तोंको शुभगति प्राप्त 
करनेक वास्ते यह ज्ञत करना चाहिये ॥ ५ ॥ आद्रपदम 
जिसने वामन भगवानकी पूजा की उसने तीनों जगदकी 
पूजा की ओर वे निःसन्देह वेकंठमे चले जाते हैं ॥६॥ 
भादवेके शुक्लपक्षमं जिसने कमछ नयन वामन मगवानकी 
कमछॉसे जयंती एकादशीके दिन पूजा की।७॥उसके द्वारा 
तीनों जगत्‌ तथा तीनों सनातन देवॉकी पूजा होती हे, इस- 
लिये इस एकादशीका ब्रत अवश्य करना चाहिये ॥ ८॥ 
इसके करनेपर फिर कुछ करना बाकी नहीं रह जाता. 


क्योंकि इसदित शयन करते हुए भगवान्‌ अपनी करवट 


.. बदते हैं ॥९ ॥ इसलिये इसको छोक परिवर्तिनीभी कहते 
बिक कु ७ 

ह्ं। युधिष्ठिरजी ४ है भगवन्‌ जनादून ! मुझ बढा 

 सैशय है उसको सुनिय ॥१०॥ हे देवदेव ! आपने क्‍यों 

. शयन किया और करवट बदली और क्‍यों आपने बलि 

असुरको षकडो विव्के न ११॥ चातुमोस्यके ब्रत करनेवालोंको 

इसकी घेका वर्णन करो। हैं जनादेन ! बआाह्मणोने संतुष्ट 


कहकर मरा संशय दुर करो ॥ १३ ॥ श्रीकृष्णजी बोढ़े 
कि, हे राजन ! आप इस पापहारिणी कथाका श्रवण 
करो, त्रेतायुगमें बलिनामक एक पवित्र दानव हुआ या 
॥ १७ ॥ वह मेरा भक्त मेरी भक्तिमें परायण होकर 
अनेक जपतपोंस मेरी नित्य अचना करता था ॥ १५॥ 
सदा त्ह्मणोंका पूजन करनेवाढा तथा नित्यही यज्ञकमडी 
करनेवाढा था। किंतु इन्द्रके ढ्ेबसे उसने देवलोकभी 
जीत लिया ॥ १६॥ जब उस महात्माने मेर दिये हुए 
इस देवछोककों भी जीवलिया तब सब देवताओंने 

मिलकर सलाह की कि, | १७ || भ्गवानके पास हम. 
सब लोगोंको यह सूचित करनके छिये जाना चाहिये। 
तब देव ओर ऋषियोंको साथ लेकर इन्द्र मुझ प्रभुक पास 
आया ॥ १८ ॥ उस प्रृथ्वीपर जाकर इन्द्रने शिरसे खुधि 
की तथा बृहस्पति वा अन्य देवत्ाओंके साथ मेरी 
अनेकबार पूजा की | १९॥ तब मेने पत्चम वामन रूपड 
अवतार छिया । जो बहुत भर्यंकर तथा तद्यांडरूपीही था 
॥ २० ॥ तबसे सत्यवादी उसको सुझ बालकने जीव डिया 
यह बाल प्रसिद्ध हुईं ॥ युधिष्ठिरजी बोले कि महा" 


१ सासिति शेषः | 


छू 





(४५३ ) 











अआयायााशाशााभानाा आना नाता का मदन बनाता दा दमा ना पादप ता का ताप दाल ता का दादा नया नाप पता ताक ए परतनादाा/ कप पाता दपातादताधनाधालअदा/ कान भादााउता/ जप वादराधा तन य यन्‍काव के: "नाप मास्क शतक भा दा आज व 0 चला अप पकत पकवान तालाएला45+० तक त्रक लावा कला दाद 


कह 





॑ए॑एओओ 


वामनरूपेण सोधसरश्व जितः कथम्‌ ॥ २१ ॥ एतत्कथय देवेश महां भक्ताय विस्तरात॥श्रीकृष्ण 
उवाच ॥ मयाइलीकेन स बालिः प्रार्थितो बटुरूपिणा ॥ २२॥ पदत्रयमितां भार देहि मे शुवन- 
त्रयम्‌ ॥ दत्त भवति ते राजन्नात्र कायो विचारणा ॥ २३॥ इत्पुक्तश्न मया राजा दत्तवाशखि- 
पदां खुवम्‌ ॥ संकल्पमात्रादिवृ्धे देहस्त्रोविक्रमः परम्‌ ॥ २४ ।| भूलोके तु कृतों पादौं ऋुबलोके 
तु जातुनी ॥ स्वलेक तु करटिं न्‍्यस्थ महलोंके तथोदरम्‌ ॥ २५ ॥ जनलोके तु हृदय तपो- 
लोक च कण्ठकम्‌ ॥ सत्यलोके सुख स्थाप्य उत्तमाड़ं तथोध्वेतेंः ॥ २६॥ चन्द्रसूयंग्रहाश्ेष 
भगणो योगसंयुतः ॥ सेन्द्राश्वेव तदा देवा नागाः शोषादयः परे ॥ २७॥ अस्तुवन्वेदसंभूतेः 
सूक्तेश्व विविधेस्तु माम्‌ ॥ करे ग्रददीत्वा तु बलिमब्॒वं वचन॑ तदा ॥२८॥ एकेन पूरिता 
पृथ्वी द्वितीयेन त्रिविष्टपम्‌ ।। तृतीयस्य तु पादस्य स्थान देहि ममानध ॥ २९॥ णवमुक्ते 
मया सो5पि मस्तके दत्तवान्बलि! ।। ततो वे मस्तके छोक॑ पर दत्त मया तदा ॥ ३० ॥ 
क्षिप्तो रसातले राजन्दानवो मम पूजकः॥ विनयावनतं दृष्दा प्रसन्नोप॥स्मि जनादनः ।। ३१ ॥ 
बले बसामि सततं सत्रिधो तब मानद॥ इत्यवोचं महाभागं बालिं वेरोचनिं तदा ॥ रे२ ॥ 
नभस्यशुक्कपक्षे तु परिवार्तिनि वासरे ॥ ममेका तत्र मूर्तिश्य बलिमाश्रित्य तिष्ठति ॥ रेरे ॥ 
द्वितीया शेषपृष्ठे वे क्षीराब्धो सागरोत्तमे ॥ सुप्ता मवति भो भूप यावच्चायाति कार्तिकी ॥३४॥ 
एतस्मात्कारणाद्राजन्कतेव्येषा प्रयत्तनतः ॥ एकादशी महापुण्या पवित्रा पापहारिणी ॥ रे५॥! 
अस्यां प्रखुततो भगवानेत्यड्रपरिवतनम्‌ ॥ एतस्यां पूजय्रेदेवे त्रेलोक्यस्य पितामहम्‌ ॥ ३२६॥। 
दधिदान प्रकतेव्य रोप्यतण्डुलसंयुतम्‌ ॥ रात्रौ जागरण कृत्वा मुक्तो भवति मानवः ॥ ३७ ॥ 
एवं यः कुरुते राजन्रेकादव्या ब्रतं शुभम्‌ || सर्वपापहरं चेव आुक्तिमृक्तिपदायकम्‌ ॥ र२4 ॥ स 
देवलोक॑ संप्राप्य श्राजते चन्द्रमा यथा ॥ श्रणुयाश्ेव यो मत्यः कथा पापहरां पराम्‌अश्वम घ॒- 





हक ऋश॥ 3७ 
राज ! आपने वामन रूप घरकर किस प्रकार उस असुरको | जगह अपना मस्तक आगे करदिया । तब मेने उसके मस्त- 


जीता ४२१॥ हे देवेश | इसको आप विस्तारसे मुझ भक्तको 
वर्णन करिये । श्रीकृष्णजी बोले कि, डस बलिस मेंने बाढ- 
क॒का रूप घारण करके यह मिथ्या पग्राथना की !२२॥ कि, 
है राजन्‌ ! आप बड दानी हैं इस लिये आप मुझे तीन 
कदम भूमिका दान करो उससे तीनों छोक दिये होजायंगे 
इसमें विचार न करियेगा ॥२३॥ इतना सुनकर उपघने मुझे 
त्रिपदा भूमिका दान किया। मेरा त्रिविक्रम शरीर संकल्प 
मात्रहीस बढने छगा ॥ २४ ॥.भूलोकमें चरण, भ्रुवर्धोकर्मे 
गोडे ओर स्वलॉकर्म कटिको रखकर महलांकर्म उद्र धारण 
किया ॥२५।॥| जनछोकमें हृदय, तपोछोकमें कंठ, सत्यछो- 
कमें मुख, स्थापित कर ऊपरकी ओर शिर किया ॥ २६ ॥ 
घांद, सूये, सारे ग्रह, तारागण, इन्द्र, देव, शेषादिक नाग 
॥२७॥ इन सबोने अनेक प्रकारकी वेदिक स्तुतियोंसे मुझे 
भगवानकी अनेकों प्राथनाएं कीं । तब मेने बलिका हाथ 
पकड़कर यह कहा ॥ २८॥ कि, हे राजन ! एक पेरसे मेंने 
बध्वी और दूसरेसे ऊपरके छोक रोकलिये | हे भनघ ! 





.. अव तुम तीखरी कदम भूमिके वास्ते मुझे ओर स्थान दो 
. ॥ २९ ॥ यह सुन राजा बलिने मेरे तीसरे पेरकी भूमिकी 


आल लललुु_ बल बालप्रनल जलती लल कक नकल किक ली अड कल न लीक लि लि किक लक तल जनक बज अकबर ॥॥आल्‍ल्‍७७७७७७७७७७॥७७/एशआश/श/श/शआआआ॥७४७७७७७४७ए७ए८ 


कपर एक पेर रक्खा ॥३०॥ हे राजन ! उस मेरे भक्त दान- 
वको मैने पाताल्में फेंक दिया, तोमी उस विनीत जानकर 
बहुत प्रसन्न हुआ ॥३१॥ तब उस मानके देनेवाले बरोचनि 
बढिको मेंने कहा कि, हे बले ! में तुम्हार निकट निवास 
करूंगा ॥३२॥ भादशुक्धा एकादशीके करवट बदलनेके दिन 
मेरी एकमूत्ति बलिका आश्रय लेकर विराजमान होती हैं 
॥३३॥ दूसरी मूत्ति, क्षीरसमुद्रमें शेषके प्रष्ठपर होती हैं । 
है राजन! जो कात्तिकी पूर्णिमातक शयन करती हुई रहती 
है ॥३४॥ इसलिये है राजन्‌ ! महापुण्य, पवित्रा और पाप- 
हारिणी इस एकादशीका ब्रत करना चाहिये ॥ ३५ | इस 
दिन सोते हुए मगवान्‌ अपना अंगपरिवत्तन करते हैं, इस 
दिन विछोकीपति सगवानका पूजन करे ॥३६॥ चांदी झोर 


चावढके साथ दहीका दान करे, रातमें जागरण करे तो वह 


मनुष्य मुक्त होजाता है ॥३७॥ इस ग्रकार हे राजन ! जो 
भोग और मोक्षकी देनेवाली तथा पापनाशिनी एकादशीको 
करता है ॥ ३८ ॥ बह देवलोकर्म जाकर चन्द्रमाके समान 
शोभित होता है ।। और जो इसकी पापनाशिनी कथाका 





१ कृतसिति शेषः । 


(४५४ ) ब्रतराज३ । [ एकादशी- 
नम कक नम नम डिक कफ मनन न्‍ कक 
सहस्रस्य फल प्राम्नोति मानवः ॥ ३९ ॥ इते श्रीस्कन्दपुराणे भाद्रपदशुक्लायाः परिवर्तिनी- 
नामेकाददया माहात्म्यं समाप्तम्‌ ॥ क्‍ 
अथाश्विनकृष्णेकादशीक$था ॥ 
युधिष्ठिर उवाच ॥ कथयस्व प्रसादेन ममाग्रे मधुखूदन ॥ आखिने क्ृष्णपक्षे तु किनामेका- 
दशी मवेत्‌ ॥ १ ॥। श्रीकृष्ण उवाच ॥ आशिनस्यासिते पक्षे इन्दिरानाम नामतः ॥ तस्या 
ब्रतप्रभावेण महापाप॑ं प्रणययाति ॥ २॥ अधोयोनिगतानां च पितृणां गतिदायिनी ॥ श्रणुष्वा- 
वहिलो राजम्कथां पापहरां पराम्‌ ॥ ३े॥ यस्याः श्रवणमात्रेण बाजपेयफलं लमभेत्‌ ॥ पुरा कृत- 
युगे राजा ब॒भूव रिपुसू्‌दनः ॥ ४ ॥ इन्द्रसेन दाते ख्यातः पुरी माहिष्मतीं प्रति॥सराज्य॑ पाल- 
यामास धर्मेण यशसाम्वित/ापृत्रपोत्रसमायक्तो धनधान्यसमन्वितशमाहिष्मत्यधिपो राजा 
विष्णुभक्तिपरायणः ॥ ६॥ जपन्‌ गोविन्दनामानि म॒क्तिदानि नराधिपः ॥ध्यानेन काल नयति 
नित्यमध्यात्मचित्तकः ॥ ७ ॥ एक्स्मिन्‌ दिवसे राशि सुखासीने सदोगते ॥ अवतीयोगमद्धी- 
' मानम्बरात्रारदों मुनिः ॥ ८ ॥ तमागतमभिभेक्ष्य ःप्रत्युतथाय कृताअलिः ॥ पूजयित्वाधवि- 
घिना चासने संन्‍्यवेशयत्‌ ॥ ९ ॥ सुखोपविष्टः सः मुनिः प्रत्युवाच नृपोत्तमम्‌ ॥ कुशल तब 
राजेर्ध सप्तस्‍्वड्भेषु बर्तते ॥ १० ॥ धर्में मतिवंतंत ते विष्णुभाक्तेरतिस्तथा ॥ इति वाक्य तु 
देवर्षे: श्रुत्वा राजा तमबबीत्‌ ॥ ११॥ राजोवाच ॥ त्वत्मसादान्मुनिश्रेष्ठ सबंध कुशल मम ॥ 
अद्य कत॒क्रियाः सर्वा+ सफलास्तव दर्शानात्‌ ॥ १२॥ असादं कुरू विप्रर्ष ब्रुद्मागमनकारणम्‌॥ 
इति राक्षो वचः श्र॒त्वा देवषिंवाक्यमबबीत्‌ ॥ १३॥ नारद उवाच ॥ श्रूथतां राजशादूल मद्गबचो 
विस्मयप्रदम्‌ ॥ ब्रह्मलोकादहं प्राप्तो यमलोक॑ द्विजोत्तम ॥ १४ शमनेनाचितो भकत्या उप- 
विष्टो वरासने ॥ धमंशीलः सत्यवांस्तु भास्करिं समुपासते ॥ १५॥ बहुपुण्यप्रकर्तों च ब्रत- 
वेकल्यदोषतः ॥ समभायाँ आाद्धदेवस्य मया दृष्ठः पिता तव ॥ १६॥ कंथितस्तेन संदेशर्स्त 
निवोध जनेश्वर ॥ इन्द्रसन इति खू्यातो राजा माहिष्मतीप्रभुः ॥ १७ ॥ तस्थाम्रे कथय बहन 














श्रवण करता है वह मनुष्य सहख्र अश्वमेघ यज्ञक॑ फछको । दिन सभाके अदर सुखस बेठे हुए राजाके सम्मुख _आका- 


पाता है ॥ ३५९ ॥ यह श्रीसकन्द्पुराणका कहा हुआ भाद्रपद्‌ 
शुक्ला परिवर्तिनी एकादशी का साहात्म्य पूरा हुआ || 


. झअथ आश्रित कृष्णा एकाद शीकी कथा -युधिष्ठि एजी बोले 
कि, हे भगवन मचुसुदन ! आश्विनमासके कृष्णपक्षकी एक्रा 
दक्षीका नाम और विधि क्‍या हे इसका मेरे आगे वणन 
करिये ॥१९॥ श्रीकृष्णजी बोले कि, हे युधिष्ठिर ! आश्विनके 
क्रप्णपक्षकी एकादशीका नाम इन्द्रा है जिसके ब्रतसे 
सहापापभी नष्ट होते हैं ॥९॥ हे राजन्‌ | इसकी पापना- 
'शिनी कथाकों सावधान होकर सुनो, जिसके प्रभावस्े 
'अधोगतिको प्राप्त भी पितगण शुभगति प्राप्त करते हैं ॥३॥ 
. जिसके श्रवण मात्रस वाजपेययज्ञका फल मिलता हे, पहले 
.. सत्युगमे रिपुओंका मारनेवाढछा एक राजा था ॥४॥ बह 
, अपनी माहिप्मती पुरीमे इन्द्रसेनके नामसे विख्यात था। 
व्रह् अपने राज्यको धर्म ओर यशसे पालन करता था ॥५॥ 
बह साहिष्मतीपुरीका राजा पुत्र, पोत्र, धन धान्यसे सम्पन्न 
ओर विष्णु भक्तिमं छीन रहता था ॥ ६ ॥ है राजन्‌ ! वह 
भगवानक मुक्ति देनवाले नामोंका जाप करते हुए अध्या- 


शसे उतरकर मुनि नारदजी आ पधारें॥|८॥ उनके आने 
पर राजाने उठ, हाथ जोडकर अर्घ विधिसे पूजन कर 
आसनपर बिठा दिया ॥९॥ आरामसे बैठ जानेपर मुन्नि 
राजासे पूछा कि, हे राजेन्द्र | आपके सप्तांगर्म कुशल वो 

॥ १० ॥ हे राजन ! आपकी धर्ममें प्रीति और विप्युमें 
भक्ति तो हे? नारदजीके ये वचन सुन, राजाने उत्तर 
दिया कि, हे देवर्षे | आपकी क्ृपासे यहाँ सब कुशछ ६ | 
आज आपके दशेनसे मेरे समह्त यज्ञ सफल होगये हू 
॥ ११-१२॥ है ऋषिराज ! आप अपने यहां पधारनका 


कारण कृपाक रके बताइये. यह सुन देवर्षिन उत्तर दिया 
॥ १३॥ ऋरदजी बोले कि, हे राजन्‌ ! आप मेरी श्स 
आश्चर्य करनेवाली बातको सुनिये कि, में जद्वलोकको एक 
समय घचलागया॥ १४॥ घमंराजका सत्कार पा करक मे उत्तम 
आसनपर बैठा | धर्मशीर सत्यवान्‌ तो भाम्करि यमकी 
उपासना करते हैं ॥१५॥ उस धर्मंराजकी समामें मैंने तुम्हारे 
पुण्यवान्‌ पिताको भी किसी ब्रवको न करनेक दोषसे 
देखा ॥ १६ ॥ उसने जो सन्देश कहा है उसको 

इन्द्रसेन नामका माहिष्मती नगरीका एक विख्याद राजा 


सचिन्वाके घ्यानमें अपना समय बिताता था॥ ७ ॥ एक | है॥१७। हे जक्षन्‌ | उसके आगे जाकर कह्दना कि; कि 


फ््ा 


श्रतानि, ] धाषाटीकासमेलः । 


, हिवत माँ यमबत्रिषों ॥ केनाजि चन्तरायेग पूवेजन्मोद्रवेन वे ॥ १८ ॥ स्वर्ग प्रेषय माँ पुत्र 

इनिदिशब्रतदावतः ॥ इत्युकोईह समायातः समीर तव पार्थिव ॥ १९ ॥ पितुः स्वर्गतयें राज- 
' ब्रिन्िराव्रतमाचर ॥ लेत ब्रतप्रभावेग स्त्री याध्यति ते पिता ॥ २५॥ राजोवाच ॥ कथयस्व 
प्रतादेन मगवत्रिन्दिरात्रतनम्‌ ॥ विबित। केन कनेव्यं कस्मिन्पक्षे तिथो तथा ॥ २१ ॥ नारद 
उवाच ॥ शगु राजन हित॑ वच्मि ब्रतस्‍्यास्य विधि शुभम ॥ आशिनस्पासिते पक्षे दशमीदि- 
बसे शुन्ते ॥ २२ ॥ प्रातः स्वाने प्रकुर्तवीत अ्रद्वायु केत चेतस। ॥ ततो मध्याहसमये स्नान कृत्वा 
बहिन ॥ २३॥ पितृर्णा त्रीतये आद्धृं कृपोच्छुद्टासमव्रिन्तः ॥ एकमक्ते ततः कृत्वा रातों 
भूपो शपीत च ॥ २४ ॥ प्रभाते विमल जाते प्रात्ते चेकाइशीदिने ॥ सखअक्षालन कुर्यादन्त- 
घधावनपूर्वेकंपत्‌ ॥ २५ ॥ उपव्ापतस्य वियम गद्दीयद्धक्रिमावतः ॥ अद्य स्थित्वा निराहारः सवबवे- 
भोगविवर्जित: ॥ २६ ॥ श्वो भोक्ष्ये पुण्डरीकाश्ष शरणं में भवाच्युत ॥ इत्येव नियम कृत्वा 
मध्यहसमये तथ। ॥ २७ ॥ शालप्रामशिलाग्रे तु आद्ध ऊत्वा यथाविधि॥ मोजयित्वा द्विजा- 
उछुद्वान्दसिगानि: खुपूजितान्‌ ॥ २८॥ पितृरोब समात्राय गवे ददण्चाद्विचक्ष गः ॥ पूजयित्वा 
हपीकेशं धूपगंधादिभिध्तथा ॥ २९ ॥ रात्रो जागरणं कुयोत्केशवस्य समीपतः ॥ ततः प्रभात- 
समये संप्रात्ते दादशीदिने ॥ ३० ॥ अचंथित्वा हारे भक्त्या भोजविंत्वा द्विज्ञानथ ॥ बन्धु- 
दोदित्रउ॒त्राद्रेः स्तये सुद्खधीत वाग्यतः ॥ ३१ ॥ अनेन विजिना राजन्कुछ ब्रतमतनिद्रितः । विष्णु- 
लोह प्रयाध्यत्ति पितरस्तव भूपते ॥ ३२॥ इत्युक्त्वा नृरति राजन सुनिरस्तरवीयत ॥ 
यवोक्तवित्िना राजा चकार ब्रतप्तत्तमम्‌ ॥ ३३.॥ अन्तःपुरेण सहितः पुत्रदवत्यस मम्वितः ॥। 
कृते बने तु कौन्तेय पुष्पवृह्टिरभूद्िवः ॥३४॥ तत्वित। गहदारूदों जगाम हरिमन्दिरम्‌ ॥ इन्द्र- 
सेनोएपि राजर्षि: कृत्वा राज्यमकण्टकम्‌ ।रे५॥ राज्ये निवश्य तनय॑ जगाम विदिव स्वयम्‌ ॥ 
इन्दिराग्रतमाहात्म्पे तवांग्र कथितं मथा ॥ ३६ ॥ पठताचव्छ्रणाच्चास्य सर्वपापेः प्रसुच्यते ॥ 
सुक्त्वेह निखिलान्भोगान्विष्णुलोके वसेखिरम्‌ ॥ ३७ ॥ इति श्रीक्ह्रवेबतेपुराणे आखश्विनकृष्णे- 
कादश्या इन्दिरानाम्न्या माहात्म्यं समाप्तम्‌ ॥ 


( ४५९५ ) 





न न 
पूरे जन्‍्मके पापसे तुम्हारा पिता यमराजकी सभामेंह॥१८॥ | णोंको दक्षिगा देकर भोजन करावे ॥ २८॥ विठशेबको 
इसड़िये हे पुत्र | तुम मुझे इन्द्रिका व्रत करके स्वगमे | सूंघकर गौको खिलावे | धूप, गन्ध आदिख भगवानकों 
भेज दे । हे राजन्‌ ! सा सुनकर में तुमारें, पास आया हूँ | पूजा करें ॥ २९॥ रातमें भंगवानके समीप जागरण करे 


॥ १९ पिताकोी शुब्स्व॒गगतिद्न वास्‍्ते हे राजन्‌ ! आप 


इन्द्रिके ब्रतको करो, जिसके प्रभावसे तुम्हारे पिता स्वगे 


में चढ़े जांयगे ॥ २० ॥ राजाने कहाकि, हे. भगवन्‌ | उस 
इन्द्रा ब्रतको किस पश्चम और तिथिसें करता चाहिये। 
ये सब बातें एवं उसकी विधि कृपाऋर मुझसे वणन करिये 
॥ २१ ॥| नारदजी बोले कि, हे राजन ! में इसकी शुभ 
विधिको तुम्हें कदता हूँ कि, आश्रित क्ृष्णपश्च को दश्वमोके 
. दिन प्रातःकाल श्रद्धायुक्त मनसे स्नान करे । और मध्याह 

समयम जलछूके बाहर स्तान करे. ॥२२॥२३॥ श्रद्धाके साथ 
पितरोंक[ श्राद्ध करे । एक समय भोजनकर रातमें भूमिरर 
शयन कर ॥ २४ ॥ दूसर दिन एकादशीके आतःकाढमें 
मुख घो कर दन्‍्तधावन करें ॥ २५४ मक्तिभावस उपवाद्ध 
करने “नियम घारण करे कि, में आज'निराहार रहइुर 
खब + |) स दूर रहेगा ॥२६॥ में कछ भोजन करूंगा, 
इसढिय है भ्रगवन्‌ ! आप सेरी रक्षा करो, म आपकेशरण 
हैं. ऐसा नियम करके मध्याह रे समयमें | २७ । शाहि- 


प्रामकी शिछाक आगे विधिपूरवक आड़ करे, पूल्य ब्राश्म- 


और द्वादशीके दिन प्राठःकाछ ॥ ३० ॥ भ्रक्तिस भगवान्‌ 
का पूजन और ब्राह्मणोंको भोजन करावे । पीछे चुपदहोकर 
बन्धुवान्धवों के साथ स्त्रय भोजन करे ॥ ३१॥ इस रीति 
सहे राजन! विधिपूर्वक इस ब्रतको करनेस तुम्हारे पितर 
छोग विष्णुछोकमें निवास करेंगे ॥३२॥ है राजन्‌ ! इस 
प्रकार कहकर मुनि अन्तर्ध्यान होगये । राजाने बताई हुईं 
विधिसे रानी और नौकर आदिके साथ उस उत्तम व्रवकों 
किया। हे युधिष्ठिर ! इस ब्रतके करनेपर उस राजापर 
स्वरगसे पुप्पवृष्टि हुईं ॥३३॥३४॥ उसका पिता गरुड पर 
चढकर वेकुण्ठमें चछा गया और राजा इन्द्रसन भी धम्मसे 
निष्केटक राज्यकर अपने राज्यभारको छडकेपर रख स्वये 
भी स्वगेम चढछागया[। यह इन्द्रिका माहात्म्य तुम्हारे 
सामने वणन कर दिया ॥३०५॥३१६॥ उसके पढने और 
सुननेसे सब पायोस छूट जाता है। इस लोकमें सब सोगों 
को भोगकर अन्तर्मं विष्णुकोकमें चिरकालतक निवास 
करता है ॥३७॥ यह श्री ब्रद्मवैवत्तयुरागक्ना कहा हुआ 
आश्विनकृष्णा इन्द्रि नासकी एकादशीका माहात्म्य 


पूरा हुआ ॥ 


्क 


( ४५६ ) ब्रतेराजई | _ एकादशौ- 











अथ आधशिनशुक्लेड्रादशीकथा ॥ 


पुधिष्िर उवाच ॥ कथयस्व प्रसादेन भगवव्‌ मधुखुदन ॥ इषस्य शुक्कपक्षे तु किनामैका- 
दशी भवेत्‌ ॥ १ ॥ श्रीकृष्ण उवाच ॥ शरण राजेन्द्र वक्ष्यामि माहात्म्य पापनाशनम्‌ ॥ शुक्कपक्षे 
चाश्वयाजि भवेदकादशी तु या 0२॥ पाशाडकुशोते विख्याता सर्वपापहरा परा ॥ पद्मनाभाति- 
धान॑ तु पूजयेत्तत्र मानवः॥३॥ सर्वांभीष्टफलप्राप्प्ये स्वरगमोक्षत्रदं नृणाम्‌ ॥ तपस्तप्त्वा नरस्तीव्र 
चिरं सुनियतेन्द्रियः ॥ ४॥ यत्फलं समवाप्नोति ते नत्वा गरूडध्वजम्‌ ॥ क्ृत्वापि बहुशः पाएं 
. नरों मोहसमन्वितः ॥५॥ न याति नरक घोर नत्वा पापहरं हरिम्‌॥ प्रथिव्यां यानि तीर्थानि पुण्या- 
न्‍्यायतनानि च॥ ६॥ तानि सर्वाण्यवाप्नोति विष्णोनोमालुकीलतनात ॥ देव॑ शाड्रधरं विष्णु 
थे प्रपत्ना जनादनम्‌ ॥ ७ ॥ न तेषां यमलोकश्व नणां वे जायते क्चित्‌ ॥ उपोष्येकाद शीमेकां 
प्रसड्रेनापि मानवाः ॥८॥ न यान्ति यातनाँ यामी पाप कृत्वापि दारूणम्‌ ॥ वेष्णवः पुरुषो भूत्वा 
शिवनिन्दां करोति यः ॥ ९ ॥ यी निनदेद्रेष्णवं लोफे स याति नरक धुवम्‌ । अश्वमेघसहल्लाणि 
राजसूयशतानि च ॥ १० ॥ एकादश्युपवासस्य कला नाहन्ति षोडशीम्‌ ॥ एकादशीसमं पृण्य॑ 
किंविल्लोके न विद्यते ॥ ११ ॥ नेहशं पावन किंचितद्िवृ लोकेयुँ विद्यते ॥ यादर्श पद्मनाभस्य दिन 
पातकहानिदम ॥ १२ ॥ तावत्पापानि तिष्ठन्ति दहेस्मित्‌ मलुजाथिप ॥ यावत्रोपोष्यते 
भकक्‍्त्या एदल्यनाभदिनं शुभम ॥ व्याजेनोपोषितमपि न दशेयति भास्करिम ॥ १३॥ स्वगंमोक्ष- 
प्रदा होषा शरीरारोग्यदायिनी ॥ सुकलत्रप्तता होषा धनधान्यप्रदायिनी ॥ १४॥ न गड्ढा ने 
गया राजन्न काशी न च पुष्करम्‌ ॥ न चापि कौयवं क्षेत्र पुण्य भूप हरेदिंदगात्‌ ॥ १५॥ राशे 


जागरण कृत्वा समुपोष्य हरेदिनम्‌ ॥ अनायासेन भूपाल प्राप्यते वेष्णवं पदम्‌ ॥ १६॥ दश 
वे मातृके पक्षे दश राजेन्द्र पेत॒ुके ॥ श्रियाया दश पक्षे तु पुरुषालुद्धरेन्नरः ॥ १७ ॥ चतुझुजा 


दिव्यहणा नागारिकृतकेतनाः ॥ स्रग्विण: पीतवस्थाश्व प्रयान्ति हॉरिमन्दिरिम्‌ ॥ १4 ॥ 





अथ आश्रिन शुक्ला एकादशीकी कथा-युधिष्ठि'जी बोले | छोकमे बुराई करे, वे घोर नरकमे- जाते हैं। एकादशीके 


कि, है भगवन्‌ ! आशिन शुक्लुपक्ष की एकादशीका क्‍या 
नाम और कया विधि है ? इसको आप क्षृपाकर वर्णन 
करिये ॥१॥ श्रीकृषष्णजी बोढे कि, हे राजेन्द्र ! आश्रिन 
झुक्कपक्ष में जो पापनाशिनों एकादशी होती हे,उसके मादा- 
त्म्यको सुनिय ॥ २ ॥ उसका विख्यात 'पाशांकुशा? नाम 
है, जो सब पापोंको हरता हे । उस दिन पद्मतास भग- 
बानकी पूजा करे | ३॥ उससे सब इच्छाओंकी पूर्ति 
होती हें । तथा स्व ओर मोशक्षकी प्राप्ति होती है, जितेन्द्रिय 
नरको चिर घोर तपको करनेपर जो फल श्राप्त होता ह वह 
फछ भगवानको नमस्कार करनेसे ही होजाता हें) अ्रमसे 
. अनेक पापोंको करकेभी ॥ ४ ॥ ५ ॥ सब पापोंके नाशक 
भगवानको नमस्कार करके घोर नरक नहीं जाता। 
पृथ्वीमें जितने तीये वा .पुण्यस्थान हें ॥६॥ उन सबका 
फल भगवानके नामकीत्तेनसे होता हैँ । जो छोग शाझ्डिधनु- 
दाल़ें जनादन भगवानकी शरणमे है॥ ७॥ उनको कभी 
यमराजके पास नहीं जाना पडता। प्रसंगसेभी जो मनुष्य 
एक एकादशीका उपवास “ करते हैं ॥“८ ५ वे दारुण पाप 
करके भी कभी यमराजकी यातना नहीं उठाते | जो म्रमुष्य 
बेप्णव होकर शिव्रनन्दा करे तो ॥ ९॥ या जो वष्णवक्री 


उपवासकी सोछहवीं कडाकोभी ह्‌ जारों अस्मेघ और 
सेकडों राजपृय यज्ञ नहीं पाखकते, इस एकादशीके समान 
पवित्र और कुछभी नहीं हैं ॥१०॥११॥ इसके सन पवित्र 
करनेवाली वस्तु त्रिडोकीमें कोई नहीं हैं । जैसा कि, पद्म- 
नाभ भगवानका पापनाशक यह दिन हैं ॥१२॥ है राजन्‌. 
पाप तबतक ही देहमें रह सकते हैं, जबतक कि, पद्मत/भर्क 
इस शुभद्नि उपवास नहीं किया जासकता | यदि मूल 
या कपटसभी उपवास करलिया जाय तो फिर यमराज 
दर्शन नहीं होते || १३ ॥ यह स्वग और मोक्षको देंनेवाल 
शरीरके आरोग्यको बढानेंबाली,सुन्दर ख्री और घन पान्वे 
को दनेवाली है ॥। १४ ॥ गेगा, गया, पुष्कर, कुरुक्षत्रत 

काशीतीर्थ भी इस हरिद्निके समान पवित्र नहीं हे ॥१%।॥ 
हे राजन्‌! हरिवासरकों रातके समय जागरण उपदा 
करे, तो उसे सहजहीमें विष्णुछोकको प्राप्ति होजाती कक 
॥ १६॥ माताके दश पीढीके ओर विताके द्श रे 
तथा ख्रीके दृश पीढीके पुरुषों छा वह पापस उद्धार है 
॥१७॥ वे छोग चतुसुजतथा दिव्यरूप घारण करकेगद । 
सवारीसे पीदांबर घारणकर दरिकोकम चेंडेजातेद [९४ 


रथ 


/ भाषाटीकासमेतः । 


(४५७ ) 


|... >ऋननननननन सर स नननन््ण्भ््त्ल्22<2:2222222.......>229»9>>:332232>>>3>> मम 





बालत्वे योवने चेव दृद्धत्वेषपि नृपोत्तम॥उपोष्प द्वादशी नूने नेति पापोइषि दुर्गतिम ॥१९॥ पाशा- 


| 4 आए क्‍लिक 


इ्कशामुपोष्येव आखिने चासितेतरे | 


सर्वपापविनिमुक्तो हरिलोक॑ स गच्छानि ॥ २० ॥ दच्वा 


हेमतिलान्‌ भार्मिं गामन्नसुदर्क तथा ॥ उपानदखच्छत्रादि न पश्याति यम नरः॥ २१॥ यस्य 
पृण्याविहीनानि दिनान्‍्यपगतानि च ॥ स लोहकारभख्रेव श्वसन्नपि न जीवति ॥ २२॥ अवन्‍्ध्यं 
' दिवस कुर्यादरिद्रोएषपि नृपोत्तम ॥ समाचरन्यथाशक्ति स्लानदानादिकराः क्रिया; ॥२५॥ तडागा- 
रामसौधानां सत्राणां पुण्यकमंणाम्‌ ॥ कतारो नेव पश्यानति धीरास्तां ममयातनाम्‌ ॥ २४ ॥ 
दीघायुषो घनादयाश्व कुलीना रोगवर्जिताः || ह्श्यत्त माया लोके पुण्यकत्तोर ३ शाः ॥ २५ 
किमत्र बहुमोक्तेन यान्त्यधर्मेण दुगंतिम॥आरोहन्ति दिव॑ धर्मेर्नात कायो विचारणा॥२६॥ इति 
ते कथितं राजन यत्पृष्टो५ह त्वयानघ ॥ पाशाइकुशाया माहात्म्यं किमन्यच्छो ठॉमेच्छासे॥२ »। 
इहते श्रीक्रह्माण्डपुराणे आविनशुक्केकादश्याः पाशाइ-कुशारूपाया माहात्म्य॑ सम्पूर्णम्‌ ॥ 
अथ कार्तिकऋष्णेकादशीक ॥ ॥ ह 

...युधिष्ठिर उवाच ॥ कथयस्व प्रसादेन मम स्लेहाजनादन॥ कार्तिकस्पासिते पक्षे किनामे- 

कादशी भवेत ॥९॥ श्रीकृष्ण उवाचाश्रूय्ता राजशादूल कथयामि तवाग्रतः ॥ कातिके कृष्ण- 
पक्ते तु रमानास्ती खुशोमना ॥ २ ॥ एकादशी समाख्याता महापापहरा परा ॥ अध्याः प्रसय- 


ड्रतो राजन्‌ माहात्म्य भ्रवदामि ते ॥श॥ मुचुकुन्द इति रूपतों 


बनूव न॒पतिः पुरा ॥ देवेन्द्र 


सम॑ यघ्य मित्र॒त्थममवश्नप ॥ ४ ॥ यमेन वरूणेनेव कुबेरेण सम तथा ॥ विभीषणेन चेतस्थ 
सखित्वममवत्सह ॥ ५ ॥ ॥ विष्णुभक्तः सत्यसन्धो बभुव तपातिर सदा ॥ लस्यव शासतो 


राजन राज्य निहतकण्टकम्‌ ॥ ६९ ॥ बनूव 


दुहिता गहे चन्द्रभागा सरिद्वरा ॥ शोमनाय च 


सा दत्ता चन्द्रसेनसुताय वे ॥ ७ ॥ स कदाचित्समायातः श्वशुरस्य गहे नूप ॥ एकाद शीत्रत- 
मिदं समायात॑ छुपुण्यद्म्‌ ॥ ८ ॥ समागते ब्रतदिने चर्द्रुभागा त्वचिन्तयत्‌ ॥ कि मविष्यति 
देवेश मम भतातिदुबेलः ॥ ९ ॥ क्षुधाँ सोह न शक्तोति पिता चेवीप्रशासनः॥ पटहस्ता वचन 


कं 


है राजन | बाल्य, यौवन वा वार्यक्य किसीभी अवस्धार्से 
इसका उपवास किया जाय तो पापीभी दुगर्गतिको प्राप्त 
नहीं होबा ॥ १९ ॥ आश्रिन कृष्णपक्षकी पाशांकुशाका 
उपवास करके सब पापोसि मुक्त होकर विष्णुलो कम चला- 
जात है ॥ २० || सुवर्णके तिछ, भूमि, गो, अन्न, जूती, 
वस्र और छन्न आदिका दान करके कभी यमराजको नहीं 
देखता ॥ २१ ॥ जिस मनुष्यको पाप करते हुए दिन बीत- 
गये हैं वद छोहारकी धौँकनीके समान साँस छेकर व्यथेद्दी 
त्रीता है ॥ २२॥ स्नान, दान आदि पुण्य कर्सोंसे दरि- 
द्रभी मनुष्य अपने दिनको साथक करें ॥ २३॥ ताढाव, 
सहरू; घमेशाल लथा यज्ञ आदि पुण्य कार्सोंके करनेवाले 
छोग कभी यमयातना नहीं पाते ॥ २४ ५ ऐसे. पुण्यके कर. 
नवाछ लोग दीर्घायु, धनी, कुलीन तथा नीरोग देख जाते 
हैं॥ २५ ॥ अधिक विघ्तारसे क्‍या प्रयोजन है ९ थोडेहीमें 
यह समझता चाहिय कि, धर्मसे स्वंगे ओर पापसे नरकमें 
बसते हैं। इस बातमें किसी तरहके सन्देहका विचारही ज़ 
ऋरना चाहिये ॥ २६ ॥ हे राजन ! तुम्हारे प्रशन करनेपर 
मेने यह पाशांकुशाका माहात्म्य वणन किया हैं अब 

क्या सुनना चाहते हो ॥ २७॥ यह श्रीन्रह्माण्डपुराणका 
कद्दा हुआ आश्ित्त शुद्ध पाशांकुशा नामकी एकादशीका- 
आशय पूरा हुआ !! 


हक 2 


बह रही 


अथ कार्निकक्ृष्णा एकादशीकी हक धिष्ठिरजी बोढ़े 
कि, हे भगवन्‌ ! कात्तिक कृष्णपश्षमें कौनसो एकादशी 
होती हैं? इसको आप मेरे स्नेहसे क्ृपाकरके कहिये ॥९॥ 
श्रीकृष्णजो बोले कि, है राजन्द्र | खुनों, कात्तिकके कृष्ण- 
पक्षकी सुझोभन एकादशीका नाम ' रमा , हैं ॥ ९॥ यह 
रमा एकादशी सब पापोंको हरनंवाछोी हे;हैं राजन्‌ | इसके 
प्रसगागत माहात्म्यकोभी में तुम्हें कहता हूं | ३ ॥ पहले 
मुचुकुंद नामका एक इन्द्रस मित्रता रखनेवाढा राजा हुआ 
था। ४ ॥ उसकी मित्रता न केवछ इन्द्रसेही थी पर यम, 
वरुण,कुबे रके साथभो थी। भक्त विभीषणके साथभी उसका 
भेनत्नीभाव था ५॥ वह राजा बडा वेंप्णव वया सत्यप्र- 
तिज्ञ था, उसके शासनसे सब राज्य सुखी था उसे है 
राजन ! इस प्रकार निःसपत्न राज्य करते | ६ ।॥ उसके 
घरमें च रा नामकी एक पुत्री हुई थी, जो नदीबनकर 
, जिसको चन्द्रसेन नामके एक छुन्दर वरकों 
दानकी थी ॥ ७ ॥| वह कभी अपने श्वशुरक घरमें आया। 
संयोगवश उस दिन पवित्र एकादशीका रिच था ॥ ८४ 


ब्रवके दिनके कारण चन्द्रभावान चिन्ता को कि, हे भग- 
, बन्‌ ! क्‍या होगा ? क्र्योकि, मरे पति अति दुबछ है ॥९॥ 


बह भूख सइन नहीं करसकते, इधर पिताका शासन बहुल 
उम्र है । जिसके राज्यमें दशमीहीके दिन यह ढोछ बजाया 


ब्रलराज: [ एंकादशी- 


(४५८ ) 





यस्‍्य संप्राप्त दशमीदिने ॥१०॥ न भोक्तव्य न भोक्तव्य न भोक्तव्यं हरेदिने॥ श्र॒त्वा पटहनियों! 
शोभनस्त्वजवीत्मियाम ॥ ११ ॥ कि कतेव्यं मया कान्‍्ते ब्रह्मपायं सखुशोभने ॥ कृतेन येन मे 
सम्यग्जीवितं न विनश्याति ॥ १५॥ चन्द्रभागोवाच ॥ मत्पितुर्वेश्मनि विभो भोक्तव्यं नावि 
केनचित्‌ ॥ गजेरश्रेस्तथा चोष्ट्ररन्येः पशुमिरेट च ॥ १३॥ तणमन्ने तथा वारि न भोक्तव्य॑ 
हरेदिने ॥ मानवेश्व कुतः कान्‍्त श्ुज्यते हरिवासरे ॥ १४ ॥ यदि त्व॑ भोक्ष्यसे कान्त ततो 
गेहात्मयास्यताम्‌ ॥ एवं विचाये मनसा खुदढे मानस कुदछ ॥ १५॥ शोभन उवाच ॥ सत्य- 
मेतरूया चोक्त करिष्येपहसुपोषणम्‌ ॥ दवेन विहित यद्वे तत्तथेव मविष्यति ॥ (६॥ इति दि 
माति $त्वा चकार व्रतमुत्मम्‌ ॥ क्षुतृषरापीडिततलुः स बभूवातिदु/खितः ॥ १७ ॥ एवं व्याकु- 
लित तस्मिन्नादित्योउस्तमग।द्विरिम ॥ वेष्णवानां नराणां सा निशा हषेविवर्थिनी ॥ १८॥ हरि 
पूजारतानां च जागरासक्तचेतसाम्‌ ॥ बभूव नृपशादूल शोभनस्यथातिदुःसहा ॥ १९॥ रेझ- 
दयवेलायां शोभनः पश्चवतां गतः॥ दाहयामास राजा त॑ राजयोग्येश्व दाझह॒भिः ॥ २० ॥ चद्ध- 
भागा नात्मदेंहं ददाह पितवारिता ॥ कृत्वोध्वंदेहिक॑ तसय तसथों जनकवेशमनि ॥ २९ ॥ शोम 
. नेन नृपश्रेष्ठ रमाव्रतप्रभावतः ॥ प्राप्ते देवपुरं रम्यं मन्दराचछसालुनि ॥ २२॥ अल त्तममना- 
धष्यमसंख्येयशुणान्वितम्‌ ॥ हेमस्तम्भमयेः सोधे रत्नवेदूय मण्डितेः ॥ २३ ॥ सर्फाटिकार्वेविधा- 
कारोवेचित्रेशपशोमितम्‌ ॥ सिंहासनसमारूठः सुशेतच्छत्रचामरः ॥ २७॥ किरीटकुण्डलयुतो 
हारकेयूर मूषितः ॥ स्तूयमानश्व गन्धर्वेरप्सरोगणसवितः॥ २५॥ शोत्न : शोमते तत्र देवराह- 
परो यथा ॥ सोमशर्मेति विख्यातों मुचुकुन्द॒पुरे बसन्‌ ॥ २६॥ तीर्थयात्राप्रसड्रेन श्रमन विश 
ददर्श सम्‌ ॥ नृपजामातर ज्ञात्वा तत्समीष जगाम सः॥ २७॥ आसनादत्थितः शीक्ष नम 





जाता है | १० ॥ कि, कोइ मनुष्य किसी तरहभी एकाद- 
शीके दिन भोजन न करने पात्रे ॥ उस ढोछकी आवाजको 
सुन उसके पतिने अपनी खरीस कहा ॥ ११ ॥ है सुशोभन ! 
है प्रिये ! मुझ क्या उपाय करता चाहिये ! जिससे मुझे 
दुःख न हो प्राणोंकी रक्षा हो ज्ञाय॥| १२॥ चन्द्रभागाने 
उत्तर दिया कि; हे प्रभो : मरे पिताके घरमें किसीकोभी 
. भोजन नहीं करना चाहिये । यहांतक कि, मरे पिताके 
राज्यमें हाथी, घोड़े, ऊेट तथा अन्यपशुओकोभी !। १३ ॥ 
- घास, अन्न) या पानी नहीं दियाजाता | तब हें पते ! मन्नु 
ष्य तो कंस इस एकादशोके दिन भोजन करसकता हैं ! 
| १७ ॥ यदि है पते |! आज भोजन करनाही चाहते हैं तो 
घरस बाहर चले जाइये। ऐसी बात शोचकऋर मनको हृढ 
कर लीजिये ॥ १५ ॥ शोभनने कहा कि, हे प्रिये ! तुमने 
जो कहा वह सब सुना, मंभसी आज उपवास भरूंगा । जो 
.  होनहार हो वह होगा सो देखाजायगा ॥ १६॥ इस 
प्रकार भाग्यपर छोड कर उसने ब्रत किया । भूख, प्यासस 

 ब्याकुछ होकर वह बडा दुःखी हुआ ॥ १७ ॥ इस प्रकार 
.  'भ्बडाते हुए उस दिन डसे सूये अस्त होगया । वेणवॉके 

* आजन्दुकों बढानेवाली रातक्ा आगम हुआ ॥ १८ ॥ बह 

| रात दरिपुजनपरायण मनुष्योंको जागरण करनेमें आनन्द 

,  जैटानबारू! थीं पर उस झोभनके वास्ते दुःखकारिणीही 
॥ १५ ॥ तृर्योदय होनेके समयही उस शोभ 











नकी भृत्यु होग३। राजाने राजकुमारके दाहयोग्य उत्तमन् 
काए्टसे उसका दाह करादिया ॥ २० ॥ चन्द्रभागानेगी 


अपने पिताके प्रना करनेसे आत्मसमपंण नहीं किया।पितक 


घरमें उसका भ्रा्धकर्म किया गया । चन्द्रभागा पिक्ाकेद्दौ 
घरपर रही।पिताक अवरोधसे सती नहीं हुई॥२१॥ह राजब, 
उच्च शोभनने उस रमसाके ब्रतके प्रभावसे मंदराचढके 
शिखरपर एक उत्तम देवनगर प्राप्त जिया ॥२२॥ जो बहुत 
बढ़िया किसीसे भी न दबायेजानेंवाछा असेख्य सुवणनि- 
मिंत खसोसि बना हुआ अमित सौधोंवाला तथा रलोंसे 
जडाहुआ एवं बेड्ूय्यास पूण मंडित था ॥ २९३ ॥ वहाँफ 
सफद चेँवरोंस ढुहते हुए अनक प्रकारकी स्फटिक 

योसे बनेहुए सिंहासनपर जा बेठा, जिसपर अश्रेतछत्र और 
चामर हुढ रहे थे ॥ २४ ॥ कानोंमें कुंडह और शिरपर 
मुकुट धारण किये था ।गन्धवंगण उसकी स्तुति करने ढ* 
रहे थे और अप्सरायें सेवा करती थीं ।। २५ || उस जगह 
ब्रह शोभन राजा दूसरे इन्द्रकी तरह शोभा पाने लगा।हिक 
सोमशर्माके नामसे विख्यात मुचुकुद नामक नगरमें निवास 
करता था॥ २६॥ एक दिन तीथयात्राके प्रसंग उस 
ब्राह्मणने उस राजाके जैवाइक वहीं दशन किये और 
अपने राजाका जामाता जान समीप चढागया ॥ ९५१॥ 
उसने आसनस शीघ्रही उठकर उस उत्तम द 


ब्रतानि ] भाषादीकासमेलः । ( ४५९ ) 













' अ्रक्रे द्वेजोत्तमम्‌ ॥ चकार कुशलप् अंश्वशुरस्थ त़पश्य च॥ कान्तायाश्रन्द्रभागायास्तथेव 
नगरस्य च ॥ २८ ॥ सोमशमोंवाच | कुशलं वतेते राजज्छशुरस्य गृह तव। चन्द्रमागा कुश- 
लिनी स्वतः कुशल पुरे ॥ २९ ॥ स्ववृत कथ्यतां राजन्नाश्वण परमं मप्त ॥ पुरं विचित्र रूचिरे 
न दृ् केनचित्कचित्‌ ॥ ३० ॥ एतदाचक्ष्व नूपते कुतः प्राप्तमिदं त्वघ।॥ झशोमन उवाच ॥ 
कार्तिकस्यासिते पक्षे नाम्ता चेकादशी रमा ॥ हे१ ॥ तामुपोष्प मया प्राप्त द्विजेन्द्रपरमध॒ वम्‌ ॥ 
धुर्व॑ मवति येनेव तत्कुरुष्व द्विजोत्तम ॥ शे२ ॥ द्विजेन्द्र वाच ” कथमशुवमेतद्धि कर्थ हि 
भवति धरुवम्‌ ॥ तत्तं कथय राजेरद्र तत्कारिष्यामि नान्यथा ॥ र२े३१॥ शोभन उवाच॥ मयेत- 
दिद्वित तरप्र श्रद्धाहीने ब्रतोत्तमम्‌ ॥ तेनेदमशुवम्‌ मन्ये घुंबे भवति तच्छूणु,॥ ३४ सुचुकुन्दस्थ 
दुद्ठिता चन्द्रभागा खुशोभमना ॥ तस्थे कथय बृत्तान्त श्ुवमेतद्धविष्यति ॥ २५॥ तच्छृत्वाथ 
द्विजवरस्तस्थे सर्व न्यवेदयत्‌ ॥ श्रुत्वाथ सा द्विजवचो विस्मयोत्फुछलोचना ॥ ३६॥ प्रत्यक्ष- 
मथवा स्वप्नस्त्वयेतत्कथ्यते द्विज ॥ सोमशमोवाच ॥ पत्यक्ष पृत्रि ते कान्‍तो मया दृष्टो महा- 
बने ॥ २७ ॥ देवतुल्यमनाधृष्य॑ दृष्टं तस्य पुरं मया ॥ अश्ुवं तेन तत्पोक्ते शुर्व भवति तत्कुर 
॥ ३८ ॥ चन्द्रभागोवाच ॥ तत्र मां नय विप्र्षे पतिद््शनलालसाम्‌ ॥ आत्मनो त्रतपुण्येन करि- 
व्यामि पुरं धुवम ॥ ३९ ॥ आवयोदिंज संयोगो यथा भवति तत्कुर॥ माप्यते हि महत्पुण्य॑ 
कृत॑ योगे विम्क्तयोः ॥ ४० ॥ इति श्रुत्वा सह तया सोमशर्मा जगाम ह । आश्रम वामदेवस्थ 


मन्दराचलसन्रिधौ ॥ ४१ ॥ वामदेवो5शणोत्सब ब॒त्तान्तं कथित तयोः॥ अभ्यविश्चच्चर्धभागां 
वेदमन्त्ररथोज्ज्वलाम्‌ ॥ ४२ ॥ ऋषिमन्त्रमभावेण विष्णुवासरसेवनात्‌ ॥ दिव्यदेहा बभूवासों 
दिव्यां गतिमवाप ह ॥ ४३ ॥ पत्युः संमीपमगमत्महषोंत्फुछलोचना ॥ सहषेः शोभनो$तीव इृष्दा 





नमस्कारकी अपने श्वसुर राजारे घरके कुशल प्रइन किये 
तथा अपनी स्त्री चन्द्रभागा और नगरके भी राजी खुशीके 
समाचार पूछे ॥ २८ ॥ सोमशर्माने कहा कि, हे राजन : 
आपके श्वसुरके घरमें सब कुशल हैं। ओर आपको पत्नी 
च॑न्द्रभागाभी आनंदमे हैं और नगरमेमी सब तरहसे कुशल 
है ॥ २९ ॥ हैं राजन ! आप अपना समाचार कहिए मुझे 
बहा आश्रय हैं कि, ऐसी विचित्र और सुदर नगरी कहीं 
किसीने भी नहीं देखी हैं ॥॥ ३० ॥| है नपते | आप इसको 
कहिये कि, यह सब कहांसे मिला हे। शोभनने उत्तरंद्या 
कि, है द्विलनद्र ! कार्तिक कृष्णपक्षकी रसा नामकी एक[- 
दुक्षीके उपबाससे मेन यह विराशी पुर प्राप्त किया है ॥। 


और जिससे स्थिर पुण्यका भोग मिले वेसा यत्न करो 


॥ ३१-३२ || ह्विजेन्द्रन कहा कि, महाराज! धुत ओर 
अप्न॒व किस प्रकार द्ोता है? इसका आप वर्णन करो। में 
उसी तरह करूँगा इसमें झूठ न होगा ॥ ३३ ॥ शोभनने 
कहा कि, मेने यह व्रत बिना श्रद्धाके किया जिससे अधुव 
फल मिला है। अब जिस कमसे धुत्र फलकी प्राप्ति होती है 
उसको सुनो ॥ ३४ ॥ मुचुकुन्द राजाकी चन्द्रभागा सुशो- 
भना पुत्री हे। वह आप जानते ही हैँ उसको जाकर यह 


सब वृत्तान्त कहो तो यह धुत्र फठ हो जायगा ॥ ३५ ॥ 


यह सुनकर उस त्राह्मणन यह सब हाल उस चन्द्रभागाको 
कह दिया ! उसने बडे विस्मयस आंखेंफाडऋर ब्राह्मणके 
बचन सुने और कहा कि ॥ ३६॥ है जाग | आप सब्र 
थे प्रत्यक्षकी बात कहते हैं या कोई स्वप्न हैं ! सोमशर्माने 
उत्तर दिया कि; है पुत्रि ! भन तुम्हारे पतिक्नो महावनर्म 
प्रत्यक्ष देखा है ॥। ३७ # मेन उसका बडा सुदर देवताओं 
का जैसा न डराये जानेवाछा नगर देखा है परन्तु उसन 
यह अध्रुव बताकर स्थायी होनेका यद्द उपाय कहा हें, स्रों 
तुमको करना चाहिए ।। ३८ ॥ चन्द्रभागा बोली कि, हें- 


| महाराज ! आप मुझे वहाँ ले चलिए; पतिके दशन करना 


चाहती हूँ। अपने ब्रतके पुण्यस पत्िके उस वेशवकों ध्रत 
करूँगी ।। ३९ | महाराज ! हम दोनोंका जेंसे संयोग हो 
ऐप्ता प्रयत्न करो | क्योंकि वियुक्त महुष्योंके संयोग करा- 
नेबार्कोंको बडा पुण्य होता है। इसस्र आपकोभी बडा भारी 
पुण्य होगा ॥ ४० ॥ यह सुन सोमशर्मा उसके साथ चल 
दिया। वह उसको मन्दराचलके निक्रट वामदेवक स्थान 
पर लेगया । ४१ | बामदेव ऋषिन उन दोनोंका हाल 
छुनकर उज्बछ चन्द्रभागाका अपने पवित्र वेदमन्त्रोंके 
अमिमनित्रद जछेसे अभिवेक किया ॥ ४२ ॥ ऋषिके मन्त्र 
प्रभावस और एकादशीके उपवाससे वह दिव्यदेह धारण 


६... यनेति ञ्३ 
१ येनेति शष: । 


( ४६० ) बलराजः । [ एकादशी« 





>-##ऋिचऋिऋणऋओंिएऋऋएऋछणंऋछणान_हनसग्ि]ब_णमत_ल्लल्ल्ल2स2स। 


*ंड लाना ऋण न्‍ 
कान्तां समागताम्‌ ॥ ४४ ॥ समाहूय स्वके वामे पा्थें तां संन्यवेशयत्‌॥ सा चोवाच प्रिय 
हर्षाचरद्रभागा प्रिय वचः ॥ ४५ ॥ श्रणु कान्‍्त हित॑ वाक्य यत्पुण्यं॑ विद्यते मयि॥ अष्टव- 
बाधिका जाता यदाहं पित्वेश्मनि॥ ४६॥ मया ततभ्रद्गति च क्ृतमेकादशीत्रतम्‌ ॥ यथोक्त- 
विधिसंयुक्ते श्रद्धायुक्तेन चेतला ॥ ४७ ॥ तेन पुण्यप्रभावेण भविष्यति पुरं धुवम्‌ ॥ सर्व- 
कामसमृद्धं च यावदाभूतसंप्लबम्‌ ॥ ४८ ॥ एव सा नपशादूल रमते पतिना सह ॥ दिव्यप्रोगा 
दिव्यरूपा दिव्याभरणभूषिता ॥ ४९ ॥ शोभनो5पि तया साद्ध रमले दिव्यविग्रहः ॥ रमा्रत- 
प्रभावेण मन्दराचलसाननि ॥५०॥ चिन्तामणिसमा होषा कामधेलुसमाथवा॥रमाप्निधाना नृपते 
लवाग्रे कथिता मया ॥ ५१ ॥ इंदर्श च ब्रतं राजन्‌ ये कुवोन्ति नरोत्तमाः ॥ बह्मेहत्यादिपापानि 
नाश यान्ति न संशयः॥ ५२॥ एकादरया रमारझूुयाया माहात्म्यं श्रणुयात्नरः॥ सबंपापवि- 
निमुक्तो विष्णुलोके महीयते ॥ ५३ ॥ इतिश्रीब० कार्तिककृष्णाया रमार्याया माहात्म्यम्‌ ॥ 
क्‍ अथ कार्तिऋशुक्लैकादशीकथा ॥ 

. ब्ह्मोबाच ॥ अवोधिन्याश्र माह्ात्म्यं पापन्नं पुण्यवर्धनम्‌ ॥ मुक्तिप्रद छुबुद्धीनां शृणुष्य सनि- 
बल25३० १॥ तावदु्जति विप्रेन्द्र गड्डा भागीरथी क्षितो ॥ यावन्नायाति पापन्नी कार्तिके ८ 
बोधिनी ॥ २॥ तावहजेन्ति तीथानि ह्यासस॒द्रं सरांसि च ॥ यावत्प्रबोधिनी विष्णोस्तिथिना- 
याति कार्तिकी ॥ ३ ॥ अश्वमेघसहस्माणि राजसूयशतानि च ॥ एकेनेबोपवासेन प्रवोधित्यां 
लमेन्नरः ॥४॥ नारद उवाच ॥ एकभक्ते च कि पुण्यं कि पुण्य नक्तमोजने॥उपवासे च किं पुण्य 
तन्मे ब्रृहि पितामह ॥५॥ ब्लोवाच ॥ एकभक्तेन जन्मोत्थं नक्तेन द्विजलुभंवम्‌ ॥ सप्तजन्ममव 
पापसुपवासेन नश्यति ॥ ६॥ यहुलेम॑ यदप्राप्यं त्रेलोक्ये न तु गोचरम्‌ ॥ तदष्यप्रार्थितं पुर 
ददाति हरिबोधिनी ॥ ७ ॥ मेरुमन्दरमात्राणि पापान्युआ्राणि यानि तु॥ एकेनेवोंपवासेन दहते 


पापहारिणी ॥ ८ ॥ पूवजन्मसहस्नेस्तु य_ष्कर्म हापार्जितम्‌ ॥ जागरघ्तत्मबोधिन्याँ दहते तूल- 
किम मा #्रधभामम७ऋऋऋाभानानााााााककढमा१्म३त् का तन्‍ का काया सका कक सका कलम कलम. पक मलडक मत अर किशमिश कमल लि किक लक मल लिशि जल जर शदातासाादानपए४<पपदहाताए ड्रतवाल- पलक ३-४० शा कड 





कर दिव्यगतिको प्राप्त हुईं ॥ ४३ || वह ह्षसे नत्रॉंको 
खिलाती हुयी अपने पतिक पास गयी और शझोभनभी 
अपनी प्रेयसी कान्‍्ताको देखकर बहुत प्रसन्न हुआ ॥ ४४॥ 
उसने अपने निकट बुछाकर बाईंगोदर्मं बिठाया चन्द्र- 
भागाने तब हषके मारे यह प्रियवचन उसको कहे ॥ ४५ ॥ 
कि, हे कान्त ! मेरे वचन घुनिए जो पुण्य मेरमें है जब मैं 
पिताके घरमें आठ वषस अधिक बडी हुईं ।॥ ४६।॥ तबसे 
जो मैंने पुण्य किया हैं और जो मैंने एकादशीके ब्रतविधि- 
पृवक्‌ श्रद्धालु चित्तसे किये हैं ॥ ५७ ॥ उस श्रद्धा, भक्ति 
और पुण्यके प्रभावस आपका यह नगर और उसकी सब 
अकारकी सम्रद्धि प्रछयपर्यत् स्थिर रहेगी ॥ ४८ ॥ हे राज- 
शा[दूंछ ! इस प्रकार वह अपने पतिके साथ दिव्यरूप दिव्य 
भोग और दिव्य अमरणादि सामानस नित्य रमण करने 
छगी ॥ ४९ ॥ शोभनभी रमाके ब्रतके प्रभावसे दिव्यरूप 
धारण करके मन्द्रा चछके शिखर॒पर चन्द्रभागाके साथ 
आन-द करता रहा || ५० ॥ है नृपते ! चिन्तामणि और 


. कामपेनुके सम्रान यह रमानामकी एकादशी है। इसका 


वर्णन तुम्हारे साभने मेंने कर दिया है | ५१ ॥ हे राजन | 
. ऐसे त्रतको जो उत्तम छोग करते हैं उनके ब्रह्महत्यादिक 
. : सहापापभी नष्ट हो जाते हैं ॥| ३१४ यह भी अब्रक्मवैवर्त 
पुराणक। कहा हुआ कात्तिक कृष्ण रमा नामकी एका- 


ध्छ 

अथ कात्तिक शुक्भक_दशीकी कथा-न्रह्माजी बोढेनद 
मुनिराज ! प्रबो धिनी एकादशीका पापनाशक पृण्यवद्धड 
तथा ज्ञानियोंको मुक्तिदायक माहात्म्य सुनो ॥ १ ॥ है विशे 
न्द्र! प्ृथिवीपर गंगा भागीरथीका गजेन तबतकही हें जब 
तह कि प्रवोधिनी एकादशी नहीं आतो ॥२॥ सरसे 
है ९ कप ५ है छह ५ 
लकर समुन्द्रपयेनत सार तीथ तबतझही गजना करते है जब 
लक कि, कात्तिकमासकी पापनाश 5 विष्णुतिथि प्रवोधिनी 
नहीं आती । प्रबोधिनीके एकहदी उपवाससे इत्तम साथ 
को सहस्नों अश्रभेषक्न और सेकडों राजसूथयज्ञका फढ| 
प्राप्त होता है ॥ ५ ॥ नारदूजी बोछे कि, एकभत्तमे क्या 
एवं नक्त भोजनमें क्‍या पुण्य हैँ तथा उपवासमें क्या पुण्य 
है | हे पितामह ! यह मुझ समझा ऊरर कहिए ॥ ५ ॥ जद्या 
बोले कि, एकभक्त पते एक जन्प्रका एवम्‌ नक्तप्ते दो जन्मदा 
तथा उपत्राससे सात जन्मका पाप नष्ट होता है॥ $ ॥ यह 
हरिंबोधिनी एकादशी ऐसे पुत्रकों देती है, जो दुलेभ हो। 
जो किसी तरह भी न मिल सके, जो ४5, तीनों ढोकोर्मे 
गोचर न हो ॥ ७ ॥ मरू और मंदराचहुके बराबर 
जो उम्र पाप्‌ हो, वे सब एकही उपवाससे दुग्ध हद 
जाते हैं ॥ ८ ॥ पढ़िले सहस्रों जन्मोंसे जो दुषमे 


दशक माहात्म्य सम्पूण हुआ।__[_[_[_३_॒_ |[इकट्ठ किए हैं, प्रवोधिनीका जागरण तूडराश्िक माहात्म्य सम्पूर्ण हुआ || इकट्र किए हैं, अबोधिनीका जागरण तृूलराश्षिकी 


१ तेषमिति शेष: | - 


ब्रतानि, | माषाटीकासमेलः । ( ४६९ ) 


अिकक  ्ंऋऋऋर ू़क]नणिमममरििनम्म्म्म्््मबबबबबू््ण्न्बब्ोधढ;६ 
राशिवत ॥९॥ उपवास प्रवोधिन्यां यः करोति स्वभांवतः ॥ विधिवन्म॒निशादूंल यथोक्ते 
छमते फलम ॥ १० ॥ यथोक्तं सुक़तं यस्तु विधिवत्कुरत नरः ॥ स्वल्पं सुनिवरश्रेष्ठ मेरुतल्य 
भवेच्च तत ॥ ११ ॥ विधिहीन तु यः कुयात्खुकूत॑ मेरूमात्॒कम्‌ ॥ अणुमात्र॑ न चाप्नोति फले 
धर्मश्य नारद ॥ १२ ॥ ये ध्यायन्ति मनोवृत्त्या करिष्यामः मबोधिनीम्‌ ॥ तेषां विलीयते पाप 
पूर्वजन्मशतोद्भधवम्‌ ॥ १३ ॥ समतीत॑ भाविष्यं च वर्तमान कुलायुतम्‌ ।। विष्णलोक शमरयाड 
प्रवोधिन्यां तु जागरात ॥ १४ ॥ बसन्ति पितरों दृष्टा विष्णुलोकेत्यलंकृताः ॥ विमरुक्ता ह 
इंःसेः पर्वकर्मंसमुद्धवेः ॥ १५॥ कृत्वा तु पातक घोर बह्महत्यादिक नरः ॥ कृत्वा ठ॒ जागरं 
विष्णोजीतपापो मवेन्छुने ॥ १६॥ दुध्भ्राप्यं यत्फर्ल विपैरश्वमेधादिभिर्मखेः ॥ प्राप्यते तत्सुखेनेव 
प्रवोधिन्यां तु जागरात ॥ १७ ॥ आप्लुत्य सर्वेतीर्येषु दत्वा गाः काखन महीम्‌ ॥ न तत्फलम- 
वाप्नोति यत्कृत्वा जागरं हरे! ॥ १८ ॥ जातेः स एंवं सुकृती कुल तेनेव पावितम्‌ ॥ कार्तिके 
मुनिश्मादूल कृता येन प्रबोधिनी ॥ १९॥ यानि कानि च्‌ तीथ्थानि त्रेलोक्ये संभवन्ति च ॥ 
तानि तस्य गहे सम्पग्यः करोति म्रबोधिनीम्‌ ॥ ० ॥ सर्वेकृत्यं पारित्यज्य तुष्टयर्थ चक्रपा- 
णिनः॥ उपोष्येकादर्शी रम्याँ कार्तिके हरिबोधिनीम्‌ ॥२१॥ स ज्ञानी स च योगी च स॒ तपस्वीं 
जितेन्द्रियः ॥ विष्णप्रियतरा होषा धर्मसारस्य दायिनी ॥ २२ ॥ सकूदेनाम॒पोष्येव मुक्तिभाक 
व भवेन्नरः ॥ भबोजिनीमुपोषित्वा न गर्म विशते नरः ॥ रहे ॥ कर्मणा मनसा वाचा पाप 
यत्समुपार्जितम्‌ ॥ तत्क्ञालयाते गोविन्दः प्रवोधिन्यां तु. जागरात्‌ ॥ २४॥ ख्वानं दाजं जपो 
होमः समुदिश्य जनादनम्‌ ॥ नरेयत्‌ क्रियते वत्स प्रवोधिन्यां तदक्यम्‌ ॥ २५ ॥ ब्नेनानेन 
देवेश परितोष्य जनादनम्‌ ॥ विराजयन्दिशः सबोः म्याति भवन हरे: ॥ ९९ ॥ चाल्ये यचा- 


ए्‌ ढ्‌ हा 

तरह जढ़ा देता है ॥| ९ ॥ जो स्वभावस ही ५ बोधिनीका मुनिशादेल | वही एक इस घरावछपर पुण्यात्मा उत्पन्न 
विधिपूवक उपवास करता हें हे मुनिशादूंछ ! उस यथोक्त | ह आहै.और उसनेद्दी अपना कुछ पत्रित्र किया है। जो मनुष्य 
फ मिलता है ॥ १० ॥ जो मनुष्य थोडा भी सुकृतविधिक विधिवत्‌ प्रबोधिनी एकाद्शीकात्रत करता हैं । उसके घरम 
साथ करता है, हे मुनिश्रेष्ठ ! उसको वह मेरुके बराबर त्रिढोकीभरके सब तीर्थ आकर निवाश्च किया करते हर 
होजाता है ॥| ११। | जो मनुष्य विधिक साथ मेरुके बरा- |॥ १९५ ॥ २० || सब मनुष्योंका कत्तेव्य हूँ कि. थे सब 
बर भौ पुण्य करता हैं, हे नारद ! उस घमेका वह अणुमात्र | कत्तव्य कम्मोंक्रा परित्याय करके चक्रपाणि भगवानकी 
3:20 % 3057: 08: 

के ब्रत करनको शो चते हैँ, उनके पहिले स्रौँ जन्मक | वहा एक ज्ञानी योगी, तेन्द्रिय हैं; जि 
, किए, पाप नष्ट होजाते हैं ॥ १३ ॥ बह कक औ प रातको विप्णु भगवानको परम श्रिया, धम्मके सार देनत्राली प्रबो- 
मो मनुष्य जागरण करता हैं, वह भूत भविष्य और वर्ते | घिनी एकाद्शीकात्रत किया हैं। जो मनुष्य जन्मभरमें एक* 
मान पर रच 5 शीघ्रही विप्णुलो ध् 233४3 लक गा है उपवास करता हे, वद्द 
॥१४॥ पहिलछे किए हुए कमोसे प्राप्त हुए नारकीय दुःखॉँसे | मोक्षमाकू होता हे.वह फिर कभीसी गर्भवासका क्छशभाकु 
मुक्त हुए एवं गा विकोय सजहुए पिवरछोग प्रसन्नताके नहीं होताहै॥२१ २१॥प्रबोधिनी एकादशीके दिन जागरण 
विष्णुल्ोकर्म चले जाते हैं ॥ १५ ॥ मलुप्य अ्द्बादत्या | करनेसे गोविंद भगवान्‌ मनुष्यके कायिक, मानसिक और 

आरके मुदाकस हर मटका | करनेस गोौविद्‌ भगवान्‌ देते हैं ! मा व र 
आईिकि घोर पातकॉंको भी करके दरिवासरम जागरण | वाचनिक समस्त पापोंको घोदेते हैं ॥ २४ ॥ दे वत्स ! जो 
करक हे सुने! सब 32283 भगवानकी हा हक | मनुष्य भगवान्‌ | देवदेवकी प्रीतिका हट न 
॥ १६ ॥| जिस फएलछको ब्राह्मण भ्श्वमेध आदि यज्ञॉस भा प्रवोधिनी एकादशीक दिन स्नान, दान, जप आर होम 
प्राप्त नहीं कर सकते वह प्रवोधिनी एकादशीके दिन जागय- करते हैं, वह उनका किया हुआ सुकृत 3823: हैं| रण] 
रण मात्रसे सुखपूरवंक पा छिया जाता हे ॥ १७।॥ सब | इस ब्रतके अनुष्ठानसे जनाईन भगव संतुष्ट करने- 
तीथाॉँका स्नान और अनेकों गऊ तथ्रा कांचन और मदींफ़ा | बाढा मनुष्य समस्त दिशाओंकों पुण्यतेजस प्रकाशमान 
दान करनेसे फछ नहीं मिल सकता जो कि, इस हरि- | करता हुआ विष्णुधामकों पधारता है ॥ २६ ॥ है वत्स ! 
दिवसमें जागरण करनेस मिलता हैं ॥१८॥ जिसने कार्ति $ | वाल्य,यौवन और वाधक्य अवस्थाओं तथा सेकडों जनन्‍्समिं 
मासमें प्रयोधिनी एकादशीके दिन उपवास किया है, हे  स्वल्प या बहुत जो पाप किया हो हे मुन्ने |! उन सव पाप्रोंको 


१ अर्थाज्ञागरदतुः ।.२ दिने इति शेषः । 





ब्रलराजः । 


+ कलर 


(४६२ ) [ एकादशी-- 
जिंत॑ वत्स यौवने वार्धके तथा ॥ शतजन्मकूत॑ पाप स्वल्पं वा यदि वा बहु ॥ २७॥ तत्क्षा- 
छयति गोविन्दो ह्यस्यामभ्यचितों सुने ॥ चन्द्रसूयोपरागे च य॒त्फर्ल परिकीतितम्‌ ॥ तत्सहस्न- 
गुण मोक्त ्रवोधिन्यां तु जागराव॥२८॥जन्मप्रद्माति यत्युण्यं नरेणासादितं भवेत्‌ ॥ वथा भवति 
तत्सर्वमकृते कार्तिकव्रते ॥९९॥ अकृत्वा नियमं विष्णोः कातिक॑ यः क्षिपेन्ररः ॥ जन्माजितस्य 
पुण्यस्थ फल नाप्नोति नारद ॥ ३० ॥ तस्मात्वया प्रयत्नेन देवदेवों जनादनः ॥ उपासनीयो 
विभेर्ध सर्वकामफलप्रदः ॥ ३१ ॥ परात्न वर्जयेग्रस्तु कार्तिके विष्णुतत्परः ॥ अवश्य॑ स नरो 
वत्स चान्द्रायणफले लभेत्‌ ॥श२॥ न तथा तुष्यते यज्ञेन दानेसॉनिसत्तम ॥ यथा शास्त्रकथालापेः 
कार्तिके मधुखूदन:॥ ३३ ॥ ये कुबन्ति कथां विष्णोयें ४ण्वन्ति समाहिताः ॥ छोकाँ छोक- 
मेक॑ वा कार्तिके गोशलं फलम ॥३४॥ श्रेयसे लोभबुद्धया वा यः करोति हरेः कथाम्‌ ॥ कार्लिके 
मुनिशादंल कुलानां तारयेच्छतम्‌ ॥श५॥ नियमेन नरो यस्त॒ »णुले वेष्णबीं कथाम्‌ ॥ कार्तिके 
तु विशेषेण गोसहस्नफलं लभेत्‌' ॥ ३२६॥ बशबोधवासरे विष्णोः कुंछते यो हरेः कथाम्‌॥ सप्त- 
द्ीपवतीदानफलं स लमते मुने ॥ ३७॥ कृत्वा विष्णुकथां दिव्यां येप्चेयन्तित कथाविदम्‌॥ 
स्वशकक्‍्त्या सुनिशादूल तेषां लोकाः सनातनाः ॥ रे८ ॥ अहाणो वचन श्वत्वा नारदः पुनरब- 
बीत ॥ नारद उवाच ॥ विधान ब्रहि मे स्वामिन्रेकादश्याः खुरोत्तम ॥ २९ ॥ चीर्णेन .येन भग- 
वन्यादइशं फलमाप्लुयात्‌ ॥ नारदस्य वचः श्॒त्वा ब्रह्मा वचनमत्रवीत्‌ ॥ ४० ॥ बह्मोवाच ॥ 
बाहों मुहूते चोत्थाय ह्रेकादश्यां द्विजोत्तम ॥ स्माने चेव प्रक्तव्यं दन्‍्तधावनपूर्वकम्‌॥ ४१॥ 
नयां तड़ागे कूपे वा वाप्यां गेहे तथव च ॥ नियमार्थे महाभाग इमं॑ मन्त्रछुदीरथेत॥ ४२ ॥ 





प्रबोधिनी एकादशीक दिन गोविन्द्भगवान्‌ अपने पूजकके 
पूजनसे संतुष्ट होकर दूर करते हूं। चन्द्र या सूर्यग्रहणके 
समय काशी कुरुक्षेत्रादितीथोंमें द्वानादि करनेसे जो पुण्य- 
फलकी ग्राप्ति होती हे. उससे सहस्रगुणी प्रबोधिनी एका- 
दशीक दिन जागरणस फढ प्राप्ति है ॥२७॥२८॥ और एक 
बारभी जिसने प्रबोधिनी एकादशीक दिन उपवास नहीं 
किया हे,उसनेजन्मसे मरणपर्यन्तभी जो पुण्य किये है, वे 
सब ब्यथ होते हूँ ॥२९॥ हे नारद ! कारतिकमासमें विष्णु 
भगवांनका व॒तानुष्ठान न करनेसे जन्मभर किये पुण्योंका 
फलभाक्‌ नहीं होता हैँ ॥३०॥ हे विप्रेन्द्र ! इसलिए धर्म, 
अथ, काम और मोक्षरूप सब अभिरछषित फर्ॉके देनेवाले 
देवदेव जानादेनका पूजन अच्छीतरह भवश्य करनाचाहिए 
भ्र्थात्‌ भगवानके पूजन करनेसे सभी कामनाएं पूणे होती 
हूँ ॥३१॥ विष्णु भगवाबकी सेवार्म तत्पर रहता हुआ जो नर 
क्रार्तिकमासमें परान्नभक्षण नहीं करता हे, उसको चानन्‍्द्रा- 
. थण ब्रत करनेका फछ अवच्य प्राप्त हो जाता है ॥ ३२॥ 
हैं मुनिसत्तम | कारतिकमासमें भगवान्‌ मधुसूदनदेवकी 
. कथाओंके श्रवण कीतेनादिसे जैसी प्रसञ्मता होती है, वेसी 
. भसभझत्ता न यज्ञोंसे और न दानोंस ही होती हैं ॥ ३३ ॥| 
!: जोविह्न्‌ कार्दिकमासमें विष्णु भगवानकी कथाका कीततैन 
(करते हैं. और जो श्रद्धा भक्त समाहित होकर उस 

के गोद आधा छोक या एक उछ्लोक भी सुनते हैं उनको 


. ब्रत करनेका . नियम पालन करनेके लिए “ एकादृश्यों 


शादूंछ ! जो मनुष्य कार्तिक मासमें अपने स्वर्गादि सुखोंके 
लिए या धनादिकोंके छोभके वशमें पढ़कर भी भम- 
वानकी कथाका श्रवण कीतंन करता है, वह अपने शत 
कुछोंका उद्धार करता है ॥३५॥ जो नर नियमपूर्वेक एवं 
कात्तिकमासमें विशेषरूपसे भगवत्कथाका श्रवण करता है. 
वह सहख्र गोदानका फलभागी होता है ॥३६॥ प्रबोधिनी 
एकादशीके दिन जो मनुष्य भगवानकी कथा करता हे, है 
मुने | वह सप्तद्गीपा अर्थात्‌ समस्त प्रथिवीके दान करनेके. 
फलको प्राप्त होता है +३७॥ह मुनिशादू ! जो मनुष्य भग- 
वानकी कथाका श्रवण करके अपनी शक्तिक अनुसार कथा. 
कहनवाले कथावेत्ता विद्वानका पूजन करते हैं, उनको अक्षय 
वेकुण्ठलोक प्राप्त होते है ॥ ३८ ॥ ऐसे जब भगदबाग्‌ जद्या- 
जीने कहा, तब ब्रह्माजीके इन वचनोंकों सुनकर नारदमुनि 
फिर बोल कि, हे स्वामिन ! हें सुरोसतम ! एकादशीके दिन 
जिस प्रकारके प्रतऋरनेसे जेसाफल मिलता दें, उसविधिका 
आप कथन करो । नारद मुनिन जब ऐसी प्रार्थना कौ,एसे 
सुनकर त्रह्माजीने उत्तर दिया। ३९॥ ४० ॥ हे द्विनोत्तम ! 
एकादशीके दिन ब्राह्म मुह॒र्तेमं शय्यास उठकर 

क्रिया करे, फिर दन्तधावन करके नदी, वलाव। ऊँष, 
वापी या इनमें पूव पूवके अभावमें उत्तर उत्तरमें एवं 


सबके अभावसें अपने घरपर ही शुद्ध जछसे स्वान के 


पका फछ प्राप्त होना दे ॥ ३४ || और दे मुनि. इस वद््यमाण मन्‍्त्रका उच्चारण करें ॥ ४१॥ 8१॥ 


श्रतोनि, ] 





( ४६३ ) 

एकादड्यां निराहारः स्थित्वापहनि परे हाहम॥भोक्ष्यामि पुण्डरीकाक्ष रारणं मे भवाच्युत ॥४शा 
गहीत्वानेन नियम देवदेव च चक्रिगम्‌ ॥ संपूज्य भक्त्या तुद्ात्मा छुपवासं समाचरेत्‌ ॥४४॥ 
रात्रौ जागरण कुर्यादेवदेवस्प सत्रिषों ॥ गीत॑ नृत्यं च वाद्य च लथा क्ृष्णकर्थां मुने ॥ ४५॥ 
बहुपुष्पेबंहुफलेः कपूरागरुकुकुमेः ॥ हरेः पूजा विधातव्या कार्तिक्यां बोधवासरे ॥ ४६ ॥ वित्त- 
शाष्ठ्ं न कतेव्यं संप्रात्त हरिवासरे ॥ फलेनानाविरशदव्य: प्रवोधिन्याँं तु भक्तिता॥ ४७॥ . 
शद्धतोयं समादाय ह्र्थों देयो जनादने ॥ यत्फर् सवतीर्थेश सवंदानेए यत्फलम्‌ ॥ ४८ ॥ 
तत्फलं कोटिगुणितं दत्तघें बोधवासरे ॥ अगस्त्य $सुमेदेवं पूजयेद्यो जनादेनम्‌ ॥ ४९ ॥ देवे- 
न्द्रोपषपि तदग्रे च करोति करसंउुटम्‌ ॥ न तत्करोति विमेन्द्र तपसा तोषितों हरिः ॥ ५०॥ यत्‌ 
करोति हबीकेशो मुनिपुष्पेरलड्क्तः ॥ बिल्वपत्रेश्व ये कृष्णं कॉलतिके कलिवद्धेन ॥ ५१॥ 
पूजयन्ति महाभकत्या मुक्तिस्‍्तेषों मयोदिता ॥ तुललीदलपुष्पेय पूजपत्ति जनादेनम्‌ ॥ ५२ ॥ 
कातिक्े स दहेत्तेषां पा जन्मायुतोद्भवम ॥ दृष्ठा स्पृष्ठाथवा ध्याता कीतिता नमिता स्तुत्ा 
॥ ५३ ॥ रोपिता सोचिता नित्य पूजिता तुलसी झुमा ॥ नवधा सोेबिता भकत्या कातिके 
येदिनदिने ॥ ५४॥ युगकोटिसहश्लाणि ते वसन्ति हरेग्रेहे। रोपिता तुलसी येस्तु वद्धले बछुधा- 
तले ॥ ५५ ॥ कुले तेषां तु ये जाता ये भविष्यन्ति ये गताः ॥ आकल्पयुग साहस्न॑ तेषां वसो 
हरेगंहे ॥ ५६ ॥ कदम्बकुसुमेंदेव येड्नचेयन्ति जनाईनम्‌॥ तेषाँ यमालयों नेव प्रसादाच्क- 
पाणिनः ॥५७॥ दृष्ठा कदम्बकुसुमं प्रीतो भवति केशवः ॥ कि पुनः पुजितो विश्न सर्वकामग्रदो 
हरिः ॥५८॥ यः पुनः पाटलापुष्पेः काॉतिके गरुडध्वजम) अचेयेत्परया भक्‍त्या मुक्तिभागी भवेद्धि 





इसका यह अर्थ है कि, हे पुण्डरीकाक्ष ! हे अच्युत ! में 
आज एकादशोके दिन निराहार रहूंगा ओर दूसरे दिन 
भोजन करूंगा | अतः इस मेरे नियमको आप निभावे. 
द क्योंकि, से आपकी झरण ६ ४३॥ इस प्रकार नियम 
६ सडुल्प ) करके देवदेव चक्रपाणि भगवानका भक्तिसे 
'पूजन करे, फिर चित्तको प्रसन्न रखताहुआ उपवास करें 
.॥ ४४ ॥ है मुने ! भगवानके स्थानमें राक़्भिर जागरण 
'करे। गान, नाच, वाद्य तथा भगवत्‌कथाका कौतंन करे 
॥ ४५॥ कातिकम्ें श्रबोधिनी एंकादशीके दिन भगवानका 
पूजन, बहुतस पुष्प फल, कपूर, अगर तथा केसर, चन्दन 
आदिसे करना चाहिये | किन्तु प्रबोधिनीके दिन भग- 
: बच झा पूजन जब करे, उस समयमें धन रहते हुए कृपणत 
9५, ् च हि 
से कर, अपने वेभवानुसार सामग्री मंगवाकर हरिका पूजन 
करे। इस परम पवित्र दिनमें भगवानके नानाविघ दिव्य 
घढोंका भोग भक्तिभावस छगाना चाहिये ॥ ४६ ॥| ४७ ॥ 
जष ५ूजन करे, बब शंख जछू भरके भगवान्‌ जनादनको 


. -अधेदान करे । समस्त तीथॉके सवनसे जो पुण्यफछ उपा- 
जिंत किया हो, तथा जो जो दान करके फल लाभ किया 


है। ४८ ॥ वह सब पुण्य प्रबोधिनी एकादशीके दिन अँधे - 
दान करनेसे कोटि गुणा अधिक होजाता है | जों मनुष्य 
भगस्त्यके पुष्पंसे जनादंन भगवानका पूजन करे॥ ४९॥ 


कि भह ब््‌ दा 
उसक सम्मुख साक्षात देवराज भी अजलि बॉघकर 
भणास करता हूं, अर्थात्‌ अपना दासभाव स्वीकार करता | 


है; भगस्त्य पुष्पोसे पूजन करनेपर हृषीकेश भगवान्‌ जो 





उपकार करते हैं, हे विभ्रन्द्र | उस उपकारको तपश्चर्यासे 
प्रसन किये हुए भी नहीं करते हैं ॥ हे कलिवद्धन ! ( पर- 
स्परमें कछहको बढानेवाले ) जो मनुष्य कार्विकमासमें 
बिल्वफ्त्रोंस परमग्रेमपूवेक कृष्ण भअगवान्‌का ॥ ५० ॥५१॥ 
पूजन करते हैं, उन्नको मोक्ष प्राप्त होता है, यह मेरा कहना 
हैं। कार्विकमासमें जो नर तुछसीके दु्लोंस तथा म'जरियों 
( एबं पुष्पों ) से विष्णुका पूजन करते हैं, उनके अयुत 
जन्मोंके भी किये पार्पोंको विष्णुभगवान्‌ दुग्ध कर देते हैं | 
तुझ्सीका द्शन, स्पशन, ध्यान, कौतेन, प्रणमन, रतबन 
॥ ५२५ ५३ ॥ आरोपण, सेचन लथा प्रतिदिन पूजन 
करना अयस्कर होता है । जिन्होंने कार्तिकसासप्रें प्रविदिन, 
पूर्वोक्त दशनाईिं नो रीतियोंस भक्तिपुत्रेंक तुछकीका सेवन 
किया है।। ५५ ॥ भगवानके वेकुण्ठघाममें हजार कोटियुग 
पर्यन्त वह निवाख करते हैं, जिन्होंकी छगायी हुईं तुछसी 
प्रथिवीपर बढती है ॥५८।॥ उन्होंके कुछमें जो अद्यावधि 
उत्पन्न हुए हैं, जो उत्पन्न होवेंगे उनका भगवानके धामर्मे 


| सहस्र कल्प्रकोटियुग पर्यन्त निवास होता है ॥| ५६ ॥ क द- 


म्बके पुष्पोंसे जो मनुष्य जनार्दनदेवका पूजन करते हैं 
उन्होंका यमराजके स्थानमें जाकर रहना, चक्तप।णि जना- 
दलकी प्रसन्नतास नहीं होता है ॥५७॥ कद्म्बपुप्पको देख- 
कर भी केशवदेव प्रसन्न होते हैं। फिर कदम्बके पुप्पोसि 
पूजनपर प्रसन्नहुए हरि सब अभिरपिताथं पूणे करे, इसमें 
सन्देह करनाही व्यथ हैं ।।५८४जो मनुप्य पाटछाके पुप्पोंसे 


' कार्तिकर्मं गरुइघ्तमदेवकी परममक्तिस पूषा करता हे, 


(४६४) ब्रतराज३ । [ एकादशी 


:दरकभा-कावावाऑनमाइभमवकाकम दर 


सश॥५९ बकुलाशोक इस मेर्येंडचेयर्ति जगत्पतिम। विशोकास्ते मविष्यन्सि याव बच्धरिवारुते 
॥६०॥ येईर्चयन्ति जगन्नार्थ करवीरें! सितासितेः ॥ तेषाँ सदा ठ॒ विभ्रेन्द्र प्रीती भषति केशदः 
॥६१॥मश्नरी सहकारस्प फेशवोपरि ये नरा॥।यच्छन्ति ते महाभागा गोकोटिफलभागिनः ॥६२॥ 
दूवीकुरेहीयेस्त॒ पूजाकाले अयच्छतिपप्‌ जाफल शतग़ु॒र्ण सम्यगमोति मानव५॥९३२॥ शमी पतरेस्त 
: थे देव पूजयन्ति सुखभदम्‌॥ यममार्गों महाधोरो निस्ती्णस्तेस्तु नारद॥९४॥ वर्षाकाले तु देवेशं 
कुछुमेश्वम्पकोद्धवेः ॥ ये: च॑यन्ति न ते मर्त्याः संसरेयुः पुनर्मवे ॥ ६५ ॥ खुबणेकेतकीपृष्प॑ यो 
ददाति जनादेने ॥ कोटिजन्मार्जिनं पाप दहुते गरूडध्वजः ॥९६॥ कुंकुमारुणवर्णा च गन्धात्रां 
हठपत्रिकाम्‌॥ यो ददाति जगन्नाथे श्वेतद्वीपालये बसेत्‌ ॥ ६०॥ एवं संपूल्य रात्रो च केशव 
स्ाक्तमक्तिदम्‌ ॥ आातरूत्थाय च बह्नन्‌ गत्वा तु सजलां नदीम्‌ ।। ८८ ॥ लत्र स्वात्वा जपिता 
च्‌ कृत्वा पौर्वाहिकीः क्रिया: ॥ रहं गत्वा च संपूज्यः केशवो विधिवन्नरेः ॥ ९९ ॥ व्रतस्थ पूर- 
. णार्थाय ब्राह्मणान्मोजयेत्सुधीः ॥ क्षमापयेत्खुबचला भक्तियुक्तेन चेतसा ।। ७० ॥ गुरुपूजा ततः 
कार्यो भोजनाच्छादनामिः ॥ दक्षिणा गौश्व दातव्या तुष्टयथ चक्रपाणिनः ॥७१॥ भूयसी चेव 
दातव्या ब्राह्मणेम्यः प्रयत्नतः ॥ नियमश्चेव सन्त्याज्यों बाह्मगाग्रे प्रयत्षतः ॥ ७२॥ कथयिता 
दिजेम्पस्तु दद्याच्छक्त्या च दक्षिणाम्‌ ॥ नक्तमोजी नरो राजन ब्राह्मणाव मोजयेच्छुनाव॥०२॥ 
अयाचिते बलीवद सहिरण्य॑ प्रदापयेत॥ अमांसाशी नरो यस्तु प्रददेदाँ सदक्षिणाम्‌॥ ७४॥ 





वह मुक्तिभागी होता ही हैं ॥॥५९। जो नर मोछसरी एवम्‌ 
अशोकके पुष्पॉस लगदीश्वरका पूजन करते हैं, वे चन्द्र 
सूये जबतक प्रकाश करेंगे, तवतक शोकभागी नहीं होते ह 
॥६०॥ है जिप्रेन्द्र ! जो मनुष्य सुफेद या काके करवीरके 
पृष्पोसि जगन्नाथभगवान्‌की आराधना करते हैं,उनके ऊपर 
क्रेशव सेव सन्‍्तुष्ट रहते है ॥६१॥ जो नर सुवन्धिवाले 
आसमकी मखरीको भगवानके ऊपर चढाते हैं, वे परम. 
भाग्यशाडी हैं और कोटिगोदानके फछभागी होपे हैं ४६२॥ 
जो मनुष्य पूजाके समय नारायणके ऊपर कोम॒छ दूवोंके 
अकूर समर्पित करता है,वह मनुष्य पूजन करनेके शतगुणित् 
फछुका ठीकठीक भागी होवा है ॥ ६३ ॥ है नारइ ! जो 
मनुष्य शरमीपत्रोंस आतन्दकारी स्रगवानका पूजन करते 
हैं, उन्होंने अत्यन्त सयझ्डर भी यमराजकोी पुरीके जानेवाले 
रस्तेके भयस छुटकारा पालिया ॥६४॥और जो सत्ये बष।- 
काछमे देवाधिदवका चम्पाके पुष्पोंके पूजन करते हूं वे 
चारबार जन्मनेके जालूम फिर कभीभी नहीं पडते हैं ॥६५॥ 


. जो मनुष्य जनादंन सगवानके ऊपर सुवर्णके समान उज्वरू 


केतकीके पुष्पोंका समपेण करता है, उसके कोटि जन्मोंम 
भी किय पापोंको गरुडध्वज देव दग्घ करदेते हैँ ॥६६॥ 
. कैसरके समान अरूण (छाछ) आकारवाली सुगन्वित्त शत- 
. पत्रिका (छमलिती ) को जगज्ञाथजी पर समपेणं करता हैं, 

ज् ध्् तद्ढो “कक * ्थ ५ 3 घर 
बह शख्तद्वोपवारे सगव।नक दिव्यधाममें निवास करता हें 


॥६॥। ऐसे प्रबोधिती ए ह्रादशीके दिंनिरातमें भोग (सांसा 


रिक मुख्सम्पत्ति) और मुक्ति ( पंरमाधिक सुखसम्पत्ति,) 


..ह............................................. मन 3५५3+3333333+333+.+3++3 333» +++ मम» ॥3++++3आक 3५3५५ +3++++ममाक 3५33५ मनन + न नननननन न न नमन ननन-नननन 


के देनेवाले केशबका पूजन करते है, हे अद्वन्‌ ! दूसरे दिव 
प्रातःकाल उठऋर जछूपूर्ण नदीके तटपर पहुंचकर ॥ ६८॥ 
जो उसके जलमें स्तान करते हैं; फिर स्नानोत्तर गायत्रीका 
जप करके पूर्वाह्योचित दूसरे तपंणादि कम्मोंको करते है 
पीछे उनको अपने घरपर जाकर शाखत्रकी विधिके अनुसार 
भगवान्‌ नारायणका पूजन करना 'वाहिय ॥ ६५९ ॥ किये 
ब्रतकी साह्नतया पूर्णवाऊे छिये विद्वान॒का कर्तव्य हे कि। 
बह फिर ब्राक्षणोंकी भोजन करावे। सुमधुर वचनों एवं 
भक्ति पूणेचित्तस उन्‌ त्राह्मणोंसे अपने पापोंकी निवृत्तिक़े 
ढिये क्षमा प्राथेना करे ॥ ७० ॥ पीछे भोजन कराकर दया 
बख्र आभूषणादिकोंसे सुसज्वित करके आचायेका पूजन 
करे, चक्रपाणि भगवानकी प्रसन्नाके लिये दक्षिणा 
गोौका अदान करे ॥७१॥फिरअभ्यागत एवं दूसरे दूसरे इस 
समयके उपस्थित ज्राज्मणोंको भूयसी दृक्षिणा अवश्य 
अपनी शक्तिके अनुरूप दे | फिर त्रत करनेका 
धारण किया था; उस नियमका त्राद्मणोंके सम्मुख बैठकर 
विसर्जन करे | ७२ | एवं कहे कि; मेने जो ब्रत करनेंका 
नियम किया था वह अबतक निभाया,अब में उसका विस 
जन करना चाहता हूँ,फिर शक्तिक अनुरूप त्राह्मणोंके लिये 
दुक्षिणा दे । है राजत ! नक्त भोजीको चाहिये कि। उत्तम 
ब्राह्मणोंको मोजन कराते । ७३ ॥ ऐसी प्रतिज्ञावाले ब्रती 
पुदंषका कत्तेउ्य है कि. वह बिता मांगे सुवणे और 

द्वान करे. जो व्रती मांसभश्ली न हो वह गऊकों, दबिता 




















7..." समायशार-धाहांअामाका : 








फललरंत+म्गनक»»५ ८१२०3. 


धात्रीलायी मरो ददष्यादाये माक्षिकमेव चाफलानां नियमे राजन फलदान॑ समाचरेत्‌॥७५॥ तेरू- 
स्‍्थाने छत देय बृतस्थाने पयः स्मृतम॥धान्यानां नियमे राजन दीयन्ते शालिसण्दुछा: ॥ ७६ ॥ 
दबाद्धशयने शय्यां सतूलां सपरिच्छदाम॥पत्रभोजी नरो दच्चाद्धाजनं वृतसंयुतम्‌ ॥ ७७ ॥ मौत्रे 
घण्टां तिलांश्रेष खहिरिण्यं प्रदापयेत्‌ ॥ धारण तु स्वकेशानामादश दाययेड्वुघः ॥ 3८ ॥ उपा- 
नहों प्रदातव्यावुपाम त्परिवर्जनात ॥ लव॒णस्थ च सतन्त्यागे शक्केरां च प्रदापयेत्‌॥ ७९॥ नित्य॑ 
दीपप्रदो यघ्तु विष्णोवों विबुधालये ॥ सदीपं सबृतं ताम्र काखनं वा दशायुतम्‌ ॥ <० 
प्रदद्ाद्िष्णुभक्ताय ब्रतसंपूर्तिहितवे ॥ एकान्तरोपवासे तु कुम्भानड्रों म्दापयेत ॥ <१॥ सब- 
.. ब्लान्काथनोपेतान्‌ सर्वाद्‌ साल कत्राज्छुभाव्‌ ॥ यथोक्तकरणे शक्तिर्यदि न स्यात्तदा म॒ने ॥८२॥ 
.. द्विजवाक्यं स्परूतं राजन संपूर्णद्रतसिद्धिन्‌ ॥ नत्वा विसजेयेद्धिम्रांस्ततो खुज्जीत च स्वयम्‌ 
॥८३॥ यच्त्यक्त चतुरो मासान समातिं तस्य चाचरेत ॥ एवं य आचरेत्पाथ सोउनन्‍तफलमा- 
प्छुयात्‌ ॥ ८४ ॥ अवसाने त॒ राजेन्द्र वाखुंदवपुरं ब्रजेव्‌ ॥ यश्राविन्नं समाप्येव चातु्मोस्यव्रतं 
नृप ॥ ८५ ॥ स मवेत्कृतकृत्यस्तु न पुनर्माल॒बो भवेत्‌॥ एतत्कृत्वा महीपाल परिपूर्ण द्व्॒॑ 
मवेत्‌ ॥ ८५ ॥ व्रतवेकल्यमासाद ह्ान्थः कुछी प्रजायते॥ एतत्ते सबभाझ्यात॑ यत्पृष्टोडहमिह 
त्वया॥पठनाच्क्वणाद्वापि लमेह्रोदानजं फलम्‌ ॥८७॥ इति श्रीसरू० का० झु० अबो०्मा०सं० ॥ 
कि अथाविकशुक्लेकादशीकथा ॥ 

युधिष्ठिर उवाच ॥ मलिःहुचस्य मासस्थ का वा एकादशी भवेत्‌ ॥ कि नाम को विधि- 


स्तस्पाः कथयस्व जनादईन ॥ १॥ श्रीकृष्ण उवाच ॥ मलमाससरूष या पुण्या शो का नाम्ना च 


रूपस आचायको प्रदान करे ॥७७॥ कार्तिकमासमें आंव- 
ढछोंको घिसकर उनकी पीठी छगाकर स्नान करनेवाला | की 
| फिर ब्राह्मणोंकोी प्रणाम कर, उन्हें विसाजित करके आप 


क्रनेवाछा त्रती पुरुष मधुर मधुर फछोंको दे ॥ ७५ ॥ तैल | भोजन करें॥ ८३॥ जिसने आषाढ शुझ्ला देवशयनौ 


दधि आर मसधुका दान करे | है राजन्‌ | फल खाकर ब्रत 


खाना जिसने छोढा हो वह फिए यदि तेछ खाना चाहे तो 


घृतका दान करे और जिसने घृत खाना छोडा हो वह दूध | 


क दान करे, धान्यभोीजी शाली ( छुगन्धित ) चावलोंका 
दान करे | ७६ ॥ पृथ्वी तक्पर शयनके नियमके पालन 


करनेवाला सोड सोडिया एवं वकियासे परिष्कृत शय्याका | ॥ ८ | 
| राजन जिसने चार मास पयन्त निविष्न ब्रत निभाया है । 


दान करे । पत्तकूम भोजन करनेवाहा ब्रतीयुत पूर्ण भोजन 


पात्रको दे ॥ ७७ ॥ मोनत्रत धारण क्रनेवाढा ब्रतके 
अन्तमें घण्टा, तिछ और सुवर्णका प्रदानकरे। अपने केशों 
को नहीं कटाऊंगा इस प्रकारका ब्रती विद्वान्‌ दर्षणको दे | 


॥ ७८ ॥| जूतियां पहिचना जिसने ड्रोडा हो, वह जूतियों 


का जोडा दे । नमक खानेका त्याग करनेवाढा शक्करका 


दान करे || ७९ ॥ विष्णु या अन्य किसी देववाके मन्दिर 


में नित्य दीपक जछानेका नियमी जन ध्ृत और बत्तीसे | 


संयुक्त तमेका दीपपात्र सामथ्य विशष हो तो सुवणका रा 
ठो | का फल प्राप्त होवा है [| ८७ ॥ यह श्रीस्कन्द्पुराण का कहा. 


दीपपात्र || ८० || चिण्णुभक्त ब्राह्मणके लिय अपने ब्रतक 


पूरा करनके लियेदे, में एक दिनके अन्तरसे भोजन करूंगा | 
अर्थात्‌ एक एक दिन छोडकर दूसर दूसरे दिन एकबाडू [्‌ 
| ब्रतकी कथाका निरूपण करते ह-राजा युधिष्ठिरन ( श्री- 


| कृष्णचन्द्रस 


भोजन करूंगा इस प्रकारका वती ब्रतके अन्तर्म आठ कुंभों 
का दान करे | ८१ | और उनके साथ वद््र सुवण और 


जलुझार भी देवे । है मुने | यदि यथोक्त दानादि करनेकी | 
शक्ति न हो तो वह ब्रतकी साह्नतया पूर्तिके छिये ॥ ८१॥ 


शाझणसे कहावे, अर्थात्‌ ४ तुम्हारा ब्रत पूण दोगया ”'ऐसे ( शुक्छा ) पदिनी एकादशी है, उस दिन विधिपूवंक उप 


५५, 





बचत त्राह्म गसे बुलावे | क्योंकि, ऐसे समयमें ब्राह्मणके 
वचन ही ( आशीवाद ही है सिद्धि करनेव्राले होते हैं। 


एकाद्शीस कार्तिक शुद्धा दकादशीतक वर्षातके चारमहोने 
पर्यन्त वस्तु जो छोडी हो, उसकी समाप्ति इपत प्रबोधिनीके 
ही दिन करे | है पाथे ! जो मसुष्य पूर्वोक्त रीतिंस ब्रता- 
चरण करता हैं उाखको अनन्त फछ मिछता है॥ <८४॥ 


हैक 


शरीर परित्याग करनेपर वेकुण्ठ ठोक चला जाता हैं। हे 


॥ ८० ॥ वह कृतकृत्य होगया; उसे फिर फिसी यज्ञादि 
करनेकी आवश्यकता नहीं। वह फिर मनुष्य योनि नहीं 
आता है, किन्तु स्वगेमें ही देवता होकर आनन्द भोगताह। 
हे महीपाल | जो हमने विधि कही हैं उसके अनुसार बद 
करनेंस तब्रत परिपृण होजाता है॥८६॥ब्रतानुप्लानकी विधिमे- 


| विकछता करनेसे अन्धा और कोढी होता ह । हे राजन ! 


जो तुमने यहां त्रतकी विधि पूछी थी; वह सब विधि मेन 
तुम्हें कहदी इस विधिक भी पठन और अवणसे गो देन 


हुआ कार्तिक युद्ध एकाद स्लीके ब्रतका माहात्म्यसमाप्हुआ॥ 
अब अधिकमापमें जो शुद्धा एकादशी आती हूँ उसके 


५3 कि, हे जनादेन ! मलछमासकी एकादशी 
का क्‍य नाम हैं और उसके वब्रतकी क्‍या विधि दे सो आप 
कहो ॥ १ ॥ श्रीकृष्ण भगवानने कहा कि, मलछ्मासमें जो 


( ४६६ ) बतराज:।._ [ एकादशौ- 













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अकललाननकलनन-नपल-मका, 








पश्चिनी ॥ सोपोषिता प्यत्नेन पद्मनाभपुरं नयेत्‌ ॥ २॥ मलमासे महपुण्या क्दीतिता कल्मषा- 
पहा ॥ तस्याः फल कथयित न शक्तश्बतराननः ॥ हे ॥ नारदाय उरा भोक्त _विधिना ब्रतमु- 
त्तमम ॥ पद्मिन्याः पापराशित्न भुक्तिउक्तिफलप्रदम्‌ ॥ ४ ॥ डत्वा वाक्य उरहस्ठु प्रोवाचाति- 


मुदान्बितः ॥ यधिष्ठिरों जगन्नार्थ विधि प्रच्छ धर्मवित ॥५॥ अुत्वा राज्स्ठ वचनझुवाद _ 
है 


मधुसूदनः ॥ शरण राजन्प॑वक्त्यामि मुनीनामप्यगोचरम्‌ ॥ ६९॥ दशमीदिवसे प्रात्ते व्रतारम्भो 
विधीयते ॥ कांस्य मांस मसूरांश्व चणकान्कोद्रवांस्तथा ॥ ७॥ शाक मधु परात्न च दशम्या- 
मष्ठ वर्जयत ॥ हविष्यान्नं च छुख्जीत अक्षारलवर्ण तथा ॥ 4 ॥ भूमिशायी बहाचारी भवेद्व 
दशमीदिने ॥ एकादशीदिने प्राप्ते प्रातहत्थाय साइरम्‌ ॥ 3 ।! विधाय च मलोत्सग न कुयों- 
दस्तधावनम्‌ ॥ कृत्वा द्वादशगण्डूबाब्छुचिभूत्वा समाहितः॥ १० ॥ खूर्योदय शुभे तीर्थे ल्लानाप 
प्रवजेत्सुधीः ॥ गोमय॑ मुत्तिकां ग्रह तिलानदभाज्छुचिस्तथा ॥ ९९ ॥ चूेरामलकीमूते- 
बिंघिना स्लानमाचरेत्‌ ॥ उद्धतासि वराहेण कृष्णेन शतबाहुना ॥ १९ ॥ मृत्तिके बहादत्तासि 
काइयपेनामिमन्त्रिता ॥ हरिपूजनयोग्य मां मृत्तिके कुछ ते नमः ॥१र॥ सर्वोषधिसमृत्पन्नं गवो- 
दरमजिष्ठितम्‌ ॥ पवित्रकरण भूमेनो पावयत गोमयम्‌ ॥ १४ ॥ अह्यछ्लीवनसेनूता धात्री शुबन- 
पावनी ॥ संस्पष्टा पावयाडु मे निर्मल कुछ ते नमः ॥ १५ ॥ देवरेव जगन्नाथ शइखचक्राद- 
धर ॥ देहि विष्णो ममाठुज्ञां तब तीथावगाहने ॥ १६।॥ वारुणांश्र जपेन्मन्त्रान्‌ स्त्राने कु्यो- 


| ्््् र्र र फक्‍:क्‍इै७ैफकफोमोपोप््पहफहफ।फ़।ोज-|फ+ह+ह|फ|5 
वास करनेसे पद्मनाभ भगवानके धामको प्राप्ति होती है | ( बुद्धिमान्‌ ) स्तान करनेके लिये पूर्यांद्यके समय पवित्र 
॥२॥ अधिकम्तासमें पद्मिती एकादशी महान्‌ पुण्यकों | तीथरके लटपर पधारे | जानेके समय गोबर, शुद्धमृत्तिका, 
बढानेवाली तथा पापोंक। विध्वेस करनेवाली हे, इस दिन | तिर, छुश ॥ ११५॥ और आंवलोंका चूरा लेकर जाय । 
ब्रत करनेका माहात्म्य साक्षात्‌ चतुरानन त्रद्माजी भी | २ आंवडोंके चूरेको तीथेजछूमें गेरकर विधिवत्‌ स्नाव 
नहीं कहू सकते ॥३॥ पद्चिनी एकादुशीका ब्रत पापपुखको | करे, उस स्नानके पहिछे अपने शरीरपर तीथैकी पवित्र 
नष्ट करके भोग और मोक्षकों देता है| इस भ्रकार त्रह्मा- | तृत्तिकाका छेप करे; उसका मन्त्र यह हे कि, हे सृत्तिके; 
जीने नारदूमुनिको पद्चिनी एकादशीक ब्रतका माइात्म्य | शत्तमुजावाढे श्रीवराहमूर्ति कृष्ण नारायणने तुम्हारा उद्धार : 
पहिलेकद्दा है।8॥और ऐसे जब श्रीक्षष्णचन्द्रजीने कहा,वब | || (६ || ऋ्याजीने प्रदान एवं कद्यपनन्द्न भगवान्‌ वास-. 
उनके बचनोंकों सुनकर राजा युधिष्ठिर बहुत असन्न हुये। | हवन अमिमन्त्रण किया दें, इससे तुम सुझेभी भगवत्यूजन 
उसधर्मज्ञ राजाने जगन्नाथ श्रीकृष्णचन्‍्द्र भगवावसेपद्चिनी | हरनेका अधिकारी करो, मैं तुम्दारे छिये प्रणाम करताईँ 
एकादशीके त्रत करनेकी विधि पूछी ॥ ५॥ श्रीकृष्ण चन्द्र ॥ १३॥ फिर गोबरका डे रे को और “सवोषधि” इस 
राजा युधिष्ठिरके वचनोंको सुनकर बोले कि, हे राजन ! पन्‍्त्रकों पहें । इसका यह अर्थ है कि, सब प्रकारकी दिव् 
2 कि 08 बे मा पादप । जैबधियोंके सबसे बज हुआ एवम्‌ गौके गभमें रहा 
नहीं है पर तुम्हार ये आज उस गुप्त वाधका कथन ह; हे गिबर मुझे भी 
कगा।।  दवामोक नदी ये अत रत करता कारगर और प्रथ्वीको पवित्र मा यह गोबर मुझे माँ, 
न । 


पदाथे; कोद्रव (कोदू) ॥। ७ ॥ शाक,मधु ( सहत, या मदि- है हा हक 
रापान ) और दूसरेके घरका अन्न द्‌ शमीके दिनमी सेवन | ग रेचस उत्पन्न होने वाले हक जगतके 
न करें केवल हविष्य अज्नके पदार्थ खाय, क्षार तथा छव॒ण | बिल अज्ञस छाऊकर डूहं नम एवं पवित्र र्‌ कर 
का सवन न करे ॥ ८ ॥ दशमीके दिनभी भूमिपर शयन | ७ छा लिए नमस्कार हूँ ॥१०॥ एस आवरढ दर िहि 
करे ब्रह्मचर्य्य रकखे अर्थात्‌ ख्रीसह्ञादिका परित्याग करे, | जल्में प्रवेश करनेके लिए भगवानको ग्ार्थना कर है 
किए एकादशीके दिन प्रातःकार प्रसन्नतासे उठकर ॥९॥ | देंवोंके भी देव ! हे जगन्नाथ ! हैं शब्धचक हे रा गदूके 
._. महत्याग करे, काष्ठस दन्तधावन्न न करके केवल बाहर | धारण करनेवाले हे विष्णो | आप मुझे अपने तीयेम अ्रवेह 
' कुँछे ही करे ऐसे पंवित्र होकर चित्तकी वृत्तिको भगवानके | कर स्लान करनेकी आज्ञा प्रदान करो ॥ ६६ ४ फ्छि 
हे ' | च्रणोंसे र्गएछकर समाहित रखता हुआ ॥ १० | वह 8ुथी ' हिरण्यश्ू डर वरुण प्रपयय ? इत्यादि वरुणक 


घतानि ] भाषाटीकासमेलः । 































(७६७ ) 





द्विधानतः॥ गड्भादितीय संस्मृत्य यत्र कुज जलाशय ॥१७)॥ पश्चात्संमाजयेड्रातं विधिना नृप- 
सत्तम ॥ परिधायाहतं वासः शुक्क शाचे ह्खवण्डितम्‌ ॥ १८॥ सन्ध्य:सुपास्य विधिना तर्पे- 
यित्वा पितुन्छुरान्‌ ॥ हरेम॑न्दिरिमागम्य पूजय्रेत्कमलापतिम्‌ ॥१९ ॥ स्वगेमाषकृतं देव राघिका- 
खहित॑ हंरिम्‌ ॥ पावेत्या सहित शम्हुं पूजयेद्धिविपूबकम्‌ !। २० ।। धान्योपरि न्यसेत्कुम्म 
ताम्रं मुन्मयमेव वा ॥ दिव्यवद्थसमायुक्ते दिव्यगन्धाठवालितम्‌ ॥ २१ ॥ तस्थोपरि न्‍्यसेव्‌ 
पात्रे ताम्रे रौप्यं हिसण्मयम्‌ । तस्मिन्सस्थापयेदेव विधिता पूजयेत्ततः ॥२२॥ संम्लाप्य सलिलेः 
श्रेष्ठेगन्थधूपायिवासितेः ॥ चरदनागुहकपररेः पूजयेदेवमीश्वरम्‌ ॥ २३ ॥ नानाकुसुमकस्त्री- 
कुइकुमेन सिताम्बु जेः ॥ तत्कालजातेः कुसुमेः पूजयेत्परमेश्वरम्‌ ॥२४ ४ नेवेद्योविवेधेः शकक्‍त्या 
तथा नीराजनादिलिः ।॥ धूपेदीपेः सकपूरेः पूजपेत्केशव शिवम्‌ ॥ २५ ॥ नृत्य गीत॑ तदओे ठु 
कुयद्धाकिपुरःसरम ॥ नालपेत्पातितान्पापांस्तस्मिन्नहनि न स्प्शेत्‌॥ २६॥ नातनूते हि वर्दे- 
द्वाक्यं सत्यपूतं वचो वदेत्‌ ॥ रजस्वलां न स्पशेच्च न निन्देद्राह्मणं गुहम्‌ ॥ २७ ॥ पुराण 
पुरतो विष्णोंः श्रणुयात्सह वेष्णबेः ॥ निजेला सा प्रकतेंव्या या च बुकछे मलिम्ठुचे ॥ २८ ॥ 
जलपानेन वा कुर्याद दुग्धाहारेण नान्यथा ॥ रात्रों जागरण कु्याद्ीतवादित्रसंयुतम्‌ ॥२९॥ प्रहरे 
प्रहरे पूजा काया विष्णोः शिवस्य च ॥ प्रथमे महर इ्द्यान्नारिकेलाघंसत्तमम्‌ ॥ २० ॥ द्वितीय 
श्रीफले बेव त॒तीये बीजप्रकेः ॥ चतुथमहरे पूर्गनारि ड्रैश्व विशेषतः ॥ ३१ ॥ प्रथमे प्रहरे पुण्य - 
मप्मैषश्रोत्स्प जायते ॥ द्वितीय वाजपेयस्य तृतीये हयमेघजम्‌ ॥ २२ ॥ चतुर्थ राजसूयस्य 
जाम्रतो जायते फलुम्‌ ॥ नातः पएलतरं पुण्ये नातः परतरा मद्या3॥ ३३ ॥ नातः प्रतरा विद्या 





पदकर विविवरत्‌ स्नान करे । ओर हे नयसत्तम | जो कोई 
जिस किसी जहूशयमें जब स्तान करना चाहे, तब वह 
प्रथम उस जड़ाशयमें गड्ड।दि तीथौंका स्मरण करे। १७ ॥ 
पोछे हे नुपपत्तम | विविवत्‌ अपने शररीरकों सम्प्तार्जित 
करे। स्नान करनेऊे पश्चात्‌ अह॒त शुद्ध सफेद और अख- 
जिह्त वल्लक्तो घारण करे | १८ | झिर विधिवत्‌ सन्ध्यो- 
पासन करे। तदनस्तर देवषिं पितृ जनों का तपेग करे, पीछे 
मेरिरमें आऋर सगवःत्‌ उद्वीपलिक्नः पूजन करे ॥ १९॥ 
और एक मासेभर राघा और श्रीकृष्ण चन्द्रकी तथा पावी 
और महादेवजीको प्रतिमा बनवाकर विधिपूवह इनका 
पूजन करें ॥| २० ॥ घान्यराशियर ताम्र या सृत्तिकाके ही 
कछशका स्थापत करके उसके कग्ठमागकों युन्दर वल्लसे 
परिवेष्टित करे । उसमें द्िविय सुगन्वरित सवर्विधि आदिरो 
छोड रूर || २१ ॥ उसके ऊपर तांबे हवॉ या चौदी का अबत्रा 
सुवणका पात्र स्वापित करे.) उप्त पात्रके ऊपर रावासहित 
श्रोकृष्ण चन्द्र, एवम पावैतीसहित महादेवजीकों मूर्थिक्रा 
स्वागत को । फिए जिधिवत्‌ उतर पूजत करें ॥ २२ ॥ 
सुगन्तरित शीवछु जज ठ से स्वान कत।ऋर, चन्दन चचित करे, 
धूप करे | चन्दन आगर कपूर, नानाविध पुष्य, ऋस्‍्तूरी, 
केघर, सफेर कमछ एवम्‌उस समयके दूसरे पुष्पों पे फर- 

बरक्ा पूजन कर ॥ २३ ॥२४॥ और शक्त्यनुद्बार बहुत 

७ ६ ७. कर ५. ७ ४... 

प्रकारके नेत्रेय चढावे और आरती आदि करें। ऐसे धूप, 

दीप और कपूरस जो विष्णु और शह्ढएक मक्तियवे्ध पूजन | है ॥ २३॥ न विद्या (अह्मज्ञान ) है, और न तपह्ी है और कपूरसे जो विष्णु और शह्भृए्का भक्तियूवेद्ध पूजव 


करे || २५ | भगवानक सम्मुखमें नाच और गान करे 

उस दि्त पतित, दुराच।री और पापियोंके साथ भाषण भी 
नहीं करना चाहिये और पद्मिनी एकादशीके दिन किसी 
भी दुराचारी पापी जनका स्पर्श न कियाकरे किन्तु उनसे 
अडगही रहे ॥ २६ ॥ झूठ वचन नहीं बोले, किन्तु सत्य 


पवित्र बचन बोले | रजस्वछ खत्रीका स्पश ते करे, किसी 


भी बाह्यग एवं गुरुकी निन्दा न करे | २७ ॥ वेष्णबोंके 
साथ मंदिरमें मगवानकी मूर्तिक्ते सम्मुख कथाका श्रवण 
करे | मलमासके शुकुृपक्षम जो पद्मिनी एक्रादशीका ब्र॒त 
भ्ै्‌ ४ के ह का किये 
हें, वह निजछ कर।। २८ | यदि तृवाक कारण पान 
विना रहा न जाय तो जछ या दुग्घक्ा पान करे, पर और 
क्रिघौमी पदा्ेका सतत ने करें | गान वायवादनादि 
पूव॑ 5 राजिम जागरण करे ॥ २५ | एक एक प्रदर बौतने- 
पर विश्यु और शररक। पूजन करना चाहिये | पहिले 
प्रहरकी पूतामें नारियलोंका अधेदान करे || ३० ॥ दुसरे 
प्रहरको पूजामें श्रीफोंका अधेदान करें तीसरे प्रहरकी 
पूजामें बिजोरोंका अध दे, एवम चतुर्थ प्रहरमें नारंगी या 
सुपारी विश्वेषर्पत्त चढावे। ३१ | पहिलछे प्रहर्में अभ्नि' 
ष्टोम यज्ञ का, दूसरे प्रहरमें वाजपेय यज्ञका, ठतीय प्रहरमें 
अश्वेघ्रव यज्ञक्न ।। ३२ ॥ और चतुर्थ प्रहरर्म जागरण कर- 
नेखे राजसूययज्ञका फछ मिलता है । इस पह्यनी एकाद- 
झीके ब्रतस बढकर पवित्र न कोई पुण्यानुट्रात हैं. न यज्ञ 
हैं॥ २३॥ न विद्या ( त्ह्नज्ञान ) है, और न तपही हैं) 


१ पतिलेः सहेत्यर्थ: । 


(४६८ ) वब्रतराज३ । ह 


[ एकादजी- 


नातः परतर तपः ॥ प्रायिव्यां यानि तीथांनि क्षेत्राण्यायतनानि च्‌॥ ३४ ॥ तेन स्नातानि 
इृष्टानि येनाकारि हरेत्रंतम्‌ ॥ एवं जागरणं कु्याद्यावत्सूयोंद्यो भवेत्‌ ॥३५॥ सूर्योदये जमे 
तीर्थे गत्वा खान॑ समाचरेत ॥ स्रात्वा चामत्य भवन पूजयेदेवमीश्वरम्‌ ॥ ३६ ॥ पूर्वोदितिन 
विधिना भोजयेद्राह्मणाउ्छुमाव ॥ कुम्मादिक च यत्वव प्रतिमां केशवस्य च्‌ ॥ ३७ ॥ पूज- 
. यित्वा विधानेन ब्राह्मणाय समपयेत्‌ ॥ एवंविधध व्रतं यो वे कुछते शुवि मानवः॥ २८ ॥ सफल 
जञायते जन्म तस्य मुंक्तिफलप्रदम ॥ एतत्ते सवेमाख्यातं यत्पृष्टो5ःह त्वयानघ ॥ रे९ ॥ ब्रतानि 
तेन चीणीने स्वांणि नृपनन्दन ॥ पद्मिन्याः भीतियुक्तो यः कुरुते ब्रतसुत्तमम ॥ ४०॥ अब 
ते कथायेष्यामे कथामेकाँ मनोरमाम्‌ ॥ नारदाय पुलस्त्येन विघ्तरेण निवोदिताम ॥ ४१ ॥ 
' क्ातंवीर्येण कारायां निशक्षित वीक्ष रावणम्‌ ॥ विमोचितः पुलस्त्येन याचायित्वा महीपतिम्‌ 
॥ ४२। तदाश्वर्य तदा श्रत्वा नारदों दिव्यद्शनः॥ पप्तच्छ च यथाभक्‍त्या पुलरुत्य॑ मानि- 
पुड्रवम ॥४र॥ नारद उवाच॥ दशाननेन विजिताः सर्वे देवा! सवासबाः ॥कातंवीर्भण विजिताः 
कर्थं रणविशारदः ॥ ४४ ॥ नारदस्थ वचः श्रुत्वा पुलर्त्यों घ्ानरिबरबीत्‌।॥ पुलस्त्य उबाच॥ . 
श्रूणु वंत्स प्रवक्ष्यामि कार्तवीयससुद्धवम्‌ ॥ ४५॥ पुरा चेतायुगे राजम्माहिष्मत्यां बृहत्तरः॥ - 
हेहयानां कुले जातः कृतवीर्यों महीपतिः ॥ ४६ ॥ सहर्न प्रमद।स्तस्य नृपस्य प्राणबछमाः ॥ 
न तासां तनय॑ काचिल्ेम राज्यधुरन्धरम्‌ ॥ ४७ ॥ यजन्‌ देवानिपतुन्सिद्धान्पातपूज्य महत्त- 
राव्‌॥ क्वस्तदादितं सवे लब्धवांस्तनये न. सः ॥ ४८ ॥ खुत बिना तदा राज्य न सुखाय . 
महीपतेः ।। क्ुघ्रितस्थ यथा भोगा न भ्वन्ति खुखप्दाः ।।४९॥ विचाये चैत्ते नृपतिस्तपस्तप्तु 











पृथिवीपर जितने तीये, झ्वत्र एबं दिव्य स्थान हैं ठव सभी 
तीथॉमें || ३४ ॥ उसने स्तान करकिये और उन क्षत्रादि- 
कॉंका दर्शनभी उसने करलिया जिसने विष्णुभगवानकी 
प्रसन्नता करनेवाले पद्मिगों एकादशीका ब्रत किया हें। 
ऐसे पद्चिनी एकादशीके दिल रात्रिमें प्रहर प्रहरपर राधा- 
कृष्ण तथा गौरीशंकरका पूजन करता हुजा जबतक लूर्य्यो- 
दय न हो तबतक जागरण करे ॥ ३५ ॥ फिर सूर्योदय 
होनेपर पवित्र तीथेके तटपर जाकर उसके जलूमें विधि 
पूयक सत्ान करें, पीछे अपने घरपंर आकर परमेश्वरका 
पूजन करे ॥ ३६॥ पूर्बोक्त विधिस सदाचारी ब्राह्मणोंको 
भोजन करावे, जो कछश आदि पूजाकी सामग्री एवं जो 
सुत्र्णादिकोंकी मूर्ति है ४ ३७॥ उसका पूजन करके ब्राह्म- 
णके लिय विधिवस्मदान करे। जो मनुष्य भूमण्डलमें ऐसे 
ब्रतका अनुष्ठान करता है ॥ १८ ॥ उसकाही जन्प्र सफल 
हैं, उसही मुक्ति मिछती है| हे अनध ! जो तुमने मछू- 
मासमें शुहृृपक्षकी एकादशीके ब्रतके विधानादि पूछे थे, 
वे सब.मेने कहदिये ॥ ६९ ॥ हे नृपनन्‍्दन ! जो प्रेमपूर्वंक 
_ :पद्मिनी एकादशीका पत्रित्र त्रत करता है, उसने सब ब्रत 

'कर लिये ॥२०॥ इस असज्ञमें में तुम्हारे छिये एक मनोहर 
,कैथा कहता हूँ,वह पंहिले पुछस्यजीने नारदमुनिको विस्तू- 
. वरूपसे सुनायी थी ॥॥४१॥ जब कात॑वीयन रावणको कारा- 
! गरम ढाढ॒दिया था, तब पुलस्त्यजीने सहस्र बाहुस माँग 


कर रावणका छुटकारा कराया था ॥ ४१ ॥ डिव्य ज्ञानी 
नारदमुनि इस अद्भुत व तान्तको सुनकर बडे आदरसे मुनि- 
वर पुल्तत्यस पूछने छगे।।४ ३॥कि,द शानन रावणने इन्द्रादि 
सद्दित सभो देवा जीत लिये थे, फिर ऐसे संग्राम त्रिजयी 
रावगको कायब्रो उते के ते जोता! ।।७४॥ नारदमुनिनें जब 
ऐसा ग्रइन किया तब उस प्रश्वको सुनकर पुलस्त्य मुनिनें 
उत्तर दिया कि, हे वत्स ! पहिले तुम कातंबीय जैंस 
उत्पन्न हुआ है उस वृत्तान्तकों सुनों || ४५।॥ पूव त्रेता- 
युगर्में माहिष्मती नगरीका अत्यन्त प्रातापी राजा कृतबीये, 


हैहय नामसे पसिद्ध क्षत्रिय वेशमें उत्पन्न हुआ ॥ ४६॥ 


प्रणोंके समान पियारी एक हजार युवती रानियां थीं पर 
उनमें किसीभी रानीके गर्भ एकभी पुत्र उत्पन्न नहीं हुआ 
था जो राज्यके भारकों घारण करता ॥ 8४७ ॥ तब वह 
कृतबीय राजा रवताओंका यजन, एवं किदृ, सिद्ध अ 

बड़े बडे महत्वाओंका विधिवत्‌ पूजन तथा उनकी अक्ञा- 
नुसार सब प्रह्मारके और और दानादि पुण्यानुष्ठान करता 
रहा पर उस पुत्रड्ा छाभ न हुआ ॥ ४८ ॥ जेसे भूखे 


। ओर और पदार्थ केसही उत्तम हों, पर भोजनक 


बिता कोई भी मनोरम नहीं छगते, ऐलेदी पुत्रके 
छिय्रे छाछ्ायित उतर क्ृतत्रीय राज-को पुत्रकें मिट विवा 
राज्यक्नी सब सुखसम्पत्ति रुचिकर नहीं हुई ॥ ४९॥ 
फिर उसने कर मन पा यही निश्चय किया कि, में तप करूं, क्‍योंकि 


१ मुक्तिफलप्रद ब्रत्नसित्यन्वय:। 


श्रतानि, ] प्राषाटीकासमेलः । ( ४६९ ) 





मनो दधे ॥ तपसेव सदा सिद्धिर्जायतें मनसेप्सिता ॥ ५० ॥ इत्युकत्वा स हि धर्मोत्मा चीश- 
वासा जटाधरः ॥ तपस्तप्तुं गतः सद्यो गद्दे न्‍्यस्य सुमन्त्रिणम ॥ ५१॥ निर्गतं॑ नपातिं वीक्ष्य 
पद्चिनी प्रमदोत्तमा | हश्श्चि्द्रस्य तनया तपस्तप्तुं कृतोद्यमम्‌ ॥ ५२॥ भूषणादि परित्यज्य 
चीरमक समाश्रयत्‌ ॥ जगाम पतिना साद्ध पव॑ते गन्धमादने ॥ ५३ ॥ गत्वा तत्र तपस्लेपे 

वर्षाणामयुत नृपः ॥ न लभ्ेष्थापि तनय॑ ध्यायन्दव गदाधघरम्‌ ॥ ५४ ॥ अस्थिस्तायुमयं कान्तं 
हृष्ठा सा प्रमदोत्तमा ॥ अनसूयां महासाध्वीं पप्रच्छाबविनयान्विता भतुंः प्रतपतः साध्यि 
व्षोणामयुतं गतम्‌ ॥ तथांप न प्रसन्नोःभत्केशवः कष्टनाशनः ॥५६॥ ब्रतं मम महाभागे कथ- 
सब यथातथम ॥ येन प्रसन्नों भगवान्भविष्यति सदा मयि ॥ ५७ ॥ येन जायेत मे पुत्रश्चऋ- 
वर्तती महत्तरः !! श्रत्वा तस्यास्तु वचन पतिब्रतपरायणा ॥ ५८ ॥ तदा जोवाच संहष्टा पश्चिनीं 
पद्मलोचनाम मासो ॥ मलिम्लुचः सुश्र मासद्वादशकाधिकः ॥ ५९ ॥ द्वाेशद्षिगतनासरा 
याति स शुभानने ॥ ततन्मध्ये द्ादशीयग्म॑ पञ्मिनी परमा तथा ॥ ६० ॥ उपोष्य तत्मकतेव्य॑ 
विधिना जागरे! समम्‌ ॥ शीघ्र प्रसन्नो भगवान्‌ भविष्यति झुतप्रदः ॥ ६१ ॥ इत्युकत्वाकथयत्‌ 
स्व मया पूर्वोदित नुप ॥ विधिब्रेतस्थ विधिवत्मसन्ना कदेम[ड्रजा॥ ६२ वा ब्रतविर्थि- 
सर्व यथोक्तमनसूयया ॥ चक्रे राक्षी च तत्संब पुत्रप्तातिममीप्सती ॥ ६३ ॥ एकाददयाँ निरा- 
हारा सदा जाता च नि्जेला ॥| जागरेण युता रात्रों गीतनवृत्यसमन्विता ॥ 5४ ॥ पूर्णे व्रते च वे 
शीघ्र प्रसन्न: केशवः स्वयम्‌ ।। बसाषे गहडारूटों वरं वरयथ शोमने ॥ ५०॥ श्र॒त्वा वाक्य 
जंगद्धातुः स्तुत्वा मीत्या शुचिस्मिता | ग्याचेदद्य वरं देहि मम मत्तबंहत्तरम्‌ ॥६छ७॥ पत्मिन्या 


स्‍्तद्गचः श्रत्वा प्रत्युवाच जनादनः॥ यथा मालिम्लुचो मास्रो नान्‍यो में प्रीतिदायकः ॥। ६७ ॥ 





केवल तपही ऐसा है, जिसके प्रभावस्र मनो5मिलूषित | 


सिद्धि मिछती है ऐसे अपने सनमें विचारऋर तप करनंका 
मन कियां ॥ ५० ॥| वह अपने राजचिन्होंकों छोड मुनि 


यॉके चिहोंको घारणकर राज्यका भार घमनिष्ठ विश्वासी | 
| एकादशी आती हू । एकका नाप पद्मिनी, दूसरीका नाम 
| प्रमा हैं।। ६० ॥ उतर दोनों एकादशियोंस अपने नगरवा* 
कर जटा बढाकर बनमें चछा गया ॥५१॥ जब वह राजा | 


उत्तम मन्त्रीके ऊपर छोडकर एवं उसे महलाॉमेही रहनेके 
लिए अनुमति दे झटपट तपश्चर्ग्याके छिए चौर वस्र धारण 


तप करनेके लिए बनमें गया तब राजा हरिश्वन्द्रकी पुत्री, 
पद्मिनी रानीने भी अपने भूषणादि छोडकर एक चीरवस्र 
भघारण कर लिया और अपमे पतिके साथ २ गन्धमाद्नप्व॑त 
पर पहुंची | ५२-५३ ॥| फिर उस कृतवीय राजंनें दुश- 
सहस्न वषपयन्त गदाधर भगवानकी ध्यानपूवक तदथश्चर्यों 
कौ, पर पुत्र ढाभ नहीं किया ॥ ५४ | तब उसने पतिके 
हड्डी और स्तायु मात्र अवशिष्ट शरीरको देखकर पतित्रता 


प्राथना कौ ॥ ५० ॥ कि हे साध्वि ! मेरा पति अयुतवर्षासे 
बाढे द्यानिधि नारायण प्रस्नन्न नहीं हुए । ५६ ॥ इसलिए 


हू महाभागे | आप मेरे छिए किसी उत्तम ब्रतका उपदेश 
जिसके करनेस मुझपर भगदान्‌ अवश्यही प्रसन्न हो 





कि ये ५७] मर गससे ऐसा पुत्र जत्पन्न हो ॥। जो बड्डा । 
प्रतापशाल़ी चक्रवर्ती राजा बने ऐसे जब १द्मिनी रानीन | 
प्राथना की, दब पतित्रतर्क पाछनमें परायणा अलुसूयाजी 





॥ ५८ ॥ प्रसन्न होकर कमलके समान विशाकह नेत्रवाली 


| पद्मिनीस बोलीं कि, हे सुञ्न ! हे सुमुखि ! प्रायः बत्तीस 
| मास बीतनेपर बारह मा्सोंसे अधिक एक मास आया 


करता है, उसे मलमास कहते हैँ ॥ ५० ॥ उस मासमें दो 


सियोंके साथ विधिंबत्‌ उपवास करो, उध्से तुम्हारे ऊपर 


| नारायण बहुत जरदी प्रसन्न हों जायैंग । अभिलपित पुत्रका 


प्रदान करेंगे ॥ ६१॥ है नूप | फिर मेने जसी पविषि 
तुम्दारे लिए कही थी, वही ऋदेमनन्दिनी अनसूयाजीने 
उस पद्मिनी रानीसे कही १ ६२ || पद्चिनी रानीने अन- 


| सूयाजीकी कही हुयी व्रत विधिको अच्छीवरह सुनकर पुत्र- 


प्राप्तिक लिए ब्रतानुष्ठान किया ॥ ६३ ॥ एकादशीके विन 


| जलपान और भन्नाहार नहीं किया, रात्रिम जागरण, मान 
मुख्य अनसूया दवीके समीप जाकर बहुत नम्रतासे | 


और नृत्य किये | ६४ ॥ एसे जब उसका वह त्रत पूणे 


| हुआ; तब नारायण आप प्रसन्न होकर गरुढपर चढ झट 
तप कर रहा है, पर फिरमसी दूसरोंके कष्टोंको दूर करने- | वहां आ पधारे और बोले कि, दे शोभने ! तुम वर सांगो 
॥। ६५॥ ऐसे जब प्रसन्न होकर जगद्»गिवाता नारागणने 
| बर सांगनेको कहा। तब प्रसन्न होकर स्तुति की, फिर उसने 
| प्रसन्नतास मंदहासके साथ प्राथना की कि, मरे पतिकी जो 


| बडीभारी अभिलाषाह उसे आप पृण करें ५६६॥ जनादन., 


भगवान पद्चिनीके वचनोंको सुनकर बोले कि, जसा मुझे 
अधिकमास प्रिय है; वेंसा और कोई नहीं हे, ॥६७॥ उस 


हि 


(9७० ) ब्रतराजः | [ एकादशौ- 




















तम्मध्येकादशी रम्या मम प्रीतिविवद्धंनी ॥ सा त्वयोपोषिता सुथ्रु यथोक्तविधिना शुभ ॥ ६८ ४ 
मेन त्वया भसतन्नोपह कृतोईस्मि सुभगानने ॥ तव भरक्तुंः प्रदास्यामि वर यन्‍्मनसेप्सितम्‌ ॥ ६९॥ 
इत्युकत्वा नृपातें प्राह विष्णुविश्वार्तिनाशनः ॥ वर वरय राजेन्द्र यत्ते मनसि कांक्षितम्‌॥ ७० ॥ 
सन्‍्तोषितो5हं प्रियया तव सिद्धिचिकीषंया ॥ श्वत्वा तद्गचनं विष्णोः प्रसन्नो नपसत्तम: ॥ ७१॥ 
बत्रे खुतं महाबाहुं सर्वहोकनमस्कृतम्‌ ॥ न देवेमोल॒पेनागेर्देत्यदानवराक्षसे॥७२॥ जेतुं शक्षों 
जगन्नाथ विना त्वाँ मधुसूदन ॥ इत्युक्तो मगवान्‌ बाढभित्युकत्वान्तरधीयत॥७र॥ नृपोषुपि सुप्रस- 
म्रात्मा दृष्ठः पुष्ठः फत्रियायत॥ समायात्‌ स्वपुर रम्यं नरनारीमनोरमम॥७४।।स पश्मिन्याँ सुतं लेगे ._ 
कातंवीय महावलम॥न तेन सदशः कश्रित्रिषु लोकेष मानव:७५॥ तस्मात्पराजितःसंख्ये रावणों 
दशकन्धरः ॥ न त॑ जेतं समर्थोइस्ति त्रिषु लोकेष कश्वन ॥ ७६ । विना नारायणं देवं चक्रपाणि 
गदाधरम्‌ ॥ न त्वया विस्मयः कायों रावणस्प पराजये ॥ ७७ ॥ मलिम्लुचप्रसादेन पश्षिन्पा- 
श्राप्युपोषणात्‌ ।। दत्तो देवाधिदेवेन कातंवीयों महाबलः ॥ ७८ ॥ इत्युक्त्वा प्रययो विप्रेः प्रस- 
न्लेनान्तरात्मना ॥ श्रीकृष्ण उबाच ॥ एतत्ते सर्वमाख्यातं यत्वृष्टोएह त्वथानघ ॥ ७९॥ महिः 
म्लचस्थ मासस्य शुक्लाया व्रतमुत्तमम्‌॥ ये करिष्यन्ति मतुजास्ते याध्यत्ति हरे! पदम॥८० 
त्वमेव॑ कुरू राजेन्द्र यदि चेष्टमभीप्ससि ॥ केशवस्य वचः अ्त्वा धर्राजोइतिहर्षितः ॥ <१॥ 
चक्रे ब्रत॑ विधानेन बन्धुमिः परिवारितः ॥ खूत उवाच ॥ एतते सर्वमाख्यातं यत्वष्टो5६ पुरा 
ह्विज | पुण्य पवित्र परम कि भूयः श्रोतुमिच्छसि ।।८२॥ एवंविधं येषरपि व्रतं मठष्या भक्ता 





मासमें भी पद्मिनी एकादशी मेरेको बहुत प्रिय है। हे सुश्र ! 
तुमने उस एकादशीका ब्रतानुष्ठान शास्बोक्त विधिक भनु- 
सार किया है ॥६८॥ हे सुभगे सुदरमुखि ! उस बतमने मुझे 
प्रसन्न किया है, इससे में तुम्हारे ऊपर प्रसन्न हूं, जो तुम्हारे 
पतिके मनकी अभिद्ाषा हे, उसे में पूण करूँगा ॥ ६९॥ 
जगतके दुःखोंको शांत करनेवाले विष्णु भगवान्‌ ऐसे कहा 
कर राजा कृतवीयसे बोछे कि, हे राजेंद्र | जो तुम्हारे 
मनमें अभिलषित वर सांगना हो, उसको मांगों ॥ ७० ॥ 
क्योंकि, तुम्हारी रानीने तुम्दारी तपश्चर्याकी सिद्धिक छिए 
मुझे सन्तुष्ट कर दिया है ऐसे जब भगवानने कहा ॥७१॥ 
तब नृपसत्तम कृतवीयने प्रसन्न होंकर यही वर माँगा कि, 
मुझको ऐसा पुत्र दो, जिसकी छम्बी भुजा हों, सब छोग 
जिसको प्रणाम करें और हे जगनज्ञाथ ! हे मधुसूदन ! 
जिसको आपके विना न देवता, न मनुष्य, न नाग; न देत्य 
न दानव और न राक्षसही जींतसकें। ऐस जब कतवीयने 
बर मांगा, तब भगवान्‌ “अच्छा ऐसाही हो तुम्हारे पुत्र- 
होगा” ऐसा वर देऋर अन्तहिंत हो गये ।। ७२-७३ फिर 
राजा कृतवीयभी अपनी रानीके साथ प्रसन्नतास हृ४ पुष्ट 
दोकर नरनारियोंस रमणीय अपनी माहिष्मती राजवानी में 
, चछा आया ॥ ७४ ॥ कृतवीयसे पद्चिनीम॑ महाबरुशाली 
._पुन्न उसन्न हुआ, कई कातेबीय ऐसा पराक्रमी छुआ कि 
, 'उसके सम्मान वीनो ढोकोंमें कोई भी नहीं था ॥ ७५॥ 


. इसीछिए संग्राममें उस हातेबीयेने रावणकों पराजित किया. 


त्रिन्‍्"ोकोमें उस जीतनेके छिए एक चक्रपाणि गदाधर नासा* 
यणके सित्रा दूसरा कोई समर्थ नहींथा .। इस काएय . 
आपको रावणके पराजय पर - आश्रय न करना चाहिये 
॥ ७६ ॥ ७७॥ मल्म्छुच मछमासकी प्रसाद और पद्चिनी 
एकादशीके उपवाससे प्रसज्ञ होकर देवाधिदेव परसेश्वरने 
महाबली कार्तबीयको प्रदान किया था ॥ ७८ ॥ इतना कह 
कर अन्तःकरणमें उस प्रकार अपने पोत्रके पराजय परमी 
प्रसज्ञता घारण करते हुए, पुछस्त्यजी चले गये। श्रीकृष्ण- . 
चन्द्र बोढ़े कि, हे अनच ! जो तुमने पूछा था। वह सब _ 
वृत्तान्त मेन तुम्हारे छिए कहा ॥ ७९।॥ जो मनुष्य महि* 
म्युच मासमें शुक्रपक्षवाद्ली पदह्मिती एकादशीके पवित्र 
प्रतको करेंगे. वे भगव्रानके पदको प्राप्त होंगे ॥<८०९॥| है. 
रजेंद्र | यदि अपने मनोरथ पूर्तिकि लिए उत्कण्ठा हैं) के . 
तुमभी इस ब्रतकों करो, सूतजों शौनकादिकोंसे कहरहे है 

कि, ऐसे जब श्रीकृष्ण बन्द्रजीने कहा तव धमंतन्दुव राजा 
युधिष्ठिर अत्यन्त प्रसञ्न हुआ ॥ ८१॥ एव. अपने बाल: 
बॉके साथ विधिपूर्वक पद्चिनीका जन्नत किया । सुतजी बोढे 
क्रि, हे द्विज ! पहिले जो तुमने मुझसे पूछाथा, मेने वह वंई 
सब तुम्हें कह दिया | यह आख्यान पुण्य एवं परप्त पवित्र 
है। अब और तुम क्या सुनना चाहते हो, सो कहो ४८ऐ 
जो कोई भी भक्तजन एसे उत्तम अधिकमास सम्व नबी 





ऐ। | बल: 3हः पं ऑ१७४ 
॥ आह | 
7७8 क है| 
हा श्र 


करिष्यन्ति मलिम्डुचस्य॥उपोष्य शुक्रामतिसतौर्य दातीमे झादरीं ते श्रुत्रि धन्यवत्या: ॥ <३े ॥। 
श्रोष्पन्ति ये तस्य विधि समग्र तेः्यशभाजों मठुज़ा भवरिति ॥ ये वे पठिष्यन्ति कथां समग्राँ 
ते वे गमिष्यन्ति हरेनिवासम्‌ ॥८४॥ इत्यधिकमासस्य शुकैकादशीकथा समात्ता ।। 
अथ धिक्मापकष्णेकाद गी इथा || 

युधिष्ठिर उवाच ॥ मलिम्लुचस्य माससय कृष्णा का कथ्यते विभो ॥ कि नाम को विधि- 
सतस्याः कथयस्व जगत्पते ॥ १॥ श्रीकृष्ण उबाच।परमेति समारूषाता पवित्रा पापहारिका || 
भ्रुक्तिमुक्ति[दा नृर्णों ख्रीणां चापि सुधिष्ठिर ॥२॥ पूर्वोक्ततिथिना कार्या कृष्णापि अुवि 
मानवेः ॥ संपूज्य परया भकत्या नाम्ना देवं नरोत्तम ॥शाअत्र ते कथाथ्रष्यामि कथामेतां मनो- 
रमाम्‌ ॥ काम्पिल्यनगरे जाता सुनीनामग्रतः श्रुताम्‌ ॥ ४ ॥ आसीहि जवरः कशथ्रित्सुमेघानाम 
धार्मिकः ॥ तंस्थे पत्नी पवित्रारूपा पातित्रत्यररायणा ॥ ५ ॥ कर्मण। केनचिद्विप्रो धनधान्य- 
विवर्जितः ॥ न कांपि लभते भिक्षां याचत्रपि नरान्वहून्‌ ॥ ६॥ न भोज्यं लमते ताइदन 
बस्तर नेव मण्डनम्‌ ॥ रूपयोवनमाधुयों नारी झुश्नूवत पतिमू ॥ ७ ॥ अतिथि मोजयित्वा सा 
क्षुष्रितापि स्वयं गहे॥तिछत्येवर विशालाक्षी ह्मम्लानमुखपड़ जा॥८॥न भतार कचिदपि नास्त्यन्न- 
म्रिति माषते ॥ विलोक्य भावों खुद॒ती कषती स्व ऋलेवरम्‌ ॥९॥ विचार्य ब्राह्मणश्षित्ते भार्यायाः 
प्रेमबन्धनम्‌ ॥ निन्‍दन्भाग्यं स्व खिन्नः पोचे वाक्य भ्रियंवदाम्‌ ॥ १० ॥ कानते करोमि कि 
कार्य न मया लग्यते घनव्‌ ॥ याचामि च नरान्मव्यान्न यच्छनति च मे धनम्‌॥ २१ ॥ कि 
करोमि कछ गच्छामि तनन्‍मे कथय शोभने ॥ बिना धनेन खुश्रोणि गहकार्य न लिद्गचनति ॥ १२॥ 


धाषाटीकासमेलः । ( ४७१ ) 


शुक्छपक्षकी इस एकादशीके ब्रतकों भक्तिस करेंगे, वे सब 
उस महासोख्यदायिनी एकादशीके ब्रतप्रभावसे मनुष्य- 


है 8 रे लांशको 
सम्पूण विधिको सुनेंगे, वे भी उस ब्रतक फ प्राप्त 
होंगे । एवं जो इस सम्पुणे कथाकी पढेंगे, वे भगवानक 


दुक्ीके ब्रतकी कथाका निरूपण समाप्त हुआ ॥ 


है ! सो आप कहो ॥ १ ॥ श्रीकृष्ण चन्द्र बोढे कि, युधि- 
प्विर | इस एकादशीका नाम परमसा है और यह पवित्र एवं 
परापोंका विध्वंसक रनेवाल्ली तथा स्री ओर पुरुष इनसभीके 
छिए भोग व मोक्षकी देनेवाली है ।| २॥ हमने जो शुक्छा 


कृष्ण एकादशीके ब्रत करनेकी भी विधि हैं। इसलिए हे 
नेरोत्तम | उसी विधिसे पुराणपुरुषका पूजन परम प्रेसपूर्वक 


इस एक सनोरम कथाका अ्व्रण कराता हूं, जो सेन मुनि- 


यॉके कल सम्मुख सुनी थी ।| ३ ॥ ४ || एक सुरेधा नामृक | 
वधमनिष्ठ द्विजोत्तम हुआ था,उसकी पत्नीका नाम पवित्रा | 
या। वह परम पतित्रता थी ॥ ५ ॥ पर उसका पति किसी | 


दुष्टक्मके कारण घन धान्यसे दहीव होगया था । वह 


थ जब कभी भिक्षाके लिये जाता था, तब उस बहुतसे 





पुरुषोंसि भिक्षा मांगनेपर भी कुछ नहीं मिछता था ॥६। 
६ | न वसा भोज्य पदार्थ ही मिछता था जिससे उनका उद्रही 
छोऋमें अत्यन्त धन्य धन्य होंगे ॥ ८३ ॥ जो इस ब्रतकी । 


भरे | न वस््र वेंसा मिलता था,जिससे उन दोनोंके अड्गोंका 


| अच्छादन भी होसके | ऐसे जब अन्न वश्लकीही चिन्ता 
| सदा रहती थी.तब आभूषणोंके मिलनेकी चर्चा ही केस्ती ? 
पदको प्राप्त होंगे ॥ ८४ ॥ यह अधिक मासकी शुक्छा एका- | फिर भी रूप, यौवन और गुण्णोके गौरवसे मधुरा पवित्रा 
| नामकी ब्राक्षणी अपने पतिकी शुश्नव्या करती ही रहती थी 

अब मलिम्छुचमासकोकृप्णा एकादशोका ब्रत माहात्म्य | 
कहते ह-राजा युधिष्ठिर बोले कि, है विभो ! हे जगत्पते ! | 
मलछमासकी कृष्णा एकादशीका क्या नाम है ? क्‍या विधि | 


॥ ७ ॥ कोई उसके घरपर अतिथि आता था, तो आप उत्त 
पहिले भोजन कराती थी | आप अन्नके अवशिष्ट न रहनेपर 
अपने घरमें भूखीही रहती, किन्तु वह विश्ञालनेत्रा सुन्द्री 
जराभी अपन मुखकमलको म्डानन करती थी ॥ ८॥ 
पतिकोभी कभी ऐस नहीं कहतो थी कि, आज खातनेके 
लिए घरमे कुछ अन्न नहीं है । सुधर्म्मा ब्राह्मण उस सुन्दर 


के | | दन्‍्वॉवालील्लीको दुबलाती हुईं देखकर ॥ ९॥ मनमें उसके 
एकादकझ्लीके ब्रतकों करनेकी विधि पूत कही थी, वही इस | 


प्रेनब्नन्धनक्की ओर दृष्टि गेर फिर खिन्न होकर अपने मन्द 


| भाग्यकी लिन्‍्दा कर श्रिय वचन बोडनेवाली ब्राद्मणीसे 
| बोला कि; है कान्‍्ते ! मुझे क्या करना चाहिए ! म अच्छे 
करना चादिय । इस विषय में तुमको काम्पिल्यनगरकी | 


अच्छे छोगोंके यहां जाकर भिक्षावृत्तिभी करता हूं, पर के 
भी मुझे कुछ नहीं देते | १० ॥ ११ ॥ अतः मुझको कहीं 
सभी कुछ नहीं मिलता । अब में क्या करूं, कहां जाऊं? 
हैं शोभने ! इससे जो कुछ उपाय तुझको उत्तम मालूम 
पडता हो, उस मरे लिए बता दो। हे सुश्रोणि ! बिना 


| घनके घरका कोई भी काये नहीं चछता ॥ १२ ॥ अतः 
| आप मुझको घन कमाझर छानेके छिए परदेश जानेकी 


१ रूपयोज नमात्रेण साधुर्स र॒स्यस्ते यस्‍्याः सा । 


ब्रतराजः । [ एकादब्ली- 


रह 5 जा: 42203 उकंटगआाााष्ा अत कैम हक ४+ज्च बह इ कपल अटल यम 2: पी कर हक पाप जप हुए पलक पाप 67 के 
5 





जम 


देह्याज्ञां परदेंशाय गच्छाम्रि धनलब्धये ॥ पस्मिन्देश च यत्माप्य भोग्य तत्रेव लबम्यते ॥ १३॥ 
उच्ममेन विन लिद्धिः कर्मणां नोपलब्यत ॥ तस्सादुबुधा) मशंसत्ति स्वथव शुभोद्यमम्‌ ॥१७॥ 
श्रत्धा कान्तस्थ वचन साथश्रुनेत्रा विचक्षणा॥ प्रोवाच प्राखलिभूत्वा विनयानतकन्धरा ॥ १९॥ 
त्वत्तो नास्ति सुविज्ञातः त्वयाज्ञत्ता ब्रवीम्पहम्‌ ॥ हितविणों नरा ब्रय॒ुः शश्रत्साघु ह्यसाध्यपि 
॥ १६॥ पूर्वदत्त हि लब्गेत यत्र कुत्र महीतले॥ बिना दाने न लम्पेत मेरों कनकपवेते ॥१» 
पूर्वदत्ता हि या विद्या पूर्वदत्त हि यद्धनम्‌ ॥ पूर्वदत्ता हि या भूमिरिह जन्मनि लम्यते ॥ १८ ॥ 
यद्धात्रा लिखितं माले तत्तथेव हि लम्यते ॥ बिना दानेन तु क्वापि लम्यते नेव किश्वन ॥ १९॥ 
पू्वजज्माने विभेन्‍्द्र न मधा म त्वया कचित्‌॥ सत्पात्राणां करे दत्त स्वरुप भुययपि सद्धनम्‌ 
॥ २० ॥ इह देशे परे वापि दत्त सत्च लभ्यते ॥ अन्नमात्र त विश्वेशों विना दत्तेन यच्छति 
॥ २१ ॥ तस्मादत्रेव विप्राम्य स्थातव्य भवता मया ॥ त्वां बिनाह न तिष्ठामि क्षणमाप्त॑ 
महामुने ॥ २२॥ न माता न॒ पिता शअ्रञाता न श्वश्रः खशुरों जनः ॥ न सत्कुवेन्ति केपषपि 
स््रींस्‍्वजनाश्व परे कुतः ॥ २३॥ भत्रो वियुक्तां निरइन्ति हुर्भगेति बदन्ति च ॥ तस्मादत्र 
स्थिरों भूत्वा विहरस्व यथासुखम्‌ ॥ २४ ॥ मवतो भाग्ययोगेन भातिश्रात्र भविष्यति ॥ श्र॒त्वा 
तस्यास्तु वचन स्थितस्तत्र विचंक्षणः ॥ २५ ॥ तावत्तत्र समायातः कौण्डिन्यो मुनिसत्तमः॥ 
दृष्ठा समागतं हृष्टः सुमेधा द्विजसत्तमः ॥ २६॥ समभार्यः सहतलोत्याय ननाम शिरस5उसकृत्‌ ॥ 
धन्योपप्यलुगहीतो<स्मि सफले जीवित मम ॥२७॥ यहश्टोसि महामाग्यादित्युवाच मुनीश्चरम ॥ 
द्रवा खुविष्टरं तस्मे पूजयामास ते द्विजम्‌ ॥ २८ ॥ भोजयित्वा विधानेन पत्नच्छ प्रमदोत्तमा॥ 





अनुमति दे दीजिए | जिसदेशमें जिसको जो मिलनेवाढा 
होग है वह वहीं जानेपर उसी तरह मिलता है॥१३॥उद्यम 
किए बिना कोई भी कारय सिद्ध नहीं होता,इसलछिए विद्वान 
छोग शुभ उद्यमकीही सवेथा प्रशंसा किया करते हैं, उसेही 
अच्छा बताया करते हैं॥ १७ ॥ पतिके कहें वचरनोंको 
सुनतेही उसके नेत्रोमिं जलभर आया; नम्नतास शिर नमा 
अखछि जोडकर वह विशाठनयनॉंवाछी बुद्धिमती त्राह्मणी 
बोली कि, हे प्रभो ! आपस अधिक में अच्छा जानती भी 
नहीं हूँ, कर भी आपने मुझे आज्ञा दी है, इससे में कुछ 
कहती हूं । अच्छा हो या बुरा हो वह सब हितिषियोंको 
उसे अवश्य एवं सब कालॉमें भी कह देना चाहिए ॥॥१५॥ 
॥ १६ ॥ जो कोई जो कुछ पूवेजन्मम जिस किसीके छिए 
देता है, वह उतनाही उससे जिस किसी भी देशमें जानेपर 
दूसरे जन्ममें प्राप्त कर लेता है। यदि पूर्व जन्ममें कुछ दान न 
किया हो तो वह कंदाचित्‌ सुमेंर पवृतपर भी पहुँच जाय, 
पर उसे वहांपर भी कुछ नहीं मिठ्ठ सकता ।। १७ ॥ इस- 
. छिए पहिले जन्ममें जो विद्या दी है; जो धन दिया है; जो 
फथिवी दी है, वही इस जन्ममें फिर उस मिलती हैँ ॥१८॥ 
: बिधवाताने जो जिसके कुछ छलाटमें छिख दिया, उसीके 
» अलजुसार उसे मिलता हें,पूर्व जन्ममें दिये बिता दूसरजन्ममें 


परदेशम क्या ! कहीं भी भटके, पर सभी जगह दी 3 
मिलता है। हाँ विश्वेंमर भगवानकी यह दया है कि, वह 
पूवजन्ममें अन्नदान न देनपर भो प्राणियों क्री उद्रपूर्तिडे 
लिए अजन्नतो दही देता हैं ॥ २१॥ अतः हे विश्ाप्न्य ! 
आप यहीँ रहें, हे महामुने |! आपके बिता में एक मुहूते 
भर भी न जीवित रहूंगी ॥ २१५।॥ न माता, न पिता; न 
भाई, न खासू , और न श्वशुर ऐसे कोई भी स्लीका आदर 


नहीं करते फिर अन्य अन्य बान्धवोंसे आदर पानेकी 


आश्याही केसी हे ? || २३ । पतिके वियोगपर स्रभी जब 
खीको दुभेगा कहकर पुकारते हैं । इससे आप यहांद्वी भेय॑ 
रखे रहेँ, यहांही घुखसे विहार करें ।। २४ ॥ आपके भाग्यसे 
यहांही धनभी मिल जायगा, ऐस जब प्रियाने कहा, तब 
वह सुमेधा वहांही रहगया।२५॥छ्िर कुछही अशेपर मुचि- 
वर कौण्डिन्य वहां आ पधारे सुमेधा ब्राह्मण उनको आए 
देखतही बहुत प्रसन्न होकर अपनी स्रीसहित खडा होगया। 
बारबार शिर नमाकर प्रणात्त कर कहने छगा कि; में घत्व 
हूं, में अनुगृहीत हूं, आपने मुझे अपनी क्रृपाका पात्र ब्नों 


लिया, मेरा जीवन आज सफड़ होगया॥२६।।२७॥क्योंकि 


मुझे आपके द्शन महाभाग्यसही हुए हैं । इसके पीछे मुनी' 


. ऋह्टींमी फिर,उसे कुछ भी नहीं मिछता ॥१९॥ हे विप्रेन्द्र ! श्वरजीके विराजनेके रिए सुन्दर आसन विछाया। अर 
है झ्ू आए हि ; पूर ३ लक तप गे थ्‌ कफ थे पविक 
थे दे जोर न अपने पूजे जन्मे सत्यात्रोंके- हाथमें थोडा | पूजन आतिथ्य किया ॥२८॥ सुमेधाकों साध्वी पविक्का 






+बक,, “" 


ि ! 
हि । आओ 52 आओ है ७ हु हा 3; अनाथ । थे गे बे कप की 
हक | का जा / | £ 47, 
१ के आए ही] 0४० “मु 5 ० 
,/. आज क आह । 0 पर मर दिया ॥ ९५० ४ इस धर 
१ । * $.५ ७8 मी हि का ् 4 कर कक <03024 
० कि कई 9 शी व कण । के ४ | का डक 
५ ही रे ॥ कि: 8 ४ गि +... अऋऋ 
कौ. 2 है# ५ पं की की जा 
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विधिवत उन्‍्दें भोजन कराय पीछे पूछा कि, दें विद4। 


ब्रतानि, || भाषाटीकासमेतः । ( ४७३ ) 


























+बी, 


विद्वन्केन प्रकारेण दारिग्यस्य क्षयो भवेत्‌ ॥ २९ ॥ विना दत्ते कर्थ लभ्येद्धन॑ विद्या कुटुंबिनी ॥ 
मां में भर्ता परित्यज्य गन्तुकामोध्य बतते ॥ ३० ॥ अन्यदेश परॉछोकान्याचितं परपत्तने ॥ 
संप्राथ्य तु॒मया विद्वन्‌ हेठ॒वाक्येमंहत्तरेः ॥ ३१ ॥ नादत्त लभ्यते किच्विदित्युक्त्वा स निवा- 
रितः॥ मम भाग्यान्मुनीरद्राद्य त्वमंत्रव समागतः ॥ ३२२॥ दारिय त्वत्मसादान्म शीघ्र नहय- 
त्यसंशयम्‌ ॥ केनोपायेन विपेन्द्र दारिय नह॒यति घुवम्‌ ॥ रेशे।। कथयस्व कूगसिन्धों बतं 
तीय तपादिकम ॥ श्रत्वा तस्‍्याः खुशीलाया भाषितं मुनिषुद्धबः ॥ ३४ ॥ पोवाच शवरं चित्ते 
विचार्य व्रतम॒त्तमम्‌ ॥ सर्वपापौधशमन ढःखदारि्यिनाशनम्‌ ॥रे५।परमानाम विख्याता विष्णो- 
स्तिथिरतत्तमा ॥ मलिम्लुचे तु या कृष्णा ज्क्तिकक्तिफलप्रदा ॥ रे६॥ तस्याम॒पोषण कृत्वा 


कि: 


धनधान्ययुतो मवेत्‌ ॥ विधिना जागरेः साक॑ गीतवादित्रसंयुतम्‌ ॥ २७ ॥ धनदेन यदाचीण 
ब्रतमेतत्सुशोभनम्‌ ॥ तदा हृष्टेन रुद्रेण धनानामधिपः कृत+ ॥ रे८ ॥ हरिश्वन्द्रण च कृत 
पुरा ऋरीतछुतेन वे ॥। पुनः प्राप्ता प्रिया तेन राज्यं निहतकण्टकम्‌ ॥ रे ॥ तस्मात्कुर विशा- 
लाक्षि ब्रतमेतत्सशोभनम्‌ ।। यथोक्तविधिना भद्नें सम॑ जागरणेन च ॥ ४० ॥ इत्युकत्वा तद्विधि 
स्व कथयामास वाडवः ॥ पुनः ओवाच त॑ विष पश्वराजित्रतं शुभम्‌ ॥ ४१॥ यस्यालष्ठान- 
मात्रेण भक्तिसुक्तिश्व भ्राप्पते ॥ परमादिवसे पातः कृत्वा पौर्वाहिकं विधिम्‌ ॥ ४२॥ कुर्योत्‌ 
प्रनियमाउछकत्या पश्चरात्रिव्रतादरात्‌ ॥ प्रातः स्नात्वा निराहारो यस्तिषछ्ठेद्दिनपश्चकम्‌ ॥ ४३ ॥ 


स गच्छेद्वेष्णवे स्थान पित्माठभ्रियायुतः ॥ एकाशनस्ठ थो भूयादिनानां पश्चक॑ नर: ॥ ४४ ऐै 





सर्वपापविनिर्मु क्तः स्वर्गलोके महीयते ॥ स्नात्वा यो भोजयेद्विमं दिनानाँ पश्चक॑ नरः ॥ ४५ ॥। 
पी ७ ृृ०4०_टघटटट०टपपणिीपपपपपप/पप/।पेए 


के, 


ऐसा कौनसा उपाय है जिससे द्रिद्रता क्षोण हो  ॥२९॥ 
मैंने तो यही निश्चय कर रखा हें कि,पूव जन्ममें दिय बिना 
धन, विद्या और स्री किसीमी तरह नहों मिछती। आज 


मेरे पति मेरा परित्याग करके जानेको समुद्यत हैं ॥ ३० | 


उनका यह अभिप्राय है छि, में देशान्तरके किसी अच्छे 
शहरोमें जाऊं, वहां उदार सज्ननोंस घन माँगूं पर मेने 
बहुत बड़े बड़े कारण बताकर यहीं रहनेकी प्रार्थना की हें, 
इससे वे रुकगये हैं ॥ ३१॥ मेने यही कहकर उन्हें रोका 
है कि, हे प्रभो ! बिना दिया द्रव्य कहींभी नहीं मिलता । 
है मुनिराज | अब आप मेरे अच्छे भाग्यों त्त यहांही पघार 
आये हैं ॥३२॥ अतः में यही समझती हूँ कि। आपको 
प्रसन्नतास सेरे घरकी दरिद्रता अवश्य जल्दीही नष्ट दो 
आायगी । हे विग्रेन्द्र ! आप उसे बतावें जिस उपायसे कि, 
दरिद्रता अवश्य नष्ट होती है ॥ ३३॥ है क्ृपासिन्धो! 
आप ब्रत, तीर्थ और तप आदि कोई भी जो दारिद्रथका 
चाशक हो उसेही बतावें. जिसको करूं । मुनिने सुन्द्र स्व- 
भाववाडी पवित्रा नामक ब्राह्मणीके वचनोंको सुनकर।। ३४॥। 
अपने सनमें अच्छीतरह शोच विचारकरके समस्त पाप- 
चुण्यके ज्ञान्तकर एवं दुःख और दारिद्रथंक अन्तक एक 








उत्तम बतका उपदेश किया ॥ ३५ ॥ कॉन्डिन्य मुनि 
कहा कि, सल्स्लुचमासमें कृष्णपक्षकी विप्णुतिथि एका- 


उश्ली * परमा * नामसे विख्यात है, वह इस छोकमें भोग 


56. 


एवं परलोकमे मोक्ष देती हैं | ३६।। उस दिन उपवास कर- 
नेसे मनुष्य धनघान्यस सम्पन्न होता है । पहिले कुबेरने 
इसी परमा एकादशीके दिन विधिपूर्वंक उपवास कर 
रात्रिमं गान, वाद्य और जागरण किया था; तब उसपर 
महादेवजीने प्रसन्न हो ऋर उस धनाध्यक्ष बना दिया ॥३७)॥ 
॥३८॥ जिसने प्रिया और पुत्रभी बच दिया था उस राजा 
हरिश्न्द्रनंभी यही त्रत किया था, इसके करनपर फिर 
उसको ख्री, पुत्र और निष्कण्टक राज्य मिलगये ॥ ३५॥ 
इससे हे विशाल्यक्षि हे भद्रे ! तुमभी शाल्बोक्तवरिधिस जाग- 
रणपूर्वक इसी ब्रतको करो ।। ४० ॥ हे पाण्डव ! कोन्डि- 
न्‍्य मुनिन यह कहकर उस ब्रतकी विधिभी बतादी, पीछे 
उसे पाँच रात्रिका शुभ व्रतभी बलादिया ।। ४१॥ जिसके 
केवल अनुष्ठानसे मनुष्योंकों इस छोकमें भोग और परछो- 
३8४... ति कादशीके 
कम मोक्ष भ्राप्त होता है । परमा एकादशीके दिन प्रातःकाछ 
पूर्वाह्नोचित स्वान सन्व्योगरासतादि के करके ॥ ४२॥' 
पञ्चरात्र ब्रतको करनेके छिये शझक्तिके अनुसार उत्तम २ 
नियम करे,जो प्रातःकाल स्नान करके निराहार पूर्वक पाँच 
दिनतक नियमसे रहे ॥ ४३ | वह अपने पिता माता और 


प्रिया समेत वेकुण्ठपदको श्राप्त होता हैं जो एशक्ादशीसे 
नेनें | पूर्णिमातक पांचदिन एक दफेदी भोजनकरक रहें ता:/४४॥ 


बह सब पा्षोंसे छूटक स्वगेलोकमें प्रतिठठाकाम करता है । 
जो मनुष्य प्रतिदिन आतःस्तान करता छुआ पांच दिन उत्तम 


(४७४) , ब्रतराजः । [ एक्ादब्ी- 
/ &-------5<-423223+++###्]_]ौ_ू कसम ररमर्मर कं भ मम ऋ 32 2... 
भोजितं तेन हि जगत्सदेवासुरमाठषम्‌ ॥ पूण कुम्म॑ सुतोयेन यो ददाति द्विजातये ॥ १६ ॥ 
दत्त तेनेव सकल बह्माण्डं सचराचरम्‌ ॥ तिलपात्र तु यो' ददष्याद्राह्मणाय विपश्विते ॥४७॥ तिल- 
संख्यासमाः साब्वि स वसेन्नाकमण्डले ॥ घृतपात्र तु यो दद्यात्स्नात्वा पश्चदिन नरः ॥ ४८ ॥ 
स अक्‍त्वा विपुलान्भोगान्सूयेलोके महीयते ॥ बह्मचर्येण यस्तिष्ठेदिनानां पश्चक॑ नरः ॥ ४९॥ 
भुनक्ति स स्वर्गमोगान्स्वर्वेश्यातिः सम॑ सुदा ॥ एवंविधं ब्रतं सांध्चि कुरू त्वं पतिना जुम्े 
॥ ५० ॥ धनधान्पयुता भूत्वा स्वगे यास्यसि खुबते ॥ इत्युक्ता सा ब्रतं॑ चक्रे कौण्डिन्येन यथो- 
दितम्‌ ॥५१॥ भरना सम॑ भावयुता स्नात्वा मासि मलिम्लुचे ॥ पशथ्चरात्रव्नते पूर्ण परायः 
प्रियसंयुता ॥ ५२ ॥ सापश्यद्राजनवनादायान्तं नृपननदनम्‌ ॥ स दत्वा नव्यभवन भव्यवस्तु- के 
समन्वितम्‌ ॥ ५३॥ वासंयामास विधिना विधिना भेरितः स्वेयम्‌ ॥ दत्वा ग्राम वृत्तिकरं बाह्य. 
णाय सुमेधसे ॥ ५४ ॥ प्रसन्नस्तपसा राजा त॑ स्त॒त्वा स्वग॒हं ययो ॥ मलिम्लुचस्थ मासस्य 
पराख्यायाः परादरात्‌ ॥ ५५॥ उपोषणात्स कृष्णायाः पश्चरात्रत्रतेन च ॥ सवपापविनिमुक्तः 

सर्वेतौर्यसमन्वितः ॥५६॥ भुक्‍त्वा भोगान्ख्िया सार्धमन्ते विष्णुपुरं ययों ॥ श्रीकृष्ण उबाच॥ 
पथ्वरात्रभवं पुण्ये मया वक्‍तुं न शकक्‍यते ॥ ५७ ॥ तथापि किखिद्रक्ष्यामि येन चीण परात्रतम्‌॥ 
सस्‍्नातानि पुष्कराद्यानि गड़ाद्याः सरितस्तथा ॥ ५८॥ घेतुसुर्यानि दानानि तेन चीणानि 
स्वेथा ॥ गयाश्राद्धं कृतं तेन पितरः परितोषिताः ॥ ५९ ॥ ब्रतानि तेन चीर्णानि व्रतखण्डो- 
दितानि वे ॥ द्विपदां ब्राह्मणः श्रेष्ठो गोवेरिष्ठा चतुस्पदाम्‌ ॥ ६० ॥ देवानां वासवः श्रेष्ठस्तथा 
मासों मलिम्ह॒ुचः ॥ मलिम्ल॒चे पश्चरात्रं महापापहरं स्मृतम्‌ ॥ ६१ ॥ पश्चरात्रे च परमा पत्चिनी _ 
पापशोषिणी ॥ सेकाप्यशक्तेः कतेव्याउवश्यं भकत्यों विचक्षणेः ॥६२॥ मालुष॑ जनरासाथ 











'कर्मनिष्ठ ब्राह्षमको भोजन करावे । ४५। वह पघमस्त देव 


है... रैक हल 
करावे दुकर उसम निवास करा, सुमेधा त्राह्मणको जीवन निर्वाह 
असुर दानव और मनुष्योंसे पूण भुवनमण्डलकों भोजन 


करानेवाले ग्रामका भी दान किया.॥ ५३ | ५४ ॥ पीछे 


कराकर तृप्त करचुका । जिसने त्राह्मणके लिय छुमघुर जल- 
पूर्ण कछशका प्रदान किया है ॥ ४६ ।॥ उसने समस्त चरा- 
चरोंसे पूण अह्माण्डका राज्य प्रदान करदिया । विद्वान 
ब्राह्मणको तिहुपूर्ण पात्रका जो दान करता है ॥ ४७ ॥ हे 
साध्वि! वह जितने तिल हों उतनेही वर्षौतक स्वर्गमें निवास 
करेगा। पाँच द्निपयन्त प्रातःकाल नित्यस्नान करता हुआ 
जो मलुष्य घृलपूणकलूश देता है. ।। ४८ ॥ वह न्ञानाविध 
विपुरुभोगोंको भोगकर सूयलछोकमें प्रतिष्ठाका भागी होता 
हैं। जो मनुष्य पांच दिन तक त्रह्मचय्येकी रक्षा करता हुआ 
नियतात्मा रहे ॥ ४९॥ वह स्वगंमें अप्सराओंके संग सान- 
न्द्‌ द्व्यभोगोंको भोगता है हे साध्वि ! हे शोभने ! तुम 
अपने पतिक साथ पश्चरात्रको करो ॥५० ॥ जिससे हे 
' झुब्रते ! तुम इस छोकमें धनधान्यकी सम्पत्तिक सुखकों 
“भोगफर स्वग॒ंको प्राप्त होंगी । इस प्रकार कौन्डिन्यमुनिन 
'कहा, पवित्रा जाद्मणीने अपने साथ बडे प्रेमस अधिकमा- 
, “खन्ने प्रातःकाछमें स्‍तान करके परमा एकादशीके दि्नसे 
', पच्चरात्र ऋ्रत किया फिर उस ब्रतको पूर्ति होतही ॥ ५१। 
8५९ ॥ राजम्रहछस अपने समीप आते हुए एक राज/को 
' ) देखा जाने विधाताकी प्रेरणास विना माँगेही आप 


४ 
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350. है है ८69४ ७, ५५३३५ ८ ॥8५ 
॥ ग्क पु ५) शा: पल: 6777 हक, 5 
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॥ 3 "भा 89७ भोंग्य है पदार्थोंसे रे नदीं 
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प्‌ छुल्दर भोग्य पदार्थोंस पूण नवींच मकान 
है का 0 ' ण्ा ड़ 
हा । हो । ह 
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राजाने 
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वह राजा प्रसन्न होकर उसके तपकी प्रशंसा करके अपने 
महरूमें वापिस चछा गया। मलूमासमें कृष्णपक्षवाढी 
परमा एकादशीके दिन परम आदर पूर्वक ॥ ५५ ॥५३॥ 
उपवास तथा पथ्चरात्र ब्रतानुष्ठानके करनेंस समस्त- 
पापोस रहित ओर सब सुखसम्पन्न होकर वह सुमेष्षा 
अपनी प्रिया पवित्राके संग इस छोकमें नानांविध भोगों- 
को भोग अन्‍्तममे मोक्षपदको प्राप्त होगया । श्रीक्षप्णचन्द्र 
राजा युधिष्ठटिरसे बोढे कि, में पश्चरात्रत्रतके पुण्यकी महि- 
माका वर्णव नहीं कर सकता ॥«७॥ फिर भी कुछ कह्दता 
हैँ, जिसने यह व्रत किया है उसने सब पुष्क्रादि वी 
गड़रादि दिव्यनदियोंमें स्नाव कर लिय ।।५८॥ गो आदि“ 
कॉको दानभी सर्वधा उसने कर ढिय, गयाश्राद्ध करके 
अपने पितृगणकी ठप्तिभो अच्छी वरहसे करढी ॥५९ ॥| 
ब्रतखण्डमें अतोंके असझूमें शाखकारोंने जो जो ब्रव कई 
है वे सब ब्रत भी उसने करलिय, अथांत्‌ इस पशरात्र 


बतानुष्ठानसेही यह सब फल मिल जाता हैं। जेस दो चर" 


णवाढॉमें ब्राह्मण, चारचरणवा्ॉमें गौ ॥६०।। देवतार्जामे 
इन्द्र श्रेष्ठ है, वेसही महीनोंमें अधिकमहीना भी अष्ठ है। 
पंचरात्रके ब्रतमें पद्चिनी पापोंकी परम नाशक है॥ $१/ 
पर जो चतुर अशक्त हों उन्हें इसे अवश्य करना चाहिये 


... बानके नित्य धामको चले जाते हैं ॥| ६६॥ यह अधिक- 


ब्रवानि] ' भाषाटीकासमेतः । (४७५ ) 








-. ब्न स्‍्नातो येमलिम्लुचः ॥ ते जन्मघातिनों नूने नोपोष्य हरिवासरे ॥ ६३॥ योनीज्ेमद्विश्व- 
- हुरशीतिलक्षाणि मानवेः॥ प्राप्यते माठुषं जन्म दुर्लभ पुण्यसश्ययः ॥ ६४॥ तस्मात्कार्य प्रथ- 
लेन परमाया व्रतं शुभम्‌ ॥ श्रीकृष्ण उवाच ॥ एतत्ते सवेमाख्यातं यत्पष्टोएहे त्वयानच ॥ ६५॥ 
मलिम्ल्चस्थ मासस्‍्य परमायाः शुभ व्रतम्‌ ॥ तत्सवे ते समाख्यातं कुरुष्वावहितों नृप 
॥ ६६॥ ये त्वेवं खुवि परमा व्रतं चरन्ति सद्धक्त्या सुभविधिना मलिम्लुचे वे ॥ ते भ्रकत्वा 
दिवि विभवं स॒रेन्द्रतुल्यं गच्छेयुद्चिछुवननन्दितस्यथ गेहम्‌ ॥ ६७ ॥ इत्यधिककृष्णेकाद्इ्या: 
परमाख्याया माहात्म्यं समाप्तम्‌ ॥| 


अथ द्वादशीव्रतानि लिख्यन्ते ॥ 
दमनोत्सव: ॥ 


'तत्र चेत्रशुकद्वादश्यां दम नोत्सव/---द्वादश्यां चेत्रमासस्य श॒ुक्वायां दमनोत्सवः ॥ बोधाय- 
नादिमिः पोक्तः कर्तव्यः प्रतिवत्सरम ॥ इति रामाचंनचनद्रकोक्तेः ॥ ऊर्जे ब्रत॑ मधों दोलां 





क्योंकि, रामाचन चन्द्रिकार्में लिखा हुआ है कि, चत्र शुक्ला 
द्वादशोक दिन दुभनोत्सव प्रति वर्ष करना चाहिए। ऐसा 
वोधायनादिकोंने कहा है । [ दमन या दूमनक अशोकके 


ले मूलमंत्रको पढ़कर, दे देव देव | हे जगवके स्वामी | हे मनोकाम- 
नाओंके देनेवाले ! हें कामेश्वरीके प्यारे ! मेरी मनोकामनाओंको पूर्ण 
प्री बोछे कि, ; | कर हैं देव | इस अशोकके फूलको ग्रहण करिये एवम मुरूपर कृपा- 
क्‍ था, वो सब मैंने तुम्हें कह दिया है॥ ६५॥ और | पक ; 
क्‍ - 8८ जाली डा बज भ जता ही कहददियां है| नये इस पुजाक ६) कर हे नहा गत: पीछे किए महा 
| हेल्प ! एकाम्र चित्त होकर करिये। ६६॥ जो सच्ची | बम दे्‌ हर दूसरे का हि अल उसे उसी देवताके अंग - 
भक्तिके साथ शुभ विधिसे परमाके शुभ ब्रतकों मलमाममें | हाओ बडी ले अनाज कक । पीछे मणि ओर विहु- 
करते हैं वे खगेमे इन्द्रके समान वैभवकों भोगकर भग- | मॉकी मालाओं एवम्‌ मन्दारके फूल आ यह आपकी संत्रत्सरमें 
“म * | होनेवाली पूजा की दे हें गदडघ्वज ! आप इसे ग्रहण करिय, हैं किष्शों ! 


के 5 | जैसे वनमाला हृदयपर और कोस्‍्तुम आपके कण्ठमें पढी रहती 
मासकी क्ृृष्णा परमा एकादशीके त्रतका सहात्म्य पूरा। « (० तरह मेरी बनाई हुई यद अऋशोकके फूर्लोकी माड़ा गे 


॥ ६२॥ मनुष्य जन्म छेकर जिन्होंने अधिकसासमें स्लान 
नहीं किया वे एकादशीके ब्रतको न करके जन्म घातीही हैं 
॥ ६३ ॥ चौरासी छाख योनियॉमें श्रमते २ पूव् पुण्योंसे 
बढ़ी कठिनताके साथ मनुष्यदेह मिलता हैं ॥ ६४ | इचप्च 
कारण प्रयत्नके साथ परमाका पवित्र ब्रत करना चाहिए । 
श्रीकृष्ण भगवान बोले कि, हे निष्पाप | जो आपने मुझे 












हुआ।॥ इसके साथ एकादशीके माहदात्म्यभी पूरे होते हैं. ॥ 
द द्वादशीव्रतानि ॥ 


ञब द्वादंशीके त्र्त कहे जाते हे | द्मनोत्सव इन द्वाद- | 
ः 8 श्लियोंक ब्रतोंमें चेत्र शुद्धा द्वाद शी को दमनोत्सव होता हैँ 


. १ जैसे अन्य तिथियोंका साथह्दी निर्णय किया है उस तरह द्वाद- | 
शीका यहाँ निणेय नहीं देखा जा रहा है इस कारण इसेभी करते हैं- | 


बुग्म वाक्‍्यसे द्वादशी पूर्वादी लेनी चाहिये स्कन्दपुराणमें कहा हे कि, 
हे प्रभो | एऋदशी युता द्वादशीकरों करना चाहिये । 

२ दमनोत्सव क्यों ओर केब करना चाहिये। यह तो अ्तराणने 
लिखा दे पर केसे करवा चाहिये इस विषयपर कुछ नहीं लिखा है। 
इस कारण उसे यहां लिखना आवश्यक समझूते हैं । यद्यपि इसकी 


और मेरी पूजा हृदयमें रहनी चाहिये इसे जल्दी न भूलियेगा | ज्ञान 
| अथवा अज्ञानसे जो आपका पूजन न किया गया द्वो वह सत्र हे 
रमापतें ! आपकी प्रसन्नतासे पूरा होजाय,दें विध्के उत्रादक पुण्डरी- 


काक्ष | तेरी जय हो / हैं मद्ापुरष | हें सनातन हे हृषीकेश ! तेरे लिये 


| नमस्कार दे । (६ मंत्र हीनम्‌ ) इससे प्रार्यता कर फिर पंचोपचारसे पूज 


झारती करके पारणाकर लेनी चाहिये जो उपचीतादिसे द्वीन हो वे 
नामसे ही समर्पण करें। विशेष-जिप द्वादशीको एक्रादशीकी पारणा 


| हो उ्ीमें यह विधान हे दूसरीमें नहीं क्‍यों कि, वहीँ यह कहा है कि, 
 पारणाके दिन द्वादशी घटिका मात्रमी न मिले तो पवित्र ओर दमना- 
| रोपणामें त्रयोदशी लेनी चाहिये यह हे दमनारोपशका मुख्य काल, 
| वहां ही इसका गोण कालमी कहा दे कि, यदि चेत्रमें विप्तके कारश 
| अशोर्केफूल मगवानपर न चढाये जा सकें तो वैशाख या श्रावणमें 
कारवाई एकादशीकी रातसेही प्रारंभ होजाती दे पर वो एकादशीमम हे | 
द्वादशीके दिनसे उसका सम्त्ंध नहीं है इप कारण रातके द्वोनेवाले | 
पूजवादिऋके विषयको छोड कर द्वादशीके दिन होनेवाले कत्योंका | 
बेन करेंगे- द्वदशीके दिन प्रातःकाल नित्य पूजादिसे निवत्त हो पीछे | 
इष्ट देवका पूजन कर अक्षत दूर्बा ओर गन्धके साथ अशोकके फूलोंको 


उसी तिथिको चढाने चाहिये यह कृत्य श्रावशतंक शुक्रास्‍्तमेंमी कर 
लेना चाहिये ऐसा नारदका वाक्य है । यह भी पाठान्तर है । यह 


| मलमासमें न करना चाहिये क्यों कि, कालादशमें लिखा है कि, उपा- 


कर्म, उत्सग,पवित्र और दमनोत्सव ये सब मलमासमें निषेव किये हैं। 
किन्तु दो मासोमेंसे पहिलिसें करले ॥ 


( ४७६ ) ब्रतराजई$ । [ द्वादझ्ी- 





श्रावणे तन्त॒पूजनम्‌ ॥ चेत्रे च दमनारोपमकुवांणों व्रजत्यधः ॥ इते तत्रेव पाह्मवचनाञ्व ॥ इद 
शुक्रास्तादावपि कार्यम्‌॥ उपाकमॉत्सजन च पवित्र दमनापंणम्‌ ॥ इंशानस्य बल विष्णोः 
शयन परिवर्तनम्‌ ॥ कुर्याच्छुक्रस्य च गरोमेटयेप्पीति विनिश्चयः ॥ इति बृद्धगाग्येवचनाव ॥ 
इति चत्रशुक्कदादशी ॥ ह 
वेशाखशुक्द्रादशी ॥ मे 
वेशाखशुक्ृद्वाद्श्यां योगविशेषों हेमाद्रो--पश्चाननस्थों गुरुभूमिप॒त्रों मेषे रावेः स्थाचदि 
शुक्कपक्षे ॥| पाशाभिधाना करभेण युक्ता तिथिव्यतीपात इतीह योग: ॥ अस्मिस्तु गोभूमि- 
हिरण्यवद्धदानेन से परिहाय पापमू॥ खुरत्वमिन्द्रत्वमनामयत्व॑ मुर्त्याधिपत्यं लभते मलुष्यः॥ 
पश्चानन$ सिंहराहशिः ॥ पाशामिषाना तोयदादशी ॥ करमी हस्तः ॥ इति वेशाखशुकृदादशी ॥ । 
ह आषादशक्ुद्वादशी ॥| " हे 
आपषादशुक्ूद्ादश्यामत॒राधायोगराहितायां पारणं कुर्यात्‌ ॥ तथा च हेमाद्रौ भविष्ये- 
आभाकासितपक्षेष मेत्रश्नवणरेवती ॥ संगमे न हि भोक्तव्यं द्ादश द्ादशीहैरेत ॥ 
अस्यार्:---आषाटभाद्रकार्तिकशुक्कद्ादशीष्वत॒राधाश्रवणरेवतीयोगे पारणं न कुयात्‌ ॥ अब - 
यद्यप्येतावदेंबोक्ते तथाप्यठराधात्रथमपाद एव वज्ये॥तदुक्त विष्णुधर्में---मेत्राद्यपादे स्वपितीह - 
विष्णु) पोष्णान्त्यपादे प्रतिबोधमेंति ॥ अलेश्व मध्ये परिवर्तमेति खुसिप्रवोधपरिवतंनमेव 
वज्येः ॥ इत्याषाटशुक्ृद्ादशी ॥ कि 
अथ श्रावणशुक्कुद्वादृश्यां दृषित्रतम्‌ | 
अज् तक्रादीनाँ त्वनिषधः।॥ तत्र दधिव्यवहाराभावात्‌ ॥ अज्रेव द्वादश्यां विष्णोः पविक्नरोपण- 
मुक्त हेमाड़ो विष्णुरहस्ये----अश्रावणस्प सिते पक्षे ककंटस्थे दिवाकरे । द्वादश्याँ वासुदेवाय 
पवित्रारोपणं स्मुृतम्‌ ॥ द्वादशयां श्रावणे वापि पश्चम्पामथवा द्विज ॥ अत॒कूलेबु कतेव्य पश्च- 


फलका नाम है। | पद्मपुराणमं छिखा हुआ हैं कि, कात्ति 
कमें व्रत, चैत्रम दोठा और श्रावणमे तन्तुपूजन, ( पवित्रा- 
रोपण ! एवं चत्रमें दमनोत्सव इनको न करके अधःपतन 
होता है। यह रामाचनचन्द्रिकामें छिखा है | इसको शुक्रके 
अस्तादिकॉमें भी करना चाहिए; क्योंकि; वृद्ध गाग्यका 
वचन है कि-उपाकम ( श्रावणी ) उससजेत (बेदुका उत्स: 
जन ) पवित्रारोपण, दमनोत्सव, ईशानकी वि, शयनी, 
परिवर्तिनी इनको. गुरु और शुक्रके अस्तादिकमें भी करना 
चाहिये, यह निश्चयहें। इति चत्रश॒ुद्धा द्ादशीका विधान ॥ 
वेशाखशुक्का द्वादक्षी-हेमाद्विन इसमें योग विशेष कहा 
रे 3 ७ ञ५ * 
हैं कि, वेशाख शुक्ला द्ादशीके दिन सिंहके गुद्द और 
मड्गछ हों मेषके रवि एवं पाशा हस्तनक्षत्रस युक्त हो तो 
इसमें व्यतीपात योग होगा । इस योगमें यो, भूमि, सोना, 
वस्ध इनका दान करनेसे सब पापोंको परित्याग करके 
मनुष्य, देवपना, इन्द्रपना, निरोगता और राजापनेकी प्राप्ति 
करता है। पंचानन सिंहराशिको कहते हैं, पाशानामकी 
तिथि द्वादशी है । करमनाम हस्तनक्षत्रक्रा है । इति वैशाख 
'शुह्वा द्वादशी ।। 
आषाहढ शुक्भाद्मदशीके दिन पारणा हेसाद्रिने सविष्य- 
.-उुराणसे छकर छिखी हैं कि, अनुराधांके योगसे रहित 
.» शीबाढ़ रुद्धा द्वाइशीके दिन पारणा करनी चाहिए, इसका 








प्रमाण वाक्य यह हैं कि, आ, भा. का, इनके शुक्लपक्षोर्त 
मेत्र,अवण और रेबतीक संगममें मोजन न करना चाहिए; 
क्योंकि इसमें भोजन करनेसे बारह द्वाइशियोंको नष्ट 
करता हैं। आ भा का-प्रन्थकार अथे करते हैं कि आषाढ, 
भाद्रपद ओर कात्तिककी रुक्का द्वादशियोंमें ऋ्रमस अनुः. 
राधा, श्रवण और रेवतीके योगम पारणा न करनीचाहिए :. 
यद्यपि उक्त वचनमें इतनीही बात कही गयी हे पर तो भी 
अनुराधाका प्रथणथ चरणही वजनीय है यह विष्णुधममें 
लिखा हुआ हैं कि, अनुराधाके पहिले चरणमें विष्णु भय 
वान्‌ सोते हैं तथा रेवबदीके अन्तिम चरणमें जागते हूँ । 
श्रवणके मध्यमें करवट बदलते हैं । इस कारण सोने जागने 
ओर करवट बद्लनेके समयका ही भोजनमें निषेध है। 
दूसरे पादोंका नहीं है । (नि० कार० इसके वचनको 
निमूल मानते हैं ) यह आषाढ शुझ्भा द्वादशीके दिनकी 
पारणाका निशंय समाप्त हुआ ॥ हे 
द्धिब्रत-श्रावणशुह्भा द्वादशीके दिन होता है इसमें तक 
आदिका निषेध नहीं है, क्योंकि, इसमें दह्दीका व्यवद्दार 
नहीं होता | पवित्रारोपणभी इसी द्वादशीके दिन विष्णु 
०. ्र्‌ रु ञ्् का 
रहस्यमें कहा हे जिसे कि, हेमाद्विने उद्धत किया हूं कि, 
श्रावण शुकुपक्षम कर्केटपर सूय्येके रहते भगवानके छिए पवि 
>ौ-----------२ ० ० न चाहिए, इसका | त्रारोपणकहागयाह,हेद्धिज! श्रावणशुक्धा या भरावणनक्षत्रदु ! श्रावणशुक्ला या भ्रावणनश्षत्रयुत 


।.. , . .* ९ “पोौषस्य रोहिण्यां मध्यमायां वाष्टकायामध्यायानुत्सजरब ” इतिगृह्मीक्तंकम । 





भाषाटीकासमेतः । ( ४७७ ) 











दृश्यामथापि वा ॥ गोंणकालमाह रामाचनचन्द्रिकायाम्‌-पवित्रारोपणं विप्लाच्छावण न भवि- 
धष्याति ॥ कार्तिक्यवधि शुक्रास्ते कतंव्यमिति नारदः ॥ हेमरौप्यताम्रक्षौमेः सत्रेः कौझोय- 
पद्मजेः ॥ कुशेः काशेश्व कापासेब्रांहण्या कतितेः शु॒भेः ॥ कृत्वा त्रिगुणितं सूत्र त्रिगणीकृत्य 
शोधयेत्‌ ॥ तत्रोत्तमं पवित्र तु षष्टया सह शतेख्रिभिः ॥ सप्तत्या सहित द्वाभ्यां शताभ्यां 
मध्यम स्मृतम्‌ ॥ साशीतिना शर्तेनेव कनिष्ठ तत्समाचरेत्‌ ॥ साधारणपतवित्राणि त्रित्निः सत्रेः 
समाचरेत्‌ ॥ उत्तमं तु शतग्रन्थि पश्चाशद्अन्थि मध्यमम्‌ ॥ कनिष्ठे त॒ पवित्र स्यात्पट्राप्ेंशदम्न्थि- 
शोभितम्‌ ॥ षट्त्रिशक्च चत॒ुविशदद्वात्रिशदिति केचन ॥ चतुविशवद्ादशाष्टावित्येके सुनयो 
विदुः ॥ शिवपवित्र तु॒॒तत्रेव शेवागमे--एकाशीत्यथवा सूत्रेख्चिशता वाष्टयुक्तया ॥ पश्चादता 
वा क॒तंव्य॑ तुल्यग्रन्थ्यन्तरालकम॥ द्वादशाडःगुलमानानि व्यासादष्टास्गुलानि वा ॥लिड्रविस्तार 
मानानि चतु॒रड्गुलकानि वा॥इति॥ एतच्च नित्यम।न करोति विधानेन पवित्रारोपणं तु यभशातस्थ - 
सांवत्सरी पूजा निष्फला मुनिसत्तम।तस्माद्धक्तिसमायुक्तेनरेविंष्णुपरायणेः वर्षे वर्ष प्रकर्तव्यं 
पवित्रारोपण हरे? इति तत्रेवोक्तेः ॥ इति श्रावणशुक्कद्वादरयां विष्णुपवित्रारोपणविधिः ॥ 
अब भद्गपदशद्धदा इशो ॥ 

अस्यां द्वादश्यां दुग्धव्रतसंकल्पः ॥दुग्धवरते तु पायसादिक वज्यंम्‌ ॥ दधिवृतादयों विकारास्तु 
ग्राह्मा एव ॥ नन्वेवं सन्धिन्यादिक्षीरनिषेधेपि दध्यादि ग्राह्म स्पादितिचेन्न; तत्र वाचनिकनिषे- 
धसत्त्वातव्‌ ॥ तदाहापराके शद्ड-क्षीराणि यान्यभक्ष्याणि तद्विकाराशने बुध: ॥ सप्तराजव्रतं कुयों 
लयत्नेन समाहित: इति ॥ व्रतम-गोमूत्रयावकर्म ॥ भाद्रशुक्रदादद यां श्रवणयोगरदितायां पारणे- 
कुृर्पात्‌ ॥ * आमाकासितपक्षेषु ” इति दिवोदासोदाहतवचनात्‌ ॥ उपोष्येकादज्ञी मोहात्पारण 





द्वादशी वा पश्चमीकेदिन अथव पंद्रसकेदिन सबके अनु कूछ 
रहते पवित्रारोपण करना चाहिए। गौणकाछ भी रामाचन 
चन्द्रिकार्मे कहा हें कि, यदि विन्नोंके कारण पवित्रारोपण 
आवशणसे न किया जा सके तो काविकी तक शुक्रास्तमें भी 
कर देना चाहिये, ऐसा नारदजीका वचन है! सोने,चौंदी , 
बामे, क्षौम, रेशम, पद्म ज,.कुश, काश, कपास इनके ब्रझ्म- 
णीक हाथसे तयार किये हुए सूतको तिह़र करके फिर भी 
उसकी तीन छर करके शोधन करे, ३६० का उत्तम पवित्र 
होता है, २७० का मध्यम होता है, १८२ का कनिष्ठ होता 
है एवं साधारण पवित्र तीन सूत्रोंक। पवित्र होता हैं, इसी 
तरह सो गॉठका उत्तम, पचासका मध्यम एवम्‌ ३६ 
गॉठका कनिष्ठ होता हैं । कोई कोई मुनि ऐसा भी कहते 
कि, छत्तीस चौवीस और चत्तीस या एवं चौवीस, 
बारह और आठ गाठोंकी संख्या होती है। शिव पवित्र- 
तो तहां ही शेवागमर्मे कहा है कि, इक्यासी, अडतीस 
अथवा पचासका बराबरकी गाठोंका वथा बराबरके 
बींचका करना चाहिये | यह बारह आठ वा चार अंगुलछ 
ढंबा अथवा लिंगकी बराबर हंबा हो। यह पतवित्रारोप॑ण 
नित्य हें क्योंकि वहीं यह कहा है कि जो विधिके साथ 
पवित्रारोपण नहीं करता, हे मुनिसत्तम ! उसकी सालभरकी 
/ जा व्यंथं हो जाती है इस कारण विष्णुपरायण परम 
भक्तोंको उचित है कि प्रतिवर्ष भगवानके ऊपर पवित्राको 


चढावें। यह श्रीश्रावणशुक्क द्वादशी की विष्णु भगवान्‌ पर 
पवित्रा चढानेकी विधि पूरी हुई ॥ क्‍ 
शुद्ध द्वादशी-भाद्रपदकी जो हो, दुग्धन्नत उसमें होता है 
उसमें ही दुग्बन्नतका संकल्य किया जाता है । दुग्धके ब्रत 
(त्याग) में खीर आदि दुग्धक वे पदार्थ जिनमें कि दूधका 
वही रूप बना हो उनका तो त्याग कहा है, पर दधि घृत 
आदि उन विकारोंछा तो ग्रहणही होता हे जो कि प्रकृतिस 
गुणान्तरमें परिणाम पा चुके हैं। इस पर शंका करते है. कि 
यदि ऐसा मानोगे कि प्रकृतिक अहणमें उसके शुणान्तरमें 
परिणत हुए विक्वार ग्रहण न होंगे तो ग्यावन गायके दूधके 
निषधर्म ऐस दूधके आपके गृहीत विकार दधि आदिका 
ग्रहण हो जायगा, इसका उत्तर देते हैं कि जेसे ग्यावन, 
गायके दूधका निषध किया है उसी तरह उसके दूधके 
विक्रारॉका भी उसी वचनसे निषेघ किया गया है इस 
कारण उसके विक्रारोंकाभी ग्रहण न होगा । यही अपराकंमें 
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शद्धका वचन हैं कि, जिन दूधोंको अभक्ष्य कद्या हैं उनके 
विकारोंके अक्षण कर लनेपर प्रयत्न पूवेझ एकाप्र चित्त हो 
सात रात ब्रत फरना चाहिये। यहां गोपृत्रकरा पान और 
यावकाज्नका भोजन त्रत कहाता हू । वाद्रपद शुद्धाद्वादरशीमें 
पारणा तो उसीमेंकरे जिसमें कि श्रवणकायोग न हो;क्योंकि 
दिवोदासीयका वचन मिलता है कि जो आपाढ, भाद्रपद्‌- 
कार्तिक इनके शुक्छ पक्षम अनुराधा श्रवण और रेबतीके 


(४७८ ) 





ब्रतराज: । 


अ्रवणे यादि ॥ करोति हन्ति तत्पुण्य द्वादशद्ादशीमवम्‌ श इति तत्रेव स्कान्दाच् ॥ अस्य तत्रेव 
प्रतिम्सदः ॥ मार्कण्डेयः-विशेषण महीपाल श्रवर्ण बद्धते यादि ॥ तिथिक्षये न भोक्तव्यं द्वादशी 


[ द्वादशी- 


लड्येन्नहि ॥ यदा त्वपरिहायों योगस्तदा अ्रवणक्षे त्रेधा विभज्य मध्यविंशतिघटिकायोग 


लक 


व्यकत्वा पारणं कार्यम ॥ तदुक्त विष्णुधमें-““श्रुत्ेश्न मध्ये परिवरतमेति' 'सुलिमबोधपरिवर्तनमेव 


श्‌ः 


बज्यम' इति ॥ केचित्त चतुथां विभज्य मध्य पादद्व्य वज्योमित्याहुः 
विष्णु संपूज्य प्रार्थथेत ॥ मंत्रस्त तिथितस्वे उक्तः--वासुदेव जगन्नाथ 


त्सवं कुर्यात्‌ ॥ संध्यायों 


प्राप्तेय द्रादशी तब ॥ पाश्वेंन परिवतेस्व खु्ख स्वापेहि माधव 
गर्गेण----द्वादहयां तु सिते पक्षे मासि भोष्ठपे तथा ॥ शुक्रमुत्थापयेद्राजा विश्व- 
द्ादशीअ्वणयोग संवोपोष्या, विष्णुश्रद्वलबि- 


मुक्तमपराके रि 
श्रवणवासरे ॥ इयमेव श्रवणद्वादशी ॥ तत्रकाददयों 


॥ अज्रेव विष्णुपरिवतंनो- 


॥ इति ॥ अजब शक्रस्योत्थापन- 


है 


* शोषयोगात्‌ ॥ द्वादशीश्रवणस्पृष्टा स्पशेदेकादशी यदि ॥ स एव बेष्णवों योगो विष्णुशदल- 


संज्ञित॥। तस्मिन्लुपोष्यविधिवन्नरः संक्षीणकल्मषः 


॥ प्राप्नोत्यतत्तमाँ सिद्धि पुनरावत्तिदुर्लेभाग्‌ 


इतिमात्स्योत्ते/॥ विष्युधर्मेंषपि--एकादशी दादशी च विष्ण्वृक्षमपि तत्र चेत्‌ ॥ तहिष्णुशडुले नाम 


विष्णुसायुज्यकृद्धवेत्‌ ॥इति॥ संस्प्रदयकादशी 
 जओछ बहाहत्यां ध्यपोहति ॥ इतिनारदीयाज् ॥ 


राजन्द्रादर्शी यदि संस्पृशेत्‌ ।' श्रवण ज्योतिषां 
दिनद्वये दादशीश्रवणयोगेषि पूवा ॥ एकादरयां 


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अ्रवणयोगामारविष ताहिन(वच्छेदेन श्रवणस्पृष्टद्वादशीयोगादेव विष्णुश्वद्चलम्‌ इते हेमाद्रिमतम्‌ ॥ 


योगमें पारणा न करनी चाहिये | [ इसका विशेष विचार 
आपषाढकी द्वादशीमें क